सोमवार, 18 जून 2012

दादा नहीं है राजमाता की असली पसंद!


दादा नहीं है राजमाता की असली पसंद!

कार्पोरेट लाबी के सामने नतमस्तक है कांग्रेस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के विरोधी रहकर समाजवादी कांग्रेस का गठन करने वाले देश के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को भले ही कांग्रेस द्वारा महामहिम राष्ट्रपति के लिए अपना और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का संयुक्त उम्मीदवार घोषित कर दिया हो पर सोनिया की भाव भंगिमाएं देखकर लग रहा है कि प्रणव मुखर्जी के लिए वे मन से तैयार नहीं हैं।
गौरतलब है कि 13 जून को ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव द्वारा संयुक्त तौर पर मीडिया के सामने आकर कलाम साहेब का नाम लेकर रायता बगरा दिया था। इसके पहले ममता सोनिया से मिलकर आईं थीं। ममता बनर्जी का मुलायम संग मिलकर कलाम, और सोमनाथ चटर्जी का नाम लेने से सियासी समीकरण एकदम गड़बड़ा गए थे।
इस अप्रत्याशित हमले से घबराकर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने बैकफुट पर आने का स्वांग अवश्य रचा। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (बतौर सांसद सोनिया को आवंटित सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है िकि सारा का सारा प्रहसन 10 जनपथ में ही लिखा गया था। इसमें हर किसी पात्र को बखूबी चुना गया था।
सूत्रों की मानें तो जब सारा मामला गड़बड़झाला के रूप में सामने आया तब प्रणव मुखर्जी का माथा ठनका और उन्होंने अपने जहर बुझे तीर सोनिया के विश्वस्तों के सामने पैने करना आरंभ किया। फिर क्या था सोनिया के विश्वस्तों ने तत्काल इसकी खबर सोनिया गांधी को दी। छूटते ही सोनिया गांधी ने प्रणव मुखर्जी को फोन कर कहा कि ममता के साथ मुलाकात में उन्होंने (सोनिया ने) तो बस प्रणव मुखर्जी का नाम ही लिया था। पता नहीं कैसे ममता बनर्जी बहकी बहकी बातें कर रही हैं। सोनिया के करीबी ने पहचान उजागर ना करने की शर्त पर पूरे विश्वास के साथ कहा कि सोनिया गांधी मूलतः प्रणव मुखर्जी की उम्मीदवारी के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं।
गौरतलब है कि कांग्रेस के धुरंधर और दिग्गज नेता प्रणव मुखर्जी ने 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद पार्टी को छोड़ भी दिया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी की सरकार में प्रणब मुखर्जी को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था। इससे नाराज प्रणब मुखर्जी ने 1986 में कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस नाम के अपने दल का गठन किया था। लेकिन पीवी नरसिंहा राव ने उन्हें  1989 में योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेसी मुख्यधारा में शामिल कर लिया था। इस तरह प्रणव पर समाजवादी होने का ठप्पा लगा गया है।
सूत्रों का कहना है कि प्रणव विरोधियों ने सोनिया के इस घाव पर जमी परत बेदर्दी से निकालकर घाव को फिर से हरा कर दिया है। उधर, सोनिया के सामने टीम अण्णा ने भी एक संकट पैदा कर दिया है। टीम अण्णा का आरोप है कि दागी प्रणव मुखर्जी को देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर कैसे बिठाया जा सकता है?
बहरहाल, प्रणव मुखर्जी के नाम को आगे बढ़ाने में देश की कार्पोरेट लाबी का भी अहम रोल माना जा रहा है। समाजवादी क्षत्रप मुलायम सिंह के करीबी सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि प्रणव के लिए लाबिंग करने के लिए मशहूर उद्योगपति अनिल अंबानी खुद आगे आ गए हैं। कहा जा रहा है कि अपने उद्योगपति मित्रों के माध्यम से अंबानीज़ द्वारा जादुई आंकड़े के जुगाड़ के लिए फंडिंग का आश्वासन भी इस शर्त पर दादा को दिया गया है कि अंबानीज़ की पसंद का वित्त मंत्री ही उनका स्थान ले।
सूत्रों की मानें तो जब त्रणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी जैसे ही कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी से मिलकर मुलायम सिंह यादव के दर पर पहुंची तो वहां मशहूर दौलतमंद उद्योगपति अनिल अंबानी को देखकर वह हतप्रभ रह गईं। अंबानी की उपस्थिति में ममता के आने से मुलायम सिंह यादव भी अपने आप को असहज ही महूसस कर रहे थे। इशारों ही इशारों में चर्चा के उपरांत अनिल अंबानी ने वहां से रूखसती डाली।
उधर प्रणव के निवास से छन छन कर बाहर आ रही खबरों के अनुसार अनिल अंबानी ने मुलायम सिंह यादव से गुफ्तगूं करने के बाद प्रणव मुखर्जी के घर का रूख किया। प्रणव के साथ चर्चा के दौरान उन्होंने मदद का ना केवल आश्वासन दिया वरन् अपने प्रयासों से प्रणव मुखर्जी की बात भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी से भी करवाई। कहा जा रहा है कि मूलतः व्यवसाई नितिन गड़करी ने भी अंबानीज़ के दाबव में पार्टी लाईन से हटकर प्रणव की मदद का आश्वासन दे दिया। माना जा रहा है कि दादा की उम्मीदवारी कार्पोरेट लाबी की पसंद के बतौर सामने आती जा रही है।

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