गुरुवार, 21 जुलाई 2011

कब तक इम्तेहान देती रहेगी रियाया?

कब तक इम्तेहान देती रहेगी रियाया?

(लिमटी खरे)

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर आक्रांताओं द्वारा एक के बाद एक हमले किए जा रहे हैं और देश के शासक मौन साधे अपनी कुर्सी बचाने के लिए ‘गठबंधन धर्म‘ का बखूबी निर्वहन किया जा रहा है। इक्कीसवीं सदी में भारत गणराज्य के समस्त दलों के नेताओं के इस ‘गठबंधन धर्म‘ के आगे ‘राष्ट्र धर्म‘ पूरी तरह बौना हो गया है। एक के बाद एक हमलों में चाहे वे आतंकी हों या नक्सली अथवा और किसी भी तरह के, हर बार देश के करदाता नागरिक को ही इसका भोगमान अपनी जान देकर भोगना पड़ा है। 2008 में मुंबई में अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमलों के बाद भी सत्ता के मद में चूर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई, जिसका परिणाम था 13 जुलाई का सीरियल बम ब्लास्ट। 2008 में नैतिकता के आधार पर तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल को त्यागपत्र देना चाहिए था, जो नाटकीय तरीके से लिया गया। अब हर मोर्चे पर विफल पलनिअप्पम चिदम्बरम की बारी है, किन्तु नेहरू गांधी परिवार की वर्तमान पीढ़ी की चरण वंदना करने वाले नेताओं की कुर्सी का एक भी पाया नहीं हिलाया जा सकता है। कांग्रेस के लिए ट्रबल शूटर की भूमिका में राजा दिग्विजय सिंह हैं, जो उल जलूल बयानबाजी से लोगों का ध्यान मुख्य मुद्दे से भटकाते आए हैं।

बीते दो दशकों से आतंकवाद पर सियासी पार्टियों का ध्यान कुछ ज्यादा ही केंद्रित हो गया है। हर एक राजनैतिक दल आतंकवाद के दर्द को उभारकर राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा है। आतंकवाद के सफाए की ओर इन दलों का ध्यान जरा सा भी नहीं जा रहा है। तगड़ी सुरक्षा घेरे में चलने वाले राहुल, सोनिया सहित अन्य राजनेताओं को आजाद भारत गणराज्य के ‘असुरक्षित‘ आम आदमी का दर्द महसूस नहीं हो पाता है। देश में अराजकता इस कदर फैल गई है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ग्रामीण स्तर से लेकर केंद्रीय स्तर तक हर एक सरकार की नुमाईंदगी करने वाला हर एक बंदा अपनी जेब भरने में लगा हुआ है।

नब्बे के दशक के आरंभ के साथ ही देश में बढ़े आतंकी हमलों के बाद कमोबेश हर राजनैतिक दल ने इस पर बयानबाजी करना ही मुनासिब समझा है। कितनी शर्म की बात है कि लगभग दो दशकों से आतंकवाद हमारे देश में फल फूल रहा है, और हमारे देश के नीति निर्धारक महज कोरी बयानबाजी कर जनता को गुमराह करने से नहीं चूक रहे हैं। इसके पहले कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में पराजय का मुंह देखने वाले शिवराज पाटिल को गृह मंत्रालय जैसा संवेदनशील और महात्वपूर्ण मंत्रालय सौंपकर पहले ही अपनी कमजोरी जाहिर कर दी थी। कांग्रेस शायद भूल गई कि देश के गृह मंत्री के पद पर लौह पुरूष माने जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसी हस्ती को भी कांग्रेस ने ही बिठाया था, जिनकी नैतिकता, कार्यप्रणाली और देशप्रेम के ज़ज़्बे को आज भी लोग सलाम करते हैं। पाटिल के बाद इस आसनी को चिदम्बरम को सौंपा गया। चिदम्बरम के कार्यकाल में यह मुंबई पर यह पहला आंतकी हमला है, किन्तु नक्सली हमलों में न जाने कितने लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

मंबई के इस और पिछले आतंकी हमलों पर भाजपा द्वारा कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेकर हाय तौबा मचाई जा रही है। सरकार से त्यागपत्र की मांग की जा रही है। पर भाजपा शायद यह भूल जाती है कि इसके पहले अटल इरादों वाले अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के गृहमंत्री रहे लाल कृष्ण आड़वाणी के कार्यकाल में खौफ का पर्याय बन चुके आतंकवादियों को सरकार ने अपने ही जहाजांे में ले जाकर कंधार में छोड़ा था। तब कहां गई थी इन नेताओं की नैतिकता?

इतना ही नहीं राजग के पीएम इन वेटिंग के गृह मंत्री के कार्यकाल में ही देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद पर आतंकवादी हमला हुआ, अक्षरधाम के रास्ते रघुनाथ मंदिर और अमरनाथ यात्रा के दौरान न जाने कितने निरीह लोगों को भूना गया। क्या देश के नेताओं की याददाश्त इतनी कमजोर हो गई है कि चंद साल पहले घटी घटनाओं को भी याद रखने में उन्हें परेशानी होने लगी है।

उधर दूसरी ओर सत्ता की चाभी संभालने वाली कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी का कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में कहा गया यह कथन वास्तविक कम चुनावी ज्यादा लगता है कि सरकार आतंकी हमलों के बाद मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती है। सोनिया गांधी यह भूल जाती हैं कि देश में आधी सदी से ज्यादा राज उन्हीं की कांग्रेस पार्टी ने किया है, और पिछले सवा सात सालों से देश में उन्हीं की पार्टी की सल्तनत है।

अब जबकि कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव हो गए हैं, और कुछ में होने बाकी हैं के साथ ही साथ लोकसभा चुनाव की पदचाप भी सुनाई देने लगी है तब कांग्रेस अध्यक्ष की तंद्रा टूटती प्रतीत हो रही है। अब उन्हें आम आदमी (मतदाता़ की याद सताने लगी है। वे कहने लगीं हैं कि हाथ पर हाथ धरे रह कर हम अपने उपर हमला होने नहीं दे सकते हैं।

वैसे सोनिया गांधी ने परोक्ष रूप से अपनी ही सरकार पर निशाना साधते हुए यह तक कह डाला कि जनता को चाहिए पक्के इरादों वाली सरकार। सोनिया गांधी के रणनीतिकार उन्हें यह बताना भूल गए कि संप्रग के कार्यकाल में हुए आतंकी हमलों की फेहरिस्त काफी लंबी है, उधर महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की ही सरकार है।

हमारी व्यक्तिगत राय में आतंकवाद के खिलाफ कठोर कदम न उठा पाने में सक्षम देश के राजनेताओं पर इसके लिए आपराधिक अनदेखी के मुकदमे दायर किए जाने चाहिए। आतंकवाद के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों के हाथों में दप्ती पर लिखी इबारत का जिकर यहां लाज़िमी होगा जिसमें उल्लेख किया गया था कि ‘‘हिन्दुस्तान को ज़ेड प्लस सुरक्षा कब मुहैया हो सकेगी?‘‘

यहां गौरतलब होगा कि यूपीए के शासनकाल में कुल दस हजार से अधिक बेकसूरों को जान से हाथ धोना पड़ा था, 2009 के साल में ही देश भर में हुए 11 आतंकी हमलों में 340 से ज्यादा लोगों ने जान गंवाई। अगर कांग्रेस नैतिकता की बात करती है तो उस वक्त कांग्रेस की नैतिकता कहां थी, जब बेकसूर दम तोड़ रहे थे। कहा जा रहा है कि मुंबई में हुए बम हादसों की इबारत फरवरी में लिखी गई थी। भटकल बंधुओं की फोन वार्ता में ये तथ्य उभरकर सामने आए हैं।

इन धमाकों में लोगों से वसूले गए रंगदारी टेक्स का भी उपयोग किया गया है। इस खुलासे से बाबा रामदेव के उन आरोपों को भी बल मिलता है कि विदेशों में जमा काला धन आतंकियों के लिए संजीवनी का काम करता है। उधर इस पूरे मामले से ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर ‘हिन्दु आतंकवाद‘ का मुद्दा उछाल दिया है। राजा का कहना है कि इसमें हिन्दु आतंकवादियों का हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। सवाल यह उठता है कि जब आतंकवाद का कोई धर्म, मजहब, जात पात नहीं होती फिर इसे हिन्दु या किसी अन्य धर्म से जोड़ने का तात्पर्य समझ से परे है। कांग्रेस के संकटमोचक हैं राजा दिग्विजय सिंह। राजा सदा ही प्रतिकूल परिस्थितियों मंे अनाप शनाप बयानबाजी से सभी का ध्यान मुख्य मुद्दे से भटका कर अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होते हैं और मुद्दा लोगों की स्मृति से विस्मृत ही हो जाता है।

9/11 हमले के बाद दुनिया के चौधरी अमेरिका ने अपनी आंतरिक सुरक्षा इतनी तगड़ी कर दी कि वहां परिंदा भी पर मार नहीं सकता। इससे उलट भारत गणराज्य के नीतिनिर्धारिकों ने कथित तौर पर ‘सहिष्णू‘ का लबादा ओढ़ कर अपने ‘नपुंसक‘ होने की बात को छिपाने का घिनौना प्रयास किया है। अमेरिका में सभी को एक आंख से ही देखा जाता है। वहां विदेशी प्रवेश के नियम बहुत ही सख्त हैं। चाहे राजा हो या रंक सभी को एक ही नजर से देखकर तलाशी ली जाती है। इससे उलट भारत में 2008 के आतंकवादी हमले के बाद कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बन पाई है। विडम्बना है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ‘‘गठबंधन धर्म‘‘ निभाने के चलते अपनी बेबसी का इजहार करने से नहीं चूकते। क्या उनके पास इस बात का उत्तर है कि उनके लिए बड़ा कौन है -‘‘गठबंधन धर्म‘‘ या राष्ट्र धर्म‘‘?

पीआईबी का पीसीयू बना एमपी का सूचना केंद्र

पीआईबी का पीसीयू बना एमपी का सूचना केंद्र

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। नई दिल्ली के पाश इलाके कनाट सर्कस की बाबा खड़क सिंग मार्ग पर अवस्थित मध्य प्रदेश सरकार की छवि को चमकाने का बीड़ा उठाने वाला सूचना केंद्र इन दिनों भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के शास्त्री भवन में संचालित पत्र एवं सूचना कार्यालय के प्रेस क्लीपिंग यूनिट (पीसीयू) में तब्दील हो गया है। सूचना केंद्र द्वारा कांग्रेस के नवनियुक्त मंत्रियों को दिल्ली के समाचार पत्रों में छपी खबरों की कतरने मुहैया करवाई जा रही हैं।

विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार संयुक्त मध्य प्रदेश के गृह मंत्री रहे चरण दास महंत वर्तमान में छत्तीसगढ़ से सांसद हैं और हाल ही में कैबनेट विस्तार में राज्य मंत्री भी बनाए गए हैं। महंत की ‘चरण वंदना‘ में मध्य प्रदेश सरकार के दिल्ली स्थित सूचना केंद्र के एक अधिकारी की जबर्दस्त दिलचस्पी दिखा रहे हैं। महंत के मंत्री बनने से लेकर उनके कार्यभार ग्रहण करने तक की पेपर क्लिपिंग्स को मध्य प्रदेश सरकार की छवि चमकाने के लिए पाबंद जनसंपर्क विभाग के दिल्ली कार्यालय ने सहेजकर महंत तक पहुंचाया। अमूमन यह काम पत्र सूचना कार्यालय के पीसीयू का होता है। बताते हैं कि इस कार्यालय से भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठनों की विज्ञप्तियों का वितरण भी सरकारी खर्च पर ही किया जाता है।

विभाग के सूत्रों ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि शिवराज सिंह चौहान सरकार से पगार पाने वाले इस कार्यालय के अधिकारी द्वारा कांग्रेस के सांसद में एसी क्या दिलचस्पी। बताया जाता है कि इसके पूर्व यह कार्यालय मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष और राज्य सभा सांसद प्रभात झा के कार्यालय के बतौर काम कर रहा था। मीडिया असमंजस में है कि यह मध्य प्रदेश सरकार का दफ्तर है या संसद सदस्य और मध्य प्रदेश के भाजपाध्यक्ष प्रभात झा अथवा कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री चरण दास महंत का कार्यालय!

आई जी एडीजी की डीपीसी 22 को

आई जी एडीजी की डीपीसी 22 को

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय पुलिस सेवा में मध्य प्रदेश संवर्ग के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक शुक्रवार को होना तय हुआ है। केंद्रीय कार्मिक विभाग के सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश शासन के अनुरोध पर 22 जुलाई की तिथि पर मोहर लगा दी गई है। इस डीपीसी में भारतीय पुलिस सेवा के 1986, 92, 96 एवं 98 बैच के अधिकारियों की पदोन्नति पर विचार किया जाएगा।

डीओपीटी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इस डीपीसी में 1985 बैच के के.एल.मीणा के गोपनीय प्रतिवेदन में प्रतिकूल टिप्पणी के चलते उनकी पदोन्नति रूक गई थी, जिसके मार्ग अब साफ हो गए हैं। इसके अलावा 1986 बैच के एमपी संवर्ग के महानिरीक्षक स्तर के अधिकारियों के.एन.तिवारी, डॉ.शैलेन्द्र श्रीवास्तव, अनिल कुमार, संजय राणा, डॉ.आर.के.गर्ग, पुरूषोत्तम शर्मा, टी.के.घोष, डा.पी.आर.माथुर एवं ए.के.श्रीवास्तव को पदोन्नत कर उन्हें अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बनाया जाएगा।

1992 बैच के उप महानिरीक्षक स्तर के अधिकारियों डी.श्रीनिवास राव, पवन श्रीवास्तव, आदर्श कटियार, राजेश गुप्ता, पंकज श्रीवास्तव, के.पी.खरे आदि के नामों पर विचार कर इन्हें महानिरीक्षक बनाया जाएगा। इसके अलावा 96 बैच के शाहिद अबसार, योगेश चौधरी आदि को डीआईजी तो 98 बैच के अफसरान को सिलेक्शन ग्रेड दिए जाने पर विचार किया जाएगा। यह डीपीसी भोपाल में राज्य सचिवालय के चौथे तल पर स्थित मुख्य सचिव के कक्ष में संपन्न होगी।

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

इंडिया यंग, लीडरशिप ओल्ड!

इंडिया यंग, लीडरशिप ओल्ड!

कांग्रेस में प्रजातांत्रिक राजशाही

(लिमटी खरे)

कांग्रेस में भविष्यदृष्टा रहे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इक्कीसवीं सदी को युवाओं की सदी घोषित किया था। उनका मानना था कि इक्कीसवीं सदी में युवाओं के मजबूत कांधों पर भारत गणराज्य उत्तरोत्तर प्रगति कर सकता है। आज सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र की बागडोर उनकी अर्धांग्नी श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों में है। राजीव पुत्र राहुल भी चालीस को टच कर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी का पहला दशक बीत चुका है, पर फिर भी युवा आज भी पार्श्व में ही रहने पर मजबूर हैं। कमोबेश यही आलम भाजपा सहित अन्य राजनैतिक दलों का है। भारत गणराज्य में प्रजातंत्र की सरेआम शवयात्रा निकाली जा रही है। आम जनता प्रजातंत्र के शव पर सर रखकर गगनभेदी करूण रूदन कर रहा है, किन्तु नीति निर्धारकों और विपक्ष में बैठे नेताओं को इसकी आवाज नहीं सुनाई दे रही है। कांग्रेस में युवाओं को आगे लाने के हिमायती सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने तो मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दो साल पहले ही अपने पुत्र जयवर्धन को राघोगढ़ से कांग्रेस का प्रत्याशी तय कर दिया है। अपने आप में यह ‘‘प्रजातांत्रिक राजशाही‘‘ का नायाब उदहारण माना जाएगा।

भारत देश दिनों दिन जवान होता जा रहा है, किन्तु आज भी सियासत की बागड़ोर उमरदराज नेताओं के हाथों में ही खेल रही है। यंगिस्तान की राह इन पुराने नेताओं के हाथों से होकर ही गुजर रही है, किन्तु साठ पार कर चुके नेता आज भी युवाओं को देश की बागडोर सौंपने आतुर नहीं दिख रहे हैं। मनमोहन सिंह के हालिया फेरबदल के बाद जो परिदृश्य उभरकर सामाने आया है उसके अनुसार कैबनेट मंत्रियों की उमर पैंसठ तो मंत्रीमण्डल की औसत आयु साठ साल है। वजीरे आजम सहित 14 मंत्रियों ने सत्तर से ज्यादा सावन देख लिए हैं। अधिकतर मंत्रियों का जन्म गुलाम भारत में हुआ था। सचिन पायलट, अगाथा संगमा और मिलिंद देवड़ा की आयु 35 से कम तो कुमारी सैलजा चालीस के पेटे में हैं।

पिछले कुछ महीनों में यंगिस्तान को तवज्जो मिलने की उम्मीदें बंधी थीं। युवाओं को यह भाव इसलिए नहीं मिला है, कि देश का उमरदराज नेतृत्व उन पर दांव लगाना चाह रहा है, इसके पीछे सीधा कारण दिखाई पड़ रहा है कि देश में 18 से 30 साल तक के करोड़ों मतदाताओं को लुभाने की गरज से साठ की उमर पार कर चुके नेताओं ने यह प्रयोग किया है कि युवाओं को आगे कर युवा मतदाताओं को अपने से जोड़ा जाए। जब लाल बत्ती की बात आती है तो कमान युवाओं के हाथों से खिसलकर फिर साठ की उमर के कांधों पर चली जाती है।

कहने को तो सभी सियासी पार्टियों द्वारा युवाओं को आगे लाने और उनके हाथ में कमान देने की बातें जोरदार तरीके से की जाती हैं, किन्तु विडम्बना ही कही जाएगी कि सियासी दल युवाओं को आगे लाने में कतराती ही हैं। कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी राहुल गांधी को आगे लाया जा रहा है, वह भी इसलिए कि उनके नाम को भुनाकर राजनेता सत्ता की मलाई काट सकें। वरना अन्य राजनैतिक दल तो इस मामले में लगभग मौन ही साधे हुए हैं।

जितने भी युवा चेहरे आज राजनैतिक परिदृश्य में दिखाई पड़ रहे हैं उनमें से अधिक को अनुकंपा नियुक्तिमिली हुई है। अपने पिता की सींची राजनैतिक जमीन को सिंपेथीवोट के जरिए ये युवा काट रहे हैं, वरना कम ही एसे युवा होंगे जिन पर पार्टी ने दांव लगाया हो और वे जीतकर संसद या विधानसभा पहुंचे हों। राजनीति में स्थापित घरानांेके वारिसान को ही पार्टी चुनाव में उतारती है और फिर आगे जाकर अपने पिताओं की उंगली पकड़कर ये देश की दशा और दिशा निर्धारित करते हैं। कांग्रेस में युवाओं को आगे लाने के हिमायती सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने तो मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दो साल पहले ही अपने पुत्र जयवर्धन को राघोगढ़ से कांग्रेस का प्रत्याशी तय कर दिया है। यह प्रजातांत्रिक राजशाही का नायाब उदहारण माना जाएगा।

कांग्रेस में सोनिया गांधी (65), मनमोहन सिंह (79), प्रणव मुखर्जी (77), ए.के.अंटोनी (71) के साथ पार्टी में नेताओं की औसत उमर 74 साल है। भाजपा भी इससे पीछे नहीं है अटल बिहारी बाजपेयी (87), एल.के.आड़वाणी (84), राजनाथ सिंह (60), एम.एम.जोशी (77) तो सुषमा स्वराज (59) के साथ यहां औसत उमर 73 दर्ज की गई है। वामदलों में सीपीआईएम में प्रकाश करात (64), सीताराम येचुरी (59), बुद्धदेव भट्टाचार्य (67), अच्युतानंदन (88) के साथ यहां राजनेताओं की औसत उमर 72 तो समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव (71), अमर सिंह (55), जनेश्वर मिश्र (77), रामगोपाल यादव (65) के साथ यह सबसे यंग पार्टी अर्थात यहां औसत उमर 61 है।

सियासी पार्टियों में एक बात और गौरतलब होगी कि जितने भी युवाओं को पार्टियों ने तरजीह दी है, वे सभी जमीनी नहीं कहे जा सकते हैं। ये सभी पार्टियों में पैदा होने के स्थान पर अवतरित हुए हैं। इनमें से हर नेता किसी न किसी का केयर ऑफही है, अर्थात यंगस्तान के नेताओं को उनके पहले वाली पीढ़ी के कारण ही जाना जाता है। ग्रास रूट लेबिल से उठकर कोई भी शीर्ष पर नहीं पहुंचा है।

पिछली बार संपन्न हुए आम चुनावों के पहले रायशुमारी के दौरान एक राजनेता ने जब अपने संसदीय क्षेत्र में अपने कार्यकर्ताओं के सामने युवाओं की हिमायत की तो एक प्रौढ़ कार्यकर्ता ने अपनी पीड़ा का इजहार करते हुए कहा कि जब मैं 29 साल पूर्व आपसे जुड़ा था तब युवा था, आज मेरा बच्चा 25 साल का हो गया है, वह पूछता है कि आप तब भी आम कार्यकर्ता थे, आज भी हैं, इन 29 सालों में आपको क्या मिला, आज मैं जवान हो गया हूं, तो किस आधार पर नेताजी युवाओं को आगे लाने की बात करते हैं।

दुनिया के चौधरी अमेरिका में युवाओं और बुजुर्गों के बीच अंतर की एक स्पष्ट फांक दिखाई पड़ती है। अमेरिका जैसे विकसित देश में जहां युवा पर्यावरण, जीवनशैली, रहन सहन और पारिवारिक मूल्यों के बारे में पुरानी पीढ़ी से अपने मत भिन्न रखती है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक जीवनशैली के मामले में युवाओं द्वारा तेज गति से बदलाव चाहा जाता है। वैसे हमारी व्यक्तिगत राय में हर राजनैतिक दलों में युवाओं और बुजुर्गों के बीच संतुलन और तालमेल होना चाहिए। यह सच है कि उमर के साथ ही अनुभव का भंडार बढ़ता है, पर यह भी सच है कि उमर बढ़ने के साथ ही साथ कार्य करने की क्षमता में भी कमी होती जाती है। जिस गति से युवाओं द्वारा कार्य को अंजाम दिया जाता है उसी तरह मार्गदर्शन के मामले में बुजुर्ग अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि जिस ब्यूरोक्रेसी (अफसरशाही) की बैसाखी पर चलकर राजनेता देश को चलता है, उसकी सेवानिवृत्ति की उम्र साठ या बासठ साल निर्धारित है, किन्तु जब बात राजनेताओं की आती है तो चलने, बोलने, हाथ पांव हिलाने में अक्षम नेता भी संसद या विधानसभा में पहुंचने की तमन्ना रखते हैं, यह कहां तक उचित माना जा सकता है। राजनैतिक क्षेत्र में युवा को अलग तरीके से परिभाषित किया जाता है। अघोषित तौर पर कहा जाता है कि राजनीति में युवा अर्थात 45 से 65 साल। इस हिसाब से राहुल गांधी को अगर अमूल बेबीकहा जाता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए। विडम्बना तो देखिए सरकार में काम करने वालों की सेवानिवृत्ति की उम्र निर्धारित है, किन्तु सरकार चलाने वालों की नहीं!

हमारे विचार से महज कुछ चेहरों के आधार पर नहीं, वरन् विचारों के आधार पर युवाओं को व्यापक स्तर पर राजनीति में आने प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कब्र में पैर लटकाने वालों को अब राहुल गांधी से प्रेरणा लेना चाहिए। जब 41 बसंत देखने वाले राहुल गांधी कैबनेट में शामिल होने से खुद को दूर रखे हुए हैं तो फिर साठ पार कर चुके नेता आखिर लाल बत्ती के लिए जोड़तोड़ क्यों करते हैं। उन्हें भी चाहिए कि वे युवाओं को आगे लाने के हिमायती बनें पर राजा दिग्विजय सिंह जैसे नहीं जो खुद तो राजनीतिक मलाई चखने की कामना रखते हैं और अपने ही पुत्र को चुनाव में उतारने की घोषणा भी कर देते हैं, जबकि अभी न प्रत्याशी चुनाव के लिए समीति बनी है और न ही चुनावों की तारीखों की ही घोषणा हुई है। बुजुर्ग राजनैताओं का नैतिक दायित्व यह बनता है कि वे सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर अब मार्गदर्शक की भूमिका में आएं और युवाओं को ईमानदारी से जनसेवा का पाठ पढ़ाएं तभी गांधी के सपनों का भारत आकार ले सकेगा।

अनेक जिलों में नामों पर बनी सहमति

अनेक जिलों में नामों पर बनी सहमति

कांग्रेस की जिला इकाई घोषित करने भूरिया को आया पसीना

राहुल सिंह ने दिखाई अपनी ताकत

निर्वाचित जिलाध्यक्ष हैं 63 जिलों में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस संगठन में तेरह महीने पहले मध्य प्रदेश में जिला अध्यक्षों के निर्वाचन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाने के बाद भी जिलाध्यक्षों की घोषणा न तो पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सुरेश पचौरी कर पाए और न ही वर्तमान अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया द्वारा ही की पा रही है। इसका कारण निर्वाचितअध्यक्षों के नामों पर उनके क्षेत्र के प्रभावशाली नेताओं की आपत्ति ही है। प्रदेश की राजनैतिक राजधानी भोपाल, आर्थिक राजधानी इंदौर और संस्कारधानी जबलपुर को लेकर जबर्दस्त घमासान मचा हुआ है।

गौरतलब है कि चार जुलाई को कांग्रेस संगठन के 63 में से 34 जिलों के कांग्रेस अध्यक्षों की घोषणा कर दी गई थी। एआईसीसी के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और नियमों के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ही इन अध्यक्षों का कार्यकाल तीन साल अर्थात छत्तीस माह का होता है, जिसमें से 13 महीने तो बीत ही चुके हैं। कांतिलाल भूरिया का कहना है कि वे जल्द ही प्रदेश के क्षत्रपों से चर्चा के उपरांत नामों की घोषणा कर देंगे।

प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया, मध्य प्रदेश के प्रभारी महासचिव बी.के.हरिप्रसाद, एमपी चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष नरेंद्र बुढ़ानिया, नेशनल चुनाव प्राधिकर के अध्यक्ष आस्कर फर्नाडिस, कांग्रेस के एमपी के क्षत्रप कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी आपस में सर जोड़कर इस मामले में बैठ चुके हैं। उधर विन्ध्य क्षेत्र में अपना वर्चस्व बढ़ाने की गरज से नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह द्वारा अपने पिता स्व.अर्जुन सिंह के खासुलखास रहे आला दर्जे के राजनेताओं के माध्यम से इस क्षेत्र में अपनी पसंद के जिलाध्यक्षों को सत्तासीन करने की कवायद की जा रही है।

एआईसीसी के एक पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि जब जिला अध्यक्षों को चुनाव द्वारा निर्वाचित घोषित किया गया है तब बड़े नेताओं की पसंद नापसंद का सवाल ही कहां से उठता है। अगर निर्वाचित अध्यक्ष के बजाए किसी अन्य नाम की घोषणा की जाती है तो यह तो कांग्रेस संगठन के अंदर प्रजातंत्र के बजाए हिटलरशाही ही मानी जाएगी।

दक्षिण से प्रभावित हैं शिवराज

अब दक्षिण राज्यों और छत्तीसगढ सरकार की तर्ज पर शिवराज भी मध्यप्रदेश में 3 रू प्रति किलो गेहूं बाटेंगे

(विदुर सरकार)

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दक्षिण राज्यों और छत्तीसगढ़ सरकारों की तर्ज पर अभी से 2013 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए चुनावी बिसात बिछाना शरू कर दिया है और लोक लुभावने निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिससे की उनकी सरकार पार्टी के जनाधार को व्यापक तरिके से भी बडा सके। इसी क्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अभी पिछले ही सप्ताह प्रधानमंत्री से मुलाकात कर प्रदेश में रिकार्ड गेहूं की पैदावार से उत्पन्न भण्डारण की समस्या से अवगत कराया और साथ ही पर्याप्त गोदाम न होने के कारण ज्यादातर गेहूं खुले में पडा है जिससे उसके खराब होने की सम्भावना को देखते हुये आग्रह किया कि केन्द्र सरकार गेहूं का प्रदेश को एक साल का अग्रिम आवंटन कर दे जिससे कि भण्डारया की समस्या हल भी हो जाएगी और राज्य सरकार गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को तीन रूपये किलो की दर से अनाज उनमें बांट देगी। इससे अनाज का भी सही उपयोग हो जायेगा और साथ ही जरूरतमंदों को भी सस्ते दाम पर अनाज मिल जाएगा। इस समय लगभग 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं खुले में रखा है जिससे सुरक्षित भण्डारया की आवश्यकता है।

अव्वल तो यह सम्भव नही है कि केन्द्र सरकार एक साल का अग्रिम आवंटन राज्य सरकार को कर दे और अगर कर देती है तो शिवराज सिंह चौहान 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं को गरीबों को 3 रूपये प्रति किलो की दर से बांट कर कई लाख परिवारों को इसका लाभ पहूचा सकेंगे जो इस समय कमर तोड़ महंगाई से जूझ रहे है वे सरकार के क्रर्ताथ होगे। जो बाद में विधान सभा चुनाव के दौरान शिवराज सरकार की वाह-वाही का गुनगान कर वोटो में तब्दील हो सकते है। कुछ इसी तरह का फायदा छत्तीसगढ़ और दखिण राज्यों ने 1 रू किलो की दर से चावल गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालो को सौगात मे दीये थे।

अगर इस पूरे मुददे का बारीकी से देखे तो 3 रू प्रति किलो का गेहू गरीबी की रेखा के नीचे वाले परिवारों को बांटने से राजनैतिक लाभ को अवश्य दिख रहा है। लेकिन इसके अर्थशास्त्र अथवा आर्थिक पक्ष को जरा बारिकी से अध्ययन करे तो पायेंगे की पूरा का पूरा मुददा हवा-हवाई लगता है जिसको की यथार्थ रूप लेने में राज्य सरकार की अर्थव्यवस्था ढगमगा जाएगी और इसको पूरा करना राज्य सरकार की आज की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सम्भव कर पाना सपना सा लगता है।

अगर हम आकडों पर जाए तो मुख्यमंत्री के अनुसार लगभग 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं खुले में पडा है। जिससे सुरक्षित भण्डारण की आवश्यकता है। अगर हम मान ले की केन्द्र सरकार 18 मीट्रिक टन गेहूं को प्रदेश को साल भर कर अग्रिम आबंटन कर देती है तो 18 लाख मीट्रिक को हम किलो में करें तो 18 करोड किलो गेहूं हुआ। अगर हम गेहूं के समर्थन मुल्य 11 रू की दर मान ले तो इस पर 8 रू की राज्य सरकार को आर्थिक सब्सीडी देगी। 8 रू प्रति किलो के हिसाव से राज्य सरकार पर केवल गेहूं की सब्सीडी का लगभग 14.500 करोड़ का अतिरिक्त भार पडेगा। जिसको की राज्य सरकार का अपनी ही वार्षिक योजना से लेना होगा। यह भार गैर योजना मद से लेना होगा।

अब प्रश्न यह उठता है की राज्य सरकार अपनी 2011-12 की कुल वार्षिक योजना 23000 मे से यह गैर योजना गत राशि खर्च कर पाना सम्भव है क्या और अगर राज्य सरकार जैसा कह रही है अगर करेगी तो राज्य सरकार को एक मद का पैसा गैर योजना मद मे खर्च करना पडेगा तो क्या अन्य कल्याणकारी क्षेत्र जैसे शिक्षा ,स्वास्थ्य, उर्जा, कृषि, उधोग, अधोसंरचना आदि की योजना पर प्रतिकूल असर नही पडेगा।

अव्वल तो ऐसा करना प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन के लिहाज से ठीक नही होगा और व्यवहारिक रूप से भी यह सम्मभव नहीं है। तो क्या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान गेहूं के मुददे पर राजनीति कर रहे है और केन्द्र सरकार से ऐसी मांग कर रहे है। जो सामान्यता  केन्द्र सरकार मानेगी नही अगर नही मानेगी तो गेहूं का सड़ना और गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों को पर्याप्त मात्रा में गेहूं सस्ते दामों में न उपलबध कराने का ठीकरा भी केन्द्र सरकार पर मड दिया जाता, और यदि अगर केन्द्र सरकार खुदा न खासता खुले में पडे गेहूं को राज्य सरकार को एक साल का अग्रिम में आवंटन करने को राजी हो जाती है तो मुख्यमंत्री को गेहूं को समर्थन मुल्य पर लेकर गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों में 3 रूपये प्रति किलो के हिसाब से बांटना राज्य सरकार के लिए गले की हडडी बन जाएगी जो न निगलते बनेगी और न उगलते बनती। अर्थात सिर्फ राजनैतिक लाभ लेने के लिए राजनेता कुछ भी लुभावने वायदे अथवा घोषणा करने से गुरेजते नही है। विकास के मूलमंत्र पर दोबारा सत्ता पर आसिन शिवराज अब तीसरे पारी के लिए अभी राजनैतिक बिसात बिछा रहे है पर उनको शायद यह नही पता की कभी-कभी इस तरह का वार उल्टा पड सकता है और कलई खुल सकती है।

सोमवार, 18 जुलाई 2011

गांधी ने कोसा गांधी को!

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

गांधी ने कोसा गांधी को!
नेहरू गांधी के नाम पर आधे दशक से अधिक सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस के खेवनहारों को असली गांधी (महात्मा गांधी) के पड़पोते तुषार गांधी ने जमकर कोसा है। हालिया कैबनेट विस्तार के बाद तुषार ने ट्विट किया है कि संप्रग सरकार ने महात्मा गांधी के हत्यारों को कैबनेट में स्थान दिया है। उनका कहना है कि हाल ही में कैबनेट में शामिल किए गए जितेंद्र सिंह अलवर राजघराने से हैं और यह वही राजघराना है जिसने बापू के हत्यारे नाथूराम गोडसे को संरक्षण दिया था। गौरतलब है कि बापू के अवसान के बाद कांग्रेस ने उन्हें भले ही राष्ट्रपिता का दर्जा दिया हो पर उनके परिवार को एकदम किनारे कर दिया है। बापू के परिवार का हाल जानने किसी को फुर्सत नहीं है। वैसे यह कटु सत्य है कि आजादी के परवानों में जवाहर लाल नेहरू के वारिसान के अलावा और किसी को कांग्रेस ने सहेजा ही नही है।

रील लाईफ से रियल लाईफ में उतरी पेज थ्री
पेज थ्री सिनेमा ने अखबार में तीसरे नंबर के पेज की मांग को बढ़ाया है। साथ ही इसमें बम ब्लास्ट के दौरान अफसरान को पार्टी मनाते दिखाया है। यह रील लाईफ थी, किन्तु देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 13 तारीख को हुए बम ब्लास्ट के बाद एसा ही कुछ नजारा रियल लाईफ में देखने को मिला। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बम धमाकों के लगभग छः घंटे बाद जब देश शोक और सदमे में डूबा था तब एक फैशन डिजायनर के शो में केंद्रीय पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय, भाजपा के राष्ट्रीय सचिव अशोक प्रधान और दिल्ली की पूर्व मेयर आरती मेहरा ने शिरकत की। सहाय, प्रधान और मेहरा का तर्क कि उन्हें जानकारी नहीं थी, गले नहीं उतरता। आज संचार क्रांति के इस दौर में जब पत्ता खड़कता है तो सबको खबर हो जाती है, एसी परिस्थिति में घटना के छः घंटे बाद भी इन शीर्ष राजनेताओं को इसका पता न चले यह संभव ही नहीं हो सकता है।

एमपी को प्रायारिटी से उतारा कांग्रेस ने
एक समय था जब देश के हृदय प्रदेश पर कांग्रेस हुकूमत किया करती थी। 2003 में राजा दिग्विजय सिंह ने इसके ताबूत में आखिरी कील ठोंकी और फिर कांग्रेस का संगठन यहां दम तोड़ गया। सुभाष यादव और सुरेश पचौरी जैसे कुशल प्रबंधक और प्रशासक भी कांग्रेस को सूबे में नहीं जिला पाए। अब कमान कांति लाल भूरिया के हाथों में आई है। भूरिया के कामन संभालते ही उपचुनाव में कांग्रेस औंधे मुंह गिर गई। आलाकमान को अब मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वापसी की कोई उम्मीद की किरण दूर दूर तक दिखाई नहीं पड़ रही है। यही कारण है कि केंद्र के हालिया फेरबदल में मध्य प्रदेश के खाते के चार ताज में से दो कांतिलाल भूरिया और अरूण यादव के सर से उतार लिए गए हैं। भूरिया पहले ही प्रदेश में कांग्रेस की पतवार थामे हैं और यादव को केंद्र में संगठन में स्थान दिया गया है। सुरेश पचौरी अभी कतार में ही हैं। मौके का फायदा शिवराज ने उठाया और कह दिया कि कांग्रेस ने एमपी से अब उम्मीद छोड़ दी है।

महंत के चरणमें जनसंपर्क विभाग
संयुक्त मध्य प्रदेश के गृह मंत्री रहे चरण दास महंत अब छत्तीसगढ़ से सांसद हैं और हाल ही में कैबनेट विस्तार में राज्य मंत्री भी बनाए गए हैं। महंत की चरण वंदनामें मध्य प्रदेश सरकार के दिल्ली स्थित एक कार्यालय के अधिकारी की दिलचस्पी आश्चर्यजनक है। महंत के मंत्री बनने से लेकर उनके कार्यभार ग्रहण करने तक की पेपर क्लिपिंग्स को मध्य प्रदेश सरकार की छवि चमकाने के लिए पाबंद जनसंपर्क विभाग के दिल्ली कार्यालय ने सहेजकर महंत तक पहुंचाया। विभाग के सूत्रों ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि शिवराज सिंह चौहान सरकार से पगार पाने वाले इस कार्यालय के अधिकारी द्वारा कांग्रेस के सांसद में एसी क्या दिलचस्पी। बताया जाता है कि इसके पूर्व यह कार्यालय मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष और राज्य सभा सांसद प्रभात झा के कार्यालय के बतौर काम कर रहा था। मीडिया असमंजस में है कि यह सरकारी दफ्तर है या संसद सदस्य प्रभात झा अथवा केंद्रीय मंत्री चरण दास महंत का कार्यालय!

क्या यह अनुशासनहीनता नहीं!
मध्य प्रदेश पर दस साल राज करने के बाद दस साल का वनवास की घोषणा कर उसे भोगने वाले कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह बेलगाम हो गए हैं। मध्य प्रदेश के चुनावों में अभी दो साल से ज्यादा का वक्त है। राजा केंद्र में महासचिव हैं, अभी चुनाव अभियान समिति तो छोड़िए मध्य प्रदेश के कांग्र्रेसी निजाम कांतिलाल भूरिया ने अपनी टीम भी नहीं बनाई है तब राजा दिग्विजय सिंह ने सामंतशाही तौर तरीकों को आगे बढ़ाते हुए अपने पुत्र जयवर्द्धन सिंह को राघोगढ़ से उतारने का एलान कर दिया है। क्या यह अनुशासनहीनता की श्रेणी में नहीं आता? राजा कभी राहुल की ताजपोशी की पैरवी करते हैं तो कभी अपने पुत्र को विधायक बनाने की बात करते हैं। देश में प्रजातंत्र है या राजशाही कि एलान किया जाए कि फलां अब राजकाज संभालने के लिए तैयार हो गए हैं। रही बात ‘‘मैनेज्ड‘‘ भाजपा की तो वह भी राजा के इस कदम पर मौन अख्तिायार किए हुए है।

गौतम ने रूलाया गड़करी को!
उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी का भाजपा में विलय हो गया। इसके विलय के अवसर पर भाजश अध्यक्ष संघप्रिय गौतम ने अपने महत्व को रेखांकित करते हुए लगभग बीस मिनिट तक भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी को सांसें थामने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली में आयोजित इस प्रोग्रम में उमा भारती और नितिन गड़करी ने बेहद अच्छा और ममस्पर्शी उद्बोधन देकर तालियों की गड़गड़ाहट से पंडाल को गुंजायमान कर दिया। जब बारी भाजश अध्यक्ष संघप्रिय की आई तो उन्होंने ‘‘मैं भाजश का भाजपा में विलय करता हूं,‘‘ की घोषणा के पहले अपने और अटल आड़वाणी के संस्मरण सुनाने आरंभ कर दिए। बार बार उमा और गड़करी के चेहरे पर आते जाते भाव साफ जाहिर कर रहे थे कि संघप्रिय की भाषणबाजी से वे व्यग्र थे। अंत में जब उमा भारती ने उन्हें आंखें दिखाईं तब जाकर गौतम ने पार्टी के विलय की घोषणा की।

राहुल के कारण गई सिपाही की जान!
कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के सुरक्षा घेरे के चलते एक सिपाही को असमय ही काल के गाल में समाने पर मजबूर होना पड़ा। राहुल पिछले दिनों कानपुर दौरे पर थे, उन्हें जिस मार्ग से गुजरना था वहां कर्फ्यू जैसे हालात बना दिए गए थे। राहुल की सुरक्षा में लगे एसपीजी के जवानों ने एक घायल पुलिस के सिपाही को अस्पताल में दाखिल होने से रोक दिया गया क्योंकि राहुल गांधी का काफिला वहां से गुजरने वाला था। घाटम पुर तहसील के जाजपुर गांव के सिपाही धर्मेंद्र कुमार सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गया था। जैसे ही उसे अस्पताल ले जाया गया वहां एसपीजी ने उसका रास्ता रोक लिया। देरी के चलते धर्मेंद्र ने दम तोड़ दिया। इसके पहले प्रधानमंत्री के काफिले की सुरक्षा व्यवस्था के चलते अमन नामक बच्चे ने दम तोड़ा था। अतिविशिष्ट की श्रेणी में शामिल लोगों की सुरक्षा का खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़े इस तरह की आजादी से तो गुलामी की जंजीरे ही बेहतर थीं।

भरपेट पैसा फिर भी भूखे!
एमपी के निजाम शिवराज सिंह चौहान सदा ही कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पर उपेक्षा के आरोप जड़ते आए हैं। उधर केंद्र का कहना रहा है कि वह मध्य प्रदेश के प्रति उदार है, और पर्याप्त सहायता देती है। यह मामला उजागर हुआ वन एवं पर्यावरण विभाग से। केंद्र सरकार द्वारा 11113.75 लाख रूपए मध्य प्रदेश के टाईगर रिजर्व के लिए प्रदान की थी, इसमें से राज्य सरकार द्वारा महज 9519.23 लाख रूपए ही खर्च किए। इसमें पेंच के लिए स्वीकृत राशि 796.69 में से 597.79 ही व्यय हो पाए। करोड़ों अरबों रूपए खर्च करने के बाद भी टाईगर रिजर्व में न तो वन्य जीवों का अवैध शिकार रोका जा सका है और न ही बेशकीमती लकड़ियों को काटने का काम। बारिश में हर साल करोड़ों रूपए मैंटिनेंस के नाम पर पानी में बहा दिए जाते हैं। एक समय था जब टाईगर रिजर्व में पोस्टिंग को पनिशमेंट पोस्टिंग माना जाता था किन्तु अब तो यह मलाईदार हो गई है।

फेरबदल बनाम असंतोष का उबाल!
कमजोर प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने पांच संपादकों की टोली के सामने खुद को मजबूत जतलाने का प्रयास किया। कुछ समय तक लगा मानो वे सच कह रहे हों। हाल ही में एक बार फिर साबित हो गया है कि पीएम कमजोर ही नहीं वरन् चाबी से चलने वाले गुड्डे के मानिंद हैं। जैसा सोचा जा रहा था, वैसा नहीं रहा यह विस्तार। कैबनेट विस्तार से असंतोष की स्वर लहरियां उभरकर सामने आ गई हैं। आदिवासी बाहुल्य मध्य प्रदेश से किसी भी आदिवासी नेता को लाल बत्ती नहीं दी गई। बचे दो मंत्री कमल नाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सामान्य वर्ग के हैं। गुरूदास कामथ त्यागपत्र दे चुके हैं, तो पीएम इसे अपना अंतिम विस्तार बता रहे हैं। वहीं दो सीट गठबंधन धर्म के कारण खाली भी रखी गई है। अगर इसे भरा जाता है तो यह विस्तार अंतिम कैसे हुआ। सच है कांग्रेस के लिए गठबंधन धर्मवाकई राष्ट्रधर्मसे बढ़कर है।

जनजातीय मंत्री की जाति पर ही शक!
मनमोहन सरकार के जनजातीय मंत्री व्ही.किशोर चंद्र देव के आदिवासी होने पर ही शक किया जा रहा है। लोकसभा की आरकु आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के मामले में कोर्ट में एक मामला दायर किया गया था। वैसे भी आदिवासी मामलों का मंत्रालय जमीन से जुड़े किसी आदिवासी के पास होने से ही उनका उद्धार संभव माना जा रहा है। इसके पहले राजघरानों से संबंध रखने वाली उर्मिला सिंह और सूट बूट वाले आदिवासी मामा कांतिलाल भूरिया के हाथों रही है इसकी लगाम। अब देव आदिवासी हैं या नहीं यह भी साफ नहीं है, वहीं इस विभाग के राज्य मंत्री जाति के जाट हैं। कांग्रेस के आदिवासी सांसदों का आरोप सही है कि आदिवासियों के विकास की जवाबदारी सदा से ही राजघरानों के कांधों पर सौंप दी जाती है। भला सामंतशाही के बीच पले बढ़े राजा गरीब आदिवासी की व्यथा कैसे समझेंगे।

तम्बखू के ब्रांड एम्बेसेडर बने राहुल गांधी!
आजादी के पहले कहा जाता था कि इंदिरा गांधी के दादा मोती लाल नेहरू के कपड़े विलायत से घुलकर आते थे। यही बात साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वे कितने अमीर थे। उसके बाद उनकी विरासत जवाहर लाल फिर उनकी पुत्री इंदिरा, के बाद राजीव और संजय के परिजनों ने संभाली। एक के बाद एक सत्ता और शक्ति के केंद्र का हस्तांतरण एक ही परिवार तक सिमट कर रह गया। बीते दिनों राहुल गांधी तम्बाखू के ब्रांड एम्बेसेडर के रूप में नजर आए। एक समारोह में मंच पर हुक्के को स्वीकार किया राहुल ने। सिगरेट एण्ड अदर टुबेके प्रोडेक्ट एक्ट 2003 में तम्बाखू के किसी भी उत्पाद को प्रोत्साहित करना प्रतिबंधित है। कांग्रेसी मानें न मानें पर राहुल गांधी अभी परिपक्व नहीं हो पाए हैं। राहुल के खिलाफ कोई कार्यवाही इसलिए भी नहीं होगी क्योंकि ‘‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं।‘‘

सहेजेंगे वालीवुड़ की विरासत
केंद्र सरकार ने भारत गणराज्य में आजादी के पहले से अब तक की फिल्मों की विरासत को सहेजने की अभिनव योजना बनाई है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा लगभग साढ़े छः सौ करोड़ रूपयों की लागत की पहली किश्त से इस काम को अंजाम दिया जाएगा। विभाग द्वारा पुरानी मशहूर फिल्मों के प्रिंट, मनमोहक पोस्टर्स, अनारकली की सलवार कमीज, गब्बर के अलग हटकर पहने कपड़ों जैसे कास्टयूम, पुराने कैमरे, ग्रामोफोन, पटकथाएं, पांडुलिपि, रिकार्डस, कैसेट्स, सीडी, अनमोल तस्वीरें, सेट डिजाईन आदि को सहेजकर रखा जाएगा। इसमें आठ हजार से ज्यादा खराब हो रही फिल्मों, चालीस हजार से ज्यादा पटकथाओं और दो लाख से ज्यादा पोस्टर्स और तस्वीरों के डिजिटलीकरण के साथ ही साथ वेशभूषा को भी सहेजकर रखा जाएगा। अगर यह योजना परवान चढ़ी तो आने वाली पीढ़ी के लिए यह बेहद ममस्पर्शी हो सकता है।

जेपीसी के लिए नए चेहरों की तलाश
2 जी स्पेक्ट्रम की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के लिए अब तीन नए चेहरों की तलाश आरंभ हो गई है। दरअसल इसमें शामिल तीन सांसदांे के मंत्री बनने के बाद यह खोज आरंभ की गई है। संसदीय नियम कहते हैं कि मंत्री बनने के बाद सदस्य इसकी बैठक में हिस्सा नहीं ले सकते हैं। देव, नटराजन और घटोवर मंत्री बन गए हैं, जो जेपीसी के मेम्बर थे। वी.किशोर चंद देव को जनजातीय मंत्री, जयंती नटराजन को वन एवं पर्यावरण तथा पवन घटोवर को पूर्वाेत्तर मामलों का मंत्री बनाया गया है। जेपीसी में अब इन तीनों का स्थान तीन कांग्रेस के ही सदस्य ले पाएंगे। इसके लिए सांसदों द्वारा अपने अपने आकाओं को सिद्ध करना आरंभ कर दिया है। कहा जा रहा है कि सांसदों ने कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह और सोनिया के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल की देहरी पर सर रगड़ना आरंभ कर दिया है।

पुच्छल तारा
राजनेता, जनसेवक, लोकसेवक सारी उमर पैसों के बीच खेलने के बाद भी उसके पीछे ही भागते रहते हैं। शरद पवार केंद्र में मंत्री हैं, फिर भी देश सेवा से बढ़कर उनके लिए क्रिकेट का पद है, क्योंकि इसमें मलाई ज्यादा है। शरद पवार की इस फितरत को महाराष्ट्र से विपिन ने एसएमएस भेजकर साफ करते हैं। विपिन लिखते हैं -‘‘ब्रेकिंग न्यूज . . .। शरद पंवार ने अब सारे काम धाम छोड़ दिए हैं। पवार आजकल मलयाली सीख रहे हैं और वे योजना बनाने में व्यस्त हैं कि किस तरह पदम्नाभन मंदिर के खजांची का चुनाव लड़ें और जीत सकें।‘‘

बुधवार, 13 जुलाई 2011

आदिवासियों से मोह भंग हुआ कांग्रेस का

आदिवासियों से मोह भंग हुआ कांग्रेस का

आदिवासी मामलों का मंत्रालय राजघरानों के हवाले

मध्य प्रदेष से खासा अन्याय किया मनमोहन ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मनमोहन मंत्रीमण्डल के अंतिम फेरबदल में कांग्रेस ने मध्य प्रदेष के साथ खासा अन्याय किया है। यद्यपि छत्तीगढ़ से चरण दास महंत को मंत्रीमण्डल में षामिल अवष्य ही कर लिया है किन्तु फिर भी कांग्रेस अपने परंपरागत आदिवासी वोट बैंक से दूर जाती ही दिखाई पड़ रही है। कांग्रेस के नए रणनीतिकारों द्वारा आदिवासियों को दरकिनार कर उनके नाम पर राजघरानों को आगे बढ़ाने का उपक्रम किया जा रहा है।

गौरतलब है कि इसके पहले आदिवासी मामलों को देखने वाली उर्मिला सिंह वर्तमान में हिमाचल प्रदेष की महामहिम राज्य पाल हैं। इसके बाद कंातिलाल भूरिया जिनकी छवि सूट बूट वाले आदिवासी नेता की थी, को कांग्रेस ने मध्य प्रदेष कांग्रेस कमेटी का कांटों भरा ताज पहनाकर केंद्रीय राजनीति से रूखसत कर दिया। वर्तमान में राजषाही परिवार से संबंध रखने वाले के. किषोर चंद्र देव को सौंपा गया है। इस विभाग के राज्य मंत्री राजस्थान के महादेव खण्डेला हैं जो ओबीसी वर्ग के जाति से जाट हैं।

इस बार उम्मीद की जा रही थी कि इस विस्तार में अगर भूरिया को विदा भी किया जाता है तो आदिवासी बाहुल्य मध्य प्रदेष और छत्तीसगढ़ से किसी आदिवासी नेता को इस विभाग की कमान सौंपी जा सकती है। चरण दास महंत को भी एग्रीकल्चर का जिम्मा सौंपा गया है। आदिवासियों की सबसे अधिक तादाद होने के बाद भी एमपी और छत्तीसगढ़ से एक भी सांसद को इस विभाग का नेजा नहीं थमाया जाना आष्चर्यजनक ही है। कांग्रेस का यह कदम उसके परंपरागत आदिवासी वोट बैंक से अपने आप को दूर करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।

कांग्रेस की सत्ता और षक्ति के सबसे बड़े केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि आदिवासी सांसद अपनी घोर उपेक्षा के चलते आज श्रीमति सोनिया गांधी से भेंट करने आने वाले हैं। इन सांसदों में कांतिलाल भूरिया, राजेष नंदनी सिंह, बसोरी सिंह समराम और गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी प्रमुख हैं।