बुधवार, 18 मई 2011

प्रहलाद पटेल को लाया जा सकता है मुख्य धारा में


गड़करी तलाश रहे हैं सही तारणहार

चर्चा में है गड़करी का ब्राम्हण बनिया प्रेम

पांच राज्यों में भाजपा के प्रदर्शन से उखड़ा है भाजपाध्यक्ष का मूड

रामलाल पर साध रहे विरोधी निशाना

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। पांच राज्यों में आठ सौ से ज्यादा सीटों के बावजूद भी महज छः सीट मिलने से भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलक आई हैं। भाजपाध्यक्ष को लगने लगा है कि उन्हें जिस चैकड़ी ने घेर रखा है उसके सहारे अगले साल होने वाले आम चुनावों में भाजपा कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाएगी।

केंद्र में सत्ता की मलाई चखने का सपना देखने वाली भारतीय जनता पार्टी द्वारा हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडू, पड्डिचेरी और केरल में कुल 824 सीटों में से एक फीसदी अर्थात आठ सीट भी नहीं जीत पाई है। पार्टी को असम में पांच और बंगाल में महज एक सीट ही मिल पाई है। भाजपा के अंदर ही अंदर अब यह बात होने लगी है कि खुद को राष्ट्रीय पार्टी और केंद्र में सरकार बनाने का दावा करने वाली भाजपा इन राज्यों में आखिर फेल क्यों हो गई। कहीं इसके पीछे गड़करी का ब्राम्हण बनिया प्रेम तो नहीं?

भाजपा में वर्चस्व की मची जंग के चलते दूसरी पंक्ति के नेता कमल की जड़ों को मजबूत करने के बजाए एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। उधर भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी को भाजपा के अंदर मनमोहन सिंह कहा जा रहा है, क्योंकि दोनों ही चुनाव लड़ने से परहेज करते आए हैं।

भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भाजपा के नए नवेले संगठन मंत्री रामलाल द्वारा भी गड़करी के ब्राम्हण बनिया के एजेंडे को हवा दी जा रही है। सूत्रों की मानें तो रामलाल द्वारा रघुवरदास से लेकर विजय गोयल को बेक सपोर्ट दिया जा रहा है। सूत्रों ने कहा है कि पांच राज्यों के चुनावों के उपरांत अब गड़करी संगठन में युवा और उर्जावान चेहरों को विशेष स्थान देने पर विचार कर रहे हैं। इसी तारतम्य में पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के असंगठित मजदूर संघ के अध्यक्ष प्रहलाद सिंह पटेल को उनकी वर्तमान जवाबदारी के साथ ही साथ संगठन में महत्वपूर्ण पद पर काबिज किया जा सकता है।

यूपी में फिर प्रकाशित होंगे कांग्रेस के पुराने अखबार



फिर आरंभ होगा कांग्रेस के मुखपत्रों का प्रकाशन

नई दिल्ली (ब्यूरो)। उत्तर प्रदेश के सेमीफायनल पर कांग्रेस का भविष्य टिका है, यही कारण है कि यूपी में कांग्रेस कोई भी मौका छोड़ने को तैयार नहीं है। राहुल और सोनिया गांधी नपी तुली रणनीति के हिसाब से यूपी में अपनी बिसात बिछाते जा रहे हैं। इसी तारतम्य में जल्द ही उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के मुखपत्रों नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज का पुर्नप्रकाशन आरंभ होने वाला है।
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कार्यकर्ताओं तक कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी की आवाज पहुंचाने के लिए पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा बनाए गए ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित इन अखबारों का प्रकाशन आरंभ करवाया जाने वाला है। गौरतलब होगा कि वित्तीय संकट के चलते अप्रेल 2008 में इन्हें बंद कर 40 पत्रकारों और 265 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृति प्रदान कर दी गई थी।
सूत्रों ने आगे बताया कि राहुल गांधी के राजनैतिक सलाहकारों ने उन्हें मशविरा दिया है कि नवजीवन और कौमी आवाज को लखनऊ से तथा नेशनल हेराल्ड को लखनऊ के साथ ही साथ दिल्ली से प्रकाशित करवाया जाए। जल्द ही इसके लिए भर्तियां भी होने वाली हैं। कहा जा रहा है कि इसका प्रकाशन पंडित नेहरू के जन्म दिन अर्थात बाल दिवस से किया जा सकता है।

मंगलवार, 17 मई 2011

कर्नाटक प्रकरण: कटघरे में राजनैतिक शुचिता



कर्नाटक प्रकरण: कटघरे में राजनैतिक शुचिता

 (लिमटी खरे)


हाशिए में गए कांग्रेस के पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज पुनः सक्रिय राजनीति में लौटने लालायित दिखाई दे रहे हैं। जानकारों का मानना है कि वे अनाप शनाप फैसले इसलिए ले रहे हैं, ताकि कांग्रेस आलाकमान उनका राजनैतिक वनवास समाप्त कर केंद्रीय मंत्री मण्डल में उन्हें वापस बुला ले। गौरतलब होगा कि पूर्व मंे बूटा सिंह ने राज्यपाल रहते कांग्रेस को नीचा दिखाया बाद में उन्हंे वापस बुला लिया गया था। यह अलहदा बात है कि उनका राजनैतिक पुनर्वास पूरी तरह से नहीं हो सका था। भाजपा जिस तरह से आक्रमक हो रही है, उसे देखकर लगने लगा है कि जल्द ही भारद्वाज की राजभवन से बिदाई तय है। इस घिनौने खेल में राजनैतिक शुचिता और राजभवन की गरिमा तार तार हुए बिना नहीं है। विधि मामलों के महारथी हंसराज भारद्वाज से इस तरह के कदम की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है।

कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है, उसे समूचा देश देख रहा है। पांच राज्यों के चुनाव भी समाप्त हो चुके हैं इसलिए इस वक्त बर्निंग टापिक कर्नाटक ही है। अगर चुनाव के चलते यह हुआ होता तो देश की निगाहें इस पर ज्यादा न जाती और मीडिया भी इस खबर को ज्यादा तवज्जो नहीं देता। वस्तुतः जल्दबाजी में कर्नाटक के महामहिम राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर डाली,जिसे आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। भारद्वाज ने येदियुरप्पा को हटाने की कोशिश तीसरी मर्तबा की है, इससे साफ है कि उनका एक सूत्रीय एजेंडा कर्नाटक में तख्ता पलट ही है।

अमूमन माना जाता है कि महामहिम राज्यपाल अपने विवेक के हिसाब से ही काम करते हैं। पिछले दो तीन दशकों का इतिहास खंगालने पर यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि केंद्र सरकार या अपने आकाओं को प्रसन्न करने की गरज से राज्यपाल आकाओं के इशारे पर ठुमके लगाते नजर आए हैं। इस बार भी बिना सोनिया गांधी या उनकी कोटरी की हरी झंडी के यह संभव नहीं दिखता। हंसराज भारद्वाज कानून मंत्री रहे हैं, और खुद भी कानून के खासे जानकार हैं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि उन्होंने इस मामले के सारे पहलुओं पर विचार न किया हो।

एक नेता के रूप में हंसराज भारद्वाज काफी सजग, होशियार और सोच समझकर कदम उठाने वालों में गिने जाते हैं। हो सकता है कि कर्नाटक प्रकरण से वे एक तीर से कई निशाने साध रहे हों। वैसे भी किसी भी नेता को अगर राज्यपाल बनाकर भेजा जाता रहा है तो यह माना जाता था कि उसका राजनैतिक कैरियर समाप्त हो गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह ने इस मिथक को तोड़ा था। मध्य प्रदेश में दूसरी मर्तबा मुख्यमंत्री बनने के उपरांत जब उन्हें दूसरे ही दिन पंजाब का गर्वनर बनाया गया था, तब लोग यही कह रहे थे कि अर्जुन सिंह का खेल खत्म, किन्तु बाद में वे सक्रिय राजनीति में लौटे और सालों तक केंद्र की राजनीति की।

बहरहाल उच्चतम न्यायालय द्वारा भाजपा के 11 विद्रोही और पांच निर्दलीय विधायकों को अयोग्य करार करने संबंधी विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को खारिज कर दिया, जिससे युदियुरप्पा को कड़ा झटका लगा। इस फैसले के हिसाब से कर्नाटक के लाट साहेब को सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करना अनुचित इसलिए है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया है अब कोई सरकार अल्पमत में है या बहुमत में इसका फैसला करने का अधिकार सदन को ही है।

विधि अनुसार अगर राज्यपाल को लग रहा था कि येदियुरप्पा सरकार अल्पमत में है तो महामहिम राज्यपाल को चाहिए था कि वे मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने को कहते। कथित रूप से हड़बड़ी में हंसराज भारद्वाज ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश ही कर डाली। इस बात में कोई संदेह की गुंजाईश नहीं है कि राज्यपाल के इस कदम से राजनैतिक शुचिता और राजभवन की गरिमा को ठेस पहुंची है।

इस पूरे प्रहसन में न्यायालय के आदेश के बाद जिस तेजी और तत्परता से राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने विशेष रिपोर्ट तैयार कर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की है उसी मुस्तैदी के साथ बागी विधायकों ने कथित तौर पर बिना शर्त युदियुरप्पा को समर्थन देने की चिट्ठी तैयार कर दी। कहते हैं राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में छः अक्टूबर 2010 के उस ज्ञापन को आधार बनाया है जिसमें विधायकों ने युदियुरप्पा से समर्थन वापस लेने की बात कही थी। 10 अक्टूबर को राज्यपाल भारद्वाज ने सरकार की बर्खास्तगी की सिफारिश की थी, जिसे केंद्र ने लौटा दिया था।

इस बार चूंकि भाजपा पर यह सीधा वार किया गया है तो भाजपा तिलमिला गई है। वैसे भी गड़करी के पुत्र के विवाह समारोह की सारी जवाबदारियां (आर्थिक तौर पर) येदियुरप्पा द्वारा उठाए जाने के आरोप लगते रहे हैं, इस आधार पर गड़करी का येदियुरप्पा प्रेम बढ़ना स्वाभाविक ही है। भाजपा इस मामले में फ्रंट फुट पर आ गई है तो कांग्रेस अब रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई पड़ रही है। कांग्रेस द्वारा भी विधि विशेषज्ञों से इस मामले में राय शुमारी की जा रही होगी। इस बात का रास्ता निकालने का प्रयास किया जा रहा होगा कि लाट साहेब हंसराज भारद्वाज के कदम को जायज ठहराया जा सके। 

भारद्वाज के इस तरह के कदम से नितिन गड़करी को कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका अवश्य ही मिल गया है, किन्तु भाजपा कांग्रेस को घेरने मंे कितने सफल हो पाते हैं यह बात भविष्य के गर्भ में ही है। फिलहाल तो गड़करी ने कांग्रेस को मशविरा दिया है कि बेहतर होगा भारद्वाज को राज्यपाल पद से हटाकर कांग्रेस कार्यसमिति का विशेष आमंत्रित बना दिया जाए। 

उमश्री के स्वास्थ्य में गिरावट


उमश्री के स्वास्थ्य में गिरावट

अंतिम सांस तक गंगा के लिए संघर्ष का कौल

नई दिल्ली (ब्यूरो)। गंगा की सफाई के लिए अनशनरत फायर ब्रांड साध्वी उमा भारती के स्वास्थ्य में गिरावट दर्ज की गई है। हरिद्वार में चंडी घाट पर अनशनरत उमा भारती ने अंतिम सांस तक गंगा के लिए संघर्ष करने की बात कही है। उमा ने आरोप लगाया है कि गंगा की सफाई के प्रति कांग्रेसनीत केंद्र और राज्य सरकर गंभीर नहीं है।
प्रेम सेवा मिशन के अनशन स्थल पर मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने कहा कि गंगा माता के लिए अगर उन्हें अपने प्राणों की आहूति भी देनी पड़ी तो उन्हें गर्व होगा। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड से बड़ी तादाद में आए लोगों को संबोधित करते हुए उमा भारती ने कहा कि देश की सरकारें गंगा के साथ लंबे अर्से से घिनौना खिलवाड़ कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में आश्वासनों की तो लंबी फेहरिस्त है किन्तु कार्य रूप में परिणित आश्वासनों की तादाद नगण्य ही है। उमा भारती ने कहा कि इस मामले में उनका मकसद राजनीति करना नहीं वरन् गंगा को बचाना है।

सत्ता के कंेद्र से मलयाली लाबी का दबदबा घटा


शीर्ष पदों की दौड़ से एमपी बाहर

मध्य प्रदेश के नौकरशाहों के लिए लामबंद नहीं हैं जनसेवक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय प्रशासनिक सेवा की एमपी काडर की वरिष्ठ अधिकारी अलका सिरोही अब कैबनेट सचिव की दौड़ में पिछड़ती दिख रही हैं। वहीं गृह और रक्षा सचिव पदों के लिए जोड़तोड़ में एमपी काडर के आईएएस पिछड़ते ही नजर आ रहे हैं। इस बार जो नाम सामने आ रहे हैं, उसे देखकर आभास होने लगा है कि देश के की पोस्ट पर अब मलयाली लाबी का दबाव कम होता जा रहा है।
हाल में कैबनेट, रक्षा और गृह सचिव के रिक्त होने वाले पदों के लिए जो नाम सामने आए हैं उनमंे कैबनेट सचिव के.एम.चंद्रशेखर के स्थान पर अलका सिरोही से आगे पुलक चटर्जी और अजित सेठ के नामों की चर्चा हो रही है। वहीं गृह सचिव जिस पर जी.के.पिल्लई विराजे हैं जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए बिहार काडर के 1975 बैच के अधिकारी राज कुमार सिंह, मणिपुर काडर के 76 बैच के अनवर अहमद, हरियाणा काडर की 76 बैच की अनिता चैधरी, सी बैच के बिहार काडर क शशिकांत शर्मा के नामों की चर्चाएं हैं।
जुलाई में प्रदीप कुमार की सेवानिव्त्ति के कारण रिक्त होने वाले रक्षा सचिव पद के लिए शशि कांत शर्मा, यूपी के 76 बैच के पी.के.मिश्रा के नाम दौड़ में सबसे आगे हैं। कैबनेट सेकेरेटरी चंद्रशेखर 13 जून, गृह सचिव पिल्लई 30 जून तो रक्षा सचिव प्रदीप कुमार 31 जुलाई को सेवानिवृत होने वाले हैं।

राजमार्गों पर अब चैबीसों घंटे एम्बूलेंस सेवा


राजमार्गों पर अब चैबीसों घंटे एम्बूलेंस सेवा

पिछले साल डेढ़ लाख से अधिक लोग मारे गए सड़क हादसों में

हर पचास किलोमीटर पर तैनात होंगी एम्बूलेंस

नई दिल्ली (ब्यूरो)। स्वर्णिम चतुर्भुज और उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम चतुष्गामी पथ भले ही अटल सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना रही हो पर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के कार्यकाल में यह परवान चढ़ रही है। हेमा मालिनी के गाल के मानिंद बनने वाली इन सड़कों के बारे में कहा जाता है कि इन पर चलने में पेट का पानी भी नहीं हिलता। जाहिर है गति बढ़ेगी और दुर्घटनाएं भी। इन दुर्घटनाओं से बचने के लिए केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय ने नई कार्ययोजना तैयार की है जो 30 मई से लागू हो जाएगी।
सरफेस ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की तादाद में तेजी से होने वाले इजाफे पर विभाग चिंतित है और विभाग ने इस हेतु चैबीसों घंटे राष्ट्रीय राजमार्ग पर एडवांस लाईफ सपोर्ट एंबूलेंस की तैनती करने का मन बनाया है। नई योजना के अनुसार हर पचास किलोमीटर पर इस तरह की एंबूलेंस तैनात होगी। इसके लिए 400 एम्बूलेंस को अस्पतालों से निकालकर सड़कों पर पहुंचाया जाएगा।
इन एंबूलेंस की सही स्थिति का पता लगाने के लिए इन्हें जीपीएस से सुसज्जित किया जाएगा। इनमें आक्सीजन, डाक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य उपकरण भी होंगे। सड़कों की लंबाई को देखते हुए विभाग बड़ी तादाद में एम्बूलेंस खरीदने का मन बना रहा है।
गौरतलब है कि 2009 में भारत में लगभग साढ़े चार लाख सड़क हादसों में एक लाख 25 हजार 864 लोग मारे गए थे। वर्ष 2010 में यह आंकड़ा पौने दो लाख तक पहुचने का अनुमान है। यहां उल्लेखनीय होगा कि एक अनुमान के अनुसार दुनिया के चैधरी अमरिका में हर साल पांच लाख के करीब सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, किन्तु उनमें मरने वालों की तादाद महज पचास हजार के लगभग ही होती है।

सोमवार, 16 मई 2011

कहां गए पीएम की मंहगाई कम करने वाले दावे



कहां गए पीएम की मंहगाई कम करने वाले दावे

(लिमटी खरे)


भारत गणराज्य में पहली बार एसा हुआ होगा जब अर्थ शास्त्री वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह देश में मंहगाई को कम करने में असफल साबित हुए हैं। बार बार मंहगाई पर नियंत्रण की तिथियां देने के बाद भी मंहगाई का जिन्न देश के निरीह नागरिकांे को निगल रहा है, किन्तु सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के साथ ही साथ जिंसों के दाम एक के बाद एक करके आसमान को छू रहे हैं, भण्डारण के अभाव मंे अनाज सड़ रहा है, अदालतें गरीबों को अनाज सड़ने के स्थान पर मुफ्त बांटने की बात कहती है, किन्तु सरकार मौन साध लेती है। जनसेवकों के वेतन भत्तों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, उनकी सुख सुविधाओं में इजाफे पर इजाफा हो रहा है, और जनता की जेब में होने वाला सुराख और बढ़ते ही जा रहा है।


सोने से मंहगा हीरा होता है, किन्तु भारत देश में सोने से मंहगा पेट्रोल है। जी हां, यह सच है पिछले 21 सालों में पेट्रोल के दामों में आठ गुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। सोने में इस अवधि में महज साढ़े सात गुना वृद्धि दर्ज की गई है। 1990 में सोना 3200 रूपए तो पेट्रोल आठ रूपए लीटर था। अब पेट्रोल 63 रूपए तो सोना 22 हजार 260 रूपए तोला है। राज्यों में विधानसभा चुनावों के समाप्त होते ही कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा मंहगाई की लगाम छोड़ दी गई है। यह लगाम अगले साल मार्च में एक बार फिर थाम ली जा सकती है क्योंकि मई में आम चुनाव जो होने हैं।

हाल ही में पेट्रोल की कीमतों में पांच रूपए की बढ़ोत्तरी के बाद अब रसोई गैस और डीजल की दरों में इजाफे के संकेत से आम आदमी की रूह कांपने लगी है। चुनावी माहों को छोड़कर बाकी समय देश के आम नागरिक पर कीमतों में इजाफे की तलवार सदा ही लटकती रही है। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार द्वारा माननीयों (सांसदों और विधायकों) की सुख सुविधाओं की तमाम चीजों को उपलब्ध कराने में कोई कमी नही की है। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में जहां कांग्रेस की सरकार है, का ही उदहारण अगर लिया जाए तो यहां एक साल में पेट्रोल की कीमतों में 32 फीसदी, दूध की कीमतों में 28 फीसदी, बैंक की ईएमआई में 18 फीसदी, दवाओं में 17 फीसदी तो स्कलों की फीस में 10 से 40 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।

भाजपा शासनकाल में कच्चे तेल के भाव आसमान छू रहे थे, किन्तु अटल सरकार ने इसका प्रभाव आम उपभोक्ता पर नहीं पड़ने दिया गया। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में खाड़ी युद्ध के कारण पेट्रोलियम पदार्थों पर तीन रूपए का खाड़ी अधिभार लगाया गया था, युद्ध समाप्त हुए आज ढाई दशक के लगभग बीत चुका है, पर खाड़ी अधिभार आज भी देश के लोग देने पर मजबूर ही हैं।

पेट्रोल की कीमतों मंे लगी आग पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो 13 जून 2009 को इसके दाम 40 रूपए 62 पैसे, 2 जुलाई को 44 रूपए 63 पैसे, 27 अक्टूबर को 44 रूपए 72 पैसे, 04 मार्च 2010 को 47 रूपए 43 पैसे, 01 अप्रेल को 47 रूपए 93 पैसे, 26 जून को 51 रूपए 43 पैसे (सरकारी नियंत्रण से मुक्ति के पहले), 01 जुलाई को 51 रूपए 45 पैसे, 8 सितंबर को 51 रूपए 56 पैसे, 21 सितम्बर को 51 रूपए 83 पैसे, 17 अक्टूबर को 52 रूपए 55 पैसे, 02 नवंबर को 52 रूपए 59 पैसे, 09 नवंबर को 52 रूपए 91 पैसे, 16 दिसंबर को 55 रूपए 87 पैसे, 16 जनवरी 2011 को 58 रूपए 37 पैसे और 14 मई को 63 रूपए 37 पैसे थी।

केंद्र सरकार द्वारा जून 2010 में पेट्रोल के दाम नियंत्रणमुक्त कर दिए गए थे, तब से अब तक 09 बार पेट्रोल के दामांे में वृद्धि की गई है। पिछले दो सालों में 23 तो ग्यारह माहों में इसके दाम 18 रूपए से ज्यादा बढ़ा दिए गए हैं। पेट्रोल पर लगने वाले करों को देखकर आम आदमी के होश फाख्ता हो सकते हैं। प्रति लीटर पर 14 रूपए 35 पैसे एक्साईज ड्यूटी, साढ़े सात फीसदी की दर से 2 रूपए 65 पैसे कस्टम ड्यूटी, बीस फीसदी की दर से 7 रूपए 05 पैसे वैट, एजुकेशन सेस के रूप में एक रूपए एवं अन्य करों के रूप में 3 रूपए 08 पैसे का करारोपण कर कुल 28 रूपए 13 पैसे का कर लगाया जा रहा है।

पेट्रोल की दरों के बढ़ने से आम उपभोक्ता की कमर भले ही टूटी हो किन्तु सरकारों की इसे पौ बारह हो गई हैं। केंद्र और राज्य सरकारें प्रति लीटर में प्रतिशत के हिसाब से कर वसूला करती हैं। वैट चार्ज अगर देखा जाए तो आंध्र प्रदेश में यह 33 फीसदी तो पड्डिचेरी में 15 फीसदी है। अनेक राज्यों में 12 फीसदी वैट लगाया जा रहा है। इस लिहाज से पेट्रोल की कीमतें 5 रूपए बढ़ाने से सरकारों की झोली में करोड़ों रूपयों का राजस्व आ रहा है।।

देखा जाए तो लीबिया संकट के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की दरों में बढ़ोत्तरी के चलते इनके दामों में साढ़े दस रूपए की वृद्धि की जानी थी। अभी पांच रूपए ही कीमत बढ़ी है, आने वाले समय में साढ़े पांच रूपए की वृद्धि से इंकार नहीं किया जा सकता है। दरअसल सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सीडी के चलते सरकार को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। सबसे अधिक गफलत मिट्टी के तेल यानी केरोसिन में होती है। डीजल से चलने वाले यंत्रों और वाहनों में केरोसीन का उपयोग धड़ल्ले से किया जाता है। केरोसीन में सब्सीडी है, और इस सब्सीड़ी का लाभ गरीबों के बजाए अमीर सबसे ज्यादा उठा रहे हैं। सरकार अब तक कोई एसी ठोस कार्ययोजना नहीं बना पाई है कि गरीबों की थाली में से निवाले निकालने वाले इन अमीरों के खिलाफ कोई कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।

एक अन्य दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में सूबों की जनता ने बहुत ही उम्मीद और उत्साह के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का साथ दिया है, यह उनके साथ सीधा सीधा छल है। कल तक केंद्र सरकार के इस तरह के कदमों पर चीखने वाली ममता बनर्जी के लिए मौजूदा हालात एक बयान जारी करने लायक भी नहीं बचे हैं। किसानों के हितैषी होने का स्वांग भरने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ग्रेटर नोएडा जाकर अनशन पर बैठ सकते हैं, पर क्या वे अब किसी पेट्रोल पंप पर अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठने का साहस जुटा पाएंगे? कितने आश्चर्य की बात है कि जो सरकर चुनाव पूर्व पेट्रोल के दाम में एक रूपए की बढ़ोत्तरी करने को राजी नहीं थी, वह अचानक ही पांच रूपए दाम बढ़ाने पर कैसे राजी हो गई?

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ गरीबों के लिए ही बढ़ी दिख रही हैं। तेल कंपनियों ने न जाने किस दबाव में आकर अमीरों की पसंदीदा सवारी हवाई जहाज और हेलीकाप्टर के ईंधन के दाम घटा दिए हैं। विमान ईंधन एटीएफ का दाम दो दशमलव नौ फीसदी घटाया गया है। एटीएफ के दाम 1,766 रूपए किलोलीटर घटकर अब 58 हजार 794 रूपए प्रति किलोलीटर हो गए हैं।

विपक्ष और सत्ताधारी दल की जुगलबंदी और कदमताल देखकर लगता है कि विपक्ष सड़कों पर उतरकर औपचारिकता ही पूरी करेगा। विपक्ष से सरकार पर दबाव बनाने की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। अब चुनाव आयोग ही इकलौती एसी संस्था बचती है जिससे संज्ञान लेने की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि चुनावों के पूर्व सरकारों द्वारा अपने महत्वपूर्ण फैसले टालकर देश की अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ किया जा सकता है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इक्कीसवीं सदी की कांग्रेस के नेतृत्व में देश के रहवासियों को लुटते, पिटते, घिसते रहना नियति बनकर रह गया है।

रविवार, 15 मई 2011

बच्चों के प्रति लापरवाह सरकारें



बच्चों के प्रति लापरवाह सरकारें

(लिमटी खरे)


सरकार चाहे केंद्र की हो राज्य की, सियासी दल चाहे जो भी हो, जनसेवक किसी भी मानसिकता का हो, हर कोई अपने आप को देश और समाज के उत्थान के प्रति अपने आप को पूरी तरह से समर्पित बताने से नहीं चूकता है। अपनी घोषित प्राथमिकताओं के प्रति ये सारे के सारे ठेकेदार कितने संजीदा हैं इस बात का पता देश की सबसे बड़ी अदालत के द्वारा प्राथमिक विद्यालयांे की दुर्दशा को देखकर लगाई गई जबर्दस्त फटकार से लगाया जा सकता है। केंद्र और राज्य के लिए शर्म की बात है कि पहली कक्षा से पांचवी कक्षा तक के बच्चों को वे बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं। देश के जनसेवक और लोकसेवक निहित स्वार्थों मंे पूरी तरह उलझकर रह गए हैं, यही कारण है कि देश के शिक्षण संस्थान बद से बदतर स्थिति को प्राप्त होते जा रहे हैं।


सर्वोच्च न्यायालय ने प्राथमिक विद्यालयों की दुर्दशा पर विभन्न राज्यों की सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए फटकार लगाई है। सरकारों के लिए डूब मरने वाली बात है कि जिस मामले में उन्हें संज्ञान लेना चाहिए उस मामले में न्यायालय द्वारा उन्हें कड़ी फटकार के साथ दिशा निर्देश जारी करने पड़ रहे हैं। शिक्षा आज व्यवसाय बन चुका है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कुकुरमुत्ते के मानिंद गली गली में स्कूल खुल चुके हैं। केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद भी सरेआम कैपिटेशन फीस ली जा रही है। कमीशन के चक्कर में दुकान विशेष से शाला का गणवेश और कोर्स की किताबें लेने मजबूर किया जा रहा है। इन सब बातों को रोकने के लिए पाबंद जिलों में तैनात जिला शिक्षा अधिकारी सरेराह लूटने वाले इन शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन के एजेंट के बतौर काम करने लगे हैं।

अमूमन हर शाला में बच्चों से बिल्डिंग फंड, विकास शुल्क, कंप्यूटर शुल्क, क्रीड़ा शुल्क, पुस्तकालय शुल्क आदि की मद में भारी भरकम राशि ली जाती है। जिला शिक्ष अधिकारी अगर शालाओं मंे जाकर नए बने किन्तु जर्जर शाला भवन, बिना कांच की खिड़कियां, खराब बिना इंटरनेट कनेक्शन वाले कंप्यूटर, पथरीले खेल के मैदान, बिना किताबों वाले पुस्तकालय देखें तो वास्तविक स्थिति काफी हद तक सामने आ सकती है। विडम्बना ही कही जाएगी कि चंद सिक्कों की खनक के आगे जिलों में तैनात शिक्षा अधिकारियों द्वारा नौनिहालों का भविष्य और अपना ईमान ही गिरवी रख दिया जाता है।

शहरों में आबादी के बोझ के कारण निजी तौर पर संचालित शिक्षण संस्थानों ने अपने शाला भवन आबादी से काफी दूर बना रखे हैं। घर से दस पांच किलोमीटर दूर शाला भवन में पहली से लेकर पांचवी दर्जे तक का बच्चा ठंड के दिनों में किस तरह दिन काटता होगा यह सोचकर ही सिहरन पैदा हो जाती है। हद तो तब होती है जब ठंड के मौसम में बिना कांच वाली खिड़कियों से सर्द गलाने वाली हवाओं के झौंके कक्षा के अंदर प्रवेश करते हैं। आसपास खेतों में होने वाली सिंचाई भी मौसम को और अधिक ठंडा बना देती है। निष्ठुर शाला प्रबंधन तब भी अपनी शाला को अलह सुब्बह ही लगाने का हिटलरी फरमान वापस भी नहीं लेता है।

बहरहाल एक जनहित याचिका की सुनवाई पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट आॅफ इंडिया ने मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड़ झारखण्ड, पंजाब सहित 13 सूबों को फटकार लगाते हुए उनके राज्यों के प्राथमिक विद्यालयों में एक माह की समयावधि में पेयजल और छः माह के अंदर ढांचागत सुविधाएं मुहैया करवाने के निर्देश दे दिए हैं। सर्वोच्च न्यायायल की फटकार के बाद वास्तविक स्थिति सामने आ गई है कि राज्यों की सरकारें देश के नौनिहालों की पढ़ाई लिखाई और सुविधाओं के प्रति कितनी संजीदा हैं।

राज्यों की सरकारें अपने और कंेद्रीय स्तर पर संचालित होने वाले सरकारी स्कूलों के साथ तो दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही हैं। जिलों में तैनात जिलाधिकारी, प्रभारी अधिकारी उप जिलाधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारियों द्वारा भी इस दिशा में ध्यान न दिया जाना आश्चर्यजनक ही है। जिलों में निजी तौर पर संचालित होने वाली शिक्षण संस्थाओं द्वारा शिक्षा को व्यवसाय बनाकर पालकों को सरेआम लूटा जा रहा है। यह निश्चित तौर पर सरकारों का सिर शर्म के साथ झुकाने वाली बात है कि हजारों की तादाद में प्राथमिक शालाओं की फेहरिसत आज भी जिंदा है जिसमें पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है। जहां पानी ही नहीं है वहां तो शौचालय, बिजली, पंखो, फर्नीचर तो दूर की कौड़ी होगी।

प्राथमिक स्तर के अलावा हाई और सेकन्ड्री स्तर पर तो और भी कमियां हैं। यह तो मूल समस्या है ही मगर शिक्षकों की कमी सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। एक तो शिक्षकों की कमी उपर से शिक्षकों को जन गणना, परिवार कल्याण, पल्स पोलियो जैसे कामों में बतौर बेगार कराने से शिक्षकों द्वारा पढ़ाई के काम में दिलचस्पी नहीं ली जाती है। अनेक राज्य तो एसे भी हैं जहां शिक्षकों के रिक्त पदों की संख्या हजारों में है। कंेद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना ‘सर्व शिक्षा अभियान‘ में शिक्षकों की कमी के चलते भी जो आंकड़े और कागजी खाना पूरी सामने आ रही है उससे प्रतीत होता है कि नौकरशाह और जनसेवक मिलकर जनता को सरेआम बेवकूफ बनाने पर ही आमदा हैं। देश के नीति निर्धारकों को इस बात को समझना ही होगा कि इस तरह से आंकड़ों की बाजीगरी कर वे देश के भविष्य के साथ किस कदर खिलवाड़ कर रहे हैं।

बच्चों के कल्याण का कथित तौर पर ठेका लेकर समाज सेवा का दंभ भरने वाली सामाजिक संस्थाएं और गैर राजनीतिक दल भी इस गंभीर मसले पर चुप्पी ही साधे बैठे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता दिनों दिन गिरती जा रही है। शिक्षा को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा नित नए प्रयोग किए जाते रहे हैं। जब जिस शासक का मन चाहा उसने अपने हिसाब से शिक्षा का स्वरूप ही बदल दिया। शिक्षा को प्रयोगशाला बनाना कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने राष्ट्र, पालक, बच्चों, समाज आदि के साथ सरेआम धोखाधड़ी की जा रही है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। मोटी चमड़ी वाले शासकों पर अब अनैतिक बातों के खिलाफ होने वाली चीत्कार का कोई असर नहीं होता है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि शिक्षा का व्यवसायीकरण हर हाल में रोकना ही होगा। शिक्षा को पैसा कमाने का व्यवसाय समझना निश्चित तौर पर अनुचित है। किसी ने सच ही कहा है कि अगर समूचे कुंए में ही भांग घुली हो तो मोहल्ले या गांव का तो भगवान ही मालिक है।

राय या त्रिवेदी हो सकते हैं नए रेल मंत्री


जल्द ही फिटेंगे केंद्र में पत्ते

फुल टाईम रेल मंत्री मिलेगा भारत गणराज्य को

उद्योग मंत्रालय पर भी है ममता की नजर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। विधानसभा चुनावों के परिणामों का असर जल्द ही कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पर पड़ने वाला है। जल्द ही केंद्र में वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह अपने मंत्रीमण्डल का पुर्नगठन करने वाले हैं। इसमें जयललिता और ममता बनर्जी का पडला भारी होने की उम्मीद जताई जा रही है। आशा की जा रही है कि आने वाले समय में भारत गणराज्य को अब फुल टाईम रेल मंत्री मिल सकता है।
बंगाल में 34 साल पुराने वाम दलों के लाल किले को ध्वस्त करने वाली रेल मंत्री ममता बनर्जी बहुत ही ताकतवर होकर उभरी हैं। अब केंद्र में मलाईदार विभागों में वे अपने कारिंदे फिट करेंगी। ममता मुख्यमंत्री बनीं तो अपने स्थान पर दिनेश त्रिवेदी या मुकुल राय को बतौर रेल मंत्री प्रस्तुत कर सकती हैं। वर्तमान में त्रणमूल कोटे में एक कैबनेट और छः राज्यमंत्री हैं। ममता के बढ़े रूतबे से कैबनेट मंत्रियों की संख्या में इजाफा हो सकता है।
उधर डीएमके के पास तीन कैबनेट और चार राज्य मंत्री हैं। आदिमत्थू राजा की सीट अभी रिक्त ही है। जयललिता भी अब केंद्र में दावेदारी कर सकतीं हैं। बंगाल के पांच राज्य सभा सदस्य सेवा निवृत हो रहे हैं। आने वाले दिनों मे त्रणमूल तीन, कांग्रेस एक और वाम दल एक सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर सकती है। चुनाव में पराजय झेलने वाले करूणानिधी कुनबे के लिए भी चुनाव परिणाम कष्टकारी साबित हो सकते हैं। कनीमोरी को भी जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा सकता है।
इन चुनाव परिणामों के बाद अब भारत गणराज्य को पार्ट टाईम के स्थान पर फुल टाईम रेल मंत्री मिलने की उम्मीद है। गौरतलब है कि रायटर बिल्डिंग पर कब्जे की चाहत के चलते रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेल मंत्रालय को दरकिनार ही कर दिया था, जिससे रेल की सेहत ही बिगड़ गई थी।

पांच साल तक काबिज रह सकता है किराएदार


पांच साल तक काबिज रह सकता है किराएदार

सुप्रीम कोर्ट ने दी नई व्यवस्था

नई दिल्ली (ब्यूरो)। यदि मकान मालिक और किराएदार के बीच हुए अनुबंध की शर्तों के हिसाब से किराए का नियमित भुगतान हो रहा हो तो मकान मालिक कम से कम पांच साल तक अपने किराएदार को बेदखल नहीं कर सकता है। उक्ताशय की व्यवस्था देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दी गई है।
जस्टिस दीपक वर्मा और जस्टिस दलवरी भण्डारी ने एक प्रकरण की सुनवाई करते हुए कहा कि बजार दर पर निर्धारित किराए का भुगतान अगर किराएदार द्वारा समय समय पर किया जा रहा हो तो मकान मालिक को कम से कम पांच साल तक एसे किराएदार को बेदखल करने का कोई अधिकार नहीं है।

शनिवार, 14 मई 2011

775 साल का लेडी पावर



775 साल का लेडी पावर

(लिमटी खरे)

आजादी के पहले महिलाओं को कमतर ही आंका जाता रहा है। महिलाओं को चूल्हा चैका संभालने और बच्चे पैदा करने की मशीन ही समझते थे सभ्य समाज में पुरूष वर्ग के लोग। अस्सी के दशक के उपरांत यह मिथक शनैः शनैः टूटने लगा। लोग मानते थे कि महिलाओं को अगर घर की दहलीज से बाहर निकलने दिया गया तो कयामत आ जाएगी, समाज के चतुर सुजान इन महिलाओं का शोषण कर लेंगे, यही कारण है कि रूपहला पर्दा हो या फिर सियासत, सदा ही महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा है। कालांतर में महिलाओं को जब भी मौका दिया गया उन्होंने साबित कर ही दिया कि वे पुरूषों से कम कतई नहीं हैं।

भारत सदा से ही पुरूष प्रधान देश माना जाता रहा है। हिन्दुस्तान के सभ्य समाज में महिलाओं का स्थान काफी नीचे ही माना जाता रहा है। यह उतना ही सच है जितना कि दिन और रात कि भारतीय पुरूषों ने महिलाओं के वर्चस्व को कभी भी स्वीकार नहीं किया है। इतिहास में चंद उदहारण एसे हैं जिनमें महिलाओं द्वारा शासन किए जाने के किस्से सुनने को मिलते हैं। इक्कीसवीं सदी में भारत की महिला ने घर की चैखट लांघ दी है, अब वह पुरूषों के कांधों से कांधा मिलाकर चल रही है।
भारत मंे महिलाओं को जब भी अपने हुनर को प्रदर्शित करने का मौका मिला है, उन्होंने बखूबी अपने इस फन को साबित किया है। मैदान ए जंग से लेकर सियासी गलियारों तक में भारतीय महिलाओं ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। 1755 के आसपास अमेरिका में भी अविवाहित महिलाओं को ही मत देने का अधिकार था। न्यूजीलेण्ड में महिलाओं के वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं था, बाद में 1893 में उन्हें मत देने तो 1919 में चुनाव लड़ने का अधिकार प्राप्त हुआ।
दुनिया की पहली महिला सांसद फिनलैण्ड में 1907 में चुनी गई थी। दुनिया के चैधरी अमेरिका लगभग एक दशक (80 साल) की लड़ाई के बाद 1920 में यह हक मिल सका। साउदी अरब अमीरात में आज भी महिलाओं को चुनाव लड़ने दिया जाए या नहीं इस बात पर बहस जारी है। अफगानिस्तान में 1970, बंग्लादेश में 1972, इराक में 1980 तो कतर में 1998 में बदलाव की बयार बही।
भारत देश में महिलाओं ने अनेक वर्जनाओं को तोड़ा है। मुगल शासक रजिया सुल्तान दुनिया भर में संभवतः पहली महिला शासक थीं जिन्होंने सल्तनत संभाली हो। जांबाज योद्धा और न्यायप्रिय शासक रजिया सुल्तान अपने पिता इल्तुतमिश की सबसे लाड़ली थी। रजिया सुल्तान ने 1236 में दिल्ली की गद्दी संभाली। उस वक्त लोगों को लग रहा था, कि दिल्ली जैसी बड़ी रियासत को संभाल पाएंगी कि नहीं, किन्तु रजिया ने इस अवधारणा को गलत साबित कर दिया। रजिया सुल्तान ने मजबूत और बुलंद इरादों के साथ शासन संचालित किया, उस वक्त बगावत के सर उठाने वालांे का सर कुचल दिया गया।
1524 में पेदा हुई गौंड शासिका रानी दुर्गावती ने अपने पति राजा दलपत शाह की लाड़ली थीं, दलपत शाह के निधन के उपरांत रानी दुर्गावती ने अपने पुत्र वीर नारायण के छोटे रहने के कारण शासन संभाला। गढ़ मंडला दुर्ग पर कब्जे के लिए बादशाह अकबर की नीयत डोली और उन्होंने दुर्गावती को महिला और कमजोर समझकर अपने अधीन आने की पेशकश की। रानी दुर्गावती ने अकबर की इस बात को ठुकरा दिया और वीरता के साथ युद्ध किया, जंग में ही रानी दुर्गावती वीरगति को प्राप्त हुईं।
1725 में जन्मी अहिल्या बाई ने अपने पति खांडेराव होल्कर की मौत के उपरांत 1854 में होल्कर रियासत की जवाबदारी संभाली। इसके 52 वर्षों के उपरांत 1795 में उनका निधन हुआ। दक्षिण में रानी चेनम्मा को सिंहनी कहा जाता था। कर्नाटक के कित्तूर की रानी चेनममा ने गोरे ब्रितानियों के आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। ब्रितानियो के साथ जमकर जंग लड़ी रानी चेनम्मा ने, बाद में उन्हें एक किले में नजर बंद कर दिया गया था, जहां उनका देहावसान हो गया था।
सुप्रसिद्ध कवियत्रि सुभद्रा कुमारी चैहान की बात किए बिना महिलाओं के पावर की बात अधूरी ही रह जाएगी। सुभद्रा कुमारी चैहान का जिक्र इसलिए क्योंकि उनके द्वारा झांसी की रानी का कविता के रूप में बखान इतना मीठा और जीवंत है कि आज भी बच्चे, युवा, प्रोढ़ या उमर दराज लोग -‘‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।‘‘ या ‘‘घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार।‘‘ जैसी पंक्तियां गुनगुनाते मिल ही जाते हैं। रानी लक्ष्मी बाई के सम्मान में मध्य प्रदेश सहित अनेक सूबों में महारानी लक्ष्मी बाई शाला (एमएलबी) की चेन स्थापित की गई है। 1834 मंे जन्मी लक्ष्मी बाई ने गंगाधर राव की मौत के बाद गद्दी संभाली थी। ब्रितानियों ने इनके गोद लिए बेटे को वारिस मानने से इंकार कर दिया था। रानी लक्ष्मी बाई ने अंगे्रजों का डटकर मुकाबला किया और आजादी की पहली लड़ाई में वीर गति को प्राप्त हुईं।
आजाद भारत में प्रियदर्शनी श्रीमति इंदिरा गांधी ने जिस उंचाई को छुआ उसे पाना शायद ही किसी के बस की बात हो। अपने पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू के अवसान के बाद इंदिरा गांधी ने देश और कांग्रेस दोनों ही की कमान संभाली। इसके उपरांत न्यूक्लियर पावर बनाने, विदेश नीति, संगठनात्मक एकता, निर्भीक शासन आदि की अद्भुत मिसाल पेश की इंदिरा गांधी ने। महिलाओं को आगे आने से रोकने के लिए कांग्रेस पर आरोप लगते रहे हैं, यही कारण है कि आज भी महिला आरक्षण बिल परवान नहीं चढ़ सका है।
कांग्रेस में श्रीमति सोनिया गांधी सर्वोच्च पद पर पहुंची जिनके हाथ में अघोषित तौर पर देश की बागडोर रहने के आरोप लगते रहे हैं। बाद में देश को 2007 में पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति के तौर पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल मिलीं। इसके उपरांत लोकसभा में पहली महिला अध्यक्ष के तौर पर मीरा कुमार भी मिल गईं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी श्रीमति सुषमा स्वराज हैं। स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री साठ के दशक में सुचिता कृपलानी थीं। इसके बाद उड़ीसा में नंदिनी सत्पथी मुख्यमंत्री बनीं। मध्य प्रदेश में उमा भारती भी मुख्यमंत्री रहीं। सत्तर के दशक में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी की शशिकला काकोडकर ने केंद्र शासित प्रदेश गोवा में मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला। अस्सी के दशक मंे अनवरा तैमूर मुख्यमंत्री बनीं तो इसी दौर में तमिलनाडू में एम.जी. रामचंद्रन की पत्नि जानकी रामचंद्रन ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। सुषमा स्वराज दिल्ली, राबड़ी देवी बिहार, वसुंधरा राजे राजस्थान तो राजिन्दर कौर भट्टल पंजाब में सफल मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।
वर्तमान में दिल्ली की गद्दी श्रीमति शीला दीक्षित, उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती हैं। अब आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तो तमिलनाडू मंे जयललिता मुख्यमंत्री बन महिला शक्ति को साबित करने वाली हैं। 2004 के बाद यह दूसरा मौका होगा जब देश के चार सूबों में महिला मुख्यमंत्री आसीन होंगी। इसक पूर्व 2004 में एमपी में उमा भारती, राजस्थान में वसुंधरा राजे, दिल्ली में शीला दीक्षित तो तमिलनाडू में जयललिता मुख्यमंत्री थीं। 1236 में रजिया सुल्तान की ताजपोशी से आरंभ हुआ लेडी पावर का सिलसिला 775 सालों बाद 2011 में भी बरकरार है। आने वाले साल दर साल यह और जमकर उछाल मारेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एसी मातृ शक्ति को समूचा भारत वर्ष नमन करता है।

रमेश ने खोला दिग्विजय के खिलाफ मोर्चा


मजबूर मनमोहन के मजबूर मंत्री

जयराम ने जाहिर की अपनी मजबूरी

दबाव में मिली महेश्वर डेम को मंजूरी!

दिग्विजय की रूचि गर्माई सियासत

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह के अप्रत्यक्ष दबाव के चलते मध्य प्रदेश की महेश्वर हाइड्रोइलेक्ट्रिकल बांध परियोजना पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने तो सहमति दे दी है, पर वे इससे बेहद खफा ही नजर आ रहे हैं। सहमति देने के दिन ही एक सेमीनार में जयराम रमेश ने कहा कि इस परियोजना को पास करने के लिए उन पर ‘उपरी‘ दबाव था।
गौरतलब होगा कि कुछ माह पूर्व प्रधानमंत्री ने देश के इलेक्ट्रानिक मीडिया के चुनिंदा संपादकों के साथ चर्चा के दौरान खुद को मजबूर बताया था, अब उनके मंत्री खुद को असहाय और मजबूर बता रहे हैं। इस परियोजना में सैद्धांतिक सहमति इसलिए नहीं दी जा पा रही थी, क्योंकि इसमें पर्यावरणीय समस्याएं हैं, इसका मतलब साफ है कि दबाव में देश के कर्णधार नियमों को धता बताने से भी नहीं चूक रहे हैं।
उधर मध्य प्रदेश कोटे से मंत्री रहे कमल नाथ के बाद अब कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय के खिलाफ भी जयराम रमेश ने मोर्चा खोल ही दिया है। कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो जयराम रमेश ने अब कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह बताना आरंभ कर दिया है कि इस तरह के नियम विरूद्ध काम करने और मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चैहान के सुर में सुर मिलाने का काम राजा दिग्विजय सिंह ही कर रहे हैं।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का आरोप है कि दबाव में एमपी की इस रूकी परियोजना को पास कराने के लिए कहा गया था। जयराम रमेश ने परोक्ष तौर पर इसके लिए प्रधानमंत्री डाॅ.एम.एम.सिंह और महासचिव दिग्जिवय सिंह को जवाबदार ठहराते हुए कहा कि अनेक अनियमिताओं को सहन करना उनकी मजबूरी है।

राज्यों में फाईव स्टार शालाओं में फटक नहीं पा रहे गरीब बच्चे


गरीबों की पहुंच से दूर निजी शालाएं

नई दिल्ली (ब्यूरो)। देश भर में शिक्षा के अधिकार कानून की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रहीं हैं। राज्य और सीबीएसई से मान्यता प्राप्त शालाओं में गरीब बच्चों के दाखिलों को लेकर बने दिशा निर्देश हवा में उड़ रहे हैं और संबंधित महकमे के कर्मचारी हाथ पर हाथ धरे सब कुछ देख रहे हैं। देश की राजनैतिक राजधानी में ही केंद्र और राज्य सरकार की नाक के नीचे दिल्ली नगर निगम से मान्यता प्राप्त 783 शालाओं में केवल 608 बच्चों को ही दाखिला दिया गया है।
ज्ञातव्य है कि कांग्रेस नीत केद्र सरकार की अति महात्वाकांक्षी परियोजना शिक्षा के अधिकार के कानूनी स्वरूप में आ जाने के बाद अब शाला की कुल छात्र क्षमता का पच्चीस फीसदी हिस्सा गरीबों के बच्चों के लिए सुरक्षित रखना अनिवार्य है। इन विद्यार्थियों को शाला द्वारा निशुल्क शिक्षा प्रदाय किए जाने का प्रावधान किया गया है।
देश भर में चल रही शिक्षा की दुकानों अर्थात शैक्षणिक संस्थाओं में गरीबों को दरवाजे से ही भगाए जाने की घटनाएं प्रकाश में आईं हैं। डर दहशत और पचड़े में फंसने से बचने के लिए गरीब गुरबों द्वारा इसकी शिकायत नहीं की जाती है। सीबीएसई के एक अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि जिला प्रशासन को चाहिए कि वह हर शाला को ताकीद करे कि शाला प्रबंधन इस बात की मुनादी पिटवाए कि उसकी शाला में गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदाय किए जाने का प्रावधान है।

‘भारतीय‘ होने पर शर्मसार युवराज


‘भारतीय‘ होने पर शर्मसार युवराज

(लिमटी खरे)

‘‘उत्तर प्रदेश में यमुना एक्सपे्रस हाईवे के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में तबियत से सियासत की जा रही है। सारे राजनैतिक दल इस मामले के गर्म तवे पर रोटियां सेंकने पर आमदा हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने ‘सूबे सुरक्षा एजेंसी‘ को चकमा देकर किसानों के बीच खुद को पहुंचाकर मीडिया में अपना महिमा मण्डन करवा लिया है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि जब इलाका सील हो और परिंदा भी वहां पर न मार सकता हो, तब राहुल गांधी जैसा नामचीन चेहरा आखिर इस चक्रव्यूह को भेदकर अंदर कैसे पहुंचा। क्या एसपीजी आंखों में पट्टी बांधकर बैठी थी? क्या यह कांग्रेस और बसपा की मिली भगत है? चाहे जो भी हो डर तो इस बात का है कि कहीं सियासी लड़ाई में किसानों का मुद्दा गौड़ न हो जाए। राहुल का बड़बोलापन पहली बार झलका है जब उन्होंने व्यवस्था पर शर्म करने के बजाए खुद को भारतीय होने पर शर्म की बात कही है। क्या इसे उनकी मा सोनिया गांधी के पीहर से जोड़कर देखा जाए!‘‘

देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाले और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी तथा युवराज राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्रों को अपने आंचल मंे सहेजने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में यमुना एक्सपे्रस हाईवे का निर्माण किया जा रहा है। तर्क दिया गया है कि इसके बनने से सूबे के विकास में चार चांद लग जाएंगे, इसके बनने से आम आदमी को जमकर फायदा होने की उम्मीद जताई जा रही है। यक्ष प्रश्न आज भी अनुततरित ही है कि इस तरह के मार्ग बनने से फायदा किसे होने वाला है? यदि यह मार्ग बना भी तो इसका उपयोग वही कर सकेंगे जिनके पास मोटर कार, ट्रक एवं परिवहन के अन्य साधन हैं। गरीब गुरबों के लिए तो यात्री बस ही सहारा होगी। कोई भी तीव्रगामी मार्ग जब बनता है तो गरीब की साईकल, बैलगाड़ी, तिपहिया और छोटे वाहनों का उस पर चलना प्रतिबंधित कर दिया जाता है। इस रफ्तार में उनको प्रवेश नहीं है जिनके हितों की दुहाई देकर इसका निर्माण कराया जाता है। जिस देश में आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही हो उनके लिए इस तरह के मार्ग का क्या ओचित्य?
देश की राजनैतिक राजधानी से सटे ग्रेटर नोएडा में भट्टा पारसौल गांव में भूमि के अधिग्रहण को लेकर मारकाट मची हुई है। हर एक सियासी दल इसका लाभ लेने की जुगाड़ में है, तो भला कांग्रेस कैसे पीछे रहने वाली। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने उत्तर प्रदेश के चुनावों को देखकर अपने भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को दौड़ा दिया भट्टा पारसौल गांव। राहुल गांधी के अंदर यह गुण है कि वे अपनी अभिजात छवि को तोड़कर आम आदमी के साथ सीधा रिश्ता बनाते हुए दिखाई पड़ ही जाते हैं। चाहे दलित के घर रात बितानी हो या फिर मुंबई में लोकल ट्रेन का सफर या एटीएम से पैसे निकालना, वे हर बार आम जनता से सीधा संवाद करते नजर आए हैं। कांग्रेस चाहती है कि वह राहुल की साफ छवि के साथ वैतरिणी पार कर ले किन्तु इसके लिए कांग्रेस को अपना चेहरा भी बदलना होगा।
कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी द्वारा मायावती सरकार के सारे नियम कायदों को धता बताते हुए उनके चक्रव्यूह को तोड़कर बुधवार को अलह सुब्बह ग्रेटर नोएडा जा पहुंचे। राहुल का वहां जाना अनेक सवालों को जन्म दे गया है। अगर राहुल गांधी प्रदेश सरकार के नियम कायदों को तोड़ रहे थे तब उनकी सुरक्षा में लगे स्पेशल प्रोटेक्शन गु्रप के जवान क्या मूक दर्शक बनकर उन्हें कानून तोड़ने दे रहे थे? एसपीजी भारत सरकार के दिशा निर्देश पर काम करती है या फिर वह भी राहुल गांधी की ‘लौंडी‘ बनकर रह गई है। हालात देखकर लगता है मानो राहुल गांधी को सुरक्षा की दृष्टि से भारत सरकार द्वारा एसपीजी नहीं वरन् राहुल गांधी ने खुद ही किसी निजी सिक्यूरिटी एजेंसी से भाड़े पर सुरक्षा कर्मी ले रखे हों।
 वैसे तो यहां किसानों द्वारा 17 जनवरी से आंदोलन किया जा रहा है, किन्तु तब इसे हवा नहीं मिल सकी। सियासी दलों की नजर लगने के बाद भट्टा पारसौल आग में झुलस रहा है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। पुलिस और किसानों के बीच हुए द्वंद के बाद अब जो जमीन तैयार हुई है उसे देखकर लगने लगा है कि मिशन यूपी 2012 की जमीन पूरी तरह तैयार हो चुकी है। राजनैतिक दल अपना अपना हित साध रहे होंगे किन्तु उन्हंे इस बात पर भी मंथन अवश्य ही करना चाहिए कि बार बार विकास, सड़क या औद्योगिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के बाद किसान हर बार ठगा सा महसूस क्यों करता है? देशवासियों के बीच बनने वाली यह धारणा बेमानी नहीं है कि ‘सरकार अब बड़े औद्योगिक घरानों के एजेंट के तौर पर काम कर रही है।‘
आखिर क्या कारण है कि अंग्रेजों के जमाने 1894 में बने जमीन अधिग्रहण कानून को भारत सरकार अब तक तब्दील नहीं कर पाई है? 1894 में बने इस कानून में 1998 में कुछ सुधार किया गया है, जो सरकार को सार्वजनिक मकसद के लिए अपनी कीमत पर जमीन खरीदने का हक देता है। इस बारे में कानून विदों की राय में जमीन की वाजिब कीमत क्या होगी और सार्वजनिक मकसद किसे कहा जाएगा? अब तक स्पष्ट नहीं है। 2009 में लोकसभा में बिल लाया गया किन्तु पारित न हो सका।
देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसानों की जमीनों के अधिग्रहण की खिलाफ धधकती असंतोष की आग बरास्ता दादरी, नंदीग्राम, सिंगूर, जगतसिंहपुर, जैतापुर, नियामगिरी होती हुई अब ग्रेटर नोएडा पहुंच ही गई। 1985 में नर्मदा घाटी परियोजना में बनने वाले बाधों के विरोध में बाबा आम्टे और मेघा पटेकर ने आंदोलन किया था। टिहरी बांध में उत्तराखण्ड में तो उड़ीसा में नियामगिरी में वेदांता परियोजना, में भी कमोबेश यही आलम रहा।
पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में नवंबर 2007 में इंडोनेशिया की एक कंपनी सालिम ग्रप के एसईजेड के लिए जमीन अधिग्रहण में पुलिस के साथ विवाद में 14 तो बंगाल के ही सिंगूर में टाटा के नैनो कार प्लांट के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले किसानों में से 14 को पुलिस की गोली का शिकार होकर जान गंवानी पड़ी थी। 2008 में अमरनाथ श्राईन बोर्ड को 99 एकड़ जमीन दने के विरोध में हुए प्रदर्शन में सात लोग मरे, तो यूपी के गाजियाबाद के दादरी में 2004 में अनिल अंबानी के स्वामित्व वाले रिलायंस गु्रप के लिए 2500 एकड़ के अधिग्रहण में भी विवाद हुआ।
पिछले साल अलीगढ़ में टप्पल में हुई हिंसा में तीन किसान और एक पुलिस कर्मी की मौत हुई। जगतसिंहपुर जिले में दक्षिण कोरिया की एक स्टील कंपनी ‘पास्को‘ की परियोजना का भी पुरजोर विरोध किया गया, इसके बाद अब ग्रटर नोएडा के भट्टा पारसौल गांव में हिंसा फैली। दिल्ली से आगरा को जोड़ने वाले 165 किलोमीटर लंबे इस मार्ग के लिए 43 हजार हेक्टेयर भूमि की आवश्यक्ता है। आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो आजादी के बाद से अब तक देश में एक ओर जहां कृषि योग्य भूमि का प्रतिशत तेजी से गिरा है तो दूसरी ओर सिंचित भूमि का प्रतिशत कम मात्रा में ही बढ़ा है।
किसानों के रिसते घावों पर युवराज राहुल गांधी घटनास्थल पर अवश्य गए। राजनैतिक तौर पर अपरिपक्व राहुल वहां पहुंचे तो मंझे हुई राजनीतिक हस्ती कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की बैसाखी के सहारे। क्या राहुल गांधी को पीएसी के उन जवानों से कोई सरोकार होगा जिन्हें वहशी तरीके से पीट पीट कर मौत के घाट उतार डाला। कांधे पर हल रखकर चलने वाला किसान क्या बंदूकों के माध्यम से आंदोलन छेड़ता है? अगर उत्तर प्रदेश मंे मायावती ‘लोकतंत्र‘ के स्थान पर ‘हिटलरशाही‘ चला रही हैं तो राहुल और कांग्रेस तो क्या हर सियासी दल को इसका प्रतिकार करने का पूरा अधिकार है, पर लोकतांत्रिक तरीके से, न कि खून से रंगे हाथों की तरफदारी कर सियासी रोटियां सेंकने की तरह से। इस बात पर भी बहस होना चाहिए कि पुलिस वालों की हत्या करने वाले क्या वाकई किसान थे या फिर जमीनों के दलाल। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पा चुके ‘मोगली‘ की कर्मभूमि है देश के हृदय प्रदेश का सिवनी जिला, इस जिले में पिछले एक दशक में जमीन के दलालों ने सरकारी नुमाईंदों के साथ मिलकर सरकारी और निजी जमीनों को बेच दिया है। सूबे की सरकार सोई पड़ी है, विधायक और सांसद अपने निहित स्वार्थों में व्यस्त हैं। बंदरबांट जारी है जिसके हिस्से जो लग रहा है, वह लेकर चंपत हो रहा है।
बहरहाल, एक समाचार एजेंसी के अनुसार राहुल गांधी ने खुद के भारतीय होने पर शर्म महसूस करने वाली बात कही है, जिसकी सिर्फ निंदा से काम चलने वाला नहीं है। राहुल गांधी का किसानों की व्यथा देखकर दुखी होना (बशर्ते वे दुखी होने का प्रहसन न कर रहे हों) लाजिमी है, किन्तु उन्हें इस पर खुद के भारतीय होने पर शर्माना कैसा? क्या राहुल गांधी के राजनैतिक प्रशिक्षकों ने उन्हें यह बात नहीं बतलाई है कि उनके परदादा पंडित जवाहर लाल नेहरू, दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी इस देश के वजीरे आजम रहे हैं, जिन्होंने साल दर साल देश पर राज किया है। देश के कानून कायदे उन्हीं के द्वारा बनाए गए हैं। आपकी माता जी अवश्य ही इटली मूल की हैं, पर आपके पिता और पितामह सभी खालिस हिन्दुस्तानी हैं, आप इस तरह की बयानबाजी कर विरोधियों को बोलने का मौका दे रहे हैं। बहरहाल राहुल गांधी के भारतीय होने पर शर्म करने की बात गले नहीं उतरती। राहुल गांधी को चाहिए था कि वे इस देश की या उत्तर प्रदेश की व्यवस्था पर शर्म जताते, वस्तुतः एसा उन्होंने किया नहीं।