मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

एमपी की तर्ज पर अब बोकारो में जलसत्याग्रह


एमपी की तर्ज पर अब बोकारो में जलसत्याग्रह

(सोनम कात्यानी)

बोकारो (साई)। अपनी मांग मनवाने के लिए हर किसी को अपने अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन का पूरा पूरा हक है। आजादी के लिए महात्मा गांधी ने अहिंसा का सहारा लिया और सत्याग्रह किया। इसी तरह मध्य प्रदेश के हरदा जिले के लोगों ने भी पानी के अंदर ही रहकर सत्याग्रह किया और सरकार को झुकाया। अब बारी बोकारो की है। कर्मचारियों के आश्रितों द्वारा जल सत्याग्रह के माध्यम से अपनी मांगें मनवाने का प्रयास किया जा रहा है।
कर्मचारियों के आश्रितों ने जल सत्याग्रह आरंभ कर दिया है। यह घटना बोकारो इस्पात की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार आश्रित नौकरी की मांग कर रहे हैं। ये लोग वैसे कर्मचारी के आश्रित हैं जिनकी मौत काम करने के दौरान हो गई थी। सत्याग्रह पर बैठे आश्रितों का कहना है कि अगर उन्हें नौकरी नहीं दी गई तो वे पूरे परिवार के साथ जल समाधि ले लेंगे।
गौरतलब है कि इसी तरह का सत्याग्रह पूर्व में मध्य प्रदेश के हरदा में हुआ था। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के एमपी ब्यूरो से सोनल सूर्यवंशी ने बताया कि पिछले साल सितंबर में हुए इस सत्याग्रह में यहां के सत्याग्रहियों की मांग थी कि इंदिरा सागर बांध के जलस्तर को 260 मीटर पर लाया जाए। ये लोग जमीन के बदले जमीन और पुनर्वास की मांग भी कर रहे थे। बांध का जलस्तर बढ़ने से हरदा के 29 गांव प्रभावित हो गये थे और हजारों एकड़ जमीन डूब गई थी। तीन गांव तो पूरी तरह से पानी में समा चुके थे। यहां पुलिस और प्रशासन ने 14 दिनों से जारी जल सत्याग्रह को जबरन रोक दिया था। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों की मांगों को सुने बगैर इन्हें जबरन पानी से निकाल दिया था।
मध्यप्रदेश में हीं नर्मदा बचाओ आंदोलन के बैनर तले घोघल गांव में 51 लोगों ने जल सत्याग्रह किया था। ये लोग राज्य सरकार के उस फैसले का विरोध कर रहे थे जिसके मुताबिक ओंकारेश्वर बांध में जल स्तर 193 मीटर तक बढाए जाने को मंजूरी दे दी गई थी। सत्याग्रह कर रहे लोगों का कहना है कि अगर पानी की ऊंचाई बढ़ाई गई तो कई गांव डूब जाएंगे।

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