सोमवार, 6 जून 2011

सुनाई देने लगी ‘आपातकाल‘ की पदचाप


सुनाई देने लगी ‘आपातकाल‘ की पदचाप

(लिमटी खरे)

देश की आजादी के वक्त आजादी के परवानों और महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं ने इक्कीसवीं सदी में भारत की जो कल्पना की होगी, भारत गणराज्य उससे एकदम ही उलट नजर आ रहा है। गरीब और अधिक गरीब तो अमीर की तिजोरी इतनी भर चुकी है कि उसका मुंह बंद नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस की नाक के नीचे जनता के गाढ़े पसीने की कमाई के लाखों करोड़ों रूपयों की होली खेली जा रही है, पर कांग्रेस नीत कंेद्र सरकार आखें बंद कर बैठी है। ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ‘ का नारा देने वाली कांग्रेस की पोल अब खुलने लगी है। हालात देखकर लगने लगा है कि कांग्रेस को अपना नारा बदलकर ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी की गर्दन के साथ‘ कर देना चाहिए। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के साथ रामलीला मैदान पर जो भी हुआ उससे भान होने लगा है कि आने वाले समय में आपतकाल लागू होजाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


देश की जनता घपले, घोटाले और भ्रष्टाचार से पूरी तरह आजिज आ चुकी है। चूंकि कानून में बदलाव का हक संसद, विधानसभा, सांसदों और विधायकों को ही होता है इसलिए आम जनता अपने आप को निरीह, निर्बल, मजबूर ही महसूस कर रही है। जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के द्वारा देश में आपातकाल लागू कर दिया गया था, हालात कुछ उसी तरह के बनते नजर आ रहे हैं। उस वक्त श्रीमति इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष तो उनके पुत्र संजय गांधी कांग्रेस के महासचिव हुआ करते थे। कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, आज कांग्रेस अध्यक्ष की आसनी पर इंदिरा गांधी के बजाए उनकी इटली मूल की बहू श्रीमति सोनिया गांधी तो महासचिव के पद पर संजय गांधी के भतीजे राहुल गांधी विराजमान हैं।

सोनिया की चाटुकार मण्डली में भी इंदिरा गांधी की कोटरी का अक्स ही दिखाई दे रहा है। उस वक्त प्रकाश चंद सेठी और नारायण दत्त तिवारी के जो स्वर थे वही तल्खी और स्वामीभक्ति राजा दिग्विजय सिंह के सुरों में दिखाई दे रही है। आपात काल में जिस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई थी, वही हालात आज भी दिख रहे हैं। सरकार का विरोध करने पर अन्ना हजारे के बाद अब रामदेव बाबा को आम ‘चोर‘ की तरह पकड़ा जाना निंदनीय है।

रामलीला मैदान में 4 और 5 जून की दरमयानी रात को जो रावण लीला हुई उससे देश दुनिया का हर नागरिक हतप्रभ है। कांग्रेस के इशारे पर पुलिस की बर्बरता से साफ हो गया है कि लोकतंत्र की स्थापना करने वाली कांग्रेस की वर्तमान पीढ़ी को अब लोकतंत्र पर विश्वास नहीं रहा। आज के हालात देखकर लगने लगा है मानो भारत गणराज्य में ‘हिटलरशाही‘ हावी होती जा रही है। अगर कोई सरकार या तंत्र के खिलाफ बोलने का साहस जुटाता है तो उसे मिटाने के लिए राजनेता एड़ी चोटी एक कर देते हैं।

आजादी के उपरांत 1975 में जय प्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी के कदमों से त्रस्त जनता को उस जंगल राज से मुक्ति दिलाने के लिए आंदोलन छेड़ा और इंदिरा गांधी से त्यागपत्र मांग लिया। जेपी की यह कथित घ्रष्टता इंदिरा गांधी और संजय गांधी को इतनी नागवार गुजरी कि उसी वक्त देश में आपातकाल लगा दिया गया। सरकार का विरोध करने वालों को तरह तरह की यातनाएं देकर जेल मंे बंद कर दिया गया था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्यों को मीसा में बंद कर जिस तरह की अमानवीय यातनाएं दी थीं, उसे याद कर आज भी मीसाबंदियों सिहर उठते हैं।

रामलीला मैदान में भी कांग्रेस नीत कंेद्र सरकार द्वारा ने कमोबश यही कदम उठाया है। आधी रात को चोरों की तरह जाकर बाबा रामदेव को पकड़ने और शांति पूर्वक अनशन करने वालों के खिलाफ लाठियां भाजनें का ओचित्य किसी को समझ नही आ पाया है। महिलाओं और उनके साथ आए बच्चों को भी पुलिस ने अपना निशाना बनाया। सवाल यह है कि आखिर एसी कौन सी आफत आ गई थी सरकार को अंधेरी रात में इस तरह के कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा।

देश की सवा करोड़ जनता प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह से इस बात का उत्तर अवश्य चाह रही है कि अगर देश में वाकई लोकतंत्र बचा हुआ है, तो वे इस बात का जवाब अवश्य ही दें कि आखिर क्या वजह थी कि बाबा रामदेव को पकड़ने और अनशनकारियों पर अश्रु गैस और लाठियां भांजने के लिए दिन होने का इंतजार नहीं किया गया? क्या कारण था कि सोते निर्दोष लोगों को बेतहाशा पीटा गया? क्या यही लोकतंत्र की परिभाषा है? क्या यही नेहरू और महात्मा गांधी के सपने के भारत के शासक हैं? इसे तो सोनिया और राहुल के शासन के प्रजातंत्र का नमूना कहा जा सकता है।

यह तो वाकई उपर वाले का शुक्र मनाना चाहिए कि चार और पांच जून की दर्मयानी रात को रामलीला मैदान में पुलिसिया कहर के बावजूद भी कोई अनहोनी नहीं घटी, वरना हालात संभालना मुश्किल हो जाता। देश के चेहरे पर भ्रष्टाचार, घपले, घोटालों के साथ ही साथ कुछ इस तरह के दाग भी लग जाते जिन्हें धोने में सालों साल का समय भी कम पड़ जाता। बाबा रामदेव के साथ ‘डीलिंग‘ करने में सरकार द्वारा जो तरीका अपनाया गया, वह अपने आप में इस बात को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि बाबा रामदेव के अनशन से सरकार किस कदर खौफजदा है।

उधर बाबा रामदेव इस आंदोलन की सफलता से फूले नहीं समा रहे हैं। बाबा का कहना है कि अगर आंदोलन तीन दिन चल जाता तो सरकार गिर जाती? हो सकता है बाबा की बात में दम हो, किन्तु बाबा को इस तरह का अहम नहीं पालना चाहिए। पहले भी मीडिया ने बाबा रामदेव का अनेक बार साक्षात्कार में भी उनका अहम छलका है। बाबा ने संवाददाताओं को ही डामीनेट करने के हथकंडे भी अपनाए। कहा जाता है कि ‘अहम‘ में से ‘अ‘ को अलग कर दिया जाए तो बाकी बचता है ‘हम‘।

केंद्र सरकार के इस तरह के कदम के उपरांत देश की सबसे बड़ी अदालत ने खुद संज्ञान लिया है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार और जस्टिस बी.एस.चैहान की पीठ ने केंद्र सरकार के गृह सचिव, दिल्ली सरकार के गृह सचिव और पुलिस आयुक्त दिल्ली को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब तलब किया है। इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में की जाएगी। एक याचिका कर्ता अधिवक्ता अग्रवाल के अनुसार कोर्ट ने उनकी अपील दाखिल करने के साथ ही कहा कि न्यायालय इस मामले में खुद ही स्वमोटिव नोटिस ले रहा है। कोर्ट खुद भी समाचार पत्र की कतरनों और विजुअल्स देखकर सन्न रह गया है। कोर्ट ने इस मामले को बेहद संगीन माना है।

न्यायालय ने लिया स्वतः संज्ञान

0 काला धन अभियान
 
न्यायालय ने लिया स्वतः संज्ञान
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। काले धन के खिलाफ जेहाद छेड़ने वाले बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के आंदोलन को बर्बरता के साथ कुचलने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्वतः ही संज्ञान लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। उधर केंद्रीय गृह मंत्रालय भी इस मामले में हरकत में आ गया है। गृह मंत्रालय में इस मामले को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक चल रही है।
 
इस मामले को लेकर याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता अजय अग्रवाल ने बताया कि उनकी पिटीशन एनरोल नहीं हो पाने के बारे मंे जब उन्होंने कोर्ट को आवगत कराया तो कोर्ट ने इस मामले में स्वतः ही संज्ञान लिया और अखबार की कतरनों तथा वीजुअल्स देखने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और पुलिस आयुक्त दिल्ली को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में होने की उम्मीद है। कोर्ट की कार्यवाही पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और खुद बाबा रामदेव ने न्यायालय के प्रति आभार जतया है।
 
गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम के करीबी सूत्रों का कहना है कि न्यायालय की कार्यवाही के बाद अब गृह मंत्रालय पूरी तरह चोकन्ना हो गया है। सूत्रों ने कहा कि गृह मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय बैठक इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है, जिसमें बाबा रामदेव को हर मोर्चे पर घेरने की तैयारियां और अब तक की पुलिस और प्रशासन की कार्यवाही को न्यायसंगत ठहराने के लिए कानून के जानकारों की मदद ली जा रही है।
 
उधर कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ से छन छन कर बाहर आ रही खबरों के अनुसार सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही इस मामले में कांग्रेस और सरकार की विफलता से बहुत ज्यादा नाराज दिख रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी इस समय सबसे ज्यादा किसी से खफा हैं तो उस फेहरिस्त में पी.चिदम्बरम, कपिल सिब्बल और पवन बंसल शामिल हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी नजरों में दिग्विजय सिंह की बयानबाजी बहुत ही कारगर साबित हो रही है।
 
बाबा रामदेव ने कहा कि मशहूर वक्ता जाकिर नायक के नाम से एक फर्जी ईमेल पुलिस ने ही बनाकर दिल्ली में मीडिया को भेजा था। बाबा का कहना था कि अनशन स्थल के पास ही एक मस्जिद है सरकार की इच्छा थी कि अनशन स्थल पर कुछ गड़बड़ कर दी जाए और इसे सांप्रदायिक स्वरूप दे दिया जाए पर सरकार विफल हो गई।
 
भाजपा ने इस मामले को अपने हाथों में लेने का प्रयास आरंभ कर दिया है। बाबा रामदेव के संघर्ष जारी रहने के फैसले के उपरांत भाजपा ने राजघाट पर एक दिवसीय धरना दे दिया है। भाजपा के धरने में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज ने ठुमके भी लगाए। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भाजपा ने महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल से मिलने का समय मांगा है। अपरान्ह बारह बजे भाजपा श्रीमति पाटिल से मिलकर उनसे विशेषाधिकार का प्रयोग कर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग करेगी। बाबा रामदेव ने अंत तक प्रधानमंत्री से त्यागपत्र की मांग नहीं की है।

रविवार, 5 जून 2011

जनरल डायर बनाम मनमोहन सिंह


जनरल डायर बनाम मनमोहन सिंह

(लिमटी खरे)

ब्रितानी हुकूमत के काल में 13 अप्रेल 1919 में जनरल डायर ने अमृतसर के जलियां वाले बाग में निर्दोष लोगों को गोलियांे से भून दिया था, यह था गोरी चमड़ी वालों की बर्बरता का नंगा नाच। महात्मा गांधी के आर्दशों पर चलकर देश को आजादी मिली और फिर कायम हुआ भारत गणराज्य जिसमें लोकतंत्र को सर्वोपरि माना गया। 4 और 5 जून की दर्मयानी रात दिल्ली में जो हुआ वह एक बार फिर ब्रितानी हुकूमत की सामंतवादी सोच का परिचायक कहा जाएगा। जिस तरह गोरों ने साम, दाम, दण्ड भेद की नीति पर चलकर देश पर राज किया, कमोबेश उसी तरह कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा हाल ही में किया जा रहा है। अन्ना हजारे के बाद बाबा रामदेव के अनशन से हिली कांग्रेस को अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। बाबा रामदेव की मुहिम को जनता का समर्थन हासिल है, इस आंदोलन के दमन से सरकार की नीयत पर अनेक प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। लोग इसकी तुलना जनरल डायर की अमानवीयता और आपातकाल (इमरजेंसी) से करने से नहीं चूक रहे हैं।

देश की सरकार एक और अन्ना हैं हजारों‘, यह जुमला आज हर किसी की जुबां पर चढ़ चुका है। चाहे अन्ना हजारे ने बाबा के काले धन के मुद्दे को हाईजेक कर लिया हो, किन्तु 4 जून को स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में जो भी किया उसे देखकर लगने लगा है मानो देश का आम आदमी भ्रष्टाचार घपले घोटालों से आजिज आ चुका है। इसके पहले अन्ना हजारे लोकपाल मामले में अपने तेवर दिखा चुके हैं। भले ही कांग्रेस इस मामले में बैकफुट पर हो, किन्तु बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ने कांग्रेस के थिंक टेंक्स को गंभीर मंत्रणा पर विवश कर ही दिया है।

भारत गणराज्य की स्थापना के साथ ही साफ कर दिया गया था कि भारत देश न तो कोई कम्युनिष्ट देश है, न ही दुनिया का चैधरी अमेरिका और न ही अरब देश की सामन्ती व्यवस्था का प्रतीक, जहां देश का सर्वोच्च नागरिक स्वविवेकसे कोई भी कानून में तब्दीली का हक रखता हो। भारत गणराज्य में सबसे ताकतवर संवैधानिक पद प्रधानमंत्रीका माना गया है, किन्तु उसे भी निचली अदालत से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत को सम्मन भेजकर हाजिर करने का हक है। इसी बिनहा पर यह कहा जा सकता है कि देश में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसे किसी भी कीमत पर छेड़ा नहीं जा सकता है।

बाबा रामदेव आखिर चाह क्या रहे हैं, यही न कि विदेशों में जमा देश का काला धन वापस स्वदेश लाया जाए। इसके लिए बाबा रामदेव लंबे समय से प्रयासरत हैं। यह अलहदा बात है कि उनकी इस मुहिम में बीच बीच में सडांध मारती राजनीति की बू भी आने लगती है, जब वे सियासत पर उतर आते हैं। लोगों को स्मरण दिलाना चाह रहा हूं कि जब लौह पुरूष का तमगा पाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल का निधन हुआ तब उनकी कुल संपत्ति 259 रूपए थी। एसे थे नीतियों पर चलने वाले राजनेता। आज के राजनेताओं के पास अकूत दौलत है। क्या आम आदमी से ज्यादा धन को राष्ट्रीय संपत्ति नहीं माना जाए!

बाबा रामदेव को मनाने के लिए कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के हालिया सबसे विश्वस्त दूत कपिल सिब्बल गए। सिब्बल और बाबा के बीच वार्ता चली, जो असफल ही रही। सिब्बल ने गोरे ब्रितानियों की चाल चलकर बाबा के राईट हेण्ड और कथित तौर पर नेपाली मूल के आचार्य बाल कृष्ण से अनशन समाप्ति का पत्र लिखवा लिया। यह बात समझ से परे है कि आखिर उन्होंने अनशन समाप्ति का पत्र अनशन प्रारंभ होने के पूर्व लिखकर क्यों दिया? कहीं एसा तो नहीं कि यह सब कुछ मिली जुली प्रायोजित कुश्ती हो? अमूमन इस तरह के पत्र अग्रिम में तो सरकार में शामिल करने के पूर्व मंत्रियों से लिखवाए जाते हैं ताकि समय बे समय काम आ सकें।

कांग्रेस का आरोप है कि बाबा के अनशन स्थल को फाईव स्टार सुविधाओं से लैस किया गया है। इसमें पैसा कौन लगा रहा है यह शोध का विषय है। सियासी दल के नुमाईंदे इस तरह के आरोप लगाने के पहले यह बात भूल जाते हैं कि जब कांग्रेस या भाजपा के अधिवेशन होते हैं तब फाईव तो क्या सेवन स्टार की सुविधाएं मुहैया होती हैं नेताओं को, तब वे इस तरह का प्रश्न दागने का नैतिक साहस क्यों नहीं कर पाते हैं? इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि बाबा के पीछे संघ है या भाजपा, सवाल तो यह है कि बाबा का मुद्दा सही है अथवा नहीं!

एक तरह से देखा जाए तो सरकार और कांग्रेस के ट्रबल शूटर बनकर एक कपिल सिब्बल पूरी तरह से असफल ही हुए हैं। बाबा रामदेव को कल शाम अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का प्रयास किया है, बाद में 4 और 5 जून की दर्मयानी रात में उन्हें बलात उठाही लिया गया, जो निंदनीय है। यह तो अच्छा हुआ कुटिल राजनेताओं ने बाबा के अनशन स्थल पर असमाजिक तत्वों का उपयोग कर रंग में भंग नहीं डाला, वरना मामला कुछ और रंग ले चुका होता।

बाबा रामदेव के इस तरह के अनशन से उनके पक्ष में बयार बह निकली है। दिल्ली इस बात की गवाह है कि सरकार के दमन चक्र के बावजूद भी बाबा रामदेव देश ने की जनता के मजबूत कांधों पर बैठकर भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद किया। बाबा रामदेव की हुंकार के आगे अन्ना हजारे का कद अब बौना नजर आने लगा है।

पहले सियासत तब गर्माई थी जब पिछले साल बाबा रामदेव ने राहुल गांधी से मुलाकात की थी। पिछले माह बाबा रामदेव ने अपने कमोबेश हर साक्षात्कार में यही कहा कि सरकार के साथ बातचीत सकारात्मक चल रही है, पर इस बात से वे कन्नी ही काटते रहे कि क्या बातचीत चल रही है? एसा कौन सा हिडन एजेंडा था जिसे बताने में बाबा रामदेव आखिरी तक हिचकते रहे। बार बार सरकार के साथ बातचीत फिर अनशन और पत्र का खुलासा, फिर बाबा की धरपकड़! आम आदमी इस बात को समझ ही नहीं पा रहा है कि आखिर एकाएक बाबा रामदेव के साथ सकारात्मकबातचीत इस तरह की विपरीत परिस्थितियों में कैसे पहुंच गई?

जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी का यह कथन भी विचारणीय ही है कि बाबा रामदेव अनशन से पहले अपने 11 हजार करोड़ रूपए के साम्राज्य की सफाई अवश्य कर लें। कल तक जिनके पास साईकल के पंचर जुड़वाने के पैसे नहीं होते थे, वे बाबा रामदेव आज अकूत दौलत पर राज कर रहे हैं। बाबा रामदेव को शंकराचार्य के इस आरोप की सफाई देना ही होगा कि बाबा रामदेव अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए यह अनशन कर रहे हैं। उधर सिने स्टार सलमान खान ने भी बाबा रामदेव को योग सिखाने पर अपना ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। पर जो भी हो बाबा रामदेव के अनशन को कुचलकर कांग्रेस ने यह साबित कर ही दिया है कि देश में कानून और व्यवस्था नाम की चीज नहीं बची है। जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर सरकार ने सभी को एक ही लाठी से हांकने का कुत्सित प्रयास किया है।

बाबा रामदेव के काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे को कांग्रेस ने बहुत ही हल्के रूप में लिया। कांग्रेस को लगा योग सिखाने वाला एक बाबा आखिर कैसे सियासी ताकत के सामने टिक पाएगा। उधर बाबा रामदेव कछुए और खरगोश की कहानी में कछुए के मानिंद चलते रहे, अंत में अब बाबा रामदेव देश में सरकार के खिलाफ अलख जगाने में कामयाब हो ही गए। बाबा रामदेव ने योग से जुड़े लोगों को एक सूत्र में पिरोया और फिर सरकार को कटघरे में खड़ा कर ही दिया।

कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह ने जहर बुझे तीरों के मार्फत बाबा रामदेव को आहत करना चाहा किन्तुू वे सफल नहीं हो सके। इसके बाद गंदी राजनीति के तहत बाबा रामदेव को सियासी ताने बाने में उलझाने का प्रयास किया गया, किन्तु बाबा रामदेव की साफगोई के चलते सरकार की चालें अंततः सामने आ ही गईं।

5 जून की मध्य रात्रि में बाबा रामदेव को अनशन स्थल से जिस तरह से उठाया गया वह लोकतांत्रिक तरीका किसी भी दृष्टिकोण से नहीं कहा जा सकता है। बाबा रामदेव की गिरफ्तारी को उनकी किडनेपिंग की संज्ञा दी जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। कांगे्रस का कहना है कि बाबा रामदेव द्वारा जनता को भड़काया जा रहा था, किन्तु कांग्रेस इस बात को स्पष्ट नहीं कर पाई कि आखिर कौन सी पंक्तियां थीं, जिनके माध्यम से बाबा रामदेव द्वारा लोगों को भरमाया जा रहा था।

पूरे घटनाक्रम का तातपर्य यह ही हुआ कि अगर आप सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे तो आपका बलात शमन कर दिया जाएगा। ये परिस्थितियां इसलिए भी निर्मित हो रही हैं क्योंकि निहित स्वार्थ को प्राथमिक मानकर लंबे समय से सत्ता, विपक्ष, नौकरशाही और मीडिया का गठजोड़ हो गया है। यही कारण है कि आज शासकों द्वारा लोकतंत्र को अपने जूते के तले रोंदने में जरा भी हिचक नहीं की जाती है। समय रहते अगर हम नहीं चेते तो देश में हिटलरशाही राज कायम होने में समय नहीें लगने वाला। इस पूरे मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी एवं ईमानदार छवि के धनी वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह की चुप्पी भी आश्चर्यजनक ही कही जाएगी।

कड़ी सुरक्षा में बाबा पहुंचे मांद में


कड़ी सुरक्षा में बाबा पहुंचे मांद में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे बाबा रामदेव का धरना पुलिस ने बलात समाप्त करवा 4 और 5 जून की दर्मयानी रात में एक बजे उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आज अपरान्ह उन्हें विशेष विमान से देहरादून के जाॅलीग्रान्ट एयर पोर्ट ले जाया गया जहां सफेद इंडिका से बाबा को कनखल स्थित उनके आश्रम ले जाया गया। बाबा ने संकेत दिए हैं कि वे मीडिया से जल्द ही चर्चा करेंगे।

प्रत्यक्ष दर्शियों के मुताबिक बीती रात लगभग एक बजे बाबा रामदेव को अनशन स्थल पर अचानक ही अहसास हुआ कि उन्हें पुलिस अपनी कस्टडी में ले सकती है, इस बात को भांपकर बाबा रामदेव ने मंच से छलांग लगा दी और अनशन स्थल से भागने की कोशिश की।

आठ घंटे तक अनशन स्थल से लापता बाबा रामदेव के बारे में दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने बताया कि वे सुरक्षित स्थान पर हैं एवं उन्हें विशेष विमान से देहरादून ले जाया जाएगा। इसके पहले सफदरजंग एयरपोर्ट से बाबा रामदेव को हेलीकाप्टर से हरिद्वार ले जाने के कयास लगाए जा रहे थे।

पुलिस की दमनात्कम कार्यवाही से व्यथित बाबा रामदेव ने कहा कि पुलिस ने शांतिपूर्वक धरना दे रहे अनशनकारियों पर बर्बरता के साथ लाठियां भांजी हैं। बहनों को अमानवीय तरीके से घसीटा है। आजाद भारत में यह बेहद संगीन जुर्म है। ब्रितानियों ने भी इस तरह की बर्बरता नहीं की थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने और उनके समर्थकों ने कोई अपराध नहीं किया है। बाबा रामदेव ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि वे दिन के उजाले में वारंट निकालकर उन्हें गिरफ्तार करें, न कि चोरों की तरह से।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बाबा रामदेव भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पतांजली पीठ पहुंच चुके थे। बाबा रामदेव आज भगवा वस्त्रों के बजाए सफेद रंग के कुर्ता पायजामा में दिखाई पड़े। साथ ही बाबा के कहर से डरी केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बाबा रामदेव के प्रवेश पर 15 दिन के लिए पाबंदी लगा दी गई है। रामलीला मैदान पर अनशन स्थल पर धारा 144 लगा दी गई है। बाबा के अनशन में साथ देने आए लोगों को अलह सुब्बह से ही घर वापसी में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा है।
कांग्रेस द्वारा एक तरफ बाबा रामदेव पर संघ और भाजपा की कठपुतली बनने का आरोप लगाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार द्वारा भी बाबा रामदेव को इस मामले में किसी भी तरह की राहत नहीं दिया जाना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है।

उधर हरिद्वार में बाबा रामदेव के समर्थकों का जमावड़ा देखते ही बन रहा है। बाबा समर्थकों ने कहा है कि वे आंदोलन को पूरी तरह जारी रखेंगे। अन्ना हजारे की टीम ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। कांग्रेस की इस कार्यवाही की देश भर में निंदा की जा रही है। बाबा रामदेव कनखल पहुंचने पर काफी थके दिखाई दिए। बाबा के समर्थकों ने आश्रम को पूरी तरह घेर लिया है और किसी को भी अंदर नहीं जाने दे रहे हैं।

मंगलवार, 31 मई 2011

कांग्रेस के चेहरे दो, भाजपा का मुखौटा एक


कांग्रेस के चेहरे दो, भाजपा का मुखौटा एक

(लिमटी खरे)

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को भाजपा का मुखौटा कहा गया था। इसके बाद भाजपा में किसी तरह का चेहरा सामने नहीं आया। भाजपा का चाल चरित्र और चेहरा भले ही बदल गया हो पर आज भी भाजपा का नाम आते ही जेहन में अटल बिहारी बाजपेयी का चेहरा आ जाता है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में वर्तमान वजीरे आजम डाॅक्टर मन मोहन सिंह के न जाने कितने चेहरे सामने आते जा रहे हैं। कभी वे खुद को मजबूर बताकर अपनी खाल बचाने की कोशिश करते हैं तो कभी भ्रष्टाचार के मामले मंे शतुरमुर्ग के मानिंद अपनी गर्दन रेत में गड़ाने का उपक्रम करते नजर आते हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ईमानदार छवि के धनी मन मोहन सिंह को ध्यान में रखकर जनता ने कांग्रेस को जिताया किन्तु बाद में जनता को समझ में आने लगा कि जिसे उन्होंने चुना है वह लोकतंत्र का सबसे बड़ा लाचार लुटेरा है। मनमोहन के सहयोगी अगर लूटपाट मचा रहे हैं और वे चुप हैं इसका तात्पर्य है कि अली बाबाने अपने चालीस चोरोंको लूट खसोट की छूट मौन सहमति के रूप में दी है।

वाकई डाॅ.मनमोहन सिंह ने इतिहास रच दिया है। आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कांग्रेस आजादी के उपरांत नेहरू गांधी परिवार की प्राईवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गई है। आजादी के बाद नेहरू गांधी परिवार के पंडित जवाहर लाल नेहरू, प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने देश के सबसे ताकतवर पद वजीरे आजम को संभाला। गैर कांग्रेसी सरकार में अटल बिहारी बाजपेयी ने ही पांच साल से ज्यादा समय तक लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित किया है। कांग्रेस में गैर नेहरू गांधी परिवार में डाॅक्टर साहेब सातवीं मर्तबा स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से देश को संबोधित करने का सौभाग्य पाएंगे।

दूसरी बार जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तब से पहली मर्तबा से अधिक कमजोर दिखाई पड़ने लगे। इसका कारण कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के सलाहकारों में कुछ मंझे और घाघ किस्म के राजनेताओं का जुड़ना ही था। अपने मन में 7, रेसकोर्स (प्रधानमंत्री का ईयरमार्क आवास) को आशियाना बनाने की चाहत पाले कांग्रेस के राजनैतिक चाणक्यों ने सोनिया गांधी को मनमोहन के खिलाफ तबियत से भरमाया और भ्रष्टों को लूट खसोट के लिए उकसाया।

कांग्रेस के बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के चाणक्य स्व.अर्जुन सिंह ने इन हालातों को बेहतर भांपा और फिर उनके मौन ने कांग्रेस नेतृत्व की नींद उड़ा दी। इसी बीच एक के बाद एक लाखों करोड़ रूपयों के घपले और घोटालों की गूंज होने लगी। क्या टू जी स्पेक्ट्रम घोटाल, क्या कामन वेल्थ घोटाला, क्या एस.बेण्ड, क्या आदर्श सोसायटी, क्या सीवीसी पद पर थामस की नियुक्ति, हर मामले में कांगे्रसनीत केंद्र सरकार को मुंह की ही खानी पड़ी है। यहां तक कि देश की शीर्ष अदालत ने दो दो मर्तबा टू जी स्पेक्ट्रम मामले में वजीरे आजम की भूमिका पर ही गंभीर सवाल खड़े किए थे। अदालत का यह कहना कि इतने बड़े घोटाले के बाद आदिमत्थू राजा आखिर मंत्री पद पर क्यों बने हुए हैं? काग्रेस को गिरेबान में झाकने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। काले धन के मामले में भी सरकार को बार बार अदालत द्वारा आड़े हाथों लेते हुए फटकार लगाई है।

जब पानी सर से उपर होता दिखा तो वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह ने देश के चुनिंदा टीवी समाचार चेनल्स के संपादकों को बुलाकर अपना स्पष्टीकरण दिया और खुद को निरीह, मजबूर और निर्दोष बताने का प्रयास किया। समूचे देश ने उस वक्त मनमोहन सिंह को पानी पी पी कर कोसा कि अगर आप मजबूर हैं तो फिर कुर्सी से चिपके रहने की क्या मजबूरी है। अगर आप इस सब भ्रष्टाचार घपले घोटाले में शामिल नहीं हैं तो आप अपने पद से त्यागपत्र क्यों नहीं दे देते? मतलब साफ है कि आप भी ‘‘कथड़ी (एक तरह का फटे वस्त्रों से बना दुशाला) ओढ़कर घी पीने‘‘ में विश्वास रखते हैं। अगर आप यह कहने का साहस जुटा पा रहे हैं कि आप मजबूर हैं तो सवा करोड़ भारतवासियों को यह जानने का पूरा हक है कि आखिर यह मजबूरी क्या है और यह आप भारत के हर नागरिक की किस कीमत पर चुका रहे हैं।

हाल ही में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दो साल पूरे हुए। प्रधानमंत्री ने सरकार में प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर शामिल घटक दलांे के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर जश्न मनाया। पता नहीं प्रधानमंत्री ने इस तरह खुशी मनाने का नैतिक साहस कैसे जुटाया? क्योंकि सरकार को भ्रष्टाचार के मामले में जिस करवट मिला उस करवट उसके अपने सहयोगियों ने कपड़ों के मानिंद धुना। पूर्व संचार मंत्री ए.राजा, कामन वेल्थ गेम्स आयोजन समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी, सरकार की सहयोगी द्रमुक अध्यक्ष करूणानिधि की पुत्री कनिमोरी जैसी शख्सियतें सरकार की छवि पर कालिख लगाकर जेल में हैं। अनेक और एसे ही नगीनों का जेल इंतजार कर रहा है। इन परिस्थितियों में क्या संप्रग सरकार ने घपले घोटालों का जश्न मनाया है!

आदि अनादि काल से रियाया के हर दुख दर्द, सुख सुविधा का ध्यान रखना शासकों का प्रथम नैतिक दायित्व रहा है। आजाद भारत में पहली मर्तबा यह देखने को मिल रहा है कि शासकांे को अपना निजी खजाना वह भी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से भरने की फिक्र है। शासकों को इतना भी इल्म नहीं है कि वह मंहगाई के बोझ तले दबी जनता के रूदन को सुन पाए। नौ माह में नौ मर्तबा पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए। डीजल और रसोई गैस इसी कतार में खड़े हैं। दूध के दामों में बार बार बढ़ोत्तरी की जा रही है। दाल तेल और अन्य खाद्य सामग्रियों की कीमतें आसमान को छू रही हैं। नहीं बढ़ रही हैं तो शराब की कीमतें।

लगता है वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह वाकई में महात्मा गांधी के सच्चे अनुयाई हैं। बापू के तीन बंदर यह शिक्षा देते हैं कि बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो। वजीरे आजम बुरा सुनने से गुरेज ही करते हैं, रही बात देखने की तो जहां भी अनर्थ या भ्रष्टाचार, घपले घोटाले होते दिखते हैं वे अपनी आंखे बन्द कर लेते हैं और बचा बुरा बोलना तो व्यक्तिगत तौर पर वे भले आदमी हैं, सो बुरा बोलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है। एक तरफ मनमोहन की छवि ईमानदार की बनी हुई है वहीं दूसरी ओर उनका दूसरा चेहरा भ्रष्टों को प्रश्रय देने वाला सामने आया है।

प्रधानमंत्री के इस नरम रवैए से कांग्रेस, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और खुद डाॅक्टर मनमोहन सिंह की छवि जमीन पर आ चुकी है। इसका सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष उदहारण अन्ना हजारे का आंदोलन था। अन्ना के आंदोलन से सरकार हिल गई। अन्ना ने लोकपाल विधेयक की तान छेड़ी है। सच है कि जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि जिसे वह जनादेश देती है अगर वह उसकी उम्मीदों पर खरा न उतरे तो उसे वापस बुलाने का अधिकार उसे होना चाहिए। अगर एसा हुआ तो पारदर्शिता आ सकती है। अन्ना हजारे द्वारा उठाए गए मुद्दों पर पहले भी काफी शोर शराबा हो चुका है। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इस बात का समर्थन किया था कि जनता को अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार होना ही चाहिए।

स्वतंत्र भारत में सत्तर के दशक के बाद भ्रष्टाचार का केंसर तेजी से बढ़ा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी ने खुद ही इस बात को स्वीकारा था कि केंद्र द्वारा दी गई इमदाद के एक रूपए में से महज पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं। उस दर्मयान एक लतीफा बहुत ही चला था। केंद्र की मदद को बर्फ की संज्ञा दी गई थी, जो एक हाथ से दूसरे हाथ जाने तक पिछलती रहती है। और जब अंतिम हाथ में पहुंचती है और उसे खर्च करने के लिए जब वह सोचता है तब तक वह पूरी ही घुल जाती है।
इस संदर्भ में मध्य प्रदेश मंे उप सचिव रहे स्व.आर.के.तिवारी दद्दा द्वारा उद्यत एक प्रसंग का जिकर लाजिमी होगा। दद्दा ने बतायाकि उन्होंने त्रि स्तरीय पंचायती राज की व्याख्या स्व.राजीव गांधी के समक्ष कुछ इस तरह की थी। सूबाई व्यवस्था में तीन स्तर पर काम होता है। पहला सचिवालय जिसे अंग्रेजी में सेक्रेटरिएट कहते हैं, यहां सब कुछ सीक्रेट है, अर्थात हो सकता है आपका काम पांच लाख में हो जाए या फिर एक बोतल शराब में, इसे दद्दा सेक्रेटरिएट के बजाए सीक्रेटरेटकहा करते थे। दूसरा है संचालनालय अर्थात डायरेक्ट रेट, यहां सब फिक्स है दो परसेंट लगेगा मतलब दो परसंेट न कम न ज्यादा। पंचायती राज का तीसरा स्तर है जिलों में जिलाध्यक्ष कार्यालय जिसे कलेक्ट रेटकहते हैं अर्थात जो कुछ आया उसे कलेक्ट करना।
आज देश के हर राज्य में कमोबेश यही आलम है। वहीं देश के प्रधानमंत्री डाॅक्टर मनमोहन सिंह ध्रतराष्ट्र की भूमिका में शांति के साथ जनता को लुटने दे रहे हैं। प्रधानमंत्री का दोहरा चरित्र देखकर आश्चर्य ही होता है। वजीरे आजम राज्य सभा से हैं, एवं आम धारणा बन चुकी है कि बिना जनाधार वाले लोग ही राज्य सभा की बैसाखी से संसदीय सौंध तक जाने का मार्ग चुनते हैं, ये रीढ़ विहीन होते हैं। अब समय आ चुका है प्रधानमंत्री को सारे मिथक तोड़ने ही होंगे, उन्हंे कठोर और अप्रिय कदम उठाने ही होंगे, इस देश की नंगी भूखी जनता की चीत्कार सुनना ही होगा, वरना आने वाले समय में जो परिदृश्य बनेगा वह अद्भुत और अकल्पनीय तौर पर भयावह ही होने की उम्मीद है।

नक्सल काडर का प्रशिक्षण स्थल बना बालाघाट!


नक्सलियों की चहलकदमी ने उड़ाई केंद्र की नींद

छत्तीसगढ़ में बनाई अपनी 11वीं कंपनी

मध्य प्रदेश में सात दर्जन से अधिक नक्सलियों के घुसने की आशंका

नक्सल काडर का प्रशिक्षण स्थल बना बालाघाट!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ में नक्सली पदचाप ने एक बार फिर केंद्र सरकार की नींद में खलल डाल दिया है। खुफिया तंत्र को मिली सूचना के मुताबिक नक्सलियों ने छग मंे अपनी ग्यारहवीं कंपनी तैयार कर ली है। पुलिस महानिरीक्षक की तैनाती के बावजूद भी नक्सली अपने कैडर के प्रशिक्षण के लिए मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिले बालाघाट को मुफीद समझ रहे हैं।

खुफिया तंत्र के सूत्रों का कहना है कि नक्सलवादी अपनी सोची समझी रणनीति के तहत अब बियावान जंगलों से निकलकर शहरों में अपना नेटवर्क मजबूत करने की कवायद में जुट गए हैं। छत्तीसगढ़ में हाल ही में चार वारदातों को अंजाम देकर नक्सलियों ने अपने इरादे जग जाहिर कर दिए हैं।

सूत्रों के मुताबिक छत्त्ीसगढ़ के राजनांदगांव और महाराष्ट्र सीमा के गढ़ चिरोली जिलों में एक के बाद एक धमाकों में दोनों ही राज्यों में सक्रिय नक्सलवादियों का आपस में सामंजस्य स्थापित होने की खबरें हैं। वहीं दूसरी ओर नक्सल प्रभावित जिलों में स्थानीय पुलिस बल और अर्ध सैनिक बलों के बीच तालमेल का अभाव भौगोलिक परिस्थितियों का न समझ पाना भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। इसी बीच नक्सलियों की 11वीं कंपनी की स्थापना की खबर ने खुफिया तंत्र की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलका दी हैं। सूत्रों का कहना है कि यद्यपि इसमें नक्सलियों की तादाद काफी कम है फिर भी नक्सलियों की सक्रियता के चलते इसमें भारी मात्रा में स्थानीय युवा सदस्यों के जुड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से 80 से अधिक नक्सलियों की लांजी और बैहर में आमद के संकेत मिले हैं। गौरतलब है कि बालाघाट में टांडा और मलाजखण्ड दलम पहले से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो नक्सलवादियों ने बालाघाट में अपना ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया है, जिसमें प्रशिक्षण लेने बड़ी तादाद में नए जुड़े नक्सली आ रहे हैं।

गौरतलब होगा कि संयुक्त मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ के प्रथक होने से पूर्व) में बालाघाट और मण्डला में नक्सली गतिविधियों के मद्देनजर पुलिस महानिरीक्षक का पद सृजित किया गया था, जिसका मुख्यालय बालाघाट से लगभग ढाई सौ तो मण्डला से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर जबलपुर में रखा गया था, बाद में इसे बालाघाट स्थानांतरित कर दिया गया है। आईजी नक्सल जोन की तैनाती के बावजूद भी बालाघाट में नक्सली प्रशिक्षण केम्प के संचालन की खबरें आश्चर्यजनक ही कही जाएंगी। इसके पहले मध्य प्रदेश के तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की नक्सलियों ने उनके निवास पर ही नृशंस तरीके से गला रेतकर हत्या कर दी थी।

उमा का पीछा करते शिवराज


उमा का पीछा करते शिवराज

जहां जहां उमा भारती जा रहीं हैं वहां वहां शिवराज दे रहे दस्तक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के वर्तमान और पूर्व निजाम के बीच चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जहां जहां जा रही हैं, वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान वहीं वहीं अपनी आमद दे रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व उमा भारती दिल्ली स्थित मध्य प्रदेश भवन में रूकीं थीं, दूसरे ही दिन शिवराज सिंह चैहान भी वहां आ धमके थे।

उस वक्त उमा भारती ने राजनैतिक बिसात छोड़कर गंगा का दामन थाम गंगा की सफाई के लिए अनशन करने की बात कही थी। उमा भारती ने अपने कौल को निभाते हुए उत्तराखण्ड के हरिद्वार जाकर अपना अनशन प्रारंभ किया। रविवार को उमा भारती ने गंगा हर की पौड़ी में गंगा में डुबकी लगाकर गंगा की रक्षा के लिए बलिदान देने का अपना संकल्प दुहराया। वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान अपने परिवार के साथ चार धाम की यात्रा पर निकल पड़े और रविवार को ही शिवराज ने हरिद्वार में व्हीआईपी घाट पर जाकर गंगा में डुबकी लगाई।

सियासी हल्कों में उमा भारती और शिवराज सिंह चैहान का बार बार अलग अलग स्थानों पर एक साथ पहुंचना महज संयोग की दृष्टि से नहीं देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि उमा भारती की भाजपा में वापसी के प्रबल विरोधी शिवराज सिंह चैहान द्वारा उनके हर पदचाप को बाद में पहुंचकर मिटाया जा रहा है।

फिर लग सकती है पेट्रोल में आग!


फिर लग सकती है पेट्रोल में आग!

कच्चे तेल के सस्ते होने पर भी कंपनियां हैं घाटे में

जीओएम 9 जून को तय करेगा बढ़ोत्तरी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। तैयार रहिएगा, सरकार जल्द ही पेट्रोल के दाम और बढ़ा सकती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ़ने पर घाटे का हवाला देकर पेट्रोल के दाम बढ़ाने वाली तेल कंपनियां अब कच्चे तेल के दाम कम होने पर भी पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने की दुहाई ही दे रही हैं।
गौरतलब होगा कि जब कच्चे तेल की कीमत 75 डालर प्रति बैरल थी तब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 110 डालर प्रति बैरल है, जो अप्रेल माह में 120 डालर तक पहुंच गई थी। इसी कारण पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए थे और डीजल, केरोसीन तथा रसोई गैस के दाम बढ़ाने की तैयारियां थीं। हालिया जानकारी के अनुसार प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली उच्च अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह की बैठक नौ जून को प्रस्तावित है जिसमें इसकी कीमत पर कोई निर्णय लिए जाने की उम्मीद है।
उधर इंडियन आयल कार्पोरेशन के सूत्रों का कहना है कि मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय दरांे के कारण उसे हर रोज 261 करोड़ रूपयों का नुकसान झेलना पड़ रहा है। सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में कंपनी को पेट्रोल पर 4 रूपए 58 पैसे, डीजल पर 14 रूपए 66 पैसे, मिट्टी के तेल पर 28 रूपए 27 पैसे प्रति लिटर तो रसाई गैस पर 330 रूपए प्रति सिलेंडर का घाटा उठाना पड़ रहा है। कंपनी की उधारी अब तक 67 हजार 880 करोड़ रूपए हो गई है जिस पर कंपनी को 1500 करोड़ का ब्याज भी चुकाना पड़ रहा है।

अव्यवस्था के साए में वेष्णो देवी यात्रा


अव्यवस्था के साए में वेष्णो देवी यात्रा

श्राईन बोर्ड को नहीं परवाह श्रृद्धालुओं की

कहीं बिजली गुल तो कहीं उबड़ खाबड़ सड़कें

(सी.एस.जोशी)

कटड़ा। त्रिकुटा की पर्वत श्रंखलाआंे पर विराजी माता वेष्णो देवी की यात्रा के दरम्यान अब श्रृद्धालुओं द्वारा नारकीय कष्ट भोगे जा रहे हैं। तत्कालीन महामहिम राज्यपाल जगमोहन के कार्यकाल में माता वेष्णो देवी श्राईन बोर्ड द्वारा श्रृद्धालुओं की सुविधाओं को ध्यान में रख अनेक प्रबंध किए गए थे, जो वर्तमान में दम तोड़ती जा रही हैं।

जम्मू काश्मीर मंे हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थ स्थल माता वेष्णो देवी के दर्शन के दौरान कटड़ा से वाणगंगा द्वार पर पहुंचते ही अव्यवस्थाओं का आलम पसरा दिखाई देता है। कहा जाता है कि किसी भी देवी देवता या देवालय के दर्शन के पूर्व हाथ पैर धोए जाते हैं किन्तु वाणगंगा प्रवेश द्वार पर पहुंचने के पहले सड़क पर बहता नालियों का गंदा बदबूदार पानी श्रृद्धालुओं के पांव पखारता है।

माता रानी के मंदिर को उड़ाने की आतंकी धमकी के बावजूद भी वाणगंगा से भवन तक सुरक्षा के नाम पर महज रस्म अदायगी ही की जा रही है। वाण गंगा से जैसे ही चढ़ाई कर उपर जाया जाता है वैसे ही जगह जगह सड़कों की टाईल्स उखड़ी पड़ी हैं। रास्ते में टट्टू वालों की दादागिरी के चलते राह में चलना दूभर हो जाता है।

हद तो तब हो जाती है जब आए दिन वेष्णो देवी की लाईट गुल हो जाती है। रात के अंधेरे में दुर्गम पहाड़ी पर बिना लाईट के अंधियारी रात में श्रृद्धालुओं द्वारा किस तरह भगवान का नाम लेकर चढ़ाई की जाती होगी यह शोध का ही विषय कहा जाएगा। भरी गर्मी में भी रास्ते में पड़ने वाली प्याऊ में पीने का पानी श्रृद्धालुओं को नसीब नहीं हो रहा है, इतना ही नहीं गंदे बदबू मारते शौचालयों के आसपास से गुजरने वाली श्रृद्धालुओं द्वारा बरबस ही अपनी नाक पर रूमाल रखने को मजबूर होना पड़ रहा है।

सोमवार, 30 मई 2011

क्या वाकई मर गया ओसामा!


क्या वाकई मर गया ओसामा!!

(लिमटी खरे) 

अमेरिका को दुनिया का चैधरी यूं ही नहीं कहा जाता है, अमेरिका का हर कदम बहुत ही सोचा समझा और दूरंदेशी वाला होता है। कहते हैं कि अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति जब भी विदेश दौरे पर होते हैं तो उनके साथ उनका लाव लश्कर पहले ही जाकर स्थिति को भांपकर उनके मुताबिक सुरक्षा तंत्र मजबूत करता है। इतना ही नहीं महामहिम की विष्ठा (मल मूत्र) तक सुखाकर उनके सुरक्षा कर्मी अपने साथ ले जाते हैं, ताकि महामहिम के बारे मंे ज्यादा पता साजी न की जा सके। अमेरिका ने कहा कि ओसामा मारा गया, उसे समुद्र में कहीं दफन कर दिया गया, उधर ओसामा की कथित बेवा का कहना है कि ओसामा को जिंदा ही पकड़ा गया था। हो सकता है अमेरिका ने ओसामा को जिन्दा ही पकड़ लिया हो और फिर उसे पूछताछ के लिए अपने साथ ले जाया गया हो, बाद में अगर ओसामा को मार दिया जाता है या मर भी जाता है तो विश्व के सामने यही कहानी सामने आएगी कि ओसामा को तो एटमाबाद में ही मार गिराया गया था।


दुनिया भर में आतंक का पर्याय बन चुके ओसामा बिन लादेन की दहशत अब समाप्त हो चुकी है। दुनिया के चैधरी अमेरिका का दावा है कि ओसामा को एटमाबाद में मार गिराया गया है। पाकिस्तान में ओसामा जिस स्थान पर निवासरत था वह पाकिस्तान के एटमाबाद का हाई सिक्यूरिटी जोन है। कोई परिवार एक घर में बिना बिजली पानी फोन कनेक्शन के सालों साल से रह रहा हो और उस देश या उस शहर के निवासियों आस पड़ोस के लोगों को पता भी न चले यह बात गले नहीं उतरती है। हाई सिक्यूरिटी जोन में वैसे भी हर घर पर खुफिया एजेंसी की नजर होती है। बावजूद इसके दहशतगर्दी के सरगना ओसामा बिन लादेन ने वहां सालों साल गुजार दिए।

एक घर को चलाने के लिए पानी और राशन की आवश्यक्ता होती है। कोई तो होगा जो इस घर में पानी और राशन पहुंचाता होगा। मोहल्ले का बनिया हर घर के बारे में जानता है। अगर आप कहीं जाएं और किसी का पता न मिले तो मोहल्ले के धोबी, मोची, परचून की दुकान, पान वाले से पता पूछा जा सकता है। अमूमन होता भी यही है कि एकदम सही और सटीक पता ये ही बता पाते हैं। क्या एटमाबाद में ओसामा के बारे में मोहल्ले के इन जासूसों को पता नहीं होगा?

अगर यह संभव नहीं है तो फिर अमेरिका ने ओसामा का पता आखिर कैसे निकाल लिया। दूसरी सबसे आपत्तिजनक बात तो यह है कि अमेरिका ने पाकिस्तान में जाकर इस तरह की कार्यवाही की। यह तो वही बात हुई कि कोई बाहरी आदमी आपके घर के अंदर आकर धमाल मचाकर किसी को पकड़कर साथ ले जाए और आपको पता भी न चले। यह तो सरासर गुण्डागर्दी हुई। वैसे अमेरिका की कार्यवाही एक तरह से सही ही मानी जाएगी, क्योंकि ओसामा ने कहर ही बरपा रखा था दुनिया भर में। आज पाकिस्तान हाथ मलकर ही रह गया है। वह अमेरिका के सामने कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तान की नापाक हरकतों के कारण दुनिया के अन्य देश उसकी मदद को आगे नहीं आ रहे हैं।

इस मामले में सबसे अधिक आश्चर्यजनक पहलू यह है कि पाकिस्तान के साथ अमेरिका ने जबरा मारे रोन न देकी कहावत चरितार्थ की है। अर्थात एक जोरदार झन्नाटेदार झापड़ रसीद करने के बाद ताकीद किया कि रोना नहीं, वरना और पिटोगे। अब पाकिस्तान अंदर ही अंदर कसमसाकर रह गया है। दूसरी तरफ आर्थिक और सैन्य मदद उपलब्ध कराकर अमेरिका पाकिस्तान की पीठ पर हाथ भी फेरता जा रहा है, जिसकी विश्व भर में निंदा होना चाहिए।

देखा जाए तो आज विश्व की महाशक्ति बनने के लिए अमेरिका और चीन दोनों ही में गलाकाट प्रतिस्पर्धा जारी है। यह बात भी उतनी ही सच है जितनी की दिन और रात कि दोनों ही देशों को भारत के समर्थन की दरकार है। इस बात को पता नहीं भारत के नीति निर्धारक समझ क्यों नहीं पा रहे हैं या फिर समझ कर भी समझना नहीं चाह रहे हैं। एक तरफ अमेरिका अपना दवाब भारत पर बना रहा है। विकीलिक्स के खुलासे मंे साफ हो गया है कि भारत गणराज्य में सरकार किसी की भी बने पर मंत्रीपद का फरमान अमेरिका के द्वारा ही दिया जाता है। अमेरिका की पसंद से ही देश में लाल बत्ती का निर्धारण होता है।

वहीं दूसरी ओर चीन द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के मानिंद देश की अर्थ व्यवस्था में सेंध लगाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। सस्ते और गैर टिकाऊ चीनी उत्पादों की धूम इस समय देश भर में है। चायनीज सामान का जादू लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है। चीन ने सबसे पहले अपनी सोची समझी रणनीति के तहत कुटीर उद्योग पर हलमा कर उसके हाथ काट दिए हैं। आज दिए, खिलोने, झालर, इलेक्ट्रानिक सामान यहां तक कि जूते चप्पल भी चायनीज आ गए हैं।

बहरहाल अमेरिका को दुनिया का चैधरी यूं ही नहीं कहा जाता है, अमेरिका का हर कदम और फैसला बहुत ही सोचा समझा और दूरंदेशी वाला होता है। कहते हैं अमरिका अपनी चालें इस कदर चलता है कि किसी को आने वाले कदमों की आहट तक नहीं मिल पाती है। कहा तो यह भी जाता है कि अमेरिका के महामहिम राष्ट्रपति जब भी विदेश दौरे पर होते हैं तो उनके साथ उनका लाव लश्कर पहले ही जाकर स्थिति को भांपकर उनके मुताबिक सुरक्षा तंत्र मजबूत करता है। इतना ही नहीं महामहिम की विष्ठा (मल मूत्र) तक सुखाकर उनके सुरक्षा कर्मी अपने साथ ले जाते हैं, ताकि महामहिम के स्वास्थ्य आदि के बारे मंे ज्यादा मालुमात न की जा सके।

लादेन को पकड़ने की योजना को गुप्त तौर पर अंजाम दिया गया। यहां तक कि पाकिस्तान की सरजमीं पर हुए इस आपरेशन की भनक पाकिस्तान को भी नहीं लग सकी। अमेरिका ने कहा कि ओसामा मारा गया, अमेरिका का एक हेलीकाप्टर इसमें खराब हो गया। अमरिका ने उस हेलीकाप्टर को नष्ट कर दिया। ओसामा के पास क्या क्या मिला इस बारे में भी कोई ठोस बयान अब तक नहीं आया है।

अमरिका का कहना है कि ओसामा को समुद्र में कहीं दफन कर दिया गया, क्योंकि आशंका थी कि अगर उसे दफनाया गया तो लोग उसकी मझार पर जाकर सजदा करना आरंभ कर देंगे। उधर ओसामा की कथित बेवा का कहना है कि ओसामा को जिंदा ही पकड़ा गया था। हो सकता है अमेरिका ने ओसामा को जिन्दा ही पकड़ लिया हो और फिर उसे पूछताछ के लिए अपने साथ ले जाया गया हो, बाद में अगर ओसामा को मार दिया जाता है या मर भी जाता है तो विश्व के सामने यही कहानी सामने आएगी कि ओसामा को तो एटमाबाद में ही मार गिराया गया था।

अमेरिका कुछ भी कर सकता है। एक किंवदंती के मुताबिक अमरिका में ‘‘एरिया 65‘‘ नामक एक स्थान है, जहां आम नागरिक नहीं पहुंच सकते हैं। वहां काम करने वालों को विशेष विमान हवाई पट्टी से उठाकर एरिया 65 तक ले जाते हैं और साल में एक बार मिलने वाली छुट्टी में वे घर उसी तरह गुमनाम जगह से वापस आते हैं। इस स्थान के बारे में अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों और हवाई जहाज के पायलट्स को ही पता होता है।

इस जगह काम करने वालों को साल भर न तो अपने परिवार से बात करने मिलती है और ना ही वे उस स्थान, वहां के क्रिया कलाप के बारे में ही किसी से कुछ कह सकते हैं। वहां केमरा ले जाना भी मना है। कहते हैं कि एक कर्मचारी ने सालों पहले वहां अपने साथ छुपाकर केमरा ले जाया गया था, अपनी सेवानिवृत्ति के उपरांत उसने वहां खीचीं फोटो को इंटरनेट पर डाल दिया। इसके बाद उसी अधार पर ‘‘इंडिपेंस डे‘‘ नामक चलचित बनाया था लीवुड ने। जिसमें एलियन्स पर अमरीकी शोध को दर्शाया गया था।

सी आधार पर यह आशंका उपजती है कि हो सकता है अमेरिका ने आतंक के पर्याय ओसामा बिन लादेन को जिंदा पकड़कर ले जाया गया हो, फिर उससे गहरी पूछताछ की जा रही हो। जो पटकथा इस पूरे नाटक के लेखक ने लिखी होगी वही पटकथा अमेरिका द्वारा दुनिया के सामने लाई जा रही है। हो सकता है ओसामा का समुद्र में अंतिम संस्कार इसी का एक हिस्सा हो। वास्तव में अमेरिका द्वारा ओसामा से गहन पूछताछ जारी हो।
अमेरिका ओसामा को इस कदर जल्दबाजी में मार दे यह बात गले नहीं उतरती। कभी कहा गया कि ओसामा निहत्था था, अगर यह सच है तो अमेरिका को उसे जिन्दा पकड़ लिए जाने की आशंकाएं और बलवती होती हैं। अगर यह बात उजागर कर दी जाती कि उसे जिन्दा पकड़ लिया गया है तो निश्चिित तौर पर जेहादी संगठनों की नालें अपने आका ओसामा को छुड़ाने अमेरिका की ओर मुड़ जाती। अगर वाकई ओसामा बिन लादेन को बराक ओबामा की टीम ने मार गिराया है तो फिर ओसामा के फोटो जारी करने उसे समुद्र में दफनाए जाने के चित्र आखिर सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

हाल ही में खबर मिली है कि सीआईए की एक टीम ने एटमाबाद में अलकायदा क सरगना ओसामा बिन लादेन की हवेली की गहन तलाशी ली है। पाकिस्तान के अखबार डानके अनुसार सीआईए की टीम हेलीकाप्टर से वहां पहुंची और एटमाबाद में ओसामा की हवेली की छः घंटे से अधिक समय तक तलाशी ली। कहा जा रहा है कि इसमें एक तहखाना भी मिला है जिसमें भविष्य के हमले की योजनाओं के बारे में पता लगाया जा रहा है। ओसामा के कथित तौर पर मरने के लगभग एक माह बाद दुबारा अमेरिका की दिलचस्पी एटमाबाद की ओसामा की हवेली में होना आश्चर्यजनक है। हो सकता है ओसामा के साथ पूछताछ में सीआईए के हाथ कुछ एसे संकेत लगे हों जिससे उसे दुबारा ओसामा की हवेली खंगालना जरूरी लग रहा हो।

9/11 में वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ। इसमें कितनी जाने गईं, अमेरिका द्वारा इसकी सूची तक जारी नहीं की गई। यह है अमेरिका का अपना नेटवर्क और सिस्टम। घर के अंदर क्या हो रहा है यह बात अमेरिका द्वारा कतई सार्वजनिक नहीं की जाती है। यही हादसा अगर किसी और देश में हुआ होता तो मुआवजे के लोभ में मारे गए लोगों की तादाद से तीन चार गुना लोगों की फेहरिस्त जारी हो गई होती, इतना ही नहीं मीडिया भी चीख पुकार कर सूची जारी करने की बात पर आमदा हो जाता। पर अमेरिका का मीडिया देशभक्त है, उसे अपने देश से प्यार है, सो अमेरिकन मीडिया ने सरकार की नीति का ही अनुसरण किया। आखिर क्यों न करे, अमेरिकन सरकार में बैठे लोग भला भारत के जनसेवकों के मानिंद अपनी शाखाओं को थोडे़ ही कुतर कर खा रहे हैं।

ओसामा बिन लादेन ने भारत में भी दहशतगर्द चेहरों को तबाही मचाने पाबंद किया था, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए भारत सहित समूची दुनिया को चाहिए कि वह अमेरिका पर यह दबाव बनाए कि ओसामा के मारे जाने और उसे समुद्र में दफनाए जाने के चित्र और वीडियो जारी करे ताकि दुनिया भर में यह संदेश जा सके कि मानवता के खिलाफ दहशतगर्दी फैलाने के लिए जिम्मेवार लोगों का हश्र कितना भयानक होता है।