सोमवार, 9 अगस्त 2010

विधान सभा उपाध्‍यक्ष बरसे जनमंच पर

जनमंच राजनैतिक पार्टी का मंच न बनेः हरवंश

सिवनी। केन्द्रीय मंत्री कमल नाथ श्ूतल परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय क® हटाने एवं उनकी सेवाये कहा ली जाये इस बात का फैसला श्रीमति स®निया गांधी एवं डा मनम®हन सिह करेगे जनमंच नही इसी तरह माननीय जयराम रमेश केन्द्रीय मंत्री वन एवं पर्यावरण मंत्रालय क® आदेश देने की बात कहने वाला जनमंच राजनैतिक पार्टी का मंच न बने फ®रलेन निर्माण की और हमारे नेताअ® क® अपमानित करने की बात ज्यादा करने वाले ऐसे मंच मे शामिल कांग्रेस नेताअ® क® अव अपने विवेक का उपय®ग करना चाहिए कि ऐसे मंच मे उन्हे रहना है या नही? उक्ताशय की बात म¤ प्र¤ विधानसश के उपाध्यक्ष एवं जिले के कद्दावर कांग्रेसी नेता ठा¤ हरवंश ने जारी एक विज्ञप्ति मे कही है। फ®रलेन निर्माण क® लेकर गठित जनमंच द्वारा केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ की सेवाऐ अन्य विशग मे लेने के अलावा जयराम रमेश क® आदेश देने हेतु अखवार® मे छपे जनमंच के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करत्® हुए जिले के सर्वमान्य नेता ठा¤ हरवंश ने अपनी विज्ञप्ति मे कहा है कि समाचार पढने से ऐसा लगता है कि फ®रलेन के लिए बना सर्वदलीय जनमंच जिसे पूर्व मे सिवनी जिले की सश्ी राजनैतिक पार्टिय® और जिले की जनता एवं जिले के सश्ी जनप्रतिनिधिय® का सहय®ग मिला इसी का परिणाम है कि 21 अगस्त 2009 क® फ®रलेन बनाने के नाम पर सम्पूर्ण जिला बंद रहा। श्री सिह ने कहा है कि फ®रलेन पूर्व प्रस्तावित एवं स्वीकृत सिवनी से ह®कर ही बने इस मांग के लिए सश्ी एकमत है और इसके लिए समय समय पर सश्ी की तरफ से प्रयास किये गये मैने श्ी प्रारंश् से ही श्रपूर प्रयास किये है तथा द® बार कांग्रेस के प्रतिनिधि मण्डल के साथ इस मांग क® लेकर दिल्ली गया हूं संश्वतः आज श्ी कांग्रेस पार्टी का एक प्रतिनिधि मंडल फ®रलेन की मांग क® लेकर दिल्ली गया है। श्री सिह ने कहा है कि जनमंच मे अन्य दल® के साथ साथ कांग्रेस पार्टी के श्ी 3-4 सदस्य है सम्पूर्ण जनमंच की अ®र से जनमंच क प्रवक्ता द्वारा जारी की गयी विज्ञप्ति क® हास्यापद बतात्® हुए श्री सिह ने कहा कि यह विज्ञप्ति फ®रलेन निर्माण के आंद®लन और शवनाअ® क® धक्का देन वाली है। जहां तक कमलनाथ की बात है हम जव श्ी व्यक्तिगत या सामूहिक रुप से मिले है उन्ह®ने सदैव इस फ®रलेन के निर्माण कराने की बात कही है और प्रयास किये है छिन्दवाड़ा दिल्ली एवं नागपुर मे उन्ह®ने समय समय पर स्पष्ट ज®रदारी से यह बात श्ी कही है कि उनका इरादा सिवनी क® नुकसान पहुंचाने का नही है और उक्त फ®रलेन सिवनी से ही बनेगी। श्री सिह ने विज्ञप्ति मे बताया है कि उन्ह®ने अनेक® बार कहा है कि जहां तक नरसिहपुर-छिन्दवाडा-नागपुर फ®रलेन की बात है वह सिवनी से ह®कर गुजरने वाले फ®रलेन की कास्ट पर नही बनायी जा रही है उसके लिए अलग से धन और बजट की व्यवस्था की है। अश्ी हाल ही मे खवासा से नागपुर तक के टेण्डर हुए है और निर्माण कार्य श्ी शीघ्र प्रारंश् ह®गा। खवासा-नगझर-लखनादौन-नरसिहपुर तक 75 प्रतिशत कार्य पूर्ण किया जा चुका है पेंच पार्क म®हगांव से कुरई एवं छपारा से बंजारी क्रमशः 9 एवं 10 ¤िक मी¤ म ज® रिजर्व वन क्ष्®त्र आता है उसमे से एक की स्वीकृति वन मंत्राल तथा मोंहगांव से रुखड 9 ¤िक मी¤ का प्रकरण माननीय सुप्रीम क®र्ट की उच्चाधिकार समिति के समझ विचाराधीन है जिसके लिये सश्ी तरफ से ज® प्रयास ह®ना चाहिए व® ह® रहे है। श्री सिह ने बताया है कि इसके साथ साथ सबसे आवश्यक बात यह है कि तत्कालीन जिलाध्यक्ष पी नरहरि द्वारा म.प्र. राज्य सरकार के निदेंश पर ज® निर्माण कार्य पर र®क लगायी गयी है अगर वह तत्काल हटा ली जाती है त® फ®रलेन निर्माण की रुकावटे 90 प्रतिशत खुद व खुद खत्म ह® जायेगी बाकी 9 कि मी¤ पेंच पार्क से लगा रिजर्व वन क्ष्®त्र का प्रकरण बचेगा वह माननीय सवोंच्च न्यायालय की उच्चाधिकार समिति के निर्णय तक लंबित रहता है अ®र अगर 9 ¤िक मी¤ सड़क वैसी की वैसी रहती है त® विश्®ष क®ई फर्क नही पड़ेगा। श्री सिह ने कहा है कि केन्द्रीय मंत्रिय® के पुतले जलाने उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने विशग बदलने ज्ौसी बात्® करने वाले ल®ग या मंच न त® सिवनी जिले के हित की बात कर रहे है और न ही फ®रलेन निर्माण की। उन्ह®ने कहा है कि जनमंच मे शामिल कांग्रेस के साथिय® से श्ी उनका आग्रह है कि जिस मंच मे फ®रलेन निर्माण की बात कम और हमारे नेताअ® क® अपमानित करने की बात ज्यादा ह®ने लगी है ऐसे मंच मे उन्हे रहना चाहिए या नही इस पर श्ी उन्हे अपने विवेक का उपय®ग करना चाहिए।

बच्चों को शिक्षा देना क्या सिर्फ केंद्र की जवाबदारी!

गुरू बिन गोविंद दर्शन हों तो कैसे?

केंद्रीय विद्यालयों का स्तर भी होगा सुधारना

गरीब गुरबों के बच्चों की कौन करेगा फिकर?

(लिमटी खरे)

बहुत पुराना दोहा है -‘‘गुरू गोविंद दोउ खडे, काके लागू पाय! बलिहारी गुरू आपकी, गोविंद दियो बताए!!‘‘ इस दोहे के भावार्थ बचपन में गुरूजनों द्वारा बडे ही चाव से बताए जाते थे, कि जब गुरू और ईश्वर दोनों खडे हों तो किसके पैरों को स्पर्श कर आर्शीवाद लिया जाना चाहिए। गुरू को ईश्वर से बडा मानकर उसके पैर स्पर्श पहले करने की बात कही जाती थी, क्योंकि गुरू के बिना ईश्वर के बारे में ज्ञात कैसे हो सकेगा? आज के दौडते भागते युग में गुरूओं का टोटा साफ दिखाई पड रहा है, यही कारण है कि गोविंद अर्थात ईश्वर के प्रति आस्था कम सी होती प्रतीत हो रही है।

देश को दशा और दिशा देने का जिम्मा केंद्र सरकार पर है। केंद्र सरकार ही जब सदन में यह स्वीकार कर ले कि देश में छः से चौदह साल के बच्चों को शिक्षा देने के लिए बारह लाख गुरूओं का टोटा है तब फिर देश का भगवान ही मालिक कहा जाएगा। सरकारी तौर पर संचालित होने वाली शालाओं में अध्ययापन के स्तर, बुनियादी ढांचे को लेकर सदा से ही बहस और चिंता जताई जाती रही है।

केंद्र सरकार आरोप प्रत्यारोपों के जरिए यह कह देती है कि वह पर्याप्त धन मुहैया करवा रही है, पर राज्य सरकारें इस मामले में सहयोग प्रदान नहीं कर रही हैं, यही कारण है कि देश में शिक्षा का स्तर प्राथमिक कक्षाओं में गिरता जा रहा है। वैसे देखा जाए तो केंद्र सरकार का आरोप अपनी जगह सही है कि राज्यों की सरकारें इस दिशा में पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही हैं।

आंकडों की बाजीगरी करने वाली केंद्र सरकार का तर्क है कि राज्यों के पास लगभग सवा पांच लाख शिक्षकों के पद आज भी रिक्त हैं, जिन्हें भरने में सूबों की सरकारें दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं। राज्यों पर आरोप मढते वक्त केंद्र सरकार यह भूल जाती है कि केंद्रीय विद्यालयों की स्थिति क्या है। क्या केंद्रीय विद्यालयों में शिक्षकों की पर्याप्त संख्या है? केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन संचालित होने वाले सेंट्रल स्कूल में शिक्षकों की कमी से अब पालकों का केंद्रीय विद्यालय के प्रति रूझान कम हो गया है।

केंद्रीय विद्यालयों में केंद्रीय शिक्षा बोर्ड का पाठ्यक्रम लागू है। सीबीएसई के नार्मस बहुत ही सख्त हैं। अगर शिक्षकों की तादाद कक्षाओं और विद्यार्थियों के हिसाब से नहीं है तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है। केंद्रीय विद्यालयों में अस्थाई या तदर्थ तौर पर शिक्षकों की नियुक्ति के विज्ञापन जब तब समाचार पत्रों में दिख जाते हैं। मतलब साफ है कि केंद्रीय स्तर पर ही शिक्षकों की नियुक्ति पूर्णकालिक के स्थान पर अंशकालिक करने पर ही जोर दिया जा रहा है।

वैसे शिक्षकों की कमी से जूझ रहे भारत गणराज्य में शिक्षा का अधिकार लागू करना किसी चुनौति से कम नहीं है। शिक्षा की नीति तय करने वाले केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सामने भी प्रशिक्षित शिक्षकों को पदस्थ करना टेडी खीर ही साबित हो रहा है। शिक्षकों की नियुक्ति के दौरान ही उसे वांछित आहर्ताएं पूरी करना होता है। अगर वह इसे पूरा करने में असमर्थ रहता है तो उसे नौकरी से हाथ धोना पडता है।

वहीं दूसरी ओर पहुंच के अभाव में अनेक प्रतिभाशाली बीएड डीएड की डिग्रीधारी शिक्षक आज भी ओवर एज होकर निजी शालाओं में दो से चार हजार की नौकरी करने पर मजबूर हैं। सरकार को चाहिए कि आयू बंधन में शिथिलता देकर विश्वविद्यालयों से बीएड या डीएड कर चुके शिक्षकों की नियुक्ति हेतु नियमों का सरलीकरण कर उनके निवास के आसपास के केंद्रीय विद्यालय में ही उन्हें नियुक्ति प्रदान करे ताकि शिक्षा के स्तर को सुधारा जा सके।

आज देश में बीएड कराने वाले निजी कालेज की बाढ देखकर लगने लगा है कि आने वाले समय में जो शिक्षक कथित तौर पर प्रशिक्षित की श्रेणी में आएंगे वे देश का भविष्य शायद ही संवार पाएं। कालेज से निकलने वाले युवा अनुभव के न होने पर बच्चों को क्या पाठ पढाएंगे यह बात तो अपने आप में शोध का विषय ही मानी जा सकती है। वस्तुतः बीएड या डीएड कालेज सिर्फ और सिर्फ पैसा बनाने की दुकान बनकर रह गए हैं। विचारणीय प्रश्न तो यह है कि जो शिक्षक भारी भरकम फीस देकर डिग्री लेगा, फिर चढोत्री देकर नौकरी पाएगा, क्या वह बच्चों को पढाने की स्थिति में होगा? जाहिर है इसका उत्तर नकारात्मक ही आएगा।

इन शिक्षकों के भरोसे केंद्र सरकार ‘‘सबको शिक्षा‘‘ का सपना कैसे साकार कर सकती है? देखा जाए तो देश में सरकारी स्कूलों में ढांचागत सुविधाओं का साफ अभाव दिखता है। अनेक शालओं के पास अपने भवन नहीं हैं, अनेक की बाउंड्रीवाल नहीं हैं, कहीं खप्पर हैं तो बारिश में चू रहे हैं, कहीं शाला प्रभावशाली लोगों के भैंसों का तबेला बन गई है, कही छात्राओं के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है। सत्तर फीसदी शालाओं में तो बिजली ही नहीं है। 88 फीसदी शालाएं कम्पयूटर विहीन हैं।

वैसे सर्वशिक्षा अभियान, मध्यान भोजन आदि के चलते शालाओं में बच्चों की उपस्थिति बढी है, जिससे केंद्र सरकार अपनी पीठ ठोंक सकती है, पर सवाल वहीं जस का तस ही खडा हुआ है कि क्या महज शालाओं में बढती उपस्थिति की औपचारिकता को पूरा करके ही शिक्षा के अधिकार को परवान चढया जा सकता है? जमीनी हकीकत कहती है कि देश के साठ फीसदी स्कूल आज भी महज एक या दो शिक्षकों के भरोसे ही चल रहे हैं।

जैसे ही शिक्षा का अधिकार कानून केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना में शामिल हुआ वैसे ही राज्य सरकारों के मुंह खुलने आरंभ हो गए। राज्यों ने इसे लागू करने के लिए और अधिक धन की मांग रख दी। हालात देखकर एसा प्रतीत होता है मानो देश की आने वाली पीढी को शिक्षा देने का ठेका सिर्फ केंद्र सरकार ने ले लिया हो। भारत की युवा होने वाली पीढी को शिक्षित करने के मामले में राज्य सरकारों का कोई नेतिक दायित्व मानो बनता ही न हो।

वस्तुतः देश के हर बच्चे को शिक्षा देने का काम केंद्र और राज्य सरकारों का है। केंद्र और राज्य सरकारें अगर इस मामले में ही आपसी तालमेल न बना पाएं तो उन्हें देश या राज्यों पर राज करने का हक नहीं है। जनसेवकों और नौकरशाहों के बच्चे तो नामी गिरामी स्कूलों मंे उम्दा और महंगी शिक्षा पा सकते हैं, पर गरीब गुरबे की फिकर करना भी इन्हीं जनसेवकों और नौकरशाहों का ही काम है, जिस महती जवाबदारी से वे बच ही रहे हैं।

फोरलेन विवाद का सच ------------04

क्या जनसेवक हैं फोरलेन मामले में दोषी!

2008 में जब उत्तर दक्षिण गलियारे के सिवनी पेच का काम रोक दिया गया था, तब सिवनी के पांच विधानसभा सीट पर जनादेश से चुने गए नुमाईंदों और परिसीमन में अवसान हुई लोकसभा सीट के सांसद ने जनादेश का सम्मान क्यों नहीं किया गया यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है। लोकसभा चुनावों के बाद अचानक ही सिवनी की फिजां में यह बात तैर गई थी कि उत्तर दक्षिण गलियारे में फोरलेन का काम रोक दिया गया है। जनता का आक्रोश इस बात की जानकारी मिलने के साथ ही चरम पर पहुंच गया था। मजे की बात तो यह है कि जिला प्रशासन द्वारा उठाए गए कदम मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनावों की कार्यवाही के चलते आचार संहिता के दौरान ही उठाए गए थे।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना स्वर्णिम चतुर्भुज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे का काम वन विभाग के एक आदेश के साथ ही अक्टूबर 2008 में रूक गया था, जिसके तहत वन विभाग ने एनएचएआई को पेड काटने पर उसके खिलाफ वन अधिनियम के तहत प्रकरण पंजीबद्ध करना आरंभ कर दिया था। वैसे छोटी छोटी बातों पर बारीक नजर रखने वाले सिवनी जिले के सांसद और विधायकों की इस मामले में चुप्पी भी आश्चर्यजनक ही मानी जा रही है।

गौरतलब होगा कि वन उत्तर सिवनी सामान्य वन मण्डलाधिकारी द्वारा 25 अक्टूबर 2008 को मुख्य वन संरक्षक सिवनी को लिखे पत्र में यह उल्लेख किया गया था कि एनएच ने वन विभाग की भूमि को अपना बताकर इस पर खडे पेड काटने की निविदा जारी कर पेड कटाई का काम आरंभ कर दिया था, जिसे वन विभाग ने अवैध माना, और वन विभाग द्वारा इस कटाई को अवैध मानते हुए पीपरखुंटा वन खण्ड के कक्ष नंबर पी - 266 में राष्ट्रीय राजमार्ग के अनाधिकृत ठेकेदार द्वारा 26 पलाश और 47 सागौन के वृक्ष काटने पर दिनांक 15 अक्टूबर 2008 को वन अपराध नंबर 1897/22 के तहत मामला दर्ज कर लिया था। यही वह समय माना जा सकता है, जब उत्तर दक्षिण गलियारे में सिवनी जिले में काम को रोका गया था।

जिला मुख्यालय सिवनी से उत्तर दिशा में बंजारी माता के आगे वाले हिस्से में जो काम बंद पडा हुआ है, उस बारे में न तो एनएचएआई और न ही जिला प्रशासन या वन विभाग कुछ स्पष्ट करने की स्थिति में ही नजर आ रहा है। कुल मिलाकर इस समूचे काम के बंद होने में षणयंत्र की बू साफ तौर पर आ रही है। तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि द्वारा भी इस सडक से पेड की कटाई का आदेश रोकने के नए आदेश जिस वक्त जारी किए गए उस वक्त मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की मुनादी पिटी हुई थी और आचार संहिता चल रही थी। जाहिर सी बात है कि राजनेता उस वक्त अपने अपने उम्मीदवार को जिताने या हराने का उपक्रम ही कर रहे थे।

आश्चर्य की बात तो यह है कि विधानसभा अथवा लोकसभा चुनावों के दौरान जब जिला प्रशासन को दम लेने की फुर्सत भी नहीं होती है, उस दौरान सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा गठित केंद्रीय साधिकार समिति के अनुरोध पर मध्य प्रदेश सरकार के निर्देशों की प्रत्याशा में तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि ने यह आदेश जारी कर दिया कि पूर्व में जिला कलेक्टर द्वारा जारी पेड कटाई के समस्त आदेश इस आदेश से निरस्त किए जाते हैं।

इस मामले में षणयंत्र की बू इसलिए भी आती है, क्योंकि जिला कलेक्टर का 18 दिसंबर 2008 का उक्त आदेश जिसे 19 दिसबर को पृष्ठांकित किया गया है, की एक प्रति जिला जनसंपर्क अधिकारी के पास इसलिए भेजी गई थी कि वे इस मामले का प्रचार प्रसार स्थानीय मीडिया के माध्यम से करें। विडम्बना यह है कि जिला जनसंपर्क विभाग ने भी इस मामले में मौन अख्तियार करना ही बेहतर समझा। पीआरओ कार्यालय का मौन निश्चित तौर पर किसी वरिष्ठ अधिकारी के डंडे के चलते ही रंग लाया होगा।

आचार संहिता की समाप्ति के उपरांत सरकार बनाने गिराने का सिलसिला आरंभ हुआ, और विधायक सांसदों के लिए सिवनी की जनता का जनादेश गौड होकर निहित स्वार्थ पहली प्राथमिकता बन गए। विधानसभा के उपरांत जब लोकसभा चुनाव हुए तो सिवनी जिले को दो पालकों के हाथों में सौंप दिया गया। सिवनी और बरघाट विधानसभा के लोगों के पालनहार बने बालाघाट के सांसद के.भाजपा के डी.देखमुख तो केवलारी और लखनादौन के खिवैया बने मण्डला के कांग्रेस के बसोरी मसराम।

पूरा एक साल बीत चुका है, किन्तु आज तक न तो सिवनी के विधायक कांग्रेस के हरवंश सिंह, भाजपा के कमल मस्कोले, श्रीमति शशि ठाकुर, श्रीमति नीता पटेरिया ने विधानसभा में इस बात को नहीं उठाया है। इतना ही नहीं सांसद द्वय मसराम और देशमुख ने भी इस मामले से अपने आप को दूर ही रखा है।

देश क कीमत पर निभ रह गठबंधन धर्म


कम हो सकती है पुलिस की दादा गिरी

ये है दिल्ली मेरी जान


(लिमटी खरे)


अब पुलिस पर लगी कसाम सबसे बडी अदालत ने


पुलिस जो चाहे सो कर सकती है। पुलिस की अगाडा, घोडे का पिछाडा और मौत का नगाडा इन तीनों चीजों से बचने की सलाह हर वक्त ही दी जाती है। आजादी के बाद भारत में पुलिस को इतना अधिकार समपन्न बना दिया गया है कि कोई भी पुलिस से टकराने की हिमाकत नहीं करता सिवाय जनसेवकों के। पुलिस के कहर से आम आदमी बुरी तरह खौफ जदा है। वैसे एक तरह से देखा जाए तो पुलिस का खौफ लोगों के मानस पटल से उड जाए तो देश में अराजकता की स्थिति बन जाएगी। वैसे तो पुलिस के पर अदालतोे ने कई मर्तबा कतरे हैं, पर प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) के मामले में पहली दफा पुलिस को आडे हाथों लिया है देश की सबसे बडी अदालत ने। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए एक हत्याकांड में तीन आरोपियों को मृत्युदण्ड से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एफआईआर सच्चाई का एनसाईक्लोपीडिया नहीं है, यह पुलिस को सिर्फ अपराध के प्रति आश्वस्त करने का काम करता है। जस्टिस हरजीत सिंह बेदी और जे.एम.पंचाल ने उच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए कहा कि किसी आरोपी को इसलिए बरी नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसका नाम एफआईआर मंे नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से पुलिस की कार्यप्रणाली में अगर बदलाव आ जाए तो आम आदमी कुछ सुकून महसूस अवश्य ही कर सकेगा।






कैंसर मरीज से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं व्हीआईपी


लगता है कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की संवेदनाएं पूरी तरह मर चुकी हैं। यही कारण है कि उसकी नजरों में बीमार की तीमारदारी से ज्यादा महत्वपूर्ण अब अतिविशिष्ट लोग लगने लगे हैं। जी हां, यह सोलह आने सच है, केंद्र सरकार के अधीन कार्यरत त्रणमूल कांग्रेस की रेलमंत्री के नेतृत्व वाले रेल मंत्रालय ने भारतीय रेल में कैंसर मरीजों की सीटों का कोटा घटा दिया है। आपातकालीन कोटे के तहत अब उन्हें आवंटित होने वाली बर्थ की संख्या की सीमा पूरी तरह तय कर दी गई है। बेशर्म केंद्र सरकार ने यह कदम अतिविशिष्ट लोगों को ज्यादा सीटें मुहैया करवाने की गरज से उठाया है। रेल राज्य मंत्री के.एच.मणियप्पा ने लोकसभा में यह जानकारी दी है। मणियप्पा का तर्क था कि रेल्वे के जोनल कार्यालयों से उन्हें एसी सूचना मिली है कि कैंसर के मरीजों का पूरा कोटा प्रयोग में आने से रेल्वे को अतिविशिष्ट लोगों को जरूरत पडने पर सीट मुहैया नहीं करवाई जा पा रही हैं। यह है भारत गणराज्य की कांग्रेसनीत केंद्र की सरकार जिसकी नजर में कैंसर जैसे गंभीर रोग से पीडित के बजाए अतिविशिष्ट लोगों की अहमियत ज्यादा है। मजे की बात तो यह है कि इस तरह के कदम में विपक्ष ने भी अपना मौन समर्थन देकर जता दिया है कि उसकी नजरों में भी बीमार की अहमियत कितनी है।






मतलब गुजरात दुश्मन देश का हिस्सा है


सीबीआई क्या कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के घर की लौंडी बन चुकी है? यह सवाल देश के हर नागरिक के जेहन में आज भारत की आजादी के छः दशकों बाद भी कौंध रहा है। इसका कारण कांग्रेस और भाजपा के बीच सोहराबुद्दीन की फर्जी मुटभेड के मामले में चल रही चिल्ल पों और आरोप प्रत्यारोप के बाद उपजी परिस्थितियां ही हैं। सोहराबुद्दीन मामले में एक मंत्री का त्यागपत्र ले चुके सूबे के निजाम नरेंद्र मोदी सीबीआई के कडे रूख से खासे आहत नजर आ रहे हैं। मोद ने कंेद्र सरकार से पूछा है कि क्या भारत गणराज्य के गुजरात सूबे को दुश्मन देश का हिस्सा मान लेना चाहिए? गौरतलब है कि खबरें आ रही हैं कि इस मामले की सुनवाई में सीबीआई को आशंका है कि गुजरात में अगर इसकी सुनवाई हुई तो निष्पक्ष नहीं हो सकती है। सीबीआई के स्टेंड से नरेंद्र मोदी हत्थे से उखड गए हैं। मोदी का मानना है कि सीबीआई का दुरूपयोग कांग्रेस द्वारा जमकर किया जा रहा है।






कोर्ट ने मंगवाई नेता जी की केस डायरी


परिसीमन में विलोपित हुई मध्य प्रदेश की लोकसभा सीट की अंतिम सांसद और जिला मुख्यालय को अपने में समाहित करने वाली सिवनी विधानसभा सीट की विधायक के उपर हुए प्राणघातक हमले के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने पुलिस से केस डायरी प्रस्तुत करने को कहा है। 26 दिसंबर 2007 को तत्कालीन सांसद श्रीमति नीता पटेरिया के सारथी राजदीप चौहान की शिकायत पर सिवनी जिले के बंडोल पुलिस थाने में एक शिकायत दर्ज की गई थी, जिसका लब्बो लुआब यह था कि मध्य प्रदेश के वर्तमान विधानसभा उपाध्यक्ष और उस वक्त के केवलारी विधायक ठाकुर हरवंश सिंह के इशारे पर उनके समर्थकों ने श्रीमति पटेरिया के वाहन पर पत्थरों से हमला किया था। राजदीप का आरोप था कि तत्कालीन सांसद के वाहन पर जमकर पत्थर बरसाए जिससे सांसद श्रीमति पटेरिया अपने पुत्र सहित किसी तरह जान बचाकर भागे। मजे की बात है कि उस वक्त प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार थी जो अब तक कायम है। श्रीमति पटेरिया भी भाजपा से सांसद रहीं और वर्तमान में वे भाजपा से विधायक भी हैं। बावजूद इसके भाजपा शासनकाल में अगर केस डायरी कोर्ट में पेश न करवाई जा सके तो यह नूरा कुश्ती की श्रेणी में ही आएगा।






देश में एक करोड़ अनाथ बच्चे हैं सोनिया जी


देश की सबसे ताकतवर महिला श्रीमति सोनिया गांधी विदेशों की शक्तिशाली महिलाओं की फेहरिस्त में अपना स्थान बना चुकी हैं। नेहरू गांधी परिवार की पहली विदेशी बहू सोनिया गांधी के दो बच्चे राहुल और प्रियंका हैं, इस लिहाज से वे बच्चों का सुख और दर्द दोनों ही बातों से अच्छी तरह वाकिफ होंगी। देश में आज लगभग सवा करोड बच्चे अनाथ हैं, यह बात सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक प्रकरण की सुनवाई में सामने आई। एक विदेश दम्पत्ति द्वारा भारतीय बच्चे को गोद लेने के मामले में जब निचली अदालतों द्वारा हाथ खडे कर दिए गए तब दुनिया के चौधरी समझे जाने वाले अमेरिका से आए केग एलन कोट्स और उनकी अर्धांग्नी सिंथिया ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए। निचली अदालतों का मानना था कि इस दंपत्ति के पहले से ही तीन बच्चे हैं अतः वे संभवतः घरेलू काम के लिए इस बच्चे को नोकर बनाकर ले जाना चाह रहे हैं। बडी अदालत ने इस मामले को संजीदगी से लिया और केंद्र सरकार से कहा है कि देश के लगभग सवा करोड अनाथ बच्चों के विदेशियों द्वारा गोद लेने के लिए कानून बनाया जाए। माना जाता है कि जब केंद्र सरकार श्रीमति सोनिया गांधी के इशारों पर ही कत्थक कर रही है, और वे भी एक मां हैं तो बेसहारा अनाथ बच्चों के लिए कानून बनाने के लिए वे पहल अवश्य ही करेंगी।






कहां गए लाट साहब को मिले उपहार!


कहा जाता है कि भारत गणराज्य में महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री या मंत्री को मिले उपहार उनकी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होते हैं। यह सब कुछ सरकारी संपत्ति की श्रेणी में आते हैं। जब भी इन पदों पर आसीन कोई भी जनसेवक कहीं भी जाता है तो उसे उपकृत और उनका सम्मान करने की गरज से महानुभावों को उपहार दिए जाते हैं। इन उपहारों का लेखा जोखा रखना भी जरूरी होता है। अमूमन लोग इसका हिसाब किताब रखना जरूरी नहीं समझते हैं। देश के हृदय प्रदेश में राज्य सूचना आयोग का एक आदेश राजभवन सचिवालय के गले की फांस बनता जा रहा है। आयोग ने अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे एक पखवाडे के अंदर मध्य प्रदेश के राज्यपालों को दस साल में मिले उपहारों की सूची बनाकर उनका भौतिक सत्यापन करवाएं, एवं इसकी एक प्रति निशुल्क ही आवेदक को सौंपें। उल्लेखनीय होगा कि हर सरकारी कार्यालय में प्रत्येक वर्ष उपलब्ध सामग्री का स्टाक मिलान कर उसका भौतिक सत्यापन करवाना आवश्यक होता है, ताकि यह साबित हो सके कि कार्यालय मंे सरकारी संपत्ति मौजूद है अथवा गायब कर दी गई है। अमूमन सरकारी कार्यालयों में एसा किया नहीं जाता है। राज्य सूचना आयोग के आदेश के बाद शायद सरकारी अमला चेते और हर साल भौतिक सत्यापन का रिवाज आगे बढाया जा सके।










मुंबई पर मच्छर राज!


पूर्व विदेश मंत्री ‘शशि थरूर‘ फेम सोशल नेटवर्किंग वेवसाईट ‘‘ट्विटर‘‘ एक बार फिर चर्चाओं में है। इस बार यह किसी राजनेता नहीं वरन राजनैतिक कारण से ही चर्चा में आई है। दरअसल विख्यात गायिका आशा भौसले द्वारा ट्विटर पर एक टिप्पणी कर दी जिससे मुंबई के स्वयंभू शेर राज ठाकरे गुर्राने लगे। आशा दी ने कह दिया कि मुंबई पर मच्छर राज कायम है। बस क्या था ‘राज‘ का नाम आते ही मनसे कार्यकर्ता आपे से बाहर हो गए। गौरतलब होगा कि पूर्व में राज ठाकरे ने कहा था कि मुंबई में अन्य प्रांतों से आने वाले लोग मलेरिया जैसी बीमारी लेकर आते हैं जिससे यह यहां फैल रही है और अस्पताल भरे पडे हैं। आशा दी ने जैसे ही मच्छर राज वाली बात कही वैसे ही मनसे कार्यकर्ताआंे को लगा मानो आशा भौसले ने राज ठाकरे पर टिप्पणी कर दी हो। मामला तूल पकडते देख आशा भौसले ने बात को संभाला और कहा कि उनकी भावनाओं को अन्यथा न लिया जाए उनका तातपर्य महज मुंबई के मच्छरों से था, जिनकी बहुतायत को उन्होंने मच्छर राज कहा था। अगर मनसे कार्यकर्ता भडकते हैं तो फिर वे धन्यवाद, नमस्कार, थेंक्य यू जैसे शब्द ही ट्विटर पर इस्तेमाल करेंगी। धन्य है देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई का ‘मच्छर राज‘।






मंहगाई पर सुषमा ने दिखाए तीखे तेवर


राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी ने जब से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद तजा है तब से भाजपा की धार लोकसभा में बोथरी ही दिख रही थी। काफी अरसे बाद अब आडवाणी का स्थान लेने वाली भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने तल्ख तेवर का आगाज किया है। सुषमा ने मंहगाई के मामले मंे सरकार को कटघरे में खडा किया है। सत्तर के दशक के बाद पहली बार विपक्ष में बैठे किसी नेता ने इस सच्चाई को जनता के सामने लाने का प्रयास किया है कि सरकार जनता का ध्यान भटकाने के लिए मंहगाई को अस्त्र की तरह इस्तेमाल करती है। सुषमा का आरोप सौ फीसदी सही है कि सरकार धोखेबाज इसलिए है क्योंकि वह चुनाव के पहले कीमतें नहीं बढाती है, पर चुनाव निपटते ही आम आदमी को भूलकर मनमाने तरीके से कीमतों में इजाफा कर देती है। यह सोलह आने सच है, और राजनेता इस सच से वाकिफ भी हैं। विडम्बना यह है कि चुनाव में जनादेश पाने के लिए तरह तरह के प्रलोभन दिए जाते हैं। आम आदमी के प्रति फिकरमंद होना और कीमतों का न बढाना भी इसी रणनीति का ही एक हिस्सा होता है। जैसे ही चुनाव के बाद पार्टियां सत्तारूढ होती हैं मंहगाई का मुंह अपने आप ही खुल जाता है।






खेल ने निकाला रियाया का तेल


कामन वेल्थ गेम्स वैसे तो भारत गणराज्य की कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के लिए नाक का सवाल बन चुकी है, किन्तु इस खेल से भला किसका हो रहा है या होने वाला है, इस बारे में सोचने की फुर्सत किसी को भी नहीं दिख रही है। सभी अपनी ढपली अपना राग ही बजा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार तीस हजार करोड रूपयों को कामन वेल्थ की हवन वेदी में स्वाहा करने की तैयारी है। आयोजन महज 13 दिनों का भले ही हो किन्तु इस आयोजन के पहले अब तक दो तिहाई पैसा बह चुका है, फिर भी तैयारियां ढाक के तीन पात ही नजर आ रही हैं। खेल मंत्री एम.एस.गिल कह रहे हैं कि इसमें गफलत तो हुई है, किन्तु समय कम है अब कुछ नहीं किया जा सकता है। जांच एजंेसियां अपना मुंह खोले बैठी हैं। सारे प्रहसन को जनता के साथ ही साथ विपक्ष भी मूकदर्शक बनकर ही देखने पर मजबूर है। जनता की मजबूरी तो समझ में आती है पर विपक्ष की मजबूरी किसी दिशा विशेष की ओर इशारा कर रही है। आयोजन समिति के अध्यक्ष ने यह कहकर सोनिया गांधी की परेशानी बढा दी है कि अगर सोनिया चाहें तो वे त्यागपत्र दे सकते हैं। इसके अनेक मतलब निकाले जा रहे हैं, जिनमें से एक यह भी है कि सोनिया के इशारे पर ही तीस हजार करोड रूपयों का बंदरबांट किया जा रहा है!






यूपी मिशन 2012 पर युवराज


कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की नजरें अब उत्तर प्रदेश में 2012 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर आकर टिक गईं हैं। राहुल गांधी यूपी चुनावों को महत्वपूर्ण समझने लगे हैं। सूत्रों का कहना है कि राहुल की सलाह पर ही कांग्रेस ने यूपी के चुनावों के मद्देनजर ‘‘यूपी मिशन 2012‘‘ नाम से तैयारियां आरंभ कर दी हैं। राहुल गांधी की मण्डली ने उन्हें मशविरा दिया है कि अगर यूपी को 2012 में कब्जे में नहीं लिया गया तो आने वाले समय में राहुल गांधी की गत भी राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी की सी होने से कोई नहीं रोक सकता है। यही कारण है कि राहुल गांधी अब यूपी में ज्यादा से ज्यादा समय देने लगे हैं। कांग्रेस जानती है कि यादवी संगठित वोट बैंक को मुलायम सिंह के बलशाली पंजे से छुडाना बहुत आसान नहीं है, सो अब गैर यादवी वोट बैंक पर कांग्रेस ने अपनी नजरें गडा रखी हैं। राहुल बाबा के एक करीबी का कहना है कि उन्हें मशविरा दिया गया है कि आने वाले समय में अगर यूपी और बिहार जैसे सूबों में अगर दलित, पिछडे और अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध नहीं लगाई गई तो समय काफी मुश्किल हो सकता है। यही कारण है कि अब कांग्रेस की नजरें गैर यादवी वोट बैंक की ओर इनायत होने लगी हैं।






सवा करोड खर्च पर एड्स है कि मानता ही नहीं!


एड्स को गंभीर बीमारी की श्रेणी में रखा गया था अस्सी के दशक के आरंभ के साथ ही। तीस सालों में अरबों खर्च करने के बाद भी सरकार एड्स को नियंत्रण में लेने में असफल ही रही है। पिछले साल लगभग 121 करोड रूपए खर्च करने के बाद भी भारत गणराज्य में एड्स के 3 लाख 85 हजार से अधिक मामले प्रकाश में आए हैं। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकार की मंशा इस रोग के नियंत्रण के प्रति क्या और कैसी है। एड्स मूलतः संक्रमित सुई के लगाने या इस तरह के खून के चढाने अथवा संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में असुरक्षित यौन संपर्क से ही फैलता है। जब यह बात सार्वजनिक तौर पर समझाई जा चुकी है, फिर भी अगर एड्स का पहिया थमने की बजाए अपनी ही गति से घूम रहा हो तब सरकार द्वारा पानी में बहाई जा रही धनराशि का क्या ओचित्य है।






पुच्छल तारा


अब जबकि कामन वेल्थ गेम्स के आरंभ होने में चंद सप्ताह ही बचे हैं, और इसके आयोजनों में हजारों करोड रूपए स्वाहा हो गए हों, तब पुराना एक लतीफा प्रसंगिक ही लगता है। कोलकता से राजुली सेन एक ईमेल भेजती हैं कि जब सानिया मिर्जा ने पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति से विवाह किया तब श्रीराम सेना के चीफ प्रमोद मुथालिक जैसे अनेक लोगों ने यह पूछा था कि क्या सानिया मिर्जा को सवा सौ करोड भारतियों में एक भी योग्य व्यक्ति विवाह के लिए नहीं मिला। इसका जवाब यह था कि जब एशियाड, ओलंपिक आदि में भारयितों को एक भी स्वर्ण पदक नहीं मिलता तब भला एसा प्रश्न इन लोगों के दिमाग में क्यों नहीं कौंधता। अब कामन वेल्थ गेम्स होने वाले हैं सो ‘‘नाई नाई कितने बाल‘‘ अभी देख लेते हैं हजूर।
1 जून 2008 को दिया था अरूणाचल स्कूल ने एफीलेशन का आवेदन


सिवनी। जिला मुख्यालय सीर दीवान में बरघाट नाके के समीप संचालित होने वाले अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) ने केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई से एफीलेशन के लिए 01 जून 2008 को पंजीकरण हेतु आवेदन दिया था, जिसे सीबीएसई बोर्ड ने 06 अगस्त 2008 को स्वीकार किया था। इसके उपरांत इसके लिए आंकडे 04 जुलाई 2009 को जनरेट किए गए थे। इसका पंजीकरण नंबर एसएस - 00490 - 0910 प्रदान किया गया था। उक्ताशय की जानकारी सीबीएसई बोर्ड उच्च पदस्थ सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराई गई है।

गौरतलब होगा कि टाईनी टाट्स स्कूल पूर्व में बारापत्थर में पूर्व विधायक नरेश दिवाकर के आवास के बाजू में संचालित होता था, जिसे कालांतर में डॉ.सलिल त्रिवेदी के आवास के सामने होमगार्ड कार्यालय मार्ग पर स्थानांतरित कर दिया गया था। बताया जाता है कि शाला प्रबंधन ने नब्बे के दशक के आरंभ में अपने यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों से पांच सौ रूपए सालाना केपीटेशन फीस वसूलकर बरघाट नाके के समीप जमीन खरीदी गई, एवं इसमें शाला का निर्माण करवाया गया।

बरघाट नाके के समीप चलने वाला टाईनी टाट्स स्कूल एकाएक इतिहास की बात हो गया, और इसका स्थान अरूणाचल पब्लिक स्कूल ने ले लिया। यह सब पलक झपकते कैसे और क्यों हो गया, यह आज भी शोध का विषय ही बना हुआ है। कल तक जो विद्यार्थी टाईनी टाट्स स्कूल के छात्र थे, उनसे अगर पूछा जाए कि वे किस स्कूल के छात्र हैं तो उनकी जुबान पर आज भी टाईनी टाट्स का नाम ही रटा हुआ है। उक्त शाला भवन के लिए खरीदी गई जमीन किस नाम से खरीदी गई है और शाला भवन किसके स्वामित्व में है, किस अनुबंध के आधार पर टाईनी टाट्स स्कूल के बजाए रातों रात इसका नाम अरूणाचल पब्लिक स्कूल कर दिया गया यह गुत्थी या तो जिला एवं पुलिस प्रशासन ही सुलझा सकता है या फिर स्वयं टाईनी टाट्स शाला प्रबंधन।

बहरहाल सूत्रों ने आगे कहा कि इसी तारतम्य में सीर दीवान सिवनी में संचालित अरूणाचल पब्लिक स्कूल के प्रबंधक को सीबीएसई बोर्ड द्वारा पत्र क्रमांक सीबीएसई / एफी / एसएस - 00490 - 0910 (1030442) / 2009 दिनांक सात जुलाई 2007 को जारी किया गया था। इस पत्र में उक्त शाला के लिए फ्रेश कंपोजिट प्रोवीजनल एफीलेशन अर्थात नवीन मिश्रित अस्थाई मान्यता को सीनियर सेकन्डरी स्तर तक स्टेट बोर्ड से स्विच ओवर विषय से जारी किया गया था।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को एफीलेशन विभाग के डिप्टी सेकेरेटरी जोसफ एम्मूअल के हस्ताक्षरों से जारी इस पत्र में उल्लेख किया गया है कि उक्त शाला के आवेदन दिनांक 26 मई 2008 के तारतम्य में उन्हें निर्देशित किया गया है कि वे शाला को यह जानकारी दें कि शाला को 01 अप्रेल 2009 से 31 मार्च 2012 तक की तीन साल की अवधि के लिए सशर्त प्रोवीजनल एफीलेशन दिया गया है।

सीबीएसई के सूत्रों ने आगे कहा कि इस पत्र में उल्लेख किया गया है कि शाला को अंग्रेजी और हिन्दी वेकल्पिक एवं कोर तथा संस्कृत के साथ ही साथ वेकल्पिक विषयों के तौर पर ज्योगरफी, इकोनोमिक्स, मेथामेटिक्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलाजी, फिजीकल एजूकेशन, बिजनिस स्टेडीज, एकाउंटेंसी, इंफरमेटिक्स प्रेक्टिस, कंप्यूटर साईंस को शामिल किया गया है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को सीबीएसई द्वारा दी गई मान्यताओं की शर्तों में उल्लेखित है कि शाला को मिडिल क्लास में एनसीईआरटी द्वारा निर्धारित किताबों को शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही साथ अन्य विषयों की किताबें सीबीएसई बोर्ड द्वारा निर्धारित और समय समय पर परिवर्तित होंगी। तीसरी शर्त के रूप में यह उल्लेख किया गया है कि शाला अपने विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या शिक्षकों के निर्धारित अनुपात में ही रखेगी। यह बोर्ड के बाय लाज के हिसाब से ही होगी एवं उससे अधिक विद्यार्थियों को दाखिला नहीं दिलवाएगा।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की चौथी शर्त के तौर पर यह बाध्यता रखी गई है कि शाला किसी अन्य शाला जो बोर्ड से एफीलेटेड न हो में विद्यार्थियों को स्पासंर नहीं करेगा। पांचवी शर्त के तौर पर कहा गया है कि शाला पर्याप्त मात्रा में क्वालिफाईड और शिक्षित स्टाफ को नियमित आधार पर एफीलेशन बायलाज के हिसाब से रखेगा। अगली शर्त में कहा गया है कि शाला अपने कर्मचारियों की सेवा शर्तें, वेतन भत्ते और अन्य सुविधाएं कम से कम उस राज्य में कार्यरत करस्पांडेंट श्रेणी के सरकारी स्कूल के स्टाफ से देगा, जहां वह स्थापित होगा, इस तरह की एक अंडरटेकिंग तत्काल प्रभाव से सीबीएसई को भेजना अनिवार्य है।

सूत्रों का आगे कहना है कि राज्य सरकार के हिसाब से कर्मचारियों की सेवा शर्तें निर्धारित की जाएं यह इसकी सातवीं शर्त है। ग्यारहवीं कंडिका मंे साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि शाला बोर्ड के निर्धारित नार्मस के हिसाब से प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवाएगा। इसकी महत्वपूर्ण कंडिका 13 में कहा गया है कि शाला कम से कम दस कम्पयूटर वाली कम्पयूटर लेब या विद्यार्थियों की 1: 20 के अनुपात में कंप्यूटर लेब उलब्ध कराएगा। अगर किसी शाला में 1000 छात्र हैं तो वहां कम से कम 50 कम्पयूटर वाली कम्पयूटर लेब का होना आवश्यक है। यह कंडिका कम्पयूटर छात्रों की संख्या के हिसाब से ही होगी। इसमें साफ तौर पर उल्लेखित किया गया है कि कम्पयूटर में निर्धारित साफ्टवेयर विद ब्राडबेण्ड कनेक्शन वह भी ‘‘इंटरनेट आलवेज आन‘‘ की स्थिति में होना आवश्यक है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की कंडिका नंबर 14 में कहा गया है कि शाला विशेष ध्यान देने वाले बच्चों या अक्षम डिसेबल्ड बच्चों को डिसेबलटी एक्ट 1995 के तहत प्रमोट करेगी। इसकी कंडिका 15 में कहा गया है कि शाला अपने रिकार्ड को बोर्ड या राज्य शासन के शिक्षा विभाग और उसके प्राधिकृत प्रतिनिधि के लिए खुला रखेगा, जब चाहे तब ये इस रिकार्ड का अवलोकन कर सकते हैं। गौरतलब होगा कि जिला शिक्षा अधिकारी सिवनी द्वारा पूर्व में यशोन्नति से चर्चा के दौरान कहा गया था, कि मामला सीबीएसई बोर्ड का है, इस मामले में वे क्या कर सकते हैं।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की कंडिका 16 कहती है कि शाला में विद्यार्थियों से वसूल की जाने वाली ट्यूशन और अन्य फीस भी वहां उपलब्ध सुविधाओं के अनुरूप होनी चाहिए। कंडिका 17 में उल्लेख किया गया है कि शाला में प्रवेश के दौरान धार्मिक, जाति आधार या जन्म स्थान का कोई बंधन नहीं होना चाहिए। शाला इस आधार पर किसी का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं कर सकती है।

अरूणाचल पब्लिक स्कूल (पूर्व में टाईनी टाट्स स्कूल) को जारी पत्र की कंडिका 18 कहती है कि किसी भी तरह की अनरिकर्जनाईज्ड क्लास शाला के प्रांगड में संचालित नहीं हो सकती है, और न ही शाला के नाम से ही संचालित हो सकती है। कंडिका 19 के अनुसार शाला इन नियमों का पालन सख्ती से करे कि विद्यार्थियों के लिए सुरक्षा उपकरण एवं व्यवस्थाएं पर्याप्त हों, शाला में अग्निशमन यंत्र, पीने का स्वच्छ पानी, शौचालय एवं ट्रांसपोर्टेशन की पर्याप्त व्यवस्था हो। इस एफीलेशन के लिए सालाना फीस पंद्रह सौ रूपए प्रतिवर्ष के हिसाब से तीन साल के लिए चार हजार पांच सौ रूपए ही होगी।

सूत्रों का कहना है कि कंडिका 27 में कहा गया है कि शाला का प्रांगण का क्षेत्रफल 8260 स्कव्यर मीटर, बिल्ट अप एरिया 5648.36 स्केयर मीटर, खेल के मैदान का क्षेत्रफल 2968 स्केयर मीटर, कुल कक्षाएं 19, प्रयोगशालाओं में बायोलाजी, फिजिक्स, रसायनशास्त्र, गणि, कम्यूटर साईंस की एक एक उपलब्ध होना आवश्यक है। इसके अलावा शाला के पुस्कालय मंे 20 गुणा 22 साईज की कुल तीन हजार एक सौ छियत्तर किताबें होना आवश्यक है। इसकी कंडिका 29 कहती है कि स्पेशल कंडीशन्स को तीन माह के अंदर ही पूरा करना अनिवार्य है।

(क्रमशः जारी)

शनिवार, 7 अगस्त 2010

सीबीएसई पर हावी शिक्षा माफिया (7)

सीबीएसई की वेव साईट बताती है कि एकलव्य, नवोदय, सेंट्रल और महर्षि  ही हैं सीबीएसई एफीलेटेड स्कूल

सिवनी। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई के प्रलोभन के चलते पालक और विद्यार्थियों पर बन आई है. जिला मुख्यालय में प्रशासन की नाक के नीचे निजी तौर पर संचालित होने वाली शालाओं द्वारा अपने आप को सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध या संबद्धता की कतार में होने का दावा कर विद्यार्थियों को जबर्दस्त तरीके से आकर्षित करने का कुत्सित प्रयास जारी है. शहर में चल रही शालाओं कथित तौर पर ली जाने वाली द्वारा केपीटेशन फीस के माध्यम से अपनी विशाल अटटालिकाएं खडी कर ली गईं हैं. इक्कीसवीं सदी में संचार क्रांति के चलते सीबीएसई बोर्ड की वेव साईट पर सब कुछ दिखता है की तर्ज पर पालक या विद्यार्थी चाहें तो सब कुछ अपनी आंख से देख भालकर संतोष कर सकते हैं, यह सब अगर किसी को नहीं दिख रहा है, तो वह है जिला प्रशासन को.
 
सीबीएसई की आधिकारिक वेव साईट द्धह्लह्लश्चरू//ष्ड्ढह्यद्ग.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ/ पर जब होम पेज खुलता है तब उसके उपरांत इस वेव साईट पर पब्लिक पर क्लिक करने पर जो विण्डो खुलती है, उसमें उपर एड्रेस बार द्धह्लह्लश्चरू//ष्ड्ढह्यद्ग.ठ्ठद्बष्.द्बठ्ठ/श्चह्वड्ढद्यद्बष्१.द्धह्लद्वमें दिखने लगेगा. इस विण्डो को खोलने पर जब बाईं और आने वाले केरेक्टर्स में देखा जाए तो दूसरे नंबर पर  ष्ठश्वक्क्रक्रञ्जरूश्वहृञ्जस्/हृढ्ढञ्जस्
(ढ्ढठ्ठद्घशह्म्द्वड्डह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र श्चस्रड्डह्लद्गह्य) दिखाई पडेगा. इसे क्लिक करने पर जो विंडो खुलेगी उसमें एकेडेमिक एडमीशन आदि दिखाई देने लगेगा. इसमें तीसरे नंबर पर एफीलेशन को क्लिक करते ही नई विण्डो खुल जाएगी.
 
इस नई विण्डो में उपर अलग अलग तरह से सर्च के आप्शन आ जाते हैं. इस विण्डो में तीसरे नंबर पर स्टेट वाईज को क्लिक कर सिलेक्ट ए स्टेट में मध्य प्रदेश और एंटर ए की वर्ड में सिवनी भरा जाकर सर्च की जाए तो जो परिणाम सामने आते हैं वे कुछ इस प्रकार हैं. सिवनी के नाम से कुल छरू शालाएं ही सीबीएसई से संबद्ध बताई गई हैं. जिनमें से केंद्रीय विद्यालय सिवनी मालवा अर्थात होशंगाबाद जिले और दूसरा जवाहर नवोदय वारासिवनी अर्थात बालाघाट जिले का है.
 
इसके अलावा इस सूची में पहली पायदान पर एकलव्य माडल रसीडेंशियल स्कूल घंसौर जिला सिवनी है, जिसके प्राचार्य के स्थान पर लोकमन गेंडाम का नाम अंकित है, इसका एफीलेशन नंबर १०२०००६ दर्शाया गया है. १९९२ से संचालित होने वाली इस शाला को प्रोवीजनल एफीलेशन १ अप्रेल २००६ से ३१ मार्च २०११ तक की अवधि के लिए प्रदान किया जाना दर्शाया गया है.
 
इसके उपरांत दूसरी पायदान पर जवाहर नवोदय विद्यालय कान्हीवाडा, जिला सिवनी का नाम दर्ज है. १९८७ से संचालित इस शाला के प्राचार्य के नाम के आगे वी एस सिंह और आर एस राव का नाम दर्ज है. इस शाला को १ अप्रेल २०१० से ३१ मार्च २०१० तक के लिए प्रोवीजनल एफीलेशन प्रदाय किया गया है जिसका नंबर १०४०००६ दर्ज है. इस मान से देखा जाए तो इस साल नए शैक्षणिक सत्र में जवाहर नवोदय विद्यालय की सीबीएसई मान्यता समाप्त हो चुकी है.
 
तीसरेी पायदान पर बालाघाट के वारासिवनी और चौथे नंबर पर होशंगाबाद के सिवनी मालवा का उल्लेख है. पांचवे नंबर पर एक बार फिर सिवनी जिले का उल्लेख किया गया है. पांचवी पायदान पर स्थान पाया है केंद्रीय विद्यालय सिवनी ने. जिले में १९९२ से संचालित इस शाला के विवरण में लिखा गया है कि यह विद्यालय पुराने जेल भवन में संचालित हो रहा है, और इसे प्रोवीजनल एफीलेशन एक अप्रेल २००१ से ३१ मार्च २०११ तक के लिए प्रदान की गई है. इसके प्राचार्य के स्थान पर आर ए मिश्रा का नाम अंकित है, इसका प्रोवीजनल एफलेशन नंबर १०००००५६ दर्शाया गया है.
 
अंतिम अर्थात छटवें नंबर पर बारी आती है महर्षि स्कूल की. महर्षी विद्यालय के विवरण में उल्लेख किया गया है कि यह शाला १९९२ से चल रही है, इसकी प्राचार्य श्रीमति आर तिकाडे हैं, तथा इसे एक अप्रेल २००७ से ३१ मार्च २०१२ तक के लिए प्रोवीजनल मान्यता प्रदान की गई है. इसका एफीलेशन नंबर १०३००७७ है. इसके बाद सूची समाप्त हो जाती है.

सुधि पाठक स्वयं ही अंदाजा लगा सकते हैं कि संचार क्रांति के इस युग में अब और क्या प्रमाण दिया जाए. जब सीबीएसई की वेव साईट खुद चिल्ला चिल्ला कर हकीकत बयां कर रही है, तब जिला मुख्यालय में सांसद, विधायक, कांग्रेस भाजपा और प्रशासन की नाक के नीचे इस तरह का गोरखधंधा हो रहा हो तब सिवनी के विद्यार्थियों का भगावन ही मालिक माना जा सकता है.
(क्रमशः जारी)

फोरलेन विवाद का सच ------------03

किस षणयंत्र के तहत किसने रूकवाया था काम

जब अक्टूबर माह में उत्तर सिवनी सामान्य वनमण्डलाधिकारी ने मुख्य वन संरक्षक सिवनी को यह सूचित किया कि उसके द्वारा अवैध पेड कटाई के मामले में ठेकेदार के खिलाफ मामला पंजीबद्ध कर लिया गया है, तब उत्तर दक्षिण गलियारे का काम रूक ही गया था। आखिर क्या वजह थी कि इसके लगभग नौ माह तक जनता को पता क्यों नहीं चल सका सडक काम निर्माण का काम रोक दिया गया है, जबकि निर्माण करा रही कंपनियां सद्भाव और मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनियांे के कारिंदे जिले में नेतागिरी का परचम लहराने वाले नुमाईंदो से मेल मुलाकात भी कर रहे थे।

 
(लिमटी खरे)

सिवनी। उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे के नक्शे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने का षणयंत्र लगभग दो साल पूर्व ही आरंभ करवा दिया गया था, और सिवनी जिले को दिशा देने वाले नेताओं को कथित तौर पर इसकी भनक भी नहीं लगी। जून 2009 में जब तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि का एक आदेश हवा में तैरा तब जाकर जिले की जनता के मन में भय और आक्रोश मिश्रित तौर पर सामने आया।
 
वन विभाग के डीएफओ द्वारा 25 अक्टूबर 2008 को सीसीएफ को लिखे पत्र में यह उल्लेख किया गया था कि एनएच ने वन विभाग की भूमि को अपना बताकर इस पर खडे पेड काटने की निविदा जारी कर पेड कटाई का काम आरंभ कर दिया था, जिसे वन विभाग ने अवैध माना, और वन विभाग द्वारा इस कटाई को अवैध मानते हुए पीपरखुंटा वन खण्ड के कक्ष नंबर पी - 266 में राष्ट्रीय राजमार्ग के अनाधिकृत ठेकेदार द्वारा 26 पलाश और 47 सागौन के वृक्ष काटने पर दिनांक 15 अक्टूबर 2008 को वन अपराध नंबर 1897/22 के तहत मामला दर्ज कर लिया था।
 
इसी से साफ हो जाता है कि वन विभाग ने इस सडक पर पेड काटने का काम रोक दिया गया था। जब सडक के चौडीकरण के काम में पेड ही नहीं हटाए जाएंगे तो भला सडक कहां से बन पाएगी? जाहिर है कि अक्टूबर 2008 में ही मीनाक्षी और सद्भाव ने अपना अपना काम रोककर हाथ पर हाथ रखकर बैठ गईं थीं।
 
बताया जाता है कि निर्माण में रत मीनाक्षी और सद्भाव कंपनियांे के कारिंदे रोजाना ही जिला मुख्यालय सिवनी आकर आवश्यक वस्तुएं खरीदा करते थे। चर्चाओं के अनुसार इन कारिंदों द्वारा शहर में अनेक नेताओं से चर्चा कर उन्हें इस बारे में आवगत कराया जाता था कि कंपनियों ने सडक निर्माण का काम रोक दिया है, बावजूद इसके सिवनी का हित साधने का प्रहसन करने वाले इन नेताओं ने कभी भी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया कि सडक निर्माण का काम रोके जाने का षणयंत्र बुना जा रहा है।
 
चर्चाएं तो यहां तक भी हैं कि इन सडक निर्माण कंपनियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर लंबा आर्थिक लाभ लेने की गरज से जिले की बदहाली पर आंसू बहाने वाले इन नेताओं (सांसद विधायक नहीं) का उपयोग निर्माण कंपनियों ने एक तरह से उपकरणों की तरह ही किया है। इन नेताओं को कंपनियों का इंस्टूमेंट बनने से क्या लाभ हुआ है, यह तो वे ही जाने किन्तु यह सच है कि इससे नुकसान में सिवनी जिले की जनता ही रही है।
 
आज आलम यह है कि इस सडक का निर्माण कार्य अधूरा रह जाने से लोगों को सिवनी से नागपुर और जबलपुर आने जाने में काफी हद तक परेशानी का सामना करना पड रहा है। जबलपुर मार्ग पर बंजारी माता के आगे से गनेशगंज के पास तक और नागपुर रोड पर मोहगांव से खवासा तक के मार्ग पर वाहनों की ‘‘कुत्ता चाल‘‘ से लोगों की परेशानी का सबब बनती जा रही है।
 
वाहन चालकों की मानें तो उन्हें सडक पर हुए भारी भरकम और असंख्य गड्ढों को बचाने के लिए कुत्ते के मानिंद कभी दांय तो कभी बांयी ओर (जिस तरह कुत्ता दांयी बायीं और खम्बों को देखकर टांग उठाता है) जाकर वाहन बचाना पडता है। बस में यात्रा करने वाले एक यात्री ने तो इसे सूपा की संज्ञा भी दे डाली है। उसके अनुसार जिस तरह सूपा में चावल या गेंहूं को फटका जाता है ठीक उसी तरह बसों में बैठे यात्री की स्थिति होती है। यात्री एक बार बांयी तो दूसरी बार दायीं और जाकर उछलता है, फिर बीच में उछाल दिया जाता है।
 
बहरहाल आज भी यक्ष प्रश्न यही बनकर खडा हुआ है कि आखिर वो कौन था जिसके आदेश पर फोरलेन के निर्माण का काम रूकवाया गया था। जिला प्रशासन, वन विभाग, एनएचएआई आदि के उपर आखिर कौन सी एक अज्ञात शक्ति दबाव बनाए हुए है, जो उत्तर दक्षिण गलियारे का काम रोककर पूर्व निर्धारित एलाईंमेंट को बदलने का प्रयास कर रही है?

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

हिटलरशाही पर उतारू हो गई है कांग्रेस

खेल खेल में अरबों का खेल
 
कामन वेल्थ में बह रहा पैसा पानी की तरह
 
शिक्षा और अन्य मदों में है नहीं पैसा पर खेल के नाम पर खुल रही पोटलियां
 
मनमानी के लिए कर रही है जबरिया अत्याचार
 
(लिमटी खरे)

महज तेरह दिनों के लिए आयोजित राष्ट्रमण्डल खेलों के लिए भारत गणराज्य की सरकार पैसे को पानी की तरह बहाने से नहीं चूक रही है। भारत पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि उसके राज में भारत गणराज्य की जनता किस कदर बेहाल हो चुकी है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के राज में मंहगाई आसमान छू रही है और देश के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी मंहगाई के बढने के कारणों को गिनाकर अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। इतना ही नहीं देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पर तीसरी मर्तबा राज करने वाली शीला दीक्षित के राज में मंहगाई ने सारे रिकार्ड तोड दिए हैं, उनके पुत्र सांसद संदीप दीक्षित संसद में संप्रग और राजग सरकार के कार्यकाल में मंहगाई की तुलना कर कांग्रेस की पीठ थपथपाने से नहीं चूकते कि कांग्रेस ने कम मात्रा में मंहगाई को बढने दिया है।
 
भारत गणराज्य के पूर्व खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने इस मामले में अपना मुंह खोला और कामन वेल्थ गेम्स को सफल न बनाने के लिए कमर कस ली। मणिशंकर अय्यर ने यहां तक कह दिया कि इस तरह के खेलों में हो रही पैसों की बर्बादी दुखद है और कामन वेल्थ गेम्स की सफलता की कामना तो शैतान ही कर सकता है। भारत पर राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का ही एक खेल मंत्री अपने ही साथियों को अगर कटघरे में खडा कर रहा हो तो फिर इस बात में कोई शक शुबहा नहीं रह जाता है कि देश की नाक का सवाल बन चुके कामन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है और पैसों की बरबादी साफ तौर पर हो रही है।
 
भारत ने इसकी मेजबानी 2003 में हासिल कर ली थी। कहा जा रहा है कि कनाडा इस खेल को हासिल करने वाला सबसे शक्तिशाली दावेदार था। कनाडा ने कामन वेल्थ गेम्स के लिए अपने शहर हेमिल्टन में प्रस्तावित तैयारियों का खाका बनाकर ही पेश किया था, किन्तु पैसे की ताकत थी कि इसे हिन्दुस्तान की गोद में डाल दिया गया।
 
खबरों के अनुसार भारत में इस आयोजन को हासिल करने के लिए अपने देश की जनता का पेट काटकर खजाना विदेशी खिलाडियों पर लुटाने में कोई कसर नहीं रखी। कामन वेल्थ गेम्स पाने के लिए दिए गए प्रलोभन में यह बात कही गई थी सभी खिलाडियों को विलासितापूर्ण लग्जरी होटल में ठहराकर उन्हें शानदार शोफर ड्रिवन कार मुहैया करवाई जाएंगी। इसमें भारत की ओर से जो पक्ष रखा गया उसमें कहा गया था कि पांच हजार दो सौ खिलाडियों और अठ्ठारह सौ अधिकारियों इस तरह कुल सात हजार लोगों को यात्रा के लिए 48 करोड रूपए का ग्रांट दिया जाएगा। इस वादे के करने से भारत को बोली के दौरान ही 137 करोड रूपए देने पडे थे।
 
भारत में खेलों की स्थिति क्या है यह बात किसी से छिपी नहीं है, पर पता नहीं क्यों भारत सरकार ने इस आयोजन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। भारत सरकार ने अपने देश में खिलाडियों को प्रोत्साहित करने के बजाए इस आयोजन में प्रतिभागी छः दर्जन देशों में प्रत्येक देश के खिलाडी को 33 करोड 12 लाख रूपए की राशि महज एथलीट ट्रेनिंग की मद में ही मुहैया करवा दी थी। इनमें एसे देशों का भी शुमार है जिनसे महज तीन या चार खिलाडियों के ही आने की उम्मीद है।
 
सबसे अधिक आश्चर्य का विषय तो यह है कि हजारों करोड रूपयों में इस तरह सरेराह आग लगाई जा रही है और विपक्ष में बैठी भाजपा के साथ ही साथ बात बात पर लाल झंडा उठाने वाले वाम दल बस हल्की सी चिल्लाहट कर ही विरोध जता रहे हैं। विपक्षी दलों का कमजोर विरोध इस ओर इशारा कर रहा है कि वे भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इस भ्रष्टाचार की गंगा में तबियत से डुबकी लगा रहे हैं।
 
कितने आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य का खेल मंत्री यह स्वीकार कर रहा है कि कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर बहुत कुछ गडबड हुआ है। भारत गणराज्य में राजनैतिक गतिविधियों के केंद्र के साथ ही साथ केंद्र सरकार का मुख्यालय भी दिल्ली ही है। दिल्ली में ही हो रहे हैं कामन वेल्थ गेम्स। जब सब कुछ दिल्ली में हो रहा है फिर कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों में पिछले तीन चार सालों से गफलत चल रही है, और गेम्स के एन दो माह पहले देश के खेल मंत्री अपनी लाचारगी जाहिर करते हुए कहंे कि अब कुछ नहीं हो सकता है, किन्तु इसमें घालमेल तो जमकर हुआ है।
 
भारत के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और पर्दे के पीछे से कठपुतली नचाने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के लिए यह शर्म की ही बात कही जा सकती है कि कामन वेल्थ गेम्स अभी आरंभ नहीं हुए हैं, और जो तैयारियां उनकी नाक के नीचे हो रही थीं, उन तैयारियों की जांच सीबीआई के हवाले है। इतना ही नहीं खेल मंत्री एम.एस.गिल स्वयं इन तैयारियों की जांच के लिए सीएजी से भी गति बढाने का आग्रह कर रहे हैं।
 
क्या इस आयोजन समिति के कोषाध्यक्ष अनिल खन्ना का त्यागपत्र ही पर्याप्त आधार नहीं है कि विपक्ष इस मामले में संसद में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को कटघरे में खडा कर दे। देश भर में आंदोलन इस बात को लेकर चलाए कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के नेतृत्व में देश का तीस हजार करोड रूपए से अधिक का धन फालतू ही जाया करवा दिया गया है। खन्ना पर आरोप था कि उन्होंने अपने पुत्र को सिंथेटिक सरफेस का ठेका दिया था। विपक्ष की खामोशी से मिली जुली नूरा कुश्ती की बू ही आती है।

वैसे एक बात अब तक स्थापित हो चुकी है कि खेल चाहे जो भी हों, इनके आयोजन में देश को हमेशा ही घाटा उठाना पडा है। मामला चाहे एशियाड का हो, ओलंपिक या कानमनवेल्थ का हर बार देश को नुकसान ही झेलना पडा है। भारत की सरकारें वैश्विक छवि बनाने के लिए आवाम ए हिन्द के मुंह से निवाले छीनकर इसे विलासिता भरा भोजन में तब्दील कर सोने की थाली में इसे विदेशियों के सामने परोसने से नहीं चूकती है, पर देश की अधनंगी भूखी जनता के हिस्से में आखिर आता क्या है?
 
अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने जब इस आयोजन को हासिल किया था तब इसके लिए प्रथक से बजट 1899 करोड रूपए का रखा गया था, जो अब सरकारी तौर पर लगभग पांच गुना बढ गया है, किन्तु अगर संपूर्ण आहूति के साथ देखा जाए तो यह बजट तीस हजार करोड रूपए से अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है। किसे सच माना जाए किसे झूठ यह बात समझ से ही परे है।
 
दिल्ली राज्य के मुख्य सचिव कहते हैं कि अब तक निर्माण पर महज 13 हजार 350 करोड रूपए ही खर्च किए गए हैं। वहीं दूसरी ओर सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि दिल्ली सरकार के वित्त मंत्री 2006 में घोषणा कर चुके हैं कि कामन वेल्थ गेम्स के निर्माण पर 2006 तक 26 हजार 808 करोड़ रूपए फूंके जा चुके हैं। 2003 में कहा गया था कि स्टेडियम निर्माण में महज डेढ सौ करोड रूपयों का खर्च ही प्रस्तावित है, किन्तु अब तक इस मद में लगभग चार हजार करोड रूपयों में आग लगाई जा चुकी है।
केंद्रीय खेल मंत्रालय चाहे जो कहे पर इन गेम्स के लिए वह भी अपनी पोटलियों के मुंह तबियत से खोल रहा है। खेल मंत्रालय ने 2005 - 2006 के वित्तीय वर्ष मंे इस आयोजन मद में साढे पेंतालीस करोड रूपए की राशि आवंटित की थी। यह रकम पिछले वित्तीय वर्ष में छः हजार दो सौ पेंतीस गुना बढकर 2 हजार 883 करोड रूपए हो गई। रही केंद्र सरकार की बात तो केंद्र सरकार ने इस साल कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों की मद में दो हजार 69 करोड रूपयों का आवंटन दिया है। दिल्ली सरकार ने खेलों के लिए दो हजार एक सौ पांच करोड रूपए का आवंटन दिया है।
 
सरकार और जनता को भटकाने के लिए आयोजन समिति का कहना है कि महज तेरह दिनों के इस आयोजन में आयोजन समिति को सत्रह सौ अस्सी करोड रूपए की आय होना अनुमानित है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) आयोजन समिति की इस राय से इत्तेफाक कतई नहीं रख रहा है। सीएजी का कहना है कि यह आंकडा बढा चढा कर बताया गया है। आवंटन और व्यय मे ंसरकारी आंकडों में असमानता ही साफ तौर पर जाहिर करती है कि खेल खेल में पैसों का तबियत से खेल किया गया है।

खेल के नाम पर अंधाधुंध पैसा बहाकर विश्व स्तर पर अपनी छवि बनाने का काम सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है जिसने भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज किया है। इसके साथ ही साथ कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर एक दशक से अधिक समय से विराजमान सोनिया गांधी ही एसा जादू दिखा सकतीं हैं कि भारत गणराज्य में जनता अधनंगी, भूखी, प्यासी तरसे और खेलों के नाम पर कांग्रेस से नेताओं और उनसे जुडे कारिंदे करोडों कमाकर मौज उडाएं और भारत गणराज्य का कानून उन्हें अपनी जद में लेने में असहज महसूस करे। देश की पुलिस इन भ्रष्टाचारी, दुराचारियों को सलाम ठोके और गरीब गुरबों को हवालात और जेल की हवा खिलाए।

रक्षित वन और पेंच के हिस्से से गुजरने वाली सडक कभी भी एनएच को हस्तांतरित ही नहीं हुई

फोरलेन विवाद का सच ------------02

2008 में ही रोक दिया गया था फोरलेन निर्माण का काम
 
वन विभाग की भूमि को अपना बताकर एनएच ने आरंभ करवा दी थी कटाई
 
वन विभाग ने कायम किया था अवैध वन कटाई का मामला
  
(लिमटी खरे)

सिवनी। अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में स्वर्णिम चतुर्भज के अंग उत्तर दक्षिण गलियारे से सिवनी का नामोनिशान मिटाने की कवायद 2008 में विधानसभा चुनावों के पहले ही आरंभ हो चुकी थी। मध्य प्रदेश के वाईल्ड लाईफ विभाग द्वारा इस सडक के निर्माण हेतु अपनी सहमति के साथ प्रस्ताव केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजा था। इसी दौरान दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डलाधिकारी द्वारा अक्टूबर 2008 में ही इस मामले में पेंच फसाने आरंभ कर दिए थे।
 
दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डल के डीएफओ द्वारा 25 अक्टूबर 2008 को जारी एक पत्र में इस बात का लेख साफ तौर पर किया गया है कि उनके कार्यालय में एसा कोई भी अभिलेख मौजूद ही नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वन विभाग के आधिपत्य वाले भाग से गुजरने वाले राजमार्ग क निर्माण या चौडीकरण के लिए लोक निर्माण विभाग अथवा राष्ट्रीय राजमार्ग को भूमि कभी हस्तांतरित की गई हो। साथ ही नेशनल हाईवे विभाग द्वारा भी डीएफओ के समक्ष एसे कोई अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए गए हैं जिससे साबित हो सके कि आरक्षित वन भूमि एनएच विभाग या लोक कर्म विभाग को कभी हस्तांतरित की गई हो। इस सडक के सालों साल रखरखाव और नवीनीकरण की जानकारी भी डीएफओ नार्थ टेरीटोरियल सिवनी के पास मौजूद नहीं है।
 
इन परिस्थितियों में यक्ष प्रश्न तो यह है कि अगर यह भूमि वन विभाग के आधिपत्य की है तो अब तक सालों साल लोक निर्माण विभाग के एनएच डिवीजन ने आखिर इस सडक का रखरखाव किस मद से किया है। पत्र में यह बात भी साफ तौर पर उल्लेखित की गई है कि राष्ट्रीय राजमार्ग वन के 03 वनखण्ड के 06 कक्षों से गुजरता है। उक्त संरक्षित वन अधिसूचना (असाधारण राजपत्र) नंबर 3060 - 404 - ग्यारह दिनांक 15 सितम्बर 55 को प्रकाशित होना बताया गया है।
 
सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय राजमार्ग के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने डीएफओ को पत्र लिखकर कहा था कि राईट ऑफ वे के तहत यह भूमि उनके स्वामित्व की है, और इस पर खडे वृक्ष कंट्रोल ऑफ राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम वर्ष 2002 के तहत उनकी सम्पत्ति हैं, एवं सडक के चौडीकरण के दौरान कार्य करने तथा उनकी कटाई करने हेतु वन सरंक्षण अधिनियम के प्रावधान इस पर लागू नहीं होते हैं। इसी तारतम्य में उन्होंने राजमार्ग के राइट ऑफ वे में खडे समस्त वृक्षों की नीलामी कर कटाई का काम भी आरंभ करवा दिया था।
 
सूत्रों के अनुसार वन विभाग द्वारा इस कटाई को अवैध मानते हुए पीपरखुंटा वन खण्ड के कक्ष नंबर पी - 266 में राष्ट्रीय राजमार्ग के अनाधिकृत ठेकेदार द्वारा 26 पलाश और 47 सागौन के वृक्ष काटने पर दिनांक 15 अक्टूबर 2008 को वन अपराध नंबर 1897/22 के तहत मामला दर्ज कर लिया था।
 
माना जा रहा है कि उपर के निर्देशों पर वन विभाग चूंकि इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुका था अतः वह इस मामले को हर तरह से रोकने पर ही आमदा नजर आ रहा था। डीएफओ नार्थ टीटी ने मुख्य वन संरक्षक सिवनी सहित जिला कलेक्टर सिवनी को यह भी सूचित किया था कि राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग द्वारा मार्ग में खडे वृक्षों को राईट ऑफ वे के तहत राष्ट्रीय प्रजाति के वृक्षों को निजी क्रेताओं को सीधे सीधे ही बेच दिया गया है, जिससे मध्य प्रदेश वनोपज व्यापार अधिनियम 1969 की की धारा 5 का उल्लंघन हो रहा है।

वन विभाग द्वारा मामले को प्रदेश सरकार के माध्यम से केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को अग्रिम आदेश और मार्गदर्शन के लिए प्रेषित कर दिया गया था। इस तरह देखा जाए तो नवंबर 2008 में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव और 2009 मई में संपन्न लोकसभा चुनावों के पहले ही सिवनी जिले को एनएचएआई के उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे से गायब करने का ताना बाना बुन लिया गया था।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित न हो यह विरोध

तारीफे काबिल है स्वप्रेरणा से किया अहिंसक विरोध
 
फोरलेन बचाने अभी भी सुलग रही है सिवनी वासियों के मन में आग
 
जिला कलेक्टर से मिलकर मामले को सुलटाने के होना चाहिए प्रयास
 
(लिमटी खरे)

केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के अंग उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे के मानचित्र से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने की साजिश से सिवनी वासियों के मानस पटल पर रोष और असंतोष की ज्वाला अभी शांत नहीं हुई है। सिवनी के निवासी इस कुत्सित प्रयास का विरोध करने का माद्दा आज भी रख रहे हैं। मंगलवार 3 अगस्त को जिला मुख्यालय के निवासियों ने स्वप्रेरणा से आधे दिन का बंद कर जता दिया है कि वे फोरलेन के लिए कितने आतुर हैं।
 
गौरतलब होगा इसके पहले जब परिसीमन और पुर्नारक्षण के चलते सिवनी लोकसभा का विलोपन करने की खबरें आम हुईं थीं तब भी सिवनी वासी सडकों पर उतर आए थे, उस समय भी भगवान शिव की सिवनी के भोले भाले नागरिकों ने शांति, संयम और धैर्य के साथ सिवनी में जिस तरह का जनता कर्फयू लगाया था, उसकी गूंज दिल्ली तक गई थी, जिसे सभी ने सराहा था। यह अलहदा मामला है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी सिवनी लोकसभा के अवसान को बचाया नहीं जा सका था।
 
इस बार जब फोरलेन बचाने वालों ने बंद का आव्हान किया तब तरह तरह के कायस लगाए जा रहे थे। सोमवार को बंद का आव्हान करने वालों ने भले ही बंद के लिए व्यापक स्तर पर अपील न की गई हो, किन्तु शहर के व्यवसाईयों ने स्वप्रेरणा से जिस तरह शांति पूर्वक बंद का आयोजन किया वह तारीफे काबिल ही कहा जा सकता है। किन्तु इस सफलता से अतिउत्साह में आने की आवश्यक्ता कतई नहीं है, क्योंकि अति उत्साह में आंदोलन पथ से भटकने की संभावनाएं बलवती हो जाती हैं।
 
हम आज पुनः अपनी उसी बात पर कायम हैं कि इस फोरलेन के अवसान के प्रयासों के मामले में एक बार फिर हमें सोचना होगा कि मामलें में कांटा कहां फंसा है। मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु नगर पंचायत, लखनादौन के पूर्व अध्यक्ष दिनेश राय और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजकुमार खुराना के सार्वजनिक किए गए वक्तव्यों से साफ हो जाता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने न तो नागपुर रोड पर कुरई घाट और जबलपुर रोड पर बंजारी के पास का काम रोका है, और न ही इसे आरंभ करने में उन्हें कोई आपत्ति है।
 
अगर इन नेता द्वय की बात सच है तो फिर मामला तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि के 18 दिसंबर 2008 को जारी किन्तु 19 दिसंबर को पृष्ठांकित आदेश के तहत अवरूद्ध हुआ है। सवाल यह उठता है कि जब काम को सिवनी के जिला कलेक्टर द्वारा ही रोका गया है, तब फोरलेन बचाने आगे आने वाले संगठनों द्वारा जिला कलेक्टर सिवनी से अब तक इस मामले मंे चर्चा कर इसका निकाल निकालने का जतन क्यों नहीं किया गया है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित है, इस मामले के दो विशेष पक्षों के रूप में वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के नाम सामने आ रहे हैं जिन पर आरोप है कि उनके चलते इस सडक का निर्माण रूका हुआ है।
 
राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के चलते एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप आम बात है, किन्तु जब मामला सार्वजनिक और विशेषकर सिवनी के हित का हो तो फिर हमारे विचार से इसमें राजनैतिक प्रतिबद्धताओं को गौड ही करना आवश्यक है, वरना यह पूरा मामला राजनीति की बली ही चढ जाएगा और मूल मुद्दा अंत तक कायम रहेगा। हमारी अपनी राय में इस मामले में चूंकि एक बार प्रथम दृृष्टया उभरकर सामने आ रही है कि मामले को जिला कलेक्टर द्वारा आदेश जारी कर रोका गया है, अतः जिला कलेक्टर से मिलकर मामले को सुलझाना पहली प्राथमिकता होना चाहिए, वस्तुतः एसा होता अब तक दिखा नहीं है। जब भी फोरलेन की बात सामने आ रही है, ले दे कर सभी इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय पर लाकर टिका दे रहे हैं।
 
इस पूरे मामले में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से भी हम सहमत नहीं हैं। वस्तुतः विधायक और सांसद जिन्हें सिवनी के मतदाताओं ने जनादेश देकर सदन में भेजा है, उन्हें भी इस मामले में स्वप्रेरणा से पहल करना चाहिए। अगर विधायक सांसद अपनी जवाबदारियों का निर्वहन करने में अपने आप को सक्षम नहीं पा रहे हैं तो आंदोलन का नेतृत्व करने वालों को चाहिए कि इन जनसेवकों से मिलकर उनको एक निश्चित समय सीमा तक का समय दें, और अगर समय सीमा में वे अपनी जवाबदारियों के निर्वहन में असफल हों तो उनका वह चेहरा भी उनको जनादेश देकर सदन में भेजने वाली जनता के समक्ष रखना चाहिए। वैसे यह काम आंदोलन के आरंभ होने के उपरांत कुछ माहों में हो जाना चाहिए था। हमारी अपनी निजी राय में अभी भी देर नहीं हुई है, विधायक सांसद को कम से कम तीस दिन का अल्टीमेटम दिया जाना आवश्यक है, जरूरी नहीं कि इससे आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सहमत हांे।

इस मामले में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सम्मानीय बंधुवरों से हम विनम्र आग्रह करना चाहते हैं कि चूंकि मामला जिला कलेक्टर सिवनी द्वारा जारी आदेश के तहत रोका गया है, अतः इस मामले में जिले के विधायक सांसद और प्रभारी मंत्री के सहयोग से सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान सहित प्रदेश के मुख्य सचिव आदि को पहल के लिए बाध्य करना होगा, ताकि सिवनी से होकर गुजरने वाली शेरशाह सूरी के जमाने की एतिहासिक महत्व की इस सडक के अस्तित्व को बचाया जा सके। पिछले साल 21 अगस्त और आज जिला मुख्यालय की जनता ने यह जता दिया है कि वह फोरलेन के साथ छेडछाड बर्दाश्त करने की स्थिति में कतई नहीं है। साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस तरह के सफल आंदोलन अपने आप में एक उर्जा का काम अवश्य करते हैं, किन्तु कहीं इन आंदोलनों की गूंज दिल्ली और भोपाल में बज रहे नगाडों के बीच ‘‘नक्कारखाने में तूती की आवाज‘‘ न साबित हो जाएं।

क्या जहर ही खिलाने पिलाने का जिम्मा है सरकार के पास

बीमार करती हरी सब्जियां और बेबस सरकार
 
आक्सीटोन खा गया गिद्ध को
 
प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती सरकार आक्सीटोन पर
 
शीतल पेय के बाद अब हरी सब्जियां हुईं घातक
 
कहीं बाबा रामदेव का बिजनेस प्रमोशन का अंग तो नहीं है यह प्रोपोगंडा
 
(लिमटी खरे)

बचपन से एक ही बात कानों में गूंजती आई है, चाहे दादा दादी हों, नाना नानी या फिर और कोई बुजुर्ग। हर किसी ने कहा है कि बेटा हरी सब्जियां खाया करो, इससे आंखों की रोशनी तेज होती है, शरीर स्वस्थ्य रहता है, बीमारियां पास नहीं फटक पाती हैं। इक्कसीवीं सदी में इलेक्ट्रानिक मीडिया के चलते कमोबेश भगवान का दर्जा पाने वाले स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी लौकी को अमृत तुल्य की संज्ञा दे डाली। हरी सब्जियों के वे भी हिमायती रहे हैं। कालांतर में इन्हीं हरी सब्जियों में जहर की बात भी सामने आने लगी है।
 
पिछले कुछ दिनों से इलेक्ट्रानिक मीडिया चीख चीख कर आगाह कर रहा है कि हरी सब्जियां लेने जाएं या उनका सेवन करे तो पूरी पूरी सावधानी बरतें। इसमें जहर हो सकता है। यह जहर प्राकृतिक तौर पर तो नहीं था अब तक जाहिर है मानव द्वारा ही जल्दी और ज्यादा लाभ कमाने की प्रवृति ने उसे इस ओर धकेला है कि वह तो खुद ज्यादा लाभ कमाए पर बाकी लोगों की थाली में जहर परोसे।
 
मीडिया यह बात समाज के सामने ला रहा है कि हरी सब्जियों जैसे लौकी आदि में जहर है, विषाक्त लौकी खाने से एक व्यक्ति के काल के गाल में समाने तक की बात को कहा है मीडिया ने। मीडिया यह बात भी बता रहा है कि यह जहर एक विशेष प्रकार के ‘‘आक्सीटोन‘‘ नामक इंजेक्शन के सब्जियों में लगाने से पनपता है। यह वही आक्सीटोन का इंजेक्शन है, जिसे मवेशियों में लगाने से मवेशी अधिक मात्रा में दूध देते हैं।
 
यद्यपि यह बात अभी प्रमाणित नहीं हो सकी है कि इस आक्सीटोन का इंजेक्शन लागातार लगाने के उपरांत मरने वाले दुधारू मवेशी का मांस कितना भयानक जहर युक्त हो जाता है, किन्तु पिछले एक डेढ दशक में मरे पशुओं का मांस खाकर पर्यावरण की सफाई के पुरोधा माने जाने वाले गिद्ध का जिस तरह से अवसान हुआ है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन मवेशियों के मृत शरीर में जहर ही होता होगा जो गिद्ध अचानक ही विलुप्त प्रजाति की श्रेणी में आ गए हैं। वरना और कोई कारण नहीं है कि पर्यावरण के रक्षक इन गिद्धों का अचानक ही गायब हो गए हैं। गिद्ध का मांस भी कोई नहीं खाता है कि समझ लिया जाए कि गिद्ध का शिकार हो रहा हो।
 
दुधारू पशुओं के उपरांत अब आक्सीटोन का कहर हरी विटामिन युक्त सब्जियों पर टूट पडा है। जब यह बात साफ तौर पर साबित होने लगी है कि इन सारी बातों की जड में आक्सीटोन इंजेक्शन ही है, तो भारत गणराज्य की सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण महकमा आखिर इस जहर के प्रमुख स्त्रोत आक्सीटोन पर प्रतिबंध लगाने की कार्यवाही क्यों नहीं कर पा रहा है। जिस तरह नशे का इंजेक्शन सस्ता होने के साथ ही सहज सुलभ है, उसी तरह आक्सीटोन भी सहज सुलभ और सस्ता होने के चलते जहर का यह कारोबार बहुत ही तेजी से फल फूल रहा है। कहते हैं कि आक्सीटोन का इंजेक्शन लगाने से रातों रात में ही लौकी का साईज जीरो से फुल हो जाता है। भला कौन सा किसान या व्यवसायी न होगा जो रातों रात माल अंटी न करने की इच्छा रखता होगा।
 
वस्तुतः देश पर शासन करने वालों का प्रमुख दायित्व अपनी रियाया की जान माल की रक्षा करने का होता है, पर पिछले कुछ दशकों से एक बात साफ तौर पर उभरकर सामने आई है कि भारत गणराज्य पर राज करने वाले शासकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि भारत गणराज्य की उस जनता ने जिसने विशाल जनादेश देकर इन शासकों को कुर्सी पर बिठाया है उसकी कोई सुनवाई हो।
 
गौरतलब है कि शीलत पेय के मामले में भी भारत सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने पूरी तरह से घुटने ही टेके हुए है। शीतल पेय में कीटनाशक की मात्रा के अनुपात के मामले में आज भी भारत गणराज्य की सरकार द्वारा मानक तय नहीं किए जाना दुखद और आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। कुल मिलाकर सारी स्थिति परिस्थिति को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भारत गणराज्य की जनता को जहर खिलाना और पिलाना अब भारत सरकार का पहला दायित्व बनकर रह गया है।
 
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने पहले लोगों को योगा सिखाने के उपरांत लौकी का जूस पीने का मशविरा दिया। इसके बाद बाबा के अनुयायी और योग के दीवानों ने लौकी के कच्चे या पके जूस को पीना आरंभ कर दिया। अब जबकि लौकी में ही आक्सीटोन के चलते जहर की बात प्रचारित कर दी गई है तो अब लोग लौकी का जूस निकालकर पीने के स्थान पर ‘‘बाबा रामदेव‘‘ के पतांजली योग प्रतिष्ठान के ‘‘शुद्ध‘‘ लौकी के जूस का सेवन न करें तो क्या करें। हालात देखकर एसा भी लगता है मानो बाबा रामदेव ने अपने पतांजली के प्रोडक्ट को बाजार में स्थापित करने की गरज से तो मीडिया के माध्यम से इस तरह का प्रोपोगंडा तो नहीं करवाया जा रहा है।

एक बात और यह भी उभरकर सामने आई है कि जबसे मीडिया में कार्पोरेट सेक्टर संस्कृति ने अपने पैर जमाए हैं और ‘‘घराना पत्रकारिता‘‘ का आगाज हुआ है, तबसे मीडिया की बात पर देश के शासकों ने बहुत ज्यादा ध्यान और तवज्जो देना बंद ही कर दिया है। हमंे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज मीडिया चाहे जितना भी चीख चिल्ला ले पर शासकों पर इसका बहुत ज्यादा असर नहीं होता है, इसका कारण भारत गणराज्य में प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ में धनकुबेरों की संेध को ही माना जा सकता है। बहरहाल भारत सरकार को चाहिए कि ‘‘आक्सीटोन‘‘ नामक जहर के इंजेक्शन को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित दवा की श्रेणी में शामिल करे ताकि आवाम ए हिन्द मंहगाई और मिलावट के इस जमाने में कम से कम शुद्ध हरी सब्जियों और दूध का सेवन तो कर सके।

फोरलेन पर घडियाली आंसू

सीआरएफ की सडकों का बहिष्कार क्यांे नहीं करते जनसेवक
 
फोरलेन पर घडियाली आंसू पर जब केंद्रीय मदद की आती है बात तो भूल जाते हैं सिवनी के हक का मामला
 
(लिमटी खरे)

सिवनी। उत्तर दक्षिण गलियारे में पेंच नेशनल पार्क का पेंच फंसने के बाद जब भी जनाक्रोश भडकने की आशंका होती है, सिवनी जिले के सांसद विधायक घडियाली आंसू बहाना आरंभ कर देते हैं, किन्तु जब भी केंद्रीय सहायता से बनने वाली सीआरएफ (सेंट्रल रोड फंड) की सडकों की बात आती है, तो ये सारे सांसद विधायक उन्हें लपकने लालायित ही दिखते हैं। वस्तुतः अगर सिवनी के हितों की इतनी ही चिंता में ये जनसेवक दुबले हुए जा रहे हैं तो फोरलेन के अडंगे के हटने तक इन्हें केंद्रीय सहायता से बनने वाली सडकों का बहिष्कार करना चाहिए।
 
गौरतलब है कि मुगल शासक शेरशाह सूरी के जमाने के इस मार्ग जिसे अब उत्तर दक्षिण गलियारे की संज्ञा दे दी गई है, से होकर आदि शंकराचार्य ने भी गमन किया था। इस सडक में पेंच नेशनल पार्क के महज नौ किलोमीटर के हिस्से के कथित तौर पर विवादित होने के उपरांत इसके निर्माण का काम रोक दिया गया है। सडक निर्माण में फंसा पेंच मूलतः भूतल परिवहन मंत्रालय और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के बीच अहं की लडाई का एक हिस्सा बन गया बताया जा रहा है।
 
अप्रेल माह में एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि सिवनी की जनता चाहती है कि यह मार्ग सिवनी से होकर जाए किन्तु उन्हें मौके पर जाकर (संभागीय मुख्यालय जबलपुर जाकर) देखा और पाया कि यह पेंच कारीडोर को काट रही है, इसलिए उन्होंने इस मार्ग को रेड लाईट दिखाकर रोक दिया है। मामला किसने और किसके आदेश से रूका है, यह अनसुलझी पहेली आज भी सिवनी जिले की भोली भाली जनता के मानस पटल में घूम रही है।
 
जितने मुंह उतनी बात की तर्ज पर जिसके मन में जो आ रहा है, वह वैसी कहानी गढकर जनता के समक्ष प्रस्तुत करने से नहीं चूक रहा है। वहीं दूसरी ओर एक और खुलासे से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री के दावे की हवा निकल जाती है जिसमें इसी कारीडोर से होकर गुजरने वाले बालाघाट से जबलपुर नेरोगेज के अमान परिवर्तन को वन विभाग द्वारा हरी झंडी दे दी जाती है। मतलब साफ है कि जयराम रमेश की नजरों में सिवनी से होकर गुजरने वाला उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारा तो वन्य जीवों पर प्रतिकुल प्रभाव डाल रहा है पर इसी कारीडोर से होकर गुजरने वाली रेल लाईन से इन वन्य प्राणियों को कोई असर होने वाला नहीं। एक ही मामले में दो तरह का रवैया समझ से परे ही कहा जाएगा।
 
सिवनी जिले से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के बालाघाट के सांसद के.डी.देशमुख, मण्डला के कांग्रेसी सांसद बसोरी मसराम द्वारा एक साल पूरा होने पर भी इस मामले में संसद में प्रश्न न लगाने से उनकी भूमिका जिलावासियों की नजरों में तो संदिग्ध हो ही चुकी है, साथ ही साथ भाजपा की सिवनी विधायक श्रीमति नीता पटेरिया, लखनादौन की शशि ठाकुर, बरघाट के कमल मस्कोले सहित केवलारी के इकलौते कांग्रेसी विधायक ठाकुर हरवंश सिंह ने भी विधानसभा का ध्यान इस ओर आकर्षित नहीं कराया है, जिससे जनमानस में इनका जनादेश के प्रति सम्मान साफ परिलक्षित होने लगा है।
 
उल्लेखनीय होगा कि भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा जब भी इन जनसेवकों के सामने प्रलोभन के तौर पर सीआरएफ मद से सडक निर्माण की बात रखी जाती है, तो ये सभी फोरलेन विवाद को बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेय की तर्ज पर फोरलेन को भूलकर अपने अपने क्षेत्र को समृद्ध करने की जुगत लगाने लग जाते हैं। ये सारे जनसेवक यह भूल जाते हैं कि यह मार्ग लखनादौन, केवलारी, सिवनी, बरघाट विधान सभा क्षेत्र के साथ ही साथ मण्डला और बालाघाट संसदीय क्षेत्र से होकर भी गुजर रही है, जिसकी रक्षा करना इन जनसेवकों की पहली प्राथमिकता होना चाहिए।

कहा जा रहा है कि फोरलेन मामले में जनसेवकों का ध्यान फोरलेन प्रकरण से भटकाने हेतु सांसद विधायकों के सामने जलेबी लटकाने के लिए कंेद्र में बैठे नुमाईंदों द्वारा केंद्रीय सडक निधी की सडकों को परोस दिया जाता है। जैसे ही इन सडकों की बात आती है, सांसद विधायकों द्वारा एतिहासिक महत्व के इस उत्तर दक्षिण गलियारे के पेंच नेशनल पार्क के प्रकरण को ठंडे बस्ते में डाल कर केंद्रीय सडक निधि का झुनझुना पकड लिया जाता है।

देश के 61 जिलों की नहीं है अपनी वेवसाईट

इक्कीसवीं सदी में नहीं पहुंच सका है भारत गणराज्य
 
सेट फारमेट के अभाव में विभिन्न तरह की हैं वेव साईट्स
 
वेव साईट तो हैं पर अपडेट नहीं होती
 
(लिमटी खरे)

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भविष्यदृष्टा की अघोषित उपाधि पाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सबसे पहले इक्कीसवीं सदी में जाने की परिकल्पना कर लोगों को अत्याधुनिक उपकरणों आदि के बारे में सपने दिखाए थे। आज वास्तव में उनकी कल्पनाएं साकार होती दिख रही हैं। विडम्बना यह है कि स्व.राजीव गांधी की अर्धांग्नी पिछले एक दशक से अधिक समय से कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं किन्तु कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ही आज इक्कीसवीं सदी में नहीं पहुंच सकी है।
 
आधुनिकता के इस युग में जब कम्पयूटर और तकनालाजी का जादू सर चढकर बोल रहा है, तब भारत गणराज्य भी इससे पीछे नहीं है। भारत में आज कंप्यूटर इंटरनेट का बोलबाला हर जगह दिखाई पड जाता है। जिला मुख्यालयों में भले ही बिजली कम ही घंटों के लिए आती हो पर हर एक जगह इंटरनेट पार्लर की धूम देखते ही बनती है। शनिवार, रविवार और अवकाश के दिनों में इंटरनेट पार्लर्स पर जो भीड उमडती है, वह जाहिर करती है कि देशवासी वास्तव में इंफरमेशन तकनालाजी से कितने रूबरू हो चुके हैं।
 
भारत गणराज्य की सरकार द्वारा जब भी ‘ई गवर्नंस‘ की बात की जाती है तो हमेशा एक ही ख्वाब दिखाया जाता है कि ‘‘अब हर जानकारी महज एक क्लिक पर‘‘, किन्तु इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। देश के कुल 626 जिलों में से 565 जिलों की अपनी वेव साईट है, आज भी 61 जिले एसे हैं जिनके पास उनकी आधिकारिक वेव साईट ही नहीं है। भारत में अगर किसी जिले के बारे में कोई जानकारी निकालना हो तो इंटरनेट पर खंगालते रहिए, जानकारी आपको मिलेगी, पर आधिकारिक तौर पर कतई नहीं, क्योंकि वेव साईट अपडेट ही नहीं होती है।
 
ई गवर्नंस के मामले में सबसे खराब स्थिति बिहार की है। बिहार के 38 जिलों में से महज 6 जिलों की ही आधिकारिक वेव साईट है, जबकि यहां के मुख्यमंत्री नितीश कुमार खुद ही अपने ब्लाग पर लोगो से रूबरू होते हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश के 23 में से 19, असम के 27 में से 24, छत्तीसगढ के 18 में से 16, झारखण्ड के 24 में से 20, कर्नाटक के 28 में से 27, मध्य प्रदेश के 50 में से 49, मिजोरम में 8 में पांच, पंजाब में 20 में 18 और तमिलनाडू के 31 में से 30 जिलों की अपनी वेव साईट है।
 
भारत गणराज्य के जिलों में आधिकारिक वेव साईट के मामले में सबसे दुखदायी पहलू यह है कि केंद्र सरकार के डंडे के कारण वेव साईट तो बना दी गई हैं, किन्तु इन्हें अद्यतन अर्थात अपडेट करने की फुर्सत किसी को नहीं है। जिलों में बैठे अप्रशिक्षित कर्मचारियों के हाथों में इन वेव साईट्स को अपडेट करने का काम सौंपा गया है, जिससे सब ओर अपनी ढपली अपना राग का मुहावरा ही चरितार्थ होता नजर आ रहा है।
 
वस्तुतः समूचा मामला ही केंद्रीय मंत्रालयों के बीच अहं की लडाई का है। अदूरदर्शिता के चलते सारा का सारा गडबडझाला सामने आने लगा है। जब नेशनल इंफरमैटिक संेटर (एनआईसी) का गठन ही कंप्यूटर इंटरनेट आधारित प्रशासन को चलाने के लिए किया गया है तब फिर इस तरह का घलमेल क्यों? एनआईसी का कहना है कि उसका काम मूलतः किसी मंत्रालय या जिले की अथारिटी के मशविरे के आधार पर ही वेव साईट डिजाईन करने का है। इसे अद्यतन करने की जवाबदारी एनआईसी की नहीं है।
 
देखा जाए तो एनआईसी के जिम्मे ही वेव साईट को अपडेट किया जाना चाहिए। जब देश के हर जिले में एनआईसी का एक कार्यालय स्थापित है तब जिले की वेव साईट पर ताजा तरीन जानकारियां एनआईसी ही करीने से अपडेट कर सकता है। चूंकि इंटरनेट  और कम्पयूटर के मामले में जिलों में बहुत ज्यादा प्रशिक्षित स्टाफ की तैनाती नहीं है इसलिए या तो ये अपनी अपनी वेव साईट अपडेट नहीं कर पाते हैं, या फिर तकनीक की जानकारी के अभाव के चलते करने से कतराते ही हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में गौतम बुद्ध नगर पूर्व में (नोएडा) में न्यू का एक साईन लिए टेंडर नोटिस लगा हुआ है, जिसमें 2008 का एक टेंडर जो 2009 में जारी कर दिया गया है आज भी विद्यमान है। इसी तरह अनेक जिलों की वेव साईट में भी सालों पुरानी जानकारियां आज भी लगी हुई हैं।
 
इसके अलावा एक और समस्या मुख्य तौर पर लोगों के सामने आ रही है। हर जिले की वेव साईट अलग अलग स्वरूप या फार्मेट में होने से भी लोगों को जानकारियां लेने में नाकों चने चबाने पड जाते हैं। फार्मेट अलग अलग होने से लोगों को जानकारियां जुटा पाना दुष्कर ही प्रतीत होता है। अगर शिक्षा पर ही जानकारियां जुटाना चाहा जाए तो अलग अलग जिलों में प्रदेश के शिक्षा बोर्ड और कंेद्रीय शिक्षा बोर्ड के अधीन कितने स्कूल संचालित हो रहे हैं, उनमें कितने शिक्षक हैं, कितने छात्र छात्राएं हैं, यह जानकारी ही पूरी तरीके से उपलब्ध नहीं हो पाती है।
 
दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू काश्मीर, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, उडीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल आदि सूबों में शत प्रति जिलों की अपनी वेव साईट हैं, पर यह कोई नहीं बात सकता है कि ये कब अद्यतन की गई हैं। लचर व्यवस्था के चलते सरकारी ढर्रे पर चलने वाली इन वेव साईट्स से मिलने वाली आधी अधूरी और पुरानी जानकारी के कारण लोगों में भ्रम की स्थिति निर्मित होना आम बात है।

देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसने देश पर आधी सदी से अधिक तक राज किया है को चाहिए कि देश भर के समस्त जिलों, संभागों की आधिकारिक वेव साईट को एक सेट फार्मेट में बनाए, और इसको अपडेट करने की जवाबदारी एनआईसी के कांधों पर डालें क्योंकि इंफरमेशन टेक्नालाजी के मामले में एनआईसी के बंदे ही महारथ हासिल रखते हैं। इसके साथ ही साथ केंद्र सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये वेव साईट समय समय पर अपडेट अवश्य हों, इसके लिए जवाबदेही तय करना अत्यावश्यक ही है, वरना आने वाले समय में लोग कांग्रेस के भविष्य दृष्टा स्व.राजीव गांधी के बाद वाली नेहरू गांधी परिवार की पीढी को बहुत इज्जत, सम्मान और आदर की नजर से देखेंगे इस बात में संदेह ही है।

फोरलेन विवाद का सच ------------01

आखिर क्या है फोरलेन विवाद
 
सडक बचाने के ठेकेदार क्यों बच रहे हैं जनसामन्य को विवाद के बारे में विस्तार से बताने से!
 
आखिर हंगामा क्यों है बरपा, कोई क्यों नहीं जानता?
 
दलगत भावना से उपर उठकर जनसेवकों की भूमिकाओं को किया जाना चाहिए सार्वजनिक
 
(लिमटी खरे)
 
सिवनी। जून 2009 के उपरांत भगवान शिव की सिवनी नगरी में हर किसी की जुबान पर बस एक ही बात है, कि फोरलेन को सिवनी से छिंदवाडा ले जाने के षणयंत्र का ताना बाना बुना जा रहा है। आखिर क्या विवाद है फोरलेन का कि सारा का सारा जिला इससे व्यथित है। बार बार बंद का आव्हान किया जा रहा है। लोग अपनी भावनाएं प्रदर्शित कर रहे हैं, पर फोरलेन विवाद आखिर है क्या? इसको बचाने के बारे में अब तक क्या प्रयास किए गए हैं? इस बारे में सडक को बचाने हेतु आगे आए ठेकेदार बचते ही नजर आ रहे हैं। ले देकर इस मामले में एक ही राजनेता ‘‘भूतल परिहन मंत्री कमल नाथ‘‘ को दोषी ठहराने और बचाने के लिए ही विज्ञप्ति युद्ध लडा जाकर अपनी सारी उर्जा नष्ट की जा रही है।

बताते हैं कि मुगल शासक शेरशाह सूरी के शासनकाल में व्यापार एवं आवागमन के उद्देश्य से जिस सडक का निर्माण किया गया था, कालांतर में वह सडक देश का सबसे व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात में तब्दील हो गया। इस मार्ग पर यातायात का दवाब सर्वाधिक महसूस किया जाता रहा है।
 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजयेयी के शासनकाल में दो परियोजनाओं का खाका प्रमुख तौर पर तैयार किया गया था। इसमें नदी जोडने और देश के चारों महानगरों को सडक मार्ग से जोडने की कार्ययोजना पर काम आरंभ हुआ था। नदी जोडना तो संभव नहीं हो पाया किन्तु दिल्ली, कोलकता, चेन्नई और मुंबई को आपस में जोडने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज मार्ग की कल्पना को साकार करना आरंभ कर दिया गया था।

समय गुजरने के साथ ही दिल्ली से चेन्नई और मुंबई सेे कोलकता जाने वाले लोगों को लंबे चक्कर से बचाने की बात भी सरकार के ध्यान में लाई गई, जिसके परिणाम स्वरूप उत्तर दक्षिण और पूर्व पश्चिम गलियारे की कल्पना हुई जिसे मूर्त रूप देना आरंभ किया गया। जैसे ही उत्तर दक्षिण गलियारे के मानचित्र पर मध्य प्रदेश उभरा वैसे ही मध्य प्रदेश के अनेक क्षत्रप इस दिशा में प्रयासरत हो गए कि यह गलियारा उनके कार्य क्षेत्र से होकर गुजरे। चूंकि मामला राष्ट्रीय स्तर पर था और इसमें मध्य प्रदेश के क्षत्रपांे की मंशा भी स्पष्ट होती जा रही थी, अतः देश के बाकी क्षत्रपों ने इस उत्तर दक्षिण गलियारे के एलाईनमंेट से छेडछाड करने का पुरजोर विरोध किया। यही कारण था कि मध्य प्रदेश के स्वयंभू क्षत्रपों की मंशा के बावजूद यह सिवनी जिले से होकर गुजरना प्रस्तावित किया गया।

केंद्र में डॉ.मनमोहन सिंह जब दूसरी मर्तबा प्रधानमंत्री बने तब भूतल परिवहन मंत्रालय की महती जवाबदारी सिवनी के पडोसी जिले छिंदवाडा के सांसद कमल नाथ को सौंपी गई। राज्य सभा में कमल नाथ ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी कि वे चाहते थे कि यह गलियारा उनके संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा से होकर जाए, किन्तु जब उन्हें बताया गया कि नरसिंहपुर से बरास्ता ंिछंदवाडा, नागपुर चूंकि नेशनल हाईवे नहीं है, अतः इसे छिंदवाडा से होकर गुजारा नहीं जा सकता है, तब वे शांत हो गए।
 
इसी बीच मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार ने चंद सडकों को राज्य के मार्ग के स्थान पर नेशनल हाईवे में तब्दील करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा। इन प्रस्तावों में नरसिंहपुर से छिंदवाडा होकर नागपुर मार्ग भी शामिल किया गया था। बताते हैं कि इस मार्ग पर वैसे तो इतना यातायात नहीं है कि इस मार्ग का उन्नयन कर इसे नेशनल हाईवे बनाया जाए, किन्तु किसी ‘‘खास रणनीति या जुगलबंदी‘‘ के तहत इसे प्रस्ताव में शामिल करवा दिया गया।

संयोग से यह नेशनल हाईवे भी फोरलेन में बनना प्रस्तावित किया गया। चूंकि उत्तर दक्षिण गलियारे को फोरलेन की संज्ञा दी जा चुकी थी अतः लोगों के मानस पटल पर यह बात घर कर गई कि यही गलियारा अब नेशनल हाईवे जो नरसिंहपुर से नागपुर प्रस्तावित है, में तब्दील हो जाएगा। यही कारण है कि सिवनी वासियों ने भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को पानी पी पी कर कोसना आरंभ कर दिया। विडम्बना तो यह थी कि कमल नाथ के नाम पर देश प्रदेश में राजनीति करने वाले और उनका झंडा उठाकर ‘‘जय जय कमल नाथ‘‘ के नारे बुलंद करने वालों ने भी कमल नाथ की खाल बचाने की जहमत नहीं उठाई, और न ही वास्तविकता ही सामने लाने का प्रयास किया गया कि आखिर फोरलेन विवाद है क्या? और किसके कहने या रोकने अथवा अनुमति न देने के कारण इस गलियारे का काम रूका हुआ है।

वस्तुतः यह काम फोरलेन बचाने का ठेका लेने वाले गैरसरकारी संगठनों जिसे राजनैतिक रंग दिया जाने लगा है, का काम था कि जिले की जनता को यह बताए कि वास्तव में फोरलेन विवाद है क्या? और इसका काम आरंभ न हो पाने में भूतल परिहन मंत्री कमल नाथ, वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जिले के सांसद के.डी.देशमुख, बसोरी सिंह मसराम, पांच में से चार बचीं विधानसभा क्षेत्रों के विधायक ठाकुर हरवंश सिंह, श्रीमति नीता पटेरिया, श्रीमति शशि ठाकुर, कमल मस्कोले की क्या भूमिका है? यह सब होना चाहिए दलगत भावना से उपर उठकर, किन्तु दुख का विषय तो यह है कि इन सारी बातों को जनता जनार्दन के सामने रखने के बजाए हर बार माननीय सर्वोच्च न्यायालय का भय बताकर ही सभी ने अपने अपने कर्तव्यों की इतीश्री कर ली।
(क्रमशः जारी)