गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

कब तक क्षमा करोगे शिशुपाल को

कब तक क्षमा करोगे शिशुपाल को
आप भारत गणराज्य के जिम्मेदार मन्त्री हैं थुरूर साहेब
थुरूर को क्यों झेल रही है कांग्रेस!


(लिमटी खरे)

सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट टि्वटर और शशि थुरूर दोनों ही एक दूसरे के पूरक हो चुके हैं। हालात देखकर लगता है कि आजाद भारत के गणराज्य में विदेश राज्य मन्त्री शशि थुरूर सोते जागते बस टि्वटर के ही सपने देखते रहते हैं। उन्हें भारत सरकार के कामकाज से कोई खास लेना देना नहीं है। वे बस इस वेव साईट पर अपने प्रशंसकों से रूबरू होते रहते हैं। वे इस वेव साईट को प्रचार प्रसार का एक अच्छा माध्यम भी मानते हैं। हमने अपने पूर्व आलेखों में साफ तौर पर कहा था कि बदनामी से बचने के लिए भारत सरकार को टि्वटर खरीद लेना चाहिए, और अपने सारे के सारे काम काज इस पर ही निष्पादित करने चाहिए। पहली बार उंट पहाड के नीचे आता दिख रहा है। आईपीएल में लगे धन के मामले में जब ललित मोदी ने टि्वटर पर चीजें सार्वजनिक की तो थुरूर तिलमिला उठे।

आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी ने अपने टि्वटर के पेज पर जब आईपीएल में कोिच्च टीम के हिस्सेदारों के नाम उजागर किए तब हंगामा मचा। इस फेहरिस्त में ब्यूटीशियन सुनन्दा पुष्कर का नाम भी है। इस टीम को रोन्देवू स्पोर्टस क्लब ने 1533 करोड रूपए की बोली लगाकर खरीदा है। इसमें सुनन्दा की हिस्सेदारी सत्तर करोड रूपए बताई गई है, जिन्हें यह फ्री इक्वीटी के तौर पर दी गई है। इसमें 25 फीसदी रोन्देवू तो 19 फीसदी शेयर सुनन्दा के पास है। हाल ही में सुनन्दा शशि थुरूर की तीसरी बीवी बनने की खबरों की अफवाहों से चर्चा में आईं हैं। मोदी का आरोप है कि थुरूर के दबाव में यह हिस्सेदारी सुनन्दा को दी गई है।
 
केन्द्रीय मन्त्री जतिन प्रसाद के ब्याह से चर्चा में आईं हैं सुनन्दा पुष्कर। दरअसल जतिन की शादी में केन्द्रीय विदेश राज्यमन्त्री शशि थुरूर अपनी एक महिला मित्र के गले में हाथ डाले घूम रहे थे। यह महिला मित्र और कोई नहीं सुनन्दा पुष्कर ही थीं। वूमेन कालेज श्रीनगर से ग्रेजुएट सुनन्दा 2005 मेें टीकाम इंवेस्टमेंट कंपनी में सेल्स मैनेजर थीं। इसके बाद वे दुबई में जाकर निर्माण करोबार से जुड गईं थीं। सुनन्दा के पिता सेवानिवृत लेिफ्टनेंट कर्नल पीएन दास श्रीनगर जाकर सेटल हो गए थे। सुनन्दा दिल्ली के एक होटल में काम करती थी, तभी उसने कश्मीरी युवक से शादी की पर शादी परवान न चढ सकी और दोनों का तलाक हो गया। इसके बाद उसने दुबई में शादी की, सुनन्दा के पति की दिल्ली में सडक दुघZटना में मौत हो गई थी। अगर थुरूर की वे जीवन संगनी बनती हैं तो यह उनकी तीसरी शादी होगी। इसी तरह चर्चा है कि थुरूर भी अपनी सात समन्दर पार वाली पित्न से तलाक लेने वाले हैं सो थुरूर की भी यह तीसरी शादी होगी।
 
बहरहाल समूचे घटनाक्रम को देखकर एक बात साफ होने लगी है कि अपने जीवन का आधे से ज्यादा समय विदेशों में बिताने वाले शशि थुरूर के मन में लक्ष्मी के प्रति मोह हद से ज्यादा बढ चुका है। शशि थुरूर भूल जाते हैं कि वे अब ब्यूरोक्रेट नहीं हैं, आम नागरिक नहीं हैं, वे भारत गणराज्य के जिम्मेदार मन्त्री पद की आसनी पर हैं, जहां ये सारी बातें शोभा नहीं देती। शादी ब्याह करना, निभना न निभना उनका नितान्त निजी मामला हो सकता है, पर जहां तक रही रूपयों पैसों की बात तो उसमें कोई भी बात निजी नहीं रह जाती जबकि आप जनसेवक हों। आईपीएल में हो रही धनवषाZ से सभी उसकी ओर आकषिZत हो रहे हैं। क्रिकेट की दीवानी समूची दुनिया है। भारत में इसका जादू सर चढकर बोल रहा है। आईपीएल में पैसे बन रहे हैं। इस पर खेला जाने वाला सट्टा भी अरबों खरबों को पार कर गया है। क्या राजनेता, क्या उद्योगपति क्या रूपहले पर्दे के सितारे। सभी एक ही भाषा में राग अलाप रहे हैं। शाहरूक ने तो यह तक कह दिया कि अगर उनकी टीम जीती तो वे नंगे होकर स्टेडियम में नाच करेंगे। शाहरूक के बयान के बाद भी भारत सरकार चुप बैठी है। अरे भई हिन्दुस्तान संसकारों के कारण जाना जाता है, यहां नग्नता का कोई स्थान नहीं है। वैसे भी इस मर्तबा मामला कुछ फसव्वल वाला लग रहा है। सार्वजनिक पद पर बैठे एक जनसेवक खासकर जब वह भारत गणराज्य का जिम्मेदार मन्त्री हो तब उससे तो सटीक राजनैतिक आचरण, उत्तम चरित्र और जवाबदेही तथा पारदर्शिता की उम्मीद बेमानी नहीं होगी। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इस मामले में शशि थुरूर का परफारमेंस ऋणात्मक ही रहा है। जिस तरह थुरूर एकाएक राजनैतिक परिदृश्य में आए और मन्त्रीपद की आसनी से नवाजे गए वह भारतीय राजनीति में ही सम्भव है। थुरूर जैसे गैर जिम्मेदार मन्त्री ने अब तक कभी भी परिपक्वता नहीं दिखाई है।
 
थुरूर कहते हैं कि मोदी ने गोपनीयता के नियमों का उल्लंघन किया है जिसमें कहा गया है कि आईपीएल की टीमों के मालिकों के बारे में कोई जानकारी उजागर न करने की शर्त रखी गई थी। सवाल यह उठता है कि जब पारदर्शिता का दायरा न्यायधीशों की कुर्सी तक पसर चुका हो तब पर्दे के पीछे के इन मालिकों के चेहरों के नकाब क्यों नहीं उतरना चाहिए। अगर इसमें मालिकों की गोपनीयता की शर्त रखी गई है तो जाहिर है कि इसमें गलत धंधों में लिप्त लोगों का पैसा लगा होगा तभी उन्होंने आईपीएल में इस तरह की शर्त रखवाई।
 
वैसे देखा जाए तो शशि थुरूर का विवादों से साक्षात्कार उनके मन्त्री बनने के बाद ही हुआ है। वैश्विक आर्थिक मन्दी के दौर में जब कांग्रेस की राजमाता सोनिया गांधी ने दिल्ली से मुम्बई की यात्रा विमान में बीस सीट खाली छुडवाकर इकानामी क्लास में की तो शशि थुरूर ने इसके बाद टि्वटर पर टिप्पणी करते हुए इकानामी क्लास को केटल क्लास (मवेशी का बाडा) की संज्ञा दे डाली। विदेश दौरे से लोटने पर उन्होंने काम के बोझ की बात भी बात कही थी। बार बार चेताने के बाद भी थुरूर का टि्वटर प्रेम बरकार ही है। पता नहीं कांग्रेस उन्हें सहन क्योें कर रही है। भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की सौ गिल्तयों को माफ किया था, पर उसके बाद उसे दण्डित किया था। अब यह बात तो कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी ही जाने कि वे थुरूर की कितनी गिल्तयों को सहने का प्रण ले चुकीं हैं।
 
इसी तरह ठहरे हुए पानी में कंकर मारकर लहरें पैदा करने वाले ललित मोदी भी कम विवादित नहीं रहे हैं। अस्सी के दशक में विदेश में पढाई के दौरान अमेरिका के डरहम काउंटी में जज द्वारा उन पर 1985 में चार सौ ग्राम कोकीन रखने और अपहरण करने का आरोप मढा गया था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था, और प्ली बारगेन के माध्यम से सजा से बच गए थे। मोदी पर 2005 में राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बनने के दौरान घालमेल करने का आरोप है। आईपीएल के दौरान भारत के सम्मान के प्रतीक तिरंगे पर शराब रखकर पिलवाने का मामला अभी पुलिस के पास विचाराधीन ही है। इसके अलावा भाजपा की वसुंधरा राजे की सरकार के कार्यकाल में उन पर भारतीय पुलिस और प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से दुर्वयवहार के अनेक आरोप हैं। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी की तर्ज पर अब मोदी पर भी महिला मित्र का दांव फेंका गया है। बताते हैं कि मोदी ने अक्रीकी माडल ग्रेब्रीला दैमित्री का वीजा रद्द करवाने का प्रयास किया था। मोदी और इस माडल के सम्बंधों के बारे में अब तरह तरह की चर्चाएं आम होती जा रहीं हैं।
 
शशि थुरूर को बचाने अब उनके पक्ष में उनकी कथित प्रेयसी सुनन्दा पुष्कर आ गईं हैं। सुनन्दा का कहना है कि शशि थुरूर एक ईमानदार और उसूलों पर चलने वाले इंसान हैं। मीडिया में आईं खबरों के अनुसार सुनन्दा इस वक्त दुबई में हैं और वे टीम में उनकी हिस्सेदारी में थुरूर की कोई भूमिका है। उन्होंने कहा कि वे पहले कोलकता नाईट राईडर्स से जुडना चाह रहीं थीं, और अब अपनी सेवाएं केिच्च की टीम को दे रहीं हैं। उधर शाहरूख खान इस बात का खण्डन कर रहे हैं कि सुनन्दा ने कभी उनसे जुडने की पेशकश की थी।
 
इस मामले का सबसे गम्भीरतम पक्ष यह है कि विपक्ष ने आरोप लगाया है कि आईपीएल की टीम को खरीदने के लिए भारत गणराज्य के मन्त्री शशि थुरूर ने अपने पद का इस्तेमाल किया और उसके एवज में मिलने वाली मेहनताने (रिश्वत) को उन्होंने अपनी होने वाली पित्न सुनन्दा की झोली में डलवा दिया। शशि थुरूर और सुनन्दा चौधरी दोनों ही आपस में एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं यह बात पूरी तरह स्थापित हो चकी है। इस लिहाज से अगर देखा जाए तो यह मामला एक मन्त्री द्वारा निजी लाभ के लिए पद के दुरूपयोग का है, नैतिकता के नाते प्रधानमन्त्री डॉ. मन मोहन सिंह को वापस लौटते ही तत्काल प्रभाव से थुरूर को पद से प्रथक कर देना चाहिए। कांग्रेस के पास यह एक अच्छा मौका है, थुरूर से पीछा छुडाने का।
 
यह मामला अब देश की सबसे बडी अदालत तक पहुंच चुका है। अधिवक्ता अजय अग्रवाल द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया है कि कोिच्च टीम को खरीदने के लिए कथित तौर पर हवाला के माध्यम से काले धन को इसमें शामिल किए जाने की आशंका है। अग्रवाल ने इस मामले में न्यायालय के विशेष जांच दल या फिर सीबीआई से इसे करवाने की गुहार लगाई है।
 
जानकारों का कहना है कि थुरूर मोदी विवाद के जरिए सियासी हिसाब किताब भी बराबर किए जा रहे हैं। इस विवाद के तार दरअसल कांग्रेस, भाजपा और राष्ट्रवादी कांग्रेस के क्रिकेट से जुडे नेताओं की बेटरी में जाकर ही मिल रहे हैं। इस विवाद को उर्जा वहीं से मिल रही है। कहा जा रहा है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के कुछ दिग्गजों ने मोदी को शह दी है। ये सभी कोिच्च की टीम की इतनी अधिक बोली को पचा नहीं पा रहे हैं। इन बिग गन्स का सीधा सम्बंध मुम्बई और अहमदाबाद के अनेक कार्पोरेट घरानों से है।
 
दूसरी ओर भाजपा के साथ मोदी की गलबहिंयां देखकर कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दे रही है। कहा जा रहा है कि केरल की टीम के साथ वहां के लोगों का भावनात्मक लगाव है। केरल में अगले साल विधानसभा चुनाव भी हैं। यही कारण है कि शशि थुरूर के द्वारा अत्त मचाने के बाद भी कांग्रेस उन्हें गोदी में ही खिला रही है। कांग्रेस को भय है कि कहीं कोिच्च टीम के विवाद से राज्य में कांग्रेस के खिलाफ माहौल न बन जाए जिसका खामियाजा उसे अगले चुनावों में उठाना पडे। इसी के मद्देनज़र कांग्रेस अध्यक्ष ने विदेश मन्त्री एम.एस.कृष्णा और कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला दोनों को 10 जनपथ बुला भेजा। इसके बाद सोनिया ने अपने तारणहार प्रणव मुखर्जी को तलब किया है। इनके बीच शशि थुरूर को लेकर क्या रणनीति तय हुई यह तो वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी।

पेंच के मामले में सख्त हुए जयराम रमेश

पेंच के मामले में सख्त हुए जयराम रमेश

नहीं लगने देंगे पेंच में पावर प्रोजेक्ट 

कमल नाथ और रमेश की टकराहट बढी

फोरलेन के बाद अब पावर प्लांट में फसाया फच्चर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 15 अप्रेल। केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्य मन्त्री जयराम रमेश और भूतल परिवहन मन्त्री जयराम रमेश के बीच चल रही तनातनी अब और बढती दिखाई दे रही है। पिछले कार्यकाल में तत्कालीन वाणिज्य और उद्योग मन्त्री कमल नाथ के अधीन वाणिज्य राज्य मन्त्री रहे जयराम रमेश के मन में उस कार्यकाल की कोई दुखद याद उन्हें आज भी साल रही है, तभी वे कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र मध्य प्रदेश के जिला छिन्दवाडा और सिवनी के तहत आने वाले पेंच नेशनल पार्क पर अपनी नज़रें गडाए हुए हैं।
राजधानी में पत्रकारों से रूबरू जयराम रमेश ने कहा कि वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय की नीति बहुत ही स्पष्ट है। एसी किसी परियोजना को अनुमति नहीं दी जाएगी जिसमें संरक्षित क्षेत्र के पानी का व्यवसायिक उपयोग संभावित हो। रूडयार्ड किपलिंग की जंगल बुक के मोगली की कर्मभूमि रही मध्य प्रदेश का पेंच नेशनल पार्क अब जयराम रमेश की आंख में खटक रहा है। गौरतलब है कि इस अभ्यरण का एक छोर कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिन्दवाडा तो दूसरा भगवान शिव के जिले सिवनी में है।
इस अभ्यारण के निकट प्रस्तावित विद्युत परियोजना के बारे में पूछे जाने पर जयराम रमेश कहते हैं कि अदाणी समूह की 1320 मेगावाट क्षमता की बिजली परियोजना प्रस्तावित है। उन्होंने पेंच संरक्षित क्षेत्र के पानी का व्यवसायिक इस्तेमाल हो सकने की संभावना को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनहोंन हिमाचल प्रदेश की प्रस्तावित उस योजना को पर्यावरण मंजूरी देने के आवेदन को अस्वीकार कर दिया है जिसमें संरक्षित क्षेत्र के पानी का व्यवसायिक उपयोग होना दर्शाया गया था।
जयराम रमेश ने जिन परियोजनाओं को अनुमति देने से इंकार किया है, उनमें गुजरात के जामनगर में पोशिट्रा बन्दरगाह के निर्माण के लिए गल्फ ऑफ कच्छ मेरीन नेशनल पार्क के हिस्सों को मांगा गया था, इसके अलावा हिमाचल के माजथल वाईल्ड लाईफ सेंचुरी में अंबुजा सीमेंट द्वारा पानी लेने के मामले, आंध्र में कोलुरू झील सेंचुरी इलाके की एक योजना शामिल है।
रमेश के करीबी सूत्रों का कहना है कि मनमोहन सिंह के पिछले कार्यकाल में वाणिज्य और उद्योग मन्त्री रहे कमल नाथ ने जयराम रमेश के अधिकारों में बहुत ज्यादा कटौती कर रखी थी। सूत्रों का कहना है कि रमेश के अधिकांश प्रस्तावों को नाथ द्वारा अस्वीकृत कर लौटा दिया जाता था। इतना ही नहीं अनेकों बार अधिकारियों के सामने भी जयराम रमेश को जलील होना पडा था। अपने मन में उस पीडा को सालों दबाए बैठे रमेश को इस बार भाग्य से वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय मिल गया है। गौरतलब है कि नाथ के पास यह मन्त्रालय नरसिंम्हाराव की सरकार के वक्त था। अब नाथ से खार खाए अधिकारी ही एक हाथ में लालटेन और एक हाथ में लाठी लेकर जयराम रमेश को कमल नाथ के खिलाफ रास्ता दिखा रहे हैं।
पिछले साल स्विर्णम चतुZभुज के अंग रहे उत्तर दक्षिण गलियारे में भी पेंच नेशनल पार्क को लेकर पर्यावरण का ही फच्चर फंसाया गया था। सूत्रों की मानें तो वन मन्त्रालय के अधिकारियों ने जयराम रमेश को बता दिया कि पेंच से होकर कान्हा तक के गलियारे में वन्य जीव विचरण करते हैं, और नक्शे में भी पेंच नेशनल पार्क को कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र का हिस्सा दर्शाया दिया गया है। फिर क्या था, जयराम रमेश नहा धोकर इस फोरलेन मार्ग के पीछे लग गए। सूत्रों के अनुसार अब पेंच का नाम आते ही जयराम रमेश के कान तक लाल हो जाते हैं और वे लाल बत्ती दिखाने के मार्ग ही खोजने में लग जाते हैं।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

कोबाल्ट हादसा बानाम आतंकियों की रिहर्सल

कोबाल्ट हादसा बानाम आतंकियों की रिहर्सल
हर पहलू पर बारीक नज़र जरूरी
5 अप्रेल को चेताया था शीला दीक्षित ने
(लिमटी खरे)

देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में गत दिनों हुए कोबाल्ट हादसे ने अनेक शंकाओं कुशंकाओं को जन्म दे दिया है। सरकार भले ही इसे बहुत गम्भीरता से न ले रही हो पर इसे गम्भीरता से लेना आवश्यक है। इसके हर पहलू पर बारीक और तीख्ी नज़र रखने की आवश्यक्ता है। कुछ समाचार पत्र इसे आतंकियों का ट्रायल की संज्ञा देने से नहीं चूक रहे हैं। देश की मौजूदा आन्तरिक हालत को देखकर इस आशंका को निर्मूल नहीं माना जा सकता है। वैसे दिनचर्या में अनेक खतरनाक हादसे होते रहते हैं, पर इसका भान तभी हो पाता है जब यह भयानक और विकृत रूप में हमारे सामने आता है।
दरअसल हिन्दुस्तान का सिस्टम बडा ही अजीब है। यहां कानून पर कानून बनते हैं, पर पालन सुनिश्चित नहीं होता। देश में बिना हेलमिट लगाए दो पहिया तो बिना सीट बेल्ट लगाए चार पहिया वाहन में बैठना या चलाना प्रतिबंधित है। देश के चुनिन्दा शहरों को छोड दिया जाए तो कमोबेश हर जगह इस कानून का उल्लंघन साफ तौर पर मिल जाएगा। इसी तरह सार्वजनिक स्थानों में धूम्रपान प्रतिबंधित होने के बावजूद भी सरेआम बीडी सिगरेट के छल्ले उडते नज़र आते हैं। इतना ही नहीं 18 साल से कम उम्र के बच्चों को बीडी सिगरेट शराब आदि का विक्रय न करने की ताकीद की गई है, पर घोषित अघोषित मयखानों में छोटू, मुन्ना, पप्पू, कल्लन आदि नाम के बच्चे बाकायदा साकी के रोल में नज़र आते हैं।

दिल्ली के मायापुरी इलाके में भी यही हुआ। रेडियोधर्मिता से लोगों को दूर रखने के लिए रेडियोधर्मी पदार्थों के निष्पादन के लिए अलग व्यवस्था और कडे नियम है, पर वे सब हाथी के मंहगे बिकने वाले दान्तों की तरह ही हैं। अभी स्पष्ट नहीं हो सका है कि आखिर उसमें क्या था जिससे पीडितों का शरीर काला पडने लगा। बताते हैं कि उसमें कोबाल्ट 60 था, जिसका उपयोग केंसर के इलाज के लिए किया जाता है। सवाल यह उठता है कि आखिर यह कोबाल्ट उस कबाड की दुकान तक पहुंचा कैसे।

दिल्ली वैसे भी बहुत ही संवेदनशील शहर है, यहां पुलिस हर पल चौकस रहती है, बावजूद इसके इस तरह के हादसे क्या चौकसी पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अकबर बीरबल की एक कहानी का जिकर यहां लाजिमी होगा। एक मर्तबा अकबर ने दरबारियों से कहा कि उन्होंने शाही बाग की सुरक्षा चाक चौबन्द कर दी है, वहां परिन्दा भी पर नहीं मार सकता। वहां से कोई अगर चोरी कर कुछ ले जाए तो बादशाह सलामत उसे ईनाम से नवाजेंगे। सारे दरबारी एक के बाद जोर अजमाइश करते रहे। जो भी चीज बाहर जाती उसको द्वारपाल अपनी पंजी में दर्ज कर देता। बीरबल के कहने पर एक साधारण आदमी बाग का कचरा बीनकर उसे बाहर ले जाता रहा। पंजी में कचरे का इन्द्राज होता रहा। सप्ताह बीतने पर बादशाह सलामत से बीरबल ने कहा कि उसने बाग से काफी कुछ चुरा लिया है। बादशाह चौंक गए। रजिस्टर तलब हुआ। बीरबल को बताया कि वहां से कुछ भी चोरी नहीं हुआ सब कुछ तो इसमें दर्ज है। बीरबल बोले बादशाह सलामत जान की सलामती हो तो अर्ज करूं। बादशाह ने इजाजत दी। बीरबल बोले हुजुर सात दिन में दो मर्तबा कचरा बाहर आया पर कचरे की ट्राली वापस नहीं गई। द्वारपाल ने कचरे की एंट्री की पर कचरा किसमें जा रहा था, यह नहीं लिखा सो चौदह कचरे की ट्रालिंया मैने चुरवा दीं। बादशाह बहुत प्रसन्न हुए और बीरबल को ढेर सारा ईनाम दिया। यही देश में हो रहा है कि सब उल्टा पुल्टा हो रहा है और कोई देख भी नहीं पा रहा है।

दिल्ली में जिस कोबाल्ट 60 के होने की बात की जा रही है, उसकी एक इकाई में 400 क्यूरी (रेडीएशन मापने की इकाई) होती है। इससे गामा किरणें निकलती हैं, और इसके लक्षण पांच से पन्द्रह मिनिट के अन्दर ही समझ में आने लगते हैं। अगर आरडी 200 से 500 हो तो एक सप्ताह में पीडित की मौत और 500 से 700 हो तो कुछ ही दिनों में मौत को गले लगा सकता है। अगर यह क्षमता 1000 तक पहुंच जाए तो दो दिन में ही काल कलवित कर सकता है इंसान को। वैसे रेडियोएक्टिविटी के प्रमुख स्त्रोत हैं, कोबाल्ट, रेडियम, यूरेनियम, प्लूटोनियम, आसेZनिक और पारा अर्थात मरकरी। इनमें से प्लूटोनियम, यूरेनियम, आसेZनिक और रेडियम का उपयोग परमाणु हथियार में होता है, अत: ये खुले बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। मरकरी भी प्रतिबंधित हो चुका है पर कोबाल्ट का सभी देशों में धडल्ले से उपयोग हो रहा है। कोबाल्ट का प्रयोग रेडियोथेरिपी के जरिए कैंसर के इलाज में, फुड उद्योग में प्रोसेसिंग के दौरान कीटाणु मारने में और उद्योगों में पाईप की इंटेंसिटी मापने के लिए किया जाता है।

कोबाल्ट 60 शरीर के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर इसका घातक असर होता है। वैसे कोबाल्ट 60 के मानव के शरीर के संपर्क में आने का सबसे बडा खतरा मेडिकल के टेस्ट और इसके इलाज के वक्त ही होता है। मेडिकल या औद्योगिक रेडिएशन के स्त्रोतों के गलत इस्तेमाल या रिसायकलिंग के दौरान जरा सी लापरवाही भी बहुत खतरनाक ही हो सकती है। यह धूल के कण, पानी या खाद्य समािग्रयों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकता है। कोबाल्ट 60 की सबसे बडी खासियत यह है कि यह तत्काल ही असर दिखाना आरम्भ कर देता है। 

यह खून और कोशिकाओं में अपनी पहुंच बनाकर लीवर, किडनी और हडि्डयों को अपनी जद में ले लेता है। इसका प्रभाव होने पर मरीज को उल्टी आना, दस्त होना, कभी कभी दस्त में खून का जाना, लगातार खून बहना, बालों का तेजी से गुच्छे के रूप में झडना, नाखूनों और त्वाचा भी काली पडने लगती है। कोबाल्ट 60 मानव शरीर के सिर की धमनियों में खराबी पैदा कर सकता है। मरीज को दौरा भी पड सकता है। हृदय की छोटी धमनियों में विसंगति पैदा कर अचानक दिल का दौरा पडवा सकता है। इसका सबसे पहले और तेज प्रभाव पेट में आन्त पर ही पडता है। इससे बोन मेरो और लाल और श्वेत रक्त कोशिकाओं में तेजी से कमी आती है। इससे प्रजनन अंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो सकते हैं, इससे स्थाई नपुंसकता तक आने की संभावना रहती है। कोबाल्ट 60 से जुडी प्रमुख घटनाओं में 1992 में चीन में इसके रेडिएशन से तीन लोग, 1996 में कोस्टिारिका में सात, 2000 में थईलेण्ड में 3 असैा इसी साल पनामा में पांच लोग मारे जा चुके हैं।

यहां मजे की बात यह है कि इसी माह पांच अप्रेल को ही दिल्ली की सत्ता पर तीसरी बार काबिज हुईं श्रीमति शीला दीक्षित ने दिल्ली सचिवालय में एक प्रोग्राम में शिरकत करते हुए 16 ई कचरा संकलन बाक्स और 42 पेपर रिसाईिक्लंग मशीनों का वितरण किया था। इसी दौरान उन्होंने दिल्ली वासियों को ताकीद करते हुए कहा था कि अपना ई कचरा कबाडी को न बेचें, अगर यह पाया गया तो पांच साल की कैद और एक लाख रूपए के जुर्माने का प्रावधान किया जा रहा है। शीला दीक्षित ने कहा ही था और चार दिनों बाद उनकी आशंका सच्चाई में तब्दील हो गई।

वैसे इस मामले में भी गम्भीरता से विचार आवश्यक है कि कहीं यह कोबाल्ट 60 किसी षणयन्त्र के तहत मायापुरी की कबाड की दुकान में पहुंचाया गया हो। मीडिया की इस आशंका को सिरे से खारिज करना उचित नहीं होगा कि आतंक फैलाने के लिए यह दहशतगर्दों का ट्रायल तो नहीं। अगर एसा है तो आने वाले समय में आतंक का पर्याय बन चुके आतंकवादियों से निपटना देश की आन्तरिक सुरक्षा सम्भाले जवानों के लिए बहुत बडी चुनौती ही साबित होने वाली है।

उमाश्री के लिए गडकरी की पेशानी पर छलकता पसीना

उमाश्री के लिए गडकरी की पेशानी पर छलकता पसीना
घर वापसी के लिए भाजपा के सुप्रीम कमाण्डर को लगाना पड रहा है एडी चोटी का जोर
उमाश्री के मसले के चलते राज्यों के भाजपाध्यक्षों की ताजपोशी में हो रहा विलंब
भारती को रोकने बुने जा रहे ताने बाने
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 14 अप्रेल। मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमन्त्री रहीं उमाश्री भारती को भाजपा में वापस लेने के लिए भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी के हाथ पांव फूलने लगे हैं। इस मसले के उलझने के कारण भाजपाध्यक्ष द्वारा अनेक बडे राज्यों के अध्यक्षों के नामों को अन्तिम रूप नहीं दे पा रहे हैं। उमाश्री की घर वापसी को लेकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व दो खेमों में बंटा साफ दिखाई पड रहा है।

भाजपा का एक धडा उन्हें वापस पार्टी में लाकर उनका उपयोग उत्तर प्रदेश में करने की वकालत कर रहा है तो दूसरा उनकी वापसी से पार्टी को होने वाले नुकसान की बात कहकर अपनी टांग फसाए हुए है। उमाश्री के विरोध करने वाले लोगों में मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश भाजपाध्यक्ष नरेन्द्र तोमर, पूर्व मुख्यमन्त्री बाबू लाल गौर के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर संघ और एल.के.आडवाणी की कीर्तन मण्डली चाह रही है कि उमाश्री भारती को वापस भाजपा में लाकर उनका उपयोग उत्तर प्रदेश में पार्टी के गिरते जनाधार को समेटने के लिए किया जाए।

हालात देखकर लगने लगा है कि भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी अब संघ और आडवाणी की जुगलबन्दी तथा भाजपा के दूसरे कद्दावर नेताओं के बीच दो पाटों में फंसकर रह गए हैं। वे चाहकर भी न तो अपनी टीम के ही लोगों को नाखुश करने का साहस जुटा पा रहे हैं और न ही संघ या आडवाणी से पंगा लेने की बात सोच पा रहे हैं। उधर उमाश्री के विरोधियों ने ``वोट फार कैश`` के समय उनके द्वारा कथित तौर पर जारी की गई एक सीडी को भी उछाला जा रहा है।

इसी उहापोह के चलते मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे बडे सूबों के प्रदेशाध्यक्ष के नाम अभी भी पोटली में ही बन्द हैं। गडकरी के करीबी सूत्रों के अनुसार इन दिनों गडकरी के गले की फांस बनकर रह गया है उमाश्री भारती की घर वापसी का मुद्दा। सूत्रों ने संकेत दिए कि गोविन्दाचार्य और उमाश्री भारती के द्वारा अपनी अपनी बनाई पार्टी से त्यागपत्र इसी शर्त पर दिया गया था, कि पार्टी के शीर्ष नेता एकराय होकर उनकी घर वापसी के मार्ग प्रशस्त करेंगे। वस्तुत: एसा हुआ नहीं। जैसे ही यह खबर फिजां में फैली कि उमाश्री भारती को भाजपा में वापस लिया जा रहा है, वैसे ही उनके विरोधियों ने रायता फैलाना आरम्भ कर दिया। स्थितियों को भांपते हुए गोविन्दाचार्य ने तो गडकरी पर निशाना साधते हुए अपने आक्रमक तेवरों से भाजपा और संघ नेतृत्व को अपनी मंशा जता दी, किन्तु उमाश्री अभी भी आस में बैठी हुईं हैं कि उनकी घर वापसी के मार्ग जल्द ही प्रशस्त होने वाले हैं।

उमाश्री के करीबी सूत्रों का कहना है कि उमाश्री का गुस्सा इन दिनों सातवें आसमान पर है, वे भाजपा के शीर्ष नेताओं की वादाखिलाफी से खासी नाराज लग रहीं हैं। सूत्रों ने कहा कि अगर जल्द ही सब कुछ ठीक ठाक नहीं हुआ तो भाजपा के शीर्ष नेताओं को उमाश्री के कोप का भाजन बनना पड सकता है। उधर कहा जा रहा है कि उमा विरोधी नेताओं ने नई रणनीति अपनाकर भाजपा के सुप्रीम कमाण्डर नितिन गडकरी से कहा है कि वे फिलहाल वेट एण्ड वाच की नीति अपनाएं ताकि उमाश्री की सहन शक्ति की भी परीक्षा हो सके। उनके विरोधी जानते हैं कि शार्ट टेंपर्ड उमाश्री जल्द ही फट पडेंगी और उनका काम आसान हो जाएगा।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

हिन्‍दी ब्‍लॉगर टंकी पुराण प्रतियोगिता का आयोजन

हिन्‍दी ब्‍लॉगर टंकी पुराण प्रतियोगिता का आयोजन


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आप स्‍वयं को इस सच्‍चा हिन्‍दी ब्‍लॉगर स्‍वीकार करते हैं तो इस प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी भावना को साबित करने का सुनहरा अवसर है।

इस प्रतियोगिता में ब्‍लॉगर और नॉन ब्‍लॉगर सभी भाग ले सकते हैं परन्‍तु इससे भाग कोई भी नहीं सकता। चाहे वो इस प्रतियोगिता के आयोजन का समर्थन करते हों या नहीं करते हों। जिस प्रकार समर्थन करने के लिए इस प्रतियोगिता में भाग लेना अनिवार्य है उसी प्रकार विरोध करने के लिए भी भाग लेना अनिवार्य है। इसमें भाग लेने से ही आपकी सहमति और विरोध दर्ज किया जाएगा । पोस्‍ट लगाते समय क्रमवार पहले इन प्रश्‍नों के उत्‍तर दें और बाद में सार-संक्षेप और निष्‍कर्ष प्रस्‍तुत करें :-


1. टंकी का प्रादुर्भाव किसने किया
2. टंकी से प्रभावित पहला ब्‍लॉगर
3. टंकी का मौलिक आइडिया किसका था
4. टंकी पर चढ़ने वाले ब्‍लॉगरों की सूची
5. टंकी से उतारने वाले ब्‍लॉगरों की सूची
6. टंकी पर चढ़े ऐसे कोई ब्‍लॉगर जो चढ़ने के बाद उतरे ही न हों
7. टंकी पर सामूहिक रूप में ब्‍लॉगर कभी चढ़े अथवा नहीं
8. टंकी के वे चित्र जो इस दौरान चर्चा में आए
9. टंकी ने जिन ब्‍लॉगर और ब्‍लॉगों को लोकप्रियता प्रदान की
10. टंकी की हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में उपादेयता पर 500 शब्‍दों में एक सारगर्भित विवेचन प्रस्‍तुत कीजिए।


इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए टिप्‍पणी रूपी सीढ़ी मात्र तीन दिन के बाद हटा ली जाएगी क्‍योंकि इस पर टिप्‍पणी नहीं, अपने अपने ब्‍लॉग पर इस प्रतियोगिता में भाग लेने का संदर्भ देते हुए एक पूरी हैवी ड्यूटी पोस्‍ट लगाना अनिवार्य है। जिनकी सूचना avinashvachaspati@gmail.com पर भेज दी जाए। जिनका लिंक http://nukkadh.com/ पर दिया जायेगा और जब न्‍यूनतम एक सौ एक पोस्‍टें अधिकतम की कोई सीमा नहीं है, इस संबंध में प्रकाशित हो जाएंगी तब एक वोट बक्‍सा खोला जाएगा उस वोटिंग के अनुसार जिसकी भी प्रविष्टि/पोस्‍ट सर्वोत्‍तम पाई जाएगी। उस ब्‍लॉगर के ऑनलाईन बैंक खाते में इनाम की राशि जमा कराई जाएगी। इस राशि के प्रायोजक की तलाश भी साथ-साथ चलती रहेगी। यदि सबकी सहमति रही तो इस संबंध में एक टंकी प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा जिसे कि भाग लेने वाले सभी ब्‍लॉगर अपने-अपने ब्‍लॉग पर लगा सकेंगे।
अंतिम तिथि इसमें खोजबीन के श्रम को देखते हुए पूरे एक महीने की घोषित की जा रही है जिसे ब्‍लॉगरों की मांग पर बढ़ाया और घटाया भी जा सकता है। यदि कोई विवाद होते हैं तो उन सभी का निपटारा दिल्‍ली में हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के मिलन समारोह में ही किया जाएगा।
इस प्रतियोगिता के संबंध में कोई सुझाव स्‍वीकार्य नहीं होंगे और इसमें लिए गए निर्णयों में किसी का हस्‍तक्षेप लागू नहीं होगा। सभी नियम परिवर्तनशील हैं। इस प्रतियोगिता को चालू रखने, रद्द करने संबंधी सभी अधिकार सुरक्षित हैं और इन पर कोई दावा स्‍वीकार नहीं किया जाएगा।

उमाश्री की वापसी पर असमंजस के बादल बरकरार

उमाश्री की वापसी पर असमंजस के बादल बरकरार
 
मध्य प्रदेश की राजनीति बनी दीवार 
 
नहीं हुई वापसी तो फट सकता है साध्वी का गुस्सा
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 13 अप्रेल। कभी भारतीय जनता पार्टी की फायर ब्राण्ड लीडर मानी जाने वाली उमाश्री भारती के लिए अब भाजपा में वापसी की राह बहुत आसान नहीं दिख रही है। भले ही राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी द्वारा सुषमा स्वराज को रोकने की गरज से उमाश्री को वापस लाने का स्वांग रचा जा रहा हो पर हाल ही में अस्तित्व में आई शिवराज सिंह चौहान और सुषमा स्वराज की जुगलबन्दी के चलते उनकी हर चाल नाकाम होती ही दिख रही है।
 
भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी, संसदीय दल के अध्यक्ष एल.के.आडवाणी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली, पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह आदि की उपस्थिति में भाजपा मुख्यालय 11 आशोक रोड पर हुई बैठक में भी इस सम्बंध में कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि उमाश्री भारती जैसी बडबोली नेता को भाजपा में वापस लेने को लेकर उभरे मतभेद गहरा चुके हैं। उमा विरोधी गुट ने अपनी भावनाओं से पार्टी आलाकमान को आवगत भी करा दिया है। राजग के पीएम इन वेटिग एल.के.आडवाणी की मण्डली द्वारा उमाश्री की वापसी की पुरजोर वकालत के बावजूद उनके विरोधियों ने आलाकमान को साफ कह दिया है कि अगर उमाश्री की वापसी होती है, तो वे उनके त्यागपत्र स्वीकार करने तैयार रहें। दरअसल उमाश्री ने भाजपा से निकाले जाने पर अटल बिहारी बाजपेयी और एल.के.आडवाणी के खिलाफ जिस तरह की अनर्गल बयान बाजी की थी, उसे ही उनके विरोधी ढाल बनाकर इस्तेमाल कर रहे हैं।
 
सूत्रों ने आगे कहा कि उमाश्री की वापसी की राह में सबसे बडा रोडा दल की मध्य प्रदेश इकाई के द्वारा लगाया जा रहा है। उन्होंने यहां तक बताया कि सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान ने तो साफ कह दिया है कि अगर उमाश्री को भाजपा में वापस लिया जाता है तो वे तत्काल ही त्यागपत्र दे देंगे। उधर मध्य प्रदेश भाजपा इकाई के अध्यक्ष नरेन्द्र तोमर ने भी उमा के वापस न आने की वकालत की है।
 
उमा विरोधी इस बात को भी हवा दे रहे हैं कि 2003 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने माईनस उमाश्री बहुमत हासिल किया है। इतना ही नहीं भाजपा ने पहली बार उन इलाकों में भी परचम लहराया है जहां लोधी बाहुल्य जनसंख्या है। उधर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष द्वारा विदिशा से लोकसभा चुनाव जीतकर इस सूबे को अपनी कर्मभूमि बना लिया है। इस तरह वे भी परोक्ष तौर पर उमाश्री के खिलाफ झण्डा उठाए खडी नज़र आ रहीं हैं। सुषमा के सुर में सुर मिलाने वालों में अब राज्य के प्रभारी महासचिव अनन्त कुमार भी आ खडे हुए हैं।

बढता ही जा रहा है लाल गलियारा 350 वी पोस्ट

देश को परिपक्व गृह मन्त्री की दरकार - - - (4)
   
350 वी पोस्ट

बढता ही जा रहा है लाल गलियारा 
उत्तर भारत में नक्सलियों की बढ रही है पैठ
 
(लिमटी खरे)

भाजपा के नए अध्यक्ष का यह कहना कि नक्सलवाद की पैठ पशुपतिनाथ से लेकर तिरूपति तक है, को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। आज के परिदृश्य को देखकर लगने लगा है कि नक्सलवाद का जहर आधे से अधिक हिस्से को लकवाग्रस्त कर चुका है और देश प्रदेश के शासक नीरो की तरह चैन की बंसी बजा रहे हैं, मानो कुछ हुआ ही न हो। एक के बाद एक जवानों को मौत के घाट उतारा जा रहा है, और देश के शासक कह अपनी भूल मानकर ही कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं। सबसे बडे विपक्षी दल का खिताब हासिल करने वाली भाजपा ने भी इस मामले में एकाध बयान जारी कर अपना कर्म पूरा कर लिया है। जनता मरती है, तो मरती रहे हम तो मलाई काटेंगे की तर्ज पर शासक अपने आवाम का ख्याल रख रही है, जो निन्दनीय ही कहा जाएगा।
 
पहले तो पश्चिम बंगाल, बिहार, उडीसा, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीगढ, आंध्र प्रदेश जैसे सूबों में ही नक्सलवाद का आतंक पसरा हुआ था, अब यह लाल गलियारा तेजी से बढ रहा है। देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए नासूर बन चुकी नक्सली गतिविधयों की उत्ताखण्ड, दिल्ली, पंजाब आदि सूबों में पदचाप सुनाई देने के बाद भी सरकारें सो ही रही हैं। सरकार की कुंभकणीZय निन्द्रा की बानगी था 2006 में 8 और 9 नवंबर को दिल्ली में हुआ नक्सली सम्मेलन। इस दौरान देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में बांटे गए पर्चे और पोस्टर्स में साफ किया गया था कि संसदीय लोकतन्त्र बहुत बडा फ्राड है और इसको समाप्त करने के लिए सशस्त्र क्रान्ति ही इकलौता विकल्प हो सकती है।
 
गृह मन्त्रालय के सूत्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि नक्सलियों ने बहुत ही कम समय में पशुपतिनाथ से लेकर तिरूपति तक लाल गलियारे की रेखा खींची जा चुकी है। सूत्रों की मानें तो मार्च 2007 तक नक्सलवादियों ने अपनी गतिविधियां केरल, तमिलनाडू, कर्नाटक में भी बढा लीं थीं। इतना गृह मन्त्रालय को मिलने वाली गुप्तचर सूचनाओं के बावजूद भी तत्कालीन गृह मन्त्री शिवराज पाटिल देश की आन्तरिक सुरक्षा अभैद्य ही होने का दावा करते रहे।
 
नक्सलवाद का गढ बन चुके छत्तीसगढ के बस्तर, दन्तेवाडा, बीजापुर, नारायणपुर, कांकेर, राजनान्दगांव सहित अनेक जिलों के लगभग तीन हजार गांव इसकी चपेट में हैं। इस सूबें में लगभग 15 हजार किलोमीटर के दायरे में पसरी है, नक्सलियों की सल्तनत। सूबे के आला सूत्रों का कहना है कि छत्तीसगढ के हालात इतने भयावह हैं कि अनेक इलाकों में शाम पांच बजे के बाद कोई घटना होने पर पुलिस को घटनास्थल पर जाने की मनाही की गई है। अनेक थाना क्षेत्रों में तो नक्सलियों से पुलिस इतनी खौफजदा है कि वह वदीZ के बजाए सिविल यूनीफार्म में ही रहकर अपना काम चलाती है। इतना ही नहीं अतिसंवेदनशील थाना क्षेत्रों में तो पुलिस को थाने से अकेले निकलने पर भी मनाही ही है। सूबे में बडे नक्सलियों नेताओं में कोसा उर्फ बीकेएस रेड्डी का नाम सबसे उपर है।
 
नक्सलवाद को जन्म देने वाले पश्चिम बंगाल में हालात बहुत ही नाजुक हैं। यहां नेता किशनजी खुद प्रेस कांफ्रेंस करते हैं पर अपना चेहरा नहीं दिखाते हैं। इसी तरह झारखण्ड में 18 से अधिक जिलों में नक्सल आतंक गरज रहा है। यहां गणपति और किसन वैंकटेशराव उर्फZ किसन दा का जलजला कायम है। इसी तरह आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश में भी इनका आतंक पसरा हुआ है। मध्य प्रदेश के बालाघाट के साथ ही साथ मण्डला और डिण्डोरी को इन्होंने अपने कब्जे में ले रखा है। राज्य में हालात इतने सगीन हैं कि बालाघाट में शासन द्वारा एक पुलिस महानिरीक्षक स्तर के अधिकारी को तैनात कर रखा है। पहले इसका मुख्यालय यहां से ढाई सौ किलोमीटर दूर जबलपुर में रखा गया था फिर इसे बालाघाट स्थानान्तरित कर दिया गया था। नौ साल पहले राज्य के परिवहन मन्त्री लिखीराम कांवरे की गला रेतकर की गई हत्या का प्रमुख आरोपी सूरज तेकाम यहां का सर्वेसर्वा है।
(क्रमश: जारी)

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

राजनाथ चुनेंगे उमा की राह के शूल

राजनाथ चुनेंगे उमा की राह के शूल

उमा की राह के रोडों को मनाएंगे राजनाथ 

यूपी के राजनाथ शिवराज को बता रहे कि यूपी में बडा नेता नहीं

(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली 12 अपे्रल। सुषमा स्वराज का कद कम करने की ठान चुके राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी ने अब उमाश्री भारती की भाजपा में वापसी के मार्ग प्रशस्त करने के लिए भाजपा के पूर्व निजाम राजनाथ सिंह के कांधे पर जवाबदारी सौंपी है। राजनाथ अब उमा के मार्ग के शूल न केवल उखाडने का काम करेंगे वरन उनकी वापसी के लिए रेड कारपेट भी बिछाएंगे।
 
गौरतलब होगा कि लोकसभा चुनावों के दौरान उमाश्री भारती ने एल.के.आडवाणी के पक्ष में धुरंधर बयानबाजी कर जता दिया था कि वे जल्द ही भाजपा में वापस आ सकतीं हैं। आडवाणी के करीबी सूत्रों का कहना है कि लोेकसभा चुनावों के दौरान ही आडवाणी ने उमाश्री को भाजपा में वापस आने का प्रस्ताव दिया था किन्तु संकोचवश उमाश्री ने उसे सविनय ठुकरा दिया था। उधर संघ के भरोसेमन्द सूत्रों का कहना है कि अब संघ के आर्थिक चिन्तक गुरूमुूर्ति ने उमाश्री को वापस लाने की कवायद आरम्भ की है। माना जा रहा है कि आडवाणी की इच्छा पूरी करने की गरज से गुरूमूर्ति यह काम कर रहे हैं। गुरूमूर्ति के प्रयासों के चलते ही दो बार नागपुर में तो एक बार दिल्ली में उमाश्री और  मोहन भागवत के बीच तीन दौर की बातचीत भी हो चुकी है।
 
संघ के सूत्र बताते हैं कि मध्य प्रदेश में तैनात संघ के कारिन्दो और उमाश्री के बीच खुदी खाई ही उमाश्री की वापसी में रोढा बन रही है। सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपाध्यक्ष नरेन्द्र तोमर इस दुखती नब्ज को भांप गए हैं और उन्होंने भी संघ के कारिन्दों के सुर में ही राग मल्हार गाना आरम्भ कर दिया है। सारे समीकरण के बाद अब राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी ने नया पत्ता फेंका है। उन्होंने नितिन गडकरी को मशविरा दिया है कि उमा की राह के कांटे चुनने का काम पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सौंपा जाए।
 
नितिन गडकरी भी उमाश्री भारती की घर वापसी के हिमायती हैं। अत: उन्होंने आडवाणी की राय से इत्तेफाक रखते हुए पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह को काम पर लगा दिया है। बताया जाता है कि राजनाथ सिंह ने इस मामले में शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र तोमर से दो दौर की टेलीफोनिक चर्चा भी कर ली है। मजे की बात तो यह है कि भाजपाध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश से हैं, और वे शिवराज सिंह चौहन और नरेन्द्र तोमर को मसझा रहे हैं क यूपी में कोई बडा नेता नहीं है, अत: उत्तर प्रदेश को मद्देनज़र उमाश्री भारती की घर वापसी बहुत जरूरी है।
 
उधर भाजपा मुख्यालय में चल रही चर्चाओं पर अगर यकीन किया जाए तो भाजपा के अनेक नेता चाहते हैं कि उमाश्री भारती को मध्य प्रदेश के बडे नेताओं के साथ बिठाकर बात करना चाहिए और उमा उन नेताओं को यकीन दिलाएं कि वे मध्य प्रदेश की राजनीति में कोई दखल नहीं देंगी तब ही उमाश्री की राह आसान हो सकती है, वरना एमपी में बैठे संघ और भाजपा के नेता उनकी घर वापसी की राह में कांटे बोने से बाज नहीं आने वाले।

सत्तर फीसदी हिस्से में फैल चुका है नक्सलवाद का कैंसर

देश को परिपक्व गृह मन्त्री की दरकार - - - (3)
सत्तर फीसदी हिस्से में फैल चुका है नक्सलवाद का कैंसर
(लिमटी खरे)
नक्सलवाद पर जारी बहस में सरकार का पक्ष चाहे जो भी हो मीडिया पर्सन की हैसियत से जनता जनार्दन के समक्ष सच्चाई रखना और सरकार को जगाने का प्रयास करना निश्चित तौर पर हमारी नैतिकता का अंग है। इसी लिहाज से हम नक्सलवाद के जहर के बारे में जितनी तफ्तीश कर चुके हैं, उसे जनता और सरकार के सामने लाना हमारा फर्ज है। 1967 में आरम्भ हुआ और नब्बे के दशक में तेज हुआ नक्सवाद आज देश के सत्तर फीसदी हिस्से को अपनी जद में ले चुका है। देश के मानचित्र पर अगर देखा जाए तो हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उडीसा, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक इसकी चपेट में हैं। इसके अलावा अलगाववाद की अगर बात की जाए तो उसम, मणिपुर, नागालैण्ड, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम इसकी जद में हैं। वामपन्थ उग्रवाद, उत्तर पूर्वी अलगाववाद और जम्मू काश्मीर की आन्तरिक समस्या सरकार की पेशानी पर पसीने की बून्दे छलका रही है।
देश भर में लगभग 22 हजार केडर में फैले ये नक्सलवादी और माओवादी संगठन देश की जडों में मठा डालने का ही प्रयास कर रहे हैं। झारखण्ड पर अगर नज़र डाली जाए तो समूचा झारखण्ड माओवादियों की बर्बरता की चपेट में है। झारखण्ड के 16 जिले माओवादी गतिविधियों का केन्द्र बन चुके हैं। यहां प्रमुख तौर पर छ: संगठन सक्रिय हैं। इसमें तृतिया प्रस्तुति कमेटी, सीपीआई (माओवाद), संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा, द पिपुल्स लिबे्रशन फ्रंट ऑफ इण्डिया, झारखण्ड प्रस्तुति समिति और झारखण्ड जनसंघर्ष मुक्ति मोर्चा प्रमुख हैं।
2001 में संयुक्त मध्यप्रदेश से प्रथक होकर अस्तित्व में आए छत्तीसगढ को नक्सलवादियों ने अपना गढ बनाया हुआ है। दरअसल संयुक्त मध्य प्रदेश में राजधानी भोपाल से बस्तर तक सडक मार्ग से पहुंचने में तीन दिन लग जाते थे, तो सरकारी इमदाद किस कदर यहां बटती होगी इस बात का अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है। जनता को सरकारी नुमाईन्दो द्वारा प्रताडित किए जाने का लाभ यहां सबसे अधिक नक्सलियों ने उठाया है। पिछले तीस सालों में खनिज संपदा के धनी और धान का कटोरा कहे जाने वाले इस सूबे की नक्सलवादियों ने आर्थिक रीढ तोड कर रख दी है। आज आलम यह है कि प्रदेश के लगभग एक दर्जन जिलों के दो सौ से अधिक पुलिस थानों में नक्सली आतंक पसरा हुआ है। सूबे के बस्तर, दन्तेवाडा, कांकेर, बलरामपुर, सरगुजा, कवर्धा आदि जिलों में नक्सलवादियों की जडें बहुत हद तक मजबूत हो चुकी हैं।
इसी तरह मध्य प्रदेश में बालाघाट, मण्डला और डिण्डोरी जिलों में जब तब नक्सली पदचाप सुनाई दे जाती है। इसके अलावा अब सिवनी, छिन्दवाडा, जबलपुर, शहडोल, बैतूल, रीवा, सतना, सीधी आदि जिलों को भी नक्सलवादियों ने अपने निशाने पर ले लिया है। बालाघाट जिले में प्रदेश के पूर्व परिवहन मन्त्री लिखी राम कांवरे को उनके मन्त्री रहते हुए उन्ही के घर पर नक्सलियों ने गला रेतकर मार डाला था। इसके अलावा और भी अनेक वारदातें नक्सलवादियों ने यहां की हैं।
उडीसा सूबे में भुखमरी को नक्सलवादियों ने अपना प्रमुख हथियार बनाया है। आज समूचा उडीसा लाल रंग में रंग चुका है। सूबे के 17 जिलों में नक्सल और माओवादियों का कहर व्याप्त है। मलकानगिरी, कोरापुट, रायगढ, गजपति जिलों में माओवादियों की पकड देखते ही बनती है। साथ ही कंधमाल में इनका नेटवर्क बहुत ही जबर्दस्त है। पश्चिमी उडीसा के सुन्दरगढ, देवगढ, संभलपुर, बांध और अंगुल में नक्लवादियों ने अपनी सरकार चला रखी है। कहा जा सकता है कि समूचा उडीसा नक्सलवाद और माओवाद से बुरी तरह ग्रस्त है।
महाराष्ट्र के अनेक जिलों में ये कहर बरपा रहे हैं। सूबे का गढचिरौली इनका गढ है। इसके अलावा इनकी सल्तनत चंन्द्रपुर, गोन्दिया, भण्डारा, नान्देड, नागपुर, यवतमाल के साथ ही साथ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और आंध्र प्रदेश की सीमा से सटे गांवों में फैली हुई है। महाराष्ट्र में आए दिन नक्सलवादी गतिविधियों की खबरें आना आम बात हो गई। विशेषकर विदर्भ के अनेक इलाकों में इनका फैलाव देखकर लगता है कि आने वाले समय में ये समूचे महाराष्ट्र को अपने कब्जे में ले सकते हैं।
रही बात बिहार की तो बिहार में नक्सलवाद और माओवाद ने अपना घर बनाकर रखा हुआ है। यहां लगभग 20 जिलों में नक्सलवाद का प्रभाव अच्छा खासा माना जा सकता है। पटना, गया, औरंगाबाद, अरवल, भभुआ, रोहतास, जहानाबाद, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चंपारण, शिवहर, सीतामढी, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, बेगुनसराय, वैशाल, सहरसा और उत्तर प्रदेश के सटे जिलों में नक्सलवाद की गूंज सुनाई देती है।
आंध्र प्रदेश के दण्डकारण्य क्षेत्र में इनका खतरा बना हुआ है। सूबे के विशाखापट्टनम, खम्माम, विजयानगरम, पूर्वी गोदावरी आदि जिलों में इनका नेटवर्क बहुत ही मजबूत है। आंध्र प्रदेश के 93 झारखण्ड के 85, छत्तीसगढ के 81, , बिहार के 34, उडीसा के 22, महाराष्ट्र के 14, पश्चिम बंगाल के 12, उत्तर प्रदेश के 7, कर्नाटक के 6, मध्य प्रदेश के 4, केरल और हरियाणा के दो दो थाने इसकी चपेट में हैं। इस तरह देश के लगभग चार सौ थाने इसकी जद में हैं।
वामपन्थी उग्रवाद के मामले में अगर देखा जाए तो 2004 से 2008 तक 842 सुरक्षा बल के जवान, 1375 आम नागरिकों के साथ 990 नक्सली मारे गए थे। इसी तरह उत्तर पूवी्र अलगाव वाद में 335 सुरक्षा बल के जवान, 1614 आम नागरिक, 4079 आतंकवादी या तो पकडे गए या फिर पकडे गए। 703 सुरक्षा बल, 2011 आम नागरिक और 2844 आतंकवादी मारे गए। उत्तर पूवी अलगाव वाद की आग में असम, मणिपुर, नागालेण्ड, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम आदि बुरी तरह झुलस गए हैं।
असम चूंकि बंग्लादेश और भूटान की सीमा से सटा हुआ है, अत: यहां अलगाववाद की बयार बारह माह चौबीसों घंटे बहती रहती है। सालों से यह सूबा हिंसा का दंश झेल रहा है। इस प्रदेश में उल्फा, एनडीएफबी जैसे अलगाव वादी संगठन फल फूल रहे हैं। मणिपुर में पीएलए, यूएनएलएफ, पीआरईपीएके, तो नागालेण्ड में एनएससीएन, आईएम, एनएससीएम, त्रिपुरा में एनएलएफटी, एटीटीएफ, मेघालय में एएनवीसी, एचएनएलसी, और मिजोरम में एचपीसी (डी), बीएनएलएफ पूरी तरह सक्रिय नज़र आ रहे हैं।
(क्रमश: जारी)

सत्ता के घोषित अघोषित केन्द्र आमने सामने

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
सत्ता के घोषित अघोषित केन्द्र आमने सामने
देश में सत्ता के घोषित केन्द्र (प्रधानमन्त्री डॉ. मन मोहन सिंह) और अघोषित केन्द्र (कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी) के बीच इन दिनों रार ठनती दिखाई दे रही है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है। नेताओं और अफसरान की जुगलबन्दी की पोल नित ही इससे खुलने से आतंक बरपा है। इसमें बदलाव को लेकर 07 रेसकोर्स रोड और 10 जनपथ के बीच तलवारें खिचती दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी चाहतीं हैं कि सूचना के अधिकार कानून में बदलाव की अभी आवश्यक्ता नहीं है। सोनिया के करीबी सूत्रों ने बताया कि बीते साल 10 नवंबर को प्रधानमन्त्री को लिखे खत में सोनिया ने साफ कहा है कि अभी यह कानून महज चार साल पुराना ही है। इसमें अभी बदलाव की गुंजाईश नहीं है, जरूरत इस बात की है कि इसके मूल उद्देश्यों पर कडाई कायम रहे। उधर प्रधानमन्त्री कार्यालय (पीएमओ) के सूत्रों ने बताया कि 24 दिसम्बर को प्रधानमन्त्री ने सोनिया को जवाबी खत लिखा जिसमें कहा गया है कि आरटीआई कानून में बदलाव के बिना कुछ होने वाला नहीं है। इसमें मुख्य सूचना आयुक्त का पद अचानक रिक्त होने की दशा में कोई वैकल्पिक प्रावधान नहीं है, इसके साथ ही साथ इसके लिए पीठ के गठन का भी कहीं उल्लेख नहीं है। कुल मिलाकर सोनिया गांधी और मनमोहन दोनों ही एक दूसरे को आईना दिखाने में लगे हैं कि किस तरह बिना होमवर्क के सोनिया की टीम के मैनेजर मामला पकाते हैं और जबरिया सरदार मनमोहन सिंह को उसे लागू करने को कहते हैं, दूसरी ओर सोनिया भी सिंह को जता रहीं हैं कि अभी भी सत्ता की चाभी उन्हीं के कमरबन्द में खुसी हुई है।
टि्वट टि्वट से बाज नहीं आ रहे थुरूर
सोशल नेटविर्कंग वेवसाईट के दीवाने हो चुके भारत गणराज्य के विदेश राज्यमन्त्री शशि थुरूर हैं कि अपने टि्वटर के पथ को छोडना ही नहीं चाह रहे हैं। लाख लानत मलानत झेलने के बाद भी वे अपनी मनमानी पर पूरी तरह उतारू हैं। वे अपने इस कृत्य को पूरी तरह सही ठहराने में कोई कसर भी नहीं रख छोड रहे हैं। देश के हृदय प्रदेश भोपाल में वन प्रबंधन संस्थान के एक समारोह में गुलामी के लबादे को उतार फेंकने के बाद फिर शशि थुरूर चर्चा में आ गए हैं। उन्होंने इसमें भी अपनी टिप्पणी दे डाली है। बकौल शशि थुरूर, जब तक गाडन का इण्डियन वर्जन (भारतीय संस्करण) तैयार नहीं हो जाता, तब कि इमें वेस्टर्न वर्जन (पश्चिमी संस्करण) पहनने में कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए। इतना ही नहीं वे तो कहते हैं कि वे दीक्षात समारोहों में इस तरह के गाउन अवश्य ही पहनेंगे। अपनी जिन्दगी का सत्तर फीसदी समय पश्चिमी देशों में बिताने वाले शशि थुरूर के दिल दिमाग से भातरीय संस्कृति पूरी तरह विस्मृत हो गई लगता है, तभी वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खादी के परिधानों को भूल चुके हैं। वैसे भी क्या जरूरत है लबादे के हिन्दुस्तानी संस्करण की। हम अपनी लाईन खुद खींचें न, क्यों खिची खिचाई लाईन से अपनी तुलना करे। अब किया भी क्या जा सकता है, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी भी इटली मूल की जो ठहरीं जिन्हें भारतीय संस्कृति का बहुत ज्यादा अन्दाजा नहीं है।
नमक से मंहगा पानी!
कहते थे कि नमक सबसे सस्ती पर बहुत ताकतवर चीज है। महात्मा गांधी ने भी नमक सत्याग्रह कर ब्रितानियों को झुका दिया था। आजाद भारत में नब्बे के दशक के बाद नमक से मंहगा बिक रहा है पानी, जी हां यह सच है। भारतीय रेल में जनता खाना महज 10 रूपए में मिलता है, पर अगर बोतल बन्द पानी रेल में खरीदा जाए तो वह 12 से 15 रूपए के बीच मिलता है। और उपर से तुर्रा यह कि जिस ब्राण्ड के सप्लायर द्वारा आईआरसीटीसी के ठेकेदार को कमीशन ज्यादा दिया जाता है, उसी कंपनी का पानी पीना पडता है। भारतीय रेल ने देर आयद दुरूस्त आयद की तर्ज पर रेल में पानी की बोतल 6 से सात रूपए में बेचने की योजना बनाई है। इसके लिए तिरूअनन्तपुरम, अमेठी, अंबाला, नासिक फरक्का में बाटलिंग प्लांट का काम आरम्भ हो गया है। यह योजना कब परवान चढ पाएगी पता नहीं किन्तु जिन रेल गाडियों में रेल्वे द्वारा सिक्का डालकर स्वच्छ पेयजल की मशीने लगाईं हैं, वे खराब पडी हैं, और वे यात्रियों का सामान रखने के काम ही आ रही हैं।
. . . मतलब शिव की आग में जलीं माया
शिक्षा के अधिकार को लेकर केन्द्र सरकार से इसको लागू करने के लिए पैसों की मांग की तो मीडिया की सुर्खियां बन गईं। लोग कहने लगे कि मायावती के पास बेहतरीन बाग बगीचे बनवाने और उनमें जीते जी अपनी प्रतिमाएं लगवाने के लिए पैसा है, पर बच्चों को पढाने के नाम पर वे अपने खाली खजाने का रोना रो रहीं हैं। मायावती को जैसे ही मीडिया ने झेला वे एकाएक बैकफुट पर आ गईं, और उन्होंने कहा कि उन्होंने तो मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान की तर्ज पर केन्द्र सरकार को पत्र लिखा था। उन्होंने कहा कि 11 सितम्बर 2009 को शिवराज ने केन्द्र को पत्र लिखकर इस कानून के लागू होने पर राज्य पर तीन सालों में खच Zहोने वाले नो हजार करोड रूपए मांग लिए थे। मायावती भी इससे प्रेरित हो गईं। 26 अक्टूबर को मायावती ने भी केन्द्र सरकार को खत लिखकर इसके क्रियान्वयन के लिए तत्काल 18 हजार करोड रूपए और फिर हर साल 14 हजार करोड रूपए की मांग रख दी। शिवराज से प्रेरणा लेकर कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब, बिहार सहित आधा दर्जन सूबों ने केन्द्र सरकार से इस मद में पैसे क मांग कर ही डाली।
आडवाणी को हाशिए में ढकेलती भाजपा
अतिमहात्वाकांक्षा पाले राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी का शनि एक बार फिर भारी होता दिख रहा है। नेता प्रतिपक्ष पद से हटने के बाद अब भाजपा के कुछ नेता उन्हें पर्दे के पीछे लाने की जुगत में लग गए हैं। दिल्ली प्रदेश भाजपा द्वारा भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में भाजपा के सुप्रीम कमाण्डर नितिन गडकरी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज और राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली को आमन्त्रित किया, पर भाजपा के भविष्य के प्रधानमन्त्री एल.के.आडवाणी को आमन्त्रित करने से चूक गई। इसमें से गडकरी और जेतली समारोह में पहुंचे और अपना उद्बोधन दिया, पर सुषमा इससे कन्नी काट गईं। और तो और सीडी काण्ड के कारण भाजपा से रूखसत होने वाले संजय जोशी तक इस कार्यक्रम में थे, जिनका मंच से सम्मान भी किया गया। आडवाणी को वहां संबोधित करने न बुलाने की बात भले ही भाजपा नेताओं को छोटी लग रही हो पर आडवाणी जैसे राजनेता इस इशारे को भली भान्ति समझ चुके हैं, यही कारण है कि उनकी कीर्तन मण्डली अब उमाश्री भारती को भाजपा में वापस लाने की चालें चल रही है, ताकि भारती की तलवार से अनेक शत्रुओं का शमन हो सके।
पितृत्व मामले में सख्त हुआ न्यायालय
अय्याशी के आरोप में राजभवन से रूखसत हुए 83 वषीZय वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नारयण दत्त तिवारी की मुसीबतें कम होती नज़र नहीं आ रहीं है। पितृत्व मामले में अब कोर्ट का रवैया भी बहुत ही सख्त हो गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने नारायण दत्त तिवारी से पूछा है कि उनके जैविक पुत्र होने का दावा करने वाले रोहित शेखर की सत्यता जानने के लिए क्यों न उनका डीएनए टेस्ट करवाया जाए। न्यायमूर्ति जे.आर.मिघाZ ने कहा है कि तिवारी की उस हर तस्वीर के बारे में जिसमें वे रोहित और उसकी मां उगावला शर्मा के साथ दिख रहे हैं, अलग अलग जवाब दाखिल किए जाएं। कोर्ट ने तिवरी से एक माह में जवाब तलब किया है। अगर तिवारी की ओर से जवाब समय सीमा में नहीं दिया जाता है तो उन्हें व्यक्तिगत तैर पर कोर्ट में उपस्थित होना पडेगा। कोर्ट पहले भी तिवारी के अनुरोध को ठुकरा चुकी है जिसमें उन्होंने कहा था कि जन्म के 31 सालों बाद रोहित उनके चरित्र पर कीचड उछाल रहा है।
`ताई` ने उमेठे `भैइया` के कान
लोकसभा में इन्दौर का प्रतिनिधित्व करने वाली सुमित्रा महाजन ``ताई`` ने मध्य प्रदेश में पांव पांव वाले ``भईया`` के नाम से विख्यात मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ खुली जंग का एलान कर दिया है। इन्दौर की उपेक्षा उन्हें खल रही है। इसी के मद्देनज़र उन्होंने शिवराज को एक पाती लिखी है। बताते हैं कि अपने खत में सुमित्रा ताई ने लिखा है कि आप (शिवराज) पत्र पत्रिकाओं और भाषणों में यह कहते नहीं थकते कि इन्दौर उनके सपनों का शहर है। शिवराज को कडा उलाहना देते हुए ताई कहतीं हैं कि उनका अनुभव है कि सपने अक्सर नीन्द में देखे जाते हैं, और आंख खुलने के बाद या तो सपने टूट जाते हैं या बिखर जाते हैं। ताई ने शिवराज की लगाम कसते हुए विनम्र भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि अगर मुख्यमन्त्री मानते हैं कि इन्दौर वास्तव में देश के हृदय प्रदेश का सांस्कृतिक, शैक्षणिक, व्यवसायिक और सबसे अधिक कर देने वाला शहर है तो इसे प्रशासनिक, व्यवसायिक, शैक्षणिक एवं अन्य सभी तरह से व्यवस्थित करना मध्य प्रदेश के हित में ही होगा। ताई महिला हैं और उनकी सर्वाधिक पीडा शराब ठेकों को लेकर है। इन्दौर में शराब ठेकों का राजस्व 100 करोड से बढकर 300 करोड जा पहुंचा है। वैसे भी सूबे में अगर पचास फीसदी महिलाएं किसी शराब दुकान का विरोध करें तो वह उस मोहल्ले में नहीं खुल सकती है।
कहां है मानवाधिकार के ठेकेदार
छत्तीसगढ में 83 पुलिस के जवान नक्सलियों के हमलों में हाथों अपनी जान गंवा चुके हैं। इसके बाद एक मातम का माहौल पूरे देश में पसर गया है। कुछ यक्ष प्रश्न लोगों के दिलो दिमाग में घुमड रहे होंगे। छोटे मोटे मामलों में शहरों को बन्द कराने वाले राजनैतिक दल भी सदमे में हैं, जो उन्होंने भारत बन्द का आव्हान नहीं किया। मानवाधिकार का ठेका लेकर दुकानदारी करने वाले संगठन गमजे में हैं, वे भी इस मामले में सामने नहीं आएंगे। किसी सांसद या विधायक के निहित स्वार्थ का मामला होता तो हमारे ``जागरूक जनसेवकों`` का गला संसद या विधानसभा में चीख चीखकर रूंध जाता, पर अफसोस वे भी गमजदा हैं। देश सेवा, पीडित मानवता के सहारे अपनी रोजी रोटी कमाने वाले संगठन भी मुंह पर पटट्ी बांघे बैठे हैं। सोचना पडेगा आखिर क्या हो गया है हमारे देशवासियों को। जो जवान देशवासियों की जान माल की हिफाजत के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं, उनकी याद में आंसू तो छोडें, मोमबत्ती जलाने के लिए भी देशवासियों के पास समय नहीं है। अगर यही बात वेलंटाईन डे की होती तो आप बाजार में एक फूल के लिए तरस जाते पर . . .। सच ही कहा है :-
कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए!
कहां चिराग भी मयस्सर नहीं शहर के लिए!!

राजमाता के नाम पर फर्जीवाडा
कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के नाम से फर्जीवाडे का एक प्रकरण प्रकाश में आया है। हुआ यूं कि बीते माह के अन्तिम दिनों में कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) से एक फोन काल देश की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के कार्यालय पहुंची कि राजमाता तत्काल महामहिम से एक जरूरी मीटिंग करना चाह रहीं हैं। महामहिम के मिनिट टू मिनिट के प्रोग्राम को देखने से पता चला कि इस तरह की कोई मीटिंग का अस्तित्व ही नहीं है। इसके उपरान्त उसी नंबर से महामहिम के सचिव को भी फोन आया और फोन काट दिया गया। इसकी शिकायत डीसीपी राष्ट्रपति भवन को की गई। महामहिम आवास के सूत्रों का कहना है कि फोन करने वाला कोई शैलेन्द्र नाम बता रहा था और जो नंबर डिस्पले हो रहा था वह कांग्रेस प्रजीडेंट के आवास का ही था। इस घटना से दिल्ली पुलिस और खुफिया एजेंसी की नीन्द में खलल पड गया है। आला अधिकारी यह जानने में जुटे हुए हैं कि आखिर महामहिम राष्ट्रपति के आवास पर महामहिम कांग्रेस प्रेजीडेंट के घर के नंबर से कैसे फोन काल आई जबकि वहां से हुई ही नही है।
हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे
प्रख्यात व्यंगकार शरद जोशी का व्यंग्य संग्रह ``हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे`` अचानक ही जेहन में जीवन्त हो गया, जब महामहिम राष्ट्रपति के द्वारा पदम सम्मान से अनेक विभूतियों को नवाजा गया। वे इस सम्मान के हकदार थे, या नहीं या इस सम्मान को चुनने के लिए क्या मापदण्ड तय किए गए थे, यह बात तो सरकार जाने पर मीडिया ने भी इसमें इक तरफा भूमिका ही निभाई है। दरअसल प्रवासी भारतीय सन्त सिंह चटवाल को इस सम्मान से नवाजे जाने पर बहस आरम्भ होना लाजिमी है। अमेरिका में व्यवसाय करने वाले सन्त सिंह चटवाल को महामहिम ने राष्ट्रपति भवन के अशोक हाल में पदम सम्मान से सम्मानित किया। चटवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार में शह देने के अनेक मामलों में जांच लंबित है। यह सच है कि जब तक उन पर आरोप सिद्ध नहीं हो जाते तब तक उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता है, पर वे आरोपी हैं इस बात को भारत सरकार को सोचना चाहिए था और एसी कौन सी दुनिया समाप्त होने वाली थी। टीवी चेनल्स की माने तो 2012 में दुनिया समाप्त होगी, इस लिहाज से अभी दो साल थे, सरकार चाहती तो जांच जल्दी पूरी कर अगले साल चटवाल को सम्मान से नवाज सकती थी।
अब मातृभाष के लिए अनुमति!
हिन्दी देश की मातृभाषा है, यह पाठ बचपन से ही पढते आ रहे हैं, पर मातृभाषा में बातचीत के लिए अनुमति की आवश्यक्ता पडेगी वह भी आजाद भारत के गणराज्य में यह कभी सोचा भी न था। जी हां यह सच है दिल्ली हाईकोर्ट में एक अधिवक्ता को हिन्दी में जिरह करने के लिए बाकायदा अनुमति लेनी पडी। और तो और अनुमति लेने के लिए अंग्रेजी में आवेदन और याचिका भी दाखिल करना पडा। है न आश्चर्य की बात। शेयर खरीदने और बेचने को लेकर हुए करार के एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में एक अधिवक्ता को अंग्रेजी में आवेदन कर हिन्दी में बहस की अनुमति लेनी पडी। उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति रेखा शर्मा ने वकील से पूछा कि उसकी याचिका तो अंग्रेेजी में है, फिर हिन्दी में बहस की अनुमति क्यों! वकील ने बडी ही मासूमियत से जवाब दिया, ``हुजूरेआला, याचिका अंग्रेजी में तैयार करना मजबूरी था, क्योंकि हिन्दी की याचिका उच्च न्यायालय के पंजीयक द्वारा स्वीकार नहीं की जाती। इस तरह उडती है ``हिन्दी की चिन्दी`` भारत गणराज्य में सखे।
पुच्छल तारा
उत्तर प्रदेश के बस्ती शहर के दमाद पंकज शर्मा पेशे से वकील हैं। वे सानिया मिर्जा और शोएब की शादी की किस्सगोई मीडिया में देखते और पढते आ रहे हैं। मीडिया के उतावलेपन से वे उकता गए हैं। हमें ईमेल भेजते हुए वे कहते हैं कि अब मीडिया दोनों की शादी की तारीख पर तारीख दिए जा रहा है अब खबर आई है कि सानिया की शादी 15 अप्रेल को होगी। पंकज मीडिया के नुमाईन्दो से पूछते हैं कि यह बताया जाए कि यह सानिया की शादी की तारीख है या कोर्ट में हमेशा बढाई जाने वाली पेशी की तारीख।

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

लिमटी खरे को संवाद सम्मान 2009

लिमटी खरे को संवाद सम्मान 2009

नई दिल्ली 10 अप्रेल। ब्लाग जगत में सक्रिय योगदान के लिए संवाद डॉट काम द्वारा दिए जाने वाले संवाद सम्मान 2009 के लिए लिमटी खरे का चयन किया गया है। उन्हें सामाजिक चेतना श्रेणी में नामित किया गया है। एमआरडी लाईफ साईंस द्वारा प्रायोजित इस सम्मान को ब्लाग जगत में योगदान के लिए दिया जाता है।
संवाद सम्मान के लिए सामाजिक चेतना श्रेणी में शास्त्री जे.सी.फिलिप, लिमटी खरे, रणधीर सिंह सुमन, गीत श्रेणी में राकेश खण्डेलवाल, काटूZन में काजल कुमार, यात्रा वृतान्त के लिए मनीष कुमार, नीरज जाट, संस्मरण यूनुस खान, शिख वाष्णेZय, हिन्दी सेवा के लिए हिन्दी युग्म, आशुतोष दुबे `सादिक`, गजल हेतु सर्वत एम.जमाल, नीरज गोस्वामी, कविता श्रेणी में ओम आचार्य, रूपचन्द शास्त्री मयंक, हिमांशु कुमार पाण्डे को चुना गया है।
सम्मान पाने के उपरान्त चर्चा के दौरान लिमटी खरे ने कहा कि 2009 बीतने के साथ ही साथ इंटरनेट पर अब हिन्दी का जबर्दस्त बोलबाला दिखाई पड रहा है। पहले हिन्दी को इंटरनेट पर तिरस्कृत समझा जाता था, किन्तु ब्लाग के चलते हिन्दी ने इंटरनेट पर एक मुकाम हासिल कर लिया है, जो तारीफेकाबिल है। लिमटी खरे ने भारतवासियों और विदेशों में रह रहे भारत वंशियों से अपील की है कि वे भी घरों मेें बोलचाल में और लिखने पढने के साथ ही साथ इंटरनेट पर हिन्दी का अधिक से अधिक प्रयोग कर, हिन्दी को विश्व की सबसे शक्तिशाली भाषा बनाने की दिशा में पहल करें।

उमा की घर वापसी : निशाना यूपी या सुषमा!

उमा की घर वापसी : निशाना यूपी या सुषमा!
आडवाणी मण्डली ने झोंकी सारी ताकत
शिवराज, तोमर हैं कि मानते नहीं
कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना
आसान नहीं दिखती उमश्री की राह
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 10 अप्रेल। कभी भाजपा की फायरब्राण्ड नेत्री रही साध्वी उमाश्री भारती की भाजपा में घर वापसी के लिए राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की कीर्तन मण्डली ने सारी ताकत झोंक दी है। अब आडवाणी मण्डली हर तरह से उमाश्री को हर कीमत पर भाजपा में वापसी के मार्ग प्रशस्त करने पर तुल गई है। कहा तो यह जा रहा है कि उमाश्री को उत्तर प्रदेश में भाजपा की मजबूती के लिए वापस लाया जा रहा है, पर कहीं पे निगाहें कहीं पर निशाने साफ तौर पर समझ में आने लगे हैं।
पिछले दिनों भाजपा के शीर्ष नेता एल.के.आडवाणी ने जिस तरह से मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान को बुलावा भेजा और उनसे चर्चा की उससे साफ होने लगा है कि शिवराज सिंह चौहान पर उमाश्री की घर वापसी के लिए दवाब बनाना आरम्भ कर दिया गया है। आडवाणी के करीबी सूत्रों का कहना है कि शिवराज सिंह से बन्द कमरे में गुफ्तगूं करने के बाद दोनो ही नेताओं ने भाजपा सुप्रीमो नितिन गडकरी से भी इस मसले में रायशुमरी की।
सूत्रों ने बताया कि इसके पहले आडवाणी ने उमाश्री भारती को बुलाकर उनसे एकान्त में लंबी चर्चा की थी। आडवाणी से मिलने के उपरान्त उमाश्री भारती ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की देहरी पर भी मत्था टेका था। उधर उमा विरोधी झण्डा उठाने वाले अरूण जेतली ने भी नितिन गडकरी के आवास पर इसी सम्बंध में चर्चा की। यह चर्चा लगभग तीन धंटे चली। गडकरी के करीबी सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि गडकरी इस बात के पक्षधर हैं कि उमाश्री भाजपा में वापस आ जाएं, किन्तु कुछ वरिष्ठ नेताओं के तगडे विरोध के चलते वे खुलकर इस मसले पर सामने आने से कतरा रहे हैं।
उधर मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान के दरबार से जो खबरें छन छन कर बाहर आ रही हैं, उनके मुताबिक चौहान ने उमाश्री की वापसी से मध्य प्रदेश पर पडने वाले असर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सह सर कार्यवाहक सुरेश सोनी से चर्चा की है।
उमाश्री की भाजपा में वापसी से भयाक्रान्त मध्य प्रदेश के वरिष्ठ भाजपाई नेताओं ने अब दिल्ली दरबार में मत्थ टेकना आरम्भ कर दिया है। एमपी की पूर्व मुख्यमन्त्री उमा भारती के सक्सेसर रहे पूर्व मुख्यमन्त्री एवं वर्तमान में सूबे में नगरीय कल्याण मन्त्रालय का जिम्मा सम्भालने वाले बाबू लाल गौर ने अपनी पुत्रवधू और भोपाल की महापौर कृष्णा गौर के साथ नितिन गडकरी से लंबी चर्चा की है। बताया जाता है कि इस चर्चा में बाबू लाल गौर ने भी शिवराज सिंह चौहान और मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष नरेन्द्र तोमर की तान में ही आलाप गाया है, जिसके तहत उमा के वापस लोटने से भले ही देश में भाजपा मजबूत हो पर मध्य प्रदेश में भाजपा कई धडों में बंट सकती है।
गौरतलब है कि उमाश्री भारती की घर वापसी की अटकलें लोकसभा चुनाव के पहले लगाई जा रहीं थीं, तब मामला परवान न चढ सका। इसके बाद निरन्तर उनकी घर वापसी की चर्चा सियासी फिजा में तैरती रहीं। उमाश्री की घरवापसी की घोर विरोधी हैं मध्य प्रदेश इकाई। दरअसल उमाश्री भारती की कर्मभूति रहा है मध्य प्रदेश, सो नेताओं को भय सताए जा रहा है कि अगर उनकी घर वापसी होती है, तो वे अपना असली रंग दिखाएंगी। उस सूरत में उन नेताओं को मुश्किल का सामना करना पड सकता है, जिन्होंने उमा के मुख्यमन्त्री पद से हटने के बाद पाला बदला था।
राजनैतिक फिजां में बह रही बयार के अनुसार उमा के भाजपा में वापस आने को लेकर आडवाणी की आतुरता आश्चर्यजनक ही मानी जा रही है। अगर आडवाणी भाजपा के प्रति इतने ही फिकरमन्द थे, तो उमा को लोकसभा के पूर्व ही भाजपा में ले लिया जाता और आडवाणी का आरक्षण कंफर्म हो जाता, वे पीएम इन वेटिंग से पीएम ही बन जाते। जानकारों का मानना है चूंकि आडवाणी से नेता प्रतिपक्ष हथियाने के बाद सुषमा स्वराज काफी तेजी से अपना ग्राफ आगे बढा रहीं हैं, तो आडवाणी की कीर्तन मण्डली को लगने लगा है कि कहीं 2014 में होने वाले आम चुनावों में आडवाणी की तस्वीर भी अटल बिहारी बाजपेयी के बराबर लगाकर उनके स्थान पर सुषमा स्वराज को पीएम इन वेटिंग न बना दिया जाए। अगर एसा होता है तो लाल कृष्ण आडवाणी का 7 रेसकोर्स रोड (भारत गणराज्य के प्रधानमन्त्री का सरकारी आवास) को आशियाना बनाने का सपना अधूरा ही रह जाएगा।

देश को परिपक्व गृह मन्त्री की दरकार - - - (2)

देश को परिपक्व गृह मन्त्री की दरकार - - - (2)
कहां से पैदा हुआ नक्सलवाद
(लिमटी खरे)

नक्सलवाद का नाम आते ही अब जवानों का या तो खून खौल जाएगा या फिर उनकी रूह कांप उठेगी। कुछ ही सालों में नक्लवाद का चेहरा इतना बर्बर और दर्दनाक हो चुका है जिसकी कल्पना मात्र से रोंगटे सिहर जाते हैं। जमीनी हकीकत से अनजान देश प्रदेश के शासकों द्वारा हमारे जांबाज सिपाहियों को इनके सामने गाजर मूली की तरह कटने को छोड दिया जाता है, जो निन्दनीय है। बीते दिनों छत्तीसगढ में जो कुछ हुआ उसकी महज निन्दा से काम चलने वाला नहीं। नक्सलवादी ``सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है`` के सिद्धान्त पर चल रहे हैं।
दरअसल नक्सलवाद क्या है, क्यों पनपा इसके लिए उपजाउ सिंचित भूमि कहां से और किसने मुहैया करवाई इन पहलुओं पर विचार आवश्यक है, तभी इसका शमन किया जा सकता है। आखिर क्या है नक्सलवाद, इस शब्द की उत्तपत्ति कहां से हुई। पश्चिम बंगाल के एक गांव नक्सलवाडी से इसका उदह होने की बात प्रकाश में आती है। नक्सलवाडी में कम्युनिस्ट नेता कानू सन्याल, जंगल सन्थाल और चारू मजूमदार ने 1967 में सत्ता के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह आरम्भ किया था। ये दोनों ही नेता चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तंग के विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित रहे हैं। इनका मानना था कि जिस तरह चीन में तंग ने सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से सत्ता हासिल की थी उसी तरह हिन्दुस्तान में भी दमनकारी शासकों का तख्ता पलट किया जा सकता है। इस विचारधारा के लोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर अखिल भारतीय स्तर पर एक समन्वय समिति का गठन किया था।
वैसे आजाद हिन्दुस्तान में शसस्त्र क्रान्ति का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि सशस्त्र लडाई 1948 में तेलंगाना संघर्ष के नाम पर आरम्भ हुई थी। उस काल में तेलंगाना सूबे के ढाई हजार गांवों के किसानों ने सशस्त्र लडाई का झण्डा उठाया हुआ था। इसके बाद तंग के विचारों पर आधारित इस समन्वय समिति में बिखराव के बीज पड गए और कुछ लोगों ने मार्कस के सिद्धान्त को अपनाकर अपना रास्ता अलग कर लिया इन लोगों ने मार्कसवादी कम्युनिस्ट पार्टी का अलग गठन कर लिया। माकपा ने 1967 में चुनावों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर ली। हो सकता है कि इनका मानना रहा हो कि जब तक माकूल वक्त नही आता तब तक सत्ता का स्वाद चखकर कुछ हासिल ही कर लिया जाए। 2 मार्च 1967 में पश्चिम बंगाल के चुनाव में माकपा ने बंगाल कांग्रेस के साथ मिलकर संविद सरकार का गठन किया। वैसे और खंगाले जाने पर पता चलता है कि हिन्दुस्तान में अमीरी गरीबी के बीच बढते फासले, राजनैतिक, आर्थिक व्यवस्था और दिनों दिन भ्रष्ट होती अफसशाही की उपज है नक्सलवाद। वामपन्थी दलों में अंर्तविरोध के चलतेे वाम दलों में विरोध के बीज प्रस्फुटित होते रहे और अन्तत: 11 अप्रेल 1964 को असन्तुष्ट सदस्यों ने एक नए दल का गठन कर लिया। संवदि सरकार की अवधारणा कानू सन्याल के गले नहीं उतरी और उन्होंने माकपा पर धोखाधडी का सनसनीखेज आरोप लगाकर एक नए गुट की आधारशिला रख दी।
इस आन्दोलन की नींव से अनेक संगठनों का जन्म होता रहा। कालान्तर में या तो वे हावी हाते रहे या फिर उनका शमन ही कर दिया गया। 1969 में एक और पार्टी का गठन किया गया जिसका नाम था, सीपीआई एमएल। आंध्र में आतंक बरपाने वाला पीपुल्स वार ग्रुप इसी पार्टी का एक हिस्सा था। 2004 में पीपुल्स वार ग्रुप ने एमसीसी नामक ग्रुप के साथ मिलकर सीपीआई माओवादी को जन्म दे दिया।
नक्सलवाद शब्द की उत्तपत्ति के बारे में गहराई से जाने पर पता चलता है कि जब अदालत के आदेश पर जमीन्दार के पास रहन रखी जमीन को जोतने एक किसान गया तो उसे जमीन्दार के लोगों ने बेतहाशा पीटा, जैसे ही यह बात कानू सन्याल और चारू मजूमदार के कानों में आई उन्होंने जमीन्दार के खिलाफ शसस्त्र लडाई लडकर किसान को उसका हक दिलया। तब से नक्लवाडी से आरम्भ इस आन्दोलन का नाम नक्सलवाद रख दिया गया। आज नक्सलवाद और माओवाद की जद में देश के 15 सूबों के 233 से अधिक जिले और 2200 से अधिक थाने हैं।  आज बिहार, झारखण्ड, बंगाल, उडीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ आदि सूबों में यह समस्या नासूर बनकर उभ्र चुकी है। उत्तराखण्ड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि सूबों में भी इनकी पदचाप सुनाई देने लगी है। नक्सलवाद 1990 के दशक से जोर पकड रहा है। तीन दशकों में नक्सलवाद का चेहरा बहुत ही ज्यादा वीभत्स हो चुका है। माओवादियों और नक्सलियों की भाषा में जंगल के मायने हैं दण्डकारण्य। आंध्र प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ है लाल गलियारा। उधर भाजपा के चीफ कमाण्डर नितिन गडकरी कहते हैं कि लाल गलियारा पशुपतिनाथ से लेकर तिरूपति तक फैला हुआ है।
आज देश के रूपयों पर ही नक्सलवादी पल रहे हैं। कहते हैं बडे बडे नेताओं, अफसरान और उद्योगपतियों के द्वारा इन नक्सलवादी विचारधारा के मुख्यधारा से भटके हुए लोगों का पालन पोषण किया जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार नक्सलवादियों का रंगदारी टेक्स वसूली का सालाना राजस्व दो हजार करोड से अधिक का है। नक्सलियों की चौथ वसूली के बढते दायरे का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार पुलिस ने पिछले साल नक्सलियों के पास से छ: लाख 84 हजार 140 रूपए बरामद किए थे, जो इस साल महज तीन महीने में बढकर 21 लाख 76 हजार 370 रूपए हो गया है।
(क्रमश: जारी)

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

संवाद सम्‍मान



ब्लॉगिंग के मायने क्या हैं? आज के ब्लॉग जगत को देखकर शायद यही कहा जा सकता है कि मौज मस्ती। इसकी टांग खिंचाई, उसकी जय-जयकार और ढ़ेरी सारी तालियाँ। लेकिन इसके बावजूद बहुत से लोग ऐसे हैं जो इसे एक जिम्मेदारी का काम समझते हैं, किसी खास उद्देश्य के लिए इस काम में लगे हुए हैं। ऐसे ही समर्पित ब्लॉगर्स को समर्पित है यह श्रेणी- सामाजिक चेतना।

जिन लोगों का ब्लॉग जगत से थोड़ा सा भी गम्भीर रिश्ता है, उनके लिए शास्त्री जे0 सी0 फिलिप जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे हिन्दी के प्रबल समर्थक हैं और उसके साथ ही साथ ब्लॉग जगत को समृद्ध बनाने के लिए तन मन धन से लगे रहते हैं। और इन सारे दायित्वों के बीच उनका समर्पण भाव साफ देखा जा सकता है। चाहे सिक्कों के बारे में हो, चाहे ब्लॉगर्स के बारे में और चाहे तमाम तरह की व्याधियों के बारे में। शास्त्री जी पूरी निष्ठा के साथ प्रामाणिक जानकारी के साथ अपने ब्लॉग पर हाजिर रहते हैं। उनकी इस निष्ठा को प्रणाम करते हुए संवाद समूह 'सामाजिक चेतना' का मुख्य संवाद सम्मान उन्हें अर्पित करता है। जैसा कि आप लोग जानते ही हैं कि मुख्य सम्मान के अन्तर्गत सम्मान राशि के रूप में एक हजार रूपये की सम्मान राशि का प्राविधान किया गया है। लेकिन शास्त्री जी ने संवाद समूह के प्रयासों को देखते हुए इस राशि को सविनय लेने से मना कर दिया है, वरन आगे होने वाले आयोजनों में अपनी ओर से आर्थिक योगदान देने का वादा भी किया है। संवाद समूह उनकी इस भावना को प्रणाम करता है और उन्हें संवाद सम्मान की हार्दिक बधाई प्रेषित करता है।

सामाजिक चेतना श्रेणी के नामित सम्मान के लिए इस बार दो लोगों का चयन किया गया है। पहना नाम है श्री लिमटी खरे और दूसरा श्री रणधीर सिंह सुमन। खरे जी और सुमन जी की सक्रियता ब्लॉग जगत में किसी से छिपी नहीं है। ये दोनों ही ब्लॉगर सामाजिक विषयों पर अपने धुंआधार लेखन के लिए जाने जाते हैं। पेशे से लिमटी जी एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और अपने ब्लॉग 'रोजनामचा' में दुनिया भर की खबरे लिया और दिया करते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ वे 'नुक्कड़', 'आमजन की खबरें' और 'पहाड़ी की धूम' आदि ब्लॉगों पर भी अपना


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सक्रिय योगदान करते रहते हैं। जबकि सुमन जी पेशे से एडवोकेट हैं और कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ाव रखते हैं। वे अपने ब्लॉग 'लोक संघर्ष' और 'लोक वेब मीडिया' के अतिरिक्त 'कबिरा खडा बजार में', 'लखनउ ब्लॉगर्स असोसिएशन', 'हिन्दुस्तान का दर्द', 'उल्टा तीर' आदि लगभग एक दर्जन ब्लॉगों पर अपना सक्रिय योगदान करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त वे 'लोक संघर्ष' नाम एक त्रैमासिक पत्रिका का भी प्रकाशन करते हैं। इन दोनों जुझारू ब्लॉगर्स के सक्रिय योगदान को देखते हुए संवाद समूह इन्हें 'सामाजिक चेतना-नामित' सम्मान से विभूषित करता है और इनके यशस्वी जीवन के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करता है।

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नोट- सभी श्रेणियों में दिये जाने वाले मुख्य सम्मान के रूप में प्रशस्ति पत्र, रू0 1001.00 की सम्मान राशि और ई-प्रमाण पत्र दिया जाएगा जबकि नामित श्रेणी के सम्मान हेतु ई-प्रमाण पत्र का प्राविधान है। 'संवाद सम्मान' सम्बंधी प्रक्रिया एवं अन्य सूचना के लिए कृपया यहाँ चटका लगाएंअन्य श्रेणियों के सम्मान की जानकारी के लिए यहाँ पर चटका लगाएं।

16 comments:

बी एस पाबला said...
nice
Suman said...
nice
जी.के. अवधिया said...
विजेताओं को बधाई!
ali said...
बधाई !
दिलीप said...
badhai...http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
सम्मानित त्रयी को बधाई! चयन उपयुक्त रहा।
अविनाश वाचस्पति said...
माननीय शास्‍त्री जी, लिमटी जी और सुमन जी। बधाई।
Kunnu. said...
Badhayi
सुलभ § सतरंगी said...
बधाई !!!
'अदा' said...
माननीय शास्‍त्री जी, लिमटी जी और सुमन जी। बधाई....!
Ram Krishna Gautam said...
बधाई! http://gautamdotcom.blogspot.com "RAM"
Anonymous said...
हद है।अपनी एक पोस्ट को दस दस जगह डाल देने वाला किस तरह का सामाजिक सरोकार कर रहा है?और अलेक्सा रैंकिंग मामले में इसका खुलासा होने पर महाशय इसको गंदी हरकत बताते हैं।ऐसों को कथित सम्मान दे आप बताना क्या चाह रहें हैं?जो किसी की मौत की खबर पर भी nice कह निकल लेता हो वह क्या सामाजिक चेतना जगाता है
पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...
super nice
डॉ टी एस दराल said...
सब को बधाई और नाईस।
Anonymous said...
the selection is totally wrong . samajik chetna kae liyae jinko samman diyaa jaa rhaa haen wo kewal aur kewal rudhivaditaa phelaa rahey haen aur sakriytaa bhi koi cheez hotee haen nomination mae koi aapti nahin hotee kyuki wo paathak ki pasand haen
Arvind Mishra said...
ब्लॉग त्रिदेवों को नमन