शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

शूलों भरी राह है अजय कांति की

शूलों भरी राह है अजय कांति की

(लिमटी खरे)

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उहापोह, मशक्कत, मेराथन बैठकों के दौर के उपरांत अंततः मध्य प्रदेश कांग्रेस कमैटी के अध्यक्ष, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के नामों पर हरी झंडी दे ही दी गई है। दोनों ही पद पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के खाते में गए हैं। दिग्विजय सिंह का सक्रिय राजनीति से वनवास का समय पूरा होने में अब तीन साल से भी कम समय बचा है। मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर दिग्विजय सिंह धूमकेतू बनकर उभर रहे हैं, जिनके सामने प्रदेश के अन्य क्षत्रप दीप्तमान नजर नहीं आ रहे हैं।

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1993 से 2003 तक मध्य प्रदेश में राजनैतिक बिसात पर वही पांसे चले जो राजा दिग्विजय ने चाहे। इस दौरान प्रदेश के तत्कालीन ताकतवर क्षत्रप स्व.माधवराव सिंधिया को अपना संसदीय क्षेत्र बदलने पर मजबूर होना पड़ा। कुंवर अर्जुन सिंह की भी कमोबेश यही हालत रही वे विन्धय के उपरांत नर्मदांचल में होशंगाबाद से मुंह की खाने के बाद बरास्ता राज्यसभा संसद पहुंचे। श्यामा और विद्याचरण शुक्ल के साथ ही साथ अजीत जोगी के आभामण्डल को नेस्तनाबूत कर दिया गया। यहां तक कि दिग्विजय सिंह के तारण हार और बड़े भाई की भूमिका निभाने वाले कमल नाथ को उपचुनाव में पराजय का मुंह देखना पड़ा। वह भी तब जब ब्लाक स्तर पर मंत्रियों की तैनाती थी। यह सब महज संयोग नहीं माना जा सकता है। इसके पीछे इक्कीसवीं सदी के उभरते कांग्रेस के राजनैतिक चाणक्य का शातिर दिमाग ही काम कर रहा था।

2003 में चुनावों में औंधे मुंह गिरी कांग्रेस के निजाम राजा दिग्विजय सिंह ने दस सालों तक सक्रिय राजनीति से तौबा करने का कौल लिया था। दिग्गी राजा ने चुनाव न लड़कर अब तक उसे निभाया है। अब वनवास समाप्त हाने की बेला आ रही है, इसलिए उनकी सक्रियता को समझा जा सकता है। देश के हृदय प्रदेश में अपना वर्चस्व बरकरार रखने के लिए वे अपने प्यादों को यहां करीने से फिट करते जा रहे हैं। कांतिलाल भूरिया को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के बाद अजय सिंह की विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर नियुक्ति इसका अभिनव उदहारण माना जा सकता है।

अपनी नियुक्ति के साथ ही अजय सिंह और भूरिया गदगद हुए बिना नहीं होंगे किन्तु उनके सामने की चुनौतियां उनके इस सफर का मजा खराब कर सकती हैं। आपसी कलह में तार तार हो चुकी प्रदेश कांग्रेस में अनेक जिलों में अब कांग्रेस के नामलेवा नहीं बचे हैं। कांग्रेस के आला नेताओं और भजपा के आलंबरदारों की जुगलबंदी से मध्य प्रदेश में कांग्रेस रसातल में ही है। सुरेश पचौरी के हटते ही कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरूण यादव जैसे धुरंधरों की अति सक्रियता से कार्यकर्ताओं में जोश अवश्य ही आएगा किन्तु वह कितने समय तक टिक पाएगा कहा नहीं जा सकता है।

नवनियुक्त नेताओं के सामने प्रदेश का भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौति बनकर उभरेगा। अफसरशाही, लाल फीताशाही और बाबूराज के बेलगाम दौड़ते घोड़ों की लगाम कसना बहुत ही दुष्कर काम है। जब नेता प्रतिपक्ष का फैसला ही सात माहों के की लंबी मशक्कत के बाद हुआ हो तब मध्य प्रदेश के क्षत्रपों की सहमति की डोर कितनी महीन होगी इस बात को समझा जा सकता है। माना जा रहा है कि अब तक पीसीसी और भाजपा के बीच आपसी ‘‘अंडरस्टेंडिग‘‘ गजब की थी, यही कारण था कि सब कुछ देखने सुनने के बाद भी और अनेक सुनहरे मौकों के बावजूद भी प्रदेश कांग्रेस ने कभी भी भाजपा को व्यापक स्तर पर घेरने का प्रयास नहीं किया। कार्यकर्ताओं में आम धारणा घर कर चुकी है कि भाजपा के आला नेताओं के इशारे पर कांग्रेस और कांग्रेस के चुनिंदा नेताओं के इशारों पर भाजपा चल रही है।

भूरिया के अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार भोपाल आगमन के एन पहले प्रदेश भाजपाध्यक्ष प्रभात झा ने उन्हें अपना एक समझदार मित्र बताकर पांच पन्नों की पाती लिख दी। झा के पत्र से यही संदेश जा रहा है कि आने वाले समय में एक बार फिर प्रदेश में कांगेस बिना दांत के ही चलने वाली है। कांग्रेस की धार बीते सात सालों मंे पूरी तरह से बोथरी हो चुकी है जिसे पजाना आसान नहीं होगा। गुटों में बटी कांग्रेस को एक सूत्र में पिरोना दोनों ही नवागंतुक पदाधिकारियों के लिए टेढ़ी खीर ही साबित होने वाला है। विधानसभा चुनावों में अभी ढाई बरस का समय है। मध्य प्रदेश में आदिवासी नेतृत्व को उभारकर आला कमान ने जो भी संदेश देना चाहा हो किन्तु मध्य प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की स्मृति इतनी कमजोर नहीं है कि वे इस बात को भूल जाएं कि भूरिया ने बतौर सांसद और केंद्रीय मंत्री मध्य प्रदेश के कितने जिलों का दौरा किया है। जब खुद कांतिलाल भूरिया ही सालों साल निष्क्रीय या क्षेत्र विशेष में समिटकर रह गए हों तब उनके निजाम बनते ही रातों रात कायापलट संभव प्रतीत नहीं होता है।

अजय सिंह और कांतिलाल भूरिया के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों ही की छवि अब तक प्रदेश स्तरीय नेता की भी नहीं बन पाई है। भूरिया मालवांचल तो अजय सिंह विन्धय प्रदेश तक ही सीमित समझे जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष रहे अजय सिंह ने चुनावों के दौरान भी समूचे प्रदेश में आमद नहीं दी। दोनों ही नेताओं को सभी गुटों को साथ लेकर चलना सबसे बड़ी चुनौति होगा, क्योंकि काग्रेस में शिख से लेकर नख तक इतनी शाखाएं और गुटबाजी है कि इस तरह की खरपतवार को नष्ट करना आसान बात नहीं होगा। भूरिया ओर अजय सिंह के सामने यह चुनौति भी कम नहीं होगी कि उन्हें मनराखनलाल हरवंश सिंह, महंेंद्र सिंह कालूखेड़ा, सज्जन सिंह वर्मा, हुकुम सिंह कराड़ा, चौधरी राकेश सिंह, एन.पी.प्रजापति, गोविंद सिंह, सात बार के विधायक प्रभुदयाल गहलोत, माणक अग्रवाल जैसे धुरंधरों को भी साधना होगा।

एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल जबर्दस्त तरीके से गिरा है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस के सामने अभी मण्डलेश्वर और जबेरा उपचुनाव के साथ ही साथ अर्जुन सिंह के निधन से रिक्त हुई राज्य सभा की सीट को जीतना परीक्षा से कम नहीं है। माना कि दोनों ही नेताओं के मौखटे के पीछे राजा दिग्विजय सिंह का चेहरा हो पर दोनों ही नेताओं को अब एक एक कदम फूंक फूंक कर ही रखना होगा, वरना आने वाले सालों में काग्रेस को जिंदा करना ही अपने आप में बहुत बड़ा मिशन बनकर रह जाएगा।

अर्जुन के बदले राज्य सभा में जा सकती हैं वीणा सिंह

वीणा से निकलेगी भाजपाई धुन

जमे जकड़े परिवारों पर नजर रही है भाजपा की

अर्जुन परिवार का दबदबा रह सकता है कायम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह के अवसान से रिक्त हुई राज्य सभा सीट के लिए भाजपा द्वारा उनकी पुत्री वीणा सिंह को तैयार करने की कवायद की जा रही है। उधर कांग्रेस द्वारा अर्जुन पुत्र अजय को मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया है। सब कुछ अगर ठीक ठाक रहा तो आने वाले समय में ठाकुर परिवार का दबदबा एक बार फिर कायम दिखेगा। कांग्रेस ओर भाजपा दोनों के द्वारा ही अर्जुन सिंह की विरासत को अपने दामन में सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।

कांग्रेस में चल रही बयार के अनुसार देश भर विशेषकर मध्य प्रदेश में कुंवर अर्जुन सिंह के समर्थकों की बड़ी तादाद को देखकर आला नेता उनके परिवार की उपेक्षा करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। उधर कांग्रेस में इक्कीसवीं सदी के चाणक्य दिग्विजय सिंह द्वारा भविष्य की स्थिति को भांपते हुए अजय सिंह पर दांव लगा ही दिया है। आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के प्रदेशाध्यक्ष बनते ही अजय सिंह को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जवाबदारी सौंप दी गई है।

उधर मध्य प्रदेश में भाजपा के बहुमत में होने से माना जा रहा है कि अर्जुन सिंह के अवसान से रिक्त होने वाली सीट पर भाजपा समर्थित उम्मीदवार ही विजयी होगा। भाजपा भी अर्जुन सिंह की विरासत को अपनाने आतुर दिख रही है यही कारण है कि भाजपा चाह रही है कि अर्जुन सिंह की पुत्री वीणा सिंह को राज्य सभा से मैदान में उतारकर अर्जुन समर्थकों का भाजपाईकरण किया जा सके।

भाजपा द्वारा कांग्रेस के जमे जकड़े परिवारों पर नजरें इनायत की जाती रहीं हैं। गौरतलब होगा कि हाल ही में मध्य प्रदेश की नेता प्रतिपक्ष श्रीमति जमुना देवी के निधन से रिक्त हुई कुक्षी विधानसभा के लिए भाजपा द्वारा उनके परिजनों पर डोरे डालने का प्रयास भी किया गया था। अब भाजपा के निशाने पर वीणा सिंह हैं।



गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

कमल नाथ, दिग्गी, ज्योतिरादित्य, अरूण यादव ने बनाया एकजुट होने का मन


पचौरी को घेरने एकजुट हुए क्षत्रप

भोज मामले में नप सकते हैं हरवंश
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। लगातार चौबीस बरस तक राज्य सभा के रास्ते संसदीय सौंध तक पहुंचने वाले कांग्रेस के मध्य प्रदेश के निर्वतमान प्रदेशाध्यक्ष सुरेश पचौरी के खिलाफ केंद्र में सक्रिय मध्य प्रदेश के आला दिग्गज अब एकजुट होने लगे हैं। केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया की एमपीसीसी चीफ के पद पर हुई ताजपोशी के उपरांत मध्य पदेश के क्षत्रपों ने एक ही विमान से मध्य प्रदेश आने की सहमति देकर जता दिया है कि वे मध्य प्रदेश में कांग्रेस को जिलाने के लिए एकजुट हो गए हैं। माना जा रहा है कि सुरेश पचौरी से खफा इन नेताओं द्वारा अब तक जानबूझकर अपनी कर्मभूमि वाले प्रदेश से दूरी बनाई गई थी।
गौरतलब होगा कि पचौरी के एमपीसीसी चीफ बनने के बाद कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह अनेक मर्तबा मध्य प्रदेश आए किन्तु उन्होंने प्रदेश कांग्रेस कमेटी जाने की जहमत नहीं उठाई। दिग्गी राजा द्वारा काफी हाउस में पत्रकारों ेस चर्चा हंसी ठठ्ठा किया जाता रहा है और श्यामला हिल्स स्थित अपने आवास पर कार्यकर्ताओं ेस भेंट, किन्तु पीसीसी कार्यालय जाना उन्होंने कभी उचित नहीं समझा। इसी तरह केंद्रीय मंत्री कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरूण यादव यहां तक कि खुद कांतिलाल भूरिया ने भी सुरेश पचौरी के कार्यकाल में पीसीसी से पर्याप्त दूरी बनाकर रखी थी।
2008 में राज्य सभा का कार्यकाल समाप्त होने के उपरांत सुरेश पचौरी को लोकसभा की टिकिट मिलने में भी दिग्गज ही आड़े आए। इतना ही नहीं दुबारा राज्य सभा जाने के रास्ते में भी मध्य प्रदेश के क्षत्रप ही आड़े आते रहे हैं। भूरिया के हाथों में एमपीसीसी की कमान आते ही प्रदेश के क्षत्रप एक बार पुनः एकजुट होते नजर आ रहे हैं जिससे साफ हो रहा है कि इन दिग्गजों ने जानबूझकर मध्य प्रदेश में कांग्रेस को रसातल में जाने के मार्ग ही प्रशस्त किए हैं। शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के उड़न खटोले जिसे मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने किराए से लिया है, पर सवार होकर एमपी के क्षत्रप भूरिया की ताजपोशी में शामिल होंगे।
उधर प्रवक्ता माणक अग्रवाल भी अब काफी हद तक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। वहीं विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह पर भी कांग्रेस के घोर विरोध के बाद राजा भोज समारोह में मंचासीन होने के आरोप उन्हें सता रहे हैं। माना जा रहा है कि अजय सिंह के पाले में विधानसभा नेता प्रतिपक्ष का पद आने के बाद अब जाति के क्षत्रिय ठाकुर हरवंश सिंह की विधानसभा उपाध्यक्ष पद से बिदाई सुनिश्चित है। हरवंश सिंह से नाराज आला नेताओं ने उन्हें एमपीसीसी में ही कहीं एडजस्ट कराकर उनका कद कम करने का प्रयास किए जाने की खबरें भी जोर पकड़ने लगी हैं।
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी की आधिकारिक वेब साईट पर पूर्व अध्यक्षों की फेहरिस्त कुछ और कहानी बयां कर रही है कि उनके कार्यकाल में पीसीसी की आईटी विंग पूरी तरह से ही निष्क्रीय रही है। पूर्व अध्यक्षों में आज तक 33वें नंबर पर अंतिम निर्वाचित अध्यक्ष सुभाष यादव को 30 जून 2005 से अध्यक्ष दर्शाया गया हैै। मजे की बात तो यह है कि इस बोर्ड के इर्द गिर्द पान की पीकें भी साफ दिखाई दे रही हैं। पचौरी के सहयोगियों ने पूर्व अध्यक्षों के नाम और कार्यकाल टाईप कर उसे वेब साईट पर अपलोड करना भी मुनासिब नहीं समझा।

केंद्रीय मंत्रियों से मिले गौर


केंद्रीय मंत्रियों से मिले गौर
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री बाबूलाल गौर ने कल यहां केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री कमल नाथ से मुलाकात कर प्रदेश से जुड़े पर्यावरण एवं शहरी विकास से संबंधित प्रकरणों के शीघ्र निदान के लिए आग्रह किया।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार बाबूलाल गौर ने केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से मुलाकात कर बताया कि भोपाल गैस त्रासदी पर गठित मंत्री समूह की अनुशंसाओं के अनुसार गैस दावा अदालतों द्वारा 700 करोड़ रूपये में से गैस पीड़ितों को अब तक 300 करोड़ रूपये की राशि वितरित की जा चुकी है। श्री गौर ने गैस त्रासदी के स्मारक के निर्माण के संबंध में भी चर्चा की और पर्यावरण संबंधी बैठक पुनः शीघ्र  बुलाये जाने का आग्रह किया।
इसके साथ ही साथ उन्होंने केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री कमल नाथ से मुलाकात कर प्रदेश में जे.एन.एन.यू.आर.एम. के तहत केन्द्र सरकार में लंबित विभिन्न योजनाओं की किश्तांें एवं केन्द्र सरकार द्वारा पुनरीक्षित योजनाओं को शीघ्र स्वीकृति देने का आग्रह किया। उन्होंने छोटे तथा मझोले शहरों की पूर्व से प्रेषित योजनाओं के संबंध में स्वीकृति एवं राशि विमुक्त करने का भी अनुरोध किया। उन्होंने बताया कि छोटे एवं मझोले शहरों की आदिवासी बाहुल्य निकायों की भी योजनाएं राज्य सरकार द्वारा तैयार करायी गयी हैं जिससे प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों की नगरीय निकायों के जल संकट की समस्या का निवारण हो सके। श्री गौर ने उक्त योजनाओं के लिए शीघ्र स्वीकृति का अनुरोध किया। श्री गौर ने भाजपा महासचिव श्री अरूण जेटली से भी सौजन्य मुलाकात की। इस अवसर पर भोपाल की मेयर श्रीमती कृष्णा गौर भी उनके साथ थीं।

प्लास्टिक पाउच में नहीं बिकेगा गुटखा


प्लास्टिक पाउच में नहीं बिकेगा गुटखा
नई दिल्ली (ब्यूरो)। प्लास्टिक पाउच में बिर रहे गुटखा और पान मसाला की प्लास्टिक पैकिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक जारी रखी है। गुटखे से सेहत तथा प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान का मुद्दा उठाने वाले संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं (एनजीओ), को भी पक्षकार बना लिया है। कोर्ट ने पान मसाला गुटखा उद्योग को भी पक्षकार के तौर पर शामिल करते हुए अपनी बात रखने की इजाजत दी है।
बुधवार को न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी एवं न्यायमूर्ति के.एस. राधाकृष्णन की पीठ ने प्लास्टिक पैकिंग पर रोक हटाने से इंकार करते हुए सभी आवेदकों की पक्षकार बनने की मांग स्वीकार कर ली। पीठ ने कहा कि वे सभी का पक्ष सुनेंगे। कोर्ट ने पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से गुटखा के अलावा बाकी उत्पादों की प्लास्टिक पैकिंग पर भी रोक लगाने की गैर सरकारी संगठन दिल्ली स्टडी ग्रुप की मांग पर सरकार से जवाब मांगा है।
इससे पहले इंडियन डेंटल एसोसिएशन के वकील ने स्वास्थ्य का मुददा उठाते हुए मामले में पक्षकार बनाए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन लगातार गुटखे के नुकसान के प्रति लोगों को सचेत करती रही है और इसके खिलाफ मुहिम चलाती रही है। एसोसिएशन चाहती है कि तंबाकू युक्त गुटखे और पान मसाले की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। पीठ ने 20 जुलाई को सुनवाई की तिथि तय करते हुए कहा कि तब कोई स्थगन नहीं होगा।
ज्ञातव्य है कि गत 2 फरवरी को भी कोर्ट ने गुटखे की प्लास्टिक पैकिंग पर प्रतिबंध की तिथि बढ़ाने से इनकार कर दिया था और केंद्र सरकार से निर्धारित तिथि तक इस बावत अधिसूचना जारी करने को कहा था। केन्द्र सरकार ने 4 फरवरी को अधिसूचना जारी कर गुटखा और पान मसाले की प्लास्टिक पैकिंग पर रोक लगा दी थी।

लोकपाल समिति पर उठी उंगलियां



लोकपाल समिति पर उठी उंगलियां
नई दिल्ली (ब्यूरो)। लोकपाल विधेयक के मसौदे के लिए बनी सरकारी और गैर सरकारी सदस्यों की समिति राजनीति की बली चढ़ती नजर आ रही है। समिति में शामिल पिता शांति भूषण और पुत्र प्रशांत भूषण की भूमिका को संदिग्ध माना जा रहा है। समिति के सदस्यों पर अब राजनीतिक हलकों से भी सवाल उठ रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने इस समिति के एक प्रमुख सदस्य एवं पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण की भूमिका पर सवाल उठा दिए हैं।
सपा नेता मोहन सिंह ने यह चिट्ठी सीधे शांतिभूषण को लिखी और उनकी ही भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है वह कानून की धाराओं के तहत बहस करने वाले अच्छे वकील हो सकते हैं, लेकिन अच्छे कानून का मसौदा बनाने में उनकी भूमिका पर उन्हें संशय है। सपा नेता ने अन्ना हजारे को भी निशाना बनाया है। मोहन सिंह ने कहा कि इस समिति को बनाने वाले ने भी कभी जन अदालत में मत्था नहीं टेका है। ऐसे में कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार रखने वाली संसद को किनारे रखकर उसका मसौदा तैयार करना संसद का अपमान है। एक डरपोक और कमजोर सरकार ने इस समिति की बात मान ली और उसमें पिता-पुत्र को जगह मिल गई।
गौरतलब है कि लोकपाल विधेयक के मसौदे के लिए समाजसेवी अन्ना हजारे के आमरण अनशन के दबाव में बनी समिति शुरू से विवाद में है। आंदोलन में अन्ना के साथ बढ़-चढ़कर खडे रहने वाले योग गुरु बाबा रामदेव ने समिति में शांतिभूषण और उनके पुत्र वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को रखे जाने पर एतराज जताया था। हालांकि बाद में उन्होंने अपना रुख नरम कर लिया।

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

केबीएसके का दिल्ली कार्यालय आरंभ

केबीएसके का दिल्ली कार्यालय आरंभ



नई दिल्ली (ब्यूरो)। गरीबी उन्नमूलन को मूल मंत्र मानकर काम करने वाले कलकत्ता मूल के गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) द्वारा राजधानी दिल्ली में अपना एक कार्यालय आरंभ किया गया है। इस कार्यालय के माध्यम से संस्था द्वारा दिल्ली राज्य में भी गरीबी उन्नमूलन के कार्य को अंजाम दिया जाएगा। उक्ताशय की बात एसर्व ग्लोबल सर्विस के जमीर नकवी ने कही है।

श्री नकवी ने बताया कि पिछले बत्तीस सालों से कार्यरत कृषि विकास शिल्प केंद्र नामक इस संस्था की स्थापना 1979 में कलकत्ता में की गई थी। बीस बिन्दुओं में इस संस्था ने गरीबी उन्नमूलन को प्राथमिकता मानकर काम किया जा रहा है। इसके अलावा लोगों को ताकत देने जनशक्ति, किसानों के लिए कृषि मित्र, श्रमिकों के हितों के संवर्धन हेतु श्रमिक कल्याण, खाद्य सुरक्षा, सबके लिए आवास, शुद्ध पेयजल, अनुसूचित जाति जनजाति, अल्पसंख्यक एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के कल्याण के लिए भी यह संस्था कार्यरत है।

इसके अलावा जन जन का स्वास्थ्य, महिला कल्याण, बाल कल्याण, युवक विकास, बस्ती सुधार, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक कल्याण, ग्रमीण सड़क, ग्रामीण उर्जा, पिछड़ा क्षेत्र विकास एवं ई शासन जैसी महती योजनाओं पर यह संस्था काम कर रही है।

निजामुद्दीन ईस्ट में इस संस्था के कार्यालय का उद्यघाटन दिल्ली के संसदीय सचिव तरविंदर सिंह मारवाह द्वारा किया गया।

शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने एक लाख में ले ली 20 करोड़ रुपये की संपत्ति

कानूनविद भूषण बंधुओं पर चार सौ बीसी का आरोप!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अन्ना हजारे के लोकपाल बिल लाने के अभियान का नेजा संभालने वाले पूर्व कानून मंत्री और उनके कानूनविद पुत्र पर करोड़ों की संपत्ति कोड़ियों में खरीदने के आरोप लगे हैं। उत्तर प्रदेश के इलहाबाद से प्रकाशित एक समाचार पत्र के हवाले से एक वेब साईट ने इसका खुलासा किया है।
उक्त वेब साईट के अनुसार इलाहाबाद के सिविल लाइंस जैसे पॉश इलाके में 12 अक्टूबर 2010 को देश के पूर्व कानून मंत्री शान्ति भूषण, उनके वरिष्ठ वकील पुत्र प्रशान्त भूषण, उनके द्वितीय पुत्र जयंत भूषण एवं उनकी पुत्री शेफाली भूषण के नाम बंगला नम्बर 19 (पुराना) 77/29 (नया) तथा 19-ए (पुराना) 79/31 (नया) एल्गिन रोड, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग की कुल भूमि 7818 वर्ग मीटर है। भूमि सहित बने हुए बंगले की ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ रजिस्ट्री मात्र एक लाख रुपये में की गयी है। यह ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ हरिमोहन दास टंडन, सुधीर टंडन एवं सतीश टंडन ने 12 अक्टूबर 2010 को दो हजार रुपये के स्टाम्प पेपर पर मात्र पांच हजार रुपये का भुगतान लेकर किया है।
गौरतलब है कि इस बंगले में शांति भूषण सालों से किरायेदार हैं और इसका विवाद भी कचहरी में चल रहा था। लेकिन सूट नम्बर 516/2000 में 5 अक्टूबर 2010 को दोनों पक्षों में समझौता दाखिल हुआ तथा प्रथम पक्ष हरिमोहन दास टंडन 7818 वर्गमीटर भूमि जिसमें बंगला निर्मित है, को दूसरे पक्ष शांतिभूषण एवं अन्य को मात्र एक लाख रुपये में बंगले को जमीन सहित बेचने के लिए राजी हो गये। इसके साथ ही दोनों पक्षों में किराये के बकाये और बेदखली के विरुद्घ दायर वाद नम्बर 11/2001 को भी वापस लेने पर सहमति हो गयी जिसकी तारीख 18 अक्टूबर 2010 को नियत थी। दोनों पक्षों ने जब तक सेलडीड न हो तब तक ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ का पंजीकरण कराने का निर्णय लिया। तदनुसार द्वितीय पक्ष शांतिभूषण ने केवल 5000 रुपये का भुगतान करके एग्रीमेंट टू सेल अपने एवं अपने परिजनों के पक्ष में करा लिया। यह सारा खेल सूट नम्बर 516/2000 में 5 अक्टूबर 2010 को दाखिल समझौते की आड़ में खेला गया जिसमें दोनों पक्ष एक लाख में जमीन व बंगला खरीदने और बेचने पर राजी हो गये।
उक्त समाचार पत्र ने दावा किया है कि ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ की प्रति अखबार के पास है जिसमें पृष्ठ नौ के बिन्दु दो पर लिखा गया है कि 5000 रुपये एडवांस 2 सितम्बर 1966 को दिये गये तथा शेष 95,000 रुपये सेलडीड एवं उसके क्रियान्वयन के समय देने का करार किया गया है जो 31 दिसम्बर 2010 तक हो जानी थी। अब पता चला है कि सेलडीड की रजिस्ट्री हो गयी है। ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ में यह भी करार किया गया है कि यदि प्रथम पक्ष यानी हरिमोहन दास टंडन सेलडीड करने में असफल रहते हैं तो दूसरा पक्ष यानी शांतिभूषण एवं उनके परिजन सूट नम्बर 516/2000 में एसीजेएम के कोर्ट से हुई डिक्री के आधार पर सेलडीड कराने के लिए अधिकृत होंगे।
गौरतलब है कि इस भूमि का फ्रीहोल्ड 8 जून 2000 को कराया गया था जिसके लिए कुल शुल्क 26 लाख 97 हजार 663 रुपये का ट्रेजरी चालान 7 अप्रैल 2000 को सरकारी खजाने में जमा किया गया था। ज्ञातव्य है कि यह ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ अक्टूबर 2010 में हुआ और उसी समय इसी भूखण्ड के अन्य कई प्लाटों की भी अलग-अलग रजिस्ट्री हुई, जिनका कुल रकबा लगभग चार हजार वर्गमीटर था और इतनी रजिस्ट्री में कुल 12 करोड़ रुपये की मालियत के आधार पर सर्किल रेट के हिसाब से स्टाम्प शुल्क अदा किया गया और 12 करोड़ रुपये का भुगतान भवन स्वामी हरिमोहन दास टंडन को किया भी गया। इस तरह यदि 4,000 वर्गमीटर का सर्किल रेट के अनुसार 12 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य होता है तो फिर जो भूमि एवं बंगला शांति भूषण एवं उनके परिजनों के पक्ष में ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ करके बेचा जा रहा है उसकी कीमत 20 करोड़ रुपये से अधिक की है। यही नहीं वर्तमान में इस क्षेत्र का सर्किल रेट 31 हजार रुपये प्रतिवर्ग मीटर से अधिक हो गया है। ऐसे में इसकी कीमत 20 करोड़ रुपये से भी काफी अधिक हो गयी है।
उक्त् समाचार पत्र ने कानूनविद भूषण बंधुओं पर आरोप लगाया है कि ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ में उ.प्र. स्टाम्प एक्ट 2008 के अनुसार स्टाम्प शुल्क या भुगतान नहीं किया गया है। एक्ट की अनुसूची (उ.प्र. स्टाम्प अधिनियम के अधीन लिखतों पर स्टाम्प शुल्क) की धारा 24 स्पष्टीकरण एक में कहा गया है कि इस अनुच्छेद में प्रयोजनों के लिए किसी स्थावर सम्पत्ति के विक्रय के करार के मामलों में जहां निष्पादन के पूर्व या निष्पादन के समय कब्जा दे दिया जाय या हस्तांतरण पत्र का निष्पादन किये बिना कब्जा दे दिये जाने का करार किया गया हो वहां करार को हस्तांतरण पत्र समझा जायेगा और उस पर तदनुसार स्टाम्प शुल्क देय होगा।
उक्त अखबार के अनुसार चूंकि दोनों पक्षों में किरायेदारी विवाद चल रहा था और शांतिभूषण उक्त संपत्ति व हैसियत किरायेदार कब्जे में है इसलिए ‘‘एग्रीमेंट टू सेल‘‘ के समय कुल मूल्य का 7 प्रतिशत स्टाम्प शुल्क दिया जाना चाहिए जो कि नहीं दिया गया है। यही नहीं, जिस भूमि के फ्री होल्ड के लिए 26 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया गया उसके लगभग दो तिहाई हिस्से को महज एक लाख रुपये में शांति भूषण कुनबे को दिया जाना गले से नीचे नहीं उतर रहा है।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

इक्कीसवीं सदी में भी मनुष्य की विष्टा मनुष्य सर पर उठाने पर मजबूर


कब समाप्त होगी मैला उठाने की परंपरा 
आजादी के छः दशक बाद भी चेत नहीं सकी सरकारें!
 
अपना पखाना खुद साफ करते थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी
 
(लिमटी खरे)
 
विडम्बना दर विडम्बना! आजादी के लगभग साढ़े छः दशकों के बाद भी भारत गणराज्य में आज भी सर पर मैला ढोने की परंपरा जारी है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय खुद इस बात को स्वीकार करता है कि मैला ढोने की परंपरा से मुक्ति के लिए बने 1993 के कानून का पालन ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है। एक तरफ नेहरू गांधी के नाम को भुनाकर सत्ता की मलाई चखने वाली आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस द्वारा इससे मुक्ति के लिए प्रयास करने का स्वांग रचा जाता रहा है, वहीं कांग्रेस यह भूल जाती है कि मोहन दास करमचंद गांधी खुद अपना संडास साफ किया करते थे।
पिछले साल दिसंबर माह में सफाई कर्मचारी आंदोलन के एक प्रतिनिधि मण्डल ने सामाजिक न्याय मंत्री से भेंट कर देश भर में सर पर मैला ढोने वालों का सर्वेक्षण करवाकर उसकी विस्त्रत रिपोर्ट सौंपी थी। इस प्रतिवेदन में कहा गया था कि देश के पंद्रह राज्यों में सर पर मैला ढोने वालों की तादाद 11 हजार से भी अधिक है। इस प्रतिनिधिमण्डल ने केंद्रीय मंत्री को सौंपे अपने प्रतिवेदन में साफ किया था कि कहां कहां कौन कौन इस काम में जुता हुआ है। इसमें फोटो और अन्य विवरणों के साथ इस अमानवीय कृत्य के बारे में सविस्तार से उल्लेख किया गया था।
पिछली मर्तबा 2008 के संसद के शीतकालीन सत्र में तत्कालीन सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्रीमती सुब्बूलक्ष्मी जगदीसन ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उŸार में बताया था कि मैला उठाने की परम्परा को जड़ मूल से समाप्त करने के लिए रणनीति बनाई गई है । उस वक्त उन्होंने बताया कि मैला उठाने वाले व्यक्तियों के पुनर्वास और स्वरोजगार की नई योजना को जनवरी, 2007 में शुरू किया गया था । उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस योजना के तहत तब देश के 1 लाख 23 हजार लाख मैला उठाने वालों और उनके आश्रितों का पुनर्वास किया जाना प्रस्तावित था।
कितने आश्चर्य की बात है कि मनुष्य के मल को मनुष्य द्वारा ही उठाए जाने की परंपरा इक्कीसवीं सदी में भी बदस्तूर जारी है। देश प्रदेश की राजधानियों, महानगरों या बड़े शहरों में रहने वाले लोगों को भले ही इस समस्या से दो चार न होना पड़ता हो पर ग्रामीण अंचलों की हालत आज भी भयावह ही बनी हुई है।
कहने को तो केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा शुष्क शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाता रहा है, वस्तुतः यह प्रोत्साहन किन अधिकारियों या गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की जेब में जाता है, यह किसी से छुपा नहीं है। करोड़ों अरबों रूपए खर्च करके सरकारों द्वारा लोगों को शुष्क शौचालयो के प्रति जागरूक किया जाता रहा है, पर दशक दर दशक बीतने के बाद भी नतीजा वह नहीं आया जिसकी अपेक्षा थी।
सरकारों को देश के युवाओं के पायोनियर रहे महात्मा गांधी से सबक लेना चाहिए। उस समय बापू द्वारा अपना शौचालय स्वयं ही साफ किया जाता था। आज केंद्रीय मंत्री जगदीसन की सदन में यह स्वीकारोक्ति कि देश के एक लाख 23 हजार मैला उठाने वालों का पुर्नवास किया जाना बाकी है, अपने आप में एक कड़वी हकीकत बयां करने को काफी है। पिछले साल जब 11 हजार लोगों के इस काम में लगे होने की बात सामने आई तब कांग्रेसनीत केंद्र सरकार का अमानवीय चेहरा सामने आया था।
सरकार खुद मान रही है कि आज भी देश में मैला उठाने की प्रथा बदस्तूर जारी है। यह स्वीकारोक्ति निश्चित रूप से सरकार के लिए कलंक से कम नहीं है। यह कड़वी सच्चाई है कि कस्बों, मजरों टोलों में आज भी एक वर्ग विशेष द्वारा आजीविका चलाने के लिए इस कार्य को रोजगार के रूप में अपनाया जा रहा है।
सरकारों द्वारा अब तक व्यय की गई धनराशि में तो समूचे देश में शुष्क शौचालय स्थापित हो चुकने थे। वस्तुतः एसा हुआ नहीं। यही कारण है कि देश प्रदेश के अनेक शहरों में खुले में शौच जाने से रोकने की पे्ररणा लिए होर्डिंग्स और विज्ञापनों की भरमार है। अगर देश में हर जगह शुष्क शौचालय मौजूद हैं तो फिर इन विज्ञापनों की प्रसंगिकता पर सवालिया निशान क्यों नहीं लगाए जा रहे हैं? क्यों सरकारी धन का अपव्यय इन विज्ञापनों के माध्यम से किया जा रहा है?
उत्तर बिल्कुल आईने के मानिंद साफ है, देश के अनेक स्थान आज भी शुष्क शौचालय विहीन चिन्हित हैं। क्या यह आदी सदी से अधिक तक देश प्रदेशों पर राज करने वाली कांग्रेस की सबसे बड़ी असफलता नहीं है? सत्ता के मद में चूर राजनेताओं ने कभी इस गंभीर समस्या की ओर नज़रें इनायत करना उचित नहीं समझा है। यही कारण है कि आज भी यह समस्या कमोबेश खड़ी ही है।
महानगरों सहित बड़े, छोटे, मंझोले शहरों में भी जहां जल मल निकासी की एक व्यवस्था है, वहां भी सीवर लाईनों की सफाई में सफाई कर्मी को ही गंदगी के अंदर उतरने पर मजबूर होना पड़ता है। अनेक स्थानों पर तो सीवर लाईन से निकलने वाली गैस के चलते सफाई कर्मियों के असमय ही काल के गाल में समाने या बीमार होने की खबरें आम हुआ करती हैं।
विडम्बना ही कही जाएगी कि एक ओर हम आईटी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने का दावा कर चंद्रयान का सफल प्रक्षेपण कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शौच के मामले में आज भी बाबा आदम के जमाने की व्यवस्थाओं को ही अंगीगार किए हुए हैं। इक्कीसवीं सदी के इस युग में आज जरूरत है कि सरकार जागे और देश को इस गंभीर और अमानवीय समस्या से निजात दिलाने की दिशा में प्रयास करे।

भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का आक्रोश निकलने से राहत है कांग्रेस में


हजारे के अनशन की सफलता से गदगद हैं सोनिया 
बीस साल को फुर्सत हो गया भ्रष्टाचार का मसला
 
अन्ना के अनशन से साधे एक तीर से कई निशाने
 
बाबा रामदेव को ढकेला हाशिए पर
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। गांधीवादी समाज सेवी अन्ना हजारे के द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में किए गए अनशन को देशव्यापी समर्थन मिलने पर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी बेहद ही प्रसन्न नजर आ रही हैं। कांग्रेस के प्रबंधकों ने एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेसनीत केंद्र सरकार इस बात पर राहत महसूस कर रही है कि घपले, घोटालों, भ्रष्टाचार पर जनता का आक्रोश निकालने में वह आखिर सफल हो गई है।
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि अन्ना हजारे के द्वारा अनशन पर बैठने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं, किन्तु कांग्रेस के ही प्रबंधकों ने इस मामले में पर्दे के पीछे रहकर जो भूमिका अदा की है उससे कांग्रेस के खिलाफ उपजा रोष असंतोष का शमन काफी हद तक शमन कर दिया गया है।
सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस प्रबंधकों ने श्रीमति सोनिया गांधी को समझाया है कि गांधी वादी अन्ना हजारे की मुहिम को मिले व्यापक समर्थन से एक ओर जनता का भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल कार्यक्रम काफी हद तक सफल रहा किन्तु इतिहास को साक्षी मानते हुए प्रबंधकों ने कांग्रेसाध्यक्ष को बताया कि 1975 में लोकनायक जयप्रकाश के द्वारा चलाए गए आंदोलन के उपरांत भ्रष्टाचार का मामला लगभग तीन दशकों के लिए स्थगित हो गया था। अस्सी के दशक के आगाज के साथ ही नौकरशाह, न्यायपालिका, मीडिया और जनसेवकों के गठजोड़ ने देश की नींव को खोखला किया गया किन्तु भ्रमित जनता चुपचाप सब कुछ देखने सुनने को मजबूर रही।
सूत्रों की मानें तो सोनिया गांधी को बताया गया है कि अबकी बार भ्रष्टाचार के मामले में दो दशकों तक का युद्ध विराम माना जा सकता है। इसी दौरान कांग्र्रेस के युवराज राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी की जा सकेगी और उन पर भ्रष्टों को संरक्षण देने के आरोप लगाने वालों की धार बोथरी की जा सकती है।
उधर राजनीति के पंडितों का कहना है कि इस मुहिम के दरम्यान ही कांग्रेस के प्रबंधकों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद करने वाले बाबा रामदेव के तेवरों को भी ढीला कर दिया है। भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ होने वाली देश की जनता अब बाबा रामदेव के बजाए अन्ना हजारे को अपना पायोनियर (अगुआ) मान रही है। उधर कांग्रेस के रणनीतिकार अब अन्ना हजारे को शीशे में उतारने का प्रयास कर रहे हैं।

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

अन्ना, आई मस्ट सैल्यूट यू

अन्ना, आई मस्ट सैल्यूट यू

लिमटी खरे

सवा अरब की आबादी है जो भारत के भूमण्डल में निवास करती है। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसने भारत वर्ष पर आजादी के उपरांत आधी सदी से ज्यादा राज किया है। दोनों के साथ ही सवा सैकड़ा का आंकड़ा जुड़ा हुआ है। कांग्रेस अब तक देश की जनता को एक ही लाठी से हांकती आई है। जो मन आया वो नीति बना दी, जो चाहा वो शिक्षा के प्रयोग करवा दिए। आजादी के उपरांत राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी के अवसान के बाद आई रिक्तता को लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कुछ हद तक भरने का प्रयास किया था। अस्सी के दशक के आरंभ होते ही एक बार फिर देश में असली गांधीवादी नेता के मामले में शून्यता महसूस की जा रही थी। नकली गांधीवादी नेताओं से तो भारत देश पटा पड़ा है।
तीन दशकों के बाद एक बार फिर अन्ना हजारे के रूप मंे देश को एक गांधी वादी नेता मिला है जो निस्वार्थ भाव से देश के लिए काम करने को राजी है, सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि अन्ना के आव्हान पर समूचे देश ने अहिंसक तरीके से पूरे जोश के साथ उनका साथ दिया। खुफिया एजेंसियों के प्रतिवेदन ने कांग्रेस के हाथ पैर फुला दिए, और सरकार को अंततः इक्कीसवीं सदी के इस गांधी के सामने घुटने टेकने ही पड़े। हो सकता है कि कांग्रेस के वर्तमान स्वरूप और आदतों के चलते वह अन्ना के साथ ही साथ देश के सामने घुटने टेकने का प्रहसन कर फौरी तोर पर इससे बचना चाह रही हो किन्तु कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस अन्ना की एक आवाज पर देश के युवाओं ने उनका साथ दिया है, वे अगर कांग्रेस धोखा करती है तो आगे किस स्तर पर जा सकते हैं।
बहरहाल आधी लंगोटी पहनकर सादगी पसंद किन्तु कठिन अनुशासन में जीवन यापन करने वाले महात्मा गांधी ने उन ब्रितानियों को देश से खदेड़ दिया था, जिनका साम्राज्य और मिल्कियत इतनी थी कि उनका सूरज कभी अस्त ही नहीं होता था। एक देश में अगर सूरज अस्त हो जाता तो दूसरे देश में उसका उदय होता था। इतने ताकतवर थे गोरी चमड़ी वाले। बेरिस्टर गांधी ने सब कुछ तजकर सादगी के साथ देश की सेवा का प्रण लिया और उसे मरते दम तक निभाया।
महात्मा गांधी ने अहिंसा को ही अस्त्र बनाकर अपनी पूरी लड़ाई लड़ी। बापू के आव्हान पर अनेक बार जेल भरो आंदोलन का आगाज हुआ। 1918 में चंपारण सत्याग्रह के दौरान ब्रितानी हुकूमत ने महात्मा गांधी के आंदोलन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। तब बापू ने आंदोलन का एक्सीलयेटर बढ़ा दिया था। जैसे ही देशव्यापी समर्थन बापू को मिला वैसे ही ब्रितानी हुकूमत उसी तरह घबराई जिस तरह अन्ना हाजरे के आंदोलन के बाद वर्तमान में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार घबराई है।
उस वक्त के सियासतदारों ने अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी को हिंसा फैलाने के आरोप में पकड़ लिया। जैसे ही यह खबर फैली वैसे ही भारत के हर नागरिक का तन बदन सुलग गया। बापू के समर्थन में अनेकों समर्थकों ने जेल जाने की इच्छा व्यक्त की। जेल के बाहर होने वाले प्रदर्शन ने गोरों को हिलाकर रख दिया। इसके अलावा 1922 में चौरी चौरा में तनाव को देखकर ब्रितानी सरकार बहुत ही भयाक्रांत थी। निर्मम गोरों ने बापू को दस मार्च 1922 को पकड़कर जेल में डाल दिया। 1930 में कमोबेश यही स्थिति नमक सत्याग्रह के दौरान निर्मित हुई थी।
आजादी के उपरांत बापू की हत्या के बाद भारत में कुछ साल तो सब कुछ ठीक ठाक चला किन्तु इसके उपरांत तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की सराउंडिंग (इर्द गिर्द के लोग) ने उन्हें अंधेरे में रखकर अत्त मचाना आरंभ कर दिया। प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी की जानकारी के बिना ही अनेक फैसले लिए जाकर उन्हें अमली जामा भी पहनाया जाने लगा। देश में अराजकता की स्थिति बन गई थी।
इसी दौरान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान जननायक जय प्रकाश नारायण ने एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार की और 25 जून 1975 को इसे मूर्त रूप दिया। जेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से त्यागपत्र की मांग कर डाली। इंदिरा गांधी के आंख नाक कान बने लोगों ने रातों रात जेपी सहित अनेक लोगों को बंद कर जेल में डाल दिया। यह जनता का रोष और असंतोष था कि आजादी के बाद सबसे ताकतवर कांग्रेस पार्टी को सत्ता छोड़कर विपक्ष के पटियों पर बैठना पड़ा था।
अन्ना हजारे ने यह साबित कर दिया है कि भारतवासी एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ कभी भी खड़े हो सकते हैं। भारत के हर नागरिक ने भी यह दिखा दिया है कि भारतवासी सहिष्णु, सहनशील शांत और सोम्य अवश्य हैं, किन्तु वे नपुंसक कतई नहीं हैं। अन्ना हजारे के इस कदम ने हर भारतवासी के दिल में बसने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लोकनायक जय प्रकाश नारायण की यांदें ताजा कर दी हैं।
देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस को अब भविष्य का रोड़मैप तय करना होगा, जिसमें घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार, अनाचार, धोखेबाजी आदि को स्थान न दिया जा सके। अन्ना हजारे की सादगी पर कोई भी मर मिटे। जिस सादगी के साथ उन्होने अनशन कर राजनेताओं को इससे दूर रखा और सरकार को झुकने पर मजबूर किया अन्ना की उस शैली को देखकर बरबस ही मुंह से फूट पड़ता है -‘‘अन्ना, आई मस्ट सैल्यूट यू।‘‘

सवा अरब की आबादी है जो भारत के भूमण्डल में निवास करती है। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसने भारत वर्ष पर आजादी के उपरांत आधी सदी से ज्यादा राज किया है। दोनों के साथ ही सवा सैकड़ा का आंकड़ा जुड़ा हुआ है। कांग्रेस अब तक देश की जनता को एक ही लाठी से हांकती आई है। जो मन आया वो नीति बना दी, जो चाहा वो शिक्षा के प्रयोग करवा दिए। आजादी के उपरांत राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी के अवसान के बाद आई रिक्तता को लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कुछ हद तक भरने का प्रयास किया था। अस्सी के दशक के आरंभ होते ही एक बार फिर देश में असली गांधीवादी नेता के मामले में शून्यता महसूस की जा रही थी। नकली गांधीवादी नेताओं से तो भारत देश पटा पड़ा है।
तीन दशकों के बाद एक बार फिर अन्ना हजारे के रूप मंे देश को एक गांधी वादी नेता मिला है जो निस्वार्थ भाव से देश के लिए काम करने को राजी है, सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि अन्ना के आव्हान पर समूचे देश ने अहिंसक तरीके से पूरे जोश के साथ उनका साथ दिया। खुफिया एजेंसियों के प्रतिवेदन ने कांग्रेस के हाथ पैर फुला दिए, और सरकार को अंततः इक्कीसवीं सदी के इस गांधी के सामने घुटने टेकने ही पड़े। हो सकता है कि कांग्रेस के वर्तमान स्वरूप और आदतों के चलते वह अन्ना के साथ ही साथ देश के सामने घुटने टेकने का प्रहसन कर फौरी तोर पर इससे बचना चाह रही हो किन्तु कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस अन्ना की एक आवाज पर देश के युवाओं ने उनका साथ दिया है, वे अगर कांग्रेस धोखा करती है तो आगे किस स्तर पर जा सकते हैं।
बहरहाल आधी लंगोटी पहनकर सादगी पसंद किन्तु कठिन अनुशासन में जीवन यापन करने वाले महात्मा गांधी ने उन ब्रितानियों को देश से खदेड़ दिया था, जिनका साम्राज्य और मिल्कियत इतनी थी कि उनका सूरज कभी अस्त ही नहीं होता था। एक देश में अगर सूरज अस्त हो जाता तो दूसरे देश में उसका उदय होता था। इतने ताकतवर थे गोरी चमड़ी वाले। बेरिस्टर गांधी ने सब कुछ तजकर सादगी के साथ देश की सेवा का प्रण लिया और उसे मरते दम तक निभाया।
महात्मा गांधी ने अहिंसा को ही अस्त्र बनाकर अपनी पूरी लड़ाई लड़ी। बापू के आव्हान पर अनेक बार जेल भरो आंदोलन का आगाज हुआ। 1918 में चंपारण सत्याग्रह के दौरान ब्रितानी हुकूमत ने महात्मा गांधी के आंदोलन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। तब बापू ने आंदोलन का एक्सीलयेटर बढ़ा दिया था। जैसे ही देशव्यापी समर्थन बापू को मिला वैसे ही ब्रितानी हुकूमत उसी तरह घबराई जिस तरह अन्ना हाजरे के आंदोलन के बाद वर्तमान में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार घबराई है।
उस वक्त के सियासतदारों ने अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी को हिंसा फैलाने के आरोप में पकड़ लिया। जैसे ही यह खबर फैली वैसे ही भारत के हर नागरिक का तन बदन सुलग गया। बापू के समर्थन में अनेकों समर्थकों ने जेल जाने की इच्छा व्यक्त की। जेल के बाहर होने वाले प्रदर्शन ने गोरों को हिलाकर रख दिया। इसके अलावा 1922 में चौरी चौरा में तनाव को देखकर ब्रितानी सरकार बहुत ही भयाक्रांत थी। निर्मम गोरों ने बापू को दस मार्च 1922 को पकड़कर जेल में डाल दिया। 1930 में कमोबेश यही स्थिति नमक सत्याग्रह के दौरान निर्मित हुई थी।
आजादी के उपरांत बापू की हत्या के बाद भारत में कुछ साल तो सब कुछ ठीक ठाक चला किन्तु इसके उपरांत तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी की सराउंडिंग (इर्द गिर्द के लोग) ने उन्हें अंधेरे में रखकर अत्त मचाना आरंभ कर दिया। प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी की जानकारी के बिना ही अनेक फैसले लिए जाकर उन्हें अमली जामा भी पहनाया जाने लगा। देश में अराजकता की स्थिति बन गई थी।
इसी दौरान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान जननायक जय प्रकाश नारायण ने एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार की और 25 जून 1975 को इसे मूर्त रूप दिया। जेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से त्यागपत्र की मांग कर डाली। इंदिरा गांधी के आंख नाक कान बने लोगों ने रातों रात जेपी सहित अनेक लोगों को बंद कर जेल में डाल दिया। यह जनता का रोष और असंतोष था कि आजादी के बाद सबसे ताकतवर कांग्रेस पार्टी को सत्ता छोड़कर विपक्ष के पटियों पर बैठना पड़ा था।
अन्ना हजारे ने यह साबित कर दिया है कि भारतवासी एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ कभी भी खड़े हो सकते हैं। भारत के हर नागरिक ने भी यह दिखा दिया है कि भारतवासी सहिष्णु, सहनशील शांत और सोम्य अवश्य हैं, किन्तु वे नपुंसक कतई नहीं हैं। अन्ना हजारे के इस कदम ने हर भारतवासी के दिल में बसने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और लोकनायक जय प्रकाश नारायण की यांदें ताजा कर दी हैं।
देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस को अब भविष्य का रोड़मैप तय करना होगा, जिसमें घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार, अनाचार, धोखेबाजी आदि को स्थान न दिया जा सके। अन्ना हजारे की सादगी पर कोई भी मर मिटे। जिस सादगी के साथ उन्होने अनशन कर राजनेताओं को इससे दूर रखा और सरकार को झुकने पर मजबूर किया अन्ना की उस शैली को देखकर बरबस ही मुंह से फूट पड़ता है -‘‘अन्ना, आई मस्ट सैल्यूट यू।‘‘


भ्रष्टों को अन्ना के अनशन से होना चाहिए शर्मसार

भ्रष्टों को अन्ना के अनशन से होना चाहिए शर्मसार
लिमटी खरे

अमेरिकी मूल के गोरे लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड की किताब में महात्मा गांधी पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैं। कहा गया है कि बापू 1908 में चार बच्चों को जन्म देने के बाद कस्तूरबा गांधी से प्रथक होकर कालेनबाश के साथ रहने चले गए थे। इस किताब में अनेक पत्रों का हवाला देकर बापू के बारे में अश्लील और अमर्यादित टिप्पणियां की गई हैं कि वे समलेंगिक या गे थे। इस किताब में कहा गया है कि बापू समलैंगिक थे। आधी धोती पहनकर ब्रितानियों के दांत खट्टे करने वाले बापू का सरेआम करने के बावजूद भी एक सप्ताह तक कांग्रेस ने इसकी सुध नहीं ली। बापू को समलेंगिक बताना वाकई कांग्रेस को छोड़कर समूचे भारत के लिए शर्म की बात है। अब कांग्रेसनीत केंद्र सरकार यह कह रही है कि इस किताब पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।
अपनी शहादत के 63 साल बाद भी आज गांधी समूचे विश्व में प्रासंगिक बने हुए हैं। समूची दुनिया उस महात्मा की कायल है जिसने आधी धोती पहनकर ब्रितानियों के दांत खट्टे कर दिए थे, जिनके बारे में कहा जाता था कि उनका सूरज नहीं डूबता है। इसका अर्थ था कि उनका साम्राज्य इतना फैला हुआ था कि एक देश में सूरज डूबता था तो दूसरे देश में उग जाता था।
गांधीवादी नेता अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल को जबर्दस्त जनसमर्थन मिलने पर किसी को आश्चर्य नहीं है। धर्मगुरूओं का यह कहना ही अपने आप में पर्याप्त है कि कांग्रेस को शर्म आनी चाहिए कि आजाद और लोकतांत्रिक देश में उसके नेतृत्व वाली सरकार के रहते हुए एक बुजुर्ग गांधीवादी को भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अमरण अनशन करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
बापू के आदर्शों को आज भी समूची दुनिया अंगीकार किए हुए है, विशेषकर उनके अंहिसा आंदोलन को। गांधीवादी तरीके से अन्ना हजारे ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा कर ही दिया है। कुछ दिनों पहले अमेरिका के डाक्टूमेंट्री फिल्म निर्माता जेम्स ओटिस ने बापू की कुछ अनमोल चीजों की नीलामी करने की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद भारत सरकार को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की याद आई और आनन फानन उसने इस चीजों को वापस लाने की पहल आरंभ की।
कितने आश्चर्य की बात है कि ओटिस ने बापू के चश्मे, जेब वाली घड़ी, चमड़े की चप्पलें, कटोरी, प्लेट आदि को भारत को सौंपने के एवज में एक मांग रखी थी। ओटिस का कहना था कि अगर भारत सरकार अपने बजट का पांच प्रतिशत हिस्सा गरीबी उन्नमूलन पर खर्च करे तो वे इन सामग्रीयों को भारत को लौटा सकते हैं।
ओटिस की इस मांग को दो नज़रियांे से देखा जा सकता है। अव्वल तो यह कि भारत सरकार क्या वाकई देश के गरीबों के प्रति फिकरमंद नहीं है? और क्या वह गरीबी उन्नमूलन की दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है। अगर एसा है तो भारत सरकार को चाहिए कि वह हर साल अपने बजट के उस हिस्से को सार्वजनिक कर ओटिस को बताए कि उनकी मांग के पहले ही भारत सरकार इस दिशा में कार्यरत है। वस्तुतः सरकार की ओर से इस तरह का जवाब न आना साफ दर्शाता है कि ओटिस की मांग में दम था।
वहीं दूसरी ओर ओटिस को इस तरह की मांग करने के पहले इस बात का जवाब अवश्य ही देना चाहिए था कि उनके द्वारा एकत्र की गईं महात्मा गांधी की इन सारी वस्तुओं को किसी उचित संग्रहालय में महफूज रखने के स्थान पर इनकी नीलामी करने की उन्हंे क्या ज़रूरत आन पड़ी।
ज्ञातव्य होगा कि 1996 में एक ब्रितानी फर्म द्वारा महात्मा गांधी की हस्तलिखित पुस्तकों की नीलामी पर मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाई गई थी। यह पहल भी 1929 में गठित किए गए नवजीवन ट्रस्ट द्वारा ही की गई थी। सवाल तो यह उठता है कि महात्मा गांधी द्वारा जब अपनी वसीयत में साफ तौर पर लिखा था कि उनकी हर चीज, प्रकाशित या अप्रकाशित आलेख रचनाएं उनके बाद नवजीवन ट्रस्ट की संपत्ति होंगे, के बाद उनसे जुड़ी वस्तुएं सात समुंदर पार कर अमेरिका और इंग्लेंड कैसे पहुंच गईं?
जिस चश्मे से उन्होंने आजाद भारत की कल्पना को साकार होते देखा, जिस चप्पल से उन्होंने दांडी जैसा मार्च किया। जिस प्लेट और कटोरी में उन्होंने दो वक्त भोजन पाया उनकी नीलामी होना निश्चित रूप से बापू के विचारों और उनकी भावनाओं का सरासर अपमान था।
समूचे विश्व के लोगों के दिलों पर राज करने वाले अघोषित राजा जिन्हें हिन्दुस्तान के लोग राष्ट्र का पिता मानते हैं, उनकी विरासत को संजोकर रखना भारत सरकार की जिम्मेवारी बनती है। इसके साथ ही साथ महात्मा गांधी के दिखाए पथ और उनके आचार विचार को अंगीकार करना हर भारतीय का नैतिक कर्तव्य होना चाहिए।
महात्मा गांधी के नाम से प्रचलित गांधी टोपी को ही अगर लिया जाए तो अब उंगलियों में गिनने योग्य राजनेता भी नहीं बचे होंगे जो इस टोपी का नियमित प्रयोग करते होंगे। अपनी हेयर स्टाईल के माध्यम से आकर्षक दिखने की चाहत मंे राजनेताआंे ने भी इस टोपी को त्याग दिया है। यहां तक कि कांग्रेस की नजर में भविष्य के युवराज राहुल गांधी भी अवसर विशेष पर ही फोटो सेशन के लिए ही गांधी टोपी धारण किया करते हैं।
आधी सदी से अधिक देश पर राज करने वाली अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अनुषांगिक संगठन सेवादल की पारंपरिक वेशभूषा में गांधी टोपी का समावेश किया गया है। विडम्बना ही कही जाएगी कि सेवादल में सलामी लेने के दौरान ही कांग्रेस के बड़े नेताओं द्वारा इस टोपी का प्रयोग किया जाता है। सलामी के बाद यह टोपी कहां चली जाती है इस बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं होता है।
इसके साथ ही गांधी वादी आज भी खादी का इस्तेमाल करते हैं, मगर असली गांधीवादी। आज हमारे देश के 99 फीसदी राजनेताओं द्वारा खादी का पूरी तरह परित्याग कर दिया गया है, जिसके चलते हाथकरघा उद्योग की कमर टूट चुकी है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि गांधी जी की विरासत को तो संजोकर रखा ही जाए, साथ ही उनके विचारों को संजोना बहुत जरूरी है। बापू की चीजें तो बेशक वापस आ जाएंगी, किन्तु उनके बताए मार्ग का क्या होगा?
दुनिया के चौधरी अमेरिका का रहवासी लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड द्वारा बापू को सरेआम समलेंगिक की श्रेणी में खड़ा किया जा रहा है और उनके नाम पर सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस द्वारा अपनी जुबान बंद रखी हुई है। कहा तो यह भी जा रहा है कि कांग्रेस की कमान इटली मूल की सोनिया मानियो उर्फ सोनिया गांधी के हाथों में हैं जिन्हें गांधी के नाम का प्रयोग तो आता है पर गांधी के बलिदान और उनकी शहादत से कोई लेना देना नहीं है।
देश के वर्तमान हालातों को देखकर हम यह कह सकते हैं कि देश के राजनेताओं ने अपने निहित स्वार्थों के चलते राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आर्दशों को भी नीलाम कर दिया है। आज के परिवेश में राजनीति में बापू के सिद्धांत और आदर्शों का टोटा साफ तौर पर परिलक्षित हो रहा है। ओटिस की नीलामी करने की घोषणा हिन्दुस्तान के राजनेताओं के लिए एक कटाक्ष ही कही जा सकती है, कि भारत गांधी जी के सिद्धांतों पर चलना सीखे।
 

0 वीरप्पा मोईली से साधा हंसराज विरोधियों को


सक्रिय हुए भारद्वाज विरोधी

(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश कोटे से राज्य सभा में पहुंचने वाले और फिर कभी मुडकर मध्य प्रदेश का रूख नहीं करने वाले पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज के विरोधी लामबंद होना आरंभ हो गए हैं। कर्नाटक के राज्यपाल भारद्वाज के केंद्र में वापसी की सुगबुगाहटों के बाद अब एक बार फिर उनकी खुलकर मुखालफत होने लगी है।
पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज की बार बार दिल्ली यात्रा से अनुमान लगाया जा रहा था कि वे कर्नाटक के राजभवन से निकलकर पुनः सक्रिय राजनीति में आना चाह रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी की वर्तमान कानून मंत्री वीरप्पा माईली के प्रति नाराजगी की खबरों के चलते भारद्वाज ने एक बार फिर कानून मंत्रालय पर काबिज होने की जुगत लगाना आरंभ कर दिया था।
वैसे तो मोईली और भारद्वाज दोनों ही के प्रति सोनिया गांधी का रूख बहुत सकारात्मक नहीं है फिर भी अब भारद्वाज विरोधियो ंने उनके मार्ग में शूल बोना आरंभ कर दिया है। बताया जाता है कि बोफोर्स मामले में क्लोजर रिपोर्ट के लीक होने से सोनिया गांधी खासी खफा थीं। इस बारे में उन्होंने अपने जासूसों को पतासाजी करने को कहा था कि इसके पीछे आखिर कौन सा चेहरा था।
दस जनपथ के सूत्रों का कहना है कि भारद्वाज विरोधियों ने सोनिया गांधी को बताया है कि बोफोर्स मामले में क्वात्रोच्चि को लेकर ट्रिब्यूनल आर्डर जारी किया गया था जिस पर कोहराम मचा, और यह ट्रिब्यूनल कानून मंत्रालय के अधीन आता है, एवं जब यह मामला चरम पर था तब हंसराज भारद्वाज ही कानून मंत्री थे।
कहा जा रहा है कि कानून मंत्री वीरप्पा माईली के गुर्गों ने इशारों ही इशारों में सोनिया गांधी को यह समझा दिया है कि पिछले दिनों बोफोर्स मामले को लेकर कांग्रेस और केंद्र सरकार की जो भद्द पिटी है उस रिपोर्ट को हंसराज भारद्वाज द्वारा ही लीक किया गया है।