बुधवार, 2 नवंबर 2011

मंत्रियों की शाहखर्ची ने नाराज हैं कार्यकर्ता


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 16

मंत्रियों की शाहखर्ची ने नाराज हैं कार्यकर्ता

जनता के सामने जवाब देते समय बगलें झांकते हैं कार्यकर्ता

पीएमओ पर होने वाला खर्च डाल रहा आश्चर्य में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की कलई शनैः शनैः खुलने लगी है। मंदी के दौर के बावजूद केंद्र सरकार के मंत्रियों की शाहखर्ची से सरकारी खजाना तेजी से खाली हुआ है। विदेश दौरों के मामले में संप्रग के मंत्रियों ने राजग के मंत्रियों को पानी पिला दिया है। कार्यकर्ता हैरान परेशान है। जनता के बीच तो उसे ही जाना है, उधर इस तरह की खबरें कांग्रेस आलाकमान की पेशानी पर परेशानी की बूंदे छलका रही हैं। आलाकमान भी अब मानने लगी हैं कि मनमोहन अक्षम होने के साथ ही साथ भ्रष्टाचार के ईमानदार संरक्षक ही साबित हो रहे हैं।

अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय पर पांच सालों में 55 करोड़ रूपए व्यय किए गए। उस वक्त इस बजट को ही अधिक मानकर हो हल्ला हुआ था। इसके बाद पांच सालों में जब वैश्विक मंदी की मार भारत गणराज्य भी झेल रहा था तब पांच सालों में पीएमओ ने 85 करोड़ रूपए फूंक डाले। हद तो तब हुई जब संप्रग टू में अब तक प्रधानमंत्री कार्यालय सत्तर करोड़ रूपए फॅूक चुका है।

गौरतलब है कि वैसे भी मंत्रीगण जनता के पैसे पर एश करने के लिए बुरी तरह कुख्यात रहे हैं। जनता के द्वारा दिए गए करों से एकत्रित राजस्व को हवा में उड़ाने में न तो राजग के मंत्री पीछे रहे और न ही संप्रग के। तुलनात्मक अध्ययन में राजग के मंत्री किफायती साबित हुए हैं। राजग के पांच साल के शासनकाल में वाजपेयी सरकार के मंत्रियों ने विदेश यात्राओं पर 268 करोड़ रूपए खर्च किए तो उसके बाद मनमोहन सरकार के मंत्रियों ने पांच सालों में ही 546 करोड़ रूपए से अधिक विदेश यात्राओं में फूंक दिए।

विदेश यात्राओं का प्रेम संप्रग टू में भी जारी है। इस बार भी मंत्रियों ने तबियत से विदेश यात्राएं की और अभी अनेकों प्रस्ताव आज भी लंबित हैं। मंत्री लाख कहें कि वे सार्वजनिक संपत्ति में खर्च नहीं करेंगे पर यक्ष प्रश्न यही खड़ा है कि क्या वे इन यात्राओं में अपनी गांठ ढीली करेंगे। अनेकों बार मंत्रियों के साथ उद्योगपति होते हैं जो परोक्ष तौर पर उनकी सुविधाओं का पूरा पूरा ध्यान रखते हैं। अगर कोई उद्योगपति राष्ट्र के मंत्रियों पर व्यय करता है तो वह उसका कितना गुना उन मंत्रियों से वसूलेगा इस बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल ही है।

(क्रमशः जारी)

आड़वाणी को पीएम नहीं देखना चाह रहे भाजपाई


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 10

आड़वाणी को पीएम नहीं देखना चाह रहे भाजपाई

मोदी, नितीश, शिवराज पर दांव लगाना चाह रहा संघ

युवाओं में नहीं आड़वाणी का क्रेज़

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस अब आड़वाणी को साईड लाईन करने की जुगत लगाने लगा है। भाजपा का युवा वर्ग तिरासी साल के आड़वाणी को पचाने की स्थिति मे नहीं है। युवाओं के मन में उमरदराज हो चुके आड़वाणी के प्रति अनुराग नहीं उमड़ पा रहा है। हालात देखकर लगने लगा है कि भाजपा और संघ दोनों ही मिलकर लाल कृष्ण आड़वाणी को प्रधानमंत्री नहीं देखना चाह रहा है।

भाजपा के अंदर चल रही बयार के अनुसार भाजपा के कार्यकर्ता ही आड़वाणी और उनकी रथ यात्रा के बारे में उत्साहित नहीं है। आड़वाणी के सामने तो कार्यकर्ता यह जताते हैं कि वे उन्हें पीएम बनवाना चाहते हैं किन्तु जब इसे अमली जामा पहनाने की बात आती है तब कार्यकर्ता चुप्पी साध लेते हैं।

संघ के सूत्रों का कहना है कि मुगालते की बजाए यथार्थ में ही जीना होगा। देश का तीन चौथाई मतदाता 35 साल की उमर से कम का है। अपेक्षाकृत युवाओं को तिरासी साल के उमर दराज आड़वाणी कतई रास नहीं आ रहे हैं। इस सबके अलावा पेंतीस साल से आड़वाणी ने जो चेहरा अपनाया था वह रातों रात तो बदला नहीं जा सकता है।

आजादी के उपरांत देश में संचार क्रांति चरम पर है। आज इंटरनेट, टीवी और मोबाईल का युग है, इसमें रथ यात्रा जैसे बाबा आदम के जमाने के निष्प्रभावी अस्त्र कब तक काम करेंगे। संसद की कार्यवाही भी अब घरों घर समाचार चेनल्स के माध्यम से पहुंच रही है। इन परिस्थितियों में संसद में सरकार के सामने कथित तौर पर घुटने टेकने के बाद रथ यात्रा का ओचित्य लोगों को समझ नहीं आ पा रहा है।

(क्रमशः जारी)

आईडिया को संचार मंत्रालय ने दिया था कारण बताओ नोटिस


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  12

आईडिया को संचार मंत्रालय ने दिया था कारण बताओ नोटिस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। टू जी स्पेक्ट्रम मामले में कथित तौर पर अपनी मुगलई चलाने वाले आदित्य बिरला गु्रप की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी आईडिया द्वारा संचार मंत्रालय को अपने घर की लौंडी समझा जाने लगा था। संचार मंत्रालय के निर्देशों की सरेआम अव्हेलना करना आईडिया सेल्यूलर का प्रमुख शगल बनकर रह गया था। इस साल मई माह में संचार मंत्रालय ने आईडिया को आड़े हाथों लेकर एक नोटिस जारी किया था।

आंध्र प्रदेश व कर्नाटक में सेवा शुरू करने में विलम्ब होने पर दूरसंचार मंत्रालय ने आइडिया सेल्युलर और स्पाइस कम्युनिकेशंस को मई माह में नोटिस जारी किया था। दोनों कंपनियों को 60 दिन के अंदर नोटिस का जवाब देने को कहा गया और जारी नोटिस में कंपनियों से पूछा गया है कि क्यों न उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएं।

दूरसंचार विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार दूरसंचार नियामक ट्राई ने दोनों कंपनियों द्वारा समय पर सेवा शुरू नहीं किए जाने पर पांच राज्यों में उनके लाइसेंस रद्द किए जाने की सिफारिश की है। इससे पहले, सरकार ने लाइसेंस समझौते के तहत आइडिया और स्पाइस समेत कई नई कंपनियों से समय पर सेवा शुरू नहीं करने को लेकर जुर्माने के रूप में करीब 300 करो़ड रूपये वसूल किए और, जुर्माना लेने के बाद उनके लाइसेंस रद करने के नोटिस दिए थे। गौरतलब है कि दोनों कंपनियों को इन सर्किलों के लिए पूर्व टूजी मामले में फंसे दूरसंचार मंत्री ए. राजा के कार्यकाल में वर्ष 2008 में लाइसेंस दिया गया था। आइडिया ने वर्ष 2008 में स्पाइस को खरीदा था, लेकिन विलय के बारे में उसे अब तक दूरसंचार विभाग से मंजूरी नहीं मिली थी।

(क्रमशः जारी)

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

प्रथ्‍वीराज को हटाने की तैयारियां आरंभ


दिल्‍ली डायरी

प्रदेश टुडे में 31 अक्‍टूबर को प्रकाशित दिल्‍ली डायरी

फिर केंद्रीय मंत्रीमण्डल फेरबदल की सुगबुगाहट


फिर केंद्रीय मंत्रीमण्डल फेरबदल की सुगबुगाहट

विधानसभा चुनावों के मद्देनजर फेंटे जा सकते हैं पत्ते

मंत्रियों को संगठन में लाने की चर्चाएं

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी पारी में एक बार फिर केंद्रीय मंत्रीमण्डल में फेरबदल की सुगबुहाटें तेज हो गईं हैं। यद्यपि दबी जुबान से इसकी चर्चा चल रही है फिर भी लोकसभा के शीत कालीन सत्र के पहले एक छोटे फेरबदल की संभावनाओं से कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्र इंकार नहीं कर रहे हैं। सियासी हल्कों में कयास लगाए जाने लगे हैं कि संसद के 21 नवंबर से आहूत शीतकालीन सत्र के पहले कांग्रेस अपने सत्ता और संगठन के पत्ते फेंट लें।

कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि सोनिया के रणनीतिकारों ने उन्हें मशविरा दिया है कि शीतकालीन सत्र के एन पहले कांग्रेस और सरकार का चेहरा मोहरा ठीक ठाक कर लिया जाए। इसे पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

इन पांच राज्यों के चुनावों के मद्देनजर अनेक हेवीवेट मंत्रियों को वहां से हटाकर संगठन की जिम्मेवारी देने पर भी विचार किया जा रहा है। चूंकि वर्तमान में नेताओं के लाल बत्ती प्रेम के कारण संगठन चरमरा गया है इसलिए अब सोनिया गांधी हेवी वेट नेताओं पर लगाम कसने की अपनी तैयारी पूरी कर रही है। इसके लिए सोनिया ने चाबुक चलाने का भी फैसला लिया है।

उधर महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में भी मुख्यमंत्री भी कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी के रडार पर हैं अतः उनके स्थान पर नए नेता की खोज जारी है। सोनिया और राहुल जुंडाली का कहना है कि इन राज्यों में केंद्रीय मंत्रियों को ही फिट करना मुनासिब लग रहा है। यद्यपि इस तरह की चर्चाएं बहुत ज्यादा वजनदारी से नहीं की जा रही हैं किन्तु फिर भी सूत्रों ने साफ संकेत दिए हैं कि अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो इस माह के पहले पखवाड़े की समाप्ति के पहले ही फेरबदल को अंजाम दे दिया जाएगा।

ट्रेन प्यासी, यात्री हलाकान


ट्रेन प्यासी, यात्री हलाकान

देश भर में अधिकतर रेलगाडियों को नहीं मिल पा रहा पानी

सालों साल सफाई नहीं हो रही पानी के टेंक की

गंदे पानी से ही कुल्ला करने मजबूर यात्री

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय रेल अपने यात्रियों के लिए बीमारी का सामन ढो रहा है। कहीं रेल प्यासी दौड़ रहीं हैं तो कहीं रेल के कोच में बनी पानी की टंकी की सालों साल सफाई न होने से उनमें बीमारी के जनक जीवाणु पनप रहे हैं। रेल यात्रियों का स्वास्थ्य ताक पर रख रही है भारतीय रेल किन्तु लोकसभा और राज्य सभा जैसी देश की सबसे बड़ी पंचायत में बात रखने का दुस्साहस कोई भी जनसेवक नहीं कर पा रहा है। कमोबेश यही आलम साफ सफाई का है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार भारतीय रेल में साफ सफाई का ठेका प्रति रेल करोड़ों रूपयों महीने का होता है। इसमें रेल के प्रस्थान स्थल से लेकर गंतव्य तक बीच की निर्धारित दूरी के बाद रेल में टायलेट आदि की साफ सफाई निरंतर किए जाने का प्रावधान है। इसका ठेका भी बाकायदा दिया जाता है। अमूमन रेलों में वातानुकूलित श्रेणी के डब्बों की सफाई कर ठेकेदार अपने कार्याें की इतिश्री समझ लेते हैं। सूचना के अधिकार में ही अगर प्रति रेल साफ सफाई पर व्यय होने वाली राशि की जानकारी निकलवाई जाए तो लोग दांतों तले उंगली दबा लेंगे। इतना ही नहीं सीएजी अगर बारीकी से इसकी जांच कर ले तो आदिमत्थू राजा के बाजू वाली कोठरियों में भारतीय रेल के अधिकारी नजर आ सकते हैं।

भारतीय रेल की अधिकतर रेल गाडियां इस वक्त ठंड के आगाज के बावजूद भी प्यासी ही दौड़ने पर मजबूर हैं। बताया जाता है कि रेल गाडियों को चार पांच सौ किलोमीटर के बाद भी पानी नहीं मिल पा रहा है, जिससे रेल यात्री कोच में मारा मारी की स्थिति निर्मित हो रही है। पानी के अभाव में शौचालय बुरी तरह दुर्गंध से बजबजा रहे हैं। इस सबके बाद भी रेल्वे प्रबंधन मुस्कुराते हुए अपने यात्रियों के स्वागत में जुटा हुआ है।

रेल्वे के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भारतीय रेल के कोच में दोनों सिरों पर पानी की टंकी बनाई जाती है जिसको शौचालयां से जोड़ा जाता है। इन टंकियों की नियमित अंतराल में सफाई का प्रावधान होने के बाद भी इनकी साफ सफाई की दिशा में कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। अनेक कोच तो एसे हैं जो ट्रेक पर उतरकर अपना जीवन पूरा कर ऑफट्रेक भी हो गए और उनकी पानी की टंकियों को एक बार भी साफ नहीं किया गया। गौरतलब है कि पानी में ही तरह तरह के जानलेवा विषाणु पनपते हैं और सालों साल सफाई के अभाव में भारतीय रेल अपने यात्रियों के जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहा है।

झाबुआ पावर की जनसुनवाई पर भी लगे थे प्रश्नचिन्ह


घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 3

झाबुआ पावर की जनसुनवाई पर भी लगे थे प्रश्नचिन्ह

क्षेत्रवासियों को पता ही नहीं और हो गई जनसुनवाई

पर्यावरण विभाग की वेव साईट पर 5 दिन पहले डली थी रिपोर्ट

कम्पनी और सरकारी मुलाजिमों की भूमिका सन्दिग्ध

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की मशहूर थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के करीब डाले जाने वाले 600 मेगावाट के पावर प्लांट की शुरूआती सरकारी कार्यवाही में हुई गफलत एक के बाद एक उभरकर सामने आती गईं। पावर प्लांट के लिए आदिवासी बाहुल्य घंसौर में हुई जनसुनवाई के दौरान ही अनेक अनियमितताएं प्रकाश में आई थीं, किन्तु रसूखदार कम्पनी की उंची पहुंच और लक्ष्मी माता की कृपा से जनसुनवाई तो निर्विध्न हो गई किन्तु ग्रामीणों में रोष और असन्तोष बना रही।

पर्यावरण मन्त्रालय के सूत्रों का दावा है कि इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया में क्षेत्रीय पर्यावरण के प्रभावों का अवलोकन कर इसका प्रतिवेदन एक माह तक परियोजना स्थल के अध्ययन क्षेत्र और दस किलोमीटर त्रिज्या वाले क्षेत्र की समस्त ग्राम पंचायतों के पास अवलोकन हेतु होना चाहिए। जब यह प्रतिवेदन ग्राम पंचायत को उपलब्ध हो जाए उसके उपरान्त गांव गांव में डोण्डी पिटवाकर आम जनता को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए। इसके साथ ही साथ पर्यावरण विभाग की वेव साईट पर इसे डाला जाना चाहिए।

मजे की बात यह है कि पर्यावरण विभाग की मिली भगत के चलते उस वक्त 22 अगस्त को होने वाली जनसुनवाई का प्रतिवेदन 5 दिन पूर्व अर्थात 17 अगस्त 2009 को पर्यावरण विभाग की वेव साईट पर मुहैया करवाया गया। बताया जाता है कि जब जागरूक नागरिकों ने हस्ता़क्षेप किया तब कहीं जाकर इसे वेव साईट पर डाला गया था। महज पांच दिनों में इस प्रतिवेदन के बारे में व्यापक प्रचार प्रसार नहीं हो सका, जिससे इसमें व्याप्त विसंगतियों के बारे में कोई भी गहराई से अध्ययन नहीं कर सका।

इस पूरे खेल में सरकारी महकमे के साथ मिलकर मशहूर थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा आदिवासी बाहुल्य घंसौर के ग्राम बरेला में डलने वाले 600 मेगावाट के पावर प्लांट हेतु ताना बाना बुना गया। इस खेल में आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात तो हुआ साथ ही सिवनी जिले के आदिवासियों के हितों के कथित पोषक बनने का दावा करने वाले जनसेवक हाथ पर हाथ रखे तमाशा देखते रहे। जनसुनवाई के उपरान्त न जाने कितने विधानसभा सत्र आहूत हो चुके हैं और न जाने कितने संसद सत्र ही, अपने निहित स्वार्थों के लिए प्रश्न पर प्रश्न दागने वाले जनसेवकों की इस मामले में अरूचि समझ से परे ही है।

(क्रमशः जारी)

उदारीकरण पर मन से असहमत हैं युवराज


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 15

उदारीकरण पर मन से असहमत हैं युवराज

विदेशी प्रोफेसर को बुलाया संकेत देने के लिए

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी बुरी तरह आहत हैं। मनमोहन सिंह की उदारीकरण की नीति राहुल के गले नहीं बैठ पा रही है। मनमोहन के उदारीकरण की नीति से असहमत राहुल गांधी ने एक विदेशी प्रोफेसर को लेक्चर के लिए आमंत्रित किया, ये महाशय उदारीकरण के सख्त आलोचकों में शुमार हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार जर्मन प्रोफेसर थामस पोग को राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ कंटेपरेरी स्टडीज में लेक्चर हेतु न्योता गया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी इसके ट्रस्टी हैं। पोग भारत में उदारीकरण और न्याय आधिकारिता पर अपने व्याख्यान दे गए। पोग की पहचान उदारीकरण के घोर आलोचकों के बतौर होती है।

एक ही तीर से राहुल गांधी ने कई निशाने साधकर एक परिपक्व राजनीतिज्ञ होने के प्रमाण देना आरंभ कर दिया है। राहुल ने इस तीर से वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और वजीरे आजम डॉक्टर मनमोहन सिंह को जतला दिया है कि वे उनके सुझावों से पूरी तरह असहमत हैं। गौरतलब है कि मुखर्जी और सिंह उदारीकरण के खासे हिमायती समझे जाते हैं। उधर इसी के साथ कांग्रेस में भी यह संदेश चला गया कि प्रणव और मनमोहन के उदारीकरण प्रस्तावों पर युवराज की सहमति कतई नहीं है।

(क्रमशः जारी)

आड़वाणी को अब रखा जाने लगा है ‘बेचारे‘ की श्रेणी में


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 9

आड़वाणी को अब रखा जाने लगा है ‘बेचारे‘ की श्रेणी में

सालों साल तपस्या और तप का नतीजा सिफर

रथ यात्रा पूरी तरह फ्लाप हो रही साबित

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सालों साल भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की आंखों के तारे बने रहे राजग की पीएम इन वेटिंग से हाल ही में हटे लाल कृष्ण आड़वाणी के हाथ अब संभावित अंतिम रथ यात्रा के बाद भी कुछ खास नहीं लगने की उम्मीद जताई जा रही है। संघ द्वारा तिरासी बसंत देख चुके उमर दराज एल.के.आड़वाणी को अब विश्राम की सलाह दी गई है। प्रधानमंत्री बनने की जुंग में ढलती उमर में भी आड़वाणी रथ यात्रा की अपनी जिद पूरी करने पर अड़े हुए हैं।

एक समय था जब आड़वाणी संघ की आंखों के तारे हुआ करते थे। उनकी एक बात पर संघ उनके पीछे आ खड़ा होता था, किन्तु पिछले कुछ सालों से आड़वाणी के कदमतालों ने उन्हें संघ से काफी दूर ले जाकर खड़ा कर दिया है। अब संघ आड़वाणी से सुरक्षित दूरी बनाकर ही चल रहा है। संघ मुख्यालय नागपुर के सूत्रों का दावा है कि संघ के शीर्ष नेतृत्व ने आड़वाणी को रथ यात्रा न करने की सलाह दी थी।

लगता है कि आड़वाणी आज भी इस मुगालते में हैं कि उनकी छवि पूर्व में अटल बिहारी बाजपेयी के साथ जुगलबंदी के वक्त जैसी है। दरअसल, अटल बिहारी बाजपेयी के द्वारा सक्रिय राजनीति से सन्यास लिए जाने के उपरांत आड़वाणी शीर्ष में इकलौते नेता बचे और उनकी अघोषित हुकूमत चलने लगी। कालांतर में उनके विरोधी सक्रिय हुए और फिर आड़वाणी की लोकप्रियता का ग्राफ एक एक कर नीचे की पायदान पर खिसकने लगा।

(क्रमशः जारी)

टूजी स्पेक्ट्र घोटाले का सर्वाधिक फायदा आईडिया को!


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  11

टूजी स्पेक्ट्र घोटाले का सर्वाधिक फायदा आईडिया को!

आईडिया की भूमिका पर लगने लगे प्रश्न चिन्ह

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। आदिमत्थू राजा के कार्यकाल में हुए भारत गणराज्य के अब तक के सबसे बड़े टेलीकाम घोटाले में सबसे अधिक मलाई काटी है आदित्य बिरला कंपनी के स्वामित्व वाली मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी आईडिया ने। इस मामले में एक सदस्यी जांच समिति के समक्ष अनेक सनसनीखेज बातें लाईं गईं जिससे जांच समीति इस निश्कर्ष पर पहुंची कि यह घोटाला मानो आईडिया के साथ एक अन्य मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनी के इशारे पर ही किया गया हो।

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच रिपोर्ट के मुताबिक इस घोटाले से एयरटेल और आईडिया जैसी टेलीकॉम कंपनियों को सबसे ज्यादा फायदा मिला है। इस मामले पर रिटायर जज शिवराज पाटिल की एक सदस्यीय जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि टेलिकॉम मिनिस्ट्री के मनमाने फैसलों से भारती एयरटेल और आइडिया सेल्युलर जैसे ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम हासिल करने में मदद मिली।

शिवराज पाटिल की समिति ने नीतियों में खामियों का जिक्र करते हुए उदाहरण दिया है कि 2003 में एनडीए के कार्यकाल में भारती एयरटेल को 8 मेगाहर्ट्ज के और 2 मेगाहर्ट्ज अतिरिक्त स्पेक्ट्रम आवंटित किया गया। हालांकि, उस समय इसके लिए कोई प्रावधान नहीं था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह फैसला संबंधित इंजिनियर के एक नोट के आधार पर लिया गया और इसे वायरलेस सलाहकार ने अपने बाकी सहयोगियों के साथ मंजूरी दी। यह पूरी तरह से मनमाना फैसला था और इससे बाकी आवेदकों को नुकसान हुआ। आदित्य बिड़ला समूह की कंपनी आइडिया सेल्युलर को भी फायदा पहुंचाया गया। आइडिया को पात्रता हासिल करने के लिए ज्यादा समय दिया गया।

(क्रमशः जारी)

आज हम 55 साल के हो गए



सभी को बधाई, आज मध्‍य प्रदेश और हमारा अपना सिवनी जिला पचपन साल का हो गया है। खुशियां मनाओ मिठाई बांटो। अब तो हमारे जन प्रतिनिधियों को शर्म करना चाहिए कि इन पचपन में से पिछले डेढ दशक यानी पंद्रह सालों में हमें बाबा आदम के जमाने में जीवन यापन पर मजबूर कर दिया है। किसी नेता विशेष की तमन्‍ना पूरी हो गई आज सिवनी से नागपुर सडक इतनी खराब है कि मजबूरी में हम छिंदवाडा होकर जाने को मजबूर हैं। यही प्रस्‍ताव तो रखा था हमें अनाथ करने वाले नाथ के इशारे पर उनके मातहतों ने। उसके बाद भी हम उससे सिर्फ मांग रहे हैं चिरौरी कर रहे हैं उनकी। बार बार सिवनी को गोद लेने वाले कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा में आज वे और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री सीपी जोशी हैं देखना है हमें कौन से आश्‍वासन की सौगात मिलती है। वैसे हमारे रिसते घावों पर नमक और मिर्च कौन छिडक रहा है कौन है वो जो इस नमक मिर्च को भुरकने के लिए हमारे रिसते घाव आगे कर रहा है, जागो मित्रों जागो, समय आ गया है वरना हम सभी खत्‍म ही समझो।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

मालवा कब्जाने की तैयारी में हैं मीनाक्षी


मालवा कब्जाने की तैयारी में हैं मीनाक्षी

इंदौर में प्रभाव बढ़ाने की जुगत में हैं मीनाक्षी

पीसीसी में अपना अलग गुट स्थापित कर रहीं नटराजन

राहुल की करीबी का है भावकाल

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की नजर में देश के भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी की कोर टीम में शामिल सांसद मीनाक्षी नटराजन ने अब रंग दिखाना आरंभ कर दिया है। मंदसौर से सियासत आरंभ करने वाली मीनाक्षी अब देश के हृदय प्रदेश के मालवांचल में अपना वर्चस्व बढ़ाने को आमदा दिख रहीं हैं। मालवा में उनका सामना एमपीसीसी के चीफ कांतिलाल भूरिया से होने की उम्मीद है।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि राहुल गांधी अब उमरदराज हो चुके मध्य प्रदेश के क्षत्रपों से आजिज आ चुके हैं। यही कारण है कि अब राहुल ने मध्य प्रदेश के युवा तुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया, मीनाक्षी नटराजन, अरूण यादव, राहुल सिंह जैसे नेताओं को आगे बढ़ाने का काम आरंभ कर दिया है। इसमें दिग्विजय सिंह द्वारा अपने स्वजातीय बंधु राहुल सिंह का समर्थन किया जा रहा है। उधर राहुल की इस मुहिम से उमर दराज हो रहे कमल नाथ, कांति लाल भूरिया, सुरेश पचौरी और खुद दिग्विजय सिंह भी खासे भयाक्रांत नजर आ रहे हैं।

राहुल गांधी की करीबी का लाभ उठाकर मीनाक्षी नटराजन ने अपना प्रभाव मालवा में बढ़ाना आरंभ कर दिया है। मालवा के बाद महाकौशल होगा मीनाक्षी के निशाने पर। गौरतलब है कि महाकौशल में कांग्रेस की लुटिया बुरी तरह डूब चुकी है। महाकौशल में केंद्रीय राजनीति की धुरी शहरी विकास मंत्री कमल नाथ तो सूबाई राजनीति विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ठाकुर के इर्द गिर्द ही घूम रही है।

मीनाक्षी नटराजन ने जिस तरह एक शैक्षणिक संस्था को चलाने वाले गुमनाम व्यक्तित्व आर.के.दोगने को पीसीसी में सचिव बनवाया है उससे एमपी के क्षत्रपों के होश उड़े हुए हैं। वैसे भी मध्य प्रदेश की अघोषित औद्योगिक राजधानी इंदौर पर कब्जा करने का मन हर एक राजनेता, आईपीएस और आईएएस अधिकारी के मन की पहली इच्छा होती है। अखिल भारतीय सेवा वाले अधिकारी इंदौर में जीवन में एक बार कलेक्टर या पुलिस अधीक्षक बनना जरूर पसंद करते हैं।

कहा जा रहा है कि मीनाक्षी नटराजन इंदौर से अगला लोकसभा चुनाव लड़ना चाह रही हैं जिससे वे मालवा के केंद्र पर कब्जा कर सकें। वर्तमान में मंदसौर से सांसद मीनाक्षी नटराजन की मंदसौर लोकसभा सीट के लिए कोई खास उपलब्धि नहीं है। ब्लाक कांग्रेस चुनाव में भी उन्होंने इंदौर में अपनी पसंद के बीआरओ बनवा दिए थे। वैसे इंदौर लोकसभा से दिल्ली में रहकर कांग्रेस संदेश से जुड़े पंकज शर्मा किस्मत आजमाने के मूड में दिख रहे हैं।

पृथ्वीराज की छुट्टी किसी भी समय


पृथ्वीराज की छुट्टी किसी भी समय

निर्णय लेने में देरी बन रही विरोध का कारण

एनसीपी को लाभ पहुंचाने का आरोप

पंवार भी चाह रहे चव्हाण की बिदाई

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के निजाम पृथ्वीराज चव्हाण का सूबे में भारी विरोध हो रहा है। कांग्रेस आलाकमान की नजरें भी उन पर तिरछी हो चुकी हैं। कहा जा रहा है कि अपने कार्यकाल का एक साल पूरा करने के पहले ही चव्हाण को मुख्यमंत्री निवास से रूखसत किया जा सकता है। कांग्र्रेस आलाकमना ने अपने विश्वस्त रहे वर्तमान में एक राज्यपाल को चव्हाण के विकल्प को खोजने जवाबदारी सौंप दी है।

सूबे के कांग्रेसी नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को बारंबार शिकायत की है कि पृथ्वीराज चव्हाण शासन चलाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। वे निर्णय लेने में इतना विलंब कर देते हैं कि लोगों का आक्रोश चरम पर पहुंच जाता है। इसका सीधा सीधा लाभा एनसीपी के अजीत पवार गुट द्वारा उठा लिया जा रहा है। इसके अलावा राज्य की सरकार शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के इशारों पर चल रही है जिससे कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सूबे में राकांपा तेजी से उभर रही है वह भी कांग्रेस की कीमत पर। नवंबर माह में होने वाले स्थानीय निकाय के चुनाव चव्हाण का भविष्य तय कर देंगे। साफ सुथरी छवि के चक्कर में एक अयोग्य व्यक्ति को कुर्सी सौंपने से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी कुपित हैं। सोनिया की नाराजगी का आलम यह है कि पिछले दिनों दिल्ली आए चव्हाण बार बार सोनिया से मिलने का समय चाहते रहे पर सोनिया ने उन्हें समय नहीं दिया।

उधर दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे की बाहें एक बार फिर सीएम बनने फड़कने लगी हैं। दोनों ही अपने अपने तौर तरीकों से मदाम को रिझाने का प्रयास कर रहे हैं। देशमुख द्वारा अण्णा हजारे का अनशन समाप्त करवाने में अपनी भूमिका को बार बार मदाम के सामने रेखांकित किया जा रहा है तो शिंदे बतौर मुख्यमंत्री और उसके बाद केंद्रीय मंत्री अपने कार्यकाल को साफ सुधरा बताकर मदाम को रिझाने की जुगत लगा रहे हैं।

सियासी हल्कों में एक बात साफ हो चुकी है कि पृथ्वीराज चव्हाण का भविष्य अगले नवंबर माह में होने वाले नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला और जनपद पंचायत के चुनावों के परिणाम पर ही निर्भर करेगा। अगर कांग्रेस को लाभ हुआ तो चव्हाण बच जाएंगे और अगर राकांपा हावी रही तो चव्हाण की बिदाई तय ही है।

पावर प्लांट से फेलेगा जबर्दस्त प्रदूषण


घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 2

पावर प्लांट से फेलेगा जबर्दस्त प्रदूषण

घंसौर के पावर प्लांट से पानी होगा प्रदूषित

बरगी बांध में जम जाएगी जबर्दस्त सिल्ट

पर्यावरण के ठेकेदारों की चुप्पी संदिग्ध

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की नामी गिरामी कंपनियों में शुमार थापर ग्रुप ऑफ कम्पनीज के प्रतिष्ठान झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से महज 100 किलोमीटर दूर आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर में स्थापित किए जाने वाले पावर प्लांट से नर्मदा नदी पर बने रानी अवन्ती बाई सागर परियोजना (बरगी बांध) पर पानी के जबर्दस्त प्रदूषण का खतरा मण्डराने लगा है। अगर यह संयन्त्र यहां स्थापित कर दिया जाता है तो इस प्लांट से उडने वाली राख से बरगी बांध की तलहटी में कुछ माहों के अन्दर ही ढेर सारी सिल्ट जमा हो जाएगी और पानी प्रर्दूिषत होने की संभावना बलवती हो जाएगी। इससे आदिवासी बाहुल्य तहसील घंसौर के निवासियों को स्वांस की समस्याओं से दो चार भी होना पड सकता है।

केन्द्रीय उर्जा मन्त्रालय के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि इस मध्य प्रदेश सरकार और झाबुआ पावर लिमिटेड के बीच हुए 1200 मेगावाट के पावर प्लांट के करार के प्रथम चरण में कंपनी द्वारा अभी सिवनी जिले के ग्राम बरेला में 600 मेगावाट का पावर प्लांट प्रस्तावित है। इस पावर प्लांट के लिए आवश्यक जलापूर्ति बरगी बांध के सिवनी जिले के जल भराव क्षेत्र गडघाट और पायली से की जाएगी।

सूत्रों ने आगे कहा कि प्रस्तावित संयन्त्र द्वारा प्रतिदिन 853 टन राख उत्सर्जित की जाएगी, जिसे बायलर के पास से ही एकत्र किया जा सकेगा। समस्या लगभग 1000 फिट उंची चिमनी से उडने वाली राख (फ्लाई एश) की है। इससे रोजना 3416 टन राख उडकर आसपास के इलाकों में फैल जाएगी। 1000 फिट की उंचाई से उडने वाली राख कितने डाईमीटर में फैलेगी इस बात का अन्दाजा लगाने मात्र से सिहरन हो उठती है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी ने अपने प्रतिवेदन में हवा का रूख जिस ओर दर्शाया है, संयन्त्र से उस ओर बरगी बांध है।

जानकारों का कहना है कि 3416 टन राख प्रतिदिन उडेगी जो साल भर में 12 लाख 46 हजार 840 टन हो जाएगी। अब इतनी मात्रा में अगर राख बरगी बांध के जल भराव क्षेत्र में जाएगी तो चन्द सालों में ही बरगी बांध का जल भराव क्षेत्र मुटठी भर ही बचेगा। यह उडने वाली राख आसपास के खेत और जलाशयों पर क्या कहर बरपाएगी इसका अन्दाजा लगाना बहुत ही दुष्कर है। इस बारे में पावर प्लांट की निर्माता कंपनी ने मौन साध रखा है।

इतना ही नहीं प्रतिदिन बायलर के पास एकत्र होने वाली 853 टन राख जो प्रतिमाह में बढकर 26 हजार 443 और साल भर में 3 लाख 11 हजार टन हो जाएगी उसे कंपनी कहां रखेगी, या उसका परिवहन करेगी तो किस साधन से, इस बारे में भी झाबुआ पावर लिमिटेड ने चुप्पी ही साध रखी है। अगर राख को संयंत्र के आसपास ही डम्प कर रखा जाएगा तो वहां के खेतों की उर्वरक क्षमता प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी और अगर परिवहन किया जाता है तो घंसौर क्षेत्र की सड़कों के धुर्रे उड़ना स्वाभाविक ही है।

इतनी सारी विसंगतियों के बावजूद भी दो वर्ष पूर्व 22 अगस्त को घंसौर में हुई जनसुनवाई में किसी भी बात को रेखांकित नहीं किया जा सका है। कहा जा रहा है कि कंपनी ने सरकारी नुमाईन्दो और जनसेवकों को ‘कीप मम‘ (शान्त रहने) के एवज में अपेक्षा से अधिक उपकृत किया है, यही कारण है कि पर्यावरण के नुकसान और मानव स्वभाव पर पडने वाले प्रतिकूल प्रभावों को जानबूझर इनके द्वारा उपेक्षित ही किया जा रहा है। पूर्व में जिला प्रशासन स्तर पर हुई जनसुनवाई की न तो मुनादी पिटवाई गई और न ही इसके बारे में कोई सूचना ही दी गई। कहा जा रहा है कि उस दौरान प्रशासन ने गुपचुप तरीके से घंसौर के पास जनसुनवाई की रस्म अदायगी पूरी कर दी गई थी।

(क्रमशः जारी)

प्रणव के रडार पर आ चुके हैं मनमोहन


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 14

प्रणव के रडार पर आ चुके हैं मनमोहन

पीसी पड़े प्रणव पुत्र के पीछे

चिदम्बरम भी हैं पीएम के बड़े दावेदार

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे ताकतवर आसनी पर विराजे नेहरू गांधी परिवार (महात्मा गांधी नहीं) से इतर प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की चला चली की बेला करीब आती दिख रही है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम दोनों ही मनमोहन को हटाने के सारे मार्ग प्रशस्त करते नजर आ रहे हैं। पीएमओ द्वारा चिट्ठी लीक करवाना मनमोहन के लिए घातक साबित होता दिख रहा है। इससे प्रणव और पीसी के बीच रार तो बढ़ी है पर दोनों ही के निशाने पर अब मनमोहन सिंह आ चुके हैं।

कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि वैसे तो कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी की पहली पसंद इस पद के लिए ए.के.अंटोनी हैं, किन्तु जब बारी सर्वसम्मति की आएगी तो चिदम्बरम पर भी वे दांव लगा सकती हैं। संभवतः यही बात चिदम्बरम के शुभचिंतकों ने उन्हें सुना दी। इसे सुनकर चिदम्बरम फूले नहीं समा रहे हैं। चिदम्बरम को यह भी बताया गया है कि उनकी राह का सबसे बड़ा रोढ़ा प्रणव मुखर्जी ही हैं जिन्हें हर हाल में हटाना जरूरी है।

सूत्रों ने कहा कि वैसे भी सोनिया के सामने यह स्थापित हो चुका है कि प्रणव मुखर्जी ने उनके पति और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की खिलाफत के बिगुल बजाए थे। इसलिए सोनिया कभी भी प्रणव के नाम पर सहमति नहीं देंगी। अब चिदम्बरम ने नई चाल चली है। चिदम्बरम द्वारा प्रणव मुखर्जी के विधायक पुत्र अभिजीत की जन्म कुण्डली बनवाना आरंभ कर दिया है।

चिदम्बरम के करीबी सूत्रों का कहना है कि उन्होंने अभिजीत के बारे में संपूर्ण जानकारी जुटा ली गई है कि किस तरह अभिजीत एक कार्पोरेट हाउस के लिए लाईजनिंग का काम करते हैं। जब इसकी भनक प्रणव मुखर्जी को लगी उन्होंने भी अपने मातहतों के जरिए चिदम्बरम पुत्र कार्तिक की संपूर्ण रामायण बनवा दी। कार्तिक को प्रणव ने शेयर घोटाले में जमकर उलझा दिया है। कांग्रेस के अंदरूनी हल्कों में अब मनमोहन की बिदाई का महूर्त तो निकाला ही जा रहा है साथ ही साथ प्रणव और चिदम्बरम की वारिसान को नग्न करने की लड़ाई के मजे भी लिए जा रहे हैं।

(क्रमशः जारी)

भाजपा नेतृत्व नहीं है आड़वाणी के साथ


उत्तराधिकारी हेतु रथ यात्रा . . . 8

भाजपा नेतृत्व नहीं है आड़वाणी के साथ

यात्री के हाथ अब तक कुछ नहीं लगा

अड़वाणी विरोधी हो रहे तेजी से सक्रिय

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। रथ यात्री एल.के.आड़वाणी अपने रथ में अकेले ही नजर आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उनकी रथ यात्रा से किनारा ही कर रखा है। आला कमना का प्रापर मैसेज नहीं होने के कारण रथ यात्रा को सूबों के रिसपांस नहीं मिल पा रहा है। मीडिया में वांछित पब्लिसिटी नहीं मिलने से आड़वाणी बुरी तरह खफा और आहत हैं। इस बार आड़वाणी की रथयात्रा की सफलता में संदेह ही जताया जा रहा है। रथ यात्री (आड़वाणी) के साथ भाजपा नेता बेमन से ही चलते दिख रहे हैं।

रथ में सवार भाजपा नेताओं में दबी जुबान से चर्चा है कि जब आड़वाणी और उनकी पुत्री प्रतिभा को ही अभिवादन स्वीकार करना है तो भला बाकी नेता शोभा की सुपारी क्यों बनें? अब यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि राजग के पीएम इन वेटिंग से थककर अपने आप को अलग करने वाले लाल कृष्ण आड़वाणी अपनी पुत्री को राजनैतिक विरासत सौंपने उनकी ताजपोशी के पहले यह यात्रा कर रहे हैं।

भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी और संघ प्रमुख को भी आड़वाणी की यात्रा समझ में नहीं आ रही है। गड़करी ने रथ यात्रा के गुजरने वाले राज्यों में भी कोई खास संदेश नहीं भेजा है जिसके चलते राज्यों में भी रथ यात्रा फीकी ही दिख रही है। इसके साथ ही साथ मीडिया मैनेजमेंट इतना घटिया है कि आड़वाणी की रथ यात्रा को वांछित कव्हरेज भी नहीं मिल पा रहा है।

उधर संघ के आला नेताओं की राय भी गड़करी से कमोबेश मिलती जुलती ही है। दिल्ली में झंडेवालान स्थित केशव कुंज के सूत्रों का कहना है कि संघ मुख्यालय नागपुर का भी मानना है कि तिरासी बसंत देख चुके आड़वाणी को अब सक्रिय राजनीति तज देना चाहिए। आड़वाणी को चाहिए कि वे अब मार्गदर्शक की भूमिका में रहें न कि खुद सारथी बनें। इतने सालों के भाजपा को दिए योगदान के बदले भाजपा और संघ उनकी विरासत उनकी पुत्री को सौंपी जाए इसमें सहमत है किन्तु प्रतिभा के महिमा मण्डन के लिए देश व्यापी दौरा किसी के गले नहीं उतर रहा है।

(क्रमशः जारी)

मोबाईल कारोबार पर क्यों मेहरबान है प्रशासन


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  10

मोबाईल कारोबार पर क्यों मेहरबान है प्रशासन

देश की सुरक्षा रखी मोबाईल सेवा प्रदाताओं ने ताक पर

क्यों ढील दे रहे हैं जिलों के अफसरान

आखिर कब तक चलेगा सिम का गोरखधंधा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के कमोबेश हर जिले में मोबाईल सिम का गोरखधंधा मचा हुआ है और जिलों का जिला एवं पुलिस प्रशासन हाथ पर हाथ रखे बैठा है। प्रशासन की अनदेखी के चलते मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां अपने उपभोक्ताओं का गला रेत रहीं हैं और उनकी रक्षा के लिए तैनात प्रशासन मूकदर्शक बना बैठा है। बिना आईडेंटीफिकेशन आरंभ होने वाली सिम देश की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बनी हुई हैं।

गौरतलब है कि मोबाईल के क्षेत्र में अग्रणी सेवा प्रदाता कंपनी आदित्य बिरला के स्वामित्व वाली आईडिया हर जिलों में अपने अपने टीम लीडर्स (टीएल) को भारी भरकम टारगेज प्रदाय कर दिए जाते हैं। मासिक टारगेट पूरा करने में टीएल को पसीने आ जाते हैं। यही कारण है कि अपनी भारी भरकम सेलरी को बचाने के लिए टीएल द्वारा लोकल लेवल पर अघोषित प्रलोभन उपभोक्ताओं को दिए जाते हैं। बताया जाता है कि ये प्रलोभन जब पूरे नहीं होते हैं तो कुछ ही उपभोक्ता दुकानदार के पास जाकर अपनी शिकायत दर्ज करवाता है जिसे समझा बुझाकर रफत कर दिया जाता है। इस तरह कंपनी द्वारा परोक्ष तौर पर अपने उपभोक्तओं की जेब तराशी जा रही है।

कंपनी का काम करने वो टीएल को कंपनी द्वारा हर माह हजारों की संख्या में सिम बेचने का लक्ष्य दिया जाता है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उनके द्वारा तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। अति व्यापक पैमाने पर होने वाले सिम के इस गोरखधंधे से देश की सुरक्षा में भी सेंध लगने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। कहा जा रहा है कि अगर इस गोरखधंधे की जिला स्तर पर ही बारीक जांच करवा दी जाए तो मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों के विकृत चेहरे को सामने आने से कोई नहीं रोक सकता है। समय रहते इस तरह से लाभ कमाने की प्रवृति पर अंकुश लगना बहुत आवश्यक है, वरना इसके दुष्परिणाम बेहद घातक और भयावह ही सामने आने की उम्मीद है।

(क्रमशः जारी)