बुधवार, 7 अप्रैल 2010

कुण्डलिनी जागरण की रहस्यमय प्रक्रिया

कुण्डलिनी जागरण की रहस्यमय प्रक्रिया

(हरीश शहरी)
(हरीश जी हमारे ब्लाग मित्र हैं और उन्होंने कुण्डलनी के जागरण की प्रक्रिया समझाने के लिए हमें मेल भेजा है, जिसे पाठकों के सुलभ सन्दर्भ के लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं लिमटी खरे)

यदि आपकी धर्म एवं ईश्वर में लेशमात्र भी आस्था है तो आपने यह अवश्य सुना होगा कि ईश्वर दशZन या तो महान ज्ञानी को प्राप्त होते हैं अथवा महा अज्ञानी को। मैं स्वयं को महान ज्ञानी होने अथवा समझने में लेशमात्र भी भ्रमित नहीं हूं, हां मेरे महा अज्ञानी होने का मुझे पूर्ण विश्वास है। शायद यह मां सरस्वती की मेरे ऊपर महान अनुकम्पा ही है जो मैं ऐसे गूढ़तम विषय में कुछ कहने का साहस कर पा रहा हूं जिसका खुद मुझे कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है। जिस विषय के अनुभवों एवं उसकी प्रक्रिया की व्याख्या स्वयं वे नहीं कर पाते जो इसका व्यक्तिगत अनुभव रखते हैं उसका बखान मुझ जैसा मन्द बुद्धि करने का साहस कर रहा है, इसका कारण शायद यह हो कि अनुभव संपन्न वे लोग शायद उस असीम आनन्द से इतने ओत-प्रोत हो जाते हों जिसे व्यक्त करने में उनकी लेखनी उनका साथ न दे पाती हो किन्तु मेरी बातें यदि आपको सार्थक न लगें तो कृपया इसे मेरी वाचालता समझकर मुझे माफ कर दीजिएगा।

जहां तक अनुभवी व्यक्तियों के लेखों और अनुभवों से मैने जाना है, कुण्डलिनी शब्द के मेरी समझ से दो अर्थ हैं: पहला, कुण्डल अर्थात चक्राकार में स्थित और दूसरा, कुण्ड अर्थात किसी गहरे स्थान या गढ्ढे में स्थित। अभिप्राय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में किसी चक्राकार गहरे स्थान में एक ऐसी शक्ति सुसुप्ता अवस्था में विद्यमान रहती है जिसे यदि जाग्रत कर दिया जाये तो असीम आनन्द की प्राप्ति होती है। यहां पर मैं पाठकों को यह भी सचेत करना चाहता हूं कि न तो यह कोई साधारण प्रक्रिया है और न ही खेल का विषय बल्कि यदि इसे सावधानी पूर्वक नियन्त्रित ढंग से उचित मानदण्डों के अनुसार न जाग्रत किया जाये तो इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं और साधक की जान का भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह एक ऐसी योगिक क्रिया (योग साधना) है जिसके संपन्न होने पर साधक में आमूल-चूल परिवर्तन होते हैं। कहने का अर्थ यह है कि साधक में न सिर्फ शारीरिक एवं मानसिक परिवर्तन होता है बल्कि आित्मक परिवर्तन भी हो जाता है। साधक को ऐसे परमानन्द की अनुभूति हो जाती है जिसके उपरान्त साधक को किसी अन्य सुख की चाह रह ही नहीं जाती है।

कुण्डलिनी जाग्रत करने से पूर्व परिस्थितियां अनुकूल होनी आवश्यक हैं अर्थात साधक को शारीरिक एवं मानसिक रूप से शुद्ध होना आवश्यक है। कहने का तात्पर्य यह है कि न सिर्फ साधक का शरीर साफ-सुथरा होना चाहिए (साधक का पेट मल-मूत्र रहित होना चाहिए एवं ऊपरी त्वचा स्वच्छ होनी चाहिए) बल्कि उसका मन भी शुद्ध होना आवश्यक है अर्थात् राग-द्वेष एवं अन्य सभी प्रकार की कलुषित भावनाओं से परे होना चाहिए। साधक की आत्मा में परमानन्द की प्राप्ति के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार की चाह नहीं होनी चाहिए। जिस स्थान पर साधक योगिक क्रिया संपन्न करना चाहता है अर्थात् कुण्डलिनी जाग्रत करना चाहता है वह स्थान साफ-सुथरा, शान्त, स्वच्छ वायुयुक्त एवं व्यवधान रहित होना चाहिए। यदि इसे निर्जन अथवा एकान्त स्थान कहा जाये तो अनुचित नहीं होगा।

उपरोक्त मानदण्डों की प्रतिपूर्ति के उपरान्त साधक को स्वच्छ स्थान (जमीन/भूमि) पर बैठकर अपने ईष्टदेव का नाम लेकर मन को एकाग्र करना चाहिए अर्थात अपने मन को अपने नाभिस्थल पर केन्द्रित करना चाहिए। मन विचलित न हो इसके लिए साधक सरस्वती मन्त्र अथवा गायत्री मन्त्र का पाठ अनवरत रूप से मन्द स्वर में कर सकता है। नित्यप्रति/प्रतिदिन प्रयास करने से कुछ दिवसों/काल उपरान्त साधक का मन नाभिस्थल पर केन्द्रित होने लगेगा। नित्यप्रति की अनवरत एकाग्रता के बढ़ने पर साधक को अपने नाभिस्थल में किसी अलौकिक शक्ति के होने का आभास मिलने लगेगा। चूंकि नाभिस्थल सम्पूर्ण शरीर का केन्द्र-बिन्दु है अर्थात शरीर की सभी इन्द्रियों का संबन्ध नाभिस्थल से होता है इसलिए जैसे ही नाभिस्थल पर मन की एकाग्रता का संयोग बनेगा, शरीर में एक अजीब स्फूर्ति का समावेश होगा और शरीर की सभी इन्द्रियां पुलकित होने लगेंगी।

उपरोक्त अवस्था के पश्चात् साधक को विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता है क्योंकि इसी अवस्था के पश्चात् कुण्डलिनी जाग्रत होती है और कुण्डलिनी के जाग्रत होने के पश्चात् यदि उसे नियन्त्रित न किया गया तो कुछ भी सम्भव हो सकता है।

कुण्डलिनी का जाग्रत होना क्या है
 
वास्तव में प्रत्येक मनुष्य की आत्मा उसके नाभिस्थल में सुसुप्ता अवस्था में स्थित होती है जो स्वत: मृत्यु के समय ही जाग्रत होती है और अभ्यास की अपूर्णता एवं जर्जर शरीर होने के कारण अनियन्त्रित होकर शरीर से बाहर निकल जाती है और ईश्वर के नियन्त्रण में चली जाती है तथा मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया में साधक अपनी साधना के द्वारा स्वयं अपनी सुसुप्त आत्मा को जाग्रत करता है एवं नियमित अभ्यास और स्वस्थ शरीर होने के कारण उसे नियन्त्रित भी कर पाता है जिससे उसकी आत्मा उसकी इच्छानुसार पुन: उसके शरीर में लौट आती है।

जब साधक नियमित प्रयास से अपनी सुसुप्त आत्मा को जाग्रत करता है तो वह अपने चक्राकार मार्ग से होती हुई मनुष्य के शरीर से बाहर आ जाती है। दरअसल प्रत्येक साधक का कुण्डलिनी जाग्रत करने का मुख्य उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मिलन करना होता है और इसी चरम अवस्था में साधक को परमानन्द की अनुभूति होती है किन्तु साधक को अपनी आत्मा का परमात्मा से एकाकार कराने के लिए उसे अपने योगबल से नियन्त्रित करना पड़ता है जिससे आत्मा दिग्भ्रमित होकर अनन्त आकाश में किसी अन्य लोक की ओर न अग्रसर हो सके और जब साधक की आत्मा सही मार्ग का अनुसरण करते हुए अनन्त आकाश में विचरण करती है तो वह ऐसा सब कुछ देख पाने में सक्षम हो जाती है जिसकी साधक सशरीर कल्पना तक नहीं कर पाता है और यही नियन्त्रित आत्मा जब कुछ क्षणों के लिए ही परम पूज्य परमात्मा से मिलती है तो साधक परमानन्द की अनुभूति करता है जिसे शब्दों में व्यक्त कर पाना असम्भव है। किन्तु जब तक मनुष्य जीवित है अर्थात उसकी आयु पूर्ण नहीं हुई है तब तक आत्मा का परमात्मा से पूर्ण मिलन सम्भव नहीं है। इसीलिए कुछ क्षणों उपरान्त आत्मा को अपने शरीर में वापस लौटना पड़ता है और साधक अपनी पूर्वावस्था में आ जाता है।

किन्तु साधक के शरीर से निकलकर यदि साधक की आत्मा अनियन्त्रित हो जाये और दिग्भ्रमित हो जाये तो वही आत्मा किसी अन्य लोक में भी जा सकती है फिर साधक को उस लोक के अनुभवों से गुजरना पड़ता है जैसे यदि साधक की आत्मा प्रेतलोक में विचरण करने लगी तो उसका सामना नाना प्रकार के प्रेतों से होगा और यदि साधक मजबूत िहृदय का स्वामी नहीं है तो डर से उसकी मृत्यु भी सम्भव है। ऐसी स्थिति में आत्मा प्रेतलोक में ही रह जायेगी और साधक की मुक्ति लगभग असम्भव हो जायेगी। अनियन्त्रित आत्मा यदि प्रेतलोक जैसे लोक में न भी जाये तो भी उसे साधक के शरीर वापस लाना जरा दुष्कर कार्य है। अत: सामान्य दिनचर्या एवं कमजोर िहृदय के स्वामियों से अनुरोध है कि इस प्रयोग को न आजमायें यही उनके लिए हितकर है।

कुण्डलिनी जाग्रत करने की प्रक्रिया अत्यन्त जटिल, साहसपूर्ण एवं नियमित एवं अनवरत अभ्यास की प्रक्रिया है जिसकी पूर्ण सफलता में साधक को 3-6 वर्ष तक का समय लग सकता है जो साधक की साधना पर निर्भर करता है किन्तु इसके लिए प्रथम अवस्था की अनिवार्यता भी है।

मैं मन्दबुद्धि यह समझता हूं कि मां सरस्वती मेरे माध्यम से जिन साधकों का मार्गदशZन करना चाहती हैं वे इसके दूरगामी परिणामों से पूर्ण परिचित होंगे एवं लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

इति

अब आडवानी के निशाने पर सुषमा!

अब आडवानी के निशाने पर सुषमा!
 
बढते कद और पद से परेशान है आडवाणी मण्डली
 
उमाश्री को बेक करने में लग गए हैं आडवाणी
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 07 अप्रेल। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसे प्रभावशाली पद को छीनने वाली सुषमा स्वराज अब राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग के निशाने पर आ गईं हैं। सुषमा के पर कतरने की गरज से अब आडवाणी मण्डली भारतीय जनशक्ति पार्टी की जनक उमाश्री भारती की भाजपा में वापसी के मार्ग प्रशस्त करने पर तुल गई है। आडवाणी मण्डली भयाक्रान्त है कि अगर सुषमा स्वराज के अश्वमेघ यज्ञ के घोडे को अगर रोका नहीं गया तो आने वाले दिनों में वे प्रधानमन्त्री पद की सशक्त दावेदार बनकर उभर सकतीं हैं।
 
ज्ञातव्य है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे लाल कृष्ण आडवाणी की इच्छा के विरूद्ध उन्हें नेता प्रतिपक्ष के पद से हटाकर सुषमा स्वराज को वह आसनी दे दी गई थी। जानकारों का कहना है कि उस वक्त तो आडवाणी खून का घूंट पीकर रह गए थे, किन्तु बाद में उन्होंने रणनीति बनाना आरम्भ कर दिया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद सम्भालने के उपरान्त सुषमा स्वराज बहुत ही नपे तुले कदम और निर्धारित रणनीति से ही चल रही हैं। सदन में महात्वपूर्ण मसलों और अपने प्रभावशाली उद्बोधनों के चलते सुषमा स्वराज की छवि कार्यकर्ताओं में भी बहुत ही अच्छी बनती जा रही है।
 
सुषमा स्वराज की जमीनी पकड के चलते कार्यकर्ता उनसे बरबस ही जुडते चले जा रहे हैं। गौरतलब है कि सुषमा स्वराज के लिए शिवराज सिंह चौहान ने सालों साल सींची विदिशा संसदीय सीट सौंपने का कडा कदम तक उठाया। इसके बाद शिवराज और सुषमा के बीच एक अघोषित गठबंधन स्थापित हो गया है। सुषमा के सहारे शिवराज ने मध्य प्रदेश में न केवल अपनी कुर्सी सलामत रखी है, वरन उन्होंने अपने शत्रुओं का शमन भी किया है। हाल ही में इन्दौर सम्मेलन में सुषमा स्वराज ने जिस तरह मुक्त कंठ से शिवराज सिंह चौहान की प्रशंसा की उससे लगने लगा था कि आने वाले दिनों में शिव सुषमा एक्सप्रेस बहुत ही तेजी से दौडने वाली है। वैसे भी मध्य प्रदेश का इतिहास गवाह है कि यहां केन्द्र में स्थापित और सूबे के मुख्यमन्त्री की जुगलबन्दी की एक्सपे्रस दौडी हैं। मोतीलाल वोरा के मुख्य मन्त्रित्व काल में स्व.माधवराव सिंधिया की मोती माधव एक्सप्रेस तो राजा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में कमल नाथ के साथ उनकी गलबहियां ``छोटे भाई बडे भाई`` के नाम से प्रचलित रही है।
 
बहरहाल सूत्र बताते हैं कि जैसे ही सुषमा स्वराज के कद के बढने का भान राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी को हुआ उन्होंने अपनी भजन कीर्तन मण्डली के मार्फत चालें चलना आरम्भ कर दिया है। आडवाणी ने उमाश्री भारती को वापस लाने का एसा दांव फेंका है, जिसकी काट शायद ही सुषमा स्वराज के पास हो। उधर उमाश्री भारती से भयाक्रान्त मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान और सूबे के भाजपा के अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर को मनाने का काम भी आरम्भ हो गया है।
श्यामला हिल्स पर स्थित मुख्यमन्त्री निवास के सत्रों का कहना है कि सुषमा के पाले में बैठे शिवराज सिंह चौहान अभी दुविधा में हैं कि वे वर्तमान कद्दावर नेता लाल कृष्ण आडवाणी का साथ दें अथवा भविष्य की नेता सुषमा स्वराज का दामन ही थामें रहें। उधर आडवाणी के इर्द गिर्द के लोग यह प्रचारित करने से नहीं चूक रहे हैं कि अगर उमाश्री भारती वापस आतीं हैं तो भाजपा के रीते पिछडे और महिला वोट बैंक को भरने में आसानी होगी।
उधर नितिन गडकरी के करीबी सूत्रों का कहना है कि उमाश्री विरोधी खेमा संघ और भाजपा सुप्रीमो को यह समझाने पर तुला हुआ है कि यह वही उमाश्री भारती हैं जिन्होंने भाजपा के चेहरे रहे अपने पिता तुल्य पूर्व प्रधानमन्त्री और एल.के.आडवाणी को पानी पी पी कर कोसा था। विधानसभा और लोकसभा चुनावों मेें भाजपा को नुकसान पहुंचाने मे भी उमाश्री ने कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी।

देश को परिपक्व गृह मन्त्री की दरकार

देश को परिपक्व गृह मन्त्री की दरकार

चिदम्बरम हो सकते हैं पार्टी के लाडले, पर गृह मन्त्री के कद के अनुरूप नहीं


नक्सलियों की ताकत को कमतर आंक गई सरकार

इस हमले की जिम्मेदारी निर्धारित करनी ही होगी


(लिमटी खरे)


(देश के 76 जांबाज नक्सलियों के हाथों शहीद हो गए हैं, उनके परिवार पर क्या बीत रही होगी इस बात का अन्दाज नहीं लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर चूक कहीं न कहीं तो हुई है, जो इतनी बडी तादाद में नुकसान झेलना पडा है। इसकी जवाबदेही तय करना ही होगा, वरना आने वाले सालों में देश किस रास्ते पर चलने लगेगा कहा नहीं जा सकता है। इस घटना के बाद सरकार को जगाने के लिए एक अभियान अवश्य चलाया जाना चाहिए। आज से हम नक्सलवाद पर जानकारियां और सरकार की बचकानी नीतियों की आलोचना और जमीनी हकीकत से लवरेज धारावाहिक आरम्भ कर रहे हैं। सुधी पाठकगण, मीडिया के मित्रों से आग्रह है कि वे भी सरकार को जगाने के लिए आगे आएं, वैसे कहा गया है कि सोते हुए को जगाया जा सकता है, जो सोने का नाटक करे उसे कोई भी नहीं जगा सकता। पर हम प्रयास ही कर सकते हैं। पाठकगणों का सहयोग आपेक्षित है, आपका मार्गदर्शन और सहयोग इस अभियान को किसी मंजिल तक अवश्य ही पहुंचाएगा, एसी आशा है)

देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में अब तक का सबसे बडा आतंकी हमला पाकिस्तान के इशारे पर हुआ या नहीं इसका खुलासा अभी तक आधिकारिक तौर पर नहीं हो सका है, किन्तु छत्तीगढ में अब तक का सबसे बडा नक्सली हमला देश के ही नक्सलवादियों ने किया है, यह बात आईने की तरह साफ हो चुकी है। खुफिया तन्त्र, पुलिस तन्त्र, पेरा मिलिट्री फोर्स, केन्द्र और राज्य सरकार की तमाम सावधानियों के बाद भी जिस तरह से देश के 76 जांबाज शहीद हुए उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है। इस घटना की महज निन्दा करने से काम नहीं चलने वाला।


कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ही बडे सियासी दलों के साथ ही साथ अन्य राजनैतिक दल सत्ता के मद में चूर मदमस्त हाथी की चाल चल रहे हैं। देशवासी आज अलगाववाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, भाषा वाद, क्षेत्रवाद जैसी इक्कीसवीं सदी की कुरितियों से बुरी तरह भयाक्रान्त हैं और देश के निजाम नीरो के मानिन्द चैन की बंसी बजा रहे हैं। वे मजे से नीन्द क्यों न लें, आखिर उन्हें किस बात की कमी है। खजाना जनता के लिए ही खाली है, निजामों और जनसेवकों की पगार, सुरक्षा और सुखसुविधाओं में तो रोज ही बढोत्तरी हो रही है। उनके इर्द गिर्द तो परिन्दा भी पर नहीं मार सकता है।

भारत का खुफिया तन्त्र कितना पंगु और देश के निजाम कितने नपुंसक हो गए हैं, इसके एक नहीं अनेकों उदहारण हैं। हमारे घर (हिन्दुस्तान) में घुसकर बाहर के आतातायी आकर कहर बरपाकर आसानी से चले जाते हैं और हम लकीरें ही पीटते रह जाते हैं। हद तो उस वक्त हो गई थी जब खुफिया तन्त्र की नाकामी के चलते 2008 में मुम्बई पर आतंकियों ने सबसे बडे हमले को अंजाम दिया था, उसके बाद अब नक्सलवादियों ने देश के सरमायादारों को जता दिया है कि उनकी चेतावनियों, सख्ती जैसी गीदड भभकियों पर उनके इरादे कहीं भारी हैं। इस नाकामी से निश्चित तौर पर नक्सलवादियों को अपना कार्यक्षेत्र बढाने में मदद मिलेगी। मंहगाई और भ्रष्टाचार से टूटी देश की जनता के मन में अब कानून के बजाए नक्सलवादियों का डर घर कर जाए तो किसी को अश्चर्य नहीं होना चाहिए। हमें कहने में कोई संकोच नहीं कि सरकार और विपक्षी दल मिलकर नूरा कुश्ती लड रहे हैं, अगर किसी घटना या दुघZटना पर मन्त्री, मुख्यमन्त्री का त्यागपत्र मांगा जाता है तो निश्चित तौर पर उसमें कहीं न कहीं सियासी मकसद जबर्दस्त रूप से हावी होता है। अब जनता के लिए लडने का माद्दा जनसेवकों में बचा ही नहीं है। इस हमले के बाद यह साफ हो गया है कि देश पर हुकूमत करने वालों की साठ साल की प्रशासनिक और राजनैतिक विफलता की परिणिति है यह बर्बर आतंक।

देश के गृह सचिव जी.के.पिल्लई बडी ही साफगोई से कहते हैं कि जिस इलाके में आपरेशन ग्रीन हंट चलाया जा रहा था, वह पूरी तरह से नक्सली कब्जे में था। कांग्रेस की सबसे ताकतवर नेत्री सोनिया गांधी, प्रधानमन्त्री डॉ.मनमोहन सिंह, गृह मन्त्री पी.चिदम्गरम सहित चुने हुए या पिछले दरवाजे से आए जनसेवकों को शर्म आनी चाहिए कि आजादी के छ: दशक बाद भी देश के कई इलाके एसे हैं जहां भारत सरकार का नहीं वरन देश को तोडने वाली ताकतों की हुकूमत चलती है। भव्य और एयर कण्डीशन्ड कमरों, महंगी कारो, विमानों में सफर करने वाले जनसेवकों को अगर कडकडाती धूप में एक दिन इन जवानों के साथ जंगलों में खाक छानने भेज दिया जाए तो इनकी तबियत बिगड जाएगी।

1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलवाडी से आरम्भ हुआ नक्सलवाद आज 43 साल की उमर को पा चुका है। आजाद भारत में विडम्बना तो देखिए कि 43 साल में केन्द्र और सूबों में न जाने कितनी सरकारें आईं और गईं पर किसी ने भी इस बीमारी को समूल खत्म करने की जहमत नहीं उठाई। उस दौरान चारू मजूमदार और कानू सन्याल ने सत्ता के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन की नींच रखी थी। इस आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले चारू मजूमदार और जंगल सन्थाल के अवसान के साथ ही यह आन्दोलन एसे लोगों के हाथों में चला गया जिनके लिए निहित स्वार्थ सर्वोपरि थे, परिणाम स्वरूप यह आन्दोलन अपने पथ से भटक गया। कोई भी केन्द्रीय नेतृत्व न होने के कारण यह आन्दोलन अराजकता का शिकार हो गया। चीन के क्रान्तिकारी नेता माओत्से तुग को आदर्श मानते हैं नक्सली। नक्सलियों का नारा यही रहा है कि बन्दूक की गोली से निकलती है, सत्ता।

यह जानकर सरकार को तो नहीं किन्तु आम आदमी को आश्चर्य ही होगा कि नक्सलियों का चौथ वसूली का सालाना राजस्व 1500 करोड रूपए से अधिक का है। इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल बिहार में नक्सलियों से पुलिस ने छ: लाख 84 हजार 140 रूपए तो इस साल महज तीन महीनों में ही 21 लाख 76 हजार 370 रूपए बरामद किए हैं। बताते हैं कि बालाघाट में नब्बे के दशक में नक्सलियों द्वारा उडाई गई एक पुलिस वेन के उपरान्त हुई पुलिस कार्यवाही के बाद मारे गए नक्सली की जेब से रंगदारी टेक्स वसूली की पर्ची भी मिली थी, जिसमें सबसे उपर बिठली चौकी के थाना प्रभारी द्वारा 5000 रूपए देना अंकित था।

इस घटना ने साबित कर दिया है कि देश के गृहमन्त्री जैसे जिम्मेदार ओहदे पर अब किसी के चहेते नहीं वरन वल्लभ भाई पटेल की छवि वाले जनसेवक की आवश्यक्ता है। वर्तमान गृहमन्त्री की नाकामी साफ परिलक्षित हो रही है। अतिउत्साह में उन्होंने आपरेशन ``गीन हंट`` की परिकल्पना कर उसे अमली जामा अवश्य पहना दिया। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि पलनिअप्पम चिदम्बरम के पास अनुभव की कमी है, वरना कौन होगा जो जमीनी भूगोल से परिचित कराए बिना इतने सारे जवानों को मौत के मुंह में ढकेलने का जोखम उठाएगा! केन्द्रीय गृह मन्त्री चिदम्बरम ने नक्सलियों की ताकत को कम आंका है, यह बात भी उतनी ही सच है जितनी कि दिन और रात। सरकार को नक्सलियों से लडने अपने तौर तरीकों में अमूल चूल बदलाव लाने ही होंगे, वरना आने वाले समय में देश के न जाने कितने सिपाही इस तरह काल कलवित होते रहेंगे।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

कब तक ढोए जाते रहेंगे गुलामी के लबादे

कब तक ढोए जाते रहेंगे गुलामी के लबादे
जयराम रमेश की पहल स्वागतयोग्य
उपनिवेशवाद को तिलांजली देने सरकार को उठाना होगा कडे कदम
अंग्रेजी मोह से उबरना जरूरी है भारतवासियों के लिए 

(लिमटी खरे)

देश के हृदय प्रदेश में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश ने एक एसी बहस को जन्म दे दिया है, जिसके बारे में उन्होंने शायद ही सोचा हो कि इस बहस की आज कितनी अधिक आवश्यक्ता है। जयराम रमेश ने उन्हें भोपाल पहनाए गए लबादे को उपनिवेशवाद का बर्बर प्रतीक चिन्ह कहकर उतार दिया। बकौल रमेश उन्हें आश्चर्य है कि आजादी के छ: दशकों के बाद भी हम इन निशानियों को सीने से लगाए हुए हैं। यह सच है कि आखिर कब तक हम मुगल और ब्रितानी गुलामी की गायब हो चुकी सांसों को सहेजकर रखेंगे। हो सकता है जयराम रमेश ने सूरज की तपन से उपजी गर्मी के चलते पसीने से तरबतर होकर अपना चोगा उतार फेंका हो, पर उसको जिस तरीके से उन्होंने सही ठहराया वह मुद्दे की बात है।
यह बहस महज भोपाल के दीक्षान्त समारोह तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। आज देश में कितने स्मारक और भवन एसे हैं जिनको ब्रितानी शासकों ने बनवाया था और जब तक उन्होंने राज किया तब तक वे इन्हीं भवनों को कार्यालय और निवास के तौर पर इस्तेमाल करते रहे। आज हमारे देश को आजाद हुए छ: दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, विडम्बना देखिए कि आज भी हम आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं।
आज भी देश का पहला नागरिक महामहिम राष्ट्रपति अपना आशियाना उसे ही बनाए हुए हैं जिसे कभी वायसराय जनरल ने बनाया हुआ था। देश के प्रधानमन्त्री से लेकर अधिकांश मन्त्री उन्ही कार्यालयों या निवासों में काम कर रहे हैं जो ब्रितानी शासकों के द्वारा बनवाए गए थे। क्या देश के शासकों को इन भवनों से दासता की बू नहीं आती। आती भी होगी तो निहित स्वार्थों में अंधे जनसेवकों की नैतिकता तो कभी की दम तोड चुकी है। आज भी देश का राजकाज वहीं से संचालित होता है, जिसे ब्रितानी शासनकाल में अंग्रेज वास्तुकार लुटियन ने बनाया था, आज `लुटियन जोन` में रहना स्टेटस सिंबल बन चुका है।
ब्रिटेन और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के अधीन रह चुके जमैका, युगाण्डा, हांगकांग, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, न्यूजीलेण्ड आदि में आज भी न्यायधीश अपने पद के अनुरूप सर पर विग पहना करते हैं। भारत में यह प्रथा बन्द हो गई है किन्तु माई लार्ड कहने की प्रथा लंबे समय तक जारी रही। बाद में देश व्यापी बहस के उपरान्त अप्रेल 2006 में बार काउंसिल ऑफ इण्डिया द्वारा यह व्यवस्था दी गई थी कि न्यायधीशों को माईलार्ड के स्थान पर ``सर`` कहकर संबोधित किया जा सकता है। हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा है, बार कांउंसिल अगर चाहता तो सर के अलावा या साथ ही साथ महोदय, मान्यवर जैसे हिन्दी के शब्दों को भी इसमें शामिल कर सकता था।
बहरहाल वन एवं पर्यावरण मन्त्री का साहस प्रशंसनीय है कि उन्होंने कम से कम इस बारे में न केवल सोचा वरन् उसे खुद भी अमली जामा पहनाया। दरअसल जो लबादा पहनाया जाता है वह मसीही समुदाय के धर्मगुरू के द्वारा पहने जाने वाल पोशाक से बहुत मेल खाता है। वैसे भी किसी धर्म के धर्मगुरू की पोशाक को पहनना अनैतिक ही है। यह पहनावा उस वक्त आरम्भ हुआ जब पश्चिमी सभ्यता के अनुसार धार्मिक स्थल ही शिक्षा के केन्द्र हुआ करते थे। प्राचीन भारत के गुरूकुल की व्यवस्थाओं में धर्म स्थलों के आसपास ही इन्हें स्थापित करने की अवधारणा थी, किन्तु धर्मगुरू या राजगुरू की अपनी एक पोशाक होती थी, जिसे कोई और धारण नहीं कर सकता था। रमेश ने इस गाउन को पोप और पादरियों से जोडा तो कुछ मसीही संगठनों ने अपनी नाराजगी जताई और दूसरी ओर पूर्व मानव संसाधन मन्त्री मुरली मनोहर जोशी और बिहार के निजाम नितिश कुमार उनके समर्थन में सामने भी आए हैं।
इस मामले को किसी सियासी दल में बांधकर देखना ठीक नही ंहोगा। जयराम रमेश कांग्रेस के सिपाही हैं, छत्तीसगढ में भाजपा की सरकार है, फिर भी छत्तीसगढ के गुरू घासीदास विश्वविद्यालय ने एक अनोखा फैसला लेते हुए यह व्यवस्था दी है कि किसी भी दीक्षान्त समारोह में वहां के छात्र या अतिथि कन्वोकेशन गाउन के स्थान पर कुर्ता पायजामा वह भी खादी का ही पहनेंगे। यहां के छात्रों के सर पर बांस की वह टोपी होगी जिसे आदिवासी समुदाय खुमरी कहता है और अपने सर पर धारण करता है। इस विवि का पहला दीक्षान्त समारोह 26 अप्रेल को है, तब यह अलग ही अन्दाज में नज़र आएगा। इस तरह बिलासपुर का यह डेढ दशक पुराना विश्वविद्यालय देश में पहला विश्वविद्यालय बन जाएगा जो उपनिवेशवाद का तिरस्कार कर भारतीय संस्कृति को सहेजकर आगे बढाने का काम करेगा।
देश की व्यवस्थाओं पर अगर गौर फरमाया जाए तो सरकारी तन्त्र में हर कदम पर ब्रितानी सभ्यता की ही झलक दिखाई पडती है। और तो और अनेक जिलों के जिलाधिकारी (रेवन्यू कलेक्टर) के दूरभाष आज भी जिला कलेक्टर के स्थान पर डिप्टी कमिश्नर के नाम पर ही अंकित हैं। आजादी के छ: दशकों बाद भी किसी को इसमें नाम सुधरवाने की सुध नहीं आना आश्चर्य का ही विषय है। हमारी न्यायपालिका से लेकर शिक्षा प्रणाली तक में ब्रितानी लटके झटके साफ दिखाई दे जाते हैं।
दुख का विषय तो यह कहा जाएगा कि आज भी देश में सरकारी तन्त्र अंग्रेजी में ही काम को तवज्जो देता है। जयराम रमेश खुद भी अंग्रेजी में ही काम करते हैं। इस तरह की व्यवस्थाओं में राष्ट्रभाषा के साथ ही साथ आम भारतीय भाषाएं तो दम ही तोड देंगी। हमें यह कहने में कोई संकोच नही कि आज अंग्रेजी देशवासियों पर थोपी जा रही है। आज जिन स्कूलों में सीबीएसई पाठ्यक्रम लागू है वहां अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य किया गया है, जिसका ओचित्य समझ से परे है। एक तरफ सरकार कहती है कि सारे कामकाज हिन्दी में करो और दूसरी तरफ अंग्रेजी की अनिवार्यता!
राष्ट्र के पिता होने का गोरव पाने वाले मोहन दास करमचन्द गांधी के नाम को आधी सदी से ज्यादा इस देश पर राज करने वाली कांग्रेस ने तबियत से भुनाया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। विडम्बना है कि सरकारी कामकाज की भाषा और शिक्षा के भाषाई माध्यम के बारे में बापू के क्या विचार थे, इस मामले में कांग्रेस पूरी तरह मौन साध लेती है। चेन्नई उच्च न्यायालय के वकीलों ने स्थानीय बोलचाल की भाषा तमिल में बहस की अनुमति चाही। इसके लिए उन्होंने आन्दोलन किया और हडताल भी की। न्यायधीशों ने उन्हें मूक समर्थन तो दिया पर औपचारिक निर्णय के लिए यह ब्रितानी शासनकाल में बने वायसराय जनरल के तत्कालीन आशियाने और वर्तमान राष्ट्रपति भवन में हिचकोले खा रही है। यह बात कहां तक उचित है कि स्थानीय कम पढा लिखा आदमी अपने केस की बहस सुनने जाए और उसे बहस समझ ही में न आए। क्या यह उपनिवेशवाद की भद्दी प्रस्तुति नहीं है।
आज प्रोढ हो चुकी पीढी ने अंग्रेजों की बर्बरता नहीं देखी। हमारा इतिहास भी अब वही पढाया जा रहा है, जो शासकों की पसन्द हो। आजादी कितने सितम सहने के बाद मिली इस बात को प्रोढ होने वाली पीढी नहीं समझ सकती है। दिल्ली में एक मर्तबा चाय की दुकान पर बूढे बाबा से चर्चा के दौरान जब हमने बूढे बाबा से अंग्रेजों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि जाते वक्त अंग्रेजों ने उनके प्रयोग में आने वाली साईकिलों को एक साथ जमीन पर रखकर उन पर गाडिया चलवां दी थीं, ताकि भारतवासी आजादी के बाद चलने के लिए साईकिल के लिए मोहताज रहें। यह अलहदा बात है कि आज भारत में ही साईकिल से लेकर कारों तक का निर्माण होने लगा है। एक और वाक्ये का जिकर यहां लाजिमी होगा। प्राचार्य रहे हमारे ताया से जब हमने अंग्रेजी शासनकाल के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि अंग्रेज आकर कर वसूला करते थे, पर जब हम पानी की बात करते तो वे कहते कि पानी मुहैया कराना सरकार की जवाबदारी नहीं है, आप अपने घर में ही कुआं खोदें और पानी पिएं। इतने बर्बर थे ब्रितानी।
आज समय आ गया है, जब हम इन बातो पर गौर फरमाएं कि उपनिवेशवाद के बर्बर प्रतीक चिन्हों और व्यवस्थाओं को तिलांजली देकर देश की भाषाओं को बढाने की दिशा में कदम उठाएं। हालात देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि अंग्रेजों की गुलामी से तो हम मुक्त हो चुके हैं, पर उनकी मानसिकता से मुक्ति में अभी सदियां लग सकती हैं। देश के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश की तारीफ करना चाहिए जहां पूर्व मुख्यमन्त्री राजा दिग्विजय सिंह ने विधानसभा के मिन्टो हाल से इसे मुक्त कराकर अरेरा हिल्स पर बनवा दिया इसी तरह इस सूबे का सचिवालय भी ब्रितानी सभ्यता का प्रतीक नहीं आजाद भारत में निर्मित किया गया है। सरकार को चाहिए कि हिन्दी के साथ ही साथ देश की स्थानीय भाषाओं के उत्थान और प्रोत्साहन के लिए कठोर कदम सुनिश्चित करे, वरना आने वाले समय में हिन्दी सहित देश की स्थानीय भाषाओं का नामलेवा भी कोई नहीं बचेगा।

खतरे में है बंसल की नौकरी

खतरे में है बंसल की नौकरी

जरा सा झटका और लाल बत्ती खो सकते हैं पवन बंसल

महिला आरक्षण पर नाकामी बन सकती है राजमाता की नाराजगी का सबब

राजीव शुक्ल या सुरेश पचौरी हो सकते हैं संसदीय कार्यमन्त्री

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 06 अप्रेल। केन्द्रीय संसदीय कार्यमन्त्री पवन बंसल पर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का नजला टूटने ही वाला है। महिला आरक्षण विधेयक के मसले पर सदन के प्रबंधन में पूरी तरह नाकाम रहे पवन बंसल से कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और प्रधानमन्त्री डॉ.एम.एम.सिंह बेहद खफा हैं। पवन बंसल के पर कतर दिए गए हैं, अब उनकी कद काठी राजनैतिक तौर पर पहले से काफी कम नज़र आने लगी है।

कांग्रेस संगठन की कमान दस सालों से ज्यादा तक सम्भालने वाली सोनिया गांधी को महिला आरक्षण बिल पेश न कर पाने के चलते काफी हद तक लानत मलानत झेलनी पडी थी। कांग्रेस के मेनेजरों को सोनिया गांधी ने बजट सत्र के दौरान इस विधेयक को पास करवाने की जवाबदारी सौंपी थी। सोनिया गांधी के आवरण बने ये प्रबंधक राज्यसभा तक इस विधेयक को ले गए और फिर वहां से ``बेटन`` (रिले रेस में दिया जाने वाला एक तरह का डण्डा) आगे ले जाने की जवाबदारी संसदीय कार्यमन्त्री पवन बंसल के कांधो पर थी।

कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि राज्य सभा में पवन बंसल की फीिल्डंग बेहद ही कमजोर रही। जब सोनिया गांधी को यह बताया गया कि पवन बंसल की कार्यप्रणाली के चलते महिला आरक्षण विधेयक की हालत पतली हो रही है, तब उन्होंने कांग्रेस के कुशल प्रबंधक प्रणव मुखर्जी और अपने राजनैतिक सचिव अहमद पटेल को यह जवाबदारी सौंप दी।

सूत्रों का कहना है कि मुखर्जी और पटेल ने एक बार शामिल शरीक प्रयास किए और उनकी जमाई फीिल्डंग के उपरान्त ही राज्यसभा में यह पारित हो सका। इस सब काम में इन दोनों ही महारथियों का साथ देने के लिए परदे के पीछे से सांसद राजीव शुक्ल को कमान सौंपी गई थी। कांग्रेस की चिन्ता सबसे पहले वित्त विधेयक को पारित करवाने की थी। इसी बीच रायता फैलाने की तैयारी में जैसे ही राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव दिखाई दिए, दोनों ही कुशल रणनीतिकारों ने इन्हें साधना आरम्भ किया। सूत्र बताते हैं कि कई दौर की बातचीत और सौदेबाजी के उपरान्त यह विधेयक राज्यसभा में परवान चढ सका।

सूत्रों ने यह भी बताया कि इस विधेयक को पारित होने के पूर्व और बजट पर चर्चा के एक दिन पहले ही बिहार में भ्रष्टाचार की गंगा बहाने वाले लालू प्रसाद यादव को आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में सीबीआई ने भी बच निकलने के मार्ग प्रशस्त किए थे। कांग्रेस के प्रबंधकों पर विश्वास न करते हुए प्रधानमन्त्री डॉ.मन मोहन सिंह ने परमाणु दायित्व विधेयक को पास करवाने खुद ही कमान सम्भाली थी।

दस जनपथ के सूत्रों का दावा है कि जैसे ही मन्त्रीमण्डल में विस्तार या फेरबदल किया जाएगा वैसे ही कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला को लाल बत्ती से नवाजा जा सकता है। सूत्र संकेत दे रहे हैं कि पवन बंसल को मन्त्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा और उनके स्थान पर राजीव शुक्ल को संसदीय कार्यमन्त्री का दायित्व सौंपा जा सकता है। उधर राज्य सभा के रास्ते सदन में वापसी का मार्ग खोज रहे मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी भी इस जुगत में बताए जा रहे हैं कि उन्हें बरास्ता राज्यसभा एक बार फिर संसदीय सौंध तक छ: साल के लिए जाने का मौका मिल जाए और वे संसदीय कार्यमन्त्री का दायित्व निभाने को आतुर दिख रहे हैं।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

कमल नाथ और रमेश की तनातनी सडकों पर

कमल नाथ और रमेश की तनातनी सडकों पर
राजमार्ग परियोजना पर पर्यावरण मन्त्रालय का कोई अडंगा नहीं
रमेश का राष्ट्रीय राजमार्ग की 98 फीसदी परियोजनाओं को मंजूरी देने का दावा
मध्य प्रदेश की एक परियोजना को नहीं मिली अनुमति
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 05 अप्रेल। केन्द्रीय भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ और वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश के बीच खिचीं अघोषित तलवारों की खनक अब सडकों पर भी सुनाई देने लगी हैं। यद्यपि कमल नाथ ने उनके विभाग की परियोजनाओं के पूरा होने में अभी तक वन एवं पर्यावरण मन्त्री के अडंगे की बात नहीं कही है, फिर भी जयराम रमेश का स्पष्टीकरण अपने आप में सब कुछ बयां करने के लिए काफी माना जा सकता है। गौरतलब है कि कमल नाथ पूर्व में वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय की महती जवाबदारी पूर्व प्रधानमन्त्री नरसिंम्हाराव के कार्यकाल में सम्भाल चुके हैं।
भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के सातवें दीक्षान्त समारोह में पत्रकारों से रूबरू केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश ने यह भरोसा दिलाया है कि उनका विभाग राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में कोई अडचन डालने की कोशिश नहीं कर रहा है। रमेश का कहना था कि पर्यावरण मन्त्रालय और वन विभाग ने राष्ट्रीय राजमार्ग की 98 फीसदी परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। उन्होंने आगे कहा कि जिन क्षेत्रों में बाघ संरक्षण केन्द्र या घने जंगलों के बावजूद परियोजनाएं पारित हुईं हैं, उन्ही परियोजनाओं को मंजूरी नहीं दी गई है।
अपने उपर लगे इन आरोपों को उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया कि उनकी वजह से नेशनल हाईवे परियोजनाएं बाघित हो रही हैं। बाघ संरक्षण केन्द्र अथवा घने वन क्षेत्रों में किन किन परियोजनाओं को मंजूरी नहीं दी गई है, के प्रश्न पर उन्होने बताया कि एक परियोजना मध्य प्रदेश में तो दूसरी असम में है, जिसे अनुमति नहीं दी गई हैं इन दोनो ही परियोजनाओं का खुलासा वे नहीं कर सके कि कौन सी परियोजना उनके द्वारा अटका कर रखी गई है।
पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की महात्वाकांक्षी स्विर्णम चतुभुZज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा वाले जिले सिवनी में फोरलेन निर्माण का काम मन्थर गति से चलाया जा रहा है। यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सिवनी जिले की पश्चिमी सीमा पर अवस्थित छिन्दवाडा जिला 1980 से केन्द्रीय भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ की कर्मभूमि रहा है। वे यहां से सांसद चुने जाते रहे हैं।
सिवनी जिले में फोरलेन का काम प्रभावित करने और इस मार्ग को बरास्ता छिन्दवाडा ले जाने के आरोप कमल नाथ पर लग चुके हैं। शेरशाह सूरी के जमाने की उत्तर को दक्षिण से जोडने वाली इस सडक को जीवनरेखा माना जाता रहा है। इस मार्ग को यहां से ले जाने और यहां से न गुजरने देने के लिए अनेक ताकतें सक्रिय हैं। गौरतलब होगा कि इस मार्ग का काम सिवनी के तत्कालीन जिलाधिकारी पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसम्बर 2008 के आदेश से रोका गया था। इसके बाद लोगों ने उस आदेश को खारिज करवाने के बजाए दूसरे रास्ते अिख्तयार किए जिससे मामला और उलझता चला गया। वर्तमान में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।
बहरहाल जयराम रमेश के करीबी सूत्रों का कहना है कि दरअसल भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ पूर्व में वन एवं पर्यावरण  मन्त्री रह चुके हैं। पृथ्वी सम्मेलन में उन्होंने भारत का पक्ष बहुत ही वजनदारी से रखा था। पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय अनेक अधिकारी आज भी कमल नाथ के मुरीद हैं। सूत्र बताते हैं कि कमल नाथ का हस्ताक्षेप आज भी वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय में काफी अधिक है, जिससे जयराम रमेश खफा हैं, और यही कारण है कि जब भी भूतल परिवहन मन्त्रालय की पूंछ उनके मन्त्रालय में आकर फंसती है, वे उसमें पूरे नियम कायदों का हवाला देकर उसे लंबित कराने से नहीं चूकते हैं।
जस्टिस कापडिया होंगे नए सीजे
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 05 अप्रेल। देश के नए मुख्य न्यायधीश के पद पर जस्टिस एच.एस.कापडिया की ताजपोशी होगें। वे 12 मई को सेवानिवृत होने वाले वर्तमान मुख्य न्यायधीश जस्टिस के.जी.बालाकृष्णन का स्थान लेंगे। जस्टिस कापडिया सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायधीश हैं, और उनकी सार्वजनिक वित्त, बोद्ध दर्शन, हिन्दू दर्शन, आर्थिक मामले, सामाजिक विकास आदि मामलात में गहरी रूचि है। अनुशासनप्रिय और कर्म को ही पूजा मानने वाले जसिटस एच.एस.कापडिया 29 सितम्बर 2012 तक देश के मुख्य न्यायधीश के पद पर बने रहेंगे।

आखिर चाहते क्या हैं शशि थुरूर

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

आखिर चाहते क्या हैं शशि थुरूर
भारत गणराज्य का इससे बडा दुर्भाग्य नहीं होगा कि उसका एक मन्त्री बार बार विदेश की एक सोशल नेटविर्कंग वेव साईट पर सरकरी नीतियों पर टीका टिप्पणी करे और भारत सरकार चुपचाप सब कुछ सहती रहे। बार बार टि्वटर पर टि्वट करने वाले शशि थुरूर का गुरूर तो देखिए वे इसे न केवल सही ठहरा रहे हैं, वरन् यह इसे जस्टीफाई करने से भी नहीं चूक रहे है। बकौल थुरूर जब आप टिवट करते हैं, तो आपके विचार साढे सात लाख लोगों तक पहुंचते हैं। अब सरकारी नीतियों के बारे में अगर टि्वटर पर कोई बात कही जाए तो साढे सात लाख लोग इसका फायदा उठाते हैं। जनाब शशि थुरूर को कौन बताए कि भारत सरकार के सूचना प्रसारण मन्त्रालय का मुख्य काम ही लोगों तक सरकारी नीतियों को पहुंचाना है। भारत सरकार के प्रेस इंफरमेशन ब्यूरो (पीआईबी), डीएव्हीपी के विभिन्न अंगों का मुख्य काम यही है। भारत सरकार द्वारा इसमें पदस्थ भारी भरकम अमले को करोडों अरबों रूपए प्रतिमाह का वेतन दिया जाता है। इतना ही नहीं सरकार द्वारा अरबों खरबों रूपए सालाना सिर्फ और सिर्फ इसी बात के लिए फूंके जाते हैं, ताकि सरकारी नीतियों को जनता तक पहुंचाया जा सके। अब जब भारत सरकार द्वारा यह काम किया ही जा रहा है, तो भला शशि थुरूर को क्या जरूरत आन पडी कि वे इंटरनेट के माध्यम से साढे सात लाख लोगों तक सरकारी नीतियों को पहुंचाएं। हो सकता है विदेशों में अपना ज्यादातर समय बिताने वाले थुरूर भारत सरकार की कामयाबी या नाकामयाबी को टि्वटर के माध्यम से अपन विदेशों में बैठे प्रशंसकों के साथ बांटना चाहते हों।
उमा की वापसी राह में शूल हैं ``शिव``
कभी भाजपा की फायर ब्राण्ड नेत्री रही उमाश्री भारती की भाजपा में वापसी लगभग तय ही है। उमाश्री की वापसी की अटकलें इस साल के आरम्भ से ही लगाई जाने लगीं थीं। अब राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी भी इस मुहिम में जुट गए हैं कि उमाश्री को वापस घर लाया जाए। उनकी राह में सबसे बडे रोढे के रूप में अब मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ही सामने आ रहे हैं। दरअसल शिवराज सिंह चौहान आज भी ``उमा फोबिया`` से ग्रसित नज़र आ रहे हैं। अडवाणी की मण्डली अब शिवराज सिंह को यह बताने का प्रयास कर रही है कि उमाश्री के लिए समूचा भारत कार्यक्षेत्र के लिए खोला जाएगा, किन्तु उसमें मध्य प्रदेश के इर्द गिर्द लक्ष्मण रेखा खींच दी जाएगी। बताते हैं कि आडवाणी मण्डली ने उमाश्री को इसके लिए तैयार कर लिया है कि उमाश्री चाहें तो मध्य प्रदेश को देख सकतीं हैं, पर वह सिर्फ और सिर्फ भारत के मानचित्र पर ही। दरअसल आडवाणी चाहते हैं कि उमाश्री को भाजपा में वापस लाकर उनका इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में मायावती के काट के तौर पर ही किया जाए, इसलिए शिवराज को यह भरोसा भी दिलवाया जा रहा है कि उमाश्री एक्सप्रेस दिल्ली से आरम्भ होकर झांसी के आगे बढने नहीं दी जाएगी। अब शिवराज इस बात से कितना इत्तेफाक रखते हैं, यह तो समय ही बताएगा। कहते हैं इसी के चलते मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष की ताजपोशी रूकी हुई है।
अर्जुन आउट, राहुल इन!
कभी कांग्रेस आलकमान के नज़रों की शान रहे बीसवीं सदी के कांग्रेस के अघोषित चाणक्य की कांग्रेस से रूखसती की बेला आ ही गई है। हालात देखकर लगने लगा है कि अब अर्जुन सिंह को छेडने पर वे प्रतिकार करने की स्थिति में भी नहीं बचे हैं। कांग्रेस में गुजरे जमाने के चाणक्य की यह दुर्गत निश्चित तौर पर अन्य लोगों के लिए एक सबक ही हो सकती है कि शरीर साथ देना छोड दे तो कछुए के मानिन्द अपने हाथ पैर समेटकर चुपचाप बैठ जाया जाए वरना मट्टी ही खराब होती है। हाल ही में जवाहर भवन ट्रस्ट के ट्रस्टी के मामले में भी यही देखने को मिला। कल तक नेहरू गांधी परिवार के लिए अहम माने जाने वाले इस महात्वपूर्ण ट्रस्ट का हिस्सा रहे कुंवर अर्जुन सिंह, माखन लाल फोतेदार और मोहसिना किदवई को यहां से विदा दे दी गई है। मुकुल वासनिक को इसमें शामिल किया गया है। आश्चर्य तो मोतीलाल वोरा को लेकर है, जिन्हें अहमद पटेल के स्थान पर इसका सचिव बनाया है। लगता है कांग्रेस के 21वीं सदी के चाणक्य दिग्विजय सिंह अपने नपे तुले कदमों से चल रहे हैं और सोनिया के दरबार से उन्होंने अर्जुन सिंह और अहमद पटेल की जमीन खोद ही दी है।
बिगबी के भूत से परेशान हैं चव्हाण
महाराष्ट्र सूबे के निजाम अशोक चव्हाण रात को सपने में भी अमिताभ बच्चन से खौफजदा हैं। बिगबी पर कांग्रेस सुप्रीमो की नज़रें तिरछी होने के बाद से ही सभी के लिए अमिताभ बच्चन अछूत हो गए। मुम्बई में सी लिंक के उद्घाटन के अवसर पर बिग बी की मौजूदगी पर न जाने कितनी बार उन्होंने सफाई पेश की। अब कांग्रेस के तरकश से जितने भी तीर निकल रहे हैं, उन सभी पर पता बिग बी का ही लिखा हुआ है। कांग्रेस की राजमाता को प्रसन्न करने के लिए हर कोई अमिताभ को कोस रहा है। एसे में भाजपा कैसे चूक सकती है। भाजपा परोक्ष तौर पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के बचाव में सामने आती दिख रही है। महाराष्ट्र भाजपा के नए अध्यक्ष सुधीर मुनगंटीवार ने बीते दिनों अपना पदभार ग्रहण करते वक्त ही कांग्रेस और अमिताभ के बीच चल रहे हाट एण्ड कोल्ड वार के मजे लिए। सुधीर कहते हैं कि अगर अमिताभ बच्चन विधायक बनकर सूबे की विधानसभा में चले जाएं तो मुख्यमन्त्री अशोक चव्हाण विधायकी ही छोड देंगे। सच ही है, भाट चारण अपनी जगह सही है, पर किसी शिक्सयत को अगर इस तरह अण्डर एस्टीमेट किया जाएगा तो फिर चल चुका शासन। अरे भई नैतिकता भी कोई चीज होती है। फिर अमिताभ बच्चन कांग्रेस के सम्मानित संसद सदस्य भी रह चुके हैं, इस बात को कम से कम कांग्रेस जन न ही भूलें तो बेहतर होगा।
मूर्ति के लिए पर पढाई के लिए नहीं है पैसा
दलित की बेटी होकर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाली मायावती और विवादों का गहरा नाता है। वे जानबूझकर विवादों में उलझतीं हैं, या फिर विवाद उनके गले पड जाते हैं, यह कहा नहीं जा सकता है। कभी मूर्तियां लगवाने तो कभी ताज कारीडोर तो कभी नोटों की माला का विवाद उनके गले ही पडा है। अब माया मेम साहब ने नया विवाद खडा करने का उपक्रम किया है। शिक्षा के अधिकार के कानून में उन्होंने बाल केन्द्र के पाले में धकेल दी है। अपनी मूर्तियों और पार्कों पर जनता के गाढे पसीने की कमाई के करोडों रूपए फूंकने वाली मायावती का कहना है कि शिक्षा के अधिकार कानून को सूबे में लागू करने के लिए आवश्यक धनराशि केन्द्र सरकार ही मुहैया करवाए। माया का कहना है कि एक साल में सूबे में इस काम के लिए 18 हजार करोड रूपयों की आवश्यक्ता है, इसमें से 45 फीसदी यानी 8 हजार करोड रूपए राज्य को अपने पल्ले से करना है, जो उनके लिए सम्भव नहीं है। वाह री मायावती तेरी माया अपरंपार, मूर्ति पर खुले थेलियों के मुंह और पढाई के नाम पर तुच्छ विचार।
मेरे अधरों पर हो अन्तिम वस्तु तुलसी रस काला  . . .
कभी मद्य का सेवन न करने वाले अजर अमर कवि हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला में शराब को जिस जीवान्त तरीके से विर्णत किया है, वह तारीफे काबिल ही है। कभी मधुशाला को ठण्डे दिमाग से सुनी जाए तो निश्चित तौर पर एक अलग सुखद अनुभूति का अनुभव ही होगा। इसकी हर एक पंक्ति में मधुशाला और मद्य दोनों ही के बारे मेें बारीक जानकारियां मिलती हैं। भले ही हरिवंश राय बच्चन इलाहाबाद से मुम्बई जाकर बसे हों पर बच्चन जी की मधुशाला के मुरीद पंजाब और हरियाण की राजधानी चण्डीगढ में ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। कहने को तो यहां कुल 4 लाख 83 हजार 982 मतदाता हैं। अर्थात यहां बालिगों की संख्या कुल मिलाकर इतनी है। सरकार भले ही बालिगों को शराब और पान गुटखा, सिगरेट बेचने की चेतावनी देती हो, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। चण्डीगढ में रोजाना दो लाख बोतल शराब बिक जाती है। जी हां यह सच्चाई है, पिछले एक साल में 65 लाख 736 हजार बोतलें गटक गए थे, चण्डीगढवासी। इसका मतलब यही हुआ कि यहां का हर दूसरा मतदाता मद्य के सुरूर में ही दिखता है। सच्चाई क्या है यह बात तो आबकारी विभाग वाले बेहतर जानते होंगे पर जहां तक रही आंकडों की बात तो आंकडे यही कहते दिख रहे हैं।
गिफ्ट तय करेगा चिकित्सक की सजा
अब दवा कंपनियों से उपहार लेने वाले चिकित्सकों के लिए एक बुरी खबर है, दवा कंपनियों से मनमाने उपहार लेने वाले चिकित्सकों के लिए केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय ने सजा का निर्धारण कर दिया है। आने वाले दिनों में अलग अलग मूल्य के उपहार लेने वाले चिकित्सकों को अलग अलग मूल्य पर अलग अलग समय की सजा का प्रावधान कर दिया गया है। अब पांच हजार के उपहार पर एक माह, दस हजार पर तीन माह, पचास हजार पर छ: माह, एक लाख तक तक एक साल और एक लाख से अधिक के उपहार लेने पर आजीवन सजा का प्रावधान कर दिया गया है। मन्त्रालय ने मेडीकल काउंसिल ऑफ इण्डिया की एक सिफारिश को मान लिया है। अब सजा को छ: श्रेणियों में बांट दिया गया है। मन्त्रालय की सख्ती को देखकर अब लगने लगा है कि आने वाले समय में दवा कंपनियों और चिकित्सकों के बीच की मुगलई के दिन समाप्त होने वाले हैं, पर यक्ष प्रश्न यही है कि क्या इन सिफारिशों का ईमानदारी से पालन हो पाएगा!
और वनमन्त्री हो गए `शिकार` के शिकार
शिकार हिन्दुस्तान में गैरकानूनी माना गया है। देश के एक सूबे के वन मन्त्री शिकार के ही शिकार हो गए हैं। छत्तीसगढ में वन मन्त्री विक्रम उसेण्डी सूबे में सत्ताधरी भाजपा के ही विधायकों के सवालों के जवाब देने में बगलें झांकने लगे। भाजपा विधायक देवजी पटेल ने वन मन्त्री को अवैध शिकार के लिए आडे हाथों लिया। इतना ही नहीं बसपा विधायक सौरभ सिंह के सवाल पर सदन में जवाब देते हुए उसेण्डी ने स्वीकार किया कि तुन्दुए समेत अन्य वन्य जीवों की मौत भूख प्यास के कारण हुई है। अवैध शिकार के मामले में वन मन्त्री को जवाब देना मुश्किल हो गया। देश में प्रजातन्त्र है, इसका प्रमाण तभी मिलता है, जब छत्तीसगढ के वन मन्त्री वन्य जीवों के साथ होने वाले अत्याचार को स्वीकार कर रहे हों, और उसके बाद भी अपने पद पर बाकायदा बने हों। अरे भई जब रियाया के साथ होने वाले अत्याचार के बाद शासकों का बाल भी बांका न हो तो फिर मूक जानवरों के लिए फिकरमन्द कौन हो सकता है।
मीडिया को नसीहत दी हाईकोर्ट ने
दिल्ली हाईकोर्ट ने मीडिया को एक अच्छी नसीहत दी है। वैसे भी मीडिया को अपनी हदें पहचानना चाहिए। मीडिया का काम नीति और अनीति के बारे में बताना है, किन्तु ग्लेमर के चलते मीडिया की पगडण्डी पर आकर चलने वाले लोगों द्वारा अपने आप को न्यायधीश समझ लिया जाता है। मीडिया में बहुत सारे लोग निर्णय देने लगते हैं, जो अनुचित है। इसी तारतम्य में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि आपराधिक मामलों में आरोप पत्र दाखिल होने के पूर्व मीडिया इकबालिया बयान न छापे। चीफ जस्टिस अजीत प्रकाश शाह की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ ने कहा है कि गिरफ्तारी के बाद आरोपियों को मीडिया के समक्ष न ले जाया जाए। साथ ही यह भी कहा है कि पुलिस को आरोपियों के बारे में अपनी राय नहीं देना चाहिए। दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के बारे में एक गैर सरकारी संगठन द्वारा दायर याचिक की सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशान्त भूषण ने कहा कि चार्ज शीट दाखिल होने के पहले मीडिया को खबरें प्रकाशित नहीं करना चाहिए। इस तरह के प्रचलन को उन्होंने ठीक नहीं ठहराया है।
मन्त्री जी भूल गए डीटीसी को
दिल्ली में कामन वेल्थ गेम्स के मद्देनज़र दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की भूमिका बहुत अहम मानी जा रही है। यही कारण है कि दिल्ली का परिवहन महकमा डीटीसी को चाक चौबन्द करने में जुटा हुआ है। पुरानी थकी हुई बसों के स्थान पर अब डीटीसी के बेडे में चमचमाती लो फ्लोर बस को शामिल किया जा रहा है। 55 लाख से 85 लाख रूपए मूल्य की इन बसों में तकनीकि तौर पर खामियां अवश्य हैं, साथ ही किलर ब्लू लाईन बसों के चलते इनकी तादाद तेजी से नहीं बढ पा रही है। दिल्ली के परिवहन मन्त्री को शायद किसी ने बता दिया कि अगर आप डीटीसी की बसों में सफर कर लेंगे तो मीडिया की सुर्खियां पा लेंगे। इस लिहाज से वे फरवरी के पहले सप्ताह में डीटीसी की एक लो फ्लोर की बस में चढ गए। कुछ दूर के सफर के दौरान अरविन्दर सिंह लवली को सीट नहीं मिली पर यात्रियों से उन्होंने चर्चा की और फिर अपनी चमचमाती लाल बत्ती कार में सवार होकर वे वहां से कूच कर गए। इसके बाद डीटीसी का बेडा इन्तजार ही कर रहा है कि कब चरण रज मिल पाएगी डीटीसी बस को परिवहन मन्त्री की।
सचिन नाज है तुम पर
भारतीय क्रिकेट को एस नाम बहुत सूट करता है। पहले सुनील गावस्कर ने भारत के क्रिकेट को बुलन्दियों पर पहुंचाया और अब उसके बाद सचिन रमेश तेन्दुलकर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। महज बीस सालों में ही सचिन ने दुनिया के कोने कोने में अपने फैन की तादाद में जबर्दस्त इजाफा किया है। 125 मैदान में 93 शतक और 146 अर्धशतक बनाने वाले सचिन आज दुनिया के महान बल्लेबाजों की फेहरिस्त में काफी उपर हैं। सचिन की सबसे बडी खासियत यह है कि वे एकलव्य की ही तरह अपने लक्ष्य पर ही नज़र रखे हुए हैं, वे आज तक अपने लक्ष्य से नहीं डिगे हैं, और रही विवादों की बात तो विवादों से वे कोसों दूर ही रहे हैं। 20 साल के टेस्ट, वनडे और फटाफट क्रिकेट में सचिन की सबसे उपलब्धि यही रही है कि उनके द्वारा खेले गए कुल मैचों में हर आठवें मैच में वे मैन ऑफ द मैच रहे हैं।
पुच्छल तारा
कानपुर से अजय प्रताप सिंह ने ईमेल भेजा है कि भाजपा जो भी बयान जारी करे वो सोच समझ कर ही करे। अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली में गन्दी यमुना को लेकर भाजपा का बयान आया था कि अकेले यमुना ही दिल्ली की नाक कटवा देगी। अरे भई दिल्ली की नाक कटवाने के मामले में गलत परंपराओं को आगे न बढाएं। दिल्ली की नाक कटवाने का मौका किलर ब्लू लाईन, बिगडेल पुलिस, लूटने वाले आटो चालकों आदि को भी मिलना चाहिए न।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

नियमों की भेंट न चढ जाये यह खेल प्रतिभा

नियमों की भेंट न चढ जाये यह खेल प्रतिभा

जबलपुर नगर का युवा पावर लिफ़्टिंग खिलाडी संजय बिल्लोरे का चयन मंगोलिया की राजधानी उलानबटर में दिनांक ०१ मई से ५ मई तक आयोजित एशियन पावर लिफ़्टिंग चैम्पियन शिप २०१० हेतु इंडियन-पावर-लिफ़्टिंग फ़ेडरेशन व्दारा किया गया है. किंतु इस खेल के नान औलौंपिक श्रेणी का होने के कारण न तो राज्य सरकार से और न ही भारत सरकार से खिलाडी को कोई मदद शासकीय तौर पर मिलना कठिन हो गया है. एक मध्यम वर्गीय युवा खेल-प्रतिभा को मंगोलिया तक की यात्रा के साधन जुटाने में जो ज़द्दो-ज़हद करनी पड रही आत्म विश्वास से भरे इस युवक को

पूरा भरोसा है अपने बेहतर प्रदर्शन के लिये: संजय का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हौने वर्ष २००७ में ताईवान में आयोजित एशियन पावर लिफ़्टिंग प्रतियोगिता में रज़त-पदक जीता था.

ओर्डिनेंस फ़ैक्ट्री खमरिया में मशीनिष्ट के पद पर कार्यरत संजय बिल्लोरे को इस खेल यात्रा के लिये लगभग एक लाख रुपयों की ज़रूरत है. यदि वे १५ अप्रेल तक फ़ेडरेशन को यात्रा व्यय हेतु राशि न भेज सके तो उनका चयन निरस्त कर दिया जायेगा. संजय ने यात्रा-व्यय के लिये अपने विभाग को आवेदन कर दिया है किंतु नियमों का हावाला देते हुए विभाग ने उनसे उम्मीद न रखने की सलाह दी है यद्यपि फ़ेडरेशन ने उनका आवेदन कलकत्ता स्थित मुख्यालय को भेज दिया है.

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ का मजीठिया वेतनबोर्ड को ज्ञापन

मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ का मजीठिया वेतनबोर्ड को ज्ञापन

मीडिया हाउसों में ठेकेदारी प्रथा पर लगे प्रभावी रोक

हर श्रेणी के वेतन में हो आकर्षक बढ़ोतरी

भोपाल। मीडिया में ठेकेदारी (कान्ट्रक्ट सर्विस) प्रथा के बढ़ते चलन पर `मजीठिया वेजबोर्ड` को खुलकर सामने आने का सुझाव देते हुए मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ ने 27 मार्च को भोपाल में उसे सौंपे अपने प्रतिनिधित्व :ज्ञापन: में कहा है कि कान्ट्रेक्चुअल सर्विस वास्तव में देश में लागू श्रम कानूनों का उल्लंघन है। मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ की ओर से उसके अध्यक्ष शलभ भदौरिया एवं अन्य प्रदेश पदाधिकारियों ने सौंपे इस ज्ञापन में पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए गठित मजीठिया वेजबोर्ड से कहा है कि श्रम कानून का मखौल उड़ाने वाली इस ठेकेदारी प्रथा से मीडियाकर्मियों को निजात दिलाने के लिए उसे सरकार के सामने अहम् भूमिका निबाहनी चाहिए।

उन्होने कहा कि पहले से ही समाचार पत्र उद्योग में श्रम कानूनों का उल्लंघन धड़ल्ले से किया जा रहा था तथा इससे पहले केन्द्र द्वारा स्वीकृत किए गए विभिन्न वेजबोर्ड्स की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया है। मीडिया हाउसों के दबाव में सरकारों ने इन वेजबोर्ड्स को लागू कराने की भी कोई प्रभावी मशीनरी कायम नहीं की, जिससे आज भी इनमें काम करने वाले पत्रकार एवं गैर पत्रकार साथियों का जमकर शोषण हो रहा है। दुनिया भर में अराजकता और शोषण के खिलाफ अपनी कलम से आवाज उठाने वाला यह वर्ग अपने ही शोषण के खिलाफ इन बड़े और दबंग नियोक्ताओं के खिलाफ, अपनी रोजी-रोटी बचाए रखने की गरज के कारण कुछ नहीं कह सकता है। इसलिए मजीठिया वेजबोर्ड को चाहिए कि वह उसे मिले इस अवसर को ठेकेदारी प्रथा जैसे नामाकूल चलन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए उपयोग करे।

ज्ञापन में सुझाव दिया गया है कि वेजबोर्ड लागू करने के लिए वह सरकार को श्रमजीवी पत्रकार कानून 1955 में आवश्यक संशोधन सुझाए, ताकि इसका उल्लंघन एक संज्ञान योग्य अपराध बन जाए। वेजबोर्ड को चाहिए कि वह राज्य स्तर तक नए वेतनमान लागू करने के प्रभावी उपाय भी सरकार को सुझाए ओर इसके उल्लंघन के लिए दाण्डिक प्रावधान करे। यही नहीं, बल्कि वेजबोर्ड का उल्लंघन करने वाले मीडिया हाउस को केन्द्र एवं राज्य दोनो सरकारों के विज्ञापनों के लिए `ब्लैकलिस्ट` किया जाए।

वेजबोर्ड की सिफारिशें पूरी तरह लागू करने के लिए संघ ने यह भी सुझाव दिया है कि हर साल की शुरूआत में जिला श्रम अधिकारियों द्वारा श्रमजीवी पत्रकारों की सूची तैयार कर, जिसमें उनके नियोक्ता का नाम और संस्थान भी शामिल हो, विधानमण्डलों एवं संसद के दोनो सदनों में अधिसूचना सहित पेश की जाए और इसी अधिसूचना को पत्रकारों की अधिमान्यता देते समय उपयोग में लाया जाए। इससे वेजबोर्ड लागू नहीं करने वाले संस्थानों का भाण्डाफोड़ तो होगा ही साथ ही इसी सूची के आधार पर सरकार की पेशन, स्वास्थ्य, जीवन बीमा आदि योजनाओं को पत्रकारों के लिए प्रभाव में लाया जा सकेगा।

संघ ने वेजबोर्ड में समाचार पत्रों की श्रेणियां पांच तक सीमित रखने तथा समाचार अभिकरणों की तीन श्रेणियां अन्तरर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय और टेलीविजन न्यूज चैनलों की भी श्रेणियां उनके राजस्व आय के आधार पर तय करने का सुझाव दिया है। ज्ञापन में कहा गया है कि हर वेजबोर्ड का मकसद पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए आकर्षक वेतन तय करना होता है, इसलिए मजीठिया अयोग से भी ऐसी ही अपेक्षा है, क्योंकि वर्तमान में पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के वेतनमान अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों की तुलना में काफी कम हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए तय हुए छठवें वेतनमान के मद्देनज़र तो यह और भी कम है।

वैश्वीकरण के इस दौर में निजी क्षेत्र में दिए जा रहे बेहद आकर्षक वेतन को देखते हुुए संघ का सुझाव है कि सबसे निचली श्रेणी में भी पत्रकारों के लिए वेतन निर्धारण कम से कम चालीस हजार रूपये मासिक होना चाहिए। हर श्रेणी में महंगाई भत्ते का शतप्रतिशत विलय के साथ ही समय-समय पर इसे `रिवाइज` करने की सुविधा हो तथा महंगाई भत्ता सरकारी कर्मचारियों को देय भत्ते से किसी भी कीमत पर कम नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार हाउसरेंट एलाउंस, मूल वेतन का 35 प्र्रतिशत, सिटी कम्पनसेटरी एलाउंस कम से कम एक हजार रूपये, मेडिकल एलाउंस पांच हजार रूपये मासिक तथा कन्वेंस एलाउंस भी कम से कम पांच हजार रूपये मासिक तय किया जाना चाहिए। जो कर्मचारी रात के समय ड्यूटी करते हों, उन्हें सब्सीडाइज्ड कैंटीन सुविधा अथवा 200 रूपये मील एलाउंस एवं 100 रूपये मासिक चायपान एलाउंस दिया जाए।

हर कर्मचारी को कम से कम 20 लाख रूपये का बीमा कवर मिले और इसका प्रीमियम प्रबंधन द्वारा भुगतान किया जाएं। इसके अलावा कर्मचारियों को चिकित्सा बीमा सुविधा पूरे जीवनकाल के लिए मिले और इसका प्रीमियम जिला श्रम अधिकारी के जरिए प्रबंधन द्वारा भरा जाए तथा नौकरी जाने अथवा सेवानिवृत्ति पर इसकी प्रीमियम राशि का भुगतान सरकार द्वारा हो।

संघ ने पत्रकारोंं के बच्चों की शिक्षा, गम्भीर बीमारी के लिए ईलाज, उनके सभी आश्रितों के लिए चिकित्सा सुविधा, असुरक्षित क्षेत्रों में काम करने पर रिस्क एरिया एलाउंस, जैसी मांगों को भी वेजबोर्ड के सामने पूरी ताकत से रखा है। उसने कहा है कि वेजबोर्ड इस तरह की व्यवस्था करे, ताकि उसकी लागू सिफारिशों को हर पांच साल में हर श्रेणी में अपने आप पचास प्रतिशत बढ़ा दिया जाए। उनसे यह भी आग्रह किया गया कि वह अपना कार्यकाल मई 2010 में पूरा होने तक सरकार को सिफारिशें सौंप दें और इसे एक जनवरी 2008 से लागू करने का सुझाव सरकार को दे, ताकि इसमें और अधिक विलंब नहीं हो।

श्रीराम चौरे का निधन

श्रीराम चौरे का निधन

जबलपुर। मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय के सेवानिवृत अतिरिक्त रजिस्टार, सत्य साई सेवा समिति के संस्थापक सदस्य, नार्मदीय ब्राम्हण समाज के वरिष्ठ नागरिक और श्री राजेन्दे चौरे तथा श्री विजय चौरे के पिता तथा ब्लाग में आवाज से रूबरू कराने वाले पाडकास्ट के संचालक श्री गिरीश बिल्लौरे के दादा जी वयोवृद्ध श्री श्रीराम चौरे का दुधद निधन नागपुर में हो गया है। वे 90 वर्ष के थे। उनकी अन्तिम यात्रा उनके निज निवास 659 ए, दुगाZ कालोनी, संजीवनी नगर, गढा से 03 मार्च को प्रात: साढे आठ बजे ग्वारीघाट मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान करेगी। हम सभी उनकी आत्मा की शान्ति और परिजनों को इस दुख को सहने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से कामना करते हैं।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

एआईआर में अपने हो गए पराए

एआईआर में अपने हो गए पराए
ऑल इण्डिया रेडियो मानता है नेपाली को विदेशी भाषा
(लिमटी खरे)

आज के दौडते भागते युग में देश के बारे में बच्चों और युवा होती पीढी का सामान्य ज्ञान काफी हद तक कमजोर माना जा सकता है। देश में कितने राज्य और उनकी राजधानियों के बारे में सत्तर फीसदी लोगों को पूरी जानकारी न हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किस सूबे की आधिकारिक भाषा क्या है, इस बात की जानकारी युवाओं को तो छोडिए भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मन्त्रालय के आला अधिकारियों को भी नहीं है।
सििक्कम भारत देश का हिस्सा है। चीन भी इस बात तो स्वीकार कर चुका है, कि सििक्कम भारत गणराज्य का ही एक अंग है। भारत गणराज्य के सूचना प्रसारण मन्त्रालय और प्रसार भारती के अधीन काम करने वाला ऑल इण्डिया रेडियो (एआईआर) इस राय से इत्तेफाक रखता दिखाई नहीं देता है। एआईआर की विदेश प्रसारण सेवा में एआईआर को आज भी विदेशी भाषा का दर्जा दिया गया है, जबकि सििक्कम की आधिकारिक भाषा नेपाली ही है। इतना ही नहीं 1992 में संविधान की आठवीं अनुसूची में नेपाली को शामिल किया जा चुका है। एआईआर की हिम्मत तो देखिए इसकी अनदेखी कर एक तरह से एआईआर द्वारा संविधान की ही उपेक्षा की जा रही है।
भारत गणराज्य के गणतन्त्र की स्थापना के साथ ही 1950 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में विदेशों में कल्चर प्रोपोगण्डा करने की गरज से विदेश प्रसारण सेवा का श्रीगणेश किया गया था। इस सेवा का कूटनीतिक महत्व भी होता था, इसमें विदेश प्रसारण सेवा के तहत वहां बोली जाने वाली भाषा में प्रोग्राम का प्रसारण किया जाता था। एआईआर ने वहां की भाषा के जानकारों की अलग से नियुक्ति की थी।
मजे की बात तो यह है कि विदेश प्रसारण सेवा में काम करने वाले अधिकारियों कर्मचारियों के वेतन भत्ते और सेवा शतेंZ भारत में काम करने वाले कर्मचारियों से एकदम अलग ही होते हैं। 50 के दशक में जिन देशोें को विदेश प्रसारण सेवा के लिए चििन्हत किया था, उनमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, आस्ट्रेलिया, ईस्ट और वेस्ट आफ्रीका, न्यूजीलेण्ड, मारीशस, ब्रिटेन, ईस्ट और वेस्ट यूरोप, नार्थ ईस्ट, ईस्ट एण्ड साउथ ईस्ट एशिया, श्रीलंका, म्यामांर, बंग्लादेश आदि शामिल थे।
एआईआर द्वारा नेपाली भाषा को विदेशी भाषा का दर्जा दिए जाने के बावजूद भी अनियमित (केजुअल) अनुवादक और उद्घोषकों को भारतीय भाषा के अनुरूप भुगतान किया जा रहा है, जो समझ से परे ही है। बताते हैं कि कुछ समय पहले केजुअल अनुवादक और उद्घोषकों द्वारा भुगतान लेने से इंकार कर दिया गया था। बाद में समझाईश के बाद मामला शान्त हो सका था।
उधर पडोसी मुल्क नेपाल जहां की आधिकारिक भाषा नेपाली ही है, ने भारत के ऑल इण्डिया रेडियो के इस तरह के कदम पर एआईआर के मुंह पर एक जबर्दस्त तमाचा जड दिया है। नेपाल में उपराष्ट्रपति पद की शपथ परमानन्द झा द्वारा हिन्दी में लेकर एक नजीर पेश कर दी। इतना ही नहीं नेपाल सरकार ने एक असाधारण विधेयक पेश कर लोगों को चौंका दिया हैै। इस विधेयक में देश के महामहिम राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद की शपथ मातृभाषा में लिए जाने का प्रस्ताव दिया गया था।
अब सवाल यह उठता है कि 1992 में आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के 18 साल बाद भी इस मामले को लंबित कर लापरवाही क्यों बरती जा रही है। यह अकेला एसा मामला नहीं है, जबकि हिन्दी को मुंह की खानी पडी हो। वैसे भी हिन्दी देश की भाषा है। लोगों के दिलोदिमाग में बसे महात्मा गांधी, पहले प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज तक के निजाम हिन्दी को प्रमोट करने के नारे लगाते आए हैं, पर हिन्दी अपनी दुर्दशा पर आज भी आंसू बहाने पर मजबूर है।
लोग कहते हैं कि दिल्ली हिन्दी नहीं अंग्रेजी में कही गई बात ही सुनती है। हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं के प्रोत्साहन के लिए अब तक करोडों अरबोें रूपए खर्च किए जा चुके हैं, दूसरी ओर सरकारी तन्त्र द्वारा हिन्दी को ही हाशिए पर लाने से नहीं चूका जाता है। हिन्दी भाषी राज्यों में ही हिन्दी की कमर पूरी तरह टूट चुकी है। ईएसडी के प्रोग्राम में ``प्रेस रिव्यू`` नाम का प्रोग्राम होता है। इसमें भारतीय अखबारों में छपी खबरों और संपादकीय का जिकर किया जाता है। विडम्बना देखिए कि इसमें हिन्दी में छपे अखबरों को शामिल नहीं किया जाता है। यद्यपि एसा कोई नियम नहीं है कि इसमें सिर्फ आंग्ल भाषा में छपे अखबारों का ही उल्लेख किया जाए पर यह हिन्दुस्तान है मेरे भाई और यहां अफसरों की मुगलई चलती आई है, और आगे भी अफसरशाही के बेलगाम घोडे अनन्त गति से दौडते ही रहेंगे।

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

पेंच में हुआ 40 लाख का बन्दरबांट

पेंच में हुआ 40 लाख का बन्दरबांट

अति सुरक्षि पेंच नेशनल पार्क से चोरी हुए ट्रिप केमरे

(लिमटी खरे)

सिवनी। वन्य जीवों पर नज़र रखने के लिए मंहगे ट्रिप केमरे ही सिवनी जिले के पेंच नेशनल पार्क से चोरी कर लिए गए हैं। देहरादून से बुलवाकर पेंच में स्थापित किए गए ट्रिप केमरों में से पांच केमरे जगह से नदारत पाए गए हैं। इसकी बाकायदा पुलिस में सूचना भी दजZ की गई है। पिछले एक असें से चर्चा में आए पेंच नेशनल पार्क में नित नई घटना घट रही है। यहां पदस्थ वन विभाग के मुलाजिम अपने कर्तव्यों और वन्य जीवों के प्रति कितने संवेदनशील हैं, इस बात का प्रमाण आए दिन यहां होने वाले वन्य जीवों के शिकार से मिलता है। पिछले दिनों यहां एक नर बाघ की मौत का मामला विधानसभा में भी गूंजा था। जिला मुख्यालय सिवनी की विधानसभा सीट पर भाजपा से चुनाव जीतीं परिसीमन में समाप्त हुई सिवनी लोकसश की अन्तिम सांसद श्रीमति नीता पटेरिया ने यह प्रश्न उठाया था, तब वन मन्त्री सरताज सिंह ने प्रबंधन की लापरवाही से साफ इंकार किया था। बाद में वन मन्त्री के सदन में दिए बयान की हवा उस वक्त निकल गई जब उक्त बाघ की बिसरा रिपोर्ट में यह साफ हुआ कि उक्त बाघ की मौत सामान्य नहीं थी, वरन उसे जहर देकर मारा गया था। इसके पहले यहां शावकों की मौत पर भी हाय तौबा मची थी। सवाल यह उठता है कि जिस राष्ट्रीय उद्यान की सुरक्षा के लिए वहां सुरक्षा बल मौजूद हो, जहां यह दावा किया जाता हो कि यहां परिन्दा भी पर नहीं मार सकता है, वहां शिकारी आकर सरेआम शिकार कर रहे हों, वन्य संपदा की कटाई चरम पर हो तब यही कहा जा सकता है कि जब समूचे कुंए में ही भांग घुली ह® तब क्या किया जा सकता है। गौरतलब है कि इस नेशनल पार्क के रखरखाव, देखरेख और वन्य संपदा और जीवों की हिफाजत का जिम्मा मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारी डॉ. के. नायक और वनमण्डलाधिकारी स्तर के अधिकारी ओम प्रकाश तिवारी के मजबूत कांधों पर सौंप रखा है। क्षेत्र में चल रही चर्चाओं के अनुसार जबसे उक्त अधिकारीद्वय ने यहां कार्यभार सम्भाला है तब से पेंच नेशनल पार्क के वन्यजीव अपने आप को बुरी तरह असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। बताया जाता है कि इनके कार्यकाल में अब तक तीन बाघ और दो शावक असमय ही काल कलवित हो चुके हैं। इस चमत्कार के बाद वित्तीय वर्ष 2009 - 2010 के अन्तिम दिन आनन फानन 40 लाख रुपए के धनादेश (चेक) काट दिए गए हैं। विभागीय सूत्रों के अनुसार नियमानुसार काम पूरा होने पर वर्क वेरीफिकेशन सर्टिफिकेट जारी होने के उपरान्त ही धनादेश जारी किए जाते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां पदस्थ सात में से छ: वनपालों के बीच 40 लाख रुपए की राशि के चेक एक ही दिन में काट दिए गए हैं। बताया जाता है कि इस वित्तीय वर्ष में पांच तालाब और कुछ बििल्डंग के निर्माण हेतु यह राशि जारी की गई है। सूत्र बताते हैं कि उक्त राशि पिछले साल जुलाई माह में पेंच नेशनल पार्क सिवनी को आवंटित कर दी गई थी, बावजूद इसके अभी तक इस राशि की मद में कोई काम संपन्न नहीं हो सका है। जानकारों का मानना है कि अब जब रेंजर्स के पास राशि आ गई है, तब वे इस राशि को किस मद में फूंकेगे यह कहा नहीं जा सकता है। अमूमन काम पूरा होने पर उसकी गुणवत्ता को देखने के बाद ही राशि जारी की जाती है, मगर इस मामले में यह नहीं कहा जा सकता है कि यह काम गुणवत्ता के साथ होगा या होगा भी या नहीं, हो सकता है काम कराए बिना ही राशि बिना डकार के पचा ली जाए।

शिक्षा को अनिवार्य कैसे किया जाएगा!

शिक्षा को अनिवार्य कैसे किया जाएगा!

पैसेजंर फाल्ट की तर्ज पर लागू करना होगा कानून
 
भय बिन न प्रीत हो गोसाईं
 
(लिमटी खरे)

एक अप्रेल का दिन बचपन से ही अप्रेल फूल बनाने के नाम से जाना जाता रहा है। इस दिन जो चाहे झूट सच बोला जाए, सब कुछ माफ ही होता है। इस दिन किए गम्भीर से गम्भीर मजाक को भी माफ ही कर दिया जाता है। सरकार ने इसी दिन से अनिवार्य शिक्षा कानून लागू करने की घोषणा की है। यह बात मजाक है या सच इस बारे में तो सरकार ही जाने पर आम जनता जरूर इसे मजाक के तौर पर ही ले रही है।
शिक्षा आदि अनादिकाल से ही एक बुनियादी जरूरत समझी जाती रही है। पहले गुरूकुलों में बच्चों को व्यवहारिक शिक्षा देने की व्यवस्था थी, जो कालान्तर में अव्यवहारिक शिक्षा प्रणाली में तब्दील हो गई। आजाद भारत में शासकों ने अपनी मर्जी से शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। अब शिक्षा जरूरत के हिसाब से नहीं वरन् सत्ताधारी पार्टी के एजेण्डे के हिसाब से तय की जाती है। कभी शिक्षा का भगवाकरण किया जाता है, तो कभी सामन्ती मानसिकता की छटा इसमें झलकने लगती है।
वर्तमान में अनिवार्य शिक्षा के कानून में 6 से 14 साल के बच्चे को अनिवार्य शिक्षा प्रवेश, पहली से आठवीं कक्षा तक अनुर्तीण करने पर प्रतिबंध, शारीरिक और मानसिक दण्ड पर प्रतिबंध, शिक्षकों को जनगणना, आपदा प्रबंधन और चुनाव को छोडकर अन्य बेगार के कामों में न उलझाने की शर्त, निजी शालाओं में केपीटेशन फीस पर प्रतिबंध, गैर अनुदान प्राप्त शालाओं के लिए अपने पडोस के मोहल्लों के न्यूनतम 25 फीसदी बच्चों को अनिवार्य तौर पर नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है।
जिस तरह लोगों को आज इतने समय बाद भी रोजगार गारंटी कानून के बारे में जानकारी पूरी नहीं हो सकी है, उसी तरह आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून टॉय टॉय फिस्स हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस नए कानून से किसी को राहत मिली हो या न मिली हो कम से कम गुरूजन तो मिठाई बांट ही रहे होंगे क्योंकि उन्हें शिक्षा से इतर बेगार के कामों में जो उलझाया जाता था, उससे उन्हें निजात मिल ही जाएगी। अब वे धूप में परिवार कल्याण और पल्स पोलियो जैसे अभियानों में चप्पल चटकाने से बच सकते हैं।
लगता है अनिवार्य शिक्षा कानून का मसौदा केन्द्र में बैठे मानव संसाधन विकास मन्त्री कपिल सिब्बल ने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली सहित अन्य महानगरों और बडे शहरों को ध्यान में रखकर बनाया है। इसमें शाला की क्षमता के न्यूनतम 25 फीसदी उन छात्रों को निशुल्क शिक्षा देने की बात कही गई है, जो गरीब हैं। हाल ही में स्वास्थ्य महकमे में दिल्ली की स्वास्थ्य मन्त्री किरण वालिया ने ही बताया था कि दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में पिछले पांच सालों में महज पांच गरीबों का ही इलाज हो सका है। जब देश के नीति निर्धारकों की जमात के स्थल पर ही इस तरह की व्यवस्थाएं फल फूल रही हों तब बाकी की कौन कहे। आने वाले दिनों में अनिवार्य शिक्षा कानून की धज्जियां अगर उडती दिख जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
अगर देखा जाए तो मानक आधार पर कमोबेश हर शाला भले ही वह सरकारी हो या निजी क्षेत्र की उसमें बुनियादी सुविधाएं तो पहले दिन से ही और न्यूनतम अधोसंरचना विकास का काम तीन साल में उलब्ध कराना आवश्यक होता है। इसके अलावा पुरूष और महिला शिक्षक के लिए टीचर्स रूम, अलग अलग शौचालय, साफ पेयजल, खेल का मैदान, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, बाउण्ड्रीवाल और फेंसिंग, किचन शेड, स्वच्छ और हवादार वातावरण होना आवश्यक ही होता है।
छात्रों के साथ शिक्षकों के अनुपात में अगर देखा जाए तो सीबीएसई के नियमों के हिसाब से एक कक्षा में चालीस से अधिक विद्याथियों को बिठाना गलत है, फिर भी सीबीएसई से एफीलेटिड शालाओं में सरेआम इन नियमों को तोडा जा रहा है। शिक्ष्कों के अनुपात मे मामले में अमूमन साठ तक दो, नब्बे तक तीन, 120 तक चार, 200 तक पांच शिक्षकों की आवश्यक्ता होती है।
अपने वेतन भत्ते और सुविधाओं में जनता के गाढे पसीने की कमाई खर्च कर सरकारी खजाना खाली करने वाले देश के जनसेवकों ने अब देश का भविष्य गढने की नई तकनीक इजाद की है। अब किराए के शिक्षक देश का भविष्य तय कर रहे हैं। कल तक पूर्णकालिक शिक्षकों का स्थान अब अंशकालीन और तदर्थ शिक्षकों ने ले लिया है। निजी स्कूल तो शिक्षकों का सरेआम शोषण कर रहे हैं। अनेक शालाएं एसी भी हैं, जहां शिक्षकों को महज 500 रूपए की पगार पाकर 2500 रूपए पर दस्तखत कर रहे हैं।
बहरहाल सरकार को चाहिए कि इस अनिवार्य शिक्षा कानून में संशोधन करे। इसमें भारतीय रेल, दिल्ली परिवहन निगम और महाराष्ट्र राज्य सडक परिवहन की तर्ज पर पैसेंजर फाल्ट सिस्टम लागू किया जाना चाहिए। जिस तरह इनमें सफर करने पर टिकिट लेने की जवाबदारी यात्री की ही होती है। चेकिंग के दौरान अगर टिकिट नहीं पाया गया तो यात्री पर भारी जुर्माना किया जाता है। उसी तर्ज पर हर बच्चे के अभिभावक की यह जवाबदारी सुनिश्चत की जाए कि उसका बच्चा स्कूल जाए यह उसकी जवाबदारी है। निरीक्षण के दौरान अगर पाया गया कि कोई बच्चा स्कूल नहीं जाता है तो उसके अभिभावक पर भारी पेनाल्टी लगाई जानी चाहिए। सरकार द्वारा सर्वशिक्षा अभियान, स्कूल चलें हम, मध्यान भोजन आदि योजनाओं पर अरबों खरबों रूपए व्यय किए जा चुके हैं, पर नतीजा सिफर ही है। निजाम अगर वाकई चाहते हैं कि उनकी रियाया पढी लिखी और समझदार हो तो इसके लिए उन्हें वातानुकूलित कमरों से अपने आप को निकालकर गांव की धूल में सनना होगा तभी अतुल्य भारत की असली तस्वीर से वे रूबरू हो सकेंगे।

राजमाता फेंट सकतीं हैं अपने पत्ते

राजमाता फेंट सकतीं हैं अपने पत्ते
टीम सोनिया के पुर्नगठन की सुगबुगाहट
एक व्यक्ति एक पद का सिद्धान्त हो सकता है लागू
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 01 अप्रेल। ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) में फेरबदल की सुगबुगाहटें तेज हो गईं हैं। आने वाले समय में एआईसीसी में नए चेहरे आमद दे सकते हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी पर बढते दवाब के चलते वर्तमान में सत्ता और संगठन की जवाबदारी सम्भालने वाले अनेक नेताओं को एक पद खोना पड सकता है। एआईसीसी में अनेक नेताओं ने पदोन्नती की आस में ही अपने बाल सफेद कर लिए हैं। यही कारण है कि कांग्रेस के अखिल भारतीय कार्यालय 24 अकबर रोड में अब रोष और असन्तोष का तापमान दिनोन्दिन बढता ही प्रतीत हो रहा है।
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र 10 जनपथ के सूत्रों का दावा है कि पार्टी में आनन फानन फेरबदल की आवश्यक्ता इसलिए पडने लगी है, क्योंकि आलाकमान पर एक व्यक्ति एक पद के सिद्धान्त को लागू करने का दवाब बढता ही जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी के ही एक ताकतवर पदाधिकारी द्वारा महाभारत के अर्जुन के तरह अपने निशाने को साधा जा रहा है। कल तक सत्ता के गलियारे में ताकतवर रहे और फिर चन्द सालों के लिए सत्ता के बियावन से बाहर हुए राजनेता द्वारा इस तरह का तानाबाना बुना जा रहा है ताकि सत्ता और संगठन दोनों ही में मलाई काट रहे नेताओं के एक हाथ से लड्डू छुडा लिया जाए। वर्तमान में नारायण सामी, जयराम रमेश, पृथ्वीराज चव्हाण, गुलाम नवी आजाद, मुकुल वासनिक, वीरप्पा मोईली आदि के पास संगठन के साथ ही साथ सत्ता के पद भी हैं।
सूत्रों ने आगे बताया कि आलाकमान के निर्देश पर गुलाम नवी आजाद को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने कमरे में करण सिंह के लिए स्थान बनाएं तो मोईलो को मणिशंकर अय्यर के लिए कमरा खाली करने को कहा गया है। गौरतलब है कि मन्त्रीपद की शपथ लेने के उपरान्त इन मन्त्रियों ने शायद ही कभी एआईसीसी मुख्यालय की ओर रूख किया हो। सूत्रों ने बताया कि आलाकमान को मिली शिकायतों में कहा गया है कि कार्यकर्ता जब भी इनसे संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें काफी मशक्कत करनी होती है। पार्टी के अदने से सिपाहियों को इन मन्त्रियों के बंग्लों से दुत्कार कर भगा दिया जाता है।
कमोबेश यही आलम पार्टी के सचिवों का है। पार्टी में अनेक सचिव एसे हैं जो सालों से कुर्सी पर चिपक कर रह गए हैं। टाम वडाक्कन एसी शिख्सयत है, जो पार्टी के मीडिया प्रभाग से तब से जुडे हुए हैं जबसे श्रीमति सोनिया गांधी अध्यक्ष पद पर काबिज हुईं हैं। पार्टी में सचिव वडाक्कन के अलावा इरशाद बघेल, प्रवीर डावर, अनीस दुर्रानी, इमरान किदवई, मेजर वेदप्रकाश आदि सालों से पदोन्नति की बाट ही जोह रहे हैं। जब भी उपकृत करने की बारी आती है, इनके स्थान पर किसी और को राज्यपाल बना दिया जाता है या राज्य सभा में भेज दिया जाता है, अथवा किसी निगम का अध्यक्ष्ष बना दिया जाता है।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि आलाकमान को बताया गया है कि अगर बिना रीढ के लोगों को इसी तरह इनाम दिया जाता रहा तो पार्टी ही की रीढ टूट सकती है। बी.के.हरिप्रसाद और प्रथ्वीराज चाव्हाण जिनका परफारमेंस अब तक ऋणात्मक रहा है, और जो अपने अपने राज्यों में पार्टी को जिला नहीं सके हैं, उन्हें उच्च आसनी दिए जाने से कार्यकर्ता बुरी तरह खफा हैं। कहा जा रहा है कि आलाकमान को कहा गया है कि इन आधार विहीन लोगों को उनके राज्यों में ही पार्टी प्रमुख बनाकर भेजा जा सकता है। वैसे भी वीरप्पा मोईली पर तेलंगाना मुद्दे की गुत्थी उलझाने के आरोप लग रहे हैं।

बुधवार, 31 मार्च 2010

भाई बहन में झगडा कैसा!

भाई बहन में झगडा कैसा! 
कांग्रेसी ही बढा रहे गांधी बच्चन परिवार में दूरियां
अहम में से `अ` को अलग करें सोनिया
(लिमटी खरे)

पिछली शताब्दी में रूपहले पर्दे के महानायक रहे बच्चन  और राजनीति के सिरमौर रहे नेहरू गांधी परिवार के बीच खटास गहराती ही जा रही है। एक समय एक दूसरे के पूरक समझे जाने वाले दोनों ही परिवार इक्कसवीं सदी में एक दूसरे के खून के प्यासे ही दिख रहे हैं, भले ही अन्दर से दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति सम्मान और प्यार बना हो पर परिदृश्य में उकरे चित्रों को देखकर यह माना जा सकता है कि दोनों एक दूसरे को पसन्द तो कतई नहीं कर रहे हैं।
बच्चन परिवार की बहू और गुजरे जमाने की मशहूर अभिनेत्री जया बच्चन जब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को कोसती नज़र आतीं हैं, और मीडिया जब इस बात को तूल देता है तब अमिताभ आगे आकर दोनों ही परिवारों के पुराने संबन्द्धों के चलते इस विवाद का शमन करते नज़र आते हैं। अमिताभ अपनी अर्धांग्नी जया के बारे में यह कह देते हैं कि जया को नहीं पता कि बच्चन और गांधी परिवार की नजदीकियां कितनी हैं, जया नासमझ हैं।
बच्चन और गांधी परिवार की नजदीकियों को समझने के लिए कुछ पन्ने पलटाने ही पडेंगे। पूर्व प्रधानमन्त्री प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इन्दिरा गांधी के नौरत्नों में से एक रत्न हरिवंश राय बच्चन भी हुआ करते थे। इसके बाद अगली पीढी में अमिताभ बच्चन और स्व.राजीव गांधी गलबहियां कितनी सशक्त थीं यह बात सभी बेहतर तरीके से जानते हैं।
दोनों ही परिवार कितने करीब थे इसका प्रमाण इटली मूल की सोनिया एन्टोनिया माईनो (सोनिया गांधी का असली नाम) का राजीव गांधी की अर्धांग्नी बनने का किस्सा ही है। जब सोनिया और राजीव गांधी के विवाह की बारी आई तब राजीव गांधी बरात लेकर अमिताभ बच्चन के घर ही गए थे। सोनिया का कन्यादान भी तेजी बच्चन के हाथों हुआ था। तेजी बच्चन भले ही सोनिया के लिए देवकी (पाउलो अर्थात सोनिया की असली माता) न हों पर यशोदा की भूमिका में तो नज़र आईं। इस लिहाज से अमिताभ बच्चन और सोनिया गांधी भाई बहन ही हुए।
9 दिसम्बर 1946 को इटली के ओवासांजो में जन्मी स्टीफनो मानियो और पाउलो की पुत्री सोनिया को भारतीय संस्कारों के बारे में जो जानकारी मिली वह उनके विवाह के उपरान्त ही मिली। भारत में भगवान कृष्ण के लालन पालन और संस्कारित करने के लिए हर पल यशोदा का नाम ही सामने आता है। उन्हें जन्म देने वाली माता देवकी को लोग गाहे बेगाही ही याद करते होंगे। इसी तरह पाउलो के बजाए सोनिया के लिए तेजी बच्चन और उनके परिवार का सम्मान ज्यादा जरूरी होना चाहिए। अमिताभ उनके भाई हुए, राजनीति में भाई भाई का नहीं होता है, यह कहावत यहां चरितार्थ होती दिख ही रही है।
एक समय अपने बाल सखा और सोनिया के पति राजीव गांधी को स्पष्ट बहुमत दिलाने के लिए अमिताभ भी राजनीति के कीचड में उतरे थे। वे इलहाबाद से संसद सदस्य बने, पर जब उन्हें लगा कि इस तरह की राजनीति से उनकी एंग्री यंग मेन और सुपर स्टार वाली छवि मटियामेट हो सकती है, उन्होंने तत्काल इस तरह की राजनीति से तौबा कर ली। इसके बाद एबीसीएल नामक कंपनी के गर्त में जाने के बाद अमिताभ टूट से गए थे। इस समय उनके लिए तारणहार बनकर आए थे, अमर सिंह। कहते हैं कि अमर सिंह ने सुब्रत राय सहारा आदि के माध्यम से अमिताभ को आर्थिक इमदाद मुहैया करवाई थी, जिससे अमिताभ फिर से सामान्य हो सके। यही कारण है कि अमिताभ ने बरास्ता अमर सिंह, मुलायम और समाजवादी पार्टी के प्लेटफार्म पर अपनी रेल लगा दी थी।
राजनीति के शातिर किन्तु छिछोरे खिलाडी अमर सिंह ने अपनी दोधारी चालों से बच्चन और गांधी परिवार के बीच पक रही सुगंधित खीर में निब्बू निचोडना आरम्भ कर दिया। नीबू की बून्दो से खीर का दूध फट गया और कालान्तर में केसर और अन्य मावों की सुगंध धीरे धीरे दुर्गन्ध में तब्दील हो गई। हद तो तब हो गई जब देश की व्यवसायिक राजधानी मुम्बई में बान्द्रा सीलिंक के दूसरे चरण के उद्घाटन मेें सदी के महानायक की उपस्थिति को लेकर बवाल कटा।
कांग्रेस के सिपाहसलार इस मामले में अपना दामन पाक साफ बताने के लिए तरह तरह के जतन करने लगे। यहां तक कि मुख्यमन्त्री अशोक चव्हाण ने बयान दे दिया कि यदि उन्हें अमिताभ की मौजूदगी पूर्व जानकारी होती तो वे वहां नहीं जाते। कांग्रेस के आलाकमान को चाहिए कि चव्हाण के इस बयान पर ही उनसे त्यागपत्र मांग लें। मामला अमिताभ की मौजूदगी का नहीं मामला चव्हाण की बयानबाजी का है। क्या एक सूबे के निजाम को यह पता नहीं होता कि जिस प्रोग्राम में वह शिरकत करने जा रहा है वहां कौन कौन से अतिथि आमन्त्रित होंगे। अगर एसा है तो एसे मिट्टी के माधव के हाथों देश के इतने बडे सूबे की कमान किस योग्यता के आधार पर अब तक सौंपी हुई है।
अमिताभ की मौजूदगी को लेकर जिन कांग्रेसियों के पेट में मरोड हो रही है, वे सभी अब मुम्बई के प्रोग्राम के बजाए अमिताब के द्वारा गुजरात के ब्राण्ड एम्बेसेडर होने पर आपत्ति दर्ज करा रहे हैं। सदी का महानायक अगर किसी प्रोग्राम में शिरकत करने पहुंच भी गया तो क्या सूबेे निजाम अशोक चव्हाण में इतनी नैतिकता भी नहीं बची कि वह राष्ट्रनायक की मौजूदगी को तर्क या कुर्तक के जरिए सही साबित कर आलोचकों के मुंह पर अलीगढ के ताले जड दे।
यह भी तय है कि सोनिया एन्टोनिया माईनो एवं गांधी परिवार के अन्य सदस्यों को अमिताभ की वहां उपस्थिति से कोई अन्तर नहीं पडा होगा। सोनिया और राहुल गांधी के अब तक के कदमताल से साफ हो जाता है कि वे दोनों कभी भी अमिताभ बच्चन या उनके परिवार को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तरीके से अपमानित करने का विचार भी मन में नहीं ला सकते हैं। फिर कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनू सिंघवी भी कह रहे हैं कि आलाकमान अर्थात कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने कभी भी अमिताभ बच्चन से दूरी बनाने के कोई निर्देश नहीं दिए हैं।
इसके बाद अर्थ अवर के दौरान दिल्ली में अमिताभ बच्चन के सुपुत्र अभिषेक बच्चन को ब्राण्ड एम्बेसेडर बनाया जाना भी चर्चाओं का हिस्सा बन गया। चव्हाण के राग मल्हार को आगे बढाते हुए दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित ने भी अपने हाथ झाडते हुए यह कह दिया कि उन्हें भी अभिषेक के एम्बेसेडर होने की जानकारी कतई नहीं है। सवाल यह उठता है कि कांग्रेस के दो मुख्यमन्त्री इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान दे रहे हों और आलाकमान धृतराष्ट्र तो विपक्ष दल चीर हरण के दौरान गुरू द्रोणाचार्य की भूमिका में हों तब बेचारी द्रोपदी (देश की निरीह जनता) की लाज बचाने भगवान कन्हैया कहां से आ पाएंगे।
बहरहाल तेजी बच्चन की मानस बेटी बन चुकीं सोनिया गांधी 28 फरवरी 1968 को हरिवंश राय बच्चन के घर में ही राजीव गांधी की हुईं थीं। अमिताभ बच्चन उनके सगे भाई तो नहीं पर अग्रज से बढकर हैं। राजीव गांधी और अमिताभ के दोस्ती के किस्से मशहूर हैं। आज राजीव गांधी नहीं हैं, तो इन दोनों ही परिवारों के बीच घुलती खटास को समाप्त करने की जवाबदारी सोनिया की ही है। विडम्बना है कि सोनिया ने भारत की इस संस्कृति को समझ ही पाया है कि अहम में से अगर `अ` निकाल दिया जाए तो वह हम में तब्दील हो जाता है। हमारी निजी राय में सोनिया को आगे आना चाहिए और उनके भाई अमिताभ पर हो रहे इस तरह के हमलों को रोकने के लिए कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को निर्देश देना होगा। दलगत राजनीति अपनी जगह है, पर सत्ता पाने और खबरों में बने रहने के लिए पारिवारिक विघटन होगा और नैतिकता का क्षरण होने लगा तो आने वाले समय में भारत का राजनैतिक परिदृश्य सुनहरा के बजाए बदबू मारते कीचड से सना ही नज़र आएगा।

सिवनी जिला थर्ड ग्रेड के शहरों में शामिल!


सिवनी जिला थर्ड ग्रेड के शहरों में शामिल!

मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां 1 अप्रेल से बन्द करेंगी ब्राडबेण्ड सुविधा

बीएसएनएल की चलेगी मोनोपल्ली

फोरलेन के चलते आईं हैं मोबाईल कंपनियां

(लिमटी खरे)

सिवनी 31 मार्च। आईडिया, रिलायंस, एयरटेल, टाटा आदि जैसी नामी गिरामी कंपनियों ने राजस्व के मामले में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले को थर्ड ग्रेड (सी ग्रेड) के जिलों की सूची में सिवनी जिले को शामिल कर दिया है। 1 अप्रेल से सिवनी में मोबाईल के क्षेत्र में निजी सेवा प्रदाता कंपनियों ने इस जिले में ब्राड बेण्ड की सुविधा अवरूद्ध करने का निर्णय लिया है। एक अप्रेल के उपरान्त जिले में इंटरनेट की ब्राड बेण्ड सेवा सिर्फ और सिर्फ भारत संचार निगम लिमिटेड द्वारा ही निबाZध रूप से प्रदाय की जाएगी।

गौरतबल है कि 2003 के उपरान्त सिवनी जिले में बीएसएनएल के अलावा शेष मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने एकाएक निवेश करना आरम्भ कर दिया था। रिलायंस, टाटा, आईडिया, एयरटेल आदि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने सिवनी जिले में आमद दी और उपभोक्ताओं को नेटवर्क देने की गरज से यहां अपने अपने मोबाईल टावर और रिटेल आउटलेट स्थापित करना आरम्भ किए। जिले में एकाएक लोगों का मोबाईल प्रेम जागा। आलम यह है कि अब कमोबेश हर हाथ में एक मोबाईल और आधे से ज्यादा लोगों के पास दो से अधिक मोबाईल दिख ही जाते हैं।

सिवनीवासी आश्चर्यचकित थे कि आखिर मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को क्या सूझी कि वे बिना किसी सर्वे के ही सिवनी में आकर कूद गईं। रिलायंस कंपनी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों को सिवनी से कोई विशेष लगाव या दिलचस्पी नहीं है, दरअसल सिवनी का यह सौभाग्य है कि यह स्विर्णम चतुभुZज के उत्तर दक्षिण गलियारे पर अवस्थित है। चूंकि कंपनियों को चतुभुZज और इसके अंगों पर निबाZध तौर पर मोबाईल सेवा उपलब्ध कराना है, इसीलिए सिवनी में नामी गिरामी मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों द्वारा अपना नेटवर्क उपलब्ध कराया गया है। एक पन्थ दो काज की दृष्टि से कंपनियों ने यहां इंटनेट सुविधा भी मुहैया करवाई थी। बाद में राजस्व के नज़रिए से उन्हें घाटा दिखाई पडने लगा।

प्राप्त जानकारी के अनुसार निजी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियों को सिवनी जिले से वांछित राजस्व न मिल पाने से क्षुब्ध होकर इन कंपनियों ने सिवनी जिला वासियों को सबक सिखाने की सोची है। सम्भवत: यही कारण है कि इन सेवा प्रदाता कंपनियों द्वारा पूर्व में इंटरनेट सुविधा, फिर हाई स्पीड और अब ब्राडबेण्ड सुविधा प्रदान की गई है, जिसमें से ब्राड बेण्ड सुविधा को वापस लेने का निर्णय लिया गया है।

उधर दूसरी और जिलावासियों ने इन कंपनियों को हाथों हाथ इसलिए भी लिया था क्योंकि बीएसएनएल का नेटवर्क सदा ही माशाअल्लाह मिलता था। लोग तो यहां तक कहने लगे थे कि बीएसएनल का तातपर्य ``भीतर से नहीं लगता`` या ``भूले से नहीं लगता`` हो गया है। आज भी आलम यह है कि शहर के अन्दर ही अगर आमने सामने बैठकर एक दूसरे का बीएसएनएल का नंबर मिलाया जाए तो आउट ऑफ कवरेज एरिया का टेप सुनाई पड जाता है। जबलपुर रोड पर स्थित क्षेत्रीय परिवहन कार्यलय में तो इसका नेटवर्क भूले से नहीं मिल पाता है। अब इन कंपनियों के ब्राडबेण्ड के क्षेत्र में मैदान से हटने के उपरान्त अब बीएसएनएल के ब्राडबेण्ड के अकेले रह जाने से उसकी मोनोपल्ली बढने की संभावना बढ गई है। इन परिस्थितियों में उपभोक्ताओं को गुणवत्ता के साथ सेवाएं मिल पाएं इसमें शंका ही नज़र आ रही है।