शनिवार, 21 अगस्त 2010

वेतन भत्तों के लिए नंगा नाच हो रहा है संसद में

घर के लड़का गौहीं चूसें, मामा खाए अमावट

भरपूर सुविधाएं फिर भी सांसदों का नहीं भर रहा पेट

रियाया मरे भूखी पर सांसदों का पेट होना चाहिए भरा

जनता को बेवकूफ ही समझते हैं देश के नीति निर्धारक

आम जनता के लिए क्या किया है सांसदों ने!

वेतन का त्याग और नैतिक मान्यताओं पर उतरना होगा खरा

(लिमटी खरे)

बुंदेल खण्ड की एक मशहूर कहावत है- ‘‘घर के लड़का गोहीं (आम की गुठली) चूसें, मामा खाएं अमावट (आम के रस से तैयार होने वाला एक स्वादिस्ट पदार्थ)।‘‘ जिसका भावार्थ कुछ इस प्रकार है कि घर में बच्चे भूख से परेशान होकर आम के रस निकालने के उपरांत बची गुठली को चूसने पर मजबूर हैं, किन्तु जब माता का भाई (मामा) आता है तो उसी रस को गाढ़ा करने के उपरांत बनाई गई आमवट उसके आगे परोस दी जाती है। इस तरह का सौतेला व्यवहार किया जाता है।

कमोबेश यही आलम देश की सबसे बड़ी पंचायत में बीते गुरूवार और शुक्रवार को देखने को मिला। दोनों ही दिन सांसदों ने अपने वेतन भत्तों को बढ़वाने के लिए जो नग्न नृत्य किया है, वह समूचे देश और दुनिया से छिपा नहीं है। सांसद कितनी संजीदगी के साथ अपने वेतन और भत्तों में कई गुना वृद्धि करवाना चाह रहे थे, और जब उन्हें वोट देने वाली जनता के अधिकार और कर्तव्यों पर बहस की बारी आती है, तो ये माननीय बगलें झांकने लगते हैं। मंहगाई पर संसद ठप्प नहीं होती है, महिला आरक्षण बिल परवान नहीं चढ़ पाता है पर जब अपने खुद के वेतन भत्तों के निर्धारण की बात आती है तब ये माननीय एक स्वर में चिल्ला कर सदन को सर पर उठा लेते हैं।

सवाल यह है कि खुद के वेतन भत्तों का निर्धारण कोई खुद कैसे कर सकता है? यह परंपरा तो कार्पोरेट सेक्टर में ही देखने को मिलती है कि किसी कंपनी का मालिक अपने वेतन भत्ते और सुविधाओं के मामले में स्वयं ही तय कर लेता है, और फरमान सुना देता है। ठीक इसी तरह देश के चुने हुए जनसेवक अपने वेतन भत्तों के बारे में फैसला ले लेते हैं मानो देश की सबसे बड़ी पंचायत एक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गई हो।

दरअसल सांसदों के मन में मेरी साड़ी तेरी साड़ी से सफेद कैसी की भावना घर कर गई है। यही कारण है कि लालू प्रसाद यादव जैसे सांसद सदन में चिल्ला चिल्ला कर यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि उनका ओहदा एक जूनियर क्लर्क से कम है। भले ही यह बात वे वेतन भत्तों के संदर्भ में कह रहे हों पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि सैद्धांतिक मामलों में जनसेवक को नौकरशाहों से कहीं उपर का दर्जा प्राप्त है।

सांसदों की इस दलील पर विचार किया जा सकता है कि उन्हें अपने विशाल संसदीय क्षेत्र में जाकर अपने मतदाताओं की पूछ परख और आवभगत में मौजूदा वेतन भत्तों के चलते काफी दिक्कत होती है। सांसद जब अपने संसदीय क्षेत्र में जाता है तो उसे 13 रूपए किलोमीटर की दर से वाहन का किराया मिलता है, जो बाजार दर के हिसाब से देखा जाए तो विलासिता वाले वाहनों की दर है। इसके अलावा कार्यालय भत्ता 20 हजार रूपए, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 20 हजार रूपए, सत्र के दौरान मिलने वाला भत्ता एक हजार रूपए प्रतिदिन, और वेतन 16 हजार रूपए। कुल मिलाकर एक सांसद को प्रतिमाह छप्पन हजार रूपए तो नकद मिल ही जाते हैं।

इसके आलवा अपनी पत्नी या किसी रिश्तेदार के साथ माननीय साल भर में 34 हवाई उड़ान, रेल गाड़ियों के प्रथम श्रेणी वातानुकूलित में पत्नि या एक रिश्तेदार के साथ असीमित मुफ्त यात्रा, दिल्ली में निशुल्क आवास, दो टेलीफोन जिसमें हर साल 50 हजार लोकल काल मुफ्त, एक अन्य टेलीफोन इंटरनेट के साथ, 04 हजार किलोलीटर पानी और 50 हजार यूनिट बिजली एकदम मुफ्त।

मौजूदा सिफारिशों के अनुसार वेतन पचास हजार रूपए, कार्यालय खर्च चालीस हजार रूपए, संसदीय क्षेत्र भत्ता चालीस हजार रूपए, वाहन का माईलेज 16 रूपए प्रति किलोमीटर तय किया गया है। पूर्व सांसदों को पेंशन आठ के बजाए अब बीस हजार रूपए मिलेगी। इस तरह एक सांसद को प्रतिमाह मिलने वाला कुल वेतन एक लाख तीस हजार रूपए है। क्या यह वेतन उनकी जरूरतं पूरी करने के लिए नाकाफी है।

सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाने की मांग गांधीवादी सोच को तजने और कार्पोरेट सेक्टर की अवधारणा से प्रेरित होने के कारण ही उपजी है। वर्तमान सांसदों को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि लगातार लंबे स्वतंत्रता संग्राम के जिन नैतिक आदर्शों और मूल्यों से भारत का लोकतंत्र और संघीय संसदीय ढांचा पैदा हुआ है, उनमें बहुतेरे सांसद एसे भी हुए हैं जिनके निधन के बाद उनकी कोई संपत्ति तक नहीं थी।

इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष का कथन स्वागतयोग्य है कि जिस समय श्रीमति इंदिरा गांधी सांसद थीं, तब उनका वेतन उनके पायलट पुत्र राजीव गांधी से कम था। जनसेवकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पास प्रधानमंत्री रहते हुए भी फिएट कार खरीदने के पैसे नहीं थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल से उन्हें सीख लेना होगा जिनके निधन के उपरांत उनके बैंक खाते में महज 259 रूपए थे। डॉ.राम मनोहर लोहिया के निधन के वक्त उनके पास भी न तो बैंक बेलेंस ही था और न ही उनका घर द्वार था। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आनंद भवन जैसी इमारत को भी राष्ट्र को समर्पित करने में संकोच नहीं किया था।

भारत गणराज्य में 85 करोड़ लोगों की प्रतिदिन की आय 20 रूपए से भी कम है, और सरकार इन्हें प्रस्तावित कर रही है कि ये माननीय प्रतिदिन चार हजार 33 रूपए की दिहाड़ी पर काम करें, जनता के द्वारा ही चुने गए ये माननीय चाहते हैं कि इन्हें पांच हजार पांच सौ रूपए से अधिक की दिहाड़ी मिले। यह कहीं भी संभव नहीं है, किन्तु कांग्रेस के राज में एसा चमत्कार अवश्य ही हो रहा है कि देश की सत्तर फीसदी आबादी महज बीस रूपए कमाने के लिए सारा दिन मेहनत मजदूरी करने पर विवश है और उसी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई पर टेक्स लगाकर जमा की गई रकम से जनता के चुने हुए नुमाईंदो को हजारों रूपए रोज की दिहाड़ी मुहैया करवाई जा रही है।

कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के इस कदम से निश्चित तौर पर अमीर और गरीब के बीच की खाई में जबर्दस्त इजाफा होने के मार्ग ही प्रशस्त होंगे। होना यह चाहिए था कि संसद में बहस इस बात को लेकर की जाती कि किस तरह देश में मंहगाई कम हो, जनता पर टेक्स का भार कम किया जाए। रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाए जाएं। वस्तुतः एसा हुआ नहीं, संविधान के नीति निर्देशक तत्वों मंे इस बात का उल्लेख साफ तौर पर किया गया है कि सरकार का कोई भी कदम देश में आर्थिक विषमता को बढ़ावा न दे।

देश में बढ़ रही मंहगाई को भी षणयंत्र के तौर पर देखा जाना चाहिए। भारत गणराज्य के नीति निर्धारक यह नहीं चाहते कि गरीब गुरबो में से योग्य लोग आगे आएं। जब मंहगाई अधिक होगी, लोगों की क्रय शक्ति का हास होगा, तो गरीब गुरबा चुनाव लड़ने की सोच ही नहीं सकेगा। गरीबों की मजबूरी होगी कि वे अमीरों और संपन्न लोगों के सामने नतमस्तक हो जाएं। इन परिस्थितियों में भारत गणराज्य की सबसे बड़ी और सूबों की पंचायतें साधन संपन्न और अमीरों की लौड़ी बन ही जाएगी।

एक समय था जब राजनीति को सेवा भाव की दृष्टि से देखा जाता था। जो भी देश के लिए जनता के लिए समर्पण का भाव रखता था, उसे लोग अपना अगुआ (पायोनियर) मानते थे। आजादी की लड़ाई हो या आजादी के उपरांत के साठ के दशक तक देश के नेताओं में नैतिकता का आभास होता था, उस समय नेताओं द्वारा नैतिक मूल्यों को बरकरार रखकर राजनीति की जाती थी, किन्तु अब इस सबकी परिभाषाएं बदल गई हैं। जब राजनीति सेवा के बदले व्यवसाय हो जाए तब एसी स्थिति बनना स्वाभिवक है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि मलाई खाएं और निरीह बेबस जनता उनका मुंह ताकती रह जाए।

फोरलेन विवाद का सच ------------ 13

कमल नाथ और शिवराज मिलकर कर रहे हैं फोरलेन पर राजनीति

हिमांशु कौशल

सिवनी। केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ के नेतृत्व वाला भूतल परिवहन मंत्रालय मध्यप्रदेश में 21 प्रोजेक्ट चला रहे हैं इन 21 प्रोजेक्ट में से 5 प्रोेजेक्ट कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को केन्द्र में रखकर तैयार किये हैं जिससे सिवनी अलग हट जाये और छिंदवाड़ा केन्द्र में आ जाये. उत्तर प्रदेश के कानपुर में जन्मे कमलनाथ द्वारा अपने उŸार प्रदेश के बाद मध्यप्रदेश में ही सबसे ज्यादा प्रोजेक्ट चलाये जा रहे हैं संभ्वतः यही कारण है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सिवनी फोरलेन के मुद्दे को तूल नहीं दे पा रहे हैं.

केन्द्रीय भूतल एवं परिवहन मंत्री श्री कमलनाथ ने जब से भूतल परिवहन मंत्रालय का कामकाज संभाला है उनके नेतृत्व में देश के सभ्ी राज्यों में फोरलेन-टू लेन प्रोजेक्ट बनने आरंभ हो गए हैं, देश में चल रही इन परियोजनाओं में सर्वाधिक प्रोजेक्ट वे उŸार प्रदेश यानी की अपने गृह राज्य में चला रहे हैं इसके बाद दूसरा नंबर आता है मध्यप्रदेश का. उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में वे 29 प्रोजेक्ट चला रहे हैं और मध्यप्रदेश में उनके द्वारा 19 प्रोजेक्ट चलाये जा रहे हैं. म.प्र. में चल रहे इन 19 प्रोजेक्टों में से 5 प्रोजेक्ट मतलब 25 प्रतिशत प्रोजेक्ट उन्होंने केवल अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को केन्द्र में रखकर बनाये हैं.

उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ द्वारा मध्यप्रदेश में जो 19 प्रोजेक्ट चलाये जा रहे हैं उनमें कमल नाथ समर्थक सांसद सज्जन सिंह वर्मा, विधायक सुखदेव पांसे, लखन घनघोरिय आदि के कार्यक्षेत्र में इंदौर से गुजरात/एम.पी. बार्डर तक, भोपाल से बरेली, बरेली से राजमार्ग क्रासिंग, राजमार्ग क्रासिंग से जबलपुर, झाँसी से खजुराहो, भोपाल से साँची, इंदौर से देवास ,ग्वालियर से देवास, बेओरा से राजस्थान बार्डर, बैतूल से नागपुर, जबलपुर से कटनी-रीवा, औबेदुल्लागंज से बैतूल, जबलपुर से मंडला चिल्पी (छ.ग.), नरसिंहपुर से अमरवाड़ा, अमरवाड़ा से उमरानाला छिंदवाड़ा बायपास होते हुए, उमरानाला से रामाकोना होते हुए सौंसर से सावनेर, सिवनी से चौरई होते हुए छिंदवाड़ा, छिंदवाड़ा से मुल्ताई और जबलपुर से लखनादौन तक है. कमल नाथ को चूंकि महाकौषल का नेता माना जाता है अतः उन्होंने जो परियोजनाएं बनवाई हैं उनमें महाकौषल का ज्यादा ध्यान रखा है, किन्तु महाकौषल के केंद्र समझे जाने वाले सिवनी जिले को ‘कमलनाथ के महाकौषल‘ के नक्षे से बाहर कर दिया गया है।

मध्यप्रदेश में चलने वाले फोरलेन-टू लेन प्रोजेक्ट्स में से 5 प्रोजेक्ट केवल छिंदवाड़ा को केन्द्र में रखकर तैयार किये गये हैं. इन पाँँच प्रोजेक्ट में पहले तीन प्रोजेक्ट 01) नरसिंहपुर से अमरवाड़ा, 02) अमरवाड़ा से उमरानाला छिंदवाड़ा बायपास को जोड़ते हुए और 03) उमरानाला से सौंसर होते हुए सावनेर नागपुर के पास तक के हैं. उक्त मार्ग पूर्व में राज्य सरकार के स्वामित्व का स्टेट हाइवे हुआ करता था. इस स्टेट हाईवे को नेषनल हाईवे में तब्दील करवाने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने भेजा और केन्द्रीय मंत्री ने मुख्यमंत्री से मिलकर नेशनल हाइवे घोषित करवा लिया और इसका नाम नेशनल हाइवे क्रमांक 26 बी रख दिया गया.

इसी प्रकार केन्द्रीय मंत्री श्री नाथ ने सिवनी से चौरई होते हुए छिंदवाड़ा और छिंदवाड़ा से मुल्ताई तक के स्टेट हाइवे को भी मुख्यमंत्री के साथ मिलकर नेशनल हाइवे घोषित करवा इसका नाम नेशनल हाइवे क्रमांक 69 ए घोषित कर दिया है.

केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ द्वारा 26 बी,, 69 ए नामक दो नयी नेशनल हाइवे केवल अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को नरसिंहपुर से नागपुर और सिवनी से मुल्ताई के केन्द्र में बनाये जाने हेतु घोषित किया गया है जिसमें प्रदेश सरकार ने अपनी सहमति दी है. नक्शे में यह भ्ी देखा जा सकता है कि छिंदवाड़ा के पास ही नेशनल हाइवे प्रोजेक्ट सबसे सघन है. उल्लेखनीय है कि स्टेट हाइवे को नेशनल हाइवे में बदलने के लिये राज्य शासन की सहमति की सहमति के साथ राज्य सरकार की ओर से प्रस्ताव अनिवार्य होता है. बिना प्रदेश सरकार की सहमति ओर प्रस्ताव के केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को नेशनल हाइवे का जंक्शन नहीं बना सकते थे. इससे स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ प्रदेश के मुखिया श्री शिवराज सिंह चौहान के साथ मिलकर सिवनी फोरलेन की बलि चढ़ा रहे हैं.

गौरतलब है कि यदि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के दृष्टिकोण से देखा जाये तो वे प्रदेश के मुखिया हैं और उन्हें पूरे प्रदेश का विकास देखना है यदि वे सिवनी फोरलेन के मुद्दे को तूल देते हैं और उनके ऐसा करने से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ प्रदेश में चल रही परियोजनाओं को रोक लेते हैं तो इससे पूरे मध्य प्रदेश का भरी नुकसान होगा. संभवतः यही कारण होगा कि मुख्यमंत्री सिवनी के मुद्दे पर चुप बैठना ज्यादा पसंद कर रहे हैं. गौरतलब होगा कि गुरूवार को मघ्य प्रदेष भवन में संपन्न पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री षिवराज सिंह चौहान ने एक तरफ जहां केंद्र सरकार और उसके मंत्रियों को आड़े हाथों लिया था वहीं दूसरी और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफ में कषीदे भी गढ़े थे।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पूरे देश में नेशनल हाइवे की सबसे ज्यादा लंबाई उŸार प्रदेश में है और फिर उसके बाद मध्य प्रदेश का नंबर आता है. यही कारण है कि केन्द्रीय मंत्री श्री नाथ से अगर मध्यप्रदेश में इतनी उदारता दिखाये जाने का कारण पूछा जायेगा तो इस प्रश्न का विशुद्ध राजनैतिक जवाब शायद यही दिया जायेगा कि कि उŸार प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश ही एक ऐसा राज्य है जहाँ नेशनल हाइवे की लंबाई सबसे ज्यादा है इसीलिये उŸार प्रदेश के बाद वे मध्यप्रदेश में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.

बहरहाल अगर राष्ट्रीय स्तर और प्रदेश स्तर पर देखा जाये तो केन्द्रीय मंत्री श्री कमलनाथ कहीं गलत नहीं कर रहे हैं और न ही मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान गलत सोच रहे हैं. श्री नाथ द्वारा पूरे मध्यप्रदेश में नेशनल हाइवे का जाल बिछाया जा रहा है जिससे मध्यप्रदेश के विकास में गति मिलेगी. इसी के साथ-साथ वे अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा को राष्ट्रीय राजमार्ग का जंक्शन जैसा बना रहे हैं तो यह भ्ी ठीक है क्योंकि वे उस क्षेत्र का वर्षों से प्रतिनिधित्व करते हैं तो उसका विकास करना उनकी जिम्मेदारी है.

यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं? सिवनी में भूतल परिवहन मंत्री के समर्थक माने जाने वाले विधानसभ उपाध्यक्ष श्री हरवंश सिंह और प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष श्रीमती नीता पटैरिया जैसी नेत्री सिवनी विधायक हैं इसके बाद भी सिवनी के साथ लगातार अन्याय ही होता आया है सिवनी वासियों को न बड़ी रेल लाइन मिली न ही संभाग मुख्यालय बनाया जा रहा है न यहाँ एफ.एम. अथवा कम्युनिटी रेडियो आया, न तो एस्टोटर्फ का स्टेडियम ही बन पाया और तो और रही सही कसर लोकसभा सीट जाने से पूरी हो गई है।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

पवार उवाच ‘‘सड़ जाए अनाज पर मुफ्त नहीं बाटेंगे‘‘

भरे पेट लोगों को क्यों होने लगी भूखों की चिंता

भूखे पेट न हों भजन गोपाला

भुखमरी के आंकड़े हैं देश में भयावह

हजारों टन सड़ जाता है अनाज हर साल

लचर सरकारी सिस्टम है जवाबदार

(लिमटी खरे)

देश की सबसे बड़ी अदालत भले ही सरकार को फटकार लगाकर अनाज को सड़ने के बजाए गरीबों में मुफ्त बांटने की बात कह रही हो पर आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार के कानों में जूं रेंगने वाली नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने एक ही पखवाड़े में दो बार सरकार को आड़े हाथांे लेते हुए अनाज के मामले में टिप्पणी की है। पिछले महीने के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिस देश में लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हों वहां अन्न का एक भी दाना बरबाद नहीं होना चाहिए। अब सर्वोच्च न्यायालय ने देश में सड़ते अनाज पर सरकार को फटकारा है कि अनाज के सड़ने के बजाए उसे गरीबों में निशुल्क बांट दिया जाना चाहिए। वैसे भी अन्न की बरबादी एक बहुत ही बड़ा अपराध ही माना जाता है।

दुनिया भर के भूखे लोगों में हर पांचवा शख्स भारतीय है। भारत में तकरीबन पचास फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इतना ही नहीं वर्ल्ड फुड प्रोग्राम का प्रतिवेदन बताता है कि देश के लगभग पच्चीस करोड़ लोग हर रात को आधे या भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। भूख सब कुछ करवा देती है। देश में तेजी से बढ़ता अपराध का ग्राफ भी कमोबेश यही कहानी कह रहा है कि खाने को तरसने वाले खाने के जुगाड़ में हर स्तर पर उतरने को तैयार हैं।

सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाने पर विचार किया जा रहा है। यह खुशफहमी चंद दिनों के लिए जनता को हो सकती है कि उसके शासक उसकी दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने जा रही है। यक्ष प्रश्न यह है कि कानून बनाने से भला क्या फायदा जब उसका पालन ही सुनिश्चित न हो। शिक्षा के अधिकार कानून के बाद कितने राज्यों में इसे लागू किया गया है। और छोडिए जनाब यह बताईए कि केंद्रीय स्तर पर चल रही शिक्षण संस्थाओं में आरटीई के क्या हाल हैं?

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में लोक लुभावन वादों के तहत यह भी कहा था कि गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवन यापन करने वाले परिवारों को हर माह तीन रूपए की दर से पच्चीस किलो चावल उपलब्ध करवाएगी। यूपीए सरकार का यह दूसरा कार्यकाल का दूसरा साल है, पर बीपीएल परिवार आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद में ही उलझा हुआ है। सवाल यह है कि बीपीएल का आधार क्या है, किस लक्ष्मण रेखा के पार रहने वालों को बीपीएल माना जाए। देखा जाए तो संपन्न और ताकतवर लोग बीपीएल की सूची में अपना नाम दर्ज करवाकर सारे लाभ उठा रहे हैं, और वास्तविक बीपीएल आज भी कमर तोड़ मंहगाई में उलझा हुआ है।

इस सब पर अनाज सड़ने की खबरें जले पर नमक का ही काम करती हैं। एक ओर खाने को नहीं है दाना और दूसरी ओर हजारों टन अनाज को रख रखाव के अभाव में सड़वा दिया गया। कुछ साल पहले केंद्र सरकार के कृषि विभाग ने निजी तौर पर वेयर हाउस बनवाने के लिए तगड़ी सब्सीडी की घोषणा की थी। साधन और पहुंच सम्पन्न लोगों ने इस योजना का लाभ उठाकर अपने बड़े बड़े गोदाम अवश्य बनवा लिए। अनेक गोदाम तो महज कागजों पर ही बन गए और सब्सीडी डकार ली गई। सवाल फिर वही खडा हुआ है कि इन गोदामों को बनाने के लिए सरकार ने अपनी ओर से राशि क्यों दी थी, जाहिर है अनाज को सड़ने से बचाने के लिए इन वेयर हाउस को सरकार किराए पर लेती। सरकार को चाहिए था कि सब्सीडी देते समय ही इस बात की शर्त रख दी जाती कि बारिश के चार माहों के साथ आधे साल के लिए इन गोदामों को सरकार को किराए पर देना वेयर हाउस मालिक के लिए आवश्यक होगा, तभी सब्सीडी दी जाएगी। अगर एसा होता तो आज देश भर की कृषि उपज मंडियों के प्रांगड में पड़ा अनाज सड़ा न होता।

एसा नहीं है कि अनाज पहली बार सड़ा हो। साल दर साल अनाज के सड़ने की खबरें आम हो रही हैं। पिछले साल ही पश्चिम बंगाल के एक बंदरगाह पर अरबों रूपए की आयतित दाल सड़ गई थी। किसान के खून पसीने से सींचे गए अनाज के दानों को सरकार संभाल नहीं पाती है। एक अनुमान के अनुसार हर सल करीब पचास हजार करोड़ रूपए का अनाज सरकारी कुप्रबंध के कारण मानव तो क्या मवेशी के खाने के लायक भी नहीं बचता है। अमूमन बफर स्टाक के चलते सरकार द्वारा जरूरत से ज्यादा अनाज खरीद लिया जाता है, पर उसके रख रखाव के अभाव में यह सड़ जाता है।

जब अनाज के सड़ने की खबरें बाजार में आती हैं तो कालाबाजारी करने वाले जमाखोरों के चेहरों पर रोनक आ जाती है। जमाखोरों द्वारा इन स्थितियों में बाजार में जिंस की कृत्रिम किल्लत पैदा कर तबियत से मुनाफा कमाया जाता है। दरअसल भारतीय खाद्य निगम की व्यवस्थाओं में ही खोट है। भारतीय खाद्य निगम ने जगह जगह अपने गोदाम अवश्य बनाए हैं पर वे नाकाफी ही हैं। सरकार को चाहिए कि कृषि विभाग से अनुदान पाकर गोदाम बनवाने वालों की सूची जिला स्तर पर बनवाई जाए और उनका किराया निर्धारित कर हर जिले के कलेक्टर पर यह जवाबदारी डाली जाए कि उस जिले की कृषि उपज मंडियों के माध्यम से की जाने वाली सरकारी अनाज की खरीद के सुरक्षित रख रखाव का जिम्मा जिला कलेक्टर का ही होगा। अगर केंद्र सरकार द्वारा इस तरह का कड़ा कदम उठा लिया गया तो अनाज की बरबादी काफी हद तक रोकी जा सकती है।

वैसे अनाज के सुरक्षित भण्डारण के लिए कंेद्र सरकार को चाहिए कि वह राज्यों को वित्तीय सहायता मुहैया करवाकर राज्यों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करे। जिलों में पदस्थ जिलाधिकारी चूंकि अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते हैं, इस लिहाज से वे केंद्र सरकार के अधीन भी होते हैं, पर दूसरी तरफ देखा जाए तो जिला कलेक्टर सीधे सीधे राज्य शासन के प्रति जवाबदेह ज्यादा होते हैं, इस तरह जिला कलेक्टर पूरी तरह राज्यों के नियंत्रण में हुआ करते हैं। देखा जाए तो अनाज के सड़ने के लिए राज्यों की सरकारें भी कम जवाबदेह नहीं हैं। अमूमन राज्य सरकारें समय पर अपना निर्धारित कोटा नहीं उठाती हैं, इसीलिए अनाज सड़ भण्डारण के अभाव में सड़ जाता है। गरीब गुरबों के लिए आंसू बहाने वाली राज्य सरकारें इस दिशा में पूरी तरह से लापरवाह ही हैं।

इधर अनाज के सड़ने की खबर से देश की सबसे बड़ी अदालत का आक्रोश लोगों को दिखा वहीं सियासत के धनी केंद्रीय कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार कह रहे हैं कि खाद्यान्न सड़ने की खबरों को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। शरद पवार का कथन और राज्य सभा में कृषि राज्य मंत्री प्रो.के.वी.थामस के दिए वक्तव्य में असमानता ही दिख रही है। अब केंद्रीय कृषि मंत्री का नया बयान आ गया है कि भले ही बर्बाद हो जाए अनाज पर गरीबों के मुफ्त में इसे नहीं बांटा जा सकता है। खुद कृषि मंत्री ने पिछले महीने ही लोकसभा में जानकारी दी थी कि 6 करोड़ 86 लाख रूपए मूल्य का 11 हजार 700 टन अनाज बर्बाद हो गया।

देश का कृषि मंत्रालय निर्दलीय पी.राजीव और के.एन.बालगोपाल के पूछे प्रश्न पर उत्तर देते हुए कहता है कि देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। 01 जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया। पिछले साल 2010 टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ था। 2008 - 2009 में 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल बरबाद हुआ था। वर्ष 2007 - 2008 में 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह देखा जाए तो तीन सालों में देश के एफसीआई के गोदाम कुल 3881 टन गेंहू और 55 हजार 458 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह इस साल 01 जुलाई तक के खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार सालांे में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज बरबाद हुआ है।

सरकार चाहे केंद्र की हो राज्यों की हर कोई बस गरीब गुरबों की चिंता में दुबले होने का स्वांग ही किया करते हैं। वस्तुतः गरीब गुरबों की फिकर किसी को भी नहीं है। देश के नौकरशाह और जनसेवक जब विलासिता भरी जिंदगी जी रहे हों, उनके वेतन भत्ते आसमान को छू रहे हों, और उनका पेट भरा हो तो भला फिर उन्हें क्यों गरीब गुरबों की फिकर होने लगी। हां वे चिंता जरूर जताते हैं, पर वह चिंता सिर्फ दिखावटी ही होती है, क्योंकि अगर उन्होंने चिंता जताने का दिखावा नहीं किया तो चुनावों के दौरान उन्हें वोट क्यों देगी यही जनता।

राज्‍यों से छिनेगा शिक्षकों की भर्ती का मामला

शिक्षा का अधिकार कानून के प्रति संजीदा हुई केंद्र सरकार

सूबाई सियासत से शिक्षक भर्ती प्रक्रिया अलग करने की कवायद

प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश को अमली जामा पहनाया एचआरडी ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 20 अगस्त। शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बाद केंद्र और राज्य सरकारांे के बीच चल रही रस्साकशी के बीच अब केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के हाथ से शिक्षकों की भर्ती को अलग करने का फरमान जारी कर दिया है। केंद्र सरकार ने एक परिपत्र जारी कर राज्य सरकारों से कहा है कि वे अपने अपने सूबों में शिक्षकों की नियुक्ति का काम अलग संस्थानों के माध्यम से करवाएं।

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा राज्यों को जारी एक पत्र में कहा गया है कि राज्यों की सरकारें शिक्षक भर्ती बोर्ड का गठन कर शिक्षकांे की भर्ती के काम को अपने से अलग करंे। इससे शिक्षकों की गुणवत्ता को बरकरार रखने के साथ ही साथ शालाओं में रिक्त पदों की संख्या में कमी आएगी और भर्ती प्रक्रिया को सुचारू बनाया जा सकेगा।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कुछ समय पूर्व अस्तित्व में आई किन्तु धूल खा रही प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों को लागू करना अब जरूरी हो गया है। सूबाई सरकारें शिक्षकांे की नियुक्ति तो करती हैं, किन्तु उसके पास शिक्षकों व्यापक स्तर पर भर्ती के लिए बुनियादी तंत्र ही मौजूद नहीं है।

गौरतलब है कि राज्य सरकारों द्वारा अपनाई जाने वाली भर्ती प्रक्रिया में भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार की गूंज होती रही है। इनमें गड़बड़ी होने से मामला कोर्ट कचहरी में सालों साल उलझा रहता है, साथ ही साथ अप्रशिक्षित और अयोग्य लोगों को इसमें मौका मिल जाता है जिससे योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक निजी शालाओं में हजार से तीन हजार रूपए तक की नौकरी करने पर मजबूर हो जाते हैं।

वैसे भी शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बाद राज्यों की सरकारें शिक्षकों की भर्ती में पूरी तरह नाकाम रही हैं। यही कारण है कि देश में आज भी आठ लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है। केंद्र सरकार ने इस कमी और राज्यों की भर्ती प्रक्रिया को देखते हुए कहा है कि सरकारें इसके लिए स्वायत्त एजेंसी अथवा बोर्ड का गठन करे, और इस प्रक्रिया से खुद को प्रथक रखें। इस प्रक्रिया में शिक्षकों की भर्ती बारह माह जारी रहेगी। इसमें भर्ती की प्रक्रिया बेंकिंग भर्ती बोर्ड और रेल्वे भर्ती बोर्ड की तर्ज पर रखी जाने की उम्मीद है।

गरीब बुनकरों से क्‍या बुराई है कांग्रेस की

बुनकरों के हाथ काटने की तैयारी में कांग्रेस

चरखा अब चलेगा सौर उर्जा से

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 20 अगस्त। पता नहीं क्यों सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के गौरवशाली शालका पुरूष रहे राष्ट्रपिता महत्मा गांधी कांग्रेस के नए निजामों के निशाने पर हैं? पहले गांधी जयंती पर केंद्र सरकार द्वारा खादी को प्रोत्साहित करने वाली 20 फीसदी की छूट को समाप्त कर दिया अब आजादी की लड़ाई में चरखा चलाकर स्वदेशी का संदेश देने के कार्यक्रम पर कांग्रेस की नजर लग गई है। आने वाले समय में बुनकरों के द्वारा चलाए जाने वाला चरखा सौर उर्जा या बिजली से चलाया जाएगा।

कांग्रेस के नए निजाम चरखे के स्वरूप और चरित्र को ही बदलने का ताना बाना बुन रहे हैं जो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में ‘‘आजादी का बाना‘‘ था। गौरतलब होगा कि महत्मा गांधी ने अहिंसा आंदोलन में खादी और चरखे को रचनात्मकता के साथ स्वराज आंदोलन का एक प्रतीक बनाया था। बापू ने उस समय देश के लगभग तीस हजार गांव के 20 लाख बुनकरों को एक सूत्र में पिरोकर आजादी की अहिंसक लड़ाई के लिए प्रोत्साहित किया था।

हालात देखकर यह लगने लगा है कि देश पर आजादी के उपरांत आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी के द्वारा प्रेरित खादी कार्यक्रम को समूल ही नष्ट करने की जुगत लगाई जा रही है। खादी संस्थाएं केंद्र सरकार के इस कदम के खिलाफ खड़ी नजर आ रही हैं। संस्थाओं का मानना है कि अगर चरखे को बिजली या सौर उर्जा से चलाया जाएगा तो हाथ से तैयार सूत और मिलों में तैयार सूत में क्या अंतर रह जाएगा।

गौरतलब होगा कि खादी के उत्पादन पर विशेष जोर देने वाले मोहन दास करम चंद गांधी ने खादी के उत्पादन में किसी भी तरह की मशीन की इजाजत नहीं दी थी। वैसे भी अगर खादी उत्पादन में मशीनों का प्रयोग होने लगेगा तो बुनकरों के सामने आजीविका की जबर्दस्त समस्या खड़ी होने की उम्मीद है, क्योंकि बिजली या सौर उर्जा से चलने वाला चरखा निस्संदेह कम से कम दस बुनकरों के हाथ का काम छीन लेगा।

उल्लेखनीय होगा कि चरखे से सूत कातकर खादी का निर्माण कुटीर उद्योगों की श्रेणी में आता है, और इससे अशिक्षित भी इसका प्रयोग कर अपनी आजीविका चला सकता है। इसके लिए अधिक मेहनत की आवश्यक्ता भी नहीं होती है। यह काम घरेलू महिलाएं भी अपने खाली समय में आसानी से कर सकती हैं। अस्सी के दशक के आरंभ तक देश के विद्यालयों में क्राफ्ट का एक कालखण्ड होता था, जिसमें बच्चों को कतली पोनी और चरखे के माध्यम से कपास से सूत कातना सिखाया जाता था, कालांतर में चरखा और कतली पोनी इतिहास की वस्तु हो बन गई हैं।

एक तरफ गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर और सदी के महानायक गुजरात में बापू के आश्रम में जाकर चरखा चलाकर खादी अपनाने का संदेश दे रहे हैं, दूसरी ओर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा गरीब बुनकरों के हाथ काटने के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं, जिसकी निंदा और विरोध किया जाना चाहिए। वैसे भी कल तक जनसेवकों की पहली पसंद मानी जाने वाली खादी का स्थान अब टेरीकाट, पालिस्टर जीन्स, कार्टराईज आदि ने ले लिया है।

फिल्‍म समीक्षा : लफंगे परिंदे

लफंगे परिंदे : अनोखी प्रेम कहानी

लफंगे परिंदे कहानी है मुंबई की गलियों में रहने वाले युवाओं के एक समूह की, जो स्टाइल का दीवाना है, जिनमें एटिट्यूड है और सितारों तक पहुँचने की चाह है। साथ ही यह नंदू (नील नितिन मुकेश) और पिंकी (दीपिका पादुकोण) की प्रेम कहानी भी है जो दोस्त से प्रेमी बन जाते हैं।

नंदू बड़ा अजीब इंसान है। ऐसा लगता है कि वह फाइट करने के लिए ही पैदा हुआ है। उसे वन-शॉट नंदू कहा जाता है। गलियों में होने वाली फाइटिंग में उसका कोई मुकाबला नहीं है। जीतने के लिए वह क्रूर और जंगली बन जाता है। आँखों पर पट्टी बाँधकर वह बॉक्सिंग की रिंग में अपने प्रतिद्वंद्वी को नॉक आउट कर देता है। यह वन शॉट अपनी शर्तों पर जिंदगी जीता है और अपने दोस्तों के बीच हीरो है। पिंकी से मुलाकात होते ही अचानक सब कुछ बदलने लगता है।

अब बात करते है पिंकी पालकर की। वह दृष्टिहीन है, लेकिन किसी से कम नहीं। उसे टेलेंट का पॉवरहाउस कहा जाता है। एक मॉल में वह बोरिंग-सा ‘9 टू 5’ जॉब करती है। स्केट पहन कर वह शानदार डांस करती है। प्रतिभाशाली, मजबूत इरादे वाली इस लड़की के ऊँचे सपने हैं। शख्सियत उसकी ऐसी है कि ज्यादातर लोग उससे घबराते हैं। उसकी इच्छा है कि वह अपने इलाके के ‘लूज़र्स’ से ऊँचा उठकर खुद अपनी एक जगह बनाए। अपने टेलेंट के जरिये साबित कर सके कि वह भी जिंदगी की दौड़ में जीत सकती है। इस राह में उसकी एक छोटी सी प्राब्लम है वह उसका अंधा होना।

‘लफंगे परिंदे’ एक आँखों पर पट्टी बाँधकर लड़ने वाले स्ट्रीट फाइटर और दृष्टिहीन डांसर की कहानी है जो अपने चार दोस्तों के साथ असंभव को हासिल करने की यात्रा पर निकलते हैं। अब तो ये फिल्म ही बताएगी।



स्टारकास्ट



बैनर : यशराज फिल्म्स

निर्माता : आदित्य चोपड़ा

निर्देशक : प्रदीप सरकार

संगीत : आर. आनंद

कलाकार : नील नितिन मुकेश, दीपिका पादुकोण

फोरलेन विवाद का सच ------------ 12


दिल्ली में गूंजा सिवनी का फोरलेन का विवाद

गुरूवार को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकार वार्ता में कहा कि सिवनी के साथ केंद्र सरकार अन्याय कर रही है। मुख्यमंत्री ने कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सन 1545 में शेरशाह सूरी द्वारा बनाए गए एतिहासिक महत्व के मार्ग को बंद करने का षणयंत्र रच रही है। जब इस मामले में मुख्यमंत्री के समक्ष सिवनी के तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के द्वारा 18 दिसंबर को जारी आदेश के बारे में पूछा गया तो मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ही इसे रोक रही है, जिला कलेक्टर का आदेश कब का है, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। इसके उपरांत जब दस्तावेज उनके समक्ष रखे गए तो मुख्यमंत्री ने दस्तावेज अपने पास रखकर इस मामले को गंभीरता से देखने की बात की है।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अगस्त। ‘‘कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश के साथ अन्याय किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है। अगर केंद्र सरकार को भाजपा से कोई गिला शिकवा है तो वह भाजपा के साथ अपना संघर्ष करे, किन्तु मध्य प्रदेश की साढ़े छः करोड़ गरीब जनता के साथ अन्याय करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। देश में संघीय व्यवस्था लागू है, हम भीख नहीं अपना अधिकार मांग रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा कोयला, खाद्यान्न, इंदिरा आवास, सड़क आदि सभी मामलों मंें मध्य प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। एक षणयंत्र के तहत सन 1545 में बनाए गई सड़क को सिवनी जिले के पेंच के उद्यान के बहाने से समाप्त करना चाह रही है।‘‘ उक्ताशय की बात आज मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश भवन में आयोजित पत्रकार वार्ता में कही।

मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश के विद्युत तापग्रहों 170 लाख मीट्रिक टन कोयले के स्थान पर महज 136 मीट्रिक टन कोयला ही प्रदाय किया जा रहा है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में बिजली के उत्पादन में वर्ष 2009-2010 में 539.71 मिलियन यूनिट और 01 अप्रेल से 18 अगस्त तक 535.65 यूनिट की कमी आई है। मध्य प्रदेश की खदानों का कोयला अन्य राज्यों को दे दिया जा रहा है, और मध्य प्रदेश को अन्य राज्यों से कोयले की आपूर्ति किए जाने को अव्यवहारिक बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कोयले के आवंटन का युक्तियुक्तकरण होना अनिवार्य है।

शिवराज सिंह चौहान ने आगे कहा कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की तादाद अंत्योदय कार्ड सहित मध्य प्रदेश में 67 लाख 70 हजार है, किन्तु भारत सरकार द्वारा महज 41 लाख 25 हजार लोगों को ही बीपीएल मानकर अनाज मुहैया करवाया जा रहा है, जिससे 26 लाख 45 हजार परिवार आज भी 35 किलो प्रति परिवार की दर से अनाज पाने से वंचित हैं। श्री सिंह ने कहा कि योजना आयोग के सदस्य सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने अपने प्रतिवेदन में सूबे के 48.6 फीसदी लोगबों को निर्धन बताया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए उन्होने कहा कि एक ओर तो अनाज सड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार जरूरत मंदों के नाम सूची से काटकर उन्हें अनाज से वंचित कर रही है।

इंदिरा आवास के बारे में मुख्यमंत्री ने कहा कि इस योजना में तो केंद्र सरकार ने पक्षपात की सारी हदें ही पार कर दी हैं। राज्यों के लिए लक्ष्यों का निर्धारण जनगणना के आधार पर किया जाता है। असम की आबादी दो करोड़ 32 लाख है वहां 22 लाख 41 हजार, और एम पी में जहां चार करोड़ 43 लाख ग्रामीण आबादी होने के बाद भी आवासों की कमी महज दो लाख आठ हजार ही बताई जा रही है।

सड़कों की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में बनाई गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश ने 26 हजार 578 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है, जो अपने आप में एक रिकार्ड है। मध्य प्रदेश सड़कों के मामले में सदा ही नंबर वन रहा है। पत्रकारों ने जब भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के द्वारा मध्य प्रदेश को पर्याप्त सहयोग देने की बात और उस दौरान मध्य प्रदेश के लोक कर्म मंत्री के उनके साथ खड़े होकर हां में हां मिलाने की बात कही गई तब मुख्यमंत्री ने कहा कि लोक निर्माण मंत्री क्या हम भी उनके साथ बैठते हैं, पर सच्चाई यह है कि मध्य प्रदेश के लिए जितनी सड़कें दी गईं हैं, वे कुछ जिलों तक ही सीमित हैं। साथ ही साथ इसके लिए आठ सौ करोड़ रूपए की राकि स्वीकृत किए हैं, पर आवंटन मिला है महज 193 करोड़ रूपए ही।

उत्तर दक्षिण गलियारे के बारे में चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि शेर शाह सूरी के जमाने के एतिहासिक महत्व के इस राजमार्ग को पेंच नेशनल पार्क के नाम पर षणयंत्र कर केंद्र सरकार द्वारा सिवनी जिले के लोगों के साथ सरासर अन्याय किया जा रहा है। जब मुख्यमंत्री से यह पूछा गया कि काम को तो सिवनी के तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के आदेशों से रोका गया है, तो उन्होंन कहा कि इस बारे में उन्हें पता नहीं है कि किस पत्र की बात की जा रही है।

पत्रकार वार्ता के उपरांत पत्रकार लिमटी खरे ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से सिवनी जिले के साथ होने वाले अन्याय पर विस्तार से चर्चा की और इस मामले के हर पहलू से मुख्यमंत्री को आवगत कराया। मुख्यमंत्री को कागज दिखाकर श्री खरे ने बताया कि वनमण्डलाधिकारी दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डल और जिला कलेक्टर के तत्कालीन आदेश दिखाकर उन्हें वास्तविकता बताइ्र गई कि गैर वन भूमि पर सड़क निर्माण का काम किस कारण रूका है। साथ ही यह भी बताया गया कि चूंकि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा इस मामले में अभी तक अपनी सहमति देते हुए अनुमति प्रदान नहीं की गई है, इस कारण वन भूमि पर काम आरंभ नहीं किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने बात को गंभीरता से सुनते हुए सारे प्रपत्र अपने पास रखकर इस मामले में ठोस कार्यवाही करने का आश्वासन दिया। इस दौरान मुख्यमंत्री के साथ मध्य प्रदेश के भाजपाध्यक्ष प्रभात झा भी मौजूद थे।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

चुका नहीं है कांग्रेस की राजनीति का चाणक्य

भोपाल गैस कांड में अर्जुन सिंह आखिर साबित क्या करना चाहते हैं?

राजीव को कथित क्लीन चिट, ठीकरा स्व.नरसिंहराव पर

(लिमटी खरे)

बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्या का अघोषित तमगा मिल चुका है पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह को। कुंवर अर्जुन सिंह के जहर बुझे तीरों के चलने के बाद जब घाव रिसने लगते हैं, तब लोगों को पता चल पाता है कि कुंवर साहब ने घाव कहां दिया है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी में कुंवर अर्जुन सिंह को दूध में से मख्खी के मानिंद निकालकर फंेक दिया गया है। कुंवर अर्जुन सिंह की खामोशी से कांग्रेस के आला नेता परेशान दिख रहे थे। राज्य सभा में जब अर्जुन सिंह ने अपना बयान दिया तब लोगों को लगा भई वाह कुंवर साहेब ने तो राजीव गांधी को सिरे से बरी कर पूरा का पूरा ठीकरा तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंहराव पर फोड दिया है। हर कांग्रेसी चैन की सांस ले रहा था कि अब कोई जाकर स्व. नरसिंहराव से पूछने तो रहा कि उनके कार्यालय ने गैस कांड के वक्त मध्य प्रदेश के निजाम रहे कुंवर अर्जुन सिंह को फोन पर भोपाल गैस कांड के आरोपी वारेन एंडरसन को छोड़ने का फरमान दिया था या नहीं।

देखा जाए तो कुंवर अर्जुन सिंह ने इस मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को बरी नहीं किया है, वरन् राजीव गांधी की भूमिकाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं? बकौल कुंवर अर्जुन सिंह उन्होंने 03 दिसंबर को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को घटना की पूरी जानकरी दे दी थी। इसके उपरांत यूनियन कार्बाईड के वारेन एण्डरसन की 07 दिसंबर की गिरफ्तारी और रिहाई के बारे में भी मध्य प्रदेश के हरदा में चुनावी कार्यक्रम में सविस्तार बता दिया था। कुंवर अर्जुन सिंह ने साफ कहा कि उन्होंने एण्डरसन की गिरफ्तारी के आदेश दिए और हरदा के लिए रवाना हो गए, जहां राजीव गांधी से उनकी इस संबंध में पूर्ण चर्चा हुई। इस मामले में वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री ने यह कहकर मामला और संगीन कर दिया है कि गृह मंत्रालय के पास एसा कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है, जिससे साबित हो सके कि उस वक्त गृह मंत्रालय इस बात के लिए इच्छुक था कि एंडरसन की रिहाई की जाए।

अर्जुन सिंह ने बड़ी ही सफाई से कांग्रेस जनों को प्रसन्न कर एक एसा दस्तावेज उजगर कर दिया है जिसमें कांग्रेसियों को यह मुगालता होने लगा है कि कुंवर अर्जुन सिंह ने बड़ी ही सफाई के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी को इस मामले से पूरी तरह बरी कर दिया है। वस्तुतः एसा है नहीं। जानकारों का साफ मानना है कि कुंवर अर्जुन सिंह ने जहर बुझे तीर के माध्यम से यह बात जनता के बीच छोड़ दी है कि जब संवेदनशील प्रधानमंत्री राजीव गांधी मध्य प्रदेश में होते हुए भी सारी हकीकत से ‘‘बेखबर‘‘ नहीं ‘‘बाखबर‘‘ तब उन्होंने कोई कदम उठाने के कुंवर अर्जुन सिंह को यह क्यों कहा कि अगली सभा की ओर कूच किया जाए? इसके पीछे राजीव गांधी की संवेदनहीनता ही सामने आ रही है, जो निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए एक मुश्किल पैदा कर सकती है, बशर्ते विपक्ष कुंवर अर्जुन सिंह के जहर बुझे तीरों को संभाल कर उठाए और उसे वापस कांग्रेस के खेमे में फंेके।

कल तक भोपाल गैस कांड के सच को अपनी आत्मकथा के माध्यम से उजागर करने की घोषणा करने वाले कुंवर अर्जुन सिंह का हृदय अचानक ही परिवर्तित हुआ और उन्होंने बजाए किताब के माध्यम से इस मसले में सदन में बयान देना ही उचित समझा। कुंवर अर्जुन सिंह का कहना है कि पूरी बात सुनने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस बारे में तो एक शब्द भी नहीं कहा लेकिन अगली चुनावी सभा में जाने का आदेश दे दिया। राजीव गांधी के बारे में जो और जितना भी लोग जानते हैं उनके गले यह बात नहीं उतर सकती कि स्व.राजीव गांधी इतने संवेदनहीन थे कि इस तरह की घटना के बाद वे चुप्पी साधे रहते। स्व. राजीव गांधी जैसा जिन्दादिल और संवेदनशील नेता सच जानने के उपरांत कुछ न कुछ प्रतिक्रिया अवश्य ही व्यक्त करता। हो सकता है कि उस समय राजीव गांधी को कुंवर अर्जुन सिंह द्वारा घटना का मार्मिक पक्ष पेश ही न किया हो या यह भी संभव है कि कुंवर अर्जुन सिंह अभी गलत बयानी कर रहे हों।

कुंवर अर्जुन सिंह बार बार एक ही बात फरमा रहे हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा उस समय बार बार फोन करके वारेन एण्डसरन को भगाने की बात कही जा रही थी। अगर यह सच है तो क्या यह कुंवर अर्जुन सिंह की मुख्यमंत्री के तौर पर जवाबदेही नहीं थी कि उन्हें सीधे तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंहराव से चर्चा करना था। 26 साल बाद गड़े मुर्दे उखाड़ने का फायदा ही क्या? इतिहास में संभवतः पहली बार कुंवर अर्जुन सिंह अपने बिछाए जाल में खुद ही फंसते नजर आ रहे हैं। इस मामले में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री के बारे में बयानबाजी कर अपना बदला अवश्य ही निकाल रहे हों पर यह तीर उन्हें भी घायल करता ही प्रतीत हो रहा है।

जनता जनार्दन के मानस पटल पर यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक ही है कि आखिर कुंवर अर्जुन सिंह जैसा राजनीतिज्ञ इतना बड़ा बोझ लेकर 26 साल तक शांत कैसे बैठा रहा? आखिर क्या वजह थी कि इतने सालों में कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी जुबान खोलने की जहमत नहीं उठाई। विधायक और सांसद रहते हुए क्या कुंवर अर्जुन सिंह को कभी नहीं लगा कि वे एक जनसेवक हैं, और वे यह बात छुपाकर जनता के साथ ही धोखा कर रहे हैं।

अब कुंवर अर्जुन सिंह 26 सालों बाद फरमा रहे हैं कि उस समय वारेन एण्डरसन को राजकीय विमान उपलब्ध कराना बेतुका था। राजनैतिक समझबूझ वाला व्यक्ति यह बात अच्छी तरह समझता है कि किसी भी सूबे में तभी सरकारी विमान किसी को मुहैया करवाया जा सकता है, जबकि मुख्यमंत्री या विमानन मंत्री इसकी अनुमति दें। इन दोनों विशेषकर मुख्यमंत्री की इजाजत के बिना सरकारी उड़न खटोला एक इंच भी सरक नहीं सकता है। सवाल यह उठता है कि आखिर इतना सब अन्याय होते देखने के बाद कुंवर अर्जुन सिंह के हृदय परिवर्तन में 26 साल का लंबा समय कैसे लग गया? इसके पहले उनका जमीर क्यों नहीं जागा?

बहरहाल इस पूरे मामले में छब्बीस साल बाद तथ्यों को सामने लाना एक तरह से अप्रासंगिक ही प्रतीत हो रहा है। ढाई दशक पहले निकले सांप की धुंधली या मिट चुकी लकीर को पीटने का आखिर फायदा क्या है? आज साफ सफाई आरोप प्रत्यारोप से ज्यादा आवश्यक यह है कि गैस त्रासदी के पीडितों को मुकम्मल इंसाफ मिले। इस मसले में सरकार के साथ ही साथ देश की न्याय व्यवस्था को आत्मावलोकन की महती आवश्यक्ता है। जनता को खुद ही यह प्रश्न पूछना चाहिए कि छब्बीस साल पहले घटी अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से भला भारत गणराज्य ने क्या सबक सीखा?

भारत गणराज्य की नीति विहीन सरकार की कार्यप्रणाली की एक बानगी है, देश के बड़े और छोटे बांध। इन बांधों के साथ आपदा प्रबंध कितना पुख्ता है, इस बारे मंे सरकरें पूरी तरह मौन हैं। आपदा प्रबंध के मसले पर स्थानीय लोगों को कुछ भी जानकारी न होना आश्चर्यजनक ही है, साथ ही साथ आपदा प्रबंध के मामले में स्थानीय लोगों को शामिल न किया जाना भी आश्चर्यजनक इसलिए माना जाएगा, क्योंकि दुर्घटना की स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले स्थानीय लोग ही होते हैं।

अभी कुछ माह पहले ही पायलट ट्रेनिंग संस्थान के ससेना विमान के मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के पास बरगी में डूबने की खबर मिली थी। जिला प्रशासन जबलपुर और सिवनी ने रानी अवंती सागर परियोजना में गोताखोरों की मदद से उक्त विमान और गायब पायलट रितुराज को खोजने का नाकाम अभियान चलाया। इसके बाद जब प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए तब रितुराज के परिजनों ने अपने स्तर पर बांध के अथाह पानी में अपने लाड़ले को खोज ही निकाल। इस तरह की घटनाएं आपदा प्रबंध की पोल खोलने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि यूनियन काबाईड को संचालित करने वाली डाउ केमिकल आज भी शान से भारत में अपना व्यवसाय संचालित कर रही है। यह सब कुछ भारत के लचर प्रशासनिक तंत्र के कारण ही संभव हुआ है। हमारी नजर में इस सबके लिए एसी व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक होगा जिससे दुर्घटना के लिए जवाबदार लोगों को तत्काल कटघरे मंे खडा किया जा सके।

भारत सरकार को चाहिए कि हाल ही में ब्रिटिश पेट्रोलियम के कुएं में हुए तेल रिसाव से सबक ले। दुनिया के चौधरी अमेरिका के प्रथम पुरूष बराक ओबामा ने इस त्रासदी को पर्यावरण का भीषणतम नुकासन बताकर न केवल ब्रिटिश पेट्रोलियम को जवाबदार ठहराया वरन् आना पाई से मुआवजा देने पर विवश भी किया है। विडम्बना है कि भारत में घटने वाली दुर्घटनाओं में संबंधित जवाबदार लोगों को जनसेवक, नौकरशाह और प्रशासनिक तंत्र हाथों हाथ लेकर उन्हें हीरो बनाने में जुट जाता है, जिसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है, इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

यमुना एक्‍सप्रेस वे पर राहुल ने ली कमल नाथ से जानकारी

राहुल ने ली कमल नाथ की क्लास!

यमुना एक्सप्रेस वे भूमि अधिग्रहण विवाद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अगस्त। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गाध्ंाी ने गत दिवस संसद भवन में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में यमुना एक्सप्रेस सड़क मार्ग के भूमि अधिग्रहण विवाद की पूरी जानकारी ली। दोनों के बीच लगभग बीस मिनिट तक चर्चा हुई।

भरोसे मंद सूत्रों का कहना है कि सदन में शून्यकाल में हुए जबर्दस्त हंगामे के बाद सभापति ने सदन को दो बजे तक के लिए स्थगित कर दिया था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी सांसदों जगदंबिका पाल, केंद्रीय भूतल परिवहन राज्य मंत्री अर.पी.एन.सिंह और पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री जतिन प्रसाद ने युवराज राहुल गांधी को अलगढ़ के टप्पा गांव में हो रहे किसानों के आंदोलन के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के सांसदों से चर्चा के साथ ही जब सदन से बाहर आ रहे थे, तभी दूसरी ओर से आ रहे भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को देख राहुल गांधी ने उन्हें रोककर उनसे इस विषय पर चर्चा की। सूत्र बताते हैं कि भूतल परिवहन और राजमार्ग मंत्री कमल नाथ ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को बताया कि जमीन का अधिग्रहण किसी सार्वजनिक कारणों से नहीं वरन् निजी तौर पर किसी निजी क्षेत्र की कालोनी या टाउनशिप बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

सूत्रों ने आगे कहा कि यमुना एक्सप्रेस वे के मामले में भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने काग्रेस के महासचिव राहुल गांधी को तर्क दिया कि यमुना एक्सप्रेस वे की अवधारणा ही गलत है। बकौल कमल नाथ यमुना एक्सप्रेस वे एक तो राष्ट्रीय राजमार्ग के समानांतर ही बन रहा है, दूसरे यह अनेक महत्वपूर्ण राजमार्गों को अवरूद्ध भी कर रहा है।

फोरलेन विवाद का सच -------------- 12

जनमंच ने ली थी फोरलेन मामले को सर्वोच्च न्यायालय में उठाने की जवाबदारी

लोगों ने मुक्त हस्त से दिया था सहयोग

लोगों की भड़ास निकली थी पहली बैठक में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अगस्त। उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारा सड़क परियोजना के नक्शे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने के मामले मंे लोगों के दिलों में जल रही आग शोले में तब्दील होने लगी थी। स्थानीय लोगों की उपस्थिति में हुई पहली बैठक में लोगों ने इस मामले में तबियत से अपनी अपनी भड़ास निकली थी। वक्ताओं के आक्रोश को देखकर लगने लगा था कि चाहे जो भी हो जाए अगली छः माही में फोरलेन मुद्दा सुलटा ही लिया जाएगा।

बैठक में राजनैतिक दलों से जुड़े सदस्यों ने हिस्सा लिया था किन्तु पहली बैठक में जब वक्ताओं की भड़ास सामने आई तो यह बात स्थापित होती नजर आ रही थी कि जनता का मंच जनमंच पूरी तरह गैर राजनैतिक ही है। सभी वक्ताओं ने इस बैठक में अपने अपने दलों और नेताओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के आगे सिवनी के हित को सर्वोपरि माना था। वक्ताओं के इस रवैए की सर्वत्र भूरी भूरी प्रशंसा भी हुई थी।

बताया जाता है कि वक्ताओं के उद्बोधन के उपरांत यह बात निकलकर सामने आई कि फोरलेन परियोजना को सिवनी न न होकर गुजारने के पीछे ‘वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया‘ की एक याचिका है, जिसमें वन्य जीवों और पर्यावरण को बचाने की दुहाई देते हुए इस सड़क को सिनी से होकर न गुजारना प्रस्तावित किया गया था, क्योंकि सिवनी से खवासा के बीच के सड़क के मार्ग में रक्षित वन और पेंच राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा पड़ता है।

जब यह बात सामने आई कि उक्त गैर सरकारी संस्था ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है, तब केंद्रीय साधिकार समिति ने आकर तत्कालीन जिला कलेक्टर से पेड़ो की कटाई रोकने का आग्रह किया था, जिसे तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि द्वारा राज्य शासन से आदेश आने हैं की प्रत्याशा में स्वीकार कर लिया था। इस पर आम सहमति यह बनी कि मामले में सिवनी का जनमंच ‘हस्तक्षेपकर्ता‘ की हैसियत से अपना पक्ष रखेगा।

इसी बीच बैठक में सुझाव आया कि दिल्ली आने जाने और सर्वोच्च न्यायालय मंे वकील करने में काफी पैसा व्यय होने वाला है, तब शहर के लोगों ने मुक्त हस्त से अपना अपना आर्थिक सहयोग इस मामले के लिए दिया था। जनमंच की ओर से इकलौते अधिकृत पदाधिकारी महेंद्र देशमुख को इसका प्रवक्ता नियुक्त कर दिया गया। इस हेतु कितनी राशि एकत्र हुई थी इसका ब्योरा भी अगले दिन कुछ समाचार पत्रों ने प्रकाशित कर दिया था।

(क्रमशः जारी)

कौन कर रहा है सिवनी के साथ धोखा

किसका था वो षणयंत्र

बुधवार, 18 अगस्त 2010

माले मुफ्त के बाद भी पेट नहीं भरता सांसदों का

 ‘‘कम ऑन वेल्थ‘‘ के लिए फिकर मंद माननीय
 
सब कुछ निशुल्क फिर भी चाहिए भारी भरकम वेतन भत्ते
 
मंहगाई पर साध लेते हैं चुप्पी पर वेतन भत्तों पर अड़े रहते हैं माननीय
 
आधी आबादी को मयस्सर नहीं दो वक्त की रोटी
 
(लिमटी खरे)

14 और 15 अगस्त की दरम्यानी रात को जब डेढ़ सौ साल की ब्रितानी हुकूमत से देश को आजादी मिल रही थी तब हर एक भारतीय की आखों में उजले भविष्य की तस्वीर साफ दिखाई पड़ रही थी। उस वक्त जवान हो चुकी पीढ़ी को लगने लगा था कि आने वाला कल हमारा है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को वाकई काफी उज्जवल भविष्य दे पाएंगे। विडम्बना यह है कि आज भारत में जाति भेद, क्षेत्र भेद, भाषा भेद, वर्ण भेद, वर्ग भेद के साथ ही साथ अमीरी गरीबी के बीच का एक एसा फासला बन गया है, जिसे आजाद भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस पार्टी द्वारा कम किए जाने के बजाए बढ़ाया ही जा रहा है।
 
भारत गणराज्य की स्थापना के उपरांत देश में प्रजातंत्र की स्थापना की गई थी। प्रजातंत्र का अर्थ है, जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन। इसकी अवधारणा जिस वक्त रखी गई थी तब एसा सोचा गया था। आज के समय में यह अवधारणा बदल चुकी है। अब यह मामला जनसेवक का, जनसेवक द्वारा जनसेवक के लिए बन चुकी है। आज के समय में सांसद और विधायक पूरी तरह से अपने ही आप पर केंद्रित निहित स्वार्थों की राह पर खुद को देश को ले जाने लगे हैं। देश पर राज करने वाले जनसेवक अपने आप को जनता का सेवक बताकर बर्ताव राजा के मानिंद कर रहे हैं, देश और प्रदेशों के मंत्री अपने आप को जनसेवक के बजाए राज करने वाला समझकर यह सोच रहे हैं कि देश में आज भी आजादी पूर्व की सामंतशाही जीवित है। मंत्रियों के लिए नौकरशाह उनके लिए उनके गण और जनता उनकी जरखरीद गुलाम हो चुकी है, वे जो चाहें वो कर सकते हैं।
 
माले मुफ्त अर्थात सब कुछ निशुल्क पाने वाले जनसेवकों ने अपने सेवाकाल में भारी भरकम पगार और सेवानिवृत्ति के उपरांत खासी पेंशन की व्यवस्था करने के बाद अब मंत्रियों को भव्य अट्टालिका और मंहगी विलासिता भरी गाडियों की दरकार होना आश्चर्यजनक है। अगर आप विधायक या सांसद हैं तो आप निजी तौर पर मंहगी विलासिता भरी गाडी में फर्राटा भर सकते हैं, पर अगर आप मंत्री हैं तो आपको निश्चित तौर पर प्रोटोकाल को निभाना ही होगा। स्टेट गैरेज से आपको आवंटित वाहन में सफर करना आपकी मजबूरी होगी। भले ही आप दूसरे वाहन में सफर करें किन्तु आपके काफिले में वह वाहन होना अनिवार्य है। स्टेट गैरिज की मजबूरी है कि उसके पास एम्बेसेडर कार की भरमार है। स्टेटस सिंबाल के लिए ‘‘जेड प्लस‘‘ केटेगरी की सुरक्षा लेने वाले जनसेवक भी जब कहीं दौरे पर जाते हैं तो वे बुलट प्रूफ एम्बेसेडर में बेठने से बचते ही हैं, क्योंकि इसके कांच नहीं खुलते और कांच नहीं खुलेंगे तो नेता जी अपने समर्थकों का हाथ हिलाकर अभिवादन कैसे कर पाएंगे। इस बारे में किसी राज्य शासन के गृह विभाग द्वारा कभी केंद्रीय गृह विभाग को नहीं बताया जाता कि जिसे अपने ही देश के नागरिकों से खतरा होने के कारण आपने जेड प्लस केटगरी की सुरक्षा दी है, उसे जनता के बीच जाते समय उस जेड प्लस की आवश्यक्ता नहीं है। अनेक माननीयों को सरकार द्वारा दिए गए गनमेन उनके लिए खलासी का काम करते हैं।
 
भारत के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि देश में राज्य सभा में करोड़पति सांसदों का आंकड़ा एक सौ के पार हो चुका है। लोकसभा में भी कमोबेश यही स्थिति सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश के सांसद अक्षय प्रताप सिंह की संपत्ति 2004 में 21 लाख के पांच साल बाद 1841 फीसदी बढ़ गई। राजस्थान के सचिन पायलट की संपत्ति इन पांच सालों में 1746 फीसदी तो एमपी के चंद्र प्रताप सिंह की 1466 फीसदी। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की संपत्ति में पांच सालांे में 431 फीसदी तो कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी की संपत्ति में 414 फीसदी का इजफा दर्ज हुआ है। सवाल यह उठता है कि आखिर इन सबका उद्योग क्या है? जाहिर है जनसेवा! अगर जनसेवा में संपत्ति इस कदर बढ़ती है तो निश्चित तौर पर देश का हर नागरिक इस तरह की ‘‘जनसेवा‘‘ करना ही चाहेगा।
 
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंचों अर्थात सांसदों को जनता की दुख तकलीफ से ज्यादा फिकर है तो अपनी सुविधाआंे की। आलीशान घर, गाड़ी, फोन, परिवार सहित मुफ्त रेल और हवाई सुविधा जैसी सहूलियतों से इन्हें संतोष नहीं है। देश में सांसद विधायक और विधान परिषद के सदस्यों को राजमार्गों पर बिना किसी शुल्क के निर्बाध आवाजाही का भी मुकम्मल इंतजाम कर दिया है केंद्र सरकार ने। क्या ये चुने हुए लोग आम आदमी से इतर हैं? जब आम जनता से शुल्क वसूला जा सकता है तो इन्हें इससे बरी किस आधार पर रखा गया है! अभी लोगों की स्मृति से विस्मृत नहीं हुआ होगा कि मंदी के दौर में कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के पहले कार्यकाल में माननीय मंत्रियों ने हवाई यात्रा पर 300 करोड़ रूपए फूंक दिए थे। क्या यह पैसा किसी टकसाल में एसे ही छप जाता है? नहीं यह देश की सवा करोड़ जनता के खून पसीने की कमाई से वसूले गए कर से ही आता है।
 
इसी साल जनवरी में जब इस मामले में हो हल्ला होने पर केंद्र सरकार ने सांसदों की कमाई पर नजर रखना आरंभ किया था। सांसदों की संपत्ति की घोषणा और उनके द्वारा भरे जाने वाले आयकर रिटर्न का मिलान करने का भरोसा भी दिलाया था सरकार ने। आयकर विभाग ने सांसदों और उनके आश्रितों के पेन नंबर और रिटर्न की जानकारी मांगी थी। इस मामले मंे सर्किल कार्यालयों को भी मुस्तैद किया गया था। सरकार का यह कदम निश्चित तौर पर माननीयों के कपड़े उतारने के लिए पर्याप्त माना जा रहा था कि सांसदों द्वारा कमाया गया धन जायज तरीके से हासिल किया गया है अथवा नहीं। विडम्बना यह है कि यह सब सांसदों के लिए किया जा रहा था, अतः यह योजना संभवतः परवान नहीं चढ़ सकी।
 
कांग्रेस के संसद सदस्य चरण दास महंत की अध्यक्षता वाली समिति ने सांसदों का वेतन केंद्रीय स्तर पर सचिवों के वेतन से एक रूपए अधिक करने की सिफारिश की है। कल इस मामले में लोकसभा में हंगामा भी हुआ। अरबों रूपए के चारा घोटाले मंे फंसे लालू प्रसाद यादव द्वारा चीख चीख कर यह बात कही गई कि सांसदों का वेतन निम्न श्रेणी लिपिक से भी कम है। लालू यादव यह भूल जाते हैं कि एलडीसी को वेतन के अलावा जो सुविधाएं मिलती हैं वे सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं के मुकाबले शन्य ही हैं। अनेक विभागों ने नई भर्ती पर यह शर्त रख दी है कि सेवानिवृति पर सरकारी नुमाईंदा पेंशन का पात्र नहीं होगा। इस मामले में सांसद चुप क्यों हैं कि जब सरकारी कर्मचारी को पेंशन नहीं तो सांसद विधायक किस हक से पेंशन के पात्र हैं?
 
यह सच है कि आज के जनसेवक, लोकसेवक, देश सेवक अपनी लज्जा को पूरी तरह तज चुके हैं। आज का राजनैतिक परिवेश एकदम भिन्न ही नजर आ रहा है। आज नेहरू और गांधी के सिद्धांत लागू नहीं किए जा सकते, किन्तु राजनेताओं को जनता की फिकर भी करनी होगी। जनसेवकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पास प्रधानमंत्री रहते हुए भी फिएट कार खरीदने के पैसे नहीं थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल से उन्हें सीख लेना होगा जिनके निधन के उपरांत उनके बैंक खाते में महज 259 रूपए थे।
 
आज वक्त आ गया है कि जनता इस बारे में सोचे कि जिसके हाथों उसने अपना और अपनी आने वाली पीढ़ी का भविष्य सौंपा है वे आज जनता के प्रति कितने जवाबदेह रह गए हैं। आसमान छूती मंहगाई लंबे समय से कायम है। सत्तर फीसदी आबादी रात को या तो आधे पेट खाना खाती है या भूखे ही सोने को मजबूर है। बेरोजगारी का आलम यह है कि युवा गलत कामों की ओर बढ़ते जा रहे हैं। सांसद विधायक अपनी भव्य और विशाल अट्टालिकाएं बना रहे हैं, पर जनता को छत नसीब नहीं है! यह कैसी आजादी और यह कैसा सुनहरा, उजला भविष्य! जिसका सपना हमारी पुरानी पीढ़ी ने आजादी के वक्त हमारे लिए देखा था, और हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सौंप कर जा रहे हैं, यह सोचना बहुत ही जरूरी है, वरना हमने तो अपनी उमर काट दी आने वाली पीढी हमें बहुत अच्छी नजर से तो कतई नहीं देखेगी।

मोंटेक के निशाने पर कमल नाथ


मोंटेक ने फिर पजाई कमल नाथ के खिलाफ तलवार
 
महज 60 फीसदी लक्ष्य ही हासिल किया भूतल परिवहन मंत्रालय ने
 
रेल मंत्रालय में जरा भी ममता नहीं दिखाई रेल मंत्री ने
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 अगस्त। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने एक बार फिर भूतल परिवहन और राजमार्ग मंत्री कमल नाथ के खिलाफ तलवारें पजाना आरंभ कर दिया है। योजना आयोग द्वारा केंद्र सरकार के समस्त ढांचागत मंत्रालयों की प्रगति की समीक्षा कर उसका प्रतिवेदन तैयार कर रहा है, जिसे जल्द ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सौंप दिया जाएगा। इसी रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री पहली तिमाही में मंत्रियों के प्रदर्शन पर गौर फरमाएंगे।
 
योजना आयोग के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि योजना आयोग द्वारा अब तक कमल नाथ के नेतृत्व वाले भूतल परिवहन मंत्रालय, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले रेल मंत्रालय, प्रफुल्ल पटेल के नागर विमानन और सुशील कुमार शिंदे के विद्युत मंत्रालय के कामों की समीक्षा को पूरा कर लिया गया है। चालू माली साल में अब तक नागर विमानन मंत्रालय का कामकाज पहले की तुलना में काफी हद तक संतोषजनक पाया गया है। इसके अलावा बिजली मंत्रालय का काम भी उत्साहजनक ही माना जा रहा है।
 
कमल नाथ के नेतृत्व वाले भूतल परिवहन मंत्रालय के बारे में योजना आयोग के विचार कुछ अच्छे नहीं माने जा रहे हैं। गौरतलब है कि कमल नाथ ने अपने मंत्रालय में हर रोज बीस किलोमीटर राजमार्ग की सड़क सड़क के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया था। कमल नाथ के इस सुझाव पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे पूरी तरह से अव्यवहारिक ही करार दिया था। योजना आयोग ने बाद में इस लक्ष्य को घटाकर प्रतिदिन बनने वाली सड़क को महज सात किलोमीटर कर दिया था।
 
इस लिहाज से पहली तिमाही में भूतल परिवहन मंत्रालय को पहली तिमाही में 764 किलोमीटर सड़क का निर्माण करना था। आयोग के सूत्रों का दावा है कि अब तक भूतल परिवहन मंत्रालय की सुस्त चाल के चलते इस लक्ष्य को महज 60 फीसदी ही पाया जा सका है। गौरतलब है कि पूर्व में आवंटन को लेकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ आमने सामने आ गए थे।

पहली तिमाही में सबसे खराब प्रदर्शन रेल मंत्री ममता बनर्जी का रहा है। योजना आयोग का मानना है कि रेल मंत्री के नेतृत्व में रेल नई रेल लाईन बिछाने, रेल लाईन दोहरीकरण, रेल लाईनों के विद्युतिकरण आदि का काम कतई भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। गौरतलब होगा कि रेलमंत्री का अधिकांश समय पश्चिम बंगाल में ही बीत रहा है, और उनका उद्देश्य साफ नजर आ रहा है कि भरतीय रेल चाहे जिस दिशा में जाए वे हर हाल में पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होकर ही दम लेंगी।

राहुल बनेंगे कददावर

राहुल को पीएम बनाने का प्रशिक्षण जल्द
 
संगठन में मिल सकता है युवराज को उंचा ओहदा
 
रोजना मुख्यालय आएंगे राहुल
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 अगस्त। डेढ़ सौ साल पुरानी कांग्रस में एक बार फिर नेहरू गांधी परिवार को सशक्त बनाने की कवायद की जा रही है। आम चुनावों के पहले पहले कांग्रेस के युवराज को प्रधानमंत्री बनने का प्रशिक्षण दिया जाने की कार्ययोजना गुप्त तौर पर बनाई जाने लगी है। इसी क्रम में पहले राहुल गांधी को कांग्रेस के महासचिव पद से हटाकर इससे उपर का कोई पद देने की सिफारिशें की गई हैं, साथ ही साथ राहुल गांधी के ‘‘द्रोणाचार्य‘‘ ने उन्हें लगातार कांग्रेस के दफ्तर जाकर कांग्रेसियों के बीच समय बिताने का मशविरा भी दिया है।
 
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष कंेद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार श्रीमति गांधी को सलाह दी गई है कि वे अगले लोक सभा चुनाव के पूर्व राहुल गांधी को कांग्रेस के फ्रंट पर लेकर आएं, अन्यथा मंहगाई, भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में जनता के रूख को देखते हुए कांग्रेस का दुबारा सत्ता में आना बहुत ही मुश्किल प्रतीत हो रहा है।
 
सूत्रों ने कहा कि अभी कांग्रेसियों के मानस पटल पर राहुल गांधी की छवि उत्तर प्रदेश विशेषकर रायबरेली, अमेठी, के नेता के तौर पर बनी हुई है। इस छवि को तोड़कर राहुल गांधी की छवि राष्ट्रीय नेता की बनाना आवश्यक है। यह तभी संभव हो पाएगा जब राहुल गांधी नियमित तौर पर कांग्रेस के मुख्यालय 24 अकबर रोड़ पर बैठें और देश भर से आए कार्यकर्ताओं से रूबरू हों। इसके अलावा राहुल गांधी को युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के साथ ही साथ महती जवाबदारियां भी सौंपी जाएं।
 
सूत्रों की माने तो कांग्रेस के 21वी सदी के चाणक्य और एक ताकतवर महासचिव राहुल गांधी के लिए 2014 का रोड़ मैप बनाने में जुटे हुए हैं। कुछ माहों पहले राहुल गांधी को मंत्री मण्डल में शामिल करने की कवायद भी की गई थी ताकि वे काम काज को समझ सकें। कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न उजगर करने की शर्त पर कहा कि इस मामले मंे सोनिया गांधी से कहा गया था कि क्या राजीव गांधी किसी केबनेट का हिस्सा रहे थे? वे भी तो सीधे प्रधानमंत्री बने थे, तब राहुल गांधी को क्यों न सीधे प्रधानमंत्री ही बनाया जाए। संभवतः इसी सुझाव के चलते राहुल गांधी को मंत्री नहीं बनाया गया था।

उधर एआईसीसी के सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी के सामने यह सुझाव रखा गया है कि या तो राहुल गांधी को कार्यकरी अध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष बना दिया जाए। सोनिया गांधी इस सुझाव से सहमत होती नहीं दिख रही हैं, क्योंकि अगर वे अध्यक्ष होंगी और राहुल गांधी कार्यकारी अध्यक्ष तो विपक्षी दल इसे परिवार वाद से जोड़कर देखेंगे जिससे राहुल गांधी की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। सूत्रों का कहना है कि अगले माह कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी की ताजपोशी के ठीक बाद राहुल गांधी का कद प्रत्यक्ष तौर पर बढ़ा हुआ मिलने वाला है।

फोरलेन विवाद का सच -------------- 11

जनाक्रोश से पैदा हुआ था ‘‘जनमंच‘‘
 
अगस्त में पहली बैठक में पूरी स्फूर्ति भरी से सिवनी के लोगों में
 
हर कदम पर साथ देने का माद्दा दिखाया था सिवनी की जनता ने
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 अगस्त। 2009 के जून माह में जैसे ही तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि का 18 दिसंबर 2008 को जारी और 19 दिसंबर को पृष्ठांकित पत्र सिवनी की फिजा में तैरा वैसे ही सिवनी के नागरिकांे में जबर्दस्त रोष और असंतोष की भावना घर कर गई थी। पहले ही लोकसभा सीट के अवसान का दुख झेल रही सिवनी जिले की जनता इस मामले में अब दुबारा घाव सहने की स्थिति में नहीं थी। लोकसभा के जाने का घाव जनता के सामने बुरी तरह रिस ही रहा था कि अचानक ही उत्तर दक्षिण गलियारे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटा देने के षणयंत्र का ताना बाना उनके सामने आ गया था।
 
सिवनी के चौक चौराहों में बस एक ही बात की चर्चा हो रही थी कि अब सिवनी से अगर किसी को नागपुर जाना है तो उसे बरास्ता कुरई खवासा के छिंदवाड़ा होकर जाना पड़ेगा। अफवाहों आशंकाओं के इस बाजार में कुछ स्वार्थी नेताओं ने इस मामले को केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ का षणयंत्र प्रचारित करना आरंभ कर दिया। तभी कमल नाथ ने राज्य सभा में एक बयान देकर सभी को चौंका दिया कि वे तो पहले से ही चाहते थे कि इस सड़क का एलाईंमेंट बदलकर छिंदवाड़ा के रास्ते ले जाया जाए।
 
इन्ही सारी गफलतों के बीच सिवनी के नागरिक अपने आप को हताश, परेशान और ठगा सा महसूस करने लगे थे। सांसद और विधायकों के भरोसे रहकर जनता ने लोकसभा सीट का अवसान साफ साफ देखा था, जिसके चलते जनता का विधायकों और सांसदों के प्रति अविश्वास साफ साफ झलकता दिखाई दे रहा था। जनता चाह रही थी कि कोई संगठन जो गैर राजनैतिक तौर पर हो वह आकर इस आंदोलन की अगुआई करे और जनता उसका पूरा पूरा साथ देने को आमदा दिख रही थी।
 
इसी बीच अगस्त के पहले सप्ताह में होटल बाहुबली के हाल में एक बैठक आहूत की गई जिस बैठक में जिले के प्रबुद्ध नागरिकों ने फोरलेन के जाने के गम को और षणयंत्र को रेखांकित करने का प्रयास किया। इस पहली बैठक में लोगों के दिलो दिमाग में स्फूर्ति साफ तौर पर परिलक्षित हो रही थी। इस बैठक में गैर राजनैतिक तौर पर सभी सदस्यों ने एक स्वर से आंदोलन को आगे बढ़ाने की बात कही थी।
 
बताया जाता है कि इसी बैठक में सर्व सम्मति से करतल ध्वनि के साथ आंदोलन को एक गैर राजनैतिक संस्था ‘‘जनमंच‘‘ के माध्यम से जनमंच की अगुआई में लड़ने का निर्णय लिया गया था। जनमंच का नेतृत्व कौन करेगा इस पर यह तय किया गया था कि जनमंच का नेतृत्व सिवनी जिले का निवासी हर एक नागरिक करेगा। लगभग डेढ़ सौ लोगों की उपस्थिति में जनमंच के बेनर तले जनता जनार्दन का रूख देखकर लगने लगा था मानो 2010 आते आते ही इस सड़क का रूका काम पुनः आरंभ हो जाएगा।

चूंकि सड़क निर्माण करा रही सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी और मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा अक्टूबर 2008 में ही इस मार्ग का लगभग नब्बे प्रतिशत काम पूरा कर लिया गया था, अतः लगने लगा था कि महज दस फीसदी काम जो कि लगभग चालीस किलोमीटर का बचा था वह तीन चार माह में ही पूरा कर लिया जाएगा। लोगों के मन में नए सवेरे के मानिंद ही उम्मीदें जाग गईं थीं जनमंच के गठन के साथ ही।