गुरुवार, 6 मई 2010

सांसदों की पांचों उंगलियां घी में

सांसदों की पांचों उंगलियां घी में

सांसद निधि को उचित ठहराया अदालत ने

वेतन को तीन गुना बढाने की तैयारी

असली मलाई काट रहे हैं जनसेवक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 06 मई। देश के नीति निर्धारक जनसेवक अब आवाम की सेहत का ध्यान रखने के बजाए अपनी खुद की सेहत सुधारते ही नजर आ रहे हैं। आजादी के वक्त जनसेवकों के मन में जो देश सेवा का जो जुनून दिखाई पडता था, आज वो कहीं खो सा गया लगता है। आधी धोती पहनकर ब्रितानियों को देश से खदेडने वाले महात्मा गांधी के नाम पर राजनैतिक रोटियां सेंकने वाले जनसेवकों केा अब जनता की कोई परवाह ही नहीं रह गई है।

एक तरफ देश के सत्तर फीसदी लोगों को दो समय पोष्टिक भोजन के लाले पडे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर देश की सबसे बडी पंचायत (संसद) के सदस्य अपना वेतन तीन गुना बढवाने की जुगत भिडा रहे हैं। गौरतलब है कि वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव ने भी कहा था कि अगर महिला आरक्षण विधेयक परवान चढ गया तो बडी मात्रा में पुरूष सांसदों को अनिवार्य सेवानिवृति लेने पर मजबूर होना पडेगा इसलिए सांसदों का वेतन अस्सी हजार और उनकी पेंशन एक लाख रूपए महीना कर दी जानी चाहिए।

संसद में लगातार हंगामे और गतिरोध के उपरांत इस बात पर सहमति बनती दिख रही है कि देश के ‘‘गरीब जनसेवक सांसदों‘‘ के वेतन और भत्तों में तीन गुना बढोत्तरी कर दी जाए। बजट सत्र के अंतिम दिन सांसदों को यह तोहफा देने की तैयारी की जा रही है। ध्यान रहे कि जनसेवकों का वेतन और एशो आराम की हर चीज देश की आवाम से वसूले कर से ही मुहैया करवाई जाती है।

संसद से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो सांसदों के वेतन और भत्तों से संबंधित समिति ने सिफारिश भी दे दी है कि सांसदों का मूल वेतन मंत्रालयों के सचिवों से अधिक अर्थात अस्सी हजार रूपए महीना होना चाहिए। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि इस प्रस्ताव को मंत्रिमण्डल (केबनेट) की अनुमति के बाद संसद में प्रस्ताव पारित करवा दिया जाएगा। इस मसले पर लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिह यादव ने वित्त मंत्री से तीन घंटे तक रायशुमारी भी की है।

सूत्रों ने कहा कि समिति के सदस्य एस.एस.अहलूवालिया ने कहा है कि चूंकि प्रोटोकाल के अनुसार भारत गणराज्य में सांसदों की औकात (स्थिति) भारत सरकार के सचिव से उपर ही होती है, अतः उनका वेतन भी सचिव से अधिक ही होना चाहिए। वर्तमान समय में सांसदों को 16 हजार रूपए महीना मूल वेतन और भत्ते आदि मिलाकर 40 हजार रूपए की राशि मिलती है। इसके अलावा आना निशुल्क, जाना निशुल्क, दिल्ली में रहना निशुल्क, बिजली निशुल्क, हवाई यात्राएं निशुल्क आदि न जाने कितनी सुविधाएं मिलती हैं। वहीं सचिवों का मूल वेतन 80 हजार है, इसमें 47 फीसदी मंहगाई भत्ता अगर जोड दिया जाए तो सचिव को प्रतिमाह एक लाख सत्रह हजार छः सौ रूपए तनख्वाह मिलती है। दोनों हाथों से देश की रियाया की गर्दन मरोडने वाले जनसेवकों ने सांसद निधि बढाने का जतन भी किया था, जिसे योजना आयोग ने सिरे से ही खारिज कर दिया था। अदालत ने सांसदों को दी जाने वाली वर्तमान निधि को उचित ठहराया है।

सोरेन पर चलना चाहिए चार सौ बीसी का मामला

इधर हाजिर उधर गैरहाजिर

विधानसभा और लोकसभा के बीच चमत्कार दिखा रहे हैं सोरेन

शोध का विषय बनते जा रहे हैं सोरेन

सोरेन पर चलना चाहिए चार सौ बीसी का मामला

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 06 मई। झारखण्ड की सत्ता पर काबिज होने वाले शिबू सोरेन का व्यक्तित्व अब विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय बनता जा रहा है। आने वाले समय में उनके उपर शोध होने लगे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। झारखण्ड के मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद संसद सदस्य शिबू सोरेन ने लोकसभा में महज एक ही दिन अपनी शक्ल दिखाई है, पर राज्य की सरकार वे पूरी मुस्तैदी से चला रहे हैं।

दांव पेंच में माहिर शिबू सोरेन ने बीमारी का कारण बताकर लोकसभाध्यक्ष से अवकाश मांगा है। सदन के नियमों के अनुसार लोकसभा या राज्य सभा के सदस्य को बाकायदा लोकसभा अध्यक्ष या राज्य सभा के सभापति से अनुपस्थित रहने पर अनुमति की दरकार होती है। यह अनुमति अवकाश के पहले या बाद में ली जा सकती है। इसी क्रम में शिबू सोरेन ने 13 अप्रेल को आवेदन देकर 19 दिसंबर 2009 से 21 दिसंबर 2009 तथा 22 फरवरी 2010 से 16 मार्च तक का अवकाश मांगा था। शिबू की अब तक की 56 दिन की छुट्टी को मंजूरी दी जा चुकी है।

बजट सत्र के दूसरे अंश में 15 अप्रेल से 07 मई तक वे फिर सदन से बंक मार गए। इस दौरान भाजपा के कटौती प्रस्ताव के वोटिंग के दिन  अलबत्ता वे सदन में उपस्थित हुए थे। इस दौरान उन्होंने भाजपा की बैसाखी पर झारखण्ड में सरकार चलाने के बावजूद भाजपा के खिलाफ ही मताधिकार का प्रयोग कर सबको चौंका दिया था। बस यही टर्निंग प्वाईंट साबित हुआ सोरेन के लिए। भाजपा ने उनसे समर्थन वापस ले लिया।

जिस तरह स्कूल कालेज में विद्यार्थी बीमारी का बहाना कर आवेदन देकर अवकाश लिया करते हैं, फिर अपने साथियों के साथ मौज मस्ती करते हैं, लगता है गुरूजी की स्कूल कालेज की यादें अभी ताजा हैं। गुरूजी भी उसी तर्ज पर झारखण्ड में अपनी सरकार चला रहे हैं। सबसे अधिक आश्चर्य का विषय तो यह है कि देश की सबसे बडी पंचायत लोकसभा में किसी भी जिम्मेदार पदाधिकारी या संसद सदस्य को अब तक यह नहीं सूझा की जो व्यक्ति बीमार है, वह आखिर बीमारी की हालत में मुख्यमंत्री की शपथ लेकर राज्य की विधान सभा या अपने सचिवालय अथवा कार्यालय में बैठकर सूबे का शासन किस तरह चला सकता है। देखा जाए तो सोरेन पर चार सौ बीसी का मामला चलाया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने अपनी बीमारी की वजह से लोकसभा से तो अवकाश लिया है पर राज्य की सरकार चला रहे हैं। यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति एक जगह बीमार हो और दूसरी जगह काम पर मुस्तैद हो। हो भी सकता है यह चमत्कार सिर्फ और सिर्फ शिबू सोरेन जैसा चालाक राजनेता ही कर सकता है।

आज हरिभूमि में पुन: रोजनामचा

400 सौ वीं पोस्‍ट

बुधवार, 5 मई 2010

ग्रामीण विद्युतीकरण निगम में छत्तीसगढ़ की बकाया 345 करोड़ रूपये प्रदान करे - डॉ. रमन सिंह

ग्रामीण विद्युतीकरण निगम में छत्तीसगढ़ की बकाया
345 करोड़ रूपये प्रदान करे - डॉ. रमन सिंह
 
राज्य के लंबित मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री की
केन्द्रीय उर्जा मंत्री श्री षिन्दे के साथ बैठक

नई दिल्ली 5 मई छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने केन्द्रीय उर्जा मंत्री श्री सुषील कुमार षिंदे से मिलकर ग्रामीण विद्युतीकरण निगम में लंबे समय से राज्य की बकाया 345 करोड़ रूपये की राषि षीघ्र जारी करने की मांग की है । उन्होंने कहा कि ग्रामीण विद्युतीकरण निगम ने यह राषि बिना किसी उचित कारण के भुगतान करने से रोक रखी है । उन्होंने उर्जा मंत्रालय से इस संबंध में आर.ई.सी. को तत्काल राषि जारी करने के निर्देष देने का आग्रह किया । मुख्यमंत्री ने यह मांग आज नई दिल्ली में उर्जा मंत्रालय में बैठक के दौरान की । केन्द्रीय मंत्री ने इस संबंध में मध्यप्रदेष और छत्तीसगढ़ के अधिकारियों की बैठक बुलाकर दो माह की अवधि में राज्य सरकार को यह भुगतान सुनिष्चित करने का निर्देष दिया ।
    बैठक में मुख्यमंत्री ने केन्द्र द्वारा राज्य को अनावंटित कोटे की 186 मेगावाट बिजली  को कम करके षून्य करने का विषय उठाया । उन्होंने कहा कि इससे राज्य की जनता को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रह है । उन्होंने इसे पुनः बहाल करने की मांग की । बैठक में उन्होंने राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत राज्य के कोरिया और जषपुर जिले के लिए प्रस्तुत विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन की स्वीकृति में विलंब के संबंध में केन्द्रीय मंत्री का ध्यान आकृष्ट किया । उन्होंने कहा कि इन दोनो जिलों की अधिकांष आबादी आदिवासी बाहुल्य और अविद्युतीकृत है इसलिए इन्हें प्राथमिकता के साथ इसका लाभ दिलाया जाना चाहिए । उन्होंने कहा कि इन दोनो जिलों के लिए सैद्धान्तिक सहमति जारी की जाये । इन कार्यो को राज्य के संसाधनों से 11वीं पंचवर्षीय योजना में ही प्रारंभ  कर दिया जाये तथा केन्द्र द्वारा राज्य द्वारा किये गये व्यय की प्रतिपूर्ति योजना की स्वीकृति  उपरांत कर  दी जाये । बैठक में उन्होंने राज्य में आगामी वर्षो में होने वाले विद्युत उत्पादन के मद्देनजर एक राष्ट्रीय स्तर के पॉवर ट्रेनिंग इन्स्ट्टियूट की स्थापना की मांग की । इस इन्स्ट्टियूट में पॉवर से संबंधित षोध और प्रषिक्षण  का कार्य किया जायेगा जिससे देष को काफी लाभ होगा । चर्चा के दौरान उन्होंने छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित ताप विद्युत परियोजनाओं के लिए आवंटित केप्टिव कोल ब्लॉक के विकास में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के स्तर पर विलंब का मामला उठाते हुए इस संबंध में आवष्यक पहल करने की मांग की ।
    बैठक में मुख्यमंत्री ने राज्य में प्रस्तावित 1000 मेगावाट क्षमता की मड़वा परियोजना को मेगापॉवर प्रोजेक्ट की मान्यता देने का भी आग्रह किया । इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत सरकार की आर.ए.पी.डी.आर.पी. योजना के तहत जनसंख्या का मापदण्ड 30 हजार के स्थान पर 20 हजार करने का आग्रह किया । उन्होंने कहा कि ऐसा करने से छत्तीसगढ़ के अधिकांष षहरों में विद्युत तंत्र के सुधार में मदद मिलेगी । केन्द्रीय उर्जा मंत्री ने मुख्यमंत्री द्वारा उठाये गये सभी मुद्दों के षीघ्र निराकरण के लिए अधिकारियों को निर्देषित किया । बैठक में उर्जा सचिव श्री अमन कुमार सिंह , आवासीय आयुक्त श्रीमती रिचा षर्मा और विषेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी श्री विक्रम सिसोदिया भी उपस्थित थे ।

क्या कसाब का गला नाप पाएगा जल्लाद

क्या कसाब का गला नाप पाएगा जल्लाद

सजा के बाद 308 की फांसी को नहीं पहनाया जा सका अमली जामा

2004 के बाद खाली बैठे हैं देश के जल्लाद

(लिमटी खरे)

आज अजमल आमिर कसाब को सजा सुनाई जाएगी। तीन दिन से समाचार चेनल और अखबार यही चीख चीख कर कह रहे हैं, पर सजा की तारीख पर तारीख बढती ही जा रही है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले के एकमात्र जिंदा गवाह कसाब की सजा का इंतजार समूचा देश कर रहा है। सभी की निगाहें मुंबई उच्च न्यायलय पर ही टिकी हुईं हैं। अनुमान तो यही लगाया जा रहा है कि कसाब को ‘‘हेंग टिल डेथ‘‘ की सजा सुनाई जाएगी।

बार बार अपने बयान बदलने, अदालत को गुमराह करने, जेल में लजील बिरयानी तो कभी पाकिस्तान से वकील बुलाने की मांग करने वाला शातिर अपराधी कसाब सोलह माहों से भारत गणराज्य की सरकार का सरकारी मेहमान है। कसाब को जिस जेल में बंद रखा गया है, वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। 21 फरवरी 2009 को कसाब ने अदालत के सामने स्वीकार किया था कि उसे लश्कर द्वारा आतंकी गतिविधयों के लिए बाकायदा प्रशिक्षण दिया गया था और भारत पर हमला करने के लिए भेजा गया था। इसके बाद 06 मई 2009 को कसाब अपने ही बयान से पलट गया था। 20 जुलाई 2009 को कसाब ने फिर अपना जुर्म स्वीकार किया और सजा की मांग की। इसके बाद 18 दिसंबर को कसाब ने एक बार फिर यू टर्न लेते हुए कहा कि उसे हमले के 20 दिन पहले पुलिस ने जुहू से पकडा था, वह भारत के सुनहले पर्दे से आकर्षित होकर समझौता एक्सप्रेस से भारत आया था। 20 दिसंबर 2009 की तारीख में भी वह अपने आरोपों से मुकरा। 18 जनवरी 2010 को कसाब ने नया पैंतरा फेंकते हुए कहा कि ताज होटल पर हमला करने वाले चार आतंकी भारत के ही थे।

सोलह माह पहले कसाब ने अपने साथियों के साथ आतंक का जो नंगा नाच नाचा था, उसके बाद उसने भारतीय न्याय व्यवस्था पर एतबार न होने की बात भी कही और किसी अंतराष्ट्रीय अदालत में इसे चलाने की मांग की। कसाब के उपर हो रहे करोडों रूपयों के खर्च को लोगों ने गलत करार देते हुए उसे तत्काल फांसी पर चढाने की मांग की। हम यह बताना चाहते हैं कि कसाब पर भारत सरकार द्वारा जो खर्च किया जा रहा है, वह अकारत नहीं जाएगा। कसाब को जिंदा रखने में भारत को जितना कूटनीतिक फायदा हुआ है, वह अरबों खरबों रूपए खर्च कर भी नहीं पाया जा सकता है। दूसरी ओर इससे पाकिस्तान को जो नुकसान हो रहा है, वह भी अनमोल ही है।

भारत की न्याय व्यवस्था की जितनी तारीफ की जाए कम होगा। एक तरफ दुनिया के चौधरी अमेरिका ने 9/11 के आरोपियों के खिलाफ मुकदमा आरंभ ही नहीं किया गया है, वहीं दूसरी ओर मुंबई आतंकी हमले की सुनवाई लगभग समाप्ति की ओर है। यकीनन इस प्रक्रिया से भारत की न्याय व्यवस्था का सर गर्व से उंचा ही हुआ है। इस मामले ने दूध का दूध और पानी का पानी की कहावत को चरितार्थ कर दिया है। अब समय आ गया है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समस्त देशों को पाकिस्तान की सरजमीं पर चल रहे आतंकी शिविरों और संगठनों के खिलाफ एकजुट होकर कठोर कार्यवाही सुनिश्चित करने दवाब बनाया जाना चाहिए।

मुंबई हमलों पर बन रही फिल्म ‘‘अशोक चक्र‘‘ 28 मई को देश के सिनेमाघरों में प्रदर्शन के लिए तैयार है। इसमें कसाब की भूमिका 22 वर्षीय राजन वर्मा ने निभाई है। फिल्म की तस्वीरें अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं, इन्हें 09 मई को जनता के लिए दिखाने की व्यवस्था है। इस सिनेमा का नाम पहले टोटल टेन रखा गया था, बाद में इसे बदलकर अशोक चक्र कर दियाग गया था। इस फिल्म में कसाब को फांसी पर चढते भी दिखाया गया है।

यक्ष प्रश्न तो यह खडा हुआ है कि अगर कसाब को मुंबई उच्च न्यायलय फांसी की सजा सुना भी देता है तो फांसी देने वाला जल्लाद (जेल में फांसी देने वाला) क्या उसकी गर्दन नाप पाएगा? आंकडों पर अगर गौर फरमाया जाए तो आज देश में 06 महिलाओं सहित 308 अपराधी फांसी की सजा पाने के बाद भी इंतजार में ही हैं कि कब उनकी गर्दन जल्लाद के हाथों में होगी। इन 308 में से अस्सी बिहार में, उत्तर प्रदेश में 70, महाराष्ट्र में 38, मध्य प्रदेश में 16, तमिलनाडू और उडीसा में 14 - 14, पश्चिम बंगाल में 13 और दिल्ली में 09 आरापी हैं, जो फांसी के इंतजार में हैं।

देश में अंतिम बार फांसी 2004 में धनंजय नाम के आरोपी को दी गई थी, जिस पर नाबालिग बालिका के साथ बालात्कार कर उसकी हत्या करने का आरोप था। कसाब के सामने अभी सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का रास्ता बचता है। इसके बाद भी अगर वह चाहे तो महामहिम राष्ट्रपति से दया की भीख (मर्सी पिटीशन) मांग सकता है। संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू सहित 29 लोगों की इस तरह की याचिकाएं अभी लंबित ही हैं। अगर कसाब को कुछ दिन और जिंदा रखा जाता है तो निश्चित तौर पर यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए काफी सुकून की बात होगी और इससे आतंक की फेक्ट्री चलाने वाले पाकिस्तान की परेशानियों में जरूर इजाफा होगा।

कांग्रेस का गरीबों को तोहफा

कांग्रेस का गरीबों को तोहफा

सेंट्रल स्कूल में बढेंगी एक लाख सीट

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 05 मई। केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना ‘‘शिक्षा का अधिकार‘‘ के लागू हो जाने के बाद अब सरकार ने घर से ही इसे अमली जामा पहनाना आरंभ कर दिया है। मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के अधीन संचालित होने वाले केंद्रीय विद्यालयों में इस साल एक लाख सीट बढाने की योजना है। वर्तमान में केंद्रीय विद्यालय में अध्ययन करने वाले छात्रों की संख्या दल लाख तेंतीत हजार है, इस लिहाज से इसमें लगभग दो लाख साठ हजार सीट बढना था, पर इसके प्रथम चरण में दस लाख सीट बढाने पर विचार चल रहा है।

केंद्रीय विद्यालय संगठन के सूत्रों का कहना है कि इस कार्ययोजना का मसौदा तैयार कर लिया गया है, इसी माह संगठन की गर्वनिंग बाडी की बैठक में इसे पेश किए जाने की पूरी तैयारी है। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद अब केंद्रीय विद्यालयों में भी पच्चीस फीसदी सीट गरीबों के बच्चों के लिए आरक्षित की जा रही हैं। सूत्रों के अनुसार पहले वर्तमान संख्या में से ही इसे समाहित करने का प्रस्ताव आया था, जिसका विरोध होने पर उसे वापस लेकर सीट बढाने की बात पर सहमति बना ली गई।

सूत्रों ने बताया कि आने वाले तीन सालों में पच्चीस फीसदी सीट का लक्ष्य पूरा कर लिया जाएगा। बढी हुई विद्यार्थियों की तादाद के बारे में सूत्रों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था के तहत पांचवी स्तर तक प्रतिकक्षा 35 तो पांचवीं से आठवीं तक 40 तो आठवीं के उपरांत इनकी संख्या 45 निर्धारित है। नई व्यवस्था में इसमें एकरूपता लाई जा सकती है, जिसके अनुसार प्रति कक्षा विद्यार्थियों की तादाद 45 कर दी जाएगी। उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में केंद्रीय विद्यालयों की कक्षाओं में पर्याप्त स्थान है, जिसमें 45 बच्चे बैठ सकते हैं। नई व्यवस्था इसी शैक्षणिक सत्र से लागू होने की उम्मीद जताई जा रही है।

वैसे मानव संसाधन एवं विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने केंद्रीय विद्यालयों से सांसदों का कोटा खत्म कर एक बहुत बडा कदम उठाया था। इससे सांसदों की नाराजगी भी उन्हें झेलनी पडी थी, पर सिब्बल अपनी जिद पर अडे रहे। 1200 सीटों का कोटा समाप्त हो जाने पर अब केंद्रीय विद्यालयों में दाखिला आसान तो होगा किन्तु इसमें गैर नौकरीपेशा लोग जो केटेगरी सात में आते हैं वे आज भी अपने बच्चों को केंद्रीय विद्यालय में नहीं पढा पाएंगे।

कोला मामले में सख्त हुआ कोर्ट का रूख

कोला मामले में सख्त हुआ कोर्ट का रूख

सरकार पर बरसा न्यायालय: कहा क्या तब तक जनता जहर पीती रहेगी

शक के दायरे में है सरकार की नीयत

(लिमटी खरे)
नई दिल्ली 05 मई। कोला मामला सरकार के गले की फांस ही बनता जा रहा है। कोला मामले में केंद्र सरकार द्वारा नोटिफिकेशन करने में बहुत विलंब किया जा रहा है, जो न्यायालय को रास नहीं आ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को फटकारते हुए इसमें विलंब के कारण जानने चाहे, जब सरकार की ओर से तीन चार माह के वक्त की दरकार की गई तो कोर्ट का कहना था कि क्या तब तक जनता जहर ही पीती रहेगी। सर्वोच्च न्यायालय में वर्ष 2004 में सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटीगेशन (सीपीआईएल) द्वारा एक याचिका दायर की थी, जिसमें एक जनहित याचिका के माध्यम से कोला में सेहत के लिए हानिकारक पदार्थों की मिलावट का शक जाहिर किया गया था, साथ ही सॉफ्ट ड्रिंक की गुणवत्ता पर नजर रखने की मांग की थी।

गौरतलब है कि भारत गणराज्य की सरकार को एक नोटिफिकेशन जारी करना था, जिसके उपरांत कोला और पेप्सी के निर्माताओं द्वारा अपने उत्पादों में मिलाए जाने वाले असली तत्वों की मात्रा के बारे में बोतल पर जानकारी देना जरूरी हो जाएगां गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय में सीपीआईएल द्वारा दायर इस प्रकरण की सुनवाई के दौरान सरकार ने नोटिफिकेशन जारी करने में अपनी असमर्थता जताते हुए 90 दिनों का समय मांगा। फूड सेफ्टी एण्ड स्टेंडर्ड अथॉरिटी के द्वारा बार बार विलंब करना न्यायालय को कतई रास नहीं आया। जैसे ही अर्थारिटी के वकील द्वारा समय की मांग की गई वैसे ही विद्वान न्यायधीश जस्टिस सुधा मिश्रा ने उक्त वकील को फटकारते हुए कहा कि क्या तब तक जनता को जहर पीना होगा।

जस्टिस सुधा मिश्रा और जस्टिस दलवीर की युगल बैंच ने सरकार को इस बात के लिए भी आडे हाथों लिया कि उत्पाद की गुणवत्ता की जांच के लिए बनाए गए साईंटिक पेनल में सरकार द्वारा इन उत्पादक कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों को क्यों शामिल किया है। जस्टिस मिश्रा ने सरकार की ओर से पैरवी करने वाले अतिरिक्त सालीसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह से यह भी पूछा है कि उन लोगों को पेनल का सदस्य कैसे बनाया जा सकता है, जिनके खिलाफ ही प्रकरण हो। कोई भी व्यक्ति अपने ही केस में जज की भूमिका में कैसे हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि आम जनता को सरकार के जांच पेनल पर भरोसा होना चाहिए। निजी हितों वाले लोगों को इसका हिस्सा कतई नहीं बनाया जा सकता है।

हरिभूमि 05 मई 2010

मंगलवार, 4 मई 2010

नक्सलियों को जनमत संग्रह की चुनौती

नक्सलियों को जनमत संग्रह की चुनौती

छत्तीसगढ़ का आम आदिवासी नक्सल हिंसा के दंष से
 
 मुक्ति पाकर विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने लोकतंत्र , विकास और आतंकवाद विषय पर आयोजित चर्चा में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नक्सलवाद को समाप्त करने पर जोर दिया

नई दिल्ली 4 मई छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सलियों तथा उनकी विचारधारा के समर्थकों को छत्तीसगढ़ में जनमत संग्रह की चुनौती दी है । नई दिल्ली में लोकतंत्र , विकास और आतंकवाद विषय पर आयोजित चर्चा में मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी देष की किसी भी निष्पक्ष संस्था से पूरे राज्य में इस विषय पर जनमत संग्रह कराया जाये की राज्य की जनता नक्सलियों की विचारधारा के पक्ष में है या लोकतांत्रिक प्रक्रिया से राज्य के विकास के पक्ष में । उन्होंने कहा कि इससे देष के महानगरों में अनर्गल प्रलाप करने वाले तथाकथित बुद्विजीवियों का भ्रम दूर हो जायेगा । उन्होंने कहा कि नक्सलियों का मुख्य एजेंडा देष के षासन तंत्र पर कब्जा कर अपनी विचारधारा का षासन चलाना है और छत्तीसगढ़ के लोग उसके इस प्रयास में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़े है । चर्चा में केन्द्रीय भारी उद्योग विभाग के मंत्री श्री विलासराव देषमुख , झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल मंराडी ,  मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा सासंद श्री सीताराम येचुरी ने भी अपने विचार व्यक्त किए ।
 
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जोर देकर कहा कि देष में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नक्सली विचारधारा को पराजित करना जरूरी है । उन्होंने कहा कि लाषों को गिनकर नक्सल समस्या की गंभीरता को नही समझा जा सकता है । यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे जीतना देष के लिए जरूरी है । उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भारत में काफी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने भी आदिवासी अंचलों में विकास को यह कहकर रोककर रखा कि इससे आदिवासियों की मूल संस्कृति पर असर पड़ेगा। इसीलिए उन्होंने आदिवासियों के निवास क्षेत्रों में सड़क, बिजली जैसी जरूरी अधोसंरचना भी नहीं बनने दिया। विदेशी पर्यटकों को इन इलाकों में घुमाने और उनसे यात्रा वृतांत लिखवाने का फैशन चलाया गया। जो किसी न किसी रूप में आज भी कथित एनजीओ, मानव अधिकार संगठन का एक सगल है। मुझे आश्चर्य होता है कि उनमें से ही कुछ लोग अब यह सवाल करते हैं कि बस्तर में सड़क क्यों नहीं बने। अबूझमाड़ अबूझ कैसे रह गया। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि एक दीर्घ कालीन षड़यंत्र के तहत बरसों पहले यह सब किया जाता रहा था, ताकि इन इलाकों में नक्सलवाद की तरह का आतंकवाद और अलगाववाद पनप सके।  उन्होंने सवाल उठाया कि एक कसाब, एक अफजल गुरू के खिलाफ जितना आक्रोश, जितना गुस्सा भारतवासियों के दिल में है, उतना गुस्सा नक्सलवादियों के लिए क्यों नहीं होना चाहिए। भोले-भाले वनवासियांे के खून की कीमत मुम्बई, दिल्ली में रहने वाले किसी व्यक्ति के खून से भला कम कैसे हो सकती है? उन्होंने कहा कि मैं भारत सहित दुनिया के मीडिया से यह सवाल करना चाहता हूं कि वे नक्सलवादियों और उनके शहरी समर्थकांे को बेनकाब करने के लिए सामने क्यों नही आते? हमारे संविधान में आम आदमी को न्याय दिलाने और उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए जो प्रावधान किए हैं, उसका फायदा तथाकथित मानव अधिकार समर्थक नक्सलियों के हित में करें और यह मीडिया की नजर से बचाकर कैसे किया जाता रहा।
  
उन्होंने कहा कि लोग अपने मन से यह बात निकाल दें कि जहां पिछड़ापन है, वहां नक्सलवाद है। वास्तव में  नक्सलवाद ही देश के बहुत बड़े हिस्से में पिछड़ेपन का कारण है। नक्सलवाद का जो रूप हमने देखा है, उसमें गरीबों की बेहतरी को लेकर कोई चिंता नहीं है। उन्होंने सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को पहुंचाया है तो वह जंगलों से घिरे गांवों में रहने वाली वह आबादी है, जिसकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरा करने के लिए सरकारें तो अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं, लेकिन नक्सलवादी विकास कार्यों का लाभ ग्रामीणों, गरीबों, किसानों, आदिवासियों, वनवासियों तक पहुंचने ही नहीं देना चाहते। नक्सलवादी कभी नहीं चाहते कि ऐसे दूरस्थ इलाकों के लोगों को सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, राशन जैसी बेहद जरूरी सुविधाओं का लाभ भी मिले। नक्सलवादी, लोगों को इसलिए शिक्षित, जागरूक और समृद्ध नहीं होने देना चाहते, जिससे कि वे उनके हाथों से निकल जाएं। नक्सली ग्रामीणों का पिछड़ापन बरकरार रखते हुए उनका मानसिक और शारीरिक शोषण करते रहना चाहते हैं ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे।
 
मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने सरगुजा-बस्तर जैसे सघन वन क्षेत्रों और नक्सली प्रभावित अंचलों में सघन दौरा किया। हमने यह पाया कि सिर्फ प्रचलित व्यवस्था से आदिवासी अंचल में विकास की गति नहीं बढ़ाई जा सकती। इसलिए नए सिरे से विचार कर हमने बस्तर एवं दक्षिण क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण, सरगुजा एवं उत्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण तथा अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण का गठन किया। हमने यहां स्थानीय जरूरतों और मांगों के आधार पर तत्काल निर्णय लेने की व्यवस्था की। हर साल स्वतंत्र रूप से बजट दिया जिसके परिणामस्वरूप लोगों को सरकार की कार्यप्रणाली पर विश्वास हुआ। उनकी समस्याएं तुरंत दूर होने से स्थानीय जनप्रतिनिधियों की बैठकों में भागीदारी बढ़ी और धीरे-धीरे करीब सैकड़ों करोड़ रूपए के कार्य इन क्षेत्रों में करा दिए गए। इसी प्रकार चाहे सस्ता नमक देना हो, सस्ता चावल देना हो, निःशुल्क चरण पादुकाएं देना हो, बच्चों को शिक्षा के लिए नई आश्रम शाला खोलना हो। नई-नई योजनाएं बनाकर ग्रामीण जनता के घर जाकर साधन-सुविधाएं मुहैया कराने की कारगर रणनीति और योजनाएं लागू की गई। ऐसे अनेक उपाय किए गए, जिससे कि स्थानीय आबादी को सरकार की उपस्थिति का बोध हो और उन्हें जल्दी से जल्दी राहत मिले। वे स्वयं और हमारी सरकार के अनेक मंत्री तथा अधिकारी ऐसे-ऐसे दुर्गम अंचलों में पहुंचे जहां पहले कोई सरकारी आदमी पहुंचा ही नहीं था।
 
उन्होंने कहा कि वे गर्व के साथ यह कहना चाहता हैं कि  इन प्रयासों का अच्छा असर हुआ। इसके साथ ही हमने नक्सलवादी, वामपंथी हिंसक तत्वों को साफ संदेश दिया कि यदि वे हिंसा का रास्ता छोड़ना चाहते हैं तो हमारी नई पुनर्वास नीति उन्हें मदद करेगी। और अगर वे हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ेंगे तो हमारी सरकार उन्हें मुंह तोड़ जबाव देने का रास्ता अपनाएगी। आजादी के 60 सालों में नक्सलवादियों को पहली बार किसी सरकार ने ऐसा दो टूक जवाब दिया था। इससे ग्रामीण जन-जीवन में पैदा हुए विश्वास ने अपना चमत्कार दिखाना चालू कर दिया।
 
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थल, प्राकृतिक संसाधन, छत्तीसगढ की उत्कृष्ट संस्कृति इन्हीं वनवासी अंचलों में है, और सदियों से विकास की बाट जोह रहे हैं लेकिन नक्सलवादियों की बारूदी सुरंगों ने इनका रास्ता रोक रखा है। नक्सलियों की काली छाया से मुक्त होने पर यह अंचल देश ही नहीं, दुनिया में अपनी प्राकृतिक सुन्दरता और संसाधनों के लिए जाना जाएगा। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न सिर्फ विकास की ललक जाग चुकी है, बल्कि जागरूकता की मशाल भी जल चुकी है। इस वीर भूमि से नक्सलियों के पैर उखड़ने की शुरूआत भी हो चुकी है। अब हम उस दिन के लिए तैयारी कर रहे हैं, जब छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त राज्य कहलाएगा। देर से ही सही केन्द्र सरकार भी इस मसले की गंभीरता को समझने लगी है। हमने अनेक बार यह सुझाव दिया है कि केन्द्र की अगुवाई में प्रभावित राज्यों के लिए एक समन्वित रणनीति और कार्य योजना बनाकर ही नक्सल समस्या से ही निबटा जा सकता है। केन्द्र सरकार के हाल के संकेतों से लग रहा है कि अब नक्सली मामले में केन्द्र की दुविधा की स्थिति खत्म हो रही है।

मुश्किल में कमल नाथ

मुश्किल में कमल नाथ

संसदीय समिति ने किया भूतल परिवहन को कटघरे में खडा
 
ठेकेदार अधिकारियों की मिली भगत से लग रहा चूना
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 04 मई। एक तरफ वजीरे आजम 22 मई को अपने दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा होने पर सभी मंत्रालयों के रिपोर्ट कार्ड पेश करने की तैयारियां कर रहा है, वहीं दूसरी एक संसद की एक स्थायी समिति ने कमल नाथ के भूतल परिवहन मंत्रालय में चल रही गडबडियों पर गहरी नारजगी जता दी है, जिससे कमल नाथ की पेशानी पर पसीने की बूंदे उभर आईं हैं। सडक परियोजनाओं में होने वाली देरी को लेकर संसद की एक समिति ने भूतल परिवहन मंत्रालय और एनएचएआई की जमकर खिचाई की है।
 
सांसद सीताराम येचुरी की अध्यक्षता वाली परिवहन, संस्कृति और पर्यटन संबंधी समिति ने साफ कहा है कि ठेकेदारों को अधिक मुनाफा देने के लिए परियोजनाओं में जानबूझकर विलंब किया जाता है। इसके पीछे भ्रष्ट नौकरशाहों, दागी ठेकेदारों और दलालों का एक बडा रेकेट है। मंत्रालय के सचिव ने स्वयं ही इस बात को समिति के समक्ष इस काकस का होना स्वीकार किया है। समिति ने अपने प्रतिवेदन में कहा है कि विलंब के चलते इन परियोजनाओं की लागत स्वयंमेव ही बढ जाती है। मूल निविदा और बढी हुई लागत के अंतर को नौकरशाह, दलाल और ठेकेदार आपस में बांट लिया करते हैं।
 
भूतल परिवहन मंत्रालय से समिति ने अपेक्षा भी व्यक्त की है कि इस मकडजाल को तोडने के लिए मंत्रालय को प्रभावी कदम सुनिश्चित करना आवश्यक है। इस समिति ने आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे भूतल परिवहन मंत्रालय की नीयत पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा है कि लेटलतीफी का शिकार हुईं अनेक परियोजनाओं में महज एक ही ठेकेदार को काली सूची में डाला गया है। समिति ने भूतल परिवहन मंत्रालय को मशविरा देते हुए कहा है कि मंत्रालय को चाहिए कि स्तरहीन खराब प्रदर्शन करने वाले ठेकादार या कंपनियों को सूचीबद्ध कर उनके खिलाफ कठोरतम कार्यवाही की जानी चाहिए।
 
समिति ने यह भी सिफारिश की है कि किसी भी परियोजना का ठेका तब दिया जाना चाहिए जब भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी के साथ ही साथ अन्य समस्त औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएं। समिति ने भूमि अधिग्रहण के मामले में एनएचएआई के सुस्त रवैए पर भी गहरी नाराजगी व्यक्त की है। समिति का मानना है कि एनएचएआई द्वारा भी भूमि अधिग्रहण के मामले में निर्धारित गाईड लाईन का पालन नहीं किया जा रहा है।
 
गौरतलब है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को एक कुशल प्रशासक के तौर पर देखा जाता रहा है। कमल नाथ के पास चाहे वन एवं पर्यावरण मंत्रालय रहा हो, वस्त्र या वाणिज्य और उद्योग, कमल नाथ ने नौकरशाही को कभी अपने उपर हावी नहीं होने दिया है। यह पहला मौका होगा जबकि नौकरशाही उनके मंत्रालय में पूरी तरह मनमानी पर उतारू है। एक सर्वेक्षण में भी कमल नाथ को उनके सचिवों के दबाव में काम करने वाला मंत्री बताया गया था। संभवतः इस बार उनका कद कम करके भूतल परिवहन (जहाजरानी को पहली बार इससे प्रथक किया गया है) जैसा मंत्रालय दिया गया है जो उनके कद के अनुरूप नहीं माना जा रहा है। हो सकता है यही कारण हो कि वे अपने मंत्रालय में बहुत ज्यादा रूचि न ले रहे हों और देश में सडकें के फैलते जाल में ग्रहण की स्थिति बन रही हो।

चिदम्बरम के बाद रमन हैं राजा के निशाने पर

चिदम्बरम के बाद रमन हैं राजा के निशाने पर

रमन और दिग्विजय आमने सामने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 04 मई। नक्सलवाद के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम को कोसने के बाद अब छत्तीसगढ के मुख्य मंत्री रमन सिंह और संयुक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तथा वर्तमान में कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के बीच नक्सलवाद को लेकर तकरार तेज हो गई है। दोनों ही नेता एक दूसरे को कटघरे में खडा करने से अपने आप को पीछे नहीं रख रहे हैं।

वैसे तो कांग्रेस की संस्कृति रही है कि पार्टी के अंदर की कोई भी बात पार्टी मंच पर ही उठाई जानी चाहिए। इससे उलट महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने जब कलम के माध्यम से केंद्रीय गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम को लानत मलानत भेजी तब कांग्रेस की कडाही मंे उबाल आने लगा था। बाद में साफ सफाई करवाकर और माफी मंगवाकर मामला शांत कराया गया। लोगों का कहना है कि अगर इस तरह की धृष्टता राजा दिग्विजय सिंह के अलावा अगर किसी और ने की होती तो अब तक उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया होता।

इसके बाद दिग्विजय सिंह को छग के सीएम रमन सिंह ने बहुत बुरा कहा। इससे कुपित होकर राजा दिग्विजय सिंह ने रमन सिंह पर दस सवाल दाग दिए। एसा लगता है कि दोनों सिंहों के बीच चल रही इस लडाई का काई अंत नहीं है, दोनों ही एक दूसरे के कपडे उतारने पर उतरू नजर आ रहे हैं। रमन सिंह ने अपने आलेख में राजा दिग्विजय सिंह को आडे हाथों लिया। रमन का कहना है कि राजा दिग्विजय सिंह दस साल तक अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पर उन्होंने नक्सलवाद के खात्मे के लिए कुछ नहीं किया।

राजा को रमन की बात दिल में लग गई। राजा दिग्विजय सिंह ने भावुक होकर रमन सिंह को पत्र लिख मारा। राजा दिग्विजय सिंह का पत्र में कहना है कि रमन सिंह के लेख की भाषा से उन्हें दुख पहुंचा है। राजा दिग्विजय सिंह का मानना है कि नक्सल प्रभावित इलाके के लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए यह आवश्यक है कि उनका विश्वास शासन के प्रति जगाया जाए। महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में आरंभ किए गए सलवा जुडूम आरंभ हुआ किन्तु गलत नीतियों के चलते हजारांे आदिवासी अपने ही क्षेत्रों में शरणाथी बनकर रह गए हैं। राजा दिग्विजय सिंह ने रमन सिंह को कोसते हुए कहा कि उनके शासनकाल में दंतेवाडा में एक हजार से ज्यादा नक्सली जुडते हैं और राज्य की गुप्तचर एजेंसी को पता न चले एसा संभव ही नहीं है। इसका प्रतिकार करते हुए रमन सिंह कहते हैं कि नक्सल समस्या के मामले में राजा दिग्विजय सिंह पूरी तरह दिग्भ्रमित ही नजर आ रहे हैं। उन्होने राजा दिग्विजय सिंह इस मामले में जहां चाहे वहां बहस की चुनौति भी दे दी है।

वैसे न तो पी.चिदम्बरम और न ही रमन सिंह ने राजा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में मध्य प्रदेश में हुई गंभीर घटनाओं की ओर ध्यान आकर्षित कराया है। गौरतलब है कि राजा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में उनके ही मंत्रीमण्डल के परिवहन मंत्री लिखीराम कांवरे को बालाघाट जिले में ही उनके घर पर आधी रात को नक्सलियों ने बुरी तरह गला रेतकर मौत के घाट उतार दिया था, यह घटना अपने आप में बहुत बडी थी। इतना ही नहीं बालाघाट जिले में ही एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बंसल और उप निरीक्षक ठाकुर को भी नक्सलियों ने मार डाला था। रही बात सिपाहियों की तो उप निरीक्षक प्रकाश कतलम की अगवानी में सर्च पार्टी के सोलह जवानों की जीप उडा दी गई थी। इसके अलावा न जाने कितने जाबांज सिपाहियों को अपनी जान गंवानी पडी थी। अगर राजा दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके मंत्रीमण्डल के सहयोगी और पुलिस के जवान ही सुरक्षित नहीं थे, तो आज किस हक से वे उसी नक्सल समस्या के बारे में किसी को शक के कटघरे में खडा करने का माद्दा रख रहे हैं।

हरिभूमि में रोजनामचा

सोमवार, 3 मई 2010

संघ की मजबूरी है : शिबू सोरेन जरूरी है

संघ की मजबूरी है : शिबू सोरेन जरूरी है

गडकरी की अग्निपरीक्षा है झारखण्ड में

मरांडी पर हाथ फेरा कांग्रेस ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 03 मई। झारखण्ड के सांसद मुख्यमंत्री शिबू सोरेन चाहे जितनी भी अत्त कर लें पर भाजपा को उन्हें साधना ही पडेगा, एसा इसलिए क्योंकि सोरेन अब संघ के लिए मजबूरी बन गए हैं। सोरेन के प्रति भाजपा के आक्रमक तेवरों के बाद अब कुछ ढिलाई हुई है तो उसके पीछे संघ का कोडा ही नजर आ रहा है। देखा जाए तो संघ को सोरेन से बहुत ज्यादा प्रेम नहीं है, पर सोरेन की काबिलियत पर संघ प्रश्न चिन्ह लगाने की स्थिति में भी नहीं है।

संघ के सूत्रों का कहना है कि संघ को पता है कि उत्तर भारत में झारखण्ड ही एक ऐसा राज्य है जहां ईसाई मशीनरियों द्वारा युद्ध स्तर पर धर्मांतरण कराया जा रहा है। झारखण्ड में ईसाई मशीनरियों के जमे पांव उखाडने के लिए आक्रमक तेवर वाले गुरूजी ने बहुत काम किया है। इतिहास गवाह है कि गुरूजी इन मशीनरियों के खिलाफ खडे नजर आए हैं। सूत्रों ने कहा जब संघ नेतृत्व ने भाजपा के शीर्ष नेताओं को अपनी मंशा से आवगत कराया तब भाजपा के नेताओं को मानो सांप सूंघ गया, वे बस इतना ही कह सके कि ठीक है पर कम से कम क्रास वोटिंग करने वाले को सबक तो मिलना ही चाहिए।

संघ के डंडे के बाद झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के विधायक दल के नेता और शिबू के पुत्र हेमंत और भाजपा नेता सर जोडकर बैठे। बैठक से बाहर आए हेमंत के चेहरे पर विजयी मुस्कान बता रही थी, कि संघ की फटकार ने असर दिखाया है। बकौल हेमंत ‘‘शिबू सोरेन झारखण्ड के मुख्यमंत्री थे, और बने रहेंगे।‘‘ महज चार माह के भाजपा और झामुमो के गठबंधन का हनीमून इतनी जल्दी समाप्त हो जाएगा किसी ने सोचा भी न था। नए नवेले अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए यह परीक्षा की घडी से कम नहीं है।

गुरूजी जानते हैं कि भाजपा के निजाम नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद यह उनका सबसे बडा फैसला था, जिसे हर कीमत पर बचाने के लिए गडकरी प्रयास करेंगे। गुरूजी की निष्फिकरी को देखकर लगता है कि उन्होंने अपने पत्ते बहुत ही सोच समझकर चले हैं, और वे निश्चिंत हैं कि अगर सरकार गिरती है तो इसका नुकसान उनसे ज्यादा भाजपा को होने वाला है।

उधर इस अस्थिरता को भंजाने में कांग्रेस भी पीछे नहीं हट रही है। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ से छन छन कर बाहर आ रही खबरो ंपर अगर यकीन किया जाए तो सोनिया गांधी ने झारखण्ड विकास मोर्चा के बाबू लाल मरांडी की पीठ पर हाथ रख दिया है। कहा जा रहा है कि मरांडी को फ्री हेण्ड देकर कहा गया है कि वे झामुमो और दूसरे विधायकों को एकजुट कर लें तो मुख्यमंत्री की कुर्सी उनकी ही होगी।

जनसत्ता अखबार में

यह है जनसेवकों का असली चेहरा

ये है दिल्ली मेरी जान
 
(लिमटी खरे)

यह है जनसेवकों का असली चेहरा
एक समय था जब जनसेवक वाकई में जनसेवा को अपना असली धर्म माना करते थे, आज जमाना बदल गया है, जनसेवकों के लिए निहित स्वार्थ ही सबसे आगे आ गया है। अपनी रोजी रोटी और विलासिता को जनसेवकों ने अपना कर्तव्य समझ लिया है, रही बात आवाम की तो उनका मानना है चूल्हे में जाए रियाया। इसी तरह का कुछ वाक्या पिछले दिनों लोकसभा में देखने को मिला। वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान पूर्व रेलमंत्री और स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव का कहना था कि महिला आरक्षण विधेयक अगर परवान चढ गया तो बडी संख्या में पुरूष संसद सदस्यों के सेवानिवृत होने की आशंका है। इसलिए लालू ने मांग की कि सांसदों की तनख्वाह और पेंशन बढाई जानी चाहिए। जनसेवा करने का मानस अपने मन मस्तिष्क में लिए लालू यादव के शब्द तो सुनिए। सांसदों का वेतन बढाकर अस्सी हजार और उनकी पेंशन को बढाकर वेतन से कहीं अधिक एक लाख रूपए प्रतिमाह कर दिया जाए। अब लालू यादव को जमीनी हकीकत कौन समझाए कि देश में आम आदमी को दो जून की रोटी नसीब नहीं है मालिक, जनता के द्वारा दिए जाने वाले कर से तो जनसेवक वेतन पाते हैं, फिर विलासिता से भरपूर जीवन जीने के लिए एक लाख रूपए प्रतिमाह की पेंशन तो शायद निजी क्षेत्र या सरकारी कर्मचारी को भी न मिल पाती हो।
आडवाणी मोदी पर होगा हत्या का मुकदमा दर्ज!
मुस्लिम लॉ बोर्ड के सदस्य और निर्दलीय संसद सदस्य मोहम्मद अदीब के एक पत्र से प्रधानमंत्री कार्यालय की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई है। पीएमओ की हालत ‘‘हुई गति सांप छछूंदर केरी, उगलत निगलत पीर घनेरी‘‘ की सी हो गई है। अदीब के पत्र की इबारत कुछ इस तरह है कि वे गुजरात के दंगों के लिए नरेंद्र मोदी और बाबरी विध्वंस के लिए राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी पर हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की अनुमति चाहते हैं। अदीब का कहना है कि जब लिब्राहन आयोग मान चुका है बावरी विध्वंस के लिए आडवाणी जिम्मेदार हैं तो फिर उस दरम्यान हुए दंगे और मारे गए लोगों की जवाबदारी भी लाल कृष्ण आडवाणी की ही बनती है। इसी तरह गोधरा कांड में एसआईटी ने नरेंद्र मोदी को बुलाकर पूछताछ की गई है, चूंकि मामला अदालत में लंबित है, इसलिए वे इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं, पर देश के लोकतंत्र की हिफाजत और हुकूमत का इकबाल बुलंद करने के लिए नरेंद्र मोदी और एल.के.आडवाणी के उपर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। पीएमओ पशोपेश में है कि सांसद मोहम्मद अदीब के पत्र का क्या जवाब दें या क्या कार्यवाही करें। वैसे अदीब ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी सहित अनेक जनसेवकों को इस पत्र की प्रति भेजी है। अब देश के मुस्लिम संगठनों और संसद सदस्यों का लगातार अदीब को समर्थन मिलता जा रहा है।
साहब के ठाठ पसंद नहीं आए विजलेंस को
दिल्ली पुलिस के एक अतिरिक्त पुलिस आयुक्त के ठाठ बाट विभाग के ही विजलेंस विभाग को रास नहीं आए। पूर्वी जिला के एसीपी ओ.पी.सागर ने गर्मी से तंग आकर सर्दी का अहसास करवाने के लिए एक पखवाडे पहले अपनी सरकारी गाडी में एसी लगवा लिया। साहब बडे मौज से एसी की हवा में अपने कर्तव्य निभा रहे थे। साहब के चाहने वालों को यह बात रास नहीं आई और हो गई एक गुमनाम शिकायत। पुलिस मुख्यालय ने तत्काल इस पर संज्ञान लिया। विजलंेस विभाग ने मारा छाप और धर लिया एसीपी की गाडी को। एसीपी महोदय अपने कमिश्नर वाई.एस.डडवाल के उस आदेश को भूल गए थे, जिसमें साफ कहा गया था कि जो भी कर्मचारी या अधिकारी एयर कंडीशन का पात्र नहीं होगा वह इसका उपयोग करते पाए जाने पर दंडित किया जाएगा। हाल ही में थानों के निरीक्षण के दौरान एक एसीपी कार्यालय मंे लगे एसी पर भडके डडवाल ने उन्हें झाड पिलाई थी। कहा जा रहा है कि एसीपी सागर जब भी निरीक्षण पर निकलते तो वे एसी वाली गाडी से नीचे पैर नहीं रखते और कोई मातहत अगर सूरज की रोशनी से बचने के लिए छांव में बैठा दिख जाता तो उसकी शामत आ जाती। इन्हीं में से किसी ने कमाल दिखाया और एसीपी हो गए बेहाल।
साठ साल में चार, चार साल में पहली!
महिला आरक्षण के हिमायती होने का दावा करने वाली कांग्रेस जिसने आधी से ज्यादा सदी तक देश पर शासन किया है के बावजू राजस्थान में साठ साल में महज चार महिला जज और सर्वोच्च न्यायालय में चार साल बाद कोई महिला जज मिल सकी है। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति रूमा पाल के जून 2006 में सेवानिवृत होने के बाद सुको में महिला जज नहीं थी। इसके बाद अब चार साल बाद न्यायमूर्ति सुधा मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के बतौर शपथ दिलवाई गई है। वे सर्वोच्च न्यायालय में चौथी महिला जस्टिस होंगी। उधर राजस्थान का उच्च न्यायलय भी सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर ही चल रहा है, वहां भी साठ साल में महज चार महिला जज ही बन पाई हैं। एक तरफ तो कांग्रेस महिलाओं की हितैषी होने का स्वांग रचती आई है, और दूसरी ओर महिलाओं को आगे बढाने की जब भी बात आती है, कांग्रेस अपना पल्लू झाडकर पीछे हो जाती है।
शोभा की सुपारी बने फुट ओवर ब्रिज
दिल्ली में एक के बाद एक कर फुट ओवर ब्रिज का निर्माण करवाया जा रहा है। कुछ सालों पहले बने मजबूत पुलों को भी तोडकर उनके स्थान पर नए लोहे के पुल बनाए जा रहे हैं। इन पुलों को एसे स्थानों पर बनाया जा रहा है कि जनता इनका उपयोग करने से हिचकने लगी है। अमूमन देखा गया है कि सडक पार करने के लिए बनाए गए फुट ओवर ब्रिज नशेडियों के अड्डे बन गए हैं। इन पुलों पर शाम ढलते ही मयखाने सजने लगते हैं, यहां चरस गांजें की सुगंध से सारा वातावरण सराबोर हो जाता है। भूल से भ अगर अलह सुब्बह आप इस पर से निकल जाएं तो इस पर चले हुए कारतूस (उपयोग किए हुए कंडोम) यत्र तत्र पडे मिल जाते हैं। जनता इन पुलों का उपयोग करने से बचती ही है। सडकों पर जहां कट है वहां से ही जनता अपनी जान जोखम में डालकर सडक पार करने में विश्वास रखती हैं अब दिल्ली सरकार को कौन बताए कि आपकी मर्जी से नहीं वरन अपनी मर्जी से चलना चहती है दिल्ली की जनता।
आईआरसीटीसी बनाम फर्जी वाडा
भारतीय रेल मंत्री ममता बनर्जी लाख दुहाई दें कि आईआरसीटीसी के हाथों में जब से रेल्वे की खान पान व्यवस्था गई है, तबसे रेल यात्रियों की मौजां ही मौजां हैं, पर जमीनी हकीकत इससे बहुत उलट ही है। आलम यह है कि राजधानी एक्सप्रेस में यात्रा करने वाले यात्रियों को ही परेशानियों का सामना करना पड रहा है। विशेषकर बिलासपुर से नई दिल्ली आने वाली राजधानी की पेन्ट्री में तो बहुत ही बुरी स्थिति है। वैसे भी राजधानी में यात्रा करने वाले यात्रियों की आम शिकायत है कि इसके कोच काफी पुराने हैं और उन्हें न तो मोबाईल चार्जर ही मिलता है और न ही धुले बेड रोल। रही बात खाने की तो वह भी पेन्ट्री के मूड पर ही निर्भर करता है। एक भुक्तभोगी यात्री ने बताया कि उसने 2441 राजधानी में जब 26 अप्रेल को तीसरी मर्तबा यात्रा की तब जाकर उसे शिकायत पुस्तिका दी गई वह भी टीसी के हस्ताक्षेप के बाद। उसने शिकायत नंबर 167698 दर्ज करवाई है, जिसका अब तक कोई उत्तर नहीं मिल सका है। उक्त यात्री की शिकायत को मानें तो उसे रात को नागपुर के बाद भोजन ही नहीं दिया गया और रही बात अन्य खाद्य पदार्थों की तो वह भी नदारत ही थे। पेन्ट्री मेनजेर से शिकायत करने पर भी कोई लाभ नहीं हुआ।
फिर अदालत की लताड पडी मीडिया को
अति उत्साह में मीडिया के कुछ कारिंदे एसा कर जाते हैं कि उन्हें बाद में पछताना पडता है। देश की अदालतों ने कई बार मीडिया को चेताया है कि वह अपनी हदें पहचाने और वर्जनाएं न तोडे। हाल ही में अभिनेत्री खुशबू के विवाह पूर्व यौन संबंधों के बयान के बारे में गलत व्याख्या करने पर एक बार फिर मीडिया अदालत के निशाने पर आ गया। इस मामले में अदालत का कहना था कि मीडिया और लोगों ने खुशबू के नजरिए को गलत रूप में समझा है, परिणामस्वरूप अदालत के सामने याचिकाओं की बाढ आ गई है। वैसे यह सच है कि मीडिया का काम गलत और सही को बताना है, अमूमन देखा जा रहा है कि पिछले कुछ सालों से जबसे देश का मीडिया कार्पोरेट घरानों की लौंडी बन गया है, तबसे मीडिया न्यायधीश की भूमिका में आ गया है, जो सरासर गलत है। मीडिया को चाहिए कि वह अपनी सीमाएं पहचाने और गलत या सही क्या है यह बताए न कि किसी मामले में फैसला दे। फैसला देने का काम अदालत का है, और यह अधिकार अदालत के पास ही रहे ता बेहतर होगा।
साईबर सुरक्षा सबसे बडी चुनौति
मई के आते ही बच्चों और युवाओं का मन आल्हादित हो उठा है, क्योंकि साल भर की पढाई के बाद अब वे फुर्सत में छुट्टियां काट रहे हैं। अवकाश के आते ही अभिभावकों के सामने एक बडी चुनौति साईबर सुरक्षा की पैदा हो गई है। इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट युवाओं और बच्चों की पहली पसंद बनकर उभरा है। घरों पर इंटरनेट कनेक्शन और साईबर कैफे में आज लाईन लगी हुई है। क्या बच्चे क्या जवान हर कोई आज इंटरनेट के अनंत आकाश में खोने को बेताब है। अवकाश के दिनों में लोग आम दिनों से ज्यादा समय तक इंटरनेट पर बिता रहे हैं। साईबर क्राईम करने वालों के लिए यह सबसे मुफीद मौका है, जबकि वे लोगों को आसानी से लूट सकते हैं। अज्ञानता में अपनी निजी जानकारी और क्रेडिट कार्ड संबंधी सूचनाएं भी लोग साझा कर रहे हैं जो सबसे अधिक चिंता का विषय है। साईबर अपराधी बच्चों या नौजवानों को उलझाकर आसानी से उनको अपने जाल में फंसाकर उनसे जानकारी शेयर कर एकांउंट को खाली कर सकते हैं। सो सावधान हो जाईए कहीं आपका बच्चा तो साईबर अपराधियों के चंगुल में नहीं फंसने जा रहा है।
काहे की मंदी यहां तो बल्ले बल्ले हैं
समूचा विश्व आर्थिक मंदी की मार झेल रहा है, भारत में भी इसका असर है, पर महाराष्ट्र के ओरंगाबाद जिसकी गिनती मराठवाडा इलाके के पिछडे जिलों में होती है में भले ही औद्योगिक विकास की किरण स्पर्श न कर पाई हो, पानी का हाहाकार हो, गरीब गुरबों की तादाद बहुत ज्यादा हो पर यहां के हालात देखकर लगता नहीं है कि यह जिला कहीं से पिछडा है। पूर्व मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख और वर्तमान निजाम अशोक चाव्हाण की कर्मभूमि औरंगाबाद जहां दौलताबाद नाम का किला है, में पिछले एक सप्ताह में ही लगभग 115 मर्सिडीज गाडी बुक करवाई गईं हैं। है न आश्चर्य की बात। मंहगी विलासिता का प्रतीक मानी जाने वाली मर्सिडीज कार की कीमत 25 से 95 लाख रूपए तक है। लोगों को हैरत है कि इतने पिछडे जिले में एक सप्ताह में ही लगभग सवा सैकडा मंहगी कार की बुकिंग कैसे हो गई, पर यह सच है जनाब। यह हैरत अंगेज कारनामा हुआ है औरंगाबाद में। इस लिहाज से कौन कहेगा कि औरंगाबाद पिछडा हुआ है।
प्रशांत भूषण मामले की सुनवाई 14 को
पूर्व न्यायाधिपतियों और वर्तमान प्रधान न्यायधीश एच.एस.कापडिया के बारे में कथित तौर पर टिप्पणी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के खिलाफ स्वतः संज्ञान के आधार पर अवमानना की कार्यवाही के लिए नोटिस देने के मामले के विचारयोग्य होने या न होने की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है। इस पर फैसला 14 जुलाई को दिया जाएगा। गौरतलब है कि तहलका को दिए एक साक्षात्कार में भूषण ने कहा था कि न्यायमूर्ति कापडिया को वन संबंधी मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ के सदस्य होने के नाते प्रधान न्यायधीश के.जी.बालकृष्णणन के साथ वेदांता स्टर्लाइट ग्रुप से जुडे मुकदमें की सुनवाई नहीं करना चाहिए, क्योंकि कंपनी में उनके अर्थात जस्टिस कापडिया के शेयर हैं। इसके बाद जस्टिस कापडिया ने खुद को इससे अलग कर लिया था। अब जब देश के प्रधान न्यायधीश की आसनी पर जस्टिस कापडिया विराजमान हैं, तब देखना यह है कि जस्टिस अमलतास की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ क्या निर्णय देती है।
शिव पर बिफरे शंक्राचार्य
जगतगुरू शंक्राचार्य स्वामी स्वरूपानंद इन दिनों मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार से खासे नाराज नजर आ रहे हैं। मध्य प्रदेश में शिवराज के नेतृत्व मंे भाजपा सरकार काबिज है, और माना जाता है कि भाजपा द्वारा साधु संतों का बहुत आदर किया जाता है। शंक्राचार्य जी का आरोप है कि मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में सांकलघाट में 10 लाख साल पुरानी आदि शंकराचार्य की पूज्यनीय गुफाओं के संरक्षण के लिए किए जा रहे कार्यों में वन मण्डल अधिकारी (डीएफओ) जानबूझकर न केवल अडंगा लगा रहे हैं, वरन डीएफओ अभद्र व्यवहार पर भी उतर आएं हैं। उनका कहना है कि इन गुफाओं में मां नर्मदा के जल का रिसाव जारी है, पास ही माता हिंगलाज का सािान है। साधु संतों के सहारे सत्ता का स्वाद चखने वाली भाजपा पर अगर शंकराचार्य की दृष्टि तिरछी हो गई हो तो भाजपा को समय रहते ही समझ लेना चाहिए कि पुरानी कहवात चरितार्थ होने वाली है कि ‘‘जब नास मनुस का छाता है, तब विवेक मर जाता है।‘‘
पुच्छल तारा
भारत गणराज्य में असमानताएं अनंत हैं, इसी पर रेखांकित एक ईमेल नरेंद्र ठाकुर ने भेजा है, जिसमें भारत सरकार के प्रति उनका गुस्सा साफ झलक रहा है। वे लिखते हैं कि ओलंपिक शूटर स्वर्ण पदक जीतकर आता है तो भारत सरकार खुशी से फूली नहीं समाती और उसे तीन करोड रूपए इनाम के बतौर देती है, वहीं दूसरी ओर नक्सलवादियों से लडते हुए 76 जवान शहीद हो जाते हैं और भारत सरकार हर जवान को महज एक लाख रूपए की राशि ही देती है। जय हो गांधी नेहरू आपकी कांग्रेस देश को कहां ले जा रही है, सदबुद्धि दो आज के इन कांग्रेसियों को।

रविवार, 2 मई 2010

मोहसीना को भेजा जा सकता है राजस्थान

मोहसीना को भेजा जा सकता है राजस्थान
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 02 मई। राजस्थान की राज्यपाल प्रभा राव के अवसान के बाद अब वहां के लिए लाट साहेब की खोज आरंभ हो गई है। इसमें कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री मोहसीना किदवई का नाम सबसे उपर ही चल रहा है। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मोहसीना किदवई की बतौर राजस्थान का राज्यपाल बनाने की फाईल श्रीमति सोनिया गांधी की हरी झंडी के इंतजार में उनके कार्यालय में पडी हुई है। जैसे ही सोनिया गांधी की सहमति मिलेगी वैसे ही इसे महामहिम राज्यपाल श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पास भेज दिया जाएगा और मोहसीना किदवई को राजस्थान का राज्यपाल घोषित कर दिया जाएगा।

आखिर सोनिया ने क्यों फटकारा हुड्डा को

आखिर सोनिया ने क्यों फटकारा हुड्डा को
 
दलितों को महफूज रखने में नाकामयाब रहे हैं हुड्डा
 
दलित हितैषी छवि बनाने की जुगत में राहुल
 
(लिमटी खरे)

देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा सूबे में हिसार के मिर्चपुर गांव में एक दलित पिता पुत्री को जिन्दा जलाए जाने की घटना से खफा होकर कांग्रेस की राजमाता ने सूबे के निजाम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के प्रति अपनी तल्ख नाराजगी जाहिर की है। हुड्डा को लिखे पत्र में सोनिया ने इसे न केवल शर्मनाक बताया है, वरन कहा है कि इस तरह की घटनाओं के होने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। कांग्रेस शासित राज्य में ही जब दलितों के साथ इस तरह का बर्ताव होगा तो भला दूसरे दलों की सरकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है।
 
गौरतलब है कि 21 अप्रेल को मिर्चपुर में दलितों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया था, जिसमें एक सत्तर वर्षीय वृद्ध के साथ ही साथ उसकी 17 साल की कमसिन पोलियोग्रस्त बेटी भी आग के दावानल में भुंज गई थी। यह सब हुआ एक पुलिस अधिकारी और एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट नायब तहसीलदार की मौजूदगी में। यह घटना अपने आप में सरकार का शर्म नीचा करने वाली ही कही जा सकती है।
 
यहां यह भी उल्लेखनीय होगा कि कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित अन्य सूबों में अपने आप और कांग्रेस को दलित हितैषी बताने का जतन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस शासित हरियाणा में गोहना के बाद हिसार में भी दलितों के खिलाफ बलशाली लोग हिंसा पर उतर आए हैं। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब पता चला कि दो दलितों की हत्या, 26 लोगों के बुरी तरह घायल होने के एक सप्ताह बाद हुक्मरान भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने घटनास्थल का दौरा करने की जहमत उठाई हो।
 
जब कांग्रेस के मैनेजरों को लगा कि इस घटना के बाद दलितों के मन में कांग्रेस के प्रति रोष और असंतोष पनप जाएगा तब उन्होंने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को मशविरा दिया होगा कि बेहतर होगा कि वे हुड्डा को कडा पत्र लिखें और इस पत्र को मीडिया में अवश्य लीक करवाएं ताकि दलितों का विश्वास जीता जा सके। संभव है प्रबंधन में कौशल रखने वाले इन्हीं जाबांजों ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी पूर्व सूचना के बिना मिर्चपुर जाने की सलाह दे दी हो ताकि उनकी छवि भी दलित हितैषी की बन सके।
 
अब तक मिर्चपुर में वैसे भी कोई नामी नेता नहीं पहुंचा है। राहुल गांधी के पहुंचने के बाद अब जो भी नेता जाएगा उसका कद उतना नहीं बढ सकेगा जितना कि राहुल गांधी ने अपना बढा लिया है। हुड्डा के लिए शर्म की बात तो यह है कि सबसे पहले उन्हें उनकी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने लताड भरा खत लिख फिर कांग्रेस के ही सबसे शक्तिशाली महासचिव ने उन्हें बिना बताए ही मिर्चपुर जाकर दलितों को गले लगाया। यह भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सबसे बडी नाकामी माना जा सकता है।
 
हरियाण में वैसे भी जाट और गैर जाट दोनों ही समुदाय रेल की पटरी की तरह साथ साथ तो चलते हैं, पर मिलते कभी नहीं है, कहावत को चरितार्थ करते हैं। जाटों के बीच कांग्रेस ने सदा ही जगह बनाने का प्रयास किया है। हरियाणा का इतिहास गवाह है कि छोटूराम से लेकर चौटाला के शासन तक कांग्रेस का बडा वोट बैंक गैर जाट समुदाय ही रहा है। सूबे में दलितों की तादाद खासी है। हरियाणा में बीते दिनां गोहना के बाद मिर्चपुर की घटना से हुड्डा पर उंगलियां उठना स्वाभाविक ही है। हालात देखकर यही कहा जा सकता है कि जाट जाति से संबंध रखने वाले मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा दलितों के प्रति बहुत ज्यादा संवदन हीन ही हैं। हुड्डा के शासन काल में खाप पंचायतें भी सर उठाने लगी हैं।
 
जब कांग्रेस के प्रबंधकों को लगा कि हरियाणा में दलितों के साथ होने वाले अत्याचारों के बाद कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इसे रोकने में नाकामयाब रह रहे हैं, तब उन्होंने ब्रम्हास्त्र के तौर पर सोनिया गांधी से पत्र लिखवाकर राहुल गांधी को बिना पूर्व सूचना के ही वहां भेजने की तैयारी की। सोनिया गांधी ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इसलिए फटकारा कि वे दलितों को सर उठाकर जीने का अधिकार देने में नाकामयाब रहे हैं। कांग्रेस को चाहिए कि दलित वोट बैंक सहेजने के साथ ही साथ भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री पद से हटाकर किसी एसी सुलझी सोच वाले को इस पर काबिज करवाएं कि सूबे में कम से कम दलित पिछडे तो भारत गणराज्य में सर उठाकर भरपूर सांस ले सकें।

भोपाल में श्रमजीवी पत्रकारों की रैली