शनिवार, 6 जून 2009

दिल्ली बेदिल वालों की

(लिमटी खरे)

क्या गुल खिलाएगी वादियों में भी पसरी कुंवर साहेब की खामोशी

कांग्रेस की राजनीति में अस्सी के दशक के बाद एकाएक तेजी से उभर कर आए कांग्रेसी राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले कुंवर अजुZन सिंह इन दिनों पर्वतों की शरण में हैं। इन दिनों उन्होंने सपरिवार कुमाउं की वादियों में अपना आशियाना बना रखा है। रामगढ़ के एक रिसोर्ट में कुंवर साहेब इन दिनों कमरे में ही कैद हैं, वे न तो किसी से मिल जुल ही रहे हैं, और न ही कहीं आ जा ही रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि अगर एयर कंडीशनंड कमरे में ही बंद रहना था तो मनमोहन मंत्रिमण्डल से बाहर का रास्ता दिखाने के बाद उनके लिए दिल्ली की कोठी क्या बुरी थी? वैसे अभी भी उनके अकबर रोड़ स्थित सरकारी आवास के सामने उनके नाम के आगे मानव संसाधन एवं विकास मंत्री की दप्ती हटाई नहीं गई है। लोग कयास लगा रहे हैं कि वहां से लौटने के बाद पता नहीं अजुZन सिंह क्या चाल चलने वाले हैं।

मीनाक्षी की मिसाल दे रहे हैं कांग्रेसी

डाउन टू अर्थ का असली मतलब जानना हो तो कोई मीनाक्षी नटराजन से पूछे। सूती सलवार कमीज, हाथ में टिफिन और मोबाईल रखे, आखों पर चश्मा लगाए आम भारतीय छवि वाली समझदार नेता हैं मीनाक्षी। इन चुनावों में उन्होंने लगातार छ: बार चुने गए लक्ष्मीनारायण पाण्डे को पटखनी दी वह भी कांग्रेसियों के भारी विरोध के बावजूद। कहते हैं कि पार्टी की ओर से मिले 75 लाख रूपयों में से उन्होंने 25 लाख रूपए लौटाकर एक मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा एआईसीसी में जमकर हो रही है। राजनीति को मनी और मसल पावर से मुक्त करने की आकांक्षी मीनाक्षी की इस मिसाल से अनेक नेताओं पर बन आई है। दरअसल उनके पैसे लौटाने के बाद वे उम्मीदवार जो चुनाव के बाद खर्च की अधिकता जताकर कांग्रेस से और पैसे की चाहत रख रहे थे, उनके सारे रास्ते अब बंद हो चुके हैं।

खून आखिर खून ही होता है

संजय और राजीव गांधी की पित्नयों में भले ही अनबोला हो किन्तु लोकसभा में सदस्यता ग्रहण करने के दौरान नेहरू गांधी परिवार में खून ने एक दूसरे को आखिर पुकार ही लिया। शपथ ग्रहण करने जब राहुल गांधी जा रहे थे, तब उन्होंने अपनी चाची मेनका को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। मेनका ने जरूर मन ही मन ढेर सारा आशीZवाद दिया हो या न दिया हो पर उन्होंने मुस्कुरा कर उनका अभिवादन स्वीकार अवश्य किया। इतना ही नहीं शपथ ग्रहण के दौरान उन्होंने मेज थपथपाकर राहुल का उत्साह भी बढ़ाया। वहीं वरूण गांधी ने अपनी ताई सोनिया गांधी को प्रणाम किया तो उन्होंने भी मुस्कुराकर अपने भतीजे का मान रखा। वरूण के शपथ ग्रहण के दौरान उनकी चचेरी बहन प्रियंका और बहनोई राबर्ट वढ़ेरा भी मुस्कुराकर वरूण का उत्साह ही बढ़ाते नजर आए। यह अलहदा बात रही कि देवरानी मेनका और जेठानी सोनिया ने एक दूसरे से नजरें मिलाना मुनासिब नहीं समझा।

आईएफएस का बोलबाला है सदन में

देश के उच्च और निचले सदन में भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) का बोलबाला साफ दिखाई दे रहा है। इस बार गजब का इत्तेफाक सामने आया है। महामहिम राष्ट्रपति की कुर्सी पर पहली बार महिला, उपराष्ट्रपति अल्पसंख्यक मुसलमान, लोकसभाध्यक्ष महिला तो उपनेता भी महिला। इसके साथ ही एक और इत्तेफाक है इस पंद्रहवीं लोकसभा में। और वह है राज्य सभा और लोकसभा दोनों ही के नेता भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी हैं। एक ओर जहां महामहिम उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पूर्व में भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी के तौर पर अनेक देशों में भारत के राजदूत रहे हैं, वहीं लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार 1973 बेच की आईएफएस हैं, तथा वे स्पेन, ब्रिटेन, मारीशस जैसे अनेक देशों में भारतीय उच्चायोग और दूतावासों में काम कर चुकी हैं।

देखना है मिनी कमल नाथ क्या करते हैं

15वीं लोकसभा के गठन के उपरांत प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह ने मंत्रियों को शपथ दिलाई और विभागों का बंटवारा किया। इसमें सिर्फ एक वाणिज्य और उद्योग विभाग ही एसा है, जो मध्य प्रदेश के खाते में बरकरार रहा है। इस विभाग की महती जवाबदारी पीएम ने ग्वालियर के युवा तुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया को दे दी है। मध्य प्रदेश से आए नेता इस जवाबदारी को मध्य प्रदेश के खाते में आने से खुश तो हैं, साथ ही उन्होंने महराज का नया नामकरण कर दिया है। चूंकि विभाग कमल नाथ के पास था अत: अब महराज को मिनी कमल नाथ की संज्ञा दी जा रही है। लोग यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमल नाथ से इतर कुछ नया कर दिखाया तब तो ठीक वरना वे कमल नाथ की छवि से इस विभाग से मुक्त नहीं हो सकेंगे।

गुड्डू की नजर अब आर्थिक राजधानी पर!

उज्जैन में सत्यनारायण जटिया को धूल चटाने वाले कांग्रेसी सांसद प्रेमचंद गुड्डू की नजरें अब मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले इंदौर शहर पर है। वे चाहते हैं कि इंदौर से उज्जैन का फासला कम हो जाए। सांसद बनते ही उन्होंने इंदौर उज्जैन रेलखण्ड का दोहरीकरण और विद्युतिकरण का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है। इतना ही नहीं अपने कार्यक्षेत्र में विस्तार की गरज से उन्होंने यह तक कह डाला कि इंदौर में नए रेल्वे स्टेशन की दरकार है, जो महू और एमआर (मेजर रोड़) 10 के पास बन सकता है। उज्जैन के विकास के बारे में तो उनकी सोच जायज कही जा सकती है, किन्तु प्रदेश की कमर्शियल केपिटल इंदौर की ओर उनकी नजरें इनायत होने के अनेक अर्थ लगाए जा रहे हैं। सनद रहे देवास से सांसद बने सज्जन सिंह वर्मा की कर्म स्थली भी इंदौर ही रही है।

उल्टे बांस बरेली के

विदिशा में भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज को खाली मेदान देने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री राजकुमार पटेल के साथ उल्टे बांस बरेली के की कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। पटेल शायद यह नहीं जानते थे कि कांग्रेस महासचिव एवं मध्य प्रदेश प्रभारी बी.के.हरिप्रसाद को मोबाईल से एसएमएस करना कितना मंहगा पड़ेगा! पार्टी सूत्र बताते हैं कि पार्टी पर्यावेक्षक हरकेश बहादुर और सईद अहमद ने जब विदिशा कांड की पूरी रिपोर्ट आलाकमान को सौंपी तब पटेल के खिलाफ एसएमएस का भी गजब रोल रहा। सूत्र बताते हैं कि पटेल ने हरिप्रसाद को एसएमएस किए थे, जिनका मजमून था कि वे विदिशा के बजाए होशंगाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। इन संदेशों को आलाकमान ने पार्टी की प्रतिबद्धता के खिलाफ माना है, कि पटेल मैदान छोड़ने का मन पहले ही बना चुके थे।ा गा

तुलनात्मक चार्ट बना चर्चा का केंद्र

विधानसभा और लोकसभा चुनावों में तुलनात्मक चार्ट इन दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। बात हो रही है मध्य प्रदेश की। मध्य प्रदेश के एक कांग्रेसी नेता ने एआईसीसी सुप्रीमो को एक तुलनात्मक चार्ट ईमेल और फेक्स के माध्यम से भेजा है, जिसमें जमीनी हकीकत को बयान किया गया है। मध्य प्रदेश की विलोपित हुई सिवनी लोकसभा सीट के मण्डला लोकसभा क्षेत्र में आने वाले विधानसभा के बारें उक्त चार्ट में कुछ रोचक तथ्य दिए गए हैं। चार्ट में 2003 विधानसभा में कांग्रेस को 16416 मत तो 2004 के लोकसभा में 16340 मत भाजपा को उसी विधानसभा से मिलना बताया गया है। इतना ही नहीं इस बार 2008 में उसी विधानसभा से कांग्रेस को 20680 मत मिलना तो 2009 में लोकसभा में भाजपा को 6989 मत मिलने की बात कही गई है। कांग्रेसी कहते हैं कि आंकड़ों में दम भी है। अब लोग कयास लगा रहे हैं कि इस तरह की जादूगरी आखिर कौन दिखा सकता है!

एक प्रमाणपत्र भूला , दूसरे ने पैर पड़े!

लाल बत्ती का जलवा कुछ इस तरह होता है कि आदमी अपनी सुध बुध खो बैठता है। हाल ही में जब मध्य प्रदेश के रतलाम से चुने गए सांसद कांतिलाल भूरिया बतौर सांसद शपथ लेने पहुंचे तो उन्हें याद आया कि उनकी जीत का प्रमाणपत्र तो वे अपनी गाड़ी में ही भूल आए हैं। दरअसल बिना प्रमाणपत्र शपथ लेना मुश्किल होता है। बाद में उन्होंने अपने सहायक को फोन कर तत्काल वाहन से प्रमाणपत्र बुलवाया। इसी तरह उज्जैन के सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने तो सारी हदें ताक पर रखकर शपथ लेने के पूर्व कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पैर छूकर आशीZवाद चाहा। हक्की बक्की सोनिया बोल पड़ीं, ``अरे, सब देख रहे हैं!`` बाद में जब वे वापल लौट रहे थे, तब इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन ने मेज थपथपाकर जोरदार लहजे में कहा, ``गुड्डू, बधाई हो बधाई।``

पुच्छल तारा

भाजपाईयों को पैजामे के अंदर रखने में मास्टर माने जाने वाले कमल नाथ ने सूबे के निजाम शिवराज सिंह को भी शीशे में उतारने की कवायद आरंभ कर दी है। मुख्यमंत्री द्वारा मध्य प्रदेश भवन में आयोजित सांसद भोज में पधारे मंत्रियों में ज्योतिरादित्य सिंधिया की कमी अवश्य खली किन्तु इसमें कमल नाथ का जलजला अलग ही दिखा। घूम घूम कर सांसदों की मिजाज पुरसी करने वाले कमल नाथ ने सभी के सामने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पानी पानी कर दिया। बार बार केंद्र की उपेक्षा का आरोप लगाने वाले शिवराज की ओर मुखातिब कमल नाथ ने कहा, ``मुख्यमंत्री जी, अब मैं मध्य प्रदेश की सड़कों के उन्नयन का काम इतनी तेजी से करूंगा कि आप पर आरोप लगने लगेंगे कि आप अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा पैसा खींचकर ले गए हैं।`` साथ ही कमल नाथ ने मध्य प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी इशारा करते हुए कहा कि यह तभी संभव हो सकेगा जब आप और आपका मंत्रीमण्डल पवित्र भावना से काम करेगा।

6 june 2009

कैसे लगे सांसदों के असंसदीय व्यवहार पर लगाम?


(लिमटी खरे)


देश की दिशा और दशा तय करने वाली देश की सबसे बड़ी पंचायत में संसद सदस्यों का आचरण अब तमाम वर्जनाओं को धूल धूसारित करता जा रहा है। सांसद नैतिकता खोने की पराकाष्ठा तक पहुंच चुके हैं। जब से लोकसभा ने अपना टीवी चेनल आरंभ किया है तब से समूचा देश संसद में होने वाले नंगे नाच को आसानी से देख पा रहा है, पर देशवासी बेबस हैं।भारत गणराज्य के गठन के दौरान सांसदों के आचरण के लिए भी नियम कायदे निर्धारित किए गए थे। लोकसभा सचिवालय ने बाकायदा पुस्तिका जारी कर संसदीय नियम कायदों का ब्योरा इसमें दिया था। पहली बार चुने गए सांसद के लिए इनकी जानकारी महत्वपूर्ण है, किन्तु अनेक बार चुने गए सांसद ही जब इसका माखौल उड़ाएंगे तो नवागत सांसद क्या सीख लेंगे।इस पुस्तिका में साफ उल्लेखित है कि सदस्यों को किसी सदस्य के बोलने के दौरान व्यवधान उत्पन्न नहीं करना चाहिए। इतना ही नहीं सदन में नारेबाजी, धरना, विरोध या कागजों को फाड़ने जैसे कदमों को नियम विरूद्ध बताया गया है। इस पुस्तिका में सदन की गरिमा को ध्यान में रखते हुए सदन में प्रवेश से लेकर उठने बैठने और बाहर जाने तक के तौर तरीकों को रेखांकित किया गया है।सदन में अध्यक्ष का दर्जा सबसे उपर है यह अकाट् सत्य है। यही कारण है कि न्यायालयों की भांति ही सदन में प्रवेश और निर्गम के समय अध्यक्ष के आसन को सर नवाने की ताकीद दी गई है। अध्यक्ष के संबोधन के दौरान सदन से बाहर नहीं जाना चाहिए साथ ही साथ अगर अध्यक्ष आसन ग्रहण कर रहे हों तो प्रवेश करने वाले सदस्य उनके आसन ग्रहण करने के उपरांत ही सदन में प्रवेश करें यह व्यवस्था भी रखी गई है।पुस्तिका में यह व्यवस्था भी दी गई है कि जब अध्यक्ष अपनी बात कहने के लिए खड़े हों तो सदस्यों को तत्काल अपने स्थान पर बैठ जाना चाहिए। विडम्बना ही कही जाएगी कि शार्ट टेंपर्ड सांसद उत्तेजना में आपा खो देते हैं, तो उनसे संसदीय आचरा के पालन की उम्मीद की जाना बेमानी ही होगा। संसदीय आचरण की इस हेण्ड बुक में तो यहां तक कहा गया है कि रोजगार या व्यवसायिक संपर्क वाले लोगों के लिए सिफारिशी पत्र लिखना भी नियम विरूद्ध ही है।पिछले दो दशकों में संसद की गरिमा तार तार हुए बिना नहीं रही है। जनादेश प्राप्त जनप्रतिनिधि संसद में जिस तरह का अशोभनीय व्यवहार करते आए हैं, उसकी महज निंदा से काम नहीं चलने वाला। आखिर वे देश के नीति निर्धारक हैं। देशवासियों के लिए वे अगुआ (पायोनियर) से कम नहीं हैं।चौदहवीं लोकसभा ने देशवासियों का सर शर्म से झुकाया है, इस बात में कोई संदेह नहीं है। पिछली मर्तबा लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को कई बार कोफ्त का सामना करते देखा गया। सांसदों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर सोमदा की टिप्पणी कि इन सांसदों न तो जनता का एक पैसा दिया जाना चाहिए और न ही इन्हें दुबारा चुनकर आना चाहिए, वास्तव में जनता के दर्द को पूरी तरह रेखांकित करने के लिए काफी कही जा सकती है। सोमदा की निष्पक्षता की कीमत उन्हें पार्टी की सदस्यता खोकर चुकानी पड़ी जो वाकई एक नज़ीर कही जा सकती है।सदन में पैसे के बदले सवाल पूछने पर हुआ स्टिंग आपरेशन हो या सदन में नोट लहराने का मामला, हर मसले में संसदीय परंपरा तार तार हुए बिना नहीं रही है। कबूतर बाजी में फंसे संसद बाबू भाई कटारा ने तो सारी हदों को पार कर दिया। पिछली लोकसभा में सदन की न्यूनतम 332 बैठकों में कार्यवाही 423 घंटे बाधित रही यह अपने आप में एक रिकार्ड ही कहा जा सकता है। पूरे घटनाक्रमों को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि संसद की गरिमा और मर्यादा काफी हद तक कम हुई है, इसके अलावा सांसदों में गंभीरता का साफ आभाव भी देखा गया। इन सारी बातों से साफ हो जाता है कि संसद अपनी महत्ता पूरी तरह खोती जा रही है, इन प्रतिकूल परिस्थितियों में लोकतंत्र के अक्षुण्ण रहने की उम्मीद करना बेमानी ही होगा।अब लोकसभाध्यक्ष के आसन पर भारतीय विदेश सेवा की पूर्व अधिकारी सुशिक्षित, सुसंस्कृत और मृदुभाषी मीरा कुमार आसीन हैं। उन्होंने सदन की गरिमा को बरकरार रखने का भरोसा दिलाया है, किन्तु पहले ही दिन सदन में यादवी संघर्ष की हल्की सी झलक दिखाई पड़ी। सदन के बाहर लोग कहने से नहीं चूके आगाज यह है तो अंजाम क्या होगा?हमारे अपने मतानुसार जिस तरह देश में कानून के पालन के लिए हर नागरिक को बाध्य किया जाता है उसी तरह संसद और विधानसभाओं में जनप्रतिनिधियों के लिए बने कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए नया कानून बनाया जाना चाहिए, ताकि जनप्रतिनिधि अपनी हदों को पहचानकर लक्ष्मण रेखा पार करने की गुस्ताखी न कर सकें। इसके लिए जनप्रतिनिधियों को ही आगे आना होगा, जिसमें संशय ही लगता है।


संघ के हाथ में होगी भाजपा की कमान!

संघ का ``पालक`` होगा भाजपा सुप्रीमो

अब फैसला लेकर नहीं, पहले बताना होगा संघ को

भाजपा से उमर दराज नेताओं की सेवानिवृति की तैयारी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं की झींगा मस्ती के दिन जल्द ही समाप्त होने वाले हैं। राजग के घोषित पीएम इन वेटिंग के चेहरे के सामने आम चुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा के पितृ संगठन ने अब भाजपा की कमान सीधे सीधे अपने हाथों में लेने का फैसला ले निया है।संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि भाजपा को सीधे नियंत्रण में लेने की गरज से संघ ने अपनी रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है। इसके लिए ``पालक`` नामक पद का सृजन करने की संघ में सैद्धांतिक सहमति बन गई है। संघ की प्रतिनिधि सभा में सह सरकार्यवाहक स्तर के पदाधिकारी की इस पद पर नियुक्ति का प्रस्ताव पेश करने की तैयारी चल रही है।सूत्रों ने बताया कि भाजपा को किसी भी बड़े फैसले को लेने के पूर्व पालक की अनुमति की दरकार होगी। अगर पालक को भाजपा की बात जमी तभी भाजपा उसकी घोषणा करेगी, अन्यथा भाजपा को अपने निर्णय में संशोधन करना होगा या फिर मामला निरस्त कर दिया जाएगा। गौरतलब होगा कि वर्तमान में भाजपा द्वारा पार्टी स्तर पर कोई भी फैसला लिया जाकर बाद में उससे संघ को आवगत कराया जाता है।संघ के सूत्रों ने कहा कि संघ प्रमुख इस बात से आश्वस्त हैं कि इस नई व्यवस्था के लागू होने के उपरांत भाजपा में अंदर और सतही तौर पर फैली खेमेबाजी पर अंकुश लगने के साथ ही साथ भाजपा अनुशासन के दायरे में रहेगी। उल्लेखनीय होगा कि सबसे अनुशासित पार्टी मानी जाने वाली भाजपा में वर्तमान में अनुशासन की सीमाएं टूटती नजर आ रही हैं।गौरतलब होगा कि भाजपा की करारी शिकस्त के उपरांत संघ प्रमुख ने भाजपा के कायाकल्प का जिम्मा खुद ही संभाला है। इसी गरज से वे पिछले दिनों राजधानी दिल्ली प्रवास पर भी थे, जहां झंडेवालान स्थित संघ मुख्यालय ``केशव कुंज`` में उन्होंने लाल कृष्ण आड़वाणी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज आदि से विस्तार से चर्चा भी की थी।उधर भाजपा में अंदर ही अंदर बुजुर्ग नेताओं की मुखालफत का काम आरंभ हो गया है। उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायकों की बैठक के दौरान यह मांग पुरजोर तरीके से उठी कि उमरदराज नेता केवल आशीZवाद और सलाह देने की भूमिका स्वीकार कर सक्रिय राजनीति से किनारा कर लें, यह समय की मांग भी है और पार्टी का उत्थान इसी से संभव है।


ग्रीन सिग्नल के लिए तैयार राहुल एक्सप्रेस

टेलेंट सर्च पार्ट टू किसी भी समय

एमपी, यूपी, टीएन, बिहार और राजस्थान होगा पड़ाव

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने प्रतिभाशाली युवाओं की तलाश का दूसरा एपीसोड आरंभ करने की तैयारियां कर ली हैं। इस बार राहुल गांधी के निशाने पर मध्य प्रदेश, तमिलनाडू, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश सूबे हैं।राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का कहना है कि पिछली मर्तबा हुए टेलेंट सर्च और लोकसभा में युवाओं की बढ़ी भागीदारी से राहुल गांधी काफी आशिन्वत नजर आ रहे हैं। राहुल की टीम जल्द ही इन पांच राज्यों में प्रतिभाशाली युवा खोजने का अभियान आरंभ करने जा रही है।सूत्रों के अनुसार टेलेंट सर्च भाग दो का प्रसारण महज चार माह ही होगा अथाZत युवाओं की खोज का काम नवंबर तक ही चलेगा, इसके उपरांंत दिसंबर में युवक कांग्रेस के चुनाव में इन युवाओं को पदों से नवाजा जाएगा। एसा नहीं कि देश के अन्य सूबों में राहुल एक्सप्रेस नहीं जाएगी, किन्तु यह काम अगले साल से आरंभ होगा।सूत्रों ने संकेत दिए कि सूबों में होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले राहुल गांधी देश भर में अपनी टीम तैयार करना चाह रहे हैं। इसके उपरांत अगले आम चुनाव में ज्यादा से ज्यादा युवाओं के भरोसे राहुल गांधी कांग्रेस की सरकार बनाने का जतन करेंगे।

शुक्रवार, 5 जून 2009

जागो! हमें कीटनाशक पिला रही है सरकार!

(लिमटी खरे)

योग गुरू बनकर उभरे बाबा रामदेव द्वारा कोल्ड िड्रंक के एक ब्रांड का नाम लेकर उसे ``टायलेट क्लीनर`` की संज्ञा दिए जाने पर काफी बहस हुई थी। जब देश के अनेक हिस्सों में कोल्ड िड्रंक के कुछ ब्रांड से कीटनाशक का काम किया गया तो लोगों की आंखें खुलीं और साथ ही सरकार की भी।विडम्बना ही कही जाएगी कि बाजार में बिक रहे शीतल पेय में कीटनाशक की मिलावट का मामला सामने आने के छ: साल बीत जाने पर भी केद्र सरकार ने इन उत्पादों के मानक तय नहीं किए हैं। जाहिर है शीतल पेय निमात्री कंपनियों के ``भारी दबाव`` के चलते देश की सबसे बड़ी पंचायत में सत्ता और विपक्ष में बैठने वाले संसद सदस्य अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन ही हैं।सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि देश में बिक रहे इन पेय पदार्थों में कीटनाशकों की मात्रा यूरोपीय मानकों से 42 गुना अधिक पाई गई थी। इसके लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति ने भी सरकार से जल्द से जल्द शीतल पेय के संबंध में मानक तय कर उसे लागू करने की पुरजोर सिफारिश की थी।इस समिति की रिपोर्ट फरवरी 2004 में संसदीय पटल पर रखी गई थी। इतना ही नहीं मार्च 2007 में एन.के.गांगुली की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञों की समिति ने केंद्र सरकार को कहा था कि शीतल पेय विशेषकर कोला के उत्पादों में कीटनाशक के मानक लागू किए जाएं। केंद्र ने अप्रेल 2009 तक मानक लागू करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया था।इतना लंबा अरसा बीत गया किन्तु केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करना मुनासिब नहीं समझा। हो सकता है इन शीतल पेय उत्पादक निजी कंपनियों द्वारा नेताओं को मुंह बंद रखने के लिए भारी भरकम वजन रखा हो, किन्तु नेताओं को अपनी नैतिकता की वर्जना तो कम से कम याद रखनी चाहिए। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार निजी शीतलपेय निर्माता कंपनियों के आगे घुटने टेक चुकी है।बाबा रामदेव के कथन से अनेक लोग प्रभावित हुए, और उन्होंने अपने अपने शौचालयों को कोला वाले शीतल पेय से साफ कर देखा तो पाया कि वाकई यह कारगर है। फिर क्या था मंहगे टायलेट क्लीनर के स्थान पर लोगों के घरों में शौचालयों में इन शीतल पेय की दो लीटर की बोतल ने अपना स्थान बना लिया।देश में कुछ किसानों ने भी काले वाले शीतल पेय का छिड़काव अपनी फसलों में किया, और पाया कि वाकई में उनकी फसलें कीट पतंगों से सुरक्षित हैं। अनेक स्थानों पर किसानों द्वारा इस शीतल पेय का उपयोग कीट पतंगों से अपनी फसल की रक्षा करने में किया जा रहा है।एक स्थानीय चेनल में शराब के विज्ञापन का जिक्र करना लाजिमी होगा, जिसमें शराब पीते बेटे को चेताने के लिए उसका पिता उसकी शराब के गिलास में एक कीड़ा डाल देता है, और कहता है, देख बेटा शराब पीने से मर जाते हैं। बेटा भी उसका बाप निकलता है और तपाक से जवाब देता है, बापू इसीलिए पी रहा हूं कि पेट के कीड़े मर जाएं।जब केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार जो स्वयं संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष रहे हैं, यह स्वीकार कर चुके हैं कि भारत में बिकने वाले शीतल पेय में कीटनाशक की मात्रा अंतर्राष्ट्रीय मानकों से कई गुना अधिक है, और संसद में इसकी आपूर्ति रूकवा दी गई है, तब फिर क्या कारण है कि देश की सवा सौ करोड़ से अधिक जनता को इस धीमे जहर से मारा जा रहा है?लोगों को धीमे जहर का आदी बनाने वाली कंपनियों के प्रवक्ता भी आग में घी का काम करने से नहीं चूक रहे हैं। पेिप्सको इंडिया के प्रवक्ता का बयान, ``सरकार अगर शीतल पेय के अंतिम उत्पाद पर मानक लाती है, तो कंपनी उसका समर्थन करेगी।`` क्या सरकार को चेतावनी देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सरकार क्या यह नहीं कर सकती है कि आखिरी उत्पाद तक तो हम बाद मे जाएंगे पहले जो साबित हो चुका है उसे तो बंद किया जाए।सांसदों की सेहत दुरूस्त रखने के लिए सरकार ने संसद में तो शीतल पेय की आपूर्ति रूकवा दी किन्तु देश भर में खुलेआम बिक रही इस धीमी मौत को रोकने की दिशा में सरकार ने कोई कदम नहीं उठाए हैं। जब देश में विशाल जनादेश लेकर रियाया की भलाई अमन चैन का सपना दिखा संसद में पक्ष और विपक्ष की जनता की ओर से मुंह मोड़ लें तो इस तरह की देशी और विदेशी कंपनियां अपने फायदे के लिए सरेराह जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करें तो क्या करें?


कांग्रेस में अंदर ही अंदर खदबदा रही है असंतोष की खिचड़ी

इस बार गठबंधन के बजाए अपनों से ही निपटना होगा पीएम को

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश में कांग्रेस के इतिहास में नेहरू गांधी परिवार से इतर दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले अर्थशास्त्री डॉ.एम.एम.सिंह पर इस बार घटक दलों के बजाए कांग्रेस के ही क्षत्रपों की नजरें इनायत होने वाली हैं। कांग्रेस के अंदरखाने में असंतोष का लावा धीरे धीरे खदकने लगा है।मंंत्रीमण्डल में वैसे तो काफी लोगों को शामिल कर मनमोहन सिंह ने साधने की कोशिश की है, किन्तु रह गए क्षत्रप अब अपनी आगे की कार्यवाही में जुट गए हैं। राज्यपाल के लालीपाप से भी असंतुष्ट गुट साधते नजर नहीं आ रहे हैं। स्थान पाने से वंचित रहने वाले नेता अब आत्ममंथन में जुट गए हैं कि आखिर उनकी उपेक्षा की असली वजह क्या रही?कांग्रेस के अंदरखाने में चल रही बयार के अनुसार इस बार मुस्लिम समुदाय द्वारा कांग्रेस का समर्थन करने के बाद भी समुदाय को मंत्रीमण्डल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, गौरतलब होगा कि मंत्रीमण्डल में कांग्रेस की ओर से गुलाम नवी आजाद को ही मंत्री बनाया गया है।वैसे अच्छे आचरण की धनी, नेहरू गांधी परिवार के प्रति निष्ठावान रहीं कांग्रेस की अनुभवी एवं वफादार मानी जाने वाली मोहसीना किदवई भी लाल बत्ती न मिलने के कारणों पर गौर फरमा रहीं हैं। विडम्बन ही कही जाएगी कि कांग्रेस सुप्रीमो और कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को देने वाला उत्तर प्रदेश सूबा एक भी केबनेट मंत्री बिना ही है। मीरा कुमार के लोकसभाध्यक्ष बनने के बाद बिहार भी मंत्री विहीन हो गया है। आंध्र प्रदेश में भी सीमित प्रतिनिधित्व के कारण वहां कांग्रेस में नारजगी जाहिर है।अजुZन सिंह, शीश राम ओला, मोतीलाल वोरा, चरण दास महंत, जनार्दन द्विवेदी, गिरिजा व्यास, हंसराज भारद्वाज, शिवरजा पाटिल जैसे दिग्गज नेता मंत्री न बन पाने के कारणों को तलाश रहे हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में लाल बत्ती से महरूम रहे कांग्रेस के दिग्गज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ अंदर ही अंदर धार तेज करने वाले हैं।कहा जा रहा है कि आने वाला समय प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के लिए अच्छा नहीं है, क्योंकि इस बार घटक दलों के अनेतिक दबाव से तो वे बच गए हैं, किन्तु अंदर ही अंदर उबल रहे तूफान से बचना उनके लिए आसान नहीं होगा।



मेट्रो उड़कर चली छत्तीसगढ़

दुर्ग भिलाई रायपुर में चल सकती है मेट्रो

होशंगाबाद भोपाल विदिशा में भी हैं मेट्रो की संभावनाएं

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। दिल्ली में अपनी आशातीत सफलता के झंडे गाड़ने के उपरांत ई. श्रीधरन के सपनों की मेट्रो रेल जल्द ही छत्तीगढ़ की राजधानी रायपुर में दिखाई देने वाली है। मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इस सिलसिले में गत दिवस दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन (डीएमआरसी) प्रमुख श्रीधरन से भेंट की।डीएमआरसी सूत्रों ने बताया कि रमन सिंह ने प्रस्ताव दिया है कि रायपुर और नए रायपुर के बीच 17 किलोमीटर लंबी मेट्रो चलाई जाए। इसके अलावा रायुपर से बरास्ता पावर हाउस, भिलाई, दुर्ग भी मेट्रो से जोड़ने की योजना भविष्य में बनाई जा सकती है। सूत्रों के अनुसार एक माह बाद डीएमआरसी की टीम जाकर मौका मुआयना कर आगे की कार्यवाही संपादित करेगी। उधर छत्तीसगढ़ सरकार के सूत्रों का कहना है कि छग में मेट्रो रेल भूमिगत के बजाए भूतल पर ही चलेगी।इधर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सीहोर, विदिशा और होशंगाबाद में रोजाना आने जाने वालो (अपडाउनर्स) की तादाद को देखकर होशंगाबाद से भोपाल होकर विदिशा एवं सीहोर भी मेट्रो रेल चलाई जा सकती है। इसके चलने से इस मार्ग पर वाहनों का दबाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।

गुरुवार, 4 जून 2009

4 june 2009

लालू की संजीवनी बिना मुश्किल है बिहार में कांग्रेस का पुर्नवास

(लिमटी खरे)


बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे सूबों में अपना जनाधार बुरी तरह खो चुकी सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस को इन राज्यों में अगर फिर से जीवित होना है, तो उसे राष्ट्रीय जनता दल और लोजपा की बैसाखी पर ही उसे खड़ा होना मजबूरी बन गया है। यद्यपि कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाली है, साथ ही उन्होंने बिहार पर भी नजरें इनायत करने के संकेत दिए हैं, फिर भी अकेले के बूते कांग्रेस इन राज्यों में खड़ी हो जाए इसमें संशय ही लगता है।
उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बिहार में कांग्रेस के वोट बैंक पर राजद ने अपना कब्जा जमा लिया है। जब लालू राबड़ी के खिलाफ राज्य में आवाजें बुलंद हो रहीं थीं उस वक्त कांग्रेस के पास माकूल मौका था, कि वह अपना वोट बैंक फिर वापस पाकर सहेज सकती थी, किन्तु कांग्रेस ने एसा किया नहीं, उस दौरान कांग्रेस के मैनेजर लालू चालीसा के पाठ में लगे हुए थे।
वैसे भी इन चुनावों में उत्तर प्रदेश में पंद्रह तो बिहार में कांग्रेस को महज दस फीसदी वोट ही मिल सके हैं। देखा जाए तो आने वाले विधानसभा चुनावों में वोट प्रतिशत और गिरने की उम्मीद है, क्योंकि मतदाताओं में उनका शुमार है, जो एक तरफ केंद्र मे राहुल गांधी का हाथ मजबूत करना चाह रहे हैं, तो दूसरी ओर सूबे में लालू राबड़ी की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करते हैं।
बिहार में ब्राम्हणों ने कांग्रेस को नकार दिया है। इस जाति के वोटों का प्रतिशत 18 है, जबकि राजग को 69 प्रतिशत वोट मिले हैं। यूपी में कांग्रेस को 21 तो बिहार में महज दो ही मिल सकी हैं। इन दो सीटों पर कांग्रेस का परचम लहराने का कारण सोनिया, राहुल फेक्टर नहीं वरन स्थानीय प्रत्याशियों की अपनी मेहनत कहा जा सकता है।
बिहार में नितीश कुमार की सरकार के खिलाफ अभी तक जनता में किसी तरह का असंतोष नहीं उपजा है। गांव गांव में चौपाल लगाकर सरकारी तंत्र को मैदानी इलाकों में दौड़ाने वाले नितीश कुमार से पार पाना अभी तो कांग्रेस के लिए टेड़ी खीर ही लग रहा है। वैसे कांग्रेस अगर चाहे तो बिहार में सरकारी तंत्र में लगा भ्रष्टाचार का घुन, शिक्षकों की बहाली में बंदबांट और हर गली में खुली शराब की दुकानों को मुद्दा बनाकर जनांदोलन कर सकती है।
भले ही केंद्र सरकार से बाहर का रास्ता दिखाकर कांग्रेस ने लालू प्रसाद यादव को उनकी औकात बता दी है, किन्तु बिहार में अपना जनाधार वापस पाने के लिए उसे लालू प्रसाद यादव जैसे घाघ नेताओं के साथ मिलकर ही सरकार के खिलाफ हल्ला बोलना पड़ेगा। लालू को साधने के लिए दििZग्वजय सिंह, कमल नाथ, कपिल सिब्बल, नारायण सामी, अजीत जोगी, जैसे नेताओं को बिहार के लिए पाबंद करना जरूरी होगा, क्योंकि ये नेता लालू यादव पर नकेल कसकर कांग्रेस के अरमानों को पूरा करने का माद्दा रखते हैं।
कांग्रेस के रणनीतिकारों ने केंद्र में सरकार बनाने में निश्चित तौर पर बेहतर रणनीति का इस्तेमाल किया है। मगर यह आश्चर्य की बात है कि जब सूबों में कांग्रेस की सरकार बनाने की बात आती है तो इनकी मेनेजरी की हवा निकल जाती है। अजुZन सिंह, कमल नाथ, सुरेश पचौरी, दििग्वजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुभाष यादव, हरवंश सिंह, कांतिलाल भूरिया जैसे कुशल सेनापतियों के होते हुए भी मध्य प्रदेश में 2003 के बाद कांग्रेस का सूपड़ा क्यों साफ है, यह बात अभी तक कोई समझ नहीं सका है। बात जब अपने सूबे से इतर दूसरे राज्य की आती है, तब इन सभी की रणनीति कमाल कर देती है।
मायावती की सोशल इंजीनियरिंग का कमाल था कि 2007 में वे उत्तर प्रदेश में सत्ता पर काबिज हो गईं। वस्तुत: लोकसभा चुनाव में मायावती के कुशासन का फल था कि कांग्रेस ने अपनी सीटों में इजाफा कर लिया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और उनके अघोषित राजनैतिक गुरू दििग्वजय सिंह उत्तर प्रदेश में 21 सीटें आने पर अपनी पीठ ठोंक अवश्य रहे हों, पर उनके चेहरों की चमक ज्यादा दिन रहने नहीं वाली।




इस बार गौर के नक्शे कदम पर शिवराज

हर मंत्री के दर पर दी दस्तक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दिल्ली यात्रा के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर की कार्यप्रणाली उनमें परिलक्षित हुई। इस बार दिल्ली आने पर शिवराज ने न केवल प्रदेश कोटे के सभी मंत्रियों से भेंट की वरन् उन्होंने सांसदों को रात्रि भोज भी दिया।
ज्ञातव्य है कि पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर ने अपने कार्यकाल में जब भी दिल्ली का रूख किया, उनकी केंद्रीय मंत्रियों विशेषकर कमल नाथ के साथ खूब छनी। केंद्रीय मंत्रियों का वे दोहन कर पाते इसके पहले ही उन्हें पदच्युत कर दिया गया था।
शिवराज सिंह चौहान ने कृषि मंत्री शरद पवार, भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ, उर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे, कोयला मंत्री श्री प्रकाश जायस्वाल, आदिवासी मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया, युवा मामलों के मंत्री अरूण यादव आदि से भ्ोंट कर प्रदेश का पक्ष रखा। माना जा रहा है कि विशेष रणनीति के तहत चौहान ने अपनी दिल्ली यात्रा को अंजाम दिया है।
गौरतलब होगा कि राज्य की विधानसभा चुनावों के दौरान केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश को दी इमदाद के बारे में कांग्रेस द्वारा विज्ञापनों के माध्यम से मतदाताओं को लुभाने का असफल प्रयास किया था। माना जा रहा है कि अगली बार के लिए शिवराज सिंह चौहान द्वारा इस तरह के कार्य किए जाकर अपना होमवर्क किया जा रहा है। मुख्यमंत्री की दिल्ली यात्रा को बेहतर कवरेज मिले इसके लिए भी व्यापक इंतजामात किए बताए जाते हैं।




ओला मध्य प्रदेश तो जाखड़ होंगे महाराष्ट्र के लाट साहेब

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र में सरकार बनाने के उपरांत अब कांग्रेस ने सरकार में शामिल होने से चूक गए नेताओं को अब सूबों में राज्यपाल बनाकर भेजने की तैयारियां आरंभ कर दीं हैं। राज्यपालों के उलटफेर मासांत तक होने की उम्मीद जताई जा रही है।
कांग्रेस की सत्ता के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि पिछली सरकार में राजस्थान कोटे से खान मंत्रालय संभालने वाले शीशराम ओेला को मध्य प्रदेश के लाट साहब की कुर्सी दी जा सकती है। वर्तमान राज्यपाल बलराम जाखड़ इसी माह 30 जून को पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले हैं।
सूत्रों ने आगे बताया कि हाल ही में बलराम जाखड़ ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी, जिसके बाद पीएम और सोनिया गांधी के बीच हुई मंत्रणा में पीएम ने सोनिया गांधी को बताया कि जाखड़ मध्य प्रदेश में ही रहने के इच्छुक हैं, किन्तु सोनिया गांधी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उन्हें महाराष्ट्र भेजने की इच्छुक हैं।

बुधवार, 3 जून 2009

चुनौतियों से भरा है 15वींं लोकसभा का सफर

(लिमटी खरे)

आजाद भारत में पंद्रहवीं लोकसभा का सत्र आरंभ हो चुका है। इस बार अनेक नए चेहरे संसदीय सौंध पहुंचकर देश की सबसे बड़ी पंचायत की कार्यवाही से रूबरू होंगे। अनेक मामलों में नई लोकसभा का सफर चुनौतिपूर्ण तो माना जा रहा है, किन्तु अवसरों के मार्ग भी प्रशस्त होते दिख रहे हैं।मनमोहन सरकार में इस बार कोई दागी मंत्री नहीं है।
इस बार अटल बिहारी बाजपेयी, जार्ज फर्नाडिस, सोमनाथ चटर्जी जैसी धुरंधर हस्तियों की आसंदी पर कोई नया चेहरा ही दिखाई पड़ने वाला है। कई सालों से पिछले दरवाजे (राज्यसभा) के रास्ते आने वाले विपक्षी नेताओं के इस बार चुन कर आने से लोकसभा में स्वस्थ्य बहस होने की उम्मीद है।सरकार में शामिल द्रमुक और तृणमूल कांग्रेस सरकार की नाक में काफी हद तक दम कर सकते हैं। गठबंधन में ताकतवर होकर शामिल हुए दोनों ही दलों के सुप्रीमों अपनी अपनी तुनक मिजाजी के लिए कुख्यात हैं। द्रमुक नेता और तमिलनाडू के पूर्व मुख्यमंत्री करूणानिधि ने सरकार के गठन के पहले ही अपनी नाराजगी दिखाकर कांग्रेस को बेकफुट पर आने मजबूर कर दिया था। करूणा ने अपने कुनबे को सरकार में न केवल शामिल कराया वरन् मनचाहे विभाग भी लिए। आने वाले समय में अगर अपनी जायज या नाजायज मांगों को लेकर द्रमुक ने कांग्रेस को आंखें दिखाई तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।सरकार का दूसरा प्रमुख घटक दल तृणमूल कांग्रेस है, जिसकी नेता ममता बनर्जी कब किस बात पर भड़क जाएं कहा नहीं जा सकता है। वैसे ममता की नजरें देश की राजनीति से इतर पश्चिम बंगाल के चुनावों पर हैं। जिसे देखकर कहा जा सकता है कि ममता शायद ही कांग्रेस से नाता तोड़ने की बात सोचें, किन्तु पश्चिम बंगाल में अगर दोनों मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ते हैं तो केंद्र सरकार मुश्किल में अवश्य आ सकती है।इस बार लोकसभा में सरकार मजबूर भी नहीं दिखाई पड़ रही है। प्रधानमंत्री आशवस्त दिखाई दे रहे हैं, कि ब्लेकमेलिंग कम से कम होगी। इन परिस्थितियों में सरकार और विपक्ष की भूमिका अत्यंत महात्वपूर्ण हो गई है। कांंग्रेसनीत सरकार को यह साबित करना होगा कि आम आदमी के हित सर्वोपरि हैं। जनता जनार्दन अब गोहत्या, राम जन्मभूमि, वेमनस्यता आदि से आगे आकर कुछ सकारात्मक देखने को उतावली है।एसा नहीं कि इस लोकसभा में चुनौतियां ही चुनौतियां हों। इस बार पहले की तुलना में अवसरों की भी भरमार नजर आ रही है। आम चुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा और कमजोर राजग विपक्ष में बैठ रहा है। कमजोर विपक्ष से सरकार की हर राह आसान होती नजर आ रही है।माना जा रहा है कि इस बार विपक्ष आरंभ से ही सरकार को घेरने के स्थान पर सकारात्मक भूमिका में होगा। वैसे भी भाजपा के थिंक टेंक और अनुभवी नेता इस बार ज्यादा संख्या में चुनकर लोकसभा में पहुंचे हैं, जिससे सदन की गरिमा के अक्षुण रहने की उम्मीद की जा सकती है।इस बार विपक्षी की ओर से राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के आलंबरदार लाल कृष्ण आड़वाणी के अलावा संघ पृष्ठभूमि के स्पष्टवक्ता मुरली मनाहेहर जोशी, समय के साथ चलने वाली सुषमा स्वराज, विद्या विषारद जसवंत सिंह, छात्र नेता से राजनीति में कूदे शरद यादव, राजनाथ सिंह, तर्कशास्त्र में निपुण यशवंत सिन्हा जैसे मुखर वक्ताओं से लोकसभा में सरकार को सामना करना पड़ेगा।इसके अलावा वामपंथी दलों के कमजोर दबाव के चलते सरकार उदारीकरण का मार्ग अपनाने में परेशानी महसूस नहीं करेगी। इस बार पेंशन, बीमा कानून संशोधन आदि जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों के ध्वनिमत से पारित होने की उम्मीद की जा सकती है। विदेश नीति पर भी ज्यादा शोरशराबा होने की उम्मीद नहीं है। साथ ही सार्वजनिक उपक्रमों की विनिवेश की प्रक्रिया सुचारू रूप में आगे बढ सकती है।इस लोकसभा की ताकत और पूंजी के रूप में युवा और महिलाएं सामने हैं। इस बार सदन के संसदीय इतिहास में पहली बार 59 महिलाएं चुनकर पहुंची हैं, जो अपने आप में एक रिकार्ड है। इतना ही नहीं कांग्रेस ने मीरा कुमार के रूप में दलित महिला को स्पीकर पद पर बिठाकर एक नजीर पेश की है।पढ़े लिखे सुसंस्कृत युवाओं की संख्या इस बार ज्यादा नजर आ रही है। 40 से कम उम्र वाले सांसदों की संख्या 79 है, जो सुखद संकेत है कि आने वाला कल युवाओं के हाथों में जा रहा है। अनुभवहीन युवा कितना और कैसा अनुभव लेते हैं यह तो वक्त ही बताएगा पर इनके आने से संसद में बहस का स्तर सुधर सकेगा।इस सबके अलावा दागी प्रत्याशी इसके सबसे बड़े कलंक कहे जा सकते हैं इस बार डेढ़ सौ दागी प्रत्याशी चुनाव जीतकर संसद की दहलीज पर पहुंचे हैं। इनमें से 21 के खिलाफ संगीन मामले विचाराधीन है। परिवारवाद की साफ छाया भी इस संसद में दिख रही है। सोनिया, राहुल गांधी, मेनका, वरूण गांधी के अलावा शरद पंवार, सुप्रिया सुले, पी.ए.संगमा और अगाथा, मुलायम और अखिलेश यादव, अजीत सिंह ओर जयंत, करूणानिधि और अझागिरी की जोड़ी परिवारवाद को हवा दे रही है।



छग और मध्य प्रदेश से आरंभ हुई आड़वाणी की मुखालफत

संघ प्रमुख के दिल्ली प्रवास के बाद गर्माई अड़वाणी विरोधी फिजा

आडवाणी के नेतृत्व पर बीजेपी में विरोध शुरू

आडवाणी के कारण हारे : भाजपा सांसद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के आधार स्तंभ माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन राव भागवत के दिल्ली प्रवास के उपरांत अब राजग के पीएम इन वेटिंग रहे लाल कृष्ण आड़वाणी का विरोध तेज हो गया है। पहले छत्तीसगढ़ से विरोध के मध्यम स्वर उठे थे, पर मध्य प्रदेश में खण्डेलवाल ने तो बिगुल फूंक ही दिया है।गौरतलब होगा कि अपने आप को सर्वमान्य नेता बनाने की चाह में पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आड़वाणी ने शतरंज की बिसात पर सभी घटकों को साधकर अपने आप को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का पीएम इन वेटिंग घोषित करवा लिया था। जिसकी बुरी तरह आलोचना हुई और अंतत: वे वेटिंग में ही रहे।पार्टी की शर्मनाक हार के बाद भले ही संघ और भाजपा अपने अपने स्तर पर हार के कारणों की समीक्षा कर रहे हों किन्तु पार्टी के अंदर ही अंदर खदबदाता असंतोष का लावा धीरे धीरे फटकर सतह पर आता दिखने लगा है। पहले जगदलपुर के सांसद बलीराम कश्यम ने आड़वाणी पर निशाना साधा तो उसके बाद मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य प्यारे लाल खण्डेलवाल ने अब पार्टी अध्यक्ष को शिकायती पत्र लिख है, जिसमें हार का ठीकरा आड़वाणी के सर पर फोड़ा गया है।छत्तीसगढ के बस्तर संसदीय क्षेत्र से लगातार चौथी बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले भारतीय जनता पार्टी सांसद बलिराम कश्यप ने कहा था कि चुनाव में श्री लाल—ष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करना पार्टी की सबसे बडी गलती थी।गौरतलब होगा कि कश्यप ने यहां जगदलपुर में मतगणनास्थल के बाहर पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा था कि देश की जनता ने श्री आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार नहÈ किया, इसी वजह से पार्टी की पराजय हुई।अब मध्य प्रदेश से यह बिगुल फुंक चुका है पार्टी के वरिष्ठ नेता प्यारेलाल खण्डेलवाल ने खतोखिताब के माध्यम से अपनी बात कही है। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता खंडेलवाल ने इस बात पर ऐतराज जताया कि बीजेपी संसदीय दल की बैठक बुलाए बगैर ही पार्टी ने आडवाणी को निर्विरोध उम्मीदवार घोषित करने का फैसला ले लिया। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, खंडेलवाल ने कहा है कि पार्टी को पूरी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए था। संसदीय दल की बैठक बुलानी चाहिए थी।सूत्र बताते हैं कि यह आडवाणी के लिए मुसीबतों की शुरुआत हो सकती है। इस बारे में वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी और खंडेलवाल के बीच बैठक हो चुकी है। जोशी को आडवाणी के विरोधी खेमे का नेता माना जाता है। खंडेलवाल के घर के बाहर मौजूद पत्रकारों ने जब जोशी से इस मुलाकात के बारे में पूछा तो उन्होंने परोक्ष रूप से अपनी बात कहते हुए कहा, ``आप क्या सोचते हैं मैं यहां कोई साजिश रचने आया हूं?``



भाजपा बोली - ``वी हेव वन मोर गांधी``!

कांग्रेस में दो, भाजपा में तीन गांधी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। गांधी का उपनाम कांग्रेस की बपौती नहीं, यह बात भाजपा ने सैकड़ों बार कही होगी, किन्तु इस बार चुनकर आए सांसदों के मामले में भाजपा यह कहने की स्थिति में आ गई है कि अगर कांग्रेस के पास नेहरू गांधी परिवार के दो सदस्य हैं तो भाजपा के पास उसके अलावा एक और गांधी है।कांग्रेस के पास श्रीमति सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो भाजपा के पास इसी परिवार की श्रीमति मेनका गांधी और वरूण गांधी हैं। यह सुखद संयोग कहा जाएगा कि महाराष्ट्र के अहमदनगर संसदीय क्षेत्र से भाजपा के मनसुख लाल गांधी भी शामिल हैं। मनसुखलाल तेरहवीं लोकसभा में विजयी हुए थे एवं बाजपेयी सरकार में मंत्री भी बने थे।वैसे भी गुलामी से आजादी के इतिहास में भारतीय राजनीति में गांधी का नाम सर्वाेपरि रहा है। वैसे गांधी का नाम आरंभ से ही कांग्रेस की संपत्ति रहा है। यही कारण है कि इस उपनाम के साथ जुड़े लोगों को कांग्रेस में बहुत ही मान प्रतिष्ठा के साथ देखा जाता है।

मंगलवार, 2 जून 2009

पानी के लिए विश्व युद्ध का दिखने लगा प्रोमो

पानी को लेकर खिचतीं तलवारें

(लिमटी खरे)

कविवर रहीम का दोहा ``रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून``, आज के समय में पूरी तरह प्रासंगिक होता नजर आ रहा है। किसी ने सच ही भविष्यवाणी की थी कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध लडा गया तो निश्चित तौर पर यह पानी के लिए ही लडा जाएगा। आज के समय में पानी को लेकर खिंची तलवारों ने इसके अंकुरण साफ दिखाई पडने लगे हैं।राजधानी दिल्ली सहित देश के हर हिस्से में पानी को लेकर जबर्दस्त मारकाट मची हुई है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक के बाद एक जानें पानी को लेकर हो रहे झगड़ों में जाती जा रही हैं। उज्जेन की स्थिति कितनी भयावह है इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, जहां सप्ताह में एक बार ही पानी की सप्लाई की जा रही हैै। हाल ही में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में दूषित जल पीने से दो लोगों की मौत और 215 के बीमार पड़ने की खबर है।यह प्रदेश और राज्य सरकारों के लिए शर्म की बात है कि पानी जैसी बुनियादी जरूरत मुहैया करवाने में वह विफल है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय को इसमें दखल देना पडा है। न्यायालय ने साफ कहा था कि अगर पानी नहीं पिला सकते हैं तो पद पर बैठने का हक नहीं है। इतना ही नहीं कोर्ट ने कहा था कि जल के बिना जीवन संभव नहीं है, अत: इसे हर कीमत पर उपलब्ध कराना सरकार का फर्ज है।राजधानी दिल्ली में पानी की किल्लत की तस्वीर तीन अस्पतालों में दिखाई पड़ रही है। लोकनायक, डीडीयू और जीटीबी अस्पताल में तीन दिन तक शल्य चिकित्सा इसलिए स्थगित रखी गई थी क्योंकि यहां पानी की जबर्दस्त किल्लत थी। कमोबेश देश के हर हिस्से में पानी की भयावह तस्वीर दिखाई पड़ रही है। सुदूर ग्रामीण अंचलों में तो लोग कोसों दूर से पानी लाकर गुजर बसर करने पर मजबूर हैंं।देश की सवा करोड़ से अधिक आबादी में से अस्सी करोड़ से भी अधिक लोगों को साफ पानी मयस्सर नहीं है। देश में पचास फीसदी से अधिक आबादी को साफ पानी नहीं मिल पाता है। वहीं दूसरी ओर देश प्रदेश की सत्ता के सारथी राजनेताओ की बैठकों में मिनरल वाटर की बोतलें टेबिल पर रखी चित्रों में साफ दिख जाती हैं। राजनेताओं और देश की गरीब जनता के बीच के इस फासले को बुंदेलखण्ड की मशहूर कहावत ``घर के लड़का गोही (आम की गुठली) चूसें, मामा खाएं अमावट``!माना जाता है कि हर व्यक्ति को प्रतिदिन पीने से लेकर नित्यकर्म के लिए कम से कम चालीस लीटर पानी की आवश्यक्ता होती है। देश में जनसंख्या के विस्फोट के बाद पानी के स्त्रोतों की कमी निरंतर जारी है। पानी बचाने के लिए शोध भी किए जा रहे हैं, किन्तु सरकारी सहायता के अभाव में ये दम तोड़ रहे हैं।आई आई टी रूड़की के रीडर डॉ.दीपक खरे ने अपने सर गंगाराम इंस्टीट्यूट ऑफ सांईंस एण्ड टेक्नालाजी के कार्यकाल के दौरान सुझाव दिया था कि घरों का उपयोग के उपरांत बहने वाला पानी पुन: प्राकृतिक तरीके से छान कर इसे घरों में संडास में उपयोग किया जाए तो इससे कम से कम 30 फीसदी जल की बचत की जा सकती है। डॉ.खरे की बात में दम था, अगर मध्य प्रदेश में ही उनके सुझावों पर अमल किया जाए तो प्रदेश की तस्वीर बदल सकती है, बाद में सफल होने पर इसे देश में भी लागू किया जा सकता है।पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने नदी जोड़ो योजना की शुरूआत की थी, जिसे पिछले पांच सालों में संप्रग सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने नदियों को आपस में जोड़ा। आज गुजरात में हरित क्रांति देखते ही बनती है।कितने आश्चर्य की बात है कि पूरी धरती का तीन चौथाई हिस्सा पानी से ढका होने के बाद भी पानी की मारामारी। सच्चाई यह है कि इसमें से महज तीन फीसदी पानी ही मानव उपयोग के योग्य माना गया है। बढ़ती जनसंख्या और वनों के सफाए के साथ ही कांक्रीट के जंगलों के उगने से तपन में इजाफा हुआ है। तपती धरती में जलसंकट विकराल रूप लेने जा रहा है।शोधकर्ताओं की चिन्ता को बेमानी नहीं कहा जा सकता है कि अगर एक मानसून बिगड़ जाए या कम हो जाए तो हिन्दुस्तान त्राहीमाम बोल उठता है। पिछले साल बुंदेलखण्ड में पानी के संकट से भी केंद्र सरकार ने सीख नहीं ली है। दरअसल जागरूकता के अभाव के चलते पानी का विकराल संकट आन खड़ा हुआ है।मध्य प्रदेश का ही उदहारण लें तो विशाल जलभराव वाले बड़े, छोटे और केरवां डेम के हाते हुए राजधानी भोपालवासियों के कण्ठ सूखे रहते हैं। इसी तरह बरगी जलाशय के बाद भी जबलपुर प्यासा रह जाता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि एशिया के सबसे बडे मिट्टी के बांध भीमगढ़ से आरंभ की गई सुआखोड़ा परियोजना जिसे जिला मुख्यालय सिवनी की प्यास बुझाने दोनों समय जलापूर्ति किए जाने की गरज से 2025 की आबादी का अनुमान लगाकर तैयार किया गया था, वह औसतन महीने में दो तिहाई दिन ही एक समय पानी आपूर्ति कर पा रहा है।अब भी वक्त है। हमेें जागना होगा, हमें अपने समाज को पानी के लिए जागरूक करना होगा, वरना आने वाले दिनों में पानी को लेेकर मचने वाली मारकाट से निपटना शासन, प्रशासन के माथे का नया सरदर्द ही साबित होगा, जिससे शासन अभी संभवत: अनिभिज्ञ ही है। आने वाले दिनों में सहज सुलभ पानी की राशनिंग भी होने लगे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


आड़वाणी की बंद कमरे में भागवत से मुलाकात के बाद सियासत गर्माई

हार का ठीकरा संघ पर फोड़ना चाह रहे आड़वाणी

आड़वाणी के नाम पर संघ में घमासान

कांग्रेस के दलित कार्ड से भाजपा में मंथन का नया दौर

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कड़क फैसले लेने के लिए मशहूर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की नेता प्रतिपक्ष लाल कृष्ण आड़वाणी के साथ झंडेवालन स्थित संघ मुख्यालय ``केशव कुंज`` में हुए 75 मिनिट लंबे विचार विमर्श के उपरांत सियासत गर्मा गई है। उधर लोकसभाध्यक्ष के लिए कांग्रेस द्वारा दलित कार्ड खेले जाने से लोकसभा उपाध्यक्ष के लिए अब भाजपा में रायशुमारी का दौर चल पड़ा है।संघ प्रमुख से चर्चा के उपरांत पत्रकारों से मुखातिब आड़वाणी ने इशारों ही इशारों में संघ को भी भाजपा की हार के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार बता ही दिया। मीडिया से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि मार्च के बाद से वे भागवत ने नहीं मिले थे। मुलाकात के मजमून पर कोई टिप्पणी किए बिना आड़वाणी ने इशारों में कहा कि चुनावों में संघ ने जो सहयोग प्रदान किया है, उसके लिए वे भागवत को धन्यवाद ज्ञापित करने आए थे।संघ के पूर्व प्रवक्ता रहे एम.जी.वैद्य ने सीधे तोर पर आड़वाणी पर वार करना आरंभ कर दिया है। एक अखबार में उनके हवाले से छपे लेख में कहा गया है कि संघ को आपात धर्म निभाते हुए भाजपा में व्यापक परिवर्तन के लिए कठोर कदम उठाना चाहिए। वैसे आड़वाणी की वेब साईट पर कार्यकर्ताओं की जो प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं उनमें सुषमा स्वराज को नेता प्रतिपक्ष और हिन्दुवादी छवि के पुरोधा माने जाने वाले नरेंद्र मोदी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की बात कही जा रही है।नेता प्रतिपक्ष के लिए आड़वाणी के नाम पर सहमति बनने के उपरांत संघ में उनके नाम पर घमासान आरंभ हो गया है। उधर संघ प्रमुख के करीबी सूत्रों का कहना है कि संघ प्रमुख चाहते हैं कि आड़वाणी नेता प्रतिपक्ष का पद एक माह में ही छोड़ दें, किन्तु आड़वाणी ने कुछ और समय मांगा है। संघ में अधिकतर नेताओं का मत है कि अब समय आ गया है जब आड़वाणी को भी अटल बिहारी बाजपेयी का अनुसरण करना चाहिए।उधर कांग्रेस द्वारा लोस अध्यक्ष पद पर दलित नेता मीरा कुमार की ताजपोशी की तैयारियों ने भाजपा के अंदरखाने में उबल रही खिचड़ी खदबदा दी है। भाजपा अब उपाध्यक्ष पद के लिए दलित के नाम पर विचार कर रही है। पहले इस पद के लिए सुषमा स्वराज और सुमित्रा महाजन के नाम की चर्चा थी, किन्तु अब गोपीनाथ मुंडे, श्रीपद नायक और करिया मुंडा के नाम राजनैतिक फिजां में तैर गए हैं।


देश की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है अरूण यादव के लिए

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश कोटे से केंद्र में राज्यमंत्री बने अरूण यादव ने बतौर खेल एवं युवा मामलों के राज्यमंत्री का कामकाज संभालने के उपरांत अपनी प्रथमिकताएं तय कर दीं हैं। बकौल अरूण यादव उनकी पहली प्रथमिकता देश की प्रतिष्ठा से जुड़े अगले साले होने वाले राष्ट्रमण्डल खेल हैं।अरूण यादव मानते हैं कि केंद्र सरकार की 100 दिनी कार्ययोजना में कामन वेल्थ गेम्स में तयशुदा सीमा में बेहतर मेजबानी प्रमुख एवं चुनौतिपूर्ण होगी। मध्य प्रदेश में भी ग्रामीण स्तर पर प्रतिभाओं को उभारने के लिए वे काफी वचनबद्ध भी दिखाई दिए। कार्यभार ग्रहण करते समय उनके पिता एवं मध्य प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव सहित अनेक समर्थक उनके साथ मौजूद थे।

सोमवार, 1 जून 2009

1 june 2009

कई मामलों में अनोखी है 15वीं लोकसभा

14वीं लोकसभा ने देखे उतार चढ़ाव

(लिमटी खरे)
आजाद हिन्दुस्तान में पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के साथ ही अनेक रिकार्ड उभरकर सामने आए हैं। कहीं सबसे कम उम्र का संसद सदस्य चुना गया है, तो कहीं कमसिन को देश में मंत्री बनाया गया है। इस बार आपराधिक रिकार्ड वाले सांसदों की तादाद भी पिछली मर्तबा से कहीं अधिक है।
इस बार 300 सांसद करोड़पति चुने गए हैं, जो पिछली मर्तबा की तुलना में लगभग दुगने हैं। इस बार सांसदों की संपत्ति में भी कई गुना बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। पिछली मर्तबा चुने गए सांसदों की संपत्ति पिछली बार से कहीं अधिक है। इनमें से 52 सांसद उत्तर प्रदेश से चुने गए हैं, जिनकी घोषित संपत्ति एक करोड से अधिक है।
सांसदों में सबसे अमीर संसद सदस्य विजय वाडा के सांसद राजगोपाल हैं। कांग्रेस जैसी आदर्शवादी पार्टी के इस सांसद की कुल घोषित संपत्ति 295 करोड है। सबसे कम संपत्ति वाले संसद सदस्य छत्तीसगढ़ से चुने गए संयुक्त मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री चरण दास महंत हैं।
आपराधिक छवि का इस बार बोलबाला दिखाई दे रहा है। पिछली बार आपराधिक रिकार्ड वाले 128 सांसदों ने संसदीय सौंध तक पहुंचने की जुर्रत की थी, तो इस बार उनकी संख्या बढकर 153 हो गई है। मजे की बात तो यह है कि आपराधिक छवि वाले संसद सदस्यों की सबसे अधिक संख्या भाजपा में है। भाजपा के 43 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।
इस बार सबसे कम उम्र के सांसद बनने का सौभाग्य लक्ष्यद्वीप के कांग्रेस प्रत्याशी मुहम्मद हमदुल्ला सईद को मिला है, इनकी उम्र महज 26 साल है। वहीं दूसरी ओर बिहार में हाजीपुर से चुनाव जीते जनता दल यूनाईटेड के रामसुंदर व्यास की उम्र 88 साल है।
इस बार युवा अथाZत 40 साल से कम वालों के संसद में पहुंचने की संख्या में दुगना इजाफा हुआ है। इस बार 88 सांसद ऐसे हैं, जिनकी उम्र 40 साल से कम है। इनमें से कांग्रेस के सांसद सबसे अधिक है। कांग्रेस में 40 साल से कम उम्र वालों की तादाद 27 है। बावजूद इसके इस बार सांसदों की औसत उम्र पिदले बार 52.6 के मुकाबले बढकर 53.04 हो गई है।
देश की पहली नागरिक महिला है, लोकसभाध्यक्ष पद पर मीरा कुमार का नाम लगभग तय हो गया है, तो भला संसद में महिलाएं कैसे पीछे रह जातीं। इस बार संसद में पिछले बार 45 के मुकाबले 59 महिलाएं चुनकर लोकसभा में पहुंची हैं। इसमें भी कांग्रेस ने ही बाजी मारी है। कांग्रेस में इनकी संख्या 23 है।
वैसे इस बार लोकसभा सदस्यों को पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के लोकसभा के पहले दिन (04 जून 2004 को ) कहे वक्तव्य को अमल में लाया जाना चाहिए। सोम दा ने कहा था -``दिन का काम खत्म हो जाने के बाद हर दिन हमं खुद से पूछना चाहिए, कि आज हमने देश और लोगों के लिए क्या किया? हमें चुनकर भेजने वाले लोगों के भरोसे के साथ क्या हमने न्याय किया?``
स्पष्टवक्ता और अपने कर्मों के प्रति ईमानदार रहे सोमदा की इस अपील को तो तेरहवीं लोकसभा के सदस्यों ने अंगीकार नहीं किया, किन्तु इस बार नए चुने लोगों से अपेक्षा की जा सकती है, क्योंकि इसमें तरूणाई की तादाद ज्यादा है।
वहीं दूसरी ओर 14वीं लोकसभा में घटी अनेक घटनाओं ने देश के लोकतंत्र को शर्मसार किया है। संसद में पैसे के बदले सवाल, सदन में नोट लहराने और कबूतरबाजी में संसद के लिप्त होने की शर्मनाक घटनाएं भी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की साक्षी बनीं जिससे सदन की गरिमा तार तार हुए बिना नहीं रही। लगभग छ: दशकों से देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा ने तमाम उतार चढ़ाव देखे हैं, किन्तु 14वीं लोकसभा जैसा गरिमाहीन प्रदर्शन कभी नहीं देखा होगा।
इस बार प्रश्न पूछने से संबंधित हुए स्टिंग आपरेशन में भाजपा के चंद्र प्रताप सिंह, अन्ना साहेब, एम.के.पाटिल, प्रदीप गांधी, संरेश चंदेल और मनोज कुमार तो राजद के मनोज कुमार, बसपा के लाल चंद, राजाराम पाल और नरेंद्र सिंह कुशवाह तथा कांग्रेस के रामसेवक सिंह को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी।
इसके अलावा शिवराज सिंह चौहान, उमर अबदुल्ला, भुवन चंद खण्डूरी, प्रेम कुमार धूमिल, मायावती, मुलायम सिंह यादव, भूपेंद्र कुमार हुड्डा जहां सूबों के निजाम (मुख्यमंत्री) बने वहीं सुशील मोदी बिहार के उपमुख्यमंत्री बने। इसके साथ ही साथ सूबों में मंत्री बनने वालों की फेहरिस्त तो इससे कहीं लंबी है।
कबूतरबाज सांसद बाबू भाई कटारा और नोट के बदले सवाल पूछने वाले सांसदों को तो लोकसभा की संसदीय सौंध से उठाकर बाहर कर दिया गया किन्तु सदन में हवा में नोट लहराने वाले सांसद को चेतावनी देकर ही बरी कर दिया गया। आज भी देश की जनता को यह पता नहीं है कि आखिर उन लहराने वाले नोटों को किसकी तिजोरी में से निकालकर लाया गया था।
इसके पहले पी.व्ही.नरसिंहराव सरकार के कार्यकाल में भी झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और अजीत सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल पर समर्थन के लिए लालच देने के आरोप लगे थे, किन्तु इस बार तो सांसद नोट की गडि्डयां हाथ में लहराते नज़र आए, जो कि अपने आप में अद्भुद ही कहा जा सकता है।
सांसद अपने दिल पर हाथ रखकर सोचें कि चौदहवीं लोकसभा में सत्र कितने दिन चले। कार्यवाही चली कम (1,738 घंटे 45 मिनिट और बाधित (423 घंटे) ज्यादा हुई। इसके लिए सत्ता या विपक्ष के सदस्यों को दोष देकर सांसद अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं, वस्तुत: यह देश की जनता द्वारा दिए गए जनादेश का घोर अपमान था।
इसके लिए कड़ा कानून बनाकर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सार्वजनिक धन के आपराधिक दुरूपयोग का मामला दायर किया जाना चाहिए। सवाल यह है कि अपने ही खिलाफ कानून बनाने की हिमाकत आखिर कौन कर पाएगा। कितने आश्चर्य की बात है कि इस बार संसद ने न्यूनतम बैठकों (332) का रिकार्ड कायम किया है।
इस लोकसभा में 41 सांसदों ने त्यागपत्र दिया तो 25 सदस्य अन्य कारणों से सदस्य नहीं रह पाए, और 11 की सदस्यता रद्द की गई। अंतिम समय में लोकसभा की 39 सीटें रिक्त थीं। कांग्रेस के सांसद एम.के.सुब्बाराव की नागरिकता पर ही सवालिया निशान लगे।
बहुप्रतिक्षित महिला आरक्षण बिल इस लोकसभा में परवान न चढ़ सका। हलांकि सूचना का अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसे बेहतरीन कानून बनाए गए, किन्तु लगभग चार दर्जन विधेयक अधर में ही लटके रहे। इस लोकसभा में अनेक सदस्यों ने अंतिम समय अपने अपने राज्यों मेंं विधानसभाओं में किस्मत आजमाने में ही भलाई समझी और संसद के अंतिम सत्र में वे गायब ही रहे।
देश के इतिहास में पहली बार एसा हुआ कि गणतंत्र दिवस परेड पर देश के वज़ीरे आला वहां उपस्थित नहीं रहे। संसद के अंतिम सत्र के अंतिम दिन प्रधानमंत्री डॉ.एम.एम.सिंह का संदेश पढ़कर सुनाया गया। संसदीय इतिहास में यह संभवत: पहला मौका रहा होगा जबकि किसी पूरे सत्र के दौरान देश के प्रधानमंत्री ने शिरकत न की हो।
इतना ही नहीं सोमनाथ चटर्जी के रूप में पहली बार कोई वामदल (44 सदस्यों वाली माकपा) का नेता लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हुआ। सोमदा ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी ईमानदारी से किया। सांसदों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर सोमदा की टिप्पणी कि इन सांसदों ने तो जनता का एक पैसा दिया जाना चाहिए और न ही इन्हें दुबारा चुनकर आना चाहिए, वास्तव में जनता के दर्द को पूरी तरह रेखांकित करने के लिए काफी कही जा सकती है। सोमदा को निष्पक्षता की कीमत पार्टी की सदस्यता खोकर चुकानी पड़ी जो वाकई एक नज़ीर कही जा सकती है।




अब मध्य प्रदेश में बढ़ेगा कमल नाथ का जनाधार

और रसूखदार होंगे निष्ठावान

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। केंद्र में भूतल परिवहन मंत्री बने कमल नाथ का जनाधार अब मध्य प्रदेश में तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। कमल नाथ के नए विभाग से उनके समर्थक मायूस अवश्य होंगे किन्तु आने वाले समय में उन्हें कमल नाथ के कद का असली अंदाजा हो जाएगा।
गौरतलब होगा कि पिछले पांच सालों में कमल नाथ ने मध्य प्रदेश को कुछ खास नहीं दिया। इसका कारण शायद प्रदेश में अनेक क्षत्रपों की उपस्थिति हो सकता है। अब पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अजुZन सिंह के सक्रिय राजनीति से पाश्र्व में ढकेले जाने के उपरांत लगता है कमल नाथ प्रदेश में अपनी सक्रियता बढ़ा देंगे।
नाथ समर्थकों के लिए खुशखबरी हो सकती है कि जल्द ही उन सभी का रसूख तेजी से बढ़ सकता है। बताया जाता है कि पिछले पांच सालों में कमल नाथ के कट्टर समर्थक माने जाने वाले अंतिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं ने दोहरी निष्ठा अपनाना आरंभ कर दिया था। एसा नहीं कि खुद कमल नाथ को इस बात का पता न हो। कमल नाथ के करीबी सूत्रों का कहना है कि इस अग्नि परीक्षा की घडी में जो समर्थक उनके साथ रहे अब उनके पुरूस्कृत होने का समय आ गया है।
मध्य प्रदेश में सड़कों के फैलते जाल को व्यवस्थित कर कमल नाथ अब अपने समर्थकों का दायरा और बढ़ा सकते हैं। कार्यभार ग्रहण करने के बाद अधिकारियों से रूबरू कमल नाथ के तीखे तेवरों का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। दिल्ली से लेकर मैदानी अफसरान में हडकम्प की स्थिति बन गई है।
बताया जाता है कि मैदानी पदस्थापना वाले अफसरान अब इस बात को लेकर संशय में हैं कि कहीं उनकी कार्यप्रणाली और कारगुजारियों की शिकायत नाथ समर्थकों द्वारा मंत्री से न कर दी जाए। वैसे उनके विरोधी भी तेजी से सक्रिय हो गए हैं। कार्यभार ग्रहण करने के उपरांत मीडिया से रूबरू कमल नाथ ने कहा था कि वे इस तरह की जिम्मेदारी चाहते थे, जिसमें देश के अंदर रहकर ही काम किया जा सके। उनके इस वक्तव्य को लोग इस तरह भी हवा दे रहे हैं कि चूंकि वे अपने संसदीय क्षेत्र को समय नहीं दे पाते थे अत: उन्होंने यह विभाग अपनाना बेहतर समझा, जबकि वास्तविकता इससे उलट ही हैं
कमल नाथ कहीं भी रहें, वे अपने संसदीय क्षेत्र के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। वैसे भी वे देश में रहें या विदेश में, अपने संसदीय क्षेत्र के सतत संपर्क में ही रहते हैं, इसलिए उनके विरोधियों द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार की हवा जल्द ही निकलने की उम्मीद है।



भाजपा के कायाकल्प का जिम्मा उठाया संघ प्रमुख ने

अगले माह हो सकता है व्यापक फेरबदल

5 की बैठक में भागवत दिखा सकते हैं अनेक नेताओं को आईना

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राजग के पीएम इन वेटिंग और मजबूत नेता निर्णायक सरकार की धज्जियां उडने के बाद अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन राव भागवत ने भाजपा के कायाकलप का बीड़ा उठाया है। वे दिल्ली में भाजपा के आला नेताओ के साथ विचार विमार्श के उपरांत पांच जून को नागपुर में होने वाली संघ के शीर्ष नेताओं की बैठक में इसका खाका रखने की तैयारी कर रहे हैं।
संघ प्रमुख के करीबी सूत्रों का कहना है कि दरअसल संघ के शीर्ष नेताओं में भी भाजपा को लेकर तरह तरह के मत हैं। कोई नरेंद्र मोदी के अहसानों तले दबा है तो कोई अरूण जेतली के। किसी को आड़वाणी पसंद हैं तो किसी को राजनाथ। इन परिस्थितियों में भाजपा के मसले में कोई कठोर फैसला संघ नहीं ले पा रहा है।
सूत्रों के अनुसार संघ मुख्यालय नागपुर में 5 जून को शीर्ष नेताओं की बैठक आहूत की गई है, जिसमें स्वयं मोहन भागवत, भैया जी जोशी, सुरेश राव जोशी, सुरेश सोनी, मदन दास देवी, सुरेश सोनी आदि के शामिल होने की संभावना है।
सूत्रों ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार में लगभग सवा छ: साल और सूबों में भाजपा के शासन होने के चलते संघ और भाजपा के आला नेताओं के रिश्ते अब वैचारिक के स्थान पर कारोबारी ज्यादा हो गए हैं, जिसे लेकर संघ प्रमुख चिंतित नजर आ रहे हैं। संघ के आला नेताओं की पसंद (कारण चाहे जो भी हो) अलग अलग होने के चलते संघ भाजपा के मामले में फैसला लेने में अपने आप को असहाय ही पा रहा है।
सूत्रों के अनुसार कुछ दिनों पूर्व संघ प्रमुख ने सुरेश राव जोशी, सुरेश सोनी, भैया जी जोशी, एवं मदन दास को भाजपा के कथित लौह पुरूष आडवाणी के पास यह संदेशा लेकर भेजा था कि संघ का मन आडवाणी, राजनाथ सहित समूची भाजपा में परिवर्तन लाने का है। संघ प्रमुख के ये दूत आडवाणी की बातों में ही उलझकर बिना किसी निर्णय के बेरंग लौट गए थे। सूत्रों ने इस बात के संकेत भी दिए कि जुलाई माह में भाजपा में व्यापक स्तर पर फेरबदल का ताना बाना भी बुना जा रहा है।

रविवार, 31 मई 2009

31 may 2009

. . . तो क्यों अलापते हो आपदा प्रबंधन का राग
(लिमटी खरे)
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में रानी अवंती बाई सागर परियोजना के डूब वाले इलाके में 6 अप्रेल को चाईम्स एविएशन के एक विमान के गिरने की खबर से सनसनी फैल गई थी। इसके पहले इसी साल मकर संक्रांति के दिन इसी जिले के अरी के पास के जंगलों में सेना के एक विमान के क्रेश होने की खबर भी पंख लगाकर उड चुकी है। इस विमान का तो आज तक पता नहीं चल सका है, यह विमान सेना का था या अन्य किसी निजी या सरकारी उपक्रम का यह तो पता नहीं चल सका है, पर यह एक किंवदंती बनकर रह गया है।हरियाणा की चाईम्स एविएशन कंपनी जिसका एक बेस सागर के पास ढाना में भी है, वहां से प्रशिक्षु पायलट रितुराज ने अबाउट टर्न के लिए बालाघाट के बैहर के लिए उडान भरी थी। शाम ढलते ही उसका सब ओर से संपर्क टूट गया। कुछ मछुआरों ने इसे गढाघाट के समीप जल समाधि लेते देखा था।इसके बाद जबलपुर और सिवनी जिला प्रशासन ने तत्परता के साथ इसकी खोज आरंभ करवा दी थी। विशाखापट्टनम, आगरा आदि से प्रशिक्षित गोताखोरों को बुलवाया गया। इन गोताखोरों का राजसी अंदाज तो देखिए बिना साजो सामान के ही ये सिवनी पहुंच गए। फिर जब इनके उपकरण आए तब इन्होंने काम चालू किया। पर अफसोस निराशा ही हाथ लगी। इसके बाद अत्याधुनिक समझा जाने वाला ``सोनार`` रडार भी नाकाफी साबित हुआ।रितुराज के परिजनों पर क्या बीती होगी इसकी कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रितुराज के परिजनों ने हार नहीं मानी। उन्होंने निजी तोर पर सी लाईन डाईविंग कंपनी के प्रशिक्षित गोताखोरों को इसके लिए पाबंद किया। इन गोताखोरों ने पचास से भी अधिक गोते लगाने के बाद 52 दिनों के पश्चात आखिरकार विमान को आखिरकार ढूंढ ही लिया।एक निजी समाचार चेनल ने ``बेटे की खातिर`` शीर्षक से इस कार्यक्रम की जीवंत तस्वीरें दिखाईं। कितने आश्चर्य की बात है कि प्रशासन ने जब अपने स्तर पर अभियान चलाया था, तब पूरा इलाका सील कर ग्रामीणों को दूर रखा था। उन्हीं ग्रामीणों की निशानदेही और उत्साह भरे सहयोग के चलते रितुराज का शव और विमान निकाला जा सका।रितुराज के मामा सतीश सिंह ने इस पूरे आपरेशन में जबलपुर जिलाधिकारी के सहयोग को अवश्य रेखांकित किया है। बकौल सतीश सिंह गांव वालों ने जहां बताया था, वहीं वह विमान मिला। यह अलहदा बात है कि गर्मी के चलते बरगी बांध का जलस्तर काफी कम हो गया है, जिसके चलते गोताखोरों को विमान ढूंढने में आसानी हुई। हीलियम गैस वाले बैलून से निजी तौर पर गोताखोरों ने वह काम कर दिखाया जिसे सरकारी तौर पर अंजाम दिया जाना था।इस पूरे आपरेशन में चाईम्स एविएशन की भूमिका भी संदिग्ध ही मानी जा सकती है। पूरे आपरेशन में चाईम्स एविएशन की ओर से कोई प्रतिक्रिया तक व्यक्त न किया जाना उनकी मानवता के प्रति संवेदनाअों को रेखांकित करने के लिए काफी कहा जा सकता है।अब विमान निकाला जा चुका है। इसके बाद नागर विमानन मंत्रालय या संचालक नागर विमानन (डीजीसीए) क्या कदम उठाता है, यह तो भविष्य के गर्त में है, किन्तु इसके अंदर के ब्लेक बाक्स से काफी कुछ राज खुल सकते हैं। विमान में ब्लेक बाक्स उसकी टेल में होता है, क्योकि माना जाता है कि विमान के उस भाग को क्षति अपेक्षाकृत कम मामलों में होती है। क्या विमान में कम ईंधन था, या तकनीकि तौर पर विमान दुरूस्त नहीं था, या इस हादसे के पीछे और कोई कारण है? इन बातों पर से पर्दा तो तब उठ सकेगा जब डीजीसीए इसकी विधिवत जांच की घोषणा कर जांच करवाएगा।महाकौशल के जबलपुर जिले में विशाल जलसंग्रह क्षमता वाला बरगी बांध है तो सिवनी जिले में एशिया का सबसे बडा मिट्टी का बांध भीमगढ में संजय सरोवर परियोजना है। इन दोनों के निर्माण के दौरान आपदा प्रबंधन की जगह ठीक उसी तरह रखी गई होगी जिस तरह पुरूषों के लिए बनने वाले पैंट में पहले बटन और अब मियानी के लिए जगह छोडी जाती है।किसी भी बांध के बनाए जाते समय पानी के भराव क्षेत्र में से जंगलों का सफाया अमूमन कर ही दिया जाता है, क्योंकि एसा नहीं करने पर मूल्यवान लकडी के पानी में डूबकर सडने की आशंका बनी रहती है। निश्चित तौर पर रानी अवंतिबाई सागर परियोजना के निर्माण के दौरान भी यही किया गया होगा। अब तो इसे बने इतना समय बीत चुका है कि इसे बनाने वाले सरकारी मुलाजिम सेवानिवृत हो चुके होंगे, इसलिए उनकी जवाबदेही तय करने से समस्या का हल नहीं हो सकता है। किन्तु आने वाले समय के लिए इससे सबक लिया जाकर नए बांधों या गर्मी में भराव क्षेत्र कम होने पर लकडी के डूंढ आदि को काट दिया जाना ही श्रेयस्कर होगा।विडम्बना ही कही जाएगी कि रितुराज के हादसे ने आपदा प्रबंधन की पोल खोलकर रख दी है। याद नहीं पडता आज तक आपदा प्रबंधन को लेकर कभी मॉक िड्रल भी हुआ हो। आपदा प्रबंधन के लिए तैनात कर्मचारी भी अब अपना मूल दायित्व भूल चुके हों तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

कमल नाथ ने दिखाए आक्रमक तेवर
कहा कागज पर नहीं जमीन पर चाहिए सड़क
पांच सालों से ठप्प पड़ी है, स्विर्णम चतुर्भुज योजना
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। माना जा रहा था कि केंद्र में भूतल परिवहन मंत्री बनने के उपरांत कमल नाथ अपनी नाराजगी जरूर दिखाएंगी, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। कार्यभार संभालते ही अधिकारियों के साथ बैठक में कमल नाथ ने तीखे तेवर अिख्तयार किए। पिछले पांच सालों के कार्यकाल को देखकर उन्होंने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें सड़क जमीन पर चाहिए कागजों में नहीं।कमल नाथ के करीबी सूत्रों का दावा है कि विभागीय कामकाज की समीक्षा के साथ ही वे अचरज में पड़ गए कि पिछले पांच सालों में कागजों पर तो योजनाएं फल फूल रहीं हैं, किन्तु वास्तविकता में इसमें एक इंच भी काम नहीं हुआ है। तेज गति से परिणाममूलक काम करने के आदी कमल नाथ के साथ विभागीय अफसर बहुत अधिक कंफर्टेबल नहीं दिखे।उधर कांग्रेस के सत्ता के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले पांच सालों में इस विभाग का काम कच्छप गति से चल रहा था, जिसे दुरूस्त करने और पटरी पर लाने की महती जिम्मेदारी कमल नाथ को सौंपी गई है। ज्ञातव्य है कि इस विभाग का जिम्मा पिछली मर्तबा द्रमुक कोटे से टी.आर.बालू के पास था।सूत्रों ने बताया कि कमल नाथ को मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कार्यभार सौंपे जाने की तैयारी कर ली गई थी, किन्तु सडकों के हालात और मध्य प्रदेश के अन्य क्षत्रपों के दबाव के चलते उन्हें भूतल परिवहन का जिम्मा सौंपा गया है। वैसे भी सडक विकास मंत्रालय का काम गति पकड़े इसलिए कमल नाथ को इसकी जवाबदारी दी गई है।गौरतलब होगा कि अफसरशाही पर लगाम कसकर बिखरे हुए तारों को समेटकर पटरी पर लाने के लिए कमल नाथ काफी माहिर माने जाते हैं। वैसे भी भूतल परिवहन में नौकरशाही का जाल बुरी तरह फैला हुआ है। हर कदम पर एक नई उलझन का सामना करना होता है, कभी अधिग्रहण का तो कभी रक्षित वन (रिजर्व फारेस्ट) की झंझट।इतना ही नहीं इस मंत्रालय के काम में राज्य सरकारों का भी पूरा पूरा दखल होता है। पिछली बार बालू यह कहकर बच जाया करते थे कि राज्य सरकारें उन्हें वांछित सहयोग प्रदान नहीं कर रही हैं, किन्तु कमल नाथ की बात ही कुछ ओर है। वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने दरबार में बुलाकर योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का खाका रखकर मुख्यमंत्रियों को फसाने में माहिर माने जाते हैं।

जेतली से बुरी तरह खफा है संघ
दो माह तक ``कीप मम`` की नसीहत दी भाजपाईयो को
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा विधानसभा के बाद आम चुनावों में भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार अरूण जेतली को कड़ी फटकार लगाई है। साथ ही संघ ने भाजपा की हार पर टिप्पणी करने वाले बयानवीर नेताओं को कम से कम दो माह तक मुंह बंद रखने की हिदायत भी दी है।ज्ञातव्य है कि भाजपा और संघ द्वारा आम चुनावों में हार की समीक्षा अपने अपने स्तर पर की जा रही है। एक ओर संघ ने एक कमेटी बनाकर हार के कारणों की समीक्षा आरंभ की है तो दूसरी ओर भाजपा नेता समीक्षा को अपने नजररिए से देखकर मीडिया को इंटरव्यू दे रहे हैं। हाल ही में एक अंग्रेजी समाचार पत्र में अरूण जेतली के साक्षात्कार संघ को नागवार गुजरा। सूत्रों ने बताया कि इसके तुरंत बाद ही संघ ने जेतली से जवाब तलब किया। संघ के सहकार्यवाहक भैयाजी जोशी ने तो साफ तोर पर जेतली को समीक्षा पूरी होने तक मीडिया से पर्याप्त दूरी बनाने का मशिविरा दे डाला।सूत्रों के अनुसार तीन चरणों हार की समीक्षा की जा रही है। राज्यवार समीक्षा लगभग दो माह में पूरी होने की उम्मीद है। इसक दूसरे चरण में संघ द्वारा भाजपा के साथ बैठकर हार के कारणों का चिंतन किया जाएगा। और तीसरे चरण में हार की वजहों को दूर करने का प्रयास किया जाएगा।सूत्रों ने यह भी बताया कि दो एक माह में ही भारतीय जनता पार्टी में व्यापक फेरबदल होना तय है। संघ अब युवाओं को आगे लाने की हिमायत कर रहा है। नेता प्रतिपक्ष के लिए संघ की पहली पसंद सुषमा स्वराज हैं, जो आने वाले कुछ महीनों में आड़वाणी का स्थान ले लेंगी।

शनिवार, 30 मई 2009

साप्ताहिक डायरी .................

ये है दिल्ली मेरी जान

लिमटी खरे

लोग इंतजार में हैं कब निकालेंगे अजुZन तरकश से नया तीर
भले ही कांग्रेस के मैनेजरों ने कुंवर अजुZन सिंह को हाशिए में लाने के लिए एडी चोटी एक कर दी हो पर आज भी उनका भय सभी को बना हुआ है। पत्र और किताबों के माध्यम से तीर चलाने में निपुण अजुZन सिंह की दो किताबों ने सियासत में तूफान ला दिया था। समय समय पर उनके पत्र मीडिया की सुिर्खयां बने और राजनेताओं को कांग्रेस के इस चाणक्य से हार माननी पडी। अब लोगों को इंतजार है अजुZन सिंह की अगली किताब का, जिसके आने के बाद अनेक क्षत्रप नप सकते हैं। सियासी गलियारां में चल रही चर्चाओं के अनुसार अजुZन सिंह माकूल वक्त का इंतेजार कर रहे हैं। समय आने पर उनकी नई किताब या पत्र के चुनिंदा अंश मीडिया में ऑफ द रिकार्ड रिलीज कर दिए जाएंगे। फिर आएगा मजा खेल का। मौन साधे अजुZन सिंह शायद यही कह रहे होंगे - ``खेल तमाशा अभी खत्म बाकी है मेरे दोस्त।``

विभाग और रूतबे से असंतुष्ट लग रहे हैं महराज
मनमोहन सिंह मंत्रीमण्डल में दूसरी बार बतौर राज्यमंत्री शामिल हुए सिंघिया घराने के युवा महराज राज्य मंत्री बनाए जाने पर कुछ ज्यादा प्रसन्न नहीं दिखाई दे रहे हैं। वैसे भी कमल नाथ के पास रहा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय उन्हें दिया गया है। अपनी पीडा का इजहार तो वे नहीं कर सकते किन्तु उन्होंने इशारों ही इशारों में जता दिया कि उन्हें स्टेयरिंग वाली गाडी अथाZत केबनेट मंत्री का पद चाहिए था। शपथ ग्रहण समारोह के उपरांत उन्होंने कहा कि पद मायने नहीं रखता, काम बडा होता है। राजनैतिक गलियारों में ज्योतिरादित्य के इस वक्तव्य के मायने खोजे जा रहे हैं। वैसे पिछले बार महज दस माह के कार्यकाल में उन्होंने अपनी छवि काफी हद तक बनाने में सफलता हासिल की थी। इस बार उन्हें केबनेट नहीं तो राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार की उम्मीद थी।

पुनर्वास के लिए बेचेन भाजपाई
आम चुनावों में युवाओं के हाथों मुंह की खाने के बाद अब मध्य प्रदेश के कुछ भाजपा नेता पुनर्वास की तैयारी में जुट गए हैं, इसके लिए उन्होंने अपने अपने आकाओं को साधना भी आरंभ कर दिया है। वे देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली और महाराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर (संघ मुख्यालय) के सतत संपर्क में हैं। वरिष्ठ नेताओं के राज्य सभा के रास्ते जाने के मार्ग प्रशस्त होते देख अब हिम्मत कोठारी और गौरीशंकर शेजवार ने लाल बत्ती हथियाने जुगत लगानी आरंभ कर दी है। एकाध माह में मध्य प्रदेश में निगम मण्डलों के अध्यक्षों का कार्यकाल समाप्त होने वाला है, सो इस पर काबिज होकर सुविधा के आदी हो चुके नेता अपने अपने पुनर्वास के मार्ग प्रशस्त करने में जुट गए हैं।

पिता के नक्शे कदम पर अरूण यादव
दििग्वजय सिंह मंत्रीमण्डल में उपमुख्यमंत्री रहे सुभाष यादव के पुत्र अरूण यादव अपने पिता के ही नक्शे कदम पर चलते दिख रहे हैं। 36 वषीZय यादव दूसरी मर्तबा सांसद चुने गए हैं। राज्य मंत्री बनने के बाद उन्होंने कहा कि वे गुटबाजी नहीं वरन काम पर ध्यान देंगे। सियासी गलियारों में इस बात की खासी चर्चा है। कहा जा रहा है कि दूसरी बार सांसद बने अरूण यादव का राजनैतिक जीवन अभी काफी कम है, फिर वे किस बिना पर गुटबाजी की बात कर रहे हैं। कहीं अपने पिता के गुट को प्रश्रय देकर वे गुटबाजी को बढावा तो नहीं देंगे। वैसे भी युवा सांसद अरूण यादव का अभी गुट तैयार ही नहीं हुआ तो गुटबाजी का प्रश्न ही कहां से पैदा होता है। गौरतलब होगा कि उनके पिता सुभाष यादव मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे थे, एवं आलाकमान ने आनन फानन उन्हें चलता कर केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को उनके स्थान पर बिठा दिया था।

इस तरह चलता किए गए हंसराज
मध्य प्रदेश से राज्यसभा संसद रहे हंसराज भारद्वाज केंद्र में कानून मंत्री जैसे महात्वपूर्ण विभाग के मंत्री रहे। यह अलहदा बात है कि 2003 में उमाश्री भारती के नेतृत्व में थंपिंग मेजारटी में आई भाजपा के उपरांत उन्होंने बरास्ता हरियाणा राज्यसभा से आमद दी। हंसराज की मिनिस्ट्री उनके बडबोलेपन के चलते ही गई। सोनिया गांधी के करीबी सूत्रों का कहना है कि सीबीआई द्वारा क्वोत्रोिच्च को क्लीन चिट देने वाली खबर को दस जनपथ ने चुनाव तक दबाए रखने के साफ निर्देश दिए थे। यह खबर पंख लगाकर हंसराज भारद्वाज के घर से फिजां में तैरने लगी थी, जिसके चलते कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पडा। हर मामले में आक्रमक रही कांग्रेस को इस मामले में रक्षात्मक मुद्रा अपनाना पडा। सूत्र यह भी कहते हैं कि इस नुकसान को कांग्रेस के एक घडे ने बडा चढा कर कांग्रेस की राजमाता के समक्ष पेश किया था, फिर क्या था, नप गए भारद्वाज।

राजा ने बचाई आदिवासियों की लाज
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू दििग्वजय सिंह की हठधर्मिता की वजह से मध्य प्रदेश में आदिवासियों की लाज बच गई। मध्य प्रदेश कोटे से बतौर केबनेट मंत्री सरकार में शामिल हुए कांतिलाल भूरिया का नाम अंतिम समय में राजा की जिद की वजह से जोडा गया। बताते हैं कि प्रदेश के क्षत्रपों ने अपने अपने प्यादों को लाल बत्ती से नवाजने की गरज से भूरिया को सुपरसीट करने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। वैसे प्रदेश से सज्जन सिंह वर्मा, प्रेम चंद गुड्डू, मीनाक्षी नटराजन जैसे नवोदित सांसदों के नाम लाल बत्ती के लिए सामने आए थे, किन्तु अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सबसे ताकतवर महासचिव दििग्वजय सिंह के वीटो के चलते अंतिम समय में भूरिया को स्टेयरिंग वाली गाडी नसीब हो गई।

रमन मुख्यमंत्री होंगे या सीईओ
विधानसभा मेें दुबारा परचम लहराने और लोकसभा में सूबे में आशातीत सफलता दिलाने के बाद अब रमन सिंह कुछ बदले स्वरूप में नजर आने वाले हैं। अब वे कार्पोरेट सेक्टर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) की भूमिका में नजर आएंगे। इसकी बाकायदा तैयारियां भी उन्होंने कर ली हैं। कहते हैं आने वाले समय में वे बिना किसी मध्यस्थ (मंत्री) के विभागीय प्रमुख सचिवों और सचिवों से रू ब रू होंगे। मंत्रियों की परवाह किए बिना ही अचानक ताकतवर होकर उभरे रमन सिंह पिछले पांच सालों का विजन एवं आने वाले समय में विभाग की कार्यप्रणाली की रूपरेखा की जानकारी लेने वाले हैं। मंत्रियों की परवाह वे करें भी क्यों, आखिर उन्होंने अपनी रणनीति के हिसाब से अपने आका भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह को गाजियाबाद से चुनाव जिताने सारी ताकत जो झोंक दी थी।

मिल ही गया पीएम को सुरक्षित आशियाना आखिर
अब तक एक भी चुनाव नहीं जीते नेहरू गांधी परिवार से इतर दूसरी बार प्रधानमंत्री बने डॉ.मनमोहन सिंह को सुरक्षित आशियाना मिल ही गया। राज्य सभा के रास्ते प्रधानमंत्री बनने का कलंक छुटाने के लिए कांग्रेस द्वारा एम.एम.सिंह के लिए उपयुक्त लोकसभा सीट की तलाश की जा रही थी। कहते हैं अब वे हरियाणा से अपना भाग्य आजमाएंगे। रोहतक सीट से साढे चार लाख वोटों से ज्यादा से जीते हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के पुत्र दीपेंद्र देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए यह सीट खाली कर सकते हैं।

अभिमन्यू चक्रव्यूह में!
राजनैतिक तोर पर अस्ताचल की ओर अग्रसर कुंवर अजुZन सिंह का साथ अब उनके पुराने विश्वस्तों ने छोडना आरंभ कर दिया है। महाभारत काल में अर्जन पुत्र अभिमन्यू चक्रव्यूह में फंसे थे। हाल ही में उनके पुत्र एवं मध्य प्रदेश के पूर्व केबनेट मंत्री अजय सिंह राहुल ने भी कमल नाथ के दरबार में अपने अस्तित्व की संभावनाएं तलाशना आरंभ कर दिया है। कहा जा रहा है कि पूर्व में मध्य प्रदेश की राजनीति की दो धुरी बन चुके कमल नाथ और अजुZन सिंह के बीच शीतयुद्ध के जनक राहुल सिंह ही थे, जो अब अपने उपर वरद हस्त की संभावनाएं टटोल रहे हैं। सूत्रों के अनुसार मध्य प्रदेश चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष रहे अजय सिंह ने कमल नाथ से चर्चा हेतु समय चाहा है। राजनैतिक गलियारों में इस बात की प्रतिक्षा हो रही है कि क्या कमल नाथ उन्हें समय देते हैं? और अगर देते हैं तो कितना?

मीनाक्षी की प्राथमिकता
मध्य प्रदेश से चुने गए 29 सांसदों ने अपनी प्राथमिकताएं तय की हों या नहीं, किन्तु मंदसौर से चुनी गईं राहुल ब्रिगेड की सदस्य और एआईसीसी सेक्रेटरी मीनाक्षी नटराजन ने अपनी प्रीयारिटी फिक्स कर ली है। इंदौर की देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से एमएससी (बायोकेमिस्ट्री) गोल्ड मेडलिस्ट, एवं विधि स्नातक मीनाक्षी की पहली प्रथमिकता उनके संसदीय क्षेत्र में जल संकट दूर करना है। मीनाक्षी के करीबी सूत्रों का कहना है कि जल संरक्षण की दिशा में काम करने वाले लोगों से मिलकर मीनाक्षी अपने संसदीय क्षेत्र में इसका प्रयोग अवश्य करना चाहेंगी। इसके अलावा मंदसौर और नीमच को रेल से जोडना तथा यहां का औद्योगिक विकास उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। कहते हैं, पूत के पांव पालने में ही दिखाई पड जाते हैं। सांसद बनते ही मीनाक्षी ने जिस संजीदगी के साथ प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं, उसे देखकर लगता है अब उनके संसदीय क्षेत्र में सुराज आने वाला है।

राज्यसभा से जाने वाले पलटकर नहीं आते
मध्य प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस राज्य से अगर किसी बाहरी नेता को बरास्ता राज्यसभा संसदीय सौंध तक पहुंचाया जाता है तो वह पलटकर प्रदेश की तरफ नहीं देखता। इसके जीते जागते उदहारण हंसराज भारद्वाज और अबू आजमी हैं। दोनों के संसद में जाने की सीढी बना था मध्य प्रदेश और दोनों ही नेताओं ने कार्यकाल के दौरान अथवा पूरा होने के उपरांत मध्य प्रदेश की ओर रूख करना मुनासिब नहीं समझा। सियासी गलियारों में जो सूबा दाना पानी दे उसे सहेजकर रखने की परंपरा बहुत पुरानी है, किन्तु मध्य प्रदेश के बाहर के नेता के राज्य सभा से जाने के मसले में यह टूटी ही है। विदिशा से लोकसभा में पहुंची सुषमा स्वराज भी मध्य प्रदेश के रास्ते राज्यसभा में पहुंची थीं। अब देखना यह है कि वे अपने संसदीय क्षेत्र विदिशा और मध्य प्रदेश को कितना पोस पातीं हैं।

पुच्छल तारा
कमल नाथ को इस बार वाणिज्य और उद्योग के बजाए भूतल परिवहन मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली है। नरसिंहराव सरकार में जब वे वन एवं पर्यावरण मंत्री थे, तब प्रदेश को उन्होंने काफी कुछ दिया था। कपडा मंत्री बनने के बाद उन्होंने छिंदवाडा के बुनकरों के लिए उन्नति के मार्ग प्रशस्त किए थे। पिछली बार वाणिज्य उद्योग मंत्री रहते वे प्रदेश को कुछ नहीं दे पाए। कहा जा रहा है कि अब भूतल परिवहन मंत्री के रूप में प्रदेश को कुछ मिले न मिले पर उनके संसदीय क्षेत्र छिंदवाडा की खस्ताहाल सडकें जरूर सुधर जाएंगी।

30 may 2009

मांसाहारी मध्यान भोजन!
(लिमटी खरे)
चीन सहित कुछ देशों में मेंढक, सांप जैसे जानवर खाने का प्रचलन अवश्य है, किन्तु हिन्दुस्तान में यह परिपाटी अभी तक आरंभ नहीं हुई है। लगता है पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगने की जल्दी में मध्य प्रदेश के सरकार कर्मचारी अब देश के नौनिहालों को सादे मध्यान भोजन के स्थान पर अब मांसाहारी भोजन परोसने की योजना बना रहे हैं।वैसे उपरोक्त कथन सत्य नहीं है कि सरकारी कर्मचारियों की मंशा कुछ इस तरह की होगी, किन्तु हाल ही में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में सरोजनी नायडू कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला में मध्यान भोजन परोसते समय एक मरा हुआ मेंढक भोजन मेंं पाया जाना कमोबेश यही साबित कर रहा है।आश्चर्य की बात तो यह है कि अभी बारिश का मौसम आरंभ नहीं हुआ है। बारिश में टर्राने वाले मेंढक अभी सुस्पुतावस्था में ही होंगे, फिर भोजन में मेंढक का निकलना सामान्य बात नहीं मानी जा सकती है। इसके पहले भी मध्य प्रदेश में मध्यान भोजन में गडबडियों की शिकायतें मिलीं थीं।पूर्व में फरवरी 2008 में सब्जी में मरा हुआ चूहा तो एक मर्तबा रोटी में लोहे का छल्ला मिला था। सरकार की अनदेखी और सत्ताधारी लोगों की अर्थलिप्सा के चलते बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड होना आम बात हो गई है। हेदराबाद की नंदी फाउंडेशन द्वारा राजधानी के पांच सौ से भी अधिक स्थानों पर मध्यान भोजन वितरित किया जा रहा है। केंद्र पोषित इस महात्वावकांक्षी योजना में इस तरह की लापरवाही होना गंभीर बात है। इसे घोर एवं आपराधिक लापरवाही के रूप में देखा जाना चाहिए।आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय को बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में संज्ञान लेना पडा है। कुछ दिनों पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि आंगनवाड़ी केन्द्रों के जरिये तीन से छह साल के बच्चों को सुबह का नाश्ता और गर्म भोजन दिया जाए। कोर्ट ने राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को दिसंबर तक योजना लागू करने का आदेश दिया है। साथ ही अगले वर्ष 15 जनवरी तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। समेकित बाल विकास योजना के तहत बच्चों को पूरक पोषाहार दिए जाने के बारे में केंद्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामा देखने के बाद कोर्ट ने ये निर्देश जारी किए।वस्तुत: स्कूल प्रशासन की लापरवाही के चलते मध्यान भोजन बच्चों के लिए पोष्टिक तो कम जान लेवा ज्यादा हो गया है। हमारा दुर्भाग्य तो यह है कि स्कूल प्रशासन इस तरह के वाक्यातों से सबक लेकर इन्हें रोकने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाता है। देश भर के स्कूलों में न जाने कितने बच्चों को विषाक्त भोजन दिया जा रहा होगा, जिसमें मरे मेंढक, छिपकली या चूहे मौजूद होते होंगे।रोजाना न जाने कितने बच्चो के इस तरह के विषाक्त मध्यान भोजन के कारण बीमार पडने की खबरों से मीडिया अटा पडा होता है, बावजूद इसके सत्ता के मद में चूर राजनेताओं के कानों में जूं भी नहीं रेंगती। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिस पावन उद्देश्य को लेकर केंद्र सरकार द्वारा मध्यान भोजन की शुरूआत की गई थी, वह आरंभ से ही पथ भ्रमित हो गया था।संभव है मध्यान भोजन बनाना और परोसना दोनों ही कार्यों में स्कूल प्रशासन को कुछ व्यवहारिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता हो, किन्तु जहां जहां इस योजना का क्रियान्वयन ठेके पर दिया गया है, वहां तो स्कूल प्रशासन को सिर्फ सुपरविजन ही करना होता है, क्या महज इतना सा काम भी शाला प्रमुखों के लिए पहाड जैसा प्रतीत होने लगा है।निहित स्वार्थ और अर्थ लिप्सा का मतलब यह तो नहीं हो जाता कि अपनी लाभ के बदले नौनिहालोंं को गंदा, बदबूदार, और विषाक्त भोजन परोसा जाए। इस मामले में एक तथ्य यह भी उभरकर सामने आया है कि मध्यान भोजन के लिए खरीदे जाने वाले अनाज और जिंसों में भी भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी है। अपने मुनाफे के लिए सड़ा गला घुन लगा अनाज और सब्जियां, दाल ही इन बच्चों के निवालों में परोसा जा रहा है।केंद्र सरकार को चाहिए कि अगर उसकी योजना का सफल क्रियान्वयन राज्य सरकारें करने में असमर्थ हैं, तो बेहतर होगा कि देश के नौनिहालों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड करने के बजाए वे इस तरह की असफल योजनाओं को तत्काल प्रभाव से ही बंद कर दें।


अब बिछ सकेगा मध्य प्रदेश में एनएच का जाल!
कमल नाथ समर्थक अपने क्षेत्रों की सड़कें बनाएंगे चमन
छिंदवाडा से गुजर सकेगा एक और नेशनल हाईवे
रारा का अधीक्षण कार्यालय स्थापित हो सकता है छिंदवाडा में
उत्तर दक्षिण गलियारा भी जा सकता है छिंदवाडा होकर
कांग्रेसी सांसद देने वाले क्षेत्रों का हो सकता है विकास
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। सतपुडा के क्षत्रप कमल नाथ के भूतल परिवहन मंत्री बनने के साथ ही अब प्रदेश के कुछ जिलों का कायाकल्प होने की उम्मीद जाग गई है। प्रदेश के 12 संसदीय क्षेत्रों जहां से कांग्रेस ने परचम लहराया है, वहां की सडकों के हालात सुधरने की उम्मीद जताई जा रही है साथ ही छिंदवाडा से होकर एक और राष्ट्रीय राजमार्ग गुजर सकता है।मध्य प्रदेश के छिंदवाडा से आठवीं बार विजयी होने वाले संसद सदस्य कमल नाथ की पहली प्राथमिकता निश्चित तौर पर उनका संसदीय क्षेत्र ही होगी। दूसरी प्रथमिकता में वे प्रदेश के उन जिलों पर नजरें इनायत कर सकते हैं, जहां उनके समर्थकों की तादाद ज्यादा है।वैसे पिछली मर्तबा उनके वाणिज्य और उद्योग मंत्री के रहते प्रदेश को कुछ उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं मिल सकी। इस बार माना जा रहा है कि प्रदेश के छिंदवाडा, देवास, खंडवा, धार, रतलाम, मंदसौर, उज्जैन, मण्डला, राजगढ, शहडोल, गुना, रतलाम जिलों में सडकों का कायाकल्प हो सकता है।पदभार संभालने के बाद पत्रकारों से रूबरू होने के बावजूद भी उन्होंने मध्य प्रदेश के लिए कोई घोषणा नहीं की है। यहां उल्लेखनीय होगा कि रेल राज्य मंत्री बनाए गए मालापुरम से सातवीं बार जीते मुस्लिम लीग के ई अहमद ने कार्यभार ग्रहण करते ही घोषणा कर दी कि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से उनके गृह राज्य केरल के लिए एक स्पेशल रेलगाडी चलाई जाएगी।इस बार छिंदवाडा की एक और बहुप्रतीक्षित मांग पूरी होने की उम्मीद जगी है। होशंगाबाद से पिपरिया, मटकुली, झिरपा, तामिया, छिंदवाडा, सिवनी, बालाघाट, गोंदिया होकर देवरी तक एक नए राष्ट्रीय राजमार्ग का जन्म हो सकता है। वैसे भी वर्तमान में होशंगाबाद से लेकर गोंदिया तक की सडक काफी अच्छी बन चुकी है। (बीच में छिंदवाडा जिले का कुछ हिस्सा अभी भी जर्जर ही है)।कमल नाथ के करीबी सूत्रों का कहना है कि देवास के सांसद सज्जन सिंह वर्मा इस बार उनका पूरा दोहन करने के मूड में दिख रहे हैं। आगरा बाम्बे राजमार्ग (एनएच 3) को और अधिक बेहतर गुणवत्ता का बनाया जा सकता है। इस पर सज्जन वर्मा और बाला बच्चन दोनों ही का कार्यक्षेत्र आता है।इसके अलावा सागर में विधायक अरूणोदय चौबे, जबलपुर के लखन घनघोरिया और मण्डला के समर्थक मिलकर सागर से दमोह, जबलपुर, मण्डला से छिल्पी घाटी होकर राजनांदगांव जाने वाले मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील करवा सकते हैं। केवलारी के विधायक एवं मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंश सिंह भी लखनादौन से घंसौर, पलारी, पांडिया छपारा होकर गोंदिया जाने वाले मार्ग का उन्नतिकरण लगे हाथ करवा सकते हैं।कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि नरसिंहपुर से लखनादौन होकर नागपुर जाने वाले उत्तर दक्षिण फोर लेन गलियारे का मार्ग बदलकर इसे हर्रई अमरवाडा, छिंदवाडा, सौंसर के रास्ते छिंदवाडा ले जाया जा सकता है। किन्तु इसमें व्यवहारिक दिक्कत यह आएगी कि कुरई घाटी के काम को छोडकर शेष कार्य लगभग पूरा हो चुका है।कमल नाथ के जबलपुर के समर्थकों की एक मांग भी अब पूरी होती दिख रही है। गौरतलब होगा कि पूर्व में जब सडक परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री टी.आर.बालू जबलपुर आए थे तब कमल नाथ समर्थकों ने मांग रखी थी कि जबलपुर से लखनादौन तक के एनएच 7 को फोरलेन में तब्दील कर दिया जाए। सूत्रों ने यह भी बताया कि छिंदवाडा जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग का अधीक्षण यंत्री अथवा कार्यपालन यंत्री स्तर का कार्यालय भी खोला जा सकता है।

शुक्रवार, 29 मई 2009

.... मतलब मध्य प्रदेश में चलेगा विकास रथ!
(लिमटी खरे)

कांग्रेस सुप्रीमो ने पत्ते फेंटे और ताश की गड्डी डॉ.एम.एम.सिंह को दे दी। मनमोहन ने अपने मनमोहक अंदाज में बिसात बिछाई और अपनी सेना खडी कर दी। इसमें मध्य प्रदेश में पहले के मानिंद ही दो कबीना तो दो राज्य मंत्री शामिल किए गए। इनमें से दो युवा हैं। विभागों के बटवारे में प्रदेश के खाते में कुछ खास नहीं आ सका है।
पिछले पांच सालों से केंद्र और राज्य में सामंजस्य के अभाव के चलते मध्य प्रदेश का विकास रथ एक इंच भी सरक नहीं सका है। दो परस्पर विरोधी दलों की सरकार होने के कारण प्रदेश और केंद्र के बीच आरोप प्रत्यारोपों का कभी न थमने वाला सिलसिला आज भी अनवरत जारी है।
एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने के साथ जनप्रतिनिधि यह भूल जाते हैं कि जिस जनता ने उन पर विश्वास कर उन्हें जनादेश दिया है, वे उसे ही मुगालते में रख रहे हैं। केंद्र की किसी योजना के लिए क्या प्रदेश ने इंकार किया है? और क्या प्रदेश की किसी वाजिब मांग को केंद्र ने ठुकराया है? अगर एसा है तो जनप्रतिनिधियों में इतना माद्दा होना चाहिए कि वे उसे जनता के सामने लाएं।
वैसे तो मध्य प्रदेश ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठने के लिए भोपाल का लाल स्व.शंकर दयाल शर्मा दिया है। इतना ही नहीं तीन बार प्रधानमंत्री प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी बाजपेयी भले ही लखनउ से लोकसभा जीतकर प्रधानमंत्री बने हों, पर उनकी कर्मभूमि मध्य प्रदेश की ग्वालियर चंबल भूमि ही रही है।
पिछली सरकार में शामिल विन्ध्य के क्षत्रप कुंवर अजुZन सिंह का सूरज अब अस्ताचल की ओर जाता दिखाई दे रहा है। लंबे समय से प्रदेश से दूरी बनाने के कारण उनके समर्थकों में भी कमी आई है। उनके समर्थकों ने या तो पाला बदल लिया है या फिर अपनी निष्ठा का इजहार अन्य उर्जावान नेताओं के प्रति कर दिया है। अजुZन पुत्र राहुल सिंह भी कुछ करामात नहीं दिखा सके, जिसके चलते सिंह खेमे में अब गिनती के ही लोग बचे हैं। पुत्री मोह एवं अन्य कारणों के चलते उन्हें सरकार में शामिल नहीं किया गया है। अगर उन्हें स्थान दिया जाता तो निश्चित तौर पर उन्हें भारी भरकम विभाग ही मिलता।
पहले गठन में स्थान पाने वाले सतपुडा के क्षत्रप कमल नाथ को पिछली बार की अपेक्षा कुछ कमजोर मंत्रालय सौंपा गया है। सबसे पहले उन्हें वन एवं पर्यावरण मंत्री बनाया गया था, इसके बार नरसिंहराव से बिगडे रिश्तों के चलते उन्हें बाद में कपडा मंत्रालय दे दिया गया था। पिछली मर्तबा वे वाणिज्य और उद्योग महत्वपूर्ण मंत्रालय में काबिज थे।
वैसे कमल नाथ को मिला भूतल परिवहन मंत्रालय काफी महत्वपूर्ण भी है, यद्यपि इससे जहाजरानी मंत्रालय को प्रथक कर दिया गया है फिर भी अनेक मायनों में यह महत्वूपर्ण कहा जा सकता है। एनडीए के शासनकाल में आरंभ की गई स्विर्णम चतुभुZज और उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम गलियारे का काम अभी बाकी है। कमल नाथ की पहली प्राथमिकता निश्चित रूप से मध्य प्रदेश होनी चाहिए, एवं सडकों के विकास की दिशा में उनके पास कर दिखाने को बहुत कुछ है। वैसे पिछली बार वाणिज्य और उद्योग मंत्री रहते हुए उन्होंने प्रदेश को कुछ खास उपलब्धि नहीं दी है। माना जा रहा था कि कमल नाथ जैसे आठ बार चुनाव जीतने वाले संसद सदस्य को भारी भरकम विभाग दिया जाएगा, वस्तुत: एसा हुआ नहीं।
रतलाम झाबुआ से पांचवी बार विजयश्री का परचम लहराने वाले आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया को अंतिम समय में मंत्रीमण्डल में स्थान मिल सका। उन्हें आदिवासी मामलों का मंत्री बनाया गया है। उम्मीद तो यह की जा रही थी कि खालिस आदिवासी नेता को अच्छा विभाग मिलेगा। पर उन्हें केबनेट मंत्री बनाकर ही लालीपाप पकडा दिया गया है।
सिंधिया घराने के चिराग ज्योतिरादित्य सिंधिया की मांग इस वक्त युवाओं में सबसे ज्यादा है। आज उनका युवाओं के बीच क्रेज वही है जो अस्सी के दशक में कुंवर अजुZन सिंह और नब्बे के दशक में कमल नाथ का हुआ करता था। पिछली बार दूरसंचार राज्यमंत्री रहे ज्योतिरादित्य को इस बार वाणिज्य और उद्योग राज्यमंत्री बनाया गया है। तीसरा लोकसभा चुनाव जीतने वाले ज्योतिरादित्य के बारे में कहा जा रहा था कि इस बार उन्हें स्टयरिंग वाली कार (केबनेट मंत्री,, क्योंकि राज्य मंत्री वैसे भी केबनेट मंत्री के अधीन ही काम करता है) मिलेगी। इसके अलावा पूर्व प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुभाष यादव के पुत्र अरूण यादव को युवा मामलों का राज्य मंत्री बनाया गया है।
आजादी से अब तक विकास के पथ खोजने वाले मध्य प्रदेश के विकसित होने के मार्ग प्रशस्त नहीं हो सके हैं। विपुल वन एवं खनिज संपदा होने के बावजूद भी मध्य प्रदेश जहां का तहां खडा हुआ है। मण्डला, डिंडोरी, छिंदवाडा, झाबुआ, धार आदि आदिवासी बाहुल्य इलाकों में आदिवासियों की हालत आज भी दयनीय ही है।
कांग्रेस नीत केंद्र सरकार में प्रदेश कोटे से बने मंत्रियों और सूबे में काबिज भाजपा की सरकार को चाहिए कि आपस के राजनैतिक अखाडे की नूरा कुश्ती बंद कर अपनी समस्त उर्जा प्रदेश के विकास में लगाएं, अन्यथा भविष्य में युवा होने वाली पीढी शायद ही इन राजनेताओं को माफ कर पाए।





भाजपा नेताओं पर से उठा भरोसा संघ का!
भाजपा को सीधे नियंत्रण में लेने की तैयारी
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। संक्रमण काल से गुजर रही भाजपा की राजनीतिक स्वतंत्रता खतरे में पडती दिखाई दे रही है। पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी और भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह के नेतृत्व में आम चुनावों में औंघे मुंह गिरी भाजपा पर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगाम कसने की तैयारी कर रहा है।
संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि वह अपने इस आनुषांगिक संगठन को सीधे अपने नियंत्रण में लेने पर मंथन कर रहा है। गौरतलब होगा कि वर्तमान में भाजपा को छोड़ कर संघ के बाकी सभी आनुषांगिक संगठनों पर संघ का सीधा नियंत्रण है। वहीं दूसरी ओर भाजपा नेतृत्व अपने तमाम फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, जिनकी जानकारी पार्टी में संघ के प्रतिनिधि के रूप में तैनात महासचिव (संगठन) के जरिए संघ पदाधिकारियों को दी जाती है।
संघ के नियंत्रण में होगें भाजपाध्यक्ष
सूत्रों का कहना है कि भाजपा अध्यक्ष के ऊपर सरकार्यवाह दत्तात्रेय होशबोले को तैनात करने की तैयारी चल रही है। इसके पीछे मकसद यह है कि भाजपा में संघ पृष्ठभूमि से इतर लोगों की तैनाती न हो सके। साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच होने वाले झगड़ों और विवादों का निपटारा सख्ती से किया जा सके। प्राप्त जानकारी के मुताबिक मई और जून में हर वर्ष देश भर में संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन होता है जिनमें संघ के तमाम वरिष्ठ पदाधिकारी स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देते हैं।
कडा हुआ संघ का रूख
लेकिन भाजपा की हार की वजह से इस बार संघ के ज्यादातर वरिष्ठ पदाधिकारी अपना अधिकतर समय दिल्ली में मंथन में बिता रहे हैं। अगस्त में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की बैठक होनी है जिसमें पूरे साल की कार्ययोजना तैयार की जाएगी। कार्यकारिणी की बैठक में ही भाजपा पर सीधे नियंत्रण का फैसला भी हो सकता है।
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को इस बात की जानकारी है, लिहाजा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने पूरी तरह से चुुप्पी साध ली है। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा नेतृत्व को दो-टूक कहा है कि अगले फैसले तक वे सिर्फ पार्टी के रुटीन कामकाज से जुड़े फैसले ही करें। कोई भी बड़ा फैसला संघ की हरी झंडी मिलने अथाZत अगस्त के बाद ही लें।



लोकसभा उपाध्यक्ष पद जाएगा मध्य प्रदेश के खाते में
भाजपा के अंदरखाने में तूफान के पहले की खामोशी!
नेता प्रतिपक्ष, लोस में उपनेता, रास ने विपक्ष के नेता के लिए मचा घमासान
वर्चस्व के लिए मची गलाकाट स्पर्धा
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। हार के कारणों की समीक्षा कर रही भाजपा भले ही उपर से शांत नजर आ रही हो पर अंदर ही अंदर खिचडी जबर्दस्त तरीके से खदबदाने लगी है। भाजपा में अब नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा मे उपनेता और राज्य सभा में विपक्ष के नेता के लिए अब शह और मात का खेल आरंभ हो चुका है।
लोकसभा उपाध्यक्ष पद को लेकर भाजपा के अंदर खाने में उबल रहा लावा किसी भी क्षण फट सकता है। हार के सदमें में भाजपा के दिग्गज नेता वैसे तो सीधी प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं किन्तु अंदर ही अंदर उनके मन में पसरा असंतोष अब साफ दिखने लगा है।
इस पद के लिए राजग की ओर से भाजपा की पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अलावा मध्य प्रदेश में विदिशा से जीतीं सुषमा स्वराज, इंदौर की सुमित्रा महाजन और भागलपुर के सांसद शहनवाज हुसैन के नामों की चर्चा हो रही है। पार्टी के अंदर ही अंदर राजनाथ के बजाए सुषमा स्वाराज को इस पद के लिए ज्यादा काबिल माना जा रहा है, क्योंकि वे अपेक्षाकृत ज्यादा युवा और पिछली बार राज्यसभा में उपनेता का दायित्व बखूबी निभा चुकी हैं।
इस पद के लिए मारामारी इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इस बार लोकसभा में भाजपा के अनेक दिग्गज जसवंत सिंह, मुरलीमनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह आदि राज्य सभा के बजाए लोकसभा सदस्य हैं, और एक साथ ये सारे दिग्गज एक ही बैंच पर बैठे नजर आएंगे।
उधर राज्यसभा में भी पार्टी को अपना नेता चुनना है। इस बार राज्य सभा में दिग्गजों का टोटा साफ दिख रहा है। पिछली बार रास में नेता जसवंत सिंह और उपनेता सुषमा स्वराज अब अगले रास्ते यानी लोकसभा से संसद में पहुंच चुके हैं। राज्यसभा में वेंकैया नायडू, शांता कुमार, अरूण जेतली, नजमा हेपतुल्ला, अहलूवालिया, अरूण शोरी ही वरिष्ठ बचे हैं। इसलिए पार्टी के पास विकल्प भी कम ही हैं।
पार्टी का एक घडा चाहता है कि अरूण जेतली यह पद संभालें, किन्तु अरूण जेतली इसके लिए तैयार नहीं बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे अपनी जमी जमाई वकालत छोडने को तैयार नहीं हैं। लाभ के पद के चलते उन्हें वकालात को तिलांजली देनी होगी। माना जा रहा है कि रास में विपक्ष के नेता के रूप में वेंकैया नायडू के नाम पर अंतिम मुहर लगाई जा सकती है। इसके अलावा उपनेता के लिए एस.एस.अहलूवालिया का नाम फायनल किया जा सकता
है।

गुरुवार, 28 मई 2009

पश्चिम बंगाल से बाहर निकलिए ममता जी
(लिमटी खरे)
रेल मंत्री ममता बनर्जी जनाधार वाली नेता हैं, इसमें कोई शक नहीं है। वे पश्चिम बंगाल से हैं अत: अपने राज्य को पहली प्राथमिकता देना नेतिकता के आधार पर उनका आधार माना जा सकता है। राज्य में आए तूफान पर उनकी चिंता वाजिब कही जा सकती है। अन्य मंत्रियो से उलट उन्होंने अपने मंत्रालय का कामकाज कोलकता में संभाला।कानून की किसी भी किताब के किसी भी सफे में यह उल्लेखित नहीं है कि मंत्री अपना कार्यभार कहां ग्रहण करेगा। पश्चिम बंगाल `आईला` नामक तूफान की चपेट में है। इन परिस्थितियों में सत्ता की चमक दमक दिखाने वे अपना सूबा छोडकर दिल्ली कैसे जा सकतीं थीं। यह अलहदा बात है कि दीगर मंत्रियों ने ममता का अनुसरण नहीं किया और न ही भविष्य में कोई करने वाला ही नजर आता है।परंपरा से हटना और परिवर्तन लाना अच्छा माना जाता है, किन्तु जब नया रास्ता दुखदायी हो जाए तो एसे रास्ते के बारे में सोचना भी व्यर्थ ही है। वैसे ममता बनर्जी अगर मनमानी कर सकती हैं तो तमिलनाडू या मध्य प्रदेश से मंत्रीमण्डल में शामिल मंत्रियों को चेन्नई या भोपाल में शपथ लेने या विभाग का कामकाज संभालने से कौन रोक सकेगा। ममता अगर जिद्दी हैं तो इस देश में और भी जिद्दी राजनेता मोजूद हैं, जो मीडिया की सुिर्खयों में बने रहने के लिए क्रुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं।ममता बनर्जी ने कोलकता में कार्यभार आरंभ कर एक नजीर पेश की है। इसके साथ ही उन्होंने 500 रूपए महीने से कम आय वालों को 100 किलोमीटर तक की यात्रा के लिए 20 रूपए मासिक पास की घोषणा भी कर दी है, जिससे साफ हो गया है कि वे भी स्वयंभू मेनेजमेंट गुरू लालू प्रसाद यादव की लोकलुभावन घोषणाओं की रेल को और आगे ले जाने की ओर अग्रसर हैं।सुिर्खयों में बने रहने के लिए ममता बनर्जी ने कोलकता में न केवल पदभार संभाला वरन् बयान भी दे दिया कि त्रणमूल कांग्रेस के केंद्रीय मंत्रियों को सप्ताह में पांच दिन का समय पश्चिम बंगाल को देना होगा। ममता का यह बयान देश के लिए चिंताजनक कहा जा सकता है।ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में अपनी पकड बनाने के लिए ममता जुगत लगा रहीं होंगी, किन्तु देश के साथ खिलवाड करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। हो सकता है त्रणमूल कांग्रेस के लिए अगला विधानसभा चुनाव जीवन मरण का प्रश्न बन गया हो पर, उनके दल के मंत्री देश के 28 सूबों और केंद्र शासित प्रदेशों में से पश्चिम बंगाल को 5 दिन एवं शेष बचे राज्यों के लिए महज 2 दिन देंगे। ममता का यह बयान भावावेश में दिया माना जा सकता है, किन्तु कोई भी इसे तर्कसंगत नहीं मानेगा।वैसे मंत्रियों का लगातार दिल्ली में बैठे रहना भी उचित नहीं कहा जा सकता है, किन्तु अगर उन्हें किसी राज्य विशेष में पांच दिन हाजिरी देनी हो तो चल चुकी केंद्र सरकार। ममता के फरमान को अगर उनके दल के मंत्रियों ने सर आंखों पर लिया तो केंद्र सरकार की चूलें हिल जाएंगी। हमारी नजर में विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ममता बनर्जी को चाहिए था कि वे एसे मंत्रालयों का चयन करतीं जिसमें मंत्रियों की उपस्थिति ज्यादा मायने नहीं रखती, या फिर विधानसभा चुनावों तक उन्हें केंद्रीय मंत्रीमण्डल से अपने आप को दूर ही रखना था।विधानसभा के पहले पिछली सरकार में मध्य प्रदेश कोटे के मंत्रियों अजुZन सिंह, कमल नाथ, कांति लाल भूरिया, सुरेश पचौरी एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जिस तरह निर्वहन किया था, उससे सभी को सबक लेना चाहिए। इन नेताओं ने पिछले पांच सालों में प्रदेश की और इक्का दुक्का बार ही झांका होगा। इन मंत्रियों की नजरों में समस्त प्रदेश बराबर थे या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता, किन्तु इन्होंने मध्य प्रदेश की जमकर उपेक्षा की यह बात सामने उभरकर आई।आज यक्ष प्रश्न यह खडा हो गया है कि ममता बनर्जी पहले पश्चिम बंगाल की नेता हैं अथवा पहले वे भारत सरकार की रेल मंत्री हैं? पंजाब पूरी तरह सुलग रहा है। वहां रेल व्यवस्थाएं ठप्प हो चुकी हैं। ममता की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? बंगाल में आए तूफान से प्रभावितों के प्रति सहानभूति जताकर सूबे की वामपंथी सरकार से प्रतिस्पर्धा करना अथवा ठप्प पडी रेल सुविधाओं को पटरी पर लाना।विश्व के सबसे बडे रेल नेटवर्क में आज घुन लग चुकी है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा आकर्षक घोषणाएं अवश्य की गईं थीं, किन्तु वे कितनी व्यवहारिक निकलीं यह बात आम यात्री ही बेहतर बता सकते हैं। ममता जी पश्चिम बंगाल से बाहर निकलिए। माना कि आप बंगाल की नेता हैं, किन्तु अब आप आजाद हिन्दुस्तान की रेल मंत्री हैं। आपकी प्राथमिकताओं में से एक पश्चिम बंगाल हो सकता है, किन्तु सिर्फ पश्चिम बंगाल को आप अपनी प्राथमिकता न बनाएं, वरना देश का इससे बडा दुर्भाग्य और कुछ नहीं होगा।


असंतुलन अभी भी बरकरार है केंद्रीय मंत्रीमण्डल में
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। एक सप्ताह चली कशमकाश के बाद मनमोहन सिंह ने अपने जम्बो मंत्रीमण्डल को स्वरूप अवश्य दे दिया है, किन्तु उसमें असंतुलन अभी भी बरकरार है। इस बार सहयोगी दलों के कम दबाव के चलते अपेक्षा की जा रही थी कि मंत्रीमण्डल में हर तरह के असंतुलन को दूर किया जा सकेगा, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। मनमोहन के मंत्रीमण्डल में उन्हें मिलाकर 79 सदस्य हैं, जबकि तय सीमा के अनुसार इसमेें 81 सदस्य हो सकते हैं।0 सबसे अधिक मंत्री हैं कांग्रेस केकांग्रेस ने 206 सीट जीतीं हैं एवं उसके मंत्रियों की संख्या 60 है। तृणमूल कांग्रेस ने 19 सीटों के साथ 7, डीएमके ने 18 सीटों के साथ 7, राष्ट्रवादी कांग्रेस ने 9 सांसदों के बूते 3, नेशनल कांफ्रेस ने 3 सीटों के साथ एक मंत्री का पद तबाडा है। अन्य में 6 सीटों पर एक ही मंत्री बन पाया है।

महिला आरक्षण बिल पास होना सशंकित
पंद्रहवीं लोकसभा के विशालकाय मंत्रीमण्डल में महिलाओं को कम तरजीह दिए जाने से लगने लगा है कि बहुप्रतिक्षित महिला आरक्षण बिल इस बार भी ठंडे बस्ते में ही धूल खाएगा। इस बार लोकसभा में पहली बार महिला सांसदों ने अर्धशतक लगाया है। इस बार 59 महिलाएं चुनकर आईं हैं। बावजूद इसके पिछली बार की तुलना में इस बार दस के बजाए 9 महिलाओं को ही मंत्रीमण्डल मे स्थान दिया गया है। पिछली केबनेट में शामिल डी.पुरंदेश्वरी एवं पनाबका लक्ष्मी, मीरा कुमार, अंबिका सोनी, कुमारी शैलजा को फिर से स्थान दिया गया है, जबकि ममता बनर्जी, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पित्न प्रणीत कौर, कृष्णा तीरथ, पूर्व लोकसभाध्यक्ष पी.ए.संगमा की पुत्री एवं सबसे युवा मंत्री अगाथा संगमा को इस बार मंत्री बनाया गया है।

उपेक्षित रह गए आदिवासी
आदिवसी नेतृत्व की इस बार घोर उपेक्षा की गई है। देश में आठ फीसदी आदिवासी समुदाय के लिहाज से केंद्र में कम से कम आधा दर्जन पद इस समुदाय की झोली में जाने चाहिए थे। आदिवासियों में मध्य प्रदेश के कांतिलाल भूरिया अकेले होंगे जो केबनेट मंत्री के रूप में कार्य करेंगे। इनको मिलाकर कुल चार मंत्रियों को इस समुदाय से लिया गया है। भूरिया का नाम भी अंतिम समय में ही शामिल किया गया है। पिछडे वर्ग के केवल 11 मंत्री हैं। मजे की बात तो यह है कि 79 सदस्यीय मंत्री मण्डल में 46 सदस्य अगडी जातियों के हैं।

9 दलित और 5 मुस्लिम मंत्री
मनमोहन सरकार में दलित मंत्रियों की संख्या 9 है, जिनमें सुशील कुमार शिंदे, मीरा कुमार, ए.राजा, मिल्लकाजुZन खडगे, कुमारी शैलजा एवं मुकुल वासनिक शामिल हैं। मायावती से निपटने इस बार कांग्रेस ने दलितों पर ज्यादा ध्यान दिया है। इसके अलावा मुस्लिम समुदाय से गुलाम नवी आजाद एवं सलमान खुशीZद केबनेट मंत्री तो फारूख अब्दुल्ला (नेशनल कांफ्रेस), ई.अहमद (मुस्लिम लीग) एवं त्रणमूल के सुल्तान अहमद राज्यमंत्री बनाए गए हैं।

3 मसीही तो जाटों का टोटा
ईसाई समुदाय से ए.के.अंटोनी, प्रो.के.वी.थामस एवं विसेंट पॉल को मंत्रीमण्डल में शामिल किया गया है। जाट समुदाय से महज महादेव खंदेला को केबनेट में बतौर राज्यमंत्री शामिल किया गया है।

छत्तीगढ के हाथ लगी निराशा
मध्य प्रदेश से टूटकर अस्तित्व में आए छत्तीसगढ राज्य से इस बार भी किसी को मंत्री नहीं बनाया गया है। छग के इकलौते सांसद चरण दास महंत का नाम सिर्फ चर्चाओं तक ही सीमित रहा। राज्य से पिछले दरवाजे से आने वाले नेताओं में मोती लाल वोरा और मोहसीना किदवई के नाम शामिल थे, किन्तु वे दौड से काफी दूर ही रहे। अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल को छोड दिया जाए तो पिछले एक दशक में राष्ट्रीय राजनीति में छत्तीगढ का नामलेवा नहीं बचा है।

मध्य प्रदेश में विन्ध्य, बुंदेलखण्ड उपेक्षित
इस बार मध्य प्रदेश में विन्ध्य प्रदेश और बुंदेलखण्ड में मायूसी पसरी दिखाई दे रही है। विन्ध्य के ठाकुर अजुZन सिंह को मंत्रीमण्डल से चलता कर देने के बाद अब दोनों ही इलाकों का केंद्र में प्रतिनिधित्व नहीं रह गया है। कमल नाथ महाकौशल (सतपुडा), कांतिलाल भूरिया एवं अरूण पटेल मालवा तो ज्योतिरादित्य सिंधिया चम्बल से हैं।0 यूपी से एक भी कैबिनेट मंत्री नहÈ1984 के बाद उत्तर प्रदेश में पहली बार 21 लोकसभा सीटों तक पहुंचने वाली कांग्रेस व उसकी सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस प्रदेश से एक कैबिनेट मंत्री नहÈ मिला। विडम्बना ही कही जाएगी कि जिस सूबे ने देश को आठ प्रधानमंत्री दिए, आज वहां से चुने गए कांग्रेस सांसदों में से एक भी कैबिनेट मंत्री बनने लायक ही नहÈ है।

एमपी से जुडे दो स्तंभ धराशायी
मध्य प्रदेश से जुडी दो शिक्सयतें इस बार औंधे मुंह गिरीं हैं। अव्वल तो मानव संसाधन विकास जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय को संभालने वाले कुंवर अजुZन सिंह को मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। ``मोहि कहां विश्राम`` से एक बार फिर चर्चा में आए अजुZन सिह को संभवत: उनकी पुत्री वीणा सिंह के निर्दलीय तौर पर चुनाव लडने के चलते विश्राम दिया गया है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के रास्ते राज्यसभा में गए कानून मंत्री जो वर्तमान में हरियाणा से राज्य सभा सदस्य हैं, को भी इस बार स्थान नहीं मिल सका है।

पूवÊ भारत से होंगे 11 कैबिनेट मंत्री
पिÜचम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने अपनी बड़ी जीत की केंद्र सरकार से मनमाफिक कीमत वसूल ली है। तृणमूल अध्यक्ष ममता बनजÊ जहां पहले ही केंद्रीय रेल मंत्री के रूप में कार्यभार संभाल चुकी हैं, वहÈ उनके छह अन्य सांसद राज्यमंत्री के रूप में शामिल हो गए हैं। जबकि झारखंड और बिहार के खाते में एक एक केंद्रीय मंत्री पद गया है। उड़ीसा को सिर्फ एक राज्यमंत्री से संतोष करना होगा। पिÜचम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और झारखंड में संप्रग से जीतने वाले कुल चौंतीस सांसदों में 11 मंत्री होंगे। यानी पूवÊ भारत से आए संप्रग के कुल सांसदों में से एक तिहाई को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया है।

दिल्ली का दबदबा
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली का दबदबा दूसरी बार देखने को मिल रहा है। इस बार कपिल सिब्बल को कबीना तो कृष्णा तीरथ को राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार और अजय माकन को राज्यमंत्री बनाया गया है। लगभग तीन दशक पहले एच.के.एल.भगत, जगदीश टाईटलर और के.सी.पंत को एक साथ मंत्रीमण्डल में शामिल किया गया था।

तरूणाई हाशिए पर
नए मंत्रीमण्डल में नौजवान सांसदों में अजय माकन, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया जहां फिर से मंत्री बनाए गए हैं, वहÈ सचिन पायलट, अरुण यादव, प्रदीप जैन जैसे कुछ नए नौजवान भी शामिल किए गए हैं। द्रमुक के खाते से मंत्री बने ए.राजा और दयानिधि मारन को भी नौजवानों की सूची में जोड़ा जाए तो भी इनकी संख्या बमुश्किल एक दर्जन पहुंच सकी है।गौरतलब है कि पंद्रहवÈ लोकसभा में नौजवानों को बड़ा प्रतिनिधित्व मिला है। आंकड़े बताते हैं कि पच्चीस से चालीस की उम्र के 79 सांसद जीतकर आए हैं। इस बार वैसे तो 226 सांसद एसे हैं जिनकी उम्र 50 से कम है।