मंगलवार, 4 मई 2010

नक्सलियों को जनमत संग्रह की चुनौती

नक्सलियों को जनमत संग्रह की चुनौती

छत्तीसगढ़ का आम आदिवासी नक्सल हिंसा के दंष से
 
 मुक्ति पाकर विकास की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता है

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने लोकतंत्र , विकास और आतंकवाद विषय पर आयोजित चर्चा में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नक्सलवाद को समाप्त करने पर जोर दिया

नई दिल्ली 4 मई छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सलियों तथा उनकी विचारधारा के समर्थकों को छत्तीसगढ़ में जनमत संग्रह की चुनौती दी है । नई दिल्ली में लोकतंत्र , विकास और आतंकवाद विषय पर आयोजित चर्चा में मुख्यमंत्री ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी देष की किसी भी निष्पक्ष संस्था से पूरे राज्य में इस विषय पर जनमत संग्रह कराया जाये की राज्य की जनता नक्सलियों की विचारधारा के पक्ष में है या लोकतांत्रिक प्रक्रिया से राज्य के विकास के पक्ष में । उन्होंने कहा कि इससे देष के महानगरों में अनर्गल प्रलाप करने वाले तथाकथित बुद्विजीवियों का भ्रम दूर हो जायेगा । उन्होंने कहा कि नक्सलियों का मुख्य एजेंडा देष के षासन तंत्र पर कब्जा कर अपनी विचारधारा का षासन चलाना है और छत्तीसगढ़ के लोग उसके इस प्रयास में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़े है । चर्चा में केन्द्रीय भारी उद्योग विभाग के मंत्री श्री विलासराव देषमुख , झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल मंराडी ,  मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य तथा सासंद श्री सीताराम येचुरी ने भी अपने विचार व्यक्त किए ।
 
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जोर देकर कहा कि देष में लोकतंत्र की रक्षा के लिए नक्सली विचारधारा को पराजित करना जरूरी है । उन्होंने कहा कि लाषों को गिनकर नक्सल समस्या की गंभीरता को नही समझा जा सकता है । यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे जीतना देष के लिए जरूरी है । उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भारत में काफी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने भी आदिवासी अंचलों में विकास को यह कहकर रोककर रखा कि इससे आदिवासियों की मूल संस्कृति पर असर पड़ेगा। इसीलिए उन्होंने आदिवासियों के निवास क्षेत्रों में सड़क, बिजली जैसी जरूरी अधोसंरचना भी नहीं बनने दिया। विदेशी पर्यटकों को इन इलाकों में घुमाने और उनसे यात्रा वृतांत लिखवाने का फैशन चलाया गया। जो किसी न किसी रूप में आज भी कथित एनजीओ, मानव अधिकार संगठन का एक सगल है। मुझे आश्चर्य होता है कि उनमें से ही कुछ लोग अब यह सवाल करते हैं कि बस्तर में सड़क क्यों नहीं बने। अबूझमाड़ अबूझ कैसे रह गया। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि एक दीर्घ कालीन षड़यंत्र के तहत बरसों पहले यह सब किया जाता रहा था, ताकि इन इलाकों में नक्सलवाद की तरह का आतंकवाद और अलगाववाद पनप सके।  उन्होंने सवाल उठाया कि एक कसाब, एक अफजल गुरू के खिलाफ जितना आक्रोश, जितना गुस्सा भारतवासियों के दिल में है, उतना गुस्सा नक्सलवादियों के लिए क्यों नहीं होना चाहिए। भोले-भाले वनवासियांे के खून की कीमत मुम्बई, दिल्ली में रहने वाले किसी व्यक्ति के खून से भला कम कैसे हो सकती है? उन्होंने कहा कि मैं भारत सहित दुनिया के मीडिया से यह सवाल करना चाहता हूं कि वे नक्सलवादियों और उनके शहरी समर्थकांे को बेनकाब करने के लिए सामने क्यों नही आते? हमारे संविधान में आम आदमी को न्याय दिलाने और उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए जो प्रावधान किए हैं, उसका फायदा तथाकथित मानव अधिकार समर्थक नक्सलियों के हित में करें और यह मीडिया की नजर से बचाकर कैसे किया जाता रहा।
  
उन्होंने कहा कि लोग अपने मन से यह बात निकाल दें कि जहां पिछड़ापन है, वहां नक्सलवाद है। वास्तव में  नक्सलवाद ही देश के बहुत बड़े हिस्से में पिछड़ेपन का कारण है। नक्सलवाद का जो रूप हमने देखा है, उसमें गरीबों की बेहतरी को लेकर कोई चिंता नहीं है। उन्होंने सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को पहुंचाया है तो वह जंगलों से घिरे गांवों में रहने वाली वह आबादी है, जिसकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरा करने के लिए सरकारें तो अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं, लेकिन नक्सलवादी विकास कार्यों का लाभ ग्रामीणों, गरीबों, किसानों, आदिवासियों, वनवासियों तक पहुंचने ही नहीं देना चाहते। नक्सलवादी कभी नहीं चाहते कि ऐसे दूरस्थ इलाकों के लोगों को सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, राशन जैसी बेहद जरूरी सुविधाओं का लाभ भी मिले। नक्सलवादी, लोगों को इसलिए शिक्षित, जागरूक और समृद्ध नहीं होने देना चाहते, जिससे कि वे उनके हाथों से निकल जाएं। नक्सली ग्रामीणों का पिछड़ापन बरकरार रखते हुए उनका मानसिक और शारीरिक शोषण करते रहना चाहते हैं ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे।
 
मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने सरगुजा-बस्तर जैसे सघन वन क्षेत्रों और नक्सली प्रभावित अंचलों में सघन दौरा किया। हमने यह पाया कि सिर्फ प्रचलित व्यवस्था से आदिवासी अंचल में विकास की गति नहीं बढ़ाई जा सकती। इसलिए नए सिरे से विचार कर हमने बस्तर एवं दक्षिण क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण, सरगुजा एवं उत्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण तथा अनुसूचित जाति विकास प्राधिकरण का गठन किया। हमने यहां स्थानीय जरूरतों और मांगों के आधार पर तत्काल निर्णय लेने की व्यवस्था की। हर साल स्वतंत्र रूप से बजट दिया जिसके परिणामस्वरूप लोगों को सरकार की कार्यप्रणाली पर विश्वास हुआ। उनकी समस्याएं तुरंत दूर होने से स्थानीय जनप्रतिनिधियों की बैठकों में भागीदारी बढ़ी और धीरे-धीरे करीब सैकड़ों करोड़ रूपए के कार्य इन क्षेत्रों में करा दिए गए। इसी प्रकार चाहे सस्ता नमक देना हो, सस्ता चावल देना हो, निःशुल्क चरण पादुकाएं देना हो, बच्चों को शिक्षा के लिए नई आश्रम शाला खोलना हो। नई-नई योजनाएं बनाकर ग्रामीण जनता के घर जाकर साधन-सुविधाएं मुहैया कराने की कारगर रणनीति और योजनाएं लागू की गई। ऐसे अनेक उपाय किए गए, जिससे कि स्थानीय आबादी को सरकार की उपस्थिति का बोध हो और उन्हें जल्दी से जल्दी राहत मिले। वे स्वयं और हमारी सरकार के अनेक मंत्री तथा अधिकारी ऐसे-ऐसे दुर्गम अंचलों में पहुंचे जहां पहले कोई सरकारी आदमी पहुंचा ही नहीं था।
 
उन्होंने कहा कि वे गर्व के साथ यह कहना चाहता हैं कि  इन प्रयासों का अच्छा असर हुआ। इसके साथ ही हमने नक्सलवादी, वामपंथी हिंसक तत्वों को साफ संदेश दिया कि यदि वे हिंसा का रास्ता छोड़ना चाहते हैं तो हमारी नई पुनर्वास नीति उन्हें मदद करेगी। और अगर वे हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ेंगे तो हमारी सरकार उन्हें मुंह तोड़ जबाव देने का रास्ता अपनाएगी। आजादी के 60 सालों में नक्सलवादियों को पहली बार किसी सरकार ने ऐसा दो टूक जवाब दिया था। इससे ग्रामीण जन-जीवन में पैदा हुए विश्वास ने अपना चमत्कार दिखाना चालू कर दिया।
 
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सर्वश्रेष्ठ पर्यटन स्थल, प्राकृतिक संसाधन, छत्तीसगढ की उत्कृष्ट संस्कृति इन्हीं वनवासी अंचलों में है, और सदियों से विकास की बाट जोह रहे हैं लेकिन नक्सलवादियों की बारूदी सुरंगों ने इनका रास्ता रोक रखा है। नक्सलियों की काली छाया से मुक्त होने पर यह अंचल देश ही नहीं, दुनिया में अपनी प्राकृतिक सुन्दरता और संसाधनों के लिए जाना जाएगा। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न सिर्फ विकास की ललक जाग चुकी है, बल्कि जागरूकता की मशाल भी जल चुकी है। इस वीर भूमि से नक्सलियों के पैर उखड़ने की शुरूआत भी हो चुकी है। अब हम उस दिन के लिए तैयारी कर रहे हैं, जब छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त राज्य कहलाएगा। देर से ही सही केन्द्र सरकार भी इस मसले की गंभीरता को समझने लगी है। हमने अनेक बार यह सुझाव दिया है कि केन्द्र की अगुवाई में प्रभावित राज्यों के लिए एक समन्वित रणनीति और कार्य योजना बनाकर ही नक्सल समस्या से ही निबटा जा सकता है। केन्द्र सरकार के हाल के संकेतों से लग रहा है कि अब नक्सली मामले में केन्द्र की दुविधा की स्थिति खत्म हो रही है।

मुश्किल में कमल नाथ

मुश्किल में कमल नाथ

संसदीय समिति ने किया भूतल परिवहन को कटघरे में खडा
 
ठेकेदार अधिकारियों की मिली भगत से लग रहा चूना
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 04 मई। एक तरफ वजीरे आजम 22 मई को अपने दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा होने पर सभी मंत्रालयों के रिपोर्ट कार्ड पेश करने की तैयारियां कर रहा है, वहीं दूसरी एक संसद की एक स्थायी समिति ने कमल नाथ के भूतल परिवहन मंत्रालय में चल रही गडबडियों पर गहरी नारजगी जता दी है, जिससे कमल नाथ की पेशानी पर पसीने की बूंदे उभर आईं हैं। सडक परियोजनाओं में होने वाली देरी को लेकर संसद की एक समिति ने भूतल परिवहन मंत्रालय और एनएचएआई की जमकर खिचाई की है।
 
सांसद सीताराम येचुरी की अध्यक्षता वाली परिवहन, संस्कृति और पर्यटन संबंधी समिति ने साफ कहा है कि ठेकेदारों को अधिक मुनाफा देने के लिए परियोजनाओं में जानबूझकर विलंब किया जाता है। इसके पीछे भ्रष्ट नौकरशाहों, दागी ठेकेदारों और दलालों का एक बडा रेकेट है। मंत्रालय के सचिव ने स्वयं ही इस बात को समिति के समक्ष इस काकस का होना स्वीकार किया है। समिति ने अपने प्रतिवेदन में कहा है कि विलंब के चलते इन परियोजनाओं की लागत स्वयंमेव ही बढ जाती है। मूल निविदा और बढी हुई लागत के अंतर को नौकरशाह, दलाल और ठेकेदार आपस में बांट लिया करते हैं।
 
भूतल परिवहन मंत्रालय से समिति ने अपेक्षा भी व्यक्त की है कि इस मकडजाल को तोडने के लिए मंत्रालय को प्रभावी कदम सुनिश्चित करना आवश्यक है। इस समिति ने आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे भूतल परिवहन मंत्रालय की नीयत पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा है कि लेटलतीफी का शिकार हुईं अनेक परियोजनाओं में महज एक ही ठेकेदार को काली सूची में डाला गया है। समिति ने भूतल परिवहन मंत्रालय को मशविरा देते हुए कहा है कि मंत्रालय को चाहिए कि स्तरहीन खराब प्रदर्शन करने वाले ठेकादार या कंपनियों को सूचीबद्ध कर उनके खिलाफ कठोरतम कार्यवाही की जानी चाहिए।
 
समिति ने यह भी सिफारिश की है कि किसी भी परियोजना का ठेका तब दिया जाना चाहिए जब भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी के साथ ही साथ अन्य समस्त औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएं। समिति ने भूमि अधिग्रहण के मामले में एनएचएआई के सुस्त रवैए पर भी गहरी नाराजगी व्यक्त की है। समिति का मानना है कि एनएचएआई द्वारा भी भूमि अधिग्रहण के मामले में निर्धारित गाईड लाईन का पालन नहीं किया जा रहा है।
 
गौरतलब है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को एक कुशल प्रशासक के तौर पर देखा जाता रहा है। कमल नाथ के पास चाहे वन एवं पर्यावरण मंत्रालय रहा हो, वस्त्र या वाणिज्य और उद्योग, कमल नाथ ने नौकरशाही को कभी अपने उपर हावी नहीं होने दिया है। यह पहला मौका होगा जबकि नौकरशाही उनके मंत्रालय में पूरी तरह मनमानी पर उतारू है। एक सर्वेक्षण में भी कमल नाथ को उनके सचिवों के दबाव में काम करने वाला मंत्री बताया गया था। संभवतः इस बार उनका कद कम करके भूतल परिवहन (जहाजरानी को पहली बार इससे प्रथक किया गया है) जैसा मंत्रालय दिया गया है जो उनके कद के अनुरूप नहीं माना जा रहा है। हो सकता है यही कारण हो कि वे अपने मंत्रालय में बहुत ज्यादा रूचि न ले रहे हों और देश में सडकें के फैलते जाल में ग्रहण की स्थिति बन रही हो।

चिदम्बरम के बाद रमन हैं राजा के निशाने पर

चिदम्बरम के बाद रमन हैं राजा के निशाने पर

रमन और दिग्विजय आमने सामने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 04 मई। नक्सलवाद के मुद्दे पर अपनी ही सरकार के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम को कोसने के बाद अब छत्तीसगढ के मुख्य मंत्री रमन सिंह और संयुक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तथा वर्तमान में कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह के बीच नक्सलवाद को लेकर तकरार तेज हो गई है। दोनों ही नेता एक दूसरे को कटघरे में खडा करने से अपने आप को पीछे नहीं रख रहे हैं।

वैसे तो कांग्रेस की संस्कृति रही है कि पार्टी के अंदर की कोई भी बात पार्टी मंच पर ही उठाई जानी चाहिए। इससे उलट महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने जब कलम के माध्यम से केंद्रीय गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम को लानत मलानत भेजी तब कांग्रेस की कडाही मंे उबाल आने लगा था। बाद में साफ सफाई करवाकर और माफी मंगवाकर मामला शांत कराया गया। लोगों का कहना है कि अगर इस तरह की धृष्टता राजा दिग्विजय सिंह के अलावा अगर किसी और ने की होती तो अब तक उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया होता।

इसके बाद दिग्विजय सिंह को छग के सीएम रमन सिंह ने बहुत बुरा कहा। इससे कुपित होकर राजा दिग्विजय सिंह ने रमन सिंह पर दस सवाल दाग दिए। एसा लगता है कि दोनों सिंहों के बीच चल रही इस लडाई का काई अंत नहीं है, दोनों ही एक दूसरे के कपडे उतारने पर उतरू नजर आ रहे हैं। रमन सिंह ने अपने आलेख में राजा दिग्विजय सिंह को आडे हाथों लिया। रमन का कहना है कि राजा दिग्विजय सिंह दस साल तक अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पर उन्होंने नक्सलवाद के खात्मे के लिए कुछ नहीं किया।

राजा को रमन की बात दिल में लग गई। राजा दिग्विजय सिंह ने भावुक होकर रमन सिंह को पत्र लिख मारा। राजा दिग्विजय सिंह का पत्र में कहना है कि रमन सिंह के लेख की भाषा से उन्हें दुख पहुंचा है। राजा दिग्विजय सिंह का मानना है कि नक्सल प्रभावित इलाके के लोगों को मुख्य धारा में लाने के लिए यह आवश्यक है कि उनका विश्वास शासन के प्रति जगाया जाए। महेंद्र कर्मा के नेतृत्व में आरंभ किए गए सलवा जुडूम आरंभ हुआ किन्तु गलत नीतियों के चलते हजारांे आदिवासी अपने ही क्षेत्रों में शरणाथी बनकर रह गए हैं। राजा दिग्विजय सिंह ने रमन सिंह को कोसते हुए कहा कि उनके शासनकाल में दंतेवाडा में एक हजार से ज्यादा नक्सली जुडते हैं और राज्य की गुप्तचर एजेंसी को पता न चले एसा संभव ही नहीं है। इसका प्रतिकार करते हुए रमन सिंह कहते हैं कि नक्सल समस्या के मामले में राजा दिग्विजय सिंह पूरी तरह दिग्भ्रमित ही नजर आ रहे हैं। उन्होने राजा दिग्विजय सिंह इस मामले में जहां चाहे वहां बहस की चुनौति भी दे दी है।

वैसे न तो पी.चिदम्बरम और न ही रमन सिंह ने राजा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में मध्य प्रदेश में हुई गंभीर घटनाओं की ओर ध्यान आकर्षित कराया है। गौरतलब है कि राजा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में उनके ही मंत्रीमण्डल के परिवहन मंत्री लिखीराम कांवरे को बालाघाट जिले में ही उनके घर पर आधी रात को नक्सलियों ने बुरी तरह गला रेतकर मौत के घाट उतार दिया था, यह घटना अपने आप में बहुत बडी थी। इतना ही नहीं बालाघाट जिले में ही एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बंसल और उप निरीक्षक ठाकुर को भी नक्सलियों ने मार डाला था। रही बात सिपाहियों की तो उप निरीक्षक प्रकाश कतलम की अगवानी में सर्च पार्टी के सोलह जवानों की जीप उडा दी गई थी। इसके अलावा न जाने कितने जाबांज सिपाहियों को अपनी जान गंवानी पडी थी। अगर राजा दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके मंत्रीमण्डल के सहयोगी और पुलिस के जवान ही सुरक्षित नहीं थे, तो आज किस हक से वे उसी नक्सल समस्या के बारे में किसी को शक के कटघरे में खडा करने का माद्दा रख रहे हैं।

हरिभूमि में रोजनामचा

सोमवार, 3 मई 2010

संघ की मजबूरी है : शिबू सोरेन जरूरी है

संघ की मजबूरी है : शिबू सोरेन जरूरी है

गडकरी की अग्निपरीक्षा है झारखण्ड में

मरांडी पर हाथ फेरा कांग्रेस ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 03 मई। झारखण्ड के सांसद मुख्यमंत्री शिबू सोरेन चाहे जितनी भी अत्त कर लें पर भाजपा को उन्हें साधना ही पडेगा, एसा इसलिए क्योंकि सोरेन अब संघ के लिए मजबूरी बन गए हैं। सोरेन के प्रति भाजपा के आक्रमक तेवरों के बाद अब कुछ ढिलाई हुई है तो उसके पीछे संघ का कोडा ही नजर आ रहा है। देखा जाए तो संघ को सोरेन से बहुत ज्यादा प्रेम नहीं है, पर सोरेन की काबिलियत पर संघ प्रश्न चिन्ह लगाने की स्थिति में भी नहीं है।

संघ के सूत्रों का कहना है कि संघ को पता है कि उत्तर भारत में झारखण्ड ही एक ऐसा राज्य है जहां ईसाई मशीनरियों द्वारा युद्ध स्तर पर धर्मांतरण कराया जा रहा है। झारखण्ड में ईसाई मशीनरियों के जमे पांव उखाडने के लिए आक्रमक तेवर वाले गुरूजी ने बहुत काम किया है। इतिहास गवाह है कि गुरूजी इन मशीनरियों के खिलाफ खडे नजर आए हैं। सूत्रों ने कहा जब संघ नेतृत्व ने भाजपा के शीर्ष नेताओं को अपनी मंशा से आवगत कराया तब भाजपा के नेताओं को मानो सांप सूंघ गया, वे बस इतना ही कह सके कि ठीक है पर कम से कम क्रास वोटिंग करने वाले को सबक तो मिलना ही चाहिए।

संघ के डंडे के बाद झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के विधायक दल के नेता और शिबू के पुत्र हेमंत और भाजपा नेता सर जोडकर बैठे। बैठक से बाहर आए हेमंत के चेहरे पर विजयी मुस्कान बता रही थी, कि संघ की फटकार ने असर दिखाया है। बकौल हेमंत ‘‘शिबू सोरेन झारखण्ड के मुख्यमंत्री थे, और बने रहेंगे।‘‘ महज चार माह के भाजपा और झामुमो के गठबंधन का हनीमून इतनी जल्दी समाप्त हो जाएगा किसी ने सोचा भी न था। नए नवेले अध्यक्ष नितिन गडकरी के लिए यह परीक्षा की घडी से कम नहीं है।

गुरूजी जानते हैं कि भाजपा के निजाम नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद यह उनका सबसे बडा फैसला था, जिसे हर कीमत पर बचाने के लिए गडकरी प्रयास करेंगे। गुरूजी की निष्फिकरी को देखकर लगता है कि उन्होंने अपने पत्ते बहुत ही सोच समझकर चले हैं, और वे निश्चिंत हैं कि अगर सरकार गिरती है तो इसका नुकसान उनसे ज्यादा भाजपा को होने वाला है।

उधर इस अस्थिरता को भंजाने में कांग्रेस भी पीछे नहीं हट रही है। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ से छन छन कर बाहर आ रही खबरो ंपर अगर यकीन किया जाए तो सोनिया गांधी ने झारखण्ड विकास मोर्चा के बाबू लाल मरांडी की पीठ पर हाथ रख दिया है। कहा जा रहा है कि मरांडी को फ्री हेण्ड देकर कहा गया है कि वे झामुमो और दूसरे विधायकों को एकजुट कर लें तो मुख्यमंत्री की कुर्सी उनकी ही होगी।

जनसत्ता अखबार में

यह है जनसेवकों का असली चेहरा

ये है दिल्ली मेरी जान
 
(लिमटी खरे)

यह है जनसेवकों का असली चेहरा
एक समय था जब जनसेवक वाकई में जनसेवा को अपना असली धर्म माना करते थे, आज जमाना बदल गया है, जनसेवकों के लिए निहित स्वार्थ ही सबसे आगे आ गया है। अपनी रोजी रोटी और विलासिता को जनसेवकों ने अपना कर्तव्य समझ लिया है, रही बात आवाम की तो उनका मानना है चूल्हे में जाए रियाया। इसी तरह का कुछ वाक्या पिछले दिनों लोकसभा में देखने को मिला। वित्त विधेयक पर चर्चा के दौरान पूर्व रेलमंत्री और स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव का कहना था कि महिला आरक्षण विधेयक अगर परवान चढ गया तो बडी संख्या में पुरूष संसद सदस्यों के सेवानिवृत होने की आशंका है। इसलिए लालू ने मांग की कि सांसदों की तनख्वाह और पेंशन बढाई जानी चाहिए। जनसेवा करने का मानस अपने मन मस्तिष्क में लिए लालू यादव के शब्द तो सुनिए। सांसदों का वेतन बढाकर अस्सी हजार और उनकी पेंशन को बढाकर वेतन से कहीं अधिक एक लाख रूपए प्रतिमाह कर दिया जाए। अब लालू यादव को जमीनी हकीकत कौन समझाए कि देश में आम आदमी को दो जून की रोटी नसीब नहीं है मालिक, जनता के द्वारा दिए जाने वाले कर से तो जनसेवक वेतन पाते हैं, फिर विलासिता से भरपूर जीवन जीने के लिए एक लाख रूपए प्रतिमाह की पेंशन तो शायद निजी क्षेत्र या सरकारी कर्मचारी को भी न मिल पाती हो।
आडवाणी मोदी पर होगा हत्या का मुकदमा दर्ज!
मुस्लिम लॉ बोर्ड के सदस्य और निर्दलीय संसद सदस्य मोहम्मद अदीब के एक पत्र से प्रधानमंत्री कार्यालय की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई है। पीएमओ की हालत ‘‘हुई गति सांप छछूंदर केरी, उगलत निगलत पीर घनेरी‘‘ की सी हो गई है। अदीब के पत्र की इबारत कुछ इस तरह है कि वे गुजरात के दंगों के लिए नरेंद्र मोदी और बाबरी विध्वंस के लिए राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आडवाणी पर हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की अनुमति चाहते हैं। अदीब का कहना है कि जब लिब्राहन आयोग मान चुका है बावरी विध्वंस के लिए आडवाणी जिम्मेदार हैं तो फिर उस दरम्यान हुए दंगे और मारे गए लोगों की जवाबदारी भी लाल कृष्ण आडवाणी की ही बनती है। इसी तरह गोधरा कांड में एसआईटी ने नरेंद्र मोदी को बुलाकर पूछताछ की गई है, चूंकि मामला अदालत में लंबित है, इसलिए वे इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं, पर देश के लोकतंत्र की हिफाजत और हुकूमत का इकबाल बुलंद करने के लिए नरेंद्र मोदी और एल.के.आडवाणी के उपर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। पीएमओ पशोपेश में है कि सांसद मोहम्मद अदीब के पत्र का क्या जवाब दें या क्या कार्यवाही करें। वैसे अदीब ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी सहित अनेक जनसेवकों को इस पत्र की प्रति भेजी है। अब देश के मुस्लिम संगठनों और संसद सदस्यों का लगातार अदीब को समर्थन मिलता जा रहा है।
साहब के ठाठ पसंद नहीं आए विजलेंस को
दिल्ली पुलिस के एक अतिरिक्त पुलिस आयुक्त के ठाठ बाट विभाग के ही विजलेंस विभाग को रास नहीं आए। पूर्वी जिला के एसीपी ओ.पी.सागर ने गर्मी से तंग आकर सर्दी का अहसास करवाने के लिए एक पखवाडे पहले अपनी सरकारी गाडी में एसी लगवा लिया। साहब बडे मौज से एसी की हवा में अपने कर्तव्य निभा रहे थे। साहब के चाहने वालों को यह बात रास नहीं आई और हो गई एक गुमनाम शिकायत। पुलिस मुख्यालय ने तत्काल इस पर संज्ञान लिया। विजलंेस विभाग ने मारा छाप और धर लिया एसीपी की गाडी को। एसीपी महोदय अपने कमिश्नर वाई.एस.डडवाल के उस आदेश को भूल गए थे, जिसमें साफ कहा गया था कि जो भी कर्मचारी या अधिकारी एयर कंडीशन का पात्र नहीं होगा वह इसका उपयोग करते पाए जाने पर दंडित किया जाएगा। हाल ही में थानों के निरीक्षण के दौरान एक एसीपी कार्यालय मंे लगे एसी पर भडके डडवाल ने उन्हें झाड पिलाई थी। कहा जा रहा है कि एसीपी सागर जब भी निरीक्षण पर निकलते तो वे एसी वाली गाडी से नीचे पैर नहीं रखते और कोई मातहत अगर सूरज की रोशनी से बचने के लिए छांव में बैठा दिख जाता तो उसकी शामत आ जाती। इन्हीं में से किसी ने कमाल दिखाया और एसीपी हो गए बेहाल।
साठ साल में चार, चार साल में पहली!
महिला आरक्षण के हिमायती होने का दावा करने वाली कांग्रेस जिसने आधी से ज्यादा सदी तक देश पर शासन किया है के बावजू राजस्थान में साठ साल में महज चार महिला जज और सर्वोच्च न्यायालय में चार साल बाद कोई महिला जज मिल सकी है। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति रूमा पाल के जून 2006 में सेवानिवृत होने के बाद सुको में महिला जज नहीं थी। इसके बाद अब चार साल बाद न्यायमूर्ति सुधा मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के बतौर शपथ दिलवाई गई है। वे सर्वोच्च न्यायालय में चौथी महिला जस्टिस होंगी। उधर राजस्थान का उच्च न्यायलय भी सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर ही चल रहा है, वहां भी साठ साल में महज चार महिला जज ही बन पाई हैं। एक तरफ तो कांग्रेस महिलाओं की हितैषी होने का स्वांग रचती आई है, और दूसरी ओर महिलाओं को आगे बढाने की जब भी बात आती है, कांग्रेस अपना पल्लू झाडकर पीछे हो जाती है।
शोभा की सुपारी बने फुट ओवर ब्रिज
दिल्ली में एक के बाद एक कर फुट ओवर ब्रिज का निर्माण करवाया जा रहा है। कुछ सालों पहले बने मजबूत पुलों को भी तोडकर उनके स्थान पर नए लोहे के पुल बनाए जा रहे हैं। इन पुलों को एसे स्थानों पर बनाया जा रहा है कि जनता इनका उपयोग करने से हिचकने लगी है। अमूमन देखा गया है कि सडक पार करने के लिए बनाए गए फुट ओवर ब्रिज नशेडियों के अड्डे बन गए हैं। इन पुलों पर शाम ढलते ही मयखाने सजने लगते हैं, यहां चरस गांजें की सुगंध से सारा वातावरण सराबोर हो जाता है। भूल से भ अगर अलह सुब्बह आप इस पर से निकल जाएं तो इस पर चले हुए कारतूस (उपयोग किए हुए कंडोम) यत्र तत्र पडे मिल जाते हैं। जनता इन पुलों का उपयोग करने से बचती ही है। सडकों पर जहां कट है वहां से ही जनता अपनी जान जोखम में डालकर सडक पार करने में विश्वास रखती हैं अब दिल्ली सरकार को कौन बताए कि आपकी मर्जी से नहीं वरन अपनी मर्जी से चलना चहती है दिल्ली की जनता।
आईआरसीटीसी बनाम फर्जी वाडा
भारतीय रेल मंत्री ममता बनर्जी लाख दुहाई दें कि आईआरसीटीसी के हाथों में जब से रेल्वे की खान पान व्यवस्था गई है, तबसे रेल यात्रियों की मौजां ही मौजां हैं, पर जमीनी हकीकत इससे बहुत उलट ही है। आलम यह है कि राजधानी एक्सप्रेस में यात्रा करने वाले यात्रियों को ही परेशानियों का सामना करना पड रहा है। विशेषकर बिलासपुर से नई दिल्ली आने वाली राजधानी की पेन्ट्री में तो बहुत ही बुरी स्थिति है। वैसे भी राजधानी में यात्रा करने वाले यात्रियों की आम शिकायत है कि इसके कोच काफी पुराने हैं और उन्हें न तो मोबाईल चार्जर ही मिलता है और न ही धुले बेड रोल। रही बात खाने की तो वह भी पेन्ट्री के मूड पर ही निर्भर करता है। एक भुक्तभोगी यात्री ने बताया कि उसने 2441 राजधानी में जब 26 अप्रेल को तीसरी मर्तबा यात्रा की तब जाकर उसे शिकायत पुस्तिका दी गई वह भी टीसी के हस्ताक्षेप के बाद। उसने शिकायत नंबर 167698 दर्ज करवाई है, जिसका अब तक कोई उत्तर नहीं मिल सका है। उक्त यात्री की शिकायत को मानें तो उसे रात को नागपुर के बाद भोजन ही नहीं दिया गया और रही बात अन्य खाद्य पदार्थों की तो वह भी नदारत ही थे। पेन्ट्री मेनजेर से शिकायत करने पर भी कोई लाभ नहीं हुआ।
फिर अदालत की लताड पडी मीडिया को
अति उत्साह में मीडिया के कुछ कारिंदे एसा कर जाते हैं कि उन्हें बाद में पछताना पडता है। देश की अदालतों ने कई बार मीडिया को चेताया है कि वह अपनी हदें पहचाने और वर्जनाएं न तोडे। हाल ही में अभिनेत्री खुशबू के विवाह पूर्व यौन संबंधों के बयान के बारे में गलत व्याख्या करने पर एक बार फिर मीडिया अदालत के निशाने पर आ गया। इस मामले में अदालत का कहना था कि मीडिया और लोगों ने खुशबू के नजरिए को गलत रूप में समझा है, परिणामस्वरूप अदालत के सामने याचिकाओं की बाढ आ गई है। वैसे यह सच है कि मीडिया का काम गलत और सही को बताना है, अमूमन देखा जा रहा है कि पिछले कुछ सालों से जबसे देश का मीडिया कार्पोरेट घरानों की लौंडी बन गया है, तबसे मीडिया न्यायधीश की भूमिका में आ गया है, जो सरासर गलत है। मीडिया को चाहिए कि वह अपनी सीमाएं पहचाने और गलत या सही क्या है यह बताए न कि किसी मामले में फैसला दे। फैसला देने का काम अदालत का है, और यह अधिकार अदालत के पास ही रहे ता बेहतर होगा।
साईबर सुरक्षा सबसे बडी चुनौति
मई के आते ही बच्चों और युवाओं का मन आल्हादित हो उठा है, क्योंकि साल भर की पढाई के बाद अब वे फुर्सत में छुट्टियां काट रहे हैं। अवकाश के आते ही अभिभावकों के सामने एक बडी चुनौति साईबर सुरक्षा की पैदा हो गई है। इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट युवाओं और बच्चों की पहली पसंद बनकर उभरा है। घरों पर इंटरनेट कनेक्शन और साईबर कैफे में आज लाईन लगी हुई है। क्या बच्चे क्या जवान हर कोई आज इंटरनेट के अनंत आकाश में खोने को बेताब है। अवकाश के दिनों में लोग आम दिनों से ज्यादा समय तक इंटरनेट पर बिता रहे हैं। साईबर क्राईम करने वालों के लिए यह सबसे मुफीद मौका है, जबकि वे लोगों को आसानी से लूट सकते हैं। अज्ञानता में अपनी निजी जानकारी और क्रेडिट कार्ड संबंधी सूचनाएं भी लोग साझा कर रहे हैं जो सबसे अधिक चिंता का विषय है। साईबर अपराधी बच्चों या नौजवानों को उलझाकर आसानी से उनको अपने जाल में फंसाकर उनसे जानकारी शेयर कर एकांउंट को खाली कर सकते हैं। सो सावधान हो जाईए कहीं आपका बच्चा तो साईबर अपराधियों के चंगुल में नहीं फंसने जा रहा है।
काहे की मंदी यहां तो बल्ले बल्ले हैं
समूचा विश्व आर्थिक मंदी की मार झेल रहा है, भारत में भी इसका असर है, पर महाराष्ट्र के ओरंगाबाद जिसकी गिनती मराठवाडा इलाके के पिछडे जिलों में होती है में भले ही औद्योगिक विकास की किरण स्पर्श न कर पाई हो, पानी का हाहाकार हो, गरीब गुरबों की तादाद बहुत ज्यादा हो पर यहां के हालात देखकर लगता नहीं है कि यह जिला कहीं से पिछडा है। पूर्व मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख और वर्तमान निजाम अशोक चाव्हाण की कर्मभूमि औरंगाबाद जहां दौलताबाद नाम का किला है, में पिछले एक सप्ताह में ही लगभग 115 मर्सिडीज गाडी बुक करवाई गईं हैं। है न आश्चर्य की बात। मंहगी विलासिता का प्रतीक मानी जाने वाली मर्सिडीज कार की कीमत 25 से 95 लाख रूपए तक है। लोगों को हैरत है कि इतने पिछडे जिले में एक सप्ताह में ही लगभग सवा सैकडा मंहगी कार की बुकिंग कैसे हो गई, पर यह सच है जनाब। यह हैरत अंगेज कारनामा हुआ है औरंगाबाद में। इस लिहाज से कौन कहेगा कि औरंगाबाद पिछडा हुआ है।
प्रशांत भूषण मामले की सुनवाई 14 को
पूर्व न्यायाधिपतियों और वर्तमान प्रधान न्यायधीश एच.एस.कापडिया के बारे में कथित तौर पर टिप्पणी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के खिलाफ स्वतः संज्ञान के आधार पर अवमानना की कार्यवाही के लिए नोटिस देने के मामले के विचारयोग्य होने या न होने की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है। इस पर फैसला 14 जुलाई को दिया जाएगा। गौरतलब है कि तहलका को दिए एक साक्षात्कार में भूषण ने कहा था कि न्यायमूर्ति कापडिया को वन संबंधी मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ के सदस्य होने के नाते प्रधान न्यायधीश के.जी.बालकृष्णणन के साथ वेदांता स्टर्लाइट ग्रुप से जुडे मुकदमें की सुनवाई नहीं करना चाहिए, क्योंकि कंपनी में उनके अर्थात जस्टिस कापडिया के शेयर हैं। इसके बाद जस्टिस कापडिया ने खुद को इससे अलग कर लिया था। अब जब देश के प्रधान न्यायधीश की आसनी पर जस्टिस कापडिया विराजमान हैं, तब देखना यह है कि जस्टिस अमलतास की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ क्या निर्णय देती है।
शिव पर बिफरे शंक्राचार्य
जगतगुरू शंक्राचार्य स्वामी स्वरूपानंद इन दिनों मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार से खासे नाराज नजर आ रहे हैं। मध्य प्रदेश में शिवराज के नेतृत्व मंे भाजपा सरकार काबिज है, और माना जाता है कि भाजपा द्वारा साधु संतों का बहुत आदर किया जाता है। शंक्राचार्य जी का आरोप है कि मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में सांकलघाट में 10 लाख साल पुरानी आदि शंकराचार्य की पूज्यनीय गुफाओं के संरक्षण के लिए किए जा रहे कार्यों में वन मण्डल अधिकारी (डीएफओ) जानबूझकर न केवल अडंगा लगा रहे हैं, वरन डीएफओ अभद्र व्यवहार पर भी उतर आएं हैं। उनका कहना है कि इन गुफाओं में मां नर्मदा के जल का रिसाव जारी है, पास ही माता हिंगलाज का सािान है। साधु संतों के सहारे सत्ता का स्वाद चखने वाली भाजपा पर अगर शंकराचार्य की दृष्टि तिरछी हो गई हो तो भाजपा को समय रहते ही समझ लेना चाहिए कि पुरानी कहवात चरितार्थ होने वाली है कि ‘‘जब नास मनुस का छाता है, तब विवेक मर जाता है।‘‘
पुच्छल तारा
भारत गणराज्य में असमानताएं अनंत हैं, इसी पर रेखांकित एक ईमेल नरेंद्र ठाकुर ने भेजा है, जिसमें भारत सरकार के प्रति उनका गुस्सा साफ झलक रहा है। वे लिखते हैं कि ओलंपिक शूटर स्वर्ण पदक जीतकर आता है तो भारत सरकार खुशी से फूली नहीं समाती और उसे तीन करोड रूपए इनाम के बतौर देती है, वहीं दूसरी ओर नक्सलवादियों से लडते हुए 76 जवान शहीद हो जाते हैं और भारत सरकार हर जवान को महज एक लाख रूपए की राशि ही देती है। जय हो गांधी नेहरू आपकी कांग्रेस देश को कहां ले जा रही है, सदबुद्धि दो आज के इन कांग्रेसियों को।

रविवार, 2 मई 2010

मोहसीना को भेजा जा सकता है राजस्थान

मोहसीना को भेजा जा सकता है राजस्थान
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 02 मई। राजस्थान की राज्यपाल प्रभा राव के अवसान के बाद अब वहां के लिए लाट साहेब की खोज आरंभ हो गई है। इसमें कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री मोहसीना किदवई का नाम सबसे उपर ही चल रहा है। कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मोहसीना किदवई की बतौर राजस्थान का राज्यपाल बनाने की फाईल श्रीमति सोनिया गांधी की हरी झंडी के इंतजार में उनके कार्यालय में पडी हुई है। जैसे ही सोनिया गांधी की सहमति मिलेगी वैसे ही इसे महामहिम राज्यपाल श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पास भेज दिया जाएगा और मोहसीना किदवई को राजस्थान का राज्यपाल घोषित कर दिया जाएगा।

आखिर सोनिया ने क्यों फटकारा हुड्डा को

आखिर सोनिया ने क्यों फटकारा हुड्डा को
 
दलितों को महफूज रखने में नाकामयाब रहे हैं हुड्डा
 
दलित हितैषी छवि बनाने की जुगत में राहुल
 
(लिमटी खरे)

देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा सूबे में हिसार के मिर्चपुर गांव में एक दलित पिता पुत्री को जिन्दा जलाए जाने की घटना से खफा होकर कांग्रेस की राजमाता ने सूबे के निजाम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के प्रति अपनी तल्ख नाराजगी जाहिर की है। हुड्डा को लिखे पत्र में सोनिया ने इसे न केवल शर्मनाक बताया है, वरन कहा है कि इस तरह की घटनाओं के होने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। कांग्रेस शासित राज्य में ही जब दलितों के साथ इस तरह का बर्ताव होगा तो भला दूसरे दलों की सरकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है।
 
गौरतलब है कि 21 अप्रेल को मिर्चपुर में दलितों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया था, जिसमें एक सत्तर वर्षीय वृद्ध के साथ ही साथ उसकी 17 साल की कमसिन पोलियोग्रस्त बेटी भी आग के दावानल में भुंज गई थी। यह सब हुआ एक पुलिस अधिकारी और एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट नायब तहसीलदार की मौजूदगी में। यह घटना अपने आप में सरकार का शर्म नीचा करने वाली ही कही जा सकती है।
 
यहां यह भी उल्लेखनीय होगा कि कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित अन्य सूबों में अपने आप और कांग्रेस को दलित हितैषी बताने का जतन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस शासित हरियाणा में गोहना के बाद हिसार में भी दलितों के खिलाफ बलशाली लोग हिंसा पर उतर आए हैं। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब हुआ जब पता चला कि दो दलितों की हत्या, 26 लोगों के बुरी तरह घायल होने के एक सप्ताह बाद हुक्मरान भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने घटनास्थल का दौरा करने की जहमत उठाई हो।
 
जब कांग्रेस के मैनेजरों को लगा कि इस घटना के बाद दलितों के मन में कांग्रेस के प्रति रोष और असंतोष पनप जाएगा तब उन्होंने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को मशविरा दिया होगा कि बेहतर होगा कि वे हुड्डा को कडा पत्र लिखें और इस पत्र को मीडिया में अवश्य लीक करवाएं ताकि दलितों का विश्वास जीता जा सके। संभव है प्रबंधन में कौशल रखने वाले इन्हीं जाबांजों ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी पूर्व सूचना के बिना मिर्चपुर जाने की सलाह दे दी हो ताकि उनकी छवि भी दलित हितैषी की बन सके।
 
अब तक मिर्चपुर में वैसे भी कोई नामी नेता नहीं पहुंचा है। राहुल गांधी के पहुंचने के बाद अब जो भी नेता जाएगा उसका कद उतना नहीं बढ सकेगा जितना कि राहुल गांधी ने अपना बढा लिया है। हुड्डा के लिए शर्म की बात तो यह है कि सबसे पहले उन्हें उनकी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने लताड भरा खत लिख फिर कांग्रेस के ही सबसे शक्तिशाली महासचिव ने उन्हें बिना बताए ही मिर्चपुर जाकर दलितों को गले लगाया। यह भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सबसे बडी नाकामी माना जा सकता है।
 
हरियाण में वैसे भी जाट और गैर जाट दोनों ही समुदाय रेल की पटरी की तरह साथ साथ तो चलते हैं, पर मिलते कभी नहीं है, कहावत को चरितार्थ करते हैं। जाटों के बीच कांग्रेस ने सदा ही जगह बनाने का प्रयास किया है। हरियाणा का इतिहास गवाह है कि छोटूराम से लेकर चौटाला के शासन तक कांग्रेस का बडा वोट बैंक गैर जाट समुदाय ही रहा है। सूबे में दलितों की तादाद खासी है। हरियाणा में बीते दिनां गोहना के बाद मिर्चपुर की घटना से हुड्डा पर उंगलियां उठना स्वाभाविक ही है। हालात देखकर यही कहा जा सकता है कि जाट जाति से संबंध रखने वाले मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा दलितों के प्रति बहुत ज्यादा संवदन हीन ही हैं। हुड्डा के शासन काल में खाप पंचायतें भी सर उठाने लगी हैं।
 
जब कांग्रेस के प्रबंधकों को लगा कि हरियाणा में दलितों के साथ होने वाले अत्याचारों के बाद कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा इसे रोकने में नाकामयाब रह रहे हैं, तब उन्होंने ब्रम्हास्त्र के तौर पर सोनिया गांधी से पत्र लिखवाकर राहुल गांधी को बिना पूर्व सूचना के ही वहां भेजने की तैयारी की। सोनिया गांधी ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इसलिए फटकारा कि वे दलितों को सर उठाकर जीने का अधिकार देने में नाकामयाब रहे हैं। कांग्रेस को चाहिए कि दलित वोट बैंक सहेजने के साथ ही साथ भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री पद से हटाकर किसी एसी सुलझी सोच वाले को इस पर काबिज करवाएं कि सूबे में कम से कम दलित पिछडे तो भारत गणराज्य में सर उठाकर भरपूर सांस ले सकें।

भोपाल में श्रमजीवी पत्रकारों की रैली



 

शनिवार, 1 मई 2010

शिव पढ रहे हैं भागवत पुराण

शिव पढ रहे हैं भागवत पुराण

उमा की वापसी हुई मुश्किल

सुरेश, प्रभात, शिव के त्रिफला की भूमिका पर संघ में चर्चा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 01 मई। मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों भागवत पुराण पढने में व्यस्त हैं। दरअसल सूबे की पूर्व मुख्यमन्त्री उमा भारती की घरवापसी से बुरी तरह भयाक्रान्त नज़र आ रहे हैं शिवराज सिंह चौहान, यही कारण है कि जब भी उमा की भाजपा में वापसी की खबरें जोर पकडती हैं, शिवराज सिंह का नाम उनके प्रबल विरोध के लिए सामने आ जाता है। अब जबकि कल 02 मई को मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष के नाम की आधिकारिक घोषणा होने की उम्मीद है के बीच ही शिवराज सिह चौहान ने संघ मुख्यालय नागपुर में जाकर मत्था टेका है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सूत्रों ने बताया कि शिवराज सिंह चौहान ने संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ लंबी बातचीत की। सूत्रों ने संकेत दिए कि बातचीत का विषय मूलत: तीन बातों पर ी केन्द्रित था पहला मुद्दा था उमा भारती की घर वापसी, दूसरा भाजपा के संभावित सूबाई अध्यक्ष प्रभात झा एवं सुरेश सोनीकी भूमिका और मध्य प्रदेश के मन्त्री कैलाश विजयवर्गीय का विवाद। इसके अलावा संगठन और सत्ता के बारे में भी औपचारिक चर्चाएं हुईं हैं।

दिल्ली में झण्डेवालान स्थित संघ मुख्यालय के सूत्रों का कहना है कि फायर ब्राण्ड नेत्री रहीं उमा भारती ने चार दिन पूर्व मोहन भागवत से भेंट की थी। जैसे ही इसकी भनक शिवराज सिंह चौहान को लगी उन्होंने भी भागवत से समय मांग लिया। गौरतलब है कि उमा भारती की वापसी का भाजपा के अन्दर ही दो तीन लाबियां विरोध कर रहीं हैं। अनेक नेताओं का मानना है कि उमा भारती की वापसी से भाजपा का अन्दरूनी माहौल बुरी तरह प्रदूषित हो जाएगा, क्योंकि उमा के जाने के बाद उमा के विश्वस्तों ने उनका साथ छोड दिया था, अब नेताओं को आशंका है कि अगर उमा भारती वापस आईं तो वे इन निष्ठा बदलने वालों को चुन चुनकर नेस्तनाबूत करने का प्रयास अवश्य ही करेंगी। उधर भाजपा में चल रही बयार के अनुसार भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी को उमा भारती को वापस लेने में कोई समस्या नहीं है, पर वे कोई भी काम आम सहमति से ही अंजाम तक पहुंचाना चाहते हैं। आडवाणी मण्डली इस फिराक में है कि उमा भारती को किसी भी कीमत पर भाजपा में वापस ले लिया जाए, ताकि सुषमा स्वराज के बढते कदमों को थामा जा सके।

संघ के सूत्रों ने बताया कि शिव और भागवत के बीच हुई चर्चा में सुरेश सोनी और प्रभात झा की भूमिका पर भी चर्चा की गई। प्रभात झा को मध्य प्रदेश का अध्यक्ष बनवाने के लिए सुरेश सोनी ने अपने सारे घोडे खोल दिए हैं। मध्य प्रदेश इकाई की एक लाबी प्रभात झा के नाम का विरोध कर रही है, पर प्रभात झा और सुरेश सोनी की जुगलबन्दी के चलते उनके विरोधियों के मंसूबे परवान नहीं चढ पा रहे हैं। इसके अलावा मध्य प्रदेश के एक मन्त्री कैलाश विजयवर्गीय का नाम भ्रष्टाचार में लवरेज होने के बाद संघ नेतृत्व की भवें तन गईं हैं। बताते हैं कि दिल्ली की एक दुकान में नोट गिनने की एक मशीन की खरीद के वक्त सीसीटीवी के फुटेज में शिवराज के बहुत अजीज का फुटेज आने की सीडी विजयवर्गीय के पास है, और उसी के चलते वे शिवराज सिंह पर दवाब बनाते रहते हैं, पर इस बार बांस उल्टे बरेली के ही पडते नज़र आ रहे हैं।

चिदम्बरम ने क्यों छुपाई विदेशों में मुद्रा की छपाई की बात

चिदम्बरम ने क्यों छुपाई विदेशों में मुद्रा की छपाई की बात

क्या कांग्रेस देगी देश के आवाम को जवाब

चिदम्बरम को भरोसा नहीं भारतीय मुद्राणयों और टकसाल पर

सूख गई नोट छापने वाली प्रेस की रोशनाई

(लिमटी खरे)

देश के गृह मन्त्री जैसे जिम्मेदार ओहदे पर बैठे पलनिअप्पम चिदम्बरम ने एक एसा कृत्य किया है, जिसे देश कभी उन्हें माफ नहीं करेगा। संसदीय समिति ने लोकसभा और राज्यसभा के पटल पर जो प्रतिवेदन रखा है, वह निश्चित तौर पर चौंकाने वाला ही कहा जाएगा कि संसाधनों के होते हुए भी 1997 - 98 में तत्कालीन वित्त मन्त्री और वर्तमान गृह मन्त्री पी.चिदम्बरम ने एक लाख करोड रूपए की भारतीय मुद्रा को सौ और पांच सौ रूपयों की शक्ल में भारत पर लंबे समय तक राज करने वाले ब्रिटेन, दुनिया के चौधरी अमेरिका और जर्मनी की अलग अलग कंपनियों से छपवाकर भारत के बाजार में फैलाया है।

सरकारी उपक्रमों सम्बंधी संसद की स्थाई समिति के अध्यक्ष वी.किशोर चन्द्र देव ने संसद परिसर में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए इस रहस्य पर से पर्दा उठाया है कि पलनिअप्पम चिदम्बरम ने इन्द्र कुमार गुजराल के प्रधानमन्त्रित्वकाल में बतौर वित्त मन्त्री इस गम्भीर काम को अंजाम दिया था, और देश की सबसे बडी पंचायत को इस जानकारी से महरूम ही रखा था। पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्यों को इसकी भनक तक नहीं लगी कि देश में चलने वाली करंसी आखिर कहां से छपकर भारत के बाजारों में घूम रही है।

लाख टके का सवाल यह है कि जब चिदम्बरम को भारत की टकसाल और नोट छापने वाली सरकारी मुद्रण व्यवस्था पर भरोसा नहीं था तो उन्होंने विदेशी कंपनियों पर एतबार किस आधार पर कर लिया। क्या विदेशी कंपनियां भारत से मिलने वाली डाई (नोट छापने में प्रयुक्त होने वाला एक औजार जिसे प्रिंटिंग ब्लाक भी कहते हैं) का बेजा इस्तेमाल नहीं कर सकतीं थीं। अगर उन्होंने एक ही नंबर के अनेक नोट छाप कर भारत में प्रचलन में ला भी दिए हों तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी नकली नोट का प्रचलन भारत सरकार का सबसे बडा सरदर्द बनकर उभरा है। आसपास के देश भारत की मुद्रा की नकल कर नकली नोट भारत में प्रचलित कराकर देश की अर्थव्यवस्था को तोड मरोड कर रखने में कोई कोर कसर नहीं रख छोड रहे हैं।

समिति के प्रतिवेदन पर गोर फरमाया जाए तो भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार भारतीय मुद्रा के प्रचलन में आने वाली व्यवहारिक कठिनाईयों जैसे कटे फटे और मैले कुचले नोट होने और भारतीय मुद्रण मशीनों की दशा ठीक न होने के कारण यह फैसला लिया गया था कि विदेशी कंपनियों से नोट छपवाए जाएं। इस निर्णय के तहत सौ रूपए सममूल्य के 200 करोड रूपए के, पांच सौ रूपए सममूल्य के 160 करोड रूपए के नोट बाहर से छपवाकर भारतीय बाजार में फैलाए गए हैं। समिति ने बताया है कि दुनिया के चौधरी अमेरिका की अमेरिकन बैंक कंपनी से सौ रूपए वाले 63.5 करोड नोट के तो ब्रिटेन की थामस डीलर से सौ रूपए वाले 136.5 करोड नोट छपवाए गए थे। पांच सौ रूपए सममूल्य के नोट छापने का जिम्मा जर्मनी की जीसेक एण्ड डेवरिएंट कंसेर्टियम कंपनी को 160 करोड नोट छापने का आर्डर दिया गया था। प्रतिवेदन में आगे कहा गया है कि 1996 - 97 के वित्तीय वर्ष में देश में कुल 335900 करोड रूपयों की मुद्रा आवश्यक थी, पर उत्पादन कुल 216575 करोड रूपए ही था।

संसद की स्थाई समिति की चिन्ता बेमानी नहीं है कि असाधारण परिस्थितियों में ही सही विदेशी कंपनी से नोट छपाने का निर्णय कैसे ले लिया गया। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जबकि स्टाम्प पेपर की छपाई में तेलगी घोटाला हुआ था। बताते हैं कि इसमें भी सरकारी मुद्राणालय से सरकारी कागज पर ही तेलगी के लिए स्टाम्प पेपर की छपाई होती थी, जिससे असली और नकली में पहचान कर पाना बहुत मुश्किल काम था। समिति का मानना है कि तीनों देशों से हुए छपाई करार के बाद प्रिंटिग ब्लाक और बची स्याही नष्ट करने का प्रावधान था, वस्तुत: इन कंपनियों ने एसा किया या नहीं यह बात भी स्पष्ट नहीं हो सकी है। भारत सरकार तो महज इन कंपनियों के आश्वासन पर ही सन्तोष जता रही है। साथ ही कंपनियां यह आश्वासन भी नहीं दे पा रहीं हैं कि एक ही नंबर के अतिरिक्त नोट छापे गए कि नहीं। देव की अध्यक्षता वाली समिति इस बात से भी इंकार नहीं कर रही है कि विदेशों से भारी मात्रा में आने वाली नकली करंसी का इस छपाई से कोई नाता हो। समिति का अनुमान है कि वर्तमान में देश में लगभग 169000 करोड रूपयों की जाली करंसी प्रचलन में है।

आजाद भारत गणराज्य में सम्भवत: यह पहला मौका होगा जबकि सरकार ने दबे छुपे भारतीय मुद्रा को विदेश से छपवाकर बुलवाया हो और बिना किसी की जानकारी के बाजार में झौंक दिया हो। प्राचीन काल से एक बात स्थापित है कि जब भी किसी राजा को अपने विरोधी राजा का दुर्ग या किला जीतना होता था, तब वह उस किले के रसद (खाना और पानी) के सारे रास्ते बन्द कर देता था, फिर इन्तजार करता था कि रसद समाप्त हो और सामने वाला राजा घुटने टेके। भारत की प्रगति देखकर भारत विरोधी ताकतें भी कमोबेश इसी तरह का उपक्रम कर रहीं हैं। वे भी भारतीय अर्थव्यवस्था में सेंध लगाकर यहां की आर्थिक संप्रभुता को दीमक की तरह खा रही हैं। पलनिअप्पम चिदम्बरम जैसे गृहमन्त्री बिना सोचे समझे ही देश के चुने हुए जनसेवकों को अंधेरे में रखकर जाने अनजाने ही इन ताकतों के हितों की जडों में पानी दे रहे हैं, जो निन्दनीय ही कहा जाएगा।

भारत सरकार को चाहिए कि इस मामले में तत्काल उच्च स्तरीय जांच करवाए और इन नोटों को विदेश में छापने की अनुमति देने की जवाबदेही तय करे। साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इस तरह बाहर से मुद्रा छपाने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, और उन पर रोक लगाने के क्या उपाय हो सकते हैं। आखिर किसी जनसेवक की गिल्त की सजा समूचे देश की सवा सौ करोड से अधिक जनता क्यों भुगते।

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

माधुरियों से पटा पडा है देश

माधुरियों से पटा पडा है देश

आखिर कब जागेगा देशप्रेम का जज्बा

क्यों बन्द हो गए देशप्रेम के गीत

किस रास्ते पर ले जा रही है सरकार आवाम को

(लिमटी खरे)

उच्च स्तर पर बैठे एक राजनयिक और भारतीय विदेश सेवा की बी ग्रेड की अफसर माधुरी गुप्ता ने अपनी हरकतों से देश को शर्मसार कर दिया है, वह भी अपने निहित स्वार्थों के लिए। माधुरी गुप्ता ने जो कुछ भी किया वह अप्रत्याशित इसलिए नहीं माना जा सकता है क्योंकि जब देश को चलाने वाले नीतिनिर्धारक ही देश के बजाए अपने निहित स्वार्थों को प्रथमिक मान रहे हों तब सरकारी मुलाजिमों से क्या उम्मीद की जाए। आज देश का कोई भी जनसेवक करोडपति न हो एसा नहीं है। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और इतिहास खंगाला जाए और आज की उनकी हैसियत में जमीन आसमान का अन्तर मिल ही जाएगा। देश के सांसद विधायकों के पास आलीशान कोठियां, मंहगी विलसिता पूर्ण गाडिया और न जाने क्या क्या हैं, फिर नौकरशाह इससे भला क्यों पीछे रहें।

नौकरशाहों के विदेशी जासूस होने की बात कोई नई नहीं है। जासूसी के ताने बाने में देश के अनेक अफसरान उलझे हुए हैं। पडोसी देश पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में पकडी गई राजनयिक माधुरी गुप्ता पहली अधिकारी नहीं हैं, जिन पर जासूसी का आरोप हो। इसके पहले भी अनेक अफसरान इसकी जद में आ चुके हैं, बावजूद इसके भारत सरकार अपनी कुंभकणीZय निन्द्रा में मगन है, जो कि वाकई आश्चर्य का विषय है। लगता है इससे बेहतर तो ब्रितानी हुकूमत के राज में गुलामी ही थी।

भारतीय नौ सेना के एक अधिकारी सुखजिन्दर सिंह पर एक रूसी महिला के साथ अवैध सम्बंधों की जांच अभी भी चल रही है। 2005 से 2007 के बीच उक्त अज्ञात रूसी महिला के साथ सुखजिन्दर के आपत्तिजनक हालात में छायाचित्रों के प्रकाश में आने के बाद सेना चेती और इसकी बोर्ड ऑफ इंक्वायरी की जांच आरम्भ की। इस दौरान सुखजिन्दर पर विमानवाहक पोत एडमिरल गोर्शकेश की मरम्मत का काम देखने का जिम्मा सौंपा गया था। सुखजिन्दर पर आरोप है कि उसने पोत की कीमत कई गुना अधिक बताकर भारत सरकार का खजाना हल्का किया था।

बीजिंग में भारतीय दूतावास के एक वरिष्ठ अधिकारी मनमोहन शर्मा को 2008 में चीन की एक अज्ञात महिला के साथ प्रेम की पींगे बढाने के चलते भारत वापस बुला लिया गया था। भारत सरकार को शक था कि कहीं उक्त अधिकारी द्वारा उस महिला के मोहपाश में पडकर गुप्त सूचनाएं लीक न कर दी जाएं। सरकार मान रही थी कि वह महिला चीन की मुखबिर हो सकती है। 1990 के पूर्वार्ध में नेवी के एक अधिकारी अताशे को आईएसआई की एक महिला एजेंट ने अपने मोहपाश में बांध लिया था। उक्त महिला करांची में सेन्य नर्सिंग सर्विस में काम किया करती थी। बाद में अताशे ने अपना गुनाह कबूला तब उसे नौकरी से हटाया गया।

इसी तरह 2007 में रॉ के एक वरिष्ठ अधिकारी (1975 बेच के अधिकारी) को हांगकांग में एक महिला के साथ प्रगाढ सम्बंधों के कारण शक के दायरे में ले लिया गया था। उस महिला पर आरोप था कि वह चीन की एक जासूसी कंपनी के लिए काम किया करती थी। रॉ के ही एक अन्य अधिकारी रविन्दर सिह जो पहले भारत गणराज्य की थलसेना में कार्यरत थे पर अमेरिकन खुफिया एजेंसी सीआईए के लिए काम करने के आरोप लग चुके हैं। रविन्दर दक्षिण पूर्व एशिया में रॉ के एक वरिष्ठ अधिकारी के बतौर कर्यरत था। इस मामले में भारत को नाकमी ही हाथ लगी, क्योकि जब तक रविन्दर के बारे में सरकार असलियत जान पाती तब तक वह बरास्ता नेपाल अमेरिका भाग चुका था। 80 के दशक में लिट्टे के प्रकरणों को देखने वाले रॉ के एक अफसर को एक महिला के साथ रंगरेलियां मनाते हुए पकडा गया। उक्त महिला अपने आप को पैन अमेरिकन एयरवेज की एयर होस्टेस के बतौर पेश करती थी। इस अफसर को बाद में 1987 में पकडा गया।

इस तरह की घटनाएं चिन्ताजनक मानी जा सकतीं हैं। देशद्रोही की गिरफ्तारी पर सन्तोष तो किया जा सकता है, पर यक्ष प्रश्न तो यह है कि हमारा सिस्टम किस कदर गल चुका है कि इनको पकडने में सरकारें कितना विलंब कर देतीं हैं। भारत पाकिस्तान के हर मसले वैसे भी अतिसंवेदनशील की श्रेणी में ही आते हैं, इसलिए भारत सरकार को इस मामले में बहुत ज्यादा सावधानी बरतने की आवश्यक्ता है। वैसे भी आदि अनादि काल से राजवंशों में एक दूसरे की सैन्य ताकत, राजनैतिक कौशल, खजाने की स्थिति आदि जानने के लिए विष कन्याओं को पाला जाता था। माधुरी के मामले में भी कमोबेश एसा ही हुआ है।

माधुरी गुप्ता का यह बयान कि वह अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बदला लेने के लिए आईएसआई के हाथों की कठपुतली बन गई थी, वैसे तो गले नही उतरता फिर भी अगर एसा था कि वह प्रतिशोध की ज्वाला में जल रही थी, तो भारत की सडांध मारती व्यवस्था ने उसे पहले क्यों नहीं पकडा। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत का गुप्तचर तन्त्र (इंटेलीजेंस नेटवर्क) पूरी तरह भ्रष्ट हो चुका है। आज देश को आजाद हुए छ: दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, और हमारे ``सम्माननीय जनसेवकों`` द्वारा खुफिया तन्त्र का उपयोग अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए ही किया जा रहा है। क्या यही है नेहरू गांधी के सपनों का भारत!

गडकरी के लिए मुसीबत बने हेवीवेट नेता

गडकरी के लिए मुसीबत बने हेवीवेट नेता

राज्यों के अध्यक्षों में देरी का कारण नेताओं का एकमत न होना

पूर्व अध्यक्षों ने भी चलाया असयोग आन्दोलन

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 30 अप्रेल। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरदहस्त के बावजूद भी भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम नितिन गडकरी को पार्टी के हेवीवेट नेताओं को एक सूत्र में पिरोने में पीसना आने लगा है। यही कारण है कि जनाधार वाले सूबों में भी राज्य इकाई के अध्यक्षों के नामों पर अन्तिम मोहर नहीं लगाई जा सकी है। बाहर से तो पार्टी में मतभेद और मनभेद नहीं दिखाई पड रहे हैं, पर अन्दरूनी तौर पर सर फटव्वल की नौबत आ रही है। पार्टी के अन्दर के झगडे अब सडकों पर आने लगे हैं।

भाजपा के स्वयंभू लौहपुरूष का तगमा लेने वाले राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी को अब संघ के निर्देश पर शनै: शनै: पाश्र्व में ढकेलने की कवायद की जा रही है। आडवाणी की नाराजगी का आलम यह है कि भाजपा के स्थापना दिवस के कार्यक्रम में ही उन्होंने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में रहते हुए किसी भी प्रोग्राम में शिरकत करना मुनासिब नहीं समझा। इतना ही नहीं टीम गडकरी की पहली बैठक में भी उन्होंने अपना मुंह सिल रखा था। इस दौरान उन्होंने उद्बोधन देने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। अमूमन आडवाणी एसे मौकों पर पार्टी का मार्गदर्शन अवश्य ही किया करते हैं।

गडकरी के सामने सबसे बडी समस्या यह है कि वे सूबाई राजनीति से एकाएक उछलकर राष्ट्रीय परिदृश्य में आ गए हैं, जहां के रस्मो रिवाज से वे भली भान्ति परिचित नहीं हैं। अब तक हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष भी गडकरी के कदमताल से खुश नहीं हैं। आडवाणी के सुर में सुर मिलाते हुए राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, मुरली मनोहर जोशी ने भी अघोषित तौर पर असहयोग आन्दोलन चलाया हुआ है। राजनाथ अपनी पूरी ताकत यूपी में अपने पसन्द के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने में झोंक रहे हैं तो मीडिया के दुलारे रहे नायडू ने भी मीडिया से पर्याप्त दूरी बना रखी है। एक समय में एक दिन में तीन तीन सूबों की मीडिया से रूबरू होने वाले नायडू अब अपने आप को आईसोलेटेड रखे हुए हैं। इसी तरह पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अपनी उपेक्षा से दुखी ही नज़र आ रहे हैं। वे भी पार्टी के कामों में दिलचस्पी लेने के बजाए अब अकादमिक सेमीनारों में अपना वक्त व्यतीत कर रहे हैं।

उधर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली के बीच चल रहे कोल्ड वार के चलते भी गडकरी बुरी तरह परेशान नज़र आ रहे हैं। अरूण जेतली के लिए पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी का प्यार जगजाहिर है, यही कारण है कि सुषमा स्वराज ने पार्टी के कामकाज से अपने आप को अलग थलग ही कर रखा है। कुल मिलाकर हेवीवेट नेताओं ने अपने अहम के चलते नए निजाम नितिन गडकरी की राह में शूल ही शूल बो दिए हैं।

उमा नहीं तो भाजपा के गांधी कूदेंगे राहुल के खिलाफ

उमा नहीं तो भाजपा के गांधी कूदेंगे राहुल के खिलाफ

युवाओं के मोहभंग के खतरे से खौफजदा है नेतृत्व

वरूण की अधिक से अधिक सभाएं कराने का प्रयास

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 30 अप्रेल। भारतीय जनता पार्टी से नाता तोडकर भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाकर उसके अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने वाली उमा भारती की भाजपा में वापसी की राह बहुत ही कटीली नज़र आ रही है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उमा की वापसी के मार्ग प्रशस्त होने तक भाजपा के गांधी (वरूण गांधी) को कांग्रेस के गांधी (राहुल गांधी) के खिलाफ मैदान में उतारने की रणनीति पर काम आरम्भ कर दिया है। भाजपा अध्यक्ष के करीबी सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को डर सता रहा है कि कहीं कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के मोह में फंसकर उत्तर प्रदेश के युवा भाजपा से किनारा न कर लें।

वैसे भी भाजपा का पूरा ध्यान अब उत्तर प्रदेश की ओर केन्द्रित होकर रह गया है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा अपनी खोई साख फिर से वापस पा ले। यही कारण है कि नेतृत्व द्वारा उमा भारती, कल्याण सिंह के अभाव में राहुल गांधी की वैकल्पिक काट के तौर पर वरूण गांधी को आगे कर दिया है। वरूण गांधी के भाषणों में हिन्दुत्व को लेकर जो तल्ख तेवर संघ ने देखे हैं, वह चाहता है कि उत्तर प्रदेश में वरूण का भरपूर उपयोग कर युवाओं को भाजपा के और करीब लाया जाए।

गौरतलब है कि दिसम्बर से अब तक यूपी में वरूण गांधी की तीन सभाएं करवाई जा चुकी हैं। सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में वरूण गांधी को युवा, उर्जावान स्टार प्रचारक के तौर पर स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। अगामी दो मई को वरूण की एक सभा जौनपुर के सुजानगंज तो जल्द ही अलीगढ के सिकन्दराराउ में कराने की तैयारी चल रही है। वहीं खबर है कि अनेक नेता अब वरूण गांधी की सभाएं अपने अपने क्षेत्र में करवाने के लिए प्रयासरत हैं। वरूण गांधी के पास से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो उनके राजनैतिक गुरू के तौर पर वे अपनी मां मेनका गांधी का पूरा सम्मान करते हैं, और उन्ही की रणनीति पर वे आगे बढ रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे भी उत्तर प्रदेश को लेकर खासे चिन्तित नज़र आ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की सियासत में चल पडी बयार ने कांग्रेस के प्रबंधकों की पेशानी पर पसीने की बून्दे छलका दी हैं। यूपी के भाजपाई चाहते हैं कि वरूण गांधी को यूपी में बतौर मुख्यमन्त्री प्रोजेक्ट किया जाना चाहिए, इससे युवाओं में अच्छा मैसेज जाएगा। यह सच है कि उत्तर प्रदेश की जनता पुराने चेहरों से उब चुकी है, और वह नया चेहरा देखना चाह रही है। यही कारण है कि पिछले लोकसभा चुनावों के उपरान्त वरूण गांधी एकाएक स्टार प्रचारक बनकर उभरे थे, सूबे में उनकी डिमाण्ड अन्य किसी भी नेता से बहुत ज्यादा थी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्यों के बीच चल रही चर्चाओं में भी वरूण गांधी को प्रदेश के हर इलाके में जाने की बात कही जा रही है। गोण्डा, बहराइच, आजमगढ, बनारस, सीतापुर, बस्ती, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर आदि इलाकों से तो वरूण की सभाओं की मांग जबर्दस्त तरीके से आ चुकी है। विधायक तो यहां तक कह रहे हैं कि अगर उनकी सीट बरकार रहेगी तो सिर्फ और सिर्फ वरूण गांधी की सभाओं के चलते। अनेक विधायक तो वरूण गांधी को तारणहार के तौर पर देख रहे हैं।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

सत्ता सदा ही फिसली है गुरूजी के हाथ से

सत्ता सदा ही फिसली है गुरूजी के हाथ से

राजनैतिक अस्थिरता नियति बन गई है झारखण्ड की

विवाद और सोरेन का चोली दामन का साथ

(लिमटी खरे)

झारखण्ड के मुख्यन्त्री शिबू सोरेन कहीं रहें और वे विवादित और चर्चित न हों एसा कैसे हो सकता है। सोरेन और विवाद का तो चोली दामन का साथ है। केन्द्र हो या सूबाई सरकार। जब कभी भी सोरेन की ताजपोशी की गई उसके बाद से ही उनके पदच्युत होने की खबरें फिजां में तैरती रहीं हैं। चार माह पूर्व भाजपा की मदद से सोरेन तीसरी मर्तबा झारखण्ड के मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर बैठे थे। चूंकि वे सदन (विधानसभा) के सदस्य नहीं थे, अत: नियमानुसार उन्हें छ: माह के भीतर विधायक बनना बहुत जरूरी था। सोरेन को विधायक बनने के लिए अपने ही दल के 18 सदस्यों में से एक का त्यागपत्र चाहिए था, जहां से उपचुनाव करवाकर वे सदन के सदस्य बनते। लोगों के आश्चर्य का तब ठिकाना नहीं रहा जब सोरेन संसद मेें अचानक सांसद की हैसियत से ही प्रकट हो गए। अपने ही दल में सोरेन को एक भी सीट खाली करने वाला नहीं मिला। वे जामा सीट पर किस्मत आजमाना चाहते थे, पर यहां से उनके बेटे स्वर्गीय दुगाZ की पित्न सीता विधायक हैं, और उन्होंने अपने ससुर को दो टूक शब्दों में जवाब दे दिया कि वे सीट खाली करने तैयार नहीं हैं। रही बात उनके पुत्र हेमन्त की तो दुमका सीट हेमन्त छोडने को तैयार हैं, पर सोरेन को लगता है कि अगर उन्होंने कुर्सी छोडी तो राजपाट सम्भालने के लिए हेमन्त से मुफीद और कोई नहीं होगा, सो पुत्रमोह में वे इस सीट से हेमन्त का त्यागपत्र नहीं दिलवाना चाहते हैं।

इतिहास साक्षी है कि सोरेन इसके पहले भी दो बार मुख्यमन्त्री बन चुके हैं पर निजाम की कुर्सी पर वे ज्यादा दिन काबिज नहीं रह पाए थे। 2005 में सोरेन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के सहयोग से मुख्यमन्त्री बन पाए थे, इस समय वे महज नौ दिन में ही टें बोल गए थे। इसके बाद एक बार फिर 2008 में यूपीए ने ही सहयोग कर उन्हें मुख्यमन्त्री बनाया इस बार भी महज चार महीनों का ही राजपाट उन्हें नसीब हुआ था। इस बार उन्होंने तमाड सीट से उपचुनाव लडा, पर हारने के कारण उन्हें कुर्सी त्यागनी पडी थी। सोरेन केन्द्र में कोयला मन्त्री रहे हैं, कोयला मन्त्री रहते हुए उन पर लदे प्रकरणों के चलते उनका आधा समय अदालत की दहलीज पर ही गुजर रहा है। इतना ही नहीं सोरेन पर हत्याओं के जघन्य आरोप भी हैं। उनके निजी सचिव शशिकान्त झा हत्याकाण्ड, कुडको हत्याकाण्ड, चीरूडीह नरसंहार जेसे मामलों से सोरेन उबर नहीं पाए हैं।

11 जनवरी 1944 में जन्मे सोरेन की राजनैतिक यात्रा 1971 से आरम्भ हुई। इस साल वे झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के महासचिव बने और 1980 में वे सातवीं लोकसभा के लिए चुने गए। इसके छ: साल बाद 1986 में वे झामुमो के अध्यक्ष बने और 1989, 1996, 2002, 2004 में लोकसभा सदस्य बने। मई 2004 में वे कोयला और खान मन्त्री बने और जुलाई 2004 में उन्होंने यह पद त्यागकर सूबाई राजनीति की ओर कदम बढा लिए। सोरेन 01 जनवरी से अपने 61 वें जन्म दिन 11 जनवरी 2005 तक झारखण्ड के सीएम बने। इसके बाद वे 29 जनवरी 06 से 28 नवंबर 2006 तक कोयला मन्त्री रहे। 2009 में एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद गुरूजी 30 दिसम्बर 2009 को झारखण्ड के मुख्यमन्त्री बने।

गुरूजी की चालों को समझ पाना असान नहीं है। झारखण्ड में सोरेन भाजपा के पेरोल पर ही टिके हुए हैं। बावजूद इसके लोकसभा में कटौती के प्रस्ताव पर भाजपा के खिलाफ ही अपना वोट डालने के बाद सोरेन ने रात का भोजन भाजपा के निजाम नितिन गडकरी के घर पर ही किया। सोरेन के लिए मेजबानी करने वाले नितिन गडकरी को जब पता चला कि गुरूजी ने भाजपा की पीठ पर ही खंजर घोंप दिया है, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन ही निकल गई।

गठबंधन धर्म से हटकर अपने निहित स्वार्थों की बलिवेदी पर शिबू सोरेन ने झारखण्ड जैसे छोटे राज्य में राजनैतिक अस्थिरता पैदा कर दी है। भाजपा के समर्थन वापस लेने से अब जेवीएम के बाबूलाल मराण्डी के साथ मिलकर सरकार बनाने के रास्ते साफ नहीं दिखाई पड रहे हैं। कांग्रेस के मैनेजरों ने अगर उन्हें तैयार भी कर लिया तो भी यह गठबंधन बहुत ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा। समूचा घटनाक्रम गुरूजी की राजनैतिक महात्वाकांक्षा की ओर ही इशारा कर रहा है। गुरूजी चाहते हैं कि वे अपनी राजनैतिक विरासत को अपने पुत्र हेमन्त के हाथों सौंप सकें। इसके लिए वे जमीन तैयार करने में जुटे हुए हैं। उन पर लदे मुकदमों के बोझ से उनकी कमर टूटने की कगार पर है। अगर वे संसद में कांग्रेस का साथ न देते तो जांच एजेंसियों की धार पैनी होना स्वाभाविक ही था। अब सोरेन को जांच में कुछ हद तक राहत मिलने की उम्मीद है। यह है भारत गणराज्य का इक्कीसवीं सदी का प्रजातन्त्र, जिसमें सरकारी एजेंसियों को देश के निजाम अपने नफा नुकसान के हिसाब से इस्तेमाल करने से नहीं चूकते हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि नए राज्य के अस्तित्व में आने के दस सालों बाद भी सूबे के मतदाता किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत देने को तैयार नहीं हैं। झारखण्ड में उपजी परिस्थितियों में अब राष्ट्रपति शासन एक विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आया है। केन्द्र सरकार के लिए यह विकल्प काफी हद तक सरल होगा, क्योंकि इसमें परोक्ष तौर पर शासन की बागडोर कांग्रेस के हाथ में होगी। इसके अलावा कांग्रेस द्वारा मरांउी और सोरेन के साथ गठबंधन कर सरकार चलाई जा सकती है। इसमें सोरेन को केन्द्र में मन्त्रीपद तो मराण्डी को सीएम और हेमन्त सोरेन को उपमुख्यमन्त्री पद से नवाजना विकल्प है। कुल मिलाकर हर पहलू से देखने से यही प्रतीत होता है कि आने वाले दिनों में सोरेन की राह बहुत आसान तो प्रतीत नहीं होती है।

वजीरे आजम पेश करेंगे रिपोर्ट कार्ड


वजीरे आजम पेश करेंगे रिपोर्ट कार्ड

यूपीए 2 की पहली सालगिरह 22 को

पीएमओ कर रहा जोर शोर से तैयारियां

अंग्रेजी में होगा मन्त्रालयों का लेखा जोखा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 29 अप्रेल। गांधी नेहरू परिवार से इतर पहले कांग्रेसी प्रधानमन्त्री होने का खिताब पाने वाले डॉ.मनमोहन सिंह जिन्होंने लगातार दूसरी बार 7 रेसकोर्स रोड (प्रधानमन्त्री का सरकारी आवास) पर अपना कब्जा बरकरार रखा है, के द्वारा अब अपनी दूसरी पारी के पहले साल में कुछ नया करने की ठानी है। 22 मई को एक साल का कामकाज पूरा होने पर प्रधानमन्त्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा सरकार का रिपोर्ट कार्ड जनता के समक्ष रखा जा सकता है, ताकि जनता फैसला कर सके कि यह सरकार काम करने वाली सरकार है, न कि बतोले बाजी में वक्त जाया करने वाली।

पीएमओ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि प्रधानमन्त्री के प्रमुख सचिव टी.के.ए.नायर द्वारा अनेक मन्त्रियों और मन्त्रालय को पत्र लिखकर समय सीमा (टाईम लिमिट) में उनके मन्त्रालयों की उपलब्धियां भेजने के लिए खत लिख चुके हैं। सूत्रों के अनुसार भारत गणराज्य की भाषा हिन्दी है, पर यह रिपोर्ट कार्ड अंग्रेजी में ``रिपोर्ट टू द प्यूपिल`` के नाम से जारी किया जाएगा। कहा जा रहा है कि जनता के बजाए इसे एलीट क्लास के लोगों को समझाने के लिए जारी की जा रही है। आखिर सरकार चलती भी तो उन्हीं के इशारों पर ही है।

भले ही मन्त्रालयों पर काबिज मन्त्री भ्रष्टाचार के तराने गा रहे हों, आसमान छूती मंहगाई के चलते जनता की कमर टूटी हो, शशि थुरूर के कारण कांग्रेस की भद्द पिट रही हो पर प्रधानमन्त्री चाहते हैं कि उनकी सरकार का उजला पक्ष जनता के सामने आए। वैसे इस प्रतिवेदन में महिला आरक्षण बिल, शिक्षा का अधिकार, फुड सिक्यूरिटी बिल को प्रमुखता के साथ शामिल किए जाने की खबर है। गौरतलब है कि प्रधानमन्त्री ने शिक्षा के अधिकार के लागू होने वाले दिन प्रधानमन्त्री ने लीक से हटकर राष्ट्र को संबोधित किया था।

प्रधानमन्त्री की मंशा के चलते अनेक मन्त्रियों की सांसे थम गई हैं। दूसरी पारी में नए विभागों से सजे धजे मन्त्रियों द्वारा अपना पूरा समय मौज मस्ती और पुरानी रंजिशें निकालने में गंवा दिया है, अत: उनके पास अब नया करने को कुछ खास नहीं है, जिसे वे अपनी उपलब्धि के बतौर बता सकें। कहा जा रहा है कि विभाग की सूरत और सीरत को रंग रोगन कर संवारने के लिए मन्त्रियों ने कुछ प्रोफेशनल्स की मदद भी ली जा रही है, ताकि पुरानी उपलब्धियों को नए मन्त्रियों के खाते में डालकर अपनी जान छुडाई जा सके।

आडवाणी की ओर से आंखें फेरी संघ ने

आडवाणी की ओर से आंखें फेरी संघ ने
 
गडकरी भी नहीं दे रहे आडवाणी को ज्यादा भाव
 
सिंघल भी दिखा चुके हैं तीखे तेवर
 
संघ चाहता है कमल एक बार फिर देश में छा जाए
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 29 अप्रेल। मुरझाए कमल के फूल की पंखुडियों को एक बार फिर नई उर्जा देकर खडा करने की कोशिश में लगे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अब अपना रोड मेप तय कर लिया है। पिछले कुछ सालों में हुई गिल्तयों पर मनन करने के बाद संघ ने अब आत्मकेन्द्रित घाघ नेताओं के पर कतरने की कार्ययोजना बना ली है। लगता है कि इस मुहिम में सबसे पहले राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की लाटरी लगी है, वे आजकल संघ के निशाने पर बताए जा रहे हैं।
 
संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि अटल बिहारी बाजपेयी के सक्रिय राजनीति से सन्यास लेते ही पार्टी के स्वयंभू नए खिवैया बनकर उभरे एल.के.आडवाणी ने खुद को प्रधानमन्त्री बनवाने के लिए पार्टी का बंटाधार करने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। आडवाणी की कीर्तन मण्डली ने उन्हीं को उपकृत किया था, जो आडवाणी की चरण वन्दना में विश्वास रखते थे, एसी परिस्थितियों में पार्टी के अनेक कुशल नेताओं ने अपने आप को एक दायरे में समेटकर रख लिया था।
 
संघ ने आडवाणी के पर करतने के उपक्रम में उन नेताओं को एक छतरी के नीचे लाना आरम्भ कर दिया है, जो कभी आडवाणी के कट्टर विरोधी रहे हैं। सूत्रों की माने तो संघ का शीर्ष नेतृत्व इन दिनों उमा भारती, गोविन्दाचार्य, सुब्रहामण्यम स्वामी, अशोक सिंघल, मदन लाल खुराना, कल्याण सिंह, यशवन्त सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेताओं से सतत संपर्क बनाए हुए है। इन्ही के साथ रायशुमारी कर संघ अपने अगले कदम तय कर रहा है। संघ के नेतृत्व की इच्छा है कि कालराज मिश्र जैसे सीजन्ड नेताओं को देश में कमल को खिलाने के लिए एक बार फिर जवाबदारी दी जा सकती है। सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि मोहन भागवत सहित भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने आडवाणी को हाशिए में ढकेलने के अभियान की कमान सम्भाल रखी है।
 
भाजपा से बिछुडे कल्याण सिंह और उमा भारती अब गोविन्दाचार्य के अगले कदम की बाट जोह रहे हैं। कल्याण सिंह की घर वापसी के लिए भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी ने कल्याण पुत्र राजवीर को दाना डाला हुआ है। हरिद्वार में सन्तों के बीच विहिप के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल भी आडवाणी के खिलाफ जहर बुझे तीर चला चुके हैं। बकौल सिंघल आडवाणी की रथ यात्रा के कारण मन्दिर नहीं बन पाया था। सिंघल ने तो आडवाणी को आडे हाथों लेते हुए यह तक कह दिया कि उनकी रथयात्रा वोट बैंक के लिए थी। कहा जा रहा है कि गडकरी और संघ का शीर्ष नेतृत्व मिलकर कुछ नए एक्सपेरीमेंट करने की तैयारी में हैं। इस तरह के प्रयोग एल.के.आडवाणी, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू, अरूण जेतली आदि को शायद ही रास आएं।

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

राजधानी की फिजां में जहर!

राजधानी की फिजां में जहर!

साढे तीन सौ गुना ज्यादा हैं सूक्ष्म कण
 
श्वसन तन्त्र, किडनी, लीवर की बज रही है बारह
 
कामन वेल्थ के नाम पर शीला सरकार का नंगा नाच
 
लोगों के स्वास्थ्य की कीमत पर कैसी तैयारी
 
किसने दिया लोगों के स्वास्थ्य के साथ खेलने का लाईसेंस
 

 
(लिमटी खरे)

राष्ट्रमण्डल खेल की तैयारियों में विलंब को लेकर सन्देह के दायरे में आई शीला सरकार के हाथ पैर फूलना स्वाभाविक ही है। तीन चार साल तक सोने के बाद जब समय कम बचा तब कम समय में युद्ध स्तर पर कार्यवाही को अंजाम देने के लिए काम कराया जा रहा है, जिससे दिल्लीवासियों का दम फूलने लगा है। समूची दिल्ली का सीना खुदा पडा है। जहां तहां तोडफोड और गेन्ती फावडे, जेसीवी मशीन का शोर सुनाई पड रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि स्वास, किडनी और लीवर के रोगियों की तादाद में आने वाले समय में तेजी से इजाफा हो सकता है।
 
प्रदूषण के लिए दिल्ली का नाम सबसे उपर ही आता है। एक समय में डीजल पेट्रोल से चलने वाले वाहनों ने लोगों का जीना दुश्वार कर रखा था। दिल्ली में सडक किनारे लगे पेड पौधे तक काले पड गए थे। न्यायालय के आदेश के बाद दिल्ली में डीजल पेट्रोल के व्यवसायिक वाहनों को सीएनजी के माध्यम से चलाने का निर्णय लिया गया। उस समय भी खासी हायतौबा मची थी। शनै: शनै: मामला पटरी पर आया और दिल्ली में प्रदूषण का स्तर कुछ हद तक काबू में आ गया।
 
कामन वेल्थ गेम्स इसी साल के अन्त में होने हैं। 2006 में इसकी तैयारियां आरम्भ कर दी गईं थीं। विडम्बना देखिए कि पांच सालों तक दिल्ली की गद्दी पर राज करने वाली शीला दीक्षित के नेतृत्व वाली सरकार सोती रही और जब अन्तिम समय आया तब जागकर इसकी तैयारियों के लिए कमर कस रही है। आज हालात यह है कि दिल्ली के किसी भी इलाके में अगर साफ प्लेट रख दी जाए तो बमुश्किल घंटे भर के अन्दर ही उस पर गर्त चढी हुई मिलेगी।
 
दिल्ली के दिल कहलाने वाले कनाट सर्कस (कनाट प्लेस) में पिछले साल रंगरोगन और निखारने का काम आरम्भ हुआ था। साल भर से यहां खुदाई और तोडफोड का काम चल रहा है। समय की कमी के चलते कनाट प्लेस के तीनों सिर्कल का काम एक साथ ही आरम्भ किया गया था। इससे लोगों को बेहद असुविधा का सामना करना पड रहा है। यहां चलने वाले निर्माण कार्य के चलते कनाट प्लेस के आउटर सिर्कल में वाहन रेंगते ही नज़र आते हैं। इन वाहनों से निकलने वाला धुंआ भी लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नहीं है।
 
दिल्ली के दिल में वायू प्रदूषण के चलते नई दिल्ली महानगर पलिका निगम ने इटली की एक कंपनी के सहयोग से यहां सिस्टम लाईफ (सीआईटीटीए) नामक मशीन संस्थापित की। यह मशीन वातावरण के वायू प्रदूषण को खींचकर वातावरण में स्वच्छ हवा को छोडती है। कहा जाता है कि उक्त मशीन 95 फीसदी तक प्रदूषण मुक्त कर देती है। इस साल 06 मार्च को लगी इस मशीन के बारे में कहा जाता है कि यह मशीन चालीस एकड क्षेत्र की आबोहवा को साफ कर देती है।
 
27 अप्रेल को जब इटली की कंपनी ने मशीन में एकत्र हुए जहरीले और हानिकारक तत्वों के बारे में मोडेना विश्वविद्यालय इटली में हुए शोध के परिणामों को उजागर किया तो सभी की सांसे थम गईं। प्रतिवेदन बताता है कि कनाट सर्कस की आबोहवा में पाए गए तत्व इंसान के लिए बहुत ही ज्यादा घातक हैं। पीएम एक, दो दशमलव पांच और दस की श्रेणी में विभाजित इन तत्वों में पीएम एक सबसे अधिक नुकसानदेह बताया जाता है। बताते हैं कि सूक्ष्म कण (पीएम एक) की अधिकतम मात्रा 60 होनी चाहिए जो कनाट प्लेस में बीस हजार है।
 
जानकार चिकित्सकों का कहना है कि इतनी अधिक मात्रा में सूक्ष्म कण के पाए जाने से इंसान के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडने से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह के कण सीधे सीधे स्वशन तन्त्र, तन्त्रिका तन्त्र, लीवर, फेंफडे, दिल, किडनी पर सीधा हमला करते हैं। इससे आम आदमी को लीवर, रक्त और फैंफडों के कैंसर के होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। सबसे ज्यादा फजीहत तो यहां काम करने वाले श्रमिकों की है, जिन्हें बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के सीधे मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। इसके अलावा कनाट प्लेस और आसपास काम करने वाले कर्मचारियों के साथ ही साथ यहां के दुकानदार मुनाफे में ही इस तरह की संगीन बीमारियों को गले लगाने पर मजबूर हैं। कमोबेश यही आलम समूची दिल्ली का है।
 
हमारा कहना महज इतना ही है कि जब समय था तब अगर मन्थर गति से ही सही तैयारियां की जातीं तो आज सरकार को आनन फानन में दिल्ली को एक साथ नहीं खोदना पडता। दिल्लीवासियों के स्वास्थ्य की कीमत पर राष्ट्रमण्डल खेल करान कहां की समझदारी है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि आखिर दिल्ली और केन्द्र सरकार को दिल्ली के निवासियों और बाहर से आने जाने वाले लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड करने का लाईसेंस किसने दिया। वह तो भला हो सिस्टम लाईफ मशीन का जिसने इस खतरे से आगाह कर दिया, वरना सरकार तो लोगों को बीमार बनाने का पुख्ता इन्तजाम कर चुकी थी। वैसे मशीन के चेताने से भी भला क्या होने वाला है, सरकार को अपना काम करना है, ठेकेदार को अपना, पर सदा की तरह पिसना तो आम जनता को ही है।

अन्तत: मध्य प्रदेश का ताज प्रभात झा को


अन्तत: मध्य प्रदेश का ताज प्रभात झा को
 
उमाश्री मामले के चलते शिवराज ने दी अपनी सहमति
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 28 अप्रेल। लंबी जद्दोजहद के बाद अन्तत: मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष के लिए प्रभात झा का नाम तय हो ही गया है। 02 मई को प्रदेश के प्रभारी कालराज मिश्र देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में उनके नाम की औपचारिक घोषणा करेंगे। मध्य प्रदेश में लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने वाले प्रभात झा मूलत: पत्रकार हैं, और उन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों के लिए काम भी किया है।
 
भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक मध्य प्रदेश संगठन के लिए अध्यक्ष का चुनाव आसान नहीं था। प्रदेश में अस्तित्व वाले अनेक गुटों द्वारा अपने अपने पसन्द के नेता का नाम इसके लिए उछाला जा रहा था। जैसे ही प्रभात झा का नाम सामने आया वैसे ही उनके बिहार मूल के होने की बात राजनैतिक फिजां में तैरा दी गई। सूत्रों ने बताया कि संघ और भाजपा नेतृत्व को बताया गया कि भले ही प्रभात झा बिहार के रहने वाले हों पर उनकी कर्मभूमि तो मध्य प्रदेश ही रही है।
 
प्रभात झा का नाम सामने आते ही एक गुट द्वारा इन्दौर की संसद सदस्य सुमित्रा महाजन का नाम जोर शोर से उछाला जाने लगा। तब लगने लगा था कि महिलाओं को प्रसन्न करने तेन्तीस फीसदी आरक्षण की हिमायत करने वाली भाजपा द्वारा कहीं प्रदेश के निजाम के बतौर सुमित्रा महाजन को न बिठा दिया जाए। इसके अलावा इन्दौर के ही दूसरे क्षत्रप और मध्य प्रदेश के एक वजनदार गायक मन्त्री कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ सामने आए मामलों से उन्हें कमजोर करने के लिए भी सुमित्रा महाजन की ताजपोशी की खबरें चल पडी थीं।
 
सूत्रों ने बताया कि उमा भारती के फेक्टर के चलते शिवराज सिंह चौहान बुरी तरह खौफजदा थे, और वे चाहते थे कि संगठन की बागडोर उनके किसी पिट्ठू को ही सौंपी जाए। उन्होंने प्रभात झा को अध्यक्ष की कुर्सी से दूर रखने के लिए एडी चोटी लगा दी थी। सूत्रों के अनुसार जब पार्टी नेतृत्व द्वारा शिवराज सिंह चौहान को भरोसा दिलाया गया कि प्रभात झा के अध्यक्ष बनने से मध्य प्रदेश में संगठन को काफी लाभ पहुंचेगा तब जाकर उन्होंने अपनी सहमति जताई। वैसे भी संघ के सह सरकार्यवाहक सुरेश सोनी ने प्रभात झा को अध्यक्ष बनने के लिए अभैद्य दीवार का काम ही किया है।
प्रभात झा के करीबी बताते हैं कि राजमाता सिंधिया के गृह जिले ग्वालियर में प्रभात झा द्वारा स्वदेश अखबार में काम करने के दौरान ही संध की रीतियों नीतियों से प्रभावित होकर वे बरास्ता संघ भाजपा में सक्रिय भूमिका में आए। इसके बाद उनकी कर्मभूमि चंबल से हटकर राजधानी भोपाल हो गई, जहां वे संवाद और संपर्क प्रमुख के बतौर काम करने लगे। राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने के उपरान्त उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सचिव बना दिया गया। प्रभात झा को मध्य प्रदेश से राज्य सभा में भेजा गया है। सूत्रों का कहना है कि 02 मई को उनके नाम की औपचारिक घोषणा के बाद वे किसी भी दिन अपना कार्यभार ग्रहण कर लेंगे।