बुधवार, 24 अगस्त 2011

अण्णा की चाभी ग्राम सभा के पास


अण्णा की चाभी ग्राम सभा के पास

सरकार की गेंद विपक्ष के पाले में

सर्वदलीय बैठक के बाद ही होगा निर्णय!

तीस हजारी के जज ने थाम अण्णा का झंडा

यशवंत ने की त्यागपत्र की पेशकश

रोजा अफ्तार बना पीएम के गले की फांस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। ‘‘बहुत पुरानी कहावत है कि राजा की जान तोते में, तोते के पर काटो राजा के हाथ कट जाएंगे।‘‘ मनमोहन सरकार राजा यानी अण्णा हजारे के लिए इसी तरह के अस्त्र की खोज की जा रही है। लगता है सरकार के हाथ वह अस्त्र लग गया है। अण्णा के अनशन को समाप्त करने की चाबी उनके गांव राणेगांव सिद्धि की ग्राम सभा के पास है। अण्णा के लिए वहां की ग्राम सभा का आदेश भगवान के आदेश के तुल्य है।
पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि सरकार द्वारा अब महाराष्ट्र सरकार के मार्फत यह दबाव बनाया जा रहा है कि अण्णा के गांव के लोग ग्राम सभा बुलाकर अण्णा से अनशन समाप्त करने का निवेदन करें। इसके पीछे अण्णा की बिगड़ती सेहत का हवाला दिया जा रहा है। सरकार का खुफिया तंत्र और प्रबंधक इस दिशा में अपने प्रयास तेज कर चुके हैं।

सूत्रों ने आगे कहा है कि अण्णा के समर्थन में जुटे देश भर में जनसमर्थन के बाद खुफिया सूत्रों ने सरकार को जो सूचनाएं दी हैं उससे सरकार के हाथ पांव फूल गए हैं। सरकार को डर है कि अगर अण्णा की सेहत बिगड़ी तो स्थिति बेकाबू हो जाएगी। इसलिए सरकार ने मंगलवार और बुधवार की दर्मयानी रात में बैठकों के अनेक दौर चलाए, जिसमें सीसीपीए और मंत्रियों की बैठक का शुमार था।

सरकार ने गेंद विपक्ष के पाले में डालते हुए संकेत दिए कि अगर विपक्ष चाहे तो संसद का सत्र आगे बढ़ा दिया जाएगा, जिससे अण्णा की इसी संसद सत्र में लोकपाल बिल की मांग को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है। सरकार ने प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का आश्वासन दे दिया है। साथ ही न्यायधीशों के लिए अलग से कानून लाने पर भी सहमत हो गई है जो टीम अण्णा की एक बड़ी जीत मानी जा सकती है।

अण्णा के स्वास्थ्य पर नजर रखने वाले डॉ.नरेश त्रेहान ने कहा कि अण्णा का केटोपोलिज्म बढ़ रहा है जो चिंता का कारण है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि इससे अण्णा की किडनी पर असर हो सकता है। उधर अण्णा ने कहा कि अगर उनकी किडनी खराब होती है तो देशवासियों में से कोई भी अपनी एक किडनी सहर्ष उन्हें दे देगा। अण्णा का गिरता स्वास्थ्य सरकार के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।

उधर भाजपा के गांधी रामलीला मैदान पर पहुंचे और अण्णा से न मिलकर वे उनके समर्थकों के साथ जाकर बैठ गए। वरूण गांधी का यह कदम मीडिया के लिए सुर्खियों का कारक बना। मीडिया पर्सन्स वरूण को घेरकर उनसे सवाल जवाब करने लगे। वरूण ने बडी ही शालीनता के साथ अण्णा के समर्थन की बात कही।

भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद यशवंत सिन्हा ने भी भाजपा का रूख अण्णा मामले में साफ न होने पर त्यागपत्र देने की पेशकश कर डाली है। रामलीला मैदान पर लोग तब हतप्रभ रह गए जब दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के एक जज अजय पांडे ने अण्णा का झंडा थामकर न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में लाने की बात कह डाली। अजय पाण्डे ने अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि वे कशमकश में थे कि अगर वे अण्णा का साथ देते हैं तो इसके क्या परिणाम होंगे, अंत मंे अतंरात्मा की आवाज पर उन्होंने अनिष्ट की आशंका के बाद भी यह कदम उठा ही लिया।

पीएमओ के सूत्रों का कहना है आज शाम को ही प्रधानमंत्री ने रोजा अफ्तारी रखी है। प्रधानमंत्री पशोपेश में हैं कि एक गांधीवादी जब नौ दिन से भूखा प्यासा बैठा है तब वे इस प्रोग्राम को रखते हैं तो इसका गलत संदेश जाएगा। यही कारण है कि सरकार ने अण्णा के अनशन को तुड़वाने के प्रयास तेज कर दिए हैं।

अण्णा ने लटकाई पीसीसी


अण्णा ने लटकाई पीसीसी

पांच अध्यक्षों की घोषणा

छिंदवाड़ा अभी भी खटाई में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अण्णा हजारे के अनशन के चलते मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी में टीम भूरिया को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। आज इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर के जिलाध्यक्षों की घोषणा अवश्य ही कर दी गई किन्तु मध्य प्रदेश के क्षत्रप और केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में जिलाध्यक्ष्ज्ञ के नाम पर सहमति नहीं बन सकी है। लंबी जद्दोजहद के बाद भूरिया अपनी सूची को अंतिम रूप देने में तो सफल रहे किन्तु अण्णा प्रकरण के कारण उसे जारी नहीं कर पा रहे हैं।

कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि भोपाल शहर में पीसी शर्मा, ग्वालियर में हरेंद्र यादव, जबलपुर में दिनेश यादव, इंदौर ग्रामीण अतर सिंह के नाम पर मुहर लगा दी गई है। उधर टीम भूरिया के लिए अंतिम तौर पर सूची तैयार की जा चुकी है। विशेष आमंत्रितों के नाम पर अभी सहमति नहीं बन पाई है।

सूत्रों ने आगे कहा कि पहली सूची में कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरूण यादव और अजय सिंह के समर्थकों को स्थान दिया जा रहा है। इसमें उपाध्यक्ष, सचिव और महामंत्रियों की घोषणा की जा सकती है। सूत्रों ने यह भी कहा कि भूरिया ने अपनी टीम में महिलाओं के लिए 33 फीसदी स्थान सुरक्षित रखा है। प्रदेश प्रभारी बी.के.हरिप्रसाद के करीबी सूत्रों का कहना है कि टीम भूरिया की पहली सूची पर उनकी मुहर लग चुकी है।

कनाड़ा में अण्णा के समर्थन में गूंजी सिवनी की आवाज


कनाड़ा में अण्णा के समर्थन में गूंजी सिवनी की आवाज

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे का आव्हान देश ही नहीं वरन् विदेशों में भी सर चढ़कर बोल रहा है। कनाड़ा के टोरंटो शहर में रहने वाली पेशे से चिकित्सक डॉ.जया राजपूत चौहान और उदय सिंह चौहान ने अण्णा के समर्थन में टोरंटो में भारतवंशियों को एक सूत्र में पिरोकर प्रदर्शन किया।

मूलतः सिवनी निवासी डॉ.जया का विवाह इंदौर निवासी इंजीनियर उदय के साथ हुआ है। दोनों ही टोरंटों में निवास कर रहे हैं। जया के पिता व्ही.एस.राजपूत सिवनी के मुंगवानी में ग्रामीण बैंक में शाखा प्रबंधक हैं। केयर कंप्यूटर सिवनी के संचालक विपिन सिंह राजपूत ने बताया कि उनकी अनुजा को समाचार चेनल्स और इंटरनेट के माध्यम से टोरंटो में अण्णा के अनशन के बारे में पता चला।

इस संवाददाता से दूरभाष पर चर्चा के दौरान डॉ.जया ने कहा कि अण्णा के भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की जानकारी मिलते ही उन्होने भारत वंशियों को वहां एकत्र किया और उनसे इस संबंध में चर्चा की। उन्होंने कहा कि वहां रह रहे भारत वंशियों का मानना है कि भारत के घपलों और घोटालों की खबरें जब कनाडा में सुखियां बनती हैं तो उनका सर शर्म से झुक जाता है। यही कारण है कि सभी ने एक साथ मिलकर अण्णा के समर्थन में प्रदर्शन करने का निर्णया लिया।

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

नेता नहीं जनता के सिर पर खिल रही है गांधी टोपी

नेता नहीं जनता के सिर पर खिल रही है गांधी टोपी

(लिमटी खरे)

नेहरू गांधी परिवार के नाम पर सत्ता की मलाई सालों साल से चखने वाली कांग्रेस के नेताओं द्वारा असली गांधी यानी महात्मा गांधी के नाम पर पहचानी जाने वाली गांधी टोपी को साल में एकाध मर्तबा ही इस्तेमाल किया जाता है। 15 अगस्त और 26 जनवरी को भी सलामी लेते वक्त नेताओं या अधिकारियों द्वारा गांधी टोपी के स्थान पर फर वाली काली टोपी का इस्तेमाल करना ज्यादा मुनासिब लगता है। एक समय था जब भारत सरकार या सूबाई सरकार के कारिंदों की यूनिफार्म में गांधी टोपी को अनिवार्य अंग माना जाता था, विडम्बना है कि वर्तमान में गांधी टोपी सभी के सर से नदारत ही दिखती है। 16 अगस्त के बाद समूचे भारत में मैं अण्णा हूंके जुमलों से युक्त गांधी टोपी लोगों के कपाल की शोभा बढ़ा रही है। लगता है गांधी टोपी के मायने महज लड़ाई के दौरान सरकार के विरोध प्रदर्शन का अनिवार्य हिस्सा बनकर रह गई है, जो निश्चित तौर पर चिंता का विषय ही माना जा सकता है।
 
एक लोकपाल हजारों लाखों करोड़ांे अण्णा। जहां देखो वहां अण्णा। गांधी टोपी लगाए सादगी की प्रतिमूर्ति नजर आने वाले अण्णा से प्रभावित होने वालों में युवाओं की खासी तादाद नजर आ रही है। अण्णा की सादगी पर मर मिटने वाले युवाओं ने गांधी टोपी की मांग को अचानक ही बढ़ा दिया है। अब तो सफेद गांधी टोपी जिस पर मैं अण्णा हूं लिखा है हर किसी के सर का ताज बनी हुई है। कल तक मारी मारी फिरने वाली यह टोपी आज सवा सौ रूपए में भी नसीब नहीं हो पा रही है। सर पर गांधी टोपी लगाए भारत वासियों का जुनून देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनकी पुरानी पीढ़ी ने जब गोरे ब्रितानियों से संघर्ष किया होगा तब उनके अंदर क्या जज़्बा रहा होगा।

कहने को तो कांग्रेस द्वारा गांधी नेहरू परिवारों का गुणगान किया जाता है, किन्तु इसमें राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी का शुमार है या नहीं यह कहा नहीं जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, के बाद अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी के इर्द गिर्द ही कांग्रेस की सत्ता की धुरी घूमती महसूस होती है। सच भी है आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस को पता है कि नेहरू गांधी परिवार का नाम ही करिश्माई है। इस परिवार की वर्तमान पीढ़ी को मुगालते मंे रखकर नेता अपना स्वार्थ सिद्ध करने पर आमदा हैं।

वैसे तो महात्मा गांधी और उनकी अपनाई गई खादी को भी अपनी विरासत मानती आई है कांग्रेस। पर अब लगता है कि वह इन दोनों ही चीजों से दूर होती चली जा रही है। अधिवेशन, चुनाव, मेले ठेलों में तो कांग्रेसी खादी के वस्त्रों का उपयोग जमकर करते हैं, किन्तु उनके सर से गांधी टोपी नदारत ही रहा करती है। बापू की सूत कती खादी अब भूले बिसरे गीतों की तरह गुजरे जमाने की बात हो गई है। अब तो नेताओं द्वारा सफेद धवल खादी जो उम्दा क्वालिटी की और मंहगी मिलों में तैयार होती है को अंगीकार किया जाता है। एक बड़े मंत्री के सफेद कुर्ते पायजामे तो एक विशेष कंपनी द्वारा तैयार करवाए जाते हैं जिनकी कीमत पचास हजार रूपए मीटर से अधिक की बताई जाती है।

कांग्रेस सेवादल के ड्रेस कोड में शामिल है गांधी टोपी। जब भी किसी बड़े नेता या मंत्री को कांग्रेस सेवादल की सलामी लेनी होती है तो उनके लिए चंद लम्हों के लिए ही सही गांधी टोपी की व्यवस्था की जाती है। सलमी लेने के तुरंत बाद नेता टोपी उतारकर अपने अंगरक्षक की ओर बढ़ा देते हैं, और अपने बाल काढ़ते नजर आते हैं, ताकि फोटोग्राफर अगर उनका फोटो लें तो उनका चेहरा बिगड़े बालों के चलते भद्दा न लगे।

इतिहास गवाह है कि गांधी टोपी कांग्रेस विचारधारा से जुड़े लोगों के पहनावे का हिस्सा रही है। अस्सी के दशक के आरंभ तक नेताओं के सिर की शान हुआ करती थी गांधी टोपी। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू हों या मोरारजी देसाई, किसी ने शायद ही इनकी कोई तस्वीर बिना गांधी टोपी के देखी हो।

लगता है कि वक्त बदलने के साथ ही साथ इस विचारधारा के लोगों के पहनावे में भी अंतर आ चुका है। अस्सी के दशक के उपरांत गांधी टोपी धारण किए गए नेताओं के चित्र दुर्लभ ही देखने को मिलते हैं। करीने से काढे गए बालों और पोज देते नेता मंत्री अवश्य ही दिख जाया करते हैं। यहां तक कि पंडित नेहरू के उपरांत उनके नवासे राजीव गांधी और पड़पोते राहुल गांधी के भी गांधी टोपी के साथ चित्र दुर्लभ ही हैं। देश के मंत्रियों ने तो गांधी टोपी को मानो तिरस्कृत ही कर रखा है।

आधुनिकता के इस युग में महात्मा गांधी के नाम से पहचानी जाने वाली गांधी टोपी अब नेताओं के सर का ताज नहीं बन पा रही है। इसका स्थान ले लिया है कांग्रेस के ध्वज के समान ही तिरंगे दुपट्टे (गमछे) ने। उधर भाजपा भी कहां पीछे रहने वाली थी, भाजपा ने भी भगवा दुपट्टे को अपना ड्रेस कोड अघोषित तौर पर बना लिया है। जब नेता ही गांधी टोपी का परित्याग कर चुके हों तो उनका अनुसरण करने वाले कार्यकर्ता भला कहां पीछे रहने वाले हैं।

एसा नहीं कि गांधी टोपी आजाद भारत के लोगों के सिरों का ताज न हो। आज भी महाराष्ट्र में अनेक गांव एसे हैं, जहां बिना इस टोपी के कोई भी सिर दिखाई दे जाए। इसके साथ ही साथ कर्नाटक और तमिलनाडू के लोगों ने भी गांधी टोपी को अंगीकार कर रखा है। अण्णा हजारे जैसे गांधी वादी आज भी गांधी टोपी को सर की शान ही समझते हैं।

अस्सी के दशक के आरंभ तक अनेक प्रदेशों में चतुर्थ श्रेणी के सरकारी नुमाईंदों के ड्रेस कोड में शामिल थी गांधी टोपी पहनकर सरकारी कर्मचारी अपने आप को गोरवांन्वित महसूस भी किया करते थे। कालांतर में गांधी टोपी ‘‘आउट ऑफ फैशन‘‘ हो गई। यहां तक कि जिस शख्सियत को पूरा देश राष्ट्रपिता के नाम से बुलाता है, उसी के नाम की टोपी को कम से कम सरकारी कर्मचारियों के सर की शान बनाने मंे भी देश और प्रदेशों की सरकरों को जिल्लत महसूस होती है। यही कारण है कि इस टोपी को पहनने के लिए सरकारें अपने मातहतों को पाबंद भी नहीं कर पाईं हैं।

यह सच है कि नेताओं की भाव भंगिमओं, उनके आचार विचार, पहनावे को उनके कार्यकर्ता अपनाते हैं। जब नेताओं के सर का ताज ही यह टोपी नहीं बन पाई हो तो औरों की कौन कहे। यहां तक कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वर्किंग कमेटी में उपसिथत होने वाले नेताओं के सर से भी यह टोपी उस वक्त भी नदारत ही मिलती है।

मर्द के सर पर टोपी और औरत के सर पर पल्लू, अच्छे संस्करों की निशानी मानी जाती है। फिर आधी सदी से अधिक देश पर राज करने वाली लगभग सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के नेताओं को इसे पहनने से गुरेज कैसा। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू रहे हों या महामहिम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, किसी ने कभी भी इनकी बिना टोपी वाले छायाचित्र नहीं देखे होंगे। आधुनिकता और पश्चिमी फैशन की चकाचौंध में हम अपने मूल संस्कार ही खोते जा रहे हैं, जो निश्चित तौर पर चिंताजनक कहा जा सकता है।

वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एक सूबे में तो वन्दे मातरम को सरकारी कार्यालयों मंे अनिवार्य कर दिया है। यह सच है कि भाजपा का जन्म राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आचार विचारों से ही हुआ है। क्या संघ के पूर्व संस्थापकों ने कभी गांधी टोपी को नहीं अपनाया? अगर अपनाया है तो फिर आज की भाजपा की पीढ़ी इससे गुरेज क्यों कर रही है?

युवाओं के पायोनियर (अगुआ) बन चुके कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी किसी कार्यक्रम में अगर जरूरत पड़ती है तो गांधी टोपी को सर पर महज औपचारिकता के लिए पहन लेते हैं, फिर मनमोहक मुस्कान देकर इसे उतारकर अपने पीछे वाली कतार में बैठे किसी नेता को पकड़ा देते हैं। देश में अण्णा की आंधी के उपरांत गांधी टोपी एक बार फिर प्रासंगिक हो चुकी है, किन्तु यह जनता जनार्दन की नजरों में ही प्रासंगिक है। देश के नेताओं की आंखों का पानी मर चुका है। वे गांधी के नाम पर सत्ता की मलाई तो चखना चाहते हैं पर उनके आदर्शों और सिद्धांतों के बिना।

अगर देश के नेता गांधी टोपी को ही एक वजनयुक्त औपचारिकता समझकर इसे धारण करेंगे तो फिर उनसे गांधी के सिद्धांतें पर चलने की आशा करना बेमानी ही होगा। यही कारण है कि हाल ही के संसद के सत्र में कांग्रेस के शांताराम लक्ष्मण नाइक ने सवाल पूछा था कि क्या महात्मा गांधी को उनके गुणो, ईमानदारी, प्रतिबद्धता, विचारों और सादगी के साथ दोबारा पैदा किया जा सकता है। इस समय उनकी बहुत जरूरत है। हम सब अपने उद्देश्य से भटक गए हैं और हमें महात्मा गांधी के मार्गदर्शन की जरूरत है। भले ही यह महात्मा गांधी के क्लोन से ही मिले।

अण्णा के बहाने राहुल के महिमा मण्डन का प्रयास

अण्णा के बहाने राहुल के महिमा मण्डन का प्रयास

टीम राहुल के प्रबंधकों ने फेंके पांसे

लगातार खामोश राहुल से बातचीत को अण्णा तैयार!

केजरीवाल ने किया खण्डन

मीडिया मैनेजमेंट में जुटी राहुल जुंडाली

मनमोहन की बिदाई चाहते हैं भ्रष्ट कांग्रेसी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। लगता है प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की चला चली की बेला करीब आ ही गई है। टीम राहुल ने अब सधे कदमों से उनके प्रधानमंत्री बनने के मार्ग प्रशस्त कर दिए हैं। राहुल के मीडिया प्रबंधक अब ज्योतिषियांे द्वारा राहुल के बारे में की गई भविष्यवाणियों को मीडिया में उछलवा रहे हैं ताकि युवराज की ताजपोशी की जा सके। मीडिया में सोमवार को यह बात जमकर उछली कि अण्णा या तो पीएमओ या राहुल गांधी से बातचीत को तैयार हैं।

रामलीला मैदान पर जब यह खबर फैली तो अण्णा के एक समर्थक का कहना था -‘‘कौन है राहुल! दो बार का सांसद, बस। क्या वह प्रधानमंत्री या मंत्री है, या कांग्रेस का अध्यक्ष जो अण्णा उससे बातचीत को तैयार हो गए? यह तो राहुल गांधी को स्थापित करना हुआ। 16 अगस्त से लगातार खामोश राहुल गांधी से अण्णा को बात कतई नहीं करना चाहिए? अगर अण्णा एसा करते हैं तो माना जाएगा कि यह सब कुछ राहुल गांधी के महिमा मण्डन के लिए किया गया है।‘‘

उधर राजनैतिक विश्लेषक इस तीर को कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य दिग्विजय सिंह के जहर बुझे तीरों के तौर पर ले रहे हैं। उनका मानना है कि कुछ माह पहले परोक्ष तौर पर मनमोहन सिंह के उपर दिग्गी राजा ने प्रहार किए थे। इतना ही नहीं दिग्विजय ंिसंह ने तो साफ तौर पर कहा था कि अब वक्त आ गया है कि राहुल को शादी कर लेना चाहिए और देश संभालना चाहिए। अर्थात मनमोहन सिंह आप सिंहासन खाली करें युवराज अब राजकाज संभालने योग्य हो चुके हैं।

यूपीए की दूसरी पारी में जिस तरह लाखों करोड़ों रूपयों के घपले और घोटाले सामने आए इसके बाद जिन भ्रष्ट नेताआंे पर गाज गिरी इससे कांग्रेस के भ्रष्टों की फौज मनमोहन सिंह की बिदाई में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है। कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो दिल्ली की निजाम शीला दीक्षित की गरदन पर कामन वेल्थ गेम्स की तलवार लटक रही है, इसलिए उन्होंने भी अण्णा के अनशन को हवा देने का काम किया है, ताकि कुछ समय के लिए ही सही लोगों का ध्यान उनकी ओर से हट जाए।

कांग्रेस के शातिर मीडिया प्रबंधकों ने सोमवार को एक खबर प्लांट की कि अण्णा सिर्फ पीएमओ या राहुल गांधी से बातचीत को ही तैयार हैं। इस खबर ने कांग्रेस विशेषकर मनमोहन सिंह खेमे में खलबली मचा दी। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि यह खबर पीएम को भी नागवार गुजर रही है कि राहुल का इस तरह से महिमा मण्डन किया जा रहा है। पीएमओ के सूत्र हैरान है कि राहुल और आजाद भारत की कुंडली सालों से ज्योतिषियों के पास होने के बाद अचानक अण्णा के अनशन के दौरान राहुल के पीएम बनने की बात उठाना किस रणनीति का हिस्सा है? सूत्रों ने कहा कि रामदेव प्रकरण और इस बार 16 अगस्त से लगातार खामोश राहुल से बातचीत की पेशकश अवश्य की गई होगी किन्तु जनता इसे पचा नहीं पाएगी।

उधर अण्णा के अर्जुन की अघोषित उपाधि पाने वाले अरविंद केजरीवाल ने इस बात का खण्डन किया है कि अण्णा सिर्फ पीएमओ या राहुल से बात करने को राजी है। केजरीवाल ने थोडा डिप्लोमेटिक होते हुए कहा कि जो जिम्मेदार होंगे उनसे ही अण्णा बात करने पर विचार कर सकते हैं।

Aravind Kejrival Vs Rahul Gandhi


Aravind Kejrival Vs Rahul Gandhi


The Government has put condition to get 25 crore people to support JanLokPal. To give your support just give missed call to 02261550789 (as given by Kiran Bedi) from your mobile no. Your Call will disconnect after 1 ring and your no registered automatically. You will get an SMS confirming this. Do it along to all your friends. Forward to as many people as you know .. verbally, by mails, by messages. Support Anti-corruption campaign lead by Anna Hazare ...Jai Hind.

Who is the leader of youth of INDIA .....................

ARVIND KEJRIVAL:-


Mechanical Engineer -IIT Kharagpur


Job :-Tata Steel
Former IRS resigned from the Govt job(posted IT Commisioner's office)

Social Activist:-
Man behind (Right to Information Act).
LokPal bill


Awards Various Ashoka Fellow, Civic Engagement.
2005: 'Satyendra Dubey Memorial Award', IIT Kanpur for his campaign for bringing transparency in Government
2006: Ramon Magsaysay Award for Emergent Leadership.
2006: CNN-IBN, 'Indian of the Year' in Public Service
2009: Distinguished Alumnus Award, IIT Kharagpur for Emergent Leadership.
2010: Policy Change Agent of the Year, Economic Times Corporate Excellence Award along with Aruna Roy.
Fighting against corruption

.............He left his job in IRS to fight against corruption.




RAHUL GANDHI
:-
Education- failed to secure passing grades in National Economic Planning and Policy graduated by any how
job: Got ancestral political power and running through it
Award: he is making awards not getting it
Fight against Indians sentiments

For him Terror attacks are common thing...
we should not be worried of that.....let it happen(since they have z class security)

he will never talk about Govt. policies....and planning....since he
is not intelligent enough to grasp that.(claimed to be most eligible to be PM)

Won't talk about black money and corruption.

will never talk in Parliament.

No political vision and goals for nation .

Trained well to fool poor villagers with safed kurta ..nd khadhi(doing same in UP and other places.)



Achievements:-
Grandson OF Nehru,
Grandson of Indira Gandhi....
Son Of Rajiv gandhi....
FRom Gandhi Family.....
till now zero...



..............Claimed to be nxt PM of INDIA ..Future face of congress.

जिला चिकित्सालय सिवनी के प्रांगण में आवारा मवेशियों का राज




जिला चिकित्सालय सिवनी के प्रांगण में आवारा मवेशियों का राज

सोमवार, 22 अगस्त 2011

युवराज का युवा भारत अण्णा के लिए सड़कों पर!

युवराज का युवा भारत अण्णा के लिए सड़कों पर!

   

युवराज का युवा भारत अण्णा के लिए सड़कों पर!
कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की नजर देश के युवा वोट बैंक पर है। वे चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा तादाद में युवा कांग्रेस से जुड़ें। इसके लिए उन्होंने बाकायदा पहल और प्रयास भी किए हैं। कांग्रेस के सियासी प्रबंधकों ने युवराज की मंशाआंे पर पानी फेर दिया है। युवा सड़कों पर भारी तादाद में आया है पर कांग्रेस या राहुल गांधी अथवा बाबा रामदेव के लिए नहीं वरन् इक्कीसवीं सदी के गांधी की खातिर। जी हां किशन बाबूराव यानी अण्णा हजारे के आव्हान पर सड़कें युवाओं से पट गईं। समूचे देश में अण्णा हजारे के हाथों को मजबूती देने की बयार चल पड़ी है। 74 साल के इस बुजुर्गवार में लोग बापू की छवि देख रहे हैं। इसका कारण है कि अण्णा की कोई राजनैतिक महात्वाकांक्षा नहीं है, साथ ही वे राहुल गांधी या बाबा रामदेव के आडम्बरों और वातानुकूलित जगहों से परहेज करते हैं। अण्णा को मिले समर्थन से सभी राजनैतिक दलों की आंखें फटी की फटी रह गई हैं।

दिग्गी के पर कतरे सोनिया ने
अनाप शनाप बयानबाजी कर सुर्खियों में रहने के आदी कांग्र्रेस के महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के लगता है दुर्दिन आरंभ हो गए हैं। अपना आपरेशन कराने विदेश जाने के पहले कांग्रेस की बागडोर एक शीर्ष समिति के हाथों में सौंप गईं सोनिया। इसमें उन्होंने अपने पुत्र राहुल गांधी को स्थान देकर परिवार वाद का नायाब उदहारण पेश किया है, पर इस समिति में 10 जनपथ और 12 तुलगक लेन के करीबी राजा दिग्विजय सिंह को नहीं रखा गया है। सियासी गलियारों में इसके निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। कहा जा रहा है िकि कांग्रेस की नजरों में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक द्रोणाचार्य राजा दिग्विजय सिंह के धुर विरोधियों अहमद पटेल और जनार्दन द्विवेदी ने चाल चलकर राजा का कद कम कर दिया है। सोनिया की अनुपस्थिति में अब राहुल की मजबूरी होगी कि वे दिग्गी के बाजए पटेल और द्विवेदी के साथ ज्यादा समय बिताएं।

मनमोहन नहीं राहुल के लिए है लोकपाल
इस वक्त देश भर में एक ही चर्चा चल रही है। और वह है सरकारी लोकपाल और जनलोकपाल। टीम अण्णा की मांग है कि इसके दायरे में प्रधानमंत्री को भी लाया जाना चाहिए। उधर सरकार इस मांग से इत्तेफाक रखती नहीं दिख रही है। दरअसल विपक्ष को डर है कि आने वाले समय में अगर राहुल गांधी को देश की बागडोर सौंप दी गई तो युवाओं का खासा वोट बैंक कांग्रेस के पाले में जा सकता है। यही कारण है कि टीम अण्णा के कांधों का उपयोग कर विपक्ष विशेषकर भाजपा द्वारा प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाने का प्रयास कर रही है। सियासी गलियारों में चल रही चर्चा के अनुसार इस तीर से गांधी परिवार को हाशिए मंे ढकेलने का उपक्रम किया जा रहा है। अगर पीएम लोकपाल के दायरे में आ गए और राहुल पीएम बने तब राहुल अपने पिता राजीव की तरह ही अनुभव हीन ही होंगे। जिस तरह बोफोर्स मामले में राजीव गांधी की फजीहत हुई थी उसी तरह राहुल गांधी को आसानी से घेरा जा सकेगा।

मनी लांड्रिग में घिर सकते हैं बाल किसन
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू राम किशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के राईट हेण्ड नेपाली मूल के बाल किसन की परेशानियों में इजाफा होने की उम्मीद है। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा बाल किसन के खिलाफ अवैध धन को वैध बनाने अर्थात मनी लांड्रिंग निषेध कानून के तहत कार्यवाही की तैयारियां की जा रही हैं। एसी स्थिति में बाल किसन के स्वामित्व वाली कंपनियों की संपत्ति जप्त की जा सकती है। योग गुरू बाबा रामदेव के विश्वस्त सहयोगी बाल किसन की आस्था चेनल सहित अनेक कंपनियों में सौ फीसदी की भागीदारी तक हैै। गौरतलब है कि बाबा रामदेव के मन में राजनैतिक महात्वाकांक्षाएं जोर मार रही हैं और वे सीधे सरकार से टकरा रहे हैं। सरकार के वारों ने बाबा के कस बल ढीले कर दिए हैं। इन दिनों बाबा रामदेव और बाल किसन दोनों ही सिर्फ आस्था चेनल के माध्यम से ही अपनी बात कह पा रहे हैं बाकी समाचार चेनल्स और मीडिया से दोनों ही गायब हैं।

थरूर का रोग लगा सुषमा को!
सोशल नेटवर्किंग वेवसाईट ट्वीटर पर ट्वीट करके अपनी लाल बत्ती गवां चुके सांसद शशि थरूर का रोग अब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को भी लग गया है। सुषमा स्वराज के चाहने वालों की तादाद तत्कालीन ‘ट्वीटर मिनिस्टर थरूर‘ की तरह एक लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है। मजे की बात यह है कि अपने समर्थकों प्रशंसकों तक बात पहुंचाने के लिए नेताओं द्वारा अब पार्टी के मुखपत्र या समाचार पत्र चेनल्स, वेब मीडिया का सहारा लेने के बजाए सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स का उपयोग जमकर किया जा रहा है। थरूर के अलावा सुषमा स्वराज, उमर अब्दुल्ला, अजय माकन, सुब्रम्णयम स्वामी, भी इस वेब साईट पर मौजूद हैं। इन सबमें थरूर के बाद एक लाख प्रशंसकों का जादुई आंकड़ा पार करने वाली सुषमा स्वराज दूसरी राजनेता बन गई हैं।

संसद में ‘बेघर‘ हैं सांसद
देश की सबसे बड़ी पंचायत में पंचों के बीच कमरों को लेकर मारामारी मची है। 22 सांसदों वाली त्रणमूल कांग्रेस चाहती है कि संसद में उसे बड़ा कमरा मिले। इसे पहले टीडीपी के कब्जे वाला भूतल का कमरा आवंटित हुआ था, बाद में इसे तीसरे माले पर कमरा मिला। लालू के आरजेडी के पास दो कमरों वाला कार्यालय है, जबकि उसके महज पांच सदस्य होने से आरजेडी कमरे की पात्रता खो चुका है। लोकसभाध्यक्ष ने इस बार यह तय कर दिया था कि कम से कम सात सांसदों वाले दलों को कमरा मिल सकेगा। संसद में राजनैतिक दलों की तादाद तो बढ़ी पर कमरों की संख्या सीमति रहने से काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। लालू यादव से कमरा खाली करवाने का साहस कांग्रेस नहीं जुटा पा रही है। वहीं त्रणमूल और द्रमुक जैसे दल बड़े कमरों की जुगत में दिन रात एक किए हुए हैं।

सांसदों को नहीं परवाह महामहिम की
राष्ट्र के भाल पर सुशोभित होने वाले देश के हृदय प्रदेश के प्रतीक पुरूष डॉ.शंकर दयाल शर्मा की पुण्य तिथि पर ‘कर्मभूमि‘ जाकर श्रृद्धांजली अर्पित करने वालों की फेहरिस्त में महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, वजीरेआजम डॉ.एम.एम.सिंह, मध्य प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के नाम प्रमुख थे। इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के 11 राज्य सभा तो 29 लोकसभा सदस्यों ने जाकर डॉ.शर्मा को श्रृद्धांजली अर्पित करना मुनासिब नहीं समझा। मध्य प्रदेश कोटे से मंत्री बने कमल नाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कर्मभूमि जाकर झांकना उचित नहीं समझा। मध्य प्रदेश सरकार के दिल्ली स्थित जनसंपर्क विभाग द्वारा भी दोपहर तक इस कार्यक्रम की खबर जाने करने की जहमत नहीं उठाई। शाम को निकलने वाले अखबारों को बमुश्किल फोटो नसीब हो सकी।

कर्ज में दबे हैं वायलर रवि!
नागरिक उड्डयन मंत्री वायलर रवि की किस्मत इन दिनों खराब ही चल रही है। पिछले दिनांे वे विदेश प्रवास से वापस आए तो बाथरूम के चिकने फर्श पर फिसल गए और हास्पिटलाईज्ड हो गए। इसके साथ ही साथ एयर इंडिया ने उनकी नाक में दम कर रखा है। वायलर रवि यानी एयर इंडिया पर इतना कर्ज है कि उसका दम फूला जा रहा है। कुछ मदद की गुहार जब उन्होंने वित्त मंत्री से लगाई तो कैबनेट में सवाल उठा कि मदद सिर्फ एयर इंडिया को ही क्यों? और कितनी बार? यह आम जनता की पहुंच से दूर है, इसका मंहगा सफर है और अपने कर्मों से ही यह कर्ज में गया है। रवि भला पीछे कहां रहने वाले थे, उन्होने कहा कि सरकार से आठ अरब रूपए लने हैं वे तो दिलवा ही दिए जाएं। इस पर बात कुछ बनती दिखी और सरकार ने अपने खजाने से साढ़े पांच अरब रूपए ढीले करने का मन बना लिया।

चालान काटा तो दी वर्दी उतरवाने की धमकी!
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अवस्थित गुड़गांव में पिछले दिनों यातायात निरीक्षक रघुवीर सिंह द्वारा आल्टो कार नंबर एचआर 51 - 6501 पर नीली बत्ती देख रोका और पूछताछ करने के बाद उसका चालान काट दिया। फिर क्या था, कार का सारथी अपने आप को जिला अदालत का मजिस्ट्रेट बताते हुए पुलिस कर्मियों की वर्दी उतरवाने की धमकी देने लगा। घबराए वर्दी धारियों ने सकी सूचना यातायात उपायुक्त भारती अरोरा को दी। भारती खुद मौके पर पहुंची और तहकीकात की तो पता चला कि कार चालक मुकेश राव था जो वाकई जिला अदालत का जज था। कहानी में ट्विस्ट महज इतना था कि अपनी परीवीक्षा अवधि के दौरान ही एक मामले में उच्च न्यायालय के एक दल ने उसे दोषी पाकर बर्खास्त कर दिया था। अंत में चालान पर कार्यवाही करनी ही पड़ी पुलिस को और उतर गई बत्ती।

क्या हम गरीब हैं?
भारत देश में क्या कोई गरीब है? क्या कोई गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करता है? अगर है तो जमीनी हकीकत देखने देश को सबसे ज्यादा वजीरे आजम देने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में जरूर जाएं। वह इसलिए क्योंकि यहां की निजाम के घर और सुरक्षा में साल भर में ज्यादा नहीं महज आधा अरब रूपया खर्च होगा। यह सच्चाई है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा ने वर्ष 2011 - 2012 के लिए 10899.93 करोड़ रूपयों की अनुदान मांगे पेश की। इन मांगों मंे 49 करोड़ रूपए की राशि का प्रावधान मुख्यमंत्री सुश्री मायावती की सुरक्षा और आवास पर ही खर्च के लिए किया गया है। इसके मायने हुए लगभग चार करोड़ रूपए प्रतिमाह। इन परिस्थितियों में कौन कह सकता है कि भारत देश में एक भी गरीब निवास करता है। वह भी तब जब विपक्ष इस पर मौन साधे बैठा रहे।

इतना मुस्तैद है हमारा तंत्र
एक तरफ तो स्वाधीनता दिवस पर आतंकी हमलों के मद्देनजर हाई एलर्ट पर रही दिल्ली। वहीं दूसरी ओर इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर लगे साढ़े तीन हजार से अधिक सीसीटीवी कैमरों में से 1400 से ज्यादा महज शोभा की सुपारी ही बने हुए हैं। इस बात की भनक पिछले दिनों आईजीआई पर श्रीलंका के एक नागरिक काथीनुकुम के गायब होने पर लगी। इसे न्यूयार्क जाने के लिए उड़ान पकड़ना था, किन्तु वह इस पर सवार न होकर 17 घंटे तक एयरपोर्ट के अंदर छिपा बैठा रहा। बाद में जब उसने हैदराबाद के लिए उड़ान पकड़ी तब वह पकड़ में आया। इस श्रीलंकाई नागरिक को खोजने के लिए जब सीसीटीवी कैमरों को खंगाला गया तो पता चला कि आधे से ज्यादा कैमरे तो बेकार ही थे। यह है हाई एलर्ट में हमारे तंत्र की मुस्तैदी! वह भी अंतर्राष्ट्रीय विमानतल पर, धन्य है कांग्रेस धन्य है सरकार।

आटोमैटिक नहीं मैन्यूअली आपरेटेड है मेट्रो
दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) का दावा है कि राजधानी में सभी लाईनों में मेट्रो रेल गाड़ी आटोमेटिक चलती है। पिछले दिनों विधानसभा मेट्रो स्टेशन पर हुए हादसे ने इन दावों की पोल खोलकर रख दी है। जैसे ही रेल वहां से चलने लगी दरवाजे बंद होते वक्त एक युवक का हाथ और पैर दरवाजे में फस गया। उसने जैसे तैसे पैर तो निकाल लिया किन्तु उसका हाथ अगले स्टेशन तक फसा ही रहा। देखा जाए तो अगर यह रेल आटोमेटिक मोड पर होती तो इसका गेट बंद ही नहीं होता, साथ ही साथ रेल भी नहीं खसकती। गौरतलब है कि वर्ष 2009 में भी एक मर्तबा अदालत में पेशी पर जाते एक आरोपी का पैर दरवाजे में फंस गया था, जिससे वह जख्मी हो गया था। डीएमआरसी को मिली सफलता ने उसके अफसरान का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है, यही कारण है कि अब मेट्रो की सांसे भी फूलती दिख रही हैं।

चौथाई लक्ष्य भी नहीं पाया टिकिट बिक्री में
कामन वेल्थ गेम्स में एक के बाद एक करके सामने आने वाले घोटालों से अनेक परतें उठती जा रही हैं। उस वक्त आपाधापी में जिसके मन में जो आया उसने वही किया किन्तु देर सबेर अब वास्तविकता सामने आती ही जा रही है। गौरतलब है कि कामन वेल्थ गेम्स में टिकिट बिक्री से 100 करोड़ रूपयों की आय का लक्ष्य रखा गया था। इस दौरान कुल 39.17 करोड़ रूपयों की टिकिट बिकीं। इसके लिए प्रबंधन और बिकावली लागत 23.37 करोड़ रूपए आई। इस तरह टिकिटों से शुद्ध राजस्व जो प्राप्त हुआ वह था महज 15 करोड़ अस्सी लाख रूपए। मजे की बात तो यह है कि सितम्बर 2010 तक टिकिट बेचना आरंभ नहीं किया गया था। वेब साईट पर उपलब्ध ही नहीं थी टिकिट। जब टिकिट बेचना बंद कर दिया गया तब इसके विज्ञापन प्रसारित किए गए।

पुच्छल तारा
मैं अण्णा, तुम अण्णा, हम सब अण्णा। इस समय इस तरह के नारों की धूम मची हुई है। हर कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ किशन बाबूराव उर्फ अण्णा हजारे के साथ खड़ा दिख रहा है। जाहिर है एसे मंे इस पर लतीफों का सिलसिला भी आरंभ हो गया होगा। चेन्नई से समीर मिड्ढा ने एक ईमेल भेजा है। समीर लिखते हैं कि एक मर्तबा कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह और पलनिअप्पम चिदम्बरम एक साथ हेलीकाप्टर से जा रहे थे।
सिब्बल ने एक सौ रूपए का नोट नीचे फंेका और बोले -‘‘मैने एक गरीब हिन्दुस्तानी को खुश कर दिया।‘‘
दिग्विजय सिंह ने पचास के दो नोट नीचे फेंके और बोले -‘‘मैने दो गरीब भारतवासियों को खुश कर दिया।‘‘
चिदम्बरम ने एक के सौ सिक्के नीचे फेंके और चहके -‘‘मैने सौ गरीब भारतियों को खुश कर दिया।‘‘
यह सब सुनकर हेलीकाप्टर का पायलट हंसा और बोला -‘‘मैं तुम तीनों को नीचे फेंक देता हूं और 121 करोड़ हिन्दुस्तानियों को हमेशा के लिए खुश कर देता हूं।‘‘
वो पायलट और कोई नहीं अण्णा हजारे ही था।

. . . मन में एक बात उठ रही है: नरेंद्र ठाकुर

. . . मन में एक बात उठ रही है: नरेंद्र ठाकुर

सिवनी। ‘‘भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे ने जो अलख जगाई है वह तारीफे काबिल है। इस मामले में सिवनी के निवासियों का बढ़ा हुआ मनोबल साफ दर्शाता है कि वे किसी से कम नहीं हे। सिवनीवासियों के जज्बे को निश्चित तोर पर सलाम किया जाना चाहिए। यह सब देखकर मन में एक बात उठ रही है, जिसे जनता जनार्दन से बांटने की तमन्ना है।‘‘ उक्ताशय की बात भाजपा युवा नेता नरेंद्र ठाकुर ‘‘गुड्डू‘‘ ने यहां जारी विज्ञप्ति में कही है।

श्री ठाकुर ने कहा है कि 16 अगस्त से ही अण्णा हजारे के समथ्रन में सिवनी के निवासी चाहे वे रिक्शे वाले हों, मोटर सायकल वाले, कार वाले, विद्यार्थी, राजनेता, धार्मिक ओर सामाजिक संगठन या कारोबारी। सभी ने कंधे से कंधा मिलाकर अण्णा का समर्थन किया है। सिवनी वासियों का अपने अपने तरीके से विरोध का तरीका बहुत ही प्रशंसनीय कहा जा सकता है। उन्होंने सिवनी वासियों को इसके लिए साध्ुावाद दिया है।

उन्होंने आगे कहा कि यह राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा है और युवाओं के भविष्य से जुड़ा अहम मुद्दा है अतः भ्रष्टाचार का प्रतिकार अत्यावश्यक है, किन्तु जब परिसीमन में सिवनी लोकसभा और घंसौर विधानसभा के विलोपन, ब्राडगेज, फोरलेन आदि की बात आती है तब सिवनी वासियों का यह जज्बा कहां चला जाता है? उन्होंने कहा कि सिवनी वासियों ने सिवनी लोकसभा के विलोपन के वक्त ‘जनता कफर््यू‘‘ लगाकर और फिर फोरलेन के मामले में 21 अगस्त को एकजुटता दिखाकर साबित कर दिया था कि वे सिवनी के विकास में बराबरी के भागीदार हैं।

सिवनी वासियों के सिवनी के विकास के लिए संजीदा होने को उन्होंने सलाम किया है, किन्तु य़़क्ष प्रश्न फिर भी वही खड़ा हुआ है कि आखिर इस तरह के आंदोलन टॉय टॉय फिस्स क्यों हो जाते हैं? इसका सीधा सा जवाब इन आदोलन के नेतत्व कर्ताओं की कार्यप्रणाली पर जाकर टिक जाता है। लोकसभा के विलोपन के दरम्यान भी सिवनी जिले के माहरथी राजनेताओं की अति सक्रियता के उपरांत बली चढ़ गया। इसके बाद परिसीमन में तीस साल पुरानी लोकसभा नक्शे से ही गायब हो गई। इतना ही नहीं जब जब ब्राडगेज की बात आई तब तब एक नई रेल लाईन को बीच में डालकर इन्हीं राजनेता द्वारा छिंदवाड़ा नैनपुर ब्राडगेज को भी लंबित करनवाने में महती भूमिका निभाई है।

यह सब सहने के बाद जब सिवनी के निवासियों के मुंह से फोरलेन का निवाला छीनने का प्रयास किया गया, तब एक बार फिर सिवनी की जनता सड़कों पर आ गई, और गजब के जोश और जुनून के साथ इसका प्रतिकार किया। यह मामला भी वक्त के राजनेताओं ने इसे भी साथ ठण्डे बस्ते में डालने का प्रयास किया। अब आधी अधूरी सड़क पर टोल टेक्स वसूलने का काम आरंभ किया जा रहा है। फिर बारी आई संभाग मुख्यालय की, इसमें भी लोग आंदोलित हुए पर नतीजा सिफर ही रहा।

भाजपा के युवा नेता ने कहा कि आत्मावलोकन पर उन्होंने यह पाया कि कहीं न कहीं इन आंदोलनों में राजनैतिक तौर पर सक्रिय रहने वालों ने सुनियोजित तरीके से इन सारे आंदोलनों का गला घोंटा है। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि सिवनी के हित को सर्वोपरि मानने वालों को ही नेतृत्व थमाया जाए। राजनेतिक रोटियां सेकने वालों का बहिष्कार यदि नहीं किया गया तो आने वाले समय में हमारी अगली पीढ़ी शायद ही हमें माफ कर पाए।

गुड्डू ठाकुर ने कहा कि उनके मन में यह बात रह रहकर उभर रही है कि जब अण्णा के समर्थन में सिवनी के हजारों हाथ एक साथ खड़े हो सकते हैं तो फिर हम सब मिलकर नैनपुर छिंदवाड़ा ब्राडगेज ओर फोरलने के लिए इस तरह का आंदोलन क्यों नहीं कर सकते? इसका जवाब शायद यही है कि जब भी आंदोलन में भीड़ दिखाई पड़ती है, तब तब अपना लाभ देखकर राजनेता इसका सूत्र अपने हाथों में लेने का प्रयास करते हैं, और आंदोलन अपने आप ही दम तोड़ देता है।