शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

डॉ.गर्ग ने फिर चमकाया कर्मचारियों को!

डॉ.गर्ग ने फिर चमकाया कर्मचारियों को!

(प्रवीण सोनी)

लखनादौन (साई)। जिला आयुष अधिकारी डॉ.एस.डी.गर्ग ने एक बार फिर अपने खिलाफ शिकायतों के चलते कर्मचारियों पर दबाव बनाया गया। आज लखनादौन प्रवास पर आए डॉ.गर्ग से मिलने के उपरांत कर्मचारी सहमे सहमे से ही दिखाई दिए।
आयुष कार्यालय के सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि आज जिला आयुष अधिकारी डॉ.सतीश चन्द गर्ग लखनादौन आए। लखनादौन आगमन के उपरांत उन्होंने आयुष विभाग के कर्मचारियों की तबियत से खैर ली। डरे सहमे कर्मचारियों पर उन्होंने दबाव बनाया कि वे अपनी शिकायत वापस लें। सूत्रों की मानें तो डरे सहमे आधा दर्जन कर्मचारियों से भी डॉ.गर्ग ने बलात अपने पक्ष में कुछ इबारत लिखवाकर दस्तखत करवा लिए।

ज्ञातव्य है कि डॉ.एस.डी.गर्ग की अनेक शिकायतें आज भी लंबित हैं। उनकी शिकायतों की जांच जिला स्तर पर और लखनादौन स्तर पर भी की जा रही है। लखनादौन की अनुविभागीय दण्डाधिकारी लता पाठक के कार्यालय में उनकी शिकायत लंबित है, जिसमें गंभीर अनियमितताओं के आरोप हैं।

अरविंद मेनन चाह रहे दिनेश को भाजपा में लाना

अरविंद मेनन चाह रहे दिनेश को भाजपा में लाना

(नन्द किशोर / दादू अखिलेंद्र नाथ सिंह)

सिवनी (साई)। ‘‘मैं किसी दल में जाने का विचार नहीं कर रहा हूं। 2008 के विधानसभा चुनावों में तीस हजार लोगों ने मुझ पर भरोसा जताया था, मैं उनसे पूछकर ही कोई कदम उठाउंगा।‘‘ मीडिया में इस बात को प्रचारित करवाने वाले लखनादौन मस्जिद के सरपरस्त, लखनादौन अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष, राय पेट्रोलियम के संचालक, नगर पंचायत लखनादौन के पूर्व अध्यक्ष दिनेश राय उर्फ मुनमुन को भाजपा में बिना शर्त लाने के लिए अरविंद मेनन जमकर प्रयास कर रहे हैं।
ज्ञातव्य है कि इसके पूर्व दिनेश राय के कांग्रेस में जाने की बातें सिवनी की फिजां में जमकर उठीं थीं। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे प्रसन्न चंद मालू की जमानत कैसे और किन कारणों से जप्त हुई इस बारे में सभी को बेहतर जानकारी है।
सिवनी के कांग्रेस के क्षत्रप हरवंश सिंह ठाकुर के अवसान के उपरांत अब सिवनी के सियासी समीकरण तेजी से बदल चुके हैं। अब ‘एक मेरी तीन तेरी‘ का फार्मूला कारगर नहीं रह गया है। इन्हीं नए सियासी समीकरणों के कारण भाजपा और निर्दलीय प्रत्याशियों की सांसें फूलती दिख रही हैं।
पिछले दिनों गांधी वादी समाजसेवी अण्णा हजारे के सिवनी आगमन के पूर्व दिनेश राय और उनके समर्थक जिस तेजी से सक्रिय हुए थे, उसे देखकर लगने लगा था कि अपने ‘‘विशेष‘‘ प्रभाव के जरिए दिनेश राय द्वारा अण्णा के इर्द गिर्द के लोगों को सम्मोहित कर उन्हें अपने पक्ष में कर लेंगे।
इसकी एक बानगी अण्णा हजारे की सिवनी यात्रा के पूर्व सुनीलम द्वारा ली गई पत्रकार वार्ता में देखने को मिली थी। इस पत्रकार वार्ता में पूर्व विधायक सुनीलम द्वारा दिनेश राय को अपने बराबरी का असान दिया था, जिससे अण्णा हजारे से जुड़े सिवनी के युवाओं में तल्ख नाराजगी सामने आई थी।
इसके उपरांत जब अण्णा के प्रोग्राम स्थल की बुकिंग आनन फानन दिनेश राय द्वारा करवा दी गई थी तब भी इन युवाओं ने अण्णा हजारे के गृह ग्राम रालेगण सिद्धि और दिल्ली कार्यालय को संपर्क किया था। कहा जाता है कि दिनेश राय का जादू इन दोनों ही जगह पर सर चढ़कर बोल रहा था, इसलिए कोई भी उनके खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाह रहा था।
अण्णा के करीबी सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑॅफ इंडिया को बताया कि सिवनी के कुछ युवाओं द्वारा वास्तविकता का कच्चा चिट्ठा दिल्ली और रालेगण भेजा तब जाकर धूमा के उपरांत अण्णा का मन बदला और ना तो मंच पर ना ही अन्य स्थानों पर अण्णा ने सिवनी के इन चेहरों को अपने पास फटकने दिया।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय के सूत्रों ने साई न्यूूज को बताया कि अब अरविंद मेनन का मन बन रहा है कि वे दिनेश राय उर्फ मुनमुन को भाजपा की सदस्यता दिलवाएं, किन्तु इसके लिए दिनेश राय की शर्तें आड़े आ रही हैं। अरविंद मेनन आखिर यह क्यों चाह रहे हैं कि दिनेश राय भाजपा में आएं इस बात का खुलासा सूत्र नहीं कर सके।
सूत्रों ने आगे कहा कि अरविंद मेनन ने इस बारे में हाई कमान को इशारे ही इशारे में सारी बातें समझा दी हैं। कहा जा रहा है कि हाई कमान ने कहा है कि भाजपा में सभी का स्वागत है, पर किसी को भी शर्तों पर भाजपा में नहीं लाया जा सकता है, बिना शर्त अगर कोई आता है तो उसका स्वागत होगा। अगर दिनेश राय भाजपा में जाते हैं तो जिला भाजपा की क्या प्रतिक्रिया होगी इस बारे में बातें अभी भविष्य के गर्भ में ही हैं।

दुर्घटनाओं को न्योता देती चरमराई यातायात व्यवस्था

दुर्घटनाओं को न्योता देती चरमराई यातायात व्यवस्था

(शरद खरे)

जिला मुख्यालय सिवनी की यातायात व्यवस्था पूरी तरह से पटरी से उतर चुकी है। सिवनी में यातायात व्यवस्था या ट्रेफिक सेंस नाम की चीज नहीं बची है। जिसका जहां मन होता है, वहां वाहन खड़ा कर देता है, जहां मन आया सवारी गाड़ियां सवारी भरती उतारती नजर आती हैं। शहर में जगह जगह बस स्टेंड स्थापित हो गए हैं।
सिवनी शहर में बिगड़ैल यातायात व्यवस्था का सबसे दुखद पहलू यह है कि सिवनी में भारी और हल्के वाहन चौबीसों घंटे फर्राटे भरते नजर आते हैं। अतिक्रमण ने सड़कों को सकरा कर दिया है तो वाहनों की तादाद में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। सिवनी शहर के पॉश इलाके बारापत्थर में भारी वाहन और अर्थ मूवर्स का आवागमन बारहों माह तीसों दिन होता है। पता नहीं सिवनी में इस जगह इन वाहनों का क्या काम?
जिला मुख्यालय सिवनी में जबलपुर रोड़, बरघाट रोड़, नागपुर, रोड़ छिंदवाड़ा रोड़ सहित अनेक मुख्य मार्गों पर विद्यालयों की भरमार है। इन विद्यालयों के लगने और अवकाश के समय यहां वाहनों की रेलमपेल से दुर्घटनाओं की आशंका बनी ही रहती है। स्कूल प्रशासन द्वारा भी इस दिशा में कोई पहल ना किया जाना आश्चर्यजनक ही माना जाएगा।
बरघाट रोड़ पर केंद्रीय विद्यालय है। बरघाट रोड़ से केंद्रीय विद्यालय पहुंच मार्ग की दयनीय दशा किसी से छिपी नहीं है। इस मार्ग में लगभग सौ फिट की सड़क अभी बनी नहीं है। बारिश के कीचड़ में विद्यार्थियों को स्कूल लाने ले जाने वाले आटो कभी भी फिसल सकते हैं, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
इसी मार्ग में बरघाट रोड़ पर रेल्वे क्रासिंग से डूंडा सिवनी तक सड़क पर भारी वाहनों का जाम देखने लायक होता है। सड़क पर खड़े इन भारी वाहनों से आवागमन बुरी तरह बाधित हुए बिना नहीं रहता है। आलम यह होता है कि सड़क महज एक ओर से ही आने जाने को खुली रहती है, जिससे वाहनों की रेलम पेल में दुर्घटना का भय सदा ही बना रहता है।
वहीं इस मार्ग पर यातायात पुलिस द्वारा पाबंद कारिंदों द्वारा महज दस बीस रूपए के लालच में भारी वाहनों को शहर में आने के लिए अनुमति दे दी जाती है, जिससे दुर्घटना का भय बना ही रहता है। शाला के अवकाश के समय अनेकों बार रेल्वे फाटक भी बंद रहता है जिससे जाम की स्थिति निर्मित हो जाती है।
इसके अलावा छिंदवाड़ा चौक और कोतवाली के सामने वाले स्कूलों के सामने भी वाहनों की आवाजाही बहुतायत में ही हुआ करती है जिससे दुर्घटना का भय बना रहता है। कोतवाली के सामने वाले स्कूल के समक्ष तो यात्री बस और टेक्सियों में बाकायदा सवारी भी भरी जाती हैं। विडम्बना ही कही जाएगी कि कोतवाली के सामने ही जब आलम यह रहता है तो भला अन्य जगहों के बारे में अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सबसे भयावह स्थिति कचहरी चौक की हुआ करती है। इस चौक पर जब मिशन उच्चतर माध्यमिक शाला और मिशन कन्या शाला की छुट्टी होती है तो शोहदों की भीड़ के बीच बालाओं को छींटाकशी का भी सामना करना पड़ता है। कचहरी चौक और सर्किट हाउस के बाजू से जिला कलेक्टोरेट जाने वाले मार्ग पर अंधी गति से भागते भारी वाहन विशेषकर डंपर से कभी भी किसी भी तरह की दुर्घटनाओं ेसे इंकार नहीं किया जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि जिला या पुलिस प्रशासन इन परिस्थितियों से वाकिफ नहीं है। हर जगह यातायात पुलिस के ट्रेफिक प्वाईंट बने हुए हैं। इन प्वाईंट्स पर यातायात पुलिस के कर्मी अक्सर ही नदारत हुआ करते हैं। इनके स्थान पर आवारा मवेशी ही यहां डेरा डाले दिख जाते हैं। पुलिस महकमा स्टाफ की कमी की बात अक्सर ही कर देता है। इसके लिए सांसद विधायक क्या कर रहे हैं, यह भी विचारणीय प्रश्न ही है।
वर्तमान में विधानसभा का सत्र चल रहा है। अगर विधायकों ने पूर्व में सूचना देकर प्रश्न नहीं लगाया है तो वे शून्यकाल में तो कम से कम इन समस्याओं और पुलिस में स्टाफ की कमी की बात कर ही सकते हैं। वस्तुतः सिवनी जिले की समस्याओं से यहां के जनादेश प्राप्त सांसद विधायकों को कोई सरोकार शायद नहीं बचा है।
जिला कलेक्टर भरत यादव एवं जिला पुलिस अधीक्षक मिथलेश शुक्ला से अपेक्षा ही की जा सकती है कि कम से कम सिवनी शहर में भारी वाहनों के लिए प्रतिबंधित समय में भारी वाहन विशेषकर अंधी गति से भागते डंपरों के प्रवेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की व्यवस्था सुनिश्चित करने के साथ ही साथ शालाओं के अवकाश के समय यातायात का दबाव कम हो इसके भी प्रयास करें। इसके लिए नगर पालिका प्रशासन को चाहिए कि कम से कम यातायात की दृष्टि से अतिसंवेदनशील इन प्वाईंट्स पर ट्रेफिक सिग्नल लगाने की व्यवस्था तत्काल सुनिश्चित करे, अन्यथा अगर कोई हादसा होता है तो उन्हें जवाब देते नहीं बनेगा।

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

तपस्या का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण: आचार्यश्री

तपस्या का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण: आचार्यश्री

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। पूज्यपाद विद्यासागर जी महाराज द्वारा आज आयोजित एक विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि तपस्या का अर्थ अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना है। सद्विचारों के साथ सभी के कल्याण की कामना लेकर हमारे द्वारा किया जाने वाला अनुष्ठान हमें आत्मबोध कराने में सहायक होता है। कषाय के रहते हम आत्म स्वरूप की अनुभूति नहीं कर सकते।
महाराज ने एक उदाहरण के माध्यम से अपनी बात को समझाते हुए कहा कि एक व्यवसायी थ जो भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि 15 दिन वर्षा न हो। ऐसा हो जाने पर गोदाम में रखा उसका सारा माल बिक जायेगा और वह फायदे में रहेगा। इसके विपरीत एक दूसरा व्यक्ति भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु समय समय पर आवश्यकता के अनुरूप वर्षा होती रहे ताकि पर्याप्त अन्न उपजेे और पृथ्वी के सभी जीव जंतु और पेड़ पौधे हरे-भरे और संतुष्ट हों।
पहले व्यक्ति की प्रार्थना स्वार्थ भरी है, और ऐसी प्रार्थना करने वाला आत्मबोध की अनुभूति नहीं कर सकता, और न ही परमात्मा को प्राप्त हो सकता है। जबकि सभी के कल्याण की कामना करने वाला व्यक्ति न सिर्फ संतुष्ट और धन धान्य से परिपूर्ण होता है, बल्कि आत्मबोध के साथ ही वह परमात्मा की अनुभूति भी कर लेता है।
महाराजश्री ने कहा कि भगवत् स्वरूप पाने की क्षमता प्रत्येक व्यक्ति में होती है। कहने को हम अपने आपको मानव कहते हैं लेकिन वास्तव में हम मानव कब बनते हैं। मस्तिष्क, आंख, नाक, मंुह, हाथ-पैर से युक्त यह शरीर हमारा आकार है, यह हमारा स्वरूप नहीं है। स्वरूप तो भीतर छुपा हुआ है जो दिखाई नहीं देता है। इसे देखने के लिये हमें अपने स्वार्थ, अपना अभिमान, छोड़कर धर्म का अनुशरण करना पड़ता है। धर्म सभी के कल्याण के लिये है, स्वयं के कल्याण के लिये किया गया धर्म स्वार्थ की श्रेणी में आ जाता है।
अतः आप सभी निःस्वार्थ भाव से सभी के कल्याण की कामना लेकर आत्म तथ्य की अनुभूति हेतु अग्रसर हों आज हम आप सबसे इतना ही कहेंगे। प्रवचन के पश्चात महाराजश्री नागपुर की ओर गमन कर गये हैं।

मिल रहा है लिपिक हड़ताल को जमकर समर्थन

मिल रहा है लिपिक हड़ताल को जमकर समर्थन

(जितेश अवधवाल)

सिवनी (साई)। लिपिक वर्गीय कर्मचारियों की हड़ताल आज 7वें दिन भी सफलतापूर्वक जारी रही। जिसमे भारी संख्या मे लिपिकों की उपस्थिति रही।
म.प्र.लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ जिला सिवनी के प्रचार सचिव मनीष जैन ने जिलाधक्ष पी.आर.गुप्ता के हवाले से बताया है कि, जिला शाखा सिवनी के म.प्र.अधिकारी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति/म.प्र.अधिकारी कर्मचारी अध्यक्षीय मण्डल एवं म.प्र.तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ ने संयुक्त रूप से हड़ताली पंडाल मे उपस्थित होकर संयुक्त हस्ताक्षरित पत्र जारी कर लिपिकों की इस हड़ताल का पूर्ण समर्थन किया है। सांथ ही म.प्र.शासन से अनुरोध किया है कि वर्षों से लंबित लिपिक वर्गीय कर्मचारियों की जायज मांगों का तत्काल निराकरण कर समस्या का समाधान करने का कष्ट करेंगें।
हड़ताल के पंडाल मे सिवनी के एम.के.अमरोदिया अध्यक्ष म.प्र.राज्य कर्मचारी संघ, महेन्द्र पण्डया अध्यक्ष म.प्र.तृतीय वर्ग शास.कर्म.संघ, सूरज नागेश्वर अध्यक्ष म.प्र.लघु वेतन कर्म.संघ, सुरेश दुबे अध्यक्ष म.प्र.शिक्षक कांग्रेस, विजय शुक्ला अध्यक्ष म.प्र.शिक्षक संघ, अरूण सैनी अध्यक्ष म.प्र.कर्मचारी कांग्रेस, विपनेंश जैन अध्यक्ष, महफूज खान कार्यकारी अध्यक्ष व शमसुन्निशा महिला प्रमुख म.प्र.राज्य अध्यापक संघ, जयपाल धुर्वे अध्यक्ष म.प्र.पटवारी संघ, टीकाराम बघेल अध्यक्ष म.प्र.स्वास्थ्य कर्म.संघ, समीर वर्मा अध्यक्ष म,प्र,वन कर्म.संघ, टी.आर.वर्मा अध्यक्ष म.प्र.डिप्लोमा इन्जी.एसो., जमुना सनोड़िया अध्यक्ष पशुचिकित्सा क्षेत्र अधि.संघ, कैलाश रूनिझा अध्यक्ष म.प्र.हैण्डपंप टैक्नि.संघ एवं म.प्र.अ.जा.जन.जाति कर्म.संघ के अध्यक्ष शामिल रहे।

अपराध की अंधी सुरंग में सिवनी का युवा!

अपराध की अंधी सुरंग में सिवनी का युवा!

(लिमटी खरे)

सिवनी जिला एक समय में शांति का टापू माना जाता था। कहा जाता है कि एक समय था जब सरकारी नुमाईंदे जिनकी सिवनी पदस्थापना होती थी वह सिवनी में महज छः माह ही बिताने के उपरांत यह सोच लेता था कि सिवनी में ही बसा जाए, क्योंकि सिवनी में आपसी सौहाद्र, भाईचारा और शांति उसके लंबे जीवन के लिए वाकई सुकून दे सकती है।
कालांतर में नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही सिवनी में अपराधिक तत्वों ने दस्तक दी। सिवनी में अपराध का ग्राफ शनैः शनैः तेज गति से बढ़ता ही चला गया। दरअसल राजनैतिक संरक्षण के चलते आपराधिक तत्वों के हौसले बुलंदी पर आए और लोगों का जीना मुहाल हो गया।
इक्कीसवीं सदी के आगाज के साथ ही सिवनी में जुंआ, सट्टा, विशेषकर क्रिकेट का सट्टा सर चढ़कर बोलने लगा। जंगलों में जुंए की फड़ जमने लगी, गौकशी के लिए गौवंश का निर्यात जोरों पर हुआ, क्रिकेट में भी सट्टे ने लोगों के घरों को बर्बाद कर दिया, शराब का प्रचलन जमकर हो गया। कुल मिलाकर सिवनी जिले में अमन चैन पूरी तरह समाप्त ही प्रतीत होने लगा।
सिवनी में एक के बाद एक हाईटेक क्रिकेट सट्टा पकड़ाए गए, पुलिस ने इनकी मश्कें कसीं, फिर भी वर्तमान में क्रिकेट का सट्टा चरम पर ही कहा जा रहा है। कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की चाह में सिवनी के युवा क्रिकेट के सट्टे के मकड़जाल में उलझकर रह गए हैं।
यही आलम जुंए का है। जंगलों में जुंए की फड़ें जम रही हैं। वहां खेलने वालों को सारी सुविधाएं भी दिए जाने की खबरें हैं। कहते हैं जुंए में जो जीता वह जुंआ खिलाने वाले को नाल देता है और हारने वाले के लिए स्पाट फाईनेंस की सुविधा है सो अलग। कहा जाता है कि महाजनी ब्याज दर से कई गुना ज्यादा ब्याज दर पर स्पाट फाईनेंस की सुविधा भी है।
बीते दिवस भाजयुमो के एक कार्यकर्ता को गोलियों से भून दिया गया, जिससे शहर दहल गया। पुलिस ने इस केस को सुलझाने का दावा किया है। इसमें तीन आरोपी अभी फरार हैं। अपनी पीठ ठोंकने वाली पुलिस द्वारा जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि आरोपी बबलू सरदार को कार में बिठाकर फलां घर ले गया जहां से वह मोटर सायकल से घटना स्थल पहुंचा।
क्या यह सिवनी पुलिस की कार्यप्रणाली है जो खुद को ही आईना दिखाने के लिए पर्याप्त कही जा सकती है। इसके पहले मिशन स्कूल में हुई घटना में बबलू सरदार फरार बताया जा रहा है। पुलिस का खुफिया तंत्र कैसा है कि फरार आरोपी खुद ही अपने घर जाता है और फिर मोटर सायकल पर बैठकर एक जघन्य हत्या जैसे अपराध में शामिल होकर अंजाम देता है?
कहा जा रहा है कि उक्त आरोपी फरारी के दौरान तीन दिन तक जिला चिकित्सालय में उपचार हेतु भर्ती रहा! कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि अगर पुलिस के कुछ मुलाजिमों के मोबाईल फोन के इन दिनों के काल रिकार्ड निकाल लिए जाएं तो अफसर दांतों तले उंगली दबा लेंगे। इन बातों में कितनी सच्चाई है यह नहीं कहा जा सकता है, और यह देखना पुलिस के आला अधिकारियों की जांच का विषय है।
गत दिवस पुलिस ने जिन आठ लोगों को इस हत्याकाण्ड में पकड़ा है, उनमें से सभी की आयु लगभग 20 से 25 साल के बीच है, जो चिंता का विषय है। हमें यह सोचना आवश्यक है कि आखिर हम सिवनी के युवाओं को किस रास्ते पर धकेल रहे हैं। जिस उमर में युवाओं के सर पर पढ़ाई का भूत सवार होना चाहिए उस आयु में युवा आखिर कैसे माउजर और हथियार लेकर घूम रहे हैं?
आखिर क्या वजह है कि इन युवाओं के पालकों को भी इनके भविष्य की चिंता नहीं सता रही है? एक दशक पहले जब ये बच्चे रहे होंगे तब इनके पालकों ने निश्चित तौर पर यही सोचा होगा कि आगे चलकर ये शहर के जिम्मेदार नागरिक बनेंगे! पर आज का परिदृश्य कुछ और ही नजर आ रहा है।
शहर के जिम्मेदार नागरिक बनने के बजाए इनमें से अधिकांश कम समय में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की चाहत मन में पालते दिख रहे हैं। इनमें से अधिकांश राजनैतिक तौर पर किसी ना किसी को माईबाप बनाए हुए हैं। इसका तातपर्य यह हुआ कि राजनैतिक तौर पर सक्रिय साहेबान भी सिवनी को बिहार बनाने पर ही अमादा हैं। कोई जनसेवक बनने की चाह मन में रख रहा है और कमर में रिवाल्वर टांगे घूम रहा है तो कोई अवैध कट्टों को खिलौने की तरह उपयोग करने वालों के सर पर अपना हाथ रखे हुए है!
मोबाईल और इंटरनेट के युग के सकारात्मक परिणाम तो हैं पर युवा पीढ़ी इनके नकारात्मक परिणामों की ओर बढ़ती दिख रही है। माता पिता की चोरी से युवा वर्ग अपने न जानने वाले किसी साथी से भी घंटो बतियाते रहते हैं। अंत में यह रिश्ता अवैध शारीरिक संबंधों में तब्दील हो जाता है। फिर आरंभ होता है युवती को ब्लेकमेल करने का सिलसिला, अपनी इज्जत को बचाने के चक्कर में किशोरियां तबाह हो जाती हैं। ऐसे एक नहीं, अनेकों वाक्ये शहर की फिजां में तैर रहे हैं।
आज हमें ही सोचना होगा, सिवनी के हर प्रौढ़ और उमर दराज व्यक्ति को सोचना ही होगा कि आखिर क्या वजह है कि युवा पीढ़ी पढ़ाई लिखाई से दूर भागकर हाथ में हथियार उठाने को फैशन मानने लगी है। आज समाज को इस दिशा में सोचना अत्यावश्यक है, वरना सिवनी के युवा जिस अंधेरी सुरंग में तेजी से दौड़ लगा रहे हैं, उसका दूसरा मुहाना बंद है। इस तरह की दौड़ की परिणिति बीच बीच में इस तरह के हत्याकांड के रूप में सामने आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
यह वाकई बेहद संवेदनशील मामला है। इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा। सामाजिक तौर पर ही नैतिक पतन के क्षरण को रोकने की बात होना चाहिए। सांसद विधायक सहित सभी जनसेवक और जनसेवक बनने का सपना देखने वालों को भी यह सोचना आवश्यक है कि इस तरह के कारनामो को सियासी प्रश्रय न दिया जाए। आखिर उनके बच्चे भी कल जवां होंगे और वे भी इसी परिवेश में ही पलेंगे तब उनका क्या हाल होगा यह बात भी उन्हें ध्यान में रखना अहम ही है।

सिवनी बालाघाट मार्ग की दुर्दशा!

सिवनी बालाघाट मार्ग की दुर्दशा!

(शरद खरे)

सिवनी से बालाघाट होकर गोंदिया फिर रायपुर जाने वाला मार्ग छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र को मध्य प्रदेश से जोड़ता है। इस मार्ग पर आवागमन का भारी दबाव है। इस मार्ग से होकर व्यापारिक व्यवसायिक माल लेकर चलने वाले वाहनों की खासी तादाद है। वैसे छत्तीसगढ़ से मध्य प्रदेश होकर अन्य प्रदेशों को जाने वाले वाहन मण्डला जिले की छिल्पी घाटी का प्रयोग भी करते हैं।
सिवनी से बालाघाट मार्ग लंबे समय से जर्जर हालत में रहा है। सालों बाद इस मार्ग की रंगत बदली, और यह ना केवल मोटरेबल हुआ वरन् इस मार्ग पर दो पहिया से लेकर दस चक्का वाहन फर्राटे भरते नजर आए। सिवनी से बालाघाट की दूरी महज 90 किलोमीटर है, पर इसे पाटने में पहले चार से पांच घंटे लग जाया करते थे।
मार्ग के निर्माण के उपरांत बस से बालाघाट पहुंचने में महज दो से ढाई घंटे ही लग रहे थे। अचानक ही हिर्री नदी का पुल टूट गया। वैकल्पिक व्यवस्था के बतौर इस मार्ग पर नदी में एक छोटा अस्थाई रपटा बना दिया गया। इस रपटे ने गर्मी भर साथ दिया किन्तु बारिश आते ही समस्या जस की तस हो गई।
पिछले साल भोपाल से आए जांच दल ने इस पुल को वाहनों के लिए असुरक्षित बताकर बंद करवा दिया था। दिसंबर माह में पुल को पूरी तरह ढहा दिया गया था। पुल ध्वस्त होते ही इसके समीप एक विचलन मार्ग बनाया गया था, जिससे आवागमन कुछ हद तक सुचारू हो सका।
जनवरी माह में यह कहा जा रहा था कि इस साल बारिश के पहले ही इस पुल को तैयार कर दिया जाएगा। बारिश आ गई पर बात को सच नहीं कर पाई सरकार। विचलन मार्ग को भी बारिश की पहली फुहार सहन नहीं कर पाई और वह भी बह गया। वैकल्पिक तौर पर मंडी काचना, केकड़ई होकर लोग आना जाना कर रहे हैं।
यह मार्ग भारी वाहनों या यातायात के अधिक दबाव को सहने की स्थिति में कतई नहीं है। इस मार्ग की हालत बहुत ही जर्जर थी जो बारिश में अत्यंत बुरी स्थिति में आ चुका है। इस मार्ग पर से निकलने वाले वाहन कीचड़ में आए दिन फंस रहे हैं जिससे जाम की स्थिति निर्मित हो रही है।
इस मार्ग के निर्माण की जवाबदेही कलकत्ता की एमबीएल कंपनी को दी गई थी। निर्माण कंपनी को ही मार्ग के रखरखाव की जवाबदेही भी सौंपी गई थी। इस कंपनी के कारिंदों को इस बात की कतई चिंता नहीं दिख रही है कि इस मार्ग का निर्माण पूरी तरह होकर आवागमन सुव्यवथित हो जाए।
इस मार्ग में सबसे बड़ी बात तो यह है कि जब इसका ठेका दिया गया था तब क्या लोक निर्माण विभाग के सेतु अनुभाग के सरकारी नुमाईंदे सो रहे थे। जब यह पुल जर्जर था तो इसका निर्माण भी मार्ग के निर्माण के साथ क्यों नहीं करवाया गया? आखिर क्या वजह है कि इसके विस्तृत प्राक्कलन बनाते वक्त ब्रितानी शासन में बने इस पुल को शामिल नहीं किया जाकर इसकी अनदेखी की गई थी?
आज सिवनी से बालाघाट आवागमन बाधित है, इस मार्ग पर बाकायदा टोल टैक्स वसूला जा रहा है, क्या वाहन मालिक या यात्री अपना समय व्यर्थ गंवाने के एवज में टोल टैक्स दे रहे हैं? इसकी जवाबदेही किस पर आहूत होती है? क्या सिवनी जिले के विधायक विशेषकर बरघाट विधानसभा के विधायक कमल मर्सकोले इस संबंध में विधानसभा के आहूत सत्र में किसी की जवाबदेही तय करने की मांग उठाएंगे या फिर सदा की ही भांति अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़े बैठे रहेंगे?
इस मार्ग पर पुल आखिर क्यों नहीं बनाया गया यह शोध का ही विषय माना जा सकता है। जब इस सड़क के निर्माण का ठेका हुआ तब इस पुल की क्यों और किन परिस्थितियों में अनदेखी की गई है यह सोचना और जवाबदेही निर्धारित करना सरकार का काम है, इससे इस सड़क से होकर गुजरने वाले यात्रियों को कुछ लेना देना नहीं है।
जिला प्रशासन को चाहिए कि वह तत्काल लोक निर्माण विभाग के आला अधिकारियों को पत्र लिखकर इस मार्ग पर टोल वसूली को स्थगित करवाए क्योंकि जब सड़क पर सिवनी से बालाघाट तक निर्विध्न यात्रा ही संभव नहीं है तो फिर टोल किस बात का? इसके लिए निर्माण कंपनी को ही कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।

वैसे जिला प्रशासन से यह अपेक्षा भी है कि वह यात्रियों को वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था कर बालाघाट जिला प्रशासन से सामंजस्य स्थापित कर रूटीन की सिर्फ वैध यात्री बसों के अलावा अन्य भारी वाहनों को बालाघाट से वारासिवनी कटंगी के रास्ते सिवनी आने के लिए बाध्य करने की व्यवस्था सुनिश्चित करे। इससे इस मार्ग पर यातायात का दबाव भी कम होगा और छोटे वाहन चालकों के साथ ही साथ यात्री बसें भी बिना किसी विध्न के गंतव्य तक पहुंच सकेंगी।

बुधवार, 10 जुलाई 2013

चुनावों में टीम अण्णा नहीं उतारेगी अपने प्रत्याशी

अण्णा दिखे पूरी तरह भ्रमित

चुनावों में टीम अण्णा नहीं उतारेगी अपने प्रत्याशी

(पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। प्रख्यात गांधी वादी समाजसेवी अण्णा हजारे आज पत्रकारों से रूबरू होते समय बहुत अधिक भ्रमित ही दिखे। पत्रकारों के सवाल का उन्होंने मुस्कुराकर जवाब अवश्य दिया किन्तु जवाब गोलमोल ही रहे। युवाओं को जागृत करने के बाद क्या कार्ययोजना है के प्रश्न पर वे मुस्कुराते रह गए। अण्णा हजारे ने साफ तौर पर कहा कि वे विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अपने समर्थित प्रत्याशी कतई नहीं उतारेंगे।
शायद अण्णा को कान से कम सुनाई देने लगा है, इसलिए वे कान की मशीन लगाए हुए थे, किन्तु थोड़ी ही देर बाद उन्होंने मशीन कान से हटा ली। इसके उपरांत पत्रकारों के प्रश्न को उनके कान में पूर्व विधायक सुनीलम और पत्रकार संतोष भारतीय द्वारा जोर से दुहराया गया तब जाकर उन्होंने पत्रकारों के सवाल के जवाब दिए।
देश में सूचना का अधिकार अधिनियम की कथित तौर पर सौगात देने वाले प्रख्यात गांधीवादी सामाज सेवी अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के लिए सत्ता और विपक्ष को जिम्मेदार मानते हैं, परंतु वह यह नहीं बता पा रहे हैं कि सत्ता और विपक्ष के अलावा भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए तीसरा विकल्प क्या है?
सर्किट हाऊस में आयोजित हुई प्रेस वार्ता में अन्ना हजारे ने कहा कि देश में वर्तमान परिस्थिति में जो हालात है, वह सत्ता पक्ष और विपक्ष के कारण है। यह दोनों ही देश में परिवर्तन नहीं लाना चाहते, जब उनसे पत्रकारो ने पूछा कि यदि सत्ता और विपक्ष दोनों जिम्मेदार है तो फिर तीसरा रास्ता क्या है तो अन्ना हजारे कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं दिखे।
पत्रकारों ने अन्ना हजारे से यह भी पूछा कि अपनी टीम में कभी अरविंद केजरीवाल, कभी किरण बेदी और कभी जनरल वीके सिंह जैसे लोग जुड़ते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद बहुत सारे लोग अलग हो जाते है? इसके पीछे क्या कारण है तो अन्ना हजारे ने यह कहकर अपनी बात समाप्त कर दी कि किसी के मन की बात मैं कैसे बता सकता हूं।
एक पत्रकार ने अन्ना हजारे से पूछा कि 2011 के आंदोलन में जो सफलता मिली थी, अब वह सफलता दिखाई नही देती, अन्ना का जादू खत्म तो नहीं हुआ, जिस पर अन्ना ने कहा कि आज भी लोग मेरे साथ है, जब उनसे यह पूछा गया कि जब- जब आप रामलीला मैदान या जंतर- मंतर में आंदोलन करते हैं, तब-तब देश में ‘आई एम अन्ना‘ की टोपी निकल जाती है लेकिन कुछ दिन बाद टोपी और टोपी पहनने वाले नदारत हो जाते हैं, तब भी अन्ना हजारे जी ने यही कहा कि किसी के दिल में क्या है, मैं कैसे बता सकता हूं।

कुल मिलाकर पत्रकारों ने अन्ना हजारे से जितने भी सवाल किये, उन सभी सवालों का जवाब देने में अन्ना हजारे भ्रमित ही नजर आए, क्योंकि अन्ना हजारे यह बता ही नहीं पाए कि आखिर आंदोलन की दिशा क्या होगी, उनके समर्थको को गांव और शहर में कौन एकजुट करेगा और स्थानीय स्तर पर आंदोलन की दशा क्या होगी? इन सभी बिंदुओ पर अन्ना हजारे ने जवाब दिया और न ही चर्चा किये, उनके इस व्यवहार से स्पष्ट हो गया कि अन्ना हजारे सिर्फ मंच में अपने उद्देश्यो को पहुंचाने में सफल है, लेकिन उन उद्देश्यो को अमलीजामा पहनाने में अन्ना हजारे भ्रमित है।

हालीवुड में बढ़ी मोगली की पूछ परख

हालीवुड में बढ़ी मोगली की पूछ परख

(शरद खरे)

भारत गणराज्य के लोगों की स्मृति से अभी विस्मृत नहीं हुआ होगा कि नब्बे के दशक में धूम मचाने वाला (दूरदर्शन पर) हर रविवार को सुबह सवेरे ‘‘जंगल जंगल पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है . . .‘‘ वाले टाईटल सांग का सीरियल ‘‘द जंगल बुक‘‘ का हीरो भेड़िया बालक मोगली देश भर के हर वर्ग, हर आयु के लोगों की पहली पसंद बन गया था। यही मोगली अब भारत से निकलकर हॉलीवुड में जाकर धूम मचा रहा है। गौरतलब है कि ब्रितानी शासनकाल में भारत के हृदय प्रदेश के सिवनी जिले के जंगलों में एक बालक जो जंगली जानवरों विशेषकर भेड़ियों के बीच पला था, के अस्तित्व में होने की किंवदंती आज भी फिजाओं में है। माना जाता है कि एक बालक जो जंगलों की वादियों में पला बढा था, वह भेडियों की सोहबत में रहने के कारण अपनी आदतें भेडियों की तरह ही कर बैठा था, ने लंबा समय जंगलों में बिताया था।
ब्रितानी शासन में इंग्लैंड के मशहूर लेखक और कवि रूडयार्ड किपलिंग ने मोगली के जीवन को कागज पर उतारा था। किपलिंग का जन्म भारत गणराज्य की आर्थिक राजधानी मुंबई में उस वक्त हुआ था जब देश पर ब्रितानी शासक हुकूमत किया करते थे। किपलिंग के माता पिता मुंबई में ही रहा करते थे। कवि रूडयार्ड किपलिंग ने महज 13 साल की आयु से ही कविताएं लिखना आरंभ कर दिया था। कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं, उसी तर्ज पर किपलिंग की कविताएं तब काफी लोकप्रिय हो गईं थीं। कहा जाता है कि किपलिंग को एक बार भारत की सुरम्य वादियों के बीच देश के जंगलों की अनमोल वादियों में सैर का मौका मिला।
उसी दौरान एक फारेस्ट रेंजर गिसबॉर्न ने रूडयार्ड किपलिंग को एक बालक के शिकार करने की क्षमताओं के बारे में सविस्तार बताया। जंगली जानवारों के बीच लालन पालन होने के कारण उस बालक में यह गुण विकसित हुआ था। यहीं से किपलिंग को जंगली खूंखार जानवरों के बीच रहने वाले उस अद्भुत बालक के बारे में लिखने की प्रेरणा मिली। किपलिंग ने जंगल बुक नामक किताब में इस अनोखे बालक के जीवन को बड़े ही करीने से उकेरा है। बाद में यही बालक सबका प्यारा दुलारा ‘मोगली‘ बन गया।
किपलिंग की इस किताब में मोगली के सहयोगी मित्रों और बुजुर्गों के तौर पर चमेली, भालू, का यानी सांप, अकडू पकडू, खूंखार शेरखान आदि को भी बखूबी स्थान दिया गया है। विडम्बना यह है कि भारत के जंगलों में पाए जाने वाले इस मोगली के बारे में उसकी खासियतें पहचानी तो एक ब्रितानी लेखक ने। इतना ही नहीं ब्रितानी लेखक के इस नायाब अनुभवों या काल्पनिक काम को सूत्र में पिरोकर फिल्माने का काम किया जापान ने। जापान में सिवनी के इस बालक के कारनामोें के बारे में 1989 में एक 52 एपीसोड वाला सीरियल तैयार किया गया था। ‘‘द जंगल बुक शिओन मोगली‘‘ नाम से बनाए गए इस एनीमेटिड टीवी सीरियल को जब प्रसारित किया गया तो जापान का हर आदमी मोगली का दीवाना बन गया था।
जब भारत को यह पता चला कि उसके देश की इस नायाब कला को जापान में सराहा जा रहा है, तो भारत में इसके प्रसारण का मन बनाया गया। एक साल बाद 1990 में इसी जापानी सीरियल द जंगल बुक ऑफ शिओन मोगली को हिन्दी में डब करावाया गया और फिर इस कार्टून सीरियल ‘द जंगल बुक‘ को दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। जैसे ही रविवार को इसका प्रसारण आरंभ किया गया, वैसे ही इस सीरियल की लोकप्रियता ने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए। इस मोगली सीरियल का टायटल सांग ‘जंगल जंगल बात चली है, पता चला है, चड्डी पहन कर फूल खिला है . . .‘ को लिखा था मशहूर गीतकार गुलजार ने और इसे संगीत दिया था विशाल भारद्वाज ने। आज लगभग बीस साल के उपरांत यह मोगली एक बार फिर अपनी लोकप्रियता के सारे पैमाने ध्वस्त करने की तैयारी में है। यह कार्टून सीरियल एक बार फिर निर्माण हेतु तैयार है। और इसके उपरांत यह दुनिया भर में धूम मचाएगा। मोगली पर फिल्म निर्माण की जवाबदारी अब विज्जुअल इफेक्ट कंपनी डीक्यू एंटरटेनमेंट ने अपने कांधों पर ली है जो इस पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर की फिल्म बनाने जा रही है। द जंगल बुक के नाम से आने वाले समय में थ्री डायमेंशनल फिल्म बनाई जाने वाली है, जो दुनिया भर में रिलीज की जाएगी।
लगभग एक सौ बीस करोड रूपए लागत से बनने वाली इस फिल्म का प्रोडक्शन आरंभ हो चुका है। भारत के हैदराबाद की एनीमेशन, गेमिंग और इंटरटेनमेंट कंपनी डीक्यू एंटरटेनमंेट द्वारा बनने वाली यह थ्री डी फिल्म 2014 में रिलीज को तैयार हो जाएगी, एैसा माना जा रहा है। मूलतः रूडयार्ड किपलिंग की किताब द जंगल बुक पर आधारित यह चलचित्र ‘इन द रूख‘, ‘टाईगर‘, ‘लेटिंग इन द जंगल‘ आदि कहानियों का निचोड होगा जिसमें मोगली के अपने माता पिता से बिछुडने, जंगल में खूंखार जानवरों के बीच पलने बढने, उसके साहसिक कारनामों और फिर मानव जाति और सभ्यता में वापसी पर आधारित होगी। विडम्बना ही कही जाएगी कि भारतीय सड़क और रेल के मानचित्र पर सिवनी जिले का नाम नहीं है। कम से कम मोगली के हालीवुड जाने के साथ ही साथ सिवनी जिले को राष्ट्रीय नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान अवश्य ही मिलने की उम्मीद है। इसका लाभ अगर सिवनी के नेता उठा सकें तो सिवनी को गुलजार होने से कोई नहीं रोक सकता है।

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

कहां से वसूलकर दूंगा दस हजार!: तांडेकर

कहां से वसूलकर दूंगा दस हजार!: तांडेकर

(जितेश अवधवाल)

सिवनी (साई)। सिवनी को पिछले साल झंडा दिवस पर सर्वाधिक संग्रहण के लिए महामहिम राज्यपाल द्वारा पुरूस्कृत किए जाने के बाद जिला कलेक्टर भरत यादव द्वारा जिले के अधिकारियों से झंडा दिवस पर अधिक से अधिक जनसहयोग लेकर राशि के एकत्रीकरण के निर्देश दिए गए हैं।
सिवनी में जिला कलेक्टर के निर्देशों की आड़ में दबंगई के साथ दो रूपए के झंडे के पांच सौ, दो सौ या एक सौ रूपए वसूल किए जा रहे हैं। गत दिवस नेशनल हाईवे पर वाहनों को रोक रोक कर झंडा टिकाकर वसूली करने की शिकायत प्राप्त हुई थी तो आज शहर के पॉश इलाके बारापत्थर में दुकानदारों से दबंगई के साथ झंडा टिकाकर वसूली करने की शिकायतें मिलीं हैं।
एक दुकानदार ने नाम उजागर ना करने की शर्त पर कहा कि पिछले शनिवार को गुमाश्ता विभाग द्वारा उनका पांच सौ का चालान बनाया गया था। आज जब उक्त दुकान में जिला पंचायत सिवनी में पदस्थ परियोजना अधिकारी डॉ.वाय.के.टांडेकर पहुंचे और उन्होंने उक्त दुकानदार से सीधे पूछा कि चालान जमा कर दिया है!
दुकानदार ने सोचा कि वे चालान वसूलने आए हैं, अतः उक्त दुकानदार ने सहमते हुए कहा कि अभी नहीं जमा हुआ है। इसके साथ ही साथ उसने पांच सौ रूपयों का नोट आगे बढ़ा दिया। डॉ.टांडेकर ने पांच सौ रूपए लिए और एक रजिस्टर में दस्तखत करवाकर उन्हें कुछ झंडे टिका दिए।
यह वाक्या उक्त दुकानदार को समझ में नहीं आया। तब डॉ.टांडेकर ने कहा कि यह राशि झंडा दिवस की वसूली की है। इसके साथ ही साथ बारापत्थर के अनेक दुकानदारों से सौ दो सौ रूपयों में झंडे दुकानदारों को बलात टिकाए गए। जब इसकी जानकारी हिन्द गजट को लगी और हिन्द गजट के कार्यालय के सामने से यह दल गुजरा तो इस दल से पूछताछ की गई।
डॉ.टांडेकर ने हिन्द गजट कार्यालय में आकर बताया कि उन्हें दस हजार रूपए के झंडे टिका दिए गए हैं, वे आखिर दस हजार रूपए कहां से देंगे। उन्होंने कहा कि उनके पास गुमाश्ता का प्रभार है अतः वे दुकानदारों को झंडा दे रहे हैं। जब उनसे कहा गया कि इसके पूर्व में गत दिवस नेशनल हाईवे पर झंडे की वसूली की जा रही है, तो उन्होंने इस काम को गलत करार दिया।

जब उनसे एक दुकानदार से पांच सौ, एक से दो सौ, एक से सौ रूपए वसूली की बात कही गई तो उन्होंने कहा कि दस हजार के झंडे वे कहां और किसको दें?