सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

सुशासन जनता का हक: राष्ट्रपति

सुशासन जनता का हक: राष्ट्रपति
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार से महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी बुरी तरह आहत हैं। संसद के बजट सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। देश की जनता सुशासन की हकदार है। अपने अभिभाषण में राष्ट्रपति ने काला धन, खाद्य सुरक्षा, भ्रष्टाचार, मंहगाई, सड़क, बिजली, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार का रवैया स्पष्ट किया।
15वीं लोकसभा के बजट सत्र को संबोधित करते हुए महामहिम राष्ट्रपति ने कहा कि लद्दख में बादल फटने के बाद सरकार ने बडी ही संजीदगी के साथ वहां राहत और पुर्नवास का काम किया है। पंडित भीमसेन जोशी के अवसान पर उन्हें श्रृद्धांजली देते हुए उन्होंने कहा कि उनके निधन से हुई क्षति की भरपाई मुश्किल है। कामन वेल्थ गेम्स की सफलता का श्रेय उन्होंने दिल्लीवासियों के शिष्टाचार को दिया। हिंसा के मसले पर कड़ा रूख अपनाते हुए महामहिम ने कहा कि किसी भी रूप में हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
सरकार की प्राथमिकताएं गिनाते हुए उन्होंने कहा कि मुद्रा स्फीती की वृद्धि दर को रोकना, खाद्यान मंहगाई को काबू में लाना, सामाजिक जीवन में ईमानदारी और सत्यता की कमी से निपटना, गरीबों और कमजोर तबके के लोगों के विकास आदि जैसे प्रमुख लक्ष्य इस सरकार की प्राथमिकताएं हैं। श्रीमति पाटिल ने कहा कि धान का समर्थन मूल्य 550 रूपए से बढ़ाकर 1000 रूपए प्रति क्विंटल और गेंहूं का 650 रूपए से बढ़ाकर 1100 रूपए किया गया है। इसी तरह गन्ने के समर्थन मूल्य में भी पचास फीसदी से ज्यादा की बढोत्तरी की गई है। इसी तरह राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 35 हजार करोड़ का निवेश किया गया है, जिससे देश भर में हरित क्रांति का आगाज हो सकेगा।
दूरसंचार के मामले मंे संतोष व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि देश भर में अस्सी करोड़ से अधिक उपभोक्ताओं की संख्या होना अपने आप में एक मिसाल है। अब सरकार ने एक लाख तक की आबादी वाले शहरों में निजी स्तर पर एफएम रेडियो की स्थापना की प्रस्तावना में 283 शहरों में 806 से ज्यादा एफएम रेडियो की स्थापना का लक्ष्य है। मोबाईल ब्राडबेण्ड का विस्तार ग्रामीण स्तर तक किए जाने पर महामहिम ने जोर दिया। साथ ही बिजली के उत्पादन को बढ़ाने की बात भी उनके द्वारा कही गई।
आतंकवाद और जातीय हिंसा है बड़ी चुनौति
महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने माना कि आतंकवाद, कट्टरवाद, जातीय हिंसा देश में बड़ी चुनौति के रूप में उभरकर सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि मुंबई हमले के बाद सरकार द्वारा सुरक्षा मानकों में व्यापक स्तर पर बदलाव किए हैं। अभी राष्ट्रीय जांच एजेंसी और सुरक्षा बलों की लगभग सौ बटालियन की स्थापना भी किया जाना प्रस्तावित है।

हरवंश सिंह को थी क्लीन चिट

हरवंश सिंह को थी क्लीन चिट की जल्दी
लेकिन फरियादी ने लगायी  शीघ्र सुनवायी की अर्जी  
मनोज मर्दन त्रिवेदी
  सिवनी। आमानाला जीमन घोटाले मामले में विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह और उनके पुत्र रजनीश सिह के बरी हो जाने का मामला राजनैतिक हल्कों में चर्चित हैं। हरवंश सिंह को तो मामले में क्लीन चिट लेने की जल्दी समझ में आती हैं लेकिन अदालत में शीघ्र सुनवायी की गुहार फरियादी द्वारा की जाना समझ से परे हैं। जिस फरियादी ने अदालत में परिवाद दायर कर हरवंश सिंह और उनके पुत्र पर आरोप लगाये थे उसी फरियादी द्वारा उन्हें आरोप मुक्त करने में जल्दी सियासी हल्कों में चर्चित है। झूठे आरोप लगाकर परिवाद पेश कर आरोपी बनाने वाले फरियादी के खिलाफ हरवंश सिंह द्वारा कोई कार्यवाही नही किये जाने की घोषणा के कई अर्थ लगाये जा रहें हैं।
  उल्लेखनीय है कि बहुचर्चित आमानाला जमीन घोटाले में फरियादी मो. शाह ने लखनादौन के न्यायालय में 18 मई 2010 को एक परिवाद धारा 156(3) के अंर्तगत पेशकर अभियुक्त न्याज अली,रजनीश सिंह और हरवंश सिंह के विरुद्ध 420,506,294,120बी के तहत प्रकरण दर्ज कर कार्यवाही करने की गुहार लगायी थी। कोर्ट के बार बार आदेश देने के बाद भी रजनीश सिंह एवं हरवंश सिंह के खिलाफ पुलिस ने मामला पंजीबद्ध नहीं किया था। अंततः 28 जून 2010 को इनके खिलाफ मामला पंजीबद्ध करने की सूचना कोर्ट को दी गयी थी। फरियादी ने कोर्ट में बयान देकर यह कहा था कि उसकी हरी महाराज ने रजनीश सिंह से फोन पर बात करायी थी। फरियादी ने यह भी कहा था कि रजनीश सिंह ने उससे कहा था कि बैठकर फैसला कर लेते हैं। अन्य सभी खातेदारों के साथ बैठ कर बात कर लो। ऐसा करते करते 3 माह गुजर गये लेकिन कोई भी सह खातेदार ने मेरे साथ बैठकर बात नहीं की हैं। यहां यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं कि फरियादी की पुश्तैनी जमीन सादकसिवनी निवासी रवी नारायण शर्मा ने खरीदी हैं जिनके हरवंश सिंह से नजदीकी संबंधों की चर्चा भी होती रही हैं।
  सियासी हल्कों में व्याप्त चर्चा के अनुसार हाल ही में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष का चयन होना हैं। नेता प्रतिपक्ष के चयन का काम तो फरवरी माह में ही किये जाने की संभावना है। राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चित हैं कि हरवंश सिंह भी इस दौड़ में शामिल हैं। इसीलिये वे प्रयासरत थे कि अदालत में पंजीबद्ध धोखाधड़ी के मामलें में उन्हें जल्द ही क्लीन चिट मिल जाये क्योंकि इस मामले शिकायत जिले के वरिष्ठ इंका नेता आशुतोष वर्मा आला कमान को कर चुके थे। लेकिन फरियादी द्वारा कोर्ट में जल्दी सुनवायी की गुहार करना लोगों को समझ में नहीं आ रहा हैं। उल्लेखनीय है कि प्रकरण की खारिजी पर विचार हेतु कोर्ट मामले को 7 फरवरी 2011 को सुनवायी के लिये नियत कर चुकी थी लेकिन कोर्ट में उपस्थित फरियादी ने एक आवेदन पत्र देकर प्रार्थना की कि आज ही याने 28 जनवरी को ही सुनवायी कर ली जाये। इस अर्जी को स्वीकार करते हुये कोर्ट ने उसी दिन प्रकरण में खारिजी लगा दी। खारिजी के संबंध फरियादी ने अदालत में अपनी सहमति जतायी तथा अपने बयान में कहा कि,“ मेरा कोई विवाद शोष नही  है।“फरियादी का अदालत में दिया यह कथन भी बहुअर्थी माना जा रहा है।
  यहां यह भी उल्लेखनीय हें कि आरोपी ने जिस तेजी से आरोप लगाये थे उसी तेजी से स्वयं ही अरोप वापस लेने की जल्दी चर्चा का विषय बनी हुयी हैं। कुछ लोगों का तो यह मानना है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि फोन पर हुयी चर्चा के अनुसार अदालत के बाहर कहीं कोई बैठक हुई हो और मामला सुलट गया हो इसीलिये फरियादी ने अपने बयान में यह कहा हो कि मेरा कोई विवाद शेष नहीं है। कुछ लोगों का तो यह भी मानना हैं कि जिले में हो रहे बेनामी जमीनों के सौदे की तरह ही यह मामला ना हो।
  इस निर्णय की जानकारी देने के लिये बुलायी गयी प्रेस कांफ्रेंस में जब हरवंश से यह पूछा गया कि झूठे आरोप लगाकर आपकी छवि खराब करने वाले फरियादी मों. शाह के विरुद्ध झूठी शिकायत करने और मानहानी का क्या आप दावा करेंगें तो हरवंश सिंह ने साफ मना कर दिया कि वे ऐसी कोई कार्यवाही नहीं करेगें। उनके इस जवाब से भी लोग भैंचक हैं कि आखिर ऐसे आदमी के खिलाफ कोई कार्यवाही करने से वे क्यों हिचक रहें हैं?  
  अब इस सब में सच्चायी क्या हैं? यह तो पर्दे के पीछे ही हैं। लेकिन इस मामले के निपट जाने से विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह को राजनैतिक रूप से काफी राहत मिल गयी हैं।
घोखाधड़ी का यह तीसरा मामला था हरवंश परसिवनी। लंबे राजनैतिक जीवन में विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के ऊपर यह घोखाधड़ी करने का तीसरा मामला हैं। पहला मामला पिछड़ेवर्ग की एक विधवा महिला था जिसने अपनी जमीन हड़प लेने का आरोप लगयाथा। दूसरा मामला आदिवासियों को पैसे लेकर सिंचाई पंप ना देने का था जिसमें धोखाध्ड़ी का आरोप प्रमाणित पाने पर उप पंजीयक सहकारी संस्थाओं ने सिवनी पुलिस थाने को अपराध पंजीबद्ध कर कार्यवाही करने हेतु लिखित पत्र भेजा था। तीसरा आरोप एक फकीर मुस्लिम ने लगाया और अदालत में मेरा कोई विवाद शेष नहीं का बयान दियाऔर मामला खारिज हो गया। यह भी एक विचारणीय प्रश्न हैं कि बार बार हरवंश सिंह पर धोखाधड़ी के आरोप लगते क्यों हैं?
क्या बेनामी खरीद का मामला है?
सिवनी। फरियादी की पुश्तैनी जमीन के 22 खातेदारों में से 19 खातेदारों ने अपनी जमीन सादकसिवनी निवासी रविनारायण शर्मा ने 29 जनवरी 2010 को खरीद ली थी। इस सौदे की रजिस्ट्री भी मामले में जांच में आयी थी। विक्रय पत्र की फोटो कापी भी ली गयी थी। बताया जाता हैं कि क्रेता रविनारायण और हरवंश सिंह के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। इसी आधार पर कई लोगों का यह भी मानना हैं कि जिले में इस चल रहें गोरख धंधें के समान ही यह भी एक बेनामी सौदा ना हो?
सात महीने दस दिनों में निपटी कार्यवाही
सिवनी। विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह के विरुद्ध परिवाद पत्र के द्वारा अदालत में पेश किये गये मामले का निर्णय होने में सात महीने दस दिनों का समय लगा। उल्लेखनीय हैं कि यह परिवाद मो. शाह ने 18 मई 2010 को पेश कर हरवंश सिंह धोखाधड़ी के आरोप चस्पा कियं थे और 28 जनवरी 2011 को अदालत में मेरा कोई विवाद शेष नहीं हैं का बयान दिया जिसके आधार पर अदालत ने खारिजी मंजूर कर दी।
कार्यवाही करने में क्यों हिचक रहें हैं हरवंश
सिवनी। झूठे आरोप लगाकर इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया में सुर्खियां बनने वाले हरवंश सिंह अब मामले के झुठे साबित  हो जाने के बाद फरियादी मो. शाह के खिलाफ झूठी शिकायत करने के लिये आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कार्यवाही करने और मानहानि का दावा करने से क्यों साफ साफ मना कर रहे हैं? उनके इस इंकार में मामले को सुलटाने की कोई गुत्थी तो नहीं उलझ रही है?

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

शिवराज से मांगा हिसाब मनमोहन ने

शिवराज से मांगा हिसाब मनमोहन ने
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। किसानों के मुद्दे पर आमने सामने आ चुके मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के बीच रार तेज हो गई है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचे शिवराज सिंह चौहान से डॉ.मनमोहन सिंह ने केंद्र पोषित समस्त योजनाओं के बारे में हिसाब मांगकर चौंका दिया।
प्रधानमंत्री निवास के भरोसेमंद सूत्रों का दावा है कि आज वजीरे आजम से मिलने पहुंचे शिवराज सिंह चौहान से प्रधानमंत्री ने राहत की अगली किश्त तब तक जारी नहीं करने की बात कही गई है जब तक कि केंद्र की इमदाद का हिसाब मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आना पाई से केंद्र को नहीं दिया जाता।
सूत्रों का कहना है कि पीएम और प्लानिंग कमीशन से मिलने गए शिवराज सिंह चौहान का होम वर्क पूरा न हो पाने के चलते वे मध्य प्रदेश के किसानों की झोली में कुछ डालने में कामयाब नहीं हो सके हैं। प्रधानमंत्री ने सूबे के निजाम को आश्वासनों के लालीपाप थमाकर फिलहाल का टकराव टाल दिया है।
शिवराज आज सुबह साढ़े नौ बजे योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से मिले फिर उन्होने प्रधानमंत्री आवास की ओर रूख किया। उधर अपरान्ह ग्यारह बजे मध्य प्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर भी नियमित उड़ान से दिल्ली पहुंच गए हैं। महामहिम के मध्य प्रदेश भवन पहुंचते ही पत्रकारों से रूबरू शिवराज सिंह चौहान हवाई अड्डे की ओर कूच कर गए और सरकारी उड़न खटोले से भोपाल रवाना हो गए।

0 कल से जमे हैं अफसर
मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अवनि वैश्य के नेतृत्व में प्रमुख सचिव राजस्व, प्रमुख सचिव खाद्य, प्रमुख सचिव परिवहन के अलावा एग्रीकल्चर प्रोडक्शन कमिश्नर ने मध्य प्रदेश भवन में अपना डेरा गुरूवार से डाला हुआ है। सूत्रों का कहना है कि गुरूवार दिन भर इन अफसरान ने योजना आयोग के अधिकारियों के साथ माथा पच्ची की। बाद में रात सवा दस बजे जब शिवराज सिंह चौहान एमपी भवन पहुंचे तब उनके साथ इन अधिकारियों ने बैठक कर पीएम और योजना अयोग के उपाध्यक्ष से बैठक का एजेंडा तय किया।

0 पीएम सीएम के बीच का सेतु बने लाट साहेब
डॉ.मनमोहन सिंह और शिवराज सिंह चौहान के बीच संवाद का सेतु सूबे के महामहिम राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर बन गए हैं। गौरबलब होगा कि मुख्यमंत्री के अनशन के पूर्व राजभवन से ही रामेश्वर ठाकुर ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की बात करवाकर अनशन समाप्त करवाया था। पीएमओ के सूत्रों के अनुसार पीएम और लाट साहेब के बीच हुई चर्चा के उपरांत ही पीएम और सीएम की मुलाकात संभव हो पाई है।

पाला को प्राकृतिक आपदा में शामिल किया जाएगा: शिवराज

पाला को प्राकृतिक आपदा में शामिल किया जाएगा: शिवराज
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। ‘‘वर्तमान में पाला को प्राकृतिक आपदा नहीं माना जाता है, प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि इसे प्राकृतिक आपदा में शामिल करने की कार्यवाही की जाएगी। मध्य प्रदेश को कितनी धनराशि देना है कितनी मदद करना है इस मामले में विचार किया जाएगा।‘‘ उक्ताशय की बात आज मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश भवन में पत्रकारों से चर्चा के दौरान कही।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि उन्होंने केंद्र से 2400 करोड़ रूपयों के विशेष पैकेज की मांग की है। साथ ही पीएम ने सीएम को आश्वासन दिया कि पाला को प्राकृतिक आपदा की फेहरिस्त में शामिल करने और मध्य प्रदेश को कितनी इमदाद दी जानी है इसके लिए मंत्री समूह (जीएमओ) का गठन किया जाएगा, जिसमें योजना आयोग के उपाध्यक्ष, वित्त और गृह मंत्री के अलावा शिवराज चौहान को विशेष आमंत्रित बनाया गया है। श्री चौहान ने कहा कि राज्य सरकार ने अब तक पांच सौ करोड़ रूपयों की राहत राशि वितरित की जा चुकी है।
सीएम ने कहा कि फसल बीमा योजना में इकाई को क्षेत्र के बजाए किसान को बनाने की मांग पर प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया कि इसके लिए एक वर्कशाप का आयोजन किया जाएगा जिसमें इस मसले पर चर्चा होगी, इसमें से एक वर्कशाप भोपाल में भी आयोजित होगा।
श्री चौहान ने बताया कि केंद्रीय सड़क निधि में दो सौ करोड़ रूपए, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना पर सैद्धांतिक चर्चा के उपरांत केंद्र द्वारा पांच सौ करोड़ रूपए की राशि, इंदिरा आवास में एक लाख अतिरिक्त मकान की स्वीकृति भी केंद्र सरकार ने दी है। खाद्यान आवंटन के मसले पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश में 65 लाख परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं, वर्तमान में केंद्र द्वारा महज 41 लाख परिवारों को इसका लाभ दिया जा रहा है। सुरेश तेंदुलकर समीति की सिफारिशों के मान लिए जाने के बाद मध्य प्रदेश को इसका सबसे अधिक लाभ होगा। उन्होंने बताया कि महेश्वर परियोजना के रूके हुए काम के लिए केंद्र एक दल भेजकर वस्तुस्थिति का पता भी लगाएगा। कोयला आवंटन में पक्षपात का आरोप लगाने के उपरांत सीएम ने कहा कि कोल के आवंटन के युक्तियुक्तकरण हेतु भी टास्क फोर्स का गठन कर दिया गया है।

शिवराज के आरोप तथ्यहीन: पचौरी

शिवराज के आरोप तथ्यहीन: पचौरी
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पर भेदभाव के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। अपने निवास पर पत्रकारों से चर्चा के दौरान श्री पचौरी ने वास्तविक आंकड़े प्रस्तुत कर कहा कि शिवराज सिंह चौहान गलत बयानी कर रहे हैं।
पाला से मची तबाही पर उन्होंने कहा कि इस हेतु केंद्र सरकार द्वारा अब तक 424 करोड़ रूपए जारी किए जा चुके हैं। मध्य प्रदेश सरकार अगर सात सौ करोड़ देने की बात कहती है तो कुल 1124 करोड़ रूपयों में से 17 फरवरी तक प्रदेश सरकार द्वारा महज 309 करोड़ रूपयों की राशि ही बांटी गई है। उन्होंने कहा कि एनडीए के शासनकाल में मध्य प्रदेश को मिली इमदाद और यूपीए के दौरान मिली मदद में जमीन आसमान का अंतर है। केंद्र ने मध्य प्रदेश को पहले की तुलना में कई गुना अधिक राशि दी है।
श्री पचौरी ने कहा कि अटल सरकार ने पांच सालों में इंदिरा आवास मद में 387 करोड़ दिए जिसकी तुलना में मनमोहन सरकार ने छः सालों में 1102 करोड़ रूपए प्रदान किए। इसी तरह प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में एनडीए के 1209 करोड़ की तुलना में यूपीए ने 9833 करोड़ रूपए दिए हैं। इस तरह केंद्र द्वारा मध्य प्रदेश को पहले से अधिक धनराशि दी गई है तब भेदभाव किस बात का। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की मद में केंद्र से मिली मदद में से राज्य ने 312 करोड़ रूपए खर्च ही नहीं किए हैं।
पाला पर राज्य सरकार की भूमिका के बारे में चर्चा करते हुए सुरेश पचौरी ने मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में किसानों द्वारा उनको मिलने वाले राहत के चेक की होली जलाने की कतरने लहराते हुए कहा कि पूरे प्रदेश में तहसीलदार, नायब तहसीलदार, पटवारी किसानों के खेत पर न जाकर भाजपा कार्यकर्ताओं के घरों में बैठ मुंह देखकर फसलों का नुकसान तय कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने फसलों के एवज में 990 करोड़ रूपए ही मांगे हैं।

भ्रष्टों के सरदार मनमोहन --- 2


कथड़ी ओढ़ कर घी खा रहे हैं मनमोहन

नाकामियों का बचाव कमजोरियों से!

मनमोहन के लिए राष्ट्रधर्म से बढ़ा है गठबंधन धर्म

वजीरे आजम ने प्रिंट को दरकिनार कर इलेक्ट्रानिक को बिठाया गोद में

(लिमटी खरे)

आजाद भारत के इतिहास में सबसे भ्रष्ट सरकार के मुखिया डॉक्टर मनमोहन सिंह गत दिवस चुनिंदा समाचार चेनल्स के संपादकों से रूबरू हुए। प्रधानमंत्री ने अपने आप को बेहद निरीह बताकर देशवासियों का भरोसा और हमदर्दी जीतने का कुत्सित प्रयास किया है, जिसकी निंदा की जानी चाहिए। कितने आश्चर्य की बात है कि मनमोहन सिंह जैसी शख्सियत राष्ट्रधर्म निभाने के बजाए गठबंधन के चलते अपनी मजबूरियों दुश्वारियों को गिना रहे हैं। इस मुलाकात के पहले ही इसे पूर्वनियोजित बढ़ा चढ़ा कर पेश कर दिया गया था। देश के संपादकों ने भी ‘बेबाक‘ सवाल दागे, पर किसी ने यह नहीं पूछा कि जनता ने कांग्रेस को अगर स्पष्ट जनादेश नहीं दिया है तो क्या गठबंधन की कीमत पर देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस के प्रधानमंत्री सरकार को सहयोग करने वाले दलों के नुमाईंदों को देश को लूटने की इजाजत दे देंगे? क्या मुखिया होने के नाते नैतिकता के आधार पर वे त्यागपत्र देने को तैयार हैं?

वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह ने कहा कि उन्हें राज के खिलाफ ढेरों शिकायतें मिल रही थीं, फिर भी गठबंधन की मजबूरी के चलते राजा को संचार मंत्री बनाया गया। यक्ष प्रश्न तो यह है कि सत्ता की मलाई चखने की आखिर एसी क्या मजबूरी है, जिसके चलते देश के संसाधनों के अवैध तरीके से दोहन और सिस्टम को अपनी जेब में रखे बिना कोई और उपाय क्यांे नहीं किए गए। ईमानदार साफगोई पसंद प्रधानमंत्री की आखिर क्या मजबूरी थी कि उन्होंने शिकायत के ढेर पर बैठे एक एसे शख्स को न केवल मंत्री बनाया वरन् उसे लंबे समय तक ढोया और उसका बचाव भी किया।

जनता के मानस पटल पर यह प्रश्न घुमड़ना स्वाभाविक ही है कि भ्रष्टाचारी ए राजा जिनके खिलाफ शिकायतों के पुलिंदे थे, उन्हें मंत्री बनाना प्रधानमंत्री की मजबूरी थी, या फिर उनकी या किसी अन्य मंत्री या संत्री की गल्ति को रोकना प्रधानमंत्री की नैतिक जवाबदारी है। इससे क्या यह साफ नहीं हो जाता है कि मनमोहन सिंह सत्ता का सुख पाने के लिए किसी दल विशेष को सरेराह रिश्वत देकर खुश कर रहे थे? मनमोहन सिंह को जवाब देना ही होगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए वे किसी दल विशेष के प्रति जवाबदेह हैं या फिर भारत गणराज्य की सवा करोड़ से अधिक जनता के प्रति। प्रधानमंत्री की गठबंधन को लेकर स्वीकारोक्ति से साफ हो जाता है कि वे सरकार नहीं चला रहे वरन् एक मुनाफा कमाने वाली एक संस्था के मुखिया बन चुके हैं। देश में डॉ.मनमोहन सिंह की छवि धूल धुसारित हुए बिना नहीं है, लोग कहने लगे हैं कि जो प्रधानमंत्री जनता के बीच जाकर जनादेश लेने से कतरा रहा हो, वह किसी जांच एजेंसी का भला क्या सामना कर सकेगा।

सरकार चलाने के लिए ममता बनर्जी का हाथ थामना भी डॉ.मनमोहन सिंह की मजबूरी है। ममता बनर्जी इसी छूट का बेजा इस्तेमाल कर सरकारी खर्च पर बंगाल को नाप रही हैं। देश का रेल मंत्रालय भाड़ में जाता है जाए ममता की बला से! यह हो क्या रहा है मनमोहन सिंह जी? भारतीय रेल पटरी से उतर चुकी है, ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनना है, तब तक वे भारत गणराज्य की रेल व्यवस्था को पंगु बनाए जा रही हैं। रेल विभाग के आला अफसरान विभाग की नस्तियां ममता के हस्ताक्षरों के लिए उनके पीछे दौड़ रहे हैं, वह भी जनता के द्वारा एकत्र किए गए धन पर। आप कब तक ध्रतराष्ट्र बने बैठे रहोगे?

भारत गणराज्य में किसी प्रधानमंत्री द्वारा एक विशेष आयोजन कर चुनिंदा मीडिया पर्सन्स को बुलाकर संवाद करने का कोई इतिहास नहीं मिलता है, अलबत्ता विदेश यात्रा, स्वाधीनता अथवा गणतंत्र दिवस या विशेष राजनैतिक या रणनीतिक महत्व की घटनाओं के दौरान एसा होने का उल्लेख अवश्य ही मिलता है। प्रधानमंत्री को अगर खुद चलकर मीडिया के पास जाना पड़ा इसका मतलब साफ है कि प्रधानमंत्री, सरकार, कांग्रेस और उसके गठबंधन वाले दलों के बीच सब कुछ सामान्य कतई नहीं है। संसद का शीतकालीन सत्र हंगामें की भेंट चढ़ा क्योंकि विपक्ष टूजी मामले में जेपीसी की मांग पर अडिग था। अब प्रधानमंत्री उस पर राजी होते दिख रहे हैं। अब क्या कहा जाए? यही न कि प्रधानमंत्री के अडियल रूख के चलते देश वासियों के करोड़ों रूपयों में आग लगा दी गई।

कितने आश्चर्य की बात है कि प्रधानमंत्री ने चुनिंदा टीवी संपादकों के सामने ही मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया और संपादक खीसें निपोरते रहे। मीडिया की भूमिका पर बोलते हुए पीएम ने कहा कि मीडिया की भूमिका अच्छी है, किन्तु अत्याधिक नकारात्मक रिर्पोटिंग से यह छवि बनती है कि देश में घोटालों के अलावा और कुछ नहीं हो रहा है। वस्तुतः यही सच है कि देश में घपलों घोटालें के अलावा हो क्या रहा है? ये उजागर हो रहे हैं, और सरकार इन पर पर्दा डालने का जतन कर रही है। वैसे प्रधानमंत्री ने चुनिंदा मीडिया पर्सन्स के बीच इस बात पर यकीन दिलाया कि भ्रष्टाचार के मामलों की पूरी जांच की जाएगी। किसी भी सम्माननीय संपादक ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि क्या इसे समय सीमा में बांधा जा सकता है? क्या मामलों की जांच समय सीमा में संभव है? अब तक सुखराम को छोड़कर किस मामले में किस माननीय जनसेवक को जेल की चक्की पीसनी पड़ी?

चुनिंदा टीवी के संपादकों के सामने बैठकर डरने, सहमने और मजबूर दिखाने का प्रहसन कर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह आम जनता के मानस पटल पर सरकार के प्रति उपजे अविश्वास को कम नहीं कर पाए हैं। विदेशों में जमा काला धन इस चर्चा में गौड हो जाना इस बात की ओर साफ इंगित करता है कि इन चुनिंदा टीवी के संपादकों को पहले से ही क्वेश्चनायर थमा दिया गया था ताकि ये सिर्फ विषय पर ही प्रश्न कर सकें।

पहले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने गठबंधन की मजबूरी का राग अलापा अब खुद वजीरे आजम इस बारे में रोना रो रहे हैं। वस्तुतः दोनों ही महानुभावों को गठबंधन की मजबूरी के स्थान पर सत्ता सुख की मजबूरी का राग मल्हार गाना चाहिए। वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया के चुनिंदा संपादकों को अपने आवास पर बुलाकर प्रधानमंत्री ने साबित कर दिया है कि उनकी नजर में प्रिंट और वेव मीडिया वाले सौतेली संतान हैं। कल तक पेड पत्रकारिता पर बहस के दौरान इसी सगे बेटे को सबसे अधिक कटघरे में खड़ा किया गया था। हर मोर्चे पर विफल देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने संपादकों के साथ चर्चा कर देश वासियों के सामने अपने आप को लाचार और मजबूर साबित कर राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी के उस आरोप को पुख्ता कर ही दिया है जिसमें आड़वाणी ने कहा था कि मनमोहन अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं।

मनमोहन सिंह को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रजातंत्र के घोषित तीन स्तंभ न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को सीमाओं में रखने के लिए मीडिया जैसा चौथा अघोषित स्तंभ खड़ा हुआ था। आज तीनों घोषित और चौथे अघोषित स्तंभ की जुगलबंदी के चलते देश रसातल की ओर जाने लगा है तब उदय हुआ है पांचवें स्तंभ अर्थात ‘ब्लाग‘ का। जिन खबरों को मीडिया मुगल सैंसर कर देते हैं वे ब्लाग पर प्रमुखता से पढ़ी और देखी जाती हैं। कहने का तात्पर्य महज इतना ही है कि चंद संपादकों के साथ मनमोहन सिंह अपनी और सरकार की छवि चाहे जैसी पेश करना चाहें करें, किन्तु ब्लागर्स वास्तविकता को जनता के सामने लाकर ही रहेंगे।

उत्तर प्रदेश में पकड़ मजबूत करने में जुटे वरूण

निर्वासित राजकुमार पुर्नवास की तलाश में!

राजाओं पर डाल रहे हैं डोरे

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेहरू गांधी परिवार के निर्वासित राजकुमार वरूण गांधी भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारकों की फेहरिस्त मंे अपना स्थान बना चुके हैं, किन्तु खाटी भाजपा नेताओं ने उनका महिमा मण्डन नहीं किया है, जिससे वे राहुल गांधी की लोकप्रियता के मुकाबले कमतर ही माने जाते हैं। वरूण गांधी के हालिया कदमतालों को देखकर लगने लगा है कि उन्होंने अपने आप को स्थापित करने की जुगत लगाना आरंभ कर दिया है, और यह काम उन्होंने उत्तर प्रदेश से आरंभ किया है।
अगले माह शादी के बंधन मंे बंधने जा रहे वरूण ने अपने लिए दुल्हनिया तलाशी वो भी ब्राम्हण। इस तरह उन्होंने अब अपने चचेरे भाई राहुल गांधी के कम्बोडियाई गर्लफ्रेंड के साथ शादी के अरमानों पर पानी फेर दिया है। यद्यपि यामिनी उनकी बचपन की सखी है, पर है तो खालिस देशी ही। वाराणसी में शंक्राचार्य के आश्रम में सादे समारोह में शादी की सुर्खियां बटोरने के बाद वरूण द्वारा दिल्ली में होटल अशोक में एक जोरदार धमाकेदार रिसेप्शन दे रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि इसमें सोनिया, राहुल गांधी के साथ ही साथ प्रियंका वढ़ेरा भी शिरकत कर सकती हैं।
खुद को स्थापित करने के लिए वरूण गांधी ने अब अपने मरहूम पिता स्वर्गीय संजय गांधी के नक्शे कदम पर चलना आरंभ कर दिया है। वरूण अब उत्तर प्रदेश से अपना सक्रिय सियासी सफर आरंभ करने लालायित लग रहे हैं। इसीलिए उन्होंने उत्तर प्रदेश के राजघरानों पर डोरे डालना आरंभ कर दिया है। राहुल की टीम में कांग्रेस के वफादार रहे राजा सहसपुर बिदारी चंद, विजय सिंह, समाजवादी राजा साहेब बांसी, राजा साहेब भिनगा, बहराईच राजा साहेब भदावर, बसपा सांसद रहे राजा साहेब मानकापुर को शामिल हो चुके हैं।
घपलों घोटालों में घिरी कांग्रेसनीत संप्रग सरकार को बचाने में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी दिन रात एक किए हुए हैं, एसी स्थिति में नेहरू गांधी परिवार के निर्वासित राजकुमार वरूण गांधी का दबे पांव लोगों को एकत्र करना निश्चित तौर पर उनकी सियासी समझ बूझ का परिचायक ही माना जाएगा। वैसे भी भाजपा द्वारा वरूण को स्थापित करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई जा रही है।

महिला आरक्षण पर सियासत शुरू

फिर निकला महिला आरक्षण का जिन्न

बजट सत्र में पेश करने की तैयारी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। घपले घोटालों से परेशान कांग्रेस ने अब संसद का बजट सत्र सुचारू तौर पर चलाने की नई कवायद आरंभ कर दी है। बजट सत्र में महिला आरक्षण बिल को प्रस्तुत करने की संभावनाएं अचानक बढ़ गई हैं। लोकसभा में दलों के सचेतकों को थमाए गए विधाई एजेंडे में महिला आरक्षण को भी स्थान दिया गया है।
लोकसभा सचिवालय से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो सरकार द्वारा बजट सत्र में पारित कराए जाने वाले विधेयकों की सूची में महिला आरक्षण विधेयक भी शािमल किया गया है। गौरतलब होगा कि पिछले साल मार्च में इसे लेकर राज्यसभा रणभूमि बन गया था। मजबूरी में सरकार ने वायदा किया था कि राजनीतिक आम सहमति बनने के उपरांत ही इसे लोकसभा में पेश किया जाएगा।
माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार, घपले, घोटालों के चलते संसद के बजट सत्र में गहमा गहमी रोकने के लिए कांग्रेस द्वारा इस तरह की चाल चली जा रही है, ताकि विपक्ष की एकता को दरकाया जा सके। बताया जाता है कि कांग्रेस द्वारा जानबूझकर इसे राज्य सभा द्वारा पारित किए गए मौजूदा स्वरूप में ही लोकसभा में लाया जा रहा है ताकि विपक्ष इस मामले में ही उलझा रहे और उसका ध्यान अन्य मुद्दों की ओर न जाए।

ये हैं मौजूदा स्वरूप के खिलाफ

समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज वादी पार्टी, जनता दल यूनाईटेड इसके मौजूदा स्वरूप के मुखर विरोधी हैं, यहां तक कि कांग्रेस और भाजपा में भी अतिपिछड़ों के लिए कोई विकल्प न रखे जाने से इसकी मुखालफत करने वालों की कमी नहीं है।

युवराज भी हैं भयाक्रांत

कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी भी महिला आरक्षण बिल से घबराए हुए हैं। बुराड़ी में दिसंबर में हुए कांग्रेस के महाधिवेशन में उन्होंने मजाक में ही सही पर यह कहकर सभी को चौंका दिया था कि महिला आरक्षण विधेयक के चलते उन्हें भी डर है कि कहीं उनकी सीट ही महिलाओं के लिए आरक्षित न हो जाए।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

ईमानदार नहीं बची मनमोहनी छवि

भ्रष्टों के सरदार मनमोहन

खुद को मजबूर बता चख रहे सत्ता की मलाई

सोनिया का मन नही मोह पा रहे मोहन

पीएमओ 10 जनपथ में बढ़ी दूरियां

(लिमटी खरे)

वर्तमान हालातों में यक्ष प्रश्न तो यही है कि भारत गणराज्य के वजीरे आजम होने के नाते डॉ.मनमोहन सिंह और सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया होने के नाते श्रीमति सोनिया गांधी इन घपले घोटालों और मंहगाई के मसले पर जनता को जवाब देने की जहमत उठाएंगे या फिर बिना जवाबदेही के ही खुद को ‘मजबूर‘ बताकर सत्ता की मलाई चखते रहेंगे



नेहरू गांधी परिवार से इतर पांच सालों से ज्यादा देश के प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य पाने वाले वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह की छवि अब धूल धुसारित हो चुकी है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने दूसरी पारी में सरकार इसलिए बना पाई क्योंकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने लाल कृष्ण आड़वाणी को बतौर प्रधानमंत्री पेश किया था, जिन पर मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि भारी पड़ी थी।

विडम्बना देखिए कि आज मनमोहन सिंह की ईमानदारी पर उनके सहयोगियों के भ्रष्टाचार भारी पड़ते जा रहे हैं। आज मनमोहन सिंह और कांग्रेस चहुंओर घपले घोटालों से पूरी तरह घिर चुकी है। कांग्रेस के सामने अब कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा है। सोनिया गांधी खुद पशोपेश में हैं कि आखिर मनमोहन जैसे ईमानदारी का चोला ओढ़ने वाले प्रधानमंत्री के रहते विपक्ष द्वारा भ्रष्टाचार को कैसे मुद्दा बना लिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के बीच खुदी खाई पटने का नाम ही नहीं ले रही है। सोनिया और मनमोहन के बीच मतभेद जाहिर होने लगे हैं। 2जी घोटाले पर विपक्ष की जेपीसी की मांग पर सोनिया गांधी पहले से ही तैयार थीं, किन्तु मनमोहन सिंह ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। पीएम के इस मामले में न झुकने से सरकार की बुरी तरह किरकिरी हो चुकी है।

आलम यह है कि सात रेसकोर्स (प्रधानमंत्री आवास) और 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के बीच अघोषित जंग का आगाज हो चुका है। सियासी बिछात पर नित्य ही नई व्यूह रचनाएं हो रही हैं। मनमोहन से त्यागपत्र मांगने का नैतिक साहस भी सोनिया गांधी नहीं जुटा पा रहीं हैं। वहीं कांग्रेस के आला नेता प्रणव मुखर्जी और राजा दिग्विजय सिंह मनमोहन के ‘सक्सेसर‘ बनकर न केवल उभर रहे हैं, बल्कि इसके मार्ग भी प्रशस्त कर रहे हैं।

दरअसल, मनमोहन के अधीन काम करने में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी अपने आप को असहज ही महसूस करते आए हैं, दादा ने भी पीएमओ के खिलाफ सोनिया की तरह ही अघोषित जंग का एलान कर दिया है। इसका कारण यह है कि जब वे वित्त मंत्री थे, तब उनके अधीन काम करने वाले अफसरान में डॉ.मनमोहन सिंह पांचवे क्रम वाले अफसर हुआ करते थे। तब और अब में जमीन आसमान का अंतर है। उस दर्मयान डॉ.मनमोहन सिंह को सीधे प्रणव मुखर्जी से मिलना बेहद मुश्किल होता था, इसमें प्रोटोकाल आड़े आता था।

अब वही अदना सा अफसर (डॉ.मनमोहन सिंह) छः साल से ज्यादा समय से दादा को सीधे निर्देश देने की स्थिति में है। दादा की पीड़ा समझी जा सकती है। पिछले दिनों बैंक चला गांव की ओर कार्यक्रम में प्रणव मुखर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को तो बुलावा भेजा किन्तु देश के वजीरे आजम को न्योता भेजना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा। इसके साथ ही साथ मनमोहन सिंह सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री भी हैं, सो इस लिहाज से वित्त मंत्री को उनसे मशविरा कर ही कोई कदम उठाना चाहिए, वस्तुतः एसा हो नहीं रहा है। प्रणव मुखर्जी बिना पीएम की सलाह के ही सारे निर्णय ले रहे हैं। उधर गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम की निष्ठा प्रधानमंत्री में गहरी होती दिख रही है।

भारत गणराज्य में छः से ज्यादा दशकों से लोकतंत्र कायम रहना ही अपने आप में सबसे बड़ी बात और मिसाल है। स्वतंत्र भारत में अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार है संप्रग दो की मनमोहन सिंह सरकार। अब तक इस सरकार के तीन लाख करोड़ रूपए से अधिक के घपले घोटाले सामने आ चुके हैं। जब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया जा रहा था, तब उनकी दो योग्यताओं को हाईलाईटेड किया गया था। अव्वल तो वे निहायत ईमानदार हैं, दूसरा वे बड़े अर्थशास्त्री हैं। घपले घोटालों, और रिकार्ड ध्वस्त करती मंहगाई ने मनमोहन सिंह की दोनों ही योग्यताओं पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि देश के कथित ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और कांग्रेस पर सवा दशक से ज्यादा समय से राज करने वाली श्रीमति सोनिया गांधी ने स्वतंत्र भारत के वर्तमान को दागदार किया है। सोनिया की नाक के नीचे प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री का कार्यालय, मंत्रियों और अन्य सहयोगियों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। टूजी घोटाले के बाद देश की न्यायपालिका को विधायिका से प्रश्न पर प्रश्न करने पर मजबूर होना पड़ा।

देश के इतिहास में पहली बार हुआ जब शीर्ष अदालत ने प्रधानमंत्री से यह पूछा था कि इतने बड़े घोटाले के बाद भी आदिमत्थू राजा अब तक मंत्री पद पर कैसे बैठे हैं? अदालत ने यह भी कहकर प्रधानमंत्री को शर्मसार कर दिया था कि राजा पर मुकदमा चलाने की मांग पर पीएमओ ने दो साल तक कार्यवाही क्यों नहीं की?

इसके बाद एक अदालत ने फिर देश के कथित ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को शर्मसार होने पर यह कहकर मजबूर कर दिया कि घपलेबाज विलासराव देशमुख को मंत्री बनाना शर्मनाक है! ये सारे मामलों में अखबारों की रोशनाई अभी सूखी भी नहीं थी कि एस बेण्ड घोटाले की आग में पीएमओ झुलस गया। यह मामला अंतरिक्ष विभाग का है, जिसके मुखिया कोई और नहीं डॉ.मनमोहन सिंह ही हैं।

प्रधानमंत्री की पसंद के चलते सीवीसी बने थामस ने प्रधानमंत्री को कम शर्मसार नहीं किया। चोरी और सीना जोरी की कहावत को चरितार्थ करते हुए थामस ने देश की सर्वोच्च अदालत में यह कहकर सभी को चौंका दिया कि संसद में कानून बनाने वाले 153 सांसदों पर आपराधिक और 74 पर तो गंभीर आरोप हैं, फिर उनके सीवीसी बनने पर किसी को क्या आपत्ति होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने थामस को सीवीसी बना दिया है, जिस विभाग में सभी की जन्म कुण्डलियां हैं, जो थामस के हाथ लग चुकी हैं। आज की तारीख में थामस बारगेनिंग की स्थिति में आ गए हैं, और सरकार बेकफुट पर। हालात देखकर कहा जा सकता है कि अब थामस को हिलाने की स्थिति में सरकार कतई दिखाई नहीं पड़ रही है। अव्वल तो सरकार ने आरंभ में थामस का बचाव कर उनके हौसले बुलंद कर दिए जिसके परिणामस्वरूप आज अदना सा नौकरशाह न केवल देश की शीर्ष अदालत को चुनौति दे रहा है, वरन् सरकार और देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंच (सांसदों) को ही आंख दिखाने की स्थिति में आ गया है।

वर्तमान हालातों में यक्ष प्रश्न तो यही है कि भारत गणराज्य के वजीरे आजम होने के नाते डॉ.मनमोहन सिंह और सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया होने के नाते श्रीमति सोनिया गांधी इन घपले घोटालों और मंहगाई के मसले पर जनता को जवाब देने की जहमत उठाएंगे या फिर बिना जवाबदेही के ही सत्ता की मलाई चखते रहेंगे? राष्ट्रमण्डल खेल, 2जी स्पेक्ट्रम, आदर्श आवासीय सोसायटी, एस बेण्ड घोटाला आदि के साथ ही साथ सीवीसी की नियुक्ति आदि जैसे ज्वलंत मसलों पर देश की जनता अपनी चुनी हुई सरकार से स्पष्टीकरण मांग रही है, देश के कथित ईमानदार प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के साथ ही साथ कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी भी जनता के द्वारा करों के माध्यम से दिए गए पैसे की इस होली को चुपचाप देखा और सुना जा रहा है। इन सभी की चुप्पी से साफ हो जाता है कि इन घपले घोटालों के जगमगाने वाले लट्टुओं को को करंट, कहीं न कहीं प्रधानमंत्री और नेहरू गांधी परिवार की बेटरी से ही मिल रहा है।

एमपी में एनएसयूआई निष्क्रीय


मीनाक्षी का पत्ता काटने में जुटे कांग्रेसी
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। कांग्रेस की नजरों में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी की करीबी एवं मध्य प्रदेश से मंदसौर संसदीय क्षेत्र की संसद सदस्य सुश्री मीनाक्षी नटराजन सूबे के वरिष्ठ कांग्रेसियों की आखों में खटकने लगी हैं। अंग्रेजी पर बेहतर पकड़ के चलते राहुल गांधी की टीम में शामिल मीनाक्षी को मुख्य धारा से अलग करने के लिए कांग्रेसियों ने उनके खिलाफ गुप्त रूप से विषवमन करना आरंभ कर दिया है।
 
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने इस मर्तबा हुए मंत्रीमण्डल फेरबदल में मीनाक्षी नटराजन को कुनबे में शामिल करने का मन बना लिया था। जैसे ही यह बात सूबे के आला कांग्रेसी नेताओं को पता चली उन्होंने आपरेशन मीनाक्षी को अंजाम देना आरंभ कर दिया।
 
बताया जाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी सहित राहुल गांधी को मीनाक्षी के प्रभार वाले एनएसयूआई की हकीकत से दो चार करवा दिया। इसमें विशेष तौर पर मध्य प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के गर्त में जाने की बात को पेश किया गया। इतना ही नहीं मीनाक्षी के संसदीय क्षेत्र के अंर्तगत आने वाले मंदसौर और नीमच जिलों में एनएसयूआई की जमीनी हकीकत से दो चार करवा दिया। इतना ही नहीं संगठन में चुनावों के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में औंधे मुंह गिरी थी एनएसयूआई।
 
एआईसीसी में चल रही चर्चाओं के अनुसार मीनाक्षी नटराजन की जिद के चलते ही एनएसयूआई के मध्य प्रदेश के निर्वाचित अध्यक्ष आकाश आहूजा को रूखसत होना पड़ा। मीनाक्षी के संसदीय क्षेत्र मंे मंदसौर जिले में एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं की संख्या महज डेढ़ सैकड़ा ही बताई जा रही है।
 
उधर राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने मीनाक्षी नटराजन को मध्य प्रदेश कांग्रेस की बागडोर सौंपने का मन भी बनाया हुआ है, किन्तु जब जमीनी हकीकत से वे दो चार हुए तो उन्होंने अपना इरादा लगभग त्याग ही दिया है। माना जा रहा है कि बजट सत्र के उपरांत गठित होने वाली एआईसीसी से भी मीनाक्षी नटराजन को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। वैसे मीनाक्षी के नेहरू युवा केंद्र के उपाध्यक्ष रहते हुए भी कोई खास उपलब्धियां हासिल न होना भी इसका एक प्रमुख अस्त्र बनाया जा रहा है, उस दौरान भारत के स्वतंत्रता संग्राम के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर मेरठ से दिल्ली तक निकली यात्रा में भी व्यपक स्तर पर भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया जा रहा है।
रेल सुविधाओं के प्रति लापरवाह हैं मीनाक्षी

नीमच और मंदसौर जिलों में रेल सुविधाओं के प्रति सांसद मीनाक्षी नटराजन बहुत ज्यादा संजीदा नजर नहीं आ रही हैं। इस रेल बजट में अगर इन जिलों को कुछ मिला तो वह निश्चित तौर पर ‘बिल्ली के भाग से छीका टूटा‘ की कहावत को ही चरितार्थ करेगा। हाल ही में मीनाक्षी नटराजन के कार्यालय से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि रेल सुविधाओं के लिए उन्होंने रेल राज्यमंत्री मुनिअप्पा से भेंट कर उन्हें अनुरोध पत्र सौंपा है। मीनाक्षी नटराजन के पास इतना समय नहीं है कि वे रेल मंत्री ममता बनर्जी से मिलकर क्षेत्र की रेल सुविधाओं के बारे में अनुरोध करें।

कौन होगा दिल्‍ली का नया एलजी


एलजी के उत्तराधिकारी की तलाश तेज

अग्रवाल, चावला, पाल, दुग्गल के नाम आए सामने
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। दिल्ली की निजाम शीला दीक्षित और उपराज्यपाल (एलजी) तेजिंद्र खन्ना के बीच अनबन किसी से छिपी नहीं है। लगता है जल्द ही शीला दीक्षित को एलजी से छुटकारा मिल सकता है। खन्ना का कार्यकाल इसी माह समाप्त हो रहा है, और उनके उत्तराधिकारी की तलाश तेज हो गई है। कांग्रेस के आला नेताओं ने अपने अपने पसंदीदा नामों के लिए लाबिंग तेज कर दी है।
 
दिल्ली के उपराज्यपाल के लिए जो नाम अब तक उभरकर सामने आए हैं, उनमें केंद्र शासित प्रदेश काडर के 1970 बैच के नौकरशाह रहे एस.पी.अग्रवाल का नाम सबसे आगे चल रहा है, इसके बाद नवीन चावला, विनोद दुग्गल और दिल्ली के पुलिस आयुक्त रहे के.के.पाल के नाम हैं।
 
बताया जाता है कि अग्रवाल और सीबीआई के तत्कालीन निदेशक रहे उनके मित्र ने उनके नाम को हरी झंडी दे दी है। माना जा रहा है कि दिल्ली के अगले उपराज्यपाल अग्रवाल ही होंगे, किन्तु अगर कंेद्र ने अग्रवाल के नाम पर मुहर लगाई तो कांग्रेस को कंेद्रीय सतर्कता आयुक्त थामस की स्थिति से दो चार होना पड़ सकता है।
दामन उजला नहीं है अग्रवाल का
 
हाल में पारसनाथ बिल्डर्स के लिए काम करने वाले एस.पी.अग्रवाल दिल्ली से प्रमुख सचिव स्वास्थ्य के पद से सेवानिवृत हुए हैं। वर्ष 1983 में जब वे खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति महकमे के आयुक्त थे, तब उनके खिलाफ एक जांच आहूत की गई थी। इसके बाद जब 1987 में वे दिल्ली नगर निगम के उपायुक्त थे तब सीवीसी ने उनके खिलाफ जांच का आदेश दिया था। इतना ही नहीं अपनी सेवानिवृत्ति के पहले स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के प्रमुख सचिव की पदस्थापना के दौरान उन पर लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में एक अधीक्षक की नियुक्ति के मसले में केंद्रीय जांच ब्यूरो में प्रकरण चल रहा है।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

संगठन की निष्क्रीयता से बैचेन हैं राजमाता

भ्रष्टाचार के मकड़जाल में उलझी नौकरशाही से त्रस्त हैं सोनिया
 
सत्ता और संगठन में अमूलचूल बदलाव कर सकतीं हैं कांग्रेस अध्यक्ष
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की दूसरी पारी में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के उजले दामन पर लगे भ्रष्टाचार के दागों और निष्क्रीय पड़े कांग्रेस संगठन से सोनिया गांधी बुरी तरह आहत नजर आ रही हैं। सोनिया को उनके सलाहकारों ने मशविरा दिया है कि संसद के बजट सत्र के एन बाद सत्ता और संगठन को नए सिरे से आकार दिया जाए। वहीं दूसरी और प्रधानमंत्री से सोनिया के बीच खाई पटने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है।
 
कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि सोनिया गांधी चाहती हैं कि भ्रष्टाचार और मंहगाई के मामले में केंद्र सरकार शीघ्र ही कड़े और प्रभावी कदम उठाए। गौरतलब है कि लंबे अरसे से 10 जनपथ और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच दूरियां बढ़ने की खबरें सियासी गलियारों में फैलने लगी हैं।
 
सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस की राजमाता को उनके एक सलाहकार ने यह कहकर भी परेशान कर दिया है कि डॉ.मनमोहन सिंह जैसे खालिस ईमानदार छवि के व्यक्ति को देश का वजीरे आजम बनाने के बाद भी विपक्ष भ्रष्टाचार को आखिर मुद्दा बनाने में कैसे कामयाब हो गया है। घपले और घोटालों से आहत सोनिया द्वारा होली के उपरांत सत्ता और संगठन में अनेक एसे बदलाव किए जा सकते हैं, जो कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को नागवार गुजरें।
 
सूत्रों ने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, गुजरात जैसे राज्यों में पार्टी के संगठन की बदहाली ने उन्हें हिलाकर रख दिया है। जिन सूबों में कांग्रेस की सरकार नहीं है वहां कांग्रेस द्वारा कमजोर विपक्ष की भूमिका पर कांग्रेसाध्यक्ष बुरी तरह खफा हैं, साथ ही साथ जिन प्रदेशों के सांसदों को केंद्र में मंत्री बनाया गया है, उन सांसदों द्वारा अपने गृह प्रदेश में ध्यान न देने और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की बात भी सोनिया गांधी की जानकारी में लाई गई है, जिस पर उनकी भवें तन गई हैं।
सोनिया की मंशा पर पानी फेरते मनमोहन

कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी चाहती हैं कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को तत्काल ही पारित करवा दिया जाए, किन्तु बजट सत्र में इसके प्रस्तुत होने की गुंजाईश कम ही प्रतीत हो रही है। लंबे समय से इस मसले में कवायद करने के बाद अब पीएमओ चाहता है कि इस विधेयक के आने से बाजार पर पड़ने वाले असर के अध्ययन के उपरांत ही इसे संसद में पेश किया जाए। गौरतलब है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक को लेकर कांग्रेस में ही दो तरह की विचारधाराएं पनप गई हैं। एक धड़ा इसे पेश करने तो दूसरा इसके पेश होने से होने वाले अच्छे और बुरे असर के बारे में विचार के उपरांत इसमें सुधार के उपरांत इसे प्रस्तुत करने का हिमायती बना हुआ है।

चौहान को मिला एनडीटीवी अवार्ड

मुख्यमंत्री चौहान को ’इंडियन ऑफ द इयर 2010’ अवार्ड

नई दिल्ली (ब्यूरो)। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को ’इंडियन ऑफ द इयर 2010’ के अवार्ड से सम्मानित किया गया। एनडीटीवी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अवार्ड ग्रहण करते हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि देश को आज विकास की जरूरत है और जनता का कल्याण ही मुख्य मुद्दा है। श्री चौहान विकास के मुद्दें पर ही मध्यप्रदेश में दोबारा सत्ता पर काबिज हुए हैं। जनता ने उनके विकास कार्य को सराहा है।
मुख्यमंत्री ने केन्द्र और राज्य सरकार के संबंधों में भेदभाव बरतने पर चिन्ता जाहिर की और कहा कि यह प्रदेश और देश दोनों के विकास के लिए ठीक नहीं है। इसके लिए सभी पार्टियों को राजनीति से ऊपर उठकर ठोस निर्णय लेने की जरूरत पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि अब देश की राजनीति में बड़ा दिल और बड़ी सोच की जरूरत है जो समाज के हर तबके के विकास के लिए कटिबंध हो। श्री चौहान ने कहा कि भ्रष्टाचार की जड़ चुनाव प्रक्रिया में है। इसके लिए संविधान में संशोधन कर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने पर जोर दिया। उन्होंने इसके लिए चुनाव आयोग द्वारा चुनाव कराने के लिए निश्चित धनराशि देने की भी बात कही।

हरवंश व पुत्र धोखाधडी से बरी

आमानाला प्रकरण में उलझे ठाकुर हरवंश सिंह एवं उनके पुत्र के मामले का खात्मा
 
मनोज मर्दन त्रिवेदी
  
सिवनी म.प्र. विधानसभा के उपाध्यक्ष ठाकुर हरवंशसिंह एवं उनके पुत्र ठाकुर रजनीशसिंह पर आमानाला नम्बर दो प्रकरण में न्यायायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी लखनादौनद्वारा आधार हीन पोये जाने पर पूरे प्रकरण को खारिज कर दिया है। इस आशय की जानकारी ठाकुर हरवंशसिंह ने स्थानीय आनंद हॉटल में आमंत्रित पत्रकार वार्ता में पत्रकारों को प्रदान की  और न्यायालय से सम्बन्धित कागजात भी उपलब्ध कराये। उन्होने जानकारी देते हुए कहा कि उनका यह दुर्भाग्य है कि उनके राजनैतिक प्रतिद्वन्दी उन्हें षडय़ंत्रपूर्वक फसाने के लिए किसी भी मामले को तूल देते रहते हैं और तिल का ताड़़ बनाकर उन्हें विवादों में उलझाये रहते हैं इसी प्रकार का मामला आमानाला से भी सम्बन्धित था जिसमें प्रथम श्रेणी न्यायालय लखनादौन ने पूरे मामले का झूठा असत्य एवं आधार हीन होने के कारण खारिज कर दिया है।  उन्होंने अपनी न्याय व्यवस्था के प्रति अटूट विश्वास का परिणाम बताया।
उल्लेखनीय है कि सुनवारा चौकी के अंतर्गत आनेवाले आमानाला नामक ग्राम के मोहम्मद शाह नामक व्यक्ति द्वारा अधिवक्ता पी.डी. साहू के साथ उपस्थित होकर नियाज अली, रजनीशसिंह एवं हरवंशसिंह के विरूद्ध धारा ४२०, ५०६, २९४, १२० बी., भारतीय दण्ड विधान के तहत परिवार प्रस्तुत किया गया था। लखनादौन प्रथम श्रेणी न्यायालय द्वारा उक्त परिवार धनौरा को भेजकर धारा १५६(३) दण्ड प्रक्रिया संङ्क्षहता के तहत कार्यवाही करने के लिए लिखा गया है। इस पूरे प्रकरण को  धनौरा पुलिस द्वारा विस्तृत जांच १८ जून २०१० से २८ जनवरी २०११ तक १३ बार न्यायालय से समय लेकर विभिन्न स्तरों पर विवेचना की गई। जिसमें थाना धनौरा अनुविभागीय पुलिस लखनादौन, पुलिस अधीक्षक सिवनी, पुलिस महानिरीक्षक जबलपुर रेंज, एवं अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, अपराध अनुसंधान ब्यूरों, पुलिस मुख्यालय भोपाल के  द्वारा विवेचना की गई। १३ बार पुलिस द्वारा समय लेकर की गई विवेचना में पाया गया कि ठाकुर हरवंशङ्क्षसह एवं ठाकुर रजनीशसिंंह के विरूद्ध जितने भी आरोप लगाये गये हैं वे पूर्णत: निराधार और असत्य हैं। पुलिस मुख्यालय भोपाल तक जांच अभिमत लेने के बाद २८ जनवरी ११ को मामले की केस डायरी के आधार पर न्यायायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी लखनादौन को कोई भी आरोप सिद्ध न होने का आवेदन किया गया। परिणाम स्वरूप न्यायालय द्वारा उक्त मामले को खारिज कर दिया गया  विधानसभा उपाध्यक्ष ने न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के पश्चात पत्रकारों को बताया कि उनके विरूद्ध किसी ने यह षडय़ंत्र किया था परंतु उन्होंने इसे राजनैतिक षडय़ंत्र मामने से इंकार कर दिया है। झूठे आरोप लगाने वाले के विरूद्ध वे कोई कार्यवाही नहीं करेंगे परंतु उनके पुत्र रजनीश ने कहा है कि उनके तथा उनके पिता के विरूद्ध जिन व्यक्तियों ने घिनौना खेल खेला है उनके साथ क्या सलूक किया जाये इस सम्बन्ध में वे अपने वरिष्ठ अधिवक्ता राजेन्द्र गुप्ता एवं बेनीशंकर शर्मा से सलाह उपरांत ही कोई कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे।

धान खरीदी में गड़बड़ करने वालों पर होगी कार्यवाही

धान खरीदी में गड़बड़ करने वालों पर होगी निलम्बन की कार्यवाही - श्रीमती नायक

भाजपा नगर अध्यक्ष की शिकायतों को गम्भीरता से लेते हुए अधिकारियों को दिये निर्देश
  पूर्व केबिनेट मंत्री डॉ. बिसेन ने की सौजन्य भेंट
 
मनोज मर्दन त्रिवेदी
सिवनी नागरिक आपूर्ति निगम की उपाध्यक्ष राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त श्रीमती अनिता नायक ने आज समर्थन मूल्य पर धान खरीदी में हो रही अनियमित्ताओं की शिकायतों को गंभीर मानते हुए भाजपा नगर अध्यक्ष प्रेम तिवारी से चर्चा कर व्यवस्था सुधारने उपायों पर विस्तृत चर्चा की साथ ही श्रीमती नायक ने नागरिकी आपूर्ति निगम एवं खाद्य अधिकारी से व्यवस्थाओं को सुधारने के निर्देश दिये श्रीमती नायक से भाजपा नगर अध्यक्ष पे्रम तिवारी ने समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की तिथि २८ फरवरी तक करने की मांग की थी। जिसे उन्होंने सहज स्वीकार करते हुए हर संभव प्रयास करने की बात कही थी तथा उन्होंने देर शाम तिथि बढऩे की जानकारी भी दी। सिवनी सर्किट हाऊस में किसानों से प्राप्त शिकायतों एवं धान खरीदी में अपनाये जा रहे भ्रष्ट रवैयों पर उपस्थित अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई नगर अध्यक्ष द्वारा नागरिक आपूर्ति निगम के भ्रष्ट कारनामों की की गई शिकायत पर हुई कार्यवाही की जानकारी चाही जिस पर उपस्थित अधिकारियों ने उन्हें बताया कि भाजपा नगर अध्यक्ष की शिकायत पर जांच चल रही है श्रीमती नायक ने कहा कि जांच को गंभीरता से लेते हुए दोषियों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जाये। उल्लेखनीय है कि भाजपा नगर अध्यक्ष प्रेम तिवारी द्वारा पिछले दिनों समर्थन मूल्य पर धान खरीदी में भ्रष्टाचार और कमीशनबाजी के चलते घटिया स्तर की धान खरीदी व्यापारियों से सांठ-गाठ कर की गई थी। जिस पर जांच जारी है। नागरिक आपूर्ति निगम की उपाध्यक्ष को यह भी ध्यान में लाया गया कि यहां खरीदी केन्द्रों पर समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी किसानों से न कर बिचौलियों के माध्यम से की जा रही है और किसान  बुरी तरह शोषण का शिकार हुआ है। श्रीमती नायक ने जिले के बालाघाट रोड पर पडऩे वाले खरीदी केन्द्रों  के निरीक्षण का आश्वासन देकर बालाघाट की ओर प्रस्थान किया।

बरघाट नगर में भी समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की जानकारी ली जहां उन्हें ज्ञात हुआ कि बरघाट में छपारा मार्केटिंग सोसायटी द्वारा खरीदी की जा रही है जिसमें भारी अनियमित्ताएं हैं। उन्होंने समस्त शिकायतों की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। इस अवसर पर भाजपा नगर अध्यक्ष के अलावा पूर्व केबिनेट मंत्री डॉ. ढालसिंह बिसेन ने सौजन्य भेंट की दुग्ध संघ के प्रतिनिधि श्रीनिवास मूर्ति भाजपा नगर महामंत्री गोपाल पवमे, नगर मंत्री पंकज बिसेन भाजपा नेता अशोक शुक्ला, ने भी भेंट की।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

धरने की राजनीति

धरने की राजनीति


    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान 13 फरवरी से भोपाल में धरने पर बैठ रहे हैं। कारण प्रदेश में पाला पड़ने और ओला वृष्टि से फसल को हुए नुकसान की भरपाई  के लिए केन्द्र सरकार से 2442 करोड़ रु0 के विशेष पैकेज की मांग पर समय पर कोई कार्यवाही न होना। श्री चौहान ने इस विषय पर प्रधानमंत्री और केन्द्रीय कृषि मंत्री से मिल कर एक ज्ञापन भी सौंपा था और उसी समय ऐलान भी कर दिया था कि केन्द्र सरकार द्वारा इस विषय पर समय रहते कोई कार्यवाही न होने की स्थिति में वह उपवास पर बैठेंगे। अब यह तो समय ही बताएगा कि शिवराज जी के धरने का क्या हर्ष होगा। हमारी सद्भावनाएं उनके साथ हैं।
    अगर हम एक आम नागरिक की भांति इस पूरे प्रकरण को देखे मामला शीशे की तरह साफ दिखता है कि पाला पड़ने और ओला वृष्टि से हुए प्रदेश के 50 जिलों में से 46 जिलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार केन्द्र सरकार से विशेष पैकेज की मांग कर रही है। पर मामला इतना सीधा और साफ नहीं है। धरने की राजनीति देश में अपनाया जाने वाला पुराना हथकंडा है जो विभिन्न पार्टी के नेता समय-समय पर अपनी जरूरत के हिसाब से अपनाते हैं। इस हथकंडे को विभिन्न श्रमिक संगठन और सरकारी संगठन कर्मचारियों के नियमितिकरण का मामला हो या फिर डी.ए. की किश्त जारी करने का मामला हो, सब संगठन पूरी राजनीति करते हैं और इसका भरपूर लाभ उठाते हैं।
    यह बात अलग है कि मध्य प्रदेश में पिछले कुछ महीनों से किसान द्वारा आत्महत्या करने के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है, यह एक चिन्ता का विषय है और इसको गंभीरता से लेना चाहिए। इन आत्महत्या के मूल कारणों में जाने की जरूरत है। इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक परिवेश में समझने की जरूरत है ताकि किसानों से जुड़ी समस्याओं का निराकरण समय रहते किया जा सके।

    इस पूरे विषय पर किसानों के हमदर्द बनने के लिए मानो कोई होड़ सी लगी है, जिसमें सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष भी इससे अछूता नहीं है। विपक्षीय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी पीछे नहीं हटते, वे भी उपवास पर बैठ जाते हैं, किसानों को न्याय दिलाने के लिए। वहीं केन्द्र सरकार भी इस ओछी राजनीति से अछूती नहीं है, वह भी जो राशि सामान्यतः स्वीकृत हो कर राज्य को दी जानी चाहिए, को प्रदेश अध्यक्ष जी के अनशन को समाप्त कराकर, दो केन्द्रीय नेताओं की मौजूदगी में सहायता राशि का ऐलान किया जाता है जिससे इसका श्रेय अनशन पर बैठे प्रदेश अध्यक्ष को देती है। ऐसा लगता है कि यह नाटक का पूर्व नियोजित था।
    वहीं दूसरी तरफ एक सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अनशन को एक मेगा शो बनाने की तैयारी कर रही है। अनशन को कांग्रेस के विरूद्ध हथियार बनाने के मकसद से पार्टी हर दिन अलग-अलग इलाकों से एक से दो हजार कार्यकर्ता मुख्यमंत्री का साथ देंगे, उम्मीद है कि दिल्ली से पार्टी के बड़े नेता भी आएंगे। यह बात अलग है कि मध्यप्रदेश सरकार केन्द्र द्वारा आपदा राहत कोष से दी गई राशि को अभी तक पूरी तरह खर्च ही नहीं कर पाई और प्रदेश के कृषि मंत्री किसानों की आत्महत्याओं को उनके पूर्व जन्म के कर्मों से जोड़ रहे हैं। इससे सरकार की मंशा पूरी तरह से साफ हो जाती है कि सरकार किसानों की कितनी बड़ी हितेषी है।
    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का 13 फरवरी को अनशन पर बैठने पर भी राजनीति है। प्रदेश में 14 फरवरी को दो उप-चुनाव में मतदान की तारीख है और सत्तारूढ़ पार्टी इसका पूरा फायदा उठाना चाहती है। पिछली बार दोनों सीटों पर कांग्रेस काबिज थी। भाजपा के नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष किसी भी प्रकार से इन सीटों पर विजयी होना चाहते हैं, जिससे जीत का सेहरा प्रदेश अध्यक्ष को जाए। प्रदेश अध्यक्ष पद पर काबिज होने के बाद प्रदेश में यह पहला उपचुनाव है।

    कुल मिलाकर देखा जाए तो किसानों की समस्या एक तरफ और सिर्फ राजनीति ही राजनीति है, पार्टी कोई भी हो। किसानों द्वारा की गई आत्महत्याएं हों या किसानों से जुड़ी अन्य समस्याएं हों, इससे किसी को भी कोई मतलब नहीं, सिर्फ विषय उठाकर राजनैतिक रोटियां सेंकना ही मकसद रह गया है। कोई नहीं सोंचता है कि धरने पर बैठने से क्या उनकी मूल समस्याओं का निवारण हो सकेगा। उनकी समस्याएं तो वही कि वही रहेंगी। क्यों नहीं कोई इस विषय पर पार्टी लाइन से हटकर ठोस निर्णय नहीं लेता और अपनी संकीर्ण सोच से परे हटकर किसानों के हित के लिए दीर्घकालीन योजना बनाते जिससे कि किसानों का उद्धार हो, इन्हीं के उद्धार होने से हमारा देश प्रगति के अग्रसर होकर सफलता की नई उचाईयां छुएगा। किसान कोई राजनीति का मोहरा नहीं है, वह हमारे देश के विकास की आधारशिला है।

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