गुरुवार, 13 अगस्त 2009
हर वर्ग में लोकप्रिय हो चुका है ब्लाग
(लिमटी खरे)
भारत में अस्सी के दशक में इंटरनेट की कल्पना करना बेमानी ही समझा जाता था। आज इंटरनेट का जादू लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है। इंटरनेट पर सूचनाओं का आदान प्रदान जिस दु्रत गति से हो रहा है, उसे देखकर लगने लगा है कि बमुश्किल पांच सालों में देश का हर गांव इंटरनेट की पहुंच में होगा।इंटरनेट पर वेब साईट्स का निर्माण काफी कठिन समझा जाता था, इसके लिए वेब स्पेस किराए पर लेना होता है। वर्तमान में वेब साईट का निर्माण या संचालन बहुत बड़ी बात नहीं रह गई है। जो लोग वेब स्पेस किराए पर नहीं ले सकते हैं, उनकी सुविधा के लिए है ``ब्लाग``।ब्लाग में आप अपने विचारों को रखकर दुनिया भर के लोगों के सामने परोस सकते हैं। सेलीब्रिटीज के ब्लाग जब तब चर्चा का केंद्र बने रहते हैं। इन सेलीब्रिटीज की देखादेखी आम भारतीय ने भी अपने अपने ब्लाग आरंभ कर दिए हैं। ब्लाग को अस्तित्व में आए दस साल पूरे हो गए हैं।इतिहास खंगालने पर ज्ञात होता है कि 1999 में पहली मर्तबा पीटर मरहोल्ज की निजी वेब साईट पर ब्लाग शब्द का प्रयोग पहली बार हुआ था। सेन फ्रांसिस्को पायरा लैब्स ने ब्लागिंग का सार्वजनिक मंच ब्लागर की शुरूआत की। अमेरिका के एक इंटरनेट प्रोग्रामर जोसफ िफ्रट्जपैट्रिक ने अपनी मित्रमण्डली को ताजा गतिविधियों से एक दूसरे को रूबरू रखने के लिए लाईवजर्नल नामक ब्लाग होस्टिंग सेवा की शुरूआत की।साल दर साल प्रगति के सौपान गठने वाले ब्लाग ने कई सफर तय किए हैं। 2002 में दुनिया के चौधरी कहे जाने वाले अमेरिका के राजनयिकों ने अपने संस्मरणों को सार्वजनिक करना आरंभ किया वह भी ब्लाग के माध्यम से। यहां इंस्टापंडित और द डेली डिश के नाम से दो ब्लाग आरंभ हुए जिनमें अमेरिका के लोकप्रिय राजनेताओं ने अपने संस्मरण दर्ज करवाए।इसके उपरांत 2003 में इंटरनेट का किंग बन चुका सर्च इंजन गूगल ने ब्लॉगर का अधिगृहण कर लिया। रेडिफ ने भी ब्लागिंग सेवा आरंभ कर दी। इराक पर अमेरिका के हमले की खबरें जब ब्लाग के माध्यम से सार्वजनिक हुईं तो यह लोगों के बीच चर्चा और कोतुहल का विषय बन गइंZ।इसके बाद 2004 के अंत में आए सुनामी तूफान के दौरान ब्लाग खबरों के स्त्रोत का प्रमुख जरिया बन गया था। ``सी - ईट`` जैसे ब्लाग ने संचार व्यवस्था भंग हो जाने पर प्रभावित इलाकों से आए संदेशों को प्रकाशित करने का नेक काम किया, और इसी के साथ ये राहत बचाव दल तथा मीडिया के लिए ताजा जानकारियों के महत्वपूर्ण स्त्रोत बनकर उभरे। इसी साल ब्लाग शब्द मरियम वेबस्टर डिक्शनरी में स्थान पा चुका था।इंटरनेट का अखबार माना जाने वाला न्यूज ब्लॉग ``द हफिंग्टन पोस्ट`` 2005 में अस्तित्व में आया। भारतीय ब्लागरों ने कश्मीर में आए 2005 के भूकंप के बाद बचाव और राहत सामग्री उपलब्ध कराने की गरज से 26 अक्टूबर 2005 को `ब्लाग क्वेक डे` की शुरूआत की।11 जुलाई 2006 को मुंबई ट्रेेन बम धमाकों के बाद भारत सरकार ने कुछ ब्लागों पर रोक लगा दी थी। सरकार का मानना था कि उन ब्लागोेें के माध्यम से जनता के बीच नफरत और उन्माद फैलाने वाली भावनाओं को उकेरा जा रहा था। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को ब्लागस्पाट डॉट काम और टाईपपैड डॉट काम के पूरे डोमेन को ही ब्लाक करने का फरमान जारी कर दिया गया था, कालांतर में यह प्रतिबंध हटा दिया गया था।वैसे ब्लॉग की शुरूआत इंटरनेट की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है, क्योंकि इसके माध्यम से सूचनाओ का आदान प्रदान जिस उन्मुक्त तरीके से सीधे सीधे आसानी से हो पाता है, वह किसी और तरीके से संभव प्रतीत नहीं होता है। इससे आप अपने बचपन की सहेजी यादें, जवानी की कारगुजारियां, प्रोढ़ावस्था के अनुभव और बुढ़ापे की खट्टी मीठी यादों को सबके बीच सहजता से परोस सकते हैं।संचार क्रांति के इस युग में जिस तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं, उसे देखकर भविष्य में क्या रोमांच हो जाए कहा नहीं जा सकता है। ब्लॉग ने अपने दस सालों के इस सफर में जिस तेजी से लोकप्रियता की पायदानें चढ़ीं हैं, उसे देखकर यह कहना गलत नही होगा कि आने वाले समय में ब्लाग का जादू हर हिन्दुस्तानी के सर चढ़कर बोलेगा।
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युवाओं पर खासा जोर लगा रहे हैं युवराज
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी का ध्यान युवाओं की तरफ ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। कांग्रेस को मजबूत करने की गरज से अब कांग्रेस के युवराज छात्र राजनीत में भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। राजधानी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों पर राहुल बारीक नजर रखे हुए हैं।उमर दराज कांग्रेसियों की बेसाखी के बजाए राहुल की पसंद युवा शक्ति दिख रही है। यही कारण है कि मंत्रीमण्डल में भी उन्होंने युवाओं की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की थी। राहुल गांधी चाहते हैं कि 21वीं सदी का भारत युवाओं का भारत हो।राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का दावा है कि उमर दराज नेताओं की ``पावर टेक्टिस`` राजनीति से वे आजिज आ चुके हैं। यही कारण है कि राहुल गांधी युवाओं को आगे लाकर भारत को युवा बनाने की तैयारियों में पूरी तरह जुट गए हैं। देश भर में टेलेंट सर्च इसकी की एक कड़ी माना जा रहा है।सूत्रों ने यह भी बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) की जीत सुनिश्चित करने की जवाबदेही राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस महासचिव मुकुल वासनिक के कांधों पर डाल दी है। गौरतलब होगा कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी भी इन चुनावों में खासी दिलचस्पी लेतीं हैं। यही कारण है कि जीत के तुरंत बाद एनएसयूआई के पदाधिकारी सीधे सोनिया गांधी के दरबार में जाते हैं।राहुल के करीब सूत्र यह भी बताते हैं कि पिछली मर्तबा इसके अध्यक्ष का पद कांग्रेस के हाथ से निकल जाने को लेकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी खासे खफा हैं, एवं इस बार वे कोेई चांस लेने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। वैसे भी युवाओं को लुभाने के लिए युवक कांग्रेस द्वारा इसी माह से ``यूथ मार्च`` के नाम से एक मुखपत्र का आरंभ किया जा रहा है।वैसे चौक चौराहों पर राहुल गांधी के विजन को लेकर चर्चाएं आम हो चुकी हैं। पढे लिखे युवा चिकित्सक, इंजीनिर, प्रबंधक, पत्रकार आदि हर वर्ग के लोग राहुल गांधी के जज्बे पर सहमत होते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस में युवाओं की सदस्य संख्या का आंकड़ा दो करोड़ को छूने वाला है।
बुधवार, 12 अगस्त 2009
आलेख 12 अगस्त 2009
किस बात का चिंतन करने जा रही है भाजपा!
(लिमटी खरे)
लगभग तीस साल पुरानी भारतीय जनता पार्टी के सामने वर्तमान में चुनौतियों के अंबार लगे हुए हैं। कभी काडर बेस्ड सबसे अनुशासित पार्टी समझी जाने वाली भाजपा में इन दिनों अनुशासन तार तार हो चुका है। पार्टी के अंदर ओर बाहर नेतृत्व सहित अनेक मुद्दों पर अनेक धड़ों में बंटी पार्टी में घमासन मचा हुआ है।यह सच है कि जिस तरीके से सुनोजित षणयंत्र के तहत उज्जवल छवि के धनी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को दरकिनार कर चतुर सुजान लाल कृष्ण आड़वाणी द्वारा अपने आप को भाजपा और राजग का सर्वमान्य ``पीएम इन वेटिंग`` घोषित करवा लिया था, उसे देखकर लगने लगा था कि आड़वाणी के भरोसे राजग की वेतरणी शायद ही पार हो सके।लोकसभा चुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा अभी भी हताशा से अब तक उबर नहीं सकी है। मुश्किल तमाम भाजपा की चिंतन बैठक का स्थान तय किया जा सका। शिमला में अगले सप्ताह होने वाली चिंतन बैठक में वैसे तो हार के कारणों पर प्रकाश डालते हुए भविष्य की रणनीति ही बनाई जाएगी।वैसे 30 वषीZय भाजपा के इतिहास में पहला एसा मौका होगा जबकि पार्टी की अिग्रम पंक्ति के नेता इस कदर लाचार और निरीह नजर आ रहे हैं। पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भी भाजपा को उसके हाल पर ही छोड़ने का उपक्रम आरंभ कर दिया है। 1984 में लोकसभा में महज दो सीटें जीतने के बाद भी भाजपा इतनी निस्तेज नजर नहीं आई जितनी कि वर्तमान में दिख रही है।राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के सामने चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। भाजपा के भविष्य के मार्ग शूल से अटे पड़े हैं। गुटबाजी, अनुशासनहीनता, कहल के साथ ही धड़ों में बंटा नेतृत्व भाजपा की प्रमुख चुनौतियों में शामिल है। कुल मिलाकर भाजपा लोकसभा चुनाव में पराजय के कारणों पर विस्तार से चर्चा करने से कतरा ही रही है।एक समय में अनुशासन के लिए विरोधी दलों से स्तुतिगान गववाने वाली भाजपा अब अन्य दलोें की ही तरह अनुशासनहीनता के उस मुकाम तक पहुंच चुकी है, जहां अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अपनी ही पार्टी के अन्य नेताओं की गिरेबां पकड़ने, उन पर कीचड़ उछालने, उन की छीछालेदर करने से परहेज नहीं किया जाता है।अभी लोगों की स्मृति से वह दृश्य विस्मृत नहीं हुआ होगा, जबकि पार्टी की ही बैठक में तत्कालीन भाजपा नेत्री उमाश्री भारती ने इसी सब के लिए पार्टी के नेताओं को जिम्मेदार बताया था। इतना ही नहीं खुद पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी नेताओं के बड़ाबेलेपन से आजिज आ चुके हैं।पार्टी के इस चिंतन शिविर के एजेंडे में निश्चित तौर पर भविष्य की रणनीति तो होगी ही। भाजपा का मजबूत होना सिर्फ भाजपा ही नहीं देश के लिए भी आवश्यक है। पिछले दो दशकों में देश के राजनैतिक परिदृश्य से साफ हो गया है कि देश में सिर्फ कांग्रेस और भाजपा ही एसे राजनैतिक दल हैं, जिन्हें राष्ट्रीय दल के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है। शेष राजनैतिक दल भी इन्हीं की गणेश परिक्रमा में जुटे रहते हैं।वैसे भी लोकतंत्र में दमदार विपक्ष होना अत्यावश्यक है। जय प्रकाश नारायण रहे हों या राम मनोहर लोहिया, इनके सामने विपक्षी दलों द्वारा कमजोर प्रत्याशी को ही मैदान में उतारा जाता रहा है, इसका कारण यह था कि जवाहर लाल नेहरू या इंदिरा गांधी सरीखे कद्दावर नेता भी यह नहीं चाहते थे कि वे सत्ता के मद में चूर होकर बेलगाम हो जाएं। वर्तमान समय में राजनेताओं ने सारी वर्जनाएं तोड़ कर रख दी हैं।सची ही है अगर विपक्ष मजबूत होगा तो सरकार पर अंकुुश अपने आप ही लग जाता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि परस्पर विरोधी राजनैतिक दलों के सदस्य होने के बाद भी राजनेताओं द्वारा अंडर टेबिल हाथ मिलाकर देश को पतन के मार्ग पर ढकेला जा रहा है, जो चिंता का विषय है।भाजपा के अपने लिए ही नहीं वरन देश के लिए एक बार फिर अपने पैरों के नीचे जमीन लाना जरूरी है। भाजपा को आज आवश्यक्ता आत्मावलोकन की है। जिन सिद्धांतों और उद्देश्यों को लेकर भाजपा की स्थापना की गई थी, वे आज की कार्यप्रणाली में कहीं परिलक्षित होते नहीं दिख रहे हैं।जिन मुद्दों को लेकर पार्टी ने जनता जनार्दश का विश्वास हासिल कर उनके बीच पैठ बनाई थी, आज जब भाजपा ने ही उन मुद्दों को भुला दिया तो जनता ने भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। पार्टी ने लोकसभा चुनावों के पूर्व जिस तरह से अटल बिहारी बाजपेयी को पाश्र्व में ढकेला था वह बेहद आश्चर्यजनक ही माना जा सकता है। इसके बाद 7 रेसकोर्स रोड़ (प्रधानमंत्री के सरकारी आवास) पर कब्जा बनाने की चाह में आड़वाणी ने सभी को बाहुपाश में ले लिया था।आज आवश्यक्ता इस बात की है कि पार्टी के नेता सेवा भाव को अपनाएं न कि स्वयंसिद्धि के मार्ग को। पार्टी के शीर्ष नेताओं को चाहिए कि रेवड़ी बांटने की परंपरा बंद कर अपने पराए का भेद मिटाए, और इस चिंतन बैठक के बहाने ही हार के कारणों पर चर्चा कर एक सकारात्मक एजेंडा तैयार करे, ताकि भाजपा को संजीवनी मिल सके।
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संघ ने तैयार किया भविष्य की भाजपा का खांका
0 संघ फिर कसने लगा है भाजपा की मुश्कें
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। पिछले कुछ सालों से अपने मूल मार्ग से भटक चुकी भारतीय जनता पार्टी को पटरी पर लाने के लिए अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भाजपा पर अपना नियंत्रण बढ़ा दिया है। आलम यह है कि दिल्ली आने वाले भाजपा नेता भाजपा मुख्यालय के बजाए संघ के मुख्यालय ``केशव कुंज`` की देहरी अधिक चूमते नजर आते हैं।आम चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन से बुरी तरह खफा संघ नेतृत्व, चुनावों की पराजय में आरोप प्रत्यारोपों से खासा आहत नजर आ रहा है। मुख्य धारा से लगभग भटक चुकी भाजपा को राह पर लाने के लिए अब संघ ने भाजपा में अपनी दखल तेजी से बढ़ा दी है।गौरतलब होगा कि हाल ही में संपन्न हुए राज्य सभा के चुनावों में प्रत्याशी तय करने में संघ की भूमिका काफी हद तक महात्वपूर्ण रही है। भले ही संघ का कोई प्रतिनिधि भाजपा की चिंतन बैठक में शिरकत न कर रहा हो किन्तु इस बैठक पर संघ की पूरी नजर है। सूत्र बताते हैं कि ``भविष्य की भाजपा`` रणनीति तैयार कर ली है।सूत्रों की मानें तो चिंतन बैठक में आमंत्रितों की सूची संघ पृष्ठभूमि वाले भाजपा के संगठन मंत्री रामलाल द्वारा तैयार की जा रही है। अंतिम रूप देने के पहले यह संघ की नजरों से अवश्य गुजारी जाएगी ताकि आमंत्रितों में कोई गलत नेता शामिल न हो सके और कोई विश्वस्त छूट न सके।ज्ञातव्य है कि पिछले लगभग डेढ़ दशक में संघ ने अपना नियंत्रण भाजपा से लगभग हटा ही लिया था। इसी बीच संयोग से भाजपा शीर्ष पर पहुंच गई थी। इस दौर में भाजपा के फैसले संघ के बजाए अटल आड़वाणी की जुगल जोड़ी लिया करती थी। इस समय संघ की ओर से परोक्ष रूप से इस जोड़ी को फैसले लेने फ्री हेण्ड दिया गया था।इसके उपरांत संघ में भी शीर्ष स्तर पर बदलाव हुए। नई सोच के अगुआ के आने से भाजपा पर अंकुश लगाना आरंभ किया गया है। इसके साथ ही साथ भाजपा की स्वतंत्रता के दिन भी समाप्त होते नजर आ रहे हैं। जिन्ना प्रकरण से कमजोर हुए आड़वाणी की पकड़ भाजपा में बुरी तरह कमजोर हो गई, भाजपा आम चुनावों में धड़ाम से गिर गई, भाजपा के निजाम राजनाथ भी एक कदम बिना संध की सलाह के आगे नहीं बढ़ाते हैं।संघ के कदमतालों से भाजपा के राज्यों के क्षत्रप भी भविष्य की रणनीति तैयार करने माहौल को भांपने लगे हैं। राज्यों से दिल्ली आने वाले भाजपा नेता अब भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय 11 अशोक रोड़ के साथ ही साथ संघ के दिल्ली के झंडेवालान स्थित मुख्यालय ``केशव कुंज`` में अपनी आमद देने लगे हैं।
सोमवार, 10 अगस्त 2009
11 AUGEST 2009
कितनी दूर जाएगी लेडील स्पेशल
(लिमटी खरे)
केंद्रीय रेल मंंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने महिला होने के नाते अपनी बिरादरी के लिए ``लेड़ीज स्पेशल`` का तोहफा दिया है, जिसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम होगी। यह सुविधा महानगरों के इर्द गिर्द रहने वाली महिलाओं को अपने कार्यस्थल आने जाने के सुरक्षित मार्ग प्रशस्त करेगी, मगर ममता बनर्जी शायद यह भूल गईं कि सूचे देश में महिलाएं हैं, जो रोजाना अपने घरों से दूर अपने कार्यस्थल पर आती जाती हैं, उन्हें भी सुरक्षा की दरकार है।
रक्षा बन्धन के पावन पर्व पर दिल्ली से चलाई गई महिला स्पेशल ट्रेन निश्चित तौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की महिलाओं के लिए किसी अनमोल तोहफे से कम नहीं कही जा सकती है। कामकाजी महिलाओं के लिए सुरक्षित परिवहन के साधन मुहैया करवाकर ममता बनर्जी ने अपने नाम के अनुसार महिलाओं के प्रति अपनी ममता को जाहिर कर दिया है।
वैसे महिलाओं के लिए रेल का सफर आज भी किसी चुनौति से कम नहीं माना जा सकता है। महिलाओं की सुरक्षा और सुविधा को दृष्टिगत रखकर किए गए इस फैसले से महिला जगत में खुशी की लहर दौड़ जाना स्वाभाविक ही है। देर आयद दुरूस्त आयद की तर्ज पर ही सही इस कदम का सभी को खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए। यद्यपि यह सुविधा अभी चंद मार्गों पर ही लागू की गई है, उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार जल्द ही कोई ठोस कार्ययोजना बनाकर इसे समूचे देश में लागू करेगी।
वैसे अभी ज्यादा समय नहीं बीता है, और प्रोढ़ हो चुकी पीढ़ी के मन मस्तिष्क से यह बात विस्मृत नहीं हुई होगी कि हमारे देश में संस्कृति के हिसाब से अस्सी के दशक के आरंभ से पहले बालक और बालिकाओं के लिए पृथक स्कूल ही श्रेष्ठ माने जाते रहे हैं। कोएड शिक्षा पाश्चात संस्कृति की विष्टा कही जा सकती है, क्योंकि इसके फायदे कम नुकसान ज्यादा ही सामने आए हैं।
युवा होते बालक बालिकाओं में शारीरिक परिवर्तन प्राकृतिक ही है। इसमें नया कुछ नहीं है। किन्तु विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण ने शालाओं को गंदगी से सराबोर कर दिया है। संचार क्रांति के युग में अश्लील एसएमएस और एमएमएस आज मोबाईल की शोभा बने हुए हैं। यह देश में सांस्कृतिक हास माना जा सकता है।
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के पुराने शहर में दिल्ली गेट के पास एक अनूठा बाजार बनाया जा रहा है, जो सिर्फ महिलाओें के लिए ही होगा। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी एक पार्क की अवधारणा स्थानीय शासन मंत्री बाबू लाल गौर के दिमाग में आई है, जहां सिर्फ महिलाएं ही प्रवेश पा सकेंगी।
पुरूष प्रधान भारतीय संस्कृति में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के सरकारी दावे कितने सच्चे हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। देश में आजादी से अब तक स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी ही अकेली महिला प्रधानमंत्री रही हैं। इतना ही नहीं वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्राध्यक्ष और मीरा कुमार देश की पहली महिला लोकसभाध्यक्ष हैं।
महानगरों के अलावा छोटे शहरों में कामकाजी महिलाएं विशेषकर शिक्षिका या नर्स जब लदी फदी जीप, बस, या अन्य साधनों से अपने कार्यस्थल पर जाती हैं, तो वे किस कदर की परेशानी और जिल्लत का सामना करती हैं, यह बात वे ही बता सकतीं हैं। परिवहन के साधनों में महिलाओं को उनके पुरूष सहयात्री खा जाने वाली निगाहों से ही देखा करते हैं।
यहां हम भाजपा नेता अरूण शोरी के लेख की उस लाईन का जिकर जरूर करना चाहेंगे जिसे उन्होंने विशुद्ध पत्रकार रहते हुए लिखी थी, कि हम दूसरे की मां बहनों को देखते समय यह भूल जाते हैं, कि जब हमारी मां बहने सड़कों पर निकलती होंगी तो वे भी किसी के लिए ``माल`` ही बन जाती होंगी।
जहां तक परिवहन साधनों का सवाल है, तो साफ है कि महिलाओं के लिए सुरक्षित परिवहन साधनों का जबर्दस्त अभाव है। थ्री व्हीलर पर सफर करना महिलाओं को बहुत असुरक्षित लगता है। बस, रेल, टेक्सी आदि में भी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और अभद्रता करना हमारे भद्र समाज के पुरूषों का पुराना शगल रहा है।
ममता बनर्जी की महिला स्पेशल वाली इस सोच के लिए वे नि:संदेह बधाई की पात्र हैं। वैसे भारतीय रेल को चाहिए कि अपने नेटवर्क के अंतर्गत आने वाले शहरों मेें कामकाजी महिलाओं के लिए अलग रेल चलाना अगर वर्तमान में संभव नहीं हो तो कम से कम कुछ कूपे तो महिलाओं के लिए आरक्षित किए ही जा सकते हैं।
इसके साथ ही साथ राज्य सरकारों का भी यह दायित्व बनता है कि उनके सूबों में चल रहे सरकारी और निजी परिवहन साधनों में महिलाओं के लिए प्रथमिकता और सुरक्षा मुहैया कराने अपनी प्रतिबद्धता का पालन कड़ाई से सुरक्षित करें। सूबे के निजाम यह न भूलें कि उनको जन्म देने वाली भी एक महिला ही थी, और उसकी कलाई पर राखी बांधने वाली एक महिला ही है, साथ ही उनके बच्चों की मां भी एक महिला ही है।
यह अलहदा बात है कि जब केंद्र या राज्य में पद पा जाने के बाद उनकी माता बहन और अर्धांग्नी अब आम जनता की सवारी का उपयोग नहीं ही करती होंगी किन्तु आम जनता में महिलाओं की तादाद बहुत ज्यादा है, जो अपने देश और राज्य के शासक से अपनी सुरक्षा की गुहार जरूर लगा रही है।
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अनेक मंत्रियों को साईज में लाने की तैयारी
0 मंत्रीमण्डल विस्तार जल्द
0 ममता की बरगेनिंग के सामने झुक सकती हैं सोनिया
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। संसद के मौजूदा सत्र के अवसान के बाद अब देश की राजनैतिक राजधानी की फिजां में इस बात को लेकर गहमागहमी मची हुई है कि जल्द ही होने वाले केबनेट विसतार में किस किस मंत्री का कद कम किया जा सकता है। वैसे एक से अधिक मंत्रालय संभालने वाले मंत्रियों से उनके अतिरिक्त विभाग छीने जा सकते हैं।
अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों के मद्देनजर त्रणमूल कांग्रेस चीफ ममता बनर्जी सरकार पर मंत्रियों की संख्या बढ़ाने का दवाब बनाए हुए है। प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों का दावा है कि ममता इस विस्तार में अपने विश्वस्त सुदीप बंदोपाध्याय को मंत्री बनवाने में सफल हो सकतीं हैं। प्रधानमंत्री और कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी ने इस बारे में सैद्धांतिक सहमति दे दी है।
सूत्रों ने यह भी बताया कि ममता बनर्जी चाह रहीं हैं कि सुदीप को न केवल स्वतंत्र प्रभार वाला राज्यमंत्री बनाया जाए, वरन त्रणमूल के खाते में इस्पात या उद्योग मंत्रालय और आ जाए। वर्तमान में उद्योग मंत्रालय आनंद शर्मा के पास तो इस्पात हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पास है।
कहा जा रहा है कि आनंद शर्मा के अलावा सी.पी.जोशी, कुमारी सैलजा, प्रथ्वीराज चौव्हाण, सलमान खुशीZद श्रीप्रकाश जैसवाल, के.वी.थामस जैसे मंत्री जिनके पास एक से अधिक विभाग हैं, के पास से एक एक मंत्रालय छीना जा सकता है। अल्पसंख्यक मंत्रालय के लिए बिहार के इकलौते संसद सदस्य मौलाना इसराउल हक का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है।
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सुषमा बन सकती हैं सोनिया की काट
0 भाजपा प्रमुख के पद पर सुषमा स्वराज की दावेदारी प्रबल
0 संघ नेतृत्व के पास है भविष्य की चाबी
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पदचिन्हों को देख भारतीय जनता पार्टी अपने भविष्य के रोड़मेप बनाने की जुगत में जुट गई है। दस साल से कांग्रेस सुप्रीमों बनी ताकतवर महिला सोनिया गांधी की काट के रूप में अब सुषमा स्वराज को भाजपा में अध्यक्ष बनाने की मुहिम छेड़ी गई है।
गौरतलब होगा कि इस साल के अंत में भाजपा में संगठनात्मक चुनाव होना है, जिसमें भाजपा के नए मुखिया का चयन किया जाएगा। कदमताल देखकर साफ होने लगा है कि राजनाथ सिंह को अब सेवावृद्धि मिलने की संभावनाएं बहुत ही कम हैं। वैसे भी राजनाथ के कार्यकाल से न तो भाजपा खुश है और न ही संघ।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि संघ परिवार में अगले भाजपा अध्यक्ष को लेकर रस्साकशी और लामबंदी चरम पर आ गई है। भाजपाध्यक्ष के लिए जो नाम अभी वजनदारी के साथ सामने आए हैं, उनमें सुषमा स्वराज के अलावा पूर्व अध्यक्ष डॉ.मुरली मनोहर जोशी, अरूण जेतली और वरिष्ठ उपाध्यक्ष बाला साहेब आप्टे के नाम प्रमुख हैं।
संघ के सूत्रों के अनुसार संघ प्रमुख मोहन भागवत की नजरों में अध्यक्ष के लिए पहली पसंद मुरली मनोहर जोशी ही हैं, उनके विकल्प के तौर पर सुषमा स्वराज के नाम पर वे तैयार हो सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक आम चुनावों में मुंह की खा चुके ``पी एम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी`` को संघ इस मामले में फ्री हेण्ड देने के मूड में दिखाई नहीं दे रहा है।
संघ परिवार में चल रही चर्चाओं के अनुसार भाजपा के एक धड़े द्वारा संघ के आला नेताओं को यह समझाने का प्रयास भी किया जा रहा है कि सुषमा स्वराज पूर्व में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को दक्षिण भारत की वेल्लारी सीट पर चुनौती दे चुकी हैं। इसके अलावा महिला को अध्यक्ष बनाने से देश भर में महिलाओं में एक अच्छा संदेश जाएगा।
वैसे भी सोनिया गांधी के मुकाबले सुषमा स्वराज की छवि आम घरेलू भारतीय नारी की है। सुषमा स्वराज को निर्विवाद नेता के साथ ही साथ कुशल वक्ता भी माना जाता है। भाजपा में भी सुषमा स्वराज के नाम पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। वर्तमान समीकरणें को देखकर भाजपा के वषाZंत में भावी अध्यक्ष के रिक्त होने वाले फ्रेम मेें सुषमा स्वराज की तस्वीर ही सबसे फिट बैठती दिख रही है।
रविवार, 9 अगस्त 2009
10 AUGEST 2009
आखिर क्यों करें हम सच का सामना
(लिमटी खरे)
मीडिया के एक स्वरूप निजी समाचार चेनल्स द्वारा अपनी टेलीवीजन रेटिंग प्वाईंट (टीआरपी) बढ़ाने के चक्कर में न जाने क्या क्या गुल खिलाए जाते हैं। दिन में एक वक्त सभी समाचार चेनल्स अपराध आधारित खबरें दिखातें हैं, तो कभी राशिफल से दर्शकों को लुभाने का प्रयास करते नजर आते हैं। कुछ समाचार चेनल्स तो घंटों तक फूहड़ हंसी मजाक की महफिल को दिखाते रहते हैं। सवाल यह उठता है कि ये समाचार चेनल्स खबरों को दिखाने का काम कर रहे हैं, या फिर टीआरपी बढ़ाने और ज्यादा विज्ञापन बटोरने के चक्कर में समाज के सामने कुछ और परोस रहे हैं।
पहले कहा जाता था कि अखबार समाज का दर्पण होता है। दरअसल उस समय मीडिया का मतलब अखबार ही होता था। उस जमाने में समाचार पत्र से इतर और अन्य साधन नहीं हुआ करते थे। आज समाज में प्रिंट के अलावा इलेक्ट्रानिक मीडिया और अब तो वेब मीडिया की खासी दखल हो चुकी है।
``सच का सामना`` सीरियल का विषय ही कुछ इस तरह का है कि लोगों की दिलचस्पी इसकी ओर बढ़ना स्वाभाविक ही है। सेक्स एक एसा विषय है, जिसके बारे में समाज का हर तबका जानने हेतु जिज्ञासू रहता है। आदि अनादि काल से यह कौतुहल का विषय रहा है। पुरातन काल में सेक्स को शास्त्र का दर्जा दिया गया था, कामदेव इस विधा के देवता माने गए थे।
महषिZ वात्सायन ने कामशास्त्र की रचना कर डाली। चंदेलों के राज में मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो के मंदिर में उन्मुक्त काम क्रीड़ा मेें रत प्रतिमाएं आज देश और विदेशी सैलानियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में रजनीश नामक चिंतक ने इसका बखूबी इस्तेमाल किया था।
हमारा उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पहुंचाना कतई नहीं है, किन्तु आचार्य रजनीश ने भारत में सेक्स तो पश्चिम में शांति को उकेरा और पूरब और पश्चिम दोनो ही जगहों पर रजनीश को हाथों हाथ लिया गया। कम समय में ही आचार्य रजनीश ने समूचे विश्व में अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया था।
देखा जाए तो सच का सामना सीरियल मूलत: लोगों की निजी जिंदगी में तांकझांक ज्यादा करता है। आज भारत में अधकचरी पश्चिमी सभ्यता ने अपने लिए उपजाउ माहौल अवश्य तैयार कर लिया है, जो बहुत घातक है। भारत में टेलीवीजन पर दिखाए जाने वाले सीरियल ने समाज को गंदे बदबूदार सड़ांध मारते नाले में उतरने को मजबूर कर दिया है, जिसकी केवल निंदा करने से काम नहीं चलने वाला। इसके लिए देश के नीति निर्धारकों को ठोस और सार्थक कदम उठाने की आवश्यक्ता है।
आज आवश्यक्ता इस बात की है कि इन सीरियल के माध्यम से इसके निर्माता निर्देशक समाज को क्या संदेश देना चाहते हैंर्षोर्षो इस पर बहस होनी चाहिए। प्रेरणास्पद सीरियल के बजाए चिटलरी से भरपूर समाज और परिवार को तोड़ने, परस्त्री या पुरूष गमन, या बच्चों के लिए मनोरंजन के बजाए उनके मन मस्तिष्क में जहर घोलने वाले सीरियल पर तत्काल लगाम लगनी चाहिए।
हमें यह कहने में कोेई संकोच नहीं कि सच का सामना सीरियल व्यक्ति की नकारात्मक प्रवृत्तियों को रेखांकित करने वाला है। यह सीरियल स्वस्थ्य मनोरंजन के बजाए आदमी के अंदर की छिपी हुई कमीनगी को ग्लेमरस बनाकर परोसने का साधन मात्र है।
हमारे मतानुसार अगर आपको सच ही स्वीकारना है तो आप किसी पुजारी अथवा पादरी अथवा अपने परिजनों से बात कीजिए। अगर आपमें इतना साहस नहीं है तो डायरी लिखिए, क्योंकि आप समाज में हर व्यक्ति से झूठ बोल सकते हैं, किन्तु अपने आप से नहीं। अपने जिन्दगी के काले सफों को चंद सिक्कों की खनक के लिए जनता के सामने घटिया तरीके से परोसने का ओचित्य समझ से परे ही है।
आने वाले दिनों में इस सच का सामना सीरियल के कारण देश में परिवारोेंं का विघटन आरंभ हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। विडम्बना ही कही जाएगी कि राजीव खण्डेलवाल के इस सीरियल में उनके सामने हाट सीट पर बैठने उनकी मां विजयलक्ष्मी ही तैयार नहीं है। राजीव को सोचना चाहिए कि इस तरह के घिनौने सीरियल के लिए जब उनकी मां ही तैयार नहीं हैं तो वे और देशवासियों की मां बहनों के सामने आखिर क्या परोस रहे हैंर्षोर्षो
हमारी निजी राय में तो इस तरह के घटिया और समाज को दिशाहीन बनाने वाले सीरियल तत्काल बंद कर देना चाहिए साथ ही सरकार को चाहिए कि सामज को दिग्भ्रमित करने वाले सीरियल पर भी रोक लगाए एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय को एक समिति बनाकर सीरियल दिखाने के पहले उसका उद्देश्य और समाज को मिलने वाली दिशा के बारे में तसल्ली होने के बाद ही इन्हें दिखाए जाने की अनुमति प्रदान करे, अन्यथा आने वाले समय में समाज का भयावह स्वस्प होगा और चेनल्स के साथ ही साथ सरकार भी इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार होगी।
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क्या सोनिया कांग्रेस में करेंगी महिला आरक्षण लागू!
0 महिलाओं की भागीदारी 33 फीसदी हो सकेगी कांग्रेस मेंर्षोर्षो
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। सवा सौ साल पुराने कांग्रेस संगठन में बदलाव की अटकलों के बीच अब यह चर्चा भी सियासी गलियारों में तेजी से घुमड़ने लगी है कि भले ही महिला आरक्षण बिल संसद में परवान न चढ़ सका हो पर क्या कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा कांग्रेस संगठन में इसे लागू करने की हिम्मत जुटा सकेंगीर्षोर्षो
कांग्रेस में सत्ता और शक्ति के केंद्र 10 जनपथ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि महिला होने के नाते श्रीमति सोनिया गांधी की इच्छा है कि पार्टी स्तर पर महिला आरक्षण को सबसे पहले लागू करवाया जाए। इसके लिए वे अनेक स्तरों पर पार्टी फोरम में चर्चा कर नेताओं के मानस को टटोल रहीं हैं।
सूत्रों ने आगे बताया कि उच्च स्तरीय कोर कमेटी ने इस मुद्दे पर रायशुमारी कर ली है। पार्टी में विर्कंग कमेटी में भी इस बात को लेकर चर्चा हो चुकी है कि भले ही संसद की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते महिला आरक्षण बिल की सांसे फूल गईं हों पर पार्टी स्तर पर इसे लागू करवाने से कोई रोक नहीं सकता है।
उधर कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड़ में चल रही चर्चाओं के अनुसार अगर पार्टी में 33 फीसदी स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए जाते हैं तो अनेक स्वयंभू महाबलियों का कद कम हो जाएगा, जिसके लिए वे इस फिराक में जोड़ तोड़ कर रहे हैं कि इसे लागू न किया जाए और अगर लागू होता भी है, तो किस स्वरूप में लागू किया जाए।
सूत्रों ने आगे बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष को यह मशविरा भी दिया गया है कि पार्टी में संविधान संशोधन कर लाटरी सिस्टम के जरिए महिलाओं को पद दिए जाएं इससे अंगद की तरह पैर जमाए नेताओं को एक तरफ आईना दिखाया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर इस लागू करने के साथ ही पार्टी नेतृत्व विवादों से भी परे रह सकेगा।
बताया जाता है कि कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को मशविरा दिया है कि कांग्रेस अपने संविधान में आवश्यक संशोधन कर पार्टी में 33 फीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित कर दे। कांग्रेस द्वारा अगर संविधान संशोधन कर लिया जाता है तो फिर अन्य सियासी दलों को भी मजबूरी में अपने अपने संविधान में संशोधन कर महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण करना होगा।
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भाजपा को उसके हाल पर छोड़ा संघ ने
0 चिंतन बैठक से किनारा करने की तैयारी में है संघ
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। भविष्य की रणनीति और लोकसभा में हुई शर्मनाक पराजय के मामले में होने वाली चिंतन बैइक से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने आप को दूर ही रखने का फैसला लिया है। संघ के कोई भी प्रतिनिधि के शिमला में 19 से 21 अगस्त तक आहूत बैठक में शामिल होने की संभावनाएं नहीं हैं।
संघ के विश्वस्त सूत्रो का कहना है कि संघ का शीर्ष नेतृत्व भाजपा को फिलहाल इस बैठक के मामले में उसके हाल पर ही छोड़ने का मानस बना रहा है। संघ अपने किसी भी प्रतिनिधि को इस बैठक में भेजने को राजी नहीं दिख रहा है। स्पून फीडिंग से उलट संघ अब इस मामले में इस रणनीति को अपना रहा है कि भारतीय जनता पार्टी अपनी चुनौतियों से खुद ही जूझे।
उधर भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने कहा कि पार्टी ने संघ से इस बैठक में शिरकत करने का आग्रह किया है। पहले संघ की ओर से सुरेश सोनी के नाम की चर्चा हो रही थी, कि वे इस बैठक में संघ का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं, किन्तु बाद में उनका नाम भी वापस ले लिया गया है। भाजपा की ओर से इस बैठक के लिए तय की गई सूची में संघ के किसी सदस्य का नाम न होना भी आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है।
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सोमवार 10 अगस्त को प्रकाशनार्थ
ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
हुई गति सांप छछूंदर केरी! उगलत निगलत पीर घनेरी!!
राजधानी दिल्ली में इन दिनों मध्य प्रदेश के एक जिले में भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता को पार्टी की जिला इकाई द्वारा दिए गए कारण बताओ नोटिस के जवाब के मायने तलाशे जा रहे हैं। दरअसल सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान को प्रेषित एक शिकायत मीडिया की सुिर्खयां बन गई थी। इसके बाद पार्टी की जिला इकाई ने आनन फानन उक्त कार्यकर्ता को नोटिस जारी कर दिया। बताते हैं कि उक्त कार्यकर्ता ने जबाब भी दे दिया है, जिसमें पार्टी की जिला इकाई के अध्यक्ष द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पुतले जलाने, स्थानीय एक विधायक के नामांकन के दौरान चुनौति देने, भाजपा के झंडे बेनर आदि जलाने जैसे संगीन आरोपों से युक्त अपना जवाब दे दिया है। यह जवाब भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में चर्चाओं का केंद्र बन गया है। सच ही है बिना समझे बूझे अगर किसी के कहने पर कोई कदम उठाया जाए तो पुरानी कहावत चरितार्थ हो ही जाती है, ``हुई गति सांप छंछूदर केरी! उगलत निगलत पीर घनेरी!!``
अहमदाबाद विस्फोट के तार छिंदवाड़ा से जुड़े!
गुजरात में अहमदाबाद में हुए विस्फोटों के तार केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की कर्मभूमि छिंदवाड़ा से जुड़ गए हैं। सुनने में अजूबा जरूर लगता है, किन्तु यह सच है। दरअसल अहमदाबाद बम विस्फोट का एक आरोपी छिंदवाड़ा की जिला जेल में बंद था। पूछताछ के सिलसिले में गुजरात पुलिस उक्त आरोपी को अपने साथ गुजरात ले गई है। बताते है कि अहमदाबाद बम विस्फोट के आरोपी हफीज शेख ताजीउद्दीन पिछले दो माहों से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा की जिला जेल में बंद था। कर्नाटक का रहने वाला हाफिज शेख ताजीउद्दीन अहमदाबाद के बम विस्फोट के मामले में आरोपी है। वह छिंदवाड़ा किस जुर्म के तहत बंद था, इसकी विस्त्रत जानकारी नहीं मिल सकी है।
सुरक्षित नहीं एसी कूपे में यात्रा!
भारतीय रेल में वातानुकूलित कूपे में यात्रा करना अब सुरक्षित नहीं रह गया है। बीते दिनों निजामुद्दीन से हबीबगंज जाने वाली शाने भोपाल एक्सप्रेस में एसी सेकंड क्लास में हुए हादसे ने यात्रियों की सांसे थाम दी थीं। बीते मंगलवार को रात जब यह रेल पलवल से मथुरा सेक्शन से गुजर रही थी, तभी इसके सेकन्ड एसी कूपे में शार्ट सिर्कट के चलते गहरा धुंआ भर गया। नींद में सोए यात्री इससे बेखबर थे, जब उनका दम घुटा तब उन्होंने दरवाजे खोले पर काई लाभ नहीं हुआ। बाद में शीशे तोड़कर ताजी हवा को कूपे में प्रवेश कराया गया तब जाकर यात्रियों की जान में जान आई। आगरा में कूपा बदलने के बाद यह रेल भोपाल के लिए रवाना की गई।
सुषमा का नया अंदाज
भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और विदिशा से सांसद सुषमा स्वराज के अंदाज हर पल अलग अलग ही होते हैं। उनके बात करने की अदा से लेकर काम करने की ललक तक सब कुछ कायल कर देने वाला होता है। इस राखी पर भला वे कैसे चूक जातीं। राजधानी दिल्ली में अपने पुराने जानकारों के माध्यम से सुषमा ने कुछ नया करने की ठानी। फिर क्या था, भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल से युक्त राखियों को लेकर वे पहुंच गईं भोपाल। राखी के पावन पर्व पर दिन भर सुषमा स्वराज के भोपाल स्थित आवास पर उनके संसदीय क्षेत्र विदिशा के साथ ही साथ भोपाल के लोगों का तांता लगा रहा। सुषमा बड़ी ही आत्मीयता के साथ एक एक से मिलीं और ``कमल`` वाली रखाी उन्हें बांधी। गद गद भाजपाई सुषमा के इस नए तरीके से अविभूत ही नजर आए।
पंडित बिसेन विवाद की दिल्ली में गूंज
मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री गोरी शंकर बिसेन और सतना के सहकारी बैंक के अध्यक्ष कमलाकर पंडित के बीच हुआ विवाद शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। अब इसकी गूंज राजधानी दिल्ली में भी सुनाई पड़ने लगी है। मंत्री जी ने सतना में भाजपा कार्यकर्ताओं को साफ तौर पर कह दिया कि वे प्रदेश सरकार के मंत्री हैं, और पंडित महज अध्यक्ष हैं। मंत्री महोदय के सुरक्षा कर्मी के बयान ने भी इस विवाद में आग में घी का ही काम किया। क्षत्री वंश के सुरक्षा कर्मी रजोल सिंह ने कह दिया कि ब्राम्हणों को जूते की माला पहनानी चाहिए। इससे सतना में ग्रामीण बुरी तरह भड़क गए। बाद में पुलिस ने मंत्री को किसी तरह वहां से निकाला। अब यह मामला दिल्ली दरबार में भी गूंजता दिख रहा है।
राजा ने पढाई पठ्ठे को पट्टी!
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह वाकई में शोध का विषय हैं। सूबे के पूर्व निजाम सुंदर लाल पटवा की यह टिप्पणी गलत नहीं थी। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को उनके उस्ताद दिग्विजय सिंह ने अब सरकारी कामकाज सीखने समझने की पट्टी पढ़ाई है, और उनका पट्ठा राहुल गांधी भी गुरू की बात का अनुसरण करने तुल गया हैै। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी इन दिनों केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में दिलचस्पी ले रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी द्वारा विभिन्न विभागों के मंत्रियों और उसके आला अधिकारियों से अपने निवास पर गुप्त मंत्रणाएं भी कर रहे हैं। इस मंत्रणा के दौर में राहुल गांधी द्वारा जमीनी हकीकत से आला अधिकारियों और मंत्रियों को रूबरू करवाया जाता है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी सधे कदमों से 7 रेसकोर्स रोड़ (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) की ओर बढ़ रहे हैं, वह भी दिग्गी राजा की उंगली पकड़कर।
सुषमा और अहलूवालिया में समानता!
कभी राज्यसभा में एक साथ रहने वाले एस.एस.अहलूवालिया और सुषमा स्वराज आज अलग अलग सदनों में भाजपा के उपनेता हैं। एक राज्य सभा में है, तो दूसरा लोकसभा में। सदन अवश्य ही बदल गए हों किन्तु दोनों के बीच समानताएं आज भी जस की तस ही बनी हुई हैं। सुषमा स्वराज की लोकसभा में पहन कर आने वाली साड़ी का रंग राज्यसभा में मौजूद एस.एस.अहलूवालिया की पगड़ी से काफी मेल खाता है। एक ओर सुषमा स्वराज इसे टेलीपेथी का नाम देती हैं तो अहलूवालिया इसे दिन के हिसाब से रंगोे के चयन का मामला बताते हैं। इसके पीछे कारण चाहे जो भी हो पर यह मामला सांसदों के लिए चर्चा का विषय तो बन ही गया है।
प्रधानमंत्री बने थुरूर!
राजनयिक से विदेश राज्यमंत्री बने शशि थुरूर क्या भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री बन गए हैं। यह चर्चा राज्यसभा में एकाएक गुरूवार को होने लगी। दरअसल विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर उस दिन उस सीट पर जाकर बैठ गए जो पहले से ही प्रधानमंत्री डॉ. मन मोहन सिंह के लिए निर्धारित की गई है। प्रधानमंत्री की सीट के पीछे बैठने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौव्हाण इस दृश्य को देखकर शशि थुरूर की ओर आश्चर्य के साथ देखते रह गए। बाद में कांग्रेस के सदस्य राजीव शुक्ला ने थुरूर का ध्यान इस ओर दिलाया कि वे पीएम की सीट पर बैठ गए हैं। अपनी गल्ती भांपते ही थुरूर वहां से उठे और पीछे अपने लिए निर्धारित आसन पर जाकर बैठ गए।
बापू के कलोन की मांग
कांग्रेस के सदस्य चाहते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का क्लोन तैयार किया जाए। यह कोई हवा हवाई बात नहीं, वरन राज्यसभा में हुआ सच्चा वाक्या है। राज्यसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने यह बात कही है। चर्चा के दौरान कांग्रेस के शांताराम लक्ष्मण नाईक ने सवाल पूछा कि क्या महात्मा गांधी को उनके गुणों, ईमानदारी, विचारों, सादगी, प्रतिबद्धता के साथ दोबारा पैदा नहीं किया जा सकतार्षोर्षो सच ही कहा नाईक ने कि आज हम सब रास्ते से भटक गए हैं, हमें बापू के मार्गदर्शन की जरूरत है।
शिव के राज में बेहाल विधायक
मध्य प्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के राज में विधायकों की फजीहत हो रही हैर्षोर्षो क्या यह सच है, जी हां भाजपा के विधायक ही इस तरह का आरोप लगाएंगे तो फिर बाकी का क्या होगार्षोर्षो भोपाल के भाजपा विधायक उमाशंकर गुप्ता ने मध्य प्रदेश विधानसभा में अपने दर्द को बयां करते हुए कहा कि पिछले दो सालों में उन्होंने भोपाल के पुलिस अधीक्षक, जिला कलेक्टर और संभागायुक्त को सौ से भी ज्यादा पत्र लिखे हैं, पर एक का भी जवाब नहीं आया। दिल्ली स्थित भाजपा के मुख्यालय में लोग उमाशंकर गुप्त के इस कथन पर चटखारे ले रहे हैं कि जब घर के (भाजपाई विधायक) ही ये हाल हैं तो बाकी की कौन कहे!
पुच्छल तारा
उत्तर दक्षिण गलियारा सिवनी जिले से होकर जाएगा या नहीं! अब इस प्रश्न को लोग उतनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, क्योकि लोगों को लगने लगा है कि बिना राजनैतिक सहयोग और समर्थन के न तो मुख्यमंत्री ही इसमें पहल करेंगे और न ही केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ। लखनादौन, केवलारी, बरघाट और सिवनी विधानसभा से होकर गुजरने वाले इस मार्ग के एक विधायक ठाकुर हरवंश सिंह ने उपर पत्र लिखकर अपनी दिलचस्पी जाहिर कर दी है। सिवनी और बरघाट का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्य के.डी.देशमुख ने राखी के बाद मुख्यमंत्री से मिलने की बात कही थी, यह समयसीमा कब समाप्त होगी पता नहींर्षोर्षो रही बात परिसीमन में समापत हुई सिवनी लोकसभा सीट की अंतिम सांसद एवं सिवनी विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया की तो वे सोमवार 10 अगस्त को मुख्यमंत्री से मिलने वालीं हैं। इससे पहले भी वे सीएम से मिल चुकीं हैं। चर्चा है कि शायद पिछली बार सीएम ने जो उनसे कहा था वह बात वे सुन नहीं पाईं थीं, सो दुबारा मिलकर सुनने का जतन करने वाली हैं। लखनादौन विधायिका श्रीमति शशि ठाकुर, बरघाट विधायक कमल मस्कोले और मण्डला के संसद सदस्य की तंद्रा लगता है, अभी टूटी नहीं है।
सोमवार 10 अगस्त को प्रकाशनार्थ
ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
हुई गति सांप छछूंदर केरी! उगलत निगलत पीर घनेरी!!
राजधानी दिल्ली में इन दिनों मध्य प्रदेश के एक जिले में भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता को पार्टी की जिला इकाई द्वारा दिए गए कारण बताओ नोटिस के जवाब के मायने तलाशे जा रहे हैं। दरअसल सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान को प्रेषित एक शिकायत मीडिया की सुिर्खयां बन गई थी। इसके बाद पार्टी की जिला इकाई ने आनन फानन उक्त कार्यकर्ता को नोटिस जारी कर दिया। बताते हैं कि उक्त कार्यकर्ता ने जबाब भी दे दिया है, जिसमें पार्टी की जिला इकाई के अध्यक्ष द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पुतले जलाने, स्थानीय एक विधायक के नामांकन के दौरान चुनौति देने, भाजपा के झंडे बेनर आदि जलाने जैसे संगीन आरोपों से युक्त अपना जवाब दे दिया है। यह जवाब भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में चर्चाओं का केंद्र बन गया है। सच ही है बिना समझे बूझे अगर किसी के कहने पर कोई कदम उठाया जाए तो पुरानी कहावत चरितार्थ हो ही जाती है, ``हुई गति सांप छंछूदर केरी! उगलत निगलत पीर घनेरी!!``
अहमदाबाद विस्फोट के तार छिंदवाड़ा से जुड़े!
गुजरात में अहमदाबाद में हुए विस्फोटों के तार केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की कर्मभूमि छिंदवाड़ा से जुड़ गए हैं। सुनने में अजूबा जरूर लगता है, किन्तु यह सच है। दरअसल अहमदाबाद बम विस्फोट का एक आरोपी छिंदवाड़ा की जिला जेल में बंद था। पूछताछ के सिलसिले में गुजरात पुलिस उक्त आरोपी को अपने साथ गुजरात ले गई है। बताते है कि अहमदाबाद बम विस्फोट के आरोपी हफीज शेख ताजीउद्दीन पिछले दो माहों से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा की जिला जेल में बंद था। कर्नाटक का रहने वाला हाफिज शेख ताजीउद्दीन अहमदाबाद के बम विस्फोट के मामले में आरोपी है। वह छिंदवाड़ा किस जुर्म के तहत बंद था, इसकी विस्त्रत जानकारी नहीं मिल सकी है।
सुरक्षित नहीं एसी कूपे में यात्रा!
भारतीय रेल में वातानुकूलित कूपे में यात्रा करना अब सुरक्षित नहीं रह गया है। बीते दिनों निजामुद्दीन से हबीबगंज जाने वाली शाने भोपाल एक्सप्रेस में एसी सेकंड क्लास में हुए हादसे ने यात्रियों की सांसे थाम दी थीं। बीते मंगलवार को रात जब यह रेल पलवल से मथुरा सेक्शन से गुजर रही थी, तभी इसके सेकन्ड एसी कूपे में शार्ट सिर्कट के चलते गहरा धुंआ भर गया। नींद में सोए यात्री इससे बेखबर थे, जब उनका दम घुटा तब उन्होंने दरवाजे खोले पर काई लाभ नहीं हुआ। बाद में शीशे तोड़कर ताजी हवा को कूपे में प्रवेश कराया गया तब जाकर यात्रियों की जान में जान आई। आगरा में कूपा बदलने के बाद यह रेल भोपाल के लिए रवाना की गई।
सुषमा का नया अंदाज
भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता और विदिशा से सांसद सुषमा स्वराज के अंदाज हर पल अलग अलग ही होते हैं। उनके बात करने की अदा से लेकर काम करने की ललक तक सब कुछ कायल कर देने वाला होता है। इस राखी पर भला वे कैसे चूक जातीं। राजधानी दिल्ली में अपने पुराने जानकारों के माध्यम से सुषमा ने कुछ नया करने की ठानी। फिर क्या था, भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल से युक्त राखियों को लेकर वे पहुंच गईं भोपाल। राखी के पावन पर्व पर दिन भर सुषमा स्वराज के भोपाल स्थित आवास पर उनके संसदीय क्षेत्र विदिशा के साथ ही साथ भोपाल के लोगों का तांता लगा रहा। सुषमा बड़ी ही आत्मीयता के साथ एक एक से मिलीं और ``कमल`` वाली रखाी उन्हें बांधी। गद गद भाजपाई सुषमा के इस नए तरीके से अविभूत ही नजर आए।
पंडित बिसेन विवाद की दिल्ली में गूंज
मध्य प्रदेश के सहकारिता मंत्री गोरी शंकर बिसेन और सतना के सहकारी बैंक के अध्यक्ष कमलाकर पंडित के बीच हुआ विवाद शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। अब इसकी गूंज राजधानी दिल्ली में भी सुनाई पड़ने लगी है। मंत्री जी ने सतना में भाजपा कार्यकर्ताओं को साफ तौर पर कह दिया कि वे प्रदेश सरकार के मंत्री हैं, और पंडित महज अध्यक्ष हैं। मंत्री महोदय के सुरक्षा कर्मी के बयान ने भी इस विवाद में आग में घी का ही काम किया। क्षत्री वंश के सुरक्षा कर्मी रजोल सिंह ने कह दिया कि ब्राम्हणों को जूते की माला पहनानी चाहिए। इससे सतना में ग्रामीण बुरी तरह भड़क गए। बाद में पुलिस ने मंत्री को किसी तरह वहां से निकाला। अब यह मामला दिल्ली दरबार में भी गूंजता दिख रहा है।
राजा ने पढाई पठ्ठे को पट्टी!
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह वाकई में शोध का विषय हैं। सूबे के पूर्व निजाम सुंदर लाल पटवा की यह टिप्पणी गलत नहीं थी। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को उनके उस्ताद दिग्विजय सिंह ने अब सरकारी कामकाज सीखने समझने की पट्टी पढ़ाई है, और उनका पट्ठा राहुल गांधी भी गुरू की बात का अनुसरण करने तुल गया हैै। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी इन दिनों केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में दिलचस्पी ले रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी द्वारा विभिन्न विभागों के मंत्रियों और उसके आला अधिकारियों से अपने निवास पर गुप्त मंत्रणाएं भी कर रहे हैं। इस मंत्रणा के दौर में राहुल गांधी द्वारा जमीनी हकीकत से आला अधिकारियों और मंत्रियों को रूबरू करवाया जाता है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी सधे कदमों से 7 रेसकोर्स रोड़ (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) की ओर बढ़ रहे हैं, वह भी दिग्गी राजा की उंगली पकड़कर।
सुषमा और अहलूवालिया में समानता!
कभी राज्यसभा में एक साथ रहने वाले एस.एस.अहलूवालिया और सुषमा स्वराज आज अलग अलग सदनों में भाजपा के उपनेता हैं। एक राज्य सभा में है, तो दूसरा लोकसभा में। सदन अवश्य ही बदल गए हों किन्तु दोनों के बीच समानताएं आज भी जस की तस ही बनी हुई हैं। सुषमा स्वराज की लोकसभा में पहन कर आने वाली साड़ी का रंग राज्यसभा में मौजूद एस.एस.अहलूवालिया की पगड़ी से काफी मेल खाता है। एक ओर सुषमा स्वराज इसे टेलीपेथी का नाम देती हैं तो अहलूवालिया इसे दिन के हिसाब से रंगोे के चयन का मामला बताते हैं। इसके पीछे कारण चाहे जो भी हो पर यह मामला सांसदों के लिए चर्चा का विषय तो बन ही गया है।
प्रधानमंत्री बने थुरूर!
राजनयिक से विदेश राज्यमंत्री बने शशि थुरूर क्या भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री बन गए हैं। यह चर्चा राज्यसभा में एकाएक गुरूवार को होने लगी। दरअसल विदेश राज्यमंत्री शशि थुरूर उस दिन उस सीट पर जाकर बैठ गए जो पहले से ही प्रधानमंत्री डॉ. मन मोहन सिंह के लिए निर्धारित की गई है। प्रधानमंत्री की सीट के पीछे बैठने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौव्हाण इस दृश्य को देखकर शशि थुरूर की ओर आश्चर्य के साथ देखते रह गए। बाद में कांग्रेस के सदस्य राजीव शुक्ला ने थुरूर का ध्यान इस ओर दिलाया कि वे पीएम की सीट पर बैठ गए हैं। अपनी गल्ती भांपते ही थुरूर वहां से उठे और पीछे अपने लिए निर्धारित आसन पर जाकर बैठ गए।
बापू के कलोन की मांग
कांग्रेस के सदस्य चाहते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का क्लोन तैयार किया जाए। यह कोई हवा हवाई बात नहीं, वरन राज्यसभा में हुआ सच्चा वाक्या है। राज्यसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने यह बात कही है। चर्चा के दौरान कांग्रेस के शांताराम लक्ष्मण नाईक ने सवाल पूछा कि क्या महात्मा गांधी को उनके गुणों, ईमानदारी, विचारों, सादगी, प्रतिबद्धता के साथ दोबारा पैदा नहीं किया जा सकतार्षोर्षो सच ही कहा नाईक ने कि आज हम सब रास्ते से भटक गए हैं, हमें बापू के मार्गदर्शन की जरूरत है।
शिव के राज में बेहाल विधायक
मध्य प्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के राज में विधायकों की फजीहत हो रही हैर्षोर्षो क्या यह सच है, जी हां भाजपा के विधायक ही इस तरह का आरोप लगाएंगे तो फिर बाकी का क्या होगार्षोर्षो भोपाल के भाजपा विधायक उमाशंकर गुप्ता ने मध्य प्रदेश विधानसभा में अपने दर्द को बयां करते हुए कहा कि पिछले दो सालों में उन्होंने भोपाल के पुलिस अधीक्षक, जिला कलेक्टर और संभागायुक्त को सौ से भी ज्यादा पत्र लिखे हैं, पर एक का भी जवाब नहीं आया। दिल्ली स्थित भाजपा के मुख्यालय में लोग उमाशंकर गुप्त के इस कथन पर चटखारे ले रहे हैं कि जब घर के (भाजपाई विधायक) ही ये हाल हैं तो बाकी की कौन कहे!
पुच्छल तारा
उत्तर दक्षिण गलियारा सिवनी जिले से होकर जाएगा या नहीं! अब इस प्रश्न को लोग उतनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, क्योकि लोगों को लगने लगा है कि बिना राजनैतिक सहयोग और समर्थन के न तो मुख्यमंत्री ही इसमें पहल करेंगे और न ही केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ। लखनादौन, केवलारी, बरघाट और सिवनी विधानसभा से होकर गुजरने वाले इस मार्ग के एक विधायक ठाकुर हरवंश सिंह ने उपर पत्र लिखकर अपनी दिलचस्पी जाहिर कर दी है। सिवनी और बरघाट का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्य के.डी.देशमुख ने राखी के बाद मुख्यमंत्री से मिलने की बात कही थी, यह समयसीमा कब समाप्त होगी पता नहींर्षोर्षो रही बात परिसीमन में समापत हुई सिवनी लोकसभा सीट की अंतिम सांसद एवं सिवनी विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया की तो वे सोमवार 10 अगस्त को मुख्यमंत्री से मिलने वालीं हैं। इससे पहले भी वे सीएम से मिल चुकीं हैं। चर्चा है कि शायद पिछली बार सीएम ने जो उनसे कहा था वह बात वे सुन नहीं पाईं थीं, सो दुबारा मिलकर सुनने का जतन करने वाली हैं। लखनादौन विधायिका श्रीमति शशि ठाकुर, बरघाट विधायक कमल मस्कोले और मण्डला के संसद सदस्य की तंद्रा लगता है, अभी टूटी नहीं है।
शनिवार, 8 अगस्त 2009
(लिमटी खरे)
स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका निभाने वाले और देश को अब के सबसे अधिक वजीरे आजल देने वाले उत्तर प्रदेश की राशि में राहु केतु और शनि जैसे भयानक और क्रूर ग्रह पिछले कुछ समय से कुंडली मारकर बैठ गए हैं, यही कारण है कि पिछले एक अरसे से यूपी कभी अकाल तो कभी अतिवषाZ, अतिवृष्टि की चपेट में आ रहा है। इस सूबे को लेकर सियासत सदा ही गरम रही है, किन्तु गरीब गुरबों की ओर किसी भी सियासी पार्टी द्वारा ध्यान नहीं दिया गया है।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखण्ड क्षेत्र में रियाया त्राहीमाम त्राहीमाम कर रही है, पर सियासी पार्टियां यहां इस मुद्दे पर जमकर राजनीति करने से नहीं चूक रही हैं। कांग्रेस की नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी जहां बुंदेलखण्ड के लिए विशेष पैकेज की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इस मामले में कांग्रेस के खिलाफ तलवार निकालकर खड़ी हो गई हैं।
बुंदेलखण्ड में आम जनता को जहां न तो रोटी नसीब हो पा रही है, और न ही पीने को पानी, पर राजनेताओं को इससे कुछ लेना देना नहीं है। कांग्रेस का गढ़ माना जाने वाला यूपी पिछले दो दशकों से बहुजन समाज पार्टी के वर्चस्व वाले क्षेत्र में तब्दील हो गया है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के पिछले दौरों ने यहां के लोगों को कुछ उम्मीदें बांधी हैं, कि सूबे की नहीं तो कम से कम केंद्र की सरकार द्वारा उनकी सुध ली जाएगी।
पिछली मर्तबा भी यही हुआ था। राहुल गांधी के पिछले साल के बुंदेलखण्ड के दौरे के बाद यहां के लिए लगभग पांच हजार करोड़ रूपए के विशेष पैकेज की तैयारी कर ली गई थी, जो बाद में कांग्रेस की सियासत में उलझ गया था। अंतत: केंद्र सरकार द्वारा यह पैकेज जारी ही नहीं किया जा सका था।
उत्तर प्रदेश के निजाम की कुर्सी पर बैठीं बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने राज्य भर में अपने आप को महिमा मण्डित करने की गरज से जीते जी ही अपनी प्रतिमाएं लगवाने की कवायद की गई है। इसके लिए सूबे के खजाने से उन्होंने लगभग 500 करोड़ रूपए निकलवाए हैं। यह राशि रातों रात अस्तित्व में आने वाले उद्यानों में महापुरूषों जिनमें सुश्री मायावती का भी शुमार है, की प्रतिमाएं लगाने में व्यय की जानी है।
लोगों के मन में अपने आप को चिरस्थायी बनाने की मंशा के कारण अपनी मूर्तियां लगवाने के चक्कर में मायावती यह भूल गईं कि उनका सूबा बहुत पिछड़ा हुआ है, और उनकी रियाया उनसे कुछ और उम्मीद लगाए बैठी है। सूखे से निपटने मायातवी ने महज ढाई सौ करोड़ रूपए की ही व्यवस्था करने कोे कहा है, जो निंदनीय है। मायावती की इस ज्यादती के खिलाफ कुछ मामले सर्वोच्च न्यायालय में भी लंबित हैं।
मायावती द्वारा सदा ही उत्तर प्रदेश में न केवल यूपी और बुंदेलखण्ड में राजनीति करती रहीं हैं, वरन योजनाओं में धन की कमी के लिए केंद्र सरकार को ही दोषी ठहराती रहीं हैं। वैसे भी दिग्विजय सिंह के फामूर्ले के बाद यूपी में कांग्रेस को मिली अप्रत्याशित सफलता ने मायावती को बोखलाने पर मजबूर कर दिया है।
वैसे अगर मायावती मूर्तियों के माध्यम से खुद को महिमा मण्डित करने के स्थान पर उस धन को जरूरतमंदों के काम मे खर्च करतीं तो निश्चित तौर पर आने वाले कई दिनों तक जनता उन्हें याद रखती।
केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्री के पद के सृजन के वक्त संविधान सभा के अध्यक्ष बाबा भीमराव अंबेडकर ने कुछ और सपना देखा होगा। जिस सपने पर आज सूबों के निजाम खुलेआम पानी फेरने से नहीं चूक रहे हैं। सूबे के निजाम का प्रथम दायित्व अपनी रियाया को खुश रखने, उसे बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने का होता है। इससे उलट आज राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा अपनी सुविधा के हिसाब से कानूनों को तोड़ मरोड़ कर व्याख्या कर अपनी स्वार्थसिद्धि की जा रही है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम आते ही हर भारतीय का मानमस्तिष्क श्रृद्धा से अपने आप झुक जाता है। बापू की प्रतिमा लगाना गौरव की बात समझा जाता है, यहां तक कि देश की करंसी पर भी बापू ही दिखाई पड़ते हैं। आधे नंगे बदन जिस शिक्सयत ने उन ब्रितानियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था, जिनके बारे में यह कहा जाता था कि उनके राज में सूरज कभी डूबता नहीं है।
आज राजनेताओं को बापू से सीख लेनी चाहिए। जिस सादगी के साथ बापू ने जीवन जिया वह वाकई एक नजीर है। देश के आजाद होने के बाद भी कोई पद स्वीकार न कर उन्होंने साबित कर दिया था कि उनका जीवन भारतवर्ष को समर्पित रहा है न कि अपने आप को महिमामण्डित करने में। आज बापू की आल औलादें भी भीड़ में ही कहीं गायब हो गईं हैं। वहीं दूसरी ओर जनसेवा का नारा देकर राजनीति करने वाले नेता अपनी दूसरी तीसरी पीढ़ी के लिए गद्दी के मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं, जिसकी निंदा की जानी चाहिए।
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सब पर भारी पड़ रहे हैं दिग्विजय सिंह
0 सोनिया के दरबार में अब अहमद पटेल नंबर दो पर
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में दस साल तक निष्कंटक राज करने वाले कांग्रेस के ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह इन दिनों अहमद पटेल के लिए सरदर्द बनते जा रहे हैं। 1993 से 2003 तक एमपी के मुख्यमंत्री रहे दिग्गी राजा के नपे तुले कदम सोनिया गांधी के राजनेतिक सचिव पटेल के लिए चुनौति से कम नहीं है।
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के भरोसेमंद सूत्रोें का कहना है कि दिग्विजय सिंह ने दस साल के लिए कोई पद नहीं लेने का अपना कोल निभाया है। अपने वनवास के सात साल काट चुके हैं। इसी बीच उन्होंने कांग्रेस की नजर में देश के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को राजनीति का ककहरा सिखाना आरंभ किया था।
राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू दिग्गी राजा की चालों से राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में संजीवनी फूंकने में कामयाबी हासिल कर ली थी। इसके बाद पर्दे के पीछे से ही दिग्विजय सिंह ने अपना खेल जारी रखा है। राहुल गांधी के प्रति वफादारी ही दिग्विजय सिंह का मूल मंत्र प्रतीत हो रहा है।
सूत्रों के अनुसार दिग्विजय सिंह की दखल अब 10 जनपथ में सोनिया के दरबार में भी मजबूत होती जा रही है। राजनैतिक नियुक्तियों में अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा दिग्विजय की सलाह को ज्यादा तरजीह दी जाने लगी है। चाहे राज्य सभा का चुनाव हो या सूबों में कांग्रेस में फेरबदल, इस सबमें दिग्विजय सिंह की राय अब मायने रखने लगी है।
सूत्रों ने यह भी बताया कि बिहार के कांग्रेस प्रभारी इकबाल सिंह को पांडिचेरी के उपराज्यपाल बनवाने में दिग्गी राजा की अहम भूमिका रही है। इतना ही नहीं, दिल्ली के विधायक परवेश हाशमी को राज्य सभा के लिए नामित करवाने में भी पर्दे के पीछे की उनकी भूमिका सशक्त ही रही है।
सबसे ताकतवर होकर उभरे अहमद पटेल को साईज में लाने के लिए दिग्विजय सिंह ने गांधी परिवार के वफादार रहे विसेंट जार्ज को भी अब चार्ज करना आरंभ कर दिया है। जानकारों का कहना है कि दिग्विजय सिंह के नपे तुले कदमों ने उन्हें सोनिया के दरबार में नवरत्नों में शुमार करवा दिया है।
सोनिया गांधी के करीबी सूत्रों का दावा है कि पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी की राजनैतिक परिपक्वता से गदगद सोनिया अब दिग्विजय सिंह को ज्यादा वजन देनें लगी हैं। यही कारण है कि अब सोनिया के दरबार में अहमद पटेल की स्थिति नंबर वन से दूसरी पायदान पर आ गई है।
कांग्रेस के अंदरखाने में चल रही चर्चाओं पर अगर यकीन किया जाए तो आने वाले दिनों में कांग्रेस की सियासत की धुरी दिग्विजय सिंह के इर्द गिर्द ही घूमती नजर आने वाली है।
शुक्रवार, 7 अगस्त 2009
(लिमटी खरे)
``मैं भारत के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के सिद्धांत को दृढ़तापूर्वक मानता हूं। मैं यह मानता हूं कि इस लक्ष्य को पाने का सिर्फ यही रास्ता है कि हम बच्चों को उपयोगी औद्योगिक शिक्षा दें और उसके द्वारा उनकी शारीरिक, मानसिक तथा आध्याित्मक शक्तियों का विकास करें।``
उक्त कथन किसी ओर का नहीं उन्हीं राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी का था, जिनके चित्रों को भारत सरकार द्वारा देश की मुद्रा पर छापा जाता है। बापू के कथन को आजाद भारत की सरकारों ने किस कदर आत्मसात किया है, यह बात किसी से छिपी नहीं है।
आजादी के बाद भारत पर शासन करने वाली सरकारों ने किस तेजी से लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाई हैं, उसका जीता जागता उदहारण है ``अनिवार्य शिक्षा विधेयक``। विडम्बना ही कही जाएगी कि शिक्षा को अनिवार्य बनाने में देश पर आधी सदी से अधिक राज करने वाली अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को बासठ साल लग गए।
बहरहाल ``देर आयद, दुरूस्त आयद`` की तर्ज पर ही सही देश में शिक्षा की अनिवार्यता को लागू किया गया है, जिसकी प्रशंसा करने भर से काम नहीं चलने वाला। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री इसे पास करवाने के बाद फूले नहीं समा रहे होंगे। ``अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है`` जुमले को दृष्टिगत रखते हुए अब केंद्र और राज्य सरकारों की जवाबदेही पहले से कई गुना अधिक बढ़ गई है।
जब यह विधेयक पास हुआ तब राज्य सभा में सांसदों की उपस्थिति 230 में से महज 54 और लोकसभा में 543 में से केवल 113 थी। अर्थात कुल 773 में से 167 संसद सदस्यों ने इस चर्चा में भाग लेने की जहमत उठाई। महज 21 फीसदी संसदों की उपस्थिति के साथ ही अनिवार्य शिक्षा के प्रति देश की सबसे बडी पंचायत के सदस्यों की जवाबदेही साफ हो गई है।
मीडिया की चुप्पी भी इस मामले में आश्चर्य जनक ही लग रही है। इससे आम भारतीय के दिलो दिमाग में एक प्रश्न का घुमड़ना स्वाभाविक ही है कि जिस विधेयक के लिए देश ने बासठ साल इंतजार किया उसका इतना फीका स्वागत! यह सब कहीं इस विधेयक के सफल क्रियान्वयन के मार्ग के शूल तो नहीं दर्शा रहा है।
इस विधेयक को लेकर राजनैतिक फिजाएं गर्म हो चुकी थीं। अनेक राजनेता प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर शिक्षा के व्यवसायिक अड्डों के मालिक बने हुए हैं। इस बिल के आने के उपरांत उनकी शिक्षा की दुकानों में टाट के पैबंद शायद ही उन्हें शोभा दें। जानकार इस मामले में शिक्षा में निवेश घटने और विद्यालयों की गुणवत्ता घटने की दुहाई भी दे रहे थे।
इस विधेयक में सबसे गोलमोल बात यह है कि शिक्षा को अनिवार्य तो कर दिया गया है, किन्तु उसके लिए जरूरी धनराशि की व्यवस्था की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई है। इसके साथ ही साथ केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय किस आधार पर होगा यह बात भी साफ नहीं की गई है। बासठ साल बाद भी गोल मोल तरीके से इस तरह के महात्वपूर्ण मुद्दे को पेश करने से सरकार की मंशा पर संदेह होना स्वाभाविक ही है।
गौरतलब होगा कि इससे पूर्व साठ के दशक में दौलत सिंह कोठारी और अस्सी के दशक में राममूर्ति कमेटी ने भी अपने प्रतिवेदन में ``पड़ोस के स्कूल`` की अवधारणा पर बल दिया था। विडम्बना से कम नहीं है कि आधी शताब्दी बीत जाने के बाद अब पड़ोस के स्कूल की अवधारणा मूर्तरूप लेती दिख रही है। इस विधेयक में यह प्रावधान रखा गया है कि कोई भी स्कूल भले ही वह किसी भी अभिजात्य वर्ग के लिए क्यों न हो में 25 फीसदी सीटें गरीब गुरबों के बच्चों के लिए सुरक्षित रखना होगा। वैसे देश के ``अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त`` का दर्जा पा चुके स्कूलों में क्या गरीब बच्चे प्रवेश पा सकेंगे, यह बात संभव प्रतीत नहीं होती है।
वैसे एक बात यह भी सच है कि नब्बे के दशक से ही आई संचार क्रांति के बाद अब डरविन की थ्योरी पर विचार करने की अवश्यक्ता है। बकोल डरविन अपना अस्तित्व वही बचाकर रख सकता है, जो बदलाव के अनुरूप अपने आप को ढाल सकता हो। यह भी सच है कि बदलाव शिक्षा के रास्ते ही संभव है। विकसित देशों की तुलना में हमारे पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण देश में अशिक्षितों की तादाद ज्यादा होना है।
वैसे देश के कानूनों को अगर बारीकी से देखा जाए तो उनसे बेहतर कानून जनता के हित में और कोई नहीं हो सकते हैं। सवाल यह है कि कानून के पालन की परवाह करने वाले निजाम कितने हैंर्षोर्षो कानून का पालन सुनिश्चित कराने वाले ही जब कानून को ठेंगा दिखाने की पहल करेंगें तो कानून के मायने क्या रह जाएंगे।
शिक्षा को मौलिक अधिकार में शामिल करना वह भी कानून के रूप में, निश्चित तौर पर एक बड़ा कदम है। इसके लिए यूपीए सरकार बधाई की पात्र है। अब इसे अक्षरश: लागू करवाना भी केंद्र और राज्य सरकारों की जवाबदारी ही है। देश के नागरिकों को चाहिए कि इस महात्वाकांक्षी कानून का पालन सुनिश्चित करने में स्कूल, बच्चों और स्कूलों के बीच समन्वय का वातावरण निर्मित करें।
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0 फोरलेन विवाद
दो प्रोजेक्ट की बढ़ाई गई समयावधि
0 अगले साल पूरा हो सकेगा एनएस कारीडोर का काम
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। स्विर्णम चतुभुZज के अंतर्गत बनने वाले दो अन्य गलियारों में उत्तर दक्षिण गलियारे का मार्ग मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के उपरांत सिवनी जिले से होकर जाएगा अथवा इसे किसी अन्य जिले से होकर गुजारा जाएगा इस बारे में सरकारी सफाई के अभाव में अटकलों का बाजार बुरी तरह गर्मा चुका है।
गौरतलब होगा कि 1995 में जब इस मार्ग के निर्माण की बात गर्भ में भी नहीं थी, उस समय सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर देश भर में वन्य जीवों और पेड़ों के संरक्षण की गरज से एक याचिका दायर की गई थी। इसके उपरांत अनेक याचिकाओं के दायर होने से इसमें क्लब कर दी गईं थीं।
इसी बीच अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में देश के चारों महानगरों देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली, कोलकता, देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई ओर चेन्नई को जोड़ने के लिए स्विर्णम चतुर्भुज योजना का श्रीगणेश किया गया था। इसके बाद उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम को जोड़ने के लिए भी गलियारों को आरंभ करवाया गया था।
उत्तर दक्षिण गलियारा मध्य प्रदेश के ग्वालियर, सागर, नरसिंहपुर और सिवनी जिलों से होकर गुजर रहा है। कुछ दिनों पूर्व एक गैर सरकारी संस्था द्वारा सर्वोच्च न्यायलय की अधिकार प्राप्त समिति ``सीईसी`` के समक्ष एक याचिका प्रस्तुत की थी। इसके साथ ही साथ सीईसी ने मध्य प्रदेश शासन और जिला कलेक्टर सिवनी को अनुरोध पत्र जारी कर पेड़ों की कटाई रोकने का अनुरोध किया गया था। जिस पर तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि द्वारा 18 दिसंबर 2008 को कटाई पर स्थगन दे दिया गया था।
इंटरनेट पर मौजूद एनएचएआई की वेब साईट पर प्रोजेक्ट इंप्लीमेंटेशन फेज दो में क्रमांक 64 में साफ तौर पर दर्शाया गया है कि लखनादौन से महाराष्ट्र बार्डर तक किलोमीटर 547.4 से किलोमीटर 596.75 के 49.3 किलोमीटर के मार्ग निर्माण का काम मार्च 2007 में आरंभ करवाया गया था एवं इसे सितंबर 2009 तक पूरा हो जाना था। इस मार्ग की समयावधि बढ़ाकर सितंबर 2010 कर दी गई है।
इसी तरह क्रमांक 67 पर उल्लेखित राजमार्ग चौराहा से लखनादौन तक के किलोमीटर 351 से 405.7 के 54.7 किलोमीटर के मार्ग निर्माण का काम अपे्रल 2006 में आरंभ करवाया गया था, एवं यह काम अक्टूबर 2008 में पूरा हो जाना चाहिए था, किन्तु इसे भी दिसंबर 2010 तक बढ़ा दिया गया है।
इसके अलावा क्रमांक 88 पर उल्लेख किया गया है कि लखनादौन से महाराष्ट्र बार्डर तक के काम में किलोमीटर 596.75 से 653.225 तक के 54.47 किलोमीटर के काम को दिसंबर 2007 में आरंभ करवाया गया था एवं इसे जून 2010 में पूरा होना है, इसकी समयावधि यथावत रखी गई है।
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वीआरएस की राह पर प्रवेश शर्मा
0 मोहम्मद सुलेमान जा सकते हैं भूतल परिवहन मंत्रालय में
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में सिवनी सहित अनेक जिलों की कमान संभालने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के मध्य प्रदेश के 1982 बैच के अधिकारी जल्द ही स्वेच्छिक सेवानिवृति ले सकते हैं। वर्तमान में श्री शर्मा मध्य प्रदेश सरकार के कृषि एवं सहकारिता विभाग में प्रमुख सचिव हैं।
श्री शर्मा के करीबी सूत्रों का दावा है कि वे जल्द ही एशियाई विकास बैंक (एडीबी) को अपनी सेवाएं सौंप सकते हैं, इसके लिए प्रवेश शर्मा को स्वैच्छिक सेवा निवृति लेना अत्यावश्यक ही होगा। सूत्रों ने आगे बताया कि एडीबी द्वारा भी श्री शर्मा के स्वागत की तैयारियां आरंभ कर दी हैं। एडीबी द्वारा देश की व्यवसायिक राजधानी दिल्ली में इंडिया रेसीडेंट मिशन में वरिष्ठ कृषि विशेषज्ञ का पद सृजित कर दिया है, जिसे जल्द ही प्रवेश शर्मा संभाल सकते हैं।
0 सुलेमान जा सकते हैं सरफेस ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री में
वहीं दूसरी और भारतीय प्रशासनिक सेवा के मध्य प्रदेश काडर के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी मोहम्मद सुलेमान भी जल्द ही केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय में अपनी आमद दे सकते हैं। सरफेस ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक चूंकि मोहम्मद सुलेमान मध्य प्रदेश में काफी समय से सचिव लोक निर्माण और सड़क विकास प्राधिकरण के प्रबंध संचालक भी हैं।
0 पचौरी और दास सूचिबद्ध
भारतीय पुलिस सेवा के मध्य प्रदेश काडर के 1993 बेच के अधिकारी पी.एन.पचौरी और पी.के.दास को केंद्र सरकार द्वारा सूचिबद्ध कर लिया गया है।
0 शर्मा शिक्षा निदेशक नियुक्त
छत्तीसगढ़ काडर की 1994 बैच की भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी ऋचा शर्मा को केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भेजने के उपरांत प्राथमिक शिक्षा निदेशक के बतौर नियुक्ति दी गई है।
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अब संगठन पर चलेगा सोनिया का कोड़ा
0 आजाद, मोईली, सामी, रमेश, चव्हाण, वासिनिक आदि पर गिरेजी गाज
0 एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत होगा कड़़ाई से लागू
0 राहुल का वर्चस्व होगा नई कार्यकारिणी में
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का ध्यान इन दिनों संगठन में जान फूंकने की ओर दिखने लगा है। एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत को जल्दी ही कड़ाई से लागू कराने की मुहिम छेड़ी जाने वाली है, इससे अनेक केंद्रीय मंत्रियों के पैरों तले से संगठन की जमीन खींचकर दूसरे नेताओं को जिम्मेदारी देने की कवायद की जा रही है।
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के करीबी सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस अध्यक्ष अब संगठन को दुरूस्त करने का उपक्रम करने वाली हैं। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस के ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल और अपने पुराने विश्वस्त विसेंट जार्ज को सक्रिय कर दिया है।
सूत्रों ने कहा कि सोनिया गांधी की ये तीनों ही बैसाखियां रोजना देश भर से आने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं से अपने अपने घरों पर ही मिलने का काम करके शाम को समूचे घटनाक्रम की संक्षिप्त जानकारी (ब्रीफ नोट) अपने मशविरे के साथ राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को प्रेषित कर देती हैं।
सूत्रों की माने तों केंद्रीय मंत्री ए.के.अंटोनी जो कि महाराष्ट्र के प्रभारी हैं, को छोड़कर शेष मंत्रियों के पास से संगठन का दायित्व वापस लिया जाने वाला है। इनमें जयराम रमेश, गुलाम नवी आजाद, पृथ्वीराज चौव्हाण, वी.नारायण सामी, मुकुल वासनिक, वीरप्पप मोईली को पार्टी मुख्यालय 24 अकबर रोड़ से मुक्त कर आधा दर्जन नए चेहरों को संगठन में महात्वपूर्ण जवाबदारी सोंपी जाएगी।
सोनिया की नई टीम में राहुल फेक्टर साफ दिखाई देगा। इसमें युवाओं को ज्यादा तरजीह मिलने की उम्मीद है। राहुल के निशाने पर इस समय बिहार और उत्तर प्रदेश है, सो इन दोनों सूबों को खासी तरजीह इसमें मिलने की संभावनाएं भी जताई जा रही हैं। कांग्रेस के मीडिया प्रभाग का कायाकल्प भी होने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके साथ ही साथ शिवराज पाटिल, बी.एल.पुनिया और शकील अहमद को भी संगठन में स्थान मिलने की चर्चाएं हैं।
गुरुवार, 6 अगस्त 2009
(लिमटी खरे)
न्यायधीशों की संपत्ति सार्वजनिक न किए जाने संबंधी विधेयक के राज्य सभा में ही दम तोड़ देने से कांग्रेसनीत केंद्र सरकार की जमकर किरकिरी हुई। विपक्ष तो विपक्ष कांग्रेस के ही जयंती नटराजन और राजीव शुक्ला जैसे संसद सदस्यों ने राज्यसभा में जब इस विधेयक का विरोध किया तब साफ हो गया था कि कांग्रेस में ही इस मसले पर रायशुमारी किए बिना ही जल्दबाजी में इस विधेयक को सदन में रख दिया गया।
सरकार द्वारा पेश इस विधेयक मेें यह प्रावधान किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायधीश अपनी संपत्ति के विवरण की घोषणा करेंगे किन्तु वे इसे देश के मुख्य न्यायधीश के समक्ष ही करेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया इस विवरण को सार्वजनिक करेंगे।
देखा जाए तो यह विधेयक सभी को बराबरी देने वाले संवैधानिक अधिकार का खुला माखौल उड़ा रहा है। न्यायधीश अगर अपनी संपत्ति को सार्वजनिक करते हैं तो इसमें बुराई ही क्या है। देश में विधायक, सांसद यहां तक कि प्रधानमंत्री और महामहिम राष्ट्रपति जैसे पदों के लिए चुनाव लड़ने के पूर्व उन्हें भी अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करनी पड़ती है।
इससे इन जनप्रतिनिधियों की माली हालत को जनता भांप लेती है, फिर दुबारा चुनाव लड़ते वक्त इनकी संपत्ति में हुए इजाफे से जनता आसानी से अनुमान लगा सकती है कि इन्होंने अपने कार्यकाल में कितनी ईमानदारी से काम किया है। जब आम आदमी को बराबरी मिलने का संवैधानिक अधिकार है, तो उससे न्यायधीशों को प्रथक रखना आपत्तिजनक माना जा सकता है।
क्या न्यायधीश आम आदमी से इतर कुछ और हैर्षोर्षो क्या वह आम आदमी से अलग कुछ और खाता पीता और अलग तरीके का रहन सहन अपनाता हैर्षोर्षो राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली का कहना तर्कसंगत है कि अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 19 (1), (ए) की उम्मीदवारों के लिए अलग और न्यायधीशों के लिए अलग व्याख्या नहीं की जा सकती है।
देश में सुरक्षा से जुड़े मामलों को गोपनीय रखने की बात तो गले उतरती है, किन्तु न्यायधीशों की संपत्ति को गोपनीय रखा जाना समझ से परे ही है। सरकार का यह कदम आम आदमी को कांग्रेस से दूर ले जाने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है, क्योंकि इससे लोगों के बीच यह धारणा भी बन सकती है कि न्यायपालिका को खुश करने की गरज से विधायिका और कार्यपालिका न्यायधीशों को इस तरह की छूट प्रदान करने का कुित्सत प्रयास कर रही है। इसके पीछे यह वजह भी बताई जा रही है कि राजनेताओं के अनेकों प्रकरण न्यायालयों में लंबित जो हैं।
भारत की न्याय व्यवस्था पर पूर्व में कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगे हैं, किन्तु ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के 2007 के सर्वे में साफ किया गया था कि देश के 77 फीसदी लोगों की नजरों में न्यायपलिका भ्रष्ट करार दी गई थी। वैसे भी न्याय का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है, उसके अनुसार न्याय होना नहीं आम लोगों को न्याय होते दिखना भी चाहिए।
भारत गणराज्य में न्यायपालिका को सबसे उपर दर्जा दिया गया है। हमारे देश में न्यायधीशों को सभी बाध्यताओं से परे रखा गया है। इसे अक्ष्क्षुण रखने के लिए आवश्यक है कि न्यायपलिका का दामन पूरी तरह उजला और पारदशीZ होना चाहिए। इसके पूर्व भी न्यायधीश इंक्वायरी बिल नहीं रखा जा सका था।
वर्तमान विधेयक में भी जो बातें सामने आईं हैं, उससे जनता के बीच यह संदेश अवश्य गया होगा कि देश को न्याय देने वाले न्यायधीश अपने आप को हर तरह की जवाबदेही से मुक्त रखना चाह रहे हैं, जो उचित नहीं कहा जा सकता है।
यह तो संतोष की बात मानी जा सकती है कि इस बिल को राज्यसभा ने ही पारित नहीं किया। राज्यसभा में खुद कांग्रेस के सांसदों के विरोध से सरकार को समझ लेना चाहिए कि इस तरह का अत्मघाती कदम सरकार के लिए बाद में गले की हड्डी बन सकता है। लोकतंत्र में सबसे अधिक जरूरी पारदर्शिता है। पारदर्शिता के बिना सब कुछ गोल मोल ही कहा जा सकता है। सरकार को चाहिए कि इस विधेयक में संशोधन कर इसे सदन में रखे।
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0 फोरलेन विवाद
इंटरनेट पर भारत के मानचित्र पर उभरा है लखनादौन
0 2369 किलोमीटर लंबा है एनएच 07
0 रेल के नक्शे पर नहीं सड़क के नक्शे पर दिखा तो सिवनी जिला
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे पर भविष्य में सिवनी जिले का नाम होगा या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता है किन्तु वर्तमान में इंटरनेट पर सरकारी वेवसाईट पर सिवनी जिले के लखनादौन का नाम अवश्य इसमें दिखाई पड़ रहा है। सिवनीवासियों के लिए यह संतोष की बात मानी जा सकती है कि भले ही रेल के मानचित्र पर सिवनी जिले के नाम का उल्लेख नहीं किया गया हो, किन्तु भूतल परिवहन मंत्रालय के नक्शे में तो जिले का नाम उकेरा गया है।
एनएचएआई के नक्शे में लखनादौन का नाम बड़े अक्षरों में लिखा गया है, जो सिवनी वासियों को गोरवािन्वत करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। आने वाले दिनों में कितने समय तक यह नाम उस नक्शे पर बरकरार रहता है, इस बात का जवाब तो सिवनी को दशा और दिशा देने वाले राजनेताओं द्वारा ही बताया जा सकेगा।
गौरतलब होगा कि पूर्व में छिंदवाड़ा सिवनी नैनपुर को नेरोगेज से ब्राडगेज में तब्दील कराने के अभियान में एक एसएमएस बहुत ही चर्चित रहा था, कि पहले भारतीय रेल के नक्शे मेें सिवनी जिले का नाम तो लाओ फिर अमान परिवर्तन की बात करना। रेल न सही सड़क मार्ग पर तो जिले के लखनादौन का नाम होना ही संतोषजनक माना जा सकता है।
कुल 2369 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात का एक बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश से होकर गुजरता है। वैसे उत्तर प्रदेश के हिस्से में 128, मध्य प्रदेश से 504, महाराष्ट्र से होकर 232, आंध्रा प्रदेश से 753, कर्नाटक से 125 और तमिलनाडू से होकर एनएच 07 का 627 किलोमीटर का हिस्सा गुजरता है।
वैसे काबिलेगोर बात यह भी है कि एक ओर जहां इंटरनेट पर एनएचएआई के मानचित्र पर लखनादौन से बरास्ता लखनादौन, सिवनी, नागपुर कन्याकुमारी जाने वाला मार्ग अब उत्तर दक्षिण कारीडोर का हिस्सा बन गया है, वहीं दूसरी ओर भूतल परिवहन मंत्रालय की वेब साईट पर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात आज भी इसी मार्ग के तोर पर जीवित है।
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दिनोंदिन गिर रहा है डीडी के न्यूज का स्तर
0 अफसरों की भरमार हो गई है डीडी भोपाल में
0 नौसिखिए बना रहे हैं खबरें!
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। दूरदर्शन के भोपाल केंद्र में जब से मनीष गौतम की पदस्थापना बतौर डिप्टी डायरेक्टर न्यूज (डीडीएन) हुई है, तब से डीडी भोपाल में खबरों का स्तर काफी हद तक गिर गया है। श्री गौतम पर लगाम कसने की गरज से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (आई एण्ड बी मिनिस्ट्री) द्वारा एक अन्य डीडीएन की पदस्थापना कर दी है।
मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि दूरदर्शन भोपाल के परफारमेंस से उच्चाधिकारी प्रसन्न नहीं हैं। वैसे भी भोपाल मनीष गौतम के खिलाफ आकाशवाणी और दूरदर्शन भोपाल में रहते हुए की गई अनियमितताओं की जांच अभी जारी है। लागलपेट में माहिर उक्त अधिकारी पर अंकुश लगाने के लिए विभाग ने एक और डीडीएन की पदस्थापना के आदेश जारी कर दिए हैं।
सूत्रों का कहना है कि महज 15 मिनिट की न्यूज के लिए भोपाल में भारी भरकम अफसरों का अमला रखने का ओचित्य नही है। सूत्रों ने यह भी कहा कि उच्चाधिकारियों के ध्यान में इस बात को भी लाया गया है कि डीडी भोपाल में खबरें बनाने का काम नौसिखियों द्वारा किया जा रहा है।
बताते हैं कि यहां खबरें बनाने का काम संपादकों के बजाए बाहरी लोगों और ``केजुअल्स`` से कराया जा रहा है। भोपाल में आकाशवाणी और दूरदर्शन की कमान डीडीएन मनीष गौतम के पास ही है, एवं गोतम के नेतृत्व में अनुभवहीन लोगों की फौज के भरोसे इस सरकारी विश्वसनीय प्रसारण माध्यम से खबरें प्रसारित की जा रही हैं।
एक उच्चाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आई एण्ड बी मिनिस्ट्री के भोपाल स्थित कार्यालय राजनीति का अड्डा बनकर रह गए हैं। उन्होंने कहा कि भोपाल आकाशवाणी और दूरदर्शन की खबरों में विश्वसनीयता की कमी साफ तौर पर परिलक्षित हो रही है।
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आड़वाणी को मुख्य धारा में लाने एक और टोटका!
0 ``माय कंट्री, माय लाईफ`` का उर्दू संस्करण ``मेरा वतन, मेरी जिंदगी``
0 संघ और भाजपा हो सकते हैं आमने सामने
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी के आरक्षण को अगले आम चुनावों तक कनफर्म करवाने की गरज से चुनिंदा भाजपा नेताओं ने कमर कस ली है। भाजपा के इन रणनीतिकारों ने आड़वाणी को हिन्दुत्व के घेरे से निकालकर अब मुसलमानों के बीच ले जाने की कवायद आरंभ कर दी है।
भाजपा के ये चुनिंदा रणनीतिकार इन दिनों आड़वाणी की चर्चित किताब माय कंट्री माय लाईफ को ध्यान से पढ़कर इसे आत्मसात करने का प्रयास कर रहे हैं। मुसलमानों के बीच आड़वाणी को लोकप्रिय बनाने और उन्हें हिन्दुत्व के घेरे से बाहर निकालने की रणनीति के तहत उनकी किताब का उर्दू संस्करण ``मेरा वतन, मेरी जिंदगी`` का विमोचन राजधानी के फिक्की सभागार में किया गया।
सूत्रों की मानें तो अब आड़वाणी की छवि इस तरह की बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि वे न तो मुस्लिम विरोधी हैं, और न ही कट्टरवादी। वे तो महज राष्ट्रवादी हैं। आम चुनावों के पूर्व तैयार हो चुकी इस पुस्तक का विमोचन तभी किया जाने वाला था, ताकि उसका लाभ आम चुनावों में भाजपा को मिल सके।
सूत्रों ने बताया कि पार्टी मंच पर आम राय न बन पाने, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दबाव और समयाभाव के चलते इसका कार्यक्रम नहीं फायनल हो सका था। बाद में गुपचुप ही इसकी सारी तैयारियां कर अब इसका विमोचन किया जा रहा है।
आड़वाणी की किताब के उर्दू संस्करण के कार्यक्रम ने भाजपा और संघ के आमने सामने आने की संभावनओं को बढ़ा दिया है। गौरतलब होगा कि आम चुनावों में भाजपा की शिकस्त के बाद से ही संघ और भाजपा दोनों ही में विचारधारा को लेकर तलवारें भांजी जा रही हैं।
भाजपा से जुड़े लेखक क्षत्रपों ने तो पार्टी को यहां तक सलाह दे डाली है कि अगर पार्टी को जीवित रखना है तो आने वाले समय में वरूण गांधी और नरेंद्र मोदी की तरह के हिन्दुत्व से किनारा करना ही उचित होगा। खेमों में बंट चुकी भाजपा में अंदर ही अंदर इस बात की खिचड़ी खदबदाने लगी है कि अब मुसलमानों को भाजपा से जोड़ने का समय आ गया है।
उधर दूसरी ओर भाजपा के अंदर संघ के आलंबरदार और खुद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा हिन्दुत्व की कीमत पर रजनीतिक लाभ के फार्मूले को सिरे से खारिज करने की कवायद की जा रही है।
मंगलवार, 4 अगस्त 2009
पुरातन महत्व का है एन एच 7
0 शेरशाह सूरी के जमाने के मुख्य मार्ग के अवसान की तैयारी!
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। मुगल शासक शेरशाह सूरी के जमाने में मुख्य मार्ग का खिताब पाने वाले बनारस से कन्याकुमारी तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात के अवसान की तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। देश भर में वनों की कटाई एवं वन्य जीव संरक्षण को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में लंबित एक याचिका एवं सिवनी जिले के तत्कालीन जिलाधिकारी पिरके चलते इसकी बली चढ़ाई जाने वाली है।
गौरतलब होगा कि इस मार्ग का मध्य प्रदेश का कुछ हिस्सा राजमार्ग विकास प्राधिकरण (एनएचएआई) ने अधिगृहित कर इसको अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की महात्वाकांक्षी स्विर्णम चतुभुZज के उत्तर दक्षिण गलियारे में शामिल कर लिया गया है। 2396 किलोमीटर लंबे इस राजमार्ग का लखनादौन से कन्याकुमारी तक का 1828 किलोमीटर का हिस्सा उत्तर दक्षिण गलियारे तो बंगलुरू से कृष्णागिरी तक का 94 किलोमीटर का हिस्सा स्विर्णम चतुभुZज में शामिल कर लिया गया है। यह अलहदा बात है कि भूतल परिवहन मंत्रालय की वेव साईट में अभी भी यह हिस्सा एनएच 7 का ही हिस्सा दर्शाया जा रहा है।
देश के सबसे लंबे और व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात उत्तर प्रदेश के बनारस से आरंभ होकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिल नाडू राज्यों से होकर गुजरता है। इन राज्यों में इसकी लबाई यूपी में 128, एमपी में 504, महाराष्ट्र मे 232, आंध्रा में 753, कर्नाटक में 125 एवं तमिल नाडू में 627 किलोमीटर है।
यह एनएच देश के अनेक एन एच को स्पर्श करता हुआ जाता है। एनएच 2, 29 एवं 56 को बनारस, 27 को मनगवां, 75 को रीवा, 78 को कटनी, राष्ट्रीय राजमार्ग 12 को जबलपुर, 26 को लखनादौन, 69 एवं 6 को नागपुर, 16 को आमरोन, 202 एवं 9 को हैदराबाद, 18 को कुरनोल, 63 को गोटी, 206 को अनंतपुर, 4 एवं 209 को बंगलुरू, 44, 66 एवं 219 को कृष्णागिरी, 68 एवं 47 को सेलम, 67 को कारूर एवं 209 एवं 45 को डिंडीगुल 49, 208 एवं 45 बी को मदुरई, 7 ए को लुरनालवली एवं 47 को कन्याकुमारी में स्पर्श करता है।
चूंकि राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 07 पूर्व में सैकड़ों साल से उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच जीवन रेखा के तौर पर संचालित होता रहा है, इसलिए इसके पुरातन महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसके बड़े भाग को एनएचएआई द्वारा उत्तर दक्षिण गलियारे में लिए जाने से इसकी महत्ता और अधिक बढ़ गई है, किन्तु बताया जाता है कि विघ्नसंतोषियों के चलते मध्य प्रदेश में नरसिंहपुर से बरास्ता लखनादौन, सिवनी नागपुर को इससे अलग करने का सुनियोजित षणयंत्र भी चलाया जा रहा है।
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चालक को बना दिया अधिकारी!
0 केट ने भेजा उपसंचालक भोपाल को नोटिस!
0 आई एण्ड बी मिनिस्ट्री के पास अधिकारियों का टोटा!
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय की फील्ड पब्लिसिटी की भोपाल स्थित शाखा प्रमुख द्वारा एक चालक को फील्ड पब्लिसिटी असिस्टेंट (एफपीए) बनाने के मामले में शास्त्री भवन स्थित सूचना प्रसारण मंत्रालय में हड़कम्प मचा हुआ है। इस मामले में केट ने उक्त अधिकारी को एक नोटिस भेजकर जवाब तलब किया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कांग्रेस नीत संप्रग सरकार की महात्वाकांक्षी योजना ``भारत निर्माण`` के मध्य प्रदेश और गुजरात प्रमुख विजय अग्रवाल द्वारा स्वेच्छिक सेवानिवृति लिए जाने के उपरांत दूरदर्शन भोपाल में पदस्थ डिप्टी डायरेक्टर न्यूज मनीष गौतम को इसका प्रभार दे दिया गया है।
आई एण्ड बी मिनिस्ट्री के पास अधिकारियों की कमी इस कदर है कि भोपाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय की तीन शाखाओं दूरदर्शन, आकाशवाणी और फील्ड पब्लिसिटी का कार्यभार अकेले मनीष गौतम ही संभाल रहे हैं।
शास्त्री भवन स्थित मंत्रालय के मुख्यालय में चल रही चर्चाओं के अनुसार सेटिंग के धनी उक्त अधिकारी ने भोपाल में अंगद की तरह पांव जमा लिए हैं। दूरदर्शन हो या आकाशवाणी या फिर फील्ड पब्लिसिटी का कार्यालय हर जगह उक्त अधिकारी की ही तूती बोल रही है।
उधर बताया जाता है कि इनकी बात न मानने वाले कर्मचारियों का तबादला तक कराने की कूबत रखने वाले उक्त अधिकारी ने पिछले अपने भोपाल के कार्यकाल में व्यापक फेरबदल करवाकर अपनी कुर्सी सलामत रखी है। आई एण्ड बी मिनिस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि उक्त अधिकारी के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं की जांच भी विभाग के पास लंबित है, जिसमें जिलों में पदस्थ संवाददाताओं से इन्होंने प्रशस्ति पत्र बुलवाकर मुख्यालय को भी भेजे थे।
सोमवार, 3 अगस्त 2009
04 AUGEST 2009
(लिमटी खरे)
बढ़ती आबादी के साथ ही बिजली का संकट कोई नई बात नहीं है। उत्पादन, आवश्यक्ता और पूर्ति के बीच के भारी भरकम अंतर को पाटना शायद केंद्र और सूबे की सरकारों के बस की बात नहीं दिख रही है। सरकारी कार्यालयों में चोबीसों घंटों मनने वाली दीपावली के चलते सुदूर ग्रामीण अंचलों में 18 से 20 घंटे की बिजली कटौती होना आम बात हो गई है।
देश के निर्वतमान महामहिम राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम के कार्यकाल को देशवासी अनेक मायनों में याद रखेंगे। इसमें एक कारण महामहिम के विशाल निवास और कार्यालय को इको फ्रेंडली बनाने का काम भी शामिल है। महामहिम के इस परिसर ने अब तक एक करोड़ चोरासी लाख रूपए की बिजली की बचत कर साबित कर दिया है कि कोई भी काम असंभव नहीं है।
वैसे पिछले ही साल राष्ट्रपति भवन को इको फ्रेंडली बनाने की मुहिम आरंभ की गई थी। पिछले साल 25 जून से आरंभ हुए आपरेशन ``रोशनी`` के नाम से आरंभ किए गए इस अभियान में इस परिसर को प्रकृति के और करीब लाकर यहां के कर्मचारियों और निवासियों के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त कराया है।
महामहिम के आवास और कार्यालय परिसर में रोशनी को प्रकृति से जुड़ी 13 परियोजनाओं से संबद्ध किया गया है। जिनमें जैविक खाद बनाना, सौर उर्जा, पौधे लगाना, कूड़ा प्रबंधन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग आदि प्रमुख हैं। परिसर में बनाए गए 96 गड्ढों में हर डेढ माह में 120 किलो जैविक खाद बनाई जा रही है, जिसका उपयोग महामहिम के परिसर में बागवानी में किया जा रहा है।
इस परिसर की यह खासियत काफी हद तक सराहनीय मानी जा सकती है कि बायोगैस से भवन और कर्मचारियों के आवासों में रसोई गैस की आपूर्ति की जा रही है, जिससे घरेलू ईंधन की कमी को पूरा किया जा रहा है। इस भवन में अधिकांश स्थानों पर सौर उर्जा से चलने वाली लाईटों का प्रयोग भी किया जा रहा है।
पानी की हायतौबा को देखते हुए यहां सोलिड वेस्ट हार्वेस्टिं सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाकर इससे मिलने वाले जल से बाग बगीचे के लिए पानी मुहैया करवाया जा रहा है। विशाल भवन में बरसाती पानी को रोककर रेन वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से जलस्तर बढ़ाने का प्रयास भी किया जा रहा है।
देश के पहले नागरिक होने का गौरव प्राप्त महामहिम की सोच अगर इतनी सकारात्मक हो सकती है तो निश्चित तौर पर उनके अधीन कार्यरत केंद्र और सूबों की सरकारों को इससे सबक लेना चाहिए। देश भर में बिजली और पानी की किल्लत को पलक झपकते ही इन उपायों को कर दूर किया जा सकता है।
सरकार को चाहिए कि कम से कम उसके सरकारी भवनों की छतों से आने वाले बरसाती पानी को ही वह रेन वाटर हार्वेस्टिंग कर बचाकर जलस्तर को बढ़ाने की दिशा में कारगर पहल करे। देश भर में अरबों वर्ग फुट में बने सरकारी भवनों की छतों से निकलने वाले बारिश के पानी को इस प्रक्रिया के माध्यम से सहेजा जा सकता है।
इससे एक ओर उन स्थानों पर जलस्तर अपने आप ही बढ़ सकेगा और दूसरी ओर गर्मी के मौसम में होने वाली पानी की दिक्कत को इस भूगभीZय पानी के माध्यम से काफी हद तक कम किया जा सकेगा। इसके साथ ही साथ जलस्तर बढ़ने से आसपास की जमीनें भी और अधिक उपजाउ हो जाएंगी।
इसके अलावा इन भवनों की छतों का इस्तेमाल सौर उर्जा चलित बिजली उपकरणों में किया जा सकता है। अमूमन देखा गया है कि सरकारी कार्यालयों के पंखे, एयर कंडीाशनर और लाईट चोबीसों घंटे ही चालू रहते हैं, जिससे बिजली की बरबादी बहुत अधिक मात्रा में होती है। सौर उर्जा चलित लाईट के उपयोग से बिजली उत्पादन का एक बड़ा भाग देश की जनता तक पहुंचाया जा सकेगा।
महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा पेश यह नजीर देशवासियों के लिए काफी हद तक फायदे का सौदा साबित हो सकती है। केंद्र सरकार को चाहिए कि इसका प्रचार प्रसार व्यापक स्तर पर करके रेन वाटर हार्वेस्टिंग और सौर उर्जा के विकल्पों को बढ़ावा देने की दिशा में कारगर कदम उठाए, क्योंकि आने वाले चंद सालों में आबादी के विस्फोट से हालात बेकाबू होते ही नजर आ रहे हैं।
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आ गया अड़वाणी युग के अवसान का समय
0 सुषमा, जेतली, शिवराज, मोदी के बीच है अगला मुकाबला
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। हालात देखकर लगने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी में आड़वाणी युग के अवसान के गीत गाने का माकूल वक्त आ गया है। इस आम चुनाव में ``पीएम इन वेटिंग`` का अलंकार पाने वाले भाजपा के सीनियर नेता लाल कृष्ण आड़वाणी का जादू आम चुनावों में नहीं चल सका। इसके बाद से ही शनै: शनै: उनकी मुखालफत के साथ ही साथ दूसरी लाईन के लीडरान अपना अपनी अपनी जमीन पुख्ता करने में जुट चुके हैं।
हाल में संपन्न हुए राज्य सभा चुनावों की उम्मीदवारी के दौरान यह बात साफ तौर पर दिखाई दी कि भाजपा में आड़वाणी की परवाह दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेता नहीं कर रहे हैं। आड़वाणी के स्पष्ट संकेतों के बाद भी मध्य प्रदेश से राज्य सभा के रास्ते पीयूष गोयल को संसदीय सौंध तक जाने के रास्ते प्रशस्त नहीं किए जा सके।
आड़वाणी के करीबी सूत्रों का कहना है कि आड़वाणी के निर्देश पर उनके सबसे विश्वस्त अनंत कुमार ने व्यक्तिगत तौर पर भारतीय जनता पार्टी के दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को ``साहब`` की भावनाओं से आवगत करा दिया था। इसके बाद जब आड़वाणी के निवास पर विदिशा की संसद सदस्य सुषमा स्वराज, अरूण जेतली, वेंकैया नायडू, शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र तोमर जुटे, तब आड़वाणी की यह कवायद धरी की धरी रह गई।
सूत्रों ने बताया कि जैसे ही मध्य प्रदेश कोटे से पीयूष गोयल के नाम का प्रस्ताव आया, वैसे ही इन सभी नेताओं ने गोयल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इसी बीच चतुर सुजान सुषमा स्वराज ने अपने पिछलग्गू अनिल माधव दवे के लिए मध्य प्रदेश की एक सीट पर सहमति बनवा ली।
बची दूसरी सीट के लिए जब विचार विमर्श आरंभ हुआ तो भाजपा के पितृ संगठन माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा प्रस्तावित कप्तान सिंह सौलंकी का नाम आते ही पार्टी के सुप्रीमो राजनाथ सिंह ने भी इस पर अपनी सहमति जता दी। जताते भी क्यों नहीं। सुरेश सोनी द्वारा यह नाम जो आगे बढ़ाया जा रहा था।
जानकारों के अनुसार अब जबकि भाजपा की दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं द्वारा आड़वाणी की ``भावनाओं`` का सम्मान नहीं किया जा रहा है, तब आने वाले समय में भाजपा की राजनीति की धुरी सुषमा स्वराज, नरेंद्र मोदी, अरूण जेतली, शिवराज सिंह चौहान के इर्द गिर्द ही घूमने की उम्मीद है।
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03 augest 2009
कलेक्टर का आदेश रद्द कराने सीएम से मिलेंगे देशमुख
0 रक्षा बंधन के बाद भोपाल जाएंगे बालाघाट सांसद
0 सिवनी वासियों के साथ नहीं हो सकेगा अन्याय : केडी
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। उत्तर दक्षिण गलियारा मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर गुजरेगा अथवा नहीं यह बात तो भविष्य के गर्भ में ही है। अब जनप्रतिनिधियों द्वारा इसे बचाने की दिशा में सार्थक प्रयास आरंभ कर दिए गए हैं। सिवनी विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया के उपरांत अब सिवनी बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद के.डी.देशमुख ने इस मसले पर मुख्यमंत्री से चर्चा करने की बात कही है।
आज दिल्ली में दूरभाष पर चर्चा के दौरान सांसद के.डी.देशमुख ने कहा कि उन्हें मूल मसला समझ में आ गया है। इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित अवश्य है, किन्तु न्यायालयीन प्रक्रिया में हस्ताक्षेप कर्ता की हैसियत से अपना पक्ष रखने में कुछ समय है।
उन्होने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) के चाणक्यपुरी स्थित ``चाणक्य भवन`` में उन्होंने सीईसी के सदस्यों से इस बारे में चर्चा कर क्षेत्रवासियों की भावनाओं से सदस्यों को आवगत कराया। श्री देशमुख ने कहा कि उन्हें पता चला है कि 1995 में लगाई गई याचिका की अगली सुनवाई 21 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की फारेस्ट बेंच के सामने होना तय हुआ है।
श्री देशमुख ने यह स्वीकार किया किया कि उनकी जानकारी में भी यह आया है कि खवासा और मोहगांव के बीच वन और गैर वन क्षेत्रों में कटाई का काम तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के आदेश से रोका गया था। इस आदेश को सीईसी के अनुरोध पर रोका गया है, जिस बारे में मुख्यमंत्री से चर्चा की जाएगी।
चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से रक्षा बंधन के उपरांत समय लेकर इस मसले पर चर्चा की जाएगी। चूंकि यह मामला उनके संसदीय क्षेत्र का है, इसलिए वे सिवनीवासियों के साथ अन्याय कतई नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री से चर्चा का एजेंडा प्रमुख रूप से तत्कालीन कलेक्टर पी.नरहरि के आदेश को निरस्त करवाना ही होगा। इसके बाद दूसरे चरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ओर रूख किया जाएगा।
गौरतलब होगा कि इससे पूर्व परिसीमन के उपरांत समाप्त हुई सिवनी लोकसभा सीट की अंतिम सांसद और सिवनी विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया ने मुख्यमंत्री से इस संबंध में चर्चा की थी। सूत्रों के अनुसार श्रीमति पटेरिया ने मुख्यमंत्री को कलेक्टर के आदेश पर काम रूकने की बात नहीं बताई गई थी,, जिस पर मुख्यमंत्री द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में प्रदेश सरकार के वकील की सेवाएं लेने की बात कही गई थी।
जानकारों के अनुसार सभी प्रयास माननीय सर्वोच्च न्यायालय में हस्ताक्षेपकर्ता बनने की ओर किए जा रहे हैं, जबकि अभी तक न्यायालय द्वार इस बारे में न तो कोई स्थगन दिया है, और न ही फैसला। सड़क निर्माण का मामला कलेक्टर सिवनी के 18 दिसंबर 2008 के आदेश के तहत रोका गया है।
रविवार, 2 अगस्त 2009
(लिमटी खरे)
इस साल मानसून के बिगड़े मिजाज ने देश के बाजार पर बदनसीबी की जो इबारत लिखी थी उसका आम आदमी की जिंदगी पर असर अब साफ दिखाई पड़ने लगा है। सरकारेें मंहगाई को लेकर चाहे जो भी दावे कर किन्तु यह सच है कि तेजी से बढ़ती मंहगाई के ग्राफ ने आम आदमी की कमर तोड़कर रख दी है।
इस साल के आरंभ से ही देश में दाल के संकट की गूंज सुनाई पड़ने लगी थी। इस साल के आरंभ में ही सेंटर फार साईंस एंड एनवायरमेंट की रिपोर्ट आने के बाद हड़कम्प सा मच गया था, इसमेें सबसे ज्यादा मिलावट दाल और खाद्य तेलों में होना बताया गया था।
दाल की उछाल मारती कीमतों से निजात के लिए दिल्ली सहित कुछ सरकारों ने सस्ती दरों पर दाल मुहैया कराने की सराहनीय पहल की है। वैसे देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की जनसंख्या के हिसाब से महज अस्सी केंद्र बनाकर उनके माध्यम से दाल वितरण कराना अपर्याप्त ही माना जा रहा है। कम वितरण केंद्रों के होने से इनमें अफरातफरी मचना स्वाभाविक ही है।
राज्य सरकारों को इस पहलू पर भी विचार करना आवश्यक होगा कि जिन कें्रद्रों पर दाल नहीं मिल पाएगी उन केंद्रों पर पहले से ही मंहगाई से त्रस्त रियाया का गुस्सा भड़कना स्वाभाविक ही होगा। सरकारों को अपनी जनलुभावनी घोषणा को अमली जामा पहनाते समय इस पहलू पर विचार अत्यावश्यक होगा। साथ ही सरकारी स्टाल पर दाल बेचना या दाल की राशनिंग करना इस समस्या का स्थाई इलाज नहीं माना जा सकता है।
यह सच है कि आसमान छूते दाल के भावों ने आम निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के खाने का न केवल जायका बिगाड़ा है, वरन इससे उनका बजट भी बिगड़ चुका है। खाने पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के उपयोग वस्तुओं के दामों में आया उछाल आम आदमी को हलाकान करने के लिए पर्याप्त कहा जा सकता है।
वैसे एक सच यह भी है कि दालों में कीमतों की बढ़ोत्तरी असमान्य ही मानी जा रही है। पिछले लगभग दो माहों के अंदर ही दालों की कीमतें लगभग पचास फीसदी बढ़ गई हैं। इन परिस्थितियों में सरकारों को यह भी जानना जरूरी हो गया है, कि आखिर कौन सी अदृश्य ताकतें बाजार को अपने हिसाब से संचालित करने का उपक्रम कर रही हैं।
दाल की कीमतों में अचानक आया उछाल दाल में काले की ओर साफ तौर पर इशारा कर रहा है। इसकी वजह अभी साफ नहीं हो सकी है। विशेषज्ञ इसे कृत्रिम संकट बताकर इसके लिए जमाखोरों, सटोरियों और मिलावटखोरों को जिम्मेदार बता रहे हैं।
हमारा कहना महज इतना ही है, कि अगर सरकार किन्ही कारणों के चलते इस लाबी के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने का साहस नहीं जुटा पा रही है, तो कम से कम उसे चाहिए कि वह उस दाल के भंडार को सुरक्षित कर ले जो बंदरगाहों पर पड़ी सड़ रही है।
विडम्बना ही कही जाएगी कि एक ओर गरीब गुरबों के साथ ही साथ निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की खाने की थाली से दाल पूरी तरह गायब सी हो रही है, वहीं दूसरी ओर उन्ही की गाढ़े पसीने की कमाई से सरकारी उपक्रमों द्वारा आयतित दाल बंदरगाहों पर पड़ी सड़ रही है। सरकारी प्रयासों से साफ हो गया है कि दाल की कीमतों पर काबू पाने के सरकार के प्रयास और हस्ताक्षेप पूरे मन से नहीं किए जा रहे हैं, तभी देश में दाल की कीमतों में जबर्दस्त उछाल आ गया है।
अनेक सर्वेक्षणों की रिपोर्ट साफ इशारा करती है कि भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा भाग कुपोषण का शिकार है। भारत में हर साल साढ़े दस लाख बच्चे कुपोषण के चलते ही असमय ही काल के गाल में समाने पर मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक प्रतिवेदन पर अगर नजर डाली जाए तो भारत के 63 फीसदी बच्चे भोजन के अभाव में भूखे सोने को मजबूरह हैं।
तिस पर आसमान छूती कीमतों के चलते आम आदमी की थाली से दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि पिछले दस सालों में भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में 10 लाख टन अनाज को या तो चूहे खा गए या वह सड़ गया।
बताते हैं कि 1997 से 2007 के बीच ही देश में भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में 83 लाख टन टन गेंहूं, 3.95 लाख टन चावल, 22 हजार टन धान, 110 टन मक्का ही सड़ा चुका है। देश में शीतगृहों के अभाव में हर साल 58 हजार करोड़ रूपयों की सब्जियां और फल सड़ जाते हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि एफसीआई के गोेदामों में जितना अनाज सड़ा है वह देश के एक करोड़ लोगों के खाने के लिए एक साल तक पर्याप्त राशन कहा जा सकता है।
इसके बावजूद भी कांग्रेसनीत डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार का काम तो देखिए। उसने 1.2 करोड़ टन अनाज जिस दर पर निर्यात किया है, उसी दर पर केंद्र सरकार देश के गरीबों को उसे सौंपने तैयार नहीं थी। इस तरह देश की सरकार अपनी रियाया का ध्यान रख रही है।
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. . . तो इस तरह बचाया लालू ने अपना सिंहासन
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। आम चुनावों के एन पहले अपने घुर विरोधी राम विलास पासवान से गलबहिंया कर कांग्रेस को आंखे दिखाने वाले लालू प्रसाद यादव ने लोकसभा में अगली पंक्ति का अपना सिंहासन बचा ही लिया। लालू यादव की यह सीट किस कीमत पर बची इसको लेकर तरह तरह की चर्चाओं के बाजार गर्मा गए हैं।
पिछले दो महीनों से यही कयास लगाया जा रहा था कि महज चार सीटों पर विजय पताका फहराने वाले राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को लोकसभा के सदन में पीछे की सीट मिलेगी। अंत में जब बंटवारा हुआ तो लालू यादव को पुराना आगे वाला आसन ही मिल गया।
लालू प्रसाद के इस कथित ``मेनेजमेंट`` पर लोगों ने दांतों तले उंगली दबा ली। कभी घाटे में जा रही भारतीय रेल को मुनाफे में लाकर लालू यादव ने ढेर सारी वाहवाही बटोरी थी। इसके बाद आम चुनावों में बिहार मे कांग्रेस का पल्ला झटक राम विलास पासवान से गठजोड़ कर चुनाव लड़ने के बाद लालू यादव के खिलाफ कांग्रेस में असंतोष के स्वर बुलंद हो गए थे।
इसके बाद सदन में यदुवंशियों अथाZत लालू प्रसाद यादव, शरद यादव और मुलायम सिंह यादव के नए त्रिफला गठबंधन ने कांग्रेस के कान खड़े कर दिए थे। बताते हैं कि राहुल गांधी के करीबी एक ताकतवर महासचिव ने कूटनीतिक चालें चलकर लालू यादव को इस यदुवंशी त्रिफला से बाहर कर दिया।
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री डॉ. मन मोहन सिंह द्वारा ``शर्म अल शेख`` में दिया गया बयान कांग्रेस के लिए गले की फांस बन गया था। इस पर सदन में चर्चा के दौरान कांग्रेस को आशंका थी कि यादव त्रय द्वारा इस मामले में सरकार की खाल उतारी जाएगी।
बलूचिस्तान मामले में शरद यादव और मुलायम ने तो जमकर भड़ास निकाली पर जब लालू प्रसाद यादव की बारी आई तो उन्होंन बड़ी ही चतुराई से अपने आप को इस मामले से बचाते हुए कहा कि वे पहले सूखे पर चर्चा करना चाहेंगे। लालू यादव की इस हरकत से एक ओर जहां यदुवंशियों के कुनबे में दरार पड़ गई वहीं दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव ने सदन में अपनी अगली पंक्ति की सीट पर कब्जा बरकरार रख लिया।
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. . . . तो कुरई घाट में क्या आपत्ति है?
0 उत्तराखण्ड सरकार ने राजाजी नेशनल पार्क से मांगी बायपास के लिए जमीन!
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। उत्तराखण्ड सरकार ने राजाजी नेशनल पार्क की दो हेक्टेयर जमीन का उपयोग बायपास निर्माण के लिए करने हेतु देश के सर्वोच्च न्यायालय से मांग की है। जब जब हिल बाईपास के लिए राष्ट्रीय उद्यान के लिए जमीन मांगी जा सकती है, जहां कि अभी कोई मार्ग ही नहीं है तो मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में कुरई घाट पर देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में पेंच क्यों फंसाए जा रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कुंभ मेले के दौरान यातायात के दबाव को कम करने के उद्देश्य से उत्तराखण्ड सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर राजाजी नेशनल पार्क की दो हेक्टेयर जमीन की मांग की है। उत्तराखण्ड सरकार की ओर से अधिवक्ता रचना श्रीवास्तव द्वारा दायर याचिका में अनुरोध किया गया है कि इसकी अनुमति शीघ्र ही प्रदान की जाए अन्यथा परियोजना में विलंब हो जाएगा।
बताया जाता है कि सर्वोच्च न्यायलय ने उक्त याचिका को जांच के लिए केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) को भेज दिया है, और कहा है कि सीईसी के प्रतिवेदन के उपरांत ही इस पर कोई फैसला लिया जा सकेगा। दायर याचिका में राज्य सरकार ने कहा है कि प्रस्तावित मार्ग खरखरी और मोतीचूर रेल्वे स्टेशन के बीच बनेगा। इस मार्ग के लिए चीफ वाईल्ड लाईफ वार्डन पूर्व में ही कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे चुके हैंं।
जब इस तरह के मार्ग के लिए प्रयास किए जा रहे हों जो कि अभी अस्तित्व में ही नहीं हैं, तो शेर शाह सूरी के जमाने से मुख्य मार्ग रहे राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात के सिवनी जिले के महज 9 किलोमीटर के हिस्से में पेड़ों की कटाई और फोरलेन के निर्माण में तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि का स्थगनादेश समझ से परे ही नजर आ रहा है।
गौरतलब होगा कि तत्कालीन जिला कलेक्टर पी.नरहरि ने 18 दिसंबर 2008 को एक आदेश जारी कर साफ कहा था कि वन और गैर वन क्षेत्रों की कटाई के बारे में पूर्व कलेक्टरों के आदेश इस आदेश के बाद निरस्त हो जाएंगे। इससे मोहगांव से खवासा (कुरई घाटी) में मार्ग निर्माण बाधित हो गया है।
शनिवार, 1 अगस्त 2009
सुप्रीम कोर्ट में अब 21 को होगी सुनवाई
0 किस बात की राह देख रहे हैं सिवनी के जनप्रतिनिधि
(लिमटी खरे)नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना स्विर्णम चतुभुZज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे का हिस्सा मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर जाएगा या नहीं इस बात से अभी कुहासा छट नहीं सका है। सर्वोच्च नयायलय में 1995 में लगाई गई एक याचिका की 31 जुलाई को हुई सुनवाई के बाद अब अगली तारीख 21 अगस्त दी गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार 1995 में 202 नंबर पर पंजीबद्ध याचिका में याचिका कर्ता गोदावर्मन थि्रमुलपड़ ने केंद्र सरकार को पार्टी बनाते हुए वन एवं पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का मामला दायर किया था। 31 जुलाई को हुई सुनवाई में आदेश दिया गया है कि इस मामले की सुनवाई 21 अगस्त को फारेस्ट बैंच के समक्ष की जाए।
बताया जाता है कि वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट की जिस याचिका क्रमांक 1124 का बार बार जिकर किया जा रहा है, वह कहीं अस्तित्व में है ही नहीं। इसी याचिका के कारण समूचा बवाल खड़ा हुआ है। याचिका कर्ता ने मध्य प्रदेश शासन और जिला कलेक्टर सिवनी से सिवनी जिले के मोहगांव से लेकर खवासा तक के वनों की कटाई रोकने का आग्रह किया था।
गौरतलब होगा कि इसी आधार पर तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि ने 18 दिसंबर 2008 को इस क्षेत्र में गैर वन और वन क्षेत्र की कटाई पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। आरोपित है कि जिलाधिकारी का उक्त आदेश जुलाई माह तक दबाया गया था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार मोहगांव से लेकर खवासा तक के मार्ग निर्माण का काम अथवा वन या गैर वन क्षेत्र में वृक्षों की कटाई रोकने के संबंध मेें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभी तक कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। इस संबंध में तरह तरह की अफवाहें फैला कर मामले को भ्रमित किए जाने का कुित्सत प्रयास भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
राजधानी दिल्ली में चल रही चर्चाओं के अनुसार सिवनी जिले के सांसद और विधायक सहित अन्य नेता शायद इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि इस मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय कब स्थगन दे, या फिर न्यायालय प्रशासन से कहे, ``काम क्यों चालू नहीं करते!`` इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि हर कोई जिलाधिकारी के 18 दिसंबर 2008 के उस आदेश को चुनौति देने के बजाए इसमें माननीय सर्वोच्च न्यायलय या केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को जवाबदार बताने का प्रयास कर रहा है।
विधि के एक वरिष्ठ ज्ञाता ने मामले को समझकर अपनी राय देते हुए कहा कि मामले की तह में जाना जरूरी है। अगर काम को जिला कलेक्टर के आदेश से रोका गया है, तो सर्वोच्च न्यायलय की चौखट चूमने का ओचित्य समझ से परे है। बेहतर होगा कि जिलाधिकारी के उक्त आदेश को खारिज करवाने की दिशा में पूरी ताकत झोंंकी जाए।
शुक्रवार, 31 जुलाई 2009
01 augest 2009
(लिमटी खरे)
इक्कीसवीं सदी में अचानक ही देश के परिदृश्य में उभरकर सामने आए योग गुरू बाबा रामदेव का देशवासियों को निश्चित तौर पर आभार मानना चाहिए कि उन्होंने सदियों पुराने भारतीय योग को उसी स्वरूप में किन्तु नया कलेवर देकर पेश किया है। आज देश के अधिकांश लोग बाबा रामदेव से प्रेरणा लेकर नियमित योगाभ्यास कर रहे हैं। बाबा रामदेव ने देश भर के कमोबेश हर जिले में अपने संस्थान की शाखा की स्थापना कर दी है।
लोगों की स्मृति से अभी विस्मृत नहीं हुआ होगा कि अप्रेल और मई माह में संपन्न हुए आम चुनावों में जब भारतीय जनता पार्टी ने विदेश से काले धन वापसी का मुद्दा चुनावों में झोंका तो बाबा रामदेव ने भी भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए कहा था कि वे भी विदेशों से काला धन वापस लाने के मुद्दे पर जनमत तैयार कर सड़कों पर उतरेंगे। बाबा ने कहा था कि वे इस मामले में चुप नहीं बैठेगें।
उस दौरान कुछ लोगों ने दबी जुबान से बाबा रामदेव पर यह आरोप भी लगाया था कि वे ``पीएम इन वेटिंग`` लाल कृष्ण आड़वाणी के सात रेसकोर्स रोड़ नई दिल्ली (प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) के मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। चुनाव हुआ और भाजपा का यह राग कहां विलुप्त हो गया पता नहीं। इतना ही नहीं बाबा रामदेव ने भी इस बारे में पूरी तरह चुप्पी साध ली।
कुछ सालों पहले बाबा रामदेव ने दंभ से कहा था कि वे योग को दुनिया भर में फैलाना चाहते हैं, किन्तु वे भारत देश के बाहर तभी कदम रखेंगे जब वे संपूर्ण देशवासियों को योग के जरिए निरोगी बना देंगे। अपनी इस बात से उलट बाबा रामदेव ने विदेशों में जाकर योग प्रशिक्षण देना आरंभ कर दिया है।
इतना ही नहीं बाबा रामदेव की कार्यप्रणाली के चलते यह भी कहा जाने लगा है कि बाबा रामदेव सिर्फ अमीरों को ही योग सिखाना चाहते हैं, क्योंकि उनके शिवरों में देश की गरीब जरूरतमंद जनता मंहगी टिकिट होने के कारण जा ही नहीं पाती है। बेहतर होगा कि बाबा रामदेव गरीब गुरबों के लिए भी योग शिविर का आयोजन किया करें।
बाबा रामेदव के हरिद्वार स्थित पतांजली योग संस्थान मेें जाना आम आदमी के लिए आसान नहीं है। कहा जाता है कि अगर कोई बाबा की दवाओं की एजेंसी (जिला स्तर पर) लेना चाहे तो उसे एक मुश्त आठ लाख रूपए की दवाएं खरीदनी होती हैं। इतने मंहगे तरीके से अगर बाबा देश के गरीब गुरबों का इलाज करना चाह रहे हैं तो इससे बेहतर तो नीम हकीम ही हैं, जो कम से कम गरीबों की जेब देखकर ही अपनी फीस और दवाअों की कीमत निर्धारित करते हैं।
हमारे पौराणिक परिदृश्य पर अगर नजर डाली जाए तो बाबा सदा से ही समाज के अगुआ (पायोनियर) रहे हैं। बाबाओं की दी सीख और शिक्षा के चलते ही हमारा सभ्य समाज कुरीतियों से बचकर इक्कीसवीं सदी में सुखमय जीवन बिता रहा है। इतिहास गवाह है कि बाबा लोग जो भी कहते हैं हमारा समाज उसे निर्विकार भाव से अंगीकार कर लेता है। इसका कारण बाबाओं का ``काम, क्रोध, मद, लोभ`` से परे होना है।
बाबा रामदेव का चर्चाओ में बना रहना नई बात नहीं है। इसके पहले सांसद वृंदा करात ने बाबा रामदेव की औषधियों में मानव शरीर के अंगों के होने की बात कहकर सनसनी फैला दी थी। इसके बाद अर्धकुंभ में भाग लेने इलहाबाद पहुंचे ग्वालियर के योगी शिवराज गिरी ने तो बाबा रामदेव को लालकारते हुए कहा था कि बाबा यह साबित कर दिखाएं कि योग से कैंसर और एड्स जैसे रोगों का इलाज होता है। इसके साथ ही साथ पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अंबूमणि रामदास भी बाबा से सीधे ही भिड़ चुके हैं।
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में स्वामियों और बाबाओं की बढ़ती भीड़ के चलते ये बाबा विवाद में भी घिरे रहे हैं। अमेरिका के आरगन में 64 हजार एकड़ भूमि के स्वामी रहे आचार्य रजनीश एक ओर जहां उन्मुक्त यौन संबंधों के कारण विवादों में रहे, वहीं दूसरी ओर एफबीआई के 35 आरोपों में से उन्होंने दो को स्वीकारा था जो फर्जी आव्रजन और शादियां कराने का मामला।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गांधी के योग गुरू रहे धीरेंद्र ब्रम्हचारी जिन्होंने बाद में अपना योग स्कूल खोला भी कम विवादित नहीं रहे हैं। इन पर इंदिरा गांधी शासनकाल में सियासी फैसलों में हस्ताक्षेप करने और जम्मू में गन फैक्ट्री के साथ अन्य कई संगीन आरोप भी मढ़े गए थे।
मौनी बाबा के नाम से विख्यात हुए पूर्व प्रधानमंत्री स्व.नरसिंहराव के जमाने में चंद्रास्वामी की तूती बोलती रही है। एक जमाने में इनके दिल्ली स्थित आश्रम में व्हीव्हीआईपी और नेताओं की कतार लगा करती थी, पर अंर्तराष्ट्रीय हथियार व्यापारी खगोशी से संबंध रखने के आरोप के साथ ही साथ इन्होंने कई आरोपों में जेल की हवा भी खाई है।
दक्षिण भारत में तिरूचिरापलली के एक तांत्रिक प्रेमानंद पर आश्रम में हत्या, 13 बलात्कार के आरोप के बाद चेन्नई हाईकोर्ट ने इन्हें उमरकेद की सजा सुनाई जिसे सर्वोच्च न्यायालन ने बरकरार रखा। प्रशांति निलयम में निवास करने वाले सत्य साई बाबा खुद को शिरडी वाले साई बाबा का अवतार बताते हैं।
इनके भक्तों मेंं अनेक पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सिने स्टार और खिलाड़ियों का शुमार है। इन पर आरोप रहा है कि पुट्टपर्ती स्थित इनके आश्रम में आश्रम की अंदरूनी राजनीति के चलते हुए गोलीकांड में छ: लोगों की जान गई थी। इनके चमत्कारों पर सवालिया निशान लगाते हुए अनेक टीवी न्यूज चेनल्स ने लंबी स्टोरी भी चलाई है।
बहरहाल बाबा रामदेव की पहल प्रशंसनीय कही जा सकती है कि उन्होंने देश के काले धन को देश में वापस लाने की शांत पर मुहिम तो छेड़ी। बाबा रामदेव ने समलेंगिकता के खिलाफ कोर्ट के दरवाजे खटखटाने के अपने वादे को भी निभाया। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। इसी बीच देश की जनता अब बाबा रामदेव की राह देख रही है कि वे कब अपना कौल निभाते हुए सड़कों पर उतरेंगे और काला धन देश में वापस लाकर इन धन कुबेरों के चेहरों पर से नकाब उतारेंगे।
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सुषमा की चतुराई से भाजपा को मिली संजीवनी
(लिमटी खरे)नई दिल्ली। संसद के दोनों सदनों में भारतीय जनता पार्टी के सांसदों के बीच हिलोरे मार रहे असंतोष पर सुषमा स्वराज ने अपनी चतुराई भरी चाल से घड़ों पानी डाल दिया है। पहले मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य फिर विदिशा से संसद सदस्य बनीं सुषमा स्वराज ने कूटनीतिक तरीके से असंतोष के फन को दबा दिया है।
भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा सदन में भाजपा की ओर से मुख्य वक्ता बनने के लिए हाथ पैर मार रहे थे। यही कारण था कि दोनों ही असंतुष्टों को हवा दे रहे थे। सूत्रों ने कहा कि लोकसभा चुनाव में शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली और अपनी उपेक्षा के कारण दोनों ही नेता रूष्ट चल रहे थे। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को मशविरा दिया गया था कि इन्हें इन्हीं के हाल पर छोड़ दिया जाना चाहिए। इसके उपरांत जब सदन में चर्चा की शुरूआत का मुद्दा आया तो दोनों ही नेताओं ने एक बार फिर नजरें तरेरना आरंभ कर दिया।
सूत्रों ने आगे बताया कि लोकसभा में पार्टी की उपनेता सुषमा स्वराज ने भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह, डॉ.मुरली मनोहर जोशी, अनंत कुमार, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह आदि के बीच सदन में अहम विषयों पर होने वाली चर्चाओं का विभाजन इस तरह किया कि सभी प्रसन्न हो गए।
भाजपा में आर्थिक और विदेश मामलों के विशेषज्ञ समझे जाने वाले जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा को दरकिनार कर पार्टी ने बजट पर अधिकृत वक्तव्य सुषमा स्वराज के माध्यम से बनवा दिया। और इस पर प्रथम वक्ता के रूप में डॉ. एम.एम.जोशी को खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं विदेश मामलों में महामहिम राष्ट्रपति को सौंपे ज्ञापन का ड्राफ्ट भी राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने बना दिया।
मजे की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा पर सदन में चर्चा के लिए जब यशवंत सिन्हा के पास प्रथम वक्ता बनने का पैगाम भेजा गया तो एक असेZ से उपेक्षित सिन्हा ने गदगद होकर इसे स्वीकार कर लिया। संसद में इस सामंजस्य का श्रेय अगर किसी को जाता है तो मध्य प्रदेश कोटे से जीतकर आईं सुषमा स्वराज को।
