रविवार, 2 अक्टूबर 2011

लालू ने फेंकी थी गेंद भाजपा के पाले में



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लालू ने फेंकी थी गेंद भाजपा के पाले में

बड़ी चतुराई से सांप भी मारा और लाठी भी न टूट पाई

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। 2008 में एक बार फिर लालू प्रसाद यादव ने बतौर रेलमंत्री कल रेल बजट पेश किया। निसंदेह लालू ने लगातार चौथी बार बजट पेश कर वह भी यात्री किराए अथवा मालभाड़े में बढोत्तरी के बिना ही बजट पेश कर अपनी पुरानी शैली को बरकरार रखी। उन्होंने उसी दौरान अस्तित्व में आई 11वीं पंचवर्षीय योजना में मीटर गेज से ब्राड गेज के अमान परिवर्तन की बात कही और इसमें छिंदवाड़ा से नैनपुर बरास्ता सिवनी का शुमार भी किया गया था।

यह लालू की बजीगरी थी कि उन्होंने इस योजना का नाम भी ले लिया और सिवनी की झोली में कुछ आया भी नहीं। लालू के बजट भाषण के उपरांत सिवनी जिले में हर्ष की लहर दौड़ गई। सिवनी के वाशिंदे यह समझने लगे कि वे बड़ी रेल लाईन पर सवारी गांढने ही जा रहे हैं। वस्तुतः इस तरह की कोई भी बात समझ में नहीं आती है। पर यह संतोष की बात है कि सालों बाद कम से कम रेल बजट में इस मार्ग का नाम तो सुनने को मिला। यह योजना अमली जामा कब पहनेगी यह बात तो समय के गर्भ में ही है।

इसके लिए लालू यादव के बजट के मूल पाठ को ध्यान से पढ़ना अत्यंत आवश्यक है कि यह राजनैतिक बाजीगरी है, अथवा वाकई सिवनी को कुछ हासिल हुआ है। अपने 38 पेज के बजट भाषण में उन्होंने 39 वीं कंडिका में इन तत्यों को साफ किया है। प्रस्तुत है उसका अंश। (पाठक चाहें तो डब्लूडब्लूडब्लू डाट इंडियनरेलवेज डाक काम पर इसे पढ़ सकते हैं)

महोदय, अनेक मार्गो का आधा अधूरा अमान परिवर्तन होने के कारण बाकी बची मीटर एवं छोटी लाईने द्वीप की तरह बन गई हैं। प्रमुख नेटवर्क से अलग थलग पड़ जाने के कारण इन लाईनों से रेल्वे को एक प्रतिशत से भी कम फ्रेट प्राप्त होता है, जबकि ये कुल नेटवर्क के 20 प्रतिशत से भी अलग हैं। फलस्वरूप रेल्वे को हजारों करोड़ रूपयों का सालाना घाटा हो रहा है। यहां तक कि इन लाईनों पर माल परिवहन भी घाटे का सौदा बन गया है। अतः 11वीं परियोजना के अंत तक अधिकांश मीटर लाईन को बड़ी लाईन मंे बदलने का कार्य पूरा करने का हम हर संभव प्रयास करेंगे।

एसी योजनाओं को स्वीकृति और क्रियान्वयन में प्राथमिकता दी जाएगी जो व्यस्त नेटवर्क के वेकल्पिक मार्ग उपलब्ध करवाएंगी, जिसमें उदयपुर अहमदाबाद, लखनउ शाहजहांपुर, ढासा जेसलमेर, जयपुर झुंझून, रतलाम खंडवा अकोला, नैनपुर छिंदवाड़ा, अहमदाबाद बोताड़ प्रमुख हैं। एसी योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर क्रियान्वित किया जाएगा जिसमें कुल लागत का पचास फीसदी खर्च राज्य सरकारें वहन करने के लिए तैयार हों।

इस तरह लालू यादव ने सांप भी मार दिया और लाठी भी नहीं टूटने दी। मध्य प्रदेश के हिसाब से अगर देखा जाए तो अब उन्होंने सारा दारोमदार भाजपा के उपर ही छोड़ दिया है, कि अगर नैनपुर से छिंदवाड़ा रेल लाईन का अमान परिवर्तन करवाना है, तो इसमें व्यय होने वाली राशि का पचास फीसदी भार उठाने के लिए मध्य प्रदेश की शिवराज चौहान के नेतृत्व वाली सरकार तैयार हो। लालू ने किसके कहने पर इस तरह से बाल उठाकर शिवराज सिंह चौहान के कोर्ट में फेंक दी यह तो शोध का ही विषय है पर इसके बाद यह योजना केंद्र और राज्य के बीच आज तक झूल भैया झूल, तेरी टोपी में फूलकी तर्ज पर ही चल रही है।
(क्रमशः जारी)

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

छिंदवाड़ा नैनपुर के लिए किसी ने भी नहीं किया आंदोलन!


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छिंदवाड़ा नैनपुर के लिए किसी ने भी नहीं किया आंदोलन!

रामटेक गोटेगांव के लिए आरंभ हुआ पोस्टकार्ड अभियान

लोस में प्रश्न पूछने के बजाए पत्रों की राजनीति की सांसदों ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। 2004 में सिवनी जिले की जनता की आवाज को लोकसभा में उठाने के लिए दिल्ली भेजी गईं परिसीमन में समाप्त हुई सिवनी लोकसभा की अंतिम सांसद श्रीमति नीता पटेरिया ने भी छुक छुक रेल गाड़ी को ब्राडगेज में तब्दील कराने के लिए कोई प्रयास नहीं किए। श्रीमति पटेरिया द्वारा कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.नरसिंहराव की चुनावी घोषणा को पूरा करने के लिए अवश्य ही 2005 में एक पत्र तत्कालीन रेल मंत्री को प्रेषित किया था।

यहां उल्लेखनीय होगा कि 30 जनवरी 2005 में वरिष्ठ इंका नेता आशुतोष वर्मा द्वारा रामटेक से गोटेगांव तक नई रेल लाईन हेतु पोस्टकार्ड अभियान चलाया गया था। श्री वर्मा ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2005 के अंत तक इस अभियान को पूरे जोर शोर से चलाए जाने के लिए हर संभव प्रयास किए। इस दौरान जिले के समस्त जनपद अध्यक्षों, सामाजिक, जातीय, कर्मचारी, पत्रकार, व्यापारी संगठनों आदि ने रेल मंत्री को पत्र लिखे थे। जिले के विधायकों ने भी इसमें बढ़ चढ़कर अपनी हिस्सेदारी जताई थी।

जगतगुरू स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी द्वारा भी इस हेतु दो मर्तबा केंद्र को पत्र लिखा गया। इतना ही नहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री विमला वर्मा ने केंद्रीय रेल मंत्री से इस लाईन के लिए गुहार लगाई। तत्कालीन सांसद श्रीमति नीता पटेरिया ने संसद में (जो कि उनके लिए सहज सुलभ और उचित मंच था) यह बात न उठाकर रेल मंत्री को पत्र लिखकर रस्म अदायगी कर डाली। श्री वर्मा के प्रयासों से एक साल में लगभग पच्चीस हजार पोस्टकार्ड रेल भवन पहुंचे किन्तु इसके बाद भी कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय के कानों में जूं नहीं रेंगी।

आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि सिवनी में सियासत की बिछात बिछाने वाले किसी भी नेता ने इतने सालों तक छिंदवड़ा से नैनपुर की छोटी लाईन के अमान परिवर्तन के लिए बड़े आंदोलन का आगाज आखिर क्यों नहीं किया? सियासी तौर पर सक्रिय लोग किस बात से खौफजदा थे यह बात समझ से परे ही है। अगर ब्राडगेज सिवनी में आ जाती तो उनके कौन से राजनैतिक मंसूबों पर पानी फिरने वाला था यह बात समझ से परे ही रही।

सिवनी के किसी संसद सदस्य ने उनके कार्यकाल के रेल मंत्रियों से यह पूछने का दुस्साहस भी नहीं किया कि उनके कार्यकाल में चलने वाली पंचवर्षीय योजनाओं में महज 139.6 किलोमीटर के छोटे से रेल खण्ड के सर्वेक्षण के लिए कब और कितनी राशि जारी होने के आदेश जारी होंगे? सिवनी संसदीय क्षेत्र की जनता द्वारा इसके अस्तित्व में आने से विलोपन तक कुल दस संसद सदस्यों पर भरोसा कर उन्हें केंद्र में अपनी नुमाईंदगी के लिए भेजा जाता रहा किन्तु किसी ने भी सिवनी के हित साधने का जतन नहीं किया। अब जबकि किसी प्रस्ताव के बिना ही अंतिम समय में परिसीमन में सिवनी लोकसभा का विलोपन किया जाकर इसे बालाघाट और मण्डला संसदीय क्षेत्र में मिला दिया गया है तब इन दोनों संसदीय क्षेत्रों के सांसदों द्वारा अगर सिवनी से दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है, सिवनी के हितों की अनदेखी की जाती है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
(क्रमशः जारी)

भुलक्कड़ के हवाले भारत की सुरक्षा!


भुलक्कड़ के हवाले भारत की सुरक्षा!

पलनिअप्पम चिदम्बरम की याददाश्त है कमजोर

शार्ट टर्म मेमोरी के साथ ही मजबूर भी हैं चिदम्बरम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा व्यवस्था इन दिनों एक भुलक्कड़ के हाथों में हैं। देश के गृह मंत्री न केवल भुलक्कड़ हैं वरन् वे मजबूर भी हैं। शुक्रवार को मीडिया से रूबरू पलनिअप्पम चिदम्बरम ने दोनों ही बातों को स्वीकार कर देश को हैरत में डाल दिया है।

केंद्र में जारी पत्र वार में मीडिया के प्रश्नों का जवाब देते वक्त चिदम्बरम से जब यह पूछा गया कि क्या उन्होंने अपने त्यागपत्र की पेशकश की थी? इसके जवाब में चिदम्बरम ने अपनी शार्ट टर्म मेमोरी का हवाला दे दिया। शार्ट टर्म मेमेरी का अर्थ है कि उन्हें पुरानी बातें याद नहीं रहती हैं। एक सप्ताह के अंदर ही चिदम्बरम द्वारा त्यागपत्र की पेशकश की खबरें सुर्खियां बनी थी। अगर देश के गृह मंत्री को एक सप्ताह के अंदर की ही बात याद नहीं है तो भला वे इससे पुरानी बातों को कैसे याद रख पाएंगे?

इतना ही नहीं आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत गणराज्य किस कदर तक लाचार है, इसका एक नमूना शुक्रवार को देखने को मिला। केंद्रीय गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हमें मालूम है कि अंडरवर्ल्ड माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान के कराची में मौजूद है, लेकिन हम मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के इनकार के कारण इस मामले में भारत कुछ करने की स्थिति में नहीं है।

गौरतलब है कि मुंबई में 1993 के ब्लास्ट के बाद दाऊद भारत से भाग गया था। उसके खिलाफ इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस भी है। अमेरिका के मुताबिक दाऊद के अल कायदा से नजदीकी रिश्ते हैं। उसे 2003 में इंटरनैशनल आतंकवादी घोषित किया गया था।

अब गड़करी का मिशन यूपी


अब गड़करी का मिशन यूपी

मोदी, पोखरियाल और येदयुरप्पा ने किया कार्यकारिणी से किनारा

बढ़ सकती है उमा की पूछ परख

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी वर्सेस एल.के.आड़वाणी शीत युद्ध में अब भारतीय जनता पार्टी दो धड़ों में बंटी साफ दिखाई पड़ने लगी है। एक तरफ तो पार्टी निजाम नितिन गड़करी उत्तर प्रदेश पर सारा ध्यान केंद्रित करना चाह रहे हैं वहीं दूसरी ओर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदयुरप्पा और उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने अपने आप को इस कार्यकारिणी की इस महत्वपूर्ण बैठक से अपने आप को दूर ही रखा है।

2014 में होने वाले आम चुनावों के पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनवों पर हर किसी की नजरें टिकी हुई हैं। भाजपा भी यूपी के सहारे ही आम चुनावों की वेतरणी पार करने की इच्छुक दिख रही है। राजनैतिक और भौगोलिक दृष्टि से सबसे बड़े इस सूबे में भाजपा अब समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी से सुरक्षित दूरी बनाकर चलेगी। यूपी में भाजपा ने अपने दम पर ही चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। शनिवार की बैठक में उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी संभालने वाली एमपी की पूर्व मुख्यमंत्री और फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती को हाथों हाथ लिए जाने की उम्मीद है। इसके साथ ही साथ संजय जोशी का कद भी बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

बीजेपी की शुक्रवार से शुरू हुई 2 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी. एस. येदयुरप्पा और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल श्निशंकश् भी नहीं पहुंचे। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने बताया कि येदयुरप्पा कुछ धार्मिक कर्मकांड की वजह से कार्यकारिणी की बैठक में नहीं आ पाए। प्रसाद ने कहा श्श्येदयुरप्पा जी को अपनी दिवंगत पत्नी के लिए पूजा करनी थी, इसलिए उन्होंने पार्टी से इसकी अनुमति ले ली थी। जब निशंक की बारी आई तो उन्होंने हालांकि निशंक की अनुपस्थिति के कारण के बारे में नहीं बताया।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

छत्तीसगढ़ के सांसद ने साधा सिवनी वासियों का हित!


0 सिवनी से चलेगी पेंच व्हेली ट्रेन . . . 6

छत्तीसगढ़ के सांसद ने साधा सिवनी वासियों का हित!

सिवनी को ब्राडगेज से जोड़ने माहोले ने लगाया था लोस में प्रश्न

सिवनी के सांसदों की नहीं टूटी तब भी तंद्रा

नैनपुर छिंदवाड़ा का सर्वे हुआ था 2003 - 04 में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। परिसीमन में सिवनी लोकसभा का अवसान हो गया। सिवनी की अंतिम सांसद रहीं श्रीमति नीता पटेरिया। वे 2004 से 2009 तक सांसद रहीं। उनके कार्यकाल में भी सिवनी की ब्राडगेज का मामला दिल्ली में सिवनी के जनसेवक नहीं उठा सके। इसी दर्मयान बिलासपुर के सांसद पुन्नू लाल माहोले ने मण्डला से बरास्ता सिवनी होकर छिंदवाड़ा जाने वाले रेल खण्ड के अमान परिवर्तन के संबंध में प्रश्न उठाया था, तब भी सिवनी में ब्राडगेज पर सियासत करने वालों की तंद्रा नहीं टूटी। सिवनी ब्राडगेज का मामला सिवनी के बजाए छत्तीसगढ़ के संसद सदस्य द्वारा देश की सबसे बड़ी पंचायत में उठाया जाना निश्चित तौर पर सिवनीवासियों के लिए सुखद संयोग ही माना जाएगा।

गौरतलब है कि लगभग डेढ़ दशक पहले तक सिवनी, छिंदवाड़ा और मण्डला लोकसभा सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। आदिवासियों की लगातार उपेक्षा के कारण महाकौशल में भाजपा का वर्चस्व बढ़ता ही चला गया। कांग्रेस के परंपरागत आदिवासी वोट बैंक उसके हाथ से फिसल गए। आदिवासियों ने अपनी उपेक्षा का सबक महाकौशल के हर लोकसभा सीट पर खड़े कांग्रेस के उम्मीदवारों को सिखाया। यहां तक कि एक उपचुनाव में छिंदवाड़ा के ताड़नहार कमल नाथ को भी भाजपा के सुंदर लाल पटवा ने धूल चटवा दी थी। वर्तमान में नरसिंहपुर, मण्डला और छिंदवाड़ा पर कांग्रेस तो जबलपुर और बालाघाट पर भाजपा का कब्जा है।

यहां उल्लेखनीय होगा कि लोकसभा में ही छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के सांसद पुन्नू लाल माहोले द्वारा मण्डला से छिंदवाड़ा रेल खण्ड के अमान परिवर्तन के बारे में प्रश्न पूछा गया था। माहोले के पूछे गए अतारांकित प्रश्न संख्या 4502 के जवाब में 25 अगस्त 2005 को तत्कालीन रेल राज्यमंत्री आर.वेलू ने कहा था कि नैनपुर से छिंदवाड़ा (139.6 किमी) खंड का छोटी लाईन से बड़ी लाईन परिवर्तन हेतु 2003-04 में सर्वेक्षण किया था, सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना की लागत उस वक्त ऋणात्मक प्रतिफल के साथ 228.22 करोड़ रूपए आंकी गई थी। यह प्रस्ताव अलाभकारी प्रकृति का होने के कारण अस्वीकार कर दिया गया था। इसके बाद इसे ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया था।

यहां एक बात और महत्वपूर्ण होगी कि एक मर्तबा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंहराव द्वारा भी चुनावी घोषणा के तौर पर परमहंसी आश्रम श्रीधाम में जगतगुरू शंकराचार्य जी के समक्ष यह कहा गया था कि उनके संसदीय क्षेत्र रहे महाराष्ट्र के रामटेक से गोटेगांव तक बड़ी रेल लाईन लाई जाएगी। दुर्भाग्य से वे दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बन पाए और छिंदवाड़ा नैनपुर से इतर रामटेक गोटेगांव की यह घोषणा खालिस चुनावी वायदा बनकर रह गई।
(क्रमशः जारी)

शिवराज से ज्यादा काबिल हैं गौर!


शिवराज से ज्यादा काबिल हैं गौर!

एक ही झटके में केंद्र से एक हजार करोड़ हथियाए गौर ने

हजारों करोड़ की इमदाद के बाद केंद्र कैसे कर रहा पक्षपात!

सूचना केंद्र द्वारा गढ़े गए गौर की तारीफों में कशीदे

दिल खोलकर राशि स्वीकृत की शहरी विकास मंत्री ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भाजपनीत मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सदा से ही केंद्र सरकार पर पक्षपात के आरोप लगाए जाते रहे हैं। मध्य प्रदेश सूचना केंद्र द्वारा गुरूवार 29 सितम्बर को स्थानीय प्रशासन और विकास मंत्री बाबूलाल गौर के हवाले से जारी खबर के अनुसार कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार पर पूरी उदारता दिखाई जा रही है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ज्यादा दमदार और काबिल होकर उभर रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर।

गुरूवार 29 सितम्बर को बाबू लाल गौर ने मध्य प्रदेश कोटे से केंद्र में मंत्री बने और शहरी विकास मंत्रालय के निजाम कमल नाथ से भेंट की। इस दौरान बाबू लाल गौर ने कमल नाथ के दिल में हृदय प्रदेश के प्रति सहानुभूति का पूरा लाभ उठाया तथा उनके विभाग से 1070 करोड़ नब्बे लाख रूपए की भारी भरकम राशि झटक ली। इतनी बड़ी राशि लाने में सफल रहे बाबू लाल गौर निश्चित तौर पर इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भारी पड़ते दिख रहे हैं। केंद्रीय मंत्री कमल नाथ ने इस राशि के बारे में आश्वासन नहीं दिया है उन्होंने इसकी बाकायदा स्वीकृति जारी की है।

जनसंपर्क विभाग के मध्य प्रदेश सूचना केंद्र द्वारा जारी समाचार के अनुसार मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री  बाबूलाल गौर ने आज यहां नई दिल्ली में केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ से भेंट की। इस अवसर पर श्री कमलनाथ ने भोपाल के बी.आर.टी.एस. कॉरीडोर की पुनरीक्षित योजना के लिए 121 करोड़ रुपये स्वीकृत किये जाने की जानकारी श्री गौर को दी। कमल नाथ ने श्री गौर को प्रदेश के 33 शहरों में केन्द्र सरकार की सहायता से चलायी जा रही यू.आई.डी.एस.एस.एम.टी. योजना के तहत विकास कार्यों के लिए 20 शहरों को द्वितीय किश्त के रूप में 171 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत करने की जानकारी दी।

विज्ञप्ति में आगे कहा गया है कि प्रदेश के 19 नगरों की नई पेयजल योजनाओं के लिए श्री गौर ने कमल नाथ से 642 करोड़ रुपये की स्वीकृति दिये जाने का आग्रह किया। इस पर श्री नाथ ने 642 करोड़ रुपये की स्वीकृति दिये जाने पर सहमति दी। इंदौर की रिवर साइड कॉरीडोर की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डी.पी.आर.) के लिए 97 करोड़ रुपये की स्वीकृति दिये जाने पर भी सहमति दी गई।

नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री श्री गौर ने यू.आई.डी.एस.एस.एम.टी. योजना के अंतर्गत प्रदेश के नगरीय क्षेत्रों की 6 शहरों की 47 योजनाओं के डी.पी.आर. (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार करने के लिए राशि की मांग की। इस पर कमलनाथ ने आठ करोड़ 22 लाख रुपये की राशि स्वीकृत करने पर सहमति दी। कमलनाथ ने खण्डवा और शिवपुरी नगर की जल प्रदाय योजनाएं जन भागीदारी (पी.पी.पी.) के आधार पर क्रियान्वित करने के लिए नवाचार के लिए एक करोड़ 68 लाख रुपये की स्वीकृति प्रदान की।

श्री गौर ने कमलनाथ से सागर नगर में आवागमन में सुधार के लिए सागर तालाब के चारों ओर चकरााघाट से बस स्टैण्ड तक तालाब के बाहर रिंग रोड बनाने के लिए केन्द्रीय सहायता का आग्रह किया। श्री गौर ने सागर में ही लोहिया पार्क के विस्तार और सुधार के लिए केन्द्रीय सहायता दिये जाने का आग्रह किया। इस पर कमलनाथ ने दोनों प्रस्तावों की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट भेजने के लिए कहा।

फग्गन के बाद निशाने पर होंगे महाकौशल के अन्य सांसद


फग्गन के बाद निशाने पर होंगे महाकौशल के अन्य सांसद

इशारों ही इशारों में सुषमा कह गईं बड़ी बात

नोट फॉर वोट का निशाना थे परिसीमन में प्रभावित सांसद

अमर सिंह के पास हो सकती है सांसदों की सूची

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। नोट फॉर वोट मामले में मध्य प्रदेश के मण्डला संसदीय क्षेत्र के पूर्व भाजपा सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते के मामले में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज द्वारा इशारों ही इशारों में अनेक गूढ़ बातें कह डालीं। मण्डला में गुरूवार को हुई जनाक्रोश महारैली के उपरांत सियासत गर्माती दिख रही है। भाजपा के रौद्र रूप को देखकर अब कांग्रेस द्वारा भाजपा को घेरने की कवायद की जा रही है।

इस महारैली को संबोधित करते हुए सुषमा स्वराज ने 22 जुलाई 2008 को संसद में नोटों की गड्डियां लहराने का जिकर करते हुए कहा कि अल्पमत में आ चुकी कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने सांसदों की खरीद फरोख्त का कुत्सित और घ्रणित कार्य किया। सुषमा का आरोप है कि सरकार बचाने के लिए 19 सांसदों की दरकार थी और इस हेतु सांसदों को करोड़ों रूपयों की रिश्वत दी गई। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि बहुमत जुटाने के लिए गरीब परिस्थिति के सांसदों और विशेषकर उन सांसदों को लक्ष्य बनाया गया जिनके संसदीय क्षेत्र या तो परिसीमन में विलुप्त हो रहे थे या फिर आरक्षित हो रहे थे।

सुषमा का सीधा आरोप था कि इसके लिए सांसदों को एक करोड़ रूपए पेशगी और दो करोड़ रूपए मतदान के बाद देने का वायदा किया गया था। सुषमा स्वाराज के इस बयान से भाजपा में ही अंदर ही अंदर खलबली मची हुई है। भाजपा में अब उन सांसदों को संदेह की नजर से देखा जाने लगेगा जिनके संसदीय क्षेत्र या तो समाप्त हो गए या आरक्षित हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि महाकौशल क्षेत्र का तीस साल पुराना सिवनी संसदीय क्षेत्र परिसीमन में विलुप्त हो गया है साथ ही साथ नोट फॉर वोट मामले में जेल में बंद फग्गन सिंह कुलस्ते भी महाकौशल के मण्डला संसदीय क्षेत्र के सांसद थे।

उधर अमर सिंह के करीबी सूत्रों का कहना है कि अगर कांग्रेस ने अमर सिंह की मदद नहीं की तो वे भी अपने कुछ पत्ते खोलकर कांग्रेस और भाजपा के लिए मुसीबत का बड़ा कारण बन सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि अमर सिंह के पास वह सूची है जिसमें नोट फॉर वोट के लिए पैसे का लेनदेन भी दर्ज है। इसमें मध्य प्रदेश के भाजपा सांसदों का नाम भी दर्ज होना बताया जा रहा है।

अब अण्णा हुए ब्लागीय!


अब अण्णा हुए ब्लागीय!

बनाया ब्लाग और हुए हाईटेक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को औंधे मुंह गिराकर देश को एक सूत्र में पिरोने वाले गांधीवादी समाजसेवी अण्णा हजारे भी अब हाईटेक हो गए हैं। अपना ब्लाग बनाकर उसके लिंक ट्विटर पर भेज अण्णा ने लोगों के बीच अपनी बात सहजता से पहुंचाने का प्रयास आरंभ कर दिया है। अपने ब्लाग के माध्यम से अण्णा हजारे अब सरकार के आरोपों का जवाब और सरकार पर तीखे प्रहार आसानी से कर सकेंगे।

सरकार की खुसुर पुुसुर से आजिज आ चुके अण्णा हजारे ने अपने ब्लाग पर लिखा है कि उन्होंने अपना अनशन किसी शासकीय एजेंट या पसंदीदा मंत्री के कहने पर नहीं वरन् अंतरात्मा की आवाज पर तोड़ा था। जो मंत्री अण्णा से बात करने आए थे उनसे अण्णा ने महज सरकारी प्रतिनिधि के बतौर बात की। गौरतलब है कि अण्णा ने अपना अनशन महाराष्ट्र कोटे से मंत्री बने विलास राव देशमुख से चर्चा के उपरांत समाप्त किया था। अण्णा और देशमुख दोनों एक ही सूबे के हैं।

बिजली की बचत हेतु केंद्र ने उठाए कदम


बिजली की बचत हेतु केंद्र ने उठाए कदम

सरकारी भवनों में सोलर सिस्टम किया अनिवार्य

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। लगता है बिजली की कमी से जूझ रहे भारत गणराज्य में अब बिजली की बचत के लिए केंद्र सरकार संजीदा हो गई है। केंद्रीय नवीन एवं नवीनीकरण उर्जा मंत्रालय ने देश के हर सूबे को ताकीद किया है कि राज्य के हर सरकारी कार्यालय में जल्द ही सोलर सिस्टम लगाकर बिजली की बचत सुनिश्चित की जाए। नवीनीकरण उर्जा विकास विभाग के माध्यम से राज्यों में कराए जाने वाले इस काम के लिए केंद्र सरकार द्वारा तीस से नब्बे फीसदी तक का अनुदान दिया जाएगा।

नवीनीकरण उर्जा मंत्री फारूख अब्दुला के करीबी सूत्रों का कहना है कि उनके निर्देश पर विभाग द्वारा एक महती कार्ययोजना को अंजाम दिया जा रहा है। इस योजना के तहत देश के हर प्रदेश में सरकारी कार्यालयों में जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय सोलर मिशन के तहत सोलर सिस्टम लगाया जाएगा। इस सिस्टम से सूर्य की रोशनी से दिन रात कार्यालय रोशन रह सकेंगे। मंत्रालय का उद्देश्य बिजली की कमी से जूझते देश को इससे निजात दिलाना है। सूत्रों ने यह भी कहा कि इसके लिए खरबों रूपए के बजट प्रावधान का प्रस्ताव है जो जल्द ही योजना आयोग को प्रेषित कर दिया जाएगा।

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

लोकसभा चुनावों का मुख्य मुद्दा रहा है ब्राडगेज!


0 सिवनी से चलेगी पेंच व्हेली ट्रेन . . . 5

लोकसभा चुनावों का मुख्य मुद्दा रहा है ब्राडगेज!

हर बार ब्राडगेज का आश्वासन देकर छला गया सिवनी वासियों को

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। जब जब लोकसभा चुनाव हुए हैं तब तब ब्राडगेज जैसे ज्वलंत और जनता से जुड़े मुद्दे को पार्टियों द्वारा उठाकर इस मामले में आश्वासन दे जनता का विश्वास जीता जाता रहा है। जीतने के बाद पांच साल तक न तो किसी सांसद ने उसे मिले जनादेश की चिंता की है और ना ही लोकसभा में इस मामले को उठाने का ही प्रयास किया है, और न ही पराजित उम्मीदवार ने ही इस मामले के लिए सांसद को जगाने का प्रयास किया। हार के बाद पराजित उम्मीदवार ने भी उसे नियति मानकर पांच साल के लिए मौन साधे रखा।
सिवनी लोकसभा जब तक अस्तित्व में रही हर बार जनता की भावनाओं का जमकर उपयोग किया गया है, प्रत्याशियों द्वारा। चूंकि रेल का ममला केंद्र सरकार का होता है अतः लोकसभा चुनावों के दौरान प्रमुख राजनैतिक दल के प्रत्याशियों द्वारा इस संवेदनशील मुद्दे को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सिवनी में शतायु हो चुकी नेरोगेज रेल लाईन को ब्राड गेज में तब्दील कराने का आश्वासन दिया जाता रहा है।
एक मर्तबा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंहराव द्वारा भी चुनावी घोषणा के तौर पर परमहंसी आश्रम श्रीधाम में जगतगुरू शंकराचार्य जी के समक्ष यह कहा गया था कि उनके संसदीय क्षेत्र रहे महाराष्ट्र के रामटेक से गोटेगांव तक बड़ी रेल लाईन लाई जाएगी। दुर्भाग्य से वे दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बन पाए और छिंदवाड़ा नैनपुर से इतर रामटेक गोटेगांव की यह घोषणा खालिस चुनावी वायदा बनकर रह गई।
सिवनी विधानसभा से दो बार कांग्रेस प्रत्याशी रहे आशुतोष वर्मा द्वारा अलबत्ता इस मामले को अपने हाथ में लेकर रामटेक गोटेगांव को भारतीय रेल के नक्शे पर लाने का हर संभव प्रयास किया गया किन्तु उनकी आवाज भारतीय रेल के नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई। पिछले बजट में इस मार्ग का जिकर होने से कुछ आशाएं अवश्य जगी हैं, किन्तु यक्ष प्रश्न अब भी यही है कि जब नागपुर से छिंदवाड़ा, सिवनी, नैनपुर होकर मण्डला और जबलपुर जाने वाला जो मार्ग अस्त्तिव में है उसका छिंदवाड़ा से नैनपुर और मण्डला का रेलखण्ड ही अभी तक नहीं बन पाया है तो नई रेल लाईन कब और कैसे आ पाएगी।
यहां उल्लेखनीय होगा कि जब जब चुनाव समाप्त हुए तो विजयी सांसद ने जनता से किए गए इस चुनावी वायदे को पूरा करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि सिवनी जिले के किसी भी संसद सदस्य द्वारा अब तक नैनपुर से बरास्ता सिवनी होकर छिंदवाड़ा जाने वाले रेलखण्ड के संबंध में प्रश्न नहीं उठाया गया है। सिवनी की सियासती जमीन इतनी भुरभुरी है कि बरास्ता राज्यसभा संसदीय सौंध तक पहुंचाने कांग्रेस और भाजपा को एक भी दावेदार नहीं मिला है इसलिए इस रेलखण्ड से संबंधित बात राज्य सभा में भी नहीं उठ सकी है।

लोकसभा चुनावों के आते ही सिवनी वासियों के मस्तिष्क पटल पर विकास का जो नक्शा उकेरा जाता रहा है उसमें ब्राडगेज को विशेष स्थान दिया जाता रहा है। लोगों को लगने लगता बस एक दो बरस में ही सिवनी ब्राडगेज से जुड़ जाएगा और फिर सिवनी के विकास के रास्ते प्रशस्त हो जाएंगे। सिवनी के निवासियों के युवा सदस्यों को इस विकास का भागीदार बनाकर यहां उद्योग धंधे स्थापित हो जाएंगे, फिर सिवनी में राम राज्य की स्थापना को कोई नहीं रोक सकता है।
(क्रमशः जारी)

बाबा आदम के जमाने में जी रही है कांग्रेस


बाबा आदम के जमाने में जी रही है कांग्रेस

तकनीकि मामलों में कांग्रेस मुख्यालय फिसड्डी

लिमटी खरे

नई दिल्ली। इक्कीसवीं सदी के भारत के स्वप्नदृष्टा तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की अर्धांग्नी एवं विश्व की ताकतवर महिलाओं में शुमार श्रीमति सोनिया गांधी के नेतृत्व में सवा सौ साल पुरानी और देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस का नेशनल हेडक्वार्टर आज भी बाबा आदम के जमाने में सांसे ले रहा है। तकनीकि मामलों में यह कार्यालय अन्य राजनैतिक पार्टियों के मुकाबले बेहद पिछड़ा ही है।

कांग्रेस की नजर में भविष्य के वजीरे आजम और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी एवं कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी का अपना निजी कार्यालय भले ही सूचना प्रोद्योगिकी के मामले में चाक चौबंद हो पर कांग्रेस का राष्ट्रीय मुख्यालय आज भी इस मामले में कराह ही रहा है।

हाल ही में रहीद किदवई की प्रकाशित एक पुस्तक कांग्रेस मुख्यालय का पता 24 अकबर रोड़ में इस बात का खुलासा हुआ है। कांग्र्रेस पर आरोप लगाया गया है कि उसने अपने मुख्यालय में अनेक अवैध निर्माण भी करवाए हैं। 295 पेज की यह किताब देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी कांग्रेस की अंदरूनी बातों को उजागर करती है।

कांग्रेस मुख्यालय का आलम यह है कि न तो यहां वाईफाई है और न ही अनेक महासचिवों और पदाधिकारियों के पास कंप्यूटर ही। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति इंदिरा गांधी से श्रीमति सोनिया गांधी तक कांग्रेस के मुख्यालय में कमरों के निर्माण तो करवाए गए हैं किन्तु शौचालयों की तादाद सीमित ही है। आलम यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सहित 11 महासचिवों के लिए तो शौचालय सहित कमरे हैं किन्तु अन्य पदाधिकारियों और आगंतुकों के लिए दो शौचालय हैं जो चोबीसों घंटे सड़ांध उगलते रहते हैं। किताब की बात को सच मानें तो मुख्यालय में एक भी शौचालय नहीं है जहां महिलाएं प्रसाधन कर सकें।

अण्णा को प्रथम नागरिक बनाने की तैयारी



अण्णा को प्रथम नागरिक बनाने की तैयारी

प्रतिभा ताई के बाद अण्णा का आशियाना होगा रायसीना हिल्स पर!

आम चुनावों के अण्णा को पिंजरे में बंद करने की कवायद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। अण्णा के रामलीला मैदान के सफलतम अनशन के बाद लोग उनकी तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से करने लगे थे। इंटरनेट पर तो अण्णा हजारे के चित्र वाले नोट भी बनकर आ गए थे। 16 अगस्त की धूम देशवासियों के सर चढ़कर बोल रही थी। लोगों का जोश और जुनून देखते ही बन रहा था। अण्णा प्रकरण में सत्ताधारी कांग्रेस के प्रबंधकों के सारे दांव उल्टे पड़ने के बाद अब सियासी दलों के नेता अण्णा की चौखट चूमते नजर आ रहे हैं।

अगले आम चुनावों में अगर अण्ण हजारे की दहाड़ एक बार फिर सुनाई पड़ी तो लोगों की भावनाओं का खिलवाड़ कर सत्ता की मलाई चखने वाले सियासी दल चारों खाने चित्त ही नजर आएंगे। इसी डर के चलते अब सियासी दलों के प्रबंधकों ने अण्णा के आसपास अपने ताने बाने बुनने आरंभ कर दिए हैं। प्रबंधकों का मानना है कि अण्णा जिस भी दल की गोद में बैठेंगे उसे चुनावों में खासा फायदा होने की उम्मीद है।

गौरतलब है कि अगले साल 2012 में जुलाई में देश का पहला नागरिक चुना जाना है एवं आम चुनाव मई 2014 में प्रस्तावित हैं। इस तरह अगर अण्णा को अपना उम्मीदवार बनाकर प्रस्तुत किया जाए तो निश्चित तौर पर यह संदेश जाएगा कि वह दल भ्रष्टाचार को मिटाने संकल्पित है। अण्णा का आशियाना रायसीना हिस्ल पर स्थित ब्रिटिश वायसराय जनरल के आवास यानी वर्तमान राष्ट्रपति भवन बनते ही अण्णा हजारे संवैधानिक मर्यादाओं के पालन के लिए पाबंद हो जाएंगे।

चर्चाओं के अनुसार शीर्ष सियासी दल कांग्रेस और भाजपा में इस विषय पर गंभीर मंथन भी चल रहा है। वैसे अण्णा के अनशन की समाप्ति पर यह संभावना व्यक्त की गई थी। उस वक्त ‘वे थे राष्ट्रपिता और ये होंगे राष्ट्रपति‘ शीर्षक की खबर ने सियासी हल्कों में तहलका भी मचाया था।

केंद्र बालाघाट में तैनात करेगा पेशेवर युवा


केंद्र बालाघाट में तैनात करेगा पेशेवर युवा

नक्सल प्रभावित जिलों की सुध ली सरकार ने

मण्डला, बालाघाट डिंडोरी हैं नक्सल प्रभावित

पीएम की मुहर हेतु लंबित है मामला

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश में तेजी से पैर पसारते नक्सलवाद पर अब केंद्र सरकार कुछ संजीदा होती नजर आ रही है। पिछले दिनों दिल्ली में हुई कलेक्टर्स कांफ्रेस के बाद केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक मसौदा तैयार किया है जिसके तहत विभाग की केंद्र पोषित योजनाओं के लिए सूबों के नक्सल प्रभावित जिलों में पेशेवर युवाओं की तैनाती का प्रस्ताव किया गया है। ये युवा जिलाधिकारियों का सहयोग करेंगे।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने बताया कि इस योजना को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समक्ष पिछले दिनों हुई नक्सल प्रभावित जिलों के कलेक्टर्स की बैठक में रखा गया था। नक्सल प्रभावित जिलों के कलेक्टर्स ने सरकार के इस प्रस्ताव को सराहा था। प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलो प्रोग्राम को अब सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय की अंतिम मुहर की दरकार है।

लोक कार्यक्रम और ग्रामीण प्रौद्योगिकी परिषद (कपार्ट) द्वारा स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से कार्यक्रमों का संचालन कराया जाता है। प्रधानमंत्री फेलो प्रोग्राम पर आने वाला पूरा खर्च कपार्ट उठाएगा। इससे खजाने पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। इसके लिए उन स्वयंसेवी संगठनों का सहयोग लिया जाएगा, जो नक्सली क्षेत्रों में पहले से ही काम कर रहे हैं।

गौरतलब है कि वर्तमान में मध्य प्रदेश के बालाघाट मण्डला और डिंडोरी जिलों को नक्सल प्रभावित जिलों की श्रेणी में रखा गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने सीधी, सिंगरोली, शहडोल, उमरिया और अनूपपुर को इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इस प्रस्ताव में बालाघाट और मण्डला जिले की सीमा से लगे सिवनी जिले को शुमार न किया जाना आश्चर्यजनक है क्योंकि कुछ सालों पहले तक सिवनी जिले में भी नक्सलवाद की पदचाप केवलारी और बरघाट विकासखण्ड में सुनाई देती रही है।

वैसे इस तरह के पेशेवर युवाओं को देश के 180 नक्सल प्रभावित जिलों में पदस्थ किए जाने की योजना है। वर्तमान में मध्य प्रदेश सहित छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखण्ड, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल मुख्य रूप से नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहे हैं। पिछले साल जुलाई माह में कर्नाटक को नक्सल प्रभावित राज्यों की सूची से हटा दिया गया था।

कलमाड़ी ने खेला था टिकिटों का भी खेल



कलमाड़ी ने खेला था टिकिटों का भी खेल

अपनों को बांट दी 72 करोड़ रू की टिकिटें

वेब साईट पर सोल्ड पर वास्तव में बिकी ही नहीं 75 फीसदी टिकिटें

टिकिट बिक्री के बाद जारी किए बिक्री के विज्ञापन!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता‘ की तर्ज पर कामन वेल्थ गेम्स की आयोजन समिति के अध्यक्ष रहे सुरेश कलमाड़ी के चमत्कार एक के बाद एक खुलते जा रहे हैं। हरि अर्थात भगवान के चमत्कार जनकल्याण के लिए थे किन्तु कलमाड़ी के चमत्कार कामन वेल्थ गेम्स के रास्ते खुद की वेल्थ सुधारने के लिए थे। इस आयोजन के लिए जनता के गाढ़े पसीने की कमाई के 72 करोड़ रूपयों की टिकिटें उपहार में ही बांट दी गई थीं।

उद्घाटन और समापन समारोह के लिए 23 हजार टिकिटें उपहार में दी गई थीं। लोगों ने इन्हें ले तो लिया किन्तु खेल देखने नहीं पहुंचे, परिणाम स्वरूप स्टेडियम में चालीस फीसदी सीट खाली ही रहीं। टिकिटों के लिए दर्शकों ने दस दिन में चालीस लाख से ज्यादा बार इसकी वेब साईट खंगाली किन्तु वहां टिकिटें सोल्ड ही मिलीं। और तो और दिल्ली में टिकिट बेचने के लिए एक भी काउंटर नहीं खोला गया। आईआरसीटीसी को सिर्फ एक आउटलेट के लिए दो करोड़ रूपयों का भुगतान कर दिया गया।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (केग) के प्रतिवेदन ने यह खुलासा किया है। आयोजन समिति द्वारा जून 2010 में टिकिटिंग सलाहकरा के द्वारा अनुबंध समाप्त होने पर विशेषज्ञ की राय के बिना ही खुद के द्वारा निर्णय ले लिए गए। अफरातफरी का माहौल इस कदर था कि सितम्बर 2010 तक टिकिटों की बिक्री आरंभ नहीं हो सकी।

इतना ही नहीं शुरूआत में टिकिटों से मिलने वाले राजस्व का लक्ष्य सौ करोड़ रखा गया था। बाद में इससे कुल राजस्व 39 करोड़ 17 लाख रूपए ही प्राप्त हुए। आश्चर्यजनक पहलू तो यह है कि टिकिट की बिक्री और प्रबंधन में ही 23 करोड़ 37 लाख रूपए खर्च हो गए। टिकिटों से कुल शुद्ध राजस्व करोड़ महज 15 करोड़ अस्सी लाख रूपए ही मिल पाया।

बुधवार, 28 सितंबर 2011

भारत माता के देश में लाचार है जननी


भारत माता के देश में लाचार है जननी

(लिमटी खरे)

दुनिया के चौधरी अमेरिका की मशहूर पत्रिका न्यूजवीक ने एक सर्वे कराया है जिसमें भारत गणराज्य में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन मिलता है। भारत को सौ में से महज 41.9 अंक ही मिल पाए हैं। जिस देश का पहला नागरिक महिला हो, जिस देश में लोकसभाध्यक्ष महिला हो, जिस देश के तमिलनाडू, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे सूबों की निजाम महिला हो, जिस देश की सरकार का रिमोट कंट्रोल भी कथित तौर पर महिला के पास हो, उस देश में महिलाओं की बदतर स्थिति कैसे हो सकती है। इन परिस्थितियों में तो यही माना जाएगा कि न्यूजवीक का सर्वेक्षण कोरी बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है। वस्तुतः यह कोरी बकवास नहीं है। यह जमीनी हकीकत है भारत गणराज्य की। लिंगानुपात भी भारत में चिंताजनक स्तर पर है। वैध अवैध सोनोग्राफी सेंटर्स में जन्म के पहले ही कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में चीन नंबर वन तो भारत दूसरी पायदान पर है।

2004 में जैसे ही कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार केंद्र पर काबिज हुई, और सरकार के अघोषित सबसे शक्तिशाली पद पर कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी बैठीं तभी लगने लगा था कि आने वाले समय में सरकार द्वारा महिलाओं के हितों का विशेष ध्यान रखा जाएगा। सात साल बीत गए पर महिलाओं की स्थिति में एक इंच भी सुधार नहीं हुआ है। महिलाओं के फायदे वाले सारे विधेयक आज भी सरकार की अलमारियों में पड़े हुए धूल खा रहे हैं। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई (33 फीसदी) भागीदारी सुनिश्चित करने संबंधी विधेयक अंततः लोकसभा में पारित ही नहीं हो सका। राजनैतिक लाभ हानि के चक्कर में संप्रग सरकार ने इस विधेयक को हाथ लगाने से परहेज ही रखा।

आजाद हिन्दुस्तान में देश की सबसे शक्तिशाली महिला होकर उभरने के बावजूद भी सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी चौदहवीं लोकसभा में महिला आरक्षण जैसे महात्वपूर्ण बिल को पास नहीं करवा सकीं। अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने अवश्य कहा है कि सरकार में आने पर महिलाओं की तीस फीसदी भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। पिछली मर्तबा संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही मौन साध रखा था। अगर कांग्रेस के मनमोहनी घोषणापत्र को अमली जामा पहनाया गया तो निश्चित रूप से आने वाले आम चुनावों के बाद आजादी के छः दशकों के उपरांत देश में महिलाओं की दशा में सुधार परिलक्षित हो सकता है, वस्तुतः एसा नहीं होगा नहीं, क्योंकि घोषणा पत्र को मतदाताओं को लुभाने के लिए ही किया जाता रहा है।

महिलाओं की हालत क्या है यह बताता है उत्तर प्रदेश में किया गया एक सर्वेक्षण। सर्वे के अनुसार 1952 से 2002 के बीच हुए 14 विधानसभा चुनावों में प्रदेश में कुल 235 महिला विधायक ही चुनी गईं थीं। इनमें से सुचिता कृपलानी और मायावती ही एसी भाग्यशाली रहीं जिनके हाथों मंे सूबे की बागड़ोर रही। चुनाव की रणभेरी बजते ही राजनैतिक दलों को महिलाओं की याद सतानी आरंभ हो जाती है। चुनावी लाभ के लिए वालीवुड के सितारों पर भी डोरे डालने से बाज नहीं आते हैं, देश के राजनेता। भीड़ जुटाने और भीड़ को वोट मंे तब्दील करवाने की जुगत में बड़े बड़े राजनेता भी रूपहले पर्दे की नायिकाओं की चिरोरी करते नज़र आते हैं।

देश के ग्रामीण इलाकों में महिलाओ की दुर्दशा देखते ही बनती है। कहने को तो सरकारों द्वारा बालिकाओं की पढ़ाई के लिए हर संभव प्रयास किए हैं। किन्तु ज़मीनी हकीकत इससे उलट है। गांव का आलम यह है कि स्कूलों में शौचालयों के अभाव के चलते देश की बेटियां पढ़ाई से वंचित हैं। प्राचीन काल से माना जाता रहा है कि पुरातनपंथी और लिंगभेदी मानसिकता के चलते देश के अनेक हिस्सों मंे लड़कियों को स्कूल पढ़ने नहीं भेजा जाता। एक गैर सरकारी संगठन द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार उत्तर भारत के अनेक गांवों में बेटियों को शाला इसलिए नहीं भेजा जाता, क्योंकि वे अपनी बेटी को शिक्षित नहीं करना चाहते। इसकी प्रमुख वजह गांवों मंे शौचालय का न होना है।

शौचालयों के लिए केंद्र सरकार द्वारा समग्र स्वच्छता अभियान चलाया है। इसके लिए अरबों रूपयों की राशि राज्यों के माध्यम  से शुष्क शोचालय बनाने में खर्च की जा रही है। सरकारी महकमों के भ्रष्ट तंत्र के चलते इसमें से अस्सी फीसदी राशि गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से सरकारी मुलाजिमों ने डकार ली होगी। सदियों से यही माना जाता रहा है कि नारी घर की शोभा है। घर का कामकाज, पति, सास ससुर की सेवा, बच्चों की देखभाल उसके प्रमुख दायित्वों में शुमार माना जाता रहा है। अस्सी के दशक तक देश में महिलाओं की स्थिति कमोबेश यही रही है। 1982 में एशियाड के उपरांत टीवी की दस्तक से मानो सब कुछ बदल गया।

नब्बे के दशक के आरंभ में महानगरों में महिलाओं के प्रति समाज की सोच में खासा बदलाव देखा गया। इसके बाद तो मानो महिलाओं को प्रगति के पंख लग गए हों। आज देश में जिला मुख्यालयों में भी महिलाओं की सोच में बदलाव साफ देखा जा सकता है। कल तक चूल्हा चौका संभालने वाली महिला के हाथ आज कंप्यूटर पर जिस तेजी से थिरकते हैं, उसे देखकर प्रोढ़ हो रही पीढी आश्चर्य व्यक्त करती है। कहने को तो आज महिलाएं हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं, पर सिर्फ बड़े, मझौले शहरों की। गांवों की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। देश की अर्थव्यवस्था गावों से ही संचालित होती है। देश को अन्न देने वाले अधिकांश किसानों की बेटियां आज भी अशिक्षित ही हैं।

आधुनिकीकरण की दौड़ में बड़े शहरों में महिलाओ ने पुरूषों के साथ बराबरी अवश्य कर ली हो पर परिवर्तन के इस युग का खामियाजा भी जवान होती पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है। मेट्रो में सरेआम शराब गटकती और धुंए के छल्ले उड़ाती युवतियों को देखकर लगने लगता है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति कितने घिनौने स्वरूप को ओढ़ने जा रही है। पिछले सालों के रिकार्ड पर अगर नज़र डाली जाए तो शराब पीकर वाहन चलाने, पुलिस से दुर्व्यवहार करने के मामले में दिल्ली की महिलाओं ने बाजी मारी है। टीवी पर गंदे अश्लील गाने, सरेआम काकटेल पार्टियां किसी को अकर्षित करतीं हो न करती हों पर महानगरों की महिलाएं धीरे धीरे इनसे आकर्षित होकर इसमें रच बस गईं हैं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि महानगरों और गांव की संस्कृति के बीच खाई बहुत लंबी हो चुकी है, जिसे पाटना जरूरी है। अन्यथा एक ही देश में संस्कृति के दो चेहरे दिखाई देंगे।

बहरहाल सरकारों को चाहिए कि महिलाओं के हितों में बनाए गई योजनाओं को कानून में तब्दील करें, और इनके पालन में कड़ाई बरतें। वरना सरकारों की अच्छी सोच के बावजूद भी छोटे शहरों और गांव, मजरों टोलों की महिलाएं पिछड़ेपन को अंगीकार करने पर विवश होंगी।