शनिवार, 19 नवंबर 2011

कानों कान खबर नहीं है जनसुनवाई की


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 19

कानों कान खबर नहीं है जनसुनवाई की

प्रदूषण मंडल की वेब साईट भी है झाबुआ ग्रुप के साथ

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के हृदय प्रदेश की संस्कारधानी से महज सौ किलोमीटर दूर स्थापित होने वाले देश के मशहूर थापर ग्रुप के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड केे कोल आधारित पावर प्लांट के द्वितीय चरण की जनसुनवाई का काम गुपचुप तरीके से चालू है। 22 नवंबर को शासकीय हाई स्कूल गोरखपुर, तहसील घंसौर एवं जिला सिवनी में प्रातः 11 बजे होने वाली जनसुनवाई की मुनादी भी नहीं पिटवाया जाना अनेक संदेहों को जन्म दे रहा है। इस बारे में मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल की वेब साईट भी लगता है झाबुआ पावर लिमिटेड के कथित एहसानों से दब चुकी है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर के ग्राम बरेला में स्थापित होने वाले पावर प्लांट के पहले चरण में पूर्व में ही गुपचुप तरीके से 600 मेगावाट की संस्थापना की जनसुनवाई पूरी कर ली गई थी। इस जनसुनवाई में क्या क्या हुआ इसका विवरण मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल की वेब साईट पर उपलब्ध तो है किन्तु जरूरी एवं काम की कार्यवाही की छायाप्रति इतनी उजली डाली गई है कि उसे पढ़ा भी नहीं जा सकता है।

मध्य प्रदेश प्रदूषण मण्डल के क्षेत्रीय अधिकारी जबलपुर पुष्पेंद्र सिंह और तत्कालीन अतिरिक्ति जिला दण्डाधिकारी श्रीमति अलका श्रीवास्तव के हस्ताक्षरों से युक्त इस प्रतिवेदन में क्या क्या हुआ यह तो वर्णित है, इसमें चालीस आपत्तियां भी दर्ज हैं, किन्तु इस आपत्तियों को पठनीय किसी भी दृष्टिकोण से नहीं कहा जा सकता है। यह शोध का ही विषय है कि सरकारी वेब साईट में लोक जनसुनवाई की कार्यवाही को पारदर्शिता के साथ प्रदर्शित क्यों नहीं किया गया है। इसके पूर्व में भी हुई जनसुनवाईयों के बारे में भी मण्डल का रवैया संदिग्ध ही रहा है।

मण्डल की वेब साईट पर 352 नंबर पर अब इसके दूसरे चरण की लोक जनसुनवाई का मामला अंकित है। इसमें हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में कंपनी की प्रस्तावना को क्लिक करने पर पेज केन नॉट बी डिस्पलेड प्रदर्शित हो जाता है। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में शिवराज सरकार का यह पक्षपात पूर्ण रवैया समझ से परे ही कहा जा सकता है। पूर्व की जनसुनवाई में आई आपत्तियों का निराकरण क्या किया गया है इस बारे में मण्डल, मध्य प्रदेश सरकार और कंपनी ने अपने मुंह सिले हुए हैं।

गौरतलब है कि इसके पूर्व भी पहले चरण में 600 मेगावाट के प्रस्तावित कोल और सुपर क्रिस्टल टेक्नोलॉजी आधारित पावर प्लांट की जनसुनवाई के मामले में भी पहले तो मण्डल की वेब साईट मौन रही फिर जब शोर शराबा हुआ तब जाकर पांच दिन पूर्व मण्डल ने इसकी कार्यवाही को सार्वजनिक किया था। इस बार 22 नवंबर को होने वाली जनसुनवाई की कार्यवाही को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रदूषण नियंत्रण मण्डल ने अपनी वेब साईट में स्थान नहीं दिया है।

(क्रमशः जारी)

सांसद देशमुख की उठाई मांगों पर जनसंपर्क मौन!


सांसद देशमुख की उठाई मांगों पर जनसंपर्क मौन!

उठाई डेढ़ दर्जन मांग खबरों में मिला एक को स्थान

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। परिसीमन में समाप्त हुई सिवनी लोकसभा सीट को समायोजित कर बालाघाट संसदीय क्षेत्र के सांसद के.डी.देशमुख ने क्षेत्र के विकास के लिए डेढ़ दर्जन से ज्यादा मांग केंद्रीय रेल मंत्री के समक्ष रखीं, किन्तु मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग द्वारा उनकी एक मांग को ही स्थान दिया जाना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। भाजपा के सांसद देशमुख के साथ मध्य प्रदेश की भाजपा की सरकार का यह रवैया चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं सिवनी जिले के दूसरे हिस्से को आरक्षित मण्डला सीट में समाहित किया गया है, वहां के सांसद बसोरी सिंह मसराम को सिवनी वासियों की कोई चिंता ही नहीं थी, यही कारण है कि वे सांसदों से रेल मंत्री के मिलन कार्यक्रम से गायब रहे।

सांसद के.डी.देशमुख ने दूरभाष पर चर्चा के दौरान बताया कि उन्होंने रेल मंत्री से चर्चा के दौरान जबलपुर से गोंदिया रेल मार्ग की बात को पुरजोर तरीके से उठाया। उन्होंने कहा कि यह रेल खण्ड डेढ़ दशक से अपूर्ण है। इसमें कुछ क्षेत्र में वनबाधा है जिसे तत्काल प्रभाव से दूर करना आवश्यक है। इसके साथ ही साथ ंिछंदवाड़ा से बरास्ता सिवनी नैनपुर होकर मण्डला के रेलखण्ड के अमान परिवर्तन का काम दो साल से लंबित है। सांसद देशमुख ने कहा कि इस रेल खण्ड के सर्वेक्षण हेतु सौ करोड़ रूपयों का बजट प्रावधान भी किया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि इसके अलावा उन्होंने कटंगी तिरोड़ी, अमान परिवर्तन के काम को तत्काल पूरा करने की मांग भी की। लामटा से परसवाड़ा बैहर मलाजखण्ड नया रेल मार्ग बनाया जाए। गौरतलब है कि मलाजखण्ड में एशिया का सबसे बड़ा कापर पोजेक्ट लगा हुआ है। इसके साथ ही साथ नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण यहां यातायात के साधनों का विकास अत्यावश्यक ही है।

सिवनी जिले के लिए सांसद देशमुख ने सिवनी छपारा लखनादौन, सिवनी बरघाट, कटंगी, मार्ग में भी नए रेलखण्ड की बात कही। उधर मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया है कि सांसद देशमुख ने महज बालाघाट से नागपुर नई रेल सेवा की मांग की है। गौरतलब है कि सांसद देशमुख द्वारा सिवनी जिले के रेल खण्ड में अमान परिवर्तन या नई रेल लाईनों के लिए संसद में कब कब तारांकित, अतारांकित प्रश्न या ध्यानाकर्षण लगाया है इस बारे में उनका इतिहास मौन ही है। जब सौ करोड़ रूपए का बजट प्रावधान छिंदवाड़ा से सिवनी, नैनपुर मण्डला फोर्ट मार्ग के लिए किया जा चुका है और काम आरंभ नहीं हुआ है तो इस संबंध में सांसद द्वारा संसद में क्या कार्यवाही की गई है इस बारे में भारतीय जनता पार्टी की जिला इकाई और खुद सांसद खामोश ही हैं।

आपा खो रही कांग्रेस भाजपा


आपा खो रही कांग्रेस भाजपा

अनर्गल प्रलाप और कामों का बढ़ा ग्राफ

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के हृदय प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष में बैठी कांग्रेस दोनों ही आपा खोती जा रही है। एक तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तथा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के खिलाफ वारंट जारी होता है तो दूसरी ओर कांग्रेस के सूबे के निजाम कांति लाल भूरिया द्वारा प्रदेश की महिला मंत्रियों को नचैया कह डाला। सूबे में कांग्रेस भाजपा के बौराएपन से असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। आलम देखकर लगने लगा है मानो किसी को भी सूबे की रियाया की दुख तकलीफ की चिंता नहीं रही।

कांग्रेस की कथित फूट जिसे सियासी हल्कों में भाजपा का तगड़ा मैनेजमेंट करार दिया जा रहा है के चलते भाजपा के आला नेता फूले नहीं समा रहे हैं। मध्य प्रदेश की एक अदालत द्वारा मुख्यमंत्री एस.आर.चौहान एवं विदिशा सांसद एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के खिलाफ राष्ट्रध्वज के अपमान के मामले में वारंट जारी करने की चर्चाएं भी हैं। दोनों ही को 9 दिसंबर को अदालत में हाजिर होने के निर्देश दिए गए हैं।

उधर दूसरी ओर कांग्रेस के नेशनल हेडक्वार्टर में चल रही चर्चाओं के अनुसार प्रदेश में कांग्रेस के अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया अब चाटुकारों की फौज से घिर गए हैं। कपड़े की तरह मोबाईल नंबर बदलने वाले भूरिया का मोबाईल सदा ही स्विच ऑफ रहता है। इतना ही नहीं चर्चा है कि उनके समर्थकों ने भूरिया को आश्वस्त किया है कि प्रदेश में लोग भाजपा के कुशासन से आजिज आ चुके हैं।

चाटुकारों ने भूरिया को यह भी भरोसा दिलाया है कि वर्ष 2013 में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का परचम फहरने से कोई नहीं रोक सकता है। और सरकार बनने के उपरांत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वे ही काबिज होंगे। संभवतः यही करण है कि उन्होंने झाबुआ के एक गांव का नाम बदलने के समारोह में प्रदेश भाजपा की मंत्रियों को नाचने वाली कह डाला। भूरिया की जुबान ने लगाम खोई और उन्होंने कांग्रेसियों को भाजपा का बाप कह डाला। इतना ही नहीं उन्होंने उल्लू जैसी संज्ञा देते हुए कहा कि भाजपाई रात को जगते हैं और दिन में घरों में दुबक जाते हैं।

परमाणु करार बन सकता है मनमोहन के गले की फांस


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 31

परमाणु करार बन सकता है मनमोहन के गले की फांस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। परमाणु बिजली घर में हादसे की स्थिति में देशी विदेशी कंपनियां किस कानून के तहत हर्जाना अदा करेंगी इस पर अभी संशय बरकरार है। कन्वेन्शन ऑफ सप्लिमेंटरी कंपनसेशन (सीएससी) वस्तुतः 1997 में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी (आईएईए) की एक संधि है, इसके साथ ही भारत में अपना अलग घरेलू लायबिलिटी कानून अस्तित्व में है। देश के वजीरे आजम के सामने यह चुनौति होगी कि वे किसकी वकालत करें। वैसे बाली में अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति बराक ओबामा को मनमोहन सिंह सीएससी को मंजूरी दिलाने का वायदा कर चुके हैं। इस पर अब तक चौदह देश हस्ताक्षर कर चुके हैं।

जानकारों का कहना है कि दोनों कानूनों में बेहद अंतर है। सीएससी और भारत के लायबिलिटी कानून में काफी विरोधाभास हैं। सीएससी में हर्जाना भरने की जिम्मेदारी ऑपरेटर (परमाणु बिजली घर चलाने वाली कंपनी) पर डाली गई है, जब कि भारत के लायबिलिटी कानून में जिम्मेदारी परमाणु बिजली घर के लिए उपकरण और साजोसामान की सप्लाई करने वाली सप्लायर कंपनियों पर डाली गई है।

भारत में जो भी विदेशी परमाणु रिएक्टर लगेगा, उसका संचालन भारत के न्यूक्लियर पावर कॉर्पाेरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआईएल) करेगा इसलिए एनपीसीआईएल ऑपरेटर कहा जाएगा और किसी परमाणु बिजली घर में कोई दुर्घटना होती है तो सीएससी के तहत दुर्घटना का हर्जाना ऑपरेटर यानी भारत सरकार की एक कंपनी को ही भरना होगा।

पेट्रोलियम मामले में बैकफुट पर सरकार


पेट्रोलियम मामले में बैकफुट पर सरकार

अब नहीं बढ़ेंगे गैस, केरोसीन और डीजल के दाम

ममता के आगे नतमस्तक सरकार

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। पेट्रोल के दाम बढ़ाकर सहयोगी दलों विशेषकर ममता बनर्जी का तीखा आक्रोश देखकर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के हाथ पांव फूल चुके हैं। इसके दामों में लगातार बढ़ोत्तरी से उपजे जनाक्रोश को भी झेलना अब सरकार के बस की बात नहीं लग रही है।

मूल लागत में करों को जोड़कर लगभग दुगने दामों पर तेल बेचने के बाद भी सरकार की नवरत्न कंपनियों को डीजल, मिट्टी का तेल और रसोई गैस बेचने में रोजाना 360 करोड़ रूपयों का घाटा उठाना पड़ रहा है जो आश्चर्यजनक ही माना जा हरा है। पीएमओ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इस वक्त इन तीनों उत्पादों के दामों बढ़ोत्तरी निश्चित तौर पर आत्मघाती ही होगा।

वैसे भी संसद का सत्र मंगलवार से आरंभ हो रहा है और एक माह चलने वाले इस सत्र के बीच अगर इन तीनों उत्पादों के दाम में बढोत्तरी की जाती है तो सरकार को विपक्ष आसानी से घेर लेगा। वैसे भी 15 नवंबर को दो रूपए की पेट्रोल की कीमतों में कमी के बाद भी सरकार पर राजनैतिक लाभ लेने के आरोप लग गए थे।

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

दवाओं की बेलगाम कीमतों पर कोर्ट की वाजिब चिंता


दवाओं की बेलगाम कीमतों पर कोर्ट की वाजिब चिंता

(लिमटी खरे)

देश में इस वक्त अगर किसी की कीमतों में आग लगी है तो वह है पेट्रोल और दवाएं। नियंत्रण मुक्त होने के कारण दोनों ही की कीमतें आसमान छू रही हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत ने देश की सबसे बड़ी पंचायत को इनकी कीमतें और न बढ़ने देने का मशविरा दिया है। देश में इस समय सबसे ज्यादा परेशानी से जूझ रहे हैं मरीज। मरीजों की जेब में डाका डाल रहीं हैं दवा कंपनियां। इनके औजार बने हुए हैं भगवान धन्वंतरी के वंशज यानी चिकित्सक। चिकित्सा जैसी व्यवसायिक पढ़ाई के दाखिले के दरम्यान चिकित्सकों को पीडित मानसिकता की सेवा का संकल्प दिलाया जाता है। जब तक ये पढ़ाई पूरी करते हैं तब तक तो इन्हें यह कौल याद रहता है किन्तु जैसे ही इनकी जेब में मरीजों को देखकर फीस आने लगती है इनका ईमान डोल जाता है। दवा कंपनियां भी मौज कर रही हैं। चिकित्सकों को भारी भरकम पैकेज देकर उनसे मनमानी दवा लिखवाकर मुनाफा कमाने से नहीं चूक रही हैं दवा कंपनिया। अनेक दवा कंपनियां तो चिकित्सकों के घर का पूरा खर्च तक उठा रही हैं। चिकित्सक भी जेनरिक दवाओं के बजाए ब्रांडेड दवाएं लिख रहे हैं। एक दवा बाजार में अगर आठ पैसे की है तो वही दवा नामी कंपनी की होकर अस्सी रूपए की हो जाती है। हाल ही में राजस्थान उच्च न्यायालय का एक फैसला इस मामले में नजीर साबित हो सकता है जिसमें चिकित्सकों को जेनरिक दवाएं ही लिखने को ताकीद किया गया है।

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की आसमान छूती कीमतों पर चिंता जताते हुए गुरूवार को कहा कि दवाओं की कीमतें अब और अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। न्यायमूर्ति जी.एस.सिंघवी और न्यायमूर्ति एस.के.मुखोपाध्याय की खण्डपीठ ने सरकार की प्रस्तावित औषधि मूल्य निर्धारण नीति को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार को मशविरा दिया कि देश में वैसे भी दवाओं की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं इन्हें और बढ़ाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। ढेर सारे गैर सरकारी संगठनों के समूह ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क ने सरकार की दवा मूल्य निर्धारण नीति को चुनौती दी थी।

दरसअल, पीडित मानवता की सेवा का संकल्प लेने वाले हिन्दुस्तान के चिकित्सकों की मानवता कभी की मर चुकी है। आज के युग में चिकित्सा का पेशा नोट कमाने का साधन बन चुका है। आज के समय को देखकर कहा जा सकता है कि मरीज की कालर एक डाक्टर द्वारा बिस्तर पर ही पकडी जाती है। दवा कंपनियों की मिलीभगत के चलते मरीजों की जेब पर सीधे सीधे डाका डाला जा रहा है।

चिकित्सकों और दवा कंपनियों ने मिलकर तंदरूस्ती हजार नियामत की पुरानी कहावत पर पानी फेरते हुए अपना नया फंडा इजाद किया है कि स्वास्थ्य के नाम पर जितना लूट सको लूट लो। इसी तारतम्य में स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने बिना मेडीकल रिपर्जेंटेटिव ही स्वास्थ्य की उपजाउ भूमि पर न केवल अपना साम्राज्य स्थापित किया है, वरन् अब तो वे देश पर राज करने का सपना भी देखने लगे हैं। संस्कृत की एक पुरानी कहावत है, ‘‘न दिवा स्वप्नं कुर्यात‘‘ अर्थात दिन में सपने नहीं देखना चाहिए, किन्तु बाबा रामदेव को लगता है कि योग के बल पर उन्होंने जो आकूत दौलत और शोहरत एकत्र की है, उसे वे भुना सकते हैं।

बहरहाल मेडीकल काउंसलि ऑफ इंडिया द्वारा इसी माह एक कोड लाने की तैयारी की जा रही है, जिसके तहत दवा कंपनियों से तोहफा लेने वाले चिकित्सकों का लाईसेंस रद्द किए जाने का प्रावधान है। एमसीआई द्वारा स्वास्थ्य के देवता भगवान धनवंतरी के वर्तमान वंशजों अर्थात चिकित्सकों पर लगाम कसने की कवायद की जा रही है। एमसीआई अपने इस कोड के निर्णय को अमली जामा कैसे पहनाती है, यह तो वक्त ही बताएगा किन्तु इस सबमें दवा कंपनियों की मश्कें कसने की बात कहीं भी सामने नहीं आई है। अर्थात कहीं न कहीं चोरी करने के लिए थोडी सी जमीन जरूर छोड दी गई है।

एमसीआई कोड के अनुसार चिकित्सक और उसके परिजन अब दवा कंपनियों के खर्चे पर सेमीनार, वर्कशाप, कांफ्रेंस आदि में नहीं जा सकेंगे। कल तक अगर चिकित्सक एसा करते थे, तब भी वे उजागर तौर पर तो किसी को यह बात नहीं ही बताते थे। इसके अलावा दवा कंपनियों के द्वारा चिकित्सकों को छुट्टियां बिताने देश विदेश की सैर कराना प्रतिबंधित हो जाएगा। चिकित्सक किसी भी फार्मा कंपनी के सलाहकार नहीं बन पाएंगे तथा मान्य संस्थाओं की मंजूरी के उपरांत ही शोध अथवा अध्ययन के लिए अनुदान या पैसे ले सकेंगे।
एमसीआई कोड भले ही ले आए पर चिकित्सकों के मुंह में दवा कंपनियों ने जो खून लगाया है, उसके चलते चिकित्सक इस सबके लिए रास्ते अवश्य ही खोज लेंगे। देखा जाए तो दुनिया का चौधरी अमेरिका इस मामले में बहुत ही ज्यादा सख्त है। अमेरिका में अनेक एसे उदहारण हैं, जिनको देखकर वहां के चिकित्सक और दवा कंपनी वालों की हिम्मत मरीजों की जेब तक हाथ पहुंचाने की नहीं हो पाती है। अमेरिका की एली लिली कंपनी ने तीन हजार चार सौ चिकित्सकों और पेशेवरों के लिए 2.20 करोड डालर (एक अरब रूपए से अधिक) दिए, बाद में गडबडियों के लिए उस कंपनी को 1.40 अरब डालर (64.40 अरब रूपए से अधिक) की पेनाल्टी भरनी पडी।

इसी तरह फायजर कंपनी ने चिकित्सकों और पेशेवरों के माध्यम से गफलत करने पर 2.30 अरब डॉलर (एक सौ पांच अरब रूपए से अधिक) का दण्ड भुगता। ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन ने 30909 डालर (14 लाख रूपए से अधिक) के औसत से 3700 डॉक्टर्स को 1.46 करोड डालर (6.71 अरब रूपए से अधिक) दिए तो मर्क ने 1078 पेशेवरों को 37 लाख डालर (सत्रह करोड रूपए से अधिक) का भुगतान किया।

अमेरिका में फिजिशियन पेमेंट सानशाइन एक्ट लाया जा रहा है, जिसके तहत दवा कंपनियों को हर साल 100 डालर से अधिक के भुगतान की जानकारी देनी होगी। जानकारी देने में नाकाम या आनाकानी करने वाली कंपनी को हर भुगतान पर कम से कम 1000 डालर और जानबूझकर जानकारी छिपाने के आरोप में कम से कम दस हजार डालर का भोगमान भुगतना पडेगा।

दरअसल पेंच चिकित्सकों द्वारा लिखी जाने वाली दवाओं में है। निहित स्वार्थ और लाभ के लिए चिकित्सकों द्वारा कंपनी विशेष की दवाओं को प्रोत्साहन दिया जाता है। दवा कंपनी द्वारा अनेक लीडिंग प्रेक्टीशनर्स को पिन टू प्लेन सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। चिकित्सकों के बच्चों की पढाई लिखाई से लेकर घर तक खरीदकर देती हैं, दवा कंपनियां। इसी बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों के साथ मिलकर किस कदर मोनोपली मचाई जाती है, और मरीजों की जेब किस तरह हल्की की जाती है।

चिकित्सकों द्वारा सस्ती दवाएं नहीं लिखी जातीं हैं, क्योंकि जितनी मंहगी दवा उतना अधिक कमीशन उसे मिलता है। वहीं दूसरी ओर देखा जाए तो चिकित्सकों पर होने वाले खर्चे के कारण ही दवाओं की कीमतें आसमान छू रहीं हैं। बीते साल में ही दवाओं की कीमतों में 20 से 30 फीसदी तक इजाफा हुआ है। हृदय रोग के काम आने वाली दवाएं तो 70 फीसदी तक उछाल मार चुकीं हैं। कहा जाता है कि लगभग पचास फीसदी दवाएं तो अनुपयुक्त ही हैं। मर्क कंपनी की अथर्राइटिस की दवा वायोक्स के साईड इफेक्ट के मामले में कंपनी ने मौन साध लिया था। इसके सेवन से हार्ट अटैक की संभावनाएं बहुत ज्यादा हो जाती थीं। अनेक मौतों के बाद इस दवा को वापस लिया गया था।

महानगरों सहित लगभग समूचे हिन्दुस्तान के बडे शहरों में चिकित्सा की दुकानें फल फूल रही है, आम जनता कराह रही है, सरकारी अस्पताल उजडे पडे हैं, पर सरकारें सो रहीं हैं। नर्सिंग होम में चिकित्सकों के परमानेंट पेथालाजी लेब, एक्सरे आदि में ही टेस्ट करवाने पर चिकित्सक उसे मान्य करते हैं, अन्यथा सब बेकार ही होता है। कितने आश्चर्य की बात है कि सरकारी अस्पतालों में होने वाले टेस्ट को इन्हीं चिकित्सकों द्वारा सिरे से खारिज कर दिया जाता है। अगर वाकई सरकारी अस्पताल के टेस्ट मानक आधार पर सही नहीं होते हैं तो बेहतर होगा कि सरकारी अस्पतालों से इन विभागों को बंद ही कर देना चाहिए। यहां तक कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कर्मभूमि विदिशा में जिला चिकित्सालय में पदस्थ सिविल सर्जन श्रीमति जैन के पास इतना समय है कि वे अस्पताल के ठीक गेट के सामने अपनी निजी चिकित्सा की दुकान चलाती हैं, और जनसेवक चुपचाप देख सुन रहे हैं।

चिकित्सकों पर अंकुश लगाने के लिए एमसीआई द्वारा नियमावली बनाई जा रही है, कहा जा रहा है कि मार्च माह में उसे लागू भी कर दिया जाएगा। इसके लिए विशेषज्ञों से सुझाव भी आमंत्रित करवाए जा रहे हैं। इस पाबंदी से डायरी, पेन, पेपवेट, कलेंडर जैसी चीजों को मुक्त रखा गया है। वैसे दवा कंपनियों से डी कंट्रोल श्रेणी की दवाओं के मूल्य निर्धारण का अधिकार छीनकर कुछ हद तक भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है।

जब तक सरकार द्वारा चिकित्सकों के साथ ही साथ दवा कंपनियों पर अंकुश नहीं लगाया जाता तब तक मरीजों की जेब में डाका डालने का सिलिसिला शायद ही थम पाए। सरकार को अमेरिका जैसा कानून ‘‘सख्ती‘‘ से लागू कराना होगा। दवा कंपनियों से यह कहना होगा कि वे किसी चिकित्सक विशेष के बजाए मेडीकल एसोसिएशन या चिकित्सकों की टीम के लिए स्पांसरशिप कर नई दवाओं की जानकारी दे। इसके अलावा एमसीआई को चिकित्सकों और जांच केंद्रों के बीच की सांठगांठ के खिलाफ कठोर पहल करनी होगी। मार्च माह में लागू किए जाने वाले कोड और आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम ही उठाने आवश्यक होंगे।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने ब्रांडेड जीवन रक्षक दवाओं की आसमान छूती कीमतों पर काबू करने के उद्देश्य से दायर की गई जनहित याचिकाओं का निस्तारण करते हुए सरकारी और निजी चिकित्सकों को साफ हिदायत दी है कि वे जेनेरिक दवाएं ही लिखें। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश अरूण मिश्र और न्यायधीश कैलाश चंद जोशी की युगल पीठ ने आदेश दिया है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम एवं राज्य सरकार के आदेश दिनांक 7 अक्टूबर 2010 के तहत जेनेरिक दवाएं नहीं लिखने वाले चिकित्सकों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी।

दरअसल देश और प्रदेशों में ज्यादातर इस्तेमाल होने वाली दवाएं एसी हैं जिनकी कीमतों पर सरकारों का कोई नियंत्रण ही नहीं है। इन दवाओं के मूल्यों का निर्धारण दवा कंपनियां स्वयं ही करती हैं यह डीकंट्रोल्ड ड्रग्स की श्रेणी में आता है। इन दवाओं की तादाद पांच सौ से उपर बताई जा रही है। इन दवाओं में कमीशन के खेल का भोगमान अंततः मरीज को ही भुगतना पड़ता है। उधर कंट्रोल्ड दवाओं की श्रेणी में महज सौ से भी कम दवाएं हैं।

भगवान धनवंतरी के आधुनिक वंशजों द्वारा मानवता की सेवा के लिए लिए गए संकल्प को पूरी तरह से भुला दिया गया है। आज सरकारी और गैरसरकारी चिकित्सकों द्वारा मरीजों को जमकर लूटा जा रहा है। चिकित्सकों और दवा कंपनियों द्वारा अपनी इस लूट से ‘‘जनसेवकों‘‘ को मुक्त रखा गया है। कोई भी जनसेवक जब बीमार पडता है तो उसे देखने जाने वाले चिकित्सक द्वारा सैंपल में मिली दवाएं इंजेक्शन दिए जाते हैं, जिससे जनसेवक को पता ही नहीं चल पाता कि आम आदमी की कमर इन दोनों ही ने किस कदर तोडकर रखी है। इसके अलावा अगर चिकित्सकों को दिए जाने वाले नाट फार सेल वाले सैंपल और बाजार में मिलने वाली दवाओं के कंटेंट्स को ही मिला लिया जाए तो गुणवत्ता की कलई खुलने में समय नहीं लगे। एमसीआई द्वारा पहल जरूर की जा रही है, पर यह परवान चढ सकेगी इस बात में संदेह ही नजर आता है।

नीता को भाव नहीं दे रहे शिवराज


नीता को भाव नहीं दे रहे शिवराज

रेल मंत्री से चर्चा में भी सिवनी की हुई घोर उपेक्षा

क्या आश्वासन ही है सिवनी की असली धरोहर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण डेढ़ दशकों से भाजपा का गढ़ बन चुके सिवनी जिले की हालिया सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान द्वारा लगातार उपेक्षा ही की जा रही है। सिवनी वासियों के सामने बड़े बड़े वायदे करने और फिर भाजपा द्वारा समय समय पर विज्ञप्तियों के माध्यम से उन वायदों को जिंदा रखने के बाद भी शिवराज सिंह चौहान ने रेल मंत्री के मध्य प्रदेश दौरे के दौरान सिवनी जिले की रेल परियोजनाओं की चर्चा न किया जाना आश्चर्यजनक ही है।

गौरतलब है कि रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी गुरूवार को एक दिवसीय यात्रा पर देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल गए थे। भोपाल में मध्य प्रदेश के समस्त सांसदों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान परिसीमन में समाप्त हुई सिवनी लोकसभा के खण्ड बालाघाट सिवनी के भाजपाई सांसद के.डी.देशमख ने तो अपनी आमद दी किन्तु मण्डला सिवनी संसदीय क्षेत्र के सांसद बसोरी सिंह मसराम बैठक से गायब रहे।

यहां उल्लेखनीय होगा कि सिवनी जिले में केवलारी विधानसभा को छोड़कर शेष सारी विधानसभाओं में कांग्रेस की गलत नीतियों का फायदा भाजपा द्वारा उठाया जाता रहा है। सिवनी में सांसद, विधायक, नगर पंचायत, यहां तक कि जिला मुख्यालय की नगर पालिका परिषद पर भी भाजपा का कब्जा है। बावजूद इसके मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के निजाम शिवराज सिंह चौहान द्वारा सिवनी के साथ लगातार सौतेला व्यवहार ही किया जा रहा है।

यहां उल्लेखनीय है कि जिला मुख्यालय को अपने आप में समाहित करने वाले सिवनी विधानसभा क्षेत्र की विधायक और परिसीमन में समाप्त हुई लोकसभा की अंतिम सांसद श्रीमति नीता पटेरिया द्वारा इसके पूर्व अनेकों बार रेल, सड़क और पेंच के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से आग्रह कर चुकी हैं। इस बारे में विज्ञप्तिवीर भाजपा के नुमाईंदों ने भी दिल खोल कर श्रीमति पटेरिया की तारीफों में कशीदे गढ़े जाते रहे हैं।

अब चर्चा यह है कि मध्य प्रदेश भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेशाध्यक्ष श्रीमति नीता पटेरिया द्वारा अगर बार बार मुख्यमंत्री को सिवनी की समस्याओं के बारे में चेताया जाता रहा है तो फिर क्या कारण है कि मुख्यमंत्री श्रीमति पटेरिया की बात पर कान नहीं दे रहे हैं। वे दिल्ली वन मंत्री से मिले तो सिवनी जिले की फोरलेन की वनबाधा दूर करने की बात नहीं की।

मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी आधिकारिक समाचार में कहा गया है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के साथ बैठक के दौरान मध्य प्रदेश में रेल सुविधाओं के लिए अपना मांग पत्र सौंपा। आधिकारिक खबर में जिन रेल मार्गों का हवाला दिया गया है उनमें महाकौशल क्षेत्र की इकलौती रेल परियोजना जबलपुर गोंदिया का जिकर किया गया है। इसमें छिंदवाड़ा से नैनपुर बरास्ता सिवनी का न होना साफ जाहिर करता है कि वे भारतीय जनता पार्टी के एक मोर्चे की प्रदेश अध्यक्ष श्रीमति नीता पटेरिया को कितना भाव दे रहे हैं।

सरकारी विज्ञप्ति में बालाघाट के सांसद के.डी.देशमुख के खाते में बालाघाट से नागपुर नई रेल सेवा की मांग को रखा गया है। इसके आलावा आदिवासी बाहुल्य बालाघाट और सुरक्षित मण्डला संसदीय क्षेत्र के बारे में आधिकारिक तौर पर कोई बात नहीं कही गई है। मण्डला के सांसद बसोरी सिंह मसराम सदा की भांति ही इस बार भी रेल मामले में मौन साधते हुए बैठक से नदातर ही रहे।

फिर उलझा फोरलेन का मसला!


फिर उलझा फोरलेन का मसला!

राजनैतिक सक्रियता में गेंद एक दूसरे के पाले में फेंकने लगी कांग्रेस भाजपा

नौ दिन चले अढ़ाई कोस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। धवल छवि के धनी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की राजग सरकार की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे में पेंच का पेंच अब भी नहीं निकाला जा सका है। पूर्व भूतल परिवहन एवं वर्तमान शहरी विकास मंत्री कमल नाथ के जन्म दिवस की पूर्व संध्या पर कांग्रेस के आधा दर्जन सेकड़ा प्रतिनिधिमण्डल की वनमंत्री और भूतल परिवहन मंत्री से भेंट का कोई हल निकलता नहीं दिख रहा है।

गौरतलब है कि तत्कालीन जिलाधिकारी पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 के आदेश क्रमांक 3266/फो.ले./2008 जिसे 19 दिसंबर को पृष्ठांकित किया गया था के द्वारा राज्य सरकार से आदेश मिलने की प्रत्याशा में पूर्व कलेक्टर द्वारा सिवनी जिले में मोहगांव से खवासा तक के भाग में सड़क चौड़ीकरण हेतु जारी वन एवं गैर वन क्षेत्रों की वनों की कटाई पर रोक लगा दी थी। इसके उपरांत सड़क की राजनीति के गर्म तवे पर न जाने कितने ही शैफ (मुख्य रसोईए) आए और अपनी अपनी रोटियां सैंकते चले गए। न्यायालयीन प्रक्रियाओं के चलते इस सड़क पर हाथ लगाने से हर कोई घबरा रहा था।

इसके बाद जब मामला इस साल के आरंभ में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर वाईल्ड लाईफ बोर्ड के पास गया तब से यह ठंडे बस्ते के ही हवाले है। राज्य सरकार द्वारा पेंच नेशनल पार्क और कान्हा नेशनल पार्क के वाईल्ड लाईफ कारीडोर के बारे में क्या प्रतिवेदन भेजा है भेजा भी है अथवा नहीं इस बारे में सभी मौन हैं। सिवनी के चार विधायक और दो सांसदों का भी मौन आश्चर्यजनक ही है। वस्तुतः इन्हें राज्य सरकार और केंद्र सरकार से पत्र लिखकर इस मामले की वास्तविकता को पता करना था और जनता के समक्ष रखना था, किन्तु एक बाहुबली क्षत्रप से भयाक्रांत कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने एक साथ इस मामले में तलवारें कतार बद्ध होकर रेते में गड़ा रखी हैं।

कांग्रेस की नजरों में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी के वरद हस्त प्राप्त केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री सी.पी.जोशी के करीबी सूत्रों का कहना है कि सिवनी जिले से आए प्रतिनिधिमण्डल की मांग पर उन्होंने दो टूक कह दिया कि राज्य सरकार से प्रास्ताव आने पर वे इस बारे में विचार करेंगे। मतलब साफ है कि एक साल से मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार और उसके विधायक फोरलेन मामले में कुंभकर्णीय निंद्रा में हैं। रही बात कांग्रेस की तो वह तो मृत्यु शैया पर ही है, कांग्रेस की ओर से इस मामले को विधानसभा या लोकसभा में उठाए जाने की कल्पना करना बेमानी ही है।

सिवनी में लगेगा प्रदेश का पहला परमाणु बिजली घर


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 18

सिवनी में लगेगा प्रदेश का पहला परमाणु बिजली घर

कैसे होगा परमाणु कचरे का निष्पादन?

शिव की प्रयोगशाला बना सिवनी जिला

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार द्वारा विकास के नाम पर विनाश को न्योता दिया जा रहा है। बिना दूरगामी प्रभावों का अध्ययन किए हुए शिवराज सरकार ने भगवान शिव के सिवनी जिले को प्रयोगशाला बना लिया है। मध्य प्रदेश की जीवन रेखा पुण्य सलिला नर्मदा नदी को जहरीला करने के साथ ही साथ सिवनी जिले में प्रदेश के पहले परमाणु बिजली घर का काम गुपचुप तरीके से अस्तित्व मेें है।

इन सब के बावजुद अमरकंटक से समुद्र में मिलने तक नर्मदा के तट के निकट करीब 18 थर्मल पावर प्लांट लगाने की तैयारी है। जबलपुर से होशंगाबाद तक पांच पावर प्लांट को सरकारों ने मंजूरी दे दी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सूत्रों के अनुसार इनमें सिवनी जिले के चुटका गांव में बनने वाला प्रदेश का पहला परमाणु बिजली घर भी शामिल है। यह बरगी बांध के कैचमेंट एरिया में है। परमाणु ऊर्जा का मुख्य केंद्र रहा अमेरिका अब परमाणु कचरे का निष्पादन नहीं कर पा रहा है।

इसके बावजूद भारत में इन परियोजनाओं से निकलने वाले परमाणु कचरे की निष्पादन की बात सरकारें नहीं कर रही हैं। इन परियोजनाओं के लिए नर्मदा का पानी देने का करार हुआ है। नरसिंहपुर के पास लगने वाले पावर प्लांट की जद में आने वाली जमीन एशिया की सर्वाेत्तम दलहन उत्पादक है। कोल पावर प्लांट के दुष्परिणामों का अंदाजा सारणी के आसपास जंगल और तवा नदी के नष्ट होने से लगाया जा सकता है।

सूत्रों ने आगे बताया कि दो हजार हैक्टेयर में बनने वाले चुटका परमाणु पावर प्लांट की जद में 36 गांव आएंगे। इनमें से फिलहाल चुटका, कुंडा, भालीबाड़ा, पाठा और टाडीघाट गांव को हटाने की तैयारी है। निर्माण एजेंसी न्यूक्लियर पावर कारपोरेशन और स्थानीय प्रशासन इस बाबत नोटिस दे चुका है। 1400 मेगावाट क्षमता के दो रिएक्टर वाले इस प्लांट में 100 क्यूसेक पानी लगेगा। एक अनुमान के मुताबिक चुटका परमाणु पावर प्लांट में जितना पानी लगेगा, उससे हजारों हैक्टेयर खेती की सिंचाई की जा सकती है। परमाणु बिजली के संयंत्र के ईंधन के रूप में यूरेनियम का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी रेडियोधर्मिता के दुष्परिणाम जन, जानवर, जल, जंगल और जमीन को स्थायी रूप से भुगतने पड़ते हैं। इसका अंदाजा रावतभाटा परमाणु संयंत्र की अध्ययन रिपोर्ट से लगाया जा सकता है।

जानकारों के मुताबिक परमाणु कचरे की उम्र 2.5 लाख वर्ष है। इसे नष्ट करने के लिए जमीन में गाड़ दिया जाए तो भी यह 600 वर्ष तक बना रहता है। इस दौरान भूजल प्रदूषित करता है। चुटका में प्लांट बनने से नर्मदा व सहायक नदियों के प्रदूषित होने की आशंका है। इतना ही नहीं, भूकंप की आशंका भी बढ़ जाती है। वहीं, चुटका में निर्माण एजेंसी अपनी आवासीय कॉलोनी प्लांट से करीब 14 किलोमीटर दूर बना रही है। प्लांट के लिए भूमि सर्वे और भूअर्जन की कोशिश जारी है, लेकिन आदिवासी और मछुआरे हटने को तैयार नहीं हैं। दरअसल ये सभी बरगी से विस्थापित हैं। हालांकि कंपनी के इंजीनियर करीब 40 फीट गहरा होल करके यहां की मिट्टी और पत्थरों का अध्ययन कर चुके हैं।

(क्रमशः जारी)

मिनी आम चुनावों की चिंता में दुबली होती कांग्रेस


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 30

मिनी आम चुनावों की चिंता में दुबली होती कांग्रेस

घाटे से उबरना है सबसे बड़ी समस्या

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को कांग्रेस मिनी आम चुनाव से कम नहीं आंक रही है। घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार के ईमानदार संरक्षक की अघोषित उपाधि पा चुके वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस अपने आप को असहज महसूस कर रही है। कांग्रेस को चिंता है कि अगर मनमोहन मिनी आम चुनाव तक रहे तो उसका बंटाधार तय है।

कांग्रेस के सत्ता और शीर्ष केंद्र 10, जनपथ (श्रीमति सोनिया का सरकारी आवास) के सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस के रणनीतिकार लंबे समय से इसी जुगत में हैं कि मनमोहन से मुक्ति कैसे पाई जाए। इसके लिए वे हर संभव दृष्टिकोण को खंगाल रहे हैं। फिर समस्या यह भी है कि हालात इतने बदतर हैं कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री अभी तत्काल नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए मनमोहन का विकल्प कौन होगा।

कांग्रेस के सामने एक और समस्या बहुत बड़ी यह उभरकर सामने आ रही है कि घाटे से कैसे उबरा जाए। संप्रग सरकार के कार्यकाल में फिजूल खर्ची, घपले घोटाले और भ्रष्टाचार से सरकारी खजाना रिक्त हो गया है। सरकार की आर्थिक नीतियों का खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री पद पर नजर गड़ाए वित्त मंत्री भी अपने मंत्रालय पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, इसलिए उनका मंत्रालय भी अफसरों की मनमर्जी पर ही सांसें ले रहा है।

(क्रमशः जारी)

नेटवर्क कंजेशन आम है आईडिया में


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  26

नेटवर्क कंजेशन आम है आईडिया में

काल न लगने पर मोबाईल घूरने का आईडिया

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। आदित्य बिरला के स्वामित्व वाली आईडिया सेल्यूलर के उपभोक्ताओं को नेटवर्क न मिलने या व्यस्त होने की समस्या से अक्सर दो चार होना पड़ता रहा है। बार बार शिकायतें मिलने के बाद भी आईडिया ने अपने नेटवर्क की क्वालिटी में सुधार नहीं किया है। भले ही आईडिया बेहतर नेटवर्क और साफ आवाज का दावा करता हो, पर हकीकत इससे कहीं अलग है।

आईडिया के एक भुक्तभोगी उपभोक्ता का कहना है कि उसने आईडिया का 7.2 एमबीपीएस का नेट सेटर खरीदा। इस नेटसेटर के डेमो के वक्त उसे अच्छी खासी स्पीड मिल रही थी। जैसे ही वह घर गया और उसे लगाया तो नेट सेटर लगने पर उसके कंपयूटर में नेट घिसट घिसट कर चलने लगा। उपभोक्ता का कहना था कि उसने सोचा उस वक्त शायद कनेक्टिविटी कम हो बाद में ठीक हो जाएगा।

जब एक सप्ताह तक लगातार उस उपभोक्ता को वही स्पीड मिली तब उसने इसकी शिकायत करना चाहा तो आईडिया के हर रिटेलर और आईडिया प्वाईंट पर उसे दुत्कार ही मिली। लुटा पिटा उपभोक्ता इसके बाद आईडिया में अपने संपर्कों के माध्यम से कुछ आगे बढ़ा तो आईडिया के कारिंदों ने नए आईडिया के साथ उसे यह कह दिया कि उसका घर शैडो झोन में है इसलिए वहां सिग्नल अच्छे मिलना संभव नहीं है।

(क्रमशः जारी)

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

शिव ने अपनी नगरी से ही किया विश्वासघात!


शिव ने अपनी नगरी से ही किया विश्वासघात!

वन मंत्री से मिले पर नहीं की फोरलेन की चर्चा!

सिवनीवासियों को मामा बना रही भाजपा कांग्रेस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के हृदय प्रदेश के सिवनी जिले को भगवान शिव की नगरी के तौर पर देखा जाता है। मान्यता है कि इसका नाम भगवान शिव के नाम पर ही सिवनी रखा गया था। सूबे के निजाम का नाम भी भगवान शंकर के नाम पर शिव राज सिंह चौहान हैं। विडम्बना है कि मुख्यमंत्री जब सिवनी के लोगों के बीच होते हैं तो बड़े बड़े वायदे कर जाते हैं, पर जब केंद्रीय मंत्रियों की देहरी पर अपनी आमद देते हैं तो वे इसे अमली जामा पहनाने की कवायद ही नहीं कर पाते हैं।

बुधवार को जब शिवराज दिल्ली आए और उन्होंने वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन से भेंट की तब वाईल्ड लाईफ बोर्ड के पास लंबित सिवनी जिले के फोरलेन मार्ग के बारे में कोई चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा। गौरतलब है कि चौहान ने पूर्व में कई बार सूरज भले ही पश्चिम से उगना आरंभ हो जाए पर फोरलेन मार्ग सिवनी से ही जाएगा का दंभ भरा है। वहीं दूसरी और कांग्रेस का एक लगभग पचास सदस्यी प्रतिनिधिमण्डल विधानसभा उपाध्यक्ष के नेतृत्व में दिल्ली गया है, जो इस मामले के साथ अन्य मामलों में केंद्रीय मंत्रियों से चर्चा करने वाला है। कहा जा रहा है कि इस मामले का श्रेय लेने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस को खुला मौका दे दिया है।

मध्य प्रदेश सरकार के सूचना केंद्र द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यहां केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री सुश्री जयन्ती नटराजन से भेंट की और उनसे आग्रह किया कि विकास और पर्यावरण में संतुलन बनाये रखते हुए विभिन्न ऊर्जा परियोजनाओं के लिए कोल ब्लाक आवंटित करने के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा शीघ्र स्वीकृति दी जाय। सुश्री नटराजन ने श्री चौहान को आश्वासन दिया कि मध्यप्रदेश की सभी लंम्बित परियोजनाओं पर शीघ्र निर्णय लिया जायेगा।

श्री चौहान ने सुश्री नटराजन का ध्यान आकर्षित किया कि छिंदवाड़ा जिले के मंडला, सिंगरौली जिले के महान, अमेलिया, अमेलिया नार्थ, उमरिया जिले के सेमरिया और पिपरिया के कोल ब्लाक ऊर्जा संयंत्रों के लिए चिन्हित किये गये हैं किन्तु अब तक वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की स्वीकृति नहीं मिलने के कारण सभी ऊर्जा परियोजनाओं के काम में विलम्ब हो रहा है। सिंगरौली जिले के महान और अमेलिया और मोरगा (एक) ऊर्जा संयंत्र बनकर तैयार हो गये हैं किन्तु उन्हें कोयला उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। इस कारण बिजली के उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पा रही है।

श्री चौहान ने सुश्री नटराजन से कैम्पा की 1130 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराने का आग्रह किया। विगत दो वर्षों में प्रदेश को केवल 104 करोड़ रुपये की राशि दी गई है। प्रदेश सरकार की ओर से कैम्पा की राशि में से 519 करोड़ रुपये के विभिन्न प्रोजेक्ट स्वीकृति के लिए भेजे गये हैं। इसके लिए शीघ्र राशि स्वीकृत की जाय। श्री चौहान ने सुश्री नटराजन का ध्यान टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट क्षेत्र के 735 गांवों के पुनसर््थापन के लिए 3300 करोड़ रुपये दिये जाने की मांग की। इन गांवों में से 117 गांव फारेस्ट रिजर्व की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील हैं। प्रदेश सरकार ने इस वित्त वर्ष में 208 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है किन्तु भारत सरकार से पुनसर््थापन के लिए राशि नहीं मिलने के कारण इन गांवों के पुनसर््थापन के कार्य में विलम्ब हो रहा है।

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय अभ्यारण्य और टाइगर रिजर्व फारेस्ट में पर्यटन को प्रतिबंधित नहीं करते हुए उसे जारी रखने का आग्रह किया। वन अभ्यारण्यों में पर्यटकों की आवाजाही के कारण जहां एक ओर स्थानीय लोगों का आर्थिक विकास होता है वहीं वन्य प्राणी भी सुरक्षित महसूस करते हैं। पर्यटकों और शासकीय अमले की चौकसी की वजह से वन्य अभ्यारण्यों में वन्य जीवों के साथ छेड़छाड़ नहीं होती। न्यायालय में लम्बित जनहित याचिका में भारत सरकार की ओर से वन्य अभ्यारण्यों में पर्यटन को प्रतिबंधित नहीं करने की दलील दी जाय।

जहरीली हो जाएगी मध्य प्रदेश की जीवन रेखा


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 17

जहरीली हो जाएगी मध्य प्रदेश की जीवन रेखा

झाबुआ पावर की राख घोलेगी बरगी बांध में जहर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के मशहूर थापर ग्रुप के सहयोगी प्रतिष्ठान झाबुआ पावर का सिवनी जिले की आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर में प्रस्तावित कोल आधारित पावर प्लांट से बड़ी तादाद में उड़ने वाली राख न केवल आसपास के जंगलों को प्रभावित करेगी वरन् यह विशाल जल संग्रह क्षमता वाले रानी अवंती सागर परियोजना के बरगी बांध के पानी में जहर घोलने का काम करेगी। गुपचुप जन सुनवाई कर प्रदूषण नियंत्रण मण्डल की अनापत्ति प्रमाण पत्र पाने का सिलसिला अभी थमा नहीं है।

उल्लेखनीय है कि नर्मदा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों में बहती हैं लेकिन नदी का 87 प्रतिशत जल प्रवाह मध्यप्रदेश में होने से, इस नदी को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा कहा जाता है। आधुनिक विकास प्रक्रिया में मनुष्य ने अपने थोड़े से लाभ के लिए जल, वायु और पृथ्वी के साथ अनुचित छेड़-छाड़ कर इन प्राकृतिक संसाधनों को जो क्षति पहुंचाई है, इसके दुष्प्रभाव मनुष्य ही नहीं बल्कि जड़ चेतन जीव वनस्पतियों को भोगना पड़ रहा है। नर्मदा तट पर बसे गांव, छोटे-बड़े शहरों, छोटे-बड़े औद्योगिक उपक्रमों और रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से की जाने वाली खेती के कारण उद्गम से सागर विलय तक नर्मदा प्रदूषित हो गई है और नर्मदा तट पर तथा नदी की अपवाह क्षेत्र में वनों की कमी के कारण आज नर्मदा में जल स्तर भी 20 वर्ष पहले की तुलना में घट गया है।

ऐसे में नर्मदा को प्रदूषण मुक्त करना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई है, लेकिन मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र की सरकारें औद्योगिक और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नर्मदा की पवित्रता बहाल करने में ज़्यादा रुचि नहीं ले रहे है। नर्मदा का उदगम स्थल अमरकंटक भी शहर के विस्तार और पर्यटकों के आवागमन के कारण नर्मदा जल प्रदूषण का शिकार हो गया है। इसके बाद, शहडोल, बालाघाट, मण्डला, डिण्डोरी, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा, खण्डवा, खरगोन आदि जिलों से गुजरती हुई नर्मदा महाराष्ट्र और गुजरात की ओर बहती है, लेकिन इन सभी जिलों में नर्मदा को प्रदूषित करने वाले मानव निर्मित सभी कारण मौजूद है।

अमलाई पेपर मिल शहडोल, अनेक शहरों के मानव मल और दूषित जल का अपवाह, नर्मदा को प्रदूषित करता है। सरकार ने औद्योगीकरण के लिए बिना सोचे समझे जो निति बनाई उससे भी नर्मदा जल में प्रदूषण बड़ा है, होशंगाबाद में भारत सरकार के सुरक्षा क़ागज़ कारखाने बड़वानी में शराब कारखानें, से उन पवित्र स्थानों पर नर्मदा जल गंभीर रूप से प्रदूषित हुआ है। गर्मी में अपने उदगम से लेकर, मण्डला, जबलपुर, बरमान घाट, होशंगाबाद, महेश्वर, ओंकारेश्वर, बड़वानी आदि स्थानों पर प्रदूषण विषेषज्ञों ने नर्मदा जल में घातक वेक्टेरिया और विषैले जीवाणु पाए जाने की ओर राज सरकार का ध्यान आकर्षित किया है।

(क्रमशः जारी)