सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

भाजपा नेता की पत्थर खदान में तीन अबोध बालाएं डूबीं!

भाजपा नेता की पत्थर खदान में तीन अबोध बालाएं डूबीं!

रात के अंधेरे में निकाले गए शव, देर रात तक मर्चुरी के बजाए पीएम सेंटर में रखे रहे शव

(अखिलेश दुबे/अय्यूब कुरैशी)

गंगेरूआ/सिवनी (साई)। बंडोल के पास गंगेरूआ गांव के समीप लगे भाजपा नेता के एक क्रेशर के पास पत्थर की खदान में आज अपरान्ह तीन मासूम बालाओं की डूब जाने से इहलीला समाप्त हो गई। तीनों के शव शाम ढलते क्रत्रिम रूप से बन गए गहरे पोखर से निकाले गए, और देर रात पुलिस कार्यवाही के बाद शव परीक्षण के लिए तीनों के शवों को सिवनी लाया गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार तीनों बच्चियों के शव, भाजपा नेता के क्रेशर के करीब की पत्थर खदान में पत्थरों के निकालने से हुए, गड्ढे में पानी भर जाने से बने पोखर में तैरते पाए गए। बाद में पुलिस द्वारा शवों को बाहर निकालकर पंचनामा बनाकर अन्य औपचारिकताएं पूरी की गईं। इसके बाद शव को शव परीक्षण के लिए सिवनी भेजा गया।

अल्प संख्यक समुदाय की हैं तीनों बच्चियां
मौके पर मौजूद थाना प्रभारी बंडोल आर.के.गुप्ता ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि गंगेरूआ निवासी शेख कलाम की पुत्री सिफा, युसुफ की पुत्री कमरून एवं शेख रमजान की पुत्री आफरीन आज अपरान्ह नहाने धोने के लिए भाजपा के एक नेता के क्रेशर के करीब बने पोखर में आईं थीं।
थाना प्रभारी श्री गुप्ता ने बताया कि तीनों बच्चियों द्वारा संभवतः पहले कपड़े धोए गए। इस बात का आधार यह बताया जा रहा है कि मौके पर पोखर के किनारे दो प्लास्टिक के टब में धुले हुए कपड़े रखे हुए थे। उन्होंने बताया कि तीनों मृतक बच्चों की आयु बारह से चौदह साल बताई जा रही है।
मौके पर मौजूद लोगों ने साई न्यूज को बताया कि लोगों द्वारा यह भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि कपड़े धोने के उपरांत किसी एक बच्ची का पैर फिसला होगा और वह डूबने लगी होगी तब उसे बचाने के चक्कर में दो अन्य बच्चियां भी पानी में उतरी होंगी। मौके पर चल रही चर्चाओं के अनुसार पानी का यह क्रत्रिम रूप से निर्मित पोखर कुछ स्थानों पर तो उथला है पर कुछ स्थानों पर इसमें लगभग डेढ़ से दो पुरूष (दस से बारह फिट) पानी हो सकता है।
आशंका व्यक्त की जा रही है कि बच्चियां गहरे पानी में ही चली गईं थीं। प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार बच्चियों के शव जिस ओर पानी में उतरा रहे थे वहां पानी सबसे ज्यादा गहरा बताया जा रहा था।

ग्यारह बजे के करीब गईं थी बच्चियां
मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि बच्चियां मौके से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित गंगेरूआ ग्राम से अपरान्ह लगभग ग्यारह बजे नहाने धोने के लिए गांव से मौके के लिए रवाना हुई थीं। लोगों ने बताया कि दो तीन घंटे बाद तक जब बच्चियां घर वापस नहीं लौटीं तो परिजनों को आशंका हुई कि बच्चियों के साथ कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं घट गई। इसके बाद बच्चियों की तलाश जारी हुई। बताया जाता है कि इसी बीच किसी ने परिजनों को बताया कि कुछ बच्चों के शव भाजपा नेता के क्रेशर के पास की पत्थर की खदान में तैर रहे हैं। इसकी सूचना लगभग चार बजे बंडोल पुलिस को दी गई।

वाहनों की लाईट में हुई कार्यवाही
बंडोल पुलिस मौके पर कुछ देर से पहुंची, उसके बाद शव को बाहर निकालने की कार्यवाही की जाकर बंडोल पुलिस द्वारा अन्य औपचारिकताएं पूरी की गईं। बंडोल पुलिस की कार्यवाही के चलते शाम ढल चुकी थी और मौके पर स्याह अंधेरा पसरने लगा था। मौके पर खड़े वाहनों को चालू कर उनकी हेड लाईट जलाकर पुलिस द्वारा पंचनामा तैयार किया गया। इसके उपरांत तीनों बच्चों के शवों को शव परीक्षण के लिए सिवनी भेजा गया।

सातवीं कक्षा की हैं छात्राएं
परिजनों के अनुसार तीनों बच्चियां बंडोल में शासकीय शाला में कक्षा सातवीं में अध्ययन करती थीं। आज रविवार होने के कारण बच्चियां घर पर ही थीं। दोपहर वे नहाने धोने के उद्देश्य से मौके पर पहुंची थीं। प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार एक शव की नाक से खून रिस रहा था। संभवतः पानी के अंदर अपने आप को बचाने के चक्कर में उक्त बालिका का सिर या कोई अंग नुकीले पत्थर से टकरा गया हो, जिसके चलते नाक से खून रिस रहा हो।

गांव वालों का आरोप!
मौके पर मौजूद ग्राम गंगेरूआ के ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में जमीन को क्रेशर संचालकों द्वारा छलनी किया जा रहा है। अपने लाभ के लिए संचालक गड्ढे खोदकर पत्थर तो निकाल लिया करते हैं, किन्तु उसके उपरांत जब काम पूरा हो जाता है तो गड्ढे खुले छोड़ दिया करते हैं। बारिश के समय इन गड्ढों में पानी भर जाया करता है। खुले में इस तरह के डबरों में भरा पानी मानव और मवेशियों के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं। इतना ही नहीं गंगेरूआ में पानी की विकराल समस्या है, जिसके चलते यहां के ग्रामीण आसपास के असुरक्षित डबरों में भरे पानी का उपयोग करते हैं। लोगों का आरोप है कि प्रशासन और खनिज विभाग की अनदेखी के चलते क्रेशर संचालक और गिट्टी खदानों के मालिकों द्वारा पत्थर खनन के लिए खोदे गए गड्ढों के आसपास वारवेड वायर लगाकर उसे बंद भी नहीं किया जाता है।

मौके पर नहीं पहुंचे खदान मालिक!
मृतकों के परिजनों ने आरोप लगाया है कि घटना के घटित होने के बाद शवों को बाहर निकालने और सिवनी शव परीक्षण के लिए लाने तक पत्थर की खदान और क्रेशर के मालिक न तो मौके पर पहुंचे और न ही इन पंक्तियों के लिखे जाने तक शव परीक्षण के लिए ही पीएम सेंटर में पहुंचे।

ठंड में ठिठुरते रहे परिजन

देर रात मृतकों के परिजन शव परीक्षण केंद्र के पास ठंड में अंधेरे में ही बैठे देखे गए। इस संबंध में जब जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन डॉ.सत्य नारायण सोनी से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि यह पुलिस की जवाबदारी है कि परिजनों को कहां रूकवाया जाए। परिजन अपनी व्यवस्था स्वयं ही करें तो बेहतर होगा।

कब सुधरेंगी सिवनी की सड़क

कब सुधरेंगी सिवनी की सड़क

(शरद खरे)

सिवनी का दुर्भाग्य ही है कि जिला मुख्यालय से चारों ओर की सड़कें बुरी तरह घायल हैं। इन सड़कों पर चलने वाले हलाकान हैं। सिवनी से नागपुर या जबलपुर जाने वाले लोग अगर टैक्सी करके जाना चाहते हैं तो उन्हें दोगुने तीन गुने पैसे देने होते हैं। भगवान शिव के नाम से जाना जाता है सिवनी को। सिवनी एक समय में काफी हद तक समृद्धशाली समझा जाता रहा है। सिवनी की सबसे बड़ी खासियत यहां की रेल लाईन और शेरशाह सूरी के जमाने का उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाला मार्ग था। आज़ादी के उपरांत देश ने तेजी से तरक्की की। छोटी और मीटर गेज लाईन को ब्रॉडगेज में तब्दील किया जाने लगा। सिवनी का नंबर कब आएगा, यह सोचते सोचते ही आज़ादी के वक्त जवान रही पीढ़ी भगवान को प्यारी होती गई। सिवनी में ब्रॉडगेज की कमी पूरी करता रहा नेशनल हाईवे नंबर सात।
एनएच 07 सिवनी की जीवन रेखा से कम नहीं है। यह मार्ग उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ता है। ब्रॉडगेज के अभाव में इस मार्ग का उपयोग माल ढुलाई के लिए सबसे ज्यादा किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तब इस मार्ग के दिन फिरे। अनेक षणयंत्रों के झटके झेलने के बाद भी यह मार्ग केंद्र सरकार के स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे का हिस्सा बना रहा।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जबसे पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा को उनके अपनों ने ही षणयंत्र के साथ सक्रिय राजनीति से हाशिए पर बिठा दिया है, तबसे सिवनी की अस्मत के साथ लगातार खिलवाड़ किया जाता रहा है। सालों साल प्रदेश और सिवनी में कांग्रेस की तूती बोलती आई है। विमला वर्मा के सियासी राजनीति से हटकर घर बैठते ही उनके अपने और उनकी आस्तीन में छिपे सपोलों ने फन काढ़ा और सिवनी के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना आरंभ कर दिया।
उस दौरान कांग्रेस के दो या तीन शीर्ष नेताओं ने आपस में जुगलबंदी कर ऐसा सियासी त्रिफला बनाया कि सिवनी के लोग इन नेताओं के समर्थन और विरोध के स्वांग में ही उलझकर रह गए। इसके बाद सिवनी की अस्मत को कथित तौर पर गिरवी रखने का षणयंत्र रचा गया। सिवनी को प्रदेश के बड़े क्षत्रपों के हाथों गिरवी रखकर इन लोगों ने खूब दावतें उड़ाईं, फाग गाए, जश्न मनाए। वस्तुतः सिवनी आज पूरी तरह अनाथ है तो उसके पीछे ये नेता कहीं न कहीं जवाबदेह जरूर हैं।
सिवनी में लोकसभा हुआ करती थी। ‘‘थी‘‘ शब्द का प्रयोग आज मजबूरी में इन्हीं नेताओं के कारण करना पड़ रहा है। जब सिवनी के विलोपन का प्रस्ताव ही नहीं था तो भला सिवनी लोकसभा विलोपित कैसे हो गई। कहां थे कांग्रेस के कथित दिमागऔर दिमागदारलोग। क्या सिवनी से लोकसभा का विलोपन कांग्रेस के क्षत्रप हरवंश सिंहके कारण हुआ! अगर हुआ तो आप सिवनी के नागरिक पहले हैं, कांग्रेस के सदस्य बाद में! क्या कारण था कि इस मामले को पार्टी फोरम में नहीं उठाया गया, और अगर उठाया गया तो क्या कारण था कि इसके विरोध में कांग्रेस से त्यागपत्र की झड़ी नहीं लगी! मतलब साफ है कि इस षणयंत्र के जगमगाते लट्टू में कहीं न कहीं इन नेताओं की बैटरी से भी करंट जा रहा था।
सिवनी में फोरलेन का षणयंत्र रचा गया। इसके लिए वर्ष 2009 में घोषित तौर पर तत्कालीन केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को दोषी करार दिया गया। सिवनी में कमल नाथ को इन्हीं नेताओं ने पुरानी फिल्मों के विलेन प्रेम चौपड़ा, और शत्रुघ्न सिन्हाबना दिया गया। कमल नाथ की प्रतीकात्मक शवयात्राएं निकाली गईं। जनमंच सिवनी एवं जनमंच लखनादौन ने मामले की नजाकत और गरम तवा देखकर इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी। सिवनी जिला इस मामले को लेकर सड़क में अडंगे के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमल नाथ को ही जवाबदार मान रहा था। इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय में जनमंच सिवनी की ओर से याचिका कर्ता वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और अधिवक्ता आशुतोष वर्मा की ओर से अपील प्रस्तुत की गई। वहीं लखनादौन जनमंच के सरपरस्त बने दिनेश राय ने भी अपनी अपील दाखिल की। सिवनी जनमंच ने लोगों से चंदा किया, लखनादौन जनमंच शायद धन्ना सेठ था इसलिए उसने किसी से चंदा नहीं लिया और कुरई जनमंच शायद साधनों या चंदे के अभाव में कहीं नहीं जा सका।
आज सिवनी से बालाघाट, सिवनी से नागपुर, सिवनी से जबलपुर, सिवनी से कटंगी, सिवनी से मण्डला, सिवनी से छिंदवाड़ा रोड जब चाहे तब बंद हो जाता है। सांसद, विधायक, भाजपा, कांग्रेस, अन्य राजनैतिक दलों के साथ ही साथ सड़क की लड़ाई लड़ने वाले जनमंच के त्रिफला भी मौन हैं। शायद सिवनी जनमंच का चंदा खत्म हो गया, लखनादौन जनमंच का ध्यान चुनाव की ओर हो, और कुरई का जनमंच . . .। कुल मिलाकर पिस तो सिवनी की जनता ही रही है। समझ में नहीं आता कि नेता आखिर यह कैसे सोच लेते हैं कि उनकी साल दो या चार साल पहले की हरकतें जनता कैसे भूल सकती है? कल तक सिवनी की जनता को सड़क के मामले में भरमाने, कमल नाथ को विलेन बनाने वाले नेता आज मौन क्यों हैं? सिवनी में सड़क की लड़ाई लड़ने के बजाए नेता नागपुर, जबलपुर, दिल्ली, छिंदवाड़ा जाकर सड़क के बारे में चर्चा कर फोटो अखबारों में छपवाकर क्या यह जतलाना चाहते हैं कि वे सिवनी की सरजमीं छोड़कर अन्य जिलों में सिवनी की सड़कों के लिए फिकरमंदर हैं? सभी नेताजी जानते हैं कि सड़क के जर्जर होने से सिवनी टापू बन गया है, जनता कराह रही है, चुप है इसका मतलब यह नहीं कि वह बेवकूफ है, वह सब कुछ सह रही है और नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के इंतजार में है जब वह इन नेताओं को देगी अपना माकूल जवाब।

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

फिरोज को फांसी, राकेश को उम्रकैद

फिरोज को फांसी, राकेश को उम्रकैद
(लिमटी खरे)
अंततः सिवनी की गुड़िया के साथ दुष्कर्म और उसकी मौत के लिए जिम्मेवार दुर्दांत आरोपी फिरोज खान और राकेश चौधरी को कानून ने अपना फैसला सुना दिया है। फिरोज को फांसी की सजा और राकेश चौधरी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। फास्ट ट्रेक अदालत में आज दोनों ही आरोपियों को नाप दिया गया है। 17 अप्रेल को घटी इस घटना में लगभग छः माह में फैसला आना सुखद ही माना जाएगा।
इस पूरे मामले में आरोपी तो नप गए, जो वाकई प्रशंसनीय ही माना जाएगा। घटनाक्रम पर अगर नज़र डाली जाए तो 17 अप्रैल को बिहार मूल के फिरोज खान नामक युवक ने 17 अप्रेल की मध्य रात्रि में देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान् मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड में कथित तौर पर काम करने वाले फिरोज द्वारा बहला फुसलाकर पास के खेत में ले जाया गया। कहा जाता है कि खेत में फिरोज ने गुड़िया के साथ हैवानियत का नंगा नाच कर, मानवता को शर्मसार कर दिया था।
गुड़िया के अचानक ही गायब हो जाने से परिजनों का चिंतित होना स्वाभाविक ही था। अगले दिन गुड़िया बेहोशी की हालत में खेत में मिली। गुड़िया को तत्काल स्थानीय प्राथमिक उपचार के बाद जबलपुर ले जाया गया। जबलपुर से उसे नागपुर भेजा गया, जहां उसे केयर अस्पताल में भर्ती किया गया। नागपुर में गुड़िया ने दम तोड़ दिया। दिल्ली में निर्भया के साथ हुए दुराचार और उसकी मौत पर सिवनी में भी मातम मनाया गया था। चार साल की अबोध गुड़िया ने दुराचार का शिकार होने के उपरांत लगभग बारह दिन तक जीवन मृत्यु के बीच संघर्ष किया। 29 अप्रैल की शाम लगभग आठ बजे गुड़िया ने अंतिम सांस ली।
सिवनी की गुड़िया के प्रति संवेदना प्रकट करना शायद समाज सेवा का दंभ भरने वाले सामाजिक और राजनीतिक संगठनों को गवारा नहीं हुआ, तभी तो सिवनी की गुड़िया के बारे में इक्का दुक्का प्रदर्शन के बाद मामला ठण्डे बस्ते के ही हवाले कर दिया गया। हो सकता है राष्ट्रीय स्तर पर उछले निर्भया मामले में मीडिया की सुर्खियां बटोरने की गरज से, सिवनी के अनेक संगठनों ने अपनी दिलचस्पी दिखाई हो। पब्लिसिटी की गुंजाईश सिवनी की गुड़िया के मामले में कम ही दिखी हो इसलिए संभवतः संगठनों ने इसमें ज्यादा दिलचस्पी लेना भी मुनासिब नहीं समझा हो।
उस वक्त तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक संजय झा ने इस मामले में पूरी तत्परता दिखाई। समाचार चैनल्स और अन्य मीडिय में जब फिरोज की तस्वीर सार्वजनिक हुई, तब खबर आई कि बिहार के हुसैनाबाद में फिरोज को देखा गया। वहां भीड़ ने पकड़कर इसे पुलिस के हवाले कर दिया। तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक संजय झा ने साफगोई के साथ इस गिरफ्तारी का श्रेय जनता को ही दिया। उनके अनुसार पुलिस के दल भी पतासाजी में लगे हुए थे, किन्तु जनता की जागरूकता के चलते फिरोज को पुलिस के शिकंजे में लाया जा सका।
इस पूरे मामले में मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड के प्रबंधन और घंसौर पुलिस को भी शक के दायरे से बरी शायद नहीं किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि अगर कोई बाहर से आकर किसी शहर में रह रहा हो तो उसकी मुसाफिरी संबंधित थाने में दर्ज कराया जाना अत्यावश्यक है। साथ ही साथ मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड के कर्मचारी द्वारा अगर इतनी बड़ी घटना को अंजाम देकर हैवानियत का परिचय दिया गया तो उसके खिलाफ भी पुलिस को संज्ञान लेना जरूरी था। इसका कारण यह है कि झाबुआ पॉवर लिमिटेड के द्वारा अपने कर्मचारियों या वहां काम करने वाले ठेकेदारों के पास काम करने वालों की न तो मुसाफिरी दर्ज करवाई गई थी और न ही चरित्र सत्यापन ही कराया गया था।
पिछले साल भाजपा के युवा नेता नरेंद्र ठाकुर ने एक विज्ञप्ति के माध्यम से पुलिस प्रशासन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था कि बाहर से आकर सिवनी में रहने वालों की न केवल मुसाफिरी दर्ज करवाई जाए वरन् उनका चरित्र सत्यापन भी उनके मूल रिहाईश वाले थाना क्षेत्रों से करवाया जाए। यह काम आज का नहीं है। मुसाफिरी दर्ज करवाने का काम न जाने कितने दशकों पुराना है, पर वर्तमान में पुलिस की अपने काम से इतर अन्य व्यस्तताओं के चलते, यह हाशिए पर चला गया है।
मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड का यह दायित्व था कि वह अपने संस्थान में काम करने वाले हर कर्मचारी और वहां कार्यरत अन्य ठेकेदारों के कारिंदों का चरित्र सत्यापन और उनकी मुसाफिरी दर्ज करवाने का काम करते, वस्तुतः ऐसा हुआ नहीं। घंसौर की गुड़िया के इलाज के लिए भी झाबुआ पॉवर लिमिटेड की ओर से उनके जनसंपर्क अधिकारी के बजाए मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क अधिकारी द्वारा यह कहा गया था कि झाबुआ पॉवर लिमिटेड गुड़िया के इलाज के लिए हर संभव कोशिश करेगी।
20 अप्रैल को तत्कालीन जनसंपर्क अधिकारी घनश्याम सिरसाम ने मीडिया से जुड़े लोगों को एक एसएमएस कर जानकारी दी थी कि गुड़िया के इलाज का सारा खर्च मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड द्वारा उठाया जा रहा है। इसके उपरांत प्रदेश के गृह मंत्री उमाशंकर गुप्त जब गुड़िया का हाल चाल जानने नागपुर पहुंचे तब उन्होंने मीडिया से रूबरू होकर कहा कि गुड़िया के इलाज का खर्च प्रदेश सरकार उठा रही है।
सवाल यह उठता है कि अरबों खरबों रूपए के स्वामित्व वाले एक संस्थान द्वारा गुड़िया के इलाज का खर्च उठाया गया और दूसरी ओर प्रदेश सरकार द्वारा भी वही इलाज का खर्च उठाने का दावा किया गया। बावजूद इसके गुड़िया को नहीं बचाया जा सका। हमने उस वक्त भी लिखा था कि तेरह का आंकड़ा बहुत ही अशुभ माना जाता है सनातन पंथियों में। तेरह के अंक को लेकर न जाने कितनी किंवदंतियां हैं। टेलीफोन में तेरह नंबर लेना कोई पसंद नहीं करता। वाहनों के पंजीयन में भी 13 नंबर दिखाई नहीं देता। मानव की मृत्यु के उपरांत सनातन पंथियों में उसकी अंतिम रस्म तेरहवीं ही होती है। तेरहवें दिन ही सिवनी की गुड़िया ने अपनी अंतिम सांस ली। गुड़िया के प्राण त्यागने से न जाने कितने प्रश्न अब अनुत्तरित ही रह जाएंगे।
कितने आश्चर्य की बात है कि चार साल की गुड़िया को जबलपुर इलाज के लिए ले जाया गया। जहां उसके इलाज में लापरवाही बरतने के संगीन आरोप हैं। इसके बाद उसे एयर एंबूलेंस से नागपुर ले जाया गया। नागपुर के केयर अस्पताल का सुझाव आखिर दिया किसने? क्या केयर अस्पताल इस मासूम के इलाज के लिए सक्षम था? जिस अस्पताल में जांच की जरूरी सुविधाएं ही न हों, उस अस्पताल में मासूम को ले जाने का क्या औचित्य? प्रदेश सरकार ने जाने अनजाने में केयर अस्पताल की ब्रॉडिंग का काम कर दिया है। अब केयर अस्पताल यह दावा आसानी से कर सकता है कि कम से कम मध्य प्रदेश सरकार की नजरों में नागपुर का केयर अस्पताल सर्वेश्रेष्ठ है। मासूम को जांच के लिए दूसरे अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ा। केयर अस्पताल को हाल ही में मध्य प्रदेश शासन के कर्मचारियों के लिए पेनलबद्ध किया गया है। अस्पताल अपने आप को पेनलबद्ध क्यों कराते हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है। जाहिर है अपनी अस्पताल रूपी दुकान की दिन दूनी रात चौगनी वृद्धि के मद्देनजर ऐसा किया जाता है।
सवाल यह उठता है कि जब उसे एयर एंबूलेंस मंे जबलपुर से नागपुर ले जाया गया तो क्या मासूम को एयर एंबूलेंस से जबलपुर से नई दिल्ली नहीं ले जाया जा सकता था? क्या कारण था के मासूम के इलाज में कोताही बरती गई? इसके लिए दोषी कौन है? जब तक मामला नहीं उछला, तब तक मासूम को घंसौर जैसी छोटी जगह पर ही इलाज के लिए रखा गया? उसे जिला चिकित्सालय सिवनी तक नहीं ले जाया गया? क्या यही है देश के उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान् मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड के द्वारा सामाजिक जिम्मेदारी, यानी सीएसआर के नियम कायदों का निर्वहन।
गुड़िया के दुनिया छोड़ने के बाद भी उसके शव को डीप फ्रीजर नसीब नहीं हुआ। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जिस आलीशान केयर अस्पताल में गुड़िया को भर्ती करवाया गया था, वहां डीप फ्रीजर ही नहीं था कि उसका शव रखा जा सके। गुड़िया को केयर अस्पताल ने पौने आठ बजे मृत घोषित कर दिया। इसकी सूचना बर्डी के पुलिस थाने को दे दी गई। इसके उपरांत गुड़िया के शव को एमपी पुलिस और परिजनों की मौजूदगी में आयुर्विज्ञान कॉलेज अस्पताल नागपुर भेजा गया, जहां कागजी खानापूर्ती में साढ़े दस बज गए। वहां शव को रखने के लिए डीप फ्रीजर मौजूद नहीं था, दो डीप फ्रीजर थे पर वे खराब थे। गुड़िया का शव गर्मी में वैसा ही पड़ा रहा। इसके बाद उसके शव को सेंट्रल एवेन्यू रोड पर स्थित मेयो अस्पताल रिफर करने की तैयारी की गई। रिफर होने में साढ़े बारह बज गए। रात लगभग एक बजे गुड़िया के शव को मेयो अस्पताल के शव गृह में रखा जा सका।
उस मां पर क्या बीती होगी जिसकी फूल सी गुड़िया दुष्कर्म के बाद शांत हो गई हो। जिला प्रशासन या सिवनी की जनता के सेवक सांसद विधायक या और दलों के नेता अगर चाहते तो सिवनी से सिंधी समाज के डीप फ्रीजर को इतनी देर में नागपुर भेजकर गुड़िया के शव को सुरक्षित रखने की माकूल व्यवस्था कर ली जाती। सिवनी से आठ बजे भी अगर इसे रवाना किया जाता तो निश्चित तौर पर ग्यारह बजे तक वह डीप फ्रीजर गुड़िया के पास पहुंच जाता। वस्तुतः अनुभवहीनता के कारण ही ऐसा हुआ माना जा सकता है। सिवनी संसदीय क्षेत्र दो टुकड़े में बंट गया है, एक का प्रतिनिधित्व कांग्रेस के बसोरी सिंह मसराम कर रहे हैं जिनके संसदीय क्षेत्र में यह घटना घटी है और दूसरे का भाजपा के के.डी.देशमुख।
इसके बाद गुड़िया की अंत्येष्ठी के वक्त यह कहा गया था कि मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड द्वारा गुड़िया के परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी। इसके अलावा उसके परिवार को आर्थिक इमदाद भी मुहैया करवाई जाएगी। विडम्बना ही कही जाएगी कि उसके परिजनों को ऐसा कुछ नहीं मिल सका। बहरहाल, सिवनी की अदालत के फैसले से पीड़ित परिवार के रिसते जख्मों पर कुछ हद तक मरहम लगा होगा। गुड़िया की मां और नानी ने आज मीडिया कर्मियों से रूबरू होकर यही कहा कि इन दरिंदों को उनकी फूल सी बेटी के साथ की गई हैवानियत के लिए बेटी की तड़प से कहीं ज्यादा सजा दी जाए। एक मां की ममता को समझा जा सकता है।

गुड़िया पर अदालत का फैसला सिवनी के लिए एक नज़ीर से कम नहीं होगा। इतने कम समय में दिए गए फैसले का स्वागत किया जा रहा है। अब जवाबदेही जिला और पुलिस प्रशासन की है कि वह जिले में पुलिस के तंत्र विशेषकर खुफिया तंत्र को इतना मजबूत करे कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके। साथ ही साथ गुड़िया के हादसे के बाद तत्कालीन आईजी संजय झा के निर्देश, कि बाहर से आए लोगों की मुसाफिरी बाकायदा दर्ज हो तथा किराए से रहने वालों की किराएदारी की जानकारी पुलिस को देना मकान मालिक का दायित्व बनाया जाए। इससे संवेदनशील सिवनी की आवाम को काफी हद तक राहत मिल सकती है। चुनाव सर पर हैं अतः चुनावी रण में उतरे प्रत्याशियों द्वारा मनी पॉवर के साथ ही साथ मसल पॉवर का उपयोग भी जमकर किया जा सकता है। बाहर से जरायम पेशा लोग भी आ सकते हैं। चुनाव के दौरान इस तरह की परिस्थितियां प्रशासन के लिए सरदर्द से कम नहीं होंगी, इसलिए अभी समय है और समय रहते चेतने में ही भलाई है।

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

दिनेश आए पेड न्यूज के दायरे में!

दिनेश आए पेड न्यूज के दायरे में!

मीडिया सर्टिफिकेशन एवं मानीटरिंग कमेटी द्वारा जारी किया गया नोटिस

(महेश रावलानी)

सिवनी (साई)। जिला स्तर पर जिला निर्वाचन अधिकारी भरत यादव की अध्‍यक्षता में कार्यरत मीडिया सर्टिफिकेशन एवं मानीटरिंग कमेटी द्वारा लिए गए निर्णय के आधार पर आर.ओ. सिवनी सुश्री लता पाठक द्वारा दिनांक २3 अक्टूबर २0१३ को समाचार पत्र: जबलपुर एक्सप्रेस‘‘ में प्रकाशित ‘‘निर्दलीय बिगाड़ेंगे समीकरण‘‘ शीर्षक के समाचार के संबंध में दिनेश राय मुनमुन को नोटिस जारी कर ४८ घंटे के अंदर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

ज्ञातव्य है कि गत दिवस उक्त समाचार पत्र में इस शीर्षक से प्रकाशित समाचार में दिनेश राय द्वारा कांग्रेस को हानि पहुंचाने की बात का उल्लेख किया गया था। जिला स्तरीय मीडिया सर्टिफिकेशन एवं मानीटरिंग कमेटी द्वारा इस मामले में संज्ञान लेते हुए, दिनेश राय उर्फ मुनमुन को नोटिस जारी किया जाकर दो दिवस के अंदर स्पष्टीकरण की मांग की है।

नारेबाजी के बाद अब पोस्टर वार!

नारेबाजी के बाद अब पोस्टर वार!

(पीयूष भार्गव)

सिवनी (साई)। जिला भाजपाध्यक्ष नरेश दिवाकर और सिवनी की वर्तमान विधायक श्रीमति नीता पटेरिया की मुखालफत पार्टी स्तर पर तेज हो गई है। सिवनी विधानसभा में नीता नरेश हटाओ-भाजपा बचाओ के नारे के बाद अब पोस्टर वार बहुत तेज हो गया है। नीता नरेश विरोधियों ने सिवनी से लेकर भोपाल तक गगन भेदी नारों से भाजपा को हिलाकर रख दिया है।
ज्ञातव्य है कि छिंदवाड़ा रोड स्थित पैराडाईज गार्डन में पशुपालन मंत्री अजय विश्नोई की उपस्थिति में नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारों ने उन्हें हलाकान कर दिया था। इसके उपरांत जबलपुर रोड स्थित सांझी लॉन में आयोजित रायशुमारी में भी नीता पटेरिया और नरेश दिवाकर से नाराज कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की थी।
नीता नरेश के विरोध का सिलसिला यहीं नहीं थमा। इसके उपरांत कार्यकर्ताओं ने, दो बस और दो दर्जन वाहनों में भोपाल जाकर प्रदेश कार्यालय को हिला दिया था। इसके उपरांत जब सिवनी के पूर्व सांसद प्रहलाद सिंह पटेल सिवनी आए तब उनके समक्ष कार्यकर्ताओं ने अनुशासन का परिचय देते हुए नारेबाजी तो नहीं की पर एक एक करके उनसे भेंट कर नीता पटेरिया और नरेश दिवाकर के कारनामों की फेहरिस्त से उन्हें अवगत कराया।
यह मामला यहीं शांत नहीं हुआ। जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सिवनी आए तब उनकी सभा में दशहरा मैदान में कार्यकर्ता उत्तेजित होकर नारेबाजी आरंभ करने ही वाले थे कि शिवराज सिंह चौहान ने कार्यकर्ताओं को शांत कराते हुए कहा था कि वे नाराज कार्यकर्ताओं से बाद में मिलंेगे। अगले दिन जब नाराज कार्यकर्ता शिवराज सिंह चौहान से मिलने सर्किट हाउस पहुंचे, तब वहां गहमा गहमी के बीच नाराज कार्यकर्ताओं ने एक बार फिर नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ के नारे बुलंद कर दिए थे।
समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के भोपाल ब्यूरो से संतोष पारदसानी ने बताया कि नीता नरेश हटाओ, भाजपा बचाओ के नारे सिवनी ही नहीं भोपाल में भी पार्टी को हिलाए हुए हैं। गत दिनों भोपाल में नीता पटेरिया और नरेश दिवाकर के खिलाफ नारेबाजी चरम पर रही। यह नारेबाजी मीडिया में चर्चा का विषय बनी रही। इस विरोध में मीडिया को ईमेल से भेजे संदेश में नीता नरेश हटाओ भाजपा बचाओ की मुहिम में नगर पालिका अध्यक्ष राजेश त्रिवेदी के फोटो युक्त समाचार की कतरन भी भेजी गई थी।
बताया जाता है कि बीती रात्रि नगर के कुछ चौक-चौराहों सहित सिवनी विधानसभा क्षेत्र में अनेक स्थानों पर  ‘‘नीता- नरेश हटाओ, 115 विधानसभा क्षेत्र बचाओ‘‘, के पोस्टर्स चस्पा पाए गए। इनमें जिला मुख्यालय में अनेक स्थानों पर इस तरह के पोस्टर्स जनचर्चा का विषय बने रहे।
बताया जाता है कि इन पोस्टर्स में न तो प्रकाशक का नाम था, न मुद्रक का और न ही कितनी तादाद में छापे गए हैं इस बात का भी उल्लेख किया गया था। बताया जाता है कि पोस्टर लगाने वालों ने नगरपालिका के सामने दो पोस्टर, बीजेपी कार्यालय, जनपद पंचायत की दीवार, महात्मा गांधी स्कूल की दीवार एवं बस स्टैण्ड में पोस्टर लगाऐ हैं। भाजपा की अंर्तकलह खुलकर सामने आ रही है, जो लोगों के बीच चौक चौराहों पर चर्चा का विषय बनी हुई है।

पानी नहीं मिल पा रहा है कलेक्टर साहेब!

पानी नहीं मिल पा रहा है कलेक्टर साहेब!

(अय्यूब कुरैशी)

सिवनी (साई)। टूटी पुलिस के पास एमपीईबी के पीछे रहने वाले नागरिकों के लिए ब्रहस्पतिवार का दिन कहर बनकर टूटा! लगातार चौथे दिन भी क्षेत्र में नल नहीं आए, न ही सड़क पर वे चल पाए। दरअसल, नगर पालिका परिषद द्वारा इस क्षेत्र में नाली निर्माण के कारण सड़क को खोद दिया गया है, बाद में पाईप लाईन बदलने के बाद नलों के कनेक्शन नहीं जोड़े गए हैं।
क्षेत्र के निवासी शिक्षा विभाग से सेवानिवृत भोला सिंह ठाकुर ने बताया कि लगभग दो माह से इस क्षेत्र में नाली निर्माण का काम नगर पालिका परिषद द्वारा करवाया जा रहा है। नाली निर्माण के समय भी घरों के सामने रेंप आदि भी बिना सूचना के तोड़ दिए गए हैं।
उन्होंने बताया कि पूर्व में पानी कम आने की शिकायत लेकर क्षेत्र के निवासी नगर पालिका गए थे, जहां नगर पालिका अध्यक्ष ने पाईप लाईन के साईज को बड़ा करने का आश्वासन दिया था। इसके उपरांत नाली के बाजू का हिस्सा एक बार फिर खोद दिया गया है जिससे सड़कों पर चलना ही दूभर हो गया है।
भोला ठाकुर ने बताया कि नगर पालिका परिषद द्वारा पुरानी सड़ी गली पाईप लाईन को बदल दिया गया है पर कनेक्शन के नाम पर अब सात सौ रूपए मांगे जा रहे हैं। वहीं नगर पालिका के सूत्रों का कहना है कि पाईप लाईन नगर पालिका द्वारा अपने व्यय पर बदली गई है, इसमें लाईन परिवर्तन का कोई मामला ही नहीं है, फिर पता नहीं क्यों पालिका द्वारा प्रत्येक कनेक्शन में सात सौ रूपए की राशि की मांग की जा रही है।
वस्तुतः नगर पालिका को मेन पाईप लाईन नई डाली गई है तो उसे यहां के रहवासियों के कनेक्शन भी उसी समय कर दिया जाना चाहिए था, किन्तु पालिका द्वारा ऐसा किया नहीं गया है। नतीजतन 21 अक्टूबर से इन पंक्तिायों के लिखे जाने तक यहां के निवासियों के घरों में एक बूंद पानी भी नहीं टपका है।
आलम यह है कि लोग दूर दराज से हेण्ड पंप या अन्य स्त्रोतों से पानी लाकर गुजारा कर रहे हैं। इस संबंध में क्षेत्र के निवासियों ने नगर पालिका से संपर्क किया तो पालिका के कारिंदों ने दो टूक जवाब दे दिया कि सात सौ रूपए पटाओ फिर होगा नल का कनेक्शन।

क्षेत्र के निवासियों के आवेदन पर पाईप लाईन बदली गई है। अतः कनेक्शन नया या परिवर्तित माना जाएगा। इसलिए नागरिक निर्धारित राशि जमा कर पावती ले लें और कनेक्शन करवा लें।
सी.के.ठाकुर

मुख्य नगर पालिका अधिकारी, सिवनी

किसके आदेश का इंतजार है पुलिस को!

किसके आदेश का इंतजार है पुलिस को!

(शरद खरे)

विधानसभा की रणभेरी बज चुकी है। जिले में सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद करने में जुट चुकी है सिवनी की पुलिस। जगह जगह बेरीकेट्स लगाकर वाहनों की चेकिंग का अभियान छेड़ा गया है। इस अभियान में कुछ हद तक सफलता भी मिलती दिख रही है। पिछले दिनों एक कपड़ा व्यापारी के पास से 3 लाख 82 हजार रूपए की रकम मिली। कहा जा रहा है कि वह रकम एक नंबर की थी, इसलिए व्यापारी को लौटा दी गई है। इससे साफ हो जाता है कि अगर पुलिस चाहे तो कुछ भी असंभव नहीं है। पता नहीं क्यों चुनाव के आते ही या ऊपर से आदेश आते ही पुलिस हरकत में आती है, बाकी समय पुलिस हाथ पर हाथ धरे ही बैठी रहती है।
चुनाव के चलते ही सही, कम से कम पुलिस हरकत में तो आई है। मीडिया में भी पुलिस की सख्ती, औचक निरीक्षण, सघन चेकिंग अभियान की खबरें पटी पड़ी हैं। जनसंपर्क विभाग भी मुस्तैदी के साथ पुलिस की इस चेकिंग की खबरें जारी कर पुलिस का मनोबल बढ़ाने में मदद कर रहा है। वैसे भी सिवनी जिला पहले से ही संवदेनशील है, साथ ही साथ सिवनी का राष्ट्रीय राजमार्ग पर होना भी इसके संवेदनशील होने का बड़ा कारण माना जा सकता है। याद पड़ता है जब मीनाक्षी शर्मा सिवनी में पुलिस अधीक्षक थीं, उस वक्त मुंबई के एक टैक्सी चालक का शव लखनवाड़ा थाना क्षेत्र में मिला था। उस समय पत्रकार वार्ता में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक श्रीमति मीनाक्षी शर्मा ने इस बात को परोक्ष तौर पर स्वीकार किया था कि अपराधियों के लिए सिवनी सॉफ्ट टारगेट से कम नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि सिवनी की शांत फिजां, जरायमपेशा लोगों के छिपने के संक्रमणकाल में एशगाहसे कम नहीं आंकी जा सकती है।
सिवनी में गंभीर किस्म की श्रेणी वाले अपराध भी तेजी से बढ़ रहे हैं। सिवनी शहर के अंदर भरी आबादी वाले क्षेत्र में बारूद फटता है एक व्यक्ति के चीथड़े उड़ जाते हैं, उंट की कुबार्नी से तनाव फैलता है, होली के पहले ही दर्जनों की तादाद में जिंदा बम मिलते हैं, प्रतिबंधात्मक सिमी के कार्यकर्ता मिलते हैं, बात बात पर हत्याएं हो जाती हैं, क्रिकेट एवं अन्य सट्टे में उधारी के चलते एक दूसरे पर पिस्तौलें तन जाती हैं, और न जाने क्या क्या संगीन अपराध घटित हो रहे हैं शांत सिवनी में। पुलिस के ही सूत्र यह भी बताते हैं कि सिवनी शहर में कम से कम दो ग्रूस (एक ग्रूस का मतलब बारह दर्जन यानी 144 नग) से ज्यादा अवैध माउज़र हैं।
यक्ष प्रश्न यह है कि क्या पुलिस को इसकी जानकारी नहीं है? क्या पुलिस का खुफिया तंत्र पूरी तरह ढह चुका है? क्या पुलिस सदा ही कर्मचारियों के अभाव का रोना रोती रहेगी? कुछ समय से पुलिस के जवान रंगरूट और अधिकारी बड़ी तादाद में शहर में दिन रात गश्त करते देखे जा रहे हैं, हो सकता है यह अतिरिक्त पुलिस बल त्यौहार या चुनावों को देखकर बुलाया गया हो। अगर यहां अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए।
चुनाव के चलते ही सही, कम से कम पुलिस ने वाहनों की चेकिंग आरंभ की है। जब वाहनों की चेकिंग हो ही रही है तो सिर्फ शराब, असलाह या बड़ी रकम की ही चेकिंग क्यों? वाहन के कागजात, इंश्योरेंस, फिटनेस, परमिट आदि भी लगे हाथ देख लिया जाए। सरकारी या गैर सरकारी वे वाहन जो टैक्सी कोटे में रजिस्टर्ड हैं उनकी पीली नंबर प्लेट के बजाए सफेद नंबर प्लेट है तो उन पर (भले ही वे सरकारी क्यांे न हों, क्योंकि कानून सबके लिए समान ही है) दण्डात्मक कार्यवाही कर चालान काटा जाए।
कुरई पुलिस की पीठ उच्चाधिकारियों को थपथपाना चाहिए, क्योंकि वह वाहनों विशेषकर यात्री बसों के सामान की डिक्की खुलवाकर उसकी चेकिंग कर रही है। मगर कुरई पुलिस से उच्चाधिकारियों द्वारा यह भी पूछ लिया जाए कि क्या उसने यात्री बसों के परमिट, फिटनेस, दो दरवाजे आदि की भी चेकिंग की है? कितने वाहनों की चेकिंग की गई और कितने वाहन नियमानुसार सही पाए गए? पुलिस से अपेक्षा इसलिए है क्योंकि खवासा में स्थापित (अब मेटेवानी में) परिवहन विभाग की चेक पोस्ट में तो सारे के सारे वाहन लक्ष्मी मैया की असीम अनुकंपा से वैध ही पाए जाते हैं।
यातायात पुलिस ने गत दिवस शक्कर का एक ट्रक पकड़ा था। इस वाहन ने शक्कर का विक्रय कर नहीं पटाया था। बाद में 18 हजार 976 रूपए का समन शुल्क देकर इस वाहन को छोड़ा गया। क्या विक्रय कर अधिकारी ने खवासा जांच चौकी से इस बात की जानकारी ली कि आखिर महाराष्ट्र से यह वाहन सेल्स टैक्स की चोरी कर एमपी में घुसा तो घुसा कैसे? जाहिर है खवासा बार्डर में चढ़ोत्री चढ़ाकर ही यह अवैध रूप से शक्कर लाने वाला वाहन पूरी तरह वैध हो गया होगा। जिला कलेक्टर भरत यादव से अपेक्षा है कि इस संबंध में संज्ञान लेकर विक्रय अधिकारी और खवासा जांच चौकी से जवाब तलब अवश्य करें, ताकि यह नजीर बने और आने वाले समय में करों की चोरी कर अपनी जेब भरने वाले सरकारी नुमाईंदे इस बात से सबक लेकर कर्तव्यों का निर्वहन उचित तरीके से कर सकें।
संवेदनशील जिला कलेक्टर भरत यादव एवं पुलिस अधीक्षक बी.पी.चंद्रवंशी से अपेक्षा ही की जा सकती है कि वाहनों की चेकिंग के लिए पुलिस बल को उचित दिशा निर्देश अवश्य प्रदान करें। साथ ही साथ पुलिस के अंदर भी उच्चाधिकारियों का खौफ पैदा करना आवश्यक है। हाल ही में एक वाहन में कोतवाली पुलिस द्वारा गौमांस जप्त करने की खबर है, खबर तो यह भी है कि लखनवाड़ा पुलिस ने इस वाहन को महज दो हजार रूपए लेकर छोड़ दिया था। अगर इस बात मेें लेशमात्र भी सच्चाई है तो यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि पुलिस में निचले स्तर पर रिश्वत का चलन बेहद ज्यादा है और उच्चाधिकारियों का भय समाप्त हो गया है। आज पुलिस के कारिंदे अपराधियों और आपराधिक छवि वाले लोगों की गलबहियां डाले दिखते हैं। समाज में पुलिस की छवि मित्र की होना चाहिए और अपराधियों में उनका भय होना चाहिए। असल में मामला उलट ही दिख रहा है, समाज पुलिस से डर रहा है और जरायमपेशा लोगों में पुलिस की छवि मित्र की बनती जा रही है. . .।

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

संरक्षित वन में बन रहा थापर का पॉवर प्लांट!

संरक्षित वन में बन रहा थापर का पॉवर प्लांट!

आदिवासियों के हितों को कुचला भाजपा ने

संरक्षित वनों से घिरा हुआ है संयंत्र का क्षेत्र

एक दर्जन संरक्षित वन हैं संयंत्र के आस पास

(ब्यूरो कार्यालय)

घंसौर (साई)। मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान् मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड के द्वारा केंद्र सरकार की छटवीं अनुसूची में शामिल मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर विकासखण्ड के ग्राम बरेला में प्रस्तावित 1200 मेगावाट का कोल आधारित पॉवर प्लांट पूरी तरह संरक्षित वनों से न केवल घिरा हुआ है वरन् यह संरक्षित वन क्षेत्र में ही बन रहा है। संयंत्र प्रबंधन ने इसके पहले चरण की लोकसुनवाई में संरक्षित वनों के बारे में चुप्पी ही साधी रखी थी जो अनेक संदेहों को जन्म दे रही है।
आरोपित है कि 22 अगस्त 2009 को मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल द्वारा आहूत लोकसुनवाई के पूर्व संयंत्र प्रबंधन द्वारा जमा कराए गए कार्यकारी सारांश में इस संयंत्र के प्रथम चरण में आसपास कोई भी नेशनल पार्क नहीं होना दर्शाया गया था। उल्लेखनीय होगा कि संयंत्र स्थल से महज सत्तर किलोमीटर दूर अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कान्हा नेशनल पार्क अवस्थित है। इतना ही नहीं संयंत्र प्रबंधन ने संयंत्र के इर्दगिर्द रक्षित वनों के मामले में इस संबंध में मौन साध लिया गया था।
शोर शराबा होने के बाद भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड के प्रथम चरण को हरी झंडी दे दी गई। इसके उपरांत जब दूसरे चरण की लोकसुनवाई संपन्न हुई तब मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड द्वारा एक बार फिर पहले चरण का ही कार्यकारी सारांश मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल को सौंप दिया गया। पीसीबी के सूत्रों का कहना है कि जब इसमें लिखित खामियों के बारे में हल्ला मचा तब संयंत्र प्रबंधन ने मण्डल के कारिंदों की मदद से कार्यकारी सारांश ही बदल दिया।
सूत्रों ने कहा कि नए कार्यकारी सारांश के पांचवें पेज में संयंत्र प्रबंधन ने कहा है कि इस संयंत्र के इर्द गिर्द एक दो नहीं एक दर्जन संरक्षित वन हैं। इसमें उत्तर से दक्षिण में तीन किलोमीटर रोटो संरक्षित वन, उत्तर से उत्तर पूर्व में साढ़े सात किलोमीटर पर बरवाक्चार संरक्षित वन, उत्तर पश्चिम में नौ किलोमीटर पर काटोरी संरक्षित वन, उत्तर पश्चिम में तीन किलोमीटर पर धूमा संरक्षित वन है।
इसके अलावा दक्षिण में साढ़े सात किलोमीटर पर घंसौर संरक्षित वन, पश्चिम उत्तर पश्चिम में डेढ़ किलोमीटर पर भाटेखारी संरक्षित वन, पूर्व दक्षिण पूर्व में साढ़े तीन किलोमीटर पर बिछुआ संरक्षित वन, दक्षिण पश्चिम में आठ किलोमीटर पर जेतपुर संरक्षित वन, ग्राम बरेला में लगने वाले संयंत्र खुद ही संरक्षित वन में स्थापित है। पूर्व दक्षिण पूर्व में आठ किलोमीटर में प्रतापगढ़ आरक्षित वन है।
संयंत्र प्रबंधन द्वारा मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल को सौंपे गए 15 पेज के अपने कार्यकारी संक्षेप के पांचवें पेज पर स्वयं ही इस बात को स्वीकार किया है कि संयंत्र से शून्य किलोमीटर दूरी पर बरेला संरक्षित वन है। शून्य किलोमीटर का सीधा तात्पर्य यही हुआ कि गौतम थापर के स्वामित्व वाला अवंथा समूह का सहयोगी प्रतिष्ठान् मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड द्वारा छटवीं अनुसूची में अधिसूचित सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर विकासखण्ड के ग्राम बरेला में लगाए जाने वाले कोल आधारित पॉवर प्लांट को संरक्षित वन में ही संस्थापित करने का तानाबाना केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की देखरेख में मध्यप्रदेश शासन के प्रदूषण नियंत्रण मण्डल के द्वारा बुना जा रहा है।
यक्ष प्रश्न तो यह बना हुआ है कि यह सब देखने सुनने के बाद क्या वन विभाग आंखों पर पट्टी बांधे हुए है, अथवा मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल, अथवा संयंत्र प्रबंधन द्वारा आनन फानन में तैयार कर मण्डल की मिलीभगत से घंसौर के गोरखपुर गांव में 22 नवंबर को संपन्न हुई लोकसुनवाई के एक सप्ताह के बाद जमा करवाए गए कार्यकारी सारांश में जल्दबाजी में यह ऋुटी कर दी गई है?

अगर संयंत्र प्रबंधन का कहना सही है कि उक्त संयंत्र संरक्षित वन में स्थापित किया जा रहा है, तब इसके प्रथम चरण के काम को क्या रोका जाएगा? साथ ही साथ जमीनी हकीकत देखे बिना केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा आखिर इसके निर्माण की अनुमति कैसे दे दी गई है? दूसरी तरफ देश में सियासी दलों द्वारा सशक्त लोकपाल लाने का दावा किया जा रहा है।