शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

पवार उवाच ‘‘सड़ जाए अनाज पर मुफ्त नहीं बाटेंगे‘‘

भरे पेट लोगों को क्यों होने लगी भूखों की चिंता

भूखे पेट न हों भजन गोपाला

भुखमरी के आंकड़े हैं देश में भयावह

हजारों टन सड़ जाता है अनाज हर साल

लचर सरकारी सिस्टम है जवाबदार

(लिमटी खरे)

देश की सबसे बड़ी अदालत भले ही सरकार को फटकार लगाकर अनाज को सड़ने के बजाए गरीबों में मुफ्त बांटने की बात कह रही हो पर आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही केंद्र सरकार के कानों में जूं रेंगने वाली नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने एक ही पखवाड़े में दो बार सरकार को आड़े हाथांे लेते हुए अनाज के मामले में टिप्पणी की है। पिछले महीने के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिस देश में लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हों वहां अन्न का एक भी दाना बरबाद नहीं होना चाहिए। अब सर्वोच्च न्यायालय ने देश में सड़ते अनाज पर सरकार को फटकारा है कि अनाज के सड़ने के बजाए उसे गरीबों में निशुल्क बांट दिया जाना चाहिए। वैसे भी अन्न की बरबादी एक बहुत ही बड़ा अपराध ही माना जाता है।

दुनिया भर के भूखे लोगों में हर पांचवा शख्स भारतीय है। भारत में तकरीबन पचास फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इतना ही नहीं वर्ल्ड फुड प्रोग्राम का प्रतिवेदन बताता है कि देश के लगभग पच्चीस करोड़ लोग हर रात को आधे या भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। भूख सब कुछ करवा देती है। देश में तेजी से बढ़ता अपराध का ग्राफ भी कमोबेश यही कहानी कह रहा है कि खाने को तरसने वाले खाने के जुगाड़ में हर स्तर पर उतरने को तैयार हैं।

सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा कानून बनाने पर विचार किया जा रहा है। यह खुशफहमी चंद दिनों के लिए जनता को हो सकती है कि उसके शासक उसकी दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने जा रही है। यक्ष प्रश्न यह है कि कानून बनाने से भला क्या फायदा जब उसका पालन ही सुनिश्चित न हो। शिक्षा के अधिकार कानून के बाद कितने राज्यों में इसे लागू किया गया है। और छोडिए जनाब यह बताईए कि केंद्रीय स्तर पर चल रही शिक्षण संस्थाओं में आरटीई के क्या हाल हैं?

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में लोक लुभावन वादों के तहत यह भी कहा था कि गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवन यापन करने वाले परिवारों को हर माह तीन रूपए की दर से पच्चीस किलो चावल उपलब्ध करवाएगी। यूपीए सरकार का यह दूसरा कार्यकाल का दूसरा साल है, पर बीपीएल परिवार आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद में ही उलझा हुआ है। सवाल यह है कि बीपीएल का आधार क्या है, किस लक्ष्मण रेखा के पार रहने वालों को बीपीएल माना जाए। देखा जाए तो संपन्न और ताकतवर लोग बीपीएल की सूची में अपना नाम दर्ज करवाकर सारे लाभ उठा रहे हैं, और वास्तविक बीपीएल आज भी कमर तोड़ मंहगाई में उलझा हुआ है।

इस सब पर अनाज सड़ने की खबरें जले पर नमक का ही काम करती हैं। एक ओर खाने को नहीं है दाना और दूसरी ओर हजारों टन अनाज को रख रखाव के अभाव में सड़वा दिया गया। कुछ साल पहले केंद्र सरकार के कृषि विभाग ने निजी तौर पर वेयर हाउस बनवाने के लिए तगड़ी सब्सीडी की घोषणा की थी। साधन और पहुंच सम्पन्न लोगों ने इस योजना का लाभ उठाकर अपने बड़े बड़े गोदाम अवश्य बनवा लिए। अनेक गोदाम तो महज कागजों पर ही बन गए और सब्सीडी डकार ली गई। सवाल फिर वही खडा हुआ है कि इन गोदामों को बनाने के लिए सरकार ने अपनी ओर से राशि क्यों दी थी, जाहिर है अनाज को सड़ने से बचाने के लिए इन वेयर हाउस को सरकार किराए पर लेती। सरकार को चाहिए था कि सब्सीडी देते समय ही इस बात की शर्त रख दी जाती कि बारिश के चार माहों के साथ आधे साल के लिए इन गोदामों को सरकार को किराए पर देना वेयर हाउस मालिक के लिए आवश्यक होगा, तभी सब्सीडी दी जाएगी। अगर एसा होता तो आज देश भर की कृषि उपज मंडियों के प्रांगड में पड़ा अनाज सड़ा न होता।

एसा नहीं है कि अनाज पहली बार सड़ा हो। साल दर साल अनाज के सड़ने की खबरें आम हो रही हैं। पिछले साल ही पश्चिम बंगाल के एक बंदरगाह पर अरबों रूपए की आयतित दाल सड़ गई थी। किसान के खून पसीने से सींचे गए अनाज के दानों को सरकार संभाल नहीं पाती है। एक अनुमान के अनुसार हर सल करीब पचास हजार करोड़ रूपए का अनाज सरकारी कुप्रबंध के कारण मानव तो क्या मवेशी के खाने के लायक भी नहीं बचता है। अमूमन बफर स्टाक के चलते सरकार द्वारा जरूरत से ज्यादा अनाज खरीद लिया जाता है, पर उसके रख रखाव के अभाव में यह सड़ जाता है।

जब अनाज के सड़ने की खबरें बाजार में आती हैं तो कालाबाजारी करने वाले जमाखोरों के चेहरों पर रोनक आ जाती है। जमाखोरों द्वारा इन स्थितियों में बाजार में जिंस की कृत्रिम किल्लत पैदा कर तबियत से मुनाफा कमाया जाता है। दरअसल भारतीय खाद्य निगम की व्यवस्थाओं में ही खोट है। भारतीय खाद्य निगम ने जगह जगह अपने गोदाम अवश्य बनाए हैं पर वे नाकाफी ही हैं। सरकार को चाहिए कि कृषि विभाग से अनुदान पाकर गोदाम बनवाने वालों की सूची जिला स्तर पर बनवाई जाए और उनका किराया निर्धारित कर हर जिले के कलेक्टर पर यह जवाबदारी डाली जाए कि उस जिले की कृषि उपज मंडियों के माध्यम से की जाने वाली सरकारी अनाज की खरीद के सुरक्षित रख रखाव का जिम्मा जिला कलेक्टर का ही होगा। अगर केंद्र सरकार द्वारा इस तरह का कड़ा कदम उठा लिया गया तो अनाज की बरबादी काफी हद तक रोकी जा सकती है।

वैसे अनाज के सुरक्षित भण्डारण के लिए कंेद्र सरकार को चाहिए कि वह राज्यों को वित्तीय सहायता मुहैया करवाकर राज्यों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करे। जिलों में पदस्थ जिलाधिकारी चूंकि अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते हैं, इस लिहाज से वे केंद्र सरकार के अधीन भी होते हैं, पर दूसरी तरफ देखा जाए तो जिला कलेक्टर सीधे सीधे राज्य शासन के प्रति जवाबदेह ज्यादा होते हैं, इस तरह जिला कलेक्टर पूरी तरह राज्यों के नियंत्रण में हुआ करते हैं। देखा जाए तो अनाज के सड़ने के लिए राज्यों की सरकारें भी कम जवाबदेह नहीं हैं। अमूमन राज्य सरकारें समय पर अपना निर्धारित कोटा नहीं उठाती हैं, इसीलिए अनाज सड़ भण्डारण के अभाव में सड़ जाता है। गरीब गुरबों के लिए आंसू बहाने वाली राज्य सरकारें इस दिशा में पूरी तरह से लापरवाह ही हैं।

इधर अनाज के सड़ने की खबर से देश की सबसे बड़ी अदालत का आक्रोश लोगों को दिखा वहीं सियासत के धनी केंद्रीय कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार कह रहे हैं कि खाद्यान्न सड़ने की खबरों को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। शरद पवार का कथन और राज्य सभा में कृषि राज्य मंत्री प्रो.के.वी.थामस के दिए वक्तव्य में असमानता ही दिख रही है। अब केंद्रीय कृषि मंत्री का नया बयान आ गया है कि भले ही बर्बाद हो जाए अनाज पर गरीबों के मुफ्त में इसे नहीं बांटा जा सकता है। खुद कृषि मंत्री ने पिछले महीने ही लोकसभा में जानकारी दी थी कि 6 करोड़ 86 लाख रूपए मूल्य का 11 हजार 700 टन अनाज बर्बाद हो गया।

देश का कृषि मंत्रालय निर्दलीय पी.राजीव और के.एन.बालगोपाल के पूछे प्रश्न पर उत्तर देते हुए कहता है कि देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। 01 जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया। पिछले साल 2010 टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ था। 2008 - 2009 में 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल बरबाद हुआ था। वर्ष 2007 - 2008 में 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह देखा जाए तो तीन सालों में देश के एफसीआई के गोदाम कुल 3881 टन गेंहू और 55 हजार 458 टन चावल खराब हुआ था। इस तरह इस साल 01 जुलाई तक के खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार सालांे में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज बरबाद हुआ है।

सरकार चाहे केंद्र की हो राज्यों की हर कोई बस गरीब गुरबों की चिंता में दुबले होने का स्वांग ही किया करते हैं। वस्तुतः गरीब गुरबों की फिकर किसी को भी नहीं है। देश के नौकरशाह और जनसेवक जब विलासिता भरी जिंदगी जी रहे हों, उनके वेतन भत्ते आसमान को छू रहे हों, और उनका पेट भरा हो तो भला फिर उन्हें क्यों गरीब गुरबों की फिकर होने लगी। हां वे चिंता जरूर जताते हैं, पर वह चिंता सिर्फ दिखावटी ही होती है, क्योंकि अगर उन्होंने चिंता जताने का दिखावा नहीं किया तो चुनावों के दौरान उन्हें वोट क्यों देगी यही जनता।

राज्‍यों से छिनेगा शिक्षकों की भर्ती का मामला

शिक्षा का अधिकार कानून के प्रति संजीदा हुई केंद्र सरकार

सूबाई सियासत से शिक्षक भर्ती प्रक्रिया अलग करने की कवायद

प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश को अमली जामा पहनाया एचआरडी ने

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 20 अगस्त। शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बाद केंद्र और राज्य सरकारांे के बीच चल रही रस्साकशी के बीच अब केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के हाथ से शिक्षकों की भर्ती को अलग करने का फरमान जारी कर दिया है। केंद्र सरकार ने एक परिपत्र जारी कर राज्य सरकारों से कहा है कि वे अपने अपने सूबों में शिक्षकों की नियुक्ति का काम अलग संस्थानों के माध्यम से करवाएं।

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा राज्यों को जारी एक पत्र में कहा गया है कि राज्यों की सरकारें शिक्षक भर्ती बोर्ड का गठन कर शिक्षकांे की भर्ती के काम को अपने से अलग करंे। इससे शिक्षकों की गुणवत्ता को बरकरार रखने के साथ ही साथ शालाओं में रिक्त पदों की संख्या में कमी आएगी और भर्ती प्रक्रिया को सुचारू बनाया जा सकेगा।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि कुछ समय पूर्व अस्तित्व में आई किन्तु धूल खा रही प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों को लागू करना अब जरूरी हो गया है। सूबाई सरकारें शिक्षकांे की नियुक्ति तो करती हैं, किन्तु उसके पास शिक्षकों व्यापक स्तर पर भर्ती के लिए बुनियादी तंत्र ही मौजूद नहीं है।

गौरतलब है कि राज्य सरकारों द्वारा अपनाई जाने वाली भर्ती प्रक्रिया में भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार की गूंज होती रही है। इनमें गड़बड़ी होने से मामला कोर्ट कचहरी में सालों साल उलझा रहता है, साथ ही साथ अप्रशिक्षित और अयोग्य लोगों को इसमें मौका मिल जाता है जिससे योग्य और प्रशिक्षित शिक्षक निजी शालाओं में हजार से तीन हजार रूपए तक की नौकरी करने पर मजबूर हो जाते हैं।

वैसे भी शिक्षा का अधिकार कानून के लागू होने के बाद राज्यों की सरकारें शिक्षकों की भर्ती में पूरी तरह नाकाम रही हैं। यही कारण है कि देश में आज भी आठ लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है। केंद्र सरकार ने इस कमी और राज्यों की भर्ती प्रक्रिया को देखते हुए कहा है कि सरकारें इसके लिए स्वायत्त एजेंसी अथवा बोर्ड का गठन करे, और इस प्रक्रिया से खुद को प्रथक रखें। इस प्रक्रिया में शिक्षकों की भर्ती बारह माह जारी रहेगी। इसमें भर्ती की प्रक्रिया बेंकिंग भर्ती बोर्ड और रेल्वे भर्ती बोर्ड की तर्ज पर रखी जाने की उम्मीद है।

गरीब बुनकरों से क्‍या बुराई है कांग्रेस की

बुनकरों के हाथ काटने की तैयारी में कांग्रेस

चरखा अब चलेगा सौर उर्जा से

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 20 अगस्त। पता नहीं क्यों सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस के गौरवशाली शालका पुरूष रहे राष्ट्रपिता महत्मा गांधी कांग्रेस के नए निजामों के निशाने पर हैं? पहले गांधी जयंती पर केंद्र सरकार द्वारा खादी को प्रोत्साहित करने वाली 20 फीसदी की छूट को समाप्त कर दिया अब आजादी की लड़ाई में चरखा चलाकर स्वदेशी का संदेश देने के कार्यक्रम पर कांग्रेस की नजर लग गई है। आने वाले समय में बुनकरों के द्वारा चलाए जाने वाला चरखा सौर उर्जा या बिजली से चलाया जाएगा।

कांग्रेस के नए निजाम चरखे के स्वरूप और चरित्र को ही बदलने का ताना बाना बुन रहे हैं जो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में ‘‘आजादी का बाना‘‘ था। गौरतलब होगा कि महत्मा गांधी ने अहिंसा आंदोलन में खादी और चरखे को रचनात्मकता के साथ स्वराज आंदोलन का एक प्रतीक बनाया था। बापू ने उस समय देश के लगभग तीस हजार गांव के 20 लाख बुनकरों को एक सूत्र में पिरोकर आजादी की अहिंसक लड़ाई के लिए प्रोत्साहित किया था।

हालात देखकर यह लगने लगा है कि देश पर आजादी के उपरांत आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी के द्वारा प्रेरित खादी कार्यक्रम को समूल ही नष्ट करने की जुगत लगाई जा रही है। खादी संस्थाएं केंद्र सरकार के इस कदम के खिलाफ खड़ी नजर आ रही हैं। संस्थाओं का मानना है कि अगर चरखे को बिजली या सौर उर्जा से चलाया जाएगा तो हाथ से तैयार सूत और मिलों में तैयार सूत में क्या अंतर रह जाएगा।

गौरतलब होगा कि खादी के उत्पादन पर विशेष जोर देने वाले मोहन दास करम चंद गांधी ने खादी के उत्पादन में किसी भी तरह की मशीन की इजाजत नहीं दी थी। वैसे भी अगर खादी उत्पादन में मशीनों का प्रयोग होने लगेगा तो बुनकरों के सामने आजीविका की जबर्दस्त समस्या खड़ी होने की उम्मीद है, क्योंकि बिजली या सौर उर्जा से चलने वाला चरखा निस्संदेह कम से कम दस बुनकरों के हाथ का काम छीन लेगा।

उल्लेखनीय होगा कि चरखे से सूत कातकर खादी का निर्माण कुटीर उद्योगों की श्रेणी में आता है, और इससे अशिक्षित भी इसका प्रयोग कर अपनी आजीविका चला सकता है। इसके लिए अधिक मेहनत की आवश्यक्ता भी नहीं होती है। यह काम घरेलू महिलाएं भी अपने खाली समय में आसानी से कर सकती हैं। अस्सी के दशक के आरंभ तक देश के विद्यालयों में क्राफ्ट का एक कालखण्ड होता था, जिसमें बच्चों को कतली पोनी और चरखे के माध्यम से कपास से सूत कातना सिखाया जाता था, कालांतर में चरखा और कतली पोनी इतिहास की वस्तु हो बन गई हैं।

एक तरफ गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर और सदी के महानायक गुजरात में बापू के आश्रम में जाकर चरखा चलाकर खादी अपनाने का संदेश दे रहे हैं, दूसरी ओर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा गरीब बुनकरों के हाथ काटने के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं, जिसकी निंदा और विरोध किया जाना चाहिए। वैसे भी कल तक जनसेवकों की पहली पसंद मानी जाने वाली खादी का स्थान अब टेरीकाट, पालिस्टर जीन्स, कार्टराईज आदि ने ले लिया है।

फिल्‍म समीक्षा : लफंगे परिंदे

लफंगे परिंदे : अनोखी प्रेम कहानी

लफंगे परिंदे कहानी है मुंबई की गलियों में रहने वाले युवाओं के एक समूह की, जो स्टाइल का दीवाना है, जिनमें एटिट्यूड है और सितारों तक पहुँचने की चाह है। साथ ही यह नंदू (नील नितिन मुकेश) और पिंकी (दीपिका पादुकोण) की प्रेम कहानी भी है जो दोस्त से प्रेमी बन जाते हैं।

नंदू बड़ा अजीब इंसान है। ऐसा लगता है कि वह फाइट करने के लिए ही पैदा हुआ है। उसे वन-शॉट नंदू कहा जाता है। गलियों में होने वाली फाइटिंग में उसका कोई मुकाबला नहीं है। जीतने के लिए वह क्रूर और जंगली बन जाता है। आँखों पर पट्टी बाँधकर वह बॉक्सिंग की रिंग में अपने प्रतिद्वंद्वी को नॉक आउट कर देता है। यह वन शॉट अपनी शर्तों पर जिंदगी जीता है और अपने दोस्तों के बीच हीरो है। पिंकी से मुलाकात होते ही अचानक सब कुछ बदलने लगता है।

अब बात करते है पिंकी पालकर की। वह दृष्टिहीन है, लेकिन किसी से कम नहीं। उसे टेलेंट का पॉवरहाउस कहा जाता है। एक मॉल में वह बोरिंग-सा ‘9 टू 5’ जॉब करती है। स्केट पहन कर वह शानदार डांस करती है। प्रतिभाशाली, मजबूत इरादे वाली इस लड़की के ऊँचे सपने हैं। शख्सियत उसकी ऐसी है कि ज्यादातर लोग उससे घबराते हैं। उसकी इच्छा है कि वह अपने इलाके के ‘लूज़र्स’ से ऊँचा उठकर खुद अपनी एक जगह बनाए। अपने टेलेंट के जरिये साबित कर सके कि वह भी जिंदगी की दौड़ में जीत सकती है। इस राह में उसकी एक छोटी सी प्राब्लम है वह उसका अंधा होना।

‘लफंगे परिंदे’ एक आँखों पर पट्टी बाँधकर लड़ने वाले स्ट्रीट फाइटर और दृष्टिहीन डांसर की कहानी है जो अपने चार दोस्तों के साथ असंभव को हासिल करने की यात्रा पर निकलते हैं। अब तो ये फिल्म ही बताएगी।



स्टारकास्ट



बैनर : यशराज फिल्म्स

निर्माता : आदित्य चोपड़ा

निर्देशक : प्रदीप सरकार

संगीत : आर. आनंद

कलाकार : नील नितिन मुकेश, दीपिका पादुकोण

फोरलेन विवाद का सच ------------ 12


दिल्ली में गूंजा सिवनी का फोरलेन का विवाद

गुरूवार को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकार वार्ता में कहा कि सिवनी के साथ केंद्र सरकार अन्याय कर रही है। मुख्यमंत्री ने कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सन 1545 में शेरशाह सूरी द्वारा बनाए गए एतिहासिक महत्व के मार्ग को बंद करने का षणयंत्र रच रही है। जब इस मामले में मुख्यमंत्री के समक्ष सिवनी के तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के द्वारा 18 दिसंबर को जारी आदेश के बारे में पूछा गया तो मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ही इसे रोक रही है, जिला कलेक्टर का आदेश कब का है, इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। इसके उपरांत जब दस्तावेज उनके समक्ष रखे गए तो मुख्यमंत्री ने दस्तावेज अपने पास रखकर इस मामले को गंभीरता से देखने की बात की है।

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अगस्त। ‘‘कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश के साथ अन्याय किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है। अगर केंद्र सरकार को भाजपा से कोई गिला शिकवा है तो वह भाजपा के साथ अपना संघर्ष करे, किन्तु मध्य प्रदेश की साढ़े छः करोड़ गरीब जनता के साथ अन्याय करने का उसे कोई अधिकार नहीं है। देश में संघीय व्यवस्था लागू है, हम भीख नहीं अपना अधिकार मांग रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा कोयला, खाद्यान्न, इंदिरा आवास, सड़क आदि सभी मामलों मंें मध्य प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। एक षणयंत्र के तहत सन 1545 में बनाए गई सड़क को सिवनी जिले के पेंच के उद्यान के बहाने से समाप्त करना चाह रही है।‘‘ उक्ताशय की बात आज मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश भवन में आयोजित पत्रकार वार्ता में कही।

मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश के विद्युत तापग्रहों 170 लाख मीट्रिक टन कोयले के स्थान पर महज 136 मीट्रिक टन कोयला ही प्रदाय किया जा रहा है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में बिजली के उत्पादन में वर्ष 2009-2010 में 539.71 मिलियन यूनिट और 01 अप्रेल से 18 अगस्त तक 535.65 यूनिट की कमी आई है। मध्य प्रदेश की खदानों का कोयला अन्य राज्यों को दे दिया जा रहा है, और मध्य प्रदेश को अन्य राज्यों से कोयले की आपूर्ति किए जाने को अव्यवहारिक बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कोयले के आवंटन का युक्तियुक्तकरण होना अनिवार्य है।

शिवराज सिंह चौहान ने आगे कहा कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की तादाद अंत्योदय कार्ड सहित मध्य प्रदेश में 67 लाख 70 हजार है, किन्तु भारत सरकार द्वारा महज 41 लाख 25 हजार लोगों को ही बीपीएल मानकर अनाज मुहैया करवाया जा रहा है, जिससे 26 लाख 45 हजार परिवार आज भी 35 किलो प्रति परिवार की दर से अनाज पाने से वंचित हैं। श्री सिंह ने कहा कि योजना आयोग के सदस्य सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली समिति ने अपने प्रतिवेदन में सूबे के 48.6 फीसदी लोगबों को निर्धन बताया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए उन्होने कहा कि एक ओर तो अनाज सड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार जरूरत मंदों के नाम सूची से काटकर उन्हें अनाज से वंचित कर रही है।

इंदिरा आवास के बारे में मुख्यमंत्री ने कहा कि इस योजना में तो केंद्र सरकार ने पक्षपात की सारी हदें ही पार कर दी हैं। राज्यों के लिए लक्ष्यों का निर्धारण जनगणना के आधार पर किया जाता है। असम की आबादी दो करोड़ 32 लाख है वहां 22 लाख 41 हजार, और एम पी में जहां चार करोड़ 43 लाख ग्रामीण आबादी होने के बाद भी आवासों की कमी महज दो लाख आठ हजार ही बताई जा रही है।

सड़कों की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में बनाई गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत मध्य प्रदेश ने 26 हजार 578 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है, जो अपने आप में एक रिकार्ड है। मध्य प्रदेश सड़कों के मामले में सदा ही नंबर वन रहा है। पत्रकारों ने जब भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के द्वारा मध्य प्रदेश को पर्याप्त सहयोग देने की बात और उस दौरान मध्य प्रदेश के लोक कर्म मंत्री के उनके साथ खड़े होकर हां में हां मिलाने की बात कही गई तब मुख्यमंत्री ने कहा कि लोक निर्माण मंत्री क्या हम भी उनके साथ बैठते हैं, पर सच्चाई यह है कि मध्य प्रदेश के लिए जितनी सड़कें दी गईं हैं, वे कुछ जिलों तक ही सीमित हैं। साथ ही साथ इसके लिए आठ सौ करोड़ रूपए की राकि स्वीकृत किए हैं, पर आवंटन मिला है महज 193 करोड़ रूपए ही।

उत्तर दक्षिण गलियारे के बारे में चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि शेर शाह सूरी के जमाने के एतिहासिक महत्व के इस राजमार्ग को पेंच नेशनल पार्क के नाम पर षणयंत्र कर केंद्र सरकार द्वारा सिवनी जिले के लोगों के साथ सरासर अन्याय किया जा रहा है। जब मुख्यमंत्री से यह पूछा गया कि काम को तो सिवनी के तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि के आदेशों से रोका गया है, तो उन्होंन कहा कि इस बारे में उन्हें पता नहीं है कि किस पत्र की बात की जा रही है।

पत्रकार वार्ता के उपरांत पत्रकार लिमटी खरे ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से सिवनी जिले के साथ होने वाले अन्याय पर विस्तार से चर्चा की और इस मामले के हर पहलू से मुख्यमंत्री को आवगत कराया। मुख्यमंत्री को कागज दिखाकर श्री खरे ने बताया कि वनमण्डलाधिकारी दक्षिण सिवनी सामान्य वन मण्डल और जिला कलेक्टर के तत्कालीन आदेश दिखाकर उन्हें वास्तविकता बताइ्र गई कि गैर वन भूमि पर सड़क निर्माण का काम किस कारण रूका है। साथ ही यह भी बताया गया कि चूंकि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा इस मामले में अभी तक अपनी सहमति देते हुए अनुमति प्रदान नहीं की गई है, इस कारण वन भूमि पर काम आरंभ नहीं किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने बात को गंभीरता से सुनते हुए सारे प्रपत्र अपने पास रखकर इस मामले में ठोस कार्यवाही करने का आश्वासन दिया। इस दौरान मुख्यमंत्री के साथ मध्य प्रदेश के भाजपाध्यक्ष प्रभात झा भी मौजूद थे।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

चुका नहीं है कांग्रेस की राजनीति का चाणक्य

भोपाल गैस कांड में अर्जुन सिंह आखिर साबित क्या करना चाहते हैं?

राजीव को कथित क्लीन चिट, ठीकरा स्व.नरसिंहराव पर

(लिमटी खरे)

बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्या का अघोषित तमगा मिल चुका है पूर्व केंद्रीय मंत्री कुंवर अर्जुन सिंह को। कुंवर अर्जुन सिंह के जहर बुझे तीरों के चलने के बाद जब घाव रिसने लगते हैं, तब लोगों को पता चल पाता है कि कुंवर साहब ने घाव कहां दिया है। यूपीए सरकार की दूसरी पारी में कुंवर अर्जुन सिंह को दूध में से मख्खी के मानिंद निकालकर फंेक दिया गया है। कुंवर अर्जुन सिंह की खामोशी से कांग्रेस के आला नेता परेशान दिख रहे थे। राज्य सभा में जब अर्जुन सिंह ने अपना बयान दिया तब लोगों को लगा भई वाह कुंवर साहेब ने तो राजीव गांधी को सिरे से बरी कर पूरा का पूरा ठीकरा तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंहराव पर फोड दिया है। हर कांग्रेसी चैन की सांस ले रहा था कि अब कोई जाकर स्व. नरसिंहराव से पूछने तो रहा कि उनके कार्यालय ने गैस कांड के वक्त मध्य प्रदेश के निजाम रहे कुंवर अर्जुन सिंह को फोन पर भोपाल गैस कांड के आरोपी वारेन एंडरसन को छोड़ने का फरमान दिया था या नहीं।

देखा जाए तो कुंवर अर्जुन सिंह ने इस मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को बरी नहीं किया है, वरन् राजीव गांधी की भूमिकाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं? बकौल कुंवर अर्जुन सिंह उन्होंने 03 दिसंबर को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को घटना की पूरी जानकरी दे दी थी। इसके उपरांत यूनियन कार्बाईड के वारेन एण्डरसन की 07 दिसंबर की गिरफ्तारी और रिहाई के बारे में भी मध्य प्रदेश के हरदा में चुनावी कार्यक्रम में सविस्तार बता दिया था। कुंवर अर्जुन सिंह ने साफ कहा कि उन्होंने एण्डरसन की गिरफ्तारी के आदेश दिए और हरदा के लिए रवाना हो गए, जहां राजीव गांधी से उनकी इस संबंध में पूर्ण चर्चा हुई। इस मामले में वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री ने यह कहकर मामला और संगीन कर दिया है कि गृह मंत्रालय के पास एसा कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है, जिससे साबित हो सके कि उस वक्त गृह मंत्रालय इस बात के लिए इच्छुक था कि एंडरसन की रिहाई की जाए।

अर्जुन सिंह ने बड़ी ही सफाई से कांग्रेस जनों को प्रसन्न कर एक एसा दस्तावेज उजगर कर दिया है जिसमें कांग्रेसियों को यह मुगालता होने लगा है कि कुंवर अर्जुन सिंह ने बड़ी ही सफाई के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी को इस मामले से पूरी तरह बरी कर दिया है। वस्तुतः एसा है नहीं। जानकारों का साफ मानना है कि कुंवर अर्जुन सिंह ने जहर बुझे तीर के माध्यम से यह बात जनता के बीच छोड़ दी है कि जब संवेदनशील प्रधानमंत्री राजीव गांधी मध्य प्रदेश में होते हुए भी सारी हकीकत से ‘‘बेखबर‘‘ नहीं ‘‘बाखबर‘‘ तब उन्होंने कोई कदम उठाने के कुंवर अर्जुन सिंह को यह क्यों कहा कि अगली सभा की ओर कूच किया जाए? इसके पीछे राजीव गांधी की संवेदनहीनता ही सामने आ रही है, जो निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए एक मुश्किल पैदा कर सकती है, बशर्ते विपक्ष कुंवर अर्जुन सिंह के जहर बुझे तीरों को संभाल कर उठाए और उसे वापस कांग्रेस के खेमे में फंेके।

कल तक भोपाल गैस कांड के सच को अपनी आत्मकथा के माध्यम से उजागर करने की घोषणा करने वाले कुंवर अर्जुन सिंह का हृदय अचानक ही परिवर्तित हुआ और उन्होंने बजाए किताब के माध्यम से इस मसले में सदन में बयान देना ही उचित समझा। कुंवर अर्जुन सिंह का कहना है कि पूरी बात सुनने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इस बारे में तो एक शब्द भी नहीं कहा लेकिन अगली चुनावी सभा में जाने का आदेश दे दिया। राजीव गांधी के बारे में जो और जितना भी लोग जानते हैं उनके गले यह बात नहीं उतर सकती कि स्व.राजीव गांधी इतने संवेदनहीन थे कि इस तरह की घटना के बाद वे चुप्पी साधे रहते। स्व. राजीव गांधी जैसा जिन्दादिल और संवेदनशील नेता सच जानने के उपरांत कुछ न कुछ प्रतिक्रिया अवश्य ही व्यक्त करता। हो सकता है कि उस समय राजीव गांधी को कुंवर अर्जुन सिंह द्वारा घटना का मार्मिक पक्ष पेश ही न किया हो या यह भी संभव है कि कुंवर अर्जुन सिंह अभी गलत बयानी कर रहे हों।

कुंवर अर्जुन सिंह बार बार एक ही बात फरमा रहे हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा उस समय बार बार फोन करके वारेन एण्डसरन को भगाने की बात कही जा रही थी। अगर यह सच है तो क्या यह कुंवर अर्जुन सिंह की मुख्यमंत्री के तौर पर जवाबदेही नहीं थी कि उन्हें सीधे तत्कालीन गृह मंत्री नरसिंहराव से चर्चा करना था। 26 साल बाद गड़े मुर्दे उखाड़ने का फायदा ही क्या? इतिहास में संभवतः पहली बार कुंवर अर्जुन सिंह अपने बिछाए जाल में खुद ही फंसते नजर आ रहे हैं। इस मामले में वे तत्कालीन प्रधानमंत्री के बारे में बयानबाजी कर अपना बदला अवश्य ही निकाल रहे हों पर यह तीर उन्हें भी घायल करता ही प्रतीत हो रहा है।

जनता जनार्दन के मानस पटल पर यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक ही है कि आखिर कुंवर अर्जुन सिंह जैसा राजनीतिज्ञ इतना बड़ा बोझ लेकर 26 साल तक शांत कैसे बैठा रहा? आखिर क्या वजह थी कि इतने सालों में कुंवर अर्जुन सिंह ने अपनी जुबान खोलने की जहमत नहीं उठाई। विधायक और सांसद रहते हुए क्या कुंवर अर्जुन सिंह को कभी नहीं लगा कि वे एक जनसेवक हैं, और वे यह बात छुपाकर जनता के साथ ही धोखा कर रहे हैं।

अब कुंवर अर्जुन सिंह 26 सालों बाद फरमा रहे हैं कि उस समय वारेन एण्डरसन को राजकीय विमान उपलब्ध कराना बेतुका था। राजनैतिक समझबूझ वाला व्यक्ति यह बात अच्छी तरह समझता है कि किसी भी सूबे में तभी सरकारी विमान किसी को मुहैया करवाया जा सकता है, जबकि मुख्यमंत्री या विमानन मंत्री इसकी अनुमति दें। इन दोनों विशेषकर मुख्यमंत्री की इजाजत के बिना सरकारी उड़न खटोला एक इंच भी सरक नहीं सकता है। सवाल यह उठता है कि आखिर इतना सब अन्याय होते देखने के बाद कुंवर अर्जुन सिंह के हृदय परिवर्तन में 26 साल का लंबा समय कैसे लग गया? इसके पहले उनका जमीर क्यों नहीं जागा?

बहरहाल इस पूरे मामले में छब्बीस साल बाद तथ्यों को सामने लाना एक तरह से अप्रासंगिक ही प्रतीत हो रहा है। ढाई दशक पहले निकले सांप की धुंधली या मिट चुकी लकीर को पीटने का आखिर फायदा क्या है? आज साफ सफाई आरोप प्रत्यारोप से ज्यादा आवश्यक यह है कि गैस त्रासदी के पीडितों को मुकम्मल इंसाफ मिले। इस मसले में सरकार के साथ ही साथ देश की न्याय व्यवस्था को आत्मावलोकन की महती आवश्यक्ता है। जनता को खुद ही यह प्रश्न पूछना चाहिए कि छब्बीस साल पहले घटी अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से भला भारत गणराज्य ने क्या सबक सीखा?

भारत गणराज्य की नीति विहीन सरकार की कार्यप्रणाली की एक बानगी है, देश के बड़े और छोटे बांध। इन बांधों के साथ आपदा प्रबंध कितना पुख्ता है, इस बारे मंे सरकरें पूरी तरह मौन हैं। आपदा प्रबंध के मसले पर स्थानीय लोगों को कुछ भी जानकारी न होना आश्चर्यजनक ही है, साथ ही साथ आपदा प्रबंध के मामले में स्थानीय लोगों को शामिल न किया जाना भी आश्चर्यजनक इसलिए माना जाएगा, क्योंकि दुर्घटना की स्थिति में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले स्थानीय लोग ही होते हैं।

अभी कुछ माह पहले ही पायलट ट्रेनिंग संस्थान के ससेना विमान के मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर के पास बरगी में डूबने की खबर मिली थी। जिला प्रशासन जबलपुर और सिवनी ने रानी अवंती सागर परियोजना में गोताखोरों की मदद से उक्त विमान और गायब पायलट रितुराज को खोजने का नाकाम अभियान चलाया। इसके बाद जब प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए तब रितुराज के परिजनों ने अपने स्तर पर बांध के अथाह पानी में अपने लाड़ले को खोज ही निकाल। इस तरह की घटनाएं आपदा प्रबंध की पोल खोलने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती हैं।

कितने आश्चर्य की बात है कि यूनियन काबाईड को संचालित करने वाली डाउ केमिकल आज भी शान से भारत में अपना व्यवसाय संचालित कर रही है। यह सब कुछ भारत के लचर प्रशासनिक तंत्र के कारण ही संभव हुआ है। हमारी नजर में इस सबके लिए एसी व्यवस्था सुनिश्चित करना आवश्यक होगा जिससे दुर्घटना के लिए जवाबदार लोगों को तत्काल कटघरे मंे खडा किया जा सके।

भारत सरकार को चाहिए कि हाल ही में ब्रिटिश पेट्रोलियम के कुएं में हुए तेल रिसाव से सबक ले। दुनिया के चौधरी अमेरिका के प्रथम पुरूष बराक ओबामा ने इस त्रासदी को पर्यावरण का भीषणतम नुकासन बताकर न केवल ब्रिटिश पेट्रोलियम को जवाबदार ठहराया वरन् आना पाई से मुआवजा देने पर विवश भी किया है। विडम्बना है कि भारत में घटने वाली दुर्घटनाओं में संबंधित जवाबदार लोगों को जनसेवक, नौकरशाह और प्रशासनिक तंत्र हाथों हाथ लेकर उन्हें हीरो बनाने में जुट जाता है, जिसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है, इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

यमुना एक्‍सप्रेस वे पर राहुल ने ली कमल नाथ से जानकारी

राहुल ने ली कमल नाथ की क्लास!

यमुना एक्सप्रेस वे भूमि अधिग्रहण विवाद

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अगस्त। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गाध्ंाी ने गत दिवस संसद भवन में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ से उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में यमुना एक्सप्रेस सड़क मार्ग के भूमि अधिग्रहण विवाद की पूरी जानकारी ली। दोनों के बीच लगभग बीस मिनिट तक चर्चा हुई।

भरोसे मंद सूत्रों का कहना है कि सदन में शून्यकाल में हुए जबर्दस्त हंगामे के बाद सभापति ने सदन को दो बजे तक के लिए स्थगित कर दिया था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी सांसदों जगदंबिका पाल, केंद्रीय भूतल परिवहन राज्य मंत्री अर.पी.एन.सिंह और पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री जतिन प्रसाद ने युवराज राहुल गांधी को अलगढ़ के टप्पा गांव में हो रहे किसानों के आंदोलन के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के सांसदों से चर्चा के साथ ही जब सदन से बाहर आ रहे थे, तभी दूसरी ओर से आ रहे भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को देख राहुल गांधी ने उन्हें रोककर उनसे इस विषय पर चर्चा की। सूत्र बताते हैं कि भूतल परिवहन और राजमार्ग मंत्री कमल नाथ ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को बताया कि जमीन का अधिग्रहण किसी सार्वजनिक कारणों से नहीं वरन् निजी तौर पर किसी निजी क्षेत्र की कालोनी या टाउनशिप बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

सूत्रों ने आगे कहा कि यमुना एक्सप्रेस वे के मामले में भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने काग्रेस के महासचिव राहुल गांधी को तर्क दिया कि यमुना एक्सप्रेस वे की अवधारणा ही गलत है। बकौल कमल नाथ यमुना एक्सप्रेस वे एक तो राष्ट्रीय राजमार्ग के समानांतर ही बन रहा है, दूसरे यह अनेक महत्वपूर्ण राजमार्गों को अवरूद्ध भी कर रहा है।

फोरलेन विवाद का सच -------------- 12

जनमंच ने ली थी फोरलेन मामले को सर्वोच्च न्यायालय में उठाने की जवाबदारी

लोगों ने मुक्त हस्त से दिया था सहयोग

लोगों की भड़ास निकली थी पहली बैठक में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 19 अगस्त। उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारा सड़क परियोजना के नक्शे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटाने के मामले मंे लोगों के दिलों में जल रही आग शोले में तब्दील होने लगी थी। स्थानीय लोगों की उपस्थिति में हुई पहली बैठक में लोगों ने इस मामले में तबियत से अपनी अपनी भड़ास निकली थी। वक्ताओं के आक्रोश को देखकर लगने लगा था कि चाहे जो भी हो जाए अगली छः माही में फोरलेन मुद्दा सुलटा ही लिया जाएगा।

बैठक में राजनैतिक दलों से जुड़े सदस्यों ने हिस्सा लिया था किन्तु पहली बैठक में जब वक्ताओं की भड़ास सामने आई तो यह बात स्थापित होती नजर आ रही थी कि जनता का मंच जनमंच पूरी तरह गैर राजनैतिक ही है। सभी वक्ताओं ने इस बैठक में अपने अपने दलों और नेताओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के आगे सिवनी के हित को सर्वोपरि माना था। वक्ताओं के इस रवैए की सर्वत्र भूरी भूरी प्रशंसा भी हुई थी।

बताया जाता है कि वक्ताओं के उद्बोधन के उपरांत यह बात निकलकर सामने आई कि फोरलेन परियोजना को सिवनी न न होकर गुजारने के पीछे ‘वाईल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया‘ की एक याचिका है, जिसमें वन्य जीवों और पर्यावरण को बचाने की दुहाई देते हुए इस सड़क को सिनी से होकर न गुजारना प्रस्तावित किया गया था, क्योंकि सिवनी से खवासा के बीच के सड़क के मार्ग में रक्षित वन और पेंच राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा पड़ता है।

जब यह बात सामने आई कि उक्त गैर सरकारी संस्था ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है, तब केंद्रीय साधिकार समिति ने आकर तत्कालीन जिला कलेक्टर से पेड़ो की कटाई रोकने का आग्रह किया था, जिसे तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि द्वारा राज्य शासन से आदेश आने हैं की प्रत्याशा में स्वीकार कर लिया था। इस पर आम सहमति यह बनी कि मामले में सिवनी का जनमंच ‘हस्तक्षेपकर्ता‘ की हैसियत से अपना पक्ष रखेगा।

इसी बीच बैठक में सुझाव आया कि दिल्ली आने जाने और सर्वोच्च न्यायालय मंे वकील करने में काफी पैसा व्यय होने वाला है, तब शहर के लोगों ने मुक्त हस्त से अपना अपना आर्थिक सहयोग इस मामले के लिए दिया था। जनमंच की ओर से इकलौते अधिकृत पदाधिकारी महेंद्र देशमुख को इसका प्रवक्ता नियुक्त कर दिया गया। इस हेतु कितनी राशि एकत्र हुई थी इसका ब्योरा भी अगले दिन कुछ समाचार पत्रों ने प्रकाशित कर दिया था।

(क्रमशः जारी)

कौन कर रहा है सिवनी के साथ धोखा

किसका था वो षणयंत्र

बुधवार, 18 अगस्त 2010

माले मुफ्त के बाद भी पेट नहीं भरता सांसदों का

 ‘‘कम ऑन वेल्थ‘‘ के लिए फिकर मंद माननीय
 
सब कुछ निशुल्क फिर भी चाहिए भारी भरकम वेतन भत्ते
 
मंहगाई पर साध लेते हैं चुप्पी पर वेतन भत्तों पर अड़े रहते हैं माननीय
 
आधी आबादी को मयस्सर नहीं दो वक्त की रोटी
 
(लिमटी खरे)

14 और 15 अगस्त की दरम्यानी रात को जब डेढ़ सौ साल की ब्रितानी हुकूमत से देश को आजादी मिल रही थी तब हर एक भारतीय की आखों में उजले भविष्य की तस्वीर साफ दिखाई पड़ रही थी। उस वक्त जवान हो चुकी पीढ़ी को लगने लगा था कि आने वाला कल हमारा है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को वाकई काफी उज्जवल भविष्य दे पाएंगे। विडम्बना यह है कि आज भारत में जाति भेद, क्षेत्र भेद, भाषा भेद, वर्ण भेद, वर्ग भेद के साथ ही साथ अमीरी गरीबी के बीच का एक एसा फासला बन गया है, जिसे आजाद भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस पार्टी द्वारा कम किए जाने के बजाए बढ़ाया ही जा रहा है।
 
भारत गणराज्य की स्थापना के उपरांत देश में प्रजातंत्र की स्थापना की गई थी। प्रजातंत्र का अर्थ है, जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन। इसकी अवधारणा जिस वक्त रखी गई थी तब एसा सोचा गया था। आज के समय में यह अवधारणा बदल चुकी है। अब यह मामला जनसेवक का, जनसेवक द्वारा जनसेवक के लिए बन चुकी है। आज के समय में सांसद और विधायक पूरी तरह से अपने ही आप पर केंद्रित निहित स्वार्थों की राह पर खुद को देश को ले जाने लगे हैं। देश पर राज करने वाले जनसेवक अपने आप को जनता का सेवक बताकर बर्ताव राजा के मानिंद कर रहे हैं, देश और प्रदेशों के मंत्री अपने आप को जनसेवक के बजाए राज करने वाला समझकर यह सोच रहे हैं कि देश में आज भी आजादी पूर्व की सामंतशाही जीवित है। मंत्रियों के लिए नौकरशाह उनके लिए उनके गण और जनता उनकी जरखरीद गुलाम हो चुकी है, वे जो चाहें वो कर सकते हैं।
 
माले मुफ्त अर्थात सब कुछ निशुल्क पाने वाले जनसेवकों ने अपने सेवाकाल में भारी भरकम पगार और सेवानिवृत्ति के उपरांत खासी पेंशन की व्यवस्था करने के बाद अब मंत्रियों को भव्य अट्टालिका और मंहगी विलासिता भरी गाडियों की दरकार होना आश्चर्यजनक है। अगर आप विधायक या सांसद हैं तो आप निजी तौर पर मंहगी विलासिता भरी गाडी में फर्राटा भर सकते हैं, पर अगर आप मंत्री हैं तो आपको निश्चित तौर पर प्रोटोकाल को निभाना ही होगा। स्टेट गैरेज से आपको आवंटित वाहन में सफर करना आपकी मजबूरी होगी। भले ही आप दूसरे वाहन में सफर करें किन्तु आपके काफिले में वह वाहन होना अनिवार्य है। स्टेट गैरिज की मजबूरी है कि उसके पास एम्बेसेडर कार की भरमार है। स्टेटस सिंबाल के लिए ‘‘जेड प्लस‘‘ केटेगरी की सुरक्षा लेने वाले जनसेवक भी जब कहीं दौरे पर जाते हैं तो वे बुलट प्रूफ एम्बेसेडर में बेठने से बचते ही हैं, क्योंकि इसके कांच नहीं खुलते और कांच नहीं खुलेंगे तो नेता जी अपने समर्थकों का हाथ हिलाकर अभिवादन कैसे कर पाएंगे। इस बारे में किसी राज्य शासन के गृह विभाग द्वारा कभी केंद्रीय गृह विभाग को नहीं बताया जाता कि जिसे अपने ही देश के नागरिकों से खतरा होने के कारण आपने जेड प्लस केटगरी की सुरक्षा दी है, उसे जनता के बीच जाते समय उस जेड प्लस की आवश्यक्ता नहीं है। अनेक माननीयों को सरकार द्वारा दिए गए गनमेन उनके लिए खलासी का काम करते हैं।
 
भारत के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि देश में राज्य सभा में करोड़पति सांसदों का आंकड़ा एक सौ के पार हो चुका है। लोकसभा में भी कमोबेश यही स्थिति सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश के सांसद अक्षय प्रताप सिंह की संपत्ति 2004 में 21 लाख के पांच साल बाद 1841 फीसदी बढ़ गई। राजस्थान के सचिन पायलट की संपत्ति इन पांच सालों में 1746 फीसदी तो एमपी के चंद्र प्रताप सिंह की 1466 फीसदी। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की संपत्ति में पांच सालांे में 431 फीसदी तो कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी की संपत्ति में 414 फीसदी का इजफा दर्ज हुआ है। सवाल यह उठता है कि आखिर इन सबका उद्योग क्या है? जाहिर है जनसेवा! अगर जनसेवा में संपत्ति इस कदर बढ़ती है तो निश्चित तौर पर देश का हर नागरिक इस तरह की ‘‘जनसेवा‘‘ करना ही चाहेगा।
 
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंचों अर्थात सांसदों को जनता की दुख तकलीफ से ज्यादा फिकर है तो अपनी सुविधाआंे की। आलीशान घर, गाड़ी, फोन, परिवार सहित मुफ्त रेल और हवाई सुविधा जैसी सहूलियतों से इन्हें संतोष नहीं है। देश में सांसद विधायक और विधान परिषद के सदस्यों को राजमार्गों पर बिना किसी शुल्क के निर्बाध आवाजाही का भी मुकम्मल इंतजाम कर दिया है केंद्र सरकार ने। क्या ये चुने हुए लोग आम आदमी से इतर हैं? जब आम जनता से शुल्क वसूला जा सकता है तो इन्हें इससे बरी किस आधार पर रखा गया है! अभी लोगों की स्मृति से विस्मृत नहीं हुआ होगा कि मंदी के दौर में कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के पहले कार्यकाल में माननीय मंत्रियों ने हवाई यात्रा पर 300 करोड़ रूपए फूंक दिए थे। क्या यह पैसा किसी टकसाल में एसे ही छप जाता है? नहीं यह देश की सवा करोड़ जनता के खून पसीने की कमाई से वसूले गए कर से ही आता है।
 
इसी साल जनवरी में जब इस मामले में हो हल्ला होने पर केंद्र सरकार ने सांसदों की कमाई पर नजर रखना आरंभ किया था। सांसदों की संपत्ति की घोषणा और उनके द्वारा भरे जाने वाले आयकर रिटर्न का मिलान करने का भरोसा भी दिलाया था सरकार ने। आयकर विभाग ने सांसदों और उनके आश्रितों के पेन नंबर और रिटर्न की जानकारी मांगी थी। इस मामले मंे सर्किल कार्यालयों को भी मुस्तैद किया गया था। सरकार का यह कदम निश्चित तौर पर माननीयों के कपड़े उतारने के लिए पर्याप्त माना जा रहा था कि सांसदों द्वारा कमाया गया धन जायज तरीके से हासिल किया गया है अथवा नहीं। विडम्बना यह है कि यह सब सांसदों के लिए किया जा रहा था, अतः यह योजना संभवतः परवान नहीं चढ़ सकी।
 
कांग्रेस के संसद सदस्य चरण दास महंत की अध्यक्षता वाली समिति ने सांसदों का वेतन केंद्रीय स्तर पर सचिवों के वेतन से एक रूपए अधिक करने की सिफारिश की है। कल इस मामले में लोकसभा में हंगामा भी हुआ। अरबों रूपए के चारा घोटाले मंे फंसे लालू प्रसाद यादव द्वारा चीख चीख कर यह बात कही गई कि सांसदों का वेतन निम्न श्रेणी लिपिक से भी कम है। लालू यादव यह भूल जाते हैं कि एलडीसी को वेतन के अलावा जो सुविधाएं मिलती हैं वे सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं के मुकाबले शन्य ही हैं। अनेक विभागों ने नई भर्ती पर यह शर्त रख दी है कि सेवानिवृति पर सरकारी नुमाईंदा पेंशन का पात्र नहीं होगा। इस मामले में सांसद चुप क्यों हैं कि जब सरकारी कर्मचारी को पेंशन नहीं तो सांसद विधायक किस हक से पेंशन के पात्र हैं?
 
यह सच है कि आज के जनसेवक, लोकसेवक, देश सेवक अपनी लज्जा को पूरी तरह तज चुके हैं। आज का राजनैतिक परिवेश एकदम भिन्न ही नजर आ रहा है। आज नेहरू और गांधी के सिद्धांत लागू नहीं किए जा सकते, किन्तु राजनेताओं को जनता की फिकर भी करनी होगी। जनसेवकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पास प्रधानमंत्री रहते हुए भी फिएट कार खरीदने के पैसे नहीं थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल से उन्हें सीख लेना होगा जिनके निधन के उपरांत उनके बैंक खाते में महज 259 रूपए थे।
 
आज वक्त आ गया है कि जनता इस बारे में सोचे कि जिसके हाथों उसने अपना और अपनी आने वाली पीढ़ी का भविष्य सौंपा है वे आज जनता के प्रति कितने जवाबदेह रह गए हैं। आसमान छूती मंहगाई लंबे समय से कायम है। सत्तर फीसदी आबादी रात को या तो आधे पेट खाना खाती है या भूखे ही सोने को मजबूर है। बेरोजगारी का आलम यह है कि युवा गलत कामों की ओर बढ़ते जा रहे हैं। सांसद विधायक अपनी भव्य और विशाल अट्टालिकाएं बना रहे हैं, पर जनता को छत नसीब नहीं है! यह कैसी आजादी और यह कैसा सुनहरा, उजला भविष्य! जिसका सपना हमारी पुरानी पीढ़ी ने आजादी के वक्त हमारे लिए देखा था, और हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या सौंप कर जा रहे हैं, यह सोचना बहुत ही जरूरी है, वरना हमने तो अपनी उमर काट दी आने वाली पीढी हमें बहुत अच्छी नजर से तो कतई नहीं देखेगी।

मोंटेक के निशाने पर कमल नाथ


मोंटेक ने फिर पजाई कमल नाथ के खिलाफ तलवार
 
महज 60 फीसदी लक्ष्य ही हासिल किया भूतल परिवहन मंत्रालय ने
 
रेल मंत्रालय में जरा भी ममता नहीं दिखाई रेल मंत्री ने
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 अगस्त। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने एक बार फिर भूतल परिवहन और राजमार्ग मंत्री कमल नाथ के खिलाफ तलवारें पजाना आरंभ कर दिया है। योजना आयोग द्वारा केंद्र सरकार के समस्त ढांचागत मंत्रालयों की प्रगति की समीक्षा कर उसका प्रतिवेदन तैयार कर रहा है, जिसे जल्द ही प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सौंप दिया जाएगा। इसी रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री पहली तिमाही में मंत्रियों के प्रदर्शन पर गौर फरमाएंगे।
 
योजना आयोग के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि योजना आयोग द्वारा अब तक कमल नाथ के नेतृत्व वाले भूतल परिवहन मंत्रालय, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले रेल मंत्रालय, प्रफुल्ल पटेल के नागर विमानन और सुशील कुमार शिंदे के विद्युत मंत्रालय के कामों की समीक्षा को पूरा कर लिया गया है। चालू माली साल में अब तक नागर विमानन मंत्रालय का कामकाज पहले की तुलना में काफी हद तक संतोषजनक पाया गया है। इसके अलावा बिजली मंत्रालय का काम भी उत्साहजनक ही माना जा रहा है।
 
कमल नाथ के नेतृत्व वाले भूतल परिवहन मंत्रालय के बारे में योजना आयोग के विचार कुछ अच्छे नहीं माने जा रहे हैं। गौरतलब है कि कमल नाथ ने अपने मंत्रालय में हर रोज बीस किलोमीटर राजमार्ग की सड़क सड़क के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया था। कमल नाथ के इस सुझाव पर लोगों ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे पूरी तरह से अव्यवहारिक ही करार दिया था। योजना आयोग ने बाद में इस लक्ष्य को घटाकर प्रतिदिन बनने वाली सड़क को महज सात किलोमीटर कर दिया था।
 
इस लिहाज से पहली तिमाही में भूतल परिवहन मंत्रालय को पहली तिमाही में 764 किलोमीटर सड़क का निर्माण करना था। आयोग के सूत्रों का दावा है कि अब तक भूतल परिवहन मंत्रालय की सुस्त चाल के चलते इस लक्ष्य को महज 60 फीसदी ही पाया जा सका है। गौरतलब है कि पूर्व में आवंटन को लेकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ आमने सामने आ गए थे।

पहली तिमाही में सबसे खराब प्रदर्शन रेल मंत्री ममता बनर्जी का रहा है। योजना आयोग का मानना है कि रेल मंत्री के नेतृत्व में रेल नई रेल लाईन बिछाने, रेल लाईन दोहरीकरण, रेल लाईनों के विद्युतिकरण आदि का काम कतई भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। गौरतलब होगा कि रेलमंत्री का अधिकांश समय पश्चिम बंगाल में ही बीत रहा है, और उनका उद्देश्य साफ नजर आ रहा है कि भरतीय रेल चाहे जिस दिशा में जाए वे हर हाल में पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होकर ही दम लेंगी।

राहुल बनेंगे कददावर

राहुल को पीएम बनाने का प्रशिक्षण जल्द
 
संगठन में मिल सकता है युवराज को उंचा ओहदा
 
रोजना मुख्यालय आएंगे राहुल
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 अगस्त। डेढ़ सौ साल पुरानी कांग्रस में एक बार फिर नेहरू गांधी परिवार को सशक्त बनाने की कवायद की जा रही है। आम चुनावों के पहले पहले कांग्रेस के युवराज को प्रधानमंत्री बनने का प्रशिक्षण दिया जाने की कार्ययोजना गुप्त तौर पर बनाई जाने लगी है। इसी क्रम में पहले राहुल गांधी को कांग्रेस के महासचिव पद से हटाकर इससे उपर का कोई पद देने की सिफारिशें की गई हैं, साथ ही साथ राहुल गांधी के ‘‘द्रोणाचार्य‘‘ ने उन्हें लगातार कांग्रेस के दफ्तर जाकर कांग्रेसियों के बीच समय बिताने का मशविरा भी दिया है।
 
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष कंेद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार श्रीमति गांधी को सलाह दी गई है कि वे अगले लोक सभा चुनाव के पूर्व राहुल गांधी को कांग्रेस के फ्रंट पर लेकर आएं, अन्यथा मंहगाई, भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में जनता के रूख को देखते हुए कांग्रेस का दुबारा सत्ता में आना बहुत ही मुश्किल प्रतीत हो रहा है।
 
सूत्रों ने कहा कि अभी कांग्रेसियों के मानस पटल पर राहुल गांधी की छवि उत्तर प्रदेश विशेषकर रायबरेली, अमेठी, के नेता के तौर पर बनी हुई है। इस छवि को तोड़कर राहुल गांधी की छवि राष्ट्रीय नेता की बनाना आवश्यक है। यह तभी संभव हो पाएगा जब राहुल गांधी नियमित तौर पर कांग्रेस के मुख्यालय 24 अकबर रोड़ पर बैठें और देश भर से आए कार्यकर्ताओं से रूबरू हों। इसके अलावा राहुल गांधी को युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के साथ ही साथ महती जवाबदारियां भी सौंपी जाएं।
 
सूत्रों की माने तो कांग्रेस के 21वी सदी के चाणक्य और एक ताकतवर महासचिव राहुल गांधी के लिए 2014 का रोड़ मैप बनाने में जुटे हुए हैं। कुछ माहों पहले राहुल गांधी को मंत्री मण्डल में शामिल करने की कवायद भी की गई थी ताकि वे काम काज को समझ सकें। कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न उजगर करने की शर्त पर कहा कि इस मामले मंे सोनिया गांधी से कहा गया था कि क्या राजीव गांधी किसी केबनेट का हिस्सा रहे थे? वे भी तो सीधे प्रधानमंत्री बने थे, तब राहुल गांधी को क्यों न सीधे प्रधानमंत्री ही बनाया जाए। संभवतः इसी सुझाव के चलते राहुल गांधी को मंत्री नहीं बनाया गया था।

उधर एआईसीसी के सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी के सामने यह सुझाव रखा गया है कि या तो राहुल गांधी को कार्यकरी अध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष बना दिया जाए। सोनिया गांधी इस सुझाव से सहमत होती नहीं दिख रही हैं, क्योंकि अगर वे अध्यक्ष होंगी और राहुल गांधी कार्यकारी अध्यक्ष तो विपक्षी दल इसे परिवार वाद से जोड़कर देखेंगे जिससे राहुल गांधी की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। सूत्रों का कहना है कि अगले माह कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी की ताजपोशी के ठीक बाद राहुल गांधी का कद प्रत्यक्ष तौर पर बढ़ा हुआ मिलने वाला है।

फोरलेन विवाद का सच -------------- 11

जनाक्रोश से पैदा हुआ था ‘‘जनमंच‘‘
 
अगस्त में पहली बैठक में पूरी स्फूर्ति भरी से सिवनी के लोगों में
 
हर कदम पर साथ देने का माद्दा दिखाया था सिवनी की जनता ने
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 18 अगस्त। 2009 के जून माह में जैसे ही तत्कालीन जिला कलेक्टर पिरकीपण्डला नरहरि का 18 दिसंबर 2008 को जारी और 19 दिसंबर को पृष्ठांकित पत्र सिवनी की फिजा में तैरा वैसे ही सिवनी के नागरिकांे में जबर्दस्त रोष और असंतोष की भावना घर कर गई थी। पहले ही लोकसभा सीट के अवसान का दुख झेल रही सिवनी जिले की जनता इस मामले में अब दुबारा घाव सहने की स्थिति में नहीं थी। लोकसभा के जाने का घाव जनता के सामने बुरी तरह रिस ही रहा था कि अचानक ही उत्तर दक्षिण गलियारे से सिवनी जिले का नामोनिशान मिटा देने के षणयंत्र का ताना बाना उनके सामने आ गया था।
 
सिवनी के चौक चौराहों में बस एक ही बात की चर्चा हो रही थी कि अब सिवनी से अगर किसी को नागपुर जाना है तो उसे बरास्ता कुरई खवासा के छिंदवाड़ा होकर जाना पड़ेगा। अफवाहों आशंकाओं के इस बाजार में कुछ स्वार्थी नेताओं ने इस मामले को केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ का षणयंत्र प्रचारित करना आरंभ कर दिया। तभी कमल नाथ ने राज्य सभा में एक बयान देकर सभी को चौंका दिया कि वे तो पहले से ही चाहते थे कि इस सड़क का एलाईंमेंट बदलकर छिंदवाड़ा के रास्ते ले जाया जाए।
 
इन्ही सारी गफलतों के बीच सिवनी के नागरिक अपने आप को हताश, परेशान और ठगा सा महसूस करने लगे थे। सांसद और विधायकों के भरोसे रहकर जनता ने लोकसभा सीट का अवसान साफ साफ देखा था, जिसके चलते जनता का विधायकों और सांसदों के प्रति अविश्वास साफ साफ झलकता दिखाई दे रहा था। जनता चाह रही थी कि कोई संगठन जो गैर राजनैतिक तौर पर हो वह आकर इस आंदोलन की अगुआई करे और जनता उसका पूरा पूरा साथ देने को आमदा दिख रही थी।
 
इसी बीच अगस्त के पहले सप्ताह में होटल बाहुबली के हाल में एक बैठक आहूत की गई जिस बैठक में जिले के प्रबुद्ध नागरिकों ने फोरलेन के जाने के गम को और षणयंत्र को रेखांकित करने का प्रयास किया। इस पहली बैठक में लोगों के दिलो दिमाग में स्फूर्ति साफ तौर पर परिलक्षित हो रही थी। इस बैठक में गैर राजनैतिक तौर पर सभी सदस्यों ने एक स्वर से आंदोलन को आगे बढ़ाने की बात कही थी।
 
बताया जाता है कि इसी बैठक में सर्व सम्मति से करतल ध्वनि के साथ आंदोलन को एक गैर राजनैतिक संस्था ‘‘जनमंच‘‘ के माध्यम से जनमंच की अगुआई में लड़ने का निर्णय लिया गया था। जनमंच का नेतृत्व कौन करेगा इस पर यह तय किया गया था कि जनमंच का नेतृत्व सिवनी जिले का निवासी हर एक नागरिक करेगा। लगभग डेढ़ सौ लोगों की उपस्थिति में जनमंच के बेनर तले जनता जनार्दन का रूख देखकर लगने लगा था मानो 2010 आते आते ही इस सड़क का रूका काम पुनः आरंभ हो जाएगा।

चूंकि सड़क निर्माण करा रही सद्भाव कंस्ट्रक्शन कंपनी और मीनाक्षी कंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा अक्टूबर 2008 में ही इस मार्ग का लगभग नब्बे प्रतिशत काम पूरा कर लिया गया था, अतः लगने लगा था कि महज दस फीसदी काम जो कि लगभग चालीस किलोमीटर का बचा था वह तीन चार माह में ही पूरा कर लिया जाएगा। लोगों के मन में नए सवेरे के मानिंद ही उम्मीदें जाग गईं थीं जनमंच के गठन के साथ ही।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

इस बार ज्‍यादा लाचार दिखे प्रधानमंत्री

लाचार प्रधानमंत्री का उबाउ उद्बोधन!

भारत गणराज्य में आजादी के उपरांत यह परंपरा चल पड़ी है कि स्वाधीनता दिवस के रोज वजीरे आजम द्वारा स्वायत्त सत्ता के प्रतीक लाल किले में तिरंगा फहराया जाएगा और उसके बाद वे उसी लाल किले की प्राचीर से आवाम ए हिन्द को संबोधित करेंगे। अब तक के प्रधानमंत्रियों में डॉ. मनमोहन सिंह के इस साल के उद्बोधन को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि देश के लाचार प्रधानमंत्री का यह उबाउ उद्बोधन था। नक्सल, माओवाद आतंक और कमर तोड़ मंहगाई की समस्या पर उनके विचारों को सुनकर हमारे कुछ मीडिया के मित्र उनका सारगर्भित उद्बोधन अवश्य कह रहे हों, किन्तु सच्चाई इस सबसे जुदा है।

(लिमटी खरे)

एतिहासिक लाल किले की प्राचीर से भारत के गणराज्य के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सातवीं बार झंडा वंदन कर देश में नेहरू गांधी परिवार से इतर पहले व्यक्ति होने का खिताब अवश्य पा लिया हो पर उनका उद्बोधन राष्ट्र को क्या संदेश दे गया इस बारे में देश व्यापी बहस की आवश्यक्ता महसूस की जाने लगी है। देश के सबसे ताकतवर पद पर विराजमान राजनेता ही जब जनता द्वारा सीधे चुना न गया हो, वह पिछले दरवाजे यानी राज्य सभा से आया हो तब उसकी मजबूरी समझी जा सकती है। कैसी विडम्बना है कि देश का प्रधानमंत्री लोगों के द्वारा चुने जाने वाले सांसदों और देश की सबसे बड़ी पंचायत में अपना वोट तक नहीं डाल सकता है!

देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह एक योग्य, काबिल, शालीन, समझदार, शांत और सौम्य व्यक्तित्व के धनी हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु देश के वर्तमान हालातों को देखकर बतौर प्रधानमंत्री उनकी कार्यप्रणाली और प्रशासनिक क्षमताओं पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है। देश में मंहगाई सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। हजारों टन अनाज भण्डारण के अभाव में सड़ रहा है। गरीब गुरबे दो वक्त की रोटी के लिए मारा मारी कर रहे हैं। जनसेवक एक रात में ही लाखों की पार्टियां उड़ा रहे हैं। देश में चुने गए सांसद और विधायकों के वेतन भत्ते आसमान छू रहे हैं। इन सबके बाद भी मनमोहन सिंह फरमा रहे हैं कि मंहगाई कम होने वाली है। सदन में मंहगाई पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज का वक्तव्य बहुत प्रासंगिक है कि मंहगाई है तो पर इतने अधिक दिन टिकी कैसे है? अगर किसी कारण विशेष से मंहगाई बढ़ रही थी तो निश्चित तौर पर वे कारण स्थाई तो कतई नहीं रहे होंगे, तब मंहगाई का ग्राफ नीचे आना चाहिए था, वस्तुतः एसा हुआ नहीं।

बहरहाल प्रधानमंत्री ने माओवादियों और नक्सलवादियों को हिंसा का रास्ता छोड़कर सरकार के साथ बातचीत का आव्हान किया है, जो दर्शाता है कि उच्च स्तर पर इस समस्या को लेकर लोग संजीदा हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि कानून और व्यवस्था के तहत हर नागरिक को सुरक्षा देना सरकार का कर्तव्य है, वहीं दूसरी ओर माओवाद और नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में आम निरीह नागरिक और सुरक्षा बलों के जवानों के मारे जाने से सरकार असहाय ही दिखाई पड़ती है। प्रधानमंत्री को इस बात को भी याद रखना चाहिए कि पूर्व में देश में चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो, उसने आतंकवादियों के सामने घुटने टेककर उन्हें छोड़ा भी है। एक समय जब आतंकवादी चेहरे ढांककर सरकार से बात करने आए थे, तब आज नक्सलवादियों या माओवादियों से बिना शर्त बात क्यों नही हो सकती है।

क्या भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री यह नहीं जानते हैं कि नक्सलवाद के पीछे मूल समस्या क्या है? अनजान परदेसी नक्सलवादी गावों के लोगों के साथ आखिर हिल मिल कैसे जाते हैं। उनका निशाना मुख्यतः कौन लोग होते हैं? जाहिर है कि जो गांव के लोगों को उनके अधिकारों के साथ छेड़छाड़ कर अत्याचार और जुल्म करता है, उसे ही नक्सलवादी अपना निशाना बनाते हैं। आंकड़े गवाह हैं कि नक्सलवादियों के निशाने पर मुख्यतः पुलिस, वन और राजस्व विभाग के कर्मचारी ही होते हैं। ये तीन विभाग ही हैं, जिनसे ग्रामीणों का रोज रोज वास्ता पड़ता है। भ्रष्टाचार की सड़ांध मारते हिन्दुस्तान के हर एक सरकारी कर्मचारी और जनसेवक की रग रग में बस चुका है भ्रष्टाचार का कैंसर। यही कारण है कि नक्सलवाद जैसी समस्या को पैदा होने के लिए उपजाउ माहौल मिल रहा है।

इस पंगु व्यवस्था के बीच प्रधानमंत्री का कहना है कि सरकार योजना आयोग के माध्यम से आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए नई योजनाएं बनाई जाएंगी। प्रधानमंत्री ने यह बात तो बड़ी सफाई से कह दी कि योजना बनाई जाएगी, किन्तु यह योजना कब बनेगी?, इसे अमली जामा कब पहनाया जाएगा? इस बारे में वे पूरी तरह से मौन ही रहे। मान लिया जाए कि आदिवासी क्षेत्र के लिए विकास की नई योजनाएं बनाई जाएंगी, किन्तु इस बात की गारंटी कौन लेगा कि जमीनी स्तर पर इस तरह की योजनाए एक बार फिर जनसेवकों, नौकरशाहों और ठेकेदारों का ग्रास नहीं बन पाएंगी।

प्रधानमंत्री को इस तरह की बात करने के पहले आत्मावलोकन करना चाहिए था। सबसे पहले उन्हें आदिवासी मामलों के मंत्री कांति लाल भूरिया को बुलाकर उनसे चर्चा करनी चाहिए थी कि देश भर में केंद्र पोषित कितनी योजनाएं अस्तित्व में हैं और उनकी जमीनी हकीकत क्या है? अगर प्रधानमंत्री एक दिन का समय निकालकर इन योजनाओं में केंद्रीय आवंटन और जमीनी हकीकत के ब्योरे पर नजर डालेंगे तो निश्चित तौर पर उनकी आंखे फटी की फटी रह जाएंगी।

मामला महज आदिवासी विकास विभाग का ही नहीं है। भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से ही स्वीकार किया है कि केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून बनाया पर आज देश के 45 लाख बच्चे स्कूल जाने से वंचित हैं। अगर हालात इस कदर हैं तो कानून बनाने का फायदा ही क्या है? केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही सारी योजनाओं मंे धांधलियों की खबरों से मीडिया अटा पड़ा है। सत्तर के दशक तक किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार की खबर छपना सामाजिक तिरस्कार का कारण बन जाता था। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के जनसेवकों के खिलाफ मीडिया चाहे जितना चिल्ला ले उनकी मोटी चमड़ी पर इसका कतई असर नहीं होता है।

आदिवासी बाहुल्य जिलों में सूबों के आदिवासी विकास विभाग, जिला, जनपद, ग्राम पंचायतें और राजस्व के अधिकारी मिलकर इन योजनाओं में आने वाले धन का बंदर बांट करते हैं। कागजों पर आदिवासियों की हालत अमेरिका या ब्रिटेन के नागरिकों से ज्यादा बेहतर है, किन्तु वास्तविकता कुछ और ही कहानी कहत नजर आती है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को कांग्रेस के ही पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी द्वारा दो दशक पहले कही गई बात को याद रखना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था कि वे जानते हैं कि केंद्र से भेजा जाने वाला एक रूपया गांव तक पहुंचते पहुंचते 15 पैसे में तब्दील हो जाता है।

वैसे भी केंद्र से मिलने वाली इमदाद बर्फ के मानिंद ही होती है। वह जितने हाथों में जाती है हाथ की गर्मी उसका कुछ अंश पिघला देती है, जिससे कुछ पानी हाथ में ही रह जाता है, फिर जब वह अंत में गंतव्य तक पहुंचती है, बर्फ का छोटा से टुकड़ा ही बचता है। समस्या कहीं और नहीं समस्या भारत के अपने सिस्टम में है। देश की लगभग सवा सौ करोड़ की आबादी में पच्चीस करोड़ लोगों के पास पैसा है, किन्तु अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग बस किसी तरह दिन काटने पर मजबूर हैं।

कुल मिलाकर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लाल किले की प्राचीर से जो संदेश देने का प्रयास किया है, वह एकदम अस्पष्ट है। देश पर राज करते हुए प्रधानमंत्री सिंह को यह सातवां साल है, फिर भी नक्सलवाद, माओवाद, अलगाववाद, के साथ ही साथ काश्मीर समस्या जस की तस खड़ी हुई है, क्या यह उनकी असफलता की दुहाई नहीं दे रही है? क्या देश की जनता लालकिले से यह सुनने के लिए ही जाती है कि अभी हम बातचीत करेंगे? यक्ष प्रश्न तो यह है कि आखिर देश के और कितने सपूत सुरक्षा बालों के जवान और निरीह लोगों की बली के बाद सरकार द्वारा कोई कदम उठाया जाना सुनिश्चित किया जाएगा?

पैरासिटामाल है खतरनाक

बिना डाक्टरी सलाह न लें पैरासिटामाल टेबलेट

शोध बताता है इससे हो सकता है अस्थमा

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 17 अगस्त। हल्का बुखार, थकान या दर्द की शिकायत होने पर युवाओं द्वारा अक्सर ही पैरासिटामाल टेबलेट का प्रयोग डाक्टरी सलाह के बिना ही कर लिया जाता है। ताजा शोध से पता चला है कि इस तरह का कृत्य नीम हकीम खतरे जान वाली कहावत को चरितार्थ कर सकता है। शोध बताता है कि अगर युवा नियमित तौर पर पैरासिटामाल का प्रयोग करते हैं तो उनमें अस्थमा होनी की आशंका बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इससे एलर्जी भी हो सकती है।

13 से 14 साल के लगभग तीन लाख किशोरों के उपर किए गए शोध से नतीजा चौंकाने वाला सामने आया है। अध्ययन में पता चला है कि जो किशोर महीने में कम से कम एक बार पैरासिटामाल गोली का प्रयोग करते थे उनमें अस्थमा होने की आशंका ढाई गुना ज्यादा हो जाती है। इतना ही नहीं शोधकर्ताओं का दावा है कि साल में एक बार पैरासिटामाल का प्रयोग करने वाले युवाओं को अस्थमा का खतरा पचास फीसदी ज्यादा हो जाता है।

‘‘अमेरिकी जर्नल ऑफ रेस्परेटरी एंड क्रिटिकल केयर मेडीसिन‘‘ में प्रकाशित इस सर्वे में रिसर्च स्कालर्स का कहना है कि अमूमन हल्के बुखार और दर्द के होने पर दर्दनाशक यह दवा प्रतिरोधक तंत्र में सीधे सीधे दखल दे देती है, जिससे श्वास नली में सूजल और जलन जैसी शिकायतें होने लगती हैं। इनका कहना है कि पैरासिटामाल का सेवन दुनिया भर में धडल्ले से किया जा रहा है।

0 फोरलेन विवाद का सच --------- 10

तत्कालीन कलेक्टर के आदेश के बाद उमड़ा था सिवनी वासियों में आक्रोश

सड़क बंद होने और छिंदवाड़ा से जाने की चर्चाओं का गर्मा गया था बाजार

पिछले साल जून में अचानक अवतरित हुआ था तत्कालीन कलेक्टर का आदेश

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली 17 अगस्त। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले का यह सौभाग्य ही माना जाएगा कि बड़े बड़े राजनेताओं के अथक प्रयासों के बावजूद भी उत्तर दक्षिण फोरलेन सड़क परियोजना के नक्शे से इस जिले का नामोनिशान नहीं मिट सका था। नेताओं ने एडी चोटी लगा दी कि इस परियोजना का एलाईंमेंट बदल दिया जाए किन्तु केंद्र सरकार ने एक न सुनी और इसका निर्माण आरंभ करवा दिया। सिवनी जिले में भी लखनादौन तहसील से नरसिंहपुर जिले की सीमा से लेकर जिला मुख्यालय सिवनी होकर महाराष्ट्र की सीमा तक इस सडत्रक का निर्माण करवाया जा रहा था।

अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में राजग सरकार की महात्वाकाक्षी योजना बन गई थी स्वर्णिम चतुर्भज फोरलेन परियोजना, जिसके तहत देश के चारों महानगरों को आपस में जोड़ा जाना प्रस्तावित था। इसी के साथ मुंबई को कोलकता और चेन्नई को नई दिल्ली से जोड़ने की गरज से उत्तर दक्षिण और पूर्व पश्चिम गलियारा बनाया जाना प्रस्तावित हुआ था। इस परियोजना में काम बहुत ही मंथर गति से चल रहा है। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायस्वाल ने संसद में लिखित उत्तर में कहा है कि 30 हजार करोड़ रूपए की लागत से बनने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना का काम छः साल पीछे चल रहा है।

बहरहाल पूर्व में इस मार्ग के निर्माण का काम युद्ध स्तर पर जारी भी किया गया है। वर्ष 2008 में दिसंबर माह में सिवनी जिले में एक नाटकीय मोड के तहत तत्कालीन जिला कलेक्टर सिवनी पिरकीपण्डला नरहरि ने आदेश क्रमांक 3266/फोले/2008 दिनांक 18 दिसंबर 2008 को जारी कर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय साधिकार समिति (सीईसी) के सदस्य सचिव के पत्र क्रमांक 1-26/सीईसी/एससी/2008 - पी 1 दिनांक 15 दिसंबर 2008 जिसे सीईसी ने मुख्य सचिव मध्य प्रदेश शासन को लिखा था के हवाले से काम रूकवा दिया था।

जिला कलेक्टर के उक्त पत्र में सीईसी ने नेशनल हाईवे नंबर सात के चोडीकरण कार्य (न कि उत्तर दक्षिण फोरलेन गलियारा) में ग्राम मोहगांव से खवासा तक पेंच टाईगर रिजर्व से लगे वन क्षेत्र और गैर वन क्षेत्रों में की जारी वृक्षों की कटाई पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अगामी आदेश तक रोक लगाने का अनुरोध करना भी उल्लेखित किया गया है। जिला कलेक्टर सिवनी ने अपने उक्त आदेश में इस प्रत्याशा के साथ कि राज्य शासन द्वारा इस मामले में अभी निर्देश प्राप्त होना है, उन समस्त आदेशों को जो कलेक्टर कार्यालय सिवनी द्वारा इस संबंध में पूर्व में जारी किए गए थे, को स्थगित कर दिया था। इसके उपरांत क्या राज्य शासन द्वारा इस मामले में कोई निर्देश दिए हैं या फिर नहीं इस मामले में जिला प्रशासन सिवनी ने अपना मुंह सिल रखा है।

मजे की बात तो यह है कि कलेक्टर सिवनी का दिसंबर 2008 का यह आदेश जुलाई 2009 में प्रायोजित तरीके से सिवनी की फिजां में तैराया गया। दिसंबर 2008 से जुलाई 2009 तक यह आदेश कैसे दबा रह गया यह बात आज भी यक्ष प्रश्न की भांति ही खडी हुई है। जुलाई 2009 में यह आदेश क्यों सामने लाया गया, यह भी एक पहेली ही बना हुआ है। आश्चर्यजनक तथ्य तो यह उभरकर सामने आया है कि जिला कलेक्टर के 18 दिसंबर 2008 के इस आदेश की प्रतिलिपि मुख्य सचिव म.प्र.शासन, मुख्य वन संरक्षक सिवनी, प्रोजेक्ट डायरेक्टर एनएचएआई, सिवनी, संबंधित विभागों के साथ ही साथ जिला जनसंपर्क अधिकारी कार्यालय सिवनी को सभी स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशन के लिए प्रेषित किया गया था।

जब यह बात सिवनी की फिजां में तैरी वैसे ही लोगों के अंदर रोष और असंतोष पनपना आरंभ हो गया। अफवाहें तबियत से गरमा चुकी थीं उस वक्त। कोई कहता सड़क बंद हो जाएगी तो कोई इसे कमल नाथ का षणयंत्र बताकर अपनी राग अलाप देता। लोगों का गुस्सा किस दिशा में जा रहा था, इस बात को कोई भी नहीं समझ पा रहा था। इसी बीच शहर के कुछ उत्साही युवाओं ने लोगों को एक सूत्र में पिरोने की ठानी।

(क्रमशः जारी)