गुरुवार, 25 अगस्त 2011

अण्णा मामले में सरकार का यू टर्न


अण्णा मामले में सरकार का यू टर्न

टीम अण्णा और सरकार में आरोप प्रत्यारोप आरंभ

सरकार को परवाह नहीं अण्णा की सेहत की

दिल्ली पुलिस कसने जा रही अपना शिकंजा

सरकार ने सौंपी कुटिल रणनीतिकारों को कमान

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। किशन बाबूराव उर्फ अण्णा हजारे का अनशन आज दसवें दिन भी जारी है। मंगलवार को संजीदा दिखने वाली सरकार ने अचानक ही इस मामले में यू टर्न लेते हुए टीम अण्णा को उसके हाल पर छोड़ दिया है। सरकार की ओर से टीम अण्णा से निपटने के लिए अब कुटिल रणनीतिकारों की मदद लेना आरंभ कर दिया गया है। दिल्ली पुलिस ने अब शिकंजा कसना आरंभ कर दिया है। कानून के उल्लंघन के अनेक मामलों की वीडियो क्लीपिंग्स पुलिस ने कब्जे में लेकर मंत्रणा की तैयारी कर ली है।

मंगलवार को टीम अण्णा और सरकार के बीच हुई बातचीत को सौहाद्रपूर्ण का दावा किया जा रहा था, वह अचानक ही बुधवार को रणभूमि में तब्दील हो गई। बैठक से लौटकर टीम अण्णा के सदस्य प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी ने सरकार पर धमकाने का आरोप लगाया। टीम अण्णा का आरोप था कि सरकार द्वारा साफ कह दिया गया है कि अण्णा का अनशन सरकार का सरदर्द नहीं है। सरकार के इस रूख से टीम अण्णा की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलक आई हैं।

दूसरी तरफ सरकार की ओर से सलमान खुर्शीद का कहना है कि सरकार बातचीत को तैयार है, टीम अण्णा आए और चर्चा करे। खुर्शीद ने आरोप लगाया कि टीम अण्णा ही बातचीत छोड़कर गई थी। टीम अण्णा के आरोपों के जवाब में खुर्शीद ने कहा कि टीम अण्णा खुद ही तय करे कि उसे किससे बात करनी है। उन्होंने कहा कि सरकार क्या खामोशी से सारी बातें सुनने और मानने के लिए है? क्या सरकार को बोलने का हक नहीं है? सरकार अगर कुछ बोलती है तो टीम अण्णा उसे गलत तरीके से जनता के सामने लाती है।

कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि टीम अण्णा को मिलने वाले व्यापक जनसमर्थन से घबराकर अब सरकार ने टीम अण्णा से निपटने की जवाबदारी शातिर और कुटिल रणनीतिकारों को सौंप दी है। सूत्रों ने बताया कि इन्हीं के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने कानून तोड़ने के कुछ मामलों की फेहरिस्त बनाना आरंभ कर दिया है। दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय के रात दस बजे के बाद स्पीकर न बजाने के निर्देश का उल्लंघन, दिल्ली में वादे बावजूद भी मशाल जलूस निकालने और रामलीला मैदान में भड़काउ भाषण की वीडियो रिकार्डिंग अपने कब्जे में कर ली है। आज अपरान्ह आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय में इस मसले पर आला अधिकारी सर जोड़कर बैठने वाले हैं।

बुधवार, 24 अगस्त 2011

घुटनों पर खड़ी केंद्र सरकार


घुटनों पर खड़ी केंद्र सरकार

(लिमटी खरे)

गांधीवादी अण्णा हजारे की एक अपील पर देश के बच्चे, युवा, प्रौढ़, बुजुर्ग, वयोवृद्ध सभी सड़कों पर निकल आए। 16 अगस्त की सुबह से ही इलेक्ट्रानिक मीडिया की फीस्ट‘ (लज़ीज भोजन) चल रही है। एंकर्स रिपोर्टस जगह जगह एकत्र भीड़ के साथ अपने अपने चेनल्स की टीआरपी बढ़ाने और ब्रेकिंग न्यूज देने का जतन कर रहे हैं। लोग भी घरों में दुबके बारिश के मौसम में चाय पकौड़ों के साथ दिल्ली का हाल जान रहे हैं। शाम ढलते ही चियर्सकी आवाज के साथ फिर लोग टीवी पर ही आंखें गड़ा देते हैं। मयखानों में भी टीवी की भारी डिमांड हो गई है। चहुंओर अण्णा ही अण्णा नजर आ रहे हैं। अण्णा के अनशन के आठ दिन बाद मोटी चमड़ी वाले मंत्रियों को कुछ शर्म महसूस हुई और वजीरे आजम ने बैठकों का कभी न थमने वाला दौर आरंभ किया। अण्णा की हालत बिगड़ती जा रही है, पर प्रधानमंत्री बैठकों में व्यस्त हैं। वैसे यह शुभ संकेत से कम नहीं है कि अण्णा के अनशन के आठ दिनों बाद ही सही कम से कम बेशर्म, नपुंसक, निरंकुश, भ्रष्ट सरकार घुटनों पर खड़ी तो दिखाई दे रही है। देश में हुए घोटालों की शुरूआत आजादी के साथ ही आरंभ हो गई थी जो आज भी अनवरत ही जारी है।


देश ही नहीं विदेशों में भी यह प्रश्न आम हो चुका है कि क्या एक लोकपाल आने से भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा? जाहिर है सभी का उत्तर है, नहीं। फिर यह हाय तौबा क्यों? क्यों भारत गणराज्य का हर आदमी एक सीधे सादे शांत सुशील बुजुर्गवार किशन बाबू राव हजारे उर्फ अण्णा हजारे के पीछे एक सप्ताह से ज्यादा समय से भाग रहा है। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि अण्णा हजारे जो महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि नामक गांव के निवासी हैं के पीछे समूचा देश भेड़चाल चल रहा है, वह भी इतने शातिर राजनेताओं के होते हुए अहिंसक तरीके से! मतलब साफ है कि एक लोकपाल के आने से भ्रष्टाचार तो नहीं मिटने वाला पर देश की जनता अपने जनसेवकों के तौर तरीकों और नूरा कुश्ती से आज़िज आ चुकी है।

देश में घपलों घोटालों की फेहरिस्त बहुत ही लंबी है। इनमें सबसे अधिक कांग्रेस की झोली में जाते हैं। 1948 में वी.के.कृष्णा मेनन का अस्सी लाख का जीप घोटाला। 1956 में पचास लाख का बीएचयू फंड घोटाला। 1957 मंे हरिदास मुंद्रा का सवा करोड़ रूपए का घोटाला। 1960 में जयंत धर्मा तेजा का लोन घोटाला जो 22 करोड़ रूपए का था के बाद 1976 में इंडियन ऑयल का ऑयल डील का दो करोड़ दो लाख का घोटाला। 1981 में अब्दुल रहमान अंतुले का ट्रस्ट घोटाला तो 1987 में बोफोर्स तोप सौदे का 64 करोड़ एवं एचडीडब्लू कमीशन घोटाला बीस करोड़ रूपए का हुआ था। बोफोर्स तोप घोटाले के बाद राजीव गांधी को सत्ता से बाहर फेंक दिया गया था। बाद में कांग्रेस के दांव पेंच के चलते मामले का खात्मा ही लगा दिया गया।

1989 में सेट किट्स जालसाजी पौने दस करोड़ रूपए की एवं इस समय का बड़ा घोटाला दो हजार करोड़ का एयर बस घोटाला था। इसके बाद घोटाले करोड़ों रूपयों में तो हुए किन्तु वे हजारों करोड़ में तब्दील हो चुके थे। 1992 में बिग बुल हर्षद मेहता ने पांच हजार करोड़ का घोटाला कर सुर्खियां बटोरीं। इसके बाद बारी आती है साढ़े छः सौ करोड़ रूपए के चीनी घोटाले की जो 1994 में हुआ। 1995 में हुए घोटालों की फेहरिस्त काफी लंबी कही जा सकती है। इस साल 43 करोड़ रूपए का कस्टम एण्ड टेक्स घोटाला हुआ जिसे वीरेंद रस्तोगी ने किया। मेघालय में तीन सौ करोड़ का वन घोटाला, पांच हजार करोड़ का प्रीफेशियल एलाटमेंट घोटाला, चार सौ करोड़ रूपए का यूगोस्लेव दिनार घोटाला, एक हजार करोड़ का कॉबलर घोटाला भी इसी साल हुआ।

1996 का वर्ष लालू यादव के नाम हो जाता है। इस साल साढ़े नौ सौ करोड़ का चारा घोटाला हुआ लालू के शासन काल में। इसके अलावा यूरिया घोटाला 133 करोड़ रूपए और तेरह सौ करोड़ रूपए का उर्वरक आयात घोटाला भी हुआ। 1997 में हुए सुखराम टेलीकाम घोटाले में 15 सौ करोड़ रूपए के लेन देन की आशंका थी। यह पहला मामला था जब किसी राजनेता को सजा हुई हो। इसी साल बारह सौ करोड़ रूपए का म्यूचुअल फंड घोटाला, 374 करोड़ रूपए का एनसी पावर प्रोजेक्ट घोटाला एवं हवाला के सूत्रधार जैन बंधुओ का बिहार भूमि घोटाला चार सौ करोड़ रूपयों का हुआ। 1998 मंे आठ हजार करोड़ रूपयों का टीक प्लांटेशन और दो सौ दस करोड़ रूपयों का उदय गोयल का एग्रीकल्चर घोटाला हुआ।

2001 में केतन पारिख का प्रतिभूति घोटाला एक हजार करोड़, यूटीआई घोटाला 32 करोड़, दिनेश डालमिया का शेयर घोटाला 595 करोड़ रूपयों का हुआ। 2002 में संजय अग्रवाल के गृह निवेश में छः सौ करोड़ रूपए और कलकत्ता स्टाक एक्सचेंज का एक सौ बीस करोड़ रूपयों का घोटाला सामने आया। इसके बाद 2003 में तो गजब ही हो गया। इस साल तेलगी ने धूम मचा दी। तेलगी ने बीस हजार करोड़ रूपयों का स्टाम्प घोटाला कर सभी को चौंका दिया। 2005 में डीमेट घोटाले के खाते में एक हजार करोड़ रूपए तो बिहार बाढ़ आपदा का छोटा सा सत्रह करोड़ रूपए का घोटाला तथा स्कॉर्पियन पनडुब्बी का 18 हजार 978 करोड़ का घोटाला हुआ। 2006 में पंद्रह सौ करोड़ रूपए का पंजाब सिटी सेंटर प्रोजेक्ट घोटाला, 175 करोड़ रूपए का ताज कारीडोर घोटाला हुआ।

2008 के उपरांत घोटालों की बाढ़ सी आ गई। इस साल हसन अली का पचास हजार करोड़ का जो 39 हजार 120 करोड़ का बताया जा रहा है के अलावा स्विस बैंक में जमा काला धन लगभग 21 लाख करोड़ रूपए, 95 करोड़ का सोराष्ट्र बैंक घोटाला, पांच हजार करोड़ रूपए का सैन्य राशन घोटाला, आठ हजार करोड़ रूपए का रामलिंगा राजू का सत्यम घोटाला प्रकाश में आया। 2009 में ढाई हजार करोड़ रूपए का चावल निर्यात घोटाला, सात हजार करोड़ रूपए का उड़ीसा खदान घोटाला, चार हजार करोड़ का झारखण्ड खदान घोटाला और एक सौ तीस करोड़ रूपए का झारखण्ड मेडीकल घोटाला सामने अया। पिछले साल यानी 2010 में एक लाख 76 हजार करोड़ का टूजी घोटाला, सत्तर हजार करोड़ रूपए का कामन वेल्थ गेम्स घोटाला, साढ़े नौ अरब का आदर्श सोसायटी घोटाला, दो लाख करोड़ का एस बैण्ड तो पेंतीस हजार करोड़ का खाद्यान्न घोटाला सामने आया है। इस तरह आजादी के बाद से अब तक खरबों करोड़ के घोटाले हो चुके हैं जिनमें से कुछ ही प्रकाश में आ सके हैं।

इतने घपले घोटाले करने के बाद भी मोटी चमड़ी वाले राजनेताओं को शर्म नहीं आई कि उन्होंने जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से एकत्र राजस्व की खुली लूट की है। इसमें सभी राजनैतिक पार्टियों की बराबर की भागीदारी है। कोई भी पार्टी अपने निहित स्वार्थों को तजकर देश की जनता के लिए कुछ करने का प्रयास नहीं करती है। संसद के अंदर नूरा कुश्ती का दौर आजादी के उपरांत से ही आरंभ हो गया था। इतिहास साक्षी है जब भी कोई घोटाला सामने आता है उसी वक्त केंद्र सरकार द्वारा इससे बचने के लिए पेट्रोलियम पदार्थों के दामों को बढ़ा दिया जाता है ताकि आम जनता का ध्यान इससे हट सके।

जनता अब जाग चुकी है। वैसे कहा जा रहा है कि अण्णा हजारे के आंदोलन को शीला दीक्षित द्वारा हवा दी जा रही है क्योंकि अब कामन वेल्थ गेम्स घोटालों की लपटें उन्हें घेरने लगी हैं। अण्णा के आंदोलन के बहाने विपक्ष और जनता का ध्यान कुछ समय के लिए ही सही इससे हट गया है। खैर जो भी हो देश की जनता ने अहिंसक तरीके से सड़कों को अण्णा के लिए थाम लिया है। अण्णा की सदगी, सच्चाई, पारदर्शिता, विनम्रता, दृढ़ता के सामने सारे राजनेता नतमस्तक ही नजर आ रहे हैं। जनता अण्णा को सर माथे पर बिठाए है। इसलिए क्योंकि अण्णा के साथ उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं जुड़ा दिख रहा है। कुछ समय पहले बाबा रामदेव का आंदोलन इसी रामलीला मैदान पर हुआ। सरकार ने बाबा के साथ बल प्रयोग किया और बाबा रामदेव रणछोड़दासहो गए।

अण्णा के अनशन के नौ दिनांे बाद सरकार अब बैठकों के दौर से गुजर रही है। साफ दिखने लगा है कि अण्णा एक अकेले नहीं हजारों हजारों करोड़ों अण्णा में तब्दील हो गए हैं। अब कड़वे वचन बोलने वाले कपिल सिब्बल और पलनिअप्पम चिदम्बरम एवं मनीष तिवारी समचार चेनल्स से एकदम गायब हो चुके हैं। हालात देखकर लगने लगा है कि आधा दर्जन राष्ट्रों हुई क्रांति के बाद अब भारत का नंबर है। सरकार खुद वार्ता की पहल कर अण्णा की शर्तें मान रही है, इसे शुभ संकेत माना जाएगा। सरकार घुटनों के बल खड़ी है, यह सफलता अण्णा हजारे की नहीं वरन् 121 करोड़ आम हिन्दुस्तानियों की है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की इसमें अहम भूमिका है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया को लाखों करोड़ रूपए के पैकेज की तैयारी की जा रही है, ताकि आंदोलन का रूख बदला जा सके। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि अगर अब इस आंदोलन के शमन के प्रयास हुए तो इसके परिणाम बहुत अच्छे नहीं सामने आएंगे। सवाल यही है कि अगर सरकार को कथित सिविल सोसायटी की बातें माननी ही थीं तो फिर 16 अगस्त से अब तक इस तरह के सर्कस का क्या ओचित्य था? जाहिर है सरकार की मंशा में खोट है।

अण्णा की चाभी ग्राम सभा के पास


अण्णा की चाभी ग्राम सभा के पास

सरकार की गेंद विपक्ष के पाले में

सर्वदलीय बैठक के बाद ही होगा निर्णय!

तीस हजारी के जज ने थाम अण्णा का झंडा

यशवंत ने की त्यागपत्र की पेशकश

रोजा अफ्तार बना पीएम के गले की फांस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। ‘‘बहुत पुरानी कहावत है कि राजा की जान तोते में, तोते के पर काटो राजा के हाथ कट जाएंगे।‘‘ मनमोहन सरकार राजा यानी अण्णा हजारे के लिए इसी तरह के अस्त्र की खोज की जा रही है। लगता है सरकार के हाथ वह अस्त्र लग गया है। अण्णा के अनशन को समाप्त करने की चाबी उनके गांव राणेगांव सिद्धि की ग्राम सभा के पास है। अण्णा के लिए वहां की ग्राम सभा का आदेश भगवान के आदेश के तुल्य है।
पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि सरकार द्वारा अब महाराष्ट्र सरकार के मार्फत यह दबाव बनाया जा रहा है कि अण्णा के गांव के लोग ग्राम सभा बुलाकर अण्णा से अनशन समाप्त करने का निवेदन करें। इसके पीछे अण्णा की बिगड़ती सेहत का हवाला दिया जा रहा है। सरकार का खुफिया तंत्र और प्रबंधक इस दिशा में अपने प्रयास तेज कर चुके हैं।

सूत्रों ने आगे कहा है कि अण्णा के समर्थन में जुटे देश भर में जनसमर्थन के बाद खुफिया सूत्रों ने सरकार को जो सूचनाएं दी हैं उससे सरकार के हाथ पांव फूल गए हैं। सरकार को डर है कि अगर अण्णा की सेहत बिगड़ी तो स्थिति बेकाबू हो जाएगी। इसलिए सरकार ने मंगलवार और बुधवार की दर्मयानी रात में बैठकों के अनेक दौर चलाए, जिसमें सीसीपीए और मंत्रियों की बैठक का शुमार था।

सरकार ने गेंद विपक्ष के पाले में डालते हुए संकेत दिए कि अगर विपक्ष चाहे तो संसद का सत्र आगे बढ़ा दिया जाएगा, जिससे अण्णा की इसी संसद सत्र में लोकपाल बिल की मांग को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है। सरकार ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का आश्वासन दे दिया है। साथ ही न्यायधीशों के लिए अलग से कानून लाने पर भी सहमत हो गई है जो टीम अण्णा की एक बड़ी जीत मानी जा सकती है।

अण्णा के स्वास्थ्य पर नजर रखने वाले डॉ.नरेश त्रेहान ने कहा कि अण्णा का केटोपोलिज्म बढ़ रहा है जो चिंता का कारण है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि इससे अण्णा की किडनी पर असर हो सकता है। उधर अण्णा ने कहा कि अगर उनकी किडनी खराब होती है तो देशवासियों में से कोई भी अपनी एक किडनी सहर्ष उन्हें दे देगा। अण्णा का गिरता स्वास्थ्य सरकार के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।

उधर भाजपा के गांधी रामलीला मैदान पर पहुंचे और अण्णा से न मिलकर वे उनके समर्थकों के साथ जाकर बैठ गए। वरूण गांधी का यह कदम मीडिया के लिए सुर्खियों का कारक बना। मीडिया पर्सन्स वरूण को घेरकर उनसे सवाल जवाब करने लगे। वरूण ने बडी ही शालीनता के साथ अण्णा के समर्थन की बात कही।

भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद यशवंत सिन्हा ने भी भाजपा का रूख अण्णा मामले में साफ न होने पर त्यागपत्र देने की पेशकश कर डाली है। रामलीला मैदान पर लोग तब हतप्रभ रह गए जब दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के एक जज अजय पांडे ने अण्णा का झंडा थामकर न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में लाने की बात कह डाली। अजय पाण्डे ने अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि वे कशमकश में थे कि अगर वे अण्णा का साथ देते हैं तो इसके क्या परिणाम होंगे, अंत मंे अतंरात्मा की आवाज पर उन्होंने अनिष्ट की आशंका के बाद भी यह कदम उठा ही लिया।

पीएमओ के सूत्रों का कहना है आज शाम को ही प्रधानमंत्री ने रोजा अफ्तारी रखी है। प्रधानमंत्री पशोपेश में हैं कि एक गांधीवादी जब नौ दिन से भूखा प्यासा बैठा है तब वे इस प्रोग्राम को रखते हैं तो इसका गलत संदेश जाएगा। यही कारण है कि सरकार ने अण्णा के अनशन को तुड़वाने के प्रयास तेज कर दिए हैं।

अण्णा ने लटकाई पीसीसी


अण्णा ने लटकाई पीसीसी

पांच अध्यक्षों की घोषणा

छिंदवाड़ा अभी भी खटाई में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अण्णा हजारे के अनशन के चलते मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी में टीम भूरिया को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। आज इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर के जिलाध्यक्षों की घोषणा अवश्य ही कर दी गई किन्तु मध्य प्रदेश के क्षत्रप और केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में जिलाध्यक्ष्ज्ञ के नाम पर सहमति नहीं बन सकी है। लंबी जद्दोजहद के बाद भूरिया अपनी सूची को अंतिम रूप देने में तो सफल रहे किन्तु अण्णा प्रकरण के कारण उसे जारी नहीं कर पा रहे हैं।

कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि भोपाल शहर में पीसी शर्मा, ग्वालियर में हरेंद्र यादव, जबलपुर में दिनेश यादव, इंदौर ग्रामीण अतर सिंह के नाम पर मुहर लगा दी गई है। उधर टीम भूरिया के लिए अंतिम तौर पर सूची तैयार की जा चुकी है। विशेष आमंत्रितों के नाम पर अभी सहमति नहीं बन पाई है।

सूत्रों ने आगे कहा कि पहली सूची में कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरूण यादव और अजय सिंह के समर्थकों को स्थान दिया जा रहा है। इसमें उपाध्यक्ष, सचिव और महामंत्रियों की घोषणा की जा सकती है। सूत्रों ने यह भी कहा कि भूरिया ने अपनी टीम में महिलाओं के लिए 33 फीसदी स्थान सुरक्षित रखा है। प्रदेश प्रभारी बी.के.हरिप्रसाद के करीबी सूत्रों का कहना है कि टीम भूरिया की पहली सूची पर उनकी मुहर लग चुकी है।

कनाड़ा में अण्णा के समर्थन में गूंजी सिवनी की आवाज


कनाड़ा में अण्णा के समर्थन में गूंजी सिवनी की आवाज

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे का आव्हान देश ही नहीं वरन् विदेशों में भी सर चढ़कर बोल रहा है। कनाड़ा के टोरंटो शहर में रहने वाली पेशे से चिकित्सक डॉ.जया राजपूत चौहान और उदय सिंह चौहान ने अण्णा के समर्थन में टोरंटो में भारतवंशियों को एक सूत्र में पिरोकर प्रदर्शन किया।

मूलतः सिवनी निवासी डॉ.जया का विवाह इंदौर निवासी इंजीनियर उदय के साथ हुआ है। दोनों ही टोरंटों में निवास कर रहे हैं। जया के पिता व्ही.एस.राजपूत सिवनी के मुंगवानी में ग्रामीण बैंक में शाखा प्रबंधक हैं। केयर कंप्यूटर सिवनी के संचालक विपिन सिंह राजपूत ने बताया कि उनकी अनुजा को समाचार चेनल्स और इंटरनेट के माध्यम से टोरंटो में अण्णा के अनशन के बारे में पता चला।

इस संवाददाता से दूरभाष पर चर्चा के दौरान डॉ.जया ने कहा कि अण्णा के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की जानकारी मिलते ही उन्होने भारत वंशियों को वहां एकत्र किया और उनसे इस संबंध में चर्चा की। उन्होंने कहा कि वहां रह रहे भारत वंशियों का मानना है कि भारत के घपलों और घोटालों की खबरें जब कनाडा में सुखियां बनती हैं तो उनका सर शर्म से झुक जाता है। यही कारण है कि सभी ने एक साथ मिलकर अण्णा के समर्थन में प्रदर्शन करने का निर्णया लिया।

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

नेता नहीं जनता के सिर पर खिल रही है गांधी टोपी

नेता नहीं जनता के सिर पर खिल रही है गांधी टोपी

(लिमटी खरे)

नेहरू गांधी परिवार के नाम पर सत्ता की मलाई सालों साल से चखने वाली कांग्रेस के नेताओं द्वारा असली गांधी यानी महात्मा गांधी के नाम पर पहचानी जाने वाली गांधी टोपी को साल में एकाध मर्तबा ही इस्तेमाल किया जाता है। 15 अगस्त और 26 जनवरी को भी सलामी लेते वक्त नेताओं या अधिकारियों द्वारा गांधी टोपी के स्थान पर फर वाली काली टोपी का इस्तेमाल करना ज्यादा मुनासिब लगता है। एक समय था जब भारत सरकार या सूबाई सरकार के कारिंदों की यूनिफार्म में गांधी टोपी को अनिवार्य अंग माना जाता था, विडम्बना है कि वर्तमान में गांधी टोपी सभी के सर से नदारत ही दिखती है। 16 अगस्त के बाद समूचे भारत में मैं अण्णा हूंके जुमलों से युक्त गांधी टोपी लोगों के कपाल की शोभा बढ़ा रही है। लगता है गांधी टोपी के मायने महज लड़ाई के दौरान सरकार के विरोध प्रदर्शन का अनिवार्य हिस्सा बनकर रह गई है, जो निश्चित तौर पर चिंता का विषय ही माना जा सकता है।
 
एक लोकपाल हजारों लाखों करोड़ांे अण्णा। जहां देखो वहां अण्णा। गांधी टोपी लगाए सादगी की प्रतिमूर्ति नजर आने वाले अण्णा से प्रभावित होने वालों में युवाओं की खासी तादाद नजर आ रही है। अण्णा की सादगी पर मर मिटने वाले युवाओं ने गांधी टोपी की मांग को अचानक ही बढ़ा दिया है। अब तो सफेद गांधी टोपी जिस पर मैं अण्णा हूं लिखा है हर किसी के सर का ताज बनी हुई है। कल तक मारी मारी फिरने वाली यह टोपी आज सवा सौ रूपए में भी नसीब नहीं हो पा रही है। सर पर गांधी टोपी लगाए भारत वासियों का जुनून देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनकी पुरानी पीढ़ी ने जब गोरे ब्रितानियों से संघर्ष किया होगा तब उनके अंदर क्या जज़्बा रहा होगा।

कहने को तो कांग्रेस द्वारा गांधी नेहरू परिवारों का गुणगान किया जाता है, किन्तु इसमें राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी का शुमार है या नहीं यह कहा नहीं जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, के बाद अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी के इर्द गिर्द ही कांग्रेस की सत्ता की धुरी घूमती महसूस होती है। सच भी है आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस को पता है कि नेहरू गांधी परिवार का नाम ही करिश्माई है। इस परिवार की वर्तमान पीढ़ी को मुगालते मंे रखकर नेता अपना स्वार्थ सिद्ध करने पर आमदा हैं।

वैसे तो महात्मा गांधी और उनकी अपनाई गई खादी को भी अपनी विरासत मानती आई है कांग्रेस। पर अब लगता है कि वह इन दोनों ही चीजों से दूर होती चली जा रही है। अधिवेशन, चुनाव, मेले ठेलों में तो कांग्रेसी खादी के वस्त्रों का उपयोग जमकर करते हैं, किन्तु उनके सर से गांधी टोपी नदारत ही रहा करती है। बापू की सूत कती खादी अब भूले बिसरे गीतों की तरह गुजरे जमाने की बात हो गई है। अब तो नेताओं द्वारा सफेद धवल खादी जो उम्दा क्वालिटी की और मंहगी मिलों में तैयार होती है को अंगीकार किया जाता है। एक बड़े मंत्री के सफेद कुर्ते पायजामे तो एक विशेष कंपनी द्वारा तैयार करवाए जाते हैं जिनकी कीमत पचास हजार रूपए मीटर से अधिक की बताई जाती है।

कांग्रेस सेवादल के ड्रेस कोड में शामिल है गांधी टोपी। जब भी किसी बड़े नेता या मंत्री को कांग्रेस सेवादल की सलामी लेनी होती है तो उनके लिए चंद लम्हों के लिए ही सही गांधी टोपी की व्यवस्था की जाती है। सलमी लेने के तुरंत बाद नेता टोपी उतारकर अपने अंगरक्षक की ओर बढ़ा देते हैं, और अपने बाल काढ़ते नजर आते हैं, ताकि फोटोग्राफर अगर उनका फोटो लें तो उनका चेहरा बिगड़े बालों के चलते भद्दा न लगे।

इतिहास गवाह है कि गांधी टोपी कांग्रेस विचारधारा से जुड़े लोगों के पहनावे का हिस्सा रही है। अस्सी के दशक के आरंभ तक नेताओं के सिर की शान हुआ करती थी गांधी टोपी। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू हों या मोरारजी देसाई, किसी ने शायद ही इनकी कोई तस्वीर बिना गांधी टोपी के देखी हो।

लगता है कि वक्त बदलने के साथ ही साथ इस विचारधारा के लोगों के पहनावे में भी अंतर आ चुका है। अस्सी के दशक के उपरांत गांधी टोपी धारण किए गए नेताओं के चित्र दुर्लभ ही देखने को मिलते हैं। करीने से काढे गए बालों और पोज देते नेता मंत्री अवश्य ही दिख जाया करते हैं। यहां तक कि पंडित नेहरू के उपरांत उनके नवासे राजीव गांधी और पड़पोते राहुल गांधी के भी गांधी टोपी के साथ चित्र दुर्लभ ही हैं। देश के मंत्रियों ने तो गांधी टोपी को मानो तिरस्कृत ही कर रखा है।

आधुनिकता के इस युग में महात्मा गांधी के नाम से पहचानी जाने वाली गांधी टोपी अब नेताओं के सर का ताज नहीं बन पा रही है। इसका स्थान ले लिया है कांग्रेस के ध्वज के समान ही तिरंगे दुपट्टे (गमछे) ने। उधर भाजपा भी कहां पीछे रहने वाली थी, भाजपा ने भी भगवा दुपट्टे को अपना ड्रेस कोड अघोषित तौर पर बना लिया है। जब नेता ही गांधी टोपी का परित्याग कर चुके हों तो उनका अनुसरण करने वाले कार्यकर्ता भला कहां पीछे रहने वाले हैं।

एसा नहीं कि गांधी टोपी आजाद भारत के लोगों के सिरों का ताज न हो। आज भी महाराष्ट्र में अनेक गांव एसे हैं, जहां बिना इस टोपी के कोई भी सिर दिखाई दे जाए। इसके साथ ही साथ कर्नाटक और तमिलनाडू के लोगों ने भी गांधी टोपी को अंगीकार कर रखा है। अण्णा हजारे जैसे गांधी वादी आज भी गांधी टोपी को सर की शान ही समझते हैं।

अस्सी के दशक के आरंभ तक अनेक प्रदेशों में चतुर्थ श्रेणी के सरकारी नुमाईंदों के ड्रेस कोड में शामिल थी गांधी टोपी पहनकर सरकारी कर्मचारी अपने आप को गोरवांन्वित महसूस भी किया करते थे। कालांतर में गांधी टोपी ‘‘आउट ऑफ फैशन‘‘ हो गई। यहां तक कि जिस शख्सियत को पूरा देश राष्ट्रपिता के नाम से बुलाता है, उसी के नाम की टोपी को कम से कम सरकारी कर्मचारियों के सर की शान बनाने मंे भी देश और प्रदेशों की सरकरों को जिल्लत महसूस होती है। यही कारण है कि इस टोपी को पहनने के लिए सरकारें अपने मातहतों को पाबंद भी नहीं कर पाईं हैं।

यह सच है कि नेताओं की भाव भंगिमओं, उनके आचार विचार, पहनावे को उनके कार्यकर्ता अपनाते हैं। जब नेताओं के सर का ताज ही यह टोपी नहीं बन पाई हो तो औरों की कौन कहे। यहां तक कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वर्किंग कमेटी में उपसिथत होने वाले नेताओं के सर से भी यह टोपी उस वक्त भी नदारत ही मिलती है।

मर्द के सर पर टोपी और औरत के सर पर पल्लू, अच्छे संस्करों की निशानी मानी जाती है। फिर आधी सदी से अधिक देश पर राज करने वाली लगभग सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के नेताओं को इसे पहनने से गुरेज कैसा। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू रहे हों या महामहिम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, किसी ने कभी भी इनकी बिना टोपी वाले छायाचित्र नहीं देखे होंगे। आधुनिकता और पश्चिमी फैशन की चकाचौंध में हम अपने मूल संस्कार ही खोते जा रहे हैं, जो निश्चित तौर पर चिंताजनक कहा जा सकता है।

वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एक सूबे में तो वन्दे मातरम को सरकारी कार्यालयों मंे अनिवार्य कर दिया है। यह सच है कि भाजपा का जन्म राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आचार विचारों से ही हुआ है। क्या संघ के पूर्व संस्थापकों ने कभी गांधी टोपी को नहीं अपनाया? अगर अपनाया है तो फिर आज की भाजपा की पीढ़ी इससे गुरेज क्यों कर रही है?

युवाओं के पायोनियर (अगुआ) बन चुके कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी किसी कार्यक्रम में अगर जरूरत पड़ती है तो गांधी टोपी को सर पर महज औपचारिकता के लिए पहन लेते हैं, फिर मनमोहक मुस्कान देकर इसे उतारकर अपने पीछे वाली कतार में बैठे किसी नेता को पकड़ा देते हैं। देश में अण्णा की आंधी के उपरांत गांधी टोपी एक बार फिर प्रासंगिक हो चुकी है, किन्तु यह जनता जनार्दन की नजरों में ही प्रासंगिक है। देश के नेताओं की आंखों का पानी मर चुका है। वे गांधी के नाम पर सत्ता की मलाई तो चखना चाहते हैं पर उनके आदर्शों और सिद्धांतों के बिना।

अगर देश के नेता गांधी टोपी को ही एक वजनयुक्त औपचारिकता समझकर इसे धारण करेंगे तो फिर उनसे गांधी के सिद्धांतें पर चलने की आशा करना बेमानी ही होगा। यही कारण है कि हाल ही के संसद के सत्र में कांग्रेस के शांताराम लक्ष्मण नाइक ने सवाल पूछा था कि क्या महात्मा गांधी को उनके गुणो, ईमानदारी, प्रतिबद्धता, विचारों और सादगी के साथ दोबारा पैदा किया जा सकता है। इस समय उनकी बहुत जरूरत है। हम सब अपने उद्देश्य से भटक गए हैं और हमें महात्मा गांधी के मार्गदर्शन की जरूरत है। भले ही यह महात्मा गांधी के क्लोन से ही मिले।

अण्णा के बहाने राहुल के महिमा मण्डन का प्रयास

अण्णा के बहाने राहुल के महिमा मण्डन का प्रयास

टीम राहुल के प्रबंधकों ने फेंके पांसे

लगातार खामोश राहुल से बातचीत को अण्णा तैयार!

केजरीवाल ने किया खण्डन

मीडिया मैनेजमेंट में जुटी राहुल जुंडाली

मनमोहन की बिदाई चाहते हैं भ्रष्ट कांग्रेसी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। लगता है प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की चला चली की बेला करीब आ ही गई है। टीम राहुल ने अब सधे कदमों से उनके प्रधानमंत्री बनने के मार्ग प्रशस्त कर दिए हैं। राहुल के मीडिया प्रबंधक अब ज्योतिषियांे द्वारा राहुल के बारे में की गई भविष्यवाणियों को मीडिया में उछलवा रहे हैं ताकि युवराज की ताजपोशी की जा सके। मीडिया में सोमवार को यह बात जमकर उछली कि अण्णा या तो पीएमओ या राहुल गांधी से बातचीत को तैयार हैं।

रामलीला मैदान पर जब यह खबर फैली तो अण्णा के एक समर्थक का कहना था -‘‘कौन है राहुल! दो बार का सांसद, बस। क्या वह प्रधानमंत्री या मंत्री है, या कांग्रेस का अध्यक्ष जो अण्णा उससे बातचीत को तैयार हो गए? यह तो राहुल गांधी को स्थापित करना हुआ। 16 अगस्त से लगातार खामोश राहुल गांधी से अण्णा को बात कतई नहीं करना चाहिए? अगर अण्णा एसा करते हैं तो माना जाएगा कि यह सब कुछ राहुल गांधी के महिमा मण्डन के लिए किया गया है।‘‘

उधर राजनैतिक विश्लेषक इस तीर को कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य दिग्विजय सिंह के जहर बुझे तीरों के तौर पर ले रहे हैं। उनका मानना है कि कुछ माह पहले परोक्ष तौर पर मनमोहन सिंह के उपर दिग्गी राजा ने प्रहार किए थे। इतना ही नहीं दिग्विजय ंिसंह ने तो साफ तौर पर कहा था कि अब वक्त आ गया है कि राहुल को शादी कर लेना चाहिए और देश संभालना चाहिए। अर्थात मनमोहन सिंह आप सिंहासन खाली करें युवराज अब राजकाज संभालने योग्य हो चुके हैं।

यूपीए की दूसरी पारी में जिस तरह लाखों करोड़ों रूपयों के घपले और घोटाले सामने आए इसके बाद जिन भ्रष्ट नेताआंे पर गाज गिरी इससे कांग्रेस के भ्रष्टों की फौज मनमोहन सिंह की बिदाई में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है। कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो दिल्ली की निजाम शीला दीक्षित की गरदन पर कामन वेल्थ गेम्स की तलवार लटक रही है, इसलिए उन्होंने भी अण्णा के अनशन को हवा देने का काम किया है, ताकि कुछ समय के लिए ही सही लोगों का ध्यान उनकी ओर से हट जाए।

कांग्रेस के शातिर मीडिया प्रबंधकों ने सोमवार को एक खबर प्लांट की कि अण्णा सिर्फ पीएमओ या राहुल गांधी से बातचीत को ही तैयार हैं। इस खबर ने कांग्रेस विशेषकर मनमोहन सिंह खेमे में खलबली मचा दी। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि यह खबर पीएम को भी नागवार गुजर रही है कि राहुल का इस तरह से महिमा मण्डन किया जा रहा है। पीएमओ के सूत्र हैरान है कि राहुल और आजाद भारत की कुंडली सालों से ज्योतिषियों के पास होने के बाद अचानक अण्णा के अनशन के दौरान राहुल के पीएम बनने की बात उठाना किस रणनीति का हिस्सा है? सूत्रों ने कहा कि रामदेव प्रकरण और इस बार 16 अगस्त से लगातार खामोश राहुल से बातचीत की पेशकश अवश्य की गई होगी किन्तु जनता इसे पचा नहीं पाएगी।

उधर अण्णा के अर्जुन की अघोषित उपाधि पाने वाले अरविंद केजरीवाल ने इस बात का खण्डन किया है कि अण्णा सिर्फ पीएमओ या राहुल से बात करने को राजी है। केजरीवाल ने थोडा डिप्लोमेटिक होते हुए कहा कि जो जिम्मेदार होंगे उनसे ही अण्णा बात करने पर विचार कर सकते हैं।