सोमवार, 5 अप्रैल 2010

आखिर चाहते क्या हैं शशि थुरूर

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

आखिर चाहते क्या हैं शशि थुरूर
भारत गणराज्य का इससे बडा दुर्भाग्य नहीं होगा कि उसका एक मन्त्री बार बार विदेश की एक सोशल नेटविर्कंग वेव साईट पर सरकरी नीतियों पर टीका टिप्पणी करे और भारत सरकार चुपचाप सब कुछ सहती रहे। बार बार टि्वटर पर टि्वट करने वाले शशि थुरूर का गुरूर तो देखिए वे इसे न केवल सही ठहरा रहे हैं, वरन् यह इसे जस्टीफाई करने से भी नहीं चूक रहे है। बकौल थुरूर जब आप टिवट करते हैं, तो आपके विचार साढे सात लाख लोगों तक पहुंचते हैं। अब सरकारी नीतियों के बारे में अगर टि्वटर पर कोई बात कही जाए तो साढे सात लाख लोग इसका फायदा उठाते हैं। जनाब शशि थुरूर को कौन बताए कि भारत सरकार के सूचना प्रसारण मन्त्रालय का मुख्य काम ही लोगों तक सरकारी नीतियों को पहुंचाना है। भारत सरकार के प्रेस इंफरमेशन ब्यूरो (पीआईबी), डीएव्हीपी के विभिन्न अंगों का मुख्य काम यही है। भारत सरकार द्वारा इसमें पदस्थ भारी भरकम अमले को करोडों अरबों रूपए प्रतिमाह का वेतन दिया जाता है। इतना ही नहीं सरकार द्वारा अरबों खरबों रूपए सालाना सिर्फ और सिर्फ इसी बात के लिए फूंके जाते हैं, ताकि सरकारी नीतियों को जनता तक पहुंचाया जा सके। अब जब भारत सरकार द्वारा यह काम किया ही जा रहा है, तो भला शशि थुरूर को क्या जरूरत आन पडी कि वे इंटरनेट के माध्यम से साढे सात लाख लोगों तक सरकारी नीतियों को पहुंचाएं। हो सकता है विदेशों में अपना ज्यादातर समय बिताने वाले थुरूर भारत सरकार की कामयाबी या नाकामयाबी को टि्वटर के माध्यम से अपन विदेशों में बैठे प्रशंसकों के साथ बांटना चाहते हों।
उमा की वापसी राह में शूल हैं ``शिव``
कभी भाजपा की फायर ब्राण्ड नेत्री रही उमाश्री भारती की भाजपा में वापसी लगभग तय ही है। उमाश्री की वापसी की अटकलें इस साल के आरम्भ से ही लगाई जाने लगीं थीं। अब राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी भी इस मुहिम में जुट गए हैं कि उमाश्री को वापस घर लाया जाए। उनकी राह में सबसे बडे रोढे के रूप में अब मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ही सामने आ रहे हैं। दरअसल शिवराज सिंह चौहान आज भी ``उमा फोबिया`` से ग्रसित नज़र आ रहे हैं। अडवाणी की मण्डली अब शिवराज सिंह को यह बताने का प्रयास कर रही है कि उमाश्री के लिए समूचा भारत कार्यक्षेत्र के लिए खोला जाएगा, किन्तु उसमें मध्य प्रदेश के इर्द गिर्द लक्ष्मण रेखा खींच दी जाएगी। बताते हैं कि आडवाणी मण्डली ने उमाश्री को इसके लिए तैयार कर लिया है कि उमाश्री चाहें तो मध्य प्रदेश को देख सकतीं हैं, पर वह सिर्फ और सिर्फ भारत के मानचित्र पर ही। दरअसल आडवाणी चाहते हैं कि उमाश्री को भाजपा में वापस लाकर उनका इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में मायावती के काट के तौर पर ही किया जाए, इसलिए शिवराज को यह भरोसा भी दिलवाया जा रहा है कि उमाश्री एक्सप्रेस दिल्ली से आरम्भ होकर झांसी के आगे बढने नहीं दी जाएगी। अब शिवराज इस बात से कितना इत्तेफाक रखते हैं, यह तो समय ही बताएगा। कहते हैं इसी के चलते मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष की ताजपोशी रूकी हुई है।
अर्जुन आउट, राहुल इन!
कभी कांग्रेस आलकमान के नज़रों की शान रहे बीसवीं सदी के कांग्रेस के अघोषित चाणक्य की कांग्रेस से रूखसती की बेला आ ही गई है। हालात देखकर लगने लगा है कि अब अर्जुन सिंह को छेडने पर वे प्रतिकार करने की स्थिति में भी नहीं बचे हैं। कांग्रेस में गुजरे जमाने के चाणक्य की यह दुर्गत निश्चित तौर पर अन्य लोगों के लिए एक सबक ही हो सकती है कि शरीर साथ देना छोड दे तो कछुए के मानिन्द अपने हाथ पैर समेटकर चुपचाप बैठ जाया जाए वरना मट्टी ही खराब होती है। हाल ही में जवाहर भवन ट्रस्ट के ट्रस्टी के मामले में भी यही देखने को मिला। कल तक नेहरू गांधी परिवार के लिए अहम माने जाने वाले इस महात्वपूर्ण ट्रस्ट का हिस्सा रहे कुंवर अर्जुन सिंह, माखन लाल फोतेदार और मोहसिना किदवई को यहां से विदा दे दी गई है। मुकुल वासनिक को इसमें शामिल किया गया है। आश्चर्य तो मोतीलाल वोरा को लेकर है, जिन्हें अहमद पटेल के स्थान पर इसका सचिव बनाया है। लगता है कांग्रेस के 21वीं सदी के चाणक्य दिग्विजय सिंह अपने नपे तुले कदमों से चल रहे हैं और सोनिया के दरबार से उन्होंने अर्जुन सिंह और अहमद पटेल की जमीन खोद ही दी है।
बिगबी के भूत से परेशान हैं चव्हाण
महाराष्ट्र सूबे के निजाम अशोक चव्हाण रात को सपने में भी अमिताभ बच्चन से खौफजदा हैं। बिगबी पर कांग्रेस सुप्रीमो की नज़रें तिरछी होने के बाद से ही सभी के लिए अमिताभ बच्चन अछूत हो गए। मुम्बई में सी लिंक के उद्घाटन के अवसर पर बिग बी की मौजूदगी पर न जाने कितनी बार उन्होंने सफाई पेश की। अब कांग्रेस के तरकश से जितने भी तीर निकल रहे हैं, उन सभी पर पता बिग बी का ही लिखा हुआ है। कांग्रेस की राजमाता को प्रसन्न करने के लिए हर कोई अमिताभ को कोस रहा है। एसे में भाजपा कैसे चूक सकती है। भाजपा परोक्ष तौर पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के बचाव में सामने आती दिख रही है। महाराष्ट्र भाजपा के नए अध्यक्ष सुधीर मुनगंटीवार ने बीते दिनों अपना पदभार ग्रहण करते वक्त ही कांग्रेस और अमिताभ के बीच चल रहे हाट एण्ड कोल्ड वार के मजे लिए। सुधीर कहते हैं कि अगर अमिताभ बच्चन विधायक बनकर सूबे की विधानसभा में चले जाएं तो मुख्यमन्त्री अशोक चव्हाण विधायकी ही छोड देंगे। सच ही है, भाट चारण अपनी जगह सही है, पर किसी शिक्सयत को अगर इस तरह अण्डर एस्टीमेट किया जाएगा तो फिर चल चुका शासन। अरे भई नैतिकता भी कोई चीज होती है। फिर अमिताभ बच्चन कांग्रेस के सम्मानित संसद सदस्य भी रह चुके हैं, इस बात को कम से कम कांग्रेस जन न ही भूलें तो बेहतर होगा।
मूर्ति के लिए पर पढाई के लिए नहीं है पैसा
दलित की बेटी होकर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाली मायावती और विवादों का गहरा नाता है। वे जानबूझकर विवादों में उलझतीं हैं, या फिर विवाद उनके गले पड जाते हैं, यह कहा नहीं जा सकता है। कभी मूर्तियां लगवाने तो कभी ताज कारीडोर तो कभी नोटों की माला का विवाद उनके गले ही पडा है। अब माया मेम साहब ने नया विवाद खडा करने का उपक्रम किया है। शिक्षा के अधिकार के कानून में उन्होंने बाल केन्द्र के पाले में धकेल दी है। अपनी मूर्तियों और पार्कों पर जनता के गाढे पसीने की कमाई के करोडों रूपए फूंकने वाली मायावती का कहना है कि शिक्षा के अधिकार कानून को सूबे में लागू करने के लिए आवश्यक धनराशि केन्द्र सरकार ही मुहैया करवाए। माया का कहना है कि एक साल में सूबे में इस काम के लिए 18 हजार करोड रूपयों की आवश्यक्ता है, इसमें से 45 फीसदी यानी 8 हजार करोड रूपए राज्य को अपने पल्ले से करना है, जो उनके लिए सम्भव नहीं है। वाह री मायावती तेरी माया अपरंपार, मूर्ति पर खुले थेलियों के मुंह और पढाई के नाम पर तुच्छ विचार।
मेरे अधरों पर हो अन्तिम वस्तु तुलसी रस काला  . . .
कभी मद्य का सेवन न करने वाले अजर अमर कवि हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला में शराब को जिस जीवान्त तरीके से विर्णत किया है, वह तारीफे काबिल ही है। कभी मधुशाला को ठण्डे दिमाग से सुनी जाए तो निश्चित तौर पर एक अलग सुखद अनुभूति का अनुभव ही होगा। इसकी हर एक पंक्ति में मधुशाला और मद्य दोनों ही के बारे मेें बारीक जानकारियां मिलती हैं। भले ही हरिवंश राय बच्चन इलाहाबाद से मुम्बई जाकर बसे हों पर बच्चन जी की मधुशाला के मुरीद पंजाब और हरियाण की राजधानी चण्डीगढ में ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। कहने को तो यहां कुल 4 लाख 83 हजार 982 मतदाता हैं। अर्थात यहां बालिगों की संख्या कुल मिलाकर इतनी है। सरकार भले ही बालिगों को शराब और पान गुटखा, सिगरेट बेचने की चेतावनी देती हो, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। चण्डीगढ में रोजाना दो लाख बोतल शराब बिक जाती है। जी हां यह सच्चाई है, पिछले एक साल में 65 लाख 736 हजार बोतलें गटक गए थे, चण्डीगढवासी। इसका मतलब यही हुआ कि यहां का हर दूसरा मतदाता मद्य के सुरूर में ही दिखता है। सच्चाई क्या है यह बात तो आबकारी विभाग वाले बेहतर जानते होंगे पर जहां तक रही आंकडों की बात तो आंकडे यही कहते दिख रहे हैं।
गिफ्ट तय करेगा चिकित्सक की सजा
अब दवा कंपनियों से उपहार लेने वाले चिकित्सकों के लिए एक बुरी खबर है, दवा कंपनियों से मनमाने उपहार लेने वाले चिकित्सकों के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय ने सजा का निर्धारण कर दिया है। आने वाले दिनों में अलग अलग मूल्य के उपहार लेने वाले चिकित्सकों को अलग अलग मूल्य पर अलग अलग समय की सजा का प्रावधान कर दिया गया है। अब पांच हजार के उपहार पर एक माह, दस हजार पर तीन माह, पचास हजार पर छ: माह, एक लाख तक तक एक साल और एक लाख से अधिक के उपहार लेने पर आजीवन सजा का प्रावधान कर दिया गया है। मन्त्रालय ने मेडीकल काउंसिल ऑफ इण्डिया की एक सिफारिश को मान लिया है। अब सजा को छ: श्रेणियों में बांट दिया गया है। मन्त्रालय की सख्ती को देखकर अब लगने लगा है कि आने वाले समय में दवा कंपनियों और चिकित्सकों के बीच की मुगलई के दिन समाप्त होने वाले हैं, पर यक्ष प्रश्न यही है कि क्या इन सिफारिशों का ईमानदारी से पालन हो पाएगा!
और वनमन्त्री हो गए `शिकार` के शिकार
शिकार हिन्दुस्तान में गैरकानूनी माना गया है। देश के एक सूबे के वन मन्त्री शिकार के ही शिकार हो गए हैं। छत्तीसगढ में वन मन्त्री विक्रम उसेण्डी सूबे में सत्ताधरी भाजपा के ही विधायकों के सवालों के जवाब देने में बगलें झांकने लगे। भाजपा विधायक देवजी पटेल ने वन मन्त्री को अवैध शिकार के लिए आडे हाथों लिया। इतना ही नहीं बसपा विधायक सौरभ सिंह के सवाल पर सदन में जवाब देते हुए उसेण्डी ने स्वीकार किया कि तुन्दुए समेत अन्य वन्य जीवों की मौत भूख प्यास के कारण हुई है। अवैध शिकार के मामले में वन मन्त्री को जवाब देना मुश्किल हो गया। देश में प्रजातन्त्र है, इसका प्रमाण तभी मिलता है, जब छत्तीसगढ के वन मन्त्री वन्य जीवों के साथ होने वाले अत्याचार को स्वीकार कर रहे हों, और उसके बाद भी अपने पद पर बाकायदा बने हों। अरे भई जब रियाया के साथ होने वाले अत्याचार के बाद शासकों का बाल भी बांका न हो तो फिर मूक जानवरों के लिए फिकरमन्द कौन हो सकता है।
मीडिया को नसीहत दी हाईकोर्ट ने
दिल्ली हाईकोर्ट ने मीडिया को एक अच्छी नसीहत दी है। वैसे भी मीडिया को अपनी हदें पहचानना चाहिए। मीडिया का काम नीति और अनीति के बारे में बताना है, किन्तु ग्लेमर के चलते मीडिया की पगडण्डी पर आकर चलने वाले लोगों द्वारा अपने आप को न्यायधीश समझ लिया जाता है। मीडिया में बहुत सारे लोग निर्णय देने लगते हैं, जो अनुचित है। इसी तारतम्य में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि आपराधिक मामलों में आरोप पत्र दाखिल होने के पूर्व मीडिया इकबालिया बयान न छापे। चीफ जस्टिस अजीत प्रकाश शाह की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने कहा है कि गिरफ्तारी के बाद आरोपियों को मीडिया के समक्ष न ले जाया जाए। साथ ही यह भी कहा है कि पुलिस को आरोपियों के बारे में अपनी राय नहीं देना चाहिए। दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के बारे में एक गैर सरकारी संगठन द्वारा दायर याचिक की सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशान्त भूषण ने कहा कि चार्ज शीट दाखिल होने के पहले मीडिया को खबरें प्रकाशित नहीं करना चाहिए। इस तरह के प्रचलन को उन्होंने ठीक नहीं ठहराया है।
मन्त्री जी भूल गए डीटीसी को
दिल्ली में कामन वेल्थ गेम्स के मद्देनज़र दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की भूमिका बहुत अहम मानी जा रही है। यही कारण है कि दिल्ली का परिवहन महकमा डीटीसी को चाक चौबन्द करने में जुटा हुआ है। पुरानी थकी हुई बसों के स्थान पर अब डीटीसी के बेडे में चमचमाती लो फ्लोर बस को शामिल किया जा रहा है। 55 लाख से 85 लाख रूपए मूल्य की इन बसों में तकनीकि तौर पर खामियां अवश्य हैं, साथ ही किलर ब्लू लाईन बसों के चलते इनकी तादाद तेजी से नहीं बढ पा रही है। दिल्ली के परिवहन मन्त्री को शायद किसी ने बता दिया कि अगर आप डीटीसी की बसों में सफर कर लेंगे तो मीडिया की सुर्खियां पा लेंगे। इस लिहाज से वे फरवरी के पहले सप्ताह में डीटीसी की एक लो फ्लोर की बस में चढ गए। कुछ दूर के सफर के दौरान अरविन्दर सिंह लवली को सीट नहीं मिली पर यात्रियों से उन्होंने चर्चा की और फिर अपनी चमचमाती लाल बत्ती कार में सवार होकर वे वहां से कूच कर गए। इसके बाद डीटीसी का बेडा इन्तजार ही कर रहा है कि कब चरण रज मिल पाएगी डीटीसी बस को परिवहन मन्त्री की।
सचिन नाज है तुम पर
भारतीय क्रिकेट को एस नाम बहुत सूट करता है। पहले सुनील गावस्कर ने भारत के क्रिकेट को बुलन्दियों पर पहुंचाया और अब उसके बाद सचिन रमेश तेन्दुलकर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। महज बीस सालों में ही सचिन ने दुनिया के कोने कोने में अपने फैन की तादाद में जबर्दस्त इजाफा किया है। 125 मैदान में 93 शतक और 146 अर्धशतक बनाने वाले सचिन आज दुनिया के महान बल्लेबाजों की फेहरिस्त में काफी उपर हैं। सचिन की सबसे बडी खासियत यह है कि वे एकलव्य की ही तरह अपने लक्ष्य पर ही नज़र रखे हुए हैं, वे आज तक अपने लक्ष्य से नहीं डिगे हैं, और रही विवादों की बात तो विवादों से वे कोसों दूर ही रहे हैं। 20 साल के टेस्ट, वनडे और फटाफट क्रिकेट में सचिन की सबसे उपलब्धि यही रही है कि उनके द्वारा खेले गए कुल मैचों में हर आठवें मैच में वे मैन ऑफ द मैच रहे हैं।
पुच्छल तारा
कानपुर से अजय प्रताप सिंह ने ईमेल भेजा है कि भाजपा जो भी बयान जारी करे वो सोच समझ कर ही करे। अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली में गन्दी यमुना को लेकर भाजपा का बयान आया था कि अकेले यमुना ही दिल्ली की नाक कटवा देगी। अरे भई दिल्ली की नाक कटवाने के मामले में गलत परंपराओं को आगे न बढाएं। दिल्ली की नाक कटवाने का मौका किलर ब्लू लाईन, बिगडेल पुलिस, लूटने वाले आटो चालकों आदि को भी मिलना चाहिए न।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

नियमों की भेंट न चढ जाये यह खेल प्रतिभा

नियमों की भेंट न चढ जाये यह खेल प्रतिभा

जबलपुर नगर का युवा पावर लिफ़्टिंग खिलाडी संजय बिल्लोरे का चयन मंगोलिया की राजधानी उलानबटर में दिनांक ०१ मई से ५ मई तक आयोजित एशियन पावर लिफ़्टिंग चैम्पियन शिप २०१० हेतु इंडियन-पावर-लिफ़्टिंग फ़ेडरेशन व्दारा किया गया है. किंतु इस खेल के नान औलौंपिक श्रेणी का होने के कारण न तो राज्य सरकार से और न ही भारत सरकार से खिलाडी को कोई मदद शासकीय तौर पर मिलना कठिन हो गया है. एक मध्यम वर्गीय युवा खेल-प्रतिभा को मंगोलिया तक की यात्रा के साधन जुटाने में जो ज़द्दो-ज़हद करनी पड रही आत्म विश्वास से भरे इस युवक को

पूरा भरोसा है अपने बेहतर प्रदर्शन के लिये: संजय का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हौने वर्ष २००७ में ताईवान में आयोजित एशियन पावर लिफ़्टिंग प्रतियोगिता में रज़त-पदक जीता था.

ओर्डिनेंस फ़ैक्ट्री खमरिया में मशीनिष्ट के पद पर कार्यरत संजय बिल्लोरे को इस खेल यात्रा के लिये लगभग एक लाख रुपयों की ज़रूरत है. यदि वे १५ अप्रेल तक फ़ेडरेशन को यात्रा व्यय हेतु राशि न भेज सके तो उनका चयन निरस्त कर दिया जायेगा. संजय ने यात्रा-व्यय के लिये अपने विभाग को आवेदन कर दिया है किंतु नियमों का हावाला देते हुए विभाग ने उनसे उम्मीद न रखने की सलाह दी है यद्यपि फ़ेडरेशन ने उनका आवेदन कलकत्ता स्थित मुख्यालय को भेज दिया है.

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ का मजीठिया वेतनबोर्ड को ज्ञापन

मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ का मजीठिया वेतनबोर्ड को ज्ञापन

मीडिया हाउसों में ठेकेदारी प्रथा पर लगे प्रभावी रोक

हर श्रेणी के वेतन में हो आकर्षक बढ़ोतरी

भोपाल। मीडिया में ठेकेदारी (कान्ट्रक्ट सर्विस) प्रथा के बढ़ते चलन पर `मजीठिया वेजबोर्ड` को खुलकर सामने आने का सुझाव देते हुए मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ ने 27 मार्च को भोपाल में उसे सौंपे अपने प्रतिनिधित्व :ज्ञापन: में कहा है कि कान्ट्रेक्चुअल सर्विस वास्तव में देश में लागू श्रम कानूनों का उल्लंघन है। मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ की ओर से उसके अध्यक्ष शलभ भदौरिया एवं अन्य प्रदेश पदाधिकारियों ने सौंपे इस ज्ञापन में पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेजबोर्ड से कहा है कि श्रम कानून का मखौल उड़ाने वाली इस ठेकेदारी प्रथा से मीडियाकर्मियों को निजात दिलाने के लिए उसे सरकार के सामने अहम् भूमिका निबाहनी चाहिए।

उन्होने कहा कि पहले से ही समाचार पत्र उद्योग में श्रम कानूनों का उल्लंघन धड़ल्ले से किया जा रहा था तथा इससे पहले केन्द्र द्वारा स्वीकृत किए गए विभिन्न वेजबोर्ड्स की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया है। मीडिया हाउसों के दबाव में सरकारों ने इन वेजबोर्ड्स को लागू कराने की भी कोई प्रभावी मशीनरी कायम नहीं की, जिससे आज भी इनमें काम करने वाले पत्रकार एवं गैर पत्रकार साथियों का जमकर शोषण हो रहा है। दुनिया भर में अराजकता और शोषण के खिलाफ अपनी कलम से आवाज उठाने वाला यह वर्ग अपने ही शोषण के खिलाफ इन बड़े और दबंग नियोक्ताओं के खिलाफ, अपनी रोजी-रोटी बचाए रखने की गरज के कारण कुछ नहीं कह सकता है। इसलिए मजीठिया वेजबोर्ड को चाहिए कि वह उसे मिले इस अवसर को ठेकेदारी प्रथा जैसे नामाकूल चलन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए उपयोग करे।

ज्ञापन में सुझाव दिया गया है कि वेजबोर्ड लागू करने के लिए वह सरकार को श्रमजीवी पत्रकार कानून 1955 में आवश्यक संशोधन सुझाए, ताकि इसका उल्लंघन एक संज्ञान योग्य अपराध बन जाए। वेजबोर्ड को चाहिए कि वह राज्य स्तर तक नए वेतनमान लागू करने के प्रभावी उपाय भी सरकार को सुझाए ओर इसके उल्लंघन के लिए दाण्डिक प्रावधान करे। यही नहीं, बल्कि वेजबोर्ड का उल्लंघन करने वाले मीडिया हाउस को केन्द्र एवं राज्य दोनो सरकारों के विज्ञापनों के लिए `ब्लैकलिस्ट` किया जाए।

वेजबोर्ड की सिफारिशें पूरी तरह लागू करने के लिए संघ ने यह भी सुझाव दिया है कि हर साल की शुरूआत में जिला श्रम अधिकारियों द्वारा श्रमजीवी पत्रकारों की सूची तैयार कर, जिसमें उनके नियोक्ता का नाम और संस्थान भी शामिल हो, विधानमण्डलों एवं संसद के दोनो सदनों में अधिसूचना सहित पेश की जाए और इसी अधिसूचना को पत्रकारों की अधिमान्यता देते समय उपयोग में लाया जाए। इससे वेजबोर्ड लागू नहीं करने वाले संस्थानों का भाण्डाफोड़ तो होगा ही साथ ही इसी सूची के आधार पर सरकार की पेशन, स्वास्थ्य, जीवन बीमा आदि योजनाओं को पत्रकारों के लिए प्रभाव में लाया जा सकेगा।

संघ ने वेजबोर्ड में समाचार पत्रों की श्रेणियां पांच तक सीमित रखने तथा समाचार अभिकरणों की तीन श्रेणियां अन्तरर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय और टेलीविजन न्यूज चैनलों की भी श्रेणियां उनके राजस्व आय के आधार पर तय करने का सुझाव दिया है। ज्ञापन में कहा गया है कि हर वेजबोर्ड का मकसद पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए आकर्षक वेतन तय करना होता है, इसलिए मजीठिया अयोग से भी ऐसी ही अपेक्षा है, क्योंकि वर्तमान में पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के वेतनमान अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों की तुलना में काफी कम हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए तय हुए छठवें वेतनमान के मद्देनज़र तो यह और भी कम है।

वैश्वीकरण के इस दौर में निजी क्षेत्र में दिए जा रहे बेहद आकर्षक वेतन को देखते हुुए संघ का सुझाव है कि सबसे निचली श्रेणी में भी पत्रकारों के लिए वेतन निर्धारण कम से कम चालीस हजार रूपये मासिक होना चाहिए। हर श्रेणी में महंगाई भत्ते का शतप्रतिशत विलय के साथ ही समय-समय पर इसे `रिवाइज` करने की सुविधा हो तथा महंगाई भत्ता सरकारी कर्मचारियों को देय भत्ते से किसी भी कीमत पर कम नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार हाउसरेंट एलाउंस, मूल वेतन का 35 प्र्रतिशत, सिटी कम्पनसेटरी एलाउंस कम से कम एक हजार रूपये, मेडिकल एलाउंस पांच हजार रूपये मासिक तथा कन्वेंस एलाउंस भी कम से कम पांच हजार रूपये मासिक तय किया जाना चाहिए। जो कर्मचारी रात के समय ड्यूटी करते हों, उन्हें सब्सीडाइज्ड कैंटीन सुविधा अथवा 200 रूपये मील एलाउंस एवं 100 रूपये मासिक चायपान एलाउंस दिया जाए।

हर कर्मचारी को कम से कम 20 लाख रूपये का बीमा कवर मिले और इसका प्रीमियम प्रबंधन द्वारा भुगतान किया जाएं। इसके अलावा कर्मचारियों को चिकित्सा बीमा सुविधा पूरे जीवनकाल के लिए मिले और इसका प्रीमियम जिला श्रम अधिकारी के जरिए प्रबंधन द्वारा भरा जाए तथा नौकरी जाने अथवा सेवानिवृत्ति पर इसकी प्रीमियम राशि का भुगतान सरकार द्वारा हो।

संघ ने पत्रकारोंं के बच्चों की शिक्षा, गम्भीर बीमारी के लिए ईलाज, उनके सभी आश्रितों के लिए चिकित्सा सुविधा, असुरक्षित क्षेत्रों में काम करने पर रिस्क एरिया एलाउंस, जैसी मांगों को भी वेजबोर्ड के सामने पूरी ताकत से रखा है। उसने कहा है कि वेजबोर्ड इस तरह की व्यवस्था करे, ताकि उसकी लागू सिफारिशों को हर पांच साल में हर श्रेणी में अपने आप पचास प्रतिशत बढ़ा दिया जाए। उनसे यह भी आग्रह किया गया कि वह अपना कार्यकाल मई 2010 में पूरा होने तक सरकार को सिफारिशें सौंप दें और इसे एक जनवरी 2008 से लागू करने का सुझाव सरकार को दे, ताकि इसमें और अधिक विलंब नहीं हो।

श्रीराम चौरे का निधन

श्रीराम चौरे का निधन

जबलपुर। मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय के सेवानिवृत अतिरिक्त रजिस्टार, सत्य साई सेवा समिति के संस्थापक सदस्य, नार्मदीय ब्राम्हण समाज के वरिष्ठ नागरिक और श्री राजेन्दे चौरे तथा श्री विजय चौरे के पिता तथा ब्लाग में आवाज से रूबरू कराने वाले पाडकास्ट के संचालक श्री गिरीश बिल्लौरे के दादा जी वयोवृद्ध श्री श्रीराम चौरे का दुधद निधन नागपुर में हो गया है। वे 90 वर्ष के थे। उनकी अन्तिम यात्रा उनके निज निवास 659 ए, दुगाZ कालोनी, संजीवनी नगर, गढा से 03 मार्च को प्रात: साढे आठ बजे ग्वारीघाट मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान करेगी। हम सभी उनकी आत्मा की शान्ति और परिजनों को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से कामना करते हैं।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

एआईआर में अपने हो गए पराए

एआईआर में अपने हो गए पराए
ऑल इण्डिया रेडियो मानता है नेपाली को विदेशी भाषा
(लिमटी खरे)

आज के दौडते भागते युग में देश के बारे में बच्चों और युवा होती पीढी का सामान्य ज्ञान काफी हद तक कमजोर माना जा सकता है। देश में कितने राज्य और उनकी राजधानियों के बारे में सत्तर फीसदी लोगों को पूरी जानकारी न हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किस सूबे की आधिकारिक भाषा क्या है, इस बात की जानकारी युवाओं को तो छोडिए भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मन्त्रालय के आला अधिकारियों को भी नहीं है।
सििक्कम भारत देश का हिस्सा है। चीन भी इस बात तो स्वीकार कर चुका है, कि सििक्कम भारत गणराज्य का ही एक अंग है। भारत गणराज्य के सूचना प्रसारण मन्त्रालय और प्रसार भारती के अधीन काम करने वाला ऑल इण्डिया रेडियो (एआईआर) इस राय से इत्तेफाक रखता दिखाई नहीं देता है। एआईआर की विदेश प्रसारण सेवा में एआईआर को आज भी विदेशी भाषा का दर्जा दिया गया है, जबकि सििक्कम की आधिकारिक भाषा नेपाली ही है। इतना ही नहीं 1992 में संविधान की आठवीं अनुसूची में नेपाली को शामिल किया जा चुका है। एआईआर की हिम्मत तो देखिए इसकी अनदेखी कर एक तरह से एआईआर द्वारा संविधान की ही उपेक्षा की जा रही है।
भारत गणराज्य के गणतन्त्र की स्थापना के साथ ही 1950 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में विदेशों में कल्चर प्रोपोगण्डा करने की गरज से विदेश प्रसारण सेवा का श्रीगणेश किया गया था। इस सेवा का कूटनीतिक महत्व भी होता था, इसमें विदेश प्रसारण सेवा के तहत वहां बोली जाने वाली भाषा में प्रोग्राम का प्रसारण किया जाता था। एआईआर ने वहां की भाषा के जानकारों की अलग से नियुक्ति की थी।
मजे की बात तो यह है कि विदेश प्रसारण सेवा में काम करने वाले अधिकारियों कर्मचारियों के वेतन भत्ते और सेवा शतेंZ भारत में काम करने वाले कर्मचारियों से एकदम अलग ही होते हैं। 50 के दशक में जिन देशोें को विदेश प्रसारण सेवा के लिए चििन्हत किया था, उनमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, आस्ट्रेलिया, ईस्ट और वेस्ट आफ्रीका, न्यूजीलेण्ड, मारीशस, ब्रिटेन, ईस्ट और वेस्ट यूरोप, नार्थ ईस्ट, ईस्ट एण्ड साउथ ईस्ट एशिया, श्रीलंका, म्यामांर, बंग्लादेश आदि शामिल थे।
एआईआर द्वारा नेपाली भाषा को विदेशी भाषा का दर्जा दिए जाने के बावजूद भी अनियमित (केजुअल) अनुवादक और उद्घोषकों को भारतीय भाषा के अनुरूप भुगतान किया जा रहा है, जो समझ से परे ही है। बताते हैं कि कुछ समय पहले केजुअल अनुवादक और उद्घोषकों द्वारा भुगतान लेने से इंकार कर दिया गया था। बाद में समझाईश के बाद मामला शान्त हो सका था।
उधर पडोसी मुल्क नेपाल जहां की आधिकारिक भाषा नेपाली ही है, ने भारत के ऑल इण्डिया रेडियो के इस तरह के कदम पर एआईआर के मुंह पर एक जबर्दस्त तमाचा जड दिया है। नेपाल में उपराष्ट्रपति पद की शपथ परमानन्द झा द्वारा हिन्दी में लेकर एक नजीर पेश कर दी। इतना ही नहीं नेपाल सरकार ने एक असाधारण विधेयक पेश कर लोगों को चौंका दिया हैै। इस विधेयक में देश के महामहिम राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद की शपथ मातृभाषा में लिए जाने का प्रस्ताव दिया गया था।
अब सवाल यह उठता है कि 1992 में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के 18 साल बाद भी इस मामले को लंबित कर लापरवाही क्यों बरती जा रही है। यह अकेला एसा मामला नहीं है, जबकि हिन्दी को मुंह की खानी पडी हो। वैसे भी हिन्दी देश की भाषा है। लोगों के दिलोदिमाग में बसे महात्मा गांधी, पहले प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज तक के निजाम हिन्दी को प्रमोट करने के नारे लगाते आए हैं, पर हिन्दी अपनी दुर्दशा पर आज भी आंसू बहाने पर मजबूर है।
लोग कहते हैं कि दिल्ली हिन्दी नहीं अंग्रेजी में कही गई बात ही सुनती है। हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन के लिए अब तक करोडों अरबोें रूपए खर्च किए जा चुके हैं, दूसरी ओर सरकारी तन्त्र द्वारा हिन्दी को ही हाशिए पर लाने से नहीं चूका जाता है। हिन्दी भाषी राज्यों में ही हिन्दी की कमर पूरी तरह टूट चुकी है। ईएसडी के प्रोग्राम में ``प्रेस रिव्यू`` नाम का प्रोग्राम होता है। इसमें भारतीय अखबारों में छपी खबरों और संपादकीय का जिकर किया जाता है। विडम्बना देखिए कि इसमें हिन्दी में छपे अखबरों को शामिल नहीं किया जाता है। यद्यपि एसा कोई नियम नहीं है कि इसमें सिर्फ आंग्ल भाषा में छपे अखबारों का ही उल्लेख किया जाए पर यह हिन्दुस्तान है मेरे भाई और यहां अफसरों की मुगलई चलती आई है, और आगे भी अफसरशाही के बेलगाम घोडे अनन्त गति से दौडते ही रहेंगे।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

पेंच में हुआ 40 लाख का बन्दरबांट

पेंच में हुआ 40 लाख का बन्दरबांट

अति सुरक्षि पेंच नेशनल पार्क से चोरी हुए ट्रिप केमरे

(लिमटी खरे)

सिवनी। वन्य जीवों पर नज़र रखने के लिए मंहगे ट्रिप केमरे ही सिवनी जिले के पेंच नेशनल पार्क से चोरी कर लिए गए हैं। देहरादून से बुलवाकर पेंच में स्थापित किए गए ट्रिप केमरों में से पांच केमरे जगह से नदारत पाए गए हैं। इसकी बाकायदा पुलिस में सूचना भी दजZ की गई है। पिछले एक असें से चर्चा में आए पेंच नेशनल पार्क में नित नई घटना घट रही है। यहां पदस्थ वन विभाग के मुलाजिम अपने कर्तव्यों और वन्य जीवों के प्रति कितने संवेदनशील हैं, इस बात का प्रमाण आए दिन यहां होने वाले वन्य जीवों के शिकार से मिलता है। पिछले दिनों यहां एक नर बाघ की मौत का मामला विधानसभा में भी गूंजा था। जिला मुख्यालय सिवनी की विधानसभा सीट पर भाजपा से चुनाव जीतीं परिसीमन में समाप्त हुई सिवनी लोकसश की अन्तिम सांसद श्रीमति नीता पटेरिया ने यह प्रश्न उठाया था, तब वन मन्त्री सरताज सिंह ने प्रबंधन की लापरवाही से साफ इंकार किया था। बाद में वन मन्त्री के सदन में दिए बयान की हवा उस वक्त निकल गई जब उक्त बाघ की बिसरा रिपोर्ट में यह साफ हुआ कि उक्त बाघ की मौत सामान्य नहीं थी, वरन उसे जहर देकर मारा गया था। इसके पहले यहां शावकों की मौत पर भी हाय तौबा मची थी। सवाल यह उठता है कि जिस राष्ट्रीय उद्यान की सुरक्षा के लिए वहां सुरक्षा बल मौजूद हो, जहां यह दावा किया जाता हो कि यहां परिन्दा भी पर नहीं मार सकता है, वहां शिकारी आकर सरेआम शिकार कर रहे हों, वन्य संपदा की कटाई चरम पर हो तब यही कहा जा सकता है कि जब समूचे कुंए में ही भांग घुली ह® तब क्या किया जा सकता है। गौरतलब है कि इस नेशनल पार्क के रखरखाव, देखरेख और वन्य संपदा और जीवों की हिफाजत का जिम्मा मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारी डॉ. के. नायक और वनमण्डलाधिकारी स्तर के अधिकारी ओम प्रकाश तिवारी के मजबूत कांधों पर सौंप रखा है। क्षेत्र में चल रही चर्चाओं के अनुसार जबसे उक्त अधिकारीद्वय ने यहां कार्यभार सम्भाला है तब से पेंच नेशनल पार्क के वन्यजीव अपने आप को बुरी तरह असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। बताया जाता है कि इनके कार्यकाल में अब तक तीन बाघ और दो शावक असमय ही काल कलवित हो चुके हैं। इस चमत्कार के बाद वित्तीय वर्ष 2009 - 2010 के अन्तिम दिन आनन फानन 40 लाख रुपए के धनादेश (चेक) काट दिए गए हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार नियमानुसार काम पूरा होने पर वर्क वेरीफिकेशन सर्टिफिकेट जारी होने के उपरान्त ही धनादेश जारी किए जाते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां पदस्थ सात में से छ: वनपालों के बीच 40 लाख रुपए की राशि के चेक एक ही दिन में काट दिए गए हैं। बताया जाता है कि इस वित्तीय वर्ष में पांच तालाब और कुछ बििल्डंग के निर्माण हेतु यह राशि जारी की गई है। सूत्र बताते हैं कि उक्त राशि पिछले साल जुलाई माह में पेंच नेशनल पार्क सिवनी को आवंटित कर दी गई थी, बावजूद इसके अभी तक इस राशि की मद में कोई काम संपन्न नहीं हो सका है। जानकारों का मानना है कि अब जब रेंजर्स के पास राशि आ गई है, तब वे इस राशि को किस मद में फूंकेगे यह कहा नहीं जा सकता है। अमूमन काम पूरा होने पर उसकी गुणवत्ता को देखने के बाद ही राशि जारी की जाती है, मगर इस मामले में यह नहीं कहा जा सकता है कि यह काम गुणवत्ता के साथ होगा या होगा भी या नहीं, हो सकता है काम कराए बिना ही राशि बिना डकार के पचा ली जाए।

शिक्षा को अनिवार्य कैसे किया जाएगा!

शिक्षा को अनिवार्य कैसे किया जाएगा!

पैसेजंर फाल्ट की तर्ज पर लागू करना होगा कानून
 
भय बिन न प्रीत हो गोसाईं
 
(लिमटी खरे)

एक अप्रेल का दिन बचपन से ही अप्रेल फूल बनाने के नाम से जाना जाता रहा है। इस दिन जो चाहे झूट सच बोला जाए, सब कुछ माफ ही होता है। इस दिन किए गम्भीर से गम्भीर मजाक को भी माफ ही कर दिया जाता है। सरकार ने इसी दिन से अनिवार्य शिक्षा कानून लागू करने की घोषणा की है। यह बात मजाक है या सच इस बारे में तो सरकार ही जाने पर आम जनता जरूर इसे मजाक के तौर पर ही ले रही है।
शिक्षा आदि अनादिकाल से ही एक बुनियादी जरूरत समझी जाती रही है। पहले गुरूकुलों में बच्चों को व्यवहारिक शिक्षा देने की व्यवस्था थी, जो कालान्तर में अव्यवहारिक शिक्षा प्रणाली में तब्दील हो गई। आजाद भारत में शासकों ने अपनी मर्जी से शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। अब शिक्षा जरूरत के हिसाब से नहीं वरन् सत्ताधारी पार्टी के एजेण्डे के हिसाब से तय की जाती है। कभी शिक्षा का भगवाकरण किया जाता है, तो कभी सामन्ती मानसिकता की छटा इसमें झलकने लगती है।
वर्तमान में अनिवार्य शिक्षा के कानून में 6 से 14 साल के बच्चे को अनिवार्य शिक्षा प्रवेश, पहली से आठवीं कक्षा तक अनुर्तीण करने पर प्रतिबंध, शारीरिक और मानसिक दण्ड पर प्रतिबंध, शिक्षकों को जनगणना, आपदा प्रबंधन और चुनाव को छोडकर अन्य बेगार के कामों में न उलझाने की शर्त, निजी शालाओं में केपीटेशन फीस पर प्रतिबंध, गैर अनुदान प्राप्त शालाओं के लिए अपने पडोस के मोहल्लों के न्यूनतम 25 फीसदी बच्चों को अनिवार्य तौर पर नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है।
जिस तरह लोगों को आज इतने समय बाद भी रोजगार गारंटी कानून के बारे में जानकारी पूरी नहीं हो सकी है, उसी तरह आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून टॉय टॉय फिस्स हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस नए कानून से किसी को राहत मिली हो या न मिली हो कम से कम गुरूजन तो मिठाई बांट ही रहे होंगे क्योंकि उन्हें शिक्षा से इतर बेगार के कामों में जो उलझाया जाता था, उससे उन्हें निजात मिल ही जाएगी। अब वे धूप में परिवार कल्याण और पल्स पोलियो जैसे अभियानों में चप्पल चटकाने से बच सकते हैं।
लगता है अनिवार्य शिक्षा कानून का मसौदा केन्द्र में बैठे मानव संसाधन विकास मन्त्री कपिल सिब्बल ने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली सहित अन्य महानगरों और बडे शहरों को ध्यान में रखकर बनाया है। इसमें शाला की क्षमता के न्यूनतम 25 फीसदी उन छात्रों को निशुल्क शिक्षा देने की बात कही गई है, जो गरीब हैं। हाल ही में स्वास्थ्य महकमे में दिल्ली की स्वास्थ्य मन्त्री किरण वालिया ने ही बताया था कि दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में पिछले पांच सालों में महज पांच गरीबों का ही इलाज हो सका है। जब देश के नीति निर्धारकों की जमात के स्थल पर ही इस तरह की व्यवस्थाएं फल फूल रही हों तब बाकी की कौन कहे। आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून की धज्जियां अगर उडती दिख जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
अगर देखा जाए तो मानक आधार पर कमोबेश हर शाला भले ही वह सरकारी हो या निजी क्षेत्र की उसमें बुनियादी सुविधाएं तो पहले दिन से ही और न्यूनतम अधोसंरचना विकास का काम तीन साल में उलब्ध कराना आवश्यक होता है। इसके अलावा पुरूष और महिला शिक्षक के लिए टीचर्स रूम, अलग अलग शौचालय, साफ पेयजल, खेल का मैदान, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, बाउण्ड्रीवाल और फेंसिंग, किचन शेड, स्वच्छ और हवादार वातावरण होना आवश्यक ही होता है।
छात्रों के साथ शिक्षकों के अनुपात में अगर देखा जाए तो सीबीएसई के नियमों के हिसाब से एक कक्षा में चालीस से अधिक विद्याथियों को बिठाना गलत है, फिर भी सीबीएसई से एफीलेटिड शालाओं में सरेआम इन नियमों को तोडा जा रहा है। शिक्ष्कों के अनुपात मे मामले में अमूमन साठ तक दो, नब्बे तक तीन, 120 तक चार, 200 तक पांच शिक्षकों की आवश्यक्ता होती है।
अपने वेतन भत्ते और सुविधाओं में जनता के गाढे पसीने की कमाई खर्च कर सरकारी खजाना खाली करने वाले देश के जनसेवकों ने अब देश का भविष्य गढने की नई तकनीक इजाद की है। अब किराए के शिक्षक देश का भविष्य तय कर रहे हैं। कल तक पूर्णकालिक शिक्षकों का स्थान अब अंशकालीन और तदर्थ शिक्षकों ने ले लिया है। निजी स्कूल तो शिक्षकों का सरेआम शोषण कर रहे हैं। अनेक शालाएं एसी भी हैं, जहां शिक्षकों को महज 500 रूपए की पगार पाकर 2500 रूपए पर दस्तखत कर रहे हैं।
बहरहाल सरकार को चाहिए कि इस अनिवार्य शिक्षा कानून में संशोधन करे। इसमें भारतीय रेल, दिल्ली परिवहन निगम और महाराष्ट्र राज्य सडक परिवहन की तर्ज पर पैसेंजर फाल्ट सिस्टम लागू किया जाना चाहिए। जिस तरह इनमें सफर करने पर टिकिट लेने की जवाबदारी यात्री की ही होती है। चेकिंग के दौरान अगर टिकिट नहीं पाया गया तो यात्री पर भारी जुर्माना किया जाता है। उसी तर्ज पर हर बच्चे के अभिभावक की यह जवाबदारी सुनिश्चत की जाए कि उसका बच्चा स्कूल जाए यह उसकी जवाबदारी है। निरीक्षण के दौरान अगर पाया गया कि कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता है तो उसके अभिभावक पर भारी पेनाल्टी लगाई जानी चाहिए। सरकार द्वारा सर्वशिक्षा अभियान, स्कूल चलें हम, मध्यान भोजन आदि योजनाओं पर अरबों खरबों रूपए व्यय किए जा चुके हैं, पर नतीजा सिफर ही है। निजाम अगर वाकई चाहते हैं कि उनकी रियाया पढी लिखी और समझदार हो तो इसके लिए उन्हें वातानुकूलित कमरों से अपने आप को निकालकर गांव की धूल में सनना होगा तभी अतुल्य भारत की असली तस्वीर से वे रूबरू हो सकेंगे।

राजमाता फेंट सकतीं हैं अपने पत्ते

राजमाता फेंट सकतीं हैं अपने पत्ते
टीम सोनिया के पुर्नगठन की सुगबुगाहट
एक व्यक्ति एक पद का सिद्धान्त हो सकता है लागू
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 01 अप्रेल। ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) में फेरबदल की सुगबुगाहटें तेज हो गईं हैं। आने वाले समय में एआईसीसी में नए चेहरे आमद दे सकते हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी पर बढते दवाब के चलते वर्तमान में सत्ता और संगठन की जवाबदारी सम्भालने वाले अनेक नेताओं को एक पद खोना पड सकता है। एआईसीसी में अनेक नेताओं ने पदोन्नती की आस में ही अपने बाल सफेद कर लिए हैं। यही कारण है कि कांग्रेस के अखिल भारतीय कार्यालय 24 अकबर रोड में अब रोष और असन्तोष का तापमान दिनोन्दिन बढता ही प्रतीत हो रहा है।
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र 10 जनपथ के सूत्रों का दावा है कि पार्टी में आनन फानन फेरबदल की आवश्यक्ता इसलिए पडने लगी है, क्योंकि आलाकमान पर एक व्यक्ति एक पद के सिद्धान्त को लागू करने का दवाब बढता ही जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी के ही एक ताकतवर पदाधिकारी द्वारा महाभारत के अर्जुन के तरह अपने निशाने को साधा जा रहा है। कल तक सत्ता के गलियारे में ताकतवर रहे और फिर चन्द सालों के लिए सत्ता के बियावन से बाहर हुए राजनेता द्वारा इस तरह का तानाबाना बुना जा रहा है ताकि सत्ता और संगठन दोनों ही में मलाई काट रहे नेताओं के एक हाथ से लड्डू छुडा लिया जाए। वर्तमान में नारायण सामी, जयराम रमेश, पृथ्वीराज चव्हाण, गुलाम नवी आजाद, मुकुल वासनिक, वीरप्पा मोईली आदि के पास संगठन के साथ ही साथ सत्ता के पद भी हैं।
सूत्रों ने आगे बताया कि आलाकमान के निर्देश पर गुलाम नवी आजाद को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने कमरे में करण सिंह के लिए स्थान बनाएं तो मोईलो को मणिशंकर अय्यर के लिए कमरा खाली करने को कहा गया है। गौरतलब है कि मन्त्रीपद की शपथ लेने के उपरान्त इन मन्त्रियों ने शायद ही कभी एआईसीसी मुख्यालय की ओर रूख किया हो। सूत्रों ने बताया कि आलाकमान को मिली शिकायतों में कहा गया है कि कार्यकर्ता जब भी इनसे संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें काफी मशक्कत करनी होती है। पार्टी के अदने से सिपाहियों को इन मन्त्रियों के बंग्लों से दुत्कार कर भगा दिया जाता है।
कमोबेश यही आलम पार्टी के सचिवों का है। पार्टी में अनेक सचिव एसे हैं जो सालों से कुर्सी पर चिपक कर रह गए हैं। टाम वडाक्कन एसी शिख्सयत है, जो पार्टी के मीडिया प्रभाग से तब से जुडे हुए हैं जबसे श्रीमति सोनिया गांधी अध्यक्ष पद पर काबिज हुईं हैं। पार्टी में सचिव वडाक्कन के अलावा इरशाद बघेल, प्रवीर डावर, अनीस दुर्रानी, इमरान किदवई, मेजर वेदप्रकाश आदि सालों से पदोन्नति की बाट ही जोह रहे हैं। जब भी उपकृत करने की बारी आती है, इनके स्थान पर किसी और को राज्यपाल बना दिया जाता है या राज्य सभा में भेज दिया जाता है, अथवा किसी निगम का अध्यक्ष्ष बना दिया जाता है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि आलाकमान को बताया गया है कि अगर बिना रीढ के लोगों को इसी तरह इनाम दिया जाता रहा तो पार्टी ही की रीढ टूट सकती है। बी.के.हरिप्रसाद और प्रथ्वीराज चाव्हाण जिनका परफारमेंस अब तक ऋणात्मक रहा है, और जो अपने अपने राज्यों में पार्टी को जिला नहीं सके हैं, उन्हें उच्च आसनी दिए जाने से कार्यकर्ता बुरी तरह खफा हैं। कहा जा रहा है कि आलाकमान को कहा गया है कि इन आधार विहीन लोगों को उनके राज्यों में ही पार्टी प्रमुख बनाकर भेजा जा सकता है। वैसे भी वीरप्पा मोईली पर तेलंगाना मुद्दे की गुत्थी उलझाने के आरोप लग रहे हैं।

बुधवार, 31 मार्च 2010

भाई बहन में झगडा कैसा!

भाई बहन में झगडा कैसा! 
कांग्रेसी ही बढा रहे गांधी बच्चन परिवार में दूरियां
अहम में से `अ` को अलग करें सोनिया
(लिमटी खरे)

पिछली शताब्दी में रूपहले पर्दे के महानायक रहे बच्चन  और राजनीति के सिरमौर रहे नेहरू गांधी परिवार के बीच खटास गहराती ही जा रही है। एक समय एक दूसरे के पूरक समझे जाने वाले दोनों ही परिवार इक्कसवीं सदी में एक दूसरे के खून के प्यासे ही दिख रहे हैं, भले ही अन्दर से दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति सम्मान और प्यार बना हो पर परिदृश्य में उकरे चित्रों को देखकर यह माना जा सकता है कि दोनों एक दूसरे को पसन्द तो कतई नहीं कर रहे हैं।
बच्चन परिवार की बहू और गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री जया बच्चन जब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को कोसती नज़र आतीं हैं, और मीडिया जब इस बात को तूल देता है तब अमिताभ आगे आकर दोनों ही परिवारों के पुराने संबन्द्धों के चलते इस विवाद का शमन करते नज़र आते हैं। अमिताभ अपनी अर्धांग्नी जया के बारे में यह कह देते हैं कि जया को नहीं पता कि बच्चन और गांधी परिवार की नजदीकियां कितनी हैं, जया नासमझ हैं।
बच्चन और गांधी परिवार की नजदीकियों को समझने के लिए कुछ पन्ने पलटाने ही पडेंगे। पूर्व प्रधानमन्त्री प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इन्दिरा गांधी के नौरत्नों में से एक रत्न हरिवंश राय बच्चन भी हुआ करते थे। इसके बाद अगली पीढी में अमिताभ बच्चन और स्व.राजीव गांधी गलबहियां कितनी सशक्त थीं यह बात सभी बेहतर तरीके से जानते हैं।
दोनों ही परिवार कितने करीब थे इसका प्रमाण इटली मूल की सोनिया एन्टोनिया माईनो (सोनिया गांधी का असली नाम) का राजीव गांधी की अर्धांग्नी बनने का किस्सा ही है। जब सोनिया और राजीव गांधी के विवाह की बारी आई तब राजीव गांधी बरात लेकर अमिताभ बच्चन के घर ही गए थे। सोनिया का कन्यादान भी तेजी बच्चन के हाथों हुआ था। तेजी बच्चन भले ही सोनिया के लिए देवकी (पाउलो अर्थात सोनिया की असली माता) न हों पर यशोदा की भूमिका में तो नज़र आईं। इस लिहाज से अमिताभ बच्चन और सोनिया गांधी भाई बहन ही हुए।
9 दिसम्बर 1946 को इटली के ओवासांजो में जन्मी स्टीफनो मानियो और पाउलो की पुत्री सोनिया को भारतीय संस्कारों के बारे में जो जानकारी मिली वह उनके विवाह के उपरान्त ही मिली। भारत में भगवान कृष्ण के लालन पालन और संस्कारित करने के लिए हर पल यशोदा का नाम ही सामने आता है। उन्हें जन्म देने वाली माता देवकी को लोग गाहे बेगाही ही याद करते होंगे। इसी तरह पाउलो के बजाए सोनिया के लिए तेजी बच्चन और उनके परिवार का सम्मान ज्यादा जरूरी होना चाहिए। अमिताभ उनके भाई हुए, राजनीति में भाई भाई का नहीं होता है, यह कहावत यहां चरितार्थ होती दिख ही रही है।
एक समय अपने बाल सखा और सोनिया के पति राजीव गांधी को स्पष्ट बहुमत दिलाने के लिए अमिताभ भी राजनीति के कीचड में उतरे थे। वे इलहाबाद से संसद सदस्य बने, पर जब उन्हें लगा कि इस तरह की राजनीति से उनकी एंग्री यंग मेन और सुपर स्टार वाली छवि मटियामेट हो सकती है, उन्होंने तत्काल इस तरह की राजनीति से तौबा कर ली। इसके बाद एबीसीएल नामक कंपनी के गर्त में जाने के बाद अमिताभ टूट से गए थे। इस समय उनके लिए तारणहार बनकर आए थे, अमर सिंह। कहते हैं कि अमर सिंह ने सुब्रत राय सहारा आदि के माध्यम से अमिताभ को आर्थिक इमदाद मुहैया करवाई थी, जिससे अमिताभ फिर से सामान्य हो सके। यही कारण है कि अमिताभ ने बरास्ता अमर सिंह, मुलायम और समाजवादी पार्टी के प्लेटफार्म पर अपनी रेल लगा दी थी।
राजनीति के शातिर किन्तु छिछोरे खिलाडी अमर सिंह ने अपनी दोधारी चालों से बच्चन और गांधी परिवार के बीच पक रही सुगंधित खीर में निब्बू निचोडना आरम्भ कर दिया। नीबू की बून्दो से खीर का दूध फट गया और कालान्तर में केसर और अन्य मावों की सुगंध धीरे धीरे दुर्गन्ध में तब्दील हो गई। हद तो तब हो गई जब देश की व्यवसायिक राजधानी मुम्बई में बान्द्रा सीलिंक के दूसरे चरण के उद्घाटन मेें सदी के महानायक की उपस्थिति को लेकर बवाल कटा।
कांग्रेस के सिपाहसलार इस मामले में अपना दामन पाक साफ बताने के लिए तरह तरह के जतन करने लगे। यहां तक कि मुख्यमन्त्री अशोक चव्हाण ने बयान दे दिया कि यदि उन्हें अमिताभ की मौजूदगी पूर्व जानकारी होती तो वे वहां नहीं जाते। कांग्रेस के आलाकमान को चाहिए कि चव्हाण के इस बयान पर ही उनसे त्यागपत्र मांग लें। मामला अमिताभ की मौजूदगी का नहीं मामला चव्हाण की बयानबाजी का है। क्या एक सूबे के निजाम को यह पता नहीं होता कि जिस प्रोग्राम में वह शिरकत करने जा रहा है वहां कौन कौन से अतिथि आमन्त्रित होंगे। अगर एसा है तो एसे मिट्टी के माधव के हाथों देश के इतने बडे सूबे की कमान किस योग्यता के आधार पर अब तक सौंपी हुई है।
अमिताभ की मौजूदगी को लेकर जिन कांग्रेसियों के पेट में मरोड हो रही है, वे सभी अब मुम्बई के प्रोग्राम के बजाए अमिताब के द्वारा गुजरात के ब्राण्ड एम्बेसेडर होने पर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं। सदी का महानायक अगर किसी प्रोग्राम में शिरकत करने पहुंच भी गया तो क्या सूबेे निजाम अशोक चव्हाण में इतनी नैतिकता भी नहीं बची कि वह राष्ट्रनायक की मौजूदगी को तर्क या कुर्तक के जरिए सही साबित कर आलोचकों के मुंह पर अलीगढ के ताले जड दे।
यह भी तय है कि सोनिया एन्टोनिया माईनो एवं गांधी परिवार के अन्य सदस्यों को अमिताभ की वहां उपस्थिति से कोई अन्तर नहीं पडा होगा। सोनिया और राहुल गांधी के अब तक के कदमताल से साफ हो जाता है कि वे दोनों कभी भी अमिताभ बच्चन या उनके परिवार को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तरीके से अपमानित करने का विचार भी मन में नहीं ला सकते हैं। फिर कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनू सिंघवी भी कह रहे हैं कि आलाकमान अर्थात कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने कभी भी अमिताभ बच्चन से दूरी बनाने के कोई निर्देश नहीं दिए हैं।
इसके बाद अर्थ अवर के दौरान दिल्ली में अमिताभ बच्चन के सुपुत्र अभिषेक बच्चन को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाया जाना भी चर्चाओं का हिस्सा बन गया। चव्हाण के राग मल्हार को आगे बढाते हुए दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित ने भी अपने हाथ झाडते हुए यह कह दिया कि उन्हें भी अभिषेक के एम्बेसेडर होने की जानकारी कतई नहीं है। सवाल यह उठता है कि कांग्रेस के दो मुख्यमन्त्री इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान दे रहे हों और आलाकमान धृतराष्ट्र तो विपक्ष दल चीर हरण के दौरान गुरू द्रोणाचार्य की भूमिका में हों तब बेचारी द्रोपदी (देश की निरीह जनता) की लाज बचाने भगवान कन्हैया कहां से आ पाएंगे।
बहरहाल तेजी बच्चन की मानस बेटी बन चुकीं सोनिया गांधी 28 फरवरी 1968 को हरिवंश राय बच्चन के घर में ही राजीव गांधी की हुईं थीं। अमिताभ बच्चन उनके सगे भाई तो नहीं पर अग्रज से बढकर हैं। राजीव गांधी और अमिताभ के दोस्ती के किस्से मशहूर हैं। आज राजीव गांधी नहीं हैं, तो इन दोनों ही परिवारों के बीच घुलती खटास को समाप्त करने की जवाबदारी सोनिया की ही है। विडम्बना है कि सोनिया ने भारत की इस संस्कृति को समझ ही पाया है कि अहम में से अगर `अ` निकाल दिया जाए तो वह हम में तब्दील हो जाता है। हमारी निजी राय में सोनिया को आगे आना चाहिए और उनके भाई अमिताभ पर हो रहे इस तरह के हमलों को रोकने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को निर्देश देना होगा। दलगत राजनीति अपनी जगह है, पर सत्ता पाने और खबरों में बने रहने के लिए पारिवारिक विघटन होगा और नैतिकता का क्षरण होने लगा तो आने वाले समय में भारत का राजनैतिक परिदृश्य सुनहरा के बजाए बदबू मारते कीचड से सना ही नज़र आएगा।

सिवनी जिला थर्ड ग्रेड के शहरों में शामिल!


सिवनी जिला थर्ड ग्रेड के शहरों में शामिल!

मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां 1 अप्रेल से बन्द करेंगी ब्राडबेण्ड सुविधा

बीएसएनएल की चलेगी मोनोपल्ली

फोरलेन के चलते आईं हैं मोबाईल कंपनियां

(लिमटी खरे)

सिवनी 31 मार्च। आईडिया, रिलायंस, एयरटेल, टाटा आदि जैसी नामी गिरामी कंपनियों ने राजस्व के मामले में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले को थर्ड ग्रेड (सी ग्रेड) के जिलों की सूची में सिवनी जिले को शामिल कर दिया है। 1 अप्रेल से सिवनी में मोबाईल के क्षेत्र में निजी सेवा प्रदाता कंपनियों ने इस जिले में ब्राड बेण्ड की सुविधा अवरूद्ध करने का निर्णय लिया है। एक अप्रेल के उपरान्त जिले में इंटरनेट की ब्राड बेण्ड सेवा सिर्फ और सिर्फ भारत संचार निगम लिमिटेड द्वारा ही निबाZध रूप से प्रदाय की जाएगी।

गौरतबल है कि 2003 के उपरान्त सिवनी जिले में बीएसएनएल के अलावा शेष मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने एकाएक निवेश करना आरम्भ कर दिया था। रिलायंस, टाटा, आईडिया, एयरटेल आदि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने सिवनी जिले में आमद दी और उपभोक्ताओं को नेटवर्क देने की गरज से यहां अपने अपने मोबाईल टावर और रिटेल आउटलेट स्थापित करना आरम्भ किए। जिले में एकाएक लोगों का मोबाईल प्रेम जागा। आलम यह है कि अब कमोबेश हर हाथ में एक मोबाईल और आधे से ज्यादा लोगों के पास दो से अधिक मोबाईल दिख ही जाते हैं।

सिवनीवासी आश्चर्यचकित थे कि आखिर मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को क्या सूझी कि वे बिना किसी सर्वे के ही सिवनी में आकर कूद गईं। रिलायंस कंपनी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को सिवनी से कोई विशेष लगाव या दिलचस्पी नहीं है, दरअसल सिवनी का यह सौभाग्य है कि यह स्विर्णम चतुभुZज के उत्तर दक्षिण गलियारे पर अवस्थित है। चूंकि कंपनियों को चतुभुZज और इसके अंगों पर निबाZध तौर पर मोबाईल सेवा उपलब्ध कराना है, इसीलिए सिवनी में नामी गिरामी मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों द्वारा अपना नेटवर्क उपलब्ध कराया गया है। एक पन्थ दो काज की दृष्टि से कंपनियों ने यहां इंटनेट सुविधा भी मुहैया करवाई थी। बाद में राजस्व के नज़रिए से उन्हें घाटा दिखाई पडने लगा।

प्राप्त जानकारी के अनुसार निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियों को सिवनी जिले से वांछित राजस्व न मिल पाने से क्षुब्ध होकर इन कंपनियों ने सिवनी जिला वासियों को सबक सिखाने की सोची है। सम्भवत: यही कारण है कि इन सेवा प्रदाता कंपनियों द्वारा पूर्व में इंटरनेट सुविधा, फिर हाई स्पीड और अब ब्राडबेण्ड सुविधा प्रदान की गई है, जिसमें से ब्राड बेण्ड सुविधा को वापस लेने का निर्णय लिया गया है।

उधर दूसरी और जिलावासियों ने इन कंपनियों को हाथों हाथ इसलिए भी लिया था क्योंकि बीएसएनएल का नेटवर्क सदा ही माशाअल्लाह मिलता था। लोग तो यहां तक कहने लगे थे कि बीएसएनल का तातपर्य ``भीतर से नहीं लगता`` या ``भूले से नहीं लगता`` हो गया है। आज भी आलम यह है कि शहर के अन्दर ही अगर आमने सामने बैठकर एक दूसरे का बीएसएनएल का नंबर मिलाया जाए तो आउट ऑफ कवरेज एरिया का टेप सुनाई पड जाता है। जबलपुर रोड पर स्थित क्षेत्रीय परिवहन कार्यलय में तो इसका नेटवर्क भूले से नहीं मिल पाता है। अब इन कंपनियों के ब्राडबेण्ड के क्षेत्र में मैदान से हटने के उपरान्त अब बीएसएनएल के ब्राडबेण्ड के अकेले रह जाने से उसकी मोनोपल्ली बढने की संभावना बढ गई है। इन परिस्थितियों में उपभोक्ताओं को गुणवत्ता के साथ सेवाएं मिल पाएं इसमें शंका ही नज़र आ रही है।

सोमवार, 29 मार्च 2010

नप सकते हैं पीएम इन वेटिंग

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
नप सकते हैं पीएम इन वेटिंग

राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के कतार में रहने वाले प्रधानमन्त्री (पीएम इन वेटिंग) एल.के.आडवाणी पर मुसीबतों का पहाड टूटता दिख रहा है, लगता है सयानी उमर में उनकी मट्टी खराब हो सकती है। अठ्ठारह साल पहले यूपी सूबे में घटी एक घटना आडवाणी के गले की फांस बनती दिख रही है। हाल ही में बाबरी विध्वंस काण्ड के नौवें गवाह के तौर पर पेश हुई 1990 बैच की भारतीय पुलिस सेवा की अधिकारी अंजु गुप्ता ने इस मामले में बयान देकर आडवाणी की पेशानी पर पसीने की बून्दे छलका दी हैं। गुप्ता ने साफ तोर पर इस बात को अपनी गवाही में उकेरा है कि बाबरी ढांचे को गिराने हेतु कार्यकर्ताओं को उकसाने के लिए आग में घी का काम किया था आडवाणी के जोशीले उद्बोधन ने। बाबरी विध्वंस के दौरान फैजाबाद में सहायक पुलिस अधीक्षक रहीं अंजू गुप्ता को आडवाणी की सुरक्षा की जवाबदारी दी गई थी, इस लिहाज से वे पूरे समय आडवाणी के साथ थीं। आडवाणी और अन्य नेताओं के बीच उस दौरान क्या क्या चर्चाएं हुईं, क्या रणनीति बनी वे बेहतर समझ सकतीं हैं। उन्होंने अपने बयान में जो बातें कहीं हैं, वे सम्भवत: बताने योग्य रही होंगी। आडवाणी का कद आज बहुत उंचा है, उन्हें सर उठाकर देखने से किसी की भी टोपी सर से गिर सकती है। इस मान से अंजू गुप्ता ने अनेक बातें छिपाकर भी रखीं होंगी। सवाल यह उठता है कि आखिर अंजू गुप्ता को यह दिव्य ज्ञान कहां से प्राप्त हो गया कि 18 साल बाद वे सच का सामना करने का साहस जुटा सकीं। तत्कालीन एएसपी फैजाबाद अंजू गुप्ता ने 1992 में ही अपनी ही पुलिस के रोजनामचे में इस बात को दर्ज क्यों नहीं कराया! इस मामले में अंजू गुप्ता पर भी अलग से प्रकरण पंजीबद्ध किया जाना चाहिए, कि लोकसेवक होते हुए भी उन्होंने सच्चाई को 18 साल तक छुपाकर रखा।
 
पत्थरों से तुले तोमर
अब तक नेताओं को लड्डू, पेडा, फलों से तुलने की बातें सुनी होंगी, पर किसी नेता को इनके साथ पत्थरों से तुलते देखा है। आपका उत्तर होगा, नहीं। जी हम बताते हैं मध्य प्रदेश में एक बडे नेता के पत्थरों से तुलने का वाक्या। दरअसल भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष रहे नरेन्द्र तोमर को टीम गडकरी में केन्द्रीय और महती जवाबदारी सौंपी गई है। जब नरेन्द्र तोमर भोपाल पहुंचे तो उनके समर्थकों के द्वारा उन्हें लड्डुओं से तोलने का प्रोग्राम तय किया। यह प्रोग्राम मन से किया गया था, या बेमन से इस बात का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तोमर के लड्डुओं से तुलने के बाद एक बुजुर्ग महिला के हाथ पत्थर ही लगे। हुआ यूं कि जब तोमर तुलने के उपरान्त वहां से हटे तो कार्यकर्ताओं ने लड्डू बांटना आरम्भ किया। इसी बीच एक बुजुर्ग महिला ने डलिया में रखे लड्डू उठा लिए, नाराज कार्यकर्ताओं ने उससे लड्डू छुआ लिए। तब उस बुजुर्ग महिला ने अपना हाथ तराजू में रखी बोरी में दे मारा। उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उसने बोरियों में पत्थर रखे पाए। उसने इसकी शिकायत वहां उपस्थित पदाधिकारियों से की। पदाधिकारी भी सन्न रह गए और उन्होंने दबी जुबान से इसकी जांच की बात भी कह दी। अब पता नहीं तोमर को पता चला कि नहीं कि वे लड्डू के बजाए पत्थरों से तुल गए हैं। पता चले भी तो क्या जब किराए के कार्यकर्ताओं से स्वागत कराया जाएगा तो एसा नहीं तो कैसा होगा।

मान गए फोर्टिस अस्पताल को
देश के फाईव स्टार संस्कृति वाले अस्पतालों के द्वारा सरकार के नियम कायदों का किस कदर सरेआम माखौल उडाया जा रहा है, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण राजधानी दिल्ली के जाने माने फोर्टिस अस्पताल की दशा देखकर लगाया जा सकता है, यह दुस्साहस भी तब किया जा रहा है, जब दिल्ली उच्च ने 22 मार्च 2007 को 38 निजी अस्पतालों को अपनी क्षमता के 10 फीसदी बिस्तर गरीब मरीजों के लिए आरक्षित रखने के निर्देश दिए थे। पिछले पांच सालों में राजधानी के फोर्टिस अस्पताल ने महज पांच गरीब मरीजों की तीमारदारी की है। इस लिहाज से एक गरीब मरीज ही एक साल में यहां इलाज करा सका है। अगर यह स्थिति है तो देश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्री गुलाम नबी आजाद को खुशफहमी पाल लेना चाहिए कि करोडों अरबों के टर्नओवर वाले अस्पताल में एक ही गरीब एक साल में आया, मतलब देश के गरीबों में बीमारी ने घर करना बन्द कर दिया है। यह बात हम नहीं दिल्ली सरकार की स्वास्थ्य मन्त्री किरण वालिया कह रहीं हैं। विधानसभा के पटल पर जानकारी देते हुए वालिया ने कहा कि 16 मई 2008 को स्वास्थ्य विभाग के तहत फोर्टिस अस्पताल का पंजीयन कराया गया है। इतना ही नहीं जिस स्थान पर यह अस्पताल संचालित हो रहा है, वह जमीन राजन ढल चैरिटेबल ट्रस्ट को आवंटित है। यह अस्पताल कौन संचालित कर रहा है इस बारे में वालिया मौन हैं, पर हकीकत यह है कि उक्त ट्रस्ट के बजाए और कोई इस अस्पताल को संचालित कर मलाई काट रहा है। है न आश्चर्य की बात, यह सब कुछ विश्व में सबसे बडे प्रजातन्त्र हिन्दुस्तान में ही सम्भव है।
ढाई करोड हवा में उडा दिए शिवराज ने
केन्द्र सरकार के साथ ही साथ देश के सूबों की सरकारों ने विश्व व्यापी आर्थिक मन्दी के चलते मितव्ययता बरतने की अपील की और उसे अंगीकार भी किया। देश के हृदय प्रदेश कहे जाने वाले मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ने मितव्ययता की एक अजब नजीर पेश की है। मितव्ययता का स्वांग रचने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में श्यामला स्थित मुख्यमन्त्री आवास से मन्त्रालय तक सायकल पर चलकर मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं, पर असलियत कुछ और बयां कर रही है। 2006 से 2008 तक मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकारी हवाई जहाज और हेलीकाप्टर के होते हुए भी अपने जानने वालों को उपकृत करने की गरज से पांच निजी एवीएशन कंपनियों को दो करोड 63 लाख रूपए का भुगतान किया है। नई दिल्ली की सारथी एयरवेज, एवीएशन सर्विस इण्डिया, रान एयर सर्विस, सर एवीएशन सर्विस इण्डिया, एस.आर.सी. एवीएशन और इन्दौर फ्लाईंग क्लब को इस राशि का भुगतान किया गया है। सवाल यह उठता है कि जब राज्य सरकार के पास अपना उडन खटोला है तब किराए से उडन खटोला लेने का क्या औचित्य है। इसके पहले दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में भी उन्होंने भी अपने जानने वालों की एवीएशन कंपनियों को बहुत लाभ पहुंचाया था, पर आवाज कौन उठाए, पैसा जनता के गाढे पसीने की कमाई पर डाका डालकर जो निकाला जा रहा है।
का वषाZ जब कृषि सुखानी
बहुत पुरानी कहावत है कि जब खेती ही सूख जाए तब बारिश का क्या फायदा! यही बात देश में स्वाईन फ्लू की वेक्सीन के बारे में लागू हो रही है। हम भारतवासी अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि अब स्वाईन फ्लू की वेक्सीन इजाद कर ली गई है। वहीं दूसरी ओर अब देश के आला अफसरान यह कहते घूम रहे हैं कि अब इसकी जरूरत नहीं है। इसका टीका अब लगाने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि पिछले दो सालों में देश में कहर बरपाने वाले एच1 एन1 वायरस का असर अब काफी हद तक कम हो चुका है। ठण्ड में यह बीमारी चरम पर होती है, किन्तु अब देश में इससे पीडितों के मामलों में तेजी से कमी होने के बाद इस टीके का ओचित्य ही नहीं रह गया है। वैसे भी मेक्सीको के रास्ते भारत में आई इस बीमारी को लेकर भारत सरकार कितनी चौकन्नी थी कि देश के हवाई अड्डों पर चौकस व्यवस्था के बाद भी देश में इस वायरस ने अपना कहर बरपा ही दिया। एक बार अगर यह बीमारी देश में प्रवेश कर गई तो फिर हवाई अड्डों पर मुस्तैदी किस काम की रही। जो वायरस देश की फिजां में रच बस गया, उसके बाद कितने भी मरीज देश में प्रवेश कर जाएं तो क्या असर पडता है। कहते हैं न कि ``बुिढया के मरने का गम नहीं, गम तो इस बात का है कि मौत ने घर देख लिया।``
माता रानी के दर्शन हुए और आसान
उत्तर भारत में त्रिकुटा की पहाडियों पर विराजीं माता वैष्णों देवी के दर्शन अब और आसान हो गए हैं। कुछ सालों पहले तक अपार कष्ट झेलकर माता रानी के दर्शन को लाखों श्रृद्धालु जाया करते थे, आज उनकी तादाद करोडों में पहुंच गई है। पहले बेहद संकरी गुफा में से होकर माता के भक्त पिण्डियों के दर्शन कर पाते थे। सुप्रसिद्ध भजन गायक गुलशन कुमार के गीतों और सस्ते कैसेट के बाद अचानक ही माता रानी के भक्तों की संख्या में विस्फोटक बढोत्तरी दर्ज की गई थी। इसके बाद माता रानी के दर्शनों हेतु भक्तों को सुविधाएं उपलब्ध कराने और व्यवस्था बनाने के लिए माता रानी श्राईन बोर्ड का गठन किया गया था। वर्तमान में माता रानी के दर्शन हेतु दो क्रत्रिम गुफाएं हैं। इस साल श्राईन बोर्ड ने यहां तीसरी गुफा का निर्माण भी करा दिया है। अभी माता रानी की तीन पिडिंयो के दर्शन हेतु महज एक से डेढ सेकण्ड का समय ही मिल पाता है, जो अब बढने की उम्मीद है। नई गुफा 10 फुट उंची और 15 फुट चौडी एवं 48 मीटर लंबी बनाई गई है। गत दिवस जम्मू काश्मीर के महामहिम राज्यपाल एन.एन.वोहरा ने इस गुफा के माध्यम से माता रानी के दर्शन भी कर लिए हैं। माना जा रहा है कि भक्तों की बढती तादाद को देखकर इसे जल्द ही खोला जा सकता है।
महिलाओं के मामले में पिछडा है राजस्थान
सरकारी सेवा में महिलाओं को स्थान देने के मामले में देश का राजस्थान सूबा काफी हद तक पीछे है। आजादी के छ: दशकों के बाद राजस्थान उच्च न्यायालय महज चार महिला न्यायधीश ही दे पाया है। 1949 में सूबे में उच्च न्यायालय की स्थापना के 29 साल के बाद कान्ता कुमार भटनागर 26 सितम्बर 1978 से 14 जून 1992 तक यहां रहने के उपरान्त चेन्नई हाईकोर्ट की मुख्य न्यायधीश बनीं, मोहिनी कपूर 13 जुलाई 1985 से 17 नवंबर 1995, ज्ञानसुधा मिश्रा 21 अप्रेल 1994 से 12 जुलाई 2008 के उपरान्त 13 जुलाई को झारखण्ड हाई कोर्ट की सीजे तो मीना वी. गोम्बर सितम्बर 2009 से यहां पदस्थ हैं। इसके अलावा राज्य काडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के 187 स्वीकृत पदों में से 28 तो 159 भारतीय पुलिस सेवा के पदों में से 12, राज्य प्रशासनिक सेवा आरजेएस में 87 मेें से 26 पदों पर ही महिलाएं काबिज हैं। उच्च न्यायालय में वर्तमान में 40 में से 27 जज कार्यरत हैं जिनमें से एक ही महिला है। उच्च न्यायिक सेवा में 142 में से 16 महिला जज तो न्यायिक सेवा में 697 में से 98 ही महिला जज हैं। न्यायिक सेवा के 839 पदों में से महज 114 पदों पर ही महिलाओं का कब्जा बरकरार है।
नियम तो बना, पालन कौन करे
मानव के लिए मोबाईल टावर से निकलने वाली किरणें बहुत हानीकारक हैं। इसके लिए नियम कायदे बन चुके हैं, पर सवाल यह उठता है कि इसका पालन कौन करे। जिस तरह सिगरेट की डब्बी पर स्टार लगाकर लिखी हुई चेतावनी को धूम्रपान करने वाला धुंआ छोडते हुए ही पढता है, उसी तरह नियमों का पालन करवाने वाले अपनी जवाबदेही निभा रहे हैं। दिल्ली में 1532 मोबाईल टावर को नगर निगम दिल्ली द्वारा बनाए गए मानकों का पालन न करने पर नोटिस जारी हो चुका है, पर अब तक सील होने की बात कहें तो महज एक मोबाईल टावर को ही सील किया गया है। दिल्ली में ही 5364 मोबाईल टावर लगे हैं, जिनमें से 2412 टावर वैध पाए गए हैं, 2952 टावर अर्वध हैं। वैसे तो 227 मोबाईल टावर सील हो चुके हैं, पर 1532 को नोटिस देने के बाद एक ही सील हो पाया है। असलियत यह है कि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को होने वाली अनापशनाप कमाई के चलते सेवा प्रदाता कंपनियां अधिकारियों के समक्ष नोटों की थैलियों के मुंह खोल दिया जाता है, फिर क्या है नियम बनते हैं बनते रहें। कहा है न कि जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का।
सपनि बन्द, पूर्व विधायक हलाकान
मध्य प्रदेश के राजनेताओं द्वारा घुन की तरह मध्य प्रदेश सडक परिवहन निगम को खा लिया गया। घाटे में जाने वाले इस निगम को बन्द कर दिया गया है। इसके स्थान पर अब अनुबंधित यात्री बसों के नाम पर अवैध बसों का इतना जबर्दस्त रेकट पनप चुका है जिसे तोड पाना किसी के बस की बात नहीं प्रतीत होती है। यात्री बसों के बन्द होने से सूबे के पूर्व विधायक और अधिमान्य पत्रकार हलाकान ही नज़र आ रहे हैं। दरअसल अधिमान्य पत्रकारों और पूर्व विधायकों को सपनि में निशुल्क यात्रा की सुविधा प्रदान की गई थी। अब अनुबंधित यात्री बस में उन्हें बहुत ही परेशानी का सामना करना पडता है। पडोसी सूबे महाराष्ट्र में यह सुविधा बाकायदा जारी है। अब पूर्व विधायक इस सेवा के लिए लामबन्द होते दिख रहे हैं। पूर्व विधायकों का कहना है कि उन्हें यात्रा भत्ता अलग से दिया जाए ताकि वे अपने क्षेत्र सहित अन्य जिलों में भी जनसंपर्क को जीवित रख सकें। मामला सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान तक पहुंच गया है, पर इस मामले में वे अभी शान्त ही दिख रहे हैं। पत्रकारों को अलबत्ता पेंशन और स्वास्थ्य बीमा का झुनझुना पकडा दिया गया है।
सरदर्द बनीं अवैध सिम
मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों के बीच मची गलाकाट स्पर्धा के चलते अधिक से अधिक उपभोक्ता बनाने की अघोषित जंग छिड गई है। इस कस्टमर वार में सरकारी नियम कायदों को साफ साफ धता बताया जा रहा है। देश के कमोबेश हर जिले के एक एक कस्बे में सेवा प्रदाता कंपनियों के वैध और अवैध डीलर को मिलने वाला टारगेट पूरा करने के लिए अनैतिक तरीकों का प्रयोग हो रहा है। बताते हैं कि बिना पहचान पत्र के ही सिम चालू कर बेच दी जाती हैं। ये सिम एकाध सप्ताह तक तो काम करती हैं, फिर पहचान के अभाव में इन्हें बन्द कर दिया जाता है, इस तरह कंपनी के उपभोक्ताओं की संख्या में दिन दूगनी रात चौगनी बढोत्तरी दर्ज हो रही है। इस काम में कंपनी की शान में तो चार चान्द लग जाते हैं पर वैध सिम लेकर सालों से उपभोग करने वाले उपभोक्ताओं को इसका खामियाजा भुगतना पड रहा है। आम शिकायत है कि अपरिचित नंबर से अश्लील एसएमएस और फोन काल पर अश्लील वार्तालाप के साथ ही साथ मिस्ड काल मारकर लोग परेशान किया करते हैं। अब देखना यह है कि ट्राई इस मामले में क्या कदम उठाती है।
हो गया हिसाब किताब बराबर
24 जनवरी को भारत सरकार के एक विज्ञापन में पाकिस्तान के पूर्व वायू सेना प्रमुख तनवीर महमूद अहमद की फोटो प्रकाशित होने पर जबर्दस्त बवाल कटा था। अब पाकिस्तान के एक सरकारी विज्ञापन में भारत की पंजाब पुलिस के लोगो के प्रकाशन का मामला सामने आया है। हिन्दुस्तान की पंजाब पुलिस के लोगो के साथ उर्दू में जारी इस विज्ञापन में आतंकवादी और अन्य वारदातों को रोकने में पुलिस की मदद की गुहार लगाई गई है। भारत और पाकिस्तान दोनों ही के लोगो में अंग्रेजी वर्णमाला के पी अक्षर से पीपी लिखा है। दोनो ही के लोगो में उपर के स्थान को छोडकर शेष स्थान को पुष्प चक्र से घेरा गया है। भारत की पंजाब पुलिस में उपर अशोक चक्र तो पकिस्तान की पंजाब पुलिस के लोगो में सितारा बना हुआ है। दोनों ही लोगो के रंग और डिजाईन लगभग एक से हैं, अन्तर सिर्फ राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का ही है। लोग तो यह कहते भी पाए जा रहे हैं कि चलो हमने आपकी छापी आपने हमारी, हो गया हिसाब किताब बराबर।
पुच्छल तारा
आज की भागदौड भरी जिन्दगी के बीच अगर बचपन को याद किया जाए तो कुछ सुखद यादें ताजा हो ही जाती हैं। समय किस कदर बदल चुका है, लोगों के बीच पहले खतो खिताब का सिलसिला चलता था। पत्र पाने के लिए प्रेयसी भी घंटों डाकिए की राह तकती थी। पत्र आते थे और अपने साथ आनन्द लाते थे। मध्य प्रदेश से अभिषेक दुबे ने इसी बात को रेखांकित करते हुए एक मेल भेजा है। याद करिए उस समय को जब हम अक्सर कहा करते थे कि चलो मिलते हैं और कुछ करने की योजना बनाते हैं। अब समय बदल गया है अब हम कहते हैं कि चलो प्लान करते हैं और फिर किसी दिन मिलते हैं। मित्र वही हैं, हम वही हैं, कुछ नहीं बदला है, बदला है तो बस हमारी प्राथमिकताएं।

रविवार, 28 मार्च 2010

कैसे लगी सेफ्टी वेन में आग

कैसे लगी सेफ्टी वेन में आग
भूतल परिवहन मन्त्रालय के ठेकेदार का एक और कारनामा
फोरलेन निर्माण कंपनी `सद्भाव` का वाहन जलकर खाक
नहीं ली थी थिनर के परिवहन की अनुमति!
(लिमटी खरे)

सिवनी 28 मार्च। पाश्र्च में ढकेल दिए गए और कभी भाजपा के चेहरे रहे अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की महात्वाकांक्षी स्विर्णम चतुZभुज परियोजना के अंग और वर्तमान में विवादस्पद हुए उत्तर दक्षिण गलियारे का निर्माण करा रही गुजरात मूल की कंपनी सद्भाव की सेफ्टी वेन 27 मार्च को अपरान्ह उसके बेस केम्प बटवानी में धू धू कर जल उठी। इस वेन में लगभग बीस बैरल थिनर रखा हुआ था।
गौरतलब है कि गुजरात मूल की सद्भाव कंपनी द्वारा उत्तर दक्षिण फोर लेन गलियारे के सिवनी से लेकर खवासा तक के मार्ग का निर्माण कराया जा रहा है। यहां उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि सिवनी जिले की पश्चिमी सीमा से लगे छिन्दवाडा जिले का प्रतिनिधित्व केन्द्रीय भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ द्वारा किया जाता है। सिवनी जिले सहित महाकौशल को कमल नाथ की कर्मभूमि ही माना जाता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार शनिवार 27 मार्च को सद्भाव कंपनी का 20 बेरल थिनर गुजरात के सूरत से ट्रांसपोर्ट के माध्यम से सिवनी पहुंचा था। इस थिनर को जिला मुख्यालय सिवनी से दक्षिण दिशा में लगभग 10 किलोमीटर दूर कंपनी के बेस केम्प बटवानी तक पहुंचाने के लिए इस सेफ्टी वेन का उपयोग किया गया था। अपरान्ह जैसे ही सेफ्टी वेन थिनर के कंटेनर लेकर बेस केम्प पहुंची अचानक ही उसमें आग लग गई और वह धू धू कर जल उठी। चन्द मिनिटों में ही सेफ्टी वेन जलकर खाक हो गई।
यह तो अच्छा हुआ कि यह हादसा शहर के अन्दर नहीं हुआ अन्यथा किसी बडी घटना के घटने से इंकार नहीं किया जा सकता था। इस सेफ्टी वेन में आग कैसे लगी इसके कारणों का अभी पता नहीं चल सका है। चूंकि वाहन में चालक या अन्य कोई कर्मचारी उस वक्त नहीं था, इसलिए आग के लगने का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है। कंपनी के सूत्र इस हादसे का कारण वेन में शार्ट सिर्कट होना बता रहे हैं। कंपनी ने बदनामी से बचने के लिए आनन फानन मामले को रफा दफा कर दिया है।
सवाल यह उठता है कि कंपनी द्वारा अगर इतनी अधिक मात्रा में थिनर जैसे ज्वलनशील पदार्थ का परिवहन किया जा रहा था तो उसे बाकायदा सम्बंधित विभाग से ज्वलनशील पदार्थ के परिवहन की अनुज्ञा लेना चाहिए थी। बताते हैं कि कंपनी ने एसा कोई भी लाईसेंस नहीं लिया गया था। वैसे भी जिले में फोरलेन के निर्माण में लगी सद्भाव और मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा की जा रही अनियमितताओं के बारे में बार बार चेतान के बाद भी शासन प्रसासन के कानों में जूं न रेंगना, किसी अन्य निहित स्वार्थ की ओर इशारा करने के लिए काफी कहा जा सकता है।

इसका भोगमान कौन भुगतेगा मोहतरमा


इसका भोगमान कौन भुगतेगा मोहतरमा

हिमाचल की लाट साहेब ने आमन्त्रित किया अपने गृह जिले की जनता को

सर्वदलीय प्रोग्राम में दिखी कांग्रेसी छटा

सम्मान समारोह के बहाने सधे विधानसभा उपाध्यक्ष पर निशाने

(लिमटी खरे)

सिवनी 28 मार्च। मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले सिवनी की बेटी एवं सूबे की पूर्व मन्त्री और प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष श्रीमति उर्मिला सिंह को हिमाचल प्रदेश का महामहिम राज्यपाल बनाने पर जिले की जनता फूली नहीं समा रही है। श्रीमति सिंह के राज्यपाल बनने के बाद पहली बार जिले में आगमन पर जिले के कांग्रेसी बहुत ही उत्साहित नज़र आए। इस अवसर पर कांग्रेस के बेनर तले उनका सर्वदलीय सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया। इस सम्मान समारोह में कांग्रेस की छटा साफ तौर पर परिलक्षित हुई। सम्मान समारोह में वक्ताओं द्वारा उर्मिला सिंह की तारीफ में कशीदे गढने के साथ ही साथ विधानसभा उपाध्यक्ष पर निशाने साधे गए।
सम्मान समारोह में श्रीमति उर्मिला सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि सौभाग्य से उन्हें एसे प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है, जो देवताओं की तपोभूमि के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने सिवनी जिले के निवासियों को परिवार के साथ अलग अलग समय पर हिमाचल प्रदेश आने और आनन्द उठाने की बात कही गई। वहां उपस्थित लोग इस तरह की चर्चा में मशगूल दिखे कि हम आ तो जाएं, पर वहां होने वाले खर्च का भोगमान कौन भोगेगा!
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में लाट साहेब रहे महामहिम राज्यपाल बलराम जाखड के कार्यकाल में करोडों रूपए की राशि अतिथि सत्कार में फूंक दी गई है। सूचना के अधिकार में जब इस बात को निकलवाया गया तब पता चला कि न जाने कितने लोग राजभवन के अतिथि बनकर ``एश`` करके चले गए। यक्ष प्रश्न तो यह है कि यह राशि आखिर आई कहां से। उत्तर कमोबेश साफ ही है कि यह राशि जनता के गाढे पसीने की कमाई से ही निकलकर आई थी। जनता के पैसे पर एश करने कराने के इस सिलसिले में मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार भी मौन साधे हुए है, जो अश्चर्य का ही विषय कहा जाएगा।
कहने को तो यह प्रोग्राम सर्वदलीय था। मंच पर कांग्रेसी नेता बहुतायत में दिखे। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष सुदर्शन बाझल, भाजपा के पूर्व मन्त्री डॉ.ढाल सिंह बिसेन और भाजपा के ही पूर्व विधायक नरेश दिवाकर के अलावा और किसी भी दल का कोई नुमाईन्दा मंचासीन नही ंहो सका। साथ ही पूरे पण्डाल में लगे फ्लेक्स में कांग्रेस के नेता ही उर्मिला सिंह को बधाई देते दिखे।
समूचे घटनाक्रम को देखने से एक बात साफ तौर पर समझ में आ रही थी कि यह सम्मान समारोह हिमाचल की राज्यपाल श्रीमति उर्मिला सिंह के सम्मान में कम, वरन् सिवनी जिले के एक और सपूत और सूबे के विधानसभा उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह पर निशाना साधने का अधिक लग रहा था। उर्मिला सिंह सहित समस्त वक्ताओं ने परोक्ष तौर पर हरवंश सिंह को निशाना बनाते हुए ही अपनी बात रखी, जिसकी चर्चा समारोह में मुक्त कंठ से होती रही।
गौरतलब है कि पूर्व केन्द्रीय मन्त्री सुश्री विमला वर्मा के कार्यकाल तक सिवनी जिला कांग्रेस का अभैद्य गढ माना जाता रहा है। उनके सक्रिय राजनीति से विदा लेते ही राजनैतिक नेतृत्व की कमान ठाकुर हरवंश सिंह के हाथों में आ गई। उस दौरान जिले में पांच विधानसभा सीटें हुआ करतीं थीं। जिनमें से परिसीमन के उपरान्त विलोपित हुई आदिवासी बहुल्य घंसौर का प्रतिनिधित्व श्रीमति उर्मिला सिंह के द्वारा ही किया जाता था। कालान्तर में जिले की केवलारी विधानसभा जिसका प्रतिनिधित्व ठाकुर हरवंश सिंह द्वारा किया जाता है को छोडकर शेष भाजपा के अभैद्य दुर्ग में तब्दील हो गई है, जो निश्चित तौर पर शोध का विषय ही कहा जाएगा।
चर्चा तो यहां तक भी है कि घंसौर जिले के ग्राम बिनैकी में लगने वाले मशहूर थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा लगाए जाने वाले पावर प्लांट के मार्ग में कोई बाधा न आए इस हेतु कम्पनी द्वारा उर्मिला सिंह से कनेक्शन जोडने के लिए जतन किए जा रहे हैं, और सिवनी जिले से हिमाचल दर्शन को पहुंचने वाले पर्यटकों के उपर होने वाले खर्च का भोगमान या तो हिमाचल का राजभवन भोगेगा या फिर पावर प्लांट की स्थापना करने वाली कंपनी।

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

साध्वी एक कदम आगे दो कदम पीछे!

साध्वी एक कदम आगे दो कदम पीछे!

अवकाश पर है जनशक्ति पार्टी

आखिर चित्त स्थिर क्यों नहीं रख पातीं उमाश्री

(लिमटी खरे)

भारतीय जनशक्ति पार्टी की सुप्रीमो उमाश्री भारती ने अपने ही दल से त्याग पत्र दे दिया है, यह खबर चौंकाने वाली ही मानी जाएगी। मीडिया ने उमाश्री के इस कदम को जोर शोर से उछाला है। वास्तव में हुआ क्या है! अरे उमाश्री ने तीन माह का अवकाश मांगा है, और कुछ नहीं। हर एक मनुष्य को काम करने के बाद अवकाश की आवश्यक्ता होती है। सरकारी सेवकों को भी तेरह दिन के सामान्य अवकाश के साथ अर्जित और मेडीकल लीव का प्रावधान है, तब उमाश्री ने अगर तीन माह का अवकाश मांग लिया तो हंगामा क्यों बरपा है। कुछ दिनों पहले कांग्रेस द्वारा अपनी उपेक्षा की पीडा का दंश झेल रहे कांग्रेस की राजनीति के हाशिए में ढकेल दिए गए चाणक्य कुंवर अर्जन सिंह ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कहा था कि वे जीवन भार राजनीति करते रहे और अब उमर के इस पडाव में अपने द्वारा अर्जित अवकाश का उपभोग कर रहे हैं, तब तो हंगामा नहीं हुआ था।

उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने भाजश छोडी है, अथवा नहीं यह बात अभी साफ नहीं हो सकी है। गौरतलब होगा कि 2005 में भाजपा से बाहर धकिया दिए जाने के बाद अपने ही साथियों की हरकतों से क्षुब्ध होकर उमाश्री भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन किया था। उमाश्री ने उस वक्त भाजपा के शीर्ष नेता एल.के.आडवाणी को आडे हाथों लिया था। कोसने में माहिर उमाश्री ने भाजपा का चेहरा समझे जाने वाले अटल बिहारी बाजपेयी को भी नही ंबख्शा था। उमाश्री के इस कदम से भाजपा में खलबली मच गई थी। चूंकि उस वक्त तक उमाश्री भारती को जनाधार वाला नेता (मास लीडर) माना जाता था, अत: भाजपाईयों के मन में खौफ होना स्वाभाविक ही था।

उमाश्री को करीब से जानने वाले भाजपा नेताओं ने इस बात की परवाह कतई नहीं की। उमाश्री ने 2003 में मध्य प्रदेश विधान सभा के चुनावी महासमर का आगाज मध्य प्रदेश के छिन्दवाडा जिले में अवस्थित हनुमान जी के सिद्ध स्थल ``जाम सांवरी`` से किया था। जामसांवरी उमाश्री के लिए काफी लाभदायक सिद्ध हुआ था, सो 2005 में भी उमाश्री ने हनुमान जी के दर्शन कर अपना काम आरम्भ किया। उमाश्री का कारवां आगे बढा और भाजपाईयों के मन का डर भी। शनै: शनै: उमाश्री ने अपनी ही कारगुजारियों से भाजश का उभरता ग्राफ और भाजपाईयों के डर को गर्त में ले जाना आरम्भ कर दिया।

कभी चुनाव मैदान में प्रत्याशी उतारने के बाद कदम वापस खीच लेना तो कभी कोई नया शिगूफा। इससे उमाश्री के साथ चलने वालों का विश्वास डिगना आरम्भ हो गया। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजश कार्यकर्ताओं ने उमाश्री को चुनाव मैदान में कूदने का दबाव बनाया। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसा इसलिए किया गया था ताकि भाजश कम से कम चुनाव तक तो मैदान में डटी रहे। कार्यकर्ताओं को भय था कि कहीं उमाश्री फिर भाजपा के किसी लालीपाप के सामने अपने प्रत्याशियों को वापस लेने की घोषणा न कर दे। 2008 का मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव उमाश्री भारती के लिए आत्मघाती कदम ही साबित हुआ। इस चुनाव में उमाश्री भारती अपनी कर्मभूमि टीकमगढ से ही औंधे मुंह गिर गईं। कभी भाजपा की सूत्रधार रहीं फायर ब्राण्ड नेत्री उमाश्री भारती ने इसके बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में फिर एक बार भाजपा द्वारा उनके प्रति नरम रूख मात्र किए जाने से उन्होंने लोकसभा में अपने प्रत्याशियों को नहीं उतारा।

माश्री भारती का राजनैतिक इतिहास देखने पर साफ हो जाता है कि उनके कदम और ताल में कहीं से कहीं तक सामंजस्य नहीं मिल पाता है। वे कहतीं कुछ और हैं, और वास्तविकता में होता कुछ और नज़र आता है। गुस्सा उमाश्री के नाक पर ही बैठा रहता है। बाद में भले ही वे अपने इस गुस्से के कारण बनी स्थितियों पर पछतावा करतीं और विलाप करतीं होंगी, किन्तु पुरानी कहावत ``अब पछताए का होत है, जब चिडिया चुग गई खेत`` से उन्हें अवश्य ही सबक लेना चाहिए।

मध्य प्रदेश में उनके ही दमखम पर राजा दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली दस साला सरकार को हाशिए में समेट पाई थी भाजपा। उमाश्री भारती मुख्य मन्त्री बनीं फिर झण्डा प्रकरण के चलते 2004 के अन्त में उन्हें कुर्सी छोडनी पडी। इसके बाद एक बार फिर नाटकीय घटनाक्रम के उपरान्त वे पैदल यात्रा पर निकल पडीं। मीडिया में वे छाई रहीं किन्तु जनमानस में उनकी छवि इससे बहुत अच्छी बन पाई हो इस बात को सभी स्वीकार कर सकते हैं।

अबकी बार उमाश्री भारती ने अपने द्वारा ही बुनी गई पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिया है। उन्होंने कार्यकारी अध्यक्ष संघप्रिय गौतम को त्यागपत्र सौंपते हुए कहा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से अपना दायित्व निभाने में सक्षम नहीं हैं, सो वे अपने आप को समस्त दायित्वों से मुक्त कर रहीं हैं, इतना ही नहीं उन्होंने बाबूराम निषाद को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाने की पेशकश भी कर डाली है। उमाश्री की इस पेशकश से पार्टी में विघटन की स्थिति बनने से इंकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे चाहतीं तो संघप्रिय गौतम पर ही भरोसा जताकर उन्हें अध्यक्ष बनाने की पेशकश कर देतीं।

उधर भाजपा ने अभी भी उमाश्री भारती के मामले में मौन साध रखा है। यद्यपि भाजपा प्रवक्ता तरूण विजय का कहना है कि उन्हें पूरे मामले की जानकारी नहीं है, फिर भी भाजपा अपने उस स्टेण्ड पर कायम है, जिसमें भाजपा के नए निजाम ने उमाश्री भारती और कल्याण सिंह जैसे लोगों की घर वापसी की संभावनाओं को खारिज नहीं किया था। कल तक थिंक टेंक समझे जाने वाले गोविन्दाचार्य से पूछ पूछ कर एक एक कदम चलने वाली उमाश्री के इस कदम के मामले में गोविन्दाचार्य का मौन भी आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। बकौल गोविन्दाचार्य -``भाजपा अब भगवा छटा वाली कांग्रेस पार्टी हो गई है।`` अभी हाल ही में उमाश्री को भाजपा के एक प्रोग्राम में देखा गया था, जिसमें नितिन गडकरी मौजूद थे। भाजपा द्वारा उमाश्री भारती की इन सारी ध्रष्टताओं को माफ कर अगर गले लगा लिया जाता है तो क्या भरोसा कि आने वाले समय में वे किसी छोटी मोटी बात से आहत होकर फिर भाजपा को कोसें और अब उनके निशाने पर अटल आडवाणी का स्थान नितिन गडकरी ले लें।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

स्कूली बच्चों से गए गुजरे हैं ``जनसेवक``

स्कूली बच्चों से गए गुजरे हैं ``जनसेवक``

केवल 162 सांसद ही रहे लोकसभा में मौजूद

आडवाणी, मलायम पास, राहुल सोनिया फिसड्डी

(लिमटी खरे)

देश की जनता जिन पर भरोसा कर उन्हें जनादेश देकर देश की सबसे बडी पंचायत ``लोकसभा`` में अपने भविष्य के सपने गढने की गरज से भेजती है, वे ही ``जनसेवक`` लोकसभा में उपस्थिति दर्ज कराने के बजाए अपना ही भविष्य गढने में लग जाते हैं। लोकसभा में अनुपस्थित रहने के साथ ही साथ अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के हितों के मामलों में उपेक्षात्मक रवैया अपनाकर न केवल ये जनसेवक अपने निहित स्वार्थ साधते हैं, वरन ये इन्हें मिले जनादेश का भी अनादर ही करते हैं।

जनसेवक भले ही अपने बच्चों को शालाओं में शत प्रतिशत उपस्थिति देने को पाबन्द रहने के उपदेश देते हों, पर जब इनकी अपनी बारी आती है तो ये जिम्मेदारियों से मुंह मोडने में गुरेज नहीं करते हैं। लोकसभा की उपस्थिति पंजी पर अगर नज़र डाली जाए तो कुछ इसी तरह की बातें निकलकर सामने आती हैं। बजट सत्र के पहले चरण में 22 से 15 मार्च तक के कार्यकाल में ही 544 में से महज 162 संसद सदस्यों ने रोजाना सदन में आकर उपस्थिति दर्ज करवाई है।

विचित्र किन्तु सत्य यहीं देखने को मिलता है। एक ओर कांग्रेस की राजमाता और यूपीए अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी कांग्रेस संसदीय दल की हर बैठक में सांसदों को सदन में मौजूद रहने पर जोर देती हों, पर जब उनका अपना रिपोर्ट कार्ड देखा जाता है तो वे ही पिछडती नज़र आती हैं। गौरतलब होगा कि परमाणु दायित्व विधेयक एवं अन्य मसलों पर सरकार को पहले ही काफी लानत मलानत झेलनी पडी थी। आश्चर्य तो तब होता है जब आम बजट और लेखानुदान मांगों पर चर्चा के दौरान ही सदन में कोरम भी पूरा नहीं हो पाता है।

बजट सत्र के पहले चरण में 22 मार्च से 16 मार्च तक सदन में कुल 15 बैठकें आहूत हुईं हैं। लोकसभा की उपस्थिति पंजी पर नज़र डाली जाए तो नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषम स्वराज, राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी, समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के गुरूदास दासगुप्ता, माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के वासुदेव आचार्य की उपस्थिति सदन में शत प्रतिशत रही है। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी सदन में महज 10 दिन तो युवराज राहुल गांधी ने 13 दिन हाजिरी दी है। कल्याण सिंह और रूपहले पर्दे की अदाकारा जया प्रदा महज एक एक दिन ही अपनी सूरत दिखाने सदन में गए।

सवाल यह उठता है कि आखिर इन जनसेवकों के पास सदन में मौजूद रहने के अलावा एसा कौन सा जरूरी काम है, जिसके चलते ये सदन से गायब रहते हैं। समूचे हिन्दुस्तान में इनका सडक, रेल या वायूमार्ग से आवागमन वह भी विलासिता वाली श्रेणी में बिल्कुल मुफ्त होता है। दिल्ली में रहने को आरामदायक निशुल्क आवास, निशुल्क बिजली एवं अन्य सुविधाओं के होते हुए ये जनसेवक आखिर लोकसभा से गायब रहने में ज्यादा दिलचस्पी क्यों लेते हैं। गौरतलब होगा कि एक प्रोग्राम के दौरान कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी ने अपनी पीडा का इजहार करते हुए भले ही मजाक में यह कहा था कि क्लास बंक करने का मजा कुछ और ही होता है। यहां सोनिया का क्लास से तातपर्य लोकसभा से ही था।

जनता अपने द्वारा दिए गए विशाल जनादेश प्राप्त जनसेवकों से पूछना चाहती है कि आखिर कौन सी एसी वजह है, जिसके चलते ये सदन की कार्यवाही में भाग लेने से इतर कोई और दूसरे काम में अपने आप को झोंक देते हैं। देखा जाए तो इन जनसेवकों की पहली जवाबदारी उनके संसदीय क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को सरकार के सामने लाकर उसे दूर करना है। विडम्बना ही कही जाएगी कि आज की राजनीति में गलत परंपराओं का संवर्धन किया जा रहा है।

चुनाव के उपरान्त परिणामों का एनालिसिस कुछ इस तरह से किया जाता है कि जिस क्षेत्र से उन्हें वोट नहीं मिलते हैं, उस क्षेत्र के लोगों को नारकीय जीवन जीने पर मजबूर कर दिया जाता है, और जहां लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया हो उस क्षेत्र को चमन बना दिया जाता है। यही आलम कार्यकर्ताओं का होता है। धडों में बंटे राजनीतिक दलों में जनसेवक अपने अनुयाईयों को पूरी तरह उपकृत कर दूसरे के फालोअर्स की जडों में मठ्ठा डालने से नहीं चूकते हैं।

बहरहाल, जनसेवकों की लोकसभा में इस तरह समाप्त होती दिलचस्पी को बहुत अच्छा शगुन नहीं माना जा सकता है। जिस तरह एक सरकारी कर्मचारी को आकिस्मक, अर्जित और स्वास्थ्य अवकाश मिलता है, उसी तरह चुने गए या मनोनीत जनसेवकों के लिए भी एक आचार संहिता बनकर इसका कडाई से पालन सुनिश्चित होना चाहिए। निर्धारित दिनों से ज्यादा अगर जनसेवक अपने कर्तव्यों से नदारत रहता है, तो उसके वेतन में से दुगनी राशि काटकर सरकारी खाते में जमा करा देना चाहिए। वर्तमान में चुने और मनोनीत जनसेवकों के लिए आचार संहिता है, पर परिस्थितियों को देखकर उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है।

जब आना, जाना, रहना, बिजली पानी आदि सब कुछ निशुल्क है तो फिर संसद सत्र के दौरान बंक (स्कूल कालेज में पढाई के दौरान विद्यालय या कालेज से गायब रहने के लिए विद्यार्थियों द्वारा प्रयुक्त एक शब्द) मारने का ओचित्य समझ से परे ही है। विद्यार्थियों को तो जुलाई से अप्रेल तक दस माह लगातार (अवकाशों को छोडकर) अपने गुरूकुल जाना होता है, पर संसद के सन्त्र तो पूरे साल नहीं चला करते। इन जनसेवकों को पगार किस बात की मिलती है, क्या इनकी जवाबदेही तय नहीं होना चाहिए, क्या इन्हें मौज करने और मलाई खाने तथा रसूख दिखाने के लिए जनता के गाढे पसीने की कमाई दी जाती है, आदि न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न देश की जनता के मानस पटल पर उभरते होंगे। नए नियम कायदों में सरकारी नौकर को पेंशन से वंचित रखा जा रहा है, पर जनसेवक चाहे सांसद हो या विधायक उसे बराबर पेंशन की पात्रता आज भी न केवल बरकरार है, वरन् उसे गाहे बेगाहे बढाने के प्रस्ताव भी ध्वनि मत से पारित कर दिए जाते हैं। इस तरह का भेदभाव `अनेकता में एकता` वाले इस हिन्दुस्तान में ही सम्भव है।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

हमारा पहला अद्भुत और अकल्पनीय अनुभव है प्राडकास्ट

हमारा पहला अद्भुत और अकल्पनीय अनुभव है पाड्कास्ट

इंटरनेट का इन्द्रजाल समझना बहुत ही मुश्किल है। इंटर नेट पर जहां तक आप सोच सकते हैं आप उससे कहीं आगे जा सकते हैं। इसके साथ ही साथ ब्लाग ने तो धूम मचा दी है। कल तक अखबारों में पत्र संपादक के नाम में अपनी भावनाएं प्रकाशित करवाने के लिए हमें संपादक के रहमो करम पर ही निर्भर रहना पडता था। आज ब्लाग इससे काफी आगे निकल चुका है। ब्लाग पर आप जो चाहे जैसा चाहें प्रकाशित करवा सकते हैं।
ब्लाग में ही नई विधा
पाड्कास्ट
का आगाज हो चुका है। हमने सुना ही था कि अचानक गिरीश बिल्लोरे जी से पिछले शुक्रवार हमारी वीडियो चेट हो गई उन्होंने हमसे एक साक्षात्कार चाहा। समय तय हुआ शनिवार का, पर शनिवार को हम दिल्ली से भोपाल के लिए निकल रहे थे सो चर्चा न हो सकी। रविवार भी बीत गया। हम भूल चुके थे इस वार्तालाप को।
सोमवार की रात लगभग साढे दस बजे बिल्लोरे जी ऑन लाईन थे, जी टॉक पर। बिल्लोरे जी ने कहा कि तब साक्षात्कार सम्भव है। हमने सहमति दे दी। विषय था विज्ञापनों में अश्लीलता। हो गई चर्चा आरम्भ लगभग एक घंटा कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। आज सुबह जब हमने ब्लाग पर अपने आप को सुना तो यह अनुभव निश्चित तौर पर अकल्पनीय ही था। आप सभी से अनुरोध है कि इस लिंक पर िक्लक करके आप
पाड्कास्ट को सन सकते हैं, और बिल्लोरे जी से अगर संपर्क करना चाहें तो उनका मेल आई डी भी नीचे सहज सुलभ सन्दर्भ के लिए प्रस्तुत है।

गिरीश बिल्‍लोरे जी ने हमें यह लिंक भेजा था

लिमटी खरे जी से सुनिये उनकी अपनी बात यहां=>
यदि आप भी दिल की बात कहना चाहतें तो कीजिये मेरे आई डी पर बस एक मेल girishbillore@gmail.com