सोमवार, 16 अगस्त 2010

फोरलेन का सच ----- 09

सद्भाव और मीनाक्षी ने बिगाड़ा है सबसे अधिक पर्यावरण

कितने झाड़ कटे कितने लगे किसी को नहीं पता

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय क्यों है सड़क के ठेकेदारों पर मेहरबान?

पहलें लगें फिर काटे जाने चाहिए थे पेड़

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 16 अगस्त। वन्य जीवों एवं पर्यावरण बचाने की दुहाई देकर केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी उत्तर दक्षिण फोरलेन सड़क गलियारा परियोजना में पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान यहां सड़क निर्माण का काम करने वाली मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी और सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी ने पहुंचाया है। सड़क निर्माण के आरंभ होते ही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई थी, जिनके एवज में कहां किस प्रजाति के पौधों को लगाया गया है, इस बारे मंे वन विभाग मौन साधे हुए है।

अमूमन जब भी अत्यावश्यक कार्यों के लिए पेड़ों की कटाई की सरकारी अनुमति दी जाती है, तो बाकायदा एक पेड़ काटने के एवज में दस पौधांे को लगाया जाता है। आदि अनादि काल से अब तक सड़कों के किनारे छायादार पेड़ इसलिए लगाए जाते थे ताकि राहगीरों को इनके नीचे बैठकर कुछ देर आराम मिल जाए। मध्य प्रदेश सरकार के लोक कर्म विभाग द्वारा पूर्व में सड़क किनारे खड़े पेड़ों पर चूने से सफेद घेरा भी बनाया जाता था, ताकि ये सरकारी संपत्ति प्रदर्शित होने के साथ ही साथ रात में वाहन चालकों को नजर भी आ सकें। कालांतर में यह चूने से घेरा बनाने की प्रक्रिया अपने आप ही विलुप्त हो गई।

आरोपित है कि कुछ जनसेवकों ने सिवनी जिले को स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे से मिटाने के षणयंत्र का तना बाना वर्ष 2008 के बीतते बीतते बुना गया। जाने अनजाने सिवनी के स्वयंभू नेता भी इस षणयंत्र का हिस्सा बनते चले गए। इस सड़क का काम किसके मौखिक या लिखित आदेश से रूका है, इस बारे में तरह तरह की किंवदंतियां सिवनी की फिजां में तैर रही हैं। कोई पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा के सांसद और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को दोषी मानता है, कोई केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को तो कोई मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को। आरोप मढ़ने वालों ने आज तक कोई भी तथ्यपरख बात जनता जनार्दन के सामने नहीं रखी है कि फलां व्यक्ति के मौखिक या लिखित आदेश से सड़क के निर्माण का काम रोका गया है, और न ही किसी स्वयंभू नेता ने ही सड़क निर्माण करा रही सद्भाव या मीनाक्षी कंपनियों के नुमाईंदों से जाकर पूछने की जहमत ही उठाई है।

बहरहाल सिवनी जिले में लखनादौन तहसील में नरसिंहपुर की सीमा से जिला मुख्यालय सिवनी तक के सड़क को फोरलेन करने का काम मीनाक्षी तो दक्षिणी ओर जिला मुख्यालय से खवासा तक का सड़क निर्माण का काम सद्भाव नामक कंपनी करवा रही है। इन दोनों ही कंपनियों द्वारा सड़क निर्माण के लिए पेड़ों की तबियत से कटाई की गई। यह काम इतनी दु्रत गति से किया गया कि सिवनी वासी समझ ही नहीं पाए कि आखिर किस प्रजाति के कितने वर्ष आयु के कितने कितने वृक्ष कब कब काट दिए गए।

इतना ही नहीं इन वृक्षों के एवज में किस किस प्रजाति के कितने कितने पौधांे को और कहां कहां रोपा गया है, इस बारे में भी सिवनी के नागरिकों को कुछ जानकारी नहीं है। देखा जाए तो तीन चार सालों में इन पेड़ों को काटे जाने से जो पर्यावरण प्रभावित हुआ है, उस बारे में न तो वन विभाग को ही चिंता है और न ही सड़क बचाने आगे आए ठेकेदारों को।

जानकारों का कहना है कि पेड़ काटने के पूर्व ही अगर फोरलेन के दोनों ओर सड़क के किनारे पौधों को लगा दिया गया होता तो सड़क के निर्माण होते तक इनकी बेहतर देखरेख सड़क निर्माण कराने वाली कंपनी ही कर देती। वस्तुतः सड़क के बीच में अवश्य ही इन कंपनियों ने कुछ सजावटी फूल वाले पौधे लगाए गए हैं, जो पुराने दोहे ‘‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर! पंछी को छाया नहीं फल लागत अतिदूर!!‘‘ की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।

अपेक्षा व्यक्त की जा रही है कि पर्यावरण बिगाड़ने में महती भागीदारी निभाने वाली सिवनी जिले में एनएचएआई के अधीन फोरलेन का निर्माण करा रही सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी और मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी पर भारी भरकम जुर्माना किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में पेड़ कटाई से पूर्व ही पौधों को लगा दिया जाए और पर्यावरण को बचाया जा सके।

गांधी से उकताती कांग्रेस

गांधी दर्शन से उबने लगी है कांग्रेस

नेहरू गांधी के नाम पर सत्ता हासिल करने वाली केंद्र सरकार भूल गई गांधी को

इस बार केंद्र सरकार नहीं देगी खादी पर विशेष छूट

गांधी जयंती पर मिलने वाली 20 फीसदी छूट इस साल से बंद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 16 अगस्त। समूचा देश मोहन दास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता कहकर ही संबांधित करता है। बापू के सादा जीवन उच्च विचारों के सामने उन ब्रितानी आताताईयों ने भी घुटने टेक दिए थे, जिन्होंने देश पर डेढ़ सौ साल राज किया। उसी बापू के नाम को भुनाकर आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने अब निर्णय लिया है कि गांधी जयंती पर खादी पर मिलने वाली 20 फीसदी छूट को इस साल से समाप्त कर दिया जाए।

महात्मा गांधी ने सदा ही खादी को प्रोत्साहित किया था। अंग्रेजों के कपड़ों का बहिष्कार भी बापू के खादी के आवहान पर ही किया गया था। आजादी के मतवालों ने खादी की महिमा का जमकर बखान भी किया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ही कहा था खादी साधारण वस्त्र नहीं है, खादी एक विचार है, और जिसका चरखा स्वदेशीकरण का प्रतीक है। गांधी जयंती पर खादी पर मिलने वाली छूट आरंभ से अब तक निर्बाध रूप से मिलती आई है।

खादी पर केंद्र सरकार की छूट के अलावा राज्यों की सरकारों द्वारा भी अपने अपने हिसाब से गांधी जयंती पर खादी की खरीद पर छूट दी जाती रही है। प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि 02 अक्टूबर से 108 दिनों तक खादी की खरीद पर केंद्र सरकार द्वारा हर साल 20 फीसदी छूट दी जाती रही है, किन्तु इस छूट को बंद करने का प्रस्ताव भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के कार्यकाल में लाया गया था।

सूत्रों का कहना है कि भाजपा ने इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में इसलिए डाल दिया था क्योंकि भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप पहले से ही है। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार जिस प्रस्ताव को अमली जामा न पहना सकी उसे महात्मा गांधी के नाम पर सियासत हासिल करने वाली कांग्रेसनीत सरकार ने साकार करने का दुस्साहस किया है।

बताया जाता है कि देश भर में खादी कमीशन से मान्यता प्राप्त 1950 खादी संस्थान वर्तमान में अस्तित्व में हैं। इन संस्थानों मे वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या 55 हजार से अधिक है। कांग्रेसनीत संप्रग सरकार खादी पर छूट को वापस लेकर देश के लगभग एक लाख बुनकर परिवारों के पेट पर सीधे सीधे लात मारने का काम ही करती नजर आ रही है।

खादी के समर्थक माने जाने वाले राजनेताओं का पहनावा भी आजकल बदला बदला ही दिख रहा है। आजकल के नेता खादी के कुर्ता पायजामा के स्थान पर टेरीकाट, जीन्स, कार्टराईज के पतलून कमीज में ही दिखाई पड़ते हैं। वैसे यह भी सच है कि आजादी, स्वदेशी, खादी आदि के मायने आज की पीढी की नजरों में बेमानी ही हो गए हैं। जनसेवक और नौकरशाह भी अब खादी से उबते ही दिख रहे हैं। संभवतः यही कारण है कि केंद्र सरकार ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्म दिवस 02 अक्टूबर से मिलने वाली खादी पर छूट को समाप्त ही कर दिया है।

650वीं पोस्‍ट

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

राहुल शरणम जाने की तैयारी में सुरेश कलमाड़ी
जनता के हजारों करोड़ रूपए हवा में उड़ाने के बाद अब कामन वेल्थ गेम्स आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने कांग्रेस के अंदर अंदर ही मची खींचतान को रोकने के लिए कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। कलमाड़ी चाहते हैं कि राहुल गांधी इस आयोजन में अपनी सक्रिय भूमिका का इजहार कर दें तो कांग्रेस के अंदर इस परियोजना को लेकर भ्रष्टाचार का जो लावा फट रहा है, उसे काफी हद तक रोका जा सकता है। सुरेश कलमाड़ी ने राजधानी दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर के बाजू में निर्माणाधीन खेल गांव के उद्घाटन के लिए राहुल गांधी पर दबाव बनाना आरंभ कर दिया है। वैसे भी यह खेल गांव कामन वेल्थ गेम्स की सबसे बड़ी और माहत्वाकांक्षी परियोजना है। इस खेल गांव में अगले महीने से मेहमान आकर रूकना आरंभ कर देंगे। बताते हैं कि राहुल गांधी को तैयार करने की गरज से कलमाड़ी कई दफा कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल की चौखट को चूमकर आ चुके हैं। वैसे अगर राहुल गांधी इस अयोजन का उद्घाटन करने अपनी हरी झंडी दे देते हैं तो सुरेश कलमाड़ी की मिट्टी खराब होना कुछ हद तक बच सकता है, किन्तु राहुल अभी वरिष्ठ की श्रेणी में नहीं आए हैं तो अगर वे इसका उद्घाटन करते हैं तो एक तरह से वे एक नया विवाद अपने सर ले लेंगे।

आखिर वंृदा को अपत्ति क्या है?
सर्वहारा वर्ग की आवाज बने हुए समझे जाने वाम दलों में आए दिन विलासिता से लवरेज बातें सुनने को मिला करती हैं। कभी पूर्व संसद सुरजीत के आवास पर लाखों का भोज सुर्खियां बनता है तो कभी वृंदा कारात के खिलाफ विश्व स्वास्थ्य संगठन का विरोध। सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम में 400 रूपए से अधिक मूल्य के हिब अर्थात मेनिगजाईटिस के टीके को शामिल कराने की जुगत में लगी है सरकार। सरकार चाहती है कि मल्टीनेशनल कंपनी के इस मंहगे उत्पाद को देश के गरीबों को निशुल्क लगाया जाए। कारात ने न केवल सरकार को नसीहत ही दी है, वरन कहा है कि इस तरह के टीके बच्चों की जान भी ले सकते हैं। विदेशों में इस तरह के टीके लगाए जा रहे हैं और बच्चे आज भी स्वस्थ्य ही हैं। गौरतबल है कि अमीर और संपन्न लोग बाजार से खरीदकर यह टीका अपने गुदड़ी के लालों को लगवा रहे हैं, पर जब गरीबोें को टीका लगवाने की बात आई तो वाम नेता माकपा की वृंदा कारात ने इसमें फच्चर फंसा दिया। लगता है वृंदा कारात गरीब विरोधी हैं!

कम नहीं हुआ थरूर का जलजला
भारत सरकार ने बड़बोले और सोशल नेटवर्किंग वेव साईट ‘‘ट्विटर‘‘ को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानने वाले शशि थरूर को भले ही विदेश राज्य मंत्री के पद से हटा दिया हो, पर उनका जलजला आज भी कायम है। कभी हवाई जहाज की इकानामी क्लास को मवेशी का बाड़ा कहने वाले शशि थरूर ट्विटर पर अपना जलवा बिखेर ही रहे हैं। 48 लाख फालोवर के साथ दुनिया के चौधरी अमरिका के प्रथम नागरिक बराक ओबामा ट्विटर के शीर्ष पर जमे हुए हैं। भारत के शशि थरूर इस वेव साईट में पांचवी पायदान पर हैं। थरूर की लोकप्रियता से साबित हो रहा है कि भले ही उनके बड़बोलेपन से भारत पर वर्तमान में शासन कर रही कांग्रेस के आला नेता परेशान हों, पर वैश्विक स्तर पर उन्हें अपनी मुहिम में भारी समर्थन हासिल हो रहा है। थरूर के पास ट्विटर पर 8 लाख 32 हजार 889 प्रशंसकों की खासी फौज जो मौजूद है।

गडकरी या सुदर्शन बताएं कांग्रेस की बेटी कौन है?
भाजपा के निजाम नितिन गड़करी ने अफजल गुरू को कांग्रेस का दमाद बताकर एक बहस को आरंभ किया था, वह बहस अभी थमी नहीं कि अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व प्रमुख के.एस.सुदर्शन ने मुस्लिम तुष्टीकरण पर कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा है कि क्या अल्पसंख्यक कांग्रेस के दमाद हैं? गौरतलब है कि कुछ दिनों पूर्व भारत गणराज्य के वजीरे आजम ने अपने एक बयान में कहा था कि अल्पसंख्यकों का देश के संसाधनों पर पहला हक है। सुदर्शन का कहना सही है कि देश संसाधनो ंपर राष्ट्र के हर नागरिक का समान हक है। सवाल यह आज भी अनुत्तरित है कि सुदर्शन और गड़करी दोनों ही किसी न किसी को कांग्रेस का कथित तौर पर ‘दामाद‘ बताया जा रहा है, पर कोई यह बताने को तैयार नहीं है कि आखिर कौन सी बेटी है कांग्रेस की जो इनसे ब्याही गई हो!

बाबूजी को बेलने पड रहे हैं लल्ला के लिए पापड़
काश्मीर में चल रही उठापटक को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पिता फारूख अब्दुल्ला बेहद परेशान हैं, वे हर कीमत पर अपने जिगर के टुकड़े को सेफ करने का प्रयास कर रहे हैं। काश्मीर मुद्दे पर प्रधानमंत्री के घर पर होने वाली बैठक को प्रचारित तो किया गया था कि पीएमओ ने इस बैठक को बुलाया है, पर वास्तविकता यह थी कि यह बैठक नहीं वरन उमर अबदुल्ला अपने साथ सर्वदलीय प्रतिनिधि मण्डल लेकर आने वाले थे। इस बैठक का भाजपा ने बहिष्कार कर दिया था। बाद में फारूख ने सुषमा स्वराज, एल.के.आड़वाणी, से संपर्क कर जोड़ तोड़ की राजनीत कर भाजपा के नेताओं को डेढ बजे की फ्लाईट से दिल्ली बुलवा ही लिया। सुषमा का कहना था कि अगर गृहमंत्री काश्मीर के भाजपा नेताओं को फोन करें तब वे आएंगे। सदन में लंबी मशक्कत के बाद चिदम्बरम ने सदन से बाहर जाकर भाजपा नेताओं को फोन पर बुलावा भेजा। इसकी पुष्टि फारूख ने जाकर सुषमा से की तब जाकर सुषमा ने काश्मीर भाजपाध्यक्ष शमशेर सिंह और विधायक दल के नेता चमन लाल गुप्ता को फोन कर डेढ़ बजे की उड़ान से दिल्ली आने का फरमान सुनाया। जब सारी बातें बनी तब जाकर लल्ला की जान बची और बाबू जी ने राहत की सांसे लीं।

सुषमा और राजनाथ की बैसाखी चाह रहे हैं मोदी
सोहराबुद्दीन मामले में जैसे जैसे सीबीआई का शिकंजा कसता जा रहा है, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की मुश्किलों का पिटारा भारी होता जा रहा है। गुजरात में कांग्रेस और सीबीआई के खिलाफ माहौल बनाने के लिए अब मोदी अपने घुर विरोधियों के सामने नतमस्तक नजर आ रहे हैं। भाजपा के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात में जिले जिले में जनसभाएं करने के लिए केंद्रीय नेताओं का सहयोग मांगा है। भाजपा के एक पदाधिकारी ने नाम न उजगर करने की शर्त पर कहा कि उन्हें घोर आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि नरेंद्र मोदी ने पूर्व भाजपाध्यक्ष राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज को गुजरात आने का न्योता दिया है, जबकि अब तक इनके बीच आंकड़ा छत्तीस का ही रहा है। मोदी के अनुरोध को भाजपा के नेतृत्व ने स्वीकार कर लिया है। जल्द ही गड़करी, राजनाथ, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू अरूण जेतली, मुख्तार अब्बास नकवी, मुरली मनोहर जोशी, रविशंकर प्रसाद, शाहनवाज हुसेन, अनंत कुमार आदि नेता गुजरात कूच करने वाले हैं।

बनिया पार्टी को आई किसानों की सुध
ब्राम्हण बनिया पार्टी का तगमा लगाए भाजपा ने अब देश में अर्थ व्यवस्था की रीढ़ किसान पर नजरें इनायत करने का फैसला लिया है। पिछले कई सालों से भाजपा के थिंक टैंक इस बात को लेकर परेशान हैं कि आखिर क्या वजह है कि भाजपा के परंपरागत वोट बेंक में संेध लगती जा रही है। भाजपा ने अब किसानों की ओर अपना रूख किया है। भाजपा के आला सूत्रों का कहना है कि जल्द ही सोची समझी रणनीति के तहत भाजपा किसानों को रिझाने का प्रयास करेगी। पिछले दिनों हुई भाजपा की एक विशेष बैठक में किसान मोर्चा के अध्यक्ष ओमप्रकाश घनकड़, राजनाथ सिंह सहित अनेक नेताओं ने इस मामले मंे विचार किया है। जल्द ही मंडी में मंडी दर्शन अभियान के जरिए भाजपा पदाधिकारी किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलवाने नजर आएंगे। भाजपा के आराम तलब पदाधिकारियों को किसानों के बीच जाने की बात सोचकर ही पसीना आने लगा है।

मेडीकल टूरिज्म के निशाने पर सुबर बग
कल तक दुनिया के चौधरी अमरिका में इलाज की सबसे अच्छी सुविधाएं मुहैया होने का दावा किया जाता रहा है, किन्तु आज भारत खुद इस मामले मंे आत्मनिर्भर स्थिति में खडा नजर आ रहा है। हाल ही में ‘न्यू डेल्ी मेटालो - 1‘ नाम के सुपरबग ने भारतीयों की नींद उड़ा दी है। समाचार पत्र और चेनल्स चीख चीख कर इसके प्रभाव और दुष्प्रभाव पर चर्चा करने लगे हैं। यह एक एसा बेक्टीरिया है जो एंडीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर देता है, जिससे इलाज में कठिनाई महसूस होने लगती है। वैसे भी हिन्दुस्तान का इतिहास रहा है कि जिस किसी भी चीज पर पश्चिमी देश अपनी मोहर लगा देते हैं, उसे देश वासी बहुत आसानी से आईएसआई का प्रमाण पत्र मानकर अपना लेते हैं। इस बार भी कुछ इसी तरह का हुआ है। कहा जा रहा है कि भारत में बढते मेडीकल टूरिज्म के चलते पश्चिमी देशों ने षणयंत्र के तहत इस प्रपागंडा को अमली जामा पहनाया है। अगर यह सच है तब तो भारत के अपने प्रोपोगंडा तंत्र को हार मानना ही पड़ेगा।

समेट दी शेरा की भूमिका
अक्टूबर माह में होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों में हो रहे भ्रष्टाचार के हो हल्ले के बीच इसका शुभंकर बना शेरा मायूस ही नजर आ रहा है। इसका कारण है कि शेरा की भूमिका को सीमित कर दिया गया है। 15 सितंबर से मोजैक तकनीक से तैयार किए गए शेरा को संस्थापित करना आरंभ कर दिया जाएगा। जैसे जैसे कामन वेल्थ गेम्स की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे वैसे आयोजनों में रद्दोबदल का सिलसिला भी चल पड़ा है। पहले शेरा को तैराकी, हाकी, बाक्सिंग आदि की मुद्राओं मंे खड़ा करने की योजना बनाइ्र गई थी, किन्तु बाद में समयाभाव के चलते अब शेरा महज विक्ट्री का साईन दिखाता हुआ खड़ा नजर आने वाला है। पूर्व में जापानी तकनीक से तैयार होने वाले शेरा को अब किस तकनीक से तैयार किया जा रहा है इस मामले मंे आयोजन समिति ने मौन साध रखा है। अभी आधे शेरा ही तैयार हो पाए हैं, शेष की तैयारियों ‘युद्ध स्तर‘ पर जारी हैं।

कोर्ट ने दिया नाबालिग जोडे को आर्शीवाद
वैसे तो देश में कानूनन विवाह की आयु 18 वर्ष की तय है, पर बाल विवाहों की खबरें जब तब मिल ही जाया करती हैं। पिछले दिनों एक नाबालिग जोड़े को न्यायालय ने संरक्षण देकर सभी को चौका दिया है। इस जोड़े में लड़का 18 का तो लड़की 16 साल भी पूरे नहीं कर पाई है। न्यायालय ने हिंदू मेरिज एक्ट का हवाला देते हुए इस विवाह को वैध माना है। 03 मई को दोनांे भागकर शादी कर ली थी, जिस पर लड़की के पिता ने लड़के के खिलाफ अपहरण का मामला पंजीबद्ध करवाया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने उस एफआईआर को भी रद्द करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि नाबालिग पति पत्नि साथ साथ रहने के लिए आजाद हैं। 15 साल के उपर की उम्र में पत्नि के साथ उसकी मर्जी से शारीरिक संबंध रेप की श्रेणी में नहीं आता है। इस मामले में चाईल्ड मेरिज एक्ट भी लागू नहीं होता है।

इग्नू का सबसे छोटा छात्र बना दिव्य
महज छः साल की उम्र क्या कोई बच्चा किसी विश्वविद्यालय का छात्र बन सकता है। अमूमन छः साल की उमर में बच्चे दूसरी कक्षा में ही कुलाटियां भरते नजर आते हैं किन्तु दिल्ली के दिव्य ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर सभी को चौंका दिया है। कुछ दिनों पहले कुतुब मीनार को ही गायब कर सुर्खियां बटोरने वाले जादूगर के.सी.पाण्डे के सबसे छोटे पुत्र दिव्य प्रकाश को इग्नू ने अपने पास पंजकृत कर लिया है। दिव्य प्रकाश ने अपनी रूचि के मुताबिक क्रफ्ट डिजाईंग के कोर्स में दाखिला लिया है। बताते हैं कि पहले इग्नू प्रशासन दिव्य को दाखिला देने के लिए राजी नहीं हुआ, बाद में उसकी बाल हट और रूचि के चलते इग्नू प्रशासन को उसके आगे झुकना पड़ा। दिव्य का जन्म 10 अक्टूबर 2003 को हुआ है, और बचपन से ही उसे मिट्टी के खिलौने बनाने में दिलचस्पी रही है।

बड़बोले मंत्रियों से मनमोहन परेशान
दूसरी पारी खेल रहे भारत के प्रधानमंत्री की दुश्वारियां उनके अपने सहयोगी मंत्री ही बढ़ाते जा रहे हैं। दरअसल यूपीए सरकार के मंत्रियों के बड़बोलेपन के चलते प्रधानमंत्री का सर अनेक बार शर्म से नीचा ही हुआ है। कभी वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश भोपाल जाकर यूनियन कार्बाईड का जहरीला कचरा हाथ में उठा लेते हैं तो कभी पूर्व विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर द्वारा सोनिया गांधी की इकानामी क्लास की हवाई यात्रा के बाद उसे मवेशी का बाड़ा कहा जाता है तो कभी भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ एक चुनावी सभा में यह कह देते हैं कि देश में मंहगाई इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि गरीब दोनो टाईम खाना खा रहा है। माननीय न्यायालय ने भी सड़ते अनाज पर चिंता जाहिर करते हुए गरीबो में अनाज मुफ्त में बांटने की बात कही है। अब खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल सदन में यह कहते हैं कि अगर सांसदों को कोई जानकारी चाहिए तो वे सूचना के अधिकार का प्रयोग करें। समझ में नहीं आता कि देश में सरकार चल रही है या मंत्रियों की मनमानी

पुच्छल तारा
स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव का योग आज भारत में लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है। बाबा के इस योग पर न जाने कितने चुटकुलों से एसएमएस और मेल बाक्स भरे पड़े हैं। चेन्नई से कन्हैया गुप्ता ने इसी पर एक मजेदार ईमेल भेजा है। वे कहते हैं कि किसी ने बाबा राम देव से पूछा कि लंबी उमर के लिए क्या करना चाहिए। इस पर बाबा रामदेव ने कहा कि शादी कर लेनी चाहिए। वह व्यक्ति आवक रह गया और प्रतिप्रश्न किया क्या शादी से जिंदगी लंबी हो जाती है? बाबा मुस्कुराए और बोले होती तो नहीं पर लगने अवश्य ही लगती है. . .।

किस षणयंत्र के तहत रूका था सिवनी में उत्‍तर दक्षिण फोरलेन कारीडोर का काम

किसने रोका फोरलेन का काम

रविवार, 15 अगस्त 2010

कामन वेल्‍थ के पहरेदार अय्यर

कामन वेल्‍थ के बहाने वेल्‍थ बढाते नेता

शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई -- 15

‘‘गुटखा‘‘ खाने का नौश फरमातीं हैं सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की एक ‘टीचर‘

स्कूलों के इर्दगिर्द तम्बाखू उत्पाद नहीं बिक सकते

कक्षा में गुटखा खाकर खिडकी से थूका करतीं हैं उक्त शिक्षिका

बच्चों पर पड रहा है प्रतिकूल प्रभाव

सिवनी। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड से मान्यता पाने में असफल रही जिला मुख्यालय में संचालित होने वाली स्तरीय शिक्षा प्रदान करने में अग्रणी शिक्षण संस्था सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की एक शिक्षिका पाउच वाला गुटखा खाने का शौक रखती हैं। बताया जाता है कि उक्त शिक्षिका के बारे में यह बात बहुत ही जोर शोर से प्रचारित की गई थी कि वे बेहद ही अनुभवी हैं और उनके पास एक कम बीस साल का पढाने का अनुभव भी है।

गौरतलब होगा कि शासन ने बच्चों को तम्बाखू के उत्पादों से दूर रखने के लिए न जाने कितने एहतियातन कदम उठाए हैं। इनमें अठ्ठारह साल से कम आयु के लोगों को तम्बाखू के उत्पादों को न बेचे जाने की बात सार्वजनिक तौर पर हर पान की दुकान में चस्पा करने के निर्देश दिए गए हैं, इतना ही नहीं शैक्षणिक संस्थाओं के इर्द गिर्द भी तम्बाखू युक्त सामग्री के बेचे जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है।

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के प्री प्रयमरी के बच्चों के बीच चल रही चर्चाओं को अगर सच माना जाए तो शाला ने नेम फेम और पालकों तथा बच्चों को लुभाने की गरज से शाला में एक एसे टीचर को भर्ती किया है, जो ‘‘गुटखा‘‘ वह भी पाउच वाला खाने का नौश फरमाती हैं। बच्चांे के बीच चल रही चर्चा को अगर सच माना जाए तो उक्त टीचर द्वारा अध्यापन कार्य के दौरान ही पाउच फाडकर गुटखा को खाया जाता है और अध्ययापन के दौरान ही इसकी पीक बीच बीच में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के लूघरवाडा के आगे स्थित निर्माणाधीन भवन की खिडकी से बाहर थूकी जाती है।

एक पालक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि किसी बालिग द्वारा गुटखा या तम्बाखू का सेवन उसका नितांत निजी मामला हो सकता है किन्तु अगर कोई टीचर यह काम बच्चों के बीच करे तो इसका बच्चों पर प्रतिकूल असर पडे बिना नहीं रह सकता है।

गौरतलब होगा कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल जिला मुख्यालय में संचालित होने वाले उत्कृष्ठ शिक्षण संस्थानों में अग्रणी माना जाता है, और इस तरह के स्तरीय विद्यालय में अगर इस तरह की हरकत लंबे समय से जारी है तथा इस बात का पता अगर सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल विद्यालय प्रशासन को न हो तो यह बात गले नहीं उतरती है। सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल विद्यालय प्रशासन से अपेक्षा व्यक्त की जाती है कि विद्यालय की गरिमा को ध्यान में रख इस मामले में तत्काल उचित कार्यवाही सुनिश्चित करे।

शनिवार, 14 अगस्त 2010

नाचो गाओ जश्‍न मनाओ आज 15 अगस्‍त है

लो फिर आ गया स्वाधीनता दिवस!



आज जगेगा देशप्रेम का जज्बा गीतों के माध्यम से



मदिरालय होंगे बंद, पर बिकेगी अवैध मदिरा



(लिमटी खरे)



14 और 15 अगस्त की दर्मयानी रात को 1947 में गोरे ब्रितानियों ने भारत को अपनी गुलामी की जंजीरों से आजादी दी थी। आजाद भारत को संवारने, दिशा देने में उस वक्त के शासकों ने बहुत सारे सपने देखे थे। इन सपनों को साकार करने का माद्दा भी था तत्कालीन शासकांे में। देश के आखिरी आदमी तक आजादी की खुशबू फैलाने के लिए वचनबद्ध थे उस वक्त देश पर शासन करने वाले कांग्रेस के नुमाईंदे। कालांतन मंे आजादी के मायने सिर्फ रसूखदार, नौकरशाह, जनसेवक और धनाड्य वर्ग के लोग ही समझ पाए। देश के गरीब गुरबे आज भी दो वक्त की रोटी के लिए रोज की मारामारी में इतना उलझकर रह गया है कि उसे इस बात का इल्म ही नहीं रहा कि असल आजादी क्या होती है।

विडम्बना देखिए सुबह उठकर पानी भरने से लेकर रात को सोने तक भारत गणराज्य का आम आदमी करों के भारी भरकम बोझ से लदा फदा ही नजर आता है। लोग टेक्स क्यों चुकाते हैं, जाहिर है कि भारत सरकार के पास नोट का पेड तो नहीं लगा है, जो वह आधारभूत संरचना, संस्थागत खर्चे, स्थापना व्यय आदि का भोगमान भोग सके। आजाद भारत में छः दशकों बाद आम आदमी की थाली में अनाज और नौकरशाह और जनसेवकों की मोटी पगार का ही अनुपात देख लिया जाए तो दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है। आज चहुंओर भ्रष्टाचार, अनाचार की गूंज मची है। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस सबकों देख सुनकर आंखें मीचे न केवल बैठी है, वरन एसा उपजाउ माहौल प्रशस्त कर रही है कि इन सारी बातों की फसल और अच्छी तैयार हो सके।

हालात देखकर हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज का युवा आजादी के मायने पूरी तरह से भूलता जा रहा है। सत्तर के दशक के उपरांत तो ब्रितानियों के कहर को चित्रित करने वाली रोंगटें खड़े कर देशवासियों के मन में देशप्रेम का सागर हिलोरे मारे इस तरह की फिल्में ही बनना बंद हो गईं। इस सबसे के लिए निश्चित तौर पर देश का सूचना और प्रसारण मंत्रालय ही जवाबदार माना जा सकता है। आज देशप्रेम का जज्बा जगाने के लिए 15 अगस्त, 26 जनवरी और 02 अक्टूबर के दिन ही जगह जगह गाने बजाए जाते हैं।

कितने जतन के बाद भारत देश में 15 अगस्त 1947 को आजादी का सूर्योदय हुआ था। देश को आजाद कराने, न जाने कितने मतवालों ने घरों घर जाकर देश प्रेम का जज्बा जगाया था। सब कुछ अब बीते जमाने की बातें होती जा रहीं हैं। आजादी के लिए जिम्मेदार देश देश के हर शहीद और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कुर्बानियां अब जिन किताबों में दर्ज हैं, वे कहीं पडी धूल खा रही हैं। विडम्बना तो देखिए आज देशप्रेम के ओतप्रोत गाने भी बलात अप्रसंगिक बना दिए गए हैं। महान विभूतियों के छायाचित्रों का स्थान सचिन तेंदुलकर, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार जैसे आईकान्स ने ले लिया है। देश प्रेम के गाने महज 15 अगस्त, 26 जनवरी और गांधी जयंती पर ही दिन भर और शहीद दिवस पर आधे दिन सुनने को मिला करते हैं।

गौरतलब होगा कि आजादी के पहले देशप्रेम के जज्बे को गानों में लिपिबध्द कर उन्हें स्वरों में पिरोया गया था। इसके लिए आज की पीढी को हिन्दी सिनेमा का आभारी होना चाहिए, पर वस्तुतः एसा है नहीं। आज की युवा पीढी इस सत्य को नहीं जानती है कि देश प्रेम की भावना को व्यक्त करने वाले फिल्मी गीतों के रचियता एसे दौर से भी गुजरे हैं जब उन्हें ब्रितानी सरकार के कोप का भाजन होना पडा था। देशप्रेम की अलख जगाने वाले गीतकारों को ब्रितानियों के कितने जुल्म का शिकार होना पड़ा था इस बात को भी आज की पीढी नहीं जानती।

देखा जाए तो देशप्रेम से ओतप्रोत गानों का लेखन 1940 के आसपास ही माना जाता है। उस दौर में बंधन, सिकंदर, किस्मत जैसे दर्जनों चलचित्र बने थे, जिनमें देशभक्ति का जज्बा जगाने वाले गानों को खासा स्थान दिया गया था। मशहूर निदेशक ज्ञान मुखर्जी द्वारा निर्देशित बंधन फिल्म संभवतः पहली फिल्म थी जिसमें देशप्रेम की भावना को रूपहले पर्दे पर व्यक्त किया गया हो। इस फिल्म में जाने माने गीतकार प्रदीप (रामचंद्र द्विवेदी) के द्वारा लिखे गए सारे गाने लोकप्रिय हुए थे। कवि प्रदीप का देशप्रेम के गानों में जो योगदान था, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।

इसके एक गीत ”चल चल रे नौजवान” ने तो धूम मचा दी थी। इसके उपरांत रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जगाने का सिलसिला आरंभ हो गया था। 1943 में बनी किस्मत फिल्म के प्रदीप के गीत ”आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है” ने देशवासियों के मानस पटल पर देशप्रेम जबर्दस्त तरीके से जगाया था। लोगों के पागलपन का यह आलम था कि लोग इस फिल्म में यह गीत बारंबार सुनने की फरमाईश किया करते थे।

आलम यह था कि यह गीत फिल्म में दो बार सुनाया जाता था। उधर प्रदीप के क्रांतिकारी विचारों से भयाक्रांत ब्रितानी सरकार ने प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया, जिससे प्रदीप को कुछ दिनों तक भूमिगत तक होना पडा था। पचास से साठ के दशक में आजादी के उपरांत रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जमकर बिका। उस वक्त इस तरह के चलचित्र बनाने में किसी को पकडे जाने का डर नहीं था, सो निर्माता निर्देशकों ने इस भावनाओं का जमकर दोहन किया। दस दौर में फणी मजूमदार, चेतन आनन्द, सोहराब मोदी, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे नामी गिरमी निर्माता निर्देशकों ने आनन्द मठ, लीजर, सिकंदरे आजम, जागृति जैसी फिल्मों का निर्माण किया जिसमें देशप्रेम से भरे गीतों को जबर्दस्त तरीके से उडेला गया था।

1962 में जब भारत और चीन युद्ध अपने चरम पर था, उस समय कवि प्रदीप द्वारा मेजर शैतान सिंह के अदम्य साहस, बहादुरी और बलिदान से प्रभावित हो एक गीत की रचना में व्यस्त थे, उस समय उनका लिखा गीत ”ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी . . .” जब संगीतकार ए.रामचंद्रन के निर्देशन में एक प्रोग्राम में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने सुनाया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी अपने आंसू नहीं रोक सके थे।

इसी दौर में बनी हकीकत में कैफी आजमी के गानों ने कमाल कर दिया था। इसके गीत कर चले हम फिदा जाने तन साथियो को आज भी प्रोढ हो चुकी पीढी जब तब गुनगुनाती दिखती है। सत्तर से अस्सी के दशक में प्रेम पुजारी, ललकार, पुकार, देशप्रेमी, कर्मा, हिन्दुस्तान की कसम, वतन के रखवाले, फरिश्ते, प्रेम पुजारी, मेरी आवाज सुनो, क्रांति जैसी फिल्में बनीं जो देशप्रेम पर ही केंदित थीं।

वालीवुड में प्रेम धवन का नाम भी देशप्रेम को जगाने वाले गीतकारों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। उनके लिखे गीत काबुली वाला के ए मेरे प्यारे वतन, शहीद का ए वतन, ए वतन तुझको मेरी कसम, मेरा रंग दे बसंती चोला, हम हिन्दुस्तानी का मशहूर गाना छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी, महान गायक मोहम्मद रफी ने देशप्रेम के अनेक गीतों में अपना स्वर दिया है। नया दौर के ये देश है वीर जवानों का, लीडर के वतन पर जो फिदा होगा, अमर वो नौजवां होगा, अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं . . ., आखें का उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता. . ., ललकार का आज गा लो मुस्करा लो, महफिलें सजा लो, देश प्रेमी का आपस में प्रेम करो मेरे देशप्रेमियों, आदि में रफी साहब ने लोगों के मन में आजादी के सही मायने भरने का प्रयास किया था।

गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता मनोज कुमार का नाम आते ही देशप्रेम अपने आप जेहन में आ जाता है। मनोज कुमार को भारत कुमार के नाम से ही पहचाना जाने लगा था। मनोज कुमार की कमोबेश हर फिल्म में देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत गाने हुआ करते थे। शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम, क्रांति जैसी फिल्में मनोज कुमार ने ही दी हैं, जो फिल्म सादगी भरी कम बजट की होने के बाद भी उस दौर में बाक्स आफिस पर धूम मचा चुकी हैं।

अस्सी के दशक के उपरांत रूपहले पर्दे पर शिक्षा प्रद और देशप्रेम की भावनाओं से बनी फिल्मों का बाजार ठंडा होता गया। आज फूहडता और नग्नता प्रधान फिल्में ही वालीवुड की झोली से निकलकर आ रही हैं। आज की युवा पीढी और देशप्रेम या आजादी के मतवालों की प्रासंगिकता पर गहरा कटाक्ष कर बनी थी, लगे रहो मुन्ना भाई, इस फिल्म में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के बजाए शुष्क दिवस (इस दिन शराब बंदी होती है) के रूप में अधिक पहचाना जाता है। विडम्बना यह है कि इसके बावजूद भी न देश की सरकार चेती और न ही प्रदेशों की। जनसेवकों ने मुन्ना भाई के उस डायलाग पर ठहाके अवश्य ही लगाए होंगे, पर हंसने वाले जनसेवक यह भूल जाते हैं कि यह कटाक्ष आज के नेताओं पर ही है।

सत्तर के दशक में स्कूल का वो नजारा आज भी हमारे दिलो दिमाग पर जीवंत है, जिसमें पंद्रह अगस्त या 26 जनवरी का दिन छुट्टी का होता है से ज्यादा इस बात के लिए याद किया जाता था, कि इस दिन भारत आजाद हुआ या गणतंत्र की स्थपना हुई थी। इस दिन जिला मुख्यालय में मुख्य कार्यक्रम में जब नेताजी संदेश का वाचन करते थे, तब एक एक शब्द गौर से सुना जाता था। उस वक्त के नेता वाकई आदर्श हुआ करते थे, आज के नेताओं का नैतिक तौर पर इतना पतन हो चुका है कि आजादी के छः दशकों बाद भी देश में जात, पात, मजहब, भाषा, क्षेत्रीयता आदि जैसे मुद्दों पर लोगों को बांटकर राजनीति की जा रही है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार और राज्यों की सरकारें भी आजादी के सही मायनों को आम जनता के मानस पटल से विस्मृत करने के मार्ग प्रशस्त कर रहीं हैं। देशप्रेम के गाने 26 जनवरी, 15 अगस्त के साथ ही 2 अक्टूबर को आधे दिन तक ही बजा करते हैं। कुल मिलाकर आज की युवा पीढी तो यह समझने का प्रयास ही नहीं कर रही है कि आजादी के मायने क्या हैं, दुख का विषय तो यह है कि देश के नीति निर्धारक भी उन्हें याद दिलाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं।

शिक्षा का गिरता स्‍तर

शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई -- 14

हिन्दी बोलने से परहेज ही करतीं हैं सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की प्राचार्य!

अंग्रेजी माध्यम शाला में एक परिचारिका के सहारे हिन्दी समझती और बोलती हैं प्राचार्य

सिवनी। भारत गणराज्य का इससे अधिक दुर्भाग्य और क्या होगा कि इसाई मिशनरी द्वारा जिला मुख्यालय सिवनी में संचालित होने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी के स्थान पर देश के उपर डेढ सौ से अधिक सालों तक राज करने वाले ब्रितानियों की अंग्रेजी भाषा को प्रमुखता से परोसा जा रहा हो। सिवनी में वैसे भी केंद्रीय शिक्षा बोर्ड अर्थात सीबीएसई का लालच देकर अनेक शालाओं द्वारा पालकों को भ्रमित कर उनकी जेब काटने का जतन किया जा रहा है।

गौरतलब है कि जिला मुख्यालय सिवनी में संचालित होने वाले और स्तरीय शिक्षण प्रदान करने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल स्कूल को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने मान्यता देने से साफ इंकार कर दिया है। इसका कारण यहां सीबीएसई के नार्मस के मुताबिक पर्याप्त भूखण्ड, खेल का मैदान, पुस्तकालय में किताबों की कमी और अप्रशिक्षित स्टाफ आदि को आधार बनाया गया है। इस लिहाज से चालू शैक्षणिक सत्र 2010 - 2011 के लिए सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को सीबीएसई बोर्ड ने मान्यता देने से इंकार कर दिया है।

शाला प्रबंधन द्वारा इस शाला में इसी शैक्षणिक सत्र के लिए कक्षा नवमीं में प्रवेश देकर कक्षाएं आरंभ की जा चुकी हैं। सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल इस मामले में पूरी तरह मौन साधे हुए है कि इस साल कक्षा नवमीं के प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों का नामांकन माध्यमिक शिक्षा मण्डल भोपाल या केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के तहत किया जाएगा। पालक असमंजस में हैं कि क्या करें? उधर शाला प्रबधन की रहस्यमय चुप्पी भी अनेक संदेहों को जन्म दे रही है।

शाला के विद्यार्थियों के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार शाला की प्राचार्य या तो दक्षिण भारत की एक स्थानीय भाषा में ही बात करतीं हैं, या फिर वे पश्चिमी देशों में ज्यादातर बोली जाने वाली आंग्ल भाषा का इस्तेमाल ही करती हैं। बताया जाता है कि अगर प्राचार्य से भारत गणराज्य की राष्ट्रभाषा हिन्दी में बात की जाती है तो वे बगलें झांकने लगती हैं। देश की आधिकारिक भाषा हिन्दी को समझने और फिर जवाब देने के लिए सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल की प्रायार्य अपनी एक सहायक शिक्षक (टीचर) पर पूरी तरह निर्भर हैं। कहा जाता है कि जिस दिन उक्त टीचर अवकाश पर होती हैं, उस दिन प्राचार्य को हिन्दी समझने में तकलीफ तो होती होगी ही साथ ही हिन्दी बोलने के मामले में उन्हें मौन वृत ही रखना होता है।

शाला के अंदरखाते से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो शाला में अध्ययापन करा रहा अधिकांश स्टाफ या तो दक्षिण भारत में अधिकांश स्थानों पर बोली जाने वाली भाषा में ही आपस में बात करते हैं या फिर आंग्ल भाषा में। विद्यार्थियों के बीच इस बात को लेकर कई तरह के चुटकले बनने भी आरंभ हो गए हैं। कभी भारत की आन बान शान का प्रतीक माने जाने वाला ‘‘गुरू‘‘ का उच्चारण भी सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में उपनिवेशवाद में बोले जाने वाला ‘‘टीचर‘‘ में तब्दील हो चुका है। जब उक्त टीचर्स आपस में दक्षिण भारत की एक विशेष भाषा में बात की जाती है तो विद्यार्थी एक दूसरे को यह ताने कसते भी पाए जाते हैं कि फलां टीचर उसे बुरा भला कह रहा है, क्यांेंकि विद्यार्थियों को उनकी बातचीत का ओर छोर ही पता नहीं चल पाता है।

विद्यालय में अध्ययनरत एक विद्यार्थी के पालक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि उन्हें डर है कि कहीं उनका बच्चा इस शाला में पढते पढते हिन्दी को पराई भाषा और दक्षिण भारत की बोली विशेष और आंग्ल भाषा को ही हिन्दी के बजाए अपनी मातृभाषा न समझने लगे। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि भारतीय पुरातन संस्कृति की हिमायती भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में अगर हिन्दी की चिंदी इस कदर उडाई जा रही हो और शासक ही खामोश बैठे हों।

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल चूंकि वर्तमान में केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के अधीन नहीं हुआ है, अतः सिद्धांततः वर्तमान में यह मध्य प्रदेश सरकार के नियंत्रण में है, फिर राज्य शासन की ओर से शिक्षा विभाग के पाबंद जिला शिक्षा अधिकारी, जिला प्रशासन के प्रभारी डिप्टी कलेक्टर आदि को इस तरह की शालाओं की अनियमितताओं की जांच करने में क्या तकलीफ है? अगर प्रशासन और शिक्षा विभाग शालाओं को लूट की खुली छूट दे रहा है तो इससे प्रशासन की मंशा भी स्पष्ट नजर नहीं आती है, कि प्रशासन आखिर इस मामले में विद्यार्थियों के साथ खडा हुआ है या फिर शाला प्रबंधन की कमियों को ढांकने का प्रयास कर रहा है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

टाटा को बाय बाय कहने की तैयारी में रतन

‘रतन‘ के बाद कौन कहेगा ‘टाटा‘



रतन टाटा के उत्ताराघिकारी की खोज आरंभ



अगले 29 माह में पद छोड देंगे रतन टाटा



टाटा ग्रुप के छटवें अध्यक्ष की ताजपोशी की तैयारियां



(लिमटी खरे)



भारत गणराज्य में टाटा समूहएक किंवदंती बनकर रह गया है। टाटा ग्रुप के वर्तमान अध्यक्ष रतन टाटा ने 1991 में इसके अध्यक्ष का कार्यभार संभाला था, उसके बाद टाटा गु्रप ने पीछे मुडकर नहीं देखा। लगभग बीस सालों के कारोबार में रतन टाटा के नेतृत्व मंे टाटा गु्रप के राजस्व में पच्चीस फीसदी बढोत्तरी दर्ज की गई है। टाटा समूह के वर्तमान अध्यक्ष लगभग ढाई साल बाद अपना पद छोड देंगे।

टाटा समूह की नींव जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा ने रखी थी। वे ही टाटा समूह के पितामह और संस्थापक माने जाते हैं। जब देश गुलाम था, उस वक्त जमशेदजी के बुलंद इरादों के आगे गुलामी की जंजीरें भी टिक न सकीं। जमशेदजी ने अपने परिश्रम और लगन के साथ टाटा के छोटे से पौधे को सींच सींच कर खडा किया। जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा इस समूह के अध्यक्ष पद पर 1868 से 1904 तक काबिज रहे।

इनके उपरांत टाटा समूह की बागडोर थामी उनके पुत्र दोराबजी टाटा ने। वे इस समूह के अध्यक्ष रहे 1904 से 1932 तक। दोराबजी के पद छोडने के बाद टाटा परिवार से इतर किसी अन्य व्यक्ति को इसकी बागडोर सौंपी गई, और वे थे नौरोजी सकलतवाला। नौरोजी ने टाटा समूह के अध्यक्ष का कामकाज महज छः साल अर्थात 1932 से 1938 तक संभाला।

टाटा समूह के अध्यक्ष की सबसे लंबी पारी जमशेदजी टाटा के भतीजे जे.आर.डी.टाटा ने खेली वे 1938 से 1991 तक लगभग 23 साल तक टाटा समूह के अध्यक्ष रहे। जमशेदजी टाटा के सम्मान में टाटा नगर को जमशेदपुर भी कहा जाता है। 1991 में टाटा समूह की बागडोर संभालने वाले रतन टाटा मूलतः जमशेदजी टाटा के पड़पोते हैं। इन्होंने 1962 में जेआरडी टाटा के मशविरे पर आईबीएम समूह का एक आकर्षक ऑफर ठुकराकर टाटा समूह से जुड़ना बेहतर समझा।

काम को ही पूजा मानने वाले रतन टाटा की कार्यशैली दूसरों से हटकर ही है। रतन टाटा ने काम की शुरूआत जमशेदपुर स्टील प्लांट से की थी, जहां उन्होंने अपने साथी कामगारों के साथ लोहा गलाने वाली धमन भट्टी तक के काम की देखरेख करने में भी शर्म महसूस नहीं की।

आज टाटा का करोबार विश्व के 85 देशों में फैला हुआ है। बाजार में सात सेक्टर्स एसे हैं जिसमें टाटा समूह सक्रिय भागीदारी निभा रहा है। वर्ष 2008 - 2009 में टाटा का कुल टर्न ओवर 71 बिलियन डालर का था। टाटा की वर्तमान में कुल 114 में से 28 फर्म लिस्टिड हैं। टाटा समूह की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके 65.8 फीयदी शेयर आज भी जनकल्याण में संचालित होने वाले चेरिटेबल ट्रस्ट के पास हैं।

अब टाटा के इस विशाल साम्राज्य को कौन संभालेगा इस बारे में बहस आरंभ हो गई है। टाटा समूह के नए अगुआ के लिए सही एवं योग्य व्यक्ति की तलाश का जिम्मा पांच लोगों की एक समिति बनाकर सौंपा गया है। टाटा समूह के उत्तराधिकारी की दौड़ में रतन टाटा के चचेरे भाई नोएल टाटा सबसे प्रबल दावेदार के तौर पर सामने आए हैं। नोएल टाटा जून 2010 में टाटा इन्वेस्टमेंट के चेयरमेन बने। इसके उपरांत वे 29 जुलाई को टाटा इंटरनेशनल के प्रबंध संचालक नियुक्त किए गए।

टाटा समूह के अध्यक्ष पद के लिए रिनॉल्ट निसान के सीईओ कार्लोस घोष, पेप्सिको की प्रमुख इंदिरा नूरी, वोडाफोन के पूर्व अध्यक्ष अरूण सरीन, सिटी बेंक के प्रमुख विक्रम पंडित, इंफोसिस के संस्थापक एन.आर.नारायण मूर्ति के अलावा यूनिक आईडेंटिटी परियोजना के प्रमुख नंदन नीलकेणी के नामों की बयार बह रही है। इनमें से कौन सा भाग्यशाली चेहरा होगा जो टाटा समूह के अध्यक्ष का ताज पहनेगा यह बात तो अभी भविष्य के गर्भ में ही छिपी है।

उधर रतन टाटा ने इस बात को खारिज कर दिया है कि टाटा सरनेम वाला कोई पारसी व्यक्ति ही टाटा समूह की बागडोर संभालेगा। बकौल रतन टाटा जो भी अध्यक्ष चुना जाएगा, वह न तो पारसी धर्म का समर्थक होगा और न ही विरोधी, वह एक योग्य व्यक्ति ही होगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने कसी शिक्षण संस्थाओं की लगाम

मान्यता नहीं तो फीस करनी होगी वापस

(ब्यूरो कार्यालय)

नई दिल्ली 13 अगस्त। गैर मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थाओं को अगर मान्यता नहीं मिलती है तो उन्हें अपने विद्यार्थियों की फीस वापस करना होगा। उक्ताशय का फैसला देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराया है जिसमें गैर मान्यता प्राप्त महाविद्यालय को मान्यता न मिलने की स्थिति में एक छात्र की फीस लौटाने का आदेश दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय में दायर विनायक मिशन डेंटल महाविद्यालय की एक छात्रा की अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति टी.एस.ठाकुर और मार्कण्डेय काटजू की युगल बैंच ने दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराया है। माननीय न्यायालय छात्रा की इस दलील से पूरी तरह सहमत था कि महाविद्यालय को मान्यता न मिल पाने से उसका एक साल खराब हो गया।

सर्वोच्च न्यायालय की युगल पीठ ने अपने फैसले में विनायक मिशन डेंटल महाविद्यालय की छात्रा को फीस की पूरी राशि 5 लाख 15 हजार रूपए, 12 फीसदी सालाना ब्याज के साथ लौटाने के आदेश जारी कर दिए हैं। न्यायालय ने आयोग के उस फैसले को उलट दिया है जिसमें आयोग ने महाविद्यालय पर ढाई लाख रूपए का जुर्माना ठोंका था।

शिक्षा माफिया की जद में सीबीएसई (13)

जमीन, प्लेग्राउंड, लाईब्रेरी, अप्रशिक्षित स्टाफ के चलते हुआ सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल का मान्यता आवेदन रद्द

चालू शैक्षणिक सत्र के लिए सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को नहीं मिली सीबीएसई मान्यता

सिवनी। ‘‘जिला मुख्यालय सिवनी में संचालित होने वाले और स्तरीय शिक्षण प्रदान करने वाले सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल स्कूल को केंद्रीय शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने मान्यता देने से साफ इंकार कर दिया है। इसका कारण यहां सीबीएसई के नार्मस के मुताबिक पर्याप्त भूखण्ड, खेल का मैदान, पुस्तकालय में किताबों की कमी और अप्रशिक्षित स्टाफ आदि को आधार बनाया गया है।‘‘ उक्ताशय की जानकारी केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के मध्य प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर के सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराई गई है।

सूत्रों ने बताया कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकन्डरी एजूकेशन शिक्षा केंद्र, 2, कन्यूनिटी सेंटर, प्रीत विहार विकास मार्ग नई दिल्ली 110092 की एफीलेशन ब्रांच के सहायक सचिव खुशाल सिंह के हस्ताक्षरों से 12 मई 2005 को जारी पत्र क्रमांक सीबीएसई / एएफएफ / एस एल / 1701 - 1011 / 2010 में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के प्रबंधक को उक्ताशय की बात से आवगत करा दिया गया है।

सूत्रों ने बताया कि पत्र में लिखा गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला प्रबंधन के आन लाईन आवेदन नंबर एस.एल. - 1701 - 1011 के संदर्भ में एक और दो फरवरी 2010 को शाला के हुए निरीक्षण के उपरांत निरीक्षण प्रतिवेदन और बोर्ड को सौंपे गए प्रपत्रों के अध्ययन के उपरांत उक्त निर्णय लिया गया है।

पत्र की कंडिका एक में कहा गया है कि शाला द्वारा जिस भवन में स्कूूल का संचालन किया जा रहा है वह बोर्ड के द्वारा निर्धारित नार्मस डेढ से दो एकड से कम है। जिसमें शाला भवन का निर्माण और शेष भाग में खेल का मैदान होना आवश्यक है। शाला द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उसके द्वारा दिए गए प्रपत्रों में इंफ्रास्टकचर, कक्षाएं, दो स्थानों के बीच की दूरी,, हर साईट का क्षेत्रफल आदि क्या है?

सीबीएसई अजमेर कार्यालय के सूत्रों ने आगे बताया कि इस पत्र की कंडिका दो में उल्लेख किया गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल में अध्ययापन कराने वाले कई शिक्षक अप्रशिक्षित हैं, अतः सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला प्रबंधन को ताकीद किया गया है कि वह बोर्ड के नार्मस के मुताबिक क्वालिफाईड और प्रशिक्षित शिक्षकों को नियुक्त करे।

सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को एफीलेशन विभाग के सहायक सचिव खुशाल सिंह के हस्ताक्षरों से जारी उक्त पत्र की कंडिका तीन कहती है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला का पुस्तकालय काफी छोटा है, अतः शाला प्रबंधन को चाहिए कि अपने पुस्तकालय को कक्षाआं के मुताबिक और किताबें शामिल कर और अधिक समृद्ध बनाया जाए। इसी पत्र की चौथी कंडिका में उल्लेख किया गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल प्रबंधन द्वारा शाला ने नाम पर जमीन या भवन के कागज नहीं संलग्न किए गए हैं, अतः सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल प्रबंधन सेल डीड की कापी संलग्न की जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जमीन को सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला संचालित करने वाली सोसायटी या शाला के नाम पर रजिस्टर्ड किया गया है।

सूत्रों का कहना है कि इस पत्र की कंडिका पांच में महत्वपूर्ण बात कही गई है, जिसके चलते ही इस नए शैक्षणिक सत्र में सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल के शाला प्रबंधन ने आनन फानन में जबलपुर रोड पर निर्माणाधीन शाला भवन में शाला को स्थानांतरित कर दिया है। इस कंडिका में कहा गया है कि शाला का नया भवन अभी निर्माणाधीन है, और शाला को उसमें अभी स्थानांतरित किया जाना बाकी है। शाला प्रबंधन ने भले ही 21 जून से आरंभ हुए शैक्षणिक सत्र में निर्माणाधीन भवन में शाला को स्थानांतरित कर दिया हो किन्तु उसकी मान्यता का आवेदन तो निरस्त ही कर दिया गया है।

इस पत्र की अंतिम और छटवी कंडिका में कहा गया है कि सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल शाला को अभी भी पर्याप्त संख्या में क्वालिफाईड और प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती आवश्यक है जो बोर्ड के नार्मस के हिसाब से 1: 1.5 का अनुपात हर स्तर पर बनाए रख सके। अंत में सहायक सचिव खुशाल सिंह आदेशित करते हैं कि उक्त सारी कमियों के चलते शाल प्रबंधन के केंद्रीय शिक्षा बोर्ड से मान्यता के आवेदन को जिसमें शाला प्रबंधन ने 2010 - 2011 के लिए मान्यता चाही गई थी को निरस्त किया जाता है।

सीबीएसई के सहायक सचिव ने आगे कहा है कि इन कमियों को दूर कर सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को चाहिए कि वह मान्यता हेतु नया मान्यता आवेदन बाकायदा निर्धारित फीस के प्रस्तुत करे ताकि उस पर विचार किया जा सके। खुशाल सिंह ने सेंट फ्रांसिस ऑफ एसिसी स्कूल को साफ तौर पर कहा है कि शाला सीबीएसई पेटर्न पर नवमीं, दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं में कक्षाएं आरंभ कतई न करे अन्यथा किसी भी तरह के विवाद के लिए सीबीएसई बोर्ड की कोई जवाबदारी नहीं होगी।

(क्रमशः जारी)

रसूखदारों को भी खरीदनी होगी टिकिट

कामन वेल्थ गेम्स में जारी नहीं होंगे ‘पास‘
 
खेलों में नहीं होगा कोई ‘‘पास‘‘ वेध
 
मीडिया और वालंटियर्स के पास होंगे मान्यता प्राप्त कार्ड
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 13 अगस्त। 03 अक्टूबर से नई दिल्ली में आरंभ होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों में अतिविशिष्ट व्यक्तियों (व्ही.व्ही.आई.पी.) के लिए निशुल्क प्रवेश करना आसान नहीं होगा। आयोजन समिति ने इसके लिए कड़ा रूख अख्तियार किया है। अब तक आयोजन समिति पर लगने वाले आरोप कि आयोजन के शुभारंभ और समापन अवसर पर पांच हजार से अधिक निशुल्क पास की व्यवस्था की जा रही है, की खबरों के बाद आयोजन समिति ने फैसला लिया है कि इसके लिए बाकायदा टिकिट पर ही प्रवेश सुनिश्चित किया जाए।
 
कामन वेल्थ गेम्स की आयोजन समिति से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आयोजन समिति ने उद्घाटन, समापन के साथ ही साथ समस्त खेल गतिविधियों के लिए 17 लाख टिकिटें बेचने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सूत्रों ने दावा किया है कि इस वृहद आयोजन में किसी भी तरह के पास जारी करने का कोई प्रावधान ही नहीं रखा गया है। खेलों को कवर करने के लिए मीडिया और खेल में सहायक होने वाले वालंटियर्स के मान्यता कार्ड के अतिरिक्त और कोई भी पास प्रवेश के लिए वेध नहीं होगा।
 
उधर केंद्रीय खेल एवं युवा मामलों के मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सरकार को अब तक इन खेलों में पास जारी करने का कोई अनुरोध अब तक प्राप्त नहीं हुआ है, और अगर एसा प्रस्ताव अब प्राप्त भी हो तो सरकार उस पर विचार नहीं करेगी। आयोजन समिति को यह भय सता रहा है कि अगर खेलों के लिए पास जारी कर दिए गए तो मंहगी टिकिटों को कौन खरीदकर खेल देखना पसंद करेगा।
 
आयोजन समिति से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि इस विशाल आयोजन में टिकिटों की कीमत पचास रूपए से पचास हजार रूपए सममूल्य की रखी गई हैं। उद्घाटन समारोह की टिकिट की कीमत साढे सात सौ रूपए से पचास हजार रूपए रखी गई है। पचास रूपए सममूल्य की टिकिट उन खेलों के लिए रखी गई है, जिन खेलों को देखने में खेल प्रेमी दर्शक कम दिलचस्पी दिखते हैं। सूत्रों ने दावा किया है कि शुभारंभ कार्यक्रम की एक हजार रूपए सममूल्य की सारी की सारी टिकिटें बिक चुकी हैं, और आयोजन समिति इन एक हजार रूपए वाली टिकिटों की संख्या बढ़ाने पर विचार कर रही है।

उधर सरकार और जनता को भटकाने के लिए आयोजन समिति का कहना है कि महज तेरह दिनों के इस आयोजन में आयोजन समिति को सत्रह सौ अस्सी करोड रूपए की आय होना अनुमानित है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) आयोजन समिति की इस राय से इत्तेफाक कतई नहीं रख रहा है। सीएजी का कहना है कि यह आंकडा बढा चढा कर बताया गया है। बहरहाल जो भी हो अगर कामन वेल्थ गेम्स में पास की व्यवस्था नहीं हो पाई तो रसूखदार लोगों के परिवारजन निराश अवश्य ही हो जाएंगे।

फोरलेन का सच ----------------08

पेटी कांट्रेक्टर ने दिया सद्भाव पर हर्जाने का नोटिस
 
सद्भाव की कार्यप्रणाली पर संदेह के बादल
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 13 अगस्त। उत्तर दक्षिण फोरलेन सड़क गलियारे के नक्शे में सिवनी जिला शामिल होगा या नहीं इस बारे में संशय के बादल अब तक छट नहीं सके हैं। फोरलेन गलियारे के मसले का विवाद रोजना ही नए राज उगल रहा है। अब तक यह बात किसी को भी पता नहीं हो सकी है कि आखिर फोरलेन के सिवनी जिले में निर्माणाधीन सड़क का काम किसके कहने पर रोका गया है। इस काम को रोकने में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कोई रूकावट न डालने की खबरें भी फिजां में तैरने लगी हैं। इसी बीच सिवनी से खवासा तक सड़क का निर्माण करा रही सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा काम को किसी अन्य ठेकेदार को पेटी पर देने की चर्चाएं भी प्रकाश में आईं थी। बताया जाता है कि उक्त पेटी कांट्रेक्टर ने सद्भाव कंपनी पर हर्जाना वसूलने का नोटिस जारी कर दिया गया है।
 
बताया जाता है कि गुजरात मूल के मालिकों की सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा सिवनी से खवासा तक का सड़क निर्माण का काम युद्ध स्तर पर किया गया था। इस ठेके का अस्सी प्रतिशत काम सद्भाव कंपनी ने 2008 के समाप्त होने के पहले पहले ही निपटा दिया गया था। शेष 20 प्रतिशत काम को सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी को अक्टूबर 2010 तक पूरा करना था। हालात देखकर यह कहा जा रहा है कि सद्भाव कंपनी जानती थी कि इस सड़क के निर्माण में पेंच फंसने वाले हैं, अतः अपना मुख्य काम उसने जल्द ही निपटा लिया था।
 
सद्भाव कंपनी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि अक्टूबर 2008 में ही सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी ने अपना काम रोककर अपनी पूरी मशीनरी को सिवनी से मण्डला, दिल्ली के पास रोहतक एवं महाराष्ट्र के धूलिया के आसपास के सड़क के काम हेतु भिजवा दिया गया था। सड़क निर्माण में फंसे पेंच के चलते सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी ने विवादित स्थल पर काम करने का ठेका भोपाल मूल की एक कंपनी को पेटी पर दे दिया था। बताया जाता है कि इस काम के लिए सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी ने करोड़ों रूपए की राशि भी पेशगी के तौर पर दे दी थी।
 
भोपाल मूल की उक्त कंपनी द्वारा खवासा के निकट अपना केम्प बनाकर सड़क निर्माण के लिए आवश्यक मशीनरी जुटा कर संस्थापित भी करवा ली थी। कहा जा रहा है कि इसके उपरांत जब लगभग एक साल तक भोपाल की उक्त कंपनी को काम करने को नहीं मिला तो कंपनी द्वारा सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी के उपर हर्जे खर्चे का दावा कर दिया है। एक तो करोड़ों रूपए अग्रिम देना फिर काम न मिलना उसके उपरांत सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी पर हर्जे खर्चे के दावे की खबरों से दाल में काला ही नजर आने लगा है।
 
कहा जा रहा है कि भूतल परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के द्वारा निर्मित किए जाने वाले उत्तर दक्षिण गलियारे में निविदा में यह शर्त रखी गई थी कि अगर काम को निर्धारित समयावधि में ठेकेदार द्वारा पूरा नहीं किया जाता है तो सरकार को ठेकेदार से और अगर देरी सरकार की ओर से होती है तो ठेकेदार को सरकार से पेनाल्टी वसूलने का अधिकार है। यह पेनाल्टी बहुत अधिक बताई जाती है।

बताया जाता है कि सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा अपने पेटी कांटेªक्टर के माध्यम से खुद पर ही हर्जे खर्चे का प्रकरण बनवाया जा रहा है ताकि उस आधार पर सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा सरकार से मनमानी पेनाल्टी वसूली जा सके। इस मामले में सिवनी जिले के जनसेवकों के साथ ही साथ फोरलेन बचाने के लिए आगे आए ठेकेदारों का मौन भी संदेहास्पद ही माना जा रहा है।

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

खेल मंत्री ने दी सांसदों के अधिकार क्षेत्र को ही चुनौती

क्या हम आजाद भारत गणराज्य में हैं!

गिल की नौकरशाही मानसिकता का घोतक है उनका वक्तव्य

सदन में नहीं आरटीआई में मिलेगी घपलों की जानकारी

खेल होने तक खुली छूट है भ्रष्टाचार करने की

(लिमटी खरे)

भारत गणराज्य के संसदीय इतिहास में पहली मर्तबा एसा हुआ होगा कि किसी कबीना मंत्री ने देश के माननीय कहे जाने वाले संसद सदस्यों के अधिकार क्षेत्र को ही चुनौति दे डाली हो। राष्ट्रमण्डल खेलों में हो रहे जबर्दस्त भ्रष्टाचार के बारे में सवाल जवाब और हंगामों के दौर के बीच भारत के खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल ने कहा कि अगर किसी को धांधली की जानकारी चाहिए तो उसे सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करना चाहिए, उन्हें हर बात का जवाब मिल जाएगा।

कामन वेल्थ गेम्स में आयोजन समिति से जुड़े लोगों की वेल्थ के मामले में हो रही चर्चा के दौरान जब जवाब देने के लिए भारत के खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल खडे हुए तब उन्होंने जो कहा वह भारत के संसदीय इतिहास में आज तक किसी ने भी नहीं कहा। भारत के खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि विपक्षी दलों के सदस्यों को अगर खेलों के आयोजन में हो रही धांधली की आशंका है तो वे सूचना के अधिकार के कानून के तहत प्रश्न पूछें, उन्हें सारे जवाब मिल जाएंगे।

सांसद आवक थे क्योंकि सदन में पहली बार किसी मंत्री ने यह कहने की जुर्रत की है कि जनता के नुमाईंदों वह भी सबसे बडी पंचायत के सदस्यों के सवालों के जवाब सदन से नहीं वरन् किसी दूसरे तंत्र के माध्यम से मिलेंगे। सदन में जब राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी जैसे तजुर्बेकार और सीनियर लीडरान मौजूद हों तब भारत के खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल द्वारा इस तरह का बयान देना अपने आप में खुद ही अचंभे से कम नहीं है। गिल ने सीधे सीधे सांसदों के प्रश्न पूछने के अधिकार क्षेत्र को ही चुनौती दे डाली है।

मनोहर सिंह गिल ने जिस तरह से देश की सबसे बड़ी पंचायत में सांसदों के अधिकार को चुनौति दी है, उसे किसी भी कीमत पर न तो स्वीकर ही किया जा सकता है, और न ही उस पर बहस ही की जाने की आवश्यक्ता है। मनोहर सिंह गिल का वक्तव्य एक तरह से सदन की अवमानना की श्रेणी में आता है। यह जनादेश प्राप्त भारत गणराज्य के नीति निर्धारकों के संवैधानिक हनन की श्रेणी में आता है।

मंत्री चाहे शशि थरूर रहे हों या मनोहर सिंह गिल, सभी के बड़बोलेपन से जाहिर हो चुका है कि कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के मंत्रियों को यह जानकारी भी नहीं है कि सांसदों के अधिकार और कर्तव्य क्या हैं? केंद्र या राज्य सरकार में मंत्री बनाने के लिए क्या कोई पैमाना निर्धारित है? या जिसे चाहे उसे लाल बत्ती सौंपकर देश और प्रदेश की जनता का भाग्य उनके हाथ में दे दिया जाता है? यह निश्चित तौर पर निंदनीय माना जाएगा।

वैसे देखा जाए तो राजनैतिक बियावान में चहलकदमी करने वाले भारत के खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल मूलतः नौकरशाह रहे हैं। गिल के इस कथन को उनकी नौकरशाह वाली मानसिकता से जोड़कर भी देखा जाना चाहिए। मनोहर सिंह गिल जब बोल रहे थे तो उनका अंदाज नेता का कम अफसराना ज्यादा प्रतीत हो रहा था। वे भूल गए कि वे भी उसी व्यवस्था का अंग हैं, जो कानून को बनाती है। कानून बनाने वालों द्वारा आम तौर पर जब तब अफसरों की खाल बचाने का कुत्सित प्रयास किया जाता है, संभवतः गिल ने भी यही सोचा होगा कि कानून बनाने वाले उनके विभाग पर लगने वाले अरबों खरबों के भ्रष्टाचार के मामलों को दबा लेंगे। अमूमन लोकतंत्र में सरकार के हर मंत्री के किसी भी निर्णय को या सरकार के किसी भी निर्णय को एक दूसरे का पूरक ही माना जाता है। जानकारों का कहना है कि संवैधानिक तौर पर संसद के उपर कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि कानून बनाने का अधिकार भी संसद को ही प्राप्त है।

खेल मंत्री का यह तर्क भी गले नहीं उतरता है जिसमें उन्होंने कहा कि अगर किसी तरह की जांच की जरूरत हो तो जांच कराई जाएगी, किन्तु 15 अक्टूबर के बाद। उधर सुरेश कलमाडी कहते हैं कि वे त्यागपत्र देने को तैयार हैं, बशर्ते सोनिया गांधी उनसे कहें। और सोनिया गांधी हैं कि देशवासियों के गाढे पसीने की कमाई को यूं ही आग लगते देख रही हैं। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी अगर इस मामले में मौन हैं तो भ्रष्टाचार के प्रति यह उनकी मौन सहमति क्यों न मान लिया जाए।

कामन वेल्थ गेम्स में दिल्ली में भ्रष्टाचार की एक छोटी सी बानगी जहां चाहे वहां देखने को मिल सकती है। सड़कों किनारे फुटपाथ पर लगे चेकर टाईल्स को अभी कुछ माह पहले ही लगाया गया था, इन्हें निकालकर दोबारा लगाया जा रहा है। ये चेकर टाईल्स पुराने अलग ही प्रतीत हो रहे हैं। इन्हें लगाने का काम भी बला टालू और बेतरतीब तरीके से ही किया जा रहा है। दो माह बाद जब इसकी जांच होगी तब पाया जाएगा कि दो महीनों में ये रखरखाव के अभाव में टूट फूट गए हैं। एक स्थान के पत्थर निकाल कर दूसरे स्थान पर नए बातकर लगाए जा रहे हैं। इस तरह ठेकेदार और सरकार का तंत्र मिलकर भारत गणराज्य की जनता का टेक्स के रूप में दिया पैसा बहाया जा रहा है।

केंद्र सरकार को इस बात का जवाब जनता को देना ही होगा कि जब धर्मशाला में सांसद द्वारा महज 45 करोड़ रूपयों में स्टेडियम का निर्माण करवा दिया जाता है, तब दिल्ली के बने बनाए नेहरू स्टेडियम के पुर्नुद्धार में 900 करोड़ रूपए कैसे लग जाते हैं। यक्ष प्रश्न आज भी यही खड़ा हुआ है कि जब राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी भारत को 2003 में मिल गई थी, और इसके बाद मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार 2004 से 2009 तक राज करती रही तब खेलों के प्रति सरकार 2008 में देर सबेर कैसे जागी? वहीं दूसरी ओर दिल्ली में भी 13 सालों से कांग्रेस का ही शासन है।

उधर राष्ट्रमण्डल खेल महसंघ (सीजीएफ) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइक हूपर भी कामन वेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए दिल्ली के तैयार न होने से चिंतित नजर आ रहे हैं। उनका तर्क विचारणीय है कि कामन वेल्थ गेम्स पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोप उन्हें भी भयाक्रांत कर रहे हैं। हूपर की चिंता बेमानी नहीं है कि गेम्स 03 अक्टूबर से आरंभ होने को हैं, अगस्त का आधा माह बीत चुका है, अब जबकि काउंट डाउन आरंभ हो चुका है, तब भी तैयारियां अधूरी हैं।

यह तो तय हो चुका है कि कामन वेल्थ गेम्स के आयोजन की तैयारियों में भारत गणराज्य की रियाया का खून पसीने का पैसा तबियत से उडाया गया है। देश ही नहीं विदेशों में भी इस महा भ्रष्टाचार के खेल पर छींटाकशी की जा रही है। भारत सरकार है कि शतुरमुर्ग के मानिंद रेत में सर गड़ाकर अपने आप को इससे बरी महसूस कर रही है। सवाल यह है कि आखिर वैश्विक छवि बनाने के लिए चिंतित भारत सरकार इस तरह के भ्रष्टाचार को करवाकर कौन सा वैश्विक चेहरा बनाने जा रही है भारत गणराज्य का।

समूचा देश मंहगाई की आग में झुलस रहा है। मंहगाई क्यों बढी है? जाहिर है अगर हजारों करोड़ रूपए खेल खेल में भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढा दिए जाएंगे तो जनता का तेल निकलना स्वाभाविक ही है। देश का मीडिया चीख चीख कर कह रहा है कि गेम्स के नाम पर हजारों करोड़ रूपए भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए हैं। मीडिया सबूत भी दे रहा है, पूरा भारत गणराज्य इस बात को मान रहा है, सिवाय देश के वजीरे आजम डॉ.मन मोहन सिंह, कांग्रेस की सबसे ताकतवर महिला श्रीमति सोनिया गांधी और भारत के खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल के।

फोरलेन विवाद का सच ------------07

ठेकेदार को लाभ पहुंचाने होती है सड़क परियोजनाओं में देरी

दो साल से रूका है सिवनी जिले में फोरलेन के निर्माण का काम

संसद की समिति ने कटघरे में खड़ा किया भूतल परिवहन मंत्रालय को

जाने अनजाने लोग भी प्रशस्त कर रहे हैं ठेकेदारों के लाभ के मार्ग

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश भर में परिवहन के साधन के लिए सड़कों को बेहतर तरीके से जाना जाता है। देश भर में सड़कों का जाल बिछाने का जिम्मा केंद्र सरकार के भूतल परिवहन मंत्रालय के जिम्मे ही है। मंत्रालय में पदस्थ अफसरान और सड़क निर्माण में लगे ठेकेदार मिलकर जनता से करों के माध्यम से वसूले गए एक एक पैसे में किस तरह आग लगाते हैं यह जादू तारीफे काबिल होता है। यह सब कुछ इतनी सफाई से होता है कि जनता के कानों में आहट तक नहीं आ पाती है।

पिछले दिनों सड़क परियोजनाओं में होने वाली देरी के कारण संसद की एक समिति ने भूतल परिवहन मंत्रालय और नेशनल हाईवे अथारिटी ऑफ इंडिया की जमकर खिंचाई कर दी है। परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी संसदीय समिति ने कहा है कि ठेकेदारों को अधिक मुनाफा देने के लिए परियोजनाओं में जानबूझकर विलंब किया जाता है। समिति का आरोप है कि इसके पीछे बाकायदा भ्रष्ट अधिकारियों, दलालों, दागी ठेकेदारों का काकस काम करता है। मंत्रालय के सचिव स्वयं भी इस समिति के सामने इस हकीकत को स्वीकार कर चुके हैं।

सांसद सीताराम येचुरी की अध्यक्षता वाली संसद की स्थाई समिति ने अपने प्रतिवेदन में कहा है कि लेटलतीफी से परियोजना की लागत बढ जाती है, जिससे मिलने वाला मुनाफा भ्रष्ट अधिकारी, दलाल और ठेकेदार आपस में बांट लेते हैं। समिति ने सिफारिश भी की है कि इस गठजोड को तोडने के लिए सड़क परिवहन मंत्रालय को प्रभावी कदम उठाने चाहिए। समिति ने इस बात पर भी आपत्ति व्यक्त की है कि लेट लतीफी का शिकार दर्जनों परियोजनाओं के लिए महज एक ही ठेकेदार को काली सूची में डाला गया है।

समिति का कहना है कि खराब प्रदर्शन करने वाले ठेकेदारों को बाकायदा सूचीबद्ध कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही सुनिश्चित होना चाहिए। समिति ने साफ तौर पर यह बात कही है कि भूमि अधिग्रहण, वन एवं पर्यावरण विभाग सहित संबंधित विभागों की अनुमति की औपचारिकता के उपरांत ही ठेका दिया जाना चाहिए। समिति ने भूमि अधिग्रहण की ढीली चाल पर एनएचएआई को भी आडे हाथों लिया।

गौरतलब होगा कि उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारे में मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में सड़क निर्माण करा रही दोनों कंपनियां मीनाक्षी और सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी का सड़क निर्माण का काम अक्टूबर 2008 से बंद पड़ा हुआ है। इसका कारण सिवनी जिले में वन विभाग एवं जिला कलेक्टर की अनुमति न होना प्रमुख है। इस लिहाज से दोनांे ही कंपनियों को सरकार से जो पेनाल्टी वसूल करना है वह काफी अधिक मात्रा में हो चुकी है।

सिवनी के लोगों द्वारा भी जिला कलेक्टर के 18 दिसंबर 2008 के आदेश को ठंडे बस्ते में डालकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की लडाई लडकर परोक्ष तौर पर ठेकेदारों के द्वारा सरकार से वसूली जाने वाली पेनाल्टी को कई गुना और कई दिनों तक बढाने का ही काम किया है। वस्तुतः अगर उसी दौरान जिला कलेक्टर का आदेश निरस्त हो जाता तो सड़क निर्माण का काम पूरा हो जाता। देखा जाए तो न्यायालय जाने की तैयारियों और अन्य व्यवधानों के बीच सीईसी एवं अन्य लोगों को सर्वोच्च न्यायालय में अपना प्रतिवेदन या पक्ष रखने का पर्याप्त मौका मुहैया करवा दिया गया, जिससे मामला और उलझ गया है।

राजधानी दिल्ली के कानूनविदों के अनुसार अगर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा काम रोका नहीं गया है तो फिर जिला कलेक्टर सिवनी के 18 दिसंबर 2008 के पत्र से गैर वन क्षेत्रों में सड़क निर्माण और वृक्षों की कटाई के लिए फोरलेन बचाने के ठेकेदार वर्तमान जिला कलेक्टर से मिलने में परहेज क्यों कर रहे हैं। देखा जाए तो कलेक्टर का उक्त आदेश अगर वन क्षेत्रों में वृक्षों की कटाई रोकता है तो यह महज नौ किलोमीटर का मसला होगा, शेष भाग में तो सड़क का निर्माण आरंभ हो ही जाएगा!

संकट में है सागर विश्‍वदयालय की मान्यता

छिन सकता है सागर से केंद्रीय विद्यालय का दर्जा

भूल से मिला है सागर यूनिवर्सिटी को केंद्रीय दर्जा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 12 अगस्त। अपने जमाने की मशहूर रहे मध्य प्रदेश के सागर में संचालित होने वाले डॉ.हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा कभी भी छीना जा सकता है। इस यूनिवर्सिटी को भूल से केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है। यह बात सागर के भाजपाई सांसद भूपेंद्र सिंह ने उजागर की है।

दरअसल सांसद सिंह ने सागर में एक अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने की मांग केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री कपिल सिब्बल के समक्ष रखी थी। सिब्बल के साथ मुलाकात के उपरांत जो तथ्य प्रकाश मंे आए हैं उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि जल्द ही सागर विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा वापस लिया जा सकता है।

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के करीबी सूत्रों का कहना है कि भाजपा सांसद सिंह के साथ चर्चा के दौरान सिब्बल ने यह स्वीकार किया कि मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा ऋुटीवश मिला है। वस्तुतः सागर में नया केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव भेजा जाना चाहिए था।

सूत्रों ने आगे कहा कि केंद्रीय मानव सांसाधन एवं विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने इस बात पर अपनी सैद्धांतिक सहमति जता दी है कि अगर सागर में नए केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने का प्रस्ताव उनके मंत्रालय को प्राप्त होता है तो वे सागर में नया केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलना पसंद करेंगे, साथ ही दशकों पुराने डॉ.हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय से केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा वापस भी ले लेंगे।

गौरतलब है कि सागर विश्वविद्यालय दशकों पुराना विश्वविद्यालय है, जहां अध्यायापन का स्तर अपने आप में एक मायने रखता है। बताते हैं कि कानूनविद डॉ.हरसिंह गौर ने अपने एक अंग्रेज मित्र से सागर की पहाड़ी को विश्वविद्यालय के लिए आवंटित करवाकर यहां यूनिवर्सिटी की परिकल्पना की थी। आज सागर विश्वविद्यालय के प्रोडक्ट देश विदेश में इस विश्वविद्यालय का नाम रोशन कर रहे हैं।