गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

ईमानदार नहीं बची मनमोहनी छवि

भ्रष्टों के सरदार मनमोहन

खुद को मजबूर बता चख रहे सत्ता की मलाई

सोनिया का मन नही मोह पा रहे मोहन

पीएमओ 10 जनपथ में बढ़ी दूरियां

(लिमटी खरे)

वर्तमान हालातों में यक्ष प्रश्न तो यही है कि भारत गणराज्य के वजीरे आजम होने के नाते डॉ.मनमोहन सिंह और सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया होने के नाते श्रीमति सोनिया गांधी इन घपले घोटालों और मंहगाई के मसले पर जनता को जवाब देने की जहमत उठाएंगे या फिर बिना जवाबदेही के ही खुद को मजबूरबताकर सत्ता की मलाई चखते रहेंगे



नेहरू गांधी परिवार से इतर पांच सालों से ज्यादा देश के प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य पाने वाले वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह की छवि अब धूल धुसारित हो चुकी है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने दूसरी पारी में सरकार इसलिए बना पाई क्योंकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने लाल कृष्ण आड़वाणी को बतौर प्रधानमंत्री पेश किया था, जिन पर मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि भारी पड़ी थी।

विडम्बना देखिए कि आज मनमोहन सिंह की ईमानदारी पर उनके सहयोगियों के भ्रष्टाचार भारी पड़ते जा रहे हैं। आज मनमोहन सिंह और कांग्रेस चहुंओर घपले घोटालों से पूरी तरह घिर चुकी है। कांग्रेस के सामने अब कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा है। सोनिया गांधी खुद पशोपेश में हैं कि आखिर मनमोहन जैसे ईमानदारी का चोला ओढ़ने वाले प्रधानमंत्री के रहते विपक्ष द्वारा भ्रष्टाचार को कैसे मुद्दा बना लिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के बीच खुदी खाई पटने का नाम ही नहीं ले रही है। सोनिया और मनमोहन के बीच मतभेद जाहिर होने लगे हैं। 2जी घोटाले पर विपक्ष की जेपीसी की मांग पर सोनिया गांधी पहले से ही तैयार थीं, किन्तु मनमोहन सिंह ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। पीएम के इस मामले में न झुकने से सरकार की बुरी तरह किरकिरी हो चुकी है।

आलम यह है कि सात रेसकोर्स (प्रधानमंत्री आवास) और 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के बीच अघोषित जंग का आगाज हो चुका है। सियासी बिछात पर नित्य ही नई व्यूह रचनाएं हो रही हैं। मनमोहन से त्यागपत्र मांगने का नैतिक साहस भी सोनिया गांधी नहीं जुटा पा रहीं हैं। वहीं कांग्रेस के आला नेता प्रणव मुखर्जी और राजा दिग्विजय सिंह मनमोहन के सक्सेसरबनकर न केवल उभर रहे हैं, बल्कि इसके मार्ग भी प्रशस्त कर रहे हैं।

दरअसल, मनमोहन के अधीन काम करने में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी अपने आप को असहज ही महसूस करते आए हैं, दादा ने भी पीएमओ के खिलाफ सोनिया की तरह ही अघोषित जंग का एलान कर दिया है। इसका कारण यह है कि जब वे वित्त मंत्री थे, तब उनके अधीन काम करने वाले अफसरान में डॉ.मनमोहन सिंह पांचवे क्रम वाले अफसर हुआ करते थे। तब और अब में जमीन आसमान का अंतर है। उस दर्मयान डॉ.मनमोहन सिंह को सीधे प्रणव मुखर्जी से मिलना बेहद मुश्किल होता था, इसमें प्रोटोकाल आड़े आता था।

अब वही अदना सा अफसर (डॉ.मनमोहन सिंह) छः साल से ज्यादा समय से दादा को सीधे निर्देश देने की स्थिति में है। दादा की पीड़ा समझी जा सकती है। पिछले दिनों बैंक चला गांव की ओर कार्यक्रम में प्रणव मुखर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को तो बुलावा भेजा किन्तु देश के वजीरे आजम को न्योता भेजना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा। इसके साथ ही साथ मनमोहन सिंह सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री भी हैं, सो इस लिहाज से वित्त मंत्री को उनसे मशविरा कर ही कोई कदम उठाना चाहिए, वस्तुतः एसा हो नहीं रहा है। प्रणव मुखर्जी बिना पीएम की सलाह के ही सारे निर्णय ले रहे हैं। उधर गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम की निष्ठा प्रधानमंत्री में गहरी होती दिख रही है।

भारत गणराज्य में छः से ज्यादा दशकों से लोकतंत्र कायम रहना ही अपने आप में सबसे बड़ी बात और मिसाल है। स्वतंत्र भारत में अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार है संप्रग दो की मनमोहन सिंह सरकार। अब तक इस सरकार के तीन लाख करोड़ रूपए से अधिक के घपले घोटाले सामने आ चुके हैं। जब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया जा रहा था, तब उनकी दो योग्यताओं को हाईलाईटेड किया गया था। अव्वल तो वे निहायत ईमानदार हैं, दूसरा वे बड़े अर्थशास्त्री हैं। घपले घोटालों, और रिकार्ड ध्वस्त करती मंहगाई ने मनमोहन सिंह की दोनों ही योग्यताओं पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश के कथित ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस पर सवा दशक से ज्यादा समय से राज करने वाली श्रीमति सोनिया गांधी ने स्वतंत्र भारत के वर्तमान को दागदार किया है। सोनिया की नाक के नीचे प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री का कार्यालय, मंत्रियों और अन्य सहयोगियों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। टूजी घोटाले के बाद देश की न्यायपालिका को विधायिका से प्रश्न पर प्रश्न करने पर मजबूर होना पड़ा।

देश के इतिहास में पहली बार हुआ जब शीर्ष अदालत ने प्रधानमंत्री से यह पूछा था कि इतने बड़े घोटाले के बाद भी आदिमत्थू राजा अब तक मंत्री पद पर कैसे बैठे हैं? अदालत ने यह भी कहकर प्रधानमंत्री को शर्मसार कर दिया था कि राजा पर मुकदमा चलाने की मांग पर पीएमओ ने दो साल तक कार्यवाही क्यों नहीं की?

इसके बाद एक अदालत ने फिर देश के कथित ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को शर्मसार होने पर यह कहकर मजबूर कर दिया कि घपलेबाज विलासराव देशमुख को मंत्री बनाना शर्मनाक है! ये सारे मामलों में अखबारों की रोशनाई अभी सूखी भी नहीं थी कि एस बेण्ड घोटाले की आग में पीएमओ झुलस गया। यह मामला अंतरिक्ष विभाग का है, जिसके मुखिया कोई और नहीं डॉ.मनमोहन सिंह ही हैं।

प्रधानमंत्री की पसंद के चलते सीवीसी बने थामस ने प्रधानमंत्री को कम शर्मसार नहीं किया। चोरी और सीना जोरी की कहावत को चरितार्थ करते हुए थामस ने देश की सर्वोच्च अदालत में यह कहकर सभी को चौंका दिया कि संसद में कानून बनाने वाले 153 सांसदों पर आपराधिक और 74 पर तो गंभीर आरोप हैं, फिर उनके सीवीसी बनने पर किसी को क्या आपत्ति होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने थामस को सीवीसी बना दिया है, जिस विभाग में सभी की जन्म कुण्डलियां हैं, जो थामस के हाथ लग चुकी हैं। आज की तारीख में थामस बारगेनिंग की स्थिति में आ गए हैं, और सरकार बेकफुट पर। हालात देखकर कहा जा सकता है कि अब थामस को हिलाने की स्थिति में सरकार कतई दिखाई नहीं पड़ रही है। अव्वल तो सरकार ने आरंभ में थामस का बचाव कर उनके हौसले बुलंद कर दिए जिसके परिणामस्वरूप आज अदना सा नौकरशाह न केवल देश की शीर्ष अदालत को चुनौति दे रहा है, वरन् सरकार और देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंच (सांसदों) को ही आंख दिखाने की स्थिति में आ गया है।

वर्तमान हालातों में यक्ष प्रश्न तो यही है कि भारत गणराज्य के वजीरे आजम होने के नाते डॉ.मनमोहन सिंह और सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया होने के नाते श्रीमति सोनिया गांधी इन घपले घोटालों और मंहगाई के मसले पर जनता को जवाब देने की जहमत उठाएंगे या फिर बिना जवाबदेही के ही सत्ता की मलाई चखते रहेंगे? राष्ट्रमण्डल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम, आदर्श आवासीय सोसायटी, एस बेण्ड घोटाला आदि के साथ ही साथ सीवीसी की नियुक्ति आदि जैसे ज्वलंत मसलों पर देश की जनता अपनी चुनी हुई सरकार से स्पष्टीकरण मांग रही है, देश के कथित ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के साथ ही साथ कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी भी जनता के द्वारा करों के माध्यम से दिए गए पैसे की इस होली को चुपचाप देखा और सुना जा रहा है। इन सभी की चुप्पी से साफ हो जाता है कि इन घपले घोटालों के जगमगाने वाले लट्टुओं को को करंट, कहीं न कहीं प्रधानमंत्री और नेहरू गांधी परिवार की बेटरी से ही मिल रहा है।

एमपी में एनएसयूआई निष्क्रीय


मीनाक्षी का पत्ता काटने में जुटे कांग्रेसी
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। कांग्रेस की नजरों में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी की करीबी एवं मध्य प्रदेश से मंदसौर संसदीय क्षेत्र की संसद सदस्य सुश्री मीनाक्षी नटराजन सूबे के वरिष्ठ कांग्रेसियों की आखों में खटकने लगी हैं। अंग्रेजी पर बेहतर पकड़ के चलते राहुल गांधी की टीम में शामिल मीनाक्षी को मुख्य धारा से अलग करने के लिए कांग्रेसियों ने उनके खिलाफ गुप्त रूप से विषवमन करना आरंभ कर दिया है।
 
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने इस मर्तबा हुए मंत्रीमण्डल फेरबदल में मीनाक्षी नटराजन को कुनबे में शामिल करने का मन बना लिया था। जैसे ही यह बात सूबे के आला कांग्रेसी नेताओं को पता चली उन्होंने आपरेशन मीनाक्षी को अंजाम देना आरंभ कर दिया।
 
बताया जाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी सहित राहुल गांधी को मीनाक्षी के प्रभार वाले एनएसयूआई की हकीकत से दो चार करवा दिया। इसमें विशेष तौर पर मध्य प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के गर्त में जाने की बात को पेश किया गया। इतना ही नहीं मीनाक्षी के संसदीय क्षेत्र के अंर्तगत आने वाले मंदसौर और नीमच जिलों में एनएसयूआई की जमीनी हकीकत से दो चार करवा दिया। इतना ही नहीं संगठन में चुनावों के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में औंधे मुंह गिरी थी एनएसयूआई।
 
एआईसीसी में चल रही चर्चाओं के अनुसार मीनाक्षी नटराजन की जिद के चलते ही एनएसयूआई के मध्य प्रदेश के निर्वाचित अध्यक्ष आकाश आहूजा को रूखसत होना पड़ा। मीनाक्षी के संसदीय क्षेत्र मंे मंदसौर जिले में एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं की संख्या महज डेढ़ सैकड़ा ही बताई जा रही है।
 
उधर राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने मीनाक्षी नटराजन को मध्य प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपने का मन भी बनाया हुआ है, किन्तु जब जमीनी हकीकत से वे दो चार हुए तो उन्होंने अपना इरादा लगभग त्याग ही दिया है। माना जा रहा है कि बजट सत्र के उपरांत गठित होने वाली एआईसीसी से भी मीनाक्षी नटराजन को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। वैसे मीनाक्षी के नेहरू युवा केंद्र के उपाध्यक्ष रहते हुए भी कोई खास उपलब्धियां हासिल न होना भी इसका एक प्रमुख अस्त्र बनाया जा रहा है, उस दौरान भारत के स्वतंत्रता संग्राम के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर मेरठ से दिल्ली तक निकली यात्रा में भी व्यपक स्तर पर भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया जा रहा है।
रेल सुविधाओं के प्रति लापरवाह हैं मीनाक्षी

नीमच और मंदसौर जिलों में रेल सुविधाओं के प्रति सांसद मीनाक्षी नटराजन बहुत ज्यादा संजीदा नजर नहीं आ रही हैं। इस रेल बजट में अगर इन जिलों को कुछ मिला तो वह निश्चित तौर पर ‘बिल्ली के भाग से छीका टूटा‘ की कहावत को ही चरितार्थ करेगा। हाल ही में मीनाक्षी नटराजन के कार्यालय से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि रेल सुविधाओं के लिए उन्होंने रेल राज्यमंत्री मुनिअप्पा से भेंट कर उन्हें अनुरोध पत्र सौंपा है। मीनाक्षी नटराजन के पास इतना समय नहीं है कि वे रेल मंत्री ममता बनर्जी से मिलकर क्षेत्र की रेल सुविधाओं के बारे में अनुरोध करें।

कौन होगा दिल्‍ली का नया एलजी


एलजी के उत्तराधिकारी की तलाश तेज

अग्रवाल, चावला, पाल, दुग्गल के नाम आए सामने
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। दिल्ली की निजाम शीला दीक्षित और उपराज्यपाल (एलजी) तेजिंद्र खन्ना के बीच अनबन किसी से छिपी नहीं है। लगता है जल्द ही शीला दीक्षित को एलजी से छुटकारा मिल सकता है। खन्ना का कार्यकाल इसी माह समाप्त हो रहा है, और उनके उत्तराधिकारी की तलाश तेज हो गई है। कांग्रेस के आला नेताओं ने अपने अपने पसंदीदा नामों के लिए लाबिंग तेज कर दी है।
 
दिल्ली के उपराज्यपाल के लिए जो नाम अब तक उभरकर सामने आए हैं, उनमें केंद्र शासित प्रदेश काडर के 1970 बैच के नौकरशाह रहे एस.पी.अग्रवाल का नाम सबसे आगे चल रहा है, इसके बाद नवीन चावला, विनोद दुग्गल और दिल्ली के पुलिस आयुक्त रहे के.के.पाल के नाम हैं।
 
बताया जाता है कि अग्रवाल और सीबीआई के तत्कालीन निदेशक रहे उनके मित्र ने उनके नाम को हरी झंडी दे दी है। माना जा रहा है कि दिल्ली के अगले उपराज्यपाल अग्रवाल ही होंगे, किन्तु अगर कंेद्र ने अग्रवाल के नाम पर मुहर लगाई तो कांग्रेस को कंेद्रीय सतर्कता आयुक्त थामस की स्थिति से दो चार होना पड़ सकता है।
दामन उजला नहीं है अग्रवाल का
 
हाल में पारसनाथ बिल्डर्स के लिए काम करने वाले एस.पी.अग्रवाल दिल्ली से प्रमुख सचिव स्वास्थ्य के पद से सेवानिवृत हुए हैं। वर्ष 1983 में जब वे खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति महकमे के आयुक्त थे, तब उनके खिलाफ एक जांच आहूत की गई थी। इसके बाद जब 1987 में वे दिल्ली नगर निगम के उपायुक्त थे तब सीवीसी ने उनके खिलाफ जांच का आदेश दिया था। इतना ही नहीं अपनी सेवानिवृत्ति के पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के प्रमुख सचिव की पदस्थापना के दौरान उन पर लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में एक अधीक्षक की नियुक्ति के मसले में केंद्रीय जांच ब्यूरो में प्रकरण चल रहा है।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

संगठन की निष्क्रीयता से बैचेन हैं राजमाता

भ्रष्टाचार के मकड़जाल में उलझी नौकरशाही से त्रस्त हैं सोनिया
 
सत्ता और संगठन में अमूलचूल बदलाव कर सकतीं हैं कांग्रेस अध्यक्ष
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी पारी में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के उजले दामन पर लगे भ्रष्टाचार के दागों और निष्क्रीय पड़े कांग्रेस संगठन से सोनिया गांधी बुरी तरह आहत नजर आ रही हैं। सोनिया को उनके सलाहकारों ने मशविरा दिया है कि संसद के बजट सत्र के एन बाद सत्ता और संगठन को नए सिरे से आकार दिया जाए। वहीं दूसरी और प्रधानमंत्री से सोनिया के बीच खाई पटने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है।
 
कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि सोनिया गांधी चाहती हैं कि भ्रष्टाचार और मंहगाई के मामले में केंद्र सरकार शीघ्र ही कड़े और प्रभावी कदम उठाए। गौरतलब है कि लंबे अरसे से 10 जनपथ और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच दूरियां बढ़ने की खबरें सियासी गलियारों में फैलने लगी हैं।
 
सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस की राजमाता को उनके एक सलाहकार ने यह कहकर भी परेशान कर दिया है कि डॉ.मनमोहन सिंह जैसे खालिस ईमानदार छवि के व्यक्ति को देश का वजीरे आजम बनाने के बाद भी विपक्ष भ्रष्टाचार को आखिर मुद्दा बनाने में कैसे कामयाब हो गया है। घपले और घोटालों से आहत सोनिया द्वारा होली के उपरांत सत्ता और संगठन में अनेक एसे बदलाव किए जा सकते हैं, जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को नागवार गुजरें।
 
सूत्रों ने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, गुजरात जैसे राज्यों में पार्टी के संगठन की बदहाली ने उन्हें हिलाकर रख दिया है। जिन सूबों में कांग्रेस की सरकार नहीं है वहां कांग्रेस द्वारा कमजोर विपक्ष की भूमिका पर कांग्रेसाध्यक्ष बुरी तरह खफा हैं, साथ ही साथ जिन प्रदेशों के सांसदों को केंद्र में मंत्री बनाया गया है, उन सांसदों द्वारा अपने गृह प्रदेश में ध्यान न देने और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की बात भी सोनिया गांधी की जानकारी में लाई गई है, जिस पर उनकी भवें तन गई हैं।
सोनिया की मंशा पर पानी फेरते मनमोहन

कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी चाहती हैं कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को तत्काल ही पारित करवा दिया जाए, किन्तु बजट सत्र में इसके प्रस्तुत होने की गुंजाईश कम ही प्रतीत हो रही है। लंबे समय से इस मसले में कवायद करने के बाद अब पीएमओ चाहता है कि इस विधेयक के आने से बाजार पर पड़ने वाले असर के अध्ययन के उपरांत ही इसे संसद में पेश किया जाए। गौरतलब है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को लेकर कांग्रेस में ही दो तरह की विचारधाराएं पनप गई हैं। एक धड़ा इसे पेश करने तो दूसरा इसके पेश होने से होने वाले अच्छे और बुरे असर के बारे में विचार के उपरांत इसमें सुधार के उपरांत इसे प्रस्तुत करने का हिमायती बना हुआ है।

चौहान को मिला एनडीटीवी अवार्ड

मुख्यमंत्री चौहान को ’इंडियन ऑफ द इयर 2010’ अवार्ड

नई दिल्ली (ब्यूरो)। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को ’इंडियन ऑफ द इयर 2010’ के अवार्ड से सम्मानित किया गया। एनडीटीवी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अवार्ड ग्रहण करते हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि देश को आज विकास की जरूरत है और जनता का कल्याण ही मुख्य मुद्दा है। श्री चौहान विकास के मुद्दें पर ही मध्यप्रदेश में दोबारा सत्ता पर काबिज हुए हैं। जनता ने उनके विकास कार्य को सराहा है।
मुख्यमंत्री ने केन्द्र और राज्य सरकार के संबंधों में भेदभाव बरतने पर चिन्ता जाहिर की और कहा कि यह प्रदेश और देश दोनों के विकास के लिए ठीक नहीं है। इसके लिए सभी पार्टियों को राजनीति से ऊपर उठकर ठोस निर्णय लेने की जरूरत पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि अब देश की राजनीति में बड़ा दिल और बड़ी सोच की जरूरत है जो समाज के हर तबके के विकास के लिए कटिबंध हो। श्री चौहान ने कहा कि भ्रष्टाचार की जड़ चुनाव प्रक्रिया में है। इसके लिए संविधान में संशोधन कर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने पर जोर दिया। उन्होंने इसके लिए चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कराने के लिए निश्चित धनराशि देने की भी बात कही।

हरवंश व पुत्र धोखाधडी से बरी

आमानाला प्रकरण में उलझे ठाकुर हरवंश सिंह एवं उनके पुत्र के मामले का खात्मा
 
मनोज मर्दन त्रिवेदी
  
सिवनी म.प्र. विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंशसिंह एवं उनके पुत्र ठाकुर रजनीशसिंह पर आमानाला नम्बर दो प्रकरण में न्यायायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी लखनादौनद्वारा आधार हीन पोये जाने पर पूरे प्रकरण को खारिज कर दिया है। इस आशय की जानकारी ठाकुर हरवंशसिंह ने स्थानीय आनंद हॉटल में आमंत्रित पत्रकार वार्ता में पत्रकारों को प्रदान की  और न्यायालय से सम्बन्धित कागजात भी उपलब्ध कराये। उन्होने जानकारी देते हुए कहा कि उनका यह दुर्भाग्य है कि उनके राजनैतिक प्रतिद्वन्दी उन्हें षडय़ंत्रपूर्वक फसाने के लिए किसी भी मामले को तूल देते रहते हैं और तिल का ताड़़ बनाकर उन्हें विवादों में उलझाये रहते हैं इसी प्रकार का मामला आमानाला से भी सम्बन्धित था जिसमें प्रथम श्रेणी न्यायालय लखनादौन ने पूरे मामले का झूठा असत्य एवं आधार हीन होने के कारण खारिज कर दिया है।  उन्होंने अपनी न्याय व्यवस्था के प्रति अटूट विश्वास का परिणाम बताया।
उल्लेखनीय है कि सुनवारा चौकी के अंतर्गत आनेवाले आमानाला नामक ग्राम के मोहम्मद शाह नामक व्यक्ति द्वारा अधिवक्ता पी.डी. साहू के साथ उपस्थित होकर नियाज अली, रजनीशसिंह एवं हरवंशसिंह के विरूद्ध धारा ४२०, ५०६, २९४, १२० बी., भारतीय दण्ड विधान के तहत परिवार प्रस्तुत किया गया था। लखनादौन प्रथम श्रेणी न्यायालय द्वारा उक्त परिवार धनौरा को भेजकर धारा १५६(३) दण्ड प्रक्रिया संङ्क्षहता के तहत कार्यवाही करने के लिए लिखा गया है। इस पूरे प्रकरण को  धनौरा पुलिस द्वारा विस्तृत जांच १८ जून २०१० से २८ जनवरी २०११ तक १३ बार न्यायालय से समय लेकर विभिन्न स्तरों पर विवेचना की गई। जिसमें थाना धनौरा अनुविभागीय पुलिस लखनादौन, पुलिस अधीक्षक सिवनी, पुलिस महानिरीक्षक जबलपुर रेंज, एवं अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, अपराध अनुसंधान ब्यूरों, पुलिस मुख्यालय भोपाल के  द्वारा विवेचना की गई। १३ बार पुलिस द्वारा समय लेकर की गई विवेचना में पाया गया कि ठाकुर हरवंशङ्क्षसह एवं ठाकुर रजनीशसिंंह के विरूद्ध जितने भी आरोप लगाये गये हैं वे पूर्णत: निराधार और असत्य हैं। पुलिस मुख्यालय भोपाल तक जांच अभिमत लेने के बाद २८ जनवरी ११ को मामले की केस डायरी के आधार पर न्यायायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी लखनादौन को कोई भी आरोप सिद्ध न होने का आवेदन किया गया। परिणाम स्वरूप न्यायालय द्वारा उक्त मामले को खारिज कर दिया गया  विधानसभा उपाध्यक्ष ने न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के पश्चात पत्रकारों को बताया कि उनके विरूद्ध किसी ने यह षडय़ंत्र किया था परंतु उन्होंने इसे राजनैतिक षडय़ंत्र मामने से इंकार कर दिया है। झूठे आरोप लगाने वाले के विरूद्ध वे कोई कार्यवाही नहीं करेंगे परंतु उनके पुत्र रजनीश ने कहा है कि उनके तथा उनके पिता के विरूद्ध जिन व्यक्तियों ने घिनौना खेल खेला है उनके साथ क्या सलूक किया जाये इस सम्बन्ध में वे अपने वरिष्ठ अधिवक्ता राजेन्द्र गुप्ता एवं बेनीशंकर शर्मा से सलाह उपरांत ही कोई कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे।

धान खरीदी में गड़बड़ करने वालों पर होगी कार्यवाही

धान खरीदी में गड़बड़ करने वालों पर होगी निलम्बन की कार्यवाही - श्रीमती नायक

भाजपा नगर अध्यक्ष की शिकायतों को गम्भीरता से लेते हुए अधिकारियों को दिये निर्देश
  पूर्व केबिनेट मंत्री डॉ. बिसेन ने की सौजन्य भेंट
 
मनोज मर्दन त्रिवेदी
सिवनी नागरिक आपूर्ति निगम की उपाध्यक्ष राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त श्रीमती अनिता नायक ने आज समर्थन मूल्य पर धान खरीदी में हो रही अनियमित्ताओं की शिकायतों को गंभीर मानते हुए भाजपा नगर अध्यक्ष प्रेम तिवारी से चर्चा कर व्यवस्था सुधारने उपायों पर विस्तृत चर्चा की साथ ही श्रीमती नायक ने नागरिकी आपूर्ति निगम एवं खाद्य अधिकारी से व्यवस्थाओं को सुधारने के निर्देश दिये श्रीमती नायक से भाजपा नगर अध्यक्ष पे्रम तिवारी ने समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की तिथि २८ फरवरी तक करने की मांग की थी। जिसे उन्होंने सहज स्वीकार करते हुए हर संभव प्रयास करने की बात कही थी तथा उन्होंने देर शाम तिथि बढऩे की जानकारी भी दी। सिवनी सर्किट हाऊस में किसानों से प्राप्त शिकायतों एवं धान खरीदी में अपनाये जा रहे भ्रष्ट रवैयों पर उपस्थित अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई नगर अध्यक्ष द्वारा नागरिक आपूर्ति निगम के भ्रष्ट कारनामों की की गई शिकायत पर हुई कार्यवाही की जानकारी चाही जिस पर उपस्थित अधिकारियों ने उन्हें बताया कि भाजपा नगर अध्यक्ष की शिकायत पर जांच चल रही है श्रीमती नायक ने कहा कि जांच को गंभीरता से लेते हुए दोषियों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जाये। उल्लेखनीय है कि भाजपा नगर अध्यक्ष प्रेम तिवारी द्वारा पिछले दिनों समर्थन मूल्य पर धान खरीदी में भ्रष्टाचार और कमीशनबाजी के चलते घटिया स्तर की धान खरीदी व्यापारियों से सांठ-गाठ कर की गई थी। जिस पर जांच जारी है। नागरिक आपूर्ति निगम की उपाध्यक्ष को यह भी ध्यान में लाया गया कि यहां खरीदी केन्द्रों पर समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी किसानों से न कर बिचौलियों के माध्यम से की जा रही है और किसान  बुरी तरह शोषण का शिकार हुआ है। श्रीमती नायक ने जिले के बालाघाट रोड पर पडऩे वाले खरीदी केन्द्रों  के निरीक्षण का आश्वासन देकर बालाघाट की ओर प्रस्थान किया।

बरघाट नगर में भी समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की जानकारी ली जहां उन्हें ज्ञात हुआ कि बरघाट में छपारा मार्केटिंग सोसायटी द्वारा खरीदी की जा रही है जिसमें भारी अनियमित्ताएं हैं। उन्होंने समस्त शिकायतों की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। इस अवसर पर भाजपा नगर अध्यक्ष के अलावा पूर्व केबिनेट मंत्री डॉ. ढालसिंह बिसेन ने सौजन्य भेंट की दुग्ध संघ के प्रतिनिधि श्रीनिवास मूर्ति भाजपा नगर महामंत्री गोपाल पवमे, नगर मंत्री पंकज बिसेन भाजपा नेता अशोक शुक्ला, ने भी भेंट की।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

धरने की राजनीति

धरने की राजनीति


    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान 13 फरवरी से भोपाल में धरने पर बैठ रहे हैं। कारण प्रदेश में पाला पड़ने और ओला वृष्टि से फसल को हुए नुकसान की भरपाई  के लिए केन्द्र सरकार से 2442 करोड़ रु0 के विशेष पैकेज की मांग पर समय पर कोई कार्यवाही होना। श्री चौहान ने इस विषय पर प्रधानमंत्री और केन्द्रीय कृषि मंत्री से मिल कर एक ज्ञापन भी सौंपा था और उसी समय ऐलान भी कर दिया था कि केन्द्र सरकार द्वारा इस विषय पर समय रहते कोई कार्यवाही होने की स्थिति में वह उपवास पर बैठेंगे। अब यह तो समय ही बताएगा कि शिवराज जी के धरने का क्या हर्ष होगा। हमारी सद्भावनाएं उनके साथ हैं।
    अगर हम एक आम नागरिक की भांति इस पूरे प्रकरण को देखे मामला शीशे की तरह साफ दिखता है कि पाला पड़ने और ओला वृष्टि से हुए प्रदेश के 50 जिलों में से 46 जिलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार केन्द्र सरकार से विशेष पैकेज की मांग कर रही है। पर मामला इतना सीधा और साफ नहीं है। धरने की राजनीति देश में अपनाया जाने वाला पुराना हथकंडा है जो विभिन्न पार्टी के नेता समय-समय पर अपनी जरूरत के हिसाब से अपनाते हैं। इस हथकंडे को विभिन्न श्रमिक संगठन और सरकारी संगठन कर्मचारियों के नियमितिकरण का मामला हो या फिर डी.. की किश्त जारी करने का मामला हो, सब संगठन पूरी राजनीति करते हैं और इसका भरपूर लाभ उठाते हैं।
    यह बात अलग है कि मध्य प्रदेश में पिछले कुछ महीनों से किसान द्वारा आत्महत्या करने के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है, यह एक चिन्ता का विषय है और इसको गंभीरता से लेना चाहिए। इन आत्महत्या के मूल कारणों में जाने की जरूरत है। इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक परिवेश में समझने की जरूरत है ताकि किसानों से जुड़ी समस्याओं का निराकरण समय रहते किया जा सके।

    इस पूरे विषय पर किसानों के हमदर्द बनने के लिए मानो कोई होड़ सी लगी है, जिसमें सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष भी इससे अछूता नहीं है। विपक्षीय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी पीछे नहीं हटते, वे भी उपवास पर बैठ जाते हैं, किसानों को न्याय दिलाने के लिए। वहीं केन्द्र सरकार भी इस ओछी राजनीति से अछूती नहीं है, वह भी जो राशि सामान्यतः स्वीकृत हो कर राज्य को दी जानी चाहिए, को प्रदेश अध्यक्ष जी के अनशन को समाप्त कराकर, दो केन्द्रीय नेताओं की मौजूदगी में सहायता राशि का ऐलान किया जाता है जिससे इसका श्रेय अनशन पर बैठे प्रदेश अध्यक्ष को देती है। ऐसा लगता है कि यह नाटक का पूर्व नियोजित था।
    वहीं दूसरी तरफ एक सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अनशन को एक मेगा शो बनाने की तैयारी कर रही है। अनशन को कांग्रेस के विरूद्ध हथियार बनाने के मकसद से पार्टी हर दिन अलग-अलग इलाकों से एक से दो हजार कार्यकर्ता मुख्यमंत्री का साथ देंगे, उम्मीद है कि दिल्ली से पार्टी के बड़े नेता भी आएंगे। यह बात अलग है कि मध्यप्रदेश सरकार केन्द्र द्वारा आपदा राहत कोष से दी गई राशि को अभी तक पूरी तरह खर्च ही नहीं कर पाई और प्रदेश के कृषि मंत्री किसानों की आत्महत्याओं को उनके पूर्व जन्म के कर्मों से जोड़ रहे हैं। इससे सरकार की मंशा पूरी तरह से साफ हो जाती है कि सरकार किसानों की कितनी बड़ी हितेषी है।
    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का 13 फरवरी को अनशन पर बैठने पर भी राजनीति है। प्रदेश में 14 फरवरी को दो उप-चुनाव में मतदान की तारीख है और सत्तारूढ़ पार्टी इसका पूरा फायदा उठाना चाहती है। पिछली बार दोनों सीटों पर कांग्रेस काबिज थी। भाजपा के नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष किसी भी प्रकार से इन सीटों पर विजयी होना चाहते हैं, जिससे जीत का सेहरा प्रदेश अध्यक्ष को जाए। प्रदेश अध्यक्ष पद पर काबिज होने के बाद प्रदेश में यह पहला उपचुनाव है।

    कुल मिलाकर देखा जाए तो किसानों की समस्या एक तरफ और सिर्फ राजनीति ही राजनीति है, पार्टी कोई भी हो। किसानों द्वारा की गई आत्महत्याएं हों या किसानों से जुड़ी अन्य समस्याएं हों, इससे किसी को भी कोई मतलब नहीं, सिर्फ विषय उठाकर राजनैतिक रोटियां सेंकना ही मकसद रह गया है। कोई नहीं सोंचता है कि धरने पर बैठने से क्या उनकी मूल समस्याओं का निवारण हो सकेगा। उनकी समस्याएं तो वही कि वही रहेंगी। क्यों नहीं कोई इस विषय पर पार्टी लाइन से हटकर ठोस निर्णय नहीं लेता और अपनी संकीर्ण सोच से परे हटकर किसानों के हित के लिए दीर्घकालीन योजना बनाते जिससे कि किसानों का उद्धार हो, इन्हीं के उद्धार होने से हमारा देश प्रगति के अग्रसर होकर सफलता की नई उचाईयां छुएगा। किसान कोई राजनीति का मोहरा नहीं है, वह हमारे देश के विकास की आधारशिला है।

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