गुरुवार, 4 जुलाई 2013

आखिर केवलारी से क्यों बना रहे हुकुम दबाव्

आखिर केवलारी से क्यों बना रहे हुकुम दबाव्

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। कभी सिवनी के कद्दावर नेता ठाकुर हरवंश सिंह की परछाईं समझे जाने वाले जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह आखिर उनके पुत्र रजनीश सिंह की राह का रोढ़ा क्यों बन रहे हैं? यह बात जिले के कांग्रेस के नेताओं के जेहन में इन दिनों तेजी से उभर रही है।
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों अपने मित्रों और परिचितों में हुकुम के नाम से मशहूर जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह की केवलारी विधानसभा से अपनी पुरजोर उम्मीदवारी की खबरें मीडिया में प्रचारित हुईं हैं। ये खबरें प्रायोजित थीं, या वास्तविक इसकी समीक्षा भी कांग्रेस के अंदर आरंभ हो चुकी है।
बताया जाता है कि मीडिया में अतिसंवेदनशील प्रचारित होने वाले जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह घंसौर की गुड़िया के मामले में भी मौन ही रहे थे। उस वक्त वे अपना मौन व्रत तोड़कर घंसौर वापस आ चुके थे। गुड़िया के मामले में जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह के मौन रहने का कारण मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के प्रबंधन के प्रति उनका गहरा अनुराग ही बताया जा रहा है।
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि विधानसभा चुनावों में दावेदारी करने वालों की फेहरिस्त में केवलारी से जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह का नाम आना आश्चर्यजनक है, क्योंकि यहां से ठाकुर हरवंश सिंह के परिजन की दावेदारी पुख्ता मानी जा रही है।

वहीं कांग्रेस के अंदर अब इस बात के मायने भी खोजे जा रहे हैं कि आखिर क्या वजह है कि जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह द्वारा ठाकुर हरवंश सिंह के सुपुत्र रजनीश सिंह के मार्ग में अपनी उम्मीदवारी जतलाकर शूल बोए जा रहे हैं, क्योंकि रजनीश सिंह अब केवलारी से कांग्रेस के स्वाभाविक दावेदार समझे जा रहे हैं।

मच्छरों को निमंत्रण दे रहा जिला चिकित्सालय!

मच्छरों को निमंत्रण दे रहा जिला चिकित्सालय!

(महेश रावलानी)

सिवनी (साई)। जिलों में मच्छरों की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग सदा ही दिशा निर्देश जारी करता रहा है किन्तु जिला चिकित्सालय में ही मच्छरों के लिए उपजाऊ माहौल तैयार होता दिख रहा है।
ज्ञातव्य है कि जिला चिकित्सालय सिवनी के प्रांगण में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जिला मलेरिया अधिकारी, सिविल सर्जन आदि के कार्यालय संचालित होते हैं। बावजूद इसके चिकित्सालय के अंदर की व्यवस्था की सुध लेना किसी को गवारा नहीं है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला चिकित्सालय परिसर में हल्की सी बारिश के उपरांत ही गड्ढों में पानी भर जाता है। सारी बारिश में यही आलम पसरा रहता है। पिछले दिनों से लगातार हो रही बारिश से अस्पताल के अंदर डबरे तालाबों का स्वरूप ले लेते हैं, जिनमें मच्छरों की उतपत्ति की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है।
गौरतलब है कि मलेरिया विभाग द्वारा पिछले दिनों ही एक जागरूकता रैली निकालकर शहरवासियों को ताकीद किया गया था कि घरों के आसपास पानी एकत्र ना होने दें। पानी एकत्र होने से मच्छरों के लिए उपजाउ माहौल तैयार हो जाता है।
जिला चिकित्सालय परिसर के अंदर जगह जगह पड़े गंदगी के ढेर, पानी के पोखर, दवाओं के पैकेट, खाली रैपर, पालीथिन, बचा खाना आदि को देखकर ना केवल मवेशी वरन् सुअर तक यहां कोहराम मचाते देखे जा सकते हैं। कुछ साल पहले तो एक नवजात को सुअर द्वारा उठाकर ले जाने की खबरें भी प्रकाश में आई थीं।
वस्तुतः अस्पताल के अंदर की व्यवस्थाएं सुचारू रूप से चलें इसकी जवाबदारी सिविल सर्जन पर आहूत होती है। जिला चिकित्सालय में सिविल सर्जन के पद पर डॉ.सत्यनारायण सोनी पदस्थ हैं, जिनकी प्रशासनिक पकड़ उपरोक्त बातों और चित्र से साफ हो जाती है।
जिला चिकित्सालय का यह आलम तब है जब हाल ही में जिलाधिकारी भरत यादव द्वारा इसका निरीक्षण किया गया है। जिलाधिकारी के अस्पताल के निरीक्षण के उपरांत भी सिविल सर्जन डॉ.सत्यनारायण सोनी को इतनी फुर्सत नहीं है कि वे अस्पताल की साफ सफाई की व्यवस्था को चौकस करवाने की दिशा में कोई ठोस पहल करें।

वहीं जिला मलेरिया अधिकारी का कार्यालय भी अस्पताल प्रांगण में है। जिला मलेरिया अधिकारी या उनके अधीनस्थ स्टाफ के साथ ही साथ नगर पालिका प्रशासन को भी इतनी परवाह नजर नहीं आ रही है कि वे भी इन पोखरों, गड्ढ़ों में भरे पानी में मच्छरों के ना पनपने के लिए दवाओं का छिड़काव करवाएं।

पुलिस की सेंट्रल स्कॉड टीम भंग

पुलिस की सेंट्रल स्कॉड टीम भंग

(गोपाल शर्मा)

सिवनी (साई)। जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला द्वारा अंततः सेंट्रल स्काड को भंग कर ही दिया है। इस पर अनेक आरोपों के चलते इसका भंग होना तय ही माना जा रहा था।
ज्ञातव्य है कि जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला ने पदभार ग्रहण करने के बाद दो सेंट्रल स्कॉड टीम का गठन किया था, जिसमें से एक टीम अवैध गौवंश तस्करी में लगाम लगाने के कार्य के लिए थी, वहीं एक अन्य स्कॉड दल दूसरे मामलों को लेकर बनाई गई थीं।
पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला ने हिन्द गजट को बताया कि दो स्काड में से एक को भंग कर दिया गया है। वर्तमान में गौवंश की तस्करी रोकने के लिए गठित स्काड यथावत काम करता रहेगा, शेष दूसरे को भंग कर इसमें तैनात पुलिस बल की जिले के अन्य थानों में पदस्थापना कर दी गई है। पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला के अनुसार यह एक रूटीन प्रक्रिया है जिसके तहत इसे भंग किया गया है।
वहीं पुलिस सूत्रों का कहना है कि जिले में आपराधिक मामलों की रोकथाम के लिए गठित पुलिस की केंद्रीय टीम के बारे में अनेक शिकायतें अस्तित्व में आ रही थीं। पिछले दिनों जुएं सट्टे, आदि के मामलों में इस दल द्वारा आपेक्षाकृत उपलब्धि हासिल नहीं की जा सकी है।

कलेक्टर भरत यादव का आभार

कलेक्टर भरत यादव का आभार

(शरद खरे)

जिले में पदस्थ युवा एवं उर्जावान जिला कलेक्टर भरत यादव गत दिवस अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकालकर जिला चिकित्सालय गए और वहां के हाल जाने। सालों बाद किसी कलेक्टर को जिला चिकित्सालय की सुध आई है। इसलिए जिला कलेक्टर भरत यादव वाकई साधुवाद के पात्र हैं।
इसके पूर्व एक समय तत्कालीन जिला कलेक्टर एच.मिश्रा फिर मोहम्मद पाशा राजन के उपरांत एम.मोहन राव ने जिला चिकित्सालय का निरीक्षण किया था। एम.मोहन राव तो बाकायदा शाम ढलते ही पेइंग वार्ड के सामने वाले मैदान जिसमें वर्तमान में निर्माण जारी है में कुर्सी लगाकर बैठ जाया करते थे और यहां व्यवस्थाओं को सुधारने का प्रयास करते। उनके समय में यहीं बनाया गया एक मनमोहक फव्वारा कालांतर मेें जमींदोज हो चुका है।
श्री मोहनराव के उपरांत जिला अस्पताल लंबे समय तक उपेक्षित ही रहा। अचानक ही तत्कालीन जिला कलेक्टर मोहम्मद सुलेमान को जिला चिकित्सालय की याद आई और उन्होंने इसके कायाकल्प का जिम्मा उठाया। उस समय अस्पताल के चारंों ओर पसरा अतिक्रमण हटाया जाकर बड़ी तादाद में रेड क्रास की दुकानें बनवाई गईं। इन दुकानों से हुई आय से रेड क्रास सोसायटी तो समृद्ध हुई पर मरीजों के किसी काम ना आ सकी। लंबे समय से जिला चिकित्सालय के अंदर रेड़ क्रास की दवा दुकान की मांग की जा रही है पर पता नहीं क्यों सिवनी की दवा लाबी के सामने घुटनों पर खड़े प्रशासन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
यहां उल्लेखनीय होगा कि राजधानी भोपाल के बारह सौ पचास के जय प्रकाश चिकित्सालय सहित प्रदेश में अनेक स्थानों पर रेड क्रास द्वारा संचालित होने वाली दवा की दुकानों से मरीजों को खासी राहत मिलती है। यहां दवाएं अन्य दवा की दुकानों के बजाए सस्ती ही मिला करती हैं, क्योंकि इन पर करारोपण कम होता है।
फिर जिला चिकित्सालय का हाल जाना उस वक्त के कलेक्टर डॉ.जी.के.सारस्वत ने। उन्होंने जिला चिकित्सालय में काम तो करवाया पर प्राईवेट वार्ड सहित अन्य कारीडोर पर बांसों की ऐसी चिलमन खड़ी करवा दी कि यहां हवा आना जाना ही बंद हो गई। उस वक्त अस्पताल में काफी सुधार कार्य हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
जिला कलेक्टर भरत यादव ने इसी क्रम को आगे बढ़ाया है। उन्होंने अस्पताल का औचक निरीक्षण किया निश्चित तौर पर वे यहां की व्यवस्थाओं से खुश या संतुष्ट तो कतई नहीं हुए होंगे। जिला चिकित्सालय में गंदगी का साम्राज्य पसरा हुआ है। निःशुल्क दवा वितरण केंद्र में पैंशनर्स को मिलने वाली दवाएं गायब हैं। दवाएं मिल रही हैं तो वे भी जिनकी एक्सपायरी डेट करीब हैं वे वाली।
अस्पताल के चिकित्सक अपने निहित स्वार्थ के चलते जैनरिक दवाओं के स्थान पर ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं। गरीब मरीज कहां से लाए इन ब्रांडेड दवाओं के लिए पैसे। सारा जीवन सरकार को समर्पित करने वाले पेंशनर्स के बुरे हाल हैं। पैंशनर्स की आयु बांसठ से नब्बे पंचायनवे या सौ वर्ष की होगी।
यह आयु निश्चित तौर पर रोगों के लिए ही मानी जाती है। इस उम्र में पैंशनर्स को मधुमेह, रक्तचाप जैसी बीमारियां होना आम बात है। अलग अलग लोगों को रक्तचाप की अलग अलग दवाएं होती हैं। अस्पताल में पैंशनर्स को रक्तचाप के नाम पर लोसार एच और एटेन नामक दवाएं ही उपलब्ध हैं।
चिकित्सकों की मानें तो रक्तचाप का मामला बहुत संवेदनशील होता है। इसमें निर्धारित दवा देना ही उचित होता है। अगर दूसरी दवा दी जाए तो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उच्च या निम्न रक्त चाप के मरीज अगर दवा ना खाए तो उसकी किडनी पर भी असर हो सकता है। जिला प्रशासन को चाहिए कि गरीबों और पैंशनर्स को मिलने वाली दवाएं कम से कम उन्हें मुहैया हों इस बारे में प्रयास अवश्य ही करें।
जिला चिकित्सालय में जिलाधिकारी भरत यादव ने बहुत सी अनियमितताएं देखी होंगी। निश्चित तौर पर जिला कलेक्टर के पास बहुत सारे काम होते हैं, व्यस्तताएं होती हैं। उन्होने समय निकाला और अस्पताल का निरीक्षण किया। जिला कलेक्टर से अपेक्षा है कि वे स्वास्थ्य विभाग के प्रभारी उप जिलाध्यक्ष को ताकीद करें कि वे जिला चिकित्सालय सहित जिले के समस्त स्वास्थ्य केंद्रों की प्रगति एवं अन्य बातों की समीक्षा कर साप्ताहिक प्रतिवेदन उनके समक्ष रखें।
इससे कम से कम जिले के स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सकों और पेरामेडीकल स्टाफ सहित समस्त चेत सकेेंगे। साथ ही साथ प्रशासन का जो भय उनके दिल दिमाग में समाप्त हो चुका है उसे दुबारा कायम किया जा सकेगा, जिससे कम से कम मरीजों को तो इसका लाभ मिल सकेगा।

जिला चिकित्साल में खून का धंधा जोरों पर है। एक्सरे और अन्य जांच के लिए भी बाहर के निजी संस्थानों के साथ इनकी जुगलबंदी देखने लायक है। अस्पताल में पदस्थ चिकित्सक भी अपना पूरा ध्यान अपनी अपनी निजी ‘दुकानों‘ में पूरी तरह दे रहे हैं। सिविल सर्जन डॉ.सत्यनारायण सोनी आरोपों में आकण्ठ डूबे हुए हैं। चिकित्सक समय पर अस्पताल में उपस्थित नहीं होते हैं। स्टॉफ का मरीजों के साथ बर्ताव बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता है। अस्पताल में मिलने वाला खाना बहुत ही बेस्वाद और घटिया क्वालिटी का होता है। ना जाने कितनी समस्याएं हैं अस्पताल के अंदर। जब जिला मुख्यालय का यह आलम है तो सुदूर ग्रामीण अंचलों के अस्पतालों की सोचकर ही रूह कांप जाती है।

बुधवार, 3 जुलाई 2013

किसानों के हितसंवर्धन के लिए कलेक्टर हुए संजीदा

किसानों के हितसंवर्धन के लिए कलेक्टर हुए संजीदा

(जितेश अवधवाल)

सिवनी (साई)। कलेक्टर श्री यादव ने जिले के कृषकों को अगामी खरीफ एवं रवी की फसलों में उत्तम गुणवत्ता के कृषि आदानों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने एवं बीज, उर्वरक एवं कीटनाशक औषधि की कालाबाजारी एवं अवैध व्यापार पर अंकुश लगाने हेतु निम्नानुसार विशेष उड़नदस्ता दल/समिति का गठन किया गया है।
यह उड़न दस्ता समय-समय पर अभियान चलाकर कृषि आदान वितरण संस्थान/निजी विक्रेताओं की संघन जांच एवं निरीक्षण करेंगे तथा बीज, उर्वरक एवं कीटनाशक दवाईयों के अवैध व्यापार पर अंकुश लगा कर उन प्रतिष्ठानों/दुकानों के संचालकों पर कार्यवाही करेंगे। साथ ही समिति द्वारा आदान सामग्री के नमूने लेेकर परीक्षण हेतु गुण नियंत्रण प्रयोगशाला में भेजे जायेगें।

इस दल/समिति के दल प्रभारी- अनुविभागीय दण्डाधिकारी (संबंधित उप संभाग) संबंधित विकासखण्ड होगें, वहीं सदस्य के रूप में सहायक संचालक, कृषि (उपसंचालक के प्रतिनिधि) विकासखण्ड-सिवनी, अनुविभागीय कृषि अधिकारी एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड सिवनी/लखनादौन, व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड सिवनी, व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड-बरघाट, व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड- केवलारी, व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड -कुरई, व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड-छपारा, व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड-लखनादौन, व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड-घंसौर एवं व.कृ.वि.अ. एवं बीज, उर्वरक, कीटनाशी निरीक्षक विकासखण्ड -धनौरा होगें।

एसडीएम के छापे से दवा व्यवसाई सकते में!

एसडीएम के छापे से दवा व्यवसाई सकते में!

(दादू अखिलेंद्र नाथ सिंह)

सिवनी (साई)। आज अपरान्ह अनुविभागीय दण्डाधिकारी, अनुविभागीय अधिकारी पुलिस एवं ड्रग इंस्पेक्टर के संयुक्त छापे की कार्यवाही से शहर के दवा व्यवसाईयों में हडकंप मच गया। छापे की यह कार्यवाही चुनिंदा दवा विक्रेताओं के प्रतिष्ठानों पर होने से चर्चाओं का बाजार भी गर्मा गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार एसडीएम चंद्रशेखर शुकल, एसडीओपी संजीव उईके एवं स्वास्थ्य विभाग के दवा निरीक्षक द्वारा आज अपरान्ह संयुक्त तौर पर दवा प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। बारापत्थर से आरंभ हुई इस कार्यवाही में बारापत्थर में आधा दर्जन से अधिक मेडीकल स्टोर्स में से महज चार में ही निरीक्षण किया गया।
छापामार दस्ता इसके उपरांत बारापत्थर से शहर की ओर कूच कर गया जहां उसने चुनिंदा दवा विक्रेताओं के प्रतिष्ठान में जाकर क्वालिफाईड पर्सन जिसके नाम से दवा दुकान का लाईसेंस है, लाईसेंस, स्टाक रजिस्टर, एक्सपाईरी डेट का स्टाक आदि का निरीक्षण किया।
दवा व्यवसाईयों में चल रही चर्चाओं के अनुसार यह छापामारी किसी की शिकायत पर ही की जा रही होगी, एसडीएम के नेतृत्व में यह छापेमारी लंबे समय के उपरांत की गई है। इसमें अनेक दवा दुकानों की ओर छापामार दल द्वारा ना देखा जाना भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

कमल नाथ के स्वागत में नदारत रहे हुकुम!

कमल नाथ के स्वागत में नदारत रहे हुकुम!

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के समक्ष कांग्रेस की रीति नीति से प्रभावित होकर कांग्रेस की सदस्यता लेने वाले जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह का कमल नाथ के आगमन पर गायब रहना लोगों के लिए शोध का विषय बन चुका है। 13 जून को कमल नाथ के सिवनी आगमन पर ना हुकुम दिखे, ना उनके बेनर पोस्टर्स और ना ही मीडिया में ही कहीं उनकी चर्चा।
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह ने घंसौर में ही 2008 में केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के समक्ष कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। इसके उपरांत वे कमल नाथ के अनुयायी माने जाने लगे थे।
बताया जाता है कि इसी बीच उस समय के जिले के कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र बने हरवंश सिंह ठाकुर से उनका गहरा नाता हो गया था, जिसके चलते जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह ने अपनी निष्ठा हरवंश सिंह के प्रति जतानी आरंभ कर दी थी।
बताया जाता है कि पिछले कुछ समय से हरवंश सिंह भी जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह की कारगुजारियों से नाराज थे। संभवतः यही कारण है कि कुंवर शक्ति सिंह का बर्रा दरबार से पत्ता ही साफ हो गया था। वहीं कांग्रेस के अंदर यह भी चर्चा चल रही है कि जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह अब यह भी कह रहे हैं कि हरवंश सिंह ने उनसे कहा था कि अगर वे (हरवंश सिंह) लोकसभा चुनाव लड़ते हैं तो हुकुम अपनी केवलारी से तैयारी रखें। इन बातों में कितनी सच्चाई है इस बारे में वे ही जानते होंगे।
बहरहाल जब 13 जून को कमल नाथ का सिवनी आगमन हुआ तब जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह के समर्थक, बेनर पोस्टर्स सहित वे मीडिया से भी गायब रहे। कमल नाथ के आगमन के उपरांत मीडिया में हुकुम की केवलारी से सशक्त दावेदारी की खबरें अवश्य ही आम हो गईं।
एक कांग्रेस के नेता ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर साई न्यूज से कहा कि जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह इतने बड़े नेता तो हैं नहीं कि उनके पक्ष में इस तरह की खबरों से मीडिया पट जाए। जाहिर है यह उनका ही अपना प्रयास होगा। वे चाहते तो कमल नाथ के आगमन के दौरान भी उनके स्वागत में कम से कम अपने मुठ्ठी भर समर्थकों को तो भेज ही सकते थे, वस्तुतः ऐसा हुआ नहीं।
पिछले दिनों कमल नाथ के एक कट्टर समर्थक के साथ सार्वजनिक तौर पर हुकुम ने डेढ़ घंटे चर्चा की तो इस बात का कयास लगाया जाने लगा है कि एक बार फिर कमल नाथ के समक्ष कांग्रेस की सदस्यता लेने के उपरांत कमल नाथ को ही भूलने वाले जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष कुंवर शक्ति सिंह अब फिर से कमल नाथ केंप में एंट्री की संभावनाएं तलाश कर रहे हैं।

(क्रमशः जारी)

डॉ.सोनी के बूते की बात नहीं अस्पताल में प्रशासन!

डॉ.सोनी के बूते की बात नहीं अस्पताल में प्रशासन!

(महेश रावलानी)

सिवनी (साई)। प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के नाम से सुशोभित जिला चिकित्सालय में जबसे सिविल सर्जन की कमान डॉ.सत्यनारायण सोनी को सौंपी गई है, तबसे यहां की व्यवस्थाएं चरमराने लगी हैं। कर्मचारियों में अंदर ही अंदर यह बात तेजी से फैल रही है कि जिला चिकित्सालय में प्रशासन की बात डॉ.सत्यनारायण सोनी के बूते की नहीं रह गई है।
जिला चिकित्सालय में जहां तहां गंदगी का साम्राज्य पसरा हुआ है। अस्पताल के कर्मचारी इस कदर निरंकुश हो चुके हैं कि उन्हें वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का भी भय नहीं बचा है। मरीजों के परिजनों से पेरामेडीकल स्टाफ द्वारा सदा ही दुर्वयवहार की शिकायतें मिल रही हैं।
डॉ.सत्यनारायण सोनी जिला चिकित्सालय में अस्सी के दशक से पदस्थ हैं। लंबे समय से सिवनी में जमे रहने का राज भी लोगों की समझ से परे ही नजर आ रहा है। बीते दिनों भोपाल से आया वरिष्ठ अधिकारियों का दल अवश्य ही जिला चिकित्सालय की व्यवस्थाएं देखकर संतुष्ट हुआ होगा।
जब निरीक्षण (औचक नहीं घोषित) चल रहा था तब चिकित्सक बाकायदा एप्रिन में तो बाकी कर्मचारी वर्दियों में मुस्तैद नजर आ रहे थे। उस समय चिकित्सालय में मरीजों के परिचारकों से अस्पताल के कर्मचारियों का व्यवहार देखते ही बन रहा था। कर्मचारियों के मुंह से भद्दी गाली के बजाए फूल झड रहे थे।

जिला चिकित्सालय में चहुंओर गंदगी पसरी हुई है। गंदगी को एकत्र करने वाले डस्ट बिन जगह जगह ना लगाए जाकर ब्लड बैंक और चिकित्सकों के कक्षों के बीच के खाली स्थान में पानी और धूप खा रहे हैं (चित्र देखें)। पर इसकी सुध ना तो डॉ.सत्यनारायण सोनी ही ले रहे हैं और ना ही किसी अन्य को ही इसकी चिंता है।

अटल ज्योति या अटक ज्योति!

अटल ज्योति या अटक ज्योति!

(शरद खरे)

लोगों को बिजली, पानी, सुरक्षा, भोजन की व्यवस्था करना सरकार की महती जवाबदेही है। इसके लिए सरकार को हर स्तर पर हर संभव प्रयास करना आवश्यक होता है। सरकारों का दीन ईमान अब नहीं बचा है। यही कारण है कि सरकारें अब लोगों की बुनियादी जरूरतों की तरफ ध्यान देना मुनासिब नहीं समझती हैं। सरकारों को अपनी रियाया की कोई चिंता नहीं रह गई है।
बड़े बूढ़े बताते हैं कि जब देश पर ब्रितानी हुकूमत थी, उस वक्त लोगों द्वारा पानी और प्रकाश की मांग की जाती थी तो क्रूर शासक लोगों पर कोड़े बरसाते हुए यह कहते कि पानी और प्रकाश देना उनका काम नहीं है। पानी के लिए घरों में कुएं खोदो और प्रकाश की व्यवस्था स्वयं ही करो।
आज आजादी के साढ़े छः दशकों के बाद भी देश प्रदेश की हालत उस समय से बदतर ही नजर आ रही है। आज के समय में लोग पानी, बिजली, साफ सफाई आदि बुनियादी व्यवस्थाओं को तरस ही रहे हैं। इसमें सिवनी जिला कोई अपवाद की श्रेणी में नहीं आता है सिवनी जिले में भी पानी और प्रकाश का अभाव साफ दिखाई पड़ जाता है।
सूबे के निजाम 22 जून को सिवनी में अटल ज्योति अभियान का श्रीगणेश करके चले गए हैं। सरकार का दावा है और आज भी वह जनसंपर्क विभाग के माध्यम से यह दावा कर रही है कि अब सिवनी जिले को चौबीसों घंटे बिजली हर हाल में मिलेगी। जिला मुख्यालय के उपनगरीय क्षेत्रों में बिजली का आलम वही है जो अटल ज्योति के श्रीगणेश के पहले हुआ करता था।
मजे की बात तो यह है कि इस संपादकीय को लिखने बैठे और शहर की बिजली ही गोल हो गई। हो सकता है तकनीकि गड़बड़ी के चलते दस पांच मिनिट को लाईट गोल हुई हो, किन्तु शहर के उपनरीय क्षेत्र डूंडा सिवनी, लूघरवाड़ा, लखनवाड़ा आदि में लाईट की आंख मिचौली अभी भी जारी ही है।
केवलारी और बरघाट विधानसभा की हालत लाईट के मामले में बहुत ही दयनीय है। अटल ज्योति अभियान के आरंभ होने के बाद भी लाईट का बुरा हाल है दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों में। दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों के तीन दर्जन से ज्यादा गांव के वाशिंदे आजादी के बाद से लाईट के इंतजार में हैं।
इन गांवों में लाईट का ना होना आश्चर्यजनक इसलिए भी है क्योंकि इन दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कांग्रेस और भाजपा के कद्दावर नेताओं ने विधानसभा और लोकसभा में किया है। आजादी के बाद साढ़े छः दशकों में भी कांग्रेस भाजपा के नुमाईंदों द्वारा लाईट के लिए इन गांव वालों की सुध ना लिया जाना अपने आप में अनोखा ही मामला है।
विद्युत मण्डल के अधिकारी इन गांवों को वनबाधित ग्राम मानते हैं। वनबाधित क्या चीज होती है। जहां लोग रह रहे हैं, अगर वह वनबाधित क्षेत्र है तो उन्हें वहां से विस्थापित किया जाना चाहिए था, वस्तुतः जो हुआ नहीं। अगर विस्थापित नहीं किया गया तो उन्हें बिजली मुहैया करवानी चाहिए थी।
सरकारी चाल किस मंथर गति से चल रही है इसका साफ उदहारण है। ये गांव। इन गांवों में आजादी के उपरांत साढ़े छः दशकों में सरकारी नस्तियां परवान नहीं चढ़ पाई हैं, जो दुःखद है। एमपीईबी का कहना है कि वन विभाग इस क्षेत्र में केबल के माध्यम से लाईन डालने की बात कह रहा है पर विस्त्रत प्राक्कलन में इसका जिकर नहीं है।
सरकारी स्तर पर बनाए गए विस्त्रत प्राक्कलन या डीपीआर में क्या है, क्या नहीं है, इस बात से बेचारे ग्रामीणों को क्या लेना देना? ग्रामीण तो बस लाईट ही चाह रहे हैं। साढ़े छः दशकों में भी इन गांवों में रोशनी की किरण ना पहुंच पाना, आश्चर्यजनक ही है। जब ग्रामीण स्तर पर यह हाल है तो भला कैसे मान लें कि कांग्रेस भारत निर्माण कर रही है और भाजपा का शाईनिंग इंडिया परवान चढ़ रहा होगा।
सरकारी स्तर पर दावे क्या हैं और इनकी जमीनी हकीकत क्या है इस बात के बारे में जनपद पंचायत घंसौर की अध्यक्ष चित्रलेखा नेताम की बात से स्थिति साफ हो जाती है। उनका कहना है कि एक लाईनमेन के भरोसे 45 गांव की व्यवस्था है। अगर यह सच है तो वाकई जमीनी हालात भयावह ही माने जाएंगे।
एक लाईनमेन भला 45 गांव की व्यवस्था कैसे संभाल सकता है। घंसौर में कुल 77 ग्राम पंचायत में 250 गांव हैं जिनमें लाईनमेन की तैनाती 15 है, इस लिहाज से चित्रलेखा नेताम का कहना सही ही साबित हो रहा है। हालात दयनीय और भयावह हैं, फिर भी मोटी चमड़ी वाले राजनेता और नौकरशाहों के कानों में जूं भी नहीं रेंग रही है।
घंसौर की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि छोटा सा भी फाल्ट आने पर उसे सुधारने में हफ्तों लगना आम बात होगी। घंसौर जहां कि तीन तीन पावर प्लांट प्रस्तावित हैं, जिनकी ठेकेदारी वहीं के नेता नुमा दबंग कर रहे हैं, पर उन्हें भी गांव वालों की सुध लेने की फुर्सत नहीं है।

युवा एवं उत्साही जिला कलेक्टर भरत यादव से अपेक्षा की जाती है कि जिस तरह वे एक एक कर सारे विभागों की मश्कें कस रहे हैं, उसी क्रम में वे मध्य प्रदेश विद्युत मण्डल को भी अपनी प्राथमिकता पर रखें और जमीनी हालातों पर गौर फरमाकर कुछ ऐसे उपाय करें ताकि गांव के लोग भी बिजली का लाभ ले सकें।

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

जबलपुर रोड़ बंद! धूमा के पास पुल पर फंसा ट्रक

जबलपुर रोड़ बंद! धूमा के पास पुल पर फंसा ट्रक

(नीलेश स्थापक)

लखनादौन (साई)। लखनादौन से धूमा के बीच लगभग दस किलोमीटर आगे पड़ने वाले सेढ़ नदी के पुल पर एक ट्रक फंस जाने से जबलपुर का संपर्क सिवनी जिले से टूट गया है। लखनादौन और धूमा पुलिस की मशक्कत के बाद भी इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पुल के दोनों ओर लगभग दस किलोमीटर तक की लंबी लाईन लगी हुई थी।
पुलिस सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि आज शाम लगभग चार बजे सेढ़ नदी के पुल पर एक दस चक्का का एक पहिया पुल की जर्जर सड़क में फंस गया। काफी मशक्कत के बाद भी इस वाहन को पुल से नहीं हटाया जा सका। जिसके चलते दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लगना आरंभ हो गई।
लखनादौन से जबलपुर मार्ग पर धूमा की ओर लगभग दस किलोमीटर दूर स्थित बड़े पुल के नाम से विख्यात इस पुल की हालत पहले से ही काफी जर्जर बताई जाती है। संबंधितों के ध्यानाकर्षण के बाद भी इस पुल की सुध किसी ने भी नहीं ली है। जिसके चलते आए दिन इस पुल पर आवागमन बाधित हो रहा है।
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पुल के दोनों ओर लगभग दस किलोमीटर तक वाहनों की कतारें लग चुकी थीं। लखनादौन और धूमा पुलिस जाम को हटाने का जतन कर रही हैं, पर उन्हें भी सफलता मिलती नहीं दिख रही है।

दो स्थानों पर हुए झगड़े

लखनादौन कोतवाली से प्राप्त जानकारी के अनुसार क्षेत्र के ग्राम जोबा और चिपकना में गत रात्रि दो गुटों के बीच अलग अलग जमकर विवाद हुआ, जिसमें अनेक घायल हो गए। बताया जाता है कि विवाद का विषय पुरानी रंजिश और जमीनी विवाद है। विस्तृत विवरण प्रतीक्षित है।

दवाओं के लिए भटक रहे पैंशनर्स

दवाओं के लिए भटक रहे पैंशनर्स

सिविल सर्जन की परवाह नहीं कर्मियों को

(महेश रावलानी)

सिवनी (साई)। इंदिरा गांधी के नाम से सुशोभित जिला चिकित्सालय में इन दिनों अंधेरगर्दी का आलम पसरा हुआ है। आलम यह है कि पैंशनर्स को ही दवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। पैंशनर्स को मिलने वाली दवाओं में कटौती पहले ही कर दी गई है और अब जो दवाएं अस्पताल प्रशासन के पास उपलब्ध हैं वे भी पैंशनर्स को नसीब नहीं हो पा रही हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार पैंशनर्स जब अस्पताल जाकर अपने हक की दवाईयां लेने सरदार वल्लभ भाई पटेल निःशुल्क दवा योजना में पैंशनर्स, सीनियर सिटीजन्स और विकलांग के लिए बने प्रथक काउंटर में जाते हैं तो उन्हें वहां कोई भी कारिंदा नजर नहीं आता है।
बीते दिवस एक पैंशनर के परिचारक द्वारा दवाएं ना मिलने की शिकायत सिविल सर्जन डॉ.सत्यनारायण सोनी से की गई तो उन्होंने वहां उपस्थित डॉ.पुरूषोत्तम सूर्या को मामले को देखने को कहा गया। डॉ.सूर्या चूंकि अन्य मरीज को देखने में व्यस्त थे अतः डॉ.सोनी स्वयं ही दवा वितरण केंद्र पहुंचे।
जब वे वहां पहुंचे तो वहां उपस्थित दवा वितरण कर रहे कर्मचारी ने डॉ.सोनी के समक्ष ही पैंशनर्स के परिचारक को दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे पैंशनर्स को दवाएं नहीं दे सकते। जब इस बात की और सिविल सर्जन डॉ.सोनी का ध्यान आकर्षित कराया गया तो डॉ.सोनी की बोलती ही बंद हो गई।
वस्तुतः डॉ.सत्यनारायण सोनी सिविल सर्जन के पद पर पदस्थ है, और उनका काम अस्पताल में प्रशासनिक व्यवस्था को चाक चौबंद रखना है। डॉ.सोनी जिला चिकित्सालय में लगभग पच्चीस सालों से अधिक समय से निश्चेतक के पद पर पदस्थ हैं। डॉ.सोनी पर निश्चेतना के लिए सौ से एक हजार रूपए तक की रिश्वत लेने के आरोप कई बार लग चुके हैं।
बताया जाता है कि डॉ.सोनी पर पूर्व में भी निजी चिकित्सालयों में जाकर बतौर निश्चेतक सेवाएं देने, जिला चिकित्सालय में शल्य क्रिया के पूर्व रूपयों के लेन देन आदि के आरोप लग चुके हैं। बताया जाता है कि कई बार तो डॉ.सोनी के साथ मारपीट तक की नौबत आ चुकी है।
इस संबंध में अस्पताल के ही एक कर्मचारी ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से कहा कि चूंकि डॉ.सत्यनारायण सोनी सालों से सिवनी में ही पदस्थ हैं और उनका पूरा ध्यान बजाए चिकित्सा के कर्म की तरफ होने के, धन उगाही में ही लगा रहता है अतः अस्पताल के कर्मचारी भी डॉ.सोनी की बात को ज्यादा वजन नहीं देते हैं।
इस बात में कितना दम है यह बात तो डॉ.सोनी ही जाने पर प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बीते दिवस सरदार वल्लभ भाई पटेल निःशुल्क दवा वितरण केंद्र में हुए वाक्ये में ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वहां उपस्थित कर्मचारी सिविल सर्जन हों और डॉ.सोनी वहां दवा बांटने वाले।

इस बात की शिकायत जब मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.वाय.एस.ठाकुर से की गई तो उन्होंने पूरी बात सुनने के उपरांत कहा कि इस मामले में शो काज नोटिस अवश्य जारी करेंगे। इस संबंध में सोमवार को जब डॉ.ठाकुर का पक्ष जानने का पुनः प्रयास किया गया तो सुबह वे जिला कलेक्टर की टीएल बैठक में व्यस्त थे और शाम को वे पुनः किसी अन्य बैठक में व्यस्त हो गए।

मुख्य धारा में आने का जतन कर रहे हुकुम!

मुख्य धारा में आने का जतन कर रहे हुकुम!

(अखिलेश दुबे)

सिवनी (साई)। एक समय में सिवनी में कांग्रेस के कद्दावर नेता हरवंश सिंह ठाकुर का पौंचा पकड़कर सियासी पायदान में सीढ़ियां चढ़ने वाले कुंवर शक्ति सिंह भले ही जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री हों पर वे कांग्रेस के अंदर ही मुख्य धारा में आने के प्रयास में दिख रहे हैं। इसी कड़ी में हाल ही में बारापत्थर में अस्पताल के समीप कांग्रेस की सत्ता और शक्ति की धुरी बन चुके एक नेता के साथ उनकी लगभग डेढ़ घंटे हुई चर्चा को जोड़कर देखा जा रहा है।
ज्ञातव्य है कि घंसौर क्षेत्र से आने वाले और मित्रों यारों में हुकुम के नाम से मशहूर कुंवर शक्ति सिंह जिला पंचायत सिवनी के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। कहा जाता है कि उस समय हुकुम को जिला पंचायत उपाध्यक्ष का पद हरवंश सिंह ठाकुर के आर्शीवाद से ही प्राप्त हुआ था। इस बात में सच्चाई कितनी है यह बात तो वे ही जानें पर बाद में शक्ति सिंह का कांग्रेस में प्रवेश इन बातों को बल ही देता है।
कहा जाता है कि इसके उपरांत हुकुम और हरवंश सिंह की जुगलबंदी के चलते घंसौर में सियासी समीकरण तेजी से बदलने लगे। घंसौर के कांग्रेस के एक नेता ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि वर्तमान हिमाचल प्रदेश की महामहिम राज्यपाल उर्मिला सिंह घंसौर में सियासत में सक्रिय थीं, उस समय हुकुम ने अंदर ही अंदर उर्मिला सिंह का पुरजोर विरोध किया।
कहा तो यहां तक जा रहा है कि सिवनी में कांग्रेस में एकछत्र राज्य स्थापित करने की गरज से तत्कालीन प्रभावशाली क्षत्रप द्वारा अपने समकक्ष के सारे नेताओं को हाशिए पर लाना आरंभ कर दिया था। इसी कड़ी में उर्मिला सिंह को भी किनारे लगाने का काम तेजी से किया जाने लगा था।
हरवंश सिंह के करीबी एक कांग्रेसी नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि हरवंश सिंह ठाकुर की उंगली पकड़कर सियासी बियावान में विचरण करने वाले शक्ति सिंह द्वारा उनके अवसान के साथ ही उनके परिजनों को आंखें दिखाना आरंभ कर दिया है। केवलारी विधानसभा क्षेत्र से टिकिट की मांग की खबरें पिछले दिनों समाचार पत्रों में छाई हुई हैं।
कहा जा रहा है कि हरवंश सिंह के निधन के उपरांत केवलारी क्षेत्र में सियासी तौर पर उनके पुत्र रजनीश सिंह ही उत्तराधिकारी हो सकते हैं, पर केवलारी से हुकुम की दावेदारी की खबरें सभी को आश्चर्यचकित कर रही हैं। लोग इसके पीछे के निहितार्थ खोजते नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस के कद्दावर नेता हरवंश सिंह के असमय अवसान के उपरांत कुंवर शक्ति सिंह के कदमताल के बाद उनकी स्थिति कांग्रेस में मजबूत नहीं मानी जा रही है। भले ही शक्ति सिंह यह प्रचारित करवाने में सफल रहे हों कि वे कांग्रेस में स्थापित नेता हो चुके हैं, पर जमीनी हकीकत से वे भी संभवतः रूबरू हो चुके होंगे।
कांग्रेस के अंदर चल रही चर्चाओं के अनुसार एकला चलो रे की नीति पर काम करते हुए कुंवर शक्ति सिंह को यह अहसास होने लगा है कि उनकी जमीन भुरभरी होकर खिसक रही है। संभवतः यही कारण है कि पिछले दिनों कमल नाथ के कट्टर समर्थक एक युवा नेता के साथ उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अस्पताल के सामने बने काम्पलेक्स में डेढ़ घंटे से अधिक समय तक सार्वजनिक तौर पर चर्चा की। माना जा रहा है कि वे इसके जरिए यह संदेश देना चाह रहे थे कि कांग्रेस के अंदर उभरते नए समीकरणों से वे पूरी तरह वाकिफ हैं और जल्द ही वे किसी नए झंडे के तले अपने आपको खड़ा कर सकते हैं।

(क्रमशः जारी)

आठ को अण्णा का सिवनी आना तय!

आठ को अण्णा का सिवनी आना तय!

(राहुल तेलरांधे)

रालेगण सिद्धि (साई)। सरकार को घुटनों के बल खड़ा करने वाले गांधीवादी समाजसेवी अण्णा हजारे का मध्य प्रदेश का दौरा कार्यक्रम तय हो गया है। वे 5 जुलाई से एमपी की यात्रा पर रहेंगे। अण्णा हजारे 8 जुलाई को सिवनी आएंगे और रात्रिविश्राम सिवनी में ही करेंगे।
ज्ञातव्य है कि अण्णा हजारे का 23 जून से उत्तर प्रदेश दौरा उनकी आंख की तकलीफ के चलते निरस्त कर दिया गया था। अण्णा के करीबी सूत्रों ने साई न्यूज को बताया कि अण्णा की आंख की शल्य क्रिया की गई है। चिकित्सकों ने उन्हें चार सप्ताह तक आराम करने का मशविरा दिया था।
अण्णा की जनतंत्र यात्रा का चौथा चरण 23 जून से 04 जुलाई तक उत्तर प्रदेश से आरंभ होना था, जो निरस्त कर दिया गया था। सूत्रों ने कहा कि उत्तर प्रदेश यात्रा की तिथियां प्रथक से घोषित की जाएंगी। अण्णा की एमपी यात्रा 5 जुलाई से रीवा से आरंभ होकर 17 जुलाई को इंदौर में समाप्त होगी।
अण्णा के करीबी सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि अन्ना हजारे 5 जुलाई को रीवा में एक जनसभा को संबोधित करेेंगे। इसके बाद रात्रि विश्राम रीवा में ही करेंगे। 6 जुलाई को रामपुर, चुरहट एवं सीधी में जनसभा को संबोधित करेंगे, तथा रात्रि विश्राम सीधी में करेंगे। 7 जुलाई को अन्ना हजारे ब्योहारी एवं कटनी में जनसभा को संबोधित करेंगे। रात्रि विश्राम कटनी में करेंगे। 8 जुलाई को अन्ना हजारे जबलपुर पहुंचकर जनसभा को संबोधित करने के बाद सिवनी आयेंगे और रात्रि विश्राम सिवनी में ही करेंगे।
9 जुलाई को सुबह अन्ना हजारे छिंदवाड़ा के लिये प्रस्थान कर जायेंगे और वहां जनसभा को संबोधित करने के बाद मुल्ताई एवं बैतूल में भी जनसभा को संबोधित करेंगे तथा रात्रि विश्राम बैतूल में करेंगे। 10 जुलाई को अन्ना हजारे इटारसी में जनसभा को संबोधित करने के बाद होशंगाबाद प्रस्थान कर जायेंगे जहां जनसभा को संबोधित करने के बाद रात्रि विश्राम भी होशंगाबाद में करेंगे।
अन्ना हजारे 11 जुलाई को भोपाल पहुंचेंगे। भोपाल में जनसभा को संबोधित करने के अलावा अन्ना हजारे प्रेस से भी मिलेंगे।  रात्रि विश्राम भी भोपाल में ही करेंगे। 12 जुलाई को वे विदिशा एवं सागर में जनसभाओं को संबोधित करेंगे, रात्रि विश्राम सागर में करेंगे। 13 जुलाई को अन्ना हजारे शाहगढ़, घुवारा व टीकमगढ़ में जनसभाओं को संबोधित करेंगे, रात्रि विश्राम टीकमगढ़ में ही होगा।
इसके बाद 14 जुलाई को सुबह अन्ना हजारे दतिया एवं ग्वालियर के लिये प्रस्थान कर जायेंगे जहां वे जनसभाओं को संबोधित करेंगे तथा रात्रि विश्राम ग्वालियर में करेंगे। 15 जुलाई को अन्ना शिवपुरी एवं गुना में जनसभाओं को संबोधित कर रात्रि विश्राम गुना में करेंगे।

अन्ना हजारे अपने मध्यप्रदेश दौरे के अंतिम चरणों में 16 जुलाई को ब्यावरा व शाजापुर तथा 17 जुलाई को उज्जैन, देवास एवं इंदौर में जनसभाओं को संबोधित करेंगे। अन्ना 16 जुलाई को शाजापुर में और 17 जुलाई को इंदौर में रात्रि विश्राम करेंगे।

खुल गई शिक्षा की ‘दुकानें‘

खुल गई शिक्षा की ‘दुकानें‘

(शरद खरे)

वैसे तो शिक्षण सत्र जून में ही आरंभ हो चुका है पर औपचारिक तौर पर शिक्षण सत्र 01 जुलाई से ही आरंभ माना जाता है। एक जुलाई को शिक्षण सत्र आरंभ हो गया है। बच्चों के अंदर स्कूल जाने का उत्साह देखते ही बन रहा है। इसका कारण यह है कि बच्चों को दो माह के अवकाश के उपरांत एक बार फिर से अपने पुराने मित्र दोस्त मिलेंगे, जिनसे वे सारी बातें शेयर करेंगे।
एक समय था जब शिक्षा का स्थान गुरूकुल माना जाता था। गुरूकुल में विद्यार्थी को चाहे वह राजा का पुत्र हो या गरीब का, सभी को समान रूप से काम करने की शिक्षा दी जाती थी। उस समय पाठ्यक्रम के साथ ही साथ बच्चों को प्रायोगिक शिक्षा भी दी जाती थी। बच्चों को आंगन लीपने से लेकर, लकड़ी काटने, भोजन पकाने, मवेशी चराने जैसे काम भी करवाए जाते थे, ताकि उन्हें जीवन की वास्तविकता का भान हो सके।
कालांतर में भारत पर मुगलों और अंग्रेजों के आक्रमण हुए। मुगलों ने अपनी संस्कृति, तो ब्रितानी गोरों ने अपनी परंपराओं को भारत पर थोपा। ब्रितानी अंग्रेजों की पूजा ईबादत रविवार को होती थी अतः उन्होंने सप्ताहिक अवकाश का दिन रविवार ही मुकर्रर किया जो आज भी अनवरत जारी है। सनातन पंथी संगठन इसे बदलकर मंगलवार करने की मांग करते आ रहे हैं पर हुआ कुछ भी नहीं।
आजादी के उपरांत गुरूकुलों और स्कूलों का स्वरूप शनैः शनैः बदलने लगा। अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए शिक्षण संस्थानों को हमारी सरकारों नें अंगीकार कर लिया। उनके नाम वही रखे गए जो पूर्व में प्रचलित थे। दशकों तक यही व्यवस्था लागू रही। नब्बे के दशक के उपरांत इनके नाम बदलने का काम आरंभ किया गया।
भारत का संविधान बना, व्यवस्थाएं भी एक के बाद एक बनती गईं। देश में शिक्षा को लागू करने, शिक्षा की नीति रीति बनाने, दिशा दशा तय करने का जिम्मा केंद्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपा गया। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सत्तर के दशक के उपरांत मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी शिक्षा में अपनी मनमर्जी को थोपा ही है। कभी किसी एचआरडी मिनिस्टर ने कहा कि शिक्षा में व्याप्त हिंसा को दूर करना होगा! तो कोई कहता सुना गया कि शिक्षा का भगवाकरण कर दिया गया है।
आखिर शिक्षा में हिंसा कैसी? और किसने इस हिंसा को डाला शिक्षा में? शिक्षा का भगवाकरण अगर हो रहा था तो उस समय विपक्ष में बैठे जनता के नुमाईंदे क्या भांग खाकर बैठे थे। देश में जितनी भी सरकारें आई,ं सबने शिक्षा को लेकर नए नए प्रयोग किए। शिक्षा पर उन्होंने वास्तविक स्थिति को सोचे समझे बिना ही अपनी मंशाओं को लादा है।
दो दशकों से शिक्षा की स्थिति बेहद खराब है। आज अधकचरी शिक्षा के चलते, विद्यार्थी भ्रमित ही नजर आ रहे हैं। अब तो लोग यह कहने पर मजबूर हो रहे हैं कि आदमी महज तीन चीजों में निवेश के लिए ही कमा रहा है। एक खाने के लिए, दूसरा चिकित्सक और दवाओं के लिए और तीसरा बच्चों की पढ़ाई के लिए।
आज के समय में नर्सरी से लेकर हायर सेकंड्री तक की पढ़ाई करवाने में पालकों की पतलून ढीली हो रही है। मंहगी फीस, मंहगे गणवेश, मंहगी किताबें पालकों की कमर तोड़ कर रख रही है। उपर से कोचिंग की दुकानों में बच्चों को पढ़ने भेजने में पालकों की बन आती है। गणवेश और किताबें भी शालाओं द्वारा विशेष दुकानों से खरीदने की सलाह दी जाती है। इसमें भी कमीशनखोरी जमकर हो रही है। सिवनी में भी दो तीन ही गणवेश वितरक हैं जिनकी चांदी है। यही आलम किताबों का है।
पता नहीं कैसे शाला में चालीस मिनिट के कालखण्ड के बाद, बच्चों को कोचिंग की आवश्यक्ता पड़ती है। यह बात भी समझ से परे ही है कि चालीस बच्चों को चालीस मिनिट के काल खण्ड में जो शिक्षक बच्चों को समझा नहीं पाता है, वह आखिर कोचिंग में चालीस से ज्यादा बच्चों को, चालीस मिनिट या एक घंटे में उसी चीज को कैसे समझा पाता है। मतलब साफ है कि शिक्षा अब व्यवसाय बन गया है। शिक्षक भी अपना मूल उद्देश्य भूल चुके हैं। शिक्षक भी शालाओं में समय पास करने जाते हैं और अपनी पूरी मेहनत कोचिंग में झोंक देते हैं।
सरकारी शालाओं में यह दायित्व सरकारी नुमाईंदों का बनता है कि वे शाला में बच्चों को सही तरीके से शिक्षा मिले, यह सुनिश्चित करें और निजी तौर पर संचालित होने वाली संस्थाओं में यह दायित्व प्रबंधन का बनता है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसके संस्थान में शिक्षक अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से करें। इसके लिए जिला प्रशासन को कड़े कदम उठाने ही होंगे।
एक और बात जो सामने आ रही है वह है प्रोजेक्ट की। शालाओं में बच्चों को प्रोजेक्ट दिए जाते हैं। इन प्रोजेक्ट को करवाने के लिए बच्चों की भीड़ सायबर कैफे में दिखाई पड़ जाती है। शासन के निर्देशानुसार हर शाला में एक कंप्यूटर लेब और इंटरनेट कनेक्शन होना चाहिए। अगर शाला में कंप्यूटर लेब है, कंप्यूटर का कालखण्ड है, इंटरनेट कनेक्शन है तो फिर क्या कारण है कि विद्यार्थी शाला के बजाए इंटरनेट कैफे के चक्कर काट रहे हैं!

जिला प्रशासन से अपेक्षा है कि शिक्षा विभाग, आदिवासी शिक्षा विभाग के आफीसर इंचार्ज उप जिलाध्यक्ष को स्पष्ट निर्देश दे कि शालाओं में चाहे वह निजी हो या शासकीय, में अध्ययन अध्यापन का सतत निरीक्षण कर सारी व्यवस्थाएं अप टू द मार्क हों। ओआईसी इसलिए क्योंकि इसके लिए जिम्मेदार जिला शिक्षा अधिकारी और सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी से नहीं कर पा रहे हैं।