बुधवार, 25 अगस्त 2010

राजनीति चुनाव फिर जनसेवा

क्या निस्वार्थ सेवा का अपमान है तीन गुना वेतन!

राजनीति करना या चुनाव लड़ना जीतकर फिर जनसेवा करना, यह सब कुछ निस्वार्थ सेवा की श्रेणी में ही आता है। आजादी के मतवालों ने ब्रितानी हुकूमत को खदेड़ने के लिए सियासत की, भीड़ का नेतृत्व किया, लोगों को सही पथ पर चलने का आव्हान किया, कुछ नरमी से पेश आते थे वे नरम दल के सदस्य बने और जो गरमी से मारकाट पर विश्वास रखते थे, वे गरम दल उनकी गिनती गरम दल में होने लगी। इसी बीच अहिंसा का पाठ पढ़ाकर आधी धोती पहनकर डेढ़ सौ साल राज करने वाले गोरी चमड़ी वालों को देश से खदेड़ने का जिम्मा महात्मा गांधी ने उठाया। आजादी के बाद जनसेवा और चुनाव लड़ने के मायने बदल गए हैं, निस्वार्थ सेवा करने की गरज से राजनीति में आने वालों को तीन गुना वेतन की सिफारिशें भी कम लगी जो दस सरकार ने दस हजार रूपए और बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है।

(लिमटी खरे)

कमर तोड़ मंहगाई में भारत गणराज्य की आवाम भले ही भूखे पेट, बिना पर्याप्त कपड़े और छत के गुजर बसर करे पर उसी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्यों को भरपेट भोजन सारी सुविधाएं निशुल्क के साथ ही साथ भारी भरकम वेतन और भत्ते ही नहीं आजीवन आराम के साथ जीवन गुजारने के लिए कुछ जरूरी सुविधाओं के साथ ही साथ भारी भरकम पेंशन की राशि भी चाहिए। देश की बुनियादी समस्याओं की तरफ बेरूखी का रूख करने वाले संसद सदस्यों को वर्तमान वेतन भत्तों में तीन गुना वृद्धि भी नागवार गुजर रही थी, सो सरकार ने उसमें दस हजार रूपए की बढोत्तरी करने का निर्णय ले लिया है। क्या कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने सोचा है कि यह रकम आएगी कहां से? जाहिर है भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस का एक हाथ आवाम ए हिन्द की गरदन पर तो दूसरा जेब पर है। एक हाथ से कांग्रेस जनता की गर्दन दबा रही है तो दूसरे हाथ से उसकी जेब में जो कुछ भी है वह लूट रही है।
 
आजादी के उपरांत 26 जनवरी 1950 को भारत का गणतंत्र स्थापित हुआ था। भारत प्रजातांत्रिक देश है, और प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जब विपक्ष ही वेतन भत्तों की मांग पर संसद में नंगा नाच आरंभ कर दे तो भारत की गरीब जनता को दोनों हाथ उपर कर ‘‘हेण्डस अप‘‘ की भूमिका में आ जाना होगा। अघोषित तौर पर कांग्रेस द्वारा गन प्वाईंट पर जनता को लूटा जा रहा है। बेबस जनता विपक्ष की ओर नम और आशा भरी निगाहों से देख रही है, पर विपक्ष है कि निरीह कराहती जनता के दुख दर्द को देखने, सुनने और समझकर उसे दूर करने के बजाए सत्ताधारी कांग्रेस के सुर में सुर मिलाते हुए असुरों की भांति अट्टहास ही लगा रहा है। जनता कई सालों से कांग्रेस, भाजपा और अन्य सहयोगी दलों की नूरा कुश्ती देख देखकर आजिज आ चुकी है।
 
इसके बाद थकी हारी जनता की आखिरी उम्मीद प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ अर्थात मीडिया पर आकर आयत होती है। मीडिया है कि अपना स्वरूप बहुत ही तेजी से बदल चुका है। मीडिया से लंबे समय से जुड़े होने के कारण हमें यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि नब्बे के दशक के शुरूआती सालों के उपरांत मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता को खोना ही आरंभ किया है। जब से मीडिया की कमान धनाड्य लोगों के हाथों में गई है तबसे मीडिया में कार्पोरेट संस्कृति का श्रीगणेश हो चुका है। पिछले कुछ माहों से पेड न्यूज पर चली देशव्यापी बहस इसी संस्कृति के गर्भ से पैदा हुआ छोटा सा विकृत, अर्धविकसित, बेडोल वह शिशु है, जिसको जीवन भर पालना इसके पालकों की मजबूरी होगी।
 
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और थिंक टेंक की नैतिकता शायद धूप में रखे कपूर की तरह उड़ चुकी है, यही कारण है कि खालिस और निस्वार्थ जनसेवा के पारितोषक या मासिक मेहनताने के तौर पर भारत गणराज्य जैसे देश में जहां औसत आम आदमी की दैनिक कमाई 20 रूपए और मासिक छः सौ रूपए से भी कम है, उसमें जनता के चुने हुए नुमाईंदे जो निस्वार्थ जनसेवा का दंभ भरते हैं को आम आदमी की औसत कमाई से लगभग ढाई सौ गुना ज्यादा मासिक इन ‘माननीयों‘ जिन्हें सब कुछ निशुल्क मिलता है, को देने का प्रस्ताव दिया है।
 
कांग्रेस के आला नेताओं को शर्म से डूब मरना चाहिए। कांग्रेस को चाहिए कि वह अपने सांसद, विधायकों को नैतिकता की सीख देते हुए यह आव्हान करे कि इस बढ़ी हुई तनख्वाह को कांग्रेस कतई स्वीकार नहीं करेगी, चाहे सरकारें क्यों न चली जाएं। विडम्बना यह है कि पूर्व में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने जनसेवकों से अपने वेतन का कुछ अंश प्रधानमंत्री सहायता कोष में जमा करने के निर्देश दिए थे। इक्कसीवीं सदी में राजपाट करने का तरीका बदल गया है, सो राजमाता के निर्देशों को हवा में ही उड़ा दिया उनकी पार्टी के चुने हुए जनसेवकों ने। हां इक्कसीवीं सदी में सब कुछ बदल गया है, सिवाए एक बात के, आज भी जनता का शोषण उसी स्तर पर जारी है जिस स्तर पर आदि अनादि काल से होता आया है।
 
दरअसल इक्कीसवीं सदी में भारत के प्रजातंत्र पर कार्पोरेट सेक्टर की गहरी छाप देखने को मिल रही है। पिछले दो दशकों से लोकसभा और राज्य सभा में पहुंचने वाले जनसेवकों में करोड़पति और व्यवसायियों की तादाद बढ़ती जा रही है। हालात देखकर लगने लगा मानो आजादी के उपरांत कांग्रेस के भविष्यदृष्टाओं ने भारत में जिन उद्देश्यों से प्रजातंत्र की स्थापना की गई थी, उस मूल अवधारणा से कांग्रेस की वर्तमान पीढ़ी पूरी तरह भटककर चंद पैसे वालों, रसूख वालों, बाहुबल वालों और व्यवसाईयों के हाथ की लौंडी बनकर रह गई है। यह कैसा प्रजातंत्र जहां आम आदमी दो वक्त की रोजी रोटी के लिए जद्दोजहद में अपना पूरा जीवन बिता दे और वहीं दूसरी ओर शासकों पांचो उंगलियां घी में सर कड़ाई में और पूरा का पूरा धड़ जमीन के बजाए झारे पर पड़ा हो।
 
कांग्रेस को उस वक्त शर्म नहीं आई जब सांसदों का वेतन 16000 रूपए से बढ़ाकर पचास हजार और भत्ते आदि मिलाकर एक लाख तीस हजार किया जा रहा था। कांग्रेस शायद भूल गई कि 2006 में सांसदों का मूल वेतन 4000 रूपए ही था। मंदी के दौर से गुजरते भारत गणराज्य में कांग्रेस ने बहुत ही नायाब उदहारण प्रस्तुत किया है। अमूमन मंदी के दौर में कास्ट कटिंग के चलते या तो सुविधाओं में कटौती की जाती है या फिर कर्मचारियों में। यह भारत गणराज्य है जहां न तो सांसदों की लोकसभा या राज्य सभा की सीटें ही कम की गईं हैं, और न ही उनकी सुविधाएं। बढ़ा है तो उनके वेतन भत्तों को बोझ वह भी आम जनता के कांधों पर।
 
करेला वह भी नीमचढ़ा की तर्ज पर सांसदों के वेतन भत्तों के मामले में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सांसदों के भत्तों में दस हजार रूपए की बढोत्तरी कर सांसदों को एक उपहार और जनता को एक करारा तमाचा मारा है। सांसद जानते हैं कि अभी कांग्रेस की पूंछ परमाणु करार बिल के कारण दबी हुई है। कांग्रेस के कुशल प्रबंधकों द्वारा विपक्ष विशेषकर भारतीय जनता पार्टी को इसके लिए राजी किया जा रहा है। मौका देखकर स्वयंभू प्रबंधन गुरू रहे लालू प्रसाद यादव सरीखे नेताओं ने सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाने की मांग रख दी। कांग्रेस अब ‘‘हुई गति सांप छछूंदर केरी, उगलत निगलत पीर घनेरी‘‘ मुहावरा गुनगुना रही है, क्योंकि अगर सांसदों की इस मनभावन मांग को वह अनसुना करती है परमाणु करार विधेयक लटक जाएगा, और जब मान रही है तो जनता के नाराज होने का खतरा उसके सर मण्डराने लगा है।
 
आज के समय में वैसे भी लोकसभा के 544 और राज्य सभा के 245 सांसद मिलकर हर साल सरकार पर चार सौ करोड़ रूपए का बोझा डालते हैं। इसके अलावा सूबों में विधायक, विधान परिषद सदस्य, जिला जनपद पंचायत, नगर पालिका, नगर निगम नगर पंचायत आदि में मिलने वाले वेतन भत्तों को अगर जोड़ लिया जाए तो साफ हो जाता है कि जनता का कचूमर तो देश पर राज करने वाले जनसेवक मिलकर ही निकाल रहे हैं।

चोदहवीं लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या 154 तो पंद्रहवीं लोकसभा में इनकी संख्या में लगभग दो गुना इजाफा होकर अब यह तीन सौ पर पहुंच गई है। क्या अपना वेतन भत्ते का स्वयं निर्धारण करने वाले सांसद और उनकी अनैतिक मांगों को मानकर देश की आम जनता का गला दबाने वाली कांग्रेस में इतना माद्दा है कि वे एक बिल पास करवाएं कि देश के अंतिम आदमी की माली हालत सुधरने तक अगले किसी भी चुनावों में वही व्यक्ति नामांकन दाखिल कर सकेगा जो यह शपथ पत्र प्रस्तुत करे कि ‘‘वे किसी भी तरह का वेतन नहीं लेंगे‘‘। निश्चित तौर पर एसा होगा नहीं क्योंकि आज राजनीति और जनसेवा का शाब्दिक अर्थ तो निस्वार्थ सेवा ही है पर इसके मायने बदल चुके हैं।

फोरलेन विवाद का सच ------------------- 15

मुख्यतः वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने नहीं दिया है क्लीयरेंस 

क्यों अडंगा लगा रहे हैं जयराम रमेश
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 25 अगस्त। उत्तर दक्षिण सड़क गलियारे का काम पूरी मुस्तैदी से जारी होने के बाद भी मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में इसके काम को रोक दिया गया है। जिला मुख्यालय से दक्षिण की ओर नागपुर के मार्ग का काम तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी के 18 दिसंबर 2008 के आदेश से रूका है किन्तु उत्तरी सीमा में बंजारी माता से लेकर गनेशगंज के पास तक का काम किसके आदेश से रूका है, यह बात स्पष्ट नहीं हो सकी है।
 
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों का दावा है कि यह सारा काम इसलिए रोका गया है क्योंकि रक्षित वन और पेंच नेशनल पार्क के भाग से गुजरने वाली सड़क में क्लीयरेंस देने का काम वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा अभी तक नहीं दिया गया है। गौरतलब होगा कि 19 अगस्त को राजधानी दिल्ली के मध्य प्रदेश भवन में पत्रकारों से रूबरू मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी सिवनी जिले के साथ अन्याय होने की बात कही गई थी।
 
एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में कुछ माह पूर्व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि उत्तर दक्षिण गलियारा पेंच नेशनल पार्क से होकर गुजर रहा है, जिस पर उन्होंने रेड सिग्नल दिखा दिया है। रमेश ने कहा था कि उन्होने स्वयं ही जाकर वास्तविकता देखी थी। साथ ही रमेश वहीं स्पष्ट भी कर गए कि उन्होंने जबलपुर जाकर मौके का मुआयना किया। जयराम रमेश कब सिवनी आए और पेंच नेशनल पार्क के बारे में उन्होने मालुमात की यह बात तो सिर्फ और सिर्फ वे ही बता सकते हैं, क्योंकि पेंच नेशनल पार्क के हिस्से में आने वाली सड़क की दूरी जिला मुख्यालय जबलपुर से कम से कम 180 किलोमीटर दूर है, सो जो हकीकत उनके सामने लाई गई होगी वही हकीकत अगर वे जबलपुर आने की जहमत न उठाते तो उन्हें दिल्ली में बैठे बैठे ही पता चल जाती।
 
सूत्रों ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि चूंकि डॉ.मनमोहन सिंह सरकार की पहली पारी में कमल नाथ केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग विभाग के केबनेट मंत्री थे, एवं जयराम रमेश उनके मातहत राज्य मंत्री थे। इसी दौरान किसी बात को लेकर दोनों में अनबन हो गई थी, जिसे जयराम रमेश आज तक निभा रहे हैं। इसके साथ ही साथ जयराम रमेश को यह बात भी बता दी गई है कि उक्त सड़क वर्तमान भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र से होकर गुजर रही है, अतः इसको लाल झंडी दिखाना अनिवार्य है। इस बात में कितनी सच्चाई है यह बात तो जयराम रमेश ही जाने पर दूसरी सच्चाई यह है कि पिछले दो सालों में भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इस सड़क के पेंच और रक्षित वन से गुजरने की अनुमति अब तक प्रदान ही नहीं की गई है।

तुम मरो भूखे हम तो खाएंगे खीर पुडी

सांसद क्‍यों करें आम आदमी की चिंता

सोमवार, 23 अगस्त 2010

अंधेरे में रहने पर मजबूर है राजमाता की रियाया

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

अंधेरे में रहने पर मजबूर है राजमाता की रियाया

भारत गणराज्य मंे छोटे बच्चे से अगर पूछा जाए कि देश पर वास्तव में शासन कौन कर रहा है तो निश्चित तौर पर उसका जवाब होगा ‘सोनिया गांधी‘। नेहरू गांधी परिवार के नाम पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस ने अघोषित तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को अपनी राजमाता और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को अपना युवराज मान ही लिया है। क्या आप जानते हैं कि राजमाता और युवराज की सल्तनत का आलम क्या है? जी हां अमेठी और रायबरेली में रियाया को महज दो से तीन घंटे बिजली ही मिल पा रही है। मतलब यहां की जनता 21 से 22 घंटे बिना बिजली के ही गुजर बसर करने पर मजबूर है, वहीं दूसरी ओर इसी जनता के जनादेश के बलबूते देश पर परोक्ष तौर पर हुकूमत करने वाली श्रीमति सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी पूरे नवाबी शौक के साथ देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली मंे विलासिता का जीवन जी रहे हैं। यह मामला तब प्रकाश में आया जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस मामले को उठाया गया। यह है भारत गणराज्य का आजादी के तिरेसठ साल बाद का नजारा। जब देश पर शासन करने वाली कांग्रेसनीत संप्रग सरकार की नैया के खिवैयों का यह हाल है तो बाकी गरीब गुरबों के बारे में अनुमान लगाने से ही रूह सिहर उठती है।

घर फूंक कर तमाशा देख रही है केंद्र सरकार

विश्व भर में भारत के सत्तर फीसदी लोगों की भुखमरी, बेरोजगारी, लाचारी पर आए दिन जगहसाई होती रहती है, इस सब से ‘बाखबर‘ होते हुए भी बेखबर होने का स्वांग रचने वाली केंद्र सरकार की आखों के नीचे कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर अरबों रूपयों के वारे न्यारे हो रहे हैं। इसी तारम्य में अब नई बात सामने आई है। कामन वेल्थ गेम्स की ओपनिंग और क्लोजिंग सेरेमनी में दर्शकों के मनोरंजन के लिए 12 मीटर से ज्यादा उचंाई के एक गुब्बारे को स्टेडियम में उड़ाया जाएगा। इस गुब्बारे की कीमत 38 करोड़ रूपए बताई जा रही है। इस गुब्बारे का लाईव प्रदर्शन देखने के लिए देश की जनता के गाढ़े पसीने की कमाई को हवा में उड़ाने के लिए आर्गनाईजिंग कमेटी के स्पेशल डीजी जी.जी.थामस, भर बाला और विराफ सरकारी सहित एक उच्च स्तरीय दल लंदन भी रवाना हो गया है। इस विशेष दल के खर्चे का हिसाब अलग से रखा जाएगा। कुल मिलाकर कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है, वह किसी भी दृष्टि से उचित कतई नहीं कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री ने स्वाधीनता दिवस के उद्बोधन में इसे राष्ट्रीय पर्व के तौर पर मनाने की बात कही थी। अगर कोई पर्व हमारी लाचारी, बेचारगी, गरीबी का माखौल उड़ाए तब उसे मनाने का क्या ओचित्य?

महिला विरोधी हैं संसद सदस्य

देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर फैसला करने वाले सांसद क्या महिलाओं के घोर विरोधी हैं? हालात देखकर तो यही लगता है कि सांसद नहीं चाहते कि महिलाएं किसी भी कीमत पर चौका चूल्हा छोड़कर बाहर आएं और मर्दों की बराबरी करें। अपने वेतन भत्ते बढ़ाने के मामले में सारे सांसद एकजुट ही नजर आए। मसखरी के सरगना लालू प्रसाद यादव ने साफ कह दिया कि सांसदों का वेतन तो जूनियर क्लर्क से भी कम है। लालू को कौन समझाए कि सांसदों की योग्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो वे जूनियर क्लर्क बनने लायक भी नहीं हैं। सांसदों के दबाव के आगे केंद्र सरकार ने घुटने टेके और केबनेट ने सांसदों की पगर बढ़ाने की बात पर अपनी सहमति दे दी। यक्ष प्रश्न यह है कि सालों से टलते आ रहे महिला आरक्षण बिल के मामले में लालू यादव या अन्य सांसदों ने एसी एकजुटता क्यों नहीं दिखाई। महिला आरक्षण के मामले मंे सांसदों के रवैए को देखकर लगने लगा है कि सांसद महिलाओं के विरोधी हैं।

झाडू लगाती और बर्तन मांझती छात्राएं!

दिल्ली सहित किसी भी भाग में अगर आपका बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ने जा रहा है तो सप्ताह में एक बार जाकर अपने बच्चे के हाल चाल जरूर ले लीजिएगा, जरूरी नहीं कि आपका बच्चा स्कूल में जाकर शिक्षा ग्रहण कर रहा हो। राजधानी दिल्ली के कदीपुर स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक बालिका विद्यालय का नजारा देखकर लगता है कि बालिकाएं यहां झाडू लगाने और बर्तन मांझने ही आती हैं। छात्राओं के अनुसार सुबह आते ही सबसे पहले उन्हें शाला के कक्षों में साफ सफाई करने हेतु झाडू लगाना पड़ता है। इसके बाद मध्यान्न भोजन को तैयार करना और उसे परोसना फिर जूठे बर्तन तक धोना उनकी जिम्मेदारियों मंे शामिल कर दिया गया है। हो सकता है शाला प्रशासन यह सोच रहा हो कि बालिकाओं को कल ब्याह कर दूसरे घर जाना है अतः उन्हें साफ सफाई और बर्तन धुलाई का व्यवहारिक प्रशिक्षण भी लगे हाथ दे ही दिया जाए पर यह मानवाधिकार हनन की श्रेणी में तो आता ही है।

मंदी और मंहगाई की छाया से कोसों दूर हैं सियासी दल

देश की आधी से अधिक आबादी दिन भर में महज बीस रूपए कमा पाए या न कमा पाए पर इसी गरीबी को मुद्दा बनाकर सियासत करने और सत्ता पाने वाले सियासी दलों के खजाने में दिन दूनी रात चौगनी बढ़ोत्तरी हो रही है। राजनैतिक दलों द्वारा जब आयकर विवरणी दाखिल की गई तब देशवासियों की आंखें चकाचौध होना स्वाभाविक ही थीं। कमाई के मामले में सबसे अव्वल कांग्रेस है, जिसे आठ सालां में 1518 करोड़ तो पिछले साल 497 करोड़ की कमाई हुई। दूसरी पायदान पर रहने वाली आदर्शों को अपनने वाली पार्टी भाजपा ने इसी अवधि में 754 करोड़ रूपए अर्जित किए और पिछले साल 220 करोड़ की खालिस कमाई हुई है भाजपा को। बैंक खातों पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो कांग्रेस के 549 करोड़, बसपा के 286 करोड़, भाजपा के 245 करोड़, समाजवादी पार्टी के 177 करोड़, माकपा के 135 करोड़, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के 32 करोड़, भाकपा के 6 करोड़ रूपए तो लालू यादव की राजद के खाते में महज 58 लाख रूपए ही जमा हैं।

मंत्री जी को मिलता है बढ़िया खाना

सांसदों की शिकायत है कि एयर इंडिया में मिलने वाला भोजन बेस्वाद और घटिया होता है। नागर विमानन मंत्री हैं कि सांसदों की शिकायत को सिरे से खारिज कर रहे हैं। विमान में मिलने वाले घटिया क्वालिटी के खाने को लेकर लगभग सभी पार्टी के सांसदों ने नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को जमकर घेरा। संसद में नोक झोंक के दौरान जब एक सांसद ने कहा कि मंत्री ने अपने जवाब में स्वयं ही लिखा है कि घरेलू उड़ाने में उन्हें 22 तो समुद्रपारीय उड़ानों में इस तरह की 19 शिकायतें मिली हैं। इस पर पटेल का जवाब था कि हजारों उड़ानों में अगर दस बीस शिकायतें मिली भी हैं तो यह औसत काफी कम है। मंत्री जी के जवाब को सुनकर बसपा सांसद गंगा चरण राजपूत उखड़ गए और बोले उन्होंने खुद ही दस शिकायतें की हैं, पर एक पर भी कार्यवाही नहीं हुई है। बाद में राजपूत ने चुटकी लेते हुए कहा कि लगता है मंत्री जी जब भी विमान में जाते हैं उन्हें बेहतरीन और लजीज भोजन मिलता है तभी तो वे शिकायतें सुनना नहीं चाह रहे हैं।

मुकदमों को लटकाने की प्रवृति से सुप्रीम कोर्ट खफा

मुकदमों में अनावश्यक होने वाली देरी पर देश की सबसे बड़ी पंचायत ने अपनी नाराजगी जताई है। सर्वोच्च न्यायायल की एक खण्डपीठ ने इलाहबाद उच्च न्यायायल द्वारा हतया के एक मामले में 36 साल पहले लगाई गई एक रोक पर यह नाराजगी जताई है। इस मामले में 36 सालों में सुनवाई ही नहीं हो पाई है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि न्याय मिलने में देरी और न्याय न मिलने की दशा में लोग कानून को अपने हाथों में लेने लगेंगे, जिससे समाज में अव्यवस्थ बढ़ेगी और न्याय पालिका पर से लोगों का विश्वास घटने लगेगा। आज न्यायालयों में 01 से 09 वर्ष वाले लंबित प्रकरणों की संख्या 8129, 10 से 20 साल की अवधि वाले 1453, 20 से 30 साल की अवधि वाले 902 और 30 से 36 साल पूर्व वाले उन प्रकरणों की संख्या जिसमें स्थगन लिया हुआ है 43 है। एमाईकस क्यूरी ने सुझाव दिया कि उच्च न्यायलयों को यह निर्देश दिए जाएं कि 10 साल या उससे अधिक पुराने मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निष्पादित किया जाए। इसके लिए हाईकोर्ट को अधिकतम छः माह का समय दिया जाना चाहिए।

रेलगाड़ियों में खाना परोसती नजर आएंगी परिचारिकाएं

भारतीय रेल के खानपान एवं पर्यटन निगम (आईआरसीटीसी) से रेलों में खान पान का अधिकार अपने पास वापस लेने के बाद अब भारतीय रेल इसमें अमूल चूल बदलावा की तैयारी में दिख रहा है। खबर है कि आने वाले समय में भारतीय रेल की सभी गाडियों में परिचारिकाएं खाना परोसती नजर आएंगी। वर्तमान में शताब्दी में ट्रॉली के माध्यम से पुरूष परिचारक खाना परोसते हैं। कुछ समय पूर्व स्वर्ण शताब्दी में परिचारिका रखने का प्रयोग किया जा चुका है। कहा जा रहा है कि शताब्दी के साथ ही साथ राजधानी और दुरंतो एक्सप्रेस में महिला परिचारिकाओं के जरिए खाना परोसा जाएगा। यह प्रयोग अगर सफल रहा तो आने वाले दिनों में लंबी दूरी की मेल एक्सप्रेस गाड़ियों में भी इसे लागू किया जा सकता है। मंत्रालय के सूत्र कहते हैं कि यह योजना तभी परवान चढ़ पाएगी जब ममता दीदी पश्चिम बंगाल से निकलकर भारतीय रेल की ओर नजरें इनायत करना आरंभ करेंगी।

पतंग के मामले में हार गया चीन

भारत के बाजार में चीनी सामान का जादू सर चढ़कर बोल रहा है। सस्ते और आकर्षक होने के कारण लोगों का मोह चीनी ड्रेगन की ओर होना स्वाभाविक ही है, किन्तु पतंगों के मामले में चीन पिछड़ गया है। पन्नी की बनी चीनी पतंगों के बजाए अब देशी कमची यानी बांस की खपच्ची की पतंगों की मांग जबर्दस्त तरीके से बढ़ी है। लोगों का मानना है कि पन्नी की चीनी पतंगे उड़ाने में उन्हें बहुत ही मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, पर खपच्ची की बनी देशी पतंग को आसमान मंे जैसा चाहे वैसे ठुमके लगवा लो। पंद्रह अगस्त पर दिल्ली वासियों के दिलो दिमाग पर पतंग का जुनून देखते ही बनता है। दिल्ली में पतंग का कारोबार सौ करोड़ रूपए से अधिक का है। दिल्ली में बरेली, रामपुर, अमरोहा, जयपुर, अहमदाबाद, लखनऊ आदि से आती हैं। इसके अलावा रील और मन्झा बरेली, अहमदाबाद, आगरा, जयपुर, बरेली आदि से बुलाया जाता है। पतंग बाजों के लिए धागा रखने का चरखा सौ से दो सौ रूपए तक की कीमत का होता है, जिसमें तीन हजार मीटर तक मन्झा भरा जा सकता है।

विवादित होना आमिर खान की फितरत!

मशहूर अभिनेता आमिर खान की किस्मत में विवादित होना बदा ही है। चाहे उनकी फिल्म थ्री ईडियट हो या पीपली लाईव, हर बार वे किसी ने किसी विवाद से अपना नाता जोड़ ही लेते हैं। मामला चाहे जो भी हो पर लगता है आमिर और विवाद का चोली दामन का साथ है। पहले थ्री ईडियट्स में उनका विवाद लेखक चेतन भगत के साथ हुआ, अब पीपली लाईव में विवादों के साए में आ गए हैं आमिर। देश के हृदय प्रदेश के बैतूल जिले के ग्राम सेहरा निवासी कुंजी लाल ने आमिर खान को एक नोटिस भेजकर पीपली लाईव से होने वाली आय का आधा हिस्सा मांगा है। कुंजी लाल का कहना है कि पीपली लाईव की कहानी उनकी आपबीती को व्यक्त कर रही है। उन्होंने अपने वकील के माध्यम से भेजे नोटिस में कहा है कि इसका आधार 20 अक्टूबर 2005 को बैतूल से दस किलो मीटर दूर ग्राम सेहरा के निवासी कुंजी लाल का कथन है, जिसमें वह खुद के मरने की घोषणा करता है। यद्यपि कुंजी लाल जिंदा है पर उस समय देश भर के मीडिया ने उसे सर पर उठा रखा था।

दस नंबरी होगी लेण्ड लाईन

दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) चाहता है कि मोबाईल के नंबरों की तरह ही लेण्ड लाईन के नंबर भी दस अंकों के हों। इस आशय का परिचर्चापत्र ट्राई ने लेण्ड लाईन सेवा प्रदाता कंपनियों को जारी किया है। अब तक मोबाईल पर तो दस अंको के नंबर होते हैं किन्तु लेण्ड लाईन के नंबरों में पर्याप्त मात्रा में असमानता ही दिखाई देती है। ट्राई का कहना है कि फिक्सड और मोबाईल सेवाआं के लिए एकीकृत नंबर योजना को 31 दिसंबर 2011 तक लगू किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उसके अनुसार आने वाले तीस चालीस सालों के लिए देश में मौजूदा सेवाओं और प्रस्तावित या भविष्य की योजनाओं के लिए पर्याप्त संख्या में नंबर उपलब्ध हो सकेंगे। ट्राई शायद यह भूल गया कि वर्तमान की योजना एनएनपी 2003 को 75 करोड़ कनेक्शन के मद्देनजर रखकर 2030 तक के लिए बनाया गया था, किन्तु पिछले साल ही मोबाईल के लिए तय कनेक्शन की संख्या पार की जा चुकी है।

क्रिकेट की पिच पर उखड़ने लगे हैं महाराज के पांव

कांग्रेस के सांसद और केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा मध्य प्रदेश के भाजपा के विधायक और वाणिज्य और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बीच राजनैतिक जंग जिस भी स्तर पर हो किन्तु अब दोनों ही के बीच मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन को लेकर जबर्दस्त जंग मची हुई है। 22 अगस्त को संपन्न होने वाले चुनावों में संभवतः पहली बार ही एसा होगा कि चुनाव मतदान से होगा, वरना तो आम राय से ही अध्यक्ष बना दिया जाता था। विजयवर्गीय इंदौर जिला क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने जाने के बाद एमपीसीए का अघ्यक्ष बनने की जुगत में हैं। सिंधिया ने संसद के सत्र को तजकर इंदौर में डेरा डाल दिया है। उनकी ओर से कमान भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के संयुक्त सचिव संजय जगदाले ने संभाल रखी है। अब सभी की निगाहें इस पर जाकर टिक गईं हैं कि इस रण में विजय किसकी होती है।

हमसे नहीं अलगाववादियों से करो चर्चा

काश्मीर की स्थिति सुधारने की गरज से वजीरे आजम डॉ.मन मोहन सिंह द्वारा पीडीपी से चर्चा की पेशकश को पीडिपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने ठुकरा दी है। पीडीपी का कहना है कि काश्मीर में अमन अगर लाना है तो वजीरे आजम को चाहिए कि पीडीपी से चर्चा करने के बजाए यह चर्चा घाटी के अलगाववादियों से की जाए। पीडीपी का दो टूक कहना है कि वे तो भारत के साथ हैं, और पीडीपी के नेताओं से चर्चा करने भर से कोई हल निकलने वाला नहीं है। गौरतलब होगा कि पूर्व में कांग्रेस के एक महासचिव और केंद्रीय मंत्री के हवाले से यह खबर आई थी कि पीडीपी नेता सईद घाटी के हालातों को लेकर जल्द ही प्रधानमंत्री से मिलने वाले हैं, किन्तु सईद वर्तमान में चेन्नई में अपने परिवार के साथ हैं और उनकी जल्द वापसी की कोई उम्मीद भी नहीं दिख रही है। पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार अगर घाटी में अमन कायम करना चाह रही है तो अलगाववादियों से चर्चा कर इसका हल निकाला जाना चाहिए।

पुच्छल तारा

देश भर में इन दिनों दो ही चर्चे ज्यादा हो रहे हैं अव्वल तो यह कि कामन वेल्थ गेम्स में खेल खेल में अरबों का खेल हो गया है और दूसरा इस गेम का थीम सांग जिसे बक्का बक्का से हर मायने में बेहतर बनाना है और जो ए.आर.रहमान द्वारा गढ़ा जा रहा है। इसी बातों को जोड़ते हुए शाहजहांनाबाद से मणिका सोनल एक ईमेल भेजती हैं। मणिका लिखती हैं कि रहमान के मन में चाहे जो घुमड़ रहा हो, पर वे यह बात जरूर सोच रहे होंगे कि देश की जनता भले ही कॉमन वेल्थ गेम्स की तैयारियों पर ‘‘हक्का बक्का‘‘ हो रही हो, पर इसका थीम सांग ‘‘वक्का वक्का‘‘ से बेहतर ही होगा।

रविवार, 22 अगस्त 2010

फोरलेन विवाद का सच ------------------ 14

एमपी वाईल्ड लाईफ बोर्ड ने दी थी सड़क बनाने पर सहमति
 
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण विभाग ने फसाया है फच्चर
 
वन क्षेत्र में सड़क निर्माण की अनुमति नहीं जारी हुई अब तक
 
अगर सड़क रूकी तो स्वर्णिम चतुर्भुज की अवधारणा ही हो जाएगी गलत साबित
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 23 अगस्त। सिवनी जिले से होकर गुजरने वाली फोरलेन सड़क को बनाने के लिए मध्य प्रदेश वाईल्ड लाईफ बोर्ड ने अपनी सहमति देकर प्रस्ताव को अनुमोदन के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजा था। केंद्रीय वन एवं पयावरण विभाग ने मध्य प्रदेश सरकार से प्राप्त सारे प्रस्तावों को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया है। यही कारण है कि इस सड़क के कुछ हिस्सों में पड़ने वाले रक्षित वन और पेंच नेशनल पार्क के क्षेत्र में सड़क का काम रोका गया है।
 
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश सरकार की ओर से इस तरह के प्रस्ताव मंत्रालय को प्राप्त हुए हैं जिनमें 1545 में निर्मित लगभग चार सौ पेंसठ साल पुराने इस मार्ग को बरकरार रखने की बात कही गई है। मध्य प्रदेश के वन विभाग और मध्य प्रदेश वाईल्ड लाईफ बोर्ड ने भी इस सड़क के निर्माण में वन्य जीवों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से ज्यादा इस बात की चिंता जताई गई है जिसमें कहा गया है कि अगर मार्ग को रोक दिया गया तो उत्तर से दक्षिण जाने वाले लोगों को बहुत लंबा चक्कर लगाना पड़ सकता है।
 
गौरतलब होगा कि देश के चार महानगरों को आपस में जोड़ने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को प्रस्तावि किया गया था। इस योजना में बाद में उत्तर दक्षिण और पूर्व पश्चिम गलियारे को भी शामिल किया गया था। इस योजना को इस बात को ध्यान में रखकर बनाया गया था कि इस मार्ग के बनने के बाद लोगों का समय और इंधन की बचत हो सके। यही कारण है कि इसका एलाईंमेट बहुत ही बारीकी से बनाया गया था। मार्ग में पड़ने वाले अनेक मोड़ों को भी समाप्त कर सड़क को सीधा ही रखने का प्रयास किया गया था।
 
अगर इस सड़क को लखनादौन से नागपुर, बरास्ता सिवनी, कुरई खवासा होकर नहीं गुजारा जाता है तो लखनादौन से नागपुर की दूरी बढ़ जाएगी, जिससे स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की मूल अवधारणा ही गलत साबित हो जाएगी। बताया जाता है कि एक तरफ एनएचएआई द्वारा यह कहा जा रहा है कि कुरई घाटी में बनने वाले फ्लाई ओवर के निर्माण में आने वाला 900 करोड़ रूपए का खर्च वहन करना विभाग के लिए आसान नहीं है, वहीं दूसरी तरफ इस काम के लगभग दो साल से रूके होने के कारण ठेकेदारों द्वारा विभाग से वसूली की जाने वाली पेनाल्टी की राशि भी करोड़ों में पहुंच चुकी है।
 
बताया जाता है कि रक्षित वन और पेंच राष्ट्रीय उद्यान के भाग में सड़क न बन पाने के पीछे वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की नाराजगी ही प्रमुख है। रमेश के करीबी सूत्रों का कहना है कि इस मामले में अब तक किसी ने भी जयराम रमेश से मिलकर वास्तविकता से आवगत कराने की जहमत नहीं उठाई है।

स्‍वाधीनता दिवस फिर आया

कैसा मना स्‍वाधीनता दिवस

शनिवार, 21 अगस्त 2010

सांसदों के अधिकारक्षेत्र पर सवालिया निशान

खेल खिलाडी का

वेतन भत्तों के लिए नंगा नाच हो रहा है संसद में

घर के लड़का गौहीं चूसें, मामा खाए अमावट

भरपूर सुविधाएं फिर भी सांसदों का नहीं भर रहा पेट

रियाया मरे भूखी पर सांसदों का पेट होना चाहिए भरा

जनता को बेवकूफ ही समझते हैं देश के नीति निर्धारक

आम जनता के लिए क्या किया है सांसदों ने!

वेतन का त्याग और नैतिक मान्यताओं पर उतरना होगा खरा

(लिमटी खरे)

बुंदेल खण्ड की एक मशहूर कहावत है- ‘‘घर के लड़का गोहीं (आम की गुठली) चूसें, मामा खाएं अमावट (आम के रस से तैयार होने वाला एक स्वादिस्ट पदार्थ)।‘‘ जिसका भावार्थ कुछ इस प्रकार है कि घर में बच्चे भूख से परेशान होकर आम के रस निकालने के उपरांत बची गुठली को चूसने पर मजबूर हैं, किन्तु जब माता का भाई (मामा) आता है तो उसी रस को गाढ़ा करने के उपरांत बनाई गई आमवट उसके आगे परोस दी जाती है। इस तरह का सौतेला व्यवहार किया जाता है।

कमोबेश यही आलम देश की सबसे बड़ी पंचायत में बीते गुरूवार और शुक्रवार को देखने को मिला। दोनों ही दिन सांसदों ने अपने वेतन भत्तों को बढ़वाने के लिए जो नग्न नृत्य किया है, वह समूचे देश और दुनिया से छिपा नहीं है। सांसद कितनी संजीदगी के साथ अपने वेतन और भत्तों में कई गुना वृद्धि करवाना चाह रहे थे, और जब उन्हें वोट देने वाली जनता के अधिकार और कर्तव्यों पर बहस की बारी आती है, तो ये माननीय बगलें झांकने लगते हैं। मंहगाई पर संसद ठप्प नहीं होती है, महिला आरक्षण बिल परवान नहीं चढ़ पाता है पर जब अपने खुद के वेतन भत्तों के निर्धारण की बात आती है तब ये माननीय एक स्वर में चिल्ला कर सदन को सर पर उठा लेते हैं।

सवाल यह है कि खुद के वेतन भत्तों का निर्धारण कोई खुद कैसे कर सकता है? यह परंपरा तो कार्पोरेट सेक्टर में ही देखने को मिलती है कि किसी कंपनी का मालिक अपने वेतन भत्ते और सुविधाओं के मामले में स्वयं ही तय कर लेता है, और फरमान सुना देता है। ठीक इसी तरह देश के चुने हुए जनसेवक अपने वेतन भत्तों के बारे में फैसला ले लेते हैं मानो देश की सबसे बड़ी पंचायत एक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गई हो।

दरअसल सांसदों के मन में मेरी साड़ी तेरी साड़ी से सफेद कैसी की भावना घर कर गई है। यही कारण है कि लालू प्रसाद यादव जैसे सांसद सदन में चिल्ला चिल्ला कर यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि उनका ओहदा एक जूनियर क्लर्क से कम है। भले ही यह बात वे वेतन भत्तों के संदर्भ में कह रहे हों पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि सैद्धांतिक मामलों में जनसेवक को नौकरशाहों से कहीं उपर का दर्जा प्राप्त है।

सांसदों की इस दलील पर विचार किया जा सकता है कि उन्हें अपने विशाल संसदीय क्षेत्र में जाकर अपने मतदाताओं की पूछ परख और आवभगत में मौजूदा वेतन भत्तों के चलते काफी दिक्कत होती है। सांसद जब अपने संसदीय क्षेत्र में जाता है तो उसे 13 रूपए किलोमीटर की दर से वाहन का किराया मिलता है, जो बाजार दर के हिसाब से देखा जाए तो विलासिता वाले वाहनों की दर है। इसके अलावा कार्यालय भत्ता 20 हजार रूपए, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 20 हजार रूपए, सत्र के दौरान मिलने वाला भत्ता एक हजार रूपए प्रतिदिन, और वेतन 16 हजार रूपए। कुल मिलाकर एक सांसद को प्रतिमाह छप्पन हजार रूपए तो नकद मिल ही जाते हैं।

इसके आलवा अपनी पत्नी या किसी रिश्तेदार के साथ माननीय साल भर में 34 हवाई उड़ान, रेल गाड़ियों के प्रथम श्रेणी वातानुकूलित में पत्नि या एक रिश्तेदार के साथ असीमित मुफ्त यात्रा, दिल्ली में निशुल्क आवास, दो टेलीफोन जिसमें हर साल 50 हजार लोकल काल मुफ्त, एक अन्य टेलीफोन इंटरनेट के साथ, 04 हजार किलोलीटर पानी और 50 हजार यूनिट बिजली एकदम मुफ्त।

मौजूदा सिफारिशों के अनुसार वेतन पचास हजार रूपए, कार्यालय खर्च चालीस हजार रूपए, संसदीय क्षेत्र भत्ता चालीस हजार रूपए, वाहन का माईलेज 16 रूपए प्रति किलोमीटर तय किया गया है। पूर्व सांसदों को पेंशन आठ के बजाए अब बीस हजार रूपए मिलेगी। इस तरह एक सांसद को प्रतिमाह मिलने वाला कुल वेतन एक लाख तीस हजार रूपए है। क्या यह वेतन उनकी जरूरतं पूरी करने के लिए नाकाफी है।

सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाने की मांग गांधीवादी सोच को तजने और कार्पोरेट सेक्टर की अवधारणा से प्रेरित होने के कारण ही उपजी है। वर्तमान सांसदों को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि लगातार लंबे स्वतंत्रता संग्राम के जिन नैतिक आदर्शों और मूल्यों से भारत का लोकतंत्र और संघीय संसदीय ढांचा पैदा हुआ है, उनमें बहुतेरे सांसद एसे भी हुए हैं जिनके निधन के बाद उनकी कोई संपत्ति तक नहीं थी।

इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष का कथन स्वागतयोग्य है कि जिस समय श्रीमति इंदिरा गांधी सांसद थीं, तब उनका वेतन उनके पायलट पुत्र राजीव गांधी से कम था। जनसेवकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पास प्रधानमंत्री रहते हुए भी फिएट कार खरीदने के पैसे नहीं थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल से उन्हें सीख लेना होगा जिनके निधन के उपरांत उनके बैंक खाते में महज 259 रूपए थे। डॉ.राम मनोहर लोहिया के निधन के वक्त उनके पास भी न तो बैंक बेलेंस ही था और न ही उनका घर द्वार था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आनंद भवन जैसी इमारत को भी राष्ट्र को समर्पित करने में संकोच नहीं किया था।

भारत गणराज्य में 85 करोड़ लोगों की प्रतिदिन की आय 20 रूपए से भी कम है, और सरकार इन्हें प्रस्तावित कर रही है कि ये माननीय प्रतिदिन चार हजार 33 रूपए की दिहाड़ी पर काम करें, जनता के द्वारा ही चुने गए ये माननीय चाहते हैं कि इन्हें पांच हजार पांच सौ रूपए से अधिक की दिहाड़ी मिले। यह कहीं भी संभव नहीं है, किन्तु कांग्रेस के राज में एसा चमत्कार अवश्य ही हो रहा है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी महज बीस रूपए कमाने के लिए सारा दिन मेहनत मजदूरी करने पर विवश है और उसी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई पर टेक्स लगाकर जमा की गई रकम से जनता के चुने हुए नुमाईंदो को हजारों रूपए रोज की दिहाड़ी मुहैया करवाई जा रही है।

कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के इस कदम से निश्चित तौर पर अमीर और गरीब के बीच की खाई में जबर्दस्त इजाफा होने के मार्ग ही प्रशस्त होंगे। होना यह चाहिए था कि संसद में बहस इस बात को लेकर की जाती कि किस तरह देश में मंहगाई कम हो, जनता पर टेक्स का भार कम किया जाए। रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाए जाएं। वस्तुतः एसा हुआ नहीं, संविधान के नीति निर्देशक तत्वों मंे इस बात का उल्लेख साफ तौर पर किया गया है कि सरकार का कोई भी कदम देश में आर्थिक विषमता को बढ़ावा न दे।

देश में बढ़ रही मंहगाई को भी षणयंत्र के तौर पर देखा जाना चाहिए। भारत गणराज्य के नीति निर्धारक यह नहीं चाहते कि गरीब गुरबो में से योग्य लोग आगे आएं। जब मंहगाई अधिक होगी, लोगों की क्रय शक्ति का हास होगा, तो गरीब गुरबा चुनाव लड़ने की सोच ही नहीं सकेगा। गरीबों की मजबूरी होगी कि वे अमीरों और संपन्न लोगों के सामने नतमस्तक हो जाएं। इन परिस्थितियों में भारत गणराज्य की सबसे बड़ी और सूबों की पंचायतें साधन संपन्न और अमीरों की लौड़ी बन ही जाएगी।

एक समय था जब राजनीति को सेवा भाव की दृष्टि से देखा जाता था। जो भी देश के लिए जनता के लिए समर्पण का भाव रखता था, उसे लोग अपना अगुआ (पायोनियर) मानते थे। आजादी की लड़ाई हो या आजादी के उपरांत के साठ के दशक तक देश के नेताओं में नैतिकता का आभास होता था, उस समय नेताओं द्वारा नैतिक मूल्यों को बरकरार रखकर राजनीति की जाती थी, किन्तु अब इस सबकी परिभाषाएं बदल गई हैं। जब राजनीति सेवा के बदले व्यवसाय हो जाए तब एसी स्थिति बनना स्वाभिवक है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि मलाई खाएं और निरीह बेबस जनता उनका मुंह ताकती रह जाए।

फोरलेन विवाद का सच ------------ 13

कमल नाथ और शिवराज मिलकर कर रहे हैं फोरलेन पर राजनीति

हिमांशु कौशल

सिवनी। केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ के नेतृत्व वाला भूतल परिवहन मंत्रालय मध्यप्रदेश में 21 प्रोजेक्ट चला रहे हैं इन 21 प्रोजेक्ट में से 5 प्रोेजेक्ट कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को केन्द्र में रखकर तैयार किये हैं जिससे सिवनी अलग हट जाये और छिंदवाड़ा केन्द्र में आ जाये. उत्तर प्रदेश के कानपुर में जन्मे कमलनाथ द्वारा अपने उŸार प्रदेश के बाद मध्यप्रदेश में ही सबसे ज्यादा प्रोजेक्ट चलाये जा रहे हैं संभ्वतः यही कारण है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सिवनी फोरलेन के मुद्दे को तूल नहीं दे पा रहे हैं.

केन्द्रीय भूतल एवं परिवहन मंत्री श्री कमलनाथ ने जब से भूतल परिवहन मंत्रालय का कामकाज संभाला है उनके नेतृत्व में देश के सभ्ी राज्यों में फोरलेन-टू लेन प्रोजेक्ट बनने आरंभ हो गए हैं, देश में चल रही इन परियोजनाओं में सर्वाधिक प्रोजेक्ट वे उŸार प्रदेश यानी की अपने गृह राज्य में चला रहे हैं इसके बाद दूसरा नंबर आता है मध्यप्रदेश का. उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में वे 29 प्रोजेक्ट चला रहे हैं और मध्यप्रदेश में उनके द्वारा 19 प्रोजेक्ट चलाये जा रहे हैं. म.प्र. में चल रहे इन 19 प्रोजेक्टों में से 5 प्रोजेक्ट मतलब 25 प्रतिशत प्रोजेक्ट उन्होंने केवल अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को केन्द्र में रखकर बनाये हैं.

उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ द्वारा मध्यप्रदेश में जो 19 प्रोजेक्ट चलाये जा रहे हैं उनमें कमल नाथ समर्थक सांसद सज्जन सिंह वर्मा, विधायक सुखदेव पांसे, लखन घनघोरिय आदि के कार्यक्षेत्र में इंदौर से गुजरात/एम.पी. बार्डर तक, भोपाल से बरेली, बरेली से राजमार्ग क्रासिंग, राजमार्ग क्रासिंग से जबलपुर, झाँसी से खजुराहो, भोपाल से साँची, इंदौर से देवास ,ग्वालियर से देवास, बेओरा से राजस्थान बार्डर, बैतूल से नागपुर, जबलपुर से कटनी-रीवा, औबेदुल्लागंज से बैतूल, जबलपुर से मंडला चिल्पी (छ.ग.), नरसिंहपुर से अमरवाड़ा, अमरवाड़ा से उमरानाला छिंदवाड़ा बायपास होते हुए, उमरानाला से रामाकोना होते हुए सौंसर से सावनेर, सिवनी से चौरई होते हुए छिंदवाड़ा, छिंदवाड़ा से मुल्ताई और जबलपुर से लखनादौन तक है. कमल नाथ को चूंकि महाकौषल का नेता माना जाता है अतः उन्होंने जो परियोजनाएं बनवाई हैं उनमें महाकौषल का ज्यादा ध्यान रखा है, किन्तु महाकौषल के केंद्र समझे जाने वाले सिवनी जिले को ‘कमलनाथ के महाकौषल‘ के नक्षे से बाहर कर दिया गया है।

मध्यप्रदेश में चलने वाले फोरलेन-टू लेन प्रोजेक्ट्स में से 5 प्रोजेक्ट केवल छिंदवाड़ा को केन्द्र में रखकर तैयार किये गये हैं. इन पाँँच प्रोजेक्ट में पहले तीन प्रोजेक्ट 01) नरसिंहपुर से अमरवाड़ा, 02) अमरवाड़ा से उमरानाला छिंदवाड़ा बायपास को जोड़ते हुए और 03) उमरानाला से सौंसर होते हुए सावनेर नागपुर के पास तक के हैं. उक्त मार्ग पूर्व में राज्य सरकार के स्वामित्व का स्टेट हाइवे हुआ करता था. इस स्टेट हाईवे को नेषनल हाईवे में तब्दील करवाने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने भेजा और केन्द्रीय मंत्री ने मुख्यमंत्री से मिलकर नेशनल हाइवे घोषित करवा लिया और इसका नाम नेशनल हाइवे क्रमांक 26 बी रख दिया गया.

इसी प्रकार केन्द्रीय मंत्री श्री नाथ ने सिवनी से चौरई होते हुए छिंदवाड़ा और छिंदवाड़ा से मुल्ताई तक के स्टेट हाइवे को भी मुख्यमंत्री के साथ मिलकर नेशनल हाइवे घोषित करवा इसका नाम नेशनल हाइवे क्रमांक 69 ए घोषित कर दिया है.

केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ द्वारा 26 बी,, 69 ए नामक दो नयी नेशनल हाइवे केवल अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को नरसिंहपुर से नागपुर और सिवनी से मुल्ताई के केन्द्र में बनाये जाने हेतु घोषित किया गया है जिसमें प्रदेश सरकार ने अपनी सहमति दी है. नक्शे में यह भ्ी देखा जा सकता है कि छिंदवाड़ा के पास ही नेशनल हाइवे प्रोजेक्ट सबसे सघन है. उल्लेखनीय है कि स्टेट हाइवे को नेशनल हाइवे में बदलने के लिये राज्य शासन की सहमति की सहमति के साथ राज्य सरकार की ओर से प्रस्ताव अनिवार्य होता है. बिना प्रदेश सरकार की सहमति ओर प्रस्ताव के केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को नेशनल हाइवे का जंक्शन नहीं बना सकते थे. इससे स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ प्रदेश के मुखिया श्री शिवराज सिंह चौहान के साथ मिलकर सिवनी फोरलेन की बलि चढ़ा रहे हैं.

गौरतलब है कि यदि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के दृष्टिकोण से देखा जाये तो वे प्रदेश के मुखिया हैं और उन्हें पूरे प्रदेश का विकास देखना है यदि वे सिवनी फोरलेन के मुद्दे को तूल देते हैं और उनके ऐसा करने से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ प्रदेश में चल रही परियोजनाओं को रोक लेते हैं तो इससे पूरे मध्य प्रदेश का भरी नुकसान होगा. संभवतः यही कारण होगा कि मुख्यमंत्री सिवनी के मुद्दे पर चुप बैठना ज्यादा पसंद कर रहे हैं. गौरतलब होगा कि गुरूवार को मघ्य प्रदेष भवन में संपन्न पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चौहान ने एक तरफ जहां केंद्र सरकार और उसके मंत्रियों को आड़े हाथों लिया था वहीं दूसरी और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफ में कषीदे भी गढ़े थे।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पूरे देश में नेशनल हाइवे की सबसे ज्यादा लंबाई उŸार प्रदेश में है और फिर उसके बाद मध्य प्रदेश का नंबर आता है. यही कारण है कि केन्द्रीय मंत्री श्री नाथ से अगर मध्यप्रदेश में इतनी उदारता दिखाये जाने का कारण पूछा जायेगा तो इस प्रश्न का विशुद्ध राजनैतिक जवाब शायद यही दिया जायेगा कि कि उŸार प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश ही एक ऐसा राज्य है जहाँ नेशनल हाइवे की लंबाई सबसे ज्यादा है इसीलिये उŸार प्रदेश के बाद वे मध्यप्रदेश में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.

बहरहाल अगर राष्ट्रीय स्तर और प्रदेश स्तर पर देखा जाये तो केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ कहीं गलत नहीं कर रहे हैं और न ही मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान गलत सोच रहे हैं. श्री नाथ द्वारा पूरे मध्यप्रदेश में नेशनल हाइवे का जाल बिछाया जा रहा है जिससे मध्यप्रदेश के विकास में गति मिलेगी. इसी के साथ-साथ वे अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को राष्ट्रीय राजमार्ग का जंक्शन जैसा बना रहे हैं तो यह भ्ी ठीक है क्योंकि वे उस क्षेत्र का वर्षों से प्रतिनिधित्व करते हैं तो उसका विकास करना उनकी जिम्मेदारी है.

यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं? सिवनी में भूतल परिवहन मंत्री के समर्थक माने जाने वाले विधानसभ उपाध्यक्ष श्री हरवंश सिंह और प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष श्रीमती नीता पटैरिया जैसी नेत्री सिवनी विधायक हैं इसके बाद भी सिवनी के साथ लगातार अन्याय ही होता आया है सिवनी वासियों को न बड़ी रेल लाइन मिली न ही संभाग मुख्यालय बनाया जा रहा है न यहाँ एफ.एम. अथवा कम्युनिटी रेडियो आया, न तो एस्टोटर्फ का स्टेडियम ही बन पाया और तो और रही सही कसर लोकसभा सीट जाने से पूरी हो गई है।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

पवार उवाच ‘‘सड़ जाए अनाज पर मुफ्त नहीं बाटेंगे‘‘

भरे पेट लोगों को क्यों होने लगी भूखों की चिंता

भूखे पेट न हों भजन गोपाला

भुखमरी के आंकड़े हैं देश में भयावह

हजारों टन सड़ जाता है अनाज हर साल

लचर सरकारी सिस्टम है जवाबदार

(लिमटी खरे)

देश की सबसे बड़ी अदालत भले ही सरकार को फटकार लगाकर अनाज को सड़ने के बजाए गरीबों में मुफ्त बांटने की बात कह रही हो पर आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार के कानों में जूं रेंगने वाली नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने एक ही पखवाड़े में दो बार सरकार को आड़े हाथांे लेते हुए अनाज के मामले में टिप्पणी की है। पिछले महीने के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिस देश में लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हों वहां अन्न का एक भी दाना बरबाद नहीं होना चाहिए। अब सर्वोच्च न्यायालय ने देश में सड़ते अनाज पर सरकार को फटकारा है कि अनाज के सड़ने के बजाए उसे गरीबों में निशुल्क बांट दिया जाना चाहिए। वैसे भी अन्न की बरबादी एक बहुत ही बड़ा अपराध ही माना जाता है।

दुनिया भर के भूखे लोगों में हर पांचवा शख्स भारतीय है। भारत में तकरीबन पचास फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इतना ही नहीं वर्ल्ड फुड प्रोग्राम का प्रतिवेदन बताता है कि देश के लगभग पच्चीस करोड़ लोग हर रात को आधे या भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। भूख सब कुछ करवा देती है। देश में तेजी से बढ़ता अपराध का ग्राफ भी कमोबेश यही कहानी कह रहा है कि खाने को तरसने वाले खाने के जुगाड़ में हर स्तर पर उतरने को तैयार हैं।

सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाने पर विचार किया जा रहा है। यह खुशफहमी चंद दिनों के लिए जनता को हो सकती है कि उसके शासक उसकी दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने जा रही है। यक्ष प्रश्न यह है कि कानून बनाने से भला क्या फायदा जब उसका पालन ही सुनिश्चित न हो। शिक्षा के अधिकार कानून के बाद कितने राज्यों में इसे लागू किया गया है। और छोडिए जनाब यह बताईए कि केंद्रीय स्तर पर चल रही शिक्षण संस्थाओं में आरटीई के क्या हाल हैं?

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में लोक लुभावन वादों के तहत यह भी कहा था कि गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवन यापन करने वाले परिवारों को हर माह तीन रूपए की दर से पच्चीस किलो चावल उपलब्ध करवाएगी। यूपीए सरकार का यह दूसरा कार्यकाल का दूसरा साल है, पर बीपीएल परिवार आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद में ही उलझा हुआ है। सवाल यह है कि बीपीएल का आधार क्या है, किस लक्ष्मण रेखा के पार रहने वालों को बीपीएल माना जाए। देखा जाए तो संपन्न और ताकतवर लोग बीपीएल की सूची में अपना नाम दर्ज करवाकर सारे लाभ उठा रहे हैं, और वास्तविक बीपीएल आज भी कमर तोड़ मंहगाई में उलझा हुआ है।

इस सब पर अनाज सड़ने की खबरें जले पर नमक का ही काम करती हैं। एक ओर खाने को नहीं है दाना और दूसरी ओर हजारों टन अनाज को रख रखाव के अभाव में सड़वा दिया गया। कुछ साल पहले केंद्र सरकार के कृषि विभाग ने निजी तौर पर वेयर हाउस बनवाने के लिए तगड़ी सब्सीडी की घोषणा की थी। साधन और पहुंच सम्पन्न लोगों ने इस योजना का लाभ उठाकर अपने बड़े बड़े गोदाम अवश्य बनवा लिए। अनेक गोदाम तो महज कागजों पर ही बन गए और सब्सीडी डकार ली गई। सवाल फिर वही खडा हुआ है कि इन गोदामों को बनाने के लिए सरकार ने अपनी ओर से राशि क्यों दी थी, जाहिर है अनाज को सड़ने से बचाने के लिए इन वेयर हाउस को सरकार किराए पर लेती। सरकार को चाहिए था कि सब्सीडी देते समय ही इस बात की शर्त रख दी जाती कि बारिश के चार माहों के साथ आधे साल के लिए इन गोदामों को सरकार को किराए पर देना वेयर हाउस मालिक के लिए आवश्यक होगा, तभी सब्सीडी दी जाएगी। अगर एसा होता तो आज देश भर की कृषि उपज मंडियों के प्रांगड में पड़ा अनाज सड़ा न होता।

एसा नहीं है कि अनाज पहली बार सड़ा हो। साल दर साल अनाज के सड़ने की खबरें आम हो रही हैं। पिछले साल ही पश्चिम बंगाल के एक बंदरगाह पर अरबों रूपए की आयतित दाल सड़ गई थी। किसान के खून पसीने से सींचे गए अनाज के दानों को सरकार संभाल नहीं पाती है। एक अनुमान के अनुसार हर सल करीब पचास हजार करोड़ रूपए का अनाज सरकारी कुप्रबंध के कारण मानव तो क्या मवेशी के खाने के लायक भी नहीं बचता है। अमूमन बफर स्टाक के चलते सरकार द्वारा जरूरत से ज्यादा अनाज खरीद लिया जाता है, पर उसके रख रखाव के अभाव में यह सड़ जाता है।

जब अनाज के सड़ने की खबरें बाजार में आती हैं तो कालाबाजारी करने वाले जमाखोरों के चेहरों पर रोनक आ जाती है। जमाखोरों द्वारा इन स्थितियों में बाजार में जिंस की कृत्रिम किल्लत पैदा कर तबियत से मुनाफा कमाया जाता है। दरअसल भारतीय खाद्य निगम की व्यवस्थाओं में ही खोट है। भारतीय खाद्य निगम ने जगह जगह अपने गोदाम अवश्य बनाए हैं पर वे नाकाफी ही हैं। सरकार को चाहिए कि कृषि विभाग से अनुदान पाकर गोदाम बनवाने वालों की सूची जिला स्तर पर बनवाई जाए और उनका किराया निर्धारित कर हर जिले के कलेक्टर पर यह जवाबदारी डाली जाए कि उस जिले की कृषि उपज मंडियों के माध्यम से की जाने वाली सरकारी अनाज की खरीद के सुरक्षित रख रखाव का जिम्मा जिला कलेक्टर का ही होगा। अगर केंद्र सरकार द्वारा इस तरह का कड़ा कदम उठा लिया गया तो अनाज की बरबादी काफी हद तक रोकी जा सकती है।

वैसे अनाज के सुरक्षित भण्डारण के लिए कंेद्र सरकार को चाहिए कि वह राज्यों को वित्तीय सहायता मुहैया करवाकर राज्यों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करे। जिलों में पदस्थ जिलाधिकारी चूंकि अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते हैं, इस लिहाज से वे केंद्र सरकार के अधीन भी होते हैं, पर दूसरी तरफ देखा जाए तो जिला कलेक्टर सीधे सीधे राज्य शासन के प्रति जवाबदेह ज्यादा होते हैं, इस तरह जिला कलेक्टर पूरी तरह राज्यों के नियंत्रण में हुआ करते हैं। देखा जाए तो अनाज के सड़ने के लिए राज्यों की सरकारें भी कम जवाबदेह नहीं हैं। अमूमन राज्य सरकारें समय पर अपना निर्धारित कोटा नहीं उठाती हैं, इसीलिए अनाज सड़ भण्डारण के अभाव में सड़ जाता है। गरीब गुरबों के लिए आंसू बहाने वाली राज्य सरकारें इस दिशा में पूरी तरह से लापरवाह ही हैं।

इधर अनाज के सड़ने की खबर से देश की सबसे बड़ी अदालत का आक्रोश लोगों को दिखा वहीं सियासत के धनी केंद्रीय कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार कह रहे हैं कि खाद्यान्न सड़ने की खबरों को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। शरद पवार का कथन और राज्य सभा में कृषि राज्य मंत्री प्रो.के.वी.थामस के दिए वक्तव्य में असमानता ही दिख रही है। अब केंद्रीय कृषि मंत्री का नया बयान आ गया है कि भले ही बर्बाद हो जाए अनाज पर गरीबों के मुफ्त में इसे नहीं बांटा जा सकता है। खुद कृषि मंत्री ने पिछले महीने ही लोकसभा में जानकारी दी थी कि 6 करोड़ 86 लाख रूपए मूल्य का 11 हजार 700 टन अनाज बर्बाद हो गया।

देश का कृषि मंत्रालय निर्दलीय पी.राजीव और के.एन.बालगोपाल के पूछे प्रश्न पर उत्तर देते हुए कहता है कि देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। 01 जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया। पिछले साल 2010 टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ था। 2008 - 2009 में 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल बरबाद हुआ था। वर्ष 2007 - 2008 में 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह देखा जाए तो तीन सालों में देश के एफसीआई के गोदाम कुल 3881 टन गेंहू और 55 हजार 458 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह इस साल 01 जुलाई तक के खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार सालांे में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज बरबाद हुआ है।

सरकार चाहे केंद्र की हो राज्यों की हर कोई बस गरीब गुरबों की चिंता में दुबले होने का स्वांग ही किया करते हैं। वस्तुतः गरीब गुरबों की फिकर किसी को भी नहीं है। देश के नौकरशाह और जनसेवक जब विलासिता भरी जिंदगी जी रहे हों, उनके वेतन भत्ते आसमान को छू रहे हों, और उनका पेट भरा हो तो भला फिर उन्हें क्यों गरीब गुरबों की फिकर होने लगी। हां वे चिंता जरूर जताते हैं, पर वह चिंता सिर्फ दिखावटी ही होती है, क्योंकि अगर उन्होंने चिंता जताने का दिखावा नहीं किया तो चुनावों के दौरान उन्हें वोट क्यों देगी यही जनता।

राज्‍यों से छिनेगा शिक्षकों की भर्ती का मामला

शिक्षा का अधिकार कानून के प्रति संजीदा हुई केंद्र सरकार

सूबाई सियासत से शिक्षक भर्ती प्रक्रिया अलग करने की कवायद

प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश को अमली जामा पहनाया एचआरडी ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 20 अगस्त। शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बाद केंद्र और राज्य सरकारांे के बीच चल रही रस्साकशी के बीच अब केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के हाथ से शिक्षकों की भर्ती को अलग करने का फरमान जारी कर दिया है। केंद्र सरकार ने एक परिपत्र जारी कर राज्य सरकारों से कहा है कि वे अपने अपने सूबों में शिक्षकों की नियुक्ति का काम अलग संस्थानों के माध्यम से करवाएं।

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा राज्यों को जारी एक पत्र में कहा गया है कि राज्यों की सरकारें शिक्षक भर्ती बोर्ड का गठन कर शिक्षकांे की भर्ती के काम को अपने से अलग करंे। इससे शिक्षकों की गुणवत्ता को बरकरार रखने के साथ ही साथ शालाओं में रिक्त पदों की संख्या में कमी आएगी और भर्ती प्रक्रिया को सुचारू बनाया जा सकेगा।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कुछ समय पूर्व अस्तित्व में आई किन्तु धूल खा रही प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों को लागू करना अब जरूरी हो गया है। सूबाई सरकारें शिक्षकांे की नियुक्ति तो करती हैं, किन्तु उसके पास शिक्षकों व्यापक स्तर पर भर्ती के लिए बुनियादी तंत्र ही मौजूद नहीं है।

गौरतलब है कि राज्य सरकारों द्वारा अपनाई जाने वाली भर्ती प्रक्रिया में भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार की गूंज होती रही है। इनमें गड़बड़ी होने से मामला कोर्ट कचहरी में सालों साल उलझा रहता है, साथ ही साथ अप्रशिक्षित और अयोग्य लोगों को इसमें मौका मिल जाता है जिससे योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक निजी शालाओं में हजार से तीन हजार रूपए तक की नौकरी करने पर मजबूर हो जाते हैं।

वैसे भी शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बाद राज्यों की सरकारें शिक्षकों की भर्ती में पूरी तरह नाकाम रही हैं। यही कारण है कि देश में आज भी आठ लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है। केंद्र सरकार ने इस कमी और राज्यों की भर्ती प्रक्रिया को देखते हुए कहा है कि सरकारें इसके लिए स्वायत्त एजेंसी अथवा बोर्ड का गठन करे, और इस प्रक्रिया से खुद को प्रथक रखें। इस प्रक्रिया में शिक्षकों की भर्ती बारह माह जारी रहेगी। इसमें भर्ती की प्रक्रिया बेंकिंग भर्ती बोर्ड और रेल्वे भर्ती बोर्ड की तर्ज पर रखी जाने की उम्मीद है।

गरीब बुनकरों से क्‍या बुराई है कांग्रेस की

बुनकरों के हाथ काटने की तैयारी में कांग्रेस

चरखा अब चलेगा सौर उर्जा से

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 20 अगस्त। पता नहीं क्यों सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के गौरवशाली शालका पुरूष रहे राष्ट्रपिता महत्मा गांधी कांग्रेस के नए निजामों के निशाने पर हैं? पहले गांधी जयंती पर केंद्र सरकार द्वारा खादी को प्रोत्साहित करने वाली 20 फीसदी की छूट को समाप्त कर दिया अब आजादी की लड़ाई में चरखा चलाकर स्वदेशी का संदेश देने के कार्यक्रम पर कांग्रेस की नजर लग गई है। आने वाले समय में बुनकरों के द्वारा चलाए जाने वाला चरखा सौर उर्जा या बिजली से चलाया जाएगा।

कांग्रेस के नए निजाम चरखे के स्वरूप और चरित्र को ही बदलने का ताना बाना बुन रहे हैं जो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में ‘‘आजादी का बाना‘‘ था। गौरतलब होगा कि महत्मा गांधी ने अहिंसा आंदोलन में खादी और चरखे को रचनात्मकता के साथ स्वराज आंदोलन का एक प्रतीक बनाया था। बापू ने उस समय देश के लगभग तीस हजार गांव के 20 लाख बुनकरों को एक सूत्र में पिरोकर आजादी की अहिंसक लड़ाई के लिए प्रोत्साहित किया था।

हालात देखकर यह लगने लगा है कि देश पर आजादी के उपरांत आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी के द्वारा प्रेरित खादी कार्यक्रम को समूल ही नष्ट करने की जुगत लगाई जा रही है। खादी संस्थाएं केंद्र सरकार के इस कदम के खिलाफ खड़ी नजर आ रही हैं। संस्थाओं का मानना है कि अगर चरखे को बिजली या सौर उर्जा से चलाया जाएगा तो हाथ से तैयार सूत और मिलों में तैयार सूत में क्या अंतर रह जाएगा।

गौरतलब होगा कि खादी के उत्पादन पर विशेष जोर देने वाले मोहन दास करम चंद गांधी ने खादी के उत्पादन में किसी भी तरह की मशीन की इजाजत नहीं दी थी। वैसे भी अगर खादी उत्पादन में मशीनों का प्रयोग होने लगेगा तो बुनकरों के सामने आजीविका की जबर्दस्त समस्या खड़ी होने की उम्मीद है, क्योंकि बिजली या सौर उर्जा से चलने वाला चरखा निस्संदेह कम से कम दस बुनकरों के हाथ का काम छीन लेगा।

उल्लेखनीय होगा कि चरखे से सूत कातकर खादी का निर्माण कुटीर उद्योगों की श्रेणी में आता है, और इससे अशिक्षित भी इसका प्रयोग कर अपनी आजीविका चला सकता है। इसके लिए अधिक मेहनत की आवश्यक्ता भी नहीं होती है। यह काम घरेलू महिलाएं भी अपने खाली समय में आसानी से कर सकती हैं। अस्सी के दशक के आरंभ तक देश के विद्यालयों में क्राफ्ट का एक कालखण्ड होता था, जिसमें बच्चों को कतली पोनी और चरखे के माध्यम से कपास से सूत कातना सिखाया जाता था, कालांतर में चरखा और कतली पोनी इतिहास की वस्तु हो बन गई हैं।

एक तरफ गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर और सदी के महानायक गुजरात में बापू के आश्रम में जाकर चरखा चलाकर खादी अपनाने का संदेश दे रहे हैं, दूसरी ओर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा गरीब बुनकरों के हाथ काटने के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं, जिसकी निंदा और विरोध किया जाना चाहिए। वैसे भी कल तक जनसेवकों की पहली पसंद मानी जाने वाली खादी का स्थान अब टेरीकाट, पालिस्टर जीन्स, कार्टराईज आदि ने ले लिया है।

फिल्‍म समीक्षा : लफंगे परिंदे

लफंगे परिंदे : अनोखी प्रेम कहानी

लफंगे परिंदे कहानी है मुंबई की गलियों में रहने वाले युवाओं के एक समूह की, जो स्टाइल का दीवाना है, जिनमें एटिट्यूड है और सितारों तक पहुँचने की चाह है। साथ ही यह नंदू (नील नितिन मुकेश) और पिंकी (दीपिका पादुकोण) की प्रेम कहानी भी है जो दोस्त से प्रेमी बन जाते हैं।

नंदू बड़ा अजीब इंसान है। ऐसा लगता है कि वह फाइट करने के लिए ही पैदा हुआ है। उसे वन-शॉट नंदू कहा जाता है। गलियों में होने वाली फाइटिंग में उसका कोई मुकाबला नहीं है। जीतने के लिए वह क्रूर और जंगली बन जाता है। आँखों पर पट्टी बाँधकर वह बॉक्सिंग की रिंग में अपने प्रतिद्वंद्वी को नॉक आउट कर देता है। यह वन शॉट अपनी शर्तों पर जिंदगी जीता है और अपने दोस्तों के बीच हीरो है। पिंकी से मुलाकात होते ही अचानक सब कुछ बदलने लगता है।

अब बात करते है पिंकी पालकर की। वह दृष्टिहीन है, लेकिन किसी से कम नहीं। उसे टेलेंट का पॉवरहाउस कहा जाता है। एक मॉल में वह बोरिंग-सा ‘9 टू 5’ जॉब करती है। स्केट पहन कर वह शानदार डांस करती है। प्रतिभाशाली, मजबूत इरादे वाली इस लड़की के ऊँचे सपने हैं। शख्सियत उसकी ऐसी है कि ज्यादातर लोग उससे घबराते हैं। उसकी इच्छा है कि वह अपने इलाके के ‘लूज़र्स’ से ऊँचा उठकर खुद अपनी एक जगह बनाए। अपने टेलेंट के जरिये साबित कर सके कि वह भी जिंदगी की दौड़ में जीत सकती है। इस राह में उसकी एक छोटी सी प्राब्लम है वह उसका अंधा होना।

‘लफंगे परिंदे’ एक आँखों पर पट्टी बाँधकर लड़ने वाले स्ट्रीट फाइटर और दृष्टिहीन डांसर की कहानी है जो अपने चार दोस्तों के साथ असंभव को हासिल करने की यात्रा पर निकलते हैं। अब तो ये फिल्म ही बताएगी।



स्टारकास्ट



बैनर : यशराज फिल्म्स

निर्माता : आदित्य चोपड़ा

निर्देशक : प्रदीप सरकार

संगीत : आर. आनंद

कलाकार : नील नितिन मुकेश, दीपिका पादुकोण

फोरलेन विवाद का सच ------------ 12


दिल्ली में गूंजा सिवनी का फोरलेन का विवाद

गुरूवार को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकार वार्ता में कहा कि सिवनी के साथ केंद्र सरकार अन्याय कर रही है। मुख्यमंत्री ने कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सन 1545 में शेरशाह सूरी द्वारा बनाए गए एतिहासिक महत्व के मार्ग को बंद करने का षणयंत्र रच रही है। जब इस मामले में मुख्यमंत्री के समक्ष सिवनी के तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के द्वारा 18 दिसंबर को जारी आदेश के बारे में पूछा गया तो मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ही इसे रोक रही है, जिला कलेक्टर का आदेश कब का है, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। इसके उपरांत जब दस्तावेज उनके समक्ष रखे गए तो मुख्यमंत्री ने दस्तावेज अपने पास रखकर इस मामले को गंभीरता से देखने की बात की है।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अगस्त। ‘‘कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश के साथ अन्याय किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है। अगर केंद्र सरकार को भाजपा से कोई गिला शिकवा है तो वह भाजपा के साथ अपना संघर्ष करे, किन्तु मध्य प्रदेश की साढ़े छः करोड़ गरीब जनता के साथ अन्याय करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। देश में संघीय व्यवस्था लागू है, हम भीख नहीं अपना अधिकार मांग रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा कोयला, खाद्यान्न, इंदिरा आवास, सड़क आदि सभी मामलों मंें मध्य प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। एक षणयंत्र के तहत सन 1545 में बनाए गई सड़क को सिवनी जिले के पेंच के उद्यान के बहाने से समाप्त करना चाह रही है।‘‘ उक्ताशय की बात आज मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश भवन में आयोजित पत्रकार वार्ता में कही।

मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश के विद्युत तापग्रहों 170 लाख मीट्रिक टन कोयले के स्थान पर महज 136 मीट्रिक टन कोयला ही प्रदाय किया जा रहा है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में बिजली के उत्पादन में वर्ष 2009-2010 में 539.71 मिलियन यूनिट और 01 अप्रेल से 18 अगस्त तक 535.65 यूनिट की कमी आई है। मध्य प्रदेश की खदानों का कोयला अन्य राज्यों को दे दिया जा रहा है, और मध्य प्रदेश को अन्य राज्यों से कोयले की आपूर्ति किए जाने को अव्यवहारिक बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कोयले के आवंटन का युक्तियुक्तकरण होना अनिवार्य है।

शिवराज सिंह चौहान ने आगे कहा कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की तादाद अंत्योदय कार्ड सहित मध्य प्रदेश में 67 लाख 70 हजार है, किन्तु भारत सरकार द्वारा महज 41 लाख 25 हजार लोगों को ही बीपीएल मानकर अनाज मुहैया करवाया जा रहा है, जिससे 26 लाख 45 हजार परिवार आज भी 35 किलो प्रति परिवार की दर से अनाज पाने से वंचित हैं। श्री सिंह ने कहा कि योजना आयोग के सदस्य सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने अपने प्रतिवेदन में सूबे के 48.6 फीसदी लोगबों को निर्धन बताया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए उन्होने कहा कि एक ओर तो अनाज सड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार जरूरत मंदों के नाम सूची से काटकर उन्हें अनाज से वंचित कर रही है।

इंदिरा आवास के बारे में मुख्यमंत्री ने कहा कि इस योजना में तो केंद्र सरकार ने पक्षपात की सारी हदें ही पार कर दी हैं। राज्यों के लिए लक्ष्यों का निर्धारण जनगणना के आधार पर किया जाता है। असम की आबादी दो करोड़ 32 लाख है वहां 22 लाख 41 हजार, और एम पी में जहां चार करोड़ 43 लाख ग्रामीण आबादी होने के बाद भी आवासों की कमी महज दो लाख आठ हजार ही बताई जा रही है।

सड़कों की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में बनाई गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश ने 26 हजार 578 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है, जो अपने आप में एक रिकार्ड है। मध्य प्रदेश सड़कों के मामले में सदा ही नंबर वन रहा है। पत्रकारों ने जब भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के द्वारा मध्य प्रदेश को पर्याप्त सहयोग देने की बात और उस दौरान मध्य प्रदेश के लोक कर्म मंत्री के उनके साथ खड़े होकर हां में हां मिलाने की बात कही गई तब मुख्यमंत्री ने कहा कि लोक निर्माण मंत्री क्या हम भी उनके साथ बैठते हैं, पर सच्चाई यह है कि मध्य प्रदेश के लिए जितनी सड़कें दी गईं हैं, वे कुछ जिलों तक ही सीमित हैं। साथ ही साथ इसके लिए आठ सौ करोड़ रूपए की राकि स्वीकृत किए हैं, पर आवंटन मिला है महज 193 करोड़ रूपए ही।

उत्तर दक्षिण गलियारे के बारे में चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि शेर शाह सूरी के जमाने के एतिहासिक महत्व के इस राजमार्ग को पेंच नेशनल पार्क के नाम पर षणयंत्र कर केंद्र सरकार द्वारा सिवनी जिले के लोगों के साथ सरासर अन्याय किया जा रहा है। जब मुख्यमंत्री से यह पूछा गया कि काम को तो सिवनी के तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के आदेशों से रोका गया है, तो उन्होंन कहा कि इस बारे में उन्हें पता नहीं है कि किस पत्र की बात की जा रही है।

पत्रकार वार्ता के उपरांत पत्रकार लिमटी खरे ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से सिवनी जिले के साथ होने वाले अन्याय पर विस्तार से चर्चा की और इस मामले के हर पहलू से मुख्यमंत्री को आवगत कराया। मुख्यमंत्री को कागज दिखाकर श्री खरे ने बताया कि वनमण्डलाधिकारी दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डल और जिला कलेक्टर के तत्कालीन आदेश दिखाकर उन्हें वास्तविकता बताइ्र गई कि गैर वन भूमि पर सड़क निर्माण का काम किस कारण रूका है। साथ ही यह भी बताया गया कि चूंकि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा इस मामले में अभी तक अपनी सहमति देते हुए अनुमति प्रदान नहीं की गई है, इस कारण वन भूमि पर काम आरंभ नहीं किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने बात को गंभीरता से सुनते हुए सारे प्रपत्र अपने पास रखकर इस मामले में ठोस कार्यवाही करने का आश्वासन दिया। इस दौरान मुख्यमंत्री के साथ मध्य प्रदेश के भाजपाध्यक्ष प्रभात झा भी मौजूद थे।