शनिवार, 11 जून 2011
शुक्रवार, 10 जून 2011
कमल नाथ ने क्षत्रपों को पछाड़ा
कमल नाथ ने क्षत्रपों को पछाड़ा
संपत्ति के मसले में अव्वल रहे कमल नाथ
नई दिल्ली (ब्यूरो)। घपलों और घोटालों से घिरी संप्रग सरकार के प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह ने अब अपनीछवि चमकाने का प्रयास आरंभ कर दिया है। इसी तारतम्य में उन्होंने पारदर्शिता के तहत अपनी संपत्तिवित्तीय वर्ष 2009 - 2010 तक की) सार्वजनिक कर दी है। प्रधानमंत्री के निर्देश पर मध्य प्रदेश में चार में सेमहज कमल नाथ ने ही अपनी संपत्ति सार्वजनिक कर खुद को पाक साफ दिखाने का सराहनीय प्रयास किया है। (
पीएमओ की वेब साईट पर डली जानकारी के अनुसार कमल नाथ और उनके परिजनों ने 23 कंपनियों मेंनिवेश किया है। स्पान मोटल्स, स्पान एयर प्राईवेट लिमिटेड, स्पान एग्रो प्रोपर्टीज, स्पान प्लांटेशन, स्पान बीचरिसोर्टस, ईएमसी अलाय आदि में उनका निवेश है। इसके अलावा दिल्ली के सुल्तानपुर में दो करोड़ 67 लाखरूपए की जमीन एवं बैंक खाते में लगभग एक करोड़ 41 लाख रूपए जमा हैं। कमल नाथ की पत्नि एवं पूर्वसांसद अलका नाथ के पास दो करोड़ 30 लाख रूपए की संपत्ति एवं पुत्र नकुल एवं बकुल के अलावा पुत्रवधू के 20 से ज्यादा कंपनियों में शेयर हैं।
कमल नाथ के अलावा मध्य प्रदेश कोटे से मंत्री बने ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांति लाल भूरिया एवं अरूणयादव ने इस मामले में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है। घोषित की गई संपत्ति में प्रधानमंत्री के पास स्टेट बैंकआॅफ इंडिया में दो करोड़ 70 लाख के फिक्स डिपाजिट, चंडीगढ़ में नब्बे लाख का मकान, दिल्ली के मंहगेरिहाईशी इलाके बसंत कुंज मंे अठ्ठयासी लाख का एक फ्लेट है।
अन्य मंत्रियों की घोषित संपत्ति करोड़ों में है। रक्षा मंत्री ए.के.अंटोनी मनमोहन सरकार के सबसे गरीब मंत्री हैं, जिनके पास एक लाख से कम की सेविंग है। पत्नि के नाम एक मकान और प्लाट जिनकी कीमत तीस लाखरूपए है के अलावा सेकंड हेण्ड वेगन आर कार है जिसके लिए उन्होंने बैंक से एक लाख 36 हजार का ऋण भीलिया है।
गेंहूं पर भण्डारण का खतरा: एक साल का अग्रिम अनाज मांगा शिवराज ने
गेंहूं पर भण्डारण का खतरा: एक साल का अग्रिम अनाज मांगा शिवराज ने
नई दिल्ली (ब्यूरो)। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने मध्य प्रदेश में गेंहूं के रिकार्ड उत्पादन का जिक्र करते हुएप्रधानमंत्री से कहा है कि गेंहूं का उचित भण्डारण अगर नहीं किया गया तो बारिश में गेंहू सड़ सकता है, इसलिएएक साल का अग्रिम अनाज एमपी को दे दिया जाए जिससे गरीबों में इसे बांटा जा सके। एक तरफ तो शिवराजगेंहूं के भण्डारण की समस्या बता रहे हैं, दूसरी तरफ एक साल का अग्रिम गेंहूं कहां रखेंगे, उसका भण्डारण कैसेहोगा, यह शोध का ही विषय माना जा रहा है।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह से मुलाकात कर प्रदेश में गेहूंके भण्डारण के लिए पर्याप्त जगह न होने के कारण हो रही समस्या को रेखांकित किया। श्री चैहान ने प्रधानमंत्रीको बताया कि इस वर्ष गेहूं की प्रदेश में रिकार्ड फसल हुई है और 49.4 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उपार्जन कियागया है, लेकिन पर्याप्त गोदाम न होने के कारण ज्यादातर गेहूं खुले में पड़ा है जिससे उसके खराब होने कीसंभावना है। अगर वर्षा से पहले इसका सही भण्डारण नहीं किया गया तो यह गेहूं खराब हो जाएगा।
श्री चैहान ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि केन्द्र सरकार गेहूं का प्रदेश को एक साल का अग्रिम आवंटन कर देजिससे कि भण्डारण की समस्या हल भी हो जायेगी और राज्य सरकार गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालेपरिवारों को तीन रुपये किलो की दर से अनाज उनमें बांट देगी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवालादेते हुए कहा कि अनाज को किसी भी हालात में सड़ने अथवा बेकार नहीं होने दिया जाय। इससे अनाज का भीसही उपयोग हो पायेगा और साथ ही जरूरतमंदों को भी सस्ते दाम पर अनाज मिल पायेगा। उन्होंने कहा किगेहूं को भारतीय खाद्य निगम भण्डारण कर ले।
श्री चैहान ने प्रधानमंत्री को बताया कि केन्द्र के मापदंडों के अनुसार मध्यप्रदेश में 41 लाख गरीबी रेखा के नीचेपरिवार हैं। सुरेश तेंडुलकर की रिपोर्ट के अनुसार भी प्रदेश में 48 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचेजीवन-यापन कर रहे हैं। श्री चैहान ने कहा कि राज्य सरकार के अनुसार 67 लाख परिवार इस समय गरीबीरेखा के नीचे हैं।
श्री चैहान ने अनुरोध किया कि केन्द्र सरकार शीघ्रतिशीघ्र निर्णय लेकर अगले वर्ष का अग्रिम अनाज का कोटाआवंटित करें जिससे अनाज के भण्डारण की भी समस्या का निवारण होगा और साथ ही गरीबी रेखा के नीचेरहने वाले परिवारों को सस्ते दाम पर राज्य सरकार गेहूं वितरित कर पायेगी।
प्रधानमंत्री डाॅ मनमोहन सिंह ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और इस संबंधमें हरसंभव सहायता देने का आश्वासन दिया।
गुरुवार, 9 जून 2011
गेंहू के सुरक्षित भंडारण की मांग की मुख्यमंत्री ने
गेंहू के सुरक्षित भंडारण की मांग की मुख्यमंत्री ने
नई दिल्ली (ब्यूरो)। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने आज यहां केन्द्रीय खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति, उपभोक्ता मामले एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली मंत्री प्रो0 के0 व्ही0 थामस, उर्वकर मंत्री जैना एवं भूतल परिवहन मंत्री सी.पीजोशी से भेंट की।
श्री चैहान ने श्री थामस को बताया कि मध्यप्रदेश में इस वर्ष 49 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूं का समर्थन मूल्य पर उपार्जन किया गया है। अगले वर्ष 62 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूं का समर्थन मूल्य पर उपार्जन होने की संभावना है। अभी गेहूं खुले में रखा हुआ है इसे अन्य राज्यों में भेजने की व्यवस्था की जाए। लगभग 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं खुले में रखा है जिसके सुरक्षित भण्डारण की आवश्यकता है । श्री चैहान ने प्रदेश में 30 लाख मीट्रिक टन अनाज के भण्डारण की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता बतायी। खुले में रखे हुए गेहूं को बरसात होने के पूर्व सुरक्षित भण्डारण की आवश्यकता है अन्यथा बरसात में गेहूं खराब हो सकता है। लगभग 18 लाख मीट्रिक टन गेहूं खुले में रखा हुआ है।
श्री चैहान ने श्री थामस को बताया कि प्रदेश में वेयरहाउसिंग बनाने के लिए जमीन उपलब्ध कराई जायगी । केन्द्र सरकार वेयरहाउसिंग के निर्माण के लिए प्रदेश को आवश्यक धनराशि भी उपलब्ध कराये।
केन्द्रीय मंत्री श्री थामस ने मुख्यमंत्री श्री चैहान को आश्वस्त किया कि मध्यप्रदेश में उपलब्ध गेहूं को सुरक्षित रूप से अन्य राज्यों को भेजा जायेगा। मध्यप्रदेश में उपलब्ध गेहूं को अन्य देशों को निर्यात करने के लिए भी भेजा जा रहा है। नाबार्ड की मदद से प्रदेश में 30 लाख मीट्रिक टन भण्डारण क्षमता के गोदाम बनाने के प्रयास किये जायंगे। राज्य में ग्रामीण भण्डारण के रूप में भण्डार गृह तैयार किये जाएं। मुख्यमंत्री श्री चैहान की मांग के अनुरूप उन्होंने चार माह का अग्रिम आवंटन बीपीएल परिवारों के लिए अग्रिम रूप से दिये जाने की सहमति जतायी। श्री थामस ने गेहूं के संग्रहण के लिए किसानों को राशि का भुगतान सीधे उनके खाते में किये जाने के लिए बधाई दी। श्री थामस ने सुझाव दिया कि अस्थायी रूप से भण्डारण की व्यवस्था की जाय जिससे गेहूं खराब नहीं हो। मुख्यमंत्री श्री चैहान ने श्री थामस को बताया कि प्रदेश में वन समितियों के माध्यम से सार्वजनिक वितरण प्रणाली का भी प्रयास किया जा रहा है। प्रदेश के पांच जिलों में राशन कार्डों को यू आई डी से लिंक किया जा रहा है जिससे बीपीएल के परिवारों को सही रूप से राशन उपलब्ध हो सके। श्री चैहान ने श्री थामस से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए एक लाख मीट्रिक टन चावल के बदले में आवश्यकतानुसार गेहूं आवंटित किये जाने का आग्रह किया।
इसके उपरांत मुख्यमंत्री ने केन्द्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री श्रीकांत जेना से भेंट की। श्री चैहान ने श्री जेना से अनुरोध किया कि प्रदेश में सोयाबीन का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रदेश की जरूरत के अनुसार दो लाख 70 हजार मीट्रिक टन डीएपी खाद शीघ्र उपलब्ध करायी जाए। 15 जून से 30 जुलाई का समय सोयाबीन की बुवाई का होता है। उस समय डीएपी खाद की अत्यंत आवश्यकता होती है। श्री चैहान ने बताया कि दो लाख 70 हजार मीट्रिक टन डीएपी की जरूरत की तुलना में प्रदेश को एक लाख 45 हजार मीट्रिक टन का आवंटन किया गया है। इसमें से अभी केवल 62 हजार मीट्रिक टन डीएपी प्राप्त हुआ है।
केन्द्रीय मंत्री श्री जेना ने श्री चैहान को बताया कि प्रदेश में खाद्यान उत्पादन की स्थिति को देखते हुए प्रदेश को आवश्यकतानुसार डीएपी और अन्य खाद उपलब्ध करायी जाएगी । 82 हजार मीट्रिक टन डीएपी खाद 25 जून तक उपलब्ध करा दी जाएगी। प्रदेश को और जितनी खाद की आवश्यकता होगी केन्द्र सरकार प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराएगा । श्री जेना ने गेहूं के समर्थन मूल्य पर खरीदी पर किसानों को बोनस दिये जाने और भुगतान की राशि सीधे किसानों के खाते में जमा किये जाने के लिए श्री चैहान की सराहना की।
प्रदेश की जर्जर सडकों के मसले में सीएम ने केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री डाॅ. सी.पी.जोशी से भेंट की। श्री चैहान ने श्री जोशी का ध्यान आकर्षित किया कि एनएचएआई के पास 1250 किलोमीटर लम्बाई के सात मार्गों के निर्माण के कार्य की जिम्मेदारी है किन्तु अभी तक इनके कार्य में कोई प्रगति नहीं है। मध्यप्रदेश रोड डेवलेपमेंट कारपोरेशन के पास 700 किलोमीटर लम्बाई की 8 सड़कों के निर्माण की जिम्मेदारी है इनमें से 7 सड़कों के डीपीआर बनाकर भारत सरकार को बनाकर भेज दिये गये हैं। इनमें से एक ग्वालियर-भिण्ड मार्ग की स्वीकृति प्राप्त हुई। श्री चैहान ने डाॅ. जोशी से 7 सड़कों की स्वीकृति शीघ्र दिये जाने और इसके लिए राशि दिये किये जाने का आग्रह किया है।
श्री चैहान ने बताया कि इंटर स्टेट कनेक्टविटी की योजना के अंतर्गत 11 सड़कों का निर्माण किया जाना है जिस पर 140 करोड़ रूपये की लागत आएगी। इसी प्रकार केन्द्रीय सड़क निधि (सीआरएफ) के अंतर्गत वर्ष 2009-10 और 2010-11 के दौरान स्वीकृत कार्यों को पूरा करने के लिए आवंटन उपलब्ध कराने का आग्रह किया।
श्री जोशी ने इंटर स्टेट कनेक्टविटी की योजना के अंतर्गत 140 करोड़ रूपये शीघ्र स्वीकृत किये जाने का आश्वासन दिया। अन्य मदों से भी प्रदेश को राशि उपलब्ध करायी जाएगी।
कब तक कीटनाशक पिलाएगी सरकार!
कब तक कीटनाशक पिलाएगी सरकार!
(लिमटी खरे)
शीतल पेय के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बार बार की जाने वाली टिप्पणियां दर्शाती हैं कि बड़े व्यापारिक घरानों और कंपनियों की गड़बडि़यों के खिलाफ कार्यवाही करने में सरकार का रवैया किस कदर टालमटोल भरा होता है। सात साल पहले एक याचिका के जरिए ठंडे पेयों की बिक्री के लिए गुणवत्ता जांच और नियम तय करने की मांग की गई थी, उसके पूर्व विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) ने अपने एक प्रतिवेदन में इस बात का खुलासा किया था कि इन पेय में किस खतरनाक हद तक कीटनाशकांे को मिलाया जा रहा है। इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी ठंडे पेय के एक विशेष ब्रांड के खिलाफ जेहाद छेड़ी थी, पर उनकी यह लड़ाई अब भ्रष्टाचार के शोर में दबकर रह गई है। कई दिनों से बाबा रामदेव ने भी ठंडे पेय के बारे में कोई वक्तव्य नहीं दिया है जो कि आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। गनीमत है कि भारत में बनने वाली दवाओं में इस्तेमाल होने वाले रसायनों के लिए मानकीकरण का काम पांच सालों बाद आरंभ हो ही गया है।
(लिमटी खरे)
शीतल पेय के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बार बार की जाने वाली टिप्पणियां दर्शाती हैं कि बड़े व्यापारिक घरानों और कंपनियों की गड़बडि़यों के खिलाफ कार्यवाही करने में सरकार का रवैया किस कदर टालमटोल भरा होता है। सात साल पहले एक याचिका के जरिए ठंडे पेयों की बिक्री के लिए गुणवत्ता जांच और नियम तय करने की मांग की गई थी, उसके पूर्व विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) ने अपने एक प्रतिवेदन में इस बात का खुलासा किया था कि इन पेय में किस खतरनाक हद तक कीटनाशकांे को मिलाया जा रहा है। इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी ठंडे पेय के एक विशेष ब्रांड के खिलाफ जेहाद छेड़ी थी, पर उनकी यह लड़ाई अब भ्रष्टाचार के शोर में दबकर रह गई है। कई दिनों से बाबा रामदेव ने भी ठंडे पेय के बारे में कोई वक्तव्य नहीं दिया है जो कि आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। गनीमत है कि भारत में बनने वाली दवाओं में इस्तेमाल होने वाले रसायनों के लिए मानकीकरण का काम पांच सालों बाद आरंभ हो ही गया है।
इक्कीसवीं सदी में स्वयंभू योग गुरू बनकर उभरे राम किशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने कोल्ड ड्रिंक के एक ब्रांड विशेष का नाम लेकर उसे ‘टायलेट क्लीनर‘ की संज्ञा तक दे डाली थी। इस पर देशव्यापी बहस भी छिड़ गई थी। जब देश के अनेक हिस्सों में उक्त ब्रांड के कोल्ड ड्रिंक ने कीटनाशक और वाकई में संडास की सफाई का काम किया तो लोगों की आंखें ख्ुाली और सरकार की तंद्रा भी टूटी थी। लोगों ने मंहगे टायलेट क्लीनर के स्थान पर उक्त शीतल पेय को अजमाया और कारगर पाया। इतना ही नहीं फसलों पर भी इसके छिड़काव के अच्छे प्रतिसाद सामने आए थे।
भारत गणराज्य की विडम्बना तो देखिए, बाजार में बिक रहे शीतल पेय में कीटनाशक की मिलावट का मामला सामने आने के सात सालों के बीत जाने के बाद भी सरकार ने इनके मानक तय नहीं किए हैं। जाहिर है शीतल पेय कंपनियों के ‘भारी और उपरी दबाव‘ के चलते देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) में सत्ता और विपक्ष में बैठने वाले सरपंच (प्रधानमंत्री) और पंच (सांसद) अपनी रियाया के साथ ही साथ अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह उदासीन ही नजर आ रहे हैं।
सबसे अधिक आश्चर्य जनक और चैंकाने वाली बात तो यह है कि पश्चिमी सभ्यता को अंगीकार करने वाले हमारे देश के युवा इस बात को भूल जाते हैं कि देश में बिक रहे पेय पदार्थों में कीटनाशक की मात्रा यूरोपीय मानकों से एक दो या दस बीस नहीं वरन् 42 फीसदी अधिक पाई गई है। इसके लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति ने भी सरकार से जल्द से जल्द शीतल पेय संबंधी मानक तय कर उसे लागू करने की पुरजोर सिफारिश की थी। अब लगभग सात साल बीत चुके हैं किन्तु जल्द से जल्द का समय अभी भी नहीं आ सका है।
इस समिति ने अपना प्रतिवेदन सात साल पूर्व फरवरी 2004 को संसदीय पटल पर रख दिया था। किसी ज्ञात आज्ञात उपरी दबाव में एक बार फिर यह प्रतिवेदन फाईलों के अंदर चला गया। इसके बाद मार्च 2007 में एन.के.गांगुली की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञों की समिति ने केंद्र सरकार से कहा था कि शीतल पेय विशेषकर कोला के उत्पादों में कीटनाशक की मात्रा के मानक अवश्य ही लागू किए जाएं। उस वक्त केंद्र सरकार ने एक झुनझुना थमाते हुए अप्रेल 2009 तक मानक लागू करने का लक्ष्य निर्धारित किया था।
फरवरी 2003 में पहली बार कोला उत्पादों में कीटनाशक के मिले होने की बात को सामने लाने वाली संस्था ‘सेंटर फाॅर साईंस एण्ड एन्वायरमेंट‘ भी इस बात से खासी खफा है कि बात के सामने आने के बाद भी सरकार का रवैया ढुल मुल ही है। मजे की बात तो यह है कि सरकार अपने पंचों अर्थात सांसदांे की सेहत के प्रति तो फिकर मंद दिखाई पड़ रही है, यही कारण है कि संसद में शीतल पेय की आपूर्ति पर रोक लगा दी है किन्तु देश की रियाया के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हुए इसे बाजार में बिकने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है।
यहां उल्लेखनीय होगा कि सीएसई ने पिछले साल देश के अलग अलग हिस्सांे से कोका कोला और पेप्सी के ग्यारह विभिन्न ब्रांड के सत्तावन नमूने लिए थे। इसकी जांच से साफ हो गया था कि इनमें मिले खतरनाक तत्वों की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो के निर्धारित मापदण्ड से पच्चीस गुना अधिक थीं। चिकित्सकों की मानें तो ये तत्व शरीर की प्रतिरोधिक क्षमता को कम करके अनेक तरह की गंभीर बीमारियों का कारक हो सकते हैं।
लंबा अरसा बीत चुका है, साल दर साल कलेंडर के पन्ने फड़फड़ाते हुए बदलते गए किन्तु शीतल पेय में मानकों की बात जस की तस ही रही। इन सात से अधिक सालों में केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने देश के सवा करोड़ लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करना भी मुनासिब नहीं समझा है। हो सकता है इन शीतल पेय कंपनियों ने हमारे जनादेश प्राप्त जनसेवकों को मंुह बंद रखने के लिए भारी भरकम वजन रखा हो, किन्तु नेताओं को अपनी नैतिकता की वर्जना ता कम से कम याद रखनी चाहिए। हमें यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि भारत गणराज्य की सरकार द्वारा इन शीतल पेय बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगे घुटने टेके जा चुके हैं।
स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव के कथन से अनेक लोग प्रभावित हुए। उनहोंने अपने शौचालयों में लेट्रिन की सीट और टाईल्स को कोका कोला वाले शीतल पेय से साफ करके इसका चमत्कारिक असर देखा। फिर क्या था मंहगे टायलेट क्लीनर के स्थान पर लोगों के घरों में कोका कोला की सस्ती दो लीटर वाली बोतल ने अपना स्थान बना लिया। यह अलहदा बात है कि पेप्सी से भी टायलेट साफ हो सकता है किन्तु बाबा रामदेव तो कोका कोला मतलब टायलेट क्लीनर का नारा जो रट रहे थे। देश के अनेक स्थानों में किसानों ने भी काले रंग वाले कोका कोला का छिड़काव कीटनाशक के स्थान पर किया, ओर पाया कि वाकई उनकी फसलें कीट पतंगों से सुरक्षित थीं।
यहां एक स्थानीय चेनल द्वारा शराब की बुराई को दर्शाने वाले जनहित में जारी विज्ञापन का जिकर लाजिमी होगा। उस विज्ञापन में शराबी बेटे की लत छुड़ाने की गरज से उसके पिता द्वारा शराब पीने के दौरान शराब के गिलास में एक कीड़ा डाल दिया जाता है। पिता कहता है देखा बेटा शराब पीने से इस तरह मर जाते हैं। बेटा भी इक्कीसवीं सदी का था, सो तपाक से बोला -‘‘पिता जी, शराब इसलिए ही पीता हूं कि पेट के सारे कीड़े मर जाएं।‘‘
जब संयुक्त संसदीय समिति ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि देश में बिकने वाले शीतल पेय मंे कीटनाशक की मात्रा अंतर्राष्ट्रीय मानकांे से कई गुना अधिक है, और संसद तक में इसकी आपूर्ति रूकवा दी गई है, तब क्या कारण है कि देश की सवा करोड़ से अधिक जनता को इस धीमे जहर के जरिए मारा जा रहा है?
शीतल पेय कंपनियां भी बड़े मजे से कह रहीं है कि अगर सरकार शीतल पेय के अंतिम उत्पाद तक मानक लागू करती है तो वे इसका स्वागत करेंगी। यह बात सरकार को मुंह चिढ़ाने के लिए पर्याप्त है, किन्तु सरकार में बैठे हमारे मोटी चमड़ी वाले जनसेवकों को इससे लेना देना नहीं है। सरकार के पास असीमित अधिकार हैं। क्या सरकार यह कहकर इनकी बिकावली नहीं रूकवा सकती कि अंतिम उत्पाद तक तो हम बाद में जाएंगे, पहले जिसमें साबित हो चुका है, उसे रोका जाए।
सुकून की बात तो यह है कि भारत गणराज्य मंे बनाई जाने वाली जीवन रक्षक औषधियांे में प्रयोग में आने वाले रसायनों पर देश नहीं विदेशों में मचे धमाल के बाद भारत सरकार जागी और पांच साल पहले इनके मानकीकरण का काम आरंभ किया गया। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण महकमे का यह दायित्व है कि वह इस बात को जांचे कि दवा मंे डाले गए तत्वों की मात्रा और स्तर क्या है? इसके अलावा इसका मानव जीवन पर प्रतिकूल असर तो नहीं पड़ रहा है। सरकार ने यह भी तय किया था कि अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के उपरांत ही दवाओं को विदेश भेजने की अनुमति दी जाएगी।
विदेश भेजने का मामला तो समझ में आता है किन्तु फिर यक्ष प्रश्न वही खड़ा हुआ है कि देशी ब्रांड क्या देश के नागरिकों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर नहीं डाल रहे हैं? सूचना के अधिकार में इस बात का खुलासा हुआ कि देश के बाजारों में खुलेआम बिकने वाली दवाओं में अल्कोहल, मरकरी, लेड और आर्सेनिक जैसे तत्वों की भरमार है। मजे की बात तो यह है कि जिन दवाओं को विदेशों ने अपने देश में प्रतिबंधित कर रखा है, उन दवाओं का आयात भारत गणराज्य की सरकार ने करने की खुली छूट प्रदान कर रखी है। औषधि निरीक्षक और ड्रग कंट्रोलर सिर्फ पैसा बनाने में लगे हुए हैं। देश में वे दवाएं खुलेआम बिक रही हैं, जिन्हें चिकित्सक की परामर्श पर्ची के बिना बेचा जाना प्रतिबंधित है। लोग नशे के लिए सस्ते इंजेक्शन बेरोकटोक खरीद रहे हैं।
सरकार द्वारा सरेराह जनता के स्वास्थ्य के साथ होते खिलवाड़ को देखा जा रहा है। सरकार द्वारा अपने सांसद भाईयों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर शीतल पेय की आपूर्ति संसद में रूकवा दी है, किन्तु देश भर मंे खुले आम बिक रही इस धीमी गति की मौत को रोकने की दिशा मंे सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाए हैं। जब देश में विशाल जनादेश लेकर रियाया की भलाई अमन चैन का सपना दिखाकर संसद मंे सत्ता की मलाई चखने वाले तथा विपक्ष में बैठकर पहरेदारी करने वाले जनता की ओर से मुंह मोड़ लें तो इस तरह की विदेशी और देशी कंपनियां अपने फायदे के लिए सरेराह देश की जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करें तो क्या करें?
भूजल सहेजने में फिसड्डी है मध्य प्रदेश
भूजल सहेजने में फिसड्डी है मध्य प्रदेश
केंद्र ने 1970 में भेजा था राज्यों को माडल कानून
आने वाले समय में पेयजल होगा दूभर
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। भूजल के गिरते स्तर पर केंद्र सरकार चिंतित नजर आ रही है। उधर मध्य प्रदेश सहित सभी राज्यों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लागू न होने से आने वाले समय में लोगों को पीने का पानी भी मयस्सर नहीं होने वाला है। केंद्र सरकार ने चार दशक पूर्व 1970 मंे एक माडल कानून बनाकर राज्यों को भेजा था, किन्तु राज्यों ने इसकी सुध तक नहीं ली।
केरल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू सहित सात राज्यों में भूजल प्राधिकरण का गठन अवश्य किया है, उधर महाराष्ट्र और गुजरात में विधानसभा में विधेयक अवश्य पारित करवा दिया गया है किन्तु इसे लागू नहीं किया गया है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड, कर्नाटक सहित अन्य राज्यों में भूजल के संरक्षण के लिए कानून बनाने की दिशा में कोई कारगर पहल नहीं की गई है।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा 1970 में एक माडल कानून बनाकर राज्यों को भेजा था कि वे अपनी जरूरत के मुताबिक इसमें संशोधन कर इसे लागू करें। इसके बाद इसी कड़ी में केंद्र सरकार द्वारा 1992, 1996, 2005 और 2006 में कांग्रेस के शासनकाल में विधेयक का माडल पुनः भेजा किन्तु राज्यों की लाल फीताशाही में यह दबकर ही रह गया। केंद्र सरकार द्वारा ‘राजीव गांधी जलग्रहण मिशन‘ भी आरंभ करवाया गया, जिसमें भी पलीता ही लग गया।
जानकरों का मानना है कि अगर समय रहते राज्यों की सरकारों द्वारा रूफ टाप रेन वाटर हार्वेस्टिंग को प्रोत्साहित नहीं किया गया तो आने वाले समय में भूमिगत जल की रीचार्जिंग एक बड़ी समस्या बनकर उभर सकती है। वस्तुतः स्थानीय निकायों द्वारा इस योजना को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए, साथ ही नए भवनों की अनुज्ञा इसी शर्त पर प्रदान की जानी चाहिए कि भवन स्वामी द्वारा भवन निर्माण के साथ ही इसे अमली जामा पहनाएगा।
रेल का प्रेम नहीं छूट रहा ममता से
रेल का प्रेम नहीं छूट रहा ममता से
सुरक्षा का जिम्मा राज्य पुलिस के बजाए रेल पुलिस के हवाले
नई दिल्ली (ब्यूरो)। पश्चिम बंगाल की नई निजाम ममता बनर्जी ने भले ही रेल मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया हो पर उनका रेल्वे का प्रेम अभी छूटता नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि ‘जेड‘ श्रेणी की सुरक्षा पाने के बाद भी वे आज भी राज्य के पुलिस बल के बजाए रेल्वे के कमांडो से घिरी हुई हैं।
रेल मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि ममता बनर्जी की सुरक्षा में रेल्वे प्रोटेक्शन फोर्स के सत्तर कमांडो आज भी तैनात है। इसके पहले भी जब रेल मंत्री रहते हुए ममता बनर्जी ने अगस्त 2010 में लालगढ़ में प्रदर्शन किया था तब भी उनकी सुरक्षा के लिए आरपीएफ की एक पूरी टुकड़ी तैनात की गई थी।
पालीथिन उड़ रही हैं त्रिकुटा की पहाड़ी में
अव्यवस्था के साए में वेष्णो देवी यात्रा . . . 2
पालीथिन उड़ रही हैं त्रिकुटा की पहाड़ी में
दस माईक्रोन से कम की बरसाती मिल रही है 20 रूपए में!
भवन के पास उड़ रहा नियम कायदों का मजाक
(सी.एस.जोशी)
दर्शन को आए श्रृद्धालुओं ने बताया कि बारिश होने पर पानी से बचने के लिए जब लोगों द्वारा माता रानी के भवन के पास की दुकानों पर बरसाती मांगी जाती है तो दुकानदारांे द्वारा उन्हें महज बीस रूपए मूल्य चुकाने पर पतली सी महीन बरसाती सौंप दी जाती है। इस बरसाती में उपयोग किए जाने वाला प्लास्टिक दस माईक्रोन से कम का ही प्रतीत होता है।
बरसाती इतनी पतली होती है कि दर्शन के लिए उपर चढ़ते या उतरते समय ही यह फट जाती है। श्रृद्धालुओं द्वारा इस फटी बरसाती हो त्रिकुटा पर्वत पर ही फंेक दिया जाता है, जो तेज हवा में यत्र तत्र उड़ती दिखाई पड़ जाती है। अव्यवस्था के साए में चलने वाली इस यात्रा में इस तरह की गंभीर लापरवाही से त्रिकुटा पर्वत और आधार केम्प कटड़ा का पर्यावरण बिगड़े बिना नहीं है।
शिवराज ने की देशमुख से भेंट
शिवराज ने की देशमुख से भेंट
नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने आज यहां केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख से भेंट की। इस अवसर पर ग्रामीण विकास राज्य मंत्री सुश्री अगाथा संगमा भी उपस्थिति थीं। मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश के 1000 से कम आबादी वाले गांवों को ग्रामीण सड़क से जोड़ने के लिए नीतिगत निर्णय लेने का आग्रह किया। श्री चैहान ने बताया कि आदिवासी अंचलों में 1000 की आबादी से कम वाले गांव हैं इन्हें जोड़ने के लिए मापदंडों को शिथिल किया जाए। प्रदेश के अभी 24000 गांवों को ग्रामीण सड़कों से जोड़ा जाना है। मध्यप्रदेश को विगत डेढ़ साल में एक भी नई सड़कें स्वीकृत नहीं की गयी हैं।
श्री चैहान ने बताया कि प्रदेश में ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए इंजीनियर और शासकीय अमला उपलब्ध है किन्तु अमला सड़क निर्माण के अभाव में कोई काम नहीं कर पा रहे हंै। श्री देशमुख ने मुख्यमंत्री श्री चैहान को आश्वस्त किया कि राज्य के पिछड़ेपन को देखते हुए ग्रामीण सड़क निर्माण के कार्य स्वीकृत किये जायंगे। श्री देशमुख ने आश्वस्त किया कि प्रदेश में लगभग 900 करोड़ रूपये के निर्माण कार्यों के लिए स्वीकृति दी जायंगी। इनमें एडीबी के अंतर्गत ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए 600 करोड़ रूपये और अन्य परियोजनाओं के अंतर्गत लगभग 300 करोड़ रूपये की राशि स्वीकृत की जायेगी। श्री देशमुख ने प्रदेश में प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत लक्ष्य से अधिक सड़क निर्माण के लिए श्री चैहान को बधाई दी। श्री देशमुख ने प्रदेश में अन्य ग्रामीण विकास के कार्यों में गुणवत्ता की भी सराहना की।
मुख्यमंत्री श्री चैहान ने श्री देशमुख का ध्यान आकर्षित किया कि प्रदेश में 37 लाख ग्रामीण आवासहीन परिवार हैं जबकि प्रदेश को केवल 37 हजार इंदिरा आवास स्वीकृत किये गये हैं। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री आवास योजना के अंतर्गत भी ग्रामीण आवासहीन परिवारों को 70 हजार रूपये की सहायता देकर मकान बनाये जा रहे हैं। प्रदेश में ग्रामीण आवासहीन परिवारों के मापदंड में सुधार किया जाए जिससे प्रदेश के गरीब परिवारों को अधिक संख्या में आवास उपलब्ध कराये जा सकें। योजना आयोग ने भी मापदंड में सुधार करने का आश्वासन दिया था। श्री देशमुख ने आवास निर्माण की योजना में अपने स्तर पर अच्छा काम करने के लिए मध्यप्रदेश की सराहना की।
श्री चैहान ने मनरेगा के अंतर्गत होने वाले निर्माण कार्यों को स्थायी रखने के लिए मजदूरी और सामग्री में 60-40 प्रतिशत के अनुपात के बजाय सामग्री और मजदूरी 50-50 प्रतिशत के अनुपात में राशि व्यय करने का नीतिगत निर्णय लिया जाए इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी सम्पत्तियों का निर्माण हो सकेगा। श्री देशमुख ने इस संबंध में नीतिगत निर्णय लेने का आश्वासन दिया।
श्री चैहान ने बताया कि मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी का भुगतान लेने के लिए श्रमिकों को 25 से 30 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। मजदूरी के भुगतान के लिए एक हजार की आबादी पर बैंक अथवा पोस्ट आॅफिस खोला जाए जिससे मजदूरों को पारिश्रमिक का आसानी से भुगतान मिल सके। श्री देशमुख ने श्रमिकों को आसानी से भुगतान मिल सके इस संबंध में व्यवस्था कराने का आश्वासन दिया।
श्री चैहान ने बताया कि प्रदेश में ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए इंजीनियर और शासकीय अमला उपलब्ध है किन्तु अमला सड़क निर्माण के अभाव में कोई काम नहीं कर पा रहे हंै। श्री देशमुख ने मुख्यमंत्री श्री चैहान को आश्वस्त किया कि राज्य के पिछड़ेपन को देखते हुए ग्रामीण सड़क निर्माण के कार्य स्वीकृत किये जायंगे। श्री देशमुख ने आश्वस्त किया कि प्रदेश में लगभग 900 करोड़ रूपये के निर्माण कार्यों के लिए स्वीकृति दी जायंगी। इनमें एडीबी के अंतर्गत ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए 600 करोड़ रूपये और अन्य परियोजनाओं के अंतर्गत लगभग 300 करोड़ रूपये की राशि स्वीकृत की जायेगी। श्री देशमुख ने प्रदेश में प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत लक्ष्य से अधिक सड़क निर्माण के लिए श्री चैहान को बधाई दी। श्री देशमुख ने प्रदेश में अन्य ग्रामीण विकास के कार्यों में गुणवत्ता की भी सराहना की।
मुख्यमंत्री श्री चैहान ने श्री देशमुख का ध्यान आकर्षित किया कि प्रदेश में 37 लाख ग्रामीण आवासहीन परिवार हैं जबकि प्रदेश को केवल 37 हजार इंदिरा आवास स्वीकृत किये गये हैं। मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री आवास योजना के अंतर्गत भी ग्रामीण आवासहीन परिवारों को 70 हजार रूपये की सहायता देकर मकान बनाये जा रहे हैं। प्रदेश में ग्रामीण आवासहीन परिवारों के मापदंड में सुधार किया जाए जिससे प्रदेश के गरीब परिवारों को अधिक संख्या में आवास उपलब्ध कराये जा सकें। योजना आयोग ने भी मापदंड में सुधार करने का आश्वासन दिया था। श्री देशमुख ने आवास निर्माण की योजना में अपने स्तर पर अच्छा काम करने के लिए मध्यप्रदेश की सराहना की।
श्री चैहान ने मनरेगा के अंतर्गत होने वाले निर्माण कार्यों को स्थायी रखने के लिए मजदूरी और सामग्री में 60-40 प्रतिशत के अनुपात के बजाय सामग्री और मजदूरी 50-50 प्रतिशत के अनुपात में राशि व्यय करने का नीतिगत निर्णय लिया जाए इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी सम्पत्तियों का निर्माण हो सकेगा। श्री देशमुख ने इस संबंध में नीतिगत निर्णय लेने का आश्वासन दिया।
श्री चैहान ने बताया कि मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी का भुगतान लेने के लिए श्रमिकों को 25 से 30 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। मजदूरी के भुगतान के लिए एक हजार की आबादी पर बैंक अथवा पोस्ट आॅफिस खोला जाए जिससे मजदूरों को पारिश्रमिक का आसानी से भुगतान मिल सके। श्री देशमुख ने श्रमिकों को आसानी से भुगतान मिल सके इस संबंध में व्यवस्था कराने का आश्वासन दिया।
बुधवार, 8 जून 2011
फायर ब्रांड उमा की खामोश वापसी!
फायर ब्रांड उमा की खामोश वापसी!
(लिमटी खरे)
उमा भारती एक फायर ब्रांड साध्वी और नेत्री हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। उमा जनाधार वाली नेत्री हैं, यह भ्रम भाजपा को रहा है, भाजपा के आला नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि उमा भारती अपने बल बूते पर अपने ही गृह प्रदेश में भारतीय जनशक्ति पार्टी का न केवल खाता नहीं खोल पाईं वरन् खुद भी चुनाव में पराजय का मुंह देख चुकी हैं। उमा का गुस्सा उनके लिए सबसे बड़ी नाकारात्मक बात है। जब उन्हें गुस्सा आता है तब वे यह नहीं देखतीं कि वे किसके बारे में क्या प्रलाप कर रही हैं। उमा भारती को उत्तर प्रदेश चुनावी वैतरणी पार करने के लिए भाजपा में लाया गया प्रचारित किया जा रहा है, जबकि लगने लगा है कि भाजपा के निजाम नितिन गड़करी द्वारा अपने विरोधियों के शमन हेतु उमा का उपयोग किया जाएगा। दिल्ली में बैठे भाजपा मानसिकता वाले मध्य प्रदेश के आला अफसरान भी अब उमा की घर वापसी से दहशत में आ गए हैं। उमा भारती एक जानदार व्यक्तित्व की स्वामी हैं, किन्तु उनकी घर वापसी जिस तरह गुपचुप और नीरस तरह से हुई उससे हर किसी को आश्चर्य ही हुआ है।
(लिमटी खरे)
उमा भारती एक फायर ब्रांड साध्वी और नेत्री हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। उमा जनाधार वाली नेत्री हैं, यह भ्रम भाजपा को रहा है, भाजपा के आला नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि उमा भारती अपने बल बूते पर अपने ही गृह प्रदेश में भारतीय जनशक्ति पार्टी का न केवल खाता नहीं खोल पाईं वरन् खुद भी चुनाव में पराजय का मुंह देख चुकी हैं। उमा का गुस्सा उनके लिए सबसे बड़ी नाकारात्मक बात है। जब उन्हें गुस्सा आता है तब वे यह नहीं देखतीं कि वे किसके बारे में क्या प्रलाप कर रही हैं। उमा भारती को उत्तर प्रदेश चुनावी वैतरणी पार करने के लिए भाजपा में लाया गया प्रचारित किया जा रहा है, जबकि लगने लगा है कि भाजपा के निजाम नितिन गड़करी द्वारा अपने विरोधियों के शमन हेतु उमा का उपयोग किया जाएगा। दिल्ली में बैठे भाजपा मानसिकता वाले मध्य प्रदेश के आला अफसरान भी अब उमा की घर वापसी से दहशत में आ गए हैं। उमा भारती एक जानदार व्यक्तित्व की स्वामी हैं, किन्तु उनकी घर वापसी जिस तरह गुपचुप और नीरस तरह से हुई उससे हर किसी को आश्चर्य ही हुआ है।
2003 में देश के हृदय प्रदेश में भाजपा ने उमा भारती के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और आशातीत सफलता पाई। प्रदेश में जिस थंपिंग मेजारिटी से भाजपा ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई उसे देखकर लगने लगा था मानो उमा भारती बहुत ज्यादा जनाधार वाली नेता बनकर उभरी हैं। विवाद उमा का पीछा नहीं छोड़ते हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उमा के खिलाफ 1994 में हुबली दंगा के मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ और उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा। इसके उपरांत नवंबर 2004 में एक लाईव पत्रकार वार्ता में उमा भारती ने अपने आरध्य एल.के.आड़वाणी की उपस्थिति में उन्हें ही कोस दिया। इतना ही नहीं उमा ने राज्य सभा के रास्ते फुरसत में राजनीति करने वाले कुछ फितरती नेताओं का नाम लिए बिना उन पर जमकर प्रहार किया कि वे मीडिया को ‘आॅफ द रिकार्ड‘ ब्रीफ कर उनके और भाजपा के अन्य नेताओं के कपड़े उतारते हैं। उमा को अनुशासनहीनता का नोटिस मिला और फिर उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उमा ने भारतीय जनशक्ति पार्टी के नाम से अलग संगठन का गठन किया। पिछले चुनावांे में यह संगठन औंधे मुंह गिर गया, यहां तक कि उमा भारती खुद अपने गृह जिले टीकमगढ़ से ही हार गईं। इसके बाद से वे भाजपा में घर वापसी के लिए प्रयासरत थीं। उमा भारती यह बात भली भांति जान चुकी हैं कि पार्टी उनसे नहीं वे पार्टी से हैं। हर हाल में संगठन का कद व्यक्ति विशेष से बड़ा ही रहता है। उमा को भ्रम हो गया था कि संगठन उनके कारण चल रहा है।
उमा भारती भाजपा में वापस आ गईं हैं, उनकी वापसी से पार्टी का क्या फायदा मिलेगा यह बात तो भविष्य के गर्भ में ही है, किन्तु यह बात बिल्कुल साफ है कि उमा के पास अपना अस्तित्व बचाने के लिए भाजपा में वापसी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। उमा भारती वर्तमान में गंगा को बचाने के अभियान पर लगी हुईं हैं। उमा भारती के बारे में राजनैतिक वीथिको में कहा जाता है कि उमा भारती कांच का सामन हैं, जिसकी पेकिंग पर एक तीर के साथ ‘दिस साईड अप‘ लिखा होता है, अर्थात उमा को अगर साथ रखना है तो बहुत ही सावधानी बरतने की आवश्यक्ता है। उमा भारती का सबसे बड़ा शत्रु उनका क्रोध पर काबू न होना है।
नितिन गड़कारी को उमा की घर वापसी का फैसला लेने में पसीना आ गया होगा। गड़करी को बताया गया होगा कि इसके पहले भी उमा घर से ‘रिसाकर‘ (रूठकर) चलीं गईं थी, इसके बाद उन्हें वापस लिया गया था, तब अनेक नेताओं ने इसका विरोध किया था। बाद में जब दुबारा उमा ने भाजपा को पानी पी पी कर कोसा और पार्टी से बिदाई ले ली तब जाकर लगा था कि पहली बार की रूखसती के बाद घर वापसी में नेताओं का विरोध गलत नहीं था।
यह सच है कि उत्तर प्रदेश एक एसा सूबा है जिसने देश को सबसे ज्यादा वजीरे आजम दिए हैं। उत्तर प्रदेश पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही की नजरें गड़ी हुई हैं। 2012 के विधानसभा चुनावों के पूर्व एक किताब दिल्ली की फिजां में तैरी जिसमें यूपी में कांग्रेस की दुर्गत के लिए इंदिरा गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्रों को अपने दामन में समेटने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में कांग्रेस अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत नजर आ रही है, वहीं दूसरी ओर यूपी पर राज करने वाली भाजपा भी तीसीे और चैथी पायदान के लिए प्रयासरत है।
इसके पहले मदन लाल खुराना और कल्याण सिंह के उदहारण हमारे सामने हैं। पार्टी ने जब इन्हें वापस लिया तब इनकी छवि या अनुभवांे का बहुत ज्यादा लाभ पार्टी को नहीं मिल सका है। उमा भारती की अपनी ही पार्टी के आला नेताओं से पटरी नहीं बैठती है। मध्य प्रदेश मूल की होने के बाद भी उमा भारती की अपने ही सूबे के नेताओं से अनबन ही रहा करती है। उमा से खौफजदा उनके अधिकांश समर्थकों ने उनका दामन छोड़ दिया था। अब उमा भाजपा में हैं इन परिस्थितियों में उमा के निशाने पर उनके निष्ठा बदलने वाले सिक्के हों तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उमा और आला नेताओं के बीच खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि उसे पाटने में ही ज्यादा समय बीत जाएगा।
एक समय था जब उमा भारती के नाम से हजारों की भीड़ जमा हो जाया करती थी। गांव गांव में उनके चोले को देखकर लोग बरबस ही उनके आगे साष्टांग हो जाया करते थे। साध्वी ऋतंभरा और उमा भारती को सुनने दूर दूर से श्रृद्धालु जुटते थे। ऋतंभरा ने तो आध्यात्म की राह नहीं छोड़ी पर उमा भारती ने भगवा चोला धारण करने के साथ ही साथ राजनैतिक राह पकड़ ली। उमा भारती शुरूआती दौर में इसमें सफल भी हुईं, किन्तु उनके उग्र स्वभाव के कारण उनके समर्थक कम शत्रु ज्यादा पैदा हो गए। राजनैतिक बिसात पर भी उमा भारती को नीचा दिखाने के लिए उनकी राह में शूल बोए जाते रहे हैं। जानबूझकर एसा वातावरण पैदा किया जाता रहा है कि वे तैश में आएं और अनाप शनाप अर्नगल प्रलाप आरंभ करें।
वैसे अगर दूसरे नजरिए से देखा जाए तो भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी के लिए अरूण जेतली, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चैहान आदि जैसे नेता चुनौति ही हैं। अगला चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाए, इस पर भाजपा के अंदरखाने में गुपचुप बहस आरंभ हो चुकी है। भाजपाई नितिन गड़करी का नेतृत्व पचा नहीं पा रहे हैं। उमा की घर वापसी का फैसला भी जिस गुपचुप तरीके से लिया जाकर एकाएक मीडिया को सुनाया गया, उससे भाजपा के आला नेताओं में रोष और असंतोष है। भाजपा में उमा की घर वापसी के वक्त वहां राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, राज्य सभा के अरूण जेतली, पूर्व अध्यक्ष और यूपी की राजनीति से उठे राजनाथ सिंह मौजूद नहीं थे, जो चर्चाओं का केंद्र बना है।
उमा की घर वापसी से शिवराज सिंह चैहान, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज नेताओं की नींद उड़ना स्वाभाविक ही है। उमा भारती का कार्यक्षेत्र मध्य प्रदेश रहा है। शिवराज सिंह चैहान द्वारा सालों साल सींची गई विदिशा लोकसभा सीट की फसल एकाएक दिल्ली से अवतरित हुईं सुषमा स्वराज द्वारा काट ली गई। शिवराज के पास चूंकि मुख्यमंत्री पद था, इसलिए वे खून का घूंट पीकर रह गए होंगे। शिवराज चाहते हैं कि उनकी अर्धांग्नी साधना को विदिशा से सांसद बनवाया जाए। उधर सुषमा के लिए कम झंझटों के साथ विदिशा लोकसभा सीट मुफीद लग रही है। उमा के आने के बाद मध्य प्रदेश की भाजपाई राजनीति में हलचल होना स्वाभाविक ही है।
हो सकता है कि भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी द्वारा अपने लिए सरदर्द बनते पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेता जो अपने आप को गड़करी का समकक्ष समझ रहे हों, को निपटाने के लिए गड़करी ने संघ से मिलकर उमा की घर वापसी करवाई हो। भले ही उमा को उत्तर प्रदेश का मिशन दिया गया हो, किन्तु उनकी नजरें मध्य प्रदेश पर ही रहेंगी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मध्य प्रदेश में उमा की अप्रत्यक्ष दखल से अब शिवराज सिंह चैहान और सुषमा स्वराज दोनों ही को अपना ज्यादा से ज्यादा समय एमपी बेस्ड राजनीति को देना होगा।
शिवराज सिंह चैहान के मुख्यमंत्री बनने के पहले जब मुख्यमंत्री पद के लिए कैलाश विजयवर्गीय का नाम चला था, उस वक्त नेशनल लेबल पर इमेज बिल्डिंग के लिए कैलाश ने मध्य प्रदेश सूचना केंद्र सहित अन्य पदों पर अपनी पसंद के अधिकारियों को बिठाकर फील्डिंग आरंभ कर दी थी। बाद में शिव का राज आने पर उन्हें बदल दिया गया। वर्तमान में दिल्ली में मध्य प्रदेश के अधिकांश अफसरान शिवराज के बजाए प्रभात झा की नौकरी करते नजर आ रहे हैं। उमा भारती की घर वापसी से उन अफसरों की पेशानी पर भी पसीने की बूंदे छलक आईं हैं जो उमा से भयाक्रांत होकर एमपी छोड़ प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली आ गए थे। उमा भारती जैसी कद्दावर नेता जिसके बल बूते पर भाजपा ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस का तिलिस्म 2003 में तोड़ा था, की इस तरह खामोश वापसी से अनेक प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं।
अन्ना का अनशन आरंभ
राजघाट को छावनी बनाने पर बिफरे अन्ना
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। सिविल सोसायटी ने रामलीला मैदान पर हुई रावणलीला के विरोध में महात्मा गांधी की समाधि ‘राजघाट‘ पर अनशन आरंभ कर दिया है। राजघाट पर लगभग गए हजार पुलिस के जवानों की तैनाती अन्ना हजारे को नागवार गुजरी और उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकार सत्याग्रह से डरने के बजाए लोगों को डरा रही है।
आज सुबह लाल रंग की गाड़ी में सवार जब अन्ना राजघाट पहुंचे तब वहां भारी तादाद में पुलिस बल मौजूद था। राजघाट को छावनी बना देख अन्ना हजारे के तेवर तीखे हो गए और उन्होंने सरकार पर प्रहार आरंभ कर दिया। अन्ना का कहना है कि वे मरने से नहीं डरते। अन्ना के साथ देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी और स्वामी अग्निवेश भी मौजूद थे। आज सुबह आरंभ हुआ अन्ना का अनशन शाम छः बजे तक चलेगा।
अनशन स्थल पर विवादों के साए में आने वाले पिता पुत्र अधिवक्ता शांति भूषण और प्रशांत भूषण भी मौजूद थे। अनशनस्थल पर बने मंच पर अन्ना हजारे अकेले ही बैठे थे। देश भक्ति के गानों पर लोग झूमते नजर आ रहे थे। नजारा देख, गोरे दमनकारी ब्रितानियों को भारत से खदेड़ने छिड़े स्वतंत्रता संग्राम की याद ताजा हो रही थीं। उमर दराज लोगों ने कहा कि जैसा देश भक्ति की फिल्मों में देखा वैसा ही नजारा राजघाट का नजर आ रहा है।
उधर मीडिया ने अब बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के साथ चार और पांच जून को रामलीला मैदान में हुए दमन की खबरों को प्रमुखता देना लगभग कम कर दिया है। बाबा के राईट हेण्ड आचार्य बाल कृष्ण कल एकाएक हरिद्वार में प्रकट हुए और उन्होंने मीडिया से चर्चा के बाद कहा कि वे छिपकर बैठे थे, क्योंकि उनको जान का खतरा बना हुआ था। जब आचार्य बाल कृष्ण से पूछा गया कि बाबा रामदेव ने उन्हें किस मिशन पर लगाया था? के जवाब में आचार्य बाल कृष्ण बगलें झांकते ही नजर आए। अपनी नागरिकता की सफाई भी उन्होंने गोलमोल तरीके से ही दी। उन्होंने कबूल किया कि उनके माता पिता और सगे भाई नेपाल के नागरिक हैं, पर वे भारत के नागरिक हैं।
एमपी ने की बच्चों को शिक्षा देने की पहल
एमपी ने की बच्चों को शिक्षा देने की पहल
नई दिल्ली (ब्यूरो)। मध्यप्रदेश की स्कूल शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस ने कहा है कि प्रदेश में शिक्षा के अधिकार के तहत सभी बच्चों को शिक्षा देने की जोरदार पहल की जा रही है। शिक्षा के अधिकार के तहत जो सकारात्मक पहल की जा रही है उसके अच्छे परिणाम आ रहे हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम को लागू करने के लिए जो कमियां हैं उन्हें दूर किये जाने की भी आवश्यकता है। शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए कुछ मामूली सुधार भी किये जायं। श्रीमती चिटनिस आज यहां मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल की अध्यक्षता में आयोजित देश के शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित कर रहीं थीं। प्रदेश के उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने भी बैठक में भाग लिया।
श्रीमती चिटनिस ने मानव संसाधन विकास मंत्री श्री सिब्बल का ध्यान आकर्षित किया कि स्कूल स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए व्होकेशनल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाय। स्कूली पाठ्यक्रम में व्होकेशनल एजुकेशन के साथ कृषि संबंधी विषय और स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संबंधित विषयों को शामिल किया जाय।
शिक्षा मंत्री श्रीमती चिटनिस ने मानव संसाधन विकास मंत्री से आग्रह किया कि निजी शिक्षण संस्थाओं की मानिटरिंग किये जाने की आवश्यकता है। निजी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा की गुणवत्ता को देखते हुए स्कूलों की रेटिंग की जाय और रेटिंग के अनुसार उनकी फीस आदि तय की जाय। अशोका होटल में आयोजित 58वीं केन्द्रीय सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड आफ एजुकेशन की बैठक में देश के सभी राज्यों के स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा मंत्रियों ने भाग लिया।
श्रीमती चिटनिस ने मानव संसाधन विकास मंत्री श्री सिब्बल का ध्यान आकर्षित किया कि स्कूल स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए व्होकेशनल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाय। स्कूली पाठ्यक्रम में व्होकेशनल एजुकेशन के साथ कृषि संबंधी विषय और स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संबंधित विषयों को शामिल किया जाय।
शिक्षा मंत्री श्रीमती चिटनिस ने मानव संसाधन विकास मंत्री से आग्रह किया कि निजी शिक्षण संस्थाओं की मानिटरिंग किये जाने की आवश्यकता है। निजी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा की गुणवत्ता को देखते हुए स्कूलों की रेटिंग की जाय और रेटिंग के अनुसार उनकी फीस आदि तय की जाय। अशोका होटल में आयोजित 58वीं केन्द्रीय सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड आफ एजुकेशन की बैठक में देश के सभी राज्यों के स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा मंत्रियों ने भाग लिया।
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