गुरुवार, 7 जुलाई 2011

नौटंकी प्रभात झा महोदय की!

नौटंकी प्रभात झा महोदय की!

(लिमटी खरे)

भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश के अध्यक्ष बिहार मूल के प्रभात झा हैं। वैसे तो झा ने मध्य प्रदेश में सालों काम किया है, किन्तु भाजपा में आज भी उनकी सर्व स्वीकार्यता का अभाव साफ देखा जा रहा है। भले ही एक के बाद एक उपचुनावों में भाजपा ने अपना परचम लहरा दिया हो, किन्तु यह जीत संगठन के खाते में इसलिए नहीं जाएगी, क्योंकि हर जगह भाजपा नहीं जीती कांग्रेस हारी है। गुटबाजी में फंसी कांग्रेस ने सदा ही भाजपा की जीत के मार्ग प्रशस्त किए हैं। मुख्यमंत्री बनने की जुगत में लगे प्रभात झा के कारिंदों को उनकी मंशा का पता चल गया है, यही कारण है कि मध्य प्रदेश सरकार के नुमाईंदे इन दिनों दिल्ली में शिवराज सिंह चौहान को ‘‘पीएम मेटेरियलबताने से नहीं चूक रहे हैं। इसी तरह का काम राजा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में मध्य प्रदेश सूचना केंद्र प्रभारी इंदिरा स्वरूप ने भी किया था राजा पीएम तो नहीं बने पर इसके बाद राजा को दस साल का वनवास अवश्य ही भोगना पड़ा था।
 
हाथी को सबसे बड़ा स्तनधारी प्राणी माना गया है। हाथी के साथ अनेक किंवदंतियां, कहावत, महावत और मुहावरे आम हैं। ‘‘हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और‘‘ बड़ी ही पुरानी और सुनी सुनाई कहावत मानी गई है। मध्य प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी सरकार और संगठन ने इस कहावत को चरितार्थ करने का प्रयास किया है। भाजपा ने डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस और कैरोसीन के मूल्यों में लगी आग पर जमकर हल्ला मचाया है। भाजपा वैसे तो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर यह दबाव बनाने में नाकाम रही है कि वह मूल्य वृद्धि को वापस ले ले। भाजपा का देश व्यापी विरोध महज रस्म अदायगी ही नजर आ रहा है। भाजपा द्वारा आम आदमी की कमर इस मंहगाई से टूटने को आधार बनाकर विरोध जताया जा रहा है।
इसी मंहगाई के शोर में मध्य प्रदेश भाजपा के निजाम प्रभात झा ने एक नायाब तीर छोड़कर सभी का ध्यान अपनी ओर बरबस ही खींच लिया। प्रभात झा ने महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को पत्र लिखकर उनसे इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगी है। संभवतः पहली बार जनता द्वारा प्रत्यक्ष न चुने गए जनप्रतिनिधि ने इस तरह की अनुमति की मांग की होगी। प्रभात झा के इस कदम से भाजपा भी दो फाड़ में बट गई है। एक धड़ा जो एमपी के सीएम की कुर्सी पर प्रभात झा को काबिज देखना चाह रहा है वह प्रभात के साथ तो दूसरा धड़ा इसे शिवराज सिंह चौहान को निपटाने के खेल का आगाज मान रहा है।

ईंधन के दामों में बढ़ोत्तरी के बाद अनेक राज्य सरकारों ने अपने अपने सूबों में करों में राहत देकर आम आदमी को सहारा दिया है। मुख्यतः बिहार ने डीजल पर बिक्री कर में 0.36 फीसदी, उत्तराखण्ड और पंजाब ने डीजल की बढ़ी कीमतों से वैट से मुक्त रखा है। हरियाणा ने कैरोसीन पर वैट समाप्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल ने रसोई गैस पर वैट समाप्त कर दिया है। राजस्थान ने डीजल पर वैट घटा दिया है एवं दिल्ली ने डीजल 37 पैसे प्रति लीटर तो बीपीएल परिवारों के लिए गैस पर पचास रूपए की छूट देने की घोषणा की है।

सभी की आंखें किसान पुत्र शिवराज सिंह चौहान पर टिकी थीं कि वे क्या करिश्मा करते हैं। अफसोस शिवराज ने मौन ही साधे रखा। एक आंकलन के अनुसार रसोई गैस और कैरोसीन दोनों ही एसे पेट्रोलियम उत्पाद हैं जो राज्यों के खजाने में खासी बढ़ोत्तरी के कारक माने जाते हैं। वैसे तो पेट्रोलियम उत्पाद पर आहूत बिक्रीकर और वैट से सरकारों को मोटी कमाई होती है, पर सूबाई सरकारें अगर चाहें तो इस पर कमी कर राज्य में जनता को राहत प्रदान कर सकती हैं। 2010 -2011 के आंकड़ों पर गौर फरमाया जाए तो इस वित्तीय वर्ष में राज्यों को पेट्रोलियम उत्पाद के माध्यम से 78 हजार 944 करोड़ रूपयों की कमाई हुई है। जो इसके पहले वाले वित्तीय वर्ष की तुलना में 24 फीसदी अधिक है। डीजल पर राजस्थान को छोड़कर किसी भी सूबे ने वैट की दरों में रियायत नहीं दी है।

एक तरफ किसान पुत्र शिवराज सिंह चौहान जो कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, वे पेट्रोलियम उत्पादों की दरों में बढ़ोत्तरी होने के बाद भी राज्यों के द्वारा इन पर आहूत करों में कमी करने को तैयार नहीं वहीं दूसरी ओर बरास्ता राज्य सभा संसदीय सौंध मेें कदम रखने वाले मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष प्रभात झा इस मंहगाई से आजिज आकर खुद इच्छा मृत्यु की इजाजत की दरकार रख रहे हैं। प्रभात झा को जिस राज्य में भाजपा की कमान सौंपी गई है उस राज्य में शिवराज के नेतृत्व में भाजपा सरकार काबिज है। शिवराज सरकार इन पेट्रोलियम उत्पादों पर भी वैट वसूलकर अपनी आमदनी बढ़ाने से नहीं चूक रहे हैं शिवराज सिंह चौहान।

अगर देखा जाए तो देश में अन्य राज्यों की तुलना में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पेट्रोलियम उत्पादों पर आहूत वैट सबसे अधिक है। जब शिवराज चौहान से पूछा जाता है कि वे अपने राज्य में पेट्रोलियम उत्पादों पर करों में राहत क्यों नहीं देते? इसके जवाब में शिवराज का कहना है कि वे क्यों दे करों में राहत? पेट्रोलियम उत्पादों के दाम केंद्र ने बढ़ाए हैं सो इसमें राहत देने का जिम्मा भी केंद्र का ही है।

देश में सबसे मंहगी रसोई गैस मध्य प्रदेश में बिक रही है। एमपी में रसोई गैस 452 रूपए, झारखण्ड में 425 रूपए 50 पैसे, पंजाब में 420 रू., हिमाचल में 411 रूपए 15 पैसे, कर्नाटक में 411 रू.10 पैसे, गुजरात में 409 रूपए पच्चीस पैसे, बिहार में 407 रूपए, छत्तीगढ़ में 403 रूपए 25 पैसे तो उत्तराखण्ड में 394 रूपए तीस पैसे की दर से मिल रही है। भाजपा की उत्तराखण्ड और एमपी सरकार के राज में रसाई गैस की कीमतों में 57 रूपए 70 पैसे का अंतर है। इसी तरह एंट्री टेक्स और वेट देखा जाए तो रसाई गैस पर 24 रूपए पचास पैसे एंट्री तो बीस रूपए वैट, पेट्रोल पर इक्यावन पैसे एंट्री तो 14 रूपए 91 पैसे वैट एवं डीजल पर छत्तीस पैसे एंट्री तो आठ रूपए 23 पैसे वैट लगाया है शिवराज सिंह चौहान ने।

मजे की बात यह है कि ठेकेदारों को ज्यादा से ज्यादा लाभ देने की गरज से शराब लाबी के दबाव में शिवराज सरकार ने शराब पर एंट्री और वैट शून्य रखा है। राज्य सरकार को वर्ष 2009 - 2010 में पेट्रोलियम पदार्थों में वैट और एंट्री टेक्स से 2550 करोड़ तो शराब पर एक्साईज ड्यूटी के रूप में 2952 करोड़ रूपयों की आमदनी हुई थी। यह आमदनी अगले वित्तीय वर्ष 2010 - 2011 में बढ़कर पेट्रोलियम पदार्थ पर 3386 करोड़ तो शराब पर 3604 करोड़ रूपए हो गई।

शिवराज सिंह चौहान अपने राज्य के विकास के लिए खासे फिकरमंद नजर आते हैं। विकास के लिए धन की आवश्यक्ता होती है। किसी भी राज्य के पास टकसाल (सिक्के ढालने का स्थान) नहीं लगा हैै। धन करों को जनता पर आहूत कर ही वसूला जाता है और राजकोषीय खजाने को भरा जाता है। इसी से फिर विकास का अनंत सिलसिला आरंभ होता हैै।

इस विकास को करने की जवाबदारी सिर्फ देश की जनता के कांधों पर ही है। इसको अमली जामा पहनाने वाले जनसेवक और लोकसेवक भारी भरकम वेतन इसी राजकोष से लेकर विलासिता से परिपूर्ण अपना जीवन यापन करते हैं। 2010 में विधायकों की पगार बढ़ाने के बाद एक बार फिर पगार बढ़ाने के लिए विधानसभा उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह के नेतृत्व में एक समिति का गठन कर दिया गया है। यह है भाजपा सरकार का एक और चेहरा। एक तरफ जनता भूखों मरने पर मजबूर है, वहीं दूसरी ओर विधायक अपनी तनख्वाह बढ़ाने की जुगत में हैं।

इस तरह की विसंगतियां प्रभात झा को दिखाई नहीं पड़तीं। अपने निजाम शिवराज सिंह चौहान के सुरों पर ठुमके लगाते हुए प्रभात झा ने भी कह डाला कि राज्य अगर वैट घटाएगा तो राज्य की विकास योजनाएं प्रभावित होंगी। क्या प्रभात झा के अंदर इतना माद्दा है कि वे अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ता शिवराज सिंह चौहान और पार्टी के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेकर विज्ञापनों में बड़े बड़े फोटो छपवाने वाले विधानसभा अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी से यह पूछ सकें कि एक तरफ वे खुद मंहगाई के लिए इच्छा मृत्यु की मांग कर रहे हैं, साथ ही वैट न घटाने पर विकास योजनओं के प्रभावित होने की दलील दे रहे हैं, फिर किस आधार पर आना फ्री, जाना फ्री, रहना फ्री, बिजली फ्री, फोन, मोबाईल फ्री, सब कुछ फ्री पाने वाले विधायकों का वेतन एक साल पहले ही बढ़ाने के बाद इस तरह की समिति बनाने का क्या ओचित्य? साथ ही साथ विपक्ष में बैठी कांग्रेस से कोई उम्मीद करना इसलिए बेमानी होगा क्योंकि 2003 के बाद कांग्रेस के कदम ताल इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस का संगठन पूरी तरह भाजपा के ही पे रोलपर काम कर रहा है।

प्रभात झा, शिवराज सिंह चौहान और वित्त मंत्री राघव जी तीनों को अपनी ही पार्टी की उत्तराखण्ड और हिमाचल सरकार से सीख लेना चाहिए जिन्होंने पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य के कर कम किए हैं। क्या इससे भाजपा शासित इन राज्यों में विकास योजनाएं प्रभावित नहीं होंगी। हर मामले में अपनी मांद (राज्य के अंदर) बैठकर केंद्र को कोसने से भला क्या होने वाला है! जब भी शिवराज सिंह चौहान दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्रियों से मिलते हैं, वे राज्य के हितों को मानों भूल ही जाते हैं।

मंहगाई पर इच्छा मृत्यु की चाहत रखने वाले प्रभात झा ने दस अप्रेल 2008 को राज्य सभा के लिए चुने जाने के उपरांत सदन में आम आदमी के हित अहित का एक भी प्रश्न नहीं पूछा है, जिससे मध्य प्रदेश क्या समूचे देश के निवासियों के प्रति उनके उत्तरदायी होने का प्रमाण खुद ब खुद मिल जाता है। तीन सालों में अगर प्रभात झा ने एक भी प्रश्न नहीं पूछा या किसी नीति का विरोध नहीं किया है तो इससे साफ है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार देश हित में काम कर ही है, जिसे मध्य प्रदेश भाजपा का पूरा पूरा समर्थन है। अब देखना यह है कि संसद के शीतकालीन सत्र में प्रभात झा द्वारा पेट्रोलियम उत्पादों की मूल्य वृद्धि पर संसद में कोई प्रश्न लगाया जाता है अथवा सदा की तरह इस बार भी मौन ही धारण कर लिया जाता है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को मध्य प्रदेश की सीमाओं के अंदर कोसने से सूबे के लोगों की सहानुभूति हासिल करने में भाजपा का कोई सानी नहीं है।

. . . मतलब विवाद में है छिंदवाड़ा!

. . . मतलब विवाद में है छिंदवाड़ा!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का नाम आते ही केंद्रीय मंत्री कमल नाथ का चेहरा लोगो के जेहन में उभर जाता है। कहते हैं छिंदवाड़ा कमल नाथ के दिल में बसता है। 1980 से लगातार (एक उपचुनाव में सुंदर लाल पटवा के हाथों पराजय का स्वाद चखने के अलावा) छिंदवाड़ा से लोकसभा जाने वाले कमल नाथ की कर्मभूमि छिंदवाड़ा में जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष न घोषित होने से लगने लगा है कि छिंदवाड़ा में कुछ विवाद अवश्य ही है।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार मध्य प्रदेश में उन्हीं जिलों के जिलाध्यक्षों की घोषणा की गई है, जहां विवाद नहीं है। विवाद वाले जिलों में समन्वय स्थापित होने के बाद ही जिलाध्यक्षों की घोषणा की जाएगी। मध्य प्रदेश में 63 जिला इकाईयों में से 34 की घोषणा कर दी गई है। शेष 29 जल्द ही घोषित होने की उम्मीद नहीं दिख रही है। शेष बचे जिलों मेें छिंदवाड़ज्ञ का नाम आने से सभी को आश्चर्य हो रहा है। माना जाता है कि छिंदवाड़ा में कमल नाथ की मंशा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता फिर कांग्रेस की घोषित पहली सूची में छिंदवाड़ा का नाम न होना आश्चर्यजनक ही है।

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और आदिवासी मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया से जब संपर्क साधा गया तो दूरभाष पर उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में कहीं भी कोई विवाद वाली स्थिति नहीं है। शेष बचे जिलों स्थानीय प्रभावशाली नेताओं से रायशुमारी के उपरांत जल्द ही जिलाध्यक्षों की घोषणा हो जाएगी। उन्होंने कहा कि दस साल का कार्यकाल पूरा करने वालों को अब अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा।

छिंदवाड़ा के संबंध में भूरिया ने तर्क दिया कि चंूकि वहां के अध्यक्ष गंगा प्रसाद तिवारी दस साल पूरे कर चुके हैं अतः नए प्रावधानों के अनुसार उनका इस पद पर बने रहना संभव नहीं है। साथ ही साथ केंद्रीय मंत्री कमल नाथ विदेश प्रवास पर हैं, इसलिए उनके आने के बाद ही उनसे चर्चा और उनके सुझाए नाम की घोषणा कर दी जाएगी। गौरतलब होगा कि कमल नाथ के प्रभाव वाले महाकौशल के बालाघाट जिले में दस साल अध्यक्ष रहने के बाद पुष्पा बिसेन को हटाकर विधायक प्रदीप जायस्वाल को अध्यक्ष की कमान सौंपी गई है। जिससे साफ है कि बालाघाट में कमल नाथ की पसंद को सम्मान दिया गया पर जब छिंदवाड़ा की बात आई तो गाड़ी अटक गई।

आम महोत्सव में नहीं दिखे एमपी के आम

आम महोत्सव में नहीं दिखे एमपी के आम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। दिल्ली पर्यटन के बेनर तले आयोजित तीन दिवसीय आम महोत्सव में देश भर से आमों की प्रजातियां लोगों को आकर्षित करती रहीं किन्तु इसमें मध्य प्रदेश के आम कहीं भी नजर नहीं आए। पीथमपुरा दिल्ली हाट में आयोजित इस आम महोत्सव में आम से निर्मित उत्पादों को भी दर्शाया गया था, जिन्हें दर्शकों ने खासा सराहा। पिछले साल जहां चार सौ प्रजातियों के आम प्रदर्शित किए गए थे, वहीं इस साल इसकी तादाद बढ़कर लगभग पांच सौ हो गई है। इस महोत्सव में आदि काल से अब तक आम के बारे में विस्तार से समझाया भी गया।

इस महोत्सव में उत्तर प्रदेश के आम्रपाली, हुस्नआरा, तोतापरी, रामकेला, फजरी, सफेदा, लंगड़ा, चौसा, रतौला, दशहरी, मल्लिका तो आंध्र प्रदेश और केरल के बांगन पल्ली, पेरी, ओलेर, चीरूकुरासम, गुलडप्पा, आलमपुर बानेशन, बिहार के हिमसागर, किशन भोग और बथुआ, पंजाब और हरियाणा के दशहरी, लंग्ड़ा और बाम्बे ग्रीन, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के वनराज, मुलगोआ, पैरी, केसर, राजपुरी, अल्फांसो, चौसा आदि को प्रदर्शित किया गया।

आश्चर्य की बात तो यह है कि लगभग पांच सौ प्रजातियों के आमों के बीच मध्य प्रदेश के आमों को स्थान नहीं दिया गया, और न ही मीडिया को ही इस तरह के आयोजन की आधिकारिक जानकारी भी मध्य प्रदेश की ओर से प्रदान की गई। कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश में किसान पुत्र शिवराज सिंह की सरकार द्वारा किसानों के हितों का शमन किया जा रहा है, यही कारण है कि कृषि आधारित अखिल भारतीय स्तर के प्रदर्शनों में मध्य प्रदेश के किसानों की उपेक्षा की जा रही है।

बुधवार, 6 जुलाई 2011

what is AM and PM


क्या महज ‘‘औपचारिक‘‘ रह गई है गांधी टोपी!

क्या महज ‘‘औपचारिक‘‘ रह गई है गांधी टोपी!

(लिमटी खरे)

कांग्रेस का इतिहास गौरवमयी रहा है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक दशक से कांग्रेस अपने मूल मार्ग से भटक चुकी है। अब सत्ता की मलाई चखना, भ्रष्टों को प्रश्रय देना, जनता जनार्दन का गला रेतकर उसकी जेब से पैसा निकालना कांग्रेस का मूल मंत्र बन गया है। आधी सदी से ज्यादा इस देश पर शासन करने वाली कांग्रेस आज गांधी के नाम को भुनाकर सत्ता सुख भोग रही है, किन्तु गांधी टोपी को पहनना कांग्रेस के हर नेता यहां तक कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तक को नागवार गुजरता है। यही कारण है कि सेवा दल की सलामी के वक्त गांधी टोपी को सर पर रखकर रस्म अदायगी करने वाले नेता चन्द क्षणों में ही इसे उतारकर मुस्कुराते हुए अपने अंगरक्षक के हवाले कर देते हैं। कहते हैं नंगा सिर अच्छा नहीं माना जाता। मर्द के सर पर टोपी और औरत के सर पर पल्लू संस्कार की निशानी होती है, जो दोनांे ही चीजें आज विलुप्त हो गईं हैं।
 
कहने को तो कांग्रेस द्वारा गांधी नेहरू परिवारों का गुणगान किया जाता है, किन्तु इसमें राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी का शुमार है या नहीं यह कहा नहीं जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, के बाद अब सोनिया गांधी और राहुल गांधी के इर्द गिर्द ही कांग्रेस की सत्ता की धुरी घूमती महसूस होती है। वैसे तो महात्मा गांधी और उनकी अपनाई गई खादी को भी अपनी विरासत मानती आई है कांग्रेस। पर अब लगता है कि वह इन दोनों ही चीजों से दूर होती चली जा रही है। अधिवेशन, चुनाव, मेले ठेलों में तो कांग्रेसी खादी के वस्त्रों का उपयोग जमकर करते हैं, किन्तु उनके सर से गांधी टोपी नदारत ही रहा करती है।

कांग्रेस सेवादल के ड्रेस कोड में शामिल है गांधी टोपी। जब भी किसी बड़े नेता या मंत्री को कांग्रेस सेवादल की सलामी लेनी होती है तो उनके लिए चंद लम्हों के लिए ही सही गांधी टोपी की व्यवस्था की जाती है। सलमी लेने के तुरंत बाद नेता टोपी उतारकर अपने अंगरक्षक की ओर बढ़ा देते हैं, और अपने बाल काढ़ते नजर आते हैं, ताकि फोटोग्राफर अगर उनका फोटो लें तो उनका चेहरा बिगड़े बालों के चलते भद्दा न लगे।

इतिहास गवाह है कि गांधी टोपी कांग्रेस विचारधारा से जुड़े लोगों के पहनावे का हिस्सा रही है। अस्सी के दशक के आरंभ तक नेताओं के सिर की शान हुआ करती थी गांधी टोपी। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू हों या मोरारजी देसाई, किसी ने शायद ही इनकी कोई तस्वीर बिना गांधी टोपी के देखी हो। आज भी महाराष्ट्र सहित अनेक सूबों के ग्रामीण इलाकों में गांधी टोपी दैनिक पहनने वाली वेशभूषा का अभिन्न अंग है।

लगता है कि वक्त बदलने के साथ ही साथ इस विचारधारा के लोगों के पहनावे में भी अंतर आ चुका है। अस्सी के दशक के उपरांत गांधी टोपी धारण किए गए नेताओं के चित्र दुर्लभ ही देखने को मिलते हैं। करीने से काढे गए बालों और पोज देते नेता मंत्री अवश्य ही दिख जाया करते हैं। गांधी नेहरू के नाम पर सियासी मलाई चखने वाले नेताओं को गांधी टोपी पहनना वजन से कम नहीं लगता है।

आधुनिकता के इस युग में महात्मा गांधी के नाम से पहचानी जाने वाली गांधी टोपी अब नेताओं के सर का ताज नहीं बन पा रही है। इसका स्थान ले लिया है कांग्रेस के ध्वज के समान ही तिरंगे दुपट्टे और भाजपा के भगवा दुपट्टे (गमछे) ने। जब नेता ही गांधी टोपी का परित्याग कर चुके हों तो उनका अनुसरण करने वाले कार्यकर्ता भला कहां पीछे रहने वाले हैं। इन परिस्थितियों में सियासी गलियारों में भला गांधी के सिद्धांतों को कौन मानने वाला रह जाएगा। कौन उनके सच्चाई, ईमानदारी, स्वयं का काम खुद करो आदि जैसे सिद्धांतों का अनुपालन करने वाला रह जाएगा।

एसा नहीं कि गांधी टोपी आजाद भारत के लोगों के सिरों का ताज न हो। आज भी महाराष्ट्र में अनेक गांव एसे हैं, जहां बिना इस टोपी के कोई भी सिर दिखाई दे जाए। इसके साथ ही साथ कर्नाटक और तमिलनाडू के लोगों ने भी गांधी टोपी को अंगीकार कर रखा है। यह गायब हुई है तो बस सियासतदारों के सिर से। नेहरू गांधी के नाम पर राजनीति करने वाली कांग्रेस की युवा पीढ़ी के अगुआ राहुल गांधी भी साल में एकाध मर्तबा ही गांधी टोपी में नजर आते हैं जब उन्हें कांग्रेस सेवादल की सलामी लेना होता है। बाकी समय तो वे खुले लहराते बालों को संवारते ही नजर आते हैं।

अस्सी के दशक के आरंभ तक अनेक प्रदेशों में चतुर्थ श्रेणी के सरकारी नुमाईंदों के ड्रेस कोड में शामिल थी गांधी टोपी। इस टोपी को पहनकर सरकारी कर्मचारी अपने आप को गोरवांन्वित महसूस भी किया करते थे। कालांतर में गांधी टोपी ‘‘आउट ऑफ फैशन‘‘ हो गई। यहां तक कि जिस शख्सियत को पूरा देश राष्ट्रपिता के नाम से बुलाता है, उसी के नाम की टोपी को कम से कम सरकारी कर्मचारियों के सर की शान बनाने मंे भी देश और प्रदेशों की सरकरों को जिल्लत महसूस होती है। यही कारण है कि इस टोपी को पहनने के लिए सरकारें अपने मातहतों को पाबंद भी नहीं कर पाईं हैं। आज टोपी लगाने का काम सुरक्षा एजेंसियों को ही करना पड़ रहा है। जिलों के कलेक्टर या नेता भी स्वाधीनता दिवस या फिर गणतंत्र दिवस पर सलामी के वक्त सर पर टोपी रखते हैं, किन्तु वह गांधी टोपी की बजाए पूर्वोत्तर राज्यों से बुलाई गई विशेष किस्म की टोपी हुआ करती है।

यह सच है कि नेताओं की भाव भंगिमओं, उनके आचार विचार, पहनावे को उनके कार्यकर्ता अपनाते हैं। जब नेताओं के सर का ताज ही यह टोपी नहीं बन पाई हो तो औरों की कौन कहे। यहां तक कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वर्किंग कमेटी में उपसिथत होने वाले नेताओं के सर से भी यह टोपी उस वक्त भी नदारत ही मिलती है। देश के पहले नागरिक तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति कलाम ने भी कभी गांधी टोपी को धारण करना मुनासिब नहीं समझा।

मर्द के सर पर टोपी और औरत के सर पर पल्लू, अच्छे संस्करों की निशानी मानी जाती है। फिर आधी सदी से अधिक देश पर राज करने वाली लगभग सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के नेताओं को इसे पहनने से गुरेज कैसा। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू रहे हों या महामहिम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, किसी ने कभी भी इनकी बिना टोपी वाले छायाचित्र नहीं देखे होंगे। आधुनिकता और पश्चिमी फैशन की चकाचौंध में हम अपने मूल संस्कार ही खोते जा रहे हैं, जो निश्चित तौर पर चिंताजनक कहा जा सकता है।

वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एक सूबे में तो वन्दे मातरम को सरकारी कार्यालयों मंे अनिवार्य कर दिया है। यह सच है कि भाजपा का जन्म राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आचार विचारों से ही हुआ है। क्या संघ के पूर्व संस्थापकों ने कभी गांधी टोपी को नहीं अपनाया? अगर अपनाया है तो फिर आज की भाजपा की पीढ़ी इससे गुरेज क्यों कर रही है? क्यों भाजपा शासित राज्यों में सरकारी नुमाईंदों को गांधी टोपी अनिवार्य नहीं की जा रही है। कारण साफ है कि आज की युवा पीढ़ी की नजरों में गांधी के सिद्धांत आप्रसंगिक हो चुके हैं।

युवाओं के पायोनियर (अगुआ) बन चुके कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी किसी कार्यक्रम में अगर जरूरत पड़ती है तो गांधी टोपी को सर पर महज औपचारिकता के लिए पहन लेते हैं, फिर मनमोहक मुस्कान देकर इसे उतारकर अपने पीछे वाली कतार में बैठे किसी नेता को पकड़ा देते हैं। फिर अपनी उंगलियों से राहुल अपने बाल संवारते नजर आ जाते हैं। आज मंत्री मण्डल का एक भी सदस्य गांधी वादी विचारधारा के प्रहसन के लिए ही सही गांधी टोपी को नही धारण करता नजर आता है।

अगर देश के नेता गांधी टोपी को ही एक वजनयुक्त औपचारिकता समझकर इसे धारण करेंगे तो फिर उनसे गांधी के सिद्धांतें पर चलने की आशा करना बेमानी ही होगा। यही कारण है कि कुछ दिनों पूर्व संसद के सत्र में कांग्रेस के शांताराम लक्ष्मण नाइक ने सवाल पूछा था कि क्या महात्मा गांधी को उनके गुणो, ईमानदारी, प्रतिबद्धता, विचारों और सादगी के साथ दोबारा पैदा किया जा सकता है। इस समय उनकी बहुत जरूरत है। हम सब अपने उद्देश्य से भटक गए हैं और हमें महात्मा गांधी के मार्गदर्शन की जरूरत है। भले ही यह महात्मा गांधी के क्लोन से ही मिले।

कुप्रबंधन का शिकार हुए शिवराज

कुप्रबंधन का शिकार हुए शिवराज

दिल्ली में एक कार्यक्रम में आमंत्रित शिवराज को नहीं मिला मंच पर आसन

मनमसोसकर दर्शक दीर्घा में विराजे मुख्यमंत्री

पीएम ने भी नहीं लिया संबोधन में नाम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में मीडिया जगत के पुरूस्कारों के कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बेहद शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। इस प्रोग्राम में विशेष तौर पर आमंत्रित शिवराज सिंह चौहान को मंच पर आसनी नहीं मिल पाई, मजबूरन उन्हें दर्शक दीर्घा में बैठने पर मजबूर होना पड़ा।

मीडिया और सरकार के बीच सेतु के तौर पर काम करने वाले जनसंपर्क विभाग के आला अधिकारियों की मौजूदगी में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक बड़े मीडिया घराने के पत्रकारिता पुरूस्कारों के कार्यक्रम में आमंत्रित किए गए। जब वे कार्यक्रम स्थल पहुंचे तब उन्हें मंच तक ले जाने के लिए कोई मौजूद नहीं था। मजबूरी में शिवराज को दर्शक दीर्घा में ही आसन ग्रहण करना पड़ा।

इस तरह भूलवश या जानबूझकर हुई उपेक्षा से शिवराज का तमतमाया चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। उधर मुख्यमंत्री की छवि निर्माण के लिए पाबंद जनसंपर्क विभाग के आला अधिकारी भी पीछे हाथ पर हाथ बांधे खड़े सारा माजरा देख रहे थे। चर्चा थी कि मंच पर ले जाने का काम आयोजकों का है, हम भला बीच में क्यों पड़ें। हद तो तब हो गई जब मुख्यमंत्री को देख प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने एक मनमोहक स्माईल अवश्य दी किन्तु अपने संबोधन में शिवराज सिंह चौहान के नाम का उल्लेख करना मुनासिब नहीं समझा।

उक्त समारोह में प्रधानमंत्री के अलावा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी.एल.जोशी, सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, भूतल परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, गिरिजा व्यास आदि को मंच पर बुलवाकर उनसे भी सम्मान दिलवाए गए, किन्तु मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पूछा तक नहीं गया। बताया जाता है कि इस अपमान से आहत शिवराज सिंह चौहान ने अपने सारे कार्यक्रम निरस्त कर दिए और सीधे हवाई अड्डे पहंुच वापस भोपाल के लिए उड़ान भर ली।

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मलयाली लाबी ने दिखाया अपना वर्चस्व!

दस जनपथ की नाराजगी के बाद भी मथाई बने विदेश सचिव

जरूरी अहर्ताएं भी पूरी नहीं कर रहे हैं नए विदेश सचिव

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ की नाराजगी के बाद भी रंजन मथाई का विदेश सचिव बनना अपने आप में आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। माना जा रहा है कि सत्ता के शीर्ष केंद्र प्रधानमंत्री आवास और संगठन और शक्ति के शीर्ष केंद्र सोनिया गांधी के आवास के बीच चल रहे शीत युद्ध के परिणामस्वरूप उनकी नाराजगी को अनदेखा कर मथाई को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है।

विदेश मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों ने दावा किया है कि रंजन मथाई की पदस्थापना कभी भी भारत के पड़ोसी देश में नहीं हुई है। यह विदेश सचिव पद के लिए आवश्यक शर्तों में से एक मानी जाती है। इस तरह की अनदेखी से साफ हो जाता है कि सेवा निवृत गृह सचिव जी.के.पिल्लई भले ही सीवीसी न बन पाए हों पर सत्ता पर मलयाली लाबी का वर्चस्व आज भी कायम है।

गौरतलब होगा कि विदेश सचिव पद के लिए शरद सब्बरवाल, हरदीप पुरी और विवेक काटजू के नाम चर्चाओं में थे। हरदीप पुरी भाजपा का दामन थामने की चाह रख रहे हैं। वे दिल्ली से भाजपा की उम्मीदवारी के इच्छुक हैं। सूत्रांे के अनुसार अफगानिस्तान में बतौर एम्बेसेडर विवेक काटजू का शानदार परफार्मेंस भी दरकिनार कर मथाई को विदेश विभाग की कमान सौंप दी गई है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

बिना ड्राईवर चल रही मंत्रालय की रेल


बिना ड्राईवर चल रही मंत्रालय की रेल

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य में इक्कीसवीं सदी का पहला दशक याद किया जाएगा तो पतन के लिए। इस दशक में नैतिक मूल्यों का जो अवमूल्यन हुआ है वह किसी भी दशक में नहीं हुआ होगा। एक के बाद एक घपले घोटाले, भ्रष्टाचार अनाचार की गूंज अनुगूंज सुनाई देती जा रही पर कांग्रेस नीत केंद्र सरकार कान में रूई लगाए चुपचाप नीरो के मानिंद बांसुरी बजा रही है। भारतीय रेल इनमें से एक है। रेल को लेकर होने वाले एक्सपेरीमेंट्स से यात्री हलाकान रहे। लालू यादव के बाद ममता बनर्जी बनीं इस विभाग की निजाम। वे भारत गणराज्य नहीं वरन् पश्चिम बंगाल की ही रेल मंत्री बनकर रह गईं। रेल की व्यवस्थाएं पटरी से उतरती गईं किन्तु हवाई सफर का आनंद लेने वाले प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसदों ने इस बारे में आवाज उठाना मुनासिब नहीं समझा। कुल मिलाकर हताशा और निराशा आम रियाया के हाथ ही लगी। हालात देखकर लगने लगा है मानो बिजली, पानी, रोड़वेज आदि की तर्ज पर अब रेल को भी निजी हाथों मंे देकर जनता की जेब काटने की तैयारियों में व्यस्त है सरकार।
 
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में पिछले एक पखवाड़े में तीन गंभीर दुर्घटनाओं के बाद भी रेल मंत्रालय के लिए यह एक सामान्य घटना होना चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा करने के लिए पर्याप्त कहा जा सकता है। 30 जून को तिलक ब्रिज के पास प्वाईंट नंबर 63 पर एक माल गाड़ी पटरी से उतर गई, जिससे यातायात दस घंटे तक बाधित रहा। इसके पहले इसी स्टेशन पर प्वाईंट नंबर 80 के खराब होने से बीस जून को लाईन गलत जुड़ गईं, जिसके चलते गुवहाटी राजधानी और काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस एक ही समय एक ही ट्रेक पर आ गईं। रेल कर्मी मुस्तैद थे इसलिए कोई हादसा नहीं हो पाया।

हद तो तब हो गई जब नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर बिना इंजन की खड़ी भुवनेश्वर राजधानी अपने आप ही चल पड़ी। इसे रोकने के लिए ट्रेक पर पत्थर डालने पड़े। यह गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आएगा। रेल विभाग इसे सामान्य घटना मान रहा है। रेल की पातों पर पत्थर पटकने से उसमें टूटफूट की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। चूंकि भुवनेश्वर राजधानी व्हीआईपी रेल की श्रेणी में है अतः यह चूक उजाकर हो पाई अन्यथा मामला दब गया होता।

रेल हादसों की प्रमुख वजह रेल विभाग के पास मौजूदा संसाधनों से कई गुना अधिक मात्रा में रेल गाडियों का परिचालन है। जनसेवकों के दबाव में रेल महकमा नई रेल गाडियों की घोषणा, मौजूदा रेल के फेरों में बढ़ोत्तरी तो कर देता है किन्तु संसाधनों के मामले में खामोशी ही अख्तियार कर लेता है। मसलन मथुरा के बाद दिल्ली तक रेल पटरी पर सरकती ही नजर आती है। इसका प्रमुख कारण यातायात का अत्याधिक दबाव ही है।

दक्षिण और पूर्व भारत से आनेवाली रेल गडियांे के लिए भुसावल और नागपुर गेट वे का काम करते हैं। इसके बाद इटारसी में आकर फिर एक बार ये सभी मिल जाती हैं। इटारसी से दिल्ली की ओर बढ़ने पर झांसी में एक और रेल लाईन आकर मिलती है। रही सही कसर मथुरा में पूरी हो जाती है, जहां गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसढ़, उड़ीसा आदि राज्यों से आने वाली रेल गाडियों का समागम होता है। इनमें माल गड़ियों को इंतजार ही करना पड़ता है। जाहिर है भुसावल, नागपुर के बाद झांसी में यातायात का दबाव बढ़ जाता है, इसके बाद झांसी और फिर मथुरा के बाद पटरी पर अत्याधिक दबाव होता है।

आज आवश्यक्ता इस बात की है कि रेल गाडियों की संख्या बढ़ाने के बाजाए पटरियों को दो के स्थान पर चार करने की दिशा में प्रयास किए जाएं। रेल्वे विभाग अपनी आधारभूत संरचाना में बदलाव के बिना ही पटरी पर यातायात का दबाव बढ़ाते जा रहा है। यह सच है कि भारत का रेल तंत्र विश्व में सबसे बडे रेल तंत्रों में स्थान पाता है। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों द्वारा अपनी सहूलियत के लिए बिछाई गई रेल की पांतों को अब भी हम उपयोग में ला रहे हैं। तकनीक के नाम पर हमारे पास बाबा आदम के जमाने के ही संसाधन हैं जिनके भरोसे भारतीय रेल द्वारा यात्रियों की सुरक्षा के इंतजामात चाक चौबंद रखे जाते हैं।

सदी के महात्वपूर्ण दशक 2020 के आगमन के साथ ही ‘‘विजन 2020‘‘ रेल मंत्रालय के रेल सुरक्षा एवं संरक्षा के दावों की हवा अपने आप निकल गई है। दिल्ली में ही एक पखवाड़े में हुई इन तीन रेल दुर्घटनाओं ने साफ कर दिया है कि आजादी के साठ सालों बाद भी हिन्दुस्तान का यह परिवहन सिस्टम कराह ही रहा है।

जब भी कोई रेल मंत्री नया बनता है वह बजट में अपने संसदीय क्षेत्र और प्रदेश के लिए रेलगाडियों की बौछार कर देता है। अधिकारी उस टेªक पर यातायात का दबाव देखे बिना ही इसका प्रस्ताव करने देते हैं। देखा जाए तो बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के रेलमंत्रियों ने अपने अपने सूबों के लिए रेलगाडियों की तादाद में गजब इजाफा किया है। देश के अनेक हिस्से रेल गाडियों के लिए आज भी तरस ही रहे हैं। भारतीय रेल आज भी बाबा आदम के जमाने के सुरक्षा संसाधनों की पटरी पर दौडने पर मजबूर है।

रेल विभाग की कमान पहले हंसौड़ की भूमिका में दिखने वाले लालू प्रसाद यादव के हाथों में रही। उन्होंने रेल्वे की आय बढ़वाने के लिए एक डिब्बे में 82 की बजाए 81 और 84 स्लीपर लगवा दिए। जब यात्रियों को परेशानी हुई तब इन्हें अलग किया गया। यह प्रयोग लगभग अस्सी फीसदी रेल गाड़ियों में किया गया था, जिसे वापस लेना पड़ा। जाहिर था कि यह बिना सोचे समझे ही लिया गया फैसला था।

ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं तो रेल मुख्यालय दिल्ली के रेल भवन में ही रहा किन्तु अघोषित तौर पर यह खसककर पश्चिम बंगाल चला गया। उनकी अनदेखी से रेल्वे पटरी से उतर गया। अब इसे पटरी पर लाने के लिए खासी कवायद की दरकार प्रतीत हो रही है। पिछले लगभग सवा दो सालों से भारतीय रेल निजाम होते हुए भी बिना निजाम का ही वैसे ही चल रहा है जैसे कि बिना इंजन की रेल गाड़ी।

गठबंधन को साधकर सत्ता की मलाई चखने की गरज से कांग्रेस भी ममता बनर्जी के नखरे सहती आई है। अब ममता की इच्छा पर ही देश को नया पूर्ण कालिक रेल मंत्री मिल पाएगा। कितने दुर्भाग्य की बात है कि करोड़ों लोगों को लेकर चलने वाली भारतीय रेल आज मुखिया विहीन है, और मुखिया ममता बनर्जी तय करेंगीं? कांग्रेस चुपचाप देश की व्यवस्था चौपट होते देख रही है। यक्ष प्रश्न तो आज यही बना हुआ है कि सवा सौ साल पुरानी और इस देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस ने भारत को जिस रास्ते पर ढकेल दिया है, क्या वही है नेहरू और गांधी के सपनों का भारत?

खबर देने वालों को नहीं खबर ‘लाट साहेब की‘

खबर देने वालों को नहीं खबर लाट साहेब की

महामहिम दिल्ली में और जनसंपर्क महकमा अनजान!

राज्यपाल को जरूरत होती है तब वे बुलाते हैं जनसंपर्क विभाग को

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के महामहिम राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर दिल्ली प्रवास पर हों और जनसंपर्क विभाग को खबर न हो, है न आश्चर्य की बात। जी हां! शुक्रवार एक जुलाई को रामेश्वर ठाकुर दिल्ली में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आए और मध्य प्रदेश का सूचना केंद्र इससे अनजान रहा! महामहिम के प्रोटोकाल की दृष्टि से इसे गंभीर त्रुटि माना जा रहा है।

द इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट ऑफ इंडियाके स्थापना समारोह के अवसर पर रामेश्वर ठाकुर के मुख्य आतिथ्य के अलावा  कार्पोरेट ममालों के मंत्री मुरली देवड़ा, राज्य मंत्री आर.पी.एन.सिंह, लोकसभा के उपाध्यक्ष के.रहमान खान, की उपस्थिति में मने इस प्रोग्राम में आईसीएआई की वेब साईट, कान्टेक्ट, प्रेक्टीशनर एवं सीए फर्म की वेब साईट आदि का लोकार्पण किया गया।

इस अवसर पर मध्य प्रदेश को कव्हर करने वाले मीडिया पर्सन्स तब हैरत में पड़ गए जब दिल्ली से प्रकाशित अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन तो देखने को मिला किन्तु उन्हें मध्य प्रदेश सूचना केंद्र की ओर से इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। इस बारे में जब सूचना केंद्र में पदस्थ सूचना केंद्र के प्रभारी और अतिरिक्त संचालक सुरेंद्र द्विवेदी से संपर्क किया गया तो उन्होंने भी इस तरह के किसी कार्यक्रम के बारे में अनिभिज्ञता ही प्रकट की।

इस बारे में राज्य पाल के प्रेस अधिकारी राजेश मलिक से दूरभाष पर चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि उनके कार्यालय से मध्य प्रदेश भवन को महामहिम की दिल्ली यात्रा की सूचना भेज दी गई थी। अमूमन इस बारे में मध्य प्रदेश सूचना केंद्र को अलग से कोई सूचना नहीं भेजी जाती है। अगर एसा हुआ है तो भविष्य में महामहिम की यात्रा और कार्यक्रमों की सूचना प्रथक से सूचना केंद्र दिल्ली को अवश्य भेजी जाएगी।

वहीं दूसरी ओर जनसंपर्क आयुक्त ने दूरभाष पर बताया कि महामहिम राज्य पाल को अगरआवश्यक्ता होती है तो वे जनसंपर्क महकमे के अधिकारियों को तलब कर पत्रकारों को सूचित करने के निर्देश देते हैं। दिल्ली में मध्य प्रदेश को कव्हर करने वाले पत्रकारों में यह चर्चा आम हो गई है कि जनसंपर्क विभाग का काम अब मंत्री और मुख्यमंत्री की सकारात्मक पब्लिसिटी का ही रह गया है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि महामहिम का कार्यकाल समाप्त होने के उपरांत दुबारा उनकी पुर्ननियुक्ति नहीं होने से जनसंपर्क विभाग भी उन्हें हल्के में ही ले रहा है।

मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि महामहिम के भोपाल दिल्ली के बहुतायत में होने वाले दौरों से अधिकारी भी आजिज आ चुके हैं, फिर स्टेट की ओर से उन्हें व्हीव्हीआईपी ट्रीटमेंट देने का कोई विशेष फरमान भी तो नहीं आया है। कम ही लोग जानते हैं कि मध्य प्रदेश के महामहिम राज्यपाल पेशे से चार्टर्ड एकांउंटेंट हैं और वे इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकांउंटेंट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

. . . और हो गईं अलका सिरोही दौड़ से बाहर

. . . और हो गईं अलका सिरोही दौड़ से बाहर

सीवीसी की दौड़ में नहीं दिया एमपी के नेताओं ने समर्थन

मलयाली लाबी को झटका देने बनया प्रदीप कुमार को सीवीसी

पिल्लई की राह का रोड़ा बनकर उभरे प्रणव

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मलयाली लाबी को झटका देने के लिए कांग्रेस के सत्ता और संगठन के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ ने अंततः नए सीवीसी के लिए प्रदीप कुमार के नाम पर हरी झंडी दिखा दी। इस पद के लिए एमपी की अलका सिरोही सहित 28 अधिकारी दौड़ में थे। कुमार के नाम पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने भी आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। मलयाली लाबी सेवानिवृत गृह सचिव जी.के.पिल्लई के लिए लामबंद हो गए थे, किन्तु प्रणव मुखर्जी के वीटो के चलते उनका पत्ता काट दिया गया।

मुख्य सतर्कता आयुक्त की दौड़ से भारतीय प्रशासनिक सेवा की मध्य प्रदेश काडर की वरिष्ठ अधिकारी अलका सिरोही का नाम इसलिए पिछड़ा क्योंकि उनके लिए मध्य प्रदेश के क्षत्रपों कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, अरूण यादव, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया आदि ने जोर नहीं लगाया। यद्यपि सिरोही को कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह की पसंद का अधिकारी माना जाता है फिर भी कैबनेट सचिव की दौड़ से जब वे बाहर हुईं तभी अनुमान लगाया जा रहा था कि देश के महत्वपूर्ण पदों पर मध्य प्रदेश के नौकरशाहों का बैठना मुश्किल ही है।

वैसे, इस दौड में अलका सिरोही के अलावा आर.पी.अग्रवाल, बिजय चटर्जी, आर.एस.पाण्डे, विजय लक्ष्मी गुप्ता, नरेश दयाल जैसे दिग्गज आईएएस अफसर थे। उधर सत्ता की धुरी बनने वाली मलयाली लाबी ने सेवानिवृत गृह सचिव जी.के.पिल्लई के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। पिल्लई को रास्ते से हटाने का काम दस जनपथ और खुद प्रणव मुखर्जी ने किया बताया जा रहा है। बताते हैं कि मलयाली लाबी को झटका देने के लिए दस जनपथ ने उनके नाम पर मोहर नहीं लगाई तो प्रणव को शक था कि पिल्लई के इशारे पर ही वित्त मंत्रालय की जासूसी करवाई गई है। इन्हीं समीकरणों के चलते हरियाणा काडर के प्रदीप कुमार की लाटरी निकल गई। रही बात सुषमा स्वराज की तो हरियाणा के अंदरूनी तार भी इस मामले में काम कर गए बताए जा रहे हैं।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

युवराज को पीएम बनाने पर आमदा भाजपा


ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

युवराज को पीएम बनाने पर आमदा भाजपा
कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए कांग्रेस से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी आतुर दिखाई पड़ रही है। जी हां, यह सच है भाजपा के महासचिव और प्रवक्ता रवि शंकर प्रसाद का कहना है कि कांग्रेस राहुल को तत्काल प्रधानमंत्री बनाए ताकि उनकी वास्तविक योग्यता जनता के सामने आ सके। प्रसाद का आरोप है कि कांग्रेस ने प्रधानमंत्री का पद मजाक बना दिया है। वैसे भी सियासी गलियारों में नेहरू गांधी परिवार के आंखों के तारों राहुल और वरूण गांधी में तुलना कर वरूण गांधी को राहुल से ज्यादा समझदार और परिपक्व करार दिया जाता रहा है। कहा जाता है कि दोनों ही भाईयों में अगर शास्त्रार्थ करवा दिया जाए तो अमूल बेबी राहुल निश्चित तौर पर अपने सलाहकारों और सहायकों के बिना बगलें झांकते ही नजर आएंगे।

लोकायुक्त को भी नहीं बख्शा कलमाड़ी ने
कामन वेल्थ गेम्स में अपनी सेहत तंदरूस्थ करने वाले आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का साहस तो देखिए उन्होंने दिल्ली के लोकयुक्त को भी नहीं बख्शा। दिल्ली के लोकायुक्त न्यायमूर्ति मनमोहन सरीन आज भी राष्ट्रमण्डल समिति को किराए पर दिए अपने घर का किराया लेने लाईन में लगे हुए हैं। न्यायमूर्ति सरीन ने पंचशील एनक्लेव का अपना घर आयोजन समिति को विदेश महमानों के बसेरे के लिए दिया था। समिति ने इनकी जमानत राशि सवा आठ लाख रूपए में से पांच लाख 36 हजार रूपए अभी तक नहीं लौटाए हैं। समिति का हाजमा इतना तगड़ा है कि उसने बिजली, टेलीफोन बिल सहित लगभग चार लाख रूपए का किराया भी हजम कर लिया है। यह मकान पौने तीन लाख रूपए महीने के किराए पर लिया गया था। आयोजन समिति के हौसले और राजनैतिक रसूख की दाद देनी पड़ेगी क्यांेकि जो लोकायुक्त के साथ एसा कर सकता है वह तो आम आदमी को घोलकर पीने का माद्दा रखता ही होगा।

ब्रांडेड मिनरल वाटर के शौकीन बाबा रामदेव!
‘‘कोका कोला‘‘ मतलब टायलेट क्लीनर! अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब बाबा रामदेव ने एक कार्पोरेट घराने के शीतल पेय की बिकावली घटाने का बाकायदा अभियान छेड़ रखा था। बाबा रामदेव के इस जुमले से कोका कोला की कमर टूट गई। बाबा रामदेव जो कहते हैं वह करते नहीं यह भी जग जाहिर है। बाबा रामदेव ने कहा था कि वे मरते मर जाएंगे किन्तु सिले वस्त्र कभी धारण नहीं करेंगे। रामलीला मैदान में सभी ने बाबा रामदेव को रात में सिले हुए महिला के वस्त्रों में चुनरी के साथ भागते देखा। बाबा कहते हैं कि उनके वस्त्र उतर गए थे। बाबा चाहते तो चुनरी लपेट कर ही भाग लेते पर वे छिपकर मंुह छिपाकर भागना चाह रहे थे। बहरहाल होटल क्लेरिजेज में बाबा और मंत्रियों के बीच हुई चर्चा के कुछ लम्हे प्लांट कर मीडिया में भेज दिए गए हैं। चर्चा के दौरान बाबा ने पानी की मांग की तो वहां ‘‘किनले‘‘ का पानी लाया गया। बाबा ने नाक मुंह सिकोड़ा तो मंत्री जी ने आंख मारकर कहा कि ‘‘हिमालय‘‘ का पानी ले आओ। बाबा ने हिमालय का पानी पिया तब मंत्री जी समझ गए कि बाबा अब हिमालय कंपनी के अघोषित ब्रांड एम्बेसेडर बन गए हैं।

कांग्रेस ने की सांसद की उपेक्षा!
दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में कुछ भाजपाईयों के बीच इन दिनों हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुए एयरपोर्ट टर्मिनल कार्यक्रम में भोपाल के सांसद को मंच पर न बिठाने पर कांग्रेस को कोसने का काम किया जा रहा है। भाजपाईयों का तर्क है कि हम तो भेदभाव नहीं करते। कांग्रेस के घोर विरोध के बाद भी भाजपा ने भोपाल में राजा भोज की प्रतिमा के अनावरण प्रोग्राम में कांग्रेस के नेता ठाकुर हरवंश सिंह को मंच पर स्थान दिया था, पर विमानपत्तन प्राधिकरण के इस प्रोग्राम में सांसद कैलाश जोशी को मंच पर स्थान नहीं दिया गया। भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री ही मंच पर रहे जबकि नैतिकता का तकाजा था कि इस प्रोग्राम में सांसद को मंच पर स्थान दिया जाना चाहिए था। भाजपा अपनी दरिया दिली की तारीफ करते नहीं थक रही है, तभी किसी ने चुटकी ली और कहा -‘‘भैये, कैलाश जोशी की कांग्रेस में अंदर तक पैठ कहां, यह तो ‘‘मन राखनलाल‘‘ हरवंश सिंह ही हैं जिनकी कांग्रेस से ज्यादा भाजपा में चलती है, सो उन्हें तो चाहे कांग्रेस का विरोध हो या समर्थन हर समय मंच पर आसनीमिलना तय ही है।

कौन बनेगा करोड़पति पीएम!
अमिताभ बच्चन ने करोड़पति के खेल में जान फूंक दी थी। आज भी लोग आर यू श्योर? लाईलाईन इस्तेमाल कर लें? लाक कर दें?‘ जैसे जुमले दोहराते नजर आते हैं। सियासी गलियारों में अब कौन बनेगा करोड़पति पीएम? का खेल आरंभ हो गया है। मनमोहन और सोनिया के बीच गहराती दरार के बाद अब सत्ता और संगठन के शीर्ष आपस में दूर होते जा रहे हैं। अब कहा जा रहा है कि सोनिया जल्द ही मनमोहन की रूखसती की इच्छुक हैं। सोनिया के सामने मानमोहन के विकल्प का संकट आन खड़ा हुआ है। उनके विश्वस्त ए.के.अंटोनी ईसाई हैं। चिदम्बरम किसी काम के नहीं हैं। प्रणव मुखर्जी अब पीएम के विश्वस्त हो गए हैं। राहुल पीएम बनना नहीं चाह रहे हैं। अब सियासी समझ बूझ वाले बचते हैं राजा दिग्विजय सिंह। राजा का इतिहास देखकर सोनिया उन पर दांव लगाने से हिचक ही रहीं हैं। सोनिया को भरमाया गया है कि अगर राजा को पीएम बना दिया तो नेहरू गांधी परिवार का नाम लेने वाले भी नहीं बचेंगे एकाध साल में इस देश में।

खेत खा रही बाड़ को!
पुरानी कहावत है कि तब कुछ नहीं किया जा सकता है जब खेत को उसकी बाड़ (खेत की सीमा पर लगी कटीली झाड़ियां) खाने लगे। देश की सेवा के लिए सरकारी नौकरी में आने वाले या चुनाव जीतकर जनसेवक बनने वाले अपने आप को जनता के नौकर की बजाए शासक समझने लगंे तो जनता का कचूमर निकलना स्वाभाविक ही है। जब पुलिस खुद ही चोरी करने लगे तो फिर जनता का तो भगवान ही मालिक है। हाल ही में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में एंटी नारकोटिक्स विभाग का अफसर ही एक रेव पार्टी में प्रतिबंधित नशीली दवाओं के स्टाक की रखवाली करते हुए पकड़ा गया। जिसके कांधों पर इन दवाओं के बाजार में उतरने से रोकने की जवाबदारी हो वे ही अगर इन दवाओं को बेचें तो फिर क्या कहा जा सकता है। इसमें गुजरे जमाने के अभिनेता विनोद खन्ना के बेटे के मिलने से हैरानी नहीं हुई हैरानी निरीक्षक अनिल जाधव के ड्रग्स के साथ मिलने से हो रही है।

. . . और लग गया लाट साहेब की रसोई में ताला!
क्या आपने कभी सुना है कि किसी राजभवन में कुपित लाट साहेब अर्थात महामहिम राज्यपाल महोदय ने रसोईघर ताला लगवा दिया हो। जी हां यह सच है। चंड़ीगढ़ स्थित हरियाणा राजभवन का किचिन बंद है, राजभवन के एक सैकड़ा से अधिक कर्मचारी बाहर से चाय पान स्वल्पाहार का आनंद ले रहे हैं। बताते हैं कि लाटसाहेब जगन्नाथ पहाड़िया को रसोईयों ने बासा सड़ा हुआ खाना परस दिया, फिर क्या था, भड़क गए महामहिम। लग गया ताला किचिन में। एक रसोईए की छुट्टी हो गई और बाकी अपना खाना बाहर दहलान में बनाने पर मजबूर हैं। शनिवार को लाट साहेब वापस आएंगे फिर पता चलेगा कि आगे यह खुलेगा या नहीं। इस बात से नसीहत लेकर अब व्हीव्हीआईपीज को खाने के लिए शबरी मंत्रअर्थात चख चखकर देना ही उचित होगा रसोईयों के लिए।

जसवंत ने डाले द्रमुक पर डोरे
अपनी बयानबाजी के लिए चर्चा में रहने वाले भाजपा के मुखर नेता जसवंत सिंह ने अब एक बार फिर नया राग अलापा है। द्रमुक सांसद आदिमत्थू राजा और कनिमोझी के जेल मंे रखे जाने पर उन्होंने सवालिया निशान लगा दिया है। यद्यपि भाजपा ने यह बयान उनकी निजी राय करार दिया है, पर जसवंत के इस बयान से कांग्रेस और द्रमुक के बीच दूरी बढ़ने की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है। जसवंत का कहना है कि जब मामले की सुनवाई चल रही हो तब ये दोनों जांच को कैसे प्रभावित कर सकते हैं? जसवंत का कहना है कि दोनों पर जो आरोप लगे हैं वे डकैती या हत्या जैसे नहीं हैं। अब जसवंत सिंह को कौन समझाए कि इन दोनों पर जो आरोप आहूत हैं वे आरोप परोक्ष तौर पर जनता के पैसों पर डकैती के हैं।

खुल गई दिल्ली पुलिस की कलई
आपके लिए आपकी दिल्ली पुलिसजुमले को ढेंगा दिखाते हुए नाबालिक बच्चों ने देश के सबसे ताकतवर पद पर बैठे प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार हरीश खरे की कार उठा ली। इसके साथ ही उनका लेपटाप और मोबाईल भी चला गया। बाद में हरीश खरे के घर के पास देना बैंक के एटीएम के फुटेज से चोर की शिनाख्त हो सकी। देना बैंक के एटीएम में भी सुरक्षा कर्मी तैनात होगा। अमूमन देश के नब्बे फीसदी एटीएम बिना ही सुरक्षा कर्मी के चल रहे हैं। उनकी कार में सांसद का स्टीकर लगा हुआ था एवं उनके लेपटॉप पर किस तरह की जानकारी थी यह पता नहीं लग सका है। संसद के स्टीकर का बेजा इस्तेमाल तो नहीं हो पाया पर उनके लेपटॉप की जानकारी का क्या होगा यह तो हरीश खरे ही बता सकते हैं। यह है गांधी तेरे देश का हाल . . .।


गोपनीयता भंग की तो होगी जेल
सावधान! अगर किसी की गोपनीयता भंग की जाती है और वह प्रमाणित होती है तो जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। मानूसन सत्र में केंद्र सरकार द्वारा एक एसा विधेयक लाया जा रहा है जिसमें इन बातों का विशेष ध्यान रखा गया है। निजता विधेयक 2011 नामक इस विधेयक में अगर किसी की बीमारी के बारे में किसी अन्य को बताया जाता है तो इसमें एक लाख रूपए जुर्माने के साथ छः माह की सजा, फोन काल सुनने और बातचीत सार्वजनिक करने पर टेलीकाम कंपनी का लाईसेंस रद्द एवं गैरकानूनी तरीके से किसी की जासूसी करने पर पांच साल की कैद का प्रावधान किया गया है। इसकी मानिटरिंग और अमल में लाने के लिए डाटा प्रोटेक्शन अथाारिटी का भी गठन किया जा रहा है।

कैबनेट में नहीं तो कहां रहते हैं मंत्री
यूपीए सरकार के मंत्री निरंकुश हो गए हैं, इस बात में दो मत नहीं है। प्रधानमंत्री की मंत्रीमण्डल पर पकड़ पूरी तरह ढीली हो चुकी है। उधर सोनिया गांधी भी मंत्रियों की मश्कें कसने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार मंत्री मण्डल की कुल 48 बैठकों में मंत्रियों की उपस्थिति काफी निराशाजनक ही रही है। प्रणव मुखर्जी 95 फीसदी के साथ पहले स्थान पर तो अंबिका सोनी, वीरप्पा माईली और ए.के.अंटोनी 85 फीसदी के साथ दूसरे एवं कपिल सिब्बल 83 फीसदी के साथ तीसरे नंबर पर हैं। जयपाल रेड्डी अस्सी, पलनिअप्पम चिदम्बरम 75, शरद पवार 66, एस.एम.कृष्णा 45 फीसदी ही उपस्थिति दर्ज करा सके हैं। सबसे कमजोर परफारमेंस एम.के.अलगिरी और पूर्व मंत्री ममता बनर्जी का रहा है जिन्होंने महज 17 फीसदी ही बैठकें अटेण्ड की हैं। यह है देश के नीति निर्धारकों का मंत्रीमण्डल की बैठकों का लेखा जोखा।

यह है शिव के घर का हाल सखे
मध्य प्रदेश में बच्चों के मामा शिवराज सिंह चौहान के राज में सुशासन चल रहा है। प्रदेश में राम राज्य है, चोरी डकैती, लूटपाट, मारामारी, कालाबाजारी आदि सब कुछ बंद है मध्य प्रदेश में। यह दावा भाजपाईयों का है, जबकि जमीनी हकीकत इससे ठीक उलट है। स्कूल चलें हम का विज्ञापन भले ही लाखों करोड़ों रूपयों खर्च कर छपवाया और दिखाया जाता हो पर बच्चे आज भी स्कूल कैसे जा रहे हैं, और पढ़ रहे हैं यह बात वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले नहीं समझ सकते। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी के अंतर्गत आने वाले अनेक गांवों के दिल दहला देने वाले हालात का बखान शिवराज विरोधी इन दिनों पार्टी के आला नेताओं के समक्ष कर रहे हैं। बताया जाता है कि रहेटी क्षेत्र की बोरी पंचायत के ग्राम डोंगरी के बच्चे आज भी भब्बड़ नदी में तैरकर ही शाला जाते हैं। साथ ही पिपलिया में भी बरसात में टापू जैसे हालात बन जाते हैं। शिवराज की भानजियां भी बरसात में नदी तैर कर शाला जाने को मजबूर हैं।


पुच्छल तारा
इन दिनों बाबा रामदेव और अण्णा हजारे के अनशन के दमन के किस्से बहुत तेजी से चल रहे हैं। इसी पर आधारित एक एसएमएस भेजा है मध्य प्रदेश से पिंकी उपाध्याय ने। पिंकी लिखते हैं कि सोनिया गांधी एक स्कूल मेें विजिट करने गईं। एक कक्षा में जाकर उन्होंने बच्चों से कहा कि कोई सवाल पूछना है तो पूछो। कक्षा का होनहार विद्यार्थी चीकू खड़ा हुआ और बोला मेडम मेरे तीन सवाल हैं।
पहला - ‘‘आप पीएम क्यों नहीं बनीं?‘‘,
दूसरा -‘‘रामलीला मैदान दिल्ली में पुलिस किसने भेजी?‘‘
और तीसरा आखिरी सवाल -‘‘स्विस बैंक में आपका कितना पैसा जमा है?‘‘
इसके पहले की सोनिया जवाब दे पातीं हाफ टाईम की घंटी बज गई।
छुट्टी के बाद भोलू खड़ा हुआ और बोला -मैडम मेरे पांच सवाल हैं। तीन तो चीकू वाले और चौथा -‘‘हाफ टाईम की बैल बीस मिनिट कैसे बजी?‘‘ और और . . .
आखिरी सवाल -‘‘चीकू कहां है?‘‘