शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

केंद्र के नियमों का पालन करने में कोताही बरत रहे हैं शिवराज


लूट मची है मनरेगा के कामों में . . . 4

केंद्र के नियमों का पालन करने में कोताही बरत रहे हैं शिवराज

मनरेगा के कामों को बनाया लूट का अड्डा


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। ग्रामीण विकास मंत्रालय इस बात पर बेहद हैरान है कि अरबों रूपए फूंकने के बाद भी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून जमीनी स्तर पर बुरी तरह फ्लाप कैसे है। पिछले दिनों में हुई ग्रामीण विकास मंत्रालय की बैठक में अप्रेल 2011 तक विजलेंस मानिटरिंग कमेटी की बैठकों का पिछले पांच साल का लेखा जोखा देखा तो अफसरों के होश उड़ गए। अरबों रूपए खर्च करने के बाद भी यह कमेटी कोई ठोस नतीजा देने में असफल ही रही।

इस बैठक में यह बात उभरकर सामने आई कि भाजपा की मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार, गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ ही साथ बिहार, पंजाब, झारखण्ड और उत्तराखण्ड जैसे राज्यों में पिदले पांच सालों से मानीटरिंग कमेटी की बैठक ही आहूत नहीं हुई। कहा जा रहा है कि बैठक में इस बात को भी रेखांकित किया गया कि मध्य प्रदेश में मनरेगा के कामों में सबसे अधिक भ्रष्टाचार की शिकायतें मिली हैं।

ग्रामीण विकास मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि पांच सालों में महाराष्ट्र ने नौ, राजस्थान और उत्तर प्रदेश ने तीन तीन, छत्तीसगढ़ ने दो, हरियाणा ने एक ही बैठक आयोजित की। सूत्रों ने कहा कि वस्तुतः देश के सभी राज्यों को इन पांच सालों में कम से कम 330 बैठकें आहूत करना आवश्यक था। इसकी तुलना में देश में मनरेगा मानीटरिंग कमेटी की महज 56 बैठकें ही हो पाई हैं।

सूत्रों ने आगे कहा कि मनरेगा के नियमों के अनुसार राज्य स्तर पर विजलेंस मानीटरिंग कमेटी की बैठक साल में कम से कम दो बार तो आहूत होना ही चाहिए। इतना ही नहीं जिला स्तर पर साल में मनरेगा की मानीटरिंग कमेटी की बैठक साल में कम से कम चार बार होना अनिवार्य रखा गया है। मजे की बात है कि देश में किसी भी हिस्से के जिला कलेक्टर ने मनरेगा के नियमों का पालन ही नहीं किया।

सूत्रों ने आगे कहा कि मनरेगा की निगरानी समिति की बैठकों में वहां के स्थानीय सांसद और विधायकों को शामिल करने का दायित्व भी जिला कलेक्टर्स के कांधों पर ही डाला गया है। सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष और उनकी कोटरी इस बात पर सबसे ज्यादा हैरान हैं कि केंद्र शासन की इस अभिनव योजना को भाजपा शासित राज्यों में पलीता लगाया जा रहा है और जिला स्तर पर कांग्रेस मूक दर्शक बनी इस भ्रष्टाचार में सहभागी होने का धर्म निभा रही है।

हरीश खरे से खासे खफा हैं कांग्रेस के क्षत्रप


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 42

हरीश खरे से खासे खफा हैं कांग्रेस के क्षत्रप

अटल से करीबी गिरा सकती है खरे पर गाज


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे के प्रबंधन पर कांग्रेस के आला नेता अब खुलकर सामने आते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के अंदर हरीश खरे को हटाने अकुलाहट बढ़ती ही जा रही है। हरीश खरे पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से करीबी के आरोप भी लग रहे हैं। कांग्रेस के अंदर चल रही चर्चाओं के अनुसार खरे द्वारा मीडिया प्रबंधन के काम को कुशलता से अंजाम दिए जाने के बजाए मनमोहन सिंह को शर्मसार अधिक करवाया जा रहा है।

कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के बीच खाई खोदने में भी हरीश खरे की भूमिका है। हरीश खरे के अकुशल मीडिया प्रबंधन की मिसाल के तौर पर लोग प्रधानमंत्री की मीडिया के साथ दो मुलाकातों का ब्योरा दे रहे हैं। दोनों ही बार प्रधानमंत्री को राहत मिलने के बजाए उन्हें शर्मसार ज्यादा होना पड़ा है। पीएमओ की तरफ से चीन और बंग्लादेश के लिए कही गई ऑफ द रिकार्ड बातचीत ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विवाद को ही जन्म दिया था। प्रधानमंत्री की गिरी हुई साख को उठाने में खरे पूरी तरह से नाकाम ही रहे हैं।

रामलीला मैदान में भी अण्णा हजारे के अनशन के दौरान भी प्रधानमंत्री असहाय ही नजर आए। उस वक्त लगने लगा था कि पीएम का प्रबंधन कितना लचर है। इस दौरान कुछ पत्रकार ही खरे से प्रसन्न रहे बाकी सब सूचना पाने के लिए जब भी हरीश खरे को फोन मिलाते वहां से कोई जानकारी न मिलने पर उन पर बरस पड़ते। पत्रकारों को बेतुके जवाबों के चलते खरे वैसे भी संदेह के दायरे में ही आ चुके हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के खासे करीबी माने जाने वाले प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे सूचनाएं देने में रेवड़ियां चीन्ह चीन्ह कर बांटते हैं। भाजपा समर्थित एक समाचार पत्र के पत्रकार का तो हरीश खरे पर सीधा सीधा आरोप है कि उन्होंने उस पत्रकार को सूचना देने से ही मना कर दिया। उक्त पत्रकार इस मामले को लेकर प्रेस परिषद की शरण में जाने की तैयारी में जुट गए हैं।

कांग्रेस के आला नेता भी अब हरीश खरे की प्रधानमंत्री कार्यालय से बिदाई में लग गए हैं। जब से सोनिया के अति विश्वस्त पुलक चटर्जी ने पीएमओ में आमद दी है तब से ही हरीश खरे असहज महसूस करने लगे हैं। मीडिया की पृष्ठभूमि वाले एक केंद्रीय मंत्री इन दिनों अपने खासुलखास को पीएमओ में प्रधानमंत्री का मीडिया सलाहकार बनाने की जुगत में लग चुके हैं। संभवतः उनकी सोच होगी कि अपने खासुलखास मीडिया सलाहकार के रास्ते ही वे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनते ही वे मलाईदार कैबनेट मंत्रालय पा जाएं।

(क्रमशः जारी)

गड़करी के लिए खतरे की घंटी है मोदी का अभ्युदय


गड़करी के लिए खतरे की घंटी है मोदी का अभ्युदय

सेकंड टर्म दिख रहा मुश्किल में गड़करी का


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी में सियासत की धुरी इन दिनों राजग के पीएम इन वेटिंग से हटे एल.के.आड़वाणी, भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी और सर्वशक्तिशाली होकर उभरे नरेंद्र मोदी के इर्दगिर्द ही घूम रही है। तीनों के बीच आपसी मतभेद और मनभेद होने के बाद भी सियासी फिजां में कुछ अस्पष्ट तस्वीरें उभरने लगी हैं, जिनके आधार पर कहा जाने लगा है कि गड़करी को पार्श्व में ढकेलने के लिए मोदी और आड़वाणी कभी भी हाथ मिला सकते हैं।

झंडेवालान स्थित राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय ‘केशव कुंज‘ के सूत्रों का कहना है कि संघ नेतृत्व ने नरेंद्र मोदी से अपना पुराना वेमनस्य भुला दिया और संघ के इशारे पर ही एल.के.आड़वाणी ने भी मोदी को आगे करना आरंभ कर दिया है। उधर आड़वाणी ने सदा से ही यही चाहा है कि गड़करी किसी भी कीमत पर दूसरी बार भाजपाध्यक्ष न बन पाएं। गड़करी हैं कि अपने सधे कदमों से भाजपा के अंदर अपनी पैठ बनाते जा रहे हैं। पुराने भूले बिसरे गीत (भाजपा छोड़कर गए नेताओं) बजाकर नेताओं की घर वापसी से गड़करी ने कुछ नेताओं को नाराज अवश्य किया किन्तु इससे गड़करी ने पार्टी को मजबूती प्रदान की है।

अड़वाणी जुंडाली इन दिनों गड़करी के खिलाफ ताना बाना बुनने में लग चुकी है। सूत्रों का कहना है कि संघ के संकेतों को भांपकर अब अड़वाणी की मित्र मण्डली भी इस बात को जोर शोर से प्रचारित करवा रहा है कि मोदी ही भाजपा के अगले निजाम होंगे। मोदी और आड़वाणी की युती अगर बन गई तो निश्चित तौर पर यह नितिन गड़करी के लिए खतरे की ही घंटी साबित होगी।

नरेंद्र मोदी ने अब अपनी चाल चलते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को कब्जे में करना आरंभ कर दिया है। मोदी के करीबी सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों को देखते हुए मोदी ने पार्टी आलाकमान से पूछा है कि वहां के लिए कितनी रसद (पैसा और मसल पावर) चाहिए। उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन खराब भी रहा तो यह गड़करी के खाते में जाएगा और अगर प्रदर्शन अच्छा रहा तो मैन और मसल पावर का हवाला देकर मोदी गेंद अपने पाले में ले आएंगे।

अविश्वास प्रस्ताव से कांग्रेस की किरकिरी


अविश्वास प्रस्ताव से कांग्रेस की किरकिरी

भूरिया राहुल का असफल रहा प्रबंधन

एक बार फिर सैट नजर आई कांग्रेस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को घेरने में सूबाई कांग्रेस नाकाम ही रही। भ्रष्टाचार के मुद्दों पर कांग्रेस अंततः खेत ही रही। शिवराज सिंह चौहान ने महज 658 करोड़ रूपए की बिजली बिना निविदा के खरीदी और कांग्रेस उनकी देहरी पर मुजरा करते ही नजर आई। तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने सड़कों के सुधार के लिए बीस हजार करोड़ रूपए दिए पर शिवराज का दावा है कि उन्हें महज 144 करोड़ रूपए ही मिले।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुख्यालय 24 अकबर रोड़ में शिवराज के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के स्वांग पर छींटाकशी के दौर थम नहीं रहे हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पीछे खड़े राजा दिग्विजय सिंह के अकुशल प्रबंधन को सभी आड़े हाथों ले रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब तैयारी ही पूरी नहीं थी तो अविश्वास प्रस्ताव लाकर कांग्रेस की भद्द पिटवाने का क्या ओचित्य था। इतना ही नहीं दिग्गी विरोधी गुटों ने इसका पूरा लेखा जोखा तैयार कर कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी के दरबार में मामले को घसीटने का मन बना लिया है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि शहरी विकास मंत्री कमल नाथ ने हाल ही में मध्य प्रदेश दौर के दर्मयान आरोप लगाए थे कि उन्होंने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को नेशनल हाईवे के सुधार के लिए बीस हजार करोड़ रूपए की इमदाद दी थी। उधर शिवराज सिंह चौहान ने अविश्वास प्रस्ताव के दौरान कहा कि कमल नाथ ने केंद्रीय सड़क निधि से 14 सौ करोड़ रूपए देने का वायदा किया था किन्तु उन्हें महज 144 करोड़ रूपए ही मिले।

इस मामले में कमल नाथ गलत बयानी कर रहे हैं या शिवराज यह कहना मुश्किल है किन्तु प्रदेश के कांग्रेस के विधायकों ने इस बात पर अपत्ति न करना साफ जाहिर करता है कि प्रदेश कांग्रेस पूरी तरह शिवराज मय हो चुकी है। हालात देखकर लगने लगा है कि कांग्रेस इन दिनों शिवराज की देहरी पर मुजरा ही कर रही है।

इसी तरह बिजली के मामले में भी कांग्रेस के बिजली के मामले में 14 हजार करोड़ रूपए के आरोप को गलत ठहराते हुए शिवराज सिंह ने कहा कि इस तरह का कोई घोटाला नहीं हुआ है। राज्य सरकार ने महज 658 करोड़ 60 लाख रूपए की बिजली ही बिना निविदा के खरीदी है। देखा जाए तो डम्फर मामले में क्लीन चिट लेने और कांग्रेस के बोथरे तीरों के बाद शिवराज सिंह चौहान के हौसले बुलंदी पर हैं।

राज्य सरकार द्वारा अगर एक रूपए की बिजली भी बिना निविदा के खरीदी है तो यह मामला संगीन और अवैध है। इस मामले में कांग्रेस की चुप्पी आश्चर्यजनक ही है। कांग्रेस के मौन रहने से उन अफवाहों को बल मिल रहा है जिनमें कहा जा रहा है कि कांग्रेस के वरिष्ठ पदाधिकारी शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही राज्य सरकार से लाखों रूपए महीना का अघोषित वजीफा पा रहे हैं।

मध्य प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ लाए गए अब तक के पहले अविश्वास प्रस्ताव में भाजपा ने तो परचम लहरा दिया किन्तु सूबे में पहले से ही उखड़ी सांसों वाली कांग्रेस की जमकर भद्द पिटी। चार दिन तक कांग्रेस के लगाए गए हर आरोप का शिवराज सिंह चौहान ने सिलसिलेवार जवाब दिया। अविश्वास प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में शिवराज के पक्ष में 149 तो विपक्ष में 63 मत पड़े। इस अविश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस की तैयारी को देखकर लगने लगा है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में सूबे में एक बार फिर कमल को खिलने से कोई रोक नहीं सकता है।

नीता के गोलमोल प्रश्न का गोलमोल जवाब दिया मलैया ने


नीता के गोलमोल प्रश्न का गोलमोल जवाब दिया मलैया ने

पेंच मामले में मरहम लगाने की असफल कोशिश


(नंद किशोर)

भोपाल। छिंदवाड़ा और सिवनी जिले के किसानों के लिए 1984 में बनी महात्वाकांक्षी पेंच परियोजना कांग्रेस और भाजपा के शासन के बावजूद भी सत्ताईस सालों के कालांतर में परवान नहीं चढ़ सकी है। इस योजना में एक ईंट भी न लग पाना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। कांग्रेस के मध्य प्रदेश के एक क्षत्रप की नाराजगी का शिकार हुई इस परियोजना को एसा पक्षाघात हुआ कि भाजपा के चिकित्सक भी इस मरीज को हाथ लगाने से कतरा रहे हैं।

सिंचाई विभाग के भरोसेमंद सूत्रों का दावा है कि बढ़ती लागत के चलते राज्य सरकार द्वारा पेंच परियोजना को बंद करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जा चुका है। घोषणावीर मुख्यमंत्री को इस बात का इल्म नहीं था। अनजाने में ही उन्होंने छिंदवाड़ा के किसानों के समक्ष इस योजना को बंद न किए जाने की घोषणा कर दी। सिंचाई विभाग के आला अधिकारी अब संशय में ही हैं कि इस परियोजना को चालू कैसे रखा जाए।

सूत्रों ने आगे कहा कि मुख्यमंत्री के इशारे पर ही इस परियोजना को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया है। इसमें ‘स्टेटस को‘ की स्थिति बना दी गई है अर्थात अब न तो केंद्र से ही कोई पत्र व्यवहार किया जाए और न ही राज्य सरकार इस मामले में कोई पहल करे। अगर इस संबंध में कोई पत्राचार भी करता है तो उसे भी गोल मोल ही जवाब दिया जाकर मामला शांत करवा दिया जाए।

इस संबंध में सिवनी की पूर्व सांसद और वर्तमान विधायक श्रीमति नीता पटेरिया ने विधानसभा में एक प्रश्न पूछा, तो शिवराज सिंह चौहान अचंभित रह गए। वे इसलिए चौंक गए क्योंकि श्रीमति पटेरिया भाजपा की विधायक हैं, और सूबे में सरकार भी भाजपा की ही है। श्रीमति पटेरिया ने किसानों का हित साधते हुए प्रश्न किया कि क्या किसानों की हित संवर्धक पेंच परियोजना को बंद करने का राज्य सरकार का कोई प्रस्ताव है।

विधानसभा में श्रीमति नीता पटेरिया द्वारा लगाए गए प्रश्न क्रमांक 1421 में एक पूरक प्रश्न भी लगाया कि यह परियोजना कब तक पूरी हो जाएगी। इसके जवाब में सिंचाई मंत्री जयंत मलैया ने कहा कि इस परियोजना में भूअर्जन का काम चल रहा है, जिसमें कुछ विलंब हो रहा है। यह परियोजना कब तक पूरी हो पाएगी यह बताया जाना संभव नहीं है। श्रीमति पटेरिया ने यहां तक ही किसानों का हित साधा।

इसके बाद पता नहीं श्रीमति पटेरिया ने किसानों के हित संवंर्धन को आगे नहीं बढ़ाते हुए यह नहीं पूछा कि क्या कारण है कि यह परियोजना सत्ताईस सालों से हिचकोले खा रही है? क्या कारण है कि इसमें बार बार भ्रम की स्थिति बनती जा रही है। आखिर क्या वजह थी कि राज्य सरकार के सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव राधेश्याम जुलानिया जिला कलेक्ट्रेट सिवनी के सभाकक्ष में चल रही आवश्यक बैठक को छोड़कर सर्किट हाउस में केवलारी के कांग्रेस विधायक हरवंश सिंह के बुलावे पर चले गए और उनसे लंबी चर्चा के बाद जब बाहर निकले तो किसानों से बदसलूकी की? क्या वजह है कि पुलिस में भाजपा के युवा नेता के खिलाफ इस मामले में प्रथम सूचना दर्ज हो गई? इन सहित अनेक जनहित के मामलों में श्रीमति पटेरिया ने संवेदना नहीं दिखाया जाना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है।

दर दर भटक रहा आईडिया का उपभोक्ता


एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया . . .  30

दर दर भटक रहा आईडिया का उपभोक्ता

पता नहीं कौन उपयोग कर रहा है सिम


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। एक आईडिया जो बदल दे आपकी दुनिया के स्लोगन वाली आदित्य बिरला के स्वामित्व वाली आईडिया सेल्यूलर की नजरों में उसके उपभोक्ता की इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं है। मध्य प्रदेश से आए एक उपभोक्ता ने बताया कि उसने लगभग तीन माह पूर्व आईडिया का नेट सेटर लिया था। उसका नेट सेटर और सिम दोनों ने ही काम करना बंद कर दिया। बार बार आईडिया की देहरी चूमने के बाद भी उपभोक्ता को न्याय नहीं मिल सका है।

एक उपभोक्ता द्वारा लिए गए नेट कनेक्शन को लगभग तीन माह बाद भी उसे नहीं सौंपा जाना आश्चर्य का विषय ही माना जा रहा है। नेट के बेहद धीरे होने की शिकायत महाकौशल के हर जिले में आम हो गई है। उक्त उपभोक्ता द्वारा दूरभाष पर बताया गया कि उसने आईडिया का नेट कनेक्शन लिया था। नेट तो आरंभ से ही इतनी धीमी गति में चल रहा है मानो आकाशवाणी का सवा तीन बजे का धीमी गति का समाचार हो। नेट पर सर्फिंग करने पर उसे साईट खोलने में घंटों ही लग जाते हैं। जैसे तैसे मेल चेक करने की बारी आती है तब लागिन करने पर ही कनेक्शन दम तोड़ देता है।

वहीं सिवनी जिले के एक उपभोक्ता ने बताया कि उसने आईडिया का नेट सैटर के साथ कनेक्शन लिया था। उसका सिम नंबर 89917851010105568677 एवं मोबाईल नंबर 9617664970 प्रदाय किया गया था। उसने सिम ली ओर नेट आरंभ किया एक दिन बाद वह बंद हो गया। इसकी शिकायत के लिए वह दर दर भटका अंत में दुकान जाकर उसने पूछा तो पता चला कि उसके दस्तावेज पूर्ण नहीं थे। जब उस उपभोक्ता ने बारीकी से जांच की तो ज्ञात हुआ कि उसके दस्तावेज तो पूर्ण थे। उसका नेट सेटर और सिम दोनों ही आईडिया के कारिंदों ने रख ली है जो उसे दो माह बाद भी नहीं मिल पाई है।

उक्त उपभोक्ता ने कहा कि उसके द्वारा ही बार बार आईडिया के टीम लीडर और एरिया सेल्स मेनेजर के मोबाईल नंबर 9826070095 पर संपर्क किया जाता रहा है, पर आईडिया की ओर से एक बार भी उससे अपनी तरफ से बात नहीं की गई है। उसने कहा कि उसकी आईडी प्रूफ पर जारी सिम किसके पास चल रही है इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है। उक्त उपभोक्ता ने आशंका व्यक्त की है कि कहीं उसकी सिम का दुरूपयोग न हो।

(क्रमशः जारी)

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

इस रात की सुबह नहीं. . .


इस रात की सुबह नहीं. . .


(लिमटी खरे)

सत्ताईस साल गुजर जाने के बाद भी न तो भारतीय जनता पार्टी और न ही कांग्रेस ने भोपाल गैस कांड को गंभीरता से लिया है। इंसाफ की रस्मअदायगी में सियासी पार्टियों ने अपने अपने हित तबियत से साधे हैं। 1984 में दो और तीन दिसंबर की दरम्यानी रात में देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में लाशों के ढेर बिछ गए थे। उस वक्त देश और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार काबिज थी। भोपाल गैस कांड में अब तक न जाने कितने राज सामने आ चुके हैं। 84 में अमरिका मूल की डाव केमिकल्स के आगे देश के नीति निर्धारकों ने घुटने टेक दिए थे। सैम अंकल को बेच दिया था हिन्दुस्तान का जमीर। यूनियन कार्बाईड से निकली जहरीली गैस ने पांच लाख से ज्यादा लोगों पर असर दिखाया। बीस हजार से ज्यादा जानें गईं पर सरकारें नीरो के मानिंद चैन की बंसी ही बजाती रहीं। इसके बाद भी परमाणु करार करने को भारत सरकार बेकरार ही दिख रही है।


सन 1984 में 2 और 3 दिसंबर की दर्मयानी रात में देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में हुआ गैस हादसा हिन्दुस्तान ही नहीं वरन दुनिया का सबसे बडा औद्योगिक हादसा था। यूनियन कार्बाईड के डॉव केमिकल के कारखाने से निकली जानलेवा गैस ने पांच लाख से अधिक लोगों को अपनी जद में लिया और बीस हजार से ज्यादा काल कलवित हो गए थे। आश्चर्य इस बात का है कि इसके दोषी आज भी सलाखों के बाहर हैं। हिन्दुस्तान में पीडित न्याय की गुहार लगाते हुए बच्चे से जवान, जवान से प्रोढ, प्रोढ से बुजुर्ग और न जाने कितने बुजुर्ग तो दुनिया छोड चुके हैं। 26 साल का समय कम नहीं होता है। 26 साल में बच्चा समझदार होकर जवानी की दहलीज पर काफी आगे निकल चुका होता है। दुनिया की इतनी बडी औद्योगिक त्रासदी जो कि मानव निर्मित ही थी, के दोषियों की पहचान होने के बाद भी इसमें न्याय के लिए अगर भारत जैसे देश में इतना समय लग जाए तो यह निश्चित तौर पर हमें शर्मसार करने के लिए पर्याप्त ही माना जा सकता है।

इस त्रासदी के उपरांत आज भी प्रभावित इलाके में भूजल बुरी तरह प्रदूषित है, इससे प्रभावित लोगों की आने वाली पीढियां बिना किसी जुर्म की सजा शारीरिक और मानसिक तौर पर भुगत रहीं हैं। विडम्बना तो यह है कि हजारों को असमय ही मौत की नींद सुलाने वाले दोषियों को 25 साल बाद महज दो दो साल की सजा मिली और तो और उन्हें जमानत भी तत्काल ही मिल गई। हमारे विचार से तो इस मुकदमे की सजा इतनी होनी चाहिए थी, कि यह दुनिया भर में इस तरह के मामलों के लिए एक नजीर पेश करती, वस्तुतः एसा हुआ नहीं। देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोईली खुद भी लाचार होकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि इस मामले में न्याय नहीं मिल सका है। फैसले में हुई देरी को वे दुर्भाग्यपूर्ण करार दे रहे हैं। दरअसल मोईली से ही यह प्रतिप्रश्न किए जाने की आवश्यक्ता है कि उन्होंने या उनके पहले रहे कानून मंत्रियों ने इस मामले में पीडितों को न्याय दिलवाने में क्या भूमिका निभाई है।

विश्व के इस सबसे बडे औद्योगिक हादसे का फैसला इस तरह का आया मानो किसी आम सडक या रेल दुर्घटना का फैसला सुनाया जा रहा हो। इस मामले में प्रमुख दोषी यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन सर्वेसर्वा वारेन एंडरसन के बारे में एक शब्द भी न लिखा जाना निश्चित तौर पर आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। यह सब तब हुआ जब इस घटना के घटने के महज तीन दिन बाद ही मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया हो। सीबीआई पर लोगों का विश्वास आज भी कायम है। इस जांच एजेंसी के बारे में लोगों का मानना है कि यह भले ही सरकार के दबाव में काम करे पर इसमें पारदर्शिता कुछ हद तक तो होती है। इस फैसले के बाद से लोगों का भरोसा सीबीआई से उठना स्वाभाविक ही है। इस पूरे मामले ने भारत के ‘‘तंत्र‘‘ को ही बेनकाब कर दिया है। क्या कार्यपलिका, क्या न्यायपालिक और क्या विधायिका। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि प्रजातंत्र के ये तीनों स्तंभ सिर्फ और सिर्फ बलशाली, बाहुबली, धनबली विशेष तबके की ‘‘लौंडी‘‘ बनकर रह गए हैं।

सीबीआई ने तीन साल तक लंबी छानबीन की और आरोप पत्र दायर किया था। इसके बाद आरोपियों ने उच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए थे। उच्च न्यायालय ने इनकी अपील को खारिज कर दिया था। इसके बाद आरोपी सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए और वहां से उन्होंने आरोप पत्र को अपने मुताबिक कमजोर करवाने में सफलता हासिल की। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सीबीआई इतनी कमजोर हो गई थी, कि उसने इस मामले की गंभीरता को न्यायालय के सामने नहीं रखा, या रखा भी तो पूरे मन से नहीं रख पाई। कारण चाहे जो भी रहे हों पर पीडितों के हाथ तो कुछ नहीं लगा।

आखिर क्या वजह थी कि एंडरसन को गिरफ्तार करने के बाद उसे गेस्ट हाउस में रखा गया। इसके बाद जब उसे जमानत मिली तो उसे विशेष विमान से भारत से भागने दिया गया। जब उसे 01 फरवरी 1992 को भगोडा घोषित कर दिया गया था, तब उसके प्रत्यापर्ण के लिए भारत सरकार द्वारा गंभीरता से प्रयास क्यों नहीं किए गए! 2004 में अमेरिका ने उसके प्रत्यापर्ण की अपील ठुकरा दी गई तो भारत सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई। क्या दुनिया के चौधरी अमेरिका का इतना खौफ है कि भारत में हुए इस भयानक दिल दहला देने वाले हादसे के बाद भी सरकार उसे सजा दिलवाने भारत न ला सकी। इतना ही नहीं जब उसने अपना केस खुद नहीं लडा तब उसे इतने कम भोगमान पर छोड दिया गया। सरकार वैसे भी पहले ही लगभग दस गुना कम मुआवजा स्वीकार कर अपनी मंशा को स्पष्ट कर चुकी है। क्या कारण थे कि भारत सरकार ने इस कंपनी को चुपचाप बिक जाने दिया। इस दर्मयान भारत गणराज्य के वजीरे आजम और प्रजीडेंट न जाने कितनी मर्तबा अमेरिका की यात्रा पर गए होंगे पर किसी ने भी अमेरिका की सरकार के सामने इस मामले को उठाने की हिमाकत नहीं की। अगर भारत के नीति निर्धारक चाहते तो अमेरिका की सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर सकते थे कि वह यूनियन कार्बाईड से यह बात पूछे कि यह हादसा हुआ कैसे!

भोपाल गैस त्रासदी और लंबे समय बाद आया उसका यह फैसला निश्चित तौर पर खतरे की घंटी से कम नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों विशेषकर अमेरिका के जूते साफ करने को आमदा लोग अगर देश में विदेशी निर्भरता वाले परमाणु उर्जा संयंत्र लगाने की अनुमति देते हैं, और ईश्वर न करे कि अगर कोई हादसा हो जाए तो भारत सरकार और उसकी जांच एजेंसी किस भूमिका में होगी इस बात का परिचाक है यह पूरा प्रकरण। स्थिति परिस्थिति को देखते हुए हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार और उसकी एजेंसियों की नजर में भारत की जनता की जान की कीमत कीडे मकोडों जैसी ही है। अगर यह हादसा अमेरिका में घटा होता तो डाव केमिकल और यूनियन कार्बाईड का नामोनिशान मिटने के साथ ही साथ अनेक बीमा कंपनियों के दिवाले निकल चुके होते। यही हादसा अगर दिल्ली में हुआ होता तो इसकी सूरत कुछ और होती। सवाल यह उठता है कि जब दिल्ली में उपहार सिनेमा में हुए हादसे के पीडितों को 15 से बीस लाख रूपए का मुआवजा मिल सकता है तो भोपाल गैस कांड के पीडितों को महज 25 - 25 हजार रूपए में क्यों टरका दिया गया।

55 अरब डालर की हो चुकी है डाव केमिकल। भोपाल जैसे हृदय विदारक हादसे को अंजाम देने के बाद भी यह कंपनी भारत का मोह नहीं छोड पा रही है। भारत सरकार है कि इस कंपनी को देश में दूसरे हादसे के लिए उपजाउ माहौल भी मुहैया करवा रही है। इस कंपनी ने वियतनाम युद्ध में एक जहरीली गैस बनाकर कहर बरपाया था। अब इस कंपनी के निशाने पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र और गुजरात सूबे हैं। इस कंपनी के प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर अहसानों से दबे ही हैं केंद्र और सूबों के मंत्री, तभी तो ये डाव केमिकल की तारीफ में कशीदे गढने से नहीं चूकते। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्वयं ही भोपाल में कंपनी के बंद पडे संयंत्र में जहरीले कचरे को छूकर कंपनी को सीधे तौर पर मदद करने का कुत्सित प्रयास किया था। इस कंपनी का महाराष्ट्र में मुंबई गोवा राजमार्ग पर एक संयंत्र आरंभ हो चुका है, जिसमें कीटनाशक बनता है। इसके अलावा गुजरात के दहेज में अगले साल यही कंपनी रसायनों का उत्पादन आरंभ कर देगी।

1984 में देश के हृदय प्रदेश में हुई अब तक की सबसे बडी और भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के फैसले के 26 साल बाद इससे संबंधित नित नए खुलासे इस तरह हो रहे हैं मानो बालाजी फिल्मस का कोई टीवी सीरियल हो। हालात देखकर लगने लगा है जिस तरह टीवी सीरियल में एक के बाद एक एपीसोड बढते ही जाते हैं, वैसे ही इस मामले में भेद खुलते ही जाएंगे। 84 की त्रासदी के बाद जहां एक ओर भोपाल शहर ने लाशें उगलीं वहीं अब इसके फैसले के उपरांत राज उगलते ही जा रहे हैं। एक के बाद एक सनसनीखेज खुलासे, कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी और बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह को शक के दायरे में ला दिया गया है, प्रधानमंत्री मीडिया के सामने आने पर मजबूर हो गए हैं, नहीं डिगा तो कांग्रेस की राजमाता और स्व.राजीव गांधी की अर्धांग्नी सोनिया गांधी का सिहांसन। आज सोनिया गांधी ने साबित कर दिया है कि वे देश के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री पद से बडी अहमियत रखती हैं। कांग्रेस पर लगे आरोपों के मामले में प्रधानमंत्री गोल मोल जवाब दे रहे हैं। कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में है। सोनिया गांधी जबडे कसकर बांधे हुए हैं। उन्हें डर है कि अपने प्रबंधकों के मशवरों के चलते राजनैतिक बियावान में हाशिए में ढकेल दिए गए कुंवर अर्जुन सिंह उनके वक्तव्यों को किस दिशा में ले जाएं कहा नहीं जा सकता है। हालात देखकर लगता है कि अगर कुंवर अर्जुन सिंह ने मुंह खोला तो कांग्रेस की वो गत बन सकती है कि आने वाले दो तीन दशकों तक कांग्रेस का नामलेवा कोई भी नहीं बचेगा। कल तक सूने पडे कंुवर अर्जुन सिंह की सरकारी आवास में लाल बत्ती और सायरन की आवाजें इस बात का घोतक है कि भोपाल गैस कांड के फैसले से उनकी पूछ परख एकदम से बढ चुकी है।

तत्कालीन जिलाधिकारी मोती सिंह ने खुलासा किया कि उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव के दबाव में यूनियन कार्बाईड के प्रमुख वारेन एंडरसन को छोडा था। यह अकाट््य सत्य है कि देश को भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ही ‘‘हांक‘‘ (जिस तरह बेलगाडी को गाडीवान हांकता है) रहे हैं। क्या जिला दण्डाधिकारी ने तब ‘‘उपरी दबाव‘‘ को लिखा पढी में लिया था, अगर नहीं तो एंडरसन को भोपाल से भगाने का आपराधिक कृत्य मोती ंिसंह ने किया। मोती सिंह पर आपराधिक मामला दायर किया जाए फिर देखिए मजे। बरास्ता मोती सिंह एक के बाद एक सभी दोषी नग्नावस्था में सडको ंपर दिखाई देंगे।

जिस तरह बालाजी फिल्मस की प्रमुख एकता कपूर अपने सीरियल के अगले एपीसोड के लिए पटकथा आगे बढाती हैं, उसी तर्ज पर ‘‘भोपाल गैस कांड‘‘ सीरियल में बयानों की बोछारें हो रहीं हैं। छब्बीस साल का समय कम नहीं होता। अमूमन छब्बीस साल में एक युवा दो बच्चों का बाप बन चुका होता है, पर इन उमरदराज लोगों का साहस देखिए इस मामलें में छब्बीस साल तक मौन साधे रखा। आखिर क्या वजह थी कि छब्बीस सालों तक ये सारे राजदार अपने अंदर अपराध बोध को पालते रहे! राजधानी भोपाल के हनुमान गंज क्षेत्र में आता है यूनियन कार्बाईड। अब उस थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी सुरेंद्र सिंह की आत्मा जागी है। उन्होंने छब्बीस साल बाद बताने की जहमत उठाई है कि ‘‘उपरी दबाव‘‘ के चलते उन्होनंे धाराएं बदलीं थी। रात में उन्हें यूनियन कार्बाईड के प्रंबंधन के खिलाफ धारा ‘304के तहत मामला पंजीबद्ध किया था, पर सुबह लाशों के ढेर देखने के बाद उन्होंने प्रबंधन के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज करना चाहा, किन्तु एक बार फिर ‘‘उपरी दबाव‘‘ का जिन्न सामने आया और उनके हाथ बंध गए।

सूत्रों के हवालों से जो खबरें मीडिया में आ रही हैं, उसके अनुसार तत्कालीन विदेश सचिव महाराज कृष्ण रसगोत्रा पर भी शक की सुई आकर टिक जाती है। कहा जा रहा है कि रसगोत्रा ने एंडरसन को गैस कांड के उपरांत भोपाल यात्रा के दरम्यान पुलिस सुरक्षा और रिहाई तक सुनिश्चित की थी। अमेरिकी दूतावास के तत्कालीन उप प्रमुख गार्डन स्ट्रीब के खुलासे से भारत गणराज्य का प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय दोनों ही शक के घेरे में आ गया है। मामले के पंेच कुछ समझ में आने लगे हैं। रसगोत्रा ने एंडरसन को मदद का वादा किया। संभवतः इसकी जानकारी तत्कालीन मुख्यमंत्री कुंवर अर्जुन सिंह को नहीं थी, इसीलिए एंडरसन को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके उपरांत वही ‘‘उपरी दबाव‘‘ के चलते रसगोत्रा को गार्डन ने उनका वादा याद दिलाया।

पूर्व अमेरिकी राजनयिक गार्डन स्ट्रीब का कहना है कि वारेन एंडरसन के मामले में भारत सरकार ने अमेरिका की इस शर्त का मान लिया था कि एंडरसन को भोपाल ले जाया जाए, किन्तु उसे सुरक्षित वापस पहुंचाया जाए। इसके बाद रसगोत्रा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को समझाया फिर दूरभाष खडके होंगे और एंडरसन ने राजकीय अतिथि का अघोषित दर्जा पाकर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी को अपना सारथी बनाया। सरकारी वाहन में कंडक्टर की जगह तत्कालीन जिला दण्डाधिकारी मोती सिंह बैठे थे। मध्य प्रदेश सरकार का उडन खटोला उनके स्वागत में स्टेट हेंगर पर उनका इंतजार कर रहा था। केप्टन अली ने उनके आते ही उनका अभिवादन किया और उन्हें ससम्मान दिल्ली पहुंचाया दिया। एक टीवी चेनल के द्वारा जारी फुटेज में साफ दिखाई पड रहा है कि हजारों लोगों का हत्यारा वारेन एंडरसन यह कह रहा है, अमेरिका का कानून है, वह घर जाने के लिए स्वतंत्र है।

जनसेवक अपनी जवाबदारी भूल चुके हैं, यह बात पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। अब किस पर भरोसा किया जाए। क्या माननीय न्यायालय स्वयं ही इस मामले में संज्ञान लेकर इन सभी से यह पूछ सकता है कि छब्बीस सालों तक सभी गोपनीय राजों को अपने सीने में दफन करने वालों की तंद्रा अब क्यों टूटी और अगर उन्होंने किसी के दबाव में अपने कर्तव्यों से मुंह मोडा था तो क्यों न उनसे छब्बीस साल का वेतन भत्ते और सारे सत्व जो उन्होंने इन छब्बीस सालों में लिए हैं, वे उनसे वापस ले लिए जाएं। वह पैसा आखिर जनता के गाढे पसीने की कमाई का ही था, अगर वे सेवानिवृत हो चुके हैं तो इन सभी की पेंशन तत्काल प्रभाव से रोक देना चाहिए। कोई भी सरकारी नुमाईंदा क्या दबाव में नौकरी करता है। सत्तर के दशक के पहले तो लोग भ्रष्टाचार करने से घबराते थे, इसे सामाजिक बुराई की संज्ञा दी जाती थी। क्या हो गया है कांग्रेस को आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस का चेहरा क्या इतना भयानक है कि सच्चाई सामने आते ही लोग इससे घ्रणा करने लगेंगे। क्या पंद्रह हजार से ज्यादा लाशों के एवज में कंाग्रेस ने दुनिया के चौधरी अमेरिका से निजी तोर पर ‘‘मुआवजा‘‘ लेकर देश को अंग्रेजों के हाथों बेच दिया था चोरासी में। कांग्रेस को इसका जवाब देना होगा। मरहूम राजीव गांधी की बेवा कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को अपना मौन तोडना ही होगा, वरना उनकी चुप्पी राजीव गांधी के उपर लगने वाले आरोपों की मौन स्वीकारोक्ति ही समझी जाएगी। एक बात और समझ से परे ही है कि इतने बडे नरसंहार के बाद सालों साल घिसटने वाले मृतकों के परिवार और पीडितों की व्यथा देखने के बाद भी एक ‘‘मा‘‘ सोनिया गांधी का दिल क्यों नहीं पसीज पा रहा है। क्या कारण है कि इतनी बडी त्रासदी के एक के बाद एक घुमावदार पेंच सामने आने के बाद भी वे चुपचाप ही बैठी हैं!

बहरहाल इतना वक्त बीत जाने के बाद भी अब हमारे पास खोने को कुछ भी नहीं है, जो भी होगा हम पाएंगे ही। इसलिए भारत सरकार को अब चेतना चाहिए। उपरी अदालतों में जाकर इसकी कमियां खोजकर नए सिरे से पहल करना आवश्यक है। इस मामले में सरकार को आगे आना होगा। इस मामले में सरकरों की मंशा आईने की तरह साफ है, जनता जनार्दन की कीमत उनकी नजरों में चुनावों के दौरान वोट से ज्यादा कतई नहीं है। स्वयं सेवी संगठनों द्वारा लंबे समय से लडाई लडी जा रही है, कुछ संगठनों पर निहित स्वार्थ सिद्धि के आरोप भी मढे जाते रहे हैं। मीडिया पहली बार खुलकर इस मामले में सामने आया है, जिसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करना होगा। सालों बाद पहली बार लगा कि प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ भी जीवित है। अगर माननीय उपरी न्यायालय स्वयं ही संज्ञान लेकर समय सीमा में इस मामले को निपटाने का प्रयास करे तो निश्चित तौर पर यह एक बेहतरीन नजीर बनकर सामने आ सकता है।

पांच सालों से नहीं हुई विजलेंस मनीटरिंग कमेटी की बैठक


लूट मची है मनरेगा के कामों में . . . 3

पांच सालों से नहीं हुई विजलेंस मनीटरिंग कमेटी की बैठक

जिलाधिकारी हैं बैठक न हो पाने के दोषी


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की राज्य एवं जिला स्तर पर बनी मानिटरिंग कमेटी की सक्रिय बैठक नहीं होने के कारण देश में मनरेगा के प्रदर्शन पर सीधा असर पड़ रहा है। केंद्र सरकार भी अपने स्तर पर यह महसूस कर रही है कि विजलेंस मानीटरिंग कमेटी की नियमित बैठकें न हो पाने से मनरेगा में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया है। मंत्रालय मनरेागा में भ्रष्टाचार के लिए जिला कलेक्टर्स को ही जवाबदेह मान रहा है।

सूत्रों के हवाले से प्राप्त जानकारी के मुताबिक ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मनरेगा के साथ ही इसकी कार्यों की निगरानी के लिए बनाई गई विजलेंस मानीटरिंग कमेटी की बैठकें अगर जिला कलेक्टर्स द्वारा नियमित तौर पर बुलाई जातीं तो मनरेगा के कार्याे का निरीक्षण सही तरीके से किया जा सकता था। इसके साथ ही साथ मनरेगा में जमीनी स्तर पर सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं से भी सरकार रूबरू हो पाती।

विडम्बना ही कही जाएगी कि इस तरह की बैठकें बुलाने की जहमत न तो ग्रामीण विकास विभाग द्वारा ही उठाई गई और न ही विजलेंस कमेटी की बैठकें बुलाने के लिए प्राधिकृत जिलाधिकारियों ने ही इस ओर कोई ध्यान दिया। कुछ दिनों पूर्व ग्रामीण विकास मंत्रालय ने तय किया था कि मनरेगा के खराब प्रदर्शन वाले जिलों में जिम्मेदार जिलाधिकारियों को इसके लिए दंडित किया जाए। मंत्रालयीन सूत्रों का दावा है कि पिछले पांच सालों में मनरेगा की विजलेंस कमेटी की बैठकें देश के अधिकांश जिलों में हुई ही नहीं हैं, जिसका प्रतिकूल प्रभाव केंद्र सरकार की इस महात्वाकांक्षी योजना पर पड़ रहा है।

सपा के अखिलेश पहनेंगे ताज


सपा के अखिलेश पहनेंगे ताज

मुलायम अब नहीं बनेंगे मुख्यमंत्री


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश पर राज करने वाले मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी अगर सत्ता में आई तो आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश को अपेक्षाकृत युवा मुख्यमंत्री यानी अखिलेश यादव मिल सकते हैं। एक बार फिर राजनैतिक शख्सियतों में सत्ता के हस्तांतरण की तैयारियां आरंभ हो चुकी हैं। जिस तरह कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा सत्ता की बागडोर अब अपने पुत्र राहुल गांधी के हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है उसी तर्ज पर मुलायम सिंह यादव भी अपने पुत्र अखिलेश यादव को आगे बढ़ाने में लग गए हैं।

समाजवादी पार्टी के अतिविश्वस्त सूत्रों का कहना है कि ढलती उम्र के कारण अब मुलायम सिंह यादव ने सूबाई राजनीति से तौबा करने का मन बना लिया है। अगर उत्तर प्रदेश में एक बार फिर समाजवादी पार्टी काबज होती है तो आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की कमान अखिलेश यादव के हाथों में ही होगी। मुलायम सिंह यादव ने सत्ता हस्तांतरण का मन पूरी तरह बना लिया है।

मुलायम सिंह यादव के करीबियों का कहना है कि मुलायम सिंह इन दिनों बीमार चल रहे हैं और वे पहले ही अपने पुत्र अखिलेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर चुके हैं। अखिलेश को उत्तराधिकारी के तौर पर महिमा मण्डित करने से यादव परिवार में विरोध आरंभ हो चुका है। गौरतलब है कि मुलायम सिंह के भाई शिशुपाल यादव और रामगोपाल यादव दोनों ही मुख्यमंत्री की दौड़ में हैं।

खरे को किनारे करने की मुहिम में चटर्जी


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 41

खरे को किनारे करने की मुहिम में चटर्जी

पीएम के मीडिया सलाहकार की तलाश तेज


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के अतिविश्वस्त पुलक चटर्जी की प्रधानमंत्री कार्यालय में आमद के साथ ही अब पीएमओ को राहुल गांधी के लिए तैयार किया जाने लगा है। सबसे पहले तो प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे के विकल्प की तलाश तेजी से की जा रही है। हरीश खरे को किनारे किए जाने के बाद पुलक चटर्जी पीएमओ पर अपना कब्जा जमाने में सफल हो जाएंगे।

प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे के स्थान पर नये मीडिया सलाहकार की तलाश बड़ी ही शिद्दत से जारी है। पीएमओ में अब हरीश खरे को भाव नहीं दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री के पिछले प्रिटोरिया दौरे में हरीश खरे को नहीं ले जाया गया था। यद्यपि हरीश खरे का नाम पीएम के कुनबे में अंतिम समय तक शामिल था किन्तु बाद में उन्हें दौरे से रोक दिया गया था।

पीएमओ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि हरीश खरे को पीएम के दौरे में जाने से यह कहकर रोक दिया गया था कि खरे को कोडमकुलम मामले में एनएसए की मदद करनी चाहिए। पीएमओ के अंदर मचे घमासान को देखकर लगने लगा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को अब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के लिए सजाया जाने लगा है। पीएम के आने वाले दौरों में भी अगर हरीश खरे से किनारा किया जाता है तो समझ लेना चाहिए कि उनके स्थान पर कोई दूसरा मीडिया सलाहकार जल्द ही पीएमओ में आमद दे देगा।

(क्रमशः जारी)

यूथ कांग्रेस आफिस बेयरर्स का सम्‍मेलन


नई दिल्‍ली में हुए ऑल इंडिया यूथ कांग्रेस के आफिस बेयरर्स के प्रोग्राम 'बुनियाद' में प्रधानमंत्री डॉ;मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्‍यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी, केंद्रीय मंत्री कृष्‍णा तीरथ और सिवनी जिले के राजा बघेल मंच पर दिखाई दे रहे हैं

भ्रष्टाचार का बढ़िया साधन बन चुका है मनरेगा


लूट मची है मनरेगा के कामों में . . . 2

भ्रष्टाचार का बढ़िया साधन बन चुका है मनरेगा

मानिटरिंग न होने से पौ बारह है अफसरान की


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की महात्वाकांक्षी योजना राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (नरेगा) को बाद में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) बना दिया गया। नरेगा और मनरेगा दोनों ही में तबियत से भ्रष्टाचार होता रहा। वर्तमान में भी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से सिंचित राजस्व को जनता के नुमाईंदों द्वारा हवा में उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।

ज्ञातव्य है कि रोजगार की तलाश में लोगों के पलायन को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर ही रोजगार मुहैया करवाने की गरज से कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा नरेगा आरंभ की गई थी। बाद में इसे कानून में तब्दील कर साल में कम से कम सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराने का काम सुनिश्चित किया गया था। मनरेगा के साथ ही ग्रामीण स्तर पर लोगों के चेहरे खिल गए थे कि अब उन्हें रोजगार की तलाश में दूर नहीं जाना पड़ेगा। उन्हें उन्हीं के क्षेत्र में रोजगार मुहैया हो सकेगा। इस तरह वे अपने परिवार के साथ ही रहकर उनकी देखभाल और उनका लालन पालन कर सकेंगे।

जब इस योजना को अमली जामा पहनाया गया तब लोगों को असलियत पता चली। इसमें मानीटरिंग न होने से लोगों का पलायन रूक नहीं सका। इस योजना के लिए आई राशि को अधिकारियों ने बंदरबांट कर सरकारी राशि हजम कर डाली। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर तो उपलब्ध हुए किन्तु काम को श्रमिकों के बजाए मशीनों से करवाकर फर्जी मस्टर रोल से सरकारी राशि डकार ली गई।

जिला स्तर पर जिला कलेक्टर्स की अनदेखी के चलते यह योजना परवान नहीं चढ़ पाई। मनरेगा के कामों के अधिकांश ठेके भी स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के हाथों में ही रहे, यही कारण है कि राजनैतिक दलों ने अफसरों से गठजोड़ कर जनता के हक पर सीधा डाका डाला गया और पहरेदार ही इसमें शामिल रहकर मौन रहे। इस योजना की मानिटरिंग ना तो जिला कलेक्टर्स और न ही अनुविभागीय दण्डाधिकारी या राजस्व के अधिकारियों ने इसके बारे मे कोई जांच करना ही मुनासिब समझा।

काले धन के छींटे प्रणव के दामन पर!


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 40

काले धन के छींटे प्रणव के दामन पर!

केंद्र के पास है स्विस एकाउंट वाले 690 लोगों की सूची


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस के अंदर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम के बीच चूहे बिल्ली का खेल चल रहा है। जिसे जब मौका मिल रहा है दूसरे की गरदन पकड़कर झझकोर रहा है। काले धन के मामले में विपक्ष द्वारा संप्रग सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है तो प्रणव विरोधियों ने इस मसले में प्रणव मुखर्जी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों के अनुसार वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह को यह बताया गया है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो की पूछताछ में कम से कम डेढ़ दर्जन लोगों ने इस बात को स्वीकार किया है कि उनके स्विस बैंक में खाते हैं। वहीं दूसरी ओर यह चर्चा भी जोरों पर है कि सरकार के पास स्विस बैंक के खाताधारकों की एक कथित सूची भी है जिसमें 690 लोगों के नाम उसमें दर्ज होने की बात कही जा रही है।

नेहरू गांधी परिवार (महात्मा गांधी नहीं) के भाजपाई सदस्य वरूण गांधी ने इस बात की पुष्टि कर सूचना के अधिकार कानून के तहत इसमें जानकारी चाही है। सूत्रों के अनुसार सीबीआई पूछताछ में जिन लोगों ने स्विस बैंक में खाता होने की बात कबूल की है उनमें से नब्बे फीसदी कांग्रेस के नेताओं की देहरी पर अमूमन रोजाना ही मुजरा किया जाता हैै। अब कांग्रेस के अंदरखाने में ही कांग्रेस के इन कथित मित्रों को बचाने के अभियान को आरंभ करने की चर्चा चल पड़ी है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि कांग्रेस आलाकमान श्रीमति सोनिया गांधी के निर्देश पर वित्त मंत्री जल्द ही इन लोगों को आयकर विवरणी पुनः रिवाईज्ड रिटर्न की तर्ज पर जमा करने का मौका देने वाले हैं। इसके तहत उन अकूत काले धन वालों को अपने काले धन का कर भारत सरकार के पास जमा करना होगा, इसके उपरांत सेफ पैसेज के तहत उनके बचाव के मार्ग प्रशस्त किए जाएंगे।

(क्रमशः जारी)

बुधवार, 30 नवंबर 2011

माल्या पर मेहरबानी की तैयारी


माल्या पर मेहरबानी की तैयारी

वायलर रवि बने माल्या के दरबारी


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। शराब माफिया या लिकर किंग की अघोषित उपाधि पाने वाले उद्योगपति सांसद विजय माल्या की ताल पर कांग्रेस अब ठुमके लगाती दिख रही है। विजय माल्या के पास अकूल दौलत है, उनकी शराब को पीकर समूचा देश झूमता है। उनके हवाई जहाज में राजनेता सैर करते हैं, तब फिर माल्या को सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस सर माथे पर भला क्यों न बिठाए। माल्या के पुत्र भी इन दिनों मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं।

देखा जाए तो किंगफिशर एयरलाईंस के मालिक विजय माल्या पर कांग्रेस की मेहरबानी की अनगिनत वजहें हैं। कांग्रेस के अंदरखाने में नागरिक विमानन मंत्री वायलर रवि और वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह के द्वारा विजय माल्या की तरफदारी के मायने खोजे जा रहे हैं। रवि और मनमोहन सिंह दोनों ही किंगफिशर की डूबती नैया को बचाने की पुरजोर कोशिशों में लगे हुए हैं।

कांग्रेस के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही चर्चाओं पर अगर यकीन किया जाए तो माल्या से कांग्रेस के नेता इसलिए भी खौफ खा रहे हैं क्योंकि कर्नाटक की राजनीति में माल्या की गहरी पकड़ है। सूबे के कम से कम एक दर्जन से अधिक विधायक माल्या के इशारों पर ही कदम ताल करते नजर आते हैं। वे माल्या के कहने पर दिन को रात तो रात को दिन तक कहने की स्थिति में हैं। इतना ही नहीं माल्या की मराठा क्षत्रप शरद पंवार से गलबहियां भी किसी से छिपी नहीं हैं।

त्रणमूल को तोड़ने में लगी कांग्रेस


त्रणमूल को तोड़ने में लगी कांग्रेस

ममता पर दबाव बनाने कांग्रेस की नई रणनीति



लिमटी खरे

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब कांग्रेस को गरिया रहीं हैं। इसी से हलाकान कांग्रेस के रणनीतिकार अब त्रणमूल कांग्रेस में फूट डालने के काम में लग गए हैं। ममता बनर्जी और रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के बीच खाई खोदकर दोनों के बीच दूरियां जमकर बढ़ावा दी हैं कांग्रेस के प्रबंधकों ने। पिछले दिनों एक बैठक में भूतल परिवहन मंत्री जयराम रमेश ने दिनेश त्रिवेदी को बचा लिया वरना उनकी रेल तो कबकी पटरी से उतर गई होती।

दरअसल विज्ञान भवन में एनडीसी की बैठक आरंभ होने के लगभग दस मिनिट पहले वहां पहुंचे रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी की आसनी (कुर्सी) देश के ताकतवर गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम के ठीक बाजू में लगाई गई थी। यह दिनेश त्रिवेदी के लिए बेहद सम्मान की बात थी कि वे भारत गणराज्य के गृह मंत्री के ठीक बाजू में बैठे हों। कहा जा रहा है कि यह कांग्रेस की कूटनीति का एक हिस्सा ही था।

जब भूतल परिवहन मंत्री जयराम रमेश द्वारा रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को उनकी कुर्सी ढूंढने में मदद की जा रही थी, तभी अनजाने में ही जयराम रमेश ने त्रिवेदी से कहा कि उनकी कुर्सी गृह मंत्री चिदम्बरम के साथ ही लगी है। आप मंच पर जाकर अपना स्थान ग्रहण करें। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि त्रणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी अन्य प्रमुख उच्चाधिकारियों के साथ गैलरी में ही आसन ग्रहण करेंगी।

दिनेश त्रिवेदी इस बात से सहम गए। उन्होंने इस प्रोग्राम से भविष्य के परिदृश्य की कल्पना की और तत्काल ही एक एसा निर्णय लिया जिसने उनकी रेल मंत्री की कुर्सी को उस वक्त तो बचवा दिया। वे कांग्रेस की कुटिल चाल को भली भांति समझकर, चुपचाप मंच के बजाए नीचे गैलरी में बैठ गए। जब जयराम रमेश ने उनसे इसका कारण पूछा तो दिनेश त्रिवेदी ने फुसफुसाकर कहा -‘‘क्या मेरा दिमाग खराब है, जो मैं मंच पर बैठूं और मेरा नेता नीचे। अरे बाबा इस तरह तो मैं अपना मंत्री पद ही गंवा दूंगा।