सोमवार, 23 मई 2011

यूपी कांग्रेस के आहत हैं युवराज


ये है दिल्ली मेरी जान

यूपी कांग्रेस के आहत हैं युवराज
भट्टा परसौल गांव में जाकर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जगाने का अच्छा स्टेंड उठाया था, किन्तु उनके इस कदम का उत्तर प्रदेश में बसपा पर के बराबर ही फर्क पड़ा है। साथ ही साथ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस भी सुसुप्तावस्था से जाग नहीं सकी है। उत्तर प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस के प्यादों और नेताओं की निष्क्रियता से आहत राहुल गांधी ने खुद ही मोर्चा संभालने का मन बनाया और कुछ किसानों के प्रतिनिधिमण्डल के साथ प्रधानमंत्री से जा मिले। राहुल के मीडिया प्रबंधकों द्वारा मैनेज्ड न्यूज चैनल और प्रिंट मीडिया में यह खबर जोरदार तरीके से पेश की गई किन्तु जमीनी तौर पर कोई भूचाल नहीं आया। इससे आहत राहुल ने इस गांव में लगभग छः दर्जन किसानों के मारे जाने का सनसनीखेज आरोप भी जड़ दिया। अब देखना यह है कि किसानों के मरने की पुष्टि राख के परीक्षण के उपरांत कब होती है, यूपी के विधानसभा चुनावों के बाद या उससे पहले!

सत्तर के काका लगा रहे कुलाटी
कहते हैं बंदर कितना भी बूढ़ा हो जाए, कुलाटी मारना नहीं छोड़ता। कमोबेश यह फिकरा वालीवुड के शहंशाह रहे काका यानी सत्तर के दशक के सुपर स्टार जतिन उर्फ राजेश खन्ना पर एकदम फिट बैठ रहा है। 29 दिसंबर 1942 को जन्मे काका ने डिंपल कापडिया का साथ छोड़ने के बाद फिल्मों से लगभग किनारा ही कर लिया था। काका का जीवन एकाकी हो चला था, किन्तु पिछले एक दशक से काका के नीरस जीवन में एक बार फिर बहार आती दिख रही है। काका पिछले आठ सालों से फिलीपींस के पूर्व महामहिम राष्ट्रपति फर्निनांड मोर्कोज की भतीजी अनीता आड़वाणी के साथनयन मटक्काकर रहे हैं। कांग्रेस के नई दिल्ली के पूर्व सासंद रहे काका का अफेयर बांद्रा में रहने वाली अनीता के साथ चल रहा है, दोनों ही एक दूसरे को पिछले 32 सालों से जानते हैं। गुजरे जमाने के सुपर स्टार राजेश खन्ना भले ही आज गुमनामी के अंधेरे में जीवन बिता रहे हों पर उनके चाहने वालों की कमी आज भी नहीं है। रोमांटिक हीरो की छवि बना चुके काका और अनीता का अफेयर कहां तक परवान चढ़ पाता है इस बात का इंतजार सभी को बेसब्री से है।

ममता का सोमनाथ प्रेम!
देश की सबसे निष्क्रीय रेल मंत्री रहीं ममता बनर्जी अब बंगाल की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। ममता बनर्जी कभी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सहयोगी सदस्य और मंत्री रही हैं, तब उनकी और राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी की खासी छना करती थी। हाल ही में चुनाव नतीजों के बाद ममता को सोमनाथ चटर्जी का बधाई हेतु फोन आया। ममता के करीबी सूत्रों का कहना है कि ममता ने दादा से घुटकर बात की और उनके पैर छूकर आर्शीवाद लेने की इच्छा भी जताई। वहीं दूसरी ओर कुछ देर बाद जब राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी ने फोन किया तो लाईन कुछ देर होल्ड कराई गई और बाद में टका सा जवाब मिला -‘‘मदाम अभी व्यस्त हैं, फुर्सत मिलते ही आपको फोन करेंगी।‘‘ राजनैतिक वीथिकाओं मंे इन दोनों ही बातों के मतलब तलाशे जा रहे हैं।

माननीयों के लिए लगता है इतना टेक्स!
सरकार ने पेट्रोल के दाम एक बार फिर बढ़ा दिए हैं, जिससे देशव्यापी बहस छिड़ गई है कि आखिर पेट्रोल के वास्तविक दाम क्या हैं? इस पर कितना टेक्स आहूत होता है, और टेक्स से प्राप्त रकम का उपयोग जनता के लिए किस मद में किया जाता है? दरअसल पेट्रोल का वास्तविक मूल्य 28 रूपए 38 पैसे है, इस पर एक्साईज ड्यूटी 14 रूपए 35 पैसे, एजूकेशन सेस 43 पैसे, वैट 10 रूपए 36 पैसे, डीलर कमीशन एक रूपए 21 पैसे, कस्टम ड्यूटी 2 रूपए 64 पैसे, ट्रांसपोर्टेशन चार्जेस छः रूपए लगता है इस तरह दिल्ली में पेट्रोल की कीमत63 रूपए 37 पैसे हो जाती है। इस तरह एक लीटर पर 34 रूपए 99 पैसे का करारोपड़ किया जाता है। रोजाना लाखों लीटर पेट्रोल की खपत है देश मंे। अब सवाल यह है कि इतनी अधिक तादाद में वसूले गए कर का उपयोग सरकार द्वारा किस मद में किया जाता है इसका खुलासा अवश्य ही होना चाहिए।

भ्रष्टाचार से आम आदमी की टूटी कमर!
भ्रष्टाचार पर होने वाले विरोधी जोरदार प्रदर्शनों से साफ हो गया है कि जनता किस कदर इससे आजिज चुकी है। अमेरिकी सर्वेक्षण एजेंसीगैलपके द्वारा कराए गए सर्वेक्षण से साफ हो गया है कि देश की लगभग आधी आबादी ने इसके खिलाफ जंग छेड़ी है। 47 फीसदी लोगों का मानना है कि पांच साल मंे भ्रष्टाचार का स्तर देश में तेजी से बढ़ा है। गैलप के प्रतिवेदन के अनुसार भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन को मिले व्यापक जनसमर्थन से साफ हो गया है कि लोग मानने लगे हैं कि यह समाज में गहराई तक पैठ कर चुकी है। सरकार के प्रयासों को भी लोगों ने नाकाफी ही बताया है। गौरतलब है कि वर्तमान प्रधानमंत्री डाॅक्टर मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि के बाद भी भ्रष्टाचार रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है जिससे जनता बुरी तरह हताश हो चुकी है।

अमूल बेबी को पंप पर धरना देने का मशविरा!
कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने यूपी के भट्टा परसौल गांव जाकर वहां के किसानों के हितैषी होने का बेहतरीन काम किया है। यह उनका स्वांग था या फिर वे वाकई किसानों के हिमायती है, यह तो वे ही जाने पर लोगों ने राहुल को अब देश के लिए कुछ करने का मशविरा दे डाला है। सोशल नेटवर्किंग वेब साईटफेसबुकपर लोगों ने चुनावों के तत्काल बाद ही बढ़े पेट्रोल के दाम पर तल्ख नाराजगी जाहिर करते हुए सरकार और राहुल पर ताने मारे हैं। लोगों का कहना है कि कांग्रेस महासचिव को अब देश के किसी भी पेट्रोल पंप पर उसी तरह बैठ जाना चाहिए जैसा कि वे गे्रटर नोएडा के एक गांव में जाकर बैठे थे। इस पर एक टिप्पणी आई -‘‘कांग्रेस का हाथ गरीब के साथ, किन्तु गरीब पेट्रोल खरीदता ही नहीं!‘‘

मौत का पर्याय बन चुकी हैं दिल्ली की सड़कें
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की सड़कों पर सड़क हादसों में मरने वाली की तादाद देखकर हर कोई दांतों तले उंगली दबा लेता है। आए दिन यहां सड़क हादसों में लोगों के मरने की खबरों से अखबार और समाचार चेनल पटे पड़े होते हैं। अब तो इस मामले में न्यायालय ने भी अपनी तलख टिप्पणी कर दी है। दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायधीश एस.एस.राठी ने 11 साल पुराने एक प्रकरण की सुनवाई के दौरान सजा सुनाते हुए कहा कि एसा लगता है मानो दिल्ली दुर्घटनओं की राजधानी बनकर रह गई है। आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली की सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की तादाद सबसे अधिक है, इसलिए एसे चालकों के खिलाफ किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। यह सब देखने सुनने के बाद भी दिल्ली की सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है और यातायात पुलिस वाले सिर्फ और सिर्फ चैथ वसूली पर ही अपना ध्यान केंद्रित किए हुए हैं।

मोस्ट वांटेड प्रकरण पर तूल देने की अपील
देश के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम का दुस्साहस तो देखिए, पाकिस्तान को सौंपीमोस्ट वांटेडअपराधियों की सूची में शामिल वजाहुल कमर खान जिसे पाकिस्तान में होने का संदेह जताया जा रहा था, वह भारत के मुंबई के ठाणे में ही वघोला स्टेट में अपनी मां और बीबी के साथ मजे से रह रहा है। भारत सरकार द्वारा की गई इतनी बड़ी गल्ति पर गृह मंत्री चिदम्बरम फरमा रहे हैं कि एक नाम गलत होने से क्या होता है, बाकी 49 तो सही हैं, साथ ही यह सूची उनके कार्यकाल में तैयार नहीं हुई थी। सवाल यह उठता है कि कार्यकाल किसी का भी रहा हो गल्ति तो गृह मंत्री की थी। बेहतर होता चिदम्बर इस बारे में अपने ही किसी अन्य साथी का दामन बचाने के बजाए इसकी जांच करने की बात कहते, वस्तुतः एसा हुआ नहीं। आतंकवाद की आग में सुलग रहे भारत के लिए यह एक बड़ी बात है, इससे गृह मंत्री की अक्षमता ही साबित होती है।

महिला निजाम बढ़ीं पर सदन में संख्या गिरी
पांच राज्योें मंे चुनाव के उपरांत तमिलनाडू में जयललिता और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही देश में मायावती और शीला दीक्षित को मिलाकर महिला मुख्यमंत्रियों की तादाद में इजाफा हुआ है। गौरतलब बात यह है कि मुख्यमंत्री पद पर तो महिलाओं ने अपनी जानदार और शानदार उपस्थिति दर्ज कराई है किन्तु सदन में इनकी तादाद में खासी गिरावट दर्ज की गई है। महिला साक्षरता में 93.91 फीसदी और लिंगानुपात में 1084 के सकारात्मक आंकड़े के बावजूद भी केरल में महज पांच फीसदी महिलाएं ही सदन में पहुंची हैं। 1996 में यहां महिला विधायकों की तादाद 13 थी जो घटकर सात पर पहुंची है। इसी तरह तमिलनाडू में पिछली बार 22 के मुकाबले महज 14 ही सदन में प्रवेश पा सकीं हैं। पश्चिम बंगाल में यह संख्या दो बढ़कर 37 हो गई है।

बिना फिटनेस दौड़ रही सरकारी क्रेन!
निजी व्यवसायिक वाहनों के पास अगर फिटनेस प्रमाणपत्र हो तो दिल्ली यातायात पुलिस द्वारा उनकी नाक में दम कर दी जाती है, किन्तु जब खुद की बारी आती है तो महकमे में खामोशी पसर जाती है। दिल्ली के सीताराम बाजार निवासी गणेश दत्त के सूचना के अधिकार आवेदन के जवाब में हैरत अंगेज जानकारी निकल कर आई है। जवाब में कहा गया है कि सरकारी वाहनों को हर साल फिटनेस प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य होता है, किन्तु सड़कों पर दौड़ रही 55 छोटी क्रेन में से महज 33 के पास ही फिटनेस प्रमाण पत्र है अर्थात शेष 22 बिना फिटनेस के ही दौड़ रही हैं। दस सरकारी क्रेन को खरीदी के वक्त फिटनेस दिया गया था दो साल के लिए पर वह भी दुबारा चेक नहीं किया गया है। सच ही कहा है किसी ने सरकार का गोल गोल, और निजी वाहन स्वामी का गोल हाॅफ साईड!

23 फीसदी अधिक टुल्ली हुए दिल्ली वाले
दिल्ली में शराब अब संस्कृति में रच बस गई है। दिल्ली में जाम छलकाने वालों की तो पौ बारह है। सेहत के लिए हानीकारक बताई जाने वाली शराब दरअसल दिल्ली सरकार की सेहत को काफी हद तक सुधार रही है। कम से कम आंकड़े तो यही बयां कर रहे हैं। पिछले साल के मुकाबले इस साल शराब बेचकर दिल्ली सरकार के आबकारी विभाग ने साढ़े तीन सौ करोड़ रूपए अधिक कमाए हैं। 01 अप्रेेल 2010 से 31 मार्च 2011 की आलोच्य अवधि में दिल्ली सरकार के आबकारी विभाग ने 2027 करोड़ रूपए कमाए थे, जबकि 01 अप्रेल 2009 से 31 मार्च 2010 तक की अवधि में यह आंकड़ा 1644 करोड़ रूपयों का था। चालू माली साल में यह लक्ष्य बढ़ाकर 2300 करोड़ रूपए कर दिया गया है। उधर मदर डेयरी दूध के दामों में इजाफा किए जा रही है, मतलब साफ है कि शीला सरकार की मंशा है कि दिल्ली वाले दूध की जगह शराब का सेवन कर सरकार की सेहत सुधारें।

बारिश के बाद करवाएंगे स्वीमिंग!
दिल्ली सरकार अजीब ही है भरी गर्मी से राहत दिलाने में उसकी पेशानी पर पसीने की बूंदे छलक रही हैं। पानी और बिजली की किल्लत चरम पर है। अमूमन मार्च माह से ही तरण ताल यानी स्वीमिंग पूल खोल दिए जाते हैं, पर इस बार मई बीतने को है पर दिल्ली में स्वीमिंग पूल में ताले ही चस्पा हैं। गौरतलब है कि दिल्ली में एक लाख से अधिक लोग गर्मी में स्वीमिंग पूल का उपयोग किया करते हैं। एमसीडी ने छः में से महज दो स्वीमिंग पूल ही खोलकर रखे हैं, डीडीए के 14 स्वीमिंग पूल लाईफ गार्ड के अभाव में बंद ही पड़े हुए हैं। सरकार की लालफीताशाही इस कदर सर चढ़कर बोल रही है कि लाईफ गार्ड के लिए विज्ञापन देना भी उसने मुनासिब नहीं समझा है। हालात देखकर लगने लगा है मानो दिल्ली में इस बार बारिश के उपरांत ही जाड़ों की हाड़ गलाने वाली ठंड में दिल्ली वासियों को स्वीमिंग पूल में तैरना नसीब हो पाएगा।

कानून की धज्जियां उड़ती शीला राज में
देश में 18 साल से कम उमर की महिलाओं का मां बनना अपराध माना जाता है किन्तु दिल्ली में इस कानून का सरेराह माखौल उड़ाया जा रहा है। एक निजी संस्था द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के नतीजे चैंकाने वाले हैं। सर्वे बताता है कि दिलली में 67 फीसदी महिलाएं अस्पतालों के बजाए घरों पर ही प्रसव के लिए मजबूर हैं। इतना ही नहीं 15 से 17 साल की उमर में मां बनने वाली महिलाओं की तादाद 51 फीसदी है। परिवार कल्याण विभाग भले ही परिवार नियोजित करने के उपयों के लिए ढिंढोरा पीटने में करोड़ों अरबों रूपए खर्च कर रहा हो पर 62 फीसदी महिलाओं को इस बात का इल्म नहीं है कि परिवार नियोजित करने के उपाय क्या हैं। तीसरी बार दिल्ली की गद्दी पर बैठी शीला दीक्षित के राज की यह एक भयावह तस्वीर से कम प्रतीत नहीं होता है।

पुच्छल तारा
कभी दिल्ली में दूध दही की नदियां बहती थीं, पर अब दिल्ली में शराब की नदियां बह रही हैं। दिल्ली से मध्य प्रदेश के कटनी लौटे महेश रावलानी ने इसी पर एक ईमेल भेजा है। महेश लिखते हैं कि जब मैने पहली बाद दारू को हाथ लगाया तब मैं अपनी नजरों में गिर गया। पर . . . . जब मैने उन तमाम दारू फेक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की बीवी बच्चों के बारे में सोचा तो मेरी आंख भर आई, और मैने फैसला कर लिया कि अब उनकी खातिर में रोजाना ही पिया करूंगा, ताकि उनके घरों में चूल्हा जल सके। अपने लिए तो सब जीते हैं, कभी दूसरों के लिए भी जीकर देखो मेरे दोस्त।दारूप्रेमी समाजसेवियों के लिए जनहित में जारी।‘‘

रविवार, 22 मई 2011

उच्च शिक्षा में हजारों शिक्षकों के पद रिक्त



सागर विश्विद्यालय में हैं 171 पद रिक्त

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा शिक्षा के सुधार के नाम पर तमाम तरह के दावे अवश्य किए जा रहे हों किन्तु यह सच है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पांच हजार से अधिक पद रिक्त है। मध्य प्रदेश के डाॅ.हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 171 पद रिक्त हैं।
शिक्षकों की कमी के मामले में सबसे अधिक बुरी स्थिति में दिल्ली विश्वविद्यालय है जहां 910, तो बनारस हिन्दु विश्विद्यालय में 905 पद रिक्त हैं। इलाहाबाद विवि में 451, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 269, जवाहरलाल नेहरू में 238, सागर विश्वविद्यालय में 171, जामिया मिलिया में 112 तो एचएन बहुगुणा में 58 पद रिक्त हैं।
इस समय देश में 26 केंद्रीय विद्यालय अस्तित्व में हैं जिनमें समय समय पर रिक्तियां भरने की कवायद की जाती है किन्तु लिखित परीक्षा के उपरांत साक्षात्कार की प्रक्रिया राजनैतिक भंवर मंे ही उलझकर रह जाती है। यही कारण है कि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति या नौकरी छोड़ने के उपरांत इन संस्थानों मंे पदों की रिक्तियां नहीं भर पाती हैं।

गुरुवार, 19 मई 2011

काली लक्ष्मी सफेद लक्ष्मी!



काली लक्ष्मी सफेद लक्ष्मी!


(लिमटी खरे)


भगवान राम के इस देश में लक्ष्मी मैया की कृपा को सभी मोहताज रहते हैं। पहले एचआईजी, एमआईजी, एलआईजी, ईडब्लूएस और बीपीएल श्रेणी में बंटे थे देश वासी। कालांतर में धारणा बदल गई है। अब एचआईजी, ईडब्लूएस और बीपीएल की श्रेणियां ही बची हैं। शेष मध्यम वर्ग का तो सूपड़ा ही साफ हो गया है। इस देश में कमोबेश हर राजनेता फावड़े तो क्या जेसीबी मशीन से धन बटोर रहा है। यह धन आखिर आता कहां से है, क्या सरकार के पास पारस पत्थर है जिसे छुलाकर वह लोहे को सोने में तब्दील कर देती है, जी नहीं इस देश की गरीब जनता का ही धन है जो सरकार करों के रूप में वसूल कर खजाना भरती है फिर अपने कारिंदों को लूटने का अघोषित प्रमाण पत्र प्रदान कर देती है। स्विस जैसे बैंक में भारत का कितना धन जमा है इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। मोटी चमड़ी वाले जनसेवक, लोकसेवको के चेहरे पर फिर भी शिकन नहीं है।

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) द्वारा पिछले दो सालों में भारत गणराज्य में कुल तीस हजार करोड़ रूपयों का काला धन बरामद किया है। सीबीडीटी द्वारा आपराधिक मामलों की जांच के लिए एक प्रथक निदेशालय के गठन पर भी विचार किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसके लिए अपनी सैद्धांतिक सहमति प्रदान कर दी है। कालेधन पर एक सेमीनार में सीबीडीटी के अध्यक्ष सुधीर चंद्रा ने कहा कि सीबीडीटी द्वारा बड़ी मछलियों और सफेद कालर लोगोंके खिलाफ महज सर्च आपरेशन्स में ही सौ करोड़ रूपयों का काला धन बरामद किया जाना अपने आप में देश की अर्थव्यवस्था की नींव के पत्थरों का खोखला होना प्रदर्शित करने के लिए काफी है। 

भारत देश को सोने की चिडि़या कहा जाता था। कहते हैं महमूद गजनवी ने सबसे अधिक लूटा है इस चिडि़या को। इसके बाद ब्रितानी गोरी चमड़ी वालों ने देश को आर्थिक तौर पर कमजोर करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी। उस वक्त गोरे ब्रितानी न केवल हमारी संपदा को लूटते वरन् हमें ही आंख चिढ़ाकर ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति का अनुसरण कर हम पर राज भी किया करते थे। ब्रितानियों ने भारत देख की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह चट करने का प्रयास किया, किन्तु उनके जाने के बाद एक बार फिर हमारी पुरानी पीढ़ी ने देश को आर्थिक तौर पर संपन्न करने का प्रयास किया।

आजादी के चार दशकों के उपरांत देश के जनसेवकों ने अपना चोला बदला और बगुला भगत बन गए। अफसोस तो इस बात का है कि इस देश को महमूद गजनवी और गोरी चमड़ी वाले ब्रितानियों ने उतना नहीं लूटा जितना कि हमारे अपने जनसेवकों और लोक सेवकों ने। अगर दो सालों में तीस हजार करोड़ का काला धन मिले, पौने दो लाख करोड़ का टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो, कामन वेल्थ जैसे घपले और नीरा राडिया जैसे टेप कांड हो जिसमें सरेआम जनसेवकों की काम की फीस तय हो, और ईमानदार किन्तु बेबस, लाचार मजबूर प्रधानमंत्री चुनिंदा संपादकों को बुलाकर अपनी इमेज बिल्डिंग का काम करें तो क्या कहा जा सकता है। लगता है वजीरे आजम देश की लगभग सवा करोड़ जनता नहीं वरन् चुनिंदा टीवी चेनल्स के संपादकों के प्रति जवाबदेह ही हैं।

भारत का काला धन विदेशी बैंक में जमा है। इसे वापस लाने के लिए बाबा रामदेव सहित अनेक विभूतियों ने अभियान छेड़ा, किन्तु उन्हें किंचित मात्र भी सफलता न मिलना इस बात का घोतक है कि देश में काले धन के संग्रहकर्ताओं की लाबी कितनी मजबूत है, कि भारत के ईमानदार छवि वाले वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह भी इस मामले में अपने आप को असहज ही महसूस कर रहे हैं। देश में गरीब गुरबों द्वारा सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हर चीज पर टेक्स दिया जाता है। इस टेक्स से संग्रहित राजस्व से केंद्र और प्रदेशों की सरकारें अपने खर्च चलाती हैं। जनता के पैसे पर एश करने का लाईसेंस अस्सी के दशक के उपरांत जनसेवकों को अघोषित तौर पर मिल चुका है। जनता मंहगाई से कराह रही है, और नेता मंत्री जनसेवक हवाई यात्राओं में मनमाना व्यय कर रहे हैं।

भारत का पैसा जो विदेशों में जमा है उसके बारे में भारत और स्विटजरलेण्ड के बीच हुई दाहरी कराधान संधि का हवाला देकर मामले की हवा निकाल दी जाती है। स्विटजरलैण्ड के आर्थिक मामलों के मंत्री जब भारत आए तो उन्होनंे कहा था कि इस साल जनवरी के उपरांत स्विस बैंक में जमा धनराशि और उनके जमाकर्ताओं के नाम के खुलासे होना संभव हो पाएगा। इस तरह की सूचनाओं का आदान प्रदान जनवरी 2011 के उपरांत ही होना बताया गया था। इससे साफ था कि जनवरी 2011 के पूर्व इस तरह की सूचनाओं का आदान प्रदान नहीं किया जा सकता था।

लगता है कि केंद्र सरकार में शामिल जनसेवकों का काला धन भी विदेशी बैंक में जमा है यही कारण है कि बाबा रामदेव की चिंघाड़ के बावजूद भी केंद्र सरकार द्वारा इस मामले में गोल मोल जवाब ही दिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी दोहरी कराधान संधि पर केंद्र सरकार को जमकर लताड़ा है। कोर्ट ने इसकी उपयोगिता पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा है कि यह किसी भी तरह से काला धन वापस लाने के मामले में कारगर साबित नहीं हो सकती है।

भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे भारत के नीति निर्धारकों द्वारा पता नहीं क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार उठाकर जेहाद करने से पीछे हटा जा रहा है। आज जबकि समूची दुनिया भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई हेतु वचन बद्ध है तब भारत की एक कदम आगे चार कदम पीछे की नीति समझ से परे ही है। गौरतलब होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2003 में एक प्रस्ताव पारित कर ‘यूनाईटेड नेशंस अगेन्सट करप्शन‘ नामक संधि को अस्तित्व में लाया था। इस संधि में 140 से अधिक देशों ने न केवल हस्ताक्षर किए वरन् इसे प्रमाणित और सत्यापित भी किया। विडम्बना देखिए कि भारत गणराज्य ने इस प्रस्ताव पर अंतिम दिन ही हस्ताक्षर किए और आज तक इसे सत्यापित और प्रमाणित नहीं किया है।

इसके उपरांत अमेरिका जैसे देश ने न केवल उन्नीस हजार काले धन के जमा संग्राहकों के नाम पता किए वरन् 780 मिलियन डालर बतौर जुर्माने के भी वसूल लिए। भारत के बारे में किंवदंती के मुताबिक अकेले स्विस बैंक में ही भारत के लोगों के 70 लाख करोड़ रूपए जमा हैं। कई अफवाहों चर्चाओं के अनुसार इसमें मशहूर राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, उद्योगपतियों, सिने अभिनेताओं आदि का बेनामी पैसा जमा है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि जब भी किसी मशहूर हस्ती को ‘वैंटीलेटर‘ पर रखा जाता है तो उसके अंगूठे और उंगलियों के निशान स्विस बैंक के अधिकारियों के सामने सत्यापित कर खाता धारक बदलकर नए अंगूठे या उंगलियों के निशान लगवा दिए जाते हैं। एसा संपादित होने पर वैंटीलेटर हटा दिया जाता है। इस बात में कितनी सच्चाई है यह बात तो उन सभी के परिजन ही जाने पर अफवाहों और चर्चाओं के बारे में कहा जाता है कि बिना आग के धुंआ नहीं निकलता।

हमारा कहना महज इतना ही है कि पैसा तो पैसा ही होता है, यह लक्ष्मी का ही एक रूप माना गया है। दीपावली के दिन धर्म भीरू सनातन पंथी माता लक्ष्मी की पूजा कर इसकी विशेष कृपा के लिए लालयित रहते हैं। लक्ष्मी या पैसा का रंग और रूप कैसा? कैसे किसी धन को काला धन और किसी धन को सफेद धन की संज्ञा दी जा सकती है। अवैध तरीके से धन कमाने पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा सकता है? सब कुछ संभव है पर इसके लिए जरूरी है देश के नीति निर्धारकों की नीयत का साफ होना।

मोंटेक को बनाया जा सकता है आईएमएफ चीफ


योजना आयोग को मिल सकता है नया निजाम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अंतर्राष्ट्री़़य मुद्रा कोष (आईएमएफ) के प्रबंध निदेशक डाॅमनिक स्ट्राॅस पर यौन शोषण के मामले लदने के बाद अब किसी भी क्षण उनकी बिदाई तय मानी जा रही है। स्ट्राॅस के स्थान पर जिन नामों की चर्चाएं हैं उनमें भारत गणराज्य के योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का नाम सबसे उपर चल रहा है।

भारत की कूटनीतिक चालों के चलते मोंटेक को दुनिया के चैधरी अमेरिका का समर्थन हासिल है। गौरतलब होगा कि पहले भी अमेरिका के दबाव में मोंटेक को वित्त मंत्री बनाए जाने हेतु लाबिंग की जा रही थी। सूत्रों के अनुसार मोंटेक अहलूवालिया को इसके लिए यूरोपीय देशों के समर्थन की दरकार होगी।

वैसे इस पद की दौड़ में फ्रांस की वित्त मंत्री क्रिश्चियन लार्गडे, दक्षिण अफ्रीका के पूर्व वित्त मंत्री ट्रवेर मेन्यूअल, टर्की के ग्लेबल इकानाॅमी और विकास कार्यक्रम के उपाध्यक्ष केमल डर्विस, बैंक आॅफ मेक्सिको के गवर्नर अगस्टिन, आईएमएफ के डिप्टी गवर्नर रह चुके स्टेलिन फिशयर आदि के नामों का शुमार है।

गौरतलब है कि आईएमएफ और विश्व बैंक दो एसी वित्तीय संस्थाएं हैं जो देशों को धन मुहैया करती है और इसकी कमान अमेरिका और यूरोपीय देशों के हाथों में होती है। अमेरिका को भारत में बड़ा बाजार दिखाई दे रहा है यही कारण है कि वह भारतीय मूल के मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर दांव लगाने से नहीं चूकेगा। अगर मोंटेक को आईएमएफ का चीफ बनाया जाता है तो फिर देश में योजना आयोग के उपाध्यक्ष के लिए नया चेहरा तलाशना पड़ सकता है।

कांग्रेस ने असंगठित मजदूरों पर डालने आरंभ किए डोरे


दिल्ली में कामवाली बाई लेगी साप्ताहिक अवकाश!

केरल महाराष्ट्र की तर्ज पर कानून का मसौदा तैयार

नई दिल्ली (ब्यूरो)। महाराष्ट्र और केरल की तर्ज पर अब कांग्रेस की दिल्ली राज्य की सरकार द्वारा काम वाली बाईयों को राहत देने के लिए घरेलू कामगार एक्ट बनाने जा रही है, जिसके तहत काम वाली बाई को साप्ताहिक अवकाश के साथ ही साथ अन्य सुविधाएं लेने की पात्रता होगी। एसा नहीं करने पर कानूनी कार्यवाही का प्रावधान भी किया गया है।

दिल्ली सरकार के श्रम विभाग के सूत्रों का कहना है कि विभाग द्वारा काम वाली बाईयों के हितों को ध्यान मंे रखते हुए सप्ताहिक अवकाश, न्यूनतम वेतन और अन्य सुविधाओं का खाका तैयार किया है। इस सबका फायदा वे ही उठा पाएंगी जो इसमें अपना पंजीयन करवाएंगी।

सरकार द्वारा इनके बच्चों की शिक्षा दीक्षा को भी ध्यान मंे रखते हुए बच्चों को पढ़ाने के विकल्प पर विचार कर रही है। गौरतलब होगा जबसे भारतीय जनता पार्टी द्वारा असंगठित मजदूरों को केंद्रित कर एक अलग शाखा का गठन कर प्रहलाद सिंह पटेल को इसका अध्यक्ष बनाया है तबसे कांग्रेस की नजर असंगठित मजदूरों पर ज्यादा ही इनायत हो रही है।

बुधवार, 18 मई 2011

प्रहलाद पटेल को लाया जा सकता है मुख्य धारा में


गड़करी तलाश रहे हैं सही तारणहार

चर्चा में है गड़करी का ब्राम्हण बनिया प्रेम

पांच राज्यों में भाजपा के प्रदर्शन से उखड़ा है भाजपाध्यक्ष का मूड

रामलाल पर साध रहे विरोधी निशाना

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। पांच राज्यों में आठ सौ से ज्यादा सीटों के बावजूद भी महज छः सीट मिलने से भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलक आई हैं। भाजपाध्यक्ष को लगने लगा है कि उन्हें जिस चैकड़ी ने घेर रखा है उसके सहारे अगले साल होने वाले आम चुनावों में भाजपा कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाएगी।

केंद्र में सत्ता की मलाई चखने का सपना देखने वाली भारतीय जनता पार्टी द्वारा हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडू, पड्डिचेरी और केरल में कुल 824 सीटों में से एक फीसदी अर्थात आठ सीट भी नहीं जीत पाई है। पार्टी को असम में पांच और बंगाल में महज एक सीट ही मिल पाई है। भाजपा के अंदर ही अंदर अब यह बात होने लगी है कि खुद को राष्ट्रीय पार्टी और केंद्र में सरकार बनाने का दावा करने वाली भाजपा इन राज्यों में आखिर फेल क्यों हो गई। कहीं इसके पीछे गड़करी का ब्राम्हण बनिया प्रेम तो नहीं?

भाजपा में वर्चस्व की मची जंग के चलते दूसरी पंक्ति के नेता कमल की जड़ों को मजबूत करने के बजाए एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। उधर भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी को भाजपा के अंदर मनमोहन सिंह कहा जा रहा है, क्योंकि दोनों ही चुनाव लड़ने से परहेज करते आए हैं।

भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भाजपा के नए नवेले संगठन मंत्री रामलाल द्वारा भी गड़करी के ब्राम्हण बनिया के एजेंडे को हवा दी जा रही है। सूत्रों की मानें तो रामलाल द्वारा रघुवरदास से लेकर विजय गोयल को बेक सपोर्ट दिया जा रहा है। सूत्रों ने कहा है कि पांच राज्यों के चुनावों के उपरांत अब गड़करी संगठन में युवा और उर्जावान चेहरों को विशेष स्थान देने पर विचार कर रहे हैं। इसी तारतम्य में पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के असंगठित मजदूर संघ के अध्यक्ष प्रहलाद सिंह पटेल को उनकी वर्तमान जवाबदारी के साथ ही साथ संगठन में महत्वपूर्ण पद पर काबिज किया जा सकता है।

यूपी में फिर प्रकाशित होंगे कांग्रेस के पुराने अखबार



फिर आरंभ होगा कांग्रेस के मुखपत्रों का प्रकाशन

नई दिल्ली (ब्यूरो)। उत्तर प्रदेश के सेमीफायनल पर कांग्रेस का भविष्य टिका है, यही कारण है कि यूपी में कांग्रेस कोई भी मौका छोड़ने को तैयार नहीं है। राहुल और सोनिया गांधी नपी तुली रणनीति के हिसाब से यूपी में अपनी बिसात बिछाते जा रहे हैं। इसी तारतम्य में जल्द ही उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के मुखपत्रों नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज का पुर्नप्रकाशन आरंभ होने वाला है।
कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कार्यकर्ताओं तक कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी की आवाज पहुंचाने के लिए पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा बनाए गए ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित इन अखबारों का प्रकाशन आरंभ करवाया जाने वाला है। गौरतलब होगा कि वित्तीय संकट के चलते अप्रेल 2008 में इन्हें बंद कर 40 पत्रकारों और 265 कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृति प्रदान कर दी गई थी।
सूत्रों ने आगे बताया कि राहुल गांधी के राजनैतिक सलाहकारों ने उन्हें मशविरा दिया है कि नवजीवन और कौमी आवाज को लखनऊ से तथा नेशनल हेराल्ड को लखनऊ के साथ ही साथ दिल्ली से प्रकाशित करवाया जाए। जल्द ही इसके लिए भर्तियां भी होने वाली हैं। कहा जा रहा है कि इसका प्रकाशन पंडित नेहरू के जन्म दिन अर्थात बाल दिवस से किया जा सकता है।

मंगलवार, 17 मई 2011

कर्नाटक प्रकरण: कटघरे में राजनैतिक शुचिता



कर्नाटक प्रकरण: कटघरे में राजनैतिक शुचिता

 (लिमटी खरे)


हाशिए में गए कांग्रेस के पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज पुनः सक्रिय राजनीति में लौटने लालायित दिखाई दे रहे हैं। जानकारों का मानना है कि वे अनाप शनाप फैसले इसलिए ले रहे हैं, ताकि कांग्रेस आलाकमान उनका राजनैतिक वनवास समाप्त कर केंद्रीय मंत्री मण्डल में उन्हें वापस बुला ले। गौरतलब होगा कि पूर्व मंे बूटा सिंह ने राज्यपाल रहते कांग्रेस को नीचा दिखाया बाद में उन्हंे वापस बुला लिया गया था। यह अलहदा बात है कि उनका राजनैतिक पुनर्वास पूरी तरह से नहीं हो सका था। भाजपा जिस तरह से आक्रमक हो रही है, उसे देखकर लगने लगा है कि जल्द ही भारद्वाज की राजभवन से बिदाई तय है। इस घिनौने खेल में राजनैतिक शुचिता और राजभवन की गरिमा तार तार हुए बिना नहीं है। विधि मामलों के महारथी हंसराज भारद्वाज से इस तरह के कदम की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती है।

कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है, उसे समूचा देश देख रहा है। पांच राज्यों के चुनाव भी समाप्त हो चुके हैं इसलिए इस वक्त बर्निंग टापिक कर्नाटक ही है। अगर चुनाव के चलते यह हुआ होता तो देश की निगाहें इस पर ज्यादा न जाती और मीडिया भी इस खबर को ज्यादा तवज्जो नहीं देता। वस्तुतः जल्दबाजी में कर्नाटक के महामहिम राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर डाली,जिसे आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। भारद्वाज ने येदियुरप्पा को हटाने की कोशिश तीसरी मर्तबा की है, इससे साफ है कि उनका एक सूत्रीय एजेंडा कर्नाटक में तख्ता पलट ही है।

अमूमन माना जाता है कि महामहिम राज्यपाल अपने विवेक के हिसाब से ही काम करते हैं। पिछले दो तीन दशकों का इतिहास खंगालने पर यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि केंद्र सरकार या अपने आकाओं को प्रसन्न करने की गरज से राज्यपाल आकाओं के इशारे पर ठुमके लगाते नजर आए हैं। इस बार भी बिना सोनिया गांधी या उनकी कोटरी की हरी झंडी के यह संभव नहीं दिखता। हंसराज भारद्वाज कानून मंत्री रहे हैं, और खुद भी कानून के खासे जानकार हैं। इसलिए यह कहना गलत होगा कि उन्होंने इस मामले के सारे पहलुओं पर विचार न किया हो।

एक नेता के रूप में हंसराज भारद्वाज काफी सजग, होशियार और सोच समझकर कदम उठाने वालों में गिने जाते हैं। हो सकता है कि कर्नाटक प्रकरण से वे एक तीर से कई निशाने साध रहे हों। वैसे भी किसी भी नेता को अगर राज्यपाल बनाकर भेजा जाता रहा है तो यह माना जाता था कि उसका राजनैतिक कैरियर समाप्त हो गया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह ने इस मिथक को तोड़ा था। मध्य प्रदेश में दूसरी मर्तबा मुख्यमंत्री बनने के उपरांत जब उन्हें दूसरे ही दिन पंजाब का गर्वनर बनाया गया था, तब लोग यही कह रहे थे कि अर्जुन सिंह का खेल खत्म, किन्तु बाद में वे सक्रिय राजनीति में लौटे और सालों तक केंद्र की राजनीति की।

बहरहाल उच्चतम न्यायालय द्वारा भाजपा के 11 विद्रोही और पांच निर्दलीय विधायकों को अयोग्य करार करने संबंधी विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को खारिज कर दिया, जिससे युदियुरप्पा को कड़ा झटका लगा। इस फैसले के हिसाब से कर्नाटक के लाट साहेब को सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करना अनुचित इसलिए है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया है अब कोई सरकार अल्पमत में है या बहुमत में इसका फैसला करने का अधिकार सदन को ही है।

विधि अनुसार अगर राज्यपाल को लग रहा था कि येदियुरप्पा सरकार अल्पमत में है तो महामहिम राज्यपाल को चाहिए था कि वे मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने को कहते। कथित रूप से हड़बड़ी में हंसराज भारद्वाज ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश ही कर डाली। इस बात में कोई संदेह की गुंजाईश नहीं है कि राज्यपाल के इस कदम से राजनैतिक शुचिता और राजभवन की गरिमा को ठेस पहुंची है।

इस पूरे प्रहसन में न्यायालय के आदेश के बाद जिस तेजी और तत्परता से राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने विशेष रिपोर्ट तैयार कर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की है उसी मुस्तैदी के साथ बागी विधायकों ने कथित तौर पर बिना शर्त युदियुरप्पा को समर्थन देने की चिट्ठी तैयार कर दी। कहते हैं राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में छः अक्टूबर 2010 के उस ज्ञापन को आधार बनाया है जिसमें विधायकों ने युदियुरप्पा से समर्थन वापस लेने की बात कही थी। 10 अक्टूबर को राज्यपाल भारद्वाज ने सरकार की बर्खास्तगी की सिफारिश की थी, जिसे केंद्र ने लौटा दिया था।

इस बार चूंकि भाजपा पर यह सीधा वार किया गया है तो भाजपा तिलमिला गई है। वैसे भी गड़करी के पुत्र के विवाह समारोह की सारी जवाबदारियां (आर्थिक तौर पर) येदियुरप्पा द्वारा उठाए जाने के आरोप लगते रहे हैं, इस आधार पर गड़करी का येदियुरप्पा प्रेम बढ़ना स्वाभाविक ही है। भाजपा इस मामले में फ्रंट फुट पर आ गई है तो कांग्रेस अब रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई पड़ रही है। कांग्रेस द्वारा भी विधि विशेषज्ञों से इस मामले में राय शुमारी की जा रही होगी। इस बात का रास्ता निकालने का प्रयास किया जा रहा होगा कि लाट साहेब हंसराज भारद्वाज के कदम को जायज ठहराया जा सके। 

भारद्वाज के इस तरह के कदम से नितिन गड़करी को कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका अवश्य ही मिल गया है, किन्तु भाजपा कांग्रेस को घेरने मंे कितने सफल हो पाते हैं यह बात भविष्य के गर्भ में ही है। फिलहाल तो गड़करी ने कांग्रेस को मशविरा दिया है कि बेहतर होगा भारद्वाज को राज्यपाल पद से हटाकर कांग्रेस कार्यसमिति का विशेष आमंत्रित बना दिया जाए। 

उमश्री के स्वास्थ्य में गिरावट


उमश्री के स्वास्थ्य में गिरावट

अंतिम सांस तक गंगा के लिए संघर्ष का कौल

नई दिल्ली (ब्यूरो)। गंगा की सफाई के लिए अनशनरत फायर ब्रांड साध्वी उमा भारती के स्वास्थ्य में गिरावट दर्ज की गई है। हरिद्वार में चंडी घाट पर अनशनरत उमा भारती ने अंतिम सांस तक गंगा के लिए संघर्ष करने की बात कही है। उमा ने आरोप लगाया है कि गंगा की सफाई के प्रति कांग्रेसनीत केंद्र और राज्य सरकर गंभीर नहीं है।
प्रेम सेवा मिशन के अनशन स्थल पर मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने कहा कि गंगा माता के लिए अगर उन्हें अपने प्राणों की आहूति भी देनी पड़ी तो उन्हें गर्व होगा। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड से बड़ी तादाद में आए लोगों को संबोधित करते हुए उमा भारती ने कहा कि देश की सरकारें गंगा के साथ लंबे अर्से से घिनौना खिलवाड़ कर रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में आश्वासनों की तो लंबी फेहरिस्त है किन्तु कार्य रूप में परिणित आश्वासनों की तादाद नगण्य ही है। उमा भारती ने कहा कि इस मामले में उनका मकसद राजनीति करना नहीं वरन् गंगा को बचाना है।

सत्ता के कंेद्र से मलयाली लाबी का दबदबा घटा


शीर्ष पदों की दौड़ से एमपी बाहर

मध्य प्रदेश के नौकरशाहों के लिए लामबंद नहीं हैं जनसेवक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय प्रशासनिक सेवा की एमपी काडर की वरिष्ठ अधिकारी अलका सिरोही अब कैबनेट सचिव की दौड़ में पिछड़ती दिख रही हैं। वहीं गृह और रक्षा सचिव पदों के लिए जोड़तोड़ में एमपी काडर के आईएएस पिछड़ते ही नजर आ रहे हैं। इस बार जो नाम सामने आ रहे हैं, उसे देखकर आभास होने लगा है कि देश के की पोस्ट पर अब मलयाली लाबी का दबाव कम होता जा रहा है।
हाल में कैबनेट, रक्षा और गृह सचिव के रिक्त होने वाले पदों के लिए जो नाम सामने आए हैं उनमंे कैबनेट सचिव के.एम.चंद्रशेखर के स्थान पर अलका सिरोही से आगे पुलक चटर्जी और अजित सेठ के नामों की चर्चा हो रही है। वहीं गृह सचिव जिस पर जी.के.पिल्लई विराजे हैं जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए बिहार काडर के 1975 बैच के अधिकारी राज कुमार सिंह, मणिपुर काडर के 76 बैच के अनवर अहमद, हरियाणा काडर की 76 बैच की अनिता चैधरी, सी बैच के बिहार काडर क शशिकांत शर्मा के नामों की चर्चाएं हैं।
जुलाई में प्रदीप कुमार की सेवानिव्त्ति के कारण रिक्त होने वाले रक्षा सचिव पद के लिए शशि कांत शर्मा, यूपी के 76 बैच के पी.के.मिश्रा के नाम दौड़ में सबसे आगे हैं। कैबनेट सेकेरेटरी चंद्रशेखर 13 जून, गृह सचिव पिल्लई 30 जून तो रक्षा सचिव प्रदीप कुमार 31 जुलाई को सेवानिवृत होने वाले हैं।

राजमार्गों पर अब चैबीसों घंटे एम्बूलेंस सेवा


राजमार्गों पर अब चैबीसों घंटे एम्बूलेंस सेवा

पिछले साल डेढ़ लाख से अधिक लोग मारे गए सड़क हादसों में

हर पचास किलोमीटर पर तैनात होंगी एम्बूलेंस

नई दिल्ली (ब्यूरो)। स्वर्णिम चतुर्भुज और उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम चतुष्गामी पथ भले ही अटल सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजना रही हो पर कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के कार्यकाल में यह परवान चढ़ रही है। हेमा मालिनी के गाल के मानिंद बनने वाली इन सड़कों के बारे में कहा जाता है कि इन पर चलने में पेट का पानी भी नहीं हिलता। जाहिर है गति बढ़ेगी और दुर्घटनाएं भी। इन दुर्घटनाओं से बचने के लिए केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय ने नई कार्ययोजना तैयार की है जो 30 मई से लागू हो जाएगी।
सरफेस ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की तादाद में तेजी से होने वाले इजाफे पर विभाग चिंतित है और विभाग ने इस हेतु चैबीसों घंटे राष्ट्रीय राजमार्ग पर एडवांस लाईफ सपोर्ट एंबूलेंस की तैनती करने का मन बनाया है। नई योजना के अनुसार हर पचास किलोमीटर पर इस तरह की एंबूलेंस तैनात होगी। इसके लिए 400 एम्बूलेंस को अस्पतालों से निकालकर सड़कों पर पहुंचाया जाएगा।
इन एंबूलेंस की सही स्थिति का पता लगाने के लिए इन्हें जीपीएस से सुसज्जित किया जाएगा। इनमें आक्सीजन, डाक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और अन्य उपकरण भी होंगे। सड़कों की लंबाई को देखते हुए विभाग बड़ी तादाद में एम्बूलेंस खरीदने का मन बना रहा है।
गौरतलब है कि 2009 में भारत में लगभग साढ़े चार लाख सड़क हादसों में एक लाख 25 हजार 864 लोग मारे गए थे। वर्ष 2010 में यह आंकड़ा पौने दो लाख तक पहुचने का अनुमान है। यहां उल्लेखनीय होगा कि एक अनुमान के अनुसार दुनिया के चैधरी अमरिका में हर साल पांच लाख के करीब सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, किन्तु उनमें मरने वालों की तादाद महज पचास हजार के लगभग ही होती है।

सोमवार, 16 मई 2011

कहां गए पीएम की मंहगाई कम करने वाले दावे



कहां गए पीएम की मंहगाई कम करने वाले दावे

(लिमटी खरे)


भारत गणराज्य में पहली बार एसा हुआ होगा जब अर्थ शास्त्री वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह देश में मंहगाई को कम करने में असफल साबित हुए हैं। बार बार मंहगाई पर नियंत्रण की तिथियां देने के बाद भी मंहगाई का जिन्न देश के निरीह नागरिकांे को निगल रहा है, किन्तु सरकार हाथ पर हाथ रखे बैठी है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के साथ ही साथ जिंसों के दाम एक के बाद एक करके आसमान को छू रहे हैं, भण्डारण के अभाव मंे अनाज सड़ रहा है, अदालतें गरीबों को अनाज सड़ने के स्थान पर मुफ्त बांटने की बात कहती है, किन्तु सरकार मौन साध लेती है। जनसेवकों के वेतन भत्तों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है, उनकी सुख सुविधाओं में इजाफे पर इजाफा हो रहा है, और जनता की जेब में होने वाला सुराख और बढ़ते ही जा रहा है।


सोने से मंहगा हीरा होता है, किन्तु भारत देश में सोने से मंहगा पेट्रोल है। जी हां, यह सच है पिछले 21 सालों में पेट्रोल के दामों में आठ गुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। सोने में इस अवधि में महज साढ़े सात गुना वृद्धि दर्ज की गई है। 1990 में सोना 3200 रूपए तो पेट्रोल आठ रूपए लीटर था। अब पेट्रोल 63 रूपए तो सोना 22 हजार 260 रूपए तोला है। राज्यों में विधानसभा चुनावों के समाप्त होते ही कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा मंहगाई की लगाम छोड़ दी गई है। यह लगाम अगले साल मार्च में एक बार फिर थाम ली जा सकती है क्योंकि मई में आम चुनाव जो होने हैं।

हाल ही में पेट्रोल की कीमतों में पांच रूपए की बढ़ोत्तरी के बाद अब रसोई गैस और डीजल की दरों में इजाफे के संकेत से आम आदमी की रूह कांपने लगी है। चुनावी माहों को छोड़कर बाकी समय देश के आम नागरिक पर कीमतों में इजाफे की तलवार सदा ही लटकती रही है। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार द्वारा माननीयों (सांसदों और विधायकों) की सुख सुविधाओं की तमाम चीजों को उपलब्ध कराने में कोई कमी नही की है। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में जहां कांग्रेस की सरकार है, का ही उदहारण अगर लिया जाए तो यहां एक साल में पेट्रोल की कीमतों में 32 फीसदी, दूध की कीमतों में 28 फीसदी, बैंक की ईएमआई में 18 फीसदी, दवाओं में 17 फीसदी तो स्कलों की फीस में 10 से 40 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है।

भाजपा शासनकाल में कच्चे तेल के भाव आसमान छू रहे थे, किन्तु अटल सरकार ने इसका प्रभाव आम उपभोक्ता पर नहीं पड़ने दिया गया। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में खाड़ी युद्ध के कारण पेट्रोलियम पदार्थों पर तीन रूपए का खाड़ी अधिभार लगाया गया था, युद्ध समाप्त हुए आज ढाई दशक के लगभग बीत चुका है, पर खाड़ी अधिभार आज भी देश के लोग देने पर मजबूर ही हैं।

पेट्रोल की कीमतों मंे लगी आग पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो 13 जून 2009 को इसके दाम 40 रूपए 62 पैसे, 2 जुलाई को 44 रूपए 63 पैसे, 27 अक्टूबर को 44 रूपए 72 पैसे, 04 मार्च 2010 को 47 रूपए 43 पैसे, 01 अप्रेल को 47 रूपए 93 पैसे, 26 जून को 51 रूपए 43 पैसे (सरकारी नियंत्रण से मुक्ति के पहले), 01 जुलाई को 51 रूपए 45 पैसे, 8 सितंबर को 51 रूपए 56 पैसे, 21 सितम्बर को 51 रूपए 83 पैसे, 17 अक्टूबर को 52 रूपए 55 पैसे, 02 नवंबर को 52 रूपए 59 पैसे, 09 नवंबर को 52 रूपए 91 पैसे, 16 दिसंबर को 55 रूपए 87 पैसे, 16 जनवरी 2011 को 58 रूपए 37 पैसे और 14 मई को 63 रूपए 37 पैसे थी।

केंद्र सरकार द्वारा जून 2010 में पेट्रोल के दाम नियंत्रणमुक्त कर दिए गए थे, तब से अब तक 09 बार पेट्रोल के दामांे में वृद्धि की गई है। पिछले दो सालों में 23 तो ग्यारह माहों में इसके दाम 18 रूपए से ज्यादा बढ़ा दिए गए हैं। पेट्रोल पर लगने वाले करों को देखकर आम आदमी के होश फाख्ता हो सकते हैं। प्रति लीटर पर 14 रूपए 35 पैसे एक्साईज ड्यूटी, साढ़े सात फीसदी की दर से 2 रूपए 65 पैसे कस्टम ड्यूटी, बीस फीसदी की दर से 7 रूपए 05 पैसे वैट, एजुकेशन सेस के रूप में एक रूपए एवं अन्य करों के रूप में 3 रूपए 08 पैसे का करारोपण कर कुल 28 रूपए 13 पैसे का कर लगाया जा रहा है।

पेट्रोल की दरों के बढ़ने से आम उपभोक्ता की कमर भले ही टूटी हो किन्तु सरकारों की इसे पौ बारह हो गई हैं। केंद्र और राज्य सरकारें प्रति लीटर में प्रतिशत के हिसाब से कर वसूला करती हैं। वैट चार्ज अगर देखा जाए तो आंध्र प्रदेश में यह 33 फीसदी तो पड्डिचेरी में 15 फीसदी है। अनेक राज्यों में 12 फीसदी वैट लगाया जा रहा है। इस लिहाज से पेट्रोल की कीमतें 5 रूपए बढ़ाने से सरकारों की झोली में करोड़ों रूपयों का राजस्व आ रहा है।।

देखा जाए तो लीबिया संकट के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की दरों में बढ़ोत्तरी के चलते इनके दामों में साढ़े दस रूपए की वृद्धि की जानी थी। अभी पांच रूपए ही कीमत बढ़ी है, आने वाले समय में साढ़े पांच रूपए की वृद्धि से इंकार नहीं किया जा सकता है। दरअसल सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सीडी के चलते सरकार को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। सबसे अधिक गफलत मिट्टी के तेल यानी केरोसिन में होती है। डीजल से चलने वाले यंत्रों और वाहनों में केरोसीन का उपयोग धड़ल्ले से किया जाता है। केरोसीन में सब्सीडी है, और इस सब्सीड़ी का लाभ गरीबों के बजाए अमीर सबसे ज्यादा उठा रहे हैं। सरकार अब तक कोई एसी ठोस कार्ययोजना नहीं बना पाई है कि गरीबों की थाली में से निवाले निकालने वाले इन अमीरों के खिलाफ कोई कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।

एक अन्य दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में सूबों की जनता ने बहुत ही उम्मीद और उत्साह के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का साथ दिया है, यह उनके साथ सीधा सीधा छल है। कल तक केंद्र सरकार के इस तरह के कदमों पर चीखने वाली ममता बनर्जी के लिए मौजूदा हालात एक बयान जारी करने लायक भी नहीं बचे हैं। किसानों के हितैषी होने का स्वांग भरने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ग्रेटर नोएडा जाकर अनशन पर बैठ सकते हैं, पर क्या वे अब किसी पेट्रोल पंप पर अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठने का साहस जुटा पाएंगे? कितने आश्चर्य की बात है कि जो सरकर चुनाव पूर्व पेट्रोल के दाम में एक रूपए की बढ़ोत्तरी करने को राजी नहीं थी, वह अचानक ही पांच रूपए दाम बढ़ाने पर कैसे राजी हो गई?

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें सिर्फ गरीबों के लिए ही बढ़ी दिख रही हैं। तेल कंपनियों ने न जाने किस दबाव में आकर अमीरों की पसंदीदा सवारी हवाई जहाज और हेलीकाप्टर के ईंधन के दाम घटा दिए हैं। विमान ईंधन एटीएफ का दाम दो दशमलव नौ फीसदी घटाया गया है। एटीएफ के दाम 1,766 रूपए किलोलीटर घटकर अब 58 हजार 794 रूपए प्रति किलोलीटर हो गए हैं।

विपक्ष और सत्ताधारी दल की जुगलबंदी और कदमताल देखकर लगता है कि विपक्ष सड़कों पर उतरकर औपचारिकता ही पूरी करेगा। विपक्ष से सरकार पर दबाव बनाने की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। अब चुनाव आयोग ही इकलौती एसी संस्था बचती है जिससे संज्ञान लेने की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि चुनावों के पूर्व सरकारों द्वारा अपने महत्वपूर्ण फैसले टालकर देश की अर्थव्यवस्था से खिलवाड़ किया जा सकता है। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इक्कीसवीं सदी की कांग्रेस के नेतृत्व में देश के रहवासियों को लुटते, पिटते, घिसते रहना नियति बनकर रह गया है।

रविवार, 15 मई 2011

बच्चों के प्रति लापरवाह सरकारें



बच्चों के प्रति लापरवाह सरकारें

(लिमटी खरे)


सरकार चाहे केंद्र की हो राज्य की, सियासी दल चाहे जो भी हो, जनसेवक किसी भी मानसिकता का हो, हर कोई अपने आप को देश और समाज के उत्थान के प्रति अपने आप को पूरी तरह से समर्पित बताने से नहीं चूकता है। अपनी घोषित प्राथमिकताओं के प्रति ये सारे के सारे ठेकेदार कितने संजीदा हैं इस बात का पता देश की सबसे बड़ी अदालत के द्वारा प्राथमिक विद्यालयांे की दुर्दशा को देखकर लगाई गई जबर्दस्त फटकार से लगाया जा सकता है। केंद्र और राज्य के लिए शर्म की बात है कि पहली कक्षा से पांचवी कक्षा तक के बच्चों को वे बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं करा पा रही हैं। देश के जनसेवक और लोकसेवक निहित स्वार्थों मंे पूरी तरह उलझकर रह गए हैं, यही कारण है कि देश के शिक्षण संस्थान बद से बदतर स्थिति को प्राप्त होते जा रहे हैं।


सर्वोच्च न्यायालय ने प्राथमिक विद्यालयों की दुर्दशा पर विभन्न राज्यों की सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए फटकार लगाई है। सरकारों के लिए डूब मरने वाली बात है कि जिस मामले में उन्हें संज्ञान लेना चाहिए उस मामले में न्यायालय द्वारा उन्हें कड़ी फटकार के साथ दिशा निर्देश जारी करने पड़ रहे हैं। शिक्षा आज व्यवसाय बन चुका है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कुकुरमुत्ते के मानिंद गली गली में स्कूल खुल चुके हैं। केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद भी सरेआम कैपिटेशन फीस ली जा रही है। कमीशन के चक्कर में दुकान विशेष से शाला का गणवेश और कोर्स की किताबें लेने मजबूर किया जा रहा है। इन सब बातों को रोकने के लिए पाबंद जिलों में तैनात जिला शिक्षा अधिकारी सरेराह लूटने वाले इन शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन के एजेंट के बतौर काम करने लगे हैं।

अमूमन हर शाला में बच्चों से बिल्डिंग फंड, विकास शुल्क, कंप्यूटर शुल्क, क्रीड़ा शुल्क, पुस्तकालय शुल्क आदि की मद में भारी भरकम राशि ली जाती है। जिला शिक्ष अधिकारी अगर शालाओं मंे जाकर नए बने किन्तु जर्जर शाला भवन, बिना कांच की खिड़कियां, खराब बिना इंटरनेट कनेक्शन वाले कंप्यूटर, पथरीले खेल के मैदान, बिना किताबों वाले पुस्तकालय देखें तो वास्तविक स्थिति काफी हद तक सामने आ सकती है। विडम्बना ही कही जाएगी कि चंद सिक्कों की खनक के आगे जिलों में तैनात शिक्षा अधिकारियों द्वारा नौनिहालों का भविष्य और अपना ईमान ही गिरवी रख दिया जाता है।

शहरों में आबादी के बोझ के कारण निजी तौर पर संचालित शिक्षण संस्थानों ने अपने शाला भवन आबादी से काफी दूर बना रखे हैं। घर से दस पांच किलोमीटर दूर शाला भवन में पहली से लेकर पांचवी दर्जे तक का बच्चा ठंड के दिनों में किस तरह दिन काटता होगा यह सोचकर ही सिहरन पैदा हो जाती है। हद तो तब होती है जब ठंड के मौसम में बिना कांच वाली खिड़कियों से सर्द गलाने वाली हवाओं के झौंके कक्षा के अंदर प्रवेश करते हैं। आसपास खेतों में होने वाली सिंचाई भी मौसम को और अधिक ठंडा बना देती है। निष्ठुर शाला प्रबंधन तब भी अपनी शाला को अलह सुब्बह ही लगाने का हिटलरी फरमान वापस भी नहीं लेता है।

बहरहाल एक जनहित याचिका की सुनवाई पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट आॅफ इंडिया ने मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड़ झारखण्ड, पंजाब सहित 13 सूबों को फटकार लगाते हुए उनके राज्यों के प्राथमिक विद्यालयों में एक माह की समयावधि में पेयजल और छः माह के अंदर ढांचागत सुविधाएं मुहैया करवाने के निर्देश दे दिए हैं। सर्वोच्च न्यायायल की फटकार के बाद वास्तविक स्थिति सामने आ गई है कि राज्यों की सरकारें देश के नौनिहालों की पढ़ाई लिखाई और सुविधाओं के प्रति कितनी संजीदा हैं।

राज्यों की सरकारें अपने और कंेद्रीय स्तर पर संचालित होने वाले सरकारी स्कूलों के साथ तो दोयम दर्जे का व्यवहार कर रही हैं। जिलों में तैनात जिलाधिकारी, प्रभारी अधिकारी उप जिलाधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारियों द्वारा भी इस दिशा में ध्यान न दिया जाना आश्चर्यजनक ही है। जिलों में निजी तौर पर संचालित होने वाली शिक्षण संस्थाओं द्वारा शिक्षा को व्यवसाय बनाकर पालकों को सरेआम लूटा जा रहा है। यह निश्चित तौर पर सरकारों का सिर शर्म के साथ झुकाने वाली बात है कि हजारों की तादाद में प्राथमिक शालाओं की फेहरिसत आज भी जिंदा है जिसमें पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है। जहां पानी ही नहीं है वहां तो शौचालय, बिजली, पंखो, फर्नीचर तो दूर की कौड़ी होगी।

प्राथमिक स्तर के अलावा हाई और सेकन्ड्री स्तर पर तो और भी कमियां हैं। यह तो मूल समस्या है ही मगर शिक्षकों की कमी सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। एक तो शिक्षकों की कमी उपर से शिक्षकों को जन गणना, परिवार कल्याण, पल्स पोलियो जैसे कामों में बतौर बेगार कराने से शिक्षकों द्वारा पढ़ाई के काम में दिलचस्पी नहीं ली जाती है। अनेक राज्य तो एसे भी हैं जहां शिक्षकों के रिक्त पदों की संख्या हजारों में है। कंेद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना ‘सर्व शिक्षा अभियान‘ में शिक्षकों की कमी के चलते भी जो आंकड़े और कागजी खाना पूरी सामने आ रही है उससे प्रतीत होता है कि नौकरशाह और जनसेवक मिलकर जनता को सरेआम बेवकूफ बनाने पर ही आमदा हैं। देश के नीति निर्धारकों को इस बात को समझना ही होगा कि इस तरह से आंकड़ों की बाजीगरी कर वे देश के भविष्य के साथ किस कदर खिलवाड़ कर रहे हैं।

बच्चों के कल्याण का कथित तौर पर ठेका लेकर समाज सेवा का दंभ भरने वाली सामाजिक संस्थाएं और गैर राजनीतिक दल भी इस गंभीर मसले पर चुप्पी ही साधे बैठे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता दिनों दिन गिरती जा रही है। शिक्षा को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा नित नए प्रयोग किए जाते रहे हैं। जब जिस शासक का मन चाहा उसने अपने हिसाब से शिक्षा का स्वरूप ही बदल दिया। शिक्षा को प्रयोगशाला बनाना कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने राष्ट्र, पालक, बच्चों, समाज आदि के साथ सरेआम धोखाधड़ी की जा रही है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। मोटी चमड़ी वाले शासकों पर अब अनैतिक बातों के खिलाफ होने वाली चीत्कार का कोई असर नहीं होता है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि शिक्षा का व्यवसायीकरण हर हाल में रोकना ही होगा। शिक्षा को पैसा कमाने का व्यवसाय समझना निश्चित तौर पर अनुचित है। किसी ने सच ही कहा है कि अगर समूचे कुंए में ही भांग घुली हो तो मोहल्ले या गांव का तो भगवान ही मालिक है।

राय या त्रिवेदी हो सकते हैं नए रेल मंत्री


जल्द ही फिटेंगे केंद्र में पत्ते

फुल टाईम रेल मंत्री मिलेगा भारत गणराज्य को

उद्योग मंत्रालय पर भी है ममता की नजर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। विधानसभा चुनावों के परिणामों का असर जल्द ही कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पर पड़ने वाला है। जल्द ही केंद्र में वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह अपने मंत्रीमण्डल का पुर्नगठन करने वाले हैं। इसमें जयललिता और ममता बनर्जी का पडला भारी होने की उम्मीद जताई जा रही है। आशा की जा रही है कि आने वाले समय में भारत गणराज्य को अब फुल टाईम रेल मंत्री मिल सकता है।
बंगाल में 34 साल पुराने वाम दलों के लाल किले को ध्वस्त करने वाली रेल मंत्री ममता बनर्जी बहुत ही ताकतवर होकर उभरी हैं। अब केंद्र में मलाईदार विभागों में वे अपने कारिंदे फिट करेंगी। ममता मुख्यमंत्री बनीं तो अपने स्थान पर दिनेश त्रिवेदी या मुकुल राय को बतौर रेल मंत्री प्रस्तुत कर सकती हैं। वर्तमान में त्रणमूल कोटे में एक कैबनेट और छः राज्यमंत्री हैं। ममता के बढ़े रूतबे से कैबनेट मंत्रियों की संख्या में इजाफा हो सकता है।
उधर डीएमके के पास तीन कैबनेट और चार राज्य मंत्री हैं। आदिमत्थू राजा की सीट अभी रिक्त ही है। जयललिता भी अब केंद्र में दावेदारी कर सकतीं हैं। बंगाल के पांच राज्य सभा सदस्य सेवा निवृत हो रहे हैं। आने वाले दिनों मे त्रणमूल तीन, कांग्रेस एक और वाम दल एक सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर सकती है। चुनाव में पराजय झेलने वाले करूणानिधी कुनबे के लिए भी चुनाव परिणाम कष्टकारी साबित हो सकते हैं। कनीमोरी को भी जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा सकता है।
इन चुनाव परिणामों के बाद अब भारत गणराज्य को पार्ट टाईम के स्थान पर फुल टाईम रेल मंत्री मिलने की उम्मीद है। गौरतलब है कि रायटर बिल्डिंग पर कब्जे की चाहत के चलते रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेल मंत्रालय को दरकिनार ही कर दिया था, जिससे रेल की सेहत ही बिगड़ गई थी।

पांच साल तक काबिज रह सकता है किराएदार


पांच साल तक काबिज रह सकता है किराएदार

सुप्रीम कोर्ट ने दी नई व्यवस्था

नई दिल्ली (ब्यूरो)। यदि मकान मालिक और किराएदार के बीच हुए अनुबंध की शर्तों के हिसाब से किराए का नियमित भुगतान हो रहा हो तो मकान मालिक कम से कम पांच साल तक अपने किराएदार को बेदखल नहीं कर सकता है। उक्ताशय की व्यवस्था देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दी गई है।
जस्टिस दीपक वर्मा और जस्टिस दलवरी भण्डारी ने एक प्रकरण की सुनवाई करते हुए कहा कि बजार दर पर निर्धारित किराए का भुगतान अगर किराएदार द्वारा समय समय पर किया जा रहा हो तो मकान मालिक को कम से कम पांच साल तक एसे किराएदार को बेदखल करने का कोई अधिकार नहीं है।

शनिवार, 14 मई 2011

775 साल का लेडी पावर



775 साल का लेडी पावर

(लिमटी खरे)

आजादी के पहले महिलाओं को कमतर ही आंका जाता रहा है। महिलाओं को चूल्हा चैका संभालने और बच्चे पैदा करने की मशीन ही समझते थे सभ्य समाज में पुरूष वर्ग के लोग। अस्सी के दशक के उपरांत यह मिथक शनैः शनैः टूटने लगा। लोग मानते थे कि महिलाओं को अगर घर की दहलीज से बाहर निकलने दिया गया तो कयामत आ जाएगी, समाज के चतुर सुजान इन महिलाओं का शोषण कर लेंगे, यही कारण है कि रूपहला पर्दा हो या फिर सियासत, सदा ही महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा है। कालांतर में महिलाओं को जब भी मौका दिया गया उन्होंने साबित कर ही दिया कि वे पुरूषों से कम कतई नहीं हैं।

भारत सदा से ही पुरूष प्रधान देश माना जाता रहा है। हिन्दुस्तान के सभ्य समाज में महिलाओं का स्थान काफी नीचे ही माना जाता रहा है। यह उतना ही सच है जितना कि दिन और रात कि भारतीय पुरूषों ने महिलाओं के वर्चस्व को कभी भी स्वीकार नहीं किया है। इतिहास में चंद उदहारण एसे हैं जिनमें महिलाओं द्वारा शासन किए जाने के किस्से सुनने को मिलते हैं। इक्कीसवीं सदी में भारत की महिला ने घर की चैखट लांघ दी है, अब वह पुरूषों के कांधों से कांधा मिलाकर चल रही है।
भारत मंे महिलाओं को जब भी अपने हुनर को प्रदर्शित करने का मौका मिला है, उन्होंने बखूबी अपने इस फन को साबित किया है। मैदान ए जंग से लेकर सियासी गलियारों तक में भारतीय महिलाओं ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। 1755 के आसपास अमेरिका में भी अविवाहित महिलाओं को ही मत देने का अधिकार था। न्यूजीलेण्ड में महिलाओं के वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं था, बाद में 1893 में उन्हें मत देने तो 1919 में चुनाव लड़ने का अधिकार प्राप्त हुआ।
दुनिया की पहली महिला सांसद फिनलैण्ड में 1907 में चुनी गई थी। दुनिया के चैधरी अमेरिका लगभग एक दशक (80 साल) की लड़ाई के बाद 1920 में यह हक मिल सका। साउदी अरब अमीरात में आज भी महिलाओं को चुनाव लड़ने दिया जाए या नहीं इस बात पर बहस जारी है। अफगानिस्तान में 1970, बंग्लादेश में 1972, इराक में 1980 तो कतर में 1998 में बदलाव की बयार बही।
भारत देश में महिलाओं ने अनेक वर्जनाओं को तोड़ा है। मुगल शासक रजिया सुल्तान दुनिया भर में संभवतः पहली महिला शासक थीं जिन्होंने सल्तनत संभाली हो। जांबाज योद्धा और न्यायप्रिय शासक रजिया सुल्तान अपने पिता इल्तुतमिश की सबसे लाड़ली थी। रजिया सुल्तान ने 1236 में दिल्ली की गद्दी संभाली। उस वक्त लोगों को लग रहा था, कि दिल्ली जैसी बड़ी रियासत को संभाल पाएंगी कि नहीं, किन्तु रजिया ने इस अवधारणा को गलत साबित कर दिया। रजिया सुल्तान ने मजबूत और बुलंद इरादों के साथ शासन संचालित किया, उस वक्त बगावत के सर उठाने वालांे का सर कुचल दिया गया।
1524 में पेदा हुई गौंड शासिका रानी दुर्गावती ने अपने पति राजा दलपत शाह की लाड़ली थीं, दलपत शाह के निधन के उपरांत रानी दुर्गावती ने अपने पुत्र वीर नारायण के छोटे रहने के कारण शासन संभाला। गढ़ मंडला दुर्ग पर कब्जे के लिए बादशाह अकबर की नीयत डोली और उन्होंने दुर्गावती को महिला और कमजोर समझकर अपने अधीन आने की पेशकश की। रानी दुर्गावती ने अकबर की इस बात को ठुकरा दिया और वीरता के साथ युद्ध किया, जंग में ही रानी दुर्गावती वीरगति को प्राप्त हुईं।
1725 में जन्मी अहिल्या बाई ने अपने पति खांडेराव होल्कर की मौत के उपरांत 1854 में होल्कर रियासत की जवाबदारी संभाली। इसके 52 वर्षों के उपरांत 1795 में उनका निधन हुआ। दक्षिण में रानी चेनम्मा को सिंहनी कहा जाता था। कर्नाटक के कित्तूर की रानी चेनममा ने गोरे ब्रितानियों के आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। ब्रितानियो के साथ जमकर जंग लड़ी रानी चेनम्मा ने, बाद में उन्हें एक किले में नजर बंद कर दिया गया था, जहां उनका देहावसान हो गया था।
सुप्रसिद्ध कवियत्रि सुभद्रा कुमारी चैहान की बात किए बिना महिलाओं के पावर की बात अधूरी ही रह जाएगी। सुभद्रा कुमारी चैहान का जिक्र इसलिए क्योंकि उनके द्वारा झांसी की रानी का कविता के रूप में बखान इतना मीठा और जीवंत है कि आज भी बच्चे, युवा, प्रोढ़ या उमर दराज लोग -‘‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।‘‘ या ‘‘घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार।‘‘ जैसी पंक्तियां गुनगुनाते मिल ही जाते हैं। रानी लक्ष्मी बाई के सम्मान में मध्य प्रदेश सहित अनेक सूबों में महारानी लक्ष्मी बाई शाला (एमएलबी) की चेन स्थापित की गई है। 1834 मंे जन्मी लक्ष्मी बाई ने गंगाधर राव की मौत के बाद गद्दी संभाली थी। ब्रितानियों ने इनके गोद लिए बेटे को वारिस मानने से इंकार कर दिया था। रानी लक्ष्मी बाई ने अंगे्रजों का डटकर मुकाबला किया और आजादी की पहली लड़ाई में वीर गति को प्राप्त हुईं।
आजाद भारत में प्रियदर्शनी श्रीमति इंदिरा गांधी ने जिस उंचाई को छुआ उसे पाना शायद ही किसी के बस की बात हो। अपने पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू के अवसान के बाद इंदिरा गांधी ने देश और कांग्रेस दोनों ही की कमान संभाली। इसके उपरांत न्यूक्लियर पावर बनाने, विदेश नीति, संगठनात्मक एकता, निर्भीक शासन आदि की अद्भुत मिसाल पेश की इंदिरा गांधी ने। महिलाओं को आगे आने से रोकने के लिए कांग्रेस पर आरोप लगते रहे हैं, यही कारण है कि आज भी महिला आरक्षण बिल परवान नहीं चढ़ सका है।
कांग्रेस में श्रीमति सोनिया गांधी सर्वोच्च पद पर पहुंची जिनके हाथ में अघोषित तौर पर देश की बागडोर रहने के आरोप लगते रहे हैं। बाद में देश को 2007 में पहली महिला महामहिम राष्ट्रपति के तौर पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल मिलीं। इसके उपरांत लोकसभा में पहली महिला अध्यक्ष के तौर पर मीरा कुमार भी मिल गईं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी श्रीमति सुषमा स्वराज हैं। स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री साठ के दशक में सुचिता कृपलानी थीं। इसके बाद उड़ीसा में नंदिनी सत्पथी मुख्यमंत्री बनीं। मध्य प्रदेश में उमा भारती भी मुख्यमंत्री रहीं। सत्तर के दशक में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी की शशिकला काकोडकर ने केंद्र शासित प्रदेश गोवा में मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला। अस्सी के दशक मंे अनवरा तैमूर मुख्यमंत्री बनीं तो इसी दौर में तमिलनाडू में एम.जी. रामचंद्रन की पत्नि जानकी रामचंद्रन ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। सुषमा स्वराज दिल्ली, राबड़ी देवी बिहार, वसुंधरा राजे राजस्थान तो राजिन्दर कौर भट्टल पंजाब में सफल मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।
वर्तमान में दिल्ली की गद्दी श्रीमति शीला दीक्षित, उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती हैं। अब आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तो तमिलनाडू मंे जयललिता मुख्यमंत्री बन महिला शक्ति को साबित करने वाली हैं। 2004 के बाद यह दूसरा मौका होगा जब देश के चार सूबों में महिला मुख्यमंत्री आसीन होंगी। इसक पूर्व 2004 में एमपी में उमा भारती, राजस्थान में वसुंधरा राजे, दिल्ली में शीला दीक्षित तो तमिलनाडू में जयललिता मुख्यमंत्री थीं। 1236 में रजिया सुल्तान की ताजपोशी से आरंभ हुआ लेडी पावर का सिलसिला 775 सालों बाद 2011 में भी बरकरार है। आने वाले साल दर साल यह और जमकर उछाल मारेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एसी मातृ शक्ति को समूचा भारत वर्ष नमन करता है।