गुरुवार, 5 मई 2011

साईबेरियन पक्षियों का असर दिख रहा है मंत्रियों पर

काम की आड़ में आराम के मूड में दिख रहे मंत्री

यूरोप अमरिका की सरकारी यात्राओं के हो रहे मार्ग प्रशस्त
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। अप्रेल माह में जब सूर्य देव अपना कहर दिखाना आरंभ करते हैं तब देश की दिशा और दशा तय करने वाले मंत्रियों की बेचैनी बढ़ने लगी है। मई में जब भगवान भास्कर अपने पूरे शबाब पर होते हैं तब यूरोप और अमरिका की हसीन वादियों की ठंडी हवाओं का मजा ही कुछ और होता है। यही कारण है कि दिल्ली में मंत्रियों के स्टाफ द्वारा अपने हाकिमों की विदेश यात्रायों के मार्ग प्रशस्त किए जाने लगे हैं।
गौरतलब है कि सर्दियां आते ही भारत गणराज्य के मुक्त गगन में विदेशी विशेषकर साईबेरियन पक्षियों की तादाद अचानक ही बढ़ जाती है। उसी तरह मई जून माह में भारत की गर्मी से आजिज आकर ठंडे प्रदेशों की ओर पलायन करने वाले मंत्रियों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा महसूस किया जाता है।
विदेश यात्रा के दौरान तीन फायदे हुआ करते हैं। एक तो ठंडी हवाएं परेशान नहीं करतीं, दूसरे इसी बहाने सरकारी काम काज निपटाना और तीसरा और अंतिम तथा अटल उद्देश्य कि इसी बहाने विदेशों में फैले अपने कारोबारों की मानिटरिंग भी हो जाती है। विदेश यात्राओं के लिए चर्चित अनेक मंत्रियों का स्टाफ इन दिनों परेशानी में है, इसका कारण इस साल जनवरी में हुआ मंत्रीमण्डल फेरबदल है। नए विभागों में गए कुछ मंत्रियों का विभागीय प्रोफाईल ही एसा है कि उसमें विदेश यात्रा का क्या काम? फिर भी नए सिरे से सरकारी खच्र पर विदेश जाने का जुगाड़ खोजा ही जा रहा है।
उधर मई आते आते वित्त मंत्रालय का बटुआ बुरी तरह कंपकपाने लगता है। आखिर इन सरकारी कम निजी यात्राओं का भोगमान तो आखिर उसे ही भोगना है। मंत्री निश्चिंत दिख रहे हैं, क्योंकि मंदी का दौर गया, और सादगी के प्रहसन पर से भी पर्दा गिर चुका है। खर्च में कटौती और किफायत का फरमान प्रधानमंत्री वैसे भी वापस ले ही चुके हैं।

उड़ने वाली राख गिरेगी जंगलों में, करेगी उर्वरक का काम

. . . तो गुलजार हो जाएंगे घंसौर के जंगल
 
पावर प्लांट्स की राख से बढ़ सकती है जमीन की उर्वरता
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली । थर्मल पावर प्लांट्स की चिमनी से निकलने वाली राख (फ्लाई एश) के मिट्टी मंे मिलने से जमीन की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है। यह निष्कर्ष वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के एक इंस्टीट्यूट ने निकाला है। अगर एसा हुआ तो मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर (कहानापस) के बरेला में लगने वाले पावर प्लांट से निकलने वाली फ्लाई एश से क्षेत्र के जंगल गुलजार हो जाएंगे।
मिनिस्ट्री ऑफ फारेस्ट एण्ड एनवार्यमेंट के सूत्रों का कहना है कि इस तरह का सफल प्रयोग दिल्ली मंे किया जा चुका है। नेशनल थर्मल पावर कार्पोरेशन द्वारा दिल्ली के दादरी स्थित प्लांट से निकलने वाली राख को आसपास के ग्रामीणों मंे वितरित किया। दावा किया जा रहा है कि मिट्टी में मिली इस राख से वहां की उर्वरक क्षमता अचानक ही बढ़ी है। वहीं अनेक शोध यह भी बताते हैं कि फ्लाई एश अनेक मामलों में घातक भी है।
एनटीपीसी का दावा है कि इस राख से फल, सब्जियां, फूलों की खेती यहां तक कि वन विभाग चाहे तो इस राख को जंगलों में बिखेर कर वनों की मिट्टी की उर्वरक क्षमता को बढ़ा सकता है। वर्तमान में इन संयंत्रों से निकलने वाली राख का उपयोग सीमेंट और सीमेंट की ईंट बनाने के लिए किया जाता है। साथ ही साथ चिमनी से उड़ने वाली राख से आसपास के जल स्त्रोत दूषित हुए बिना नहीं रहते हैं।

निजी भूमि पर शासन द्वारा करोड़ों के भवन निर्माण

निजी भूमि पर शासन द्वारा करोड़ों के भवन निर्माण
(अभिषेक दुबे)
सिवनी (मध्य प्रदेश)। गोपालगंज में निर्मित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा स्वास्थ्य केन्द्र में पदस्थ कर्मचारियों के लिए निर्मित आवासीय भवन जो करोड़ों रूपये से निर्मित हुए हैं, अभी तक प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर एवं शासकीय अधिकारियों के कथन अनुसार वे निजी स्वामित्व की भूमि पर निर्मित हुए हैं। हालांकि शासन द्वारा अवैध रूप से निर्मित किये गये भवनों पर अपना कब्जा करने के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य खोज लिया जायेगा। परंतु सवाल यह उठता है कि आखिर करोड़ों रूपये के भवन किसी अन्य की भूमि पर बिना किसी स्वीकृति के निर्मित कैसे कर लिये गये और अब जब भूमि स्वामी द्वारा आपत्ति लगायी जा रही है तो जिम्मेदार अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है। जिस भूमि पर करोड़ों रूपये के उक्त भवन निर्मित हुए हैं वह भूमि न तो स्वास्थ्य विभाग के अधिकार क्षेत्र की है और न अन्य किसी शासकीय मद की। इसके बावजूद भी यह बात समझ से परे है कि उक्त भवनों के निर्माण के लिए तकनीकि स्वीकृति एवं प्रशासकीय स्वीकृति बिना खसरा नंबर और नक्शे के कैसे प्राप्त हुई होगी? जानकारी के अनुसार इन भवनों के निर्माण के लिए पंचायत का भी कोई प्रस्ताव नहीं है। भूमि विक्रय के लिए भू-स्वामी द्वारा भूमि विक्रय प्रमाणपत्र हेतु जब नायब तहसीलदार के यहां आवेदन लगाया गया तो तहसीलदार द्वारा पटवारी का अभिमत एवं सीमाकंन के लिए निर्देश दिये गये। संबंधित पटवारी द्वारा पूरा मामला स्पष्ट करते हुए नक्शा सहित प्रतिवेदन सौंपा गया जिसमें उसने उल्लेख किया है कि खसरा क्र. 71,73 का रकबा सिमरत सिंह पाल के नाम पर दर्ज है। खसरा कालम 12 में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र निर्मित है। पटवारी द्वारा मौके का सीमांकन किया गया। सीमांकन के दौरान सिमरत पाल द्वारा नियुक्त मुख्तयार नरेंन्द्र ठाकुर एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से गोपालगंज के कर्मचारी उपस्थित रहे हैं। इस भूमि के स्वामित्व को लेकर नायब तहसीलदार न्यायालय द्वारा स्वास्थ्य विभाग से दस्तावेजों की मांग की जाती रही परंतु स्वास्थ्य विभाग के द्वारा किसी भी प्रकार के दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराये गये। तब भूमि स्वामी सिमरत पाल के मुख्तयार को जमीन विक्रय प्रमाणपत्र नायब तहसीलदार द्वारा जारी कर दिया गया। वर्तमान में स्वास्थ्य विभाग के लिए निर्मित करोड़ों रूपये के भवन सिमरत पाल की भूमि पर बने हैं, जिसके पास की खाली जगह उसके द्वारा निशा ठाकुर को बेच दी गई है। जानकारों का कहना है कि करोड़ों रूपये के भवन शासन द्वारा किसी के भी अधिकार क्षेत्र की भूमि पर बिना उसकी स्वीकृति के नहीं बनाये जा सकते। यदि मामला न्यायालय में जायेगा तो निर्णय शासन के पक्ष में आना संभव नहीं है। ऐसी स्थिती में शासन का करोड़ों रूपये बर्बाद हो सकता है और यह जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही का बड़ा कारण साबित होगा। भवन निर्माण की स्वीकृति बिना खसरा नंबर, नक्शा और भूमि पर अधिकार के पत्र के बिना कैसे प्राप्त हुई और भवनों का निर्माण कैसे हुआ यह पूरा मामला बुरी तरह उलझ गया है। काम का पूर्णता प्रमाणपत्र (सी.सी.) जारी भी हो चुकी है और अंकेक्षण भी इतने सारे चरणों से भवन निर्माण की प्रक्रिया गुजरने के पश्चात यदि यह मामला बिना भूमि अधिकार पत्र के सामने आता है तो अंधेरगर्दी ही कही जायेगी। इस पूरे प्रकरण में जिला कलेक्टर द्वारा नायब तहसीलदार को निलंबित कर दिया गया है, जिससे पूरा मामला और अधिक उलझता दिखायी दे रहा है।
 
क्या कहती हैं आरोपी अधिकारी
निलंबित नायब तहसीलदार, अनीता भोयर का कहना है कि उनकेे द्वारा राजस्व नियमों के अनुसर ही पटवरी का प्रतिवेदन प्राप्त होने पर भूमि स्वामी के अधिकार क्षेत्र की भूमि होने के दस्तावेज अवलोकन तथा स्वास्थ्य विभाग द्वारा भूमि के किसी भी प्रकार के दस्तावेज प्रस्तुत न करने के कारण विक्रय प्रमाणपत्र जारी किया गया था। उनका निलंबन किस कारण किया गया है इसकी उन्होंने कोई जानकारी नहीं है वे अभी शहर से बाहर हैं, सिवनी पहुंचने पर कलेक्टर से चर्चा की जाएगी।
दूसरी ओर सिवनी के मुख्य जिला चिकित्सा अधिकारी का कहना है डॉ. वाय.एस. ठाकुर का कहना है कि जिला कलेक्टर द्वारा हुई रजिस्ट्री को शून्य कराने के लिए निर्देश प्राप्त हुए हैं, जिसके लिए आवेदन लगाना है, कानूनी सलाहकारों से इस संबंध में सलाह ली जा रही है। निर्मित भवनों की भूमि पर आधिपत्य से संबंधित कोई दस्तावेज या दानपत्र विभाग के पास उपलब्ध नहीं है, परंतु ऐसा कहा जा रहा था कि भू-स्वामी हरनाम सिंह पाल (जो अब इस दुनिया में नहीं है) के द्वारा भूमि दान में देने के लिए कहा गया था परंतु विभाग न तो दान पत्र लिखा पाया और न भूमि का विभाग के पक्ष में नामांतरण हुआ। स्वास्थ्य विभाग को भवन निर्माण कर पी.डब्ल्यू.डी. ने दिया है। हमारी कोशिश होगी कि निर्मित भवनों की भूमि का दान पत्र भू-स्वामी से लिखा लिया जाये ।

सोमवार, 2 मई 2011

मध्य प्रदेश भवन का टूटा बोर्ड


नई दिल्ली क बुरदलोई मार्ग पर स्थित मध्य प्रदेश भवन का टूटा बोर्ड जहां आए दिन महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्री जाकर रूकते हैं।

डीजीसीए के नियम महज कागजों पर


हवा में तैरता रोमांच और खतरे!

अतिविशिष्ट व्यक्तियों के परिवहन में लापरवाही क्यों?

(लिमटी खरे)

अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू का हेलीकाप्टर लापता है। लगातार खोज के बाद भी उनका कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है। खराब मौसम खोजबीन में आड़े आ रहा है। अरूणाचल प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय से कहा था कि पवन हंस के चौपर की सेवाएं बंद कर दी जाएं क्योंकि वे उड़ान के काबिल ही नहीं हैं।
सवाल यही है कि अतिविशिष्ट व्यक्तियों के हवाई मार्ग से परिवहन में लगे हवाई जहाज या हेलीकाप्टर पर लगाम कौन लगाए? इसके लिए संचालक नागर विमानन (डीजीसीए) को पाबंद किया गया है। डीजीसीए द्वारा समय समय पर दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं किन्तु शायद इसके द्वारा यह सुनिश्चित नहीं किया जाता है कि उनके नियमों का पालन हो भी रहा है या नहीं।
हेलीकाप्टर में न जाने कितने राजनेता असमय ही काल के गाल में समा चुके हैं फिर भी अतिविशिष्ट व्यक्तियों के लिए आज भी यह अहम सवारी ही बना हुआ है। वैसे हेलीकाप्टर एक फ्रांसिसी शब्द है जो ग्रीक भााा के हेलिक्स टेरान शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ है घूमने वाला पंख। दुर्गम स्थानों, पहाडियों, जंगलों, बाढ़ ग्रस्त इलाकों में इसकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता है।
देश का हर जनसेवक नेता चाहता है कि वह हेलीकाप्टर की उड़ान अवश्य भरे, ताकि उसके रसूख में बढ़ोत्तरी हो सके। अनेक राजनेताओं के निजी बेड़े मंे विमान और हेलीकाप्टर का शुमार है, जिसके माध्यम से वे अपने दल या विपक्षी दलों के लोगों को उपकृत कर अहसानों में दबा देते हैं।
इसके अलावा अमीरजादों के पास भी हेलीकाप्टर का होना दर्शाता है कि अब यह सहज सुलभ परिवहन का साधन हो चुका है। इसके लिए लंबी चौड़ी हवाई पट्टी की आवश्यक्ता नहीं होती है। इसे खेत खलिहान, छोटे मैदान यहां तक कि किसी की छत पर भी उतारा जा सकता है।
इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि हेलीकॉप्टर के प्रारूप की नींव 1480 में पड़ी। तब लियोनार्दो दा विंची ने हवा में उड़ने वाली एक एसी मशीन का डिजाईन तैयार किया जो लंबवत उड़ान भरने में सक्षम था। इसके बाद रूस के भिखाइल लोमोनोसोव ने 1754 में दो पंखों वाले एक छोटे यंत्र को आकाश में उड़ाने में अंततः सफलता पा ही ली।
उस दौर में पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता नहीं थी अतः 1861 में फ्रांस के गुस्ताव डी.पोंटोन डीएमकोर्ट ने भाप से चलने वाले एक हेलीकाप्टर का माडल बनाया। 16 साल इस पर काम करने के बाद अंततः 1877 में मिलान में इस हेलीकाप्टर के बदले और छोटे स्वरूप ने 20 सेकण्ड तक 43 फुट की उड़ान भरी।
उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ मंे एक बार फिर हेलीकाप्टर पर शोध आरंभ हुए और 1907 में पाल कोर्नू ने छः मीटर वाले दो पंखों और 18 किलोवाट के हेलीकाप्टर के इंजन को बनाया जो था तो काफी उन्नत किन्तु यह भी महज 20 सेकन्ड की उड़ान ही भर पाया। 1930 में इटली के कोराडिनो ने दो पंखो वाले हेलीकाप्टर को बनाया जो वास्तव में हेलीकाप्टर के इतिहास में मील का पत्थर ही साबित हुआ। वर्तमान समय में राबिन्सन बेल और डॉल्फिन कंपनी के हेलीकाप्टर दुनिया भर में धूम मचाए हुए हैं।
बहरहाल यह तो हुई हेलीकाप्टर के शैशव काल की कहानी। भारत में हेलीकाप्टर की सवारी गांठना राजनेताओं का प्रिय शगल बनकर रह गया है। इसमंे हेलीकाप्टर क्रेश होने की अनेक घटनाओं के बाद भी न तो डीजीसीए ही इस मामले में सख्त हुआ और न ही नागरिक उड्यन मंत्रालय ने ही इसमें रूचि दिखाई है।
इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही मध्य प्रदेश सरकार के सरकारी उड़न खटोले के इंदौर के पास गिर जाने से सुप्रसिद्ध गायिका अनुराधा पोडवाल घायल हो गईं थीं। 2009 में खराब मौसम के कारण ही सुषमा स्वराज का हेलीकाप्टर भटककर सागर जिले मंे चला गया था। बाद में बड़ी मशक्कत के बाद हेलीकाप्टर को सही जगह मिली।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का हेलीकाप्टर अप्रेल 2009 में खराब मौसम के चलते ही निर्धारित गन्तव्य से सात किलोमीटर दूर उतारा गया। इतना ही नहीं इसे सागर के एक हाईवे पर उतारना पड़ा। उस वक्त अगर कोई वाहन आ जा रहा होता तो दुर्घटना से इंकार नहीं किया जा सकता था।
इसके अलावा मध्य प्रदेश के सतना में ही हेलीकाप्टर का पाईप फट जाने से उसे अलग स्थान पर उतारना पड़ा था। पचमढ़ी मंे सोनिया गांधी के साथ जा रहे कांग्रेस के आला नेताओं के हेली काप्टर का पंख क्षति ग्रस्त हो गया था, जिसे पायलट ने जान जोखिम में डालकर उतारा था।
इसी तरह सितम्बर 2009 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी सहित पांच लोगों को ले जाने वाले हेलीकाप्टर हादसे में उनका निधन हो गया था। इसके अलावा इसी साल नितिन गड़करी का हेलीकाप्टर पांशकुडा से परूलिया जाते वक्त तूफान में फंस गया था, जिसे बाद में जमशेदपुर में उतारा गया। 19 अप्रेल को तवांग के पास पवन हंस का एक हेलीकाप्टर दुर्घटना ग्रस्त हो गया था जिसमें चालक दल सहित 17 लोगों की मौत हो गई थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया का निधन भी हवाई जहाज हादसे में ही हुआ था।
जब अतिविशिष्ट व्यक्तियों की प्रिय सवारी बन ही चुका है हेलीकाप्टर और हवाई जहाज तब संचालक नागर विमानन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय आखिर इनकी सुरक्षा में कोताही क्यों बरतते हैं। देखा जाए तो हेलीकाप्टर के फ्यूल का परिवहन संगीनों के साए होना चाहिए किन्तु इसे निजी वाहनों में ले जाया जाता है, जिससे कभी भी दुर्घटना होने की आशंका बनी रहती है। इसी तरह सूर्यास्त के उपरांत भी लोगों द्वारा नियम विरूद्ध हेलीकाप्टर की उड़ान जारी रखी जाती है। सवाल फिर वही है कि जब हेलीकाप्टर सूर्यास्त के उपरांत हवा में तैरता है तो क्या वह संबंधित एयर ट्रेफिक कंट्रोल (एटीसी) के रडार की जद में नहीं आता, और अगर आता है तो एटीसी द्वारा उस पायलट को ग्राउंडेड करने की सिफारिश आखिर क्यों नहीं की जाती है? कुल मिलाकर डीजीसीए, सिविल एविएशन मिनिस्ट्री की मिलीभगत से ही सब कुछ चल रहा है। जिसका भोगमान व्हीव्हीआईपीज अपनी जान देकर ही भुगत रहे हैं।

शिवराज बनाम भूरिया चल पड़ी है जंग


चर्चा मंे हैं एमपी के मामा

दरकती दिख रही है कांग्रेस की एकता

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में इन दिनों देश के हृदय प्रदेश के ‘‘मामा‘‘ चर्चा में हैं। एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद को सूबे के बच्चों का मामा बताते आए हैं तो अब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नवनियुक्त अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने खुद को असली मामा बता दिया है।
बीते दिनांे भूरिया के पदभार ग्रहण करने के दौरान कांग्रेस की कथित एकता रेली में मामाओं पर की गई टीका टिप्पणी की दिल्ली में जमकर चर्चाएं हो रही हैं। इसी दौरान सांसद सज्जन सिंह वर्मा द्वारा यह बात भी कह दी गई कि इतिहास में दो ही मामाओं का उल्लेख मिलता है एक कंस मामा और दूसरे शकुनि मामा। वर्मा शायद बचपन के चंदा मामाको भूल गए।
पांव पांव वाले भईया के नाम से चर्चित शिवराज सिंह चौहान द्वारा बच्चों और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखकर आरंभ की गई योजनाओं के कारण सूबे में उन्हें लोग मामा के नाम से जानने लगे हैं, उधर आदिवासियों के बीच कांतिलाल भूरिया को भी मामा के रूप में पहचाना जाता है।
खबरों के अनुसार कांतिलाल भूरिया के हाथों मध्य प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपे जाने के उपरांत सूबे में सुस्सुप्तावस्था में पड़ी काग्रेस में कुछ हलचल अवश्य ही महसूस की जा रही है। एकता रैली में कमल नाथ, दिग्जिवय सिंह, सुरेश पचौरी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरूण यादव जैसे क्षत्रपों का एक मंच पर आना भी कांग्रेस के लिए सुखद संयोग से कम नहीं था, किन्तु समारोह में सिंधिया का महज शक्ल दिखाकर लौट जाना और कमल नाथ तथा प्रदेश प्रभारी महासचिव बी.के.हरिप्रसाद का वहां न पहुंचना भी चर्चाआंे और चटखारों का केंद्र बना हुआ है।

रविवार, 1 मई 2011

बिना सेफ्टी सर्टिफिकेट के चल रहे हैं देश भर में स्कूल

बारूद के ढेर पर देश के नौनिहाल!

आपदा प्रबंधन के मानकों का सरे आम उड़ रहा माखौल

नई दिल्ली (ब्यूरो)। आपदा प्रबंधन के उपाय का केंद्र सरकार द्वारा समय समय पर राग अवश्य ही अलापा जाता है, किन्तु जब जमीनी हकीकत सामने आती है तब आपदा प्रबंधन के दावों की कलई खुल जाती है। केंद्र और राज्यों की सरकारें इस बारे में कितनी संजीदा है इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि स्थानीय निकायों के फायर विभाग से सेफ्टी सर्टिफिकेट लिए बिना देश भर में पंचानवे प्रतिशत स्कूलों का संचालन किया जा रहा है।

अग्निशमन महकमे के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि शालाओं को सुरक्षा प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य है। इसके लिए शाला में आग बुझाने के पर्याप्त इंतजामात होना जरूरी है। इसके साथ ही साथ भवन में निकस के लिए दो सीढ़ियां, हर कक्षा में निकासी हेतु दो दरवाजों की अनिवार्यता बताई गई है। इनमें दरवाजों को कक्ष के अंदर के स्थान पर बाहर खुलना जरूरी है। शालाओं में रेत की बाल्टियां और फायर एक्सटिनगशिर जो एक्सपाईरी डेट का न हो हर कक्ष में होना अनिवार्य है।

उल्लेखनीय होगा कि देश भर में संचालित होने वाले सरकारी स्कूलों के अलावा निजी तौर पर खुली शिक्षा की दुकानों में भी आग से निपटने के पर्याप्त इंतजामात नहीं है। इतना ही नहीं निजी तौर पर संचालित होने वाली कोचिंग कक्षाओं में भी आग लगने की स्थिति में निपटने के कोई ठोस उपाय नहीं है, जिससे छोटा सा हादसा भी विकराल रूप धारण कर सकता है।

0 दिल्ली में आधे से अधिक टावर हैं अवैध

मोबाईल टावर पर निगम नहीं लगा सकता फीस


0 सीलिंग के बाद बढ़ सकती है नेटवर्क प्राब्लम

नई दिल्ली (ब्यूरो)। रिहाईशी इलाकों में मोबाईल टावर की संस्थापना पर स्थानीय निकाय द्वारा फीस नहीं लगाई जा सकती है, उक्ताशय की व्यवस्था दिल्ली उच्च न्यायलय द्वारा दी गई है। न्यायालय ने कहा है कि यद्यपि मोबाईल टावर लगाने की अनुमति स्थानीय निकाय द्वारा ही दी जाती है, किन्तु उन पर फीस लगाने या बढ़ाने का अधिकार नगर पालिका या निगम को नहीं है।

गौरतलब होगा कि दिल्ली नगर निगम की सीमा में संस्थापित मोबाईल टावर की फीस एक लाख से बढ़ाकर पांच लाख रूपए कर दी गई थी। जिसके विरोध में मोबाईल सेवा प्रदाता संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। दिल्ली के 12 जोन में संस्थापित 5459 में से 2777 टावर अवैध रूप से लगाए गए हैं।

सुनवाई के उपरांत कोर्ट ने व्यवस्था दी कि एमसीडी को माबाईल टावर के लिए महज एक बार ही प्रोसेसिंग फीस लेने का अधिकार है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और स्थानीय निकायों को भी आदेश दिया कि वे बिल्डिंग बायलाज में इस तरह के बदलाव करें कि इसमें टावर लगाने की बात को शामिल किया जा सके। कोर्ट ने एमसीडी की इस दलील से इत्तेफाक जताया है जिसमें कहा गया है कि सकरी गलियों वाले मकानों और संरक्षित इमारतों पर टावर नहीं लगाए जा सकते हैं।

‘अमूल बेबी‘ की आरटीआई के मायने

‘अमूल बेबी‘ की आरटीआई के मायने

(लिमटी खरे)

‘‘भारत गणराज्य का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि देश की सबसे बड़ी पंचायत के सदस्य सांसद को ही घपले घोटाले के तह में पहुंचने के लिए सूचना के अधिकार के अस्त्र का प्रयोग करना पड़े। राहुल देश के सबसे बड़े ख्यातिलब्ध और शक्तिशाली परिवार के न केवल सदस्य हैं वरन् उत्तर प्रदेश से सांसद भी हैं, फिर केंद्र पोषित योजना के बारे में उन्होंने संसद जैसे सही मंच का इस्तेमाल आखिर क्यों नहीं किया? क्या राहुल गांधी संसद में प्रश्न पूछकर वास्तविकता से रूबरू नहीं हो सकते? रीता बहुगुणा की आरटीआई को दाखिल करने का स्वांग आखिर राहुल गांधी ने क्यों रचा यह बात अभी भी विचारणीय ही है। मीडिया ने भी इस बात को इस तरह उछाला मानो राहुल गांधी द्वारा रीता बहुगुणा का विधानसभा या लोकसभा का पर्चा दाखिल करवाया गया हो।


राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनएचआरएम) में उत्तर प्रदेश को केंद्र द्वारा आवंटित राशि में जमकर घालमेल हुआ है। इसी बात की तह में पहुंचने के लिए कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी द्वारा लखनऊ स्थित एनएचआरएम के मुख्यालय जाकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा की ओर से सूचना के अधिकार के तहत एक आवेदन जमा करवाया है। जन सूचना अधिकारी ए.के.मिश्रा को दिए इस आवेदन में 17 सवाल पूछे गए हैं। मिश्रा ने राहुल को बताया कि संबंधित विभाग से जानकारियां मंगाकर तय समय सीमा में इसका जवाब दे दिया जाएगा।

भारत गणराज्य की अवधारणा लोकतंत्र (जनतंत्र) पर आधारित है। आजादी के उपरांत समय चक्र घूमा और फिर जनता के उपर तंत्र भारी पड़ने लगा। ‘जनता का, जनता द्वारा जनता के लिए‘ शासन की अवधारणा धूल में मिल गई। जनसेवकों द्वारा जनता के हितों को गौढ़ कर दिया गया और निहित स्वार्थ परवान चढ़ने लगे। जनता के पैसों से जनसेवकों द्वारा एश करने के मार्ग प्रशस्त किए जाते रहे। भूखी प्यासी देश की जनता करों के बोझ से दबती गई और जनसेवकों की जेबें इसी पैसों की बंदरबांट से फूलती चली गईं।

एक समय था जब राजनीति को जनता की सेवा का माध्यम समझा जाता था, किन्तु आज राजनीति व्यवसाय विशेषकर खानदानी व्यवसाय बनकर रह गई है। सरकारी तंत्र में अगर लोकसेवक (सरकारी कर्मचारी) का निधन हो जाता था तो उसके परिजन को अनुकंपा नियुक्ति देने का प्रावधान किया गया था। कालांतर में यह प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया और अनुकंपा नियुक्ति को अघोषित तौर पर राजनेताओं ने अपना लिया। किसी नेता के अवसान होने पर उसके वारिस को टिकिट देकर सिंपेथी वोट बटोरने का सिलसिला चल पड़ा है।

राहुल गांधी राजनीति का ककहरा अनेक दिग्गज और घाघ नेताओं से सीख रहे हैं। उन्हें कदम कदम पर तरह तरह के मशविरे भी दिए जाते हैं। अनेक मर्तबा तो राहुल गांधी उपहास के पात्र भी बने हैं। दिल्ली से चंडीगढ़ तक उन्होंने शताब्दी ट्रेन मंे यात्रा कर सादगी का नायाब प्रदर्शन किया। बाद में जब पोल खुली तो पता चला कि राहुल के लिए पूरी एक बोगी ही रिजर्व करवा दी गई थी। राहुल के इस ‘सादगी प्रहसन‘ का भोगमान आखिर देश की जनता ने ही भोगा, इसके लिए राहुल गांधी की जेब से कुछ खर्च नहीं हुआ।

राहुल गांधी को महिमा मण्डित करने के लिए कांग्रेस के प्रबंधकों ने मीडिया तक में सेंध लगा दी। मीडिया मुगलों को जेब में रखकर राहुल का महिमा मण्डन का काम बरकरार ही रखा गया है। कभी वे कलावती के घर जाकर रात गुजार देते हैं, तो कभी किसी दलित के घर जाकर खाना खाते हैं। मीडिया में इन बातों को जमकर तवज्जो दी जाती है। कम ही लोग जानते हैं कि राहुल के किसी के घर रात गुजारने के पहले एसपीजी का पूरा दस्ता महीनों उस इलाके की खाक छानता रहता है। एमपी के टीकमगढ़ के टपरिया गांव में एक महिला ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए राहुल से मदद मांगी। राहुल ने बीस हजार रूपए देने का वायदा भी किया, पर निभाया नहीं। उस वायदे को निभाया मध्य प्रदेश के निजाम और सूबे के बच्चों के मामा शिवराज सिंह चौहान ने।

निस्संदेह राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन भारत सरकार की एक महात्वाकांक्षी योजना है, इसमें कोताही कतई बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। रीता बहुगुणा बेशक सूचना के अधिकार के तहत इसमें होने वाली गड़बड़ियों का पता लगाकर सच्चाई पर से पर्दा उठा दें, किन्तु राहुल गांधी को इस तरह उनका संवाहक बनना शोभा नहीं देता है।

राहुल गांधी जनप्रतिनिधि हैं, कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार केंद्र में सत्तारूढ़ है। केंद्र की अनेक योजनाओं को राज्यों की गैर कांग्रेसी सरकारें अपना बताकर अपने सूबों में इसका प्रचार प्रसार कर फायदा उठा रही हैं। केंद्र पोषित कमोबेश हर योजना में भ्रष्टाचार की गंध आ रही है, जिसकी निंदा की जानी चाहिए। इसके लिए जिम्मेवार दुराचारियों को सीखचों के पीछे भेजा जाना आवश्यक है।

रीता बहुगुणा की आरटीआई को लगाने खुद राहुल गांधी का जाना आश्चर्यजनक है। अगर राहुल गांधी वाकई में चाहते हैं कि इस योजना में हुए घपले घोटालों पर से पर्दा उठे तो उन्हें चाहिए कि संसद में मौन रहने वाले ‘अमूल बेबी‘ संसद में इस बारे में अपनी जुबान अवश्य खोलें। वस्तुतः एसा होगा नहीं, क्योंकि राहुल गांधी यह सब कुछ उत्तर प्रदेश मंे पब्लिसिटी गेन करने की गरज से ही कर रहे हैं। यक्ष प्रश्न तो यह है कि टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, नीरा राडिया कांड़, कामन वेल्थ घोटाला, चांवल घोटाला आदि के वक्त कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी की नैतिकता आखिर कहां चली गई थी, जो इस बारे में वे पूरी तरह मौन ही धारण किए हुए हैं। पीएसी में जो कुछ हुआ वह भी किसी से छिपा नहीं है, जोड़ तोड़ की राजनीति के चलते देश का ध्यान घपलों घोटालांे से हटाने का कुत्सित प्रयास कर रही है देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस पार्टी, जिसकी निंदा की जाना चाहिए।

प्रश्न तो यह है कि अगर वास्तव में उत्तर प्रदेश में मायावती द्वारा केंद्र पोषित एनएचआरएम योजना में गिद्ध लूट की है और उसकी सतही जानकारी ही सही, अगर वह भी राहुल गांधी के पास है तो उन्हें इस मामले को पुरजोर तरीके से संसद में उठाना चाहिए। उनके पास जनता के द्वारा दिया गया जनादेश है। संसद एक उचित प्लेट फार्म है जहां इस बात को रखा जाना चाहिए, किन्तु राहुल गांधी के प्रशिक्षकों ने उन्हें यह करने से मना ही किया होगा, क्योंकि एसा करने से कांग्रेस शासित राज्यों में केंद्र की इमदाद से चलने वाली योजनाओं में हो रहे बंदरबांट को भी बेपर्दा करना होगा।

मीडिया की कारस्तानी पर भी अचरज ही होता है। आखिर क्या वजह है कि रीता बहुगुणा के सूचना के अधिकार के आवेदन को राहुल गांधी का आवेदन बताकर इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी टीआरपी और वेब व प्रिंट अपनी पाठक संख्या बढ़ाने पर आमदा है। सच्चाई सबके सामने है यह आरटीआई रीता बहुगुणा के नाम से है न कि राहुल गांधी के नाम से। मीडिया के मार्फत राहुल गांधी का जबरिया महिमा मण्डल तत्काल बंद होना चाहिए।

राहुल का मिशन यूपी टांय टांय फिस्स

युवराज के आदर्शों की होली जलाती कांग्रेस

एमपी में उड़ रहा राहुल की सुधारवादी नसीहतों का मजाक

 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की नजर में भविष्य के वजीरेआजम राहुल गांधी के अरमानों पर कोई और नहीं उन्हीं की माता श्रीमति सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पानी फेरती जा रही है। यूपी के उपचुनावों में राहुल गांधी के मिशन 2012 की हवा निकल चुकी है। उधर मध्य प्रदेश में युवक कांग्रेस चुनावों में भी राहल की सुधारवादी नसीहतों को दरकिनार करने से नहीं चूक रही है कांग्रेस।

2009 में हुए लोकसभा चुनावों के नतीजे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए आशा की किरण लेकर आए थे। आंकड़े के बाजीगरों ने राहुल गांधी को आंकड़ों मंे उलझाकर मिशन 2012 का आगाज करवा दिया जिसके तहत उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनावों में मायावती को उखाड़ फेंकने के साथ ही साथ वहां कांग्रेस की सरकार बनाने का दावा किया जा रहा है।

हाल ही में यूपी में हुए विधानसभा उपचुनाव ने मिशन 2012 की कलई खोलकर रख दी है। उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक उपचुनाव हारने के बाद मजबूरी में पिपराईच विधानसभा सीट पर उपचुनाव के दौरान कांग्रेस को समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार राजमति देवी का समर्थन करना पड़ा।

उधर मध्य प्रदेश में युवक कांग्रेस के चुनावों में राहुल गांधी का टेलेंट हंट कार्यक्रम भी जड़ से ही उखड़ चुका है। केंद्र में सक्रिय मध्य प्रदेश के क्षत्रपों के मोहरे इन चुनावों में दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं, इस तरह की सूचनाओं से राहुल गांधी खासे नाराज बताए जा रहे हैं। एआईसीसी में चल रही चर्चाओं के अनुसार राहुल गांधी के रणनीतिकारों के इशरों पर मध्य प्रदेश युवका कांग्रेस का चुनाव विधानसभा चुनावों मंे तब्दील होकर रह गया है। लोग दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं, और हर तरीके से लुभा रहे हैं अपने अपने मतदाता को।

दुर्गम इलाकों में तैनात देश के सपूतों के लिए सेना का नया प्रस्ताव

विमान से घर तक जाएंगे जवान!

रक्षा मंत्रालय के पास है प्रस्ताव विचाराधीन

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की सीमा और दुर्गम इलाकों पर देश की रक्षा करने वाले जवानों के लिए खुशखबरी है कि उन्हें उनके घरों के पास वाले हवाई अड्डे तक विमान से भेजा जाएगा। वर्तमान में दूरदराज इलाकों में तैनात जवानों को एयर इंडिया और जेट एयरवेज के चार्टर्ड विमानों से दिल्ली और कोलकता भेजा जाता है, जहां से वे अपने घरों तक जाने के लिए रेल मार्ग पर ही निर्भर हैं। जवानों की इस यात्रा का खर्च रक्षा मंत्रालय द्वारा उठाया जाता है।

गौरतलब है कि भारतीय रेल में सेना के लिए आरक्षित कोटा कम होने से जवानों को तरह तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही साथ उत्तर और पूर्वोत्तर के पहाड़ों के दुर्गम इलाकों में तैनात जवानों को समीपस्थ रेल्वे स्टेशन पहुंचने में काफी समय लग जाता है।

उधर सेना द्वारा जवानों पर कराए गए सर्वे में एक बात उभरकर सामने आई है कि जवानों के अंदर तनाव का प्रमुख कारण जवानों को अवकाश मिलने में होने वाली परेशानियां ही प्रमुख है। वैसे सेना द्वारा अपने जवानों को तनावरहित रखने के लिए चार्टर्ड विमान सेवाएं ले रखी हैं। इनमें एयर इंडिया की लेह से दिल्ली के बीच सप्ताह में पांच दिन, श्रीनगर से दिल्ली सप्ता में चार और इंफाल से कोलकता के बीच सप्ताह में एक दिन तथा जेट एयरवेज की थॉयस से दिल्ली सप्ताह में दो बार विमान सेवाएं उपलब्ध हैं। वायूसेना के विमान गुवहाटी से दिल्ली, चंडीगढ़ से लेह और श्रीनगर के बीच उड़ाने भरते हैं।

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

महज कानून बनाने से नहीं रूकने वाला उत्पीड़न चक्र

आदि अनादि काल से प्रताडि़त होती आईं हैं महिलाएं

कानून तो बहुतेरे पर इनका पालन नहीं है सुनिश्चित

(लिमटी खरे)

पुरानी कहावत है -‘‘. . ., गंवार, पशु और नारी, ये सब हैं ताड़न के अधिकारी।‘‘ इसमें नारी को शामिल किया गया है। एक तरफ तो नारी को माता का दर्जा देकर सबसे उपर रखा गया है, वहीं दूसरी ओर नारी को ही प्रताड़ना का अधिकारी बताया जाना कहां तक न्यायसंगत है। नारी के जिस स्वरूप को मनुष्य द्वारा मां के रूप में पूजा जाता है, वही नारी आखिर पत्नि या बहू के तौर पर प्रताडि़त करने की वस्तु क्यों बन जाती है।

सालों पहले एक पत्रकार द्वारा लिखा गया था -‘हमारे घरों की मां बहने जब सड़क पर निकला करती हैं तो वे दूसरों के लिए माल बन जाया करती हैं।‘ उस बात मे वाकई दम है। हमारा समाज अपने घरों की महिलाओं को छोड़कर जब दूसरे घरों की महिलाओं को देखता है तो मन में लड्डू फूटने लगते हैं मुंह से सीटी और सिसकारियां निकल जाती हैं, मन में कलुषित भावनाएं कुलाचें मारने लगती हैं।

भारत गणराज्य में नारियों की अस्मत को बचाने के लिए कानूनों की कमी नहीं है। हाल ही में राजस्थान सरकार द्वारा महिलाओं पर होने वाले अत्याचार रोकने के लिए कड़े कानून बनाने के लिए कुछ प्रावधान किए हैं, जिनका स्वागत होना चाहिए। वर्तमान परिदृश्य में चहुं ओर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की कमी नहीं है। कहीं दहेज के लिए बहू को जलाया जा रहा है, तो कहीं युवतियों तो छोडि़ए अबोध बालाओं का शील भंग किया जा रहा है, कहीं सरेआम रेल गाड़ी से महिला को फेंक दिया जाता है।

एसा नहीं है कि भारत गणराज्य में महिलाओं को सुरक्षित रखने के लिए कानूनों की कमी है। महिलाओं के हितों के लिए काननू अवश्य हैं किन्तु उनमें इतनी पोल हैं कि अपराधी सीखचों के पीछे जाने से सदा ही बच जाते हैं। देश के कमोबेश हर प्रदेश में महिलाएंे सुरक्षित नहीं कही जा सकती हैं। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली जहां पर कि खुद एक महिला तीसरी बार निजाम बनी हैं, उसी शीला दीक्षित के राज में महिलाओं की रोज होने वाली दुर्गत किसी से छिपी नहीं है।

देश भर में कार्य स्थलों में महिलाओं का यौन उत्पीड़न किसी से छिपा नहीं है। खुद मीडिया में ही महिलाओं की स्थिति क्या है यह बात सभी बेहतर जानते हैं। कहीं महिलाओं से बेगार करवाया जाता है, तो कहीं पुलिस थाने में ही महिला की अस्मत लूट ली जाती है, चैक चैराहों, मदिरालयों के इर्द गिर्द से गुजरने वाली महिलाओं को अश्लील फब्तियां कसी जाती हैं। कार्यालय में बाॅस अपनी महिला कर्मी को लांग ड्राईव पर ले जाने ख्वाईशमंद हुआ करते हैं। आजकल कार्पोरेट जगत में महिलाओं के योन उत्पीड़न के शब्दकोश में एक नया शब्द जुड गया है वह है ‘कापरेट करना‘ जिसका अर्थ अपने सीनियर्स की मनमानी को खामोश रहकर सहते हुए कापरेट करने से जोड़कर देखा जाता है।

राजस्थान सरकार ने वाकई एक नायाब पहल की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि महिलाओं के हितों के संवर्धन के लिए राजस्थान सरकार के प्रयास निश्चित तौर पर नजीर बनकर उभरेंगें। कहने को तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने अपने आप को सूबे के हर बच्चे का मामा घोषित किया है। अर्थात सबे की हर मां उनकी बहन है, किन्तु क्या शिवराज सिंह चैहान राजनैतिक चश्मा उतारकर सीने पर हाथ रखकर यह कहने का साहस कर पाएंगे कि उनके राज में महिलाएं सुरक्षित हैं, जवाब निश्चित तौर पर नकारात्मक ही होगा।

भारत अघोषित तौर पर पुरूष प्रधान देश माना जाता रहा है जहां पुरूषों का काम आजीविका कमाकर लाना और महिलाआंे का काम दो वक्त की रोटी बनाकर घर के काम काज करने के साथ ही साथ बच्चे पैदा करने की मशीन के तौर पर काम करने तक ही सीमित था। आधुनिकता के दौर में महिलाओं ने घरों की चैखट लांघ दी है। महिलाएं आज पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। एक तरफ तो सभ्य समाज होने का हम दंभ भरते हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं को प्रताडि़त कर इसी सभ्य समाज के पुरूष गौरवांवित हुए बिना नहीं रहते हैं।

इस देश की इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि जिस देश की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज हों उस देश में महिलाओं को अपने आप को सुरक्षित रखने के तरीके तलाशने पड़ रहे हों। जहां महिलाएं ही सर्वोच्च पदों पर आसीन हों वहां भी महिलाएं असुरक्षित हों तो निश्चित तौर पर व्यवस्था में कहीं न कहीं दीमक अवश्य ही लगा हुआ है।

राजस्थान सरकार ने कानून बनाने के प्रावधानों की पहल करके एक नई सुबह का आगाज किया है। ध्यान इस बात का रखा जाना चाहिए कि कानून बनकर एसे कानून की किताबों के सफांे पर ही कैद होकर न रह जाएं। इन्हें व्यवहारिक तौर पर लागू करना सुनिश्चित करना होगा। इसमें आवश्यक है कि कानून का पालन न करने वाले जिम्मेदार नौकरशाहों और कर्मचारियों को भी सजा के दायरे में लाना जरूरी है।

केंद्र सरकार को चाहिए कि इस संवेदनशील और गंभीर मसले पर राज्यों के साथ वह सर जोड़कर बैठे और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कार्ययोजना तैयार करे। इसके लिए इस बात को ध्यान में रखा जाना नितांत जरूरी है कि कानून एसे हों जिनका उल्लंघन करने पर व्यक्ति को समझ में आ जाए कि आखिर उसने कितना बड़ा जुर्म किया है। इससे और लोगों को नसीहत भी मिल सकेगी। इसके लिए मीडिया की भी यह जवाबदेही बनती है कि वह भी इस तरह सजा वाली खबरों को प्रमुखता से जनता के सामने लाए और महिलाओं का उत्पीड़न करने का मानस बनाने वालों के हौसले पस्त करे।

दहेज प्रताड़ना, हरिजन आदिवासी कानून की आड़ में निर्दोष लोगों को प्रताडि़त करने की खबरें मिला करती हैं। इसके लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि महिलाओं को प्रताडि़त करने से बचाने के लिए बनने वाले कानूनों में यह प्रावधान भी किया जाए कि कोई महिला या उसके परिजन द्वारा इस कानून का बेजा इस्तेमाल न किया जा सके। हमारी राय में यही इकलौता रास्ता होगा जिसके जरिए महिलाओं को उत्पीड़न से बचाया जा सकता है।

लाईव टीवी का मजा नहीं ले सकेंगे भोपाल शताब्दी वाले

लास्ट प्रार्यरटी में है भोपाल शताब्दी

एम पी के जनप्रतिनिधियों को नहीं है रेलों की परवाह

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से विभिन्न राज्यों को जाने वाली शताब्दी एक्सप्रेस रेल गाडियों के एक्जीक्यूटिव क्लास के यात्रियों के मनोरंजन के लिए लाईव टीवी योजना का आगाज किया जा रहा है। पहले चरण में लगभग आधा दर्जन शताब्दी रेल में इसे डिश टीवी के माध्यम से सजीव प्रसारण किया जाएगा। भारतीय रेल की फेहरिस्त में भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस को अंतिम वरीयता पर रखा गया है।


रेल्वे के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि दिल्ली से कालका के बीच चलने वाली शताब्दी एक्सप्रेस में पहले से रिकार्डेड प्रोग्राम दिखाए जाने के उत्साहजनक परिणाम आने के बाद रेल्वे ने डिश टीवी के माध्यम से सीधा प्रसारण दिखाने की योजना को हरी झंडी दे दी है। रेल्वे बोर्ड ने इस काम को अंजाम देने के लिए जोनल बोर्ड को ही सारे अधिकार दे दिए हैं।


सूत्रों ने आगे बताया कि उत्तर रेल्वे द्वारा दिल्ली से कालका, अमृतसर, लखनऊ, देहरादून, अजमेर जाने वाली शताब्दी एक्सप्रेस के एक्जीक्यूटिव क्लास दर्जे में इस काम को अंजाम दिया जा रहा है। उधर अहमदाबाद, रांची, बंग्लुरू, चेन्नई, मैसूर आदि के बीच भी शताब्दी एक्सपे्रस की सेवाएं हैं किन्तु वहां काम कुछ समय बाद आंरभ होगा।


सूत्रों ने यह भी कहा कि दिल्ली से देश के हृदय प्रदेश भोपाल जाने वाले 12001 / 12002 नंबर की शतब्दी भारतीय रेल की वरीयता सूची में बेहद पीछे है। यही कारण है कि इस शताब्दी के एक्सप्रेस में सफर करने वाले यात्रियों को ज्यादा सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं। मध्य प्रदेश कोटे से केंद्र मंे मंत्री कमल नाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरूण यादव और कांतिलाल भूरिया सहित लोकसभा के 29 और राज्य सभा के 10 सांसदों द्वारा भी रेल सुविधाओं के मामले में पुरजोर आवाज न उठा पाने से मध्य प्रदेश में घटिया रेल सेवाओं की मार सीधे सीधे यात्रियों पर ही पड़ रही है।



ठक टिक की बिदाई

तीन सौ साल पुराने साथी को अलविदा कहेगी दुनिया

टाईपराईटर के साथ कार्बन और टाईप रिबिन भी होंगे विलुप्त प्रजाति में शामिल

(लिमटी खरे)

एक समय में ठक टिक की आवाज के साथ गर्व से सीना ताने चलने वाला टाईपराईटर अब इतिहास की वस्तु हो गया है। कम ही जगहों पर टाईपराईटर देखने को मिला करते हैं। भारतीय सिनेमा की जासूसी फिल्मों में टिक टिक की आवाज के साथ शबदों को कागज पर उतारने वाले टाईपराईटर के अक्षरों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया जाता रहा है। कोर्ट कचहरी, अर्जीनवीस, समाचार पत्र, सरकारी कार्यालयों आदि में टाईपराईटर की आवाज बहुत ही मधुर हुआ करती थी। कालांतर में इसका स्थान कम्पयूटर के बेआवाज की बोर्ड ने ले लिया। अब तो हर जगह डेक्स टाप या लेपटाप की ही धूम है। अस्सी के दशक के बीतने तक टाईपिंग सिखाने वालों की दुकानें रोशन हुआ करती थीं।

टाईपराईटर का उत्पादन कर रही दुनिया की आखिरी कंपनी गोदरेज एण्ड बोएस ने अब इसका उत्पादन नहीं करने का फैसला लिया है। निश्चित तौर पर यह समय की मांग है किन्तु सालों साल उत्पादन करने वाली कंपनी ने भारी मन से यह फैसला लिया होगा, कंपनी के कर्मचारियों और मालिकों की पीड़ा को समझा जा सकता है। कंपनी के पास लगभग दो सौ टाईपराईटर हैं जिन्हें वह एंटीक के बतौर उसी तरह बेच सकती है जिस तरह आज ग्रामो फोन लोगों के घरों की बैठक की शान बन गए हैं।

अस्सी के दशक तक मीडिया में प्रिंट का दबदबा चरम पर था, (है तो आज भी किन्तु इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया के आगे इसकी छवि उतनी उजली नहीं बची है) इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। उस समय संपादकों द्वारा वही रचनाएं प्रकाशन के लिए स्वीकार की जाती थीं, जो सुपाठ्य अक्षरों में या टाईप की हुई हुआ करती थीं। न जाने कितने चलचित्र की पटकथा भी इन्ही टाईपराईटर से कागजों पर उतरी होंगी। कहते हैं कि हालीवुड के मशहूर किरदार जेम्स बांड की सुपर डुपर हिट फिल्मों के लेखक इयान फ्लेमिंग के पास एक सोने का बना टाईपराईटर था।

दुनिया के चैधरी अमेरिका में 1714 में हेनरी मिल द्वारा इस मशीन का अविष्कार किया था। इसके लगभग डेढ़ सौ साल के लंबे सफर के उपरांत क्रिस्टोफर लाॅमथ शोलेज द्वारा इसे 1864 में अंतिम बार नया रूप दिया और तब से इसका स्वरूप यही बना रहा। टाईपराईटर का व्यवसायिक उत्पादन 1867 में आरंभ हुआ था। 1950 के आते आते टाईपराईटर की लोकप्रियता लोगों के सार चढ़कर बोलने लगी। सरकारी कामकाज में टाईपराईटर का उपयोग जरूरी महसूस किया जाने लगा। इसी दौरान अमेरिका की कंपनी स्मिथ कोरोन ने दस लाख टाईपराईटर बेचकर रिकार्ड कायम किया। 1953 में तो दुनिया भर में एक करोड़ बीस लाख टाईपराईटर बिके।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ टाईपराईटर में एक बार फिर तब्दीली महसूस हुई उस दौरान सामान्य टाईपराईटर से डेढ़ गुना बड़े आकार का इलेक्ट्रानिक टाईपराईटर बाजार में आया। इसमें मेमोरी थी, जिसमें कुछ प्रोफार्मा बनाकर सेव किए जा सकते थे। यह काफी हद तक लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसमें टाईपिस्ट को एक ही पत्र को बार बार टाईप नहीं करना होता था। इलेक्ट्रानिक टाईपराईटर की सांसे जल्द ही उखड़ गईं और इसका स्थान ले लिया कंप्यूटर ने।

कोर्ट कचहरी और भवन भूखण्डों की रजिस्ट्री के लिए अर्जीनवीस कार्यालय में टाईपिंग की स्पीड देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे, जब वे टाईपिंग मशीन पर बैठे व्यक्ति को एक ही उंगली से फर्राटे के साथ टाईप करते देखते थे। टाईपिंग करने वाले का की बोर्ड पर एक ही उंगली से निशाना गजब का होता था, जिसमें गल्ति की गुंजाईश ही नहीं होती थी। एक समय था जब टाईपिंग की परीक्षा आहूत होती थी, इसमें हर परीक्षार्थी को टाईपिंग मशीन साथ लाना अनिवार्य होता था। टाईपिंग की परीक्षा प्राप्त आवेदकों को स्टेनोग्राफर, टाईपिस्ट या क्लर्क की नौकरी में वरीयता भी मिला करती थी।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कंप्यूटर ने अपनी आमद दी। धीरे धीरे यह समाज पर छा गया। मुख्य तौर पर देखा जाए तो टाईपराईटर के लिए कंप्यूटर ही दुश्मन या सौतन साबित हुआ। टाईपिंग के प्रशिक्षण के लिए खुले संेटर वीरान होने लगे, शार्ट हेण्ड और टाईपिंग की विधा में से टाईपिंग भर जिंदा मानी जा सकती है, शार्ट हेण्ड तो अब गुजरे जमाने की बात हो चली है। रही बात टाईपिंग सीखने की तो कंप्यूटर के की बोर्ड पर उंगलियां चलाते चलाते बच्चे आसानी से टाईपिंग सीखने लगे हैं। हिन्दी की टाईपिंग जरा मुश्किल है, किन्तु अंगे्रजी की टाईपिंग बेहद आसान मानी जाती है। अब तो हिन्दी के शब्दों के स्टीकर की बोर्ड पर लगाकर बच्चे आसानी से हिन्दी मंे टाईप करने लगे हैं। हालात देखकर लगने लगा है मानो बच्चे मां के पेट से ही टाईपिंग सीखकर आ रहे हैं।

तीस साल की हो रही पीढ़ी इस परिवर्तन की साक्षात गवाह मानी जा सकती है जिसने टिक ठक से लेकर बेआवाज की बोर्ड तक का सफर अपनी नंगी आंखों से देखा होगा। इस पूरे बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि टाईपराईटर की जवान पीढ़ी कंप्यूटर का की बोर्ड आज भी लोकप्रिय रही टाईपराईटर कंपनी रेमिंगटन के नाम पर आज भी धडल्ले से चल रहा है।

हर चीज जो पैदा होती है उसका अंत अवश्य ही होता है। कहा जाता है कि मनुष्य और उसके द्वारा निर्मित हर प्रोडक्ट कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है, उसका अवसान सुनिश्चित है। टिक टक की ध्वनि के साथ शब्दों को कागज पर उकेरने वाले टाईपराईटर ने लगभग तीन सौ सालों तक एक छत्र राज्य किया, अंत में वह मानव निर्मित संगणक (कंप्यूटर) के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया है।

टाईपराईटर में शब्दों का आकार सीमित हुआ करता था, किन्तु उसके परिष्कृत स्वरूप कंप्यूटर में हिन्दी अंगे्रजी उर्दू सहित अनेक भाषाओं के अनगिनत फाॅन्टस के साथ ही साथ उनका आकार (साईज) भी मनमाफिक करने की सुविधा है। एक ओर जहां टाईपराईटर से टाईप करने पर गल्ति होने पर उसमें व्हाईट फ्लूड लगाना या फिर उस शब्द पर दूसरा शब्द बार बार टाईप करना होता था उसके स्थान पर कंप्यूटर पर स्क्रीन पर ही पढ़कर उसमें करेक्शन किया जा सकता है।

टाईपराईटर के अवसान के साथ ही साथ इसके सहयोगी अव्यव टाईप रिबिन और कार्बन भी आने वाले समय में विलुप्त हो जाएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अनेक चीजें एसी हैं जो समय के साथ ही बाजार से गायब तो हो चुकी हैं, पर गाहे बेगाहे, उनकी चर्चा होने पर पुनः उन प्रोडक्ट्स से जुड़ी मीठी यादें ताजा हो जाया करती हैं। उसी प्रकार जिन लोगों ने टाईपराईटर को देखा या उसका उपयोग किया है, उनके मानस पटल से लंबे समय तक टाईपराईटर विस्मृत होने वाला नहीं।

गोविंदा के बाद अब सलमान पर डाल रही कांग्रेस डोरे

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

गोविंदा के बाद अब सलमान पर डाल रही कांग्रेस डोरे

कांग्रेस का जनाधार धीरे धीरे घटता ही जा रहा है। देश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस अब कुछ सूबों में ही सिमटकर रह गई है। युवाओं को लुभाने के लिए कांग्रेस ने वालीवुड के सितारों का राजनीति में आने का प्रयोग किया। कुछ हद तक यह प्रयोग सफल रहा। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, सुनील दत्ता, गोविंदा और सुनील दत्त की पुत्री प्रिया आदि इसके नायाब उदहारण माने जा सकते हैं। अब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी और सलमान खान के बीच छनने वाली खबरों से लगने लगा है कि सल्लू मियां जल्द ही कांग्रेस खेमे में आने वाले हैं। भारत श्रीलंका के वल्र्ड कप फायनल में युवराज राहुल अपने आठ दोस्तों के साथ मुंबई गए। सूत्रों की मानें तो भारत की जीत की खुशी में कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने मुंबई के वर्ली इलाके में पार्टी आरंभ की। आधी रात के बाद जब पार्टी का सुरूर चढ़ा तब राहुल का एक मित्र उन्हें सलमान खान के घर ले गया। बताते हैं कि वहां पार्टी अलहसुब्बह भोर की पहली किरण उगने तक अर्थात छः बजे तक चली। इस बात की चर्चा दिल्ली के सियासी गलियारों में जमकर हो रही है।



बेरोजगार होने वाले हैं जोशी!

डाॅ.मुरली मनोेहर जोशी जल्द ही बेरोजगार हो सकते हैं। दरअसल उनके नेतृत्व वाली पीएसी का कार्यकाल इसी माह की तीस तारीख को पूरा होने वाला है। पीएसी का भाव इन दिनों इसलिए भी बढ़ा हुआ है, क्योंकि टू जी स्पेक्ट्रम मामला इसके पास विचाराधीन है। भाजपा के अंदरखाते से जो खबरें आ रही हैं, वे बताती हैं कि जोशी पर दबाव है कि वे इस विवादित मामले पर पीएसी का प्रतिवेदन इसी सप्ताह के अंत तक अर्थात 28 या 29 तारीख तक पेश कर दें। वैसे एक मई को नई पीएसी का गठन किया जाना प्रस्तावित है। नई पीएसी के लिए सियासी बिसात बिछ चुकी है, कांग्रेस और भाजपा द्वारा इसके लिए गलाकाट खींचतान आरंभ कर दी है। देखना यह है कि इस महत्वपूर्ण मामले में जोशी अपने कार्यकाल में टूजी मामले की रिपोर्ट प्रकाश में ला पाते हैं या फिर नए अध्यक्ष के जिम्मे यह काम सौंपा जाता है।



अशांति है शांति के घर पर!

जनता पार्टी के समय में कानून मंत्री रहे और 1980 में भाजपा की स्थापना वर्ष में पार्टी के उपाध्यक्ष रहे शांति भूषण की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकती साफ दिखाई दे रही हैं। भूषण एण्ड संस अच्छा खासा काम धंधा शांति के साथ कर रहे थे। बाद में अन्ना हजारे का साथ देने के कारण वे कांग्रेस के निशाने पर आ गए। एक के बाद एक विवादों में भूषण बंधुओं को उलझाया जा रहा है। कभी इलाहाबाद में बीस करोड़ का मकान महज एक लाख में खरीदने तो कभी नोएडा में भूखण्ड का मामला, तो कभी हिमाचल के पालमपुर के मकान की जांच। भूषण एण्ड संस पर कम समय में ज्यादा संपत्ति एकत्र करने के आरोप भी मढ़े जा रहे हैं। भूषण एण्ड संस तो विचलित हैं ही उनके साथ ही साथ अन्ना भी परेशां हैं कि उनके आंदोलन में इन पिता पुत्रों के कारण कालिख लगती जा रही है। कांगे्रस के दिग्गज इन्हें आसानी से छोड़ने वाले नहीं, अभी तो यह आगाज है, अंजाम देखिए क्या होता है।



सिंहों की यात्रा पर हुआ खर्च करो सार्वजनिक

केंद्रीय सूचना आयोग ने प्रधानमंत्री कार्यालय को निर्देश दिया है कि पीएम डाॅ.मनमोहन सिंह के साथ विदेश यात्रा पर गए उनके रिश्तेदारों पर सरकार ने कितना खर्च किया है, इस बात को सार्वजनिक किया जाए। सीआईसी ने पीएमओ की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया है कि उसके पास एसा कोई रिकार्ड है ही नहीं। यूपी के शाहजहांपुर के अयूब अली द्वारा मांगी गई जानकारी पर पीएमओ एवं विदेश मंत्रालय ने यह जवाब दिया था कि उसके पास इस तरह की कोई जानकारी नहीं है। केंद्रीय सूचना आयोग ने इस पर सख्त रवैया अपनाते हुए पीएमओ को निर्देश दिया है कि वह प्रधानमंत्री के रिश्तेदारों (सिंह फेमली) बीस कार्य दिवसों के अंदर वह समस्त विभागों से जानकारी मुहैया करे और आवेदक को यह उपलब्ध कराए।



अब रामदास पर गिरेगी गाज

पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अम्बूमणि रामदास फर्जी आर्युविज्ञान संस्थानों को अनुमति देने के मामले में नप सकते हैं। इस मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने 16 अप्रेल को मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से इंडेक्स मेडीकल कालेज के मालिक सुरेश भदोरया को अरेस्ट किया था। भदोरया के बयानों और उनके पास से मिले दस्तावेजों के आधार पर अब केंद्रीय जांच ब्यूरो जल्द ही रामदास पर शिंकजा कसने की तैयारी कर रही है। मेडिकल कांउसिल आॅफ इंडिया (एमसीआई) के पदाधिकारियों की नियुक्ति में भी भारी अनियमितताएं होने की बातें प्रकाश में आई हैं। एमसीआई में सचिव पद काफी महत्वपूर्ण होता है और इस पद पर संगीता शर्मा की नियुक्ति पर भी विवाद आरंभ हो गया है।



सीबीएसई अपनाए पंजाब फार्मूला

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को पंजाब पेटर्न को तत्काल अपना लेना चाहिए। पंजाब में निजी शालाओं में किताबों और स्कूल की वर्दी की दुकानें अब नहीं चल पाएंगी। पंजाब सरकार के शिक्षा विभाग ने निजी शाला के प्रबंधन की इस मनमानी को तत्काल रोकने की कवायद आरंभ कर दी है। बताते हैं कि सरकारी शाला के प्राचार्यों के दायित्वों में इस बात का भी शुमार किया गया है कि वे अपने इर्द गिर्द संचालित होने वाले निजी स्कूलों का समूचा ब्योरा एकत्र करने को जोड़ा गया है। निजी स्कूल भले ही वे सीबीएसई एफीलेटेड हों या न को इसमें शामिल किया गया है। निर्देशों में कहा गया है कि प्राचार्य इस बात की जानकरी विशेष तौर से जुटाएं जिसमें फीस से लेकर वर्दी तक की जानकारी शामिल हो। आठ कालम के प्रोफार्मा को भरने की जवाबदारी निजी शाला के प्राचार्य की होगी किन्तु भरवाएंगे सरकारी शाला के प्राचार्य।



ममता का चुनावी तोहफा!

रेल मंत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में चुनावी बिसात बिछाने में व्यस्त हैं। उधर रेल महकमे की मौजां ही मौजां है। भारतीय रेल ने ममता बनर्जी की ओर से यात्रियों को एक नायाब चुनावी तोहफा दिया है। आने वाले समय में रेल में सफर करने वाले यात्रियों को आॅन बोर्ड खाने के लिए ज्यादा जेब ढीली करनी होगी। आने वाले दिनों में 27 रूपए वाली थाली जो रेल में 35 से 40 रूपए में बेची जाती है का दाम बढ़ाकर 65 रूपए कर दिया गया है। मतलब साफ है कि यह थाली अब 70 से 80 रूपए में बिकेगी। इसी तरह 14 वाला जो नाश्ता 20 से 25 में बिकता था के दाम बढ़ाकर 30 कर दिए गए हैं जो अब 40 से 50 रूपए के बीच बिकेगा। अब ममता बनर्जी रेल के बजाए बंगाल पर ध्यान देंगी तो रेल यात्रियों की कमर टूटना लाजिमी ही है। इन परिस्थितियों में दस रूपए वाला जनता मील कहां और कैसे मिलेगा यह यक्ष प्रश्न ही बना हुआ है।



चर्चा में है अमूल के विज्ञापन

गुजरात कोआॅपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के एक उत्पाद अमूल बटर के चुटीले विज्ञापन यूं तो सदा ही चर्चा में हुआ करते हैं, किन्तु कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को अमूल बेबी का तमगा देने पर बने विज्ञापन की धूम मची हुई है। केरल के मुख्यमंत्री वी.एस.अच्युतानंदन द्वारा राहुल गांधी अमूल बेबी करार दिया गया है। बडबोले शशि थरूर ने एक बार फिर ट्विटर पर अपनी जुबान खोलकर इस बहस को आगे बढ़ा दिया है। राहुल पर लगे अमूल बेबी के ठप्पे को पुख्ता करते हुए थुरूर ने कह दिया है कि इसमें गलत क्या है। अमूल बेबी चुस्त दुरूस्त, मजबूत और भविष्य के प्रति गंभीर होते हैं। अब देखना यह है कि थरूर के इस कथन को अमूल किस तरह कैच कर विज्ञापन की अगली कड़ी में क्या प्रदर्शित करता है।





ब्लू लाईन का खौफ

किलर ब्लू लाईन को दिल्ली की सड़कों से हटाने की मुहिम के बाद ब्लू लाईन संचालकों और चालक परिचालकों का आक्रोश देखते ही बन रहा है। बेरोजगार हो रहे इन चालक परिचालकों द्वारा अब सवारियों के साथ बदतमीजी करना आरंभ कर दिया है। गौरतलब है कि ब्लू लाईन के परमिटधारी संचालकों द्वारा बसों को चालक परिचालकों को ही ठेके पर दे दिया जाता रहा है। प्रतिस्पर्धा के चलते चालकों द्वारा बसों को हवा में उड़ाया जाता रहा है और राहगीर असमय ही काल के गाल में समाते रहे हैं। हाल ही में पश्चिमी दिल्ली में एक हादसे ने इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि दिल्ली में ब्लू लाईन संचालकों को किसी का खौफ नहीं रहा। प्राप्त जानकारी के अनुसार इंद्रपुरी क्षेत्र में एक बच्चे को सरेराह ही चलती बस से धक्का दे दिया जिससे सड़क पर गिरने से उसकी मौत हो गई। दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर सवालिया निशान लग गया है।



बच्चों की बाजीगरी पर रोक!

बाल श्रम कानून का सरेआम माखौल इस देश में उड़ाया जाता है। हद तो तब हो जाती है जब शराब के अड्डों पर छोटू, मुन्ना, बबलू और पप्पू की आवाजें सुनाई देती हैं। श्रम विभाग की इस अंधेरगर्दी पर कोर्ट ने सख्त रवैया अपनाया है। जस्टिस दलबीर भंडारी और जस्टिस ए.के.पटनायक की संयुक्त बैंच ने बचपन बचाओ आंदोलन की याचिका पर यह व्यवस्था दी। पीठ ने सर्कस में बच्चों के काम करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है। कोर्ट ने तल्ख रवैया अपनाते हुए कहा है कि सर्कस सहित खतरनाक उद्योगों में काम कर रहे बच्चों को मुक्त करवाकर उनका पुनर्वास करवाया जाए। न्यायालय ने मानव संसाधन विभाग के महिला एवं बाल विकास विभाग को ताकीद किया है कि वह दस सप्ताह के अंदर अपनी रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष रखे।



मंत्री पुत्र अरेस्ट!

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावांे के चलते केंद्रीय मंत्री मुकुल राय के पुत्र और विधानसभा में त्रणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार सुभ्रांशु राय को बंगाल पुलिस ने अरेस्ट किया है। केंद्रीय मंत्री राय के पुत्र की गिरफ्तारी के बाद राजधानी की सियासत गर्माने लगी है। दरअसल मुकुल राय के पुत्र पर आरोप है कि उन्होने अपने साथियों के साथ सरकारी और निजी इमारतों की दीवारों पर लिखे नारे मिटाने गए चुनाव आयोग के दल पर हमला किया है। चुनाव आयोग ने सुभ्रांश राय को अरेस्ट न कर पाने वाले निरीक्षक पाथ्र प्रीतम राय को निलंबित भी किया है। वाम दल इस घटना को जमकर तूल दे रहा है। वाम दलों के अनुसार त्रणमूल कांग्रेस को लोकतंत्र, शांति और पुलिस पर यकीन नहीं है यही कारण है कि त्रणमूल के नेता अब गुण्डागर्दी पर उतारू हो गए हैं।



चालक बिना दौड़ती भारतीय रेल

भारत का रेल नेटवर्क विश्व का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क माना जाता है। इसकी कमान केंद्रीय रेल मंत्री के हाथों में होती है। भारतीय लोकतंत्र का सबसे शर्मनाक पहलू यह माना जाएगा कि भारत गणराज्य की रेल मंत्री ममता बनर्जी पिछले लगभग एक साल से मुख्याल दिल्ली छोड़कर पश्चिम बंगाल की चुनावी तैयारियों में व्यस्त हैं, और बिना निजाम के भारतीय रेल महकमा दिशा से भटक चुका है। देश भर में रेल गाडियों में कर्मचारी मजे कर रहे हैं और यात्री बुरी तरह पिस रहे हैं। कभी रेल में डकैती पड़ती है तो कभी किसी को चलती रेल से फेंक दिया जाता है। व्हीव्हीआईपी समझी जाने वाली राजधानी एक्सपे्रस बर्निंग ट्रेन बन जाती है, तो चालक ही रेल लेकर भाग जाता है। हाल ही में कश्मीर की वादियों में 35 किलोमीटर तक रेल गाड़ी बिना चालक के ही दौड़ती रही। वादियों में रेल सेवा का उदघाटन वजीरे आजम डाॅ.एम.एम.सिंह ने 2008 में किया था। समुद्र तल से 5420 फिट उपर कश्मीर की खतरनाक वादियों में यह करिश्मा रेल मंत्री को आईना दिखाने के लिए पर्याप्त है।



इस पर भी कुछ फरमाएं कृष्णा जी

भारत के विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा द्वारा विदेश में भारतीयों पर होने वाली ज्यादतियों पर लगभग मौन ही साधे रहते हैं। विश्व कप में भारत की जीत का जश्न मनाना कुवैत में काम करने वाले लगभग छः दर्जन मजदूरों को भारी पड़ा है। 30 मार्च को खेले गए सेमी फायनल मैच में भारत की जीत की खुशी मनाने वाले 68 भारतीय मजदूरों को कुवैत से देश निकाला दे दिया गया है। जीत का जश्न मनाना कुवैत सरकार को इस कदर नागवार गुजरा कि वहां की सरकार ने इन मजदूरों का न केवल वेतन हड़प लिया वरन् उनका वीजा भी रद्द कर दिया है। इन मजदूरों के कुवैत में एक साल तक प्रवेश पर रोक भी लगा दी गई है। भारत सरकार द्वारा इस मामले में अब तक कोई कार्यवाही न करना निश्चित तौर पर अनेक संदेहों के साथ आश्चर्य को ही जन्म दे रहा है।



फिर न कहना माईकल दारू पीके . . .

‘अच्छा हुआ अंगूर को बेटा न हुआ, जिसकी बेटी ने सर पे उठा रख्खी दुनिया‘ शायर की ये मंशा सच ही है। इसका उदहारण दिया बवाना क्षेत्र में मुख्य चिकित्त्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने। दिल्ली में राजा हरिश्चंद्र अस्पताल के सीएमएचओ डाॅ.मनोज ने बीती रात शराब पीकर डीएसआईडीसी औद्योगिक क्षेत्र को सर पर उठा लिया। जो भी उन्हें समझाने जाता तो डाॅक्टर मनोज अपने पद का रौब गांठकर उसे हड़का देते। सूचना पाकर पुलिस मौके पर पहुंची और डाक्टर का मुलाहजा संजय गांधी अस्पताल में करवाया। बाद में पुलिस ने एक्साईज एक्ट के तहत कार्यवाही कर एक बांड भरवाकर सीएमएचओ को छोड दिया। वैसे दिल्ली में कड़े नियम और भयानक फाईन के बाद भी लोग सार्वजनिक स्थलों पर छककर शराब पीते नजर आ ही जाते हैं।



पुच्छल तारा

सड़कों पर गाडियों की बाढ़ देखते ही बनती है। दिल्ली में तो जितने परिवार के सदस्य नहीं उतनी गाडियां हैं अनेक परिवारों के पास। गाडियों पर तरह तरह के जुमले लिखा होना आम बात है। पश्चिमी दिल्ली से सपना सरीन ने एक ईमेल भेजा है। सपना लिखती हैं कि वाहनों पर ऊं, अल्लाह, गुरू नानक देव, साईं बाबा, राम, जय माता दी आदि लिखे हुए तो बहुत देखे हैं। दिल्ली में ब्लू लाईन की बिदाई के साथ ही सरकारी गाडियों में इस तरह के नाम अब देखने को नहीं मिलते। दिल्ली की सड़कों पर छोटी गाडियां दौड रही हैं। इन गाडियों में इस तरह के नामो की बौछार है। एक गाडी में लिखी बात पढ़़कर हर कोई हंसे बिना तो नहीं रह सकता। इस पर लिखा था -‘‘जलो मत किश्तों पर आई हूं।‘‘

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

केंद्र में सालों से मलाई चखने वाले अधिकारी होंगे मूल काडर में वापस

एमपी काडर के चार दर्जन अफसरों पर गिर सकती है गाज
 
प्रतिनियुक्ति पर हैं सूबे के 70 अफसरान
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। अपने मूल काडर को छोड़कर देश की राजधानी दिल्ली में मलाई चखने वाले अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की अब खैर नहीं है। केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग (डीओपीटी) ने इन अधिकारियों की मुश्कें कसना आरंभ कर दिया है। पांच साल का समय प्रतिनियुक्ति के लिए पर्याप्त माना गया है। पांच साल से ज्यादा समय तक पदस्थ रहने वाले अफसरों को अपने मूल काडर में लौटना अनिवार्य कर दिया गया है।
कार्मिक विभाग के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि अपने आवंटित सूबे के बजाए अधिकारियों को दिल्ली में रहना ज्यादा भा रहा है, इसका कारण राजनैतिक चैसर पर बिछी बिसात को माना जा रहा है। राज्यों अफसरों की कमी होने के बाद भी ये दिल्ली में या तो रूके रहना चाहते हैं या फिर मंत्रालय इन्हें रोकने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। यह मामला प्रधानमंत्री तक गया और पीएम के साफ निर्देशों के बाद कार्मिक विभाग ने सख्त आदेश जारी कर ही दिए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार अब पांच साल से अधिक प्रतिनियुक्ति पर रहने वाले अफसरांे के खिलाफ न केवल अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी, वरन् पांच साल से अधिक वाला सेवाकाल उनके कार्यकाल के सेवाकाल में नहीं जोड़ा जाएगा, इतना ही नहीं उनकी वेतनवृद्धि भी रोकी जाकर पेंशन भी कम करने का प्रावधान किया गया है। अगर कोई अफसर पांच साल की अवधि से ज्यादा समय प्रतिनियुक्ति पर काटता है तो इसकी जवाबदेही उसके उच्चाधिकरियों पर आहूत की गई है।
केंद्र के इस सख्त आदेश के बाद अब राज्यों से आए भारतीय प्रशासनिक, पुलिस और वन सेवा के अधिकारियों का बोरिया बिस्तर बंधना तय माना जा रहा है। वहीं दूसरी और देश की नीति निर्धारक सबसे ताकतवर आईएएस लाबी ने इस मामले में प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने का मन बना लिया है। माना जा रहा है कि जल्द ही लाबी के आला पदाधिकारियों द्वारा पीएम से मिलकर इन नियमों को शिथिल करने के मसले पर चर्चा की जाएगी।
 
छोटा मोटा वल्लभ भवन बन गया था दिल्ली में
 
2003 में जब उमा भारती के नेतष्त्व में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तब कांग्रेस की मानसिकता वाले अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों ने खतरे को भांपते हुए सूबे से निकलने में ही भलाई समझी। अपने संपर्कों का लाभ उठाकर अफसरान ने केंद्र में प्रतिनियुक्ति ले ली, ताकि उमा भारती के कोप से बचा जा सके। इस बात को आठ साल बीतने को हैं, पर न तो शिवराज सिंह ने इसकी सुध ली और ना ही केंद्र सरकार ने इन्हें वापस भेजने में कोई दिलचस्पी दिखाई। यही कारण है कि सूबे में अधिकारियों की कमी के चलते ही राज्य स्तर की सेवाओं के अधिकारियों को जिलों में महत्वपूर्ण कमान सौंपी गई है।
यह है लेखा जोखा
 
केंद्र सरकार के पास अखिल भातीय सेवा के पांच हजार छः सौ नवासी अफसर हैं जिनमें से चार हजार पांच सौ चैंतीस काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार के पास इनमें से कुल सात सौ चैदह आईएएस अफसर प्रतिनियुक्ति पर हैं। मध्य प्रदेश के बावन अफसर दिल्ली में प्रतिनियुक्ति पर हैं। इस तरह सवा सात फीसदी भागीदारी है मध्य प्रदेश की केंद्र में आईएएस प्रतिनियुक्ति में और लगभग दस फीसदी सभी अखिल भारतीय सेवाओं में।
आईएएस का हुआ प्रदेश से मोह भंग

भारतीय जनता पार्टी सरकार के मध्य प्रदेश में सत्तारूढ होते ही भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरान का अपने मूल काडर से मोह भंग हो गया है। 2003 के बाद केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले अफसरों की संख्या में विस्फोटक वृद्धि दर्ज की गई है। अधिकतर अफसर कार्यकाल पूरा करने के बाद भी वापस न लौटें इसके लिए जतन कर रहे हैं तो एमपी में रहने वाले अफसर केंद्र में जाने की लाबिंग में जुटे हुए हैं। 87 बैच के प्रवीर कृष्ण और 91 बैच के मनु श्रीवास्तव ने एमपी के सीएस से प्रतिनियुक्ति बढ़ाने का आग्रह किया है। उधर मध्य प्रदेश में बीस जिलों में पुलिस अधीक्षक की कमान राज्य पुलिस सेवा के स्तर के अधिकारियों के कांधों पर है, जिस बारे में शिवराज सरकार कतई संजीदा नहंी दिख रही है।
इन पर गिर सकती है गाज
 
एमपी काडर के भारतीय प्रषासनिक सेवा में राघवेंद्र सिंह सिरोही, अल्का सिरोही, सुषमा नाथ, के.एम.आचार्य, जेमनि कुमार षर्मा, अजय आचार्य, सुमित बोस, डी.आर.एस.चैधरी, विमल जुल्का, आर,गोपालकृष्णन, स्नेहलता कुूमार, स्वदीप सिंह, लवलीन कक्कड़, राजन कटोच, एंथोनी जे.सी.डिसा, डाॅ.अमर सिंह, अमिता शर्मा, अरूणा शर्मा, डी.के.सामन्तरे, सुरंजना रे, अजय नाथ, जे.एस.माथुर, राघव चन्द्रा, रश्मि शुक्ला शर्मा, एम.गोपालरेड्डी, प्रवीर कृष्ण, गौरी सिंह, आई.सी.पी.केशरी, मनु श्रीवास्तव, प्रमोद अग्रवाल, नीलम शमी राव, ब्ही.एल.कान्ता राव, दीप्ति गौड़ मुखर्जी, पल्लवी जैन, फैज अहमद किदवई, केरेलिन खोंगवार देशमुख।

भारतीय पुलिस सेवा के अफसरान में यशोवर्धन आजाद, रीना मित्रा, विवेक जोहरी, आलोक पटेरिया, सुधीर कुमार सक्सेना, संजीव कुमार सिह, राजीव टंडन, एस.के.पाण्डेय, एस.एल.थौसेन, प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव, अनन्त कुमार सिंह, मनीश शंकर षर्मा, जयदीप प्रसाद, योगेष देशमुख, सालोमन के.मिंज।
 
भारतीय वन सेवा के डाॅ.राजेश गोपाल, असित गोपाल और प्रकाश उन्हाले।

कुवांरे कर्मचारियों के घर बसाने में जुटा केंद्रीय विद्यालय


शादीलाल घरजोड़े बना केवीएस

एमपी के अध्यापक ने दिया था सबसे पहले अपना विवरण
 
नई दिल्ली (ब्यूरो)। देश के नौनिहालों को शिक्षा के लिए पाबंद किया गया केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) इन दिनों संगठन के अविवाहित कर्मचारियों के घर बसाने का पावन काम कर रहा है। केवीएस के कर्मचारियों में संगठन को अब शादी लाल घरजोड़े या केंद्रीय विद्यालय मेरिज ब्यूरो भी कहा जाने लगा है।
देश विदेश में एक हजार से ज्यादा शैक्षणिक संस्थान का प्रबंधन संभालने वाले केवीएस इन दिनों नई सामाजिक जिम्मेवारी संभाले हुए है। अपने मूल काम से हटकर केवीएस द्वारा अपने संस्थान के अविवाहित कर्मचारियों के लिए रिश्ते तय करने का काम किया जा रहा है।
केवीएस के सूत्रों का कहना है कि इस काम की शुरूआत केवीएस ने अपनी वेब साईट पर दस कुंवारे कर्मचारियों के विवरण डालकर की थी। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि अब यह पूरी तरह से वेब पेज की शक्ल अख्तियार कर चुका है जिसमें सौ से ज्यादा कुंवारों के बारे में संपूर्ण विवरण है।
गौरतलब है कि केवीएस की शालाएं सुदूर अंचलों में हैं जहां काम करने वाले कर्मचारियों को उपयुक्त जीवन साथी मिलने की संभावनाएं कम ही होती हैं। इसी के मद्देनजर केवीएस ने यह अभिनव अभियान आरंभ किया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश के एक अध्यापक ने सबसे पहले इसके लिए अपना विवरण भेजा था। बताते हैं कि उसे केरल में पदस्थ एक अध्यापिका से रिश्ता जुड़ने की उम्मीद बन गई है। इसमें एमपी के ग्वालियर और गुना के अन ब्याहे कर्मचारियों का विवरण मौजूद है।

दिल्ली में होगा कार्टून वाॅच का कार्टून महोत्सव

इस बार दिल्ली में होगा कार्टून वाॅच का कार्टून महोत्सव

डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम होंगे मुख्य अतिथि

नई दिल्ली (ब्यूरो)। देष की एकमात्र कार्टून पत्रिका कार्टून वाॅच द्वारा प्रतिवर्श आयोजित कार्टून महोत्सव इस बार दिल्ली में किया जा रहा है. 29 अप्रैल 2011 को हिन्दी भवन दिल्ली में इसका उद्घाटन पूर्व राश्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम करेंगे. कार्टून वाॅच के सम्पादक त्रयम्बक षर्मा ने जारी विज्ञप्ति में बताया कि इस बार कार्टून वाॅच की तरफ से लाईफ टाईम एचीवमेंट एवार्ड पांच वरिश्ठ कार्टूनिस्टों को दिया जायेगा. टाईम्स आफ इंडिया समूह के श्री अजीत नैनन, नवभारत टाईम्स के पूर्व कार्टूनिस्ट श्री काक, मधुमुस्कान पत्रिका के नन्हा जासूस बबलू के रचयिता श्री हुसैन जामिन, छत्तीसगढ के श्री बी.वी.पांडुरंग राव जो अब बैंगलोर में हैं, और दिल्ली दैनिक जागरण के कार्टूनिस्ट श्री जगजीत राणा को इस वर्श कार्टून महोत्सव में लाईफ टाईम एचीवमेंट एवार्ड प्रदान किया जायेगा. इसके अलावा कार्टून विधा को बढावा देने के लिये उल्लेखनीय कार्य करने के लिये विषेश रूप से केरला कार्टून एकेडमी के पूर्व सचिव एवं कार्टूनिस्ट श्री सुधीरनाथ को भी सम्मानित किया जायेगा.
इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ प्रदेष के संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल विषेश अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे. उल्लेखनीय है कि पूर्व के वर्शों में कार्टून महोत्सव में श्री आर.के.लक्ष्मण, श्री आबिद सुरती, चाचा चैधरी के जनक श्री प्राण, श्री सुधीर दर, श्री राजेन्द्र धोडपकर, श्री एच.एम.सूदन, श्री सुरेष सावंत और श्री ष्याम जगोता सहित अनेक कार्टून हस्तियां सम्मानित हो चुकी हैं. इस महोत्सव में देष के विभिन्न हिस्सों से कार्टूनिस्ट षामिल हो रहे हैं. कार्टून वाॅच पत्रिका अपने प्रकाषन के पंद्रहवें वर्श पर हो रहे इस आयोजन के अवसर पर विषेश अंक का प्रकाषन भी करने जा रही है जिसका विमोचन डाॅ. कलाम के हाथों होगा. इस अंक में इस बार सम्मानित किये जा रहे कार्टूनिस्टों के कार्टून प्रकाषित किये जायेंगे. श्री षर्मा ने बताया कि डाॅ. अब्दुल कलाम कार्टून विधा को बहुत पसंद करते हैं और राश्ट्रपति पद में रहने के दौरान उन्होंने सभी समाचार पत्र के सम्पादकों से अनुरोध किया था कि वे कार्टून को प्रथम पृश्ठ में स्थान दें. ज्ञातव्य है कि श्री षर्मा दृवारा रचित कार्टून पात्र प्रिंस का विमोचन भी डाॅ. कलाम ने चेन्नई में किया था. कार्टून वाॅच के विषेश अंक में भी डाॅ. कलाम के कार्टून प्रकाषित किये जायेंगे.
कार्टून वाॅच पत्रिका ने विगत पंद्रह वर्शोंमें छत्तीसगढ का नाम देष के अलावा विदेषों में भी रोषन किया है. लंदन में दो सप्ताह इस पत्रिका द्वारा प्रदर्षनी लगाई गई, सम्पादक त्रयम्बक षर्मा का साक्षात्कार बीबीसी लंदन के हिन्दी रेडियो सेवा से किया गया, श्री षर्मा को नेपाल में आयोजित पांच देषों के कार्टूनिस्टों के सम्मेलन में आमंत्रित किया गया. हाल ही में कार्टून वाॅच ने दिल्ली में पहली बार आयोजित काॅमिक कन्वेन्षन - काॅमिकान में भी देष की एकमात्र कार्टून पत्रिका के रूप में भाग लिया था.

बंसल, अश्विनी से नाराज हैं महामहिम

बंसल, अश्विनी से नाराज हैं महामहिम
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश के महामहिम उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी इन दिनों संसदीय कार्य मंत्री पवन बंसल और राज्य मंत्री अश्विनी कुमार से खासे नाराज हैं। नए नवेले मंत्री अश्विनी कुमार द्वारा संसद के सत्र के दौरान अपने आप को प्रधानमंत्री के खासुलखास बताने के लिए बंसल के पहले ही पीएम को ब्रीफ कर दिया जाता है।
संसद चलने के दौरान अमूमन महामहिम के कार्यालय में सुबह दस बजकर चालीस मिनिट पर एक ब्रीफिंग होती है जिसमें संसदीय कार्यवाही को लेकर चर्चाएं होती हैं। इस तरह की ब्रीफिंग में संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल या राज्य मंत्री अश्विनी कुमार शायद ही कभी पहुंचे हों।
पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि दोनों ही मंत्रियों का सारा का सारा ध्यान दस पचास पर प्रधानमंत्री के यहां होने वाली बैठकों पर ही होता है। नियमानुसार पीएम को ब्रीफ करने का जिम्मा पवन बंसल का है, पर अश्विनी कुमार उनसे पहले वहां पहंुच जाते हैं। लिहाजा पवन बंसल आश्चर्य चकित हैं तो महामहिम उपराष्ट्रपति गुस्से में।

पचैरी और गिरिजा व्यास बन सकते हैं महासचिव

द्विवेदी को मिल सकती है लाल बत्ती

(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। मई में विधानसभा चुनावों के उपरांत होने वाले केंद्रीय मंत्रीमण्डल फेरबदल में कांग्रेस के महासचिव और मीडिया प्रभाग के प्रमुख जनार्दन द्विवेदी को लाल बत्ती से नवाजा जा सकता है। उधर दो ब्राम्हण नताओं राष्ट्रीय महिला आयोग की निर्वतमान अध्यक्ष गिरिजा व्यास और एमपीसीसी के प्रजीडेंट सुरेश पचैरी को संगठन में महासचिव बनाया जा सकता है।
कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों का कहना है कि व्यास का नाम वैसे तो सी.पी.जोशी के स्थान पर राजस्थान इकाई के अध्यक्ष के लिए चल रहा है, किन्तु अगर सुरेश पचैरी को महासचिव बनाया जाता है तो निश्चित तौर पर दूसरे ब्राम्हण जनार्दन द्विवेदी को संगठन से सत्ता मंे लाकर मंत्री बनाया जाएगा। इसके साथ ही साथ गिरिजा की दावेदारी राजस्थान के साथ ही साथ संगठन में महासचिव की भी बन रही है।
सोनिया गांधी इन दिनों पार्टी के अल्पसंख्यक प्रभाग के लिए उत्तर प्रदेश के किसी मुस्लिम चेहरे को तलाश रहीं है। गौरतलब है कि वर्तमान अध्यक्ष इमरान किदवई इस पद पर छः सालों से काबिज हैं, जिन्हें बदला जाना है। इनके स्थान पर जो नाम सामने आ रहे है उनमें सलीम शेरवानी और राशिद अल्वी प्रमुख हैं।