0 रिजर्व फारेस्ट में कैसे बन रहा पावर
प्लांट . . . 02
झाबुआ पावर की पहली जनसुनवाई पर भी लगे
थे प्रश्नचिन्ह
(एस.के.खरे)
सिवनी (साई)। देश की मशहूर थापर ग्रुप
ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा मध्य प्रदेश की संस्कारधानी
जबलपुर के करीब डाले जाने वाले 600 मेगावाट के पावर प्लांट की शुरूआती
सरकारी कार्यवाही में हुई गफलत एक के बाद एक उभरकर सामने आती गईं। पावर प्लांट के
लिए आदिवासी बाहुल्य घंसौर में हुई जनसुनवाई के दौरान ही अनेक अनियमितताएं प्रकाश
में आई थीं, किन्तु रसूखदार कम्पनी की उंची पहुंच और लक्ष्मी माता की कृपा से पहली
जनसुनवाई 22 अगस्त 2009 को तो निर्विध्न हो गई किन्तु ग्रामीणों में रोष और असन्तोष बना रही।
पर्यावरण मन्त्रालय के सूत्रों का दावा
है कि इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया में क्षेत्रीय पर्यावरण के प्रभावों का अवलोकन
कर इसका प्रतिवेदन एक माह तक परियोजना स्थल के अध्ययन क्षेत्र और दस किलोमीटर
त्रिज्या वाले क्षेत्र की समस्त ग्राम पंचायतों के पास अवलोकन हेतु होना चाहिए। जब
यह प्रतिवेदन ग्राम पंचायत को उपलब्ध हो जाए उसके उपरान्त गांव गांव में डोण्डी
पिटवाकर आम जनता को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए। इसके साथ ही साथ पर्यावरण विभाग
की वेव साईट पर इसे डाला जाना चाहिए।
मजे की बात यह है कि पर्यावरण विभाग की
मिली भगत के चलते उस वक्त 22 अगस्त को होने वाली जनसुनवाई का
प्रतिवेदन 5 दिन पूर्व अर्थात 17 अगस्त 2009 को पर्यावरण विभाग की वेव साईट पर
मुहैया करवाया गया। बताया जाता है कि जब जागरूक नागरिकों ने हस्ता़क्षेप किया तब
कहीं जाकर इसे वेव साईट पर डाला गया था। महज पांच दिनों में इस प्रतिवेदन के बारे
में व्यापक प्रचार प्रसार नहीं हो सका, जिससे इसमें व्याप्त विसंगतियों के बारे
में कोई भी गहराई से अध्ययन नहीं कर सका।
इस पूरे खेल में सरकारी महकमे के साथ
मिलकर मशहूर थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा
आदिवासी बाहुल्य घंसौर के ग्राम बरेला में डलने वाले 600 मेगावाट के पावर प्लांट हेतु ताना बाना
बुना गया। इस खेल में आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात तो हुआ साथ ही सिवनी जिले
के आदिवासियों के हितों के कथित पोषक बनने का दावा करने वाले जनसेवक हाथ पर हाथ
रखे तमाशा देखते रहे।
(क्रमशः जारी)


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