सोमवार, 7 मार्च 2011

प्लास्टिक के पाउच में अब भी बिक रहा है जहर

किसी को परवाह नहीं भारत सरकार के नियम कायदों 
अरबों रूपए रोजाना का है गुटखों का व्यवसाय
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत की सख्ती के बाद भी केंद्र सरकार गुटखा, पान मसाला लाबी के आगे घुटने टेकती नजर आ रही है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के नए नियमों के बाद भी देश भर में गुटखा पान मसाला धडल्ले से बिक रहा है, और तो और शिक्षण संस्थाएं भी इसकी जद से परे नहीं हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के उपरांत केंद्र सरकार ने एक मार्च से प्लास्टिक पाउच में गुटखा पान मसाला बेचने पर पाबंदी लगा दी थी, जिसे अमली जामा अब तक नहीं पहनाया जा सका है।
 
 ज्ञातव्य है कि राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अस्थमा केयर सोसायटी द्वारा दायर याचिका पर फैसला देते हुए प्लास्टिक पाउच के विषैलेपन के मद्देनजर इस पर पाबंदी लगा दी थी। इसके बाद पान मसाला उत्पादकों ने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए थे। सर्वोच्च न्यायलय की जस्टिस जी.एस.सिंघवी और अशोक कुमार गांगुली की बैंच ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए पिछले महीने ही इसमें रियायत देने से साफ इंकार कर दिया था।
 
आरोपित है कि मेग्नीशियम कार्बोनेट युक्त जहरीले गुटखा और पान मसालों की गिरफ्त में आज देश के अस्सी फीसदी लोग आ चुके हैं। वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों का दावा है कि देश में गुटखा व्यवसाय हर साल दस हजार करोड़ से ज्यादा का करोबार करता है। वैसे भी प्लास्टिक के पाउच में इनका विक्रय स्वास्थ्य के साथ ही साथ पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि भारत सरकार ने इस साल चार फरवरी को प्लास्टिक के कचरे से निपटने के लिए नए नियम बनाए हैं। इन नियम कायदों के तहत प्लास्टिक के पाउच में बिकने वाले गुटखों और पान मसालों का विक्रय प्रतिबंधित किया गया है।
देश के हर राज्य मेें जहरीले पान मसाले सरेआम बिकते नजर आ रहे हैं। हद तो तब हो जाती है जब ये पाउच शिक्षण संस्थानों के इर्द गिर्द सरेआम बिकते नजर आते हैं। अनेक शैक्षणिक स्थलों के परिसर में बने काम्पलेक्स में पान परचून की दुकानों में इनका विक्रय सरेराह किया जाता है।
बदल दिए पुराने नियम

केंद्र सरकार ने प्रदूषण पर रोक लगाने की गरज से पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 में अनेक महत्वपूर्ण तब्दीली करते हुए प्लास्टिक वेस्ट अधिनियम 2011 बनाया है। नई गाईडलाईन में प्लास्टिक की पूर्व की निर्धारित मोटाई 20 माईक्रोन को दुगना कर अब 40 कर दिया गया है, जिससे अब इससे पतले प्लास्टिक का विक्रय प्रतिबंधित कर दिया है। सरकार ने इसके लिए प्लास्टिक मैन्यूफेक्चर एण्ड यूजेस अधिनियम 1999 में 2003 वर्ष में किए गए बदलावों में पुनः तब्दीली कर अब कड़ा कर दिया है, जिसके तहत प्लास्टिक निर्माताओं को ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टेंडर्ड का पालन करना आवश्यक होगा। इसके साथ ही साथ अब चुनिंदा रंग या पारदर्शी प्लास्टिक का उपयोग ही किया जा सकेगा।
बेखबर हैं सूबों की सरकारें

केंद्र सरकार के इस दिशा निर्देश से सूबों की सरकारें भी बेखबर ही हैं। फारेस्ट इन्वायरमेंट मिनिस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश सहित समस्त प्रदेशों को दिशा निर्देश फरवरी में ही भेज दिए गए थे, किन्तु राज्यों की सरकारें भी गुटखा लाबी के आगे बेबस ही नजर रही है, यही कारण है कि देश भर में गुटखा का व्यवसाय धड़ल्ले से चल रहा है।
कीमत न बढ़ना आश्चर्यजनक!

पान मसाला उद्योग की एक विशेषता यह है कि 1989 में एक रूपए मंे बिकने वाला पाउच आज भी एक रूपए में ही बिक रहा है। बीस साल में मंहगाई चरम पर पहुंच गई है। चालीस रूपए किलो वाली सुपारी अब दो सौ तो केवड़ा साठ हजार रूपए किलो से तीन लाख रूपए किलो और चंदन के तेल ने पांच हजार रूपए प्रति लिटर से सत्तर हजार की तेजी दर्ज करा ली है। मजे की बात है कि इस पर मंहगाई का कोई असर नहीं पड़ा है।
मुंह के केंसर का कारक है गुटखा

राजधानी के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की अनदेखी से बढ़ रही पाउच के उपयोग की आदत से ओरल सबम्यूकल फायब्रोसिस यानी मुंह के केंसर का खतरा चार सौ गुना बढ़ जाता है। इसमें शुरूआत में मुंह खुलना कम होता है, फिर एकदम ही बंद हो जाता है।
लाबिंग के लिए है संगठन

गुटखा कारोबारियों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए बाकायदा अपना एक संगठन भी खड़ा कर रखा है। ‘‘जी 10‘‘ नामक यह संगठन आयकर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और अन्य महकमों से निपटने के लिए बनाया गया है। इस संगठन का मूल काम केंद्र सरकार में अपने कारोबार के लिए लाबिंग और अफसरान को नियम कायदों के पेंच में उलझाना है। कर चोरी करने वाले इन कारोबारियों ने इस संगठन को खुले हाथ से चंदा देकर आर्थिक तौर पर सुद्रढ़ बना दिया है।
प्रशासन भी है बेखबर

देश के हर सूबे के जिलों में जिला प्रशासन के आला अफसरान भी बात बात पर गुटखा पाउच फांकते नजर आते हैं। जांच में इस बात का खुलासा हो चुका है कि मैग्नीशियम कार्बोनेट नाम का तत्व गुटखा पान मसाला पाउच के अंदर मिलाकर बेचा जाता है, जबकि खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम के तहत खाद्य पदार्थ में निकोटिन अथवा तम्बाखू का प्रयोग कतई नहीं किया जाना चाहिए।

शीला सरकार गरीबों को 80 रूपए में देंगी रसोई गैस


दिल्ली में केरोसीन के बदले अब रसोई गैस

होटल व्यवसाईयों की होगी चांदी

 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। तीसरी बार दिल्ली की कुर्सी पर बैठने वाली शीला दीक्षित जल्द ही गरीबों के लिए खजाना खोलने वाली हैं। दिल्ली सरकार द्वारा गरीब गुरबों को मिट्टी के तेल के बजाए अब रसोई गैस उपलब्ध कराने की योजना बना रही है। गरीबों को यह सिलेंडर महज अस्सी रूपए में मुहैया होगा, शेष सब्सीडी दिल्ली सरकार भुगतेगी।
मुख्यमंत्री ने बताया कि इस मसले में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच बातचीत जारी है। गौरतलब होगा कि केंद्र सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए सीधी सब्सीडी देने का एलान किया था। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में सरकार द्वारा बीपीएल परिवार के लिए दो सौ साठ रूपए की सब्सीडी दी जा रही है। वर्तमान में गैस का सिलेण्डर साढ़े तीन सौ रूपयों में दिल्ली में उपलब्ध होता है और अगर इन परिवारों के लिए रसोई गैस का सिलेण्डर महज अस्सी रूपए में मिलेगा तब शेष राशि सरकार द्वारा सब्सीडी के तौर पर दी जाएगी।
होटल व्यवसाईयों के हांेगे मजे
 
हाल में मिल रहे केरोसीन का एक बड़ा हिस्सा ट्रांसपोटर्स द्वारा डीजल के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, सस्सा होने के कारण डीजल से चलने वाले वाहनों में सरकारी सब्सीडी वाला केरोसीन धडल्ले से भरा जा रहा है। नई व्यवस्था लागू हो जाने से होटल व्यवसाईयों के मजे हो जाएंगे। दिल्ली में वर्तमान में होटल संचालकों द्वारा घरेलू उपयोग वाले रसोई गैस के सिलेण्डर को चार सौ रूपयों तक खरीदा जाता है। अगर यह अस्सी रूपए में बीपीएल परिवार को उपल्बध होगा तो फिर होटल व्यवसाई इसे डेढ से दो सौ रूपयों में आसानी से खरीद सकेंगे।
यह है जमीनी हकीकत
 
दिल्ली में दो लाख अठ्ठाईस लाख बीपीएल कार्ड और सत्तर हजार नौ सौ चोपन अंत्योदय योजना के कार्ड धारक तथा अठ्ठाईस हजार झुग्गी पुनर्वास कालोनी के कार्ड धारक हैं। वर्तमान में दिल्ली में साढ़े तीन सौ रूपयों में मिलने वाला सिलण्डर बीपीएल परिवार को महज अस्सी रूपए में मिल सकेगा।

अप्रेल से वकीलों को भी देना होगा सेवाकर

वकीलों पर सेवाकर का शिकंजा 
चार्टर्ड एकाउंटेंट भी होंगे सेवाकर की जद में
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। यद्यपि अभी 2011 - 2012 के आम बजट पर बहस होना शेष है पर लगने लगा है कि आने वाले दिनों में वकील और चार्टर्ड एकाउंटेंट पर कर की गाज गिर सकती है। सरकार द्वारा राजस्व में बढ़ोत्तरी के लिए अब वकील और चार्टर्ड एकाउंटेंट पर भी शिकंजा कसना आरंभ कर दिया है। इस साल अप्रेल से इन दोनों ही व्यवसायिक सेवा वालों को सेवाकर देना होगा।
वित्त मंत्रालय के सूत्रों का दावा है कि बढ़ती मंहगाई और सरकारी खर्चों को पूरा करने के लिए अब वित्त मंत्री के पास नए करारोपण के अतिरिक्त कोई ओर विकलप नहीं बचा है। यही कारण है कि इन दोनों ही प्रोफेशनल्स पर सेवाकर आहूत करने का प्रावधान अभी लंबित है, जिसे बजट के उपरांत लागू किया जा सकता है।
सूत्रों ने आगे बताया कि वैसे तो इन दोनों ही पर सेवाकर लगाने का मसला 2009 में लाया गया था, किन्तु वकीलों के भारी विरोध के बाद सरकार ने अपने कदम वापस खींच लिए थे। इसके साथ ही साथ सरकार द्वारा न्यायिक सेवा के लिए एक नियामक आयोग के गठन पर भी विचार कर रही है ताकि वकीलों की मश्कें कसी जा सकें।

शनिवार, 5 मार्च 2011

अंतिम समय में अकेले ही रहे कुंवर अर्जुन सिंह

अनेक प्रश्न अनुत्तरित छोड़ गया अर्जुन सिंह का अवसान! 
प्रधानमंत्री नहीं निकाल सके अर्जुन से मिलने का समय
 
चिकित्सकों की लापरवाही चर्चित
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के स्थापित क्षत्रप कुंवर अर्जुन सिंह के निधन के उपरांत अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान (एम्स) में उनकी तीमारदारी पर प्रश्नचिन्ह लगने आरंभ हो गए हैं। सियासी हल्कों में चल रही चर्चाओं के अनुसार अतिविशिष्ट व्यक्ति की श्रेणी वाले अर्जुन सिंह की बीमारी और चिंताजनक स्थिति के बावजूद भी एम्स प्रशासन, वरिष्ठ अधिकारियों और योग्य चिकित्सकों ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाए।
 
बताया जाता है कि एम्स में भर्ती अर्जुन सिंह को देखने के लिए चिकित्सक अलग अलग समय में अकेले ही जाया करते थे, चिकित्सकों का एकराय न होना भी आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है। लोगों की चिंता है कि अर्जुन सिंह के इलाज में लापरवाही बरती गई है, यह किस कारण से या किसके कहने पर हुई यह अलहदा मामला है किन्तु एम्स में दिनचर्या को देखकर लगने लगा है कि उनकी तीमारदारी में घोर अनियमितता बरती गई है।
 
एम्स सूत्रों का कहना है कि अर्जुन सिंह की किडनी काम करना लगभग बंद कर चुकी थीं, जिससे उनके शरीर का खून विषाक्त होने लगा था। सूत्रों की मानें तो अर्जुन सिंह की तबियत दो मार्च की शाम से ही बिगड़ना आरंभ हो गई थी। जानकारी होने के बाद भी चिकित्सकों की टीम ने बैठकर कोई निर्णय नहीं लिया।
 
उधर अर्जुन सिंह के करीबी सूत्रों का दावा है कि इसी शाम कुंवर अर्जुन सिंह के निज सचिव यूनुस ने फोन पर कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी एवं केंद्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नवी आजाद को इस बारे मंे इत्तला दे दी थी। बावजूद इसके अगले दिन तक चिकित्सकों ने कोई कदम नहीं उठाया। बताते हैं कि तीन मार्च को शाम जब गुलाम नवी आजाद ने एम्स प्रबंधन को फोन पर इस मामले को देखने को कहा तब जाकर शाम होते होते डॉक्टर महाजन, डॉ.शर्मा, डॉ.डेका, डॉ.पदमा, डॉ.गुलेरिया आदि सर जोड़कर बैठे।
 
चिकित्सकों की इस अनदेखी के चलते कुंवर अर्जुन सिंह की तबियत लगातार बिगड़ती गई और अगले दिन चार मार्च को प्रातः उन्हें गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में वेंटीलेटर पर रखा गया। अर्जुन सिंह की बिगड़ती हालत को देखकर चिकित्सकों के हाथ पांव फूलने लगे और फिर चिकित्सकों द्वारा यह कहना आरंभ कर दिया गया कि उनके लिए अगले चोबीस घंटे बहुत ही नाजुक क्षण हैं।
देश के हृदय प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री, पंजाब में नाजुक हालातों को संभालने का सफल काम करने वाले एवं लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिंह की बीमारी के बाद भी एम्स प्रशासन द्वारा नियमित स्वास्थ्य बुलेटिन जारी न करना आश्चर्य का ही विषय माना जा रहा है।
 
सियासी गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार नेहरू गांधी परिवार के अंत तक वफादार रहे कुंवर अर्जुन सिंह के बारे में उनके विरोधियों ने सोनिया गांधी के कान जमकर भर दिए थे। कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि अब वो दिन हवा हुए जब कांग्रेस के अध्यक्ष द्वारा जमीनी हकीकत को तवज्जो दी जाती थी। सोशलिस्ट अर्जुन सिंह को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेसी बनया था। अब तो सोनिया गांधी कान की कच्ची हो गई हैं और वे वही देखती हैं जिस रंग का चश्मा उन्हें लगाकर दिखाया जाता है, वही करती हैं जो उन्हें करने को कहा जाता है, वही कहतीं हैं जितने शब्द उनके मुंह में डाले जाते हैं। सालों साल कांग्रेस और सोनिया के परिवार के लिए वफादार रहने वाले अर्जुन सिंह को दूध में से मख्खी की तरह निकालकर फेंक दिया गया था। जिस दिन उनका निधन हुआ उसी दिन अर्जुन सिंह को सोनिया गांधी ने अपनी टीम से निकाल बाहर कर दिया था।

एक के बाद एक मसालेदार बयानों से बने हुए हैं चर्चाओं में दिग्गी राजा


कांग्रेस के असली प्रवक्ता बनकर उभरे हैं दिग्विजय सिंह
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह का कद भले ही कांग्रेस में ज्यादा उपर न चढ़ पाया हो पर उनकी वजनदारी अब काफी हद तक बढ़ चुकी है। एक के बाद एक सधे हुए कदमों के चलते उन्होंने कांग्रेस के सारे पदाधिकारियों को हाशिए में ही ढकेल दिया है, यहां तक कि कांग्रेस के प्रवक्ता भी उनके आगे बौने नजर आने लगे हैं। दिग्गी राजा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कांग्रेस महासचिव रहते हुए उन्होंने जितनी भी पत्रकार वार्ताएं आयोजित की हैं, वे सब कांग्रेस मुख्यालय से परे ही की हैं।
 
वर्ष 2003 में सत्ता से उतरे राजा दिग्विजय सिंह ने दस सालों तक सक्रिय राजनीति से तौबा अवश्य कर ली थी, किन्तु वे राजनैतिक परिदृश्य से गायब नहीं हुए। एक के बाद एक विवादस्पद बयान देकर उन्होंने खुद को चर्चा में बनाए रखा है, जबकि अन्य कांग्रेस के क्षत्रप उनके सामने बौने ही प्रतीत हो रहे हैं।
 
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश पर दस साल शासन के दौरान उन्होंने संयुक्त मध्य प्रदेश के ताकतवर क्षत्रपों विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल, अजीत जोगी को हाशिए पर डाला। फिर तिवारी कांग्रेस के जन्मदाता कुंवर अर्जुन सिंह को होशंगाबाद से चुनाव लड़ने पर मजबूर किया और कुंवर साहेब जब औंधे मुंह गिरे तब उन्हें बरास्ता राज्यसभा संसदीय सौंध में जाना पड़ा। स्व.महाराजा माधवराव सिंधिया ने भी अपना संसदीय क्षेत्र बदला, और तो और दिग्गी राजा को ताज पहनाने वाले उनके बड़े भाई कमल नाथ को भी 1997 में उपचुनावों में कड़ी पराजय का मुंह देखना पड़ा।
 
बाद में सन्यास की अपनी पारी में पहले बटाला मुटभेड़ को फर्जी निरूपित कर उन्होंने आजमगढ़ की सियासत में अपनी जबर्दस्त दखल दर्ज करवाई। इसके बाद नक्सल समस्या पर सरकार के दावों पर विरोधाभासी बयान देकर दिग्गीराजा ने चिदम्बरम को उनकी औकात बता दी। फिर भगवा आतंकवाद में संघ को कटघरे में खड़ा करने वाले दिग्विजय सिंह ने मंुबई आतंकी हमले की आरएसएस वाली पुस्तक को भी हवा देना आरंभ कर दिया। महाराष्ट्र एटीएस चीफ हेमंत करकरे के साथ बातचीत को भी राजा दिग्विजय सिंह ने लोगों के कोतुहल का विषय बना ही दिया।

हाल ही में इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव जिन्होने 2003 में छोटे से मंच से अपना करोबार आरंभ किया और जो अब 2011 में एक लाख करोड़ रूपए से अधिक का हो चुका है, को भी सार्वजनिक रूप से ललकार दिया है। जबकि बाबा योग के अलावा काले धन को वापस लाने की वकालत भर कर रहे हैं। कांग्रेस के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी का भरोसा जीत लिया है, इसलिए अब वे अपने हिडन एजेंडे पर काम कर रहे हैं। वे बाबा पर तीखे प्रहार इसलिए कर रहे हैं, ताकि बाबा रामदेव भी कांग्रेस के नेताओं के चुन चुन कर नाम लेकर उनसे हिसाब मांगे और फिर आधुनिक राजनीति के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह उन सबको आसानी के साथ अपने प्रधानमंत्री बनने के मार्ग से उखाड़कर अलग कर सकें।

जल्द समाप्त होगी मैला ढोने की कुप्रथा: राजूखेड़ी


जल्द समाप्त होगी मैला ढोने की कुप्रथा: राजूखेड़ी
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली।। कांग्रेस सांसद गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी ने कहा है कि सर पर मैला ढोने की कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने की दिशा में कांग्रेस पार्टी का कदम सराहनीय है। उन्होंने बताया कि 28 फरवरी 2011 को पेष किए गए बजट में देष में गैर कानूनी रूप से चल रही अमानवीय प्रथा मेला ढोने की प्रथा के उन्मूलन के लिए 98 करोड़ रूपए आवंटित किए गए है।
श्री राजूखेडी ने आगे कहा कि इतनी बड़ी राषि आवंटित करके वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए की चेयरमेन सोनिया गांधी की इस इच्छा को क्रियांवित करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा दिया है कि एक साल के भीतर इस कुप्रथा को खत्म कर दिया जाए।
मध्यप्रदेश के कांग्रेस सांसद एवं प्रदेश संसदीय दल संयोजक गजेन्द्रसिंह राजूखेड़ी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि बजट में इतनी बड़ी राषि आवंटित करवाकर राष्ट्रीय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस कुप्रथा को खत्म करने का प्रयास किया है जो सर्वहारा वर्ग हितैषी है एवं निष्चित रूप से गरीबी उन्मूलन के सार्थक परिणाम आयेंगे।

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

एम्स में आज शाम ली अर्जुन सिंह ने अंतिम सांस

शांत हो गया कांग्रेस का चाणक्य
 
आज ही हटाया था सोनिया ने अर्जुन सिंह को अपनी मण्डली से

(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। कांग्रेस के बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के चाणक्य कुंवर अर्जुन सिंह का आज निधन हो गया, वे 81 वर्ष के थे, और लंबे समय से बीमार थे। अस्सी के दशक के उपरांत राजनैतिक ज्वार भाटा के साक्षी रहे अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, पंजाब के राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री रहे हैं।

देश के हृदय प्रदेश के विन्ध्य क्षेत्र के राजनेता राव शिव बहादुर सिंह के पुत्र कुंवर अर्जुन सिंह का जन्म पांच नवंबर 1930 को हुआ था। उनका विवाह विन्ध्य के सतना की ही सरोज देवी के साथ हुआ था। वे अपने पीछे पत्नि, दो पुत्र और एक पुत्री को बिलखता छोड गए हैं। माना जाता है कि तिवारी कांग्रेस के गठन के समय अगर उन्होंने कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा होता तो वे आज देश के प्रधानमंत्री होते।

अर्जुन सिंह की गिनती सफल राजनेताओं में की जाएगी। बतौर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री उन्होंने 1984 में संयुक्त मध्य प्रदेश में कांग्रेस को चालीस में से चालीस सीटेें जितवाकर दी थी। अर्जुन सिंह को 1985 में केवल एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनने का अवसर भी मिला। एक दिन के उपरांत ही उन्हें पंजाब में विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए बतौर राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया था। उस दौरान राजीव गांधी और लोंगोवाल समझौते में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण ही रही है। पंजाब में अस्तव्यस्त जनजीवन को पटरी पर लाने के लिए अर्जुन सिंह को सदा ही याद रखा जाएगा। इसके अलावा संयुक्त मध्य प्रदेश में तेंदूपत्ता संग्राहकों को उनका वाजिब हक दिलाने में अर्जुन सिंह की नीति भी सराहनीय रही है।

राजीव गांधी की हत्या के उपरांत प्रधानमंत्री बने नरसिंहराव से उनके संबंध कभी भी मधुर नहीं रहे हैं। बाद में तिवारी कांग्रेस के गठन के बाद इसी दल की टिकिट से सतना से वे चुनाव हार गए थे। बाद में वे कांग्रेस में वापस लौटे और फिर 1998 में लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपना क्षेत्र बदलकर होशंगाबाद कर दिया किन्तु वहां से भी उन्हें पराजय ही हाथ लगी।

वर्ष 2000 में उन्हें मध्य प्रदेश से ही राज्य सभा सदस्य बनाया गया, जिसके बाद वे 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में मानव संसाधन और विकास मंत्री बने। संप्रग की दूसरी पारी में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। इसके बाद उनकी परेशानियों और दुश्वारियों का सिलसिला आरंभ हुआ।

अर्जुन सिंह के लाख चाहने पर भी कांग्रेस ने उनकी पुत्री को लोकसभा का टिकिट नहीं दिया गया। इसके उपरांत उनकी जीवनी पर लिखी उनकी किताब में उनकी पत्नि के हवाले से बयान आया कि सोनिया गांधी ने अर्जुन सिंह को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बनाकर गल्ती की है। साथ ही भोपाल गैस कांड में एण्डरसन को भगाने के मामले में उनकी भूमिका काफी संदिग्ध समझी गई थी। आज घोषित हुई टीम सोनिया में भी कुंवर अर्जुन सिंह का नाम नदारत ही है। माना जा रहा है कि अब राहुल सिंह के मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष बनने की संभावनाएं भी क्षीण ही हो गई हैं।

और कितने प्रमाण चाहिए कांग्रेस की राजमाता को

थामस का शनी हो गया भारी
 
दागदार को बनाया थानेदार कोर्ट ने उतारा कुर्सी से

आखिर क्या चाह रही हैं सोनिया गांधी?

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से दूध का दूध पानी का पानी

(लिमटी खरे)

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक की समाप्ति के दौर में सवा सौ करोड़ की आबादी का भारत गणराज्य बुरी तरह शर्मसार हुआ है। देश को शर्मसार और किसी ने नहीं वरन् सवा सौ साल पुरानी और देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस के वर्तमान निजामों ने किया है। लंबे समय से कांग्रेस की बागडोर इटली मूल की श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों में है। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के सारे कारिंदे मनमानी पर पूरी तरह उतारू हैं, और सोनिया कभी मंद मंद मुस्कुरा देती हैं तो कभी जोर का ठहाका लगा देती हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पोलायिल जोसफ थामस को हटाने के जो आदेश जारी किए हैं, वे देश की कांग्रेसनीत सरकार की किरकिरी करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है, किन्तु घपलों, घोटालों को अंगीकार कर चुकी भ्रष्टों की संरक्षक और हिमायती बनी कांग्रेस पार्टी ने इसे अपने बचाव के तौर पर भी देख रही है। कांग्रेस ने सारी हदें पार कर ली हैं। इस वक्त लगभग तीन लाख करोड़ रूपयों के घपले और घोटाले देश में गूंज रहे हैं, इनका कहीं न कहीं कांग्रेस से संबंध है।

लंबे समय तक पोलायिल जोसफ थामस का बचाव करने वाली केंद्र सरकार के गाल पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो जबर्दस्त तमाचा मारा है, उसकी गूंज की गूंज सालों साल तक सुनी जाती रहेगी। वस्तुतः प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम द्वारा सीवीसी की नियुक्ति के लिए गठित समिति की तीसरी सदस्य नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए पोलायिल जोसफ थामस को सीवीसी जैसे महत्वपूर्ण पद पर विराजमान कर दिया था। सवाल यह है कि जहां देश की सबसे बडी जांच एजेंसी सीबीआई भी सीवीसी की देखरेख में काम करती है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के समय संस्थागत गरिमा को बाकायदा ध्यान में रखा जाए। इसके लिए जरूरी है कि सीवीसी जैसे पद पर उस व्यक्ति को बिठाया जाए जिसकी छवि उजली हो, बेदाग हो और वह किसी के दबाव में आकर काम न करे।

पोलायिल जोसफ थामस की हिमाकत तो देखिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायलय में यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि जब आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग देश में सांसद चुने जा सकते हैं तो फिर वे सीवीसी क्यों नहीं बन सकते हैं। उधर कितने आश्चर्य की बात है कि देश के प्रधानमंत्री को यह नहीं पता कि पोलायिल जोसफ थामस पर पामोलिन आयल घोटाले का प्रकरण चल रहा है! जब थामस पर एक प्रकरण चल रहा है फिर पलनिअप्पम चिदम्बरम भला थामस को कैसे क्लीन चिट दे सकते हैं।

पोलायिल जोसफ थामस में क्या गुड लगा हुआ है जो सरकार बार बार उनका बचाव करती रही। इतना ही नहीं सरकार द्वारा न्यायपलिका पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगाते हुए कहा गया कि न्यायपालिका को सरकार के काम में दखल देने का अधिकार नहीं है। कितने आश्चर्य की बात है कि एक अदने से भ्रष्ट अधिकारी को सही ठहराने के लिए कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा न केवल तथ्यों को छिपाने का कुत्सित प्रयास किया है, वरन देश को गुमराह भी करने में कोई शर्म नहीं महसूस की है।

विडम्बना तो यह है कि एक निहायत ईमानदार व्यक्ति के प्रधानमंत्री होते हुए केंद्र सरकार एक के बाद एक घपले घोटालों से घिरती ही चली जा रही है। पता नहीं कब यह सिलसिला रूक सकेगा। इससे पहले कामन वेल्थ गेम्स में सरकार की खासी किरकिरी हो चुकी है। टूजी मामले में आदिमत्थू राजा का बचाव करने वाली सरकार के सामने बुरी स्थिति तब आई जब उसे इसी मसले में राजा से त्यागपत्र मांगा गया और फिर बाद में राजा को जेल भी भेजा गया।

हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि सरकार अपनी जिम्मेवारी को समझना ही नहीं चाहती। बहुत पुरानी कहावत है कि ‘‘जगाया उसे जा सकता है, जो सो रहा हो, किन्तु जो सोने का नाटक करे उसे आप कभी भी जगा नहीं सकते। कहने का तातपर्य महज इतना ही है कि सरकार को अपने हाथ साफ करके सबके सामने आना चाहिए, ना कि आत्मघाती राजनैतिक मजबूरियों को गिनाने का प्रयास करना चाहिए।

भगवान शनि बहुत दयालू और दूसरी ओर बहुत ही क्रूर भी हैं। शनि देव को तेल का अर्पण करने से वे प्रसन्न हो जाते हैं। पोलायिल जोसफ थामस ने केरल में पामोलीन तेल के आयात में घोटाला किया था। इस लिहाज से थामस ने शनि को रूष्ट कर दिया। केरल सरकार ने वर्ष 1991 - 92 में सिंगापुर के एक प्रतिष्ठान से ताड़ का तेल मंगवाया गया था। इसमें आरोप था कि इसे अंतर्राष्ट्रीय दर से अधिक कीमत पर मंगाया गया था। सरकार ने 405 डालर प्रति टन की दर से पंद्रह हजार टन तेल के आयात को मंजूरी दी थी। जबकि बाजार में इसकी दर 392.25 डाॅलर प्रति टन थी। इस हिसाब से राज्य सरकार को उस वक्त 2 करोड़ 32 लाख रूपए का नुकसान उठाना पड़ा था।

जब पोलायिल जोसफ थामस के सीवीसी बनाए जाने की बात चल रही थी तब उनके अलावा 1973 बैच के पश्चिम बंगाल के भारतीय प्रशासनिक सेवा के विजय चटर्जी और 1975 बैच के उत्तरांचल काडर के अधिकारी एस.कृष्णन का नाम उस फेहरिस्त मे ंथा। दूसरी तरफ देखा जाए तो केंद्रीय सतर्कता आयोग एक स्वायत्ता संस्था है, जो केंद्र सरकार की समस्त विजलेंस इकाईयों की निगरानी का काम करती है। वस्तुतः यह कोई जांच एजेंसी नहीं है, यह सीबीआई या अन्य विभागीय जांच एजेंसियों के माध्यम से काम करवाती है। इतना ही नहीं यह सरकार द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों की जांच भी स्वयं अपने स्तर पर ही करती है। देखा जाए तो सीवीसी ने 1998 से ही काम करना आरंभ कर दिया था किन्तु इसका गठन 2003 में देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश के बाद हुआ था।

सोनिया मनमोहन के बीच संवाद आरंभ

पिघल रही है दस जनपथ और 7 रेसकोर्स में जमी बर्फ

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह के बीच संवादहीनता की स्थिति अब कुछ हद तक समाप्त होती प्रतीत हो रही है। दोनों ही शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर भी अब संवाद आरंभ कर दिया है। पिछले दिनों एक विवाह समारोह में जब दोनों ही ताकतवर नेता आमने सामने आए तो वे एक दूसरे की उपेक्षा करने का साहस नहीं जुटा सके।

पिछले दिनों सोनिया गांधी के एक करीबी सुमन दुबे के पुत्र के विवाह समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डाॅ.एम.एम.सिंह दोनों ही शिरकत करने पहुंचे। दोनों ही के वहां पहुंचने के पहले वर पक्ष की ओर से सोनिया की मण्डली तो वधू पक्ष की कमान प्रधानमंत्री कार्यालय के विश्वस्तों ने संभाल रखी थी।

गौरतलब है कि सुमन दुबे की गिनती कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र दस जनपथ (सोनिया का सरकारी आवास) के वफादारों में होती है, तो सुमन दुबे की बहू एक मलयाली पत्रकार और प्रधानमंत्री कार्यालय के अतिरिक्त सचिव की सुपुत्री हैं, जो प्रधानमंत्री की गुड बुक्स में हैं। इस लिहाज से घोषित और अघोषित सत्ता और शक्ति के केंद्र की वहां उपस्थिति लाजिमी ही थी।

यद्यपि यह विवाह केरल में संपन्न हुआ किन्तु इसका रिसेप्शन धौलाकुआं स्थित वायुसेना के मैदान में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मनमोहन और सोनिया गांधी दोनों ही आमने सामने आए और कुछ पलों तक वे एकांत में चर्चारत भी रहे। वहां मौजूद लोग इस नजारे को देखकर यह कहने से नहीं चूके कि संबंधों की बर्फ पिघल रही है।

कांग्रेस को अमरिकी अदालत के समन से खलबली


कांग्रेस को अमरिकी अदालत के समन से खलबली
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। नवंबर 1984 में हिन्दुस्तान में हुए सिख्खों पर हमले की बात लगता है कांग्रेस का पीछा ही नहीं छोड़ रही है। पहले शहरी विकास मंत्री कमल नाथ को अमरिकी समन का सामना करना पड़ा और अब दुनिया के चैधरी अमरिका की एक अदालत ने कांग्रेस पार्टी के नाम से ही समन जारी कर खलबली मचा दी है।
कांग्रेस मुख्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार यद्यपि अभी तक कांग्रेस पार्टी को इस समन की प्रति नहीं मिल सकी है किन्तु इंटरनेट के माध्यम से कांग्रेस के पदाधिकारियों को इस बारे में पता चल गया है। कांग्रेस के पदाधिकारी इस मामले में अपनी जुबान खोलने से पूरी तरह बच ही रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार अमरिका की एक अदालत में सिख्स फाॅर जस्टिस संगठन द्वारा दायर याचिका मंे कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों के बारे में अदालत ने कांग्रेस से अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है। इस संगठन में 1984 के दंगों में बचे अनेक सिख्ख सदस्य हैं।
याचिका में आरोप लगाया कि नवंबर 1984 में कांग्रेस पार्टी केंद्र में सत्ता में थी, उस दौरान कांग्रेस पार्टी द्वारा देश भर में सिख्खों पर हमले की साजिश रची थी। इतना ही नहीं हमलों में मदद दी और लोगों को हमला करने के लिए उकसाया। सिख्खों पर हमला भी उन्हीं राज्यों में हुआ था जहां कांग्रेस सत्ता में थी।

अर्जुन, माहसीना बाहर नए चेहरों पर जोर


अंततः सोनिया ने फेंट ही दिए पत्ते 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। अंततः कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी ने अपनी कार्यकारिणी का पुर्नगठन कर ही दिया है। पहले चरण में अनेक वरिष्ठ नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। माना जा रहा है कि अपने बेटे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के मार्ग प्रशस्त करने में लगी सोनिया गांधी ने कड़ा रूख अख्तिायार कर ही लिया है।
 
चैथी बार अध्यक्ष चुने जाने के तीन माह बाद आज पुर्नगठित कार्यकारिणी में नेहरू गांधी परिवार के विश्वस्त रहे कुंवर अर्जुन सिंह, मोहसीना किदवई और जी.वैंकटस्वामी जैसे उमर दराज नेताओं को स्थान नहीं मिल सका है। सोनिया गांधी ने अनेक लोगों को खलने वाले फैसले लेकर पश्चिम बंगाल, झारखण्ड प्रभारी केशव राव को हटा दिया है। इसके अलावा वी.नारायण सामी, प्रथ्वीराज चव्हाण, मल्लिकार्जुन खडगे, किशोर चंद देव को भी कार्यसमिति से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। आस्कर फर्नाडिस को कार्यसमिति में शामिल करते हुए महासचिव बनाया गया है।
 
सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल का रूतबा बरकरार रखा गया है। इसके अलावा मोती लाल वोरा, दिग्विजय सिंह, प्रणव मुखर्जी, ए.के.अंटोनी, जनार्दन द्विवेदी, गुलाम नवी आजाद के साथ ही साथ अपने पुत्र राहुल को भी इसमें स्थान दिया गया है। कांग्रेस की कार्यसमिति में अब 19 सदस्य हो गए हैं।

मध्य प्रदेश के बुंदेलखण्ड क्षेत्र के सूरमा सत्यव्रत चतुर्वेदी की भी सोनिया ने छुट्टी कर दी है। इसके अलावा सोनिया गांधी ने अपनी टीम में आस्कर फर्नाडिस, मधुसूदन मिस्त्री, वीरेंद्र सिंह जैसे लोगों को बतौर महासचिव शामिल किया है। चर्चाओं के अनुसार टीम सोनिया में दो बार से सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले आंध्र प्रदेश को प्रतिनिधित्व न मिलने पर दक्षिण में कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

हम हैं सबसे बडे कर्जदार

हम हैं पांचवे सबसे बड़े कर्जदार 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। हिन्दुस्तान विश्व के बड़े कर्जदारों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है, जी हां यह सच है। विश्व बैंक के ग्लोबल डेवेलपमेंट फाइनैंस 2010 प्रतिवेदन में 20 कर्जदार देशों के आंकड़ों के आधार पर हिन्दुस्तान को दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कर्जदार देश बताया गया है।
लोकसभा में शिव कुमार उदासी के प्रश्न के लिखित उŸार में विŸा मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बताया कि वल्र्ड बैंक के ग्लोबल डेवेलपमेंट फाइनैंस 2010 रिपोर्ट में बाहरी कर्ज के मामले में भारत को दुनिया का पांचवां सबसे कर्जदार देश बताया गया है। इस सूची में पहले स्थान पर रूस उसके बाद चीन, तुर्की और ब्राजील हैं।
वित्त मंत्री ने कहा कि सितंबर 2010 को समाप्त तिमाही में भारत का बाहरी कर्ज 13 लाख 32 हजार 195 करोड़ रुपये था जबकि इससे पूर्व मार्च 2010 को समाप्त तिमाही में बाहरी कर्ज 11 लाख 84 हजार 998 करोड़ रुपये था। प्रणव मुखर्जी ने कहा कि इन कर्जों र्में सितंबर 2010 को समाप्त तिमाही में 77.7 प्रतिशत कर्ज लंबी अवधि के थे और 22.3 प्रतिशत कर्ज कम समय के थे।

गुरुवार, 3 मार्च 2011

खासी किरकिरी हो चुकी है सीवीसी मामले में सरकार की

कोर्ट के कोड़े के बाद बिदा हुए थामस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। पामोलीन तेल घोटाले के आरोपी 1973 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पोलायिल जोसफ थामस को अंततः सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के उपरांत त्यागपत्र देने पर मजबूर होना पड़ा है। थामस अपनी नियुक्ति से ही विवादों में थे। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा थामस की नियुक्ति को उचित ठहराने के लिए अनेक कवायद की थी। थामस ने अपना त्यागपत्र सरकार को भेज दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश जस्टिस एस.एच.कापड़िया, जस्टिस के.एस.राधाकृष्णणन और जस्टिस स्वतंत्र कुमार की बैंच ने थामस की सीवीसी के पद पर नियुक्ति को गैरकानूनी करार देते हुए कहा कि इस पद की गरिमा को बरकरार रखने के लिए थामस को पद से हटा दिया जाना चाहिए।
मूलतः केरल के तिरूअनंतपुरम के वजाहुताकाड़ा निवासी साठ वर्षीय थामस के बारे में देश की सबसे बड़ी अदालत की प्रतिकूल टिप्पणी से सरकार अब बैकफुट पर आती नजर आ रही है। उधर विपक्ष अपनी बोथरी धार को पजाकर पैना करते हुए अब इस मामले में वजीरेआजम के त्यागपत्र की मांग पर अड़ती नजर आ रही है।

यह है थामस पर आरोप

1991 में केरल में हुए पामोलिन आयात घोटाले में सूबे के पूर्व निजाम करूणानिधी अैर तत्कालीन खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति सचिव थामस सहित नौ अन्य आरोपियों पर मुकदमा चल रहा है। थामस पर आरोप था कि उन्होंने मलेश्यिा की एक कंपनी से पंद्रह सौ टन पाम आयल आयात करने के सौदे में भ्रष्टाचार किया था। 2007 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर रोक लगा दी थी।

फैसले का पूरा सम्मान

प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने कहा है कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का पूरा पूरा सम्मान करते हैं। उधर पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि इस मामले में संसद के दोनों सदनों में सरकार की ओर से वक्तव्य भी जारी किया जाएगा।

थामस के बचाव में आए मोईली

उधर केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोईली ने प्रधानमंत्री और थामस का बचाव करते हुए कहा है कि सरकार ने कोई गैरकानूनी काम नहीं किया है। संसद के बाहर पत्रकारों से चर्चा के दौरान मोईली ने कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री देश से क्यों माफी मांगे? आखिर प्रधानमंत्री ने कौन सा गैरकानूनी काम किया है।

नियुक्ति रद्द कराने में बनाया रिकार्ड

चर्चित और विवादित देश के चौदहवें केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पोलायिल जोसफ थामस की नियुक्ति रद्द होना भी अपने आप में एक रिकार्ड बन गया है। थामस पहले एसे सीवीसी बन गए हैं जिनकी नियुक्ति रद्द की गई हो।

भरी भीड़ में अकेले खड़े हैं मनमोहन

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

भरी भीड़ में अकेले खड़े हैं मनमोहन
कांग्रेस के अंदर अब यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि अब वक्त आ गया है और वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन को सेवानिवृत्ति ले लेनी चाहिए। मतलब साफ है कि इस साल देश को नया प्रधानमंत्री तो अगले साल देश को नया महामहिम राष्ट्रपति मिलने वाला है। ईमानदार छवि के धनी गैर राजनैतिक प्रधानमंत्री डाॅ.सिंह के दिन गिनती के ही बचे हैं। उधर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी फिलहाल बतौर प्रधानमंत्री अपनी ताजपोशी को तैयार नहीं हैं। राहुल के अलावा जिन नामों पर चर्चा संभव है उनमें प्रणव मुखर्जी, पलनिअप्पम चिदम्बरम और ए.के.अंटोनी के नाम प्रमुख हैं। इनमें अंटोनी के पीछे सोनिया का जबर्दस्त समर्थन हैं। लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार भी दबे पांव इस दौड़ में शामिल हैं। अगर दलित और महिला को प्रधानमंत्री बनाने की बात आती है तो मीरा कुमार का दावा सबसे अधिक पुख्ता हो जाता है। इस सबसे इतर चतुर सुजान राजा दिग्विजय सिंह भी बिसात बिछाने में लगे हैं, पर राजा के दांव समझना इन राजनेताओं के बस की बात नहीं।

साढ़े नौ दशक बाद लल्ला लाएगा ब्राम्हण दुल्हनिया
आजादी के बाद देश के खिवैया रहे नेहरू गांधी परिवार में एक संयोग 94 साल बाद बनने जा रहा है। मौका है इस परिवार की राजनैतिक तौर पर सक्रिय पांचवीं पीढ़ी के विवाह का। संजय गांधी के पुत्र वरूण गांधी की जीवन संगनी ब्राम्हण बाला बनने वाली है। इसके पहले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की 1916 में ब्राम्हण कुल की कमला नेहरू को अपनी अर्धांग्नी बनाया था। इसके बाद इंदिरा गांधी ने फिरोज गांधी से तो राजीव गांधी ने इटली मूल की सोनिया और स्व.संजय ने पंजाबी मेनका को अपना जीवन साथी चुना। इसके बाद वाली पीढ़ी में प्रियंका ने राबर्ट वढ़ेरा को चुन लिया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की नजरें भी विदेशी बाला पर ही होने की खबरें हैं। इन परिस्थितियों में वरूण गांधी द्वारा ब्राम्हण कन्या से विवाह रचाकर कांग्रेस के गांधीज को परेशानी में डाल दिया है। अब राहूुल की मजबूरी हो जाएगी कि वे भी ब्राम्हण कन्या के साथ ही स्वयंवर रचाएं। वैसे उत्तर प्रदेश के एक संसद सदस्य के परिवार में उनके विवाह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

किसानों के पैसों से चमक रहे माननीयों के कपड़े
देश भर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है भूमिपुत्र किसान को। किसानों के लिए सरकारें हर कुछ करने को आमदा होती है। किसानों के नाम पर राजनीति भी जमकर ही होती है। पिछले दिनों दिल्ली से इल्ली तक किसानों को सभी ने लूटा। हाल ही में छत्तीसगढ़ की आर्थिक अपराध शाखा के पास एक नए तरीके का अभिनव मामला प्रकाश में आया है, जिसकी चर्चा भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में भी हो रही है। बताया जाता है कि किसानों के लिए जिस रकम का प्रावधान किया गया था, उस राशि से माननीय वियाायकों और मंत्रियों के कपड़ों की चमक बरकरार रखने के लिए वाशिंग मशीन ही खरीद दी गईं। पहले 7550 रूपए प्रति मशीन के हिसाब से तीन लाख दो हजार की बाद में 5600 रूपए के हिसाब से तीन लाख 92 हजार की मशीने खरीदी गईं। किसानों के लिए सरकार ने छः लाख चोरानवे हजार का प्रावधान किया किन्तु अधिकारियों ने माननीयों के कपड़ों की चमक के लिए उसे खर्च कर दिया।

मंहगाई ने किया संसद की और रूख!
जी हां, यह सच है कि आसमान छूती मंहगाई ने अब देश की सबसे बड़ी पंचायत की ओर रूख कर दिया है। आपको यकीन नहीं हो रहा है न। जाईए, सांसदों के आवास के पास की केंटीन में जाकर कुछ खाईए तो सही। आपको पहले से ज्यादा किन्तु बाजार से काफी कम दरों पर भुगतान करना होगा। सांसदों को काफी के लिए चार रूपए, वेज बिरयानी बारह रूपए, चिकिन बिरयानी के लिए 51 रूपए का शगुन। हर मामले मंे दरें पचास फीसदी बढ़ा दी गईं हैं। आप सोच रहे होंगे कि आखिर माजरा क्या है? क्या माननीयों की केंटीन आजाद भारत के बाहर है, जी नहीं इस केंटीन में मिलने वाले खाने पर सरकार द्वारा सब्सीडी दी जाती है। अर्थात इसके अलावा शेष राशि का भुगतान सरकार द्वारा किया जाता है। और यह भुगतान होता है आम जनता से करों के माध्यम से वसूली गई राशि से। है न कमाल की बात। आम जनता की आवाज उठाने वाले आम जनता के पैसे पर किस कदर एश करते हैं, यह बात सिर्फ और सिर्फ भारत गणराज्य में ही देखने को मिल सकती है।

कानून का मजाक उड़ाते माननीय
भारत गणराज्य का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां चुने हुए या पिछले दरवाजे से प्रवेश करने वाले सांसद या विधायक ही देश के कानून के साथ खिलवाड़ करते नजर आते हैं। जिन सांसदों या विधायकों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, वे खुलेआम सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिरकत करते नजर आते हैं, उन्हें पकड़ने के लिए पाबंद पुलिस ही उनकी देखसंभाल में लगी होती है। बीते दिनों मध्य प्रदेश के एक विधायक के बारे में भी इसी तरह की चर्चाएं दिल्ली स्थित मध्य प्रदेश भवनमें चटखारे लेकर सुनाई गई। सुसनेर के भाजपा विधायक संतोष जोशी पर मोमिन बडोदिया थाने में धारा 323 और 506 का प्रकरण पंजीबद्ध है। वे दो माहों से फरार हैं। बावजूद इसके जोशी ने अपने क्षेत्र में पदयात्रा की। नियम कायदों को ताक पर रखने की हद तो तब हो गई जब फरार विधायक के कार्यक्रम में सूबे के निजाम शिवराज सिंह चैहान ने भी आमद दे दी। सीएम की वहां मौजूदगी के चलते पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों के सामने विधायक संतोष जोशी सीना तानकर मंच पर डटे रहे। कोई राह चलता होता तो पुलिस का अदना सा सिपाही भी उसे कालर पकड़कर हवालात में ले जाता पर यहां तो साहेब बहादुर ही सलाम ठोंक रहे थे।

जयंती ने कराई कांग्रेस की किरकिरी
कांग्रेस के प्रवक्ताओं की फौज में शामिल राज्य सभा सांसद जयंती नटराजन वैसे तो अपना अधिक समय चेन्नई में बिताने के लिए मशहूर हो चुकी हैं, पिछले दिनों संसद में उनकी अनुपस्थिति ने कांग्रेस को बुरी तरह शर्मसार किया। मसला यह था कि महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सत्तारूढ़ कांग्रेसनीत संप्रग की ओर से जनार्दन द्विवेदी के धन्यवाद प्रस्ताव के समर्थन में जब उपसभापति ने बार बार जयंती नटराजन का नाम पुकारा तब वे सीट से नदारत ही थीं। मौके की नजाकत को भांप उपसभापति ने सदन की कार्यवाही एक घंटा पहले ही स्थगित करना मुनासिब समझा। मजे की बात तो यह रही कि उस वक्त सदन में वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह स्वयं उपस्थित थे। बाद में पतासाजी पर ज्ञात हुआ कि नटराजन ने चर्चा में भाग लेने के बजाए उस वक्त गोधरा कांड पर मीडिया से मुखातिब होना उचित समझा।

. . . तो यह दांव लगाया चिरंजीवी ने
आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी फेक्टर की काट के तौर पर कांग्रेस ने प्रजाराज्यम पार्टी से विलय की खिचड़ी पका ही ली। लोग असमंजस में हैं कि आखिर दोनों ही को इससे क्या लाभ हुआ। कांग्र्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है चूंकि दक्षिण में चिरंजीवी का जलजला है इसलिए कांग्रेस उनकी लोकप्रियता को भुनाना चाह रही है। सूत्रों ने आगे कहा कि चिरंजीवी ने विलय के लिए केंद्र में मंत्री पद की शर्त रखी थी। चूंकि चिरंजीवी लोक या राज्यसभा में नहीं हैं अतः उन्हें चुनवाने की जवाबदेही कांग्रेस के सर ही आती। बाद में राजमाता सोनिया गांधी के एक रणनीतिकार ने उन्हें मशविरा दिया कि अगर चिरंजीवी को उपमुख्यमंत्री बना दिया जाए तो उचित होगा। फिर क्या था चिरंजीवी के सामने यह जलेबी लटका दी गई। चिरंजीवी खुद को लाल बत्ती में बैठकर घूमने का सपना देखने लगे और हो गया प्रजाराज्यम का कांग्रेस में विलय।

खेद पत्रने बांटा भाजपा को
पाकिस्तान के कायदे आजम जिन्ना की तारीफों में कशीदे पढ़ने के बाद यह दूसरा मौका होगा जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी की भूमिका पर पार्टी के अंदर सवाल उठने लगे हों। मामला कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को काले धन और विदेशी बैंक खातों के संबंध में लिखे गए खेद प्रकट करने का खत से जुड़ा हुआ है। भाजपा का एक धड़ा इसे उच्च आदर्श की राजनीति का घोतक तो दूसरा राजनैतिक तौर पर गैरजरूरी कदम निरूपित कर रहा है। लोकसभा में पार्टी के उपनेता गोपी नाथ मुंडे का कहना है कि यह सोनिया के लिए क्लीन चिट नहीं है। मामले की जांच चल रही है, जब तक जांच पूरी नहीं होती तब तक यह कहना मुश्किल है कि किसका खाता है और किसका नहीं। अंदरखाते से जो खबरें छन छन कर बाहर आ रही हैं उन पर अगर यकीन किया जाए तो कांग्रेस के कुशाग्र प्रबंधकों ने काले धन के मामले में आड़वाणी की दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिसके परिणामस्वरूप निकलकर आया है खेदपत्र

खतरे में सुकुमार
दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित के सुकुमार समझे जाने वाले लोक कर्म विभाग के मंत्री राज कुमार चैहान के आसन पर खतरा डगमगा रहा है। भ्रष्टाचार के एक प्रकरण में दिल्ली के लोकायुक्त न्यायमूर्ति मनमोहन सरीन ने उन्हें दोषी मानते हुए भारत गणराज्य की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल से उन्हें पद से हटाने की सिफारिश कर दी है। इतना ही नहीं लोकायुक्त ने चैहान पर आपराधिक मामला चलाने की सिफारिश भी की है। जाहिर है इस कार्यवाही के बाद घपलों और घोटालों से घिरी शीला और कांग्रेस नेतृत्व पर नैतिक दवाब बढ़ गया है। गौरतलब होगा कि लोकायुक्त की इसी तरह की प्रतिकूल टिप्पणी के आधार पर कांग्रेस द्वारा कर्नाटक के निजाम येदिरप्पा से त्यागपत्र की मांग की जा रही है। लाख टके का सवाल यह है कि लोकायुक्त की सिफारिश पर महामहिम राष्ट्रपति का सचिवालय कब और क्या निर्णय सुनाता है?

वसुंधरा ही तार सकतीं हैं राजस्थान भाजपा को
रसातल की ओर अग्रसर भाजपा की राजस्थान इकाई में जान फूंकने के लिए अब भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को वसुंधरा राजे सिंधिया से उपयुक्त दूसरा कोई प्रतीत नहीं हो रहा है। पिछले दिनों उन्हें राज्य में नेता प्रतिपक्ष के पद का आफर दिया गया था, जो उन्होंने विनम्रता के साथ ठुकरा दिया है। और अपनी ओर से नंदलाल मीणा का नाम सुझाया है। इस पद के लिए अन्य नामों में धनश्याम तिवाड़ी, गुलाबचंद कटारिया और वसुंधरा खेमे से राजेंद्र सिंह राठौर और डाॅ.दिगम्बर सिंह के नामों की चर्चा है। भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी चाहते हैं कि उन्हें सूबे की भाजपा का मुखिया बनाकर अगला चुनाव उनकी अगुआई में ही लड़ा जाए। इसके पीछे माना जा रहा है कि राजघराने से होने के बाद भी आज वसुंधरा का जनाधार औरों की अपेक्षा काफी तगड़ा और विधायकों में पकड़ बरकरार है। किन्तु समस्या यह है कि सूबे के मौजूदा अध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी का कार्यकाल अभी एक साल का बचा हुआ है।

अब आया है उंट पहाड़ के नीचे
इक्कीसवीं सदी में जमीन से उठकर स्वयंभू योग गुरू बनने वाले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने महज आठ सालों में धर्मार्थ संस्था के नाम पर कर बचाकर लाखों करोड़ों रूपयों की अकूत धन संपदा एकत्र कर ली, फिर चले राजनीति की काल कोठरी को स्वच्छ, निर्मल, धवल बनाने। जिसका पेट भरा होता है, वही गंदगी को दूर करने का प्रहसन किया करता है। फिल्म शोले का मशहूर डायलाग है - ‘‘अब आया है उंट पहाड़ के नीचे‘‘। इसी तर्ज पर अब कांग्रेस के सामने बाबा रामदेव आ चुके हैं। बाबा ने काले धन पर जमकर सियासत की। कांग्रेस ने भी अर्जुन की तरह निपुण धर्नुधर, चाणक्य की तरह दूरंदेशी वाले महासचिव राजा दिग्विजय सिंह को बाबा के सामने मैदान संभालने पाबंद किया है। अब दोनों ओर से बयानो के बाण चल रहे हैं। राजनैतिक समझबूझ वाले जानते हैं कि दिग्गी राजा के आगे बाबा रामदेव ज्यादा देर टिक नहीं पाएंगे।

आखिर उद्योगपति क्यों हैं सीबीआई के निशाने पर
केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अनिल अंबानी, वेणुगोपाल, शाहिद बलवा जैसी मशहूर हस्तियों की कालर पर हाथ डाला है तो निश्चित मान लिया जाए कि इसके पीछे कारण कुछ गहरा और बेक सपोर्ट बड़ा ही तगड़ा है। वरना किसी की क्या हिमाकत कि इन धनकुबेरों को बुलावा भेजा जाए वह भी साधारण मुलजिमों की तरह पूछताछ का। कहा जा रहा है कि अब बारी कुमार मंगलग बिरला और रतन टाटा की है। दस जनपथ के सूत्रों का कहना है कि देश के उद्योगपति कल तक कांग्रेस की हां में हां मिलाते आए हैं, किन्तु अब इनके द्वारा क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को आर्थिक रूप से सुदृढ कर कांग्रेस का सफायश किया जा रहा है। इसके साथ ही साथ इन शीर्ष उद्योगपतियों द्वारा समय समय पर कांग्रेस की व्यवस्था के खिलाफ अनर्गल प्रलाप भी किया गया है। यही कारण है कि दस जनपथ के इशारों पर सीबीआई ने इन्हें बुला भेजा और इशारों ही इशारों में इन्हें पैजामे के अंदर रहने का मशविरा भी दे डाला।

पुच्छल तारा
भारत में कौन कितना कमाता और कितना खर्च करता है इस बारे में कोई हिसाब किताब ही नहीं रखा जाता है, जबकि विदेशों में आय से अधिक संपत्ति पर कानून कड़े हैं और सरकारों की बाकायदा नजरें रहती हैं। लुधियाना से सुरभी ने एक ईमेल भेजा है। सुरभी लिखती हैं कि एक अमेरिकी और एक भारतीय आपस में बतिया रहे थे।
अमेरिकी: हमारे यहां हर नागरिक की औसत कमाई दस हजार डालर है और वह खर्च करता है सात हजार डालर।
हिन्दुस्तानी: बाकी बचे पैसों का वह क्या करता है?
अमेरिकी: यह उसका नितांत निजी मामला है, कि वह बचे पैसे का क्या करता है, हमारे यहां निजी मामलों में दखल नहीं दिया जाता है।
हिन्दुस्तानी: हमारे यहां हर नागरिक की औसत कमाई डेढ़ हजार रूपए है, और वह खर्च करता है पांच हजार रूपए।
अमेरिकी (हैरत के साथ): बाकी पैसे वह लाता कहां से है?
हिन्दुस्तानी: यह उसका सरदर्द और नितांत निजी मामला है। हमारे यहां भी किसी के निजी मामलों में कोई दखल नहीं देता है।

खूंखार भिखारियो के निशाने पर लो फ्लोर बसें

भिखारियों के कब्जे में दिल्ली

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कामन वेल्थ गेम्स के आगाज के साथ ही दिल्ली की सूरत और सीरत बदलने की कवायद आरंभ की गई थी। पिछले साल सरकार द्वारा नई नई परियोजनाओं के जरिए दिल्ली का मिजाज बदलने का प्रयास किया था। इस दौरान दिल्ली को भिखारियों से मुक्त करने का काम भी हाथ में लिया था, विडम्बना ही कही जाएगी कि आज भी चैक चैराहों के साथ ही साथ रेल और बस में खूंखार भिखारी लोगों के साथ हाथापाई करते नजर आ रहे हैं।
आरोपित है कि स्मेक, ब्राउन शुगर जैसे नशे की जद में पूरी तरह आ चुके दिल्ली के भिखारी जिनमें युवाओं और दुधमुहे बच्चों की खासी तादाद है, के दारा अपनी एक खुराक के लिए चोरी और राहजनी जैसी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। पहले इस तरह की घटनाएं देर रात सूनसान इलाकों या सड़कों पर घटित होती थीं, किन्तु अब इस तरह की घटनाएं भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी घटित होने लगी हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार कनाट सर्कस, इंडिया गेट सर्किल, निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन, प्रगति मैदान, साउथ एक्स आदि इलाकों से गुजरने वाली लो फ्लोर यात्री बसों यहां तक कि चमचमाती लाल एसी बस में भी इस तरह के दुर्गन्ध मारते भिखारी चढ़ जाते हैं, और बिना टिकिट ही एक दो स्टेशन तक यात्रा करते हैं। इसी बीच इनके द्वारा यात्रियों से बाकायदा भीख मांगी जाती है। भीख देने से इंकार करने पर इनके द्वारा छुरा या ब्लेड निकालकर यात्रियों को डराया धमकाया जाता है। कुछ वारदात तो सामन लेकर भागने की भी प्रकाश में आई हैं।
एक यात्री ने बताया कि नई दिल्ली से ओखला की ओर जाने वाली 984 रूट की एसी बस में एक गेंग चढ़ती है, जो यात्रियों के साथ लूटपाट किया करती है। कनाट प्लेस पर भी इस तरह के भिखारियों द्वारा राहगीरों के साथ अभद्र व्यवहार किया जा रहा है। इस तरह के भिखारी इतने खूंखार हैं कि बात बात में चाकू और ब्लेड निकालकर इनके द्वारा अपने काम को अंजाम दिया जाता है।
इसी तरह की अनेक गैंग पुरानी दिल्ली, नई दिल्ली, विशेषकर निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर चोरी, राहजनी को अंजाम देती मिल जाती हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब सीधे सादे यात्री को रेल्वे पुलिस या टिकिट कलक्टर द्वारा बिना टिकिट पकड़े जाने पर जुर्माने के साथ ही साथ प्रताडित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर रेल के प्लेटफार्म पर लगते ही इस तरह के भिखारी रेल में खाली बोतल और डब्बे बीनने बेधड़क घुसकर यात्रियों का सामान पार कर देते हैं। इतना ही नहीं आटो, टेक्सी और रिक्शा वाले भी प्लेटफार्म पर जाकर सवारियों के साथ मोल तोल करते मिल ही जाते हैं।

महासचिवों ने फेरा 24 अकबर रोड़ से मुंह

एआईसीसी में फेरबदल किसी भी समय

मीडिया टीम होगी तगड़ी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा अपनी नई टीम का एलान अब किसी भी समय किया जा सकता है। पार्टी महासचिवों और मीडिया प्रभाग की कार्यप्रणाली से राजमाता श्रीमति गांधी खासी खफा नजर आ रही हैं। माना जा रहा है कि पार्टी इन दोनों ही की पोस्ट्स पर सोनिया गांधी द्वारा उपयुक्त लोगों को विराजमान किया जा सकता है।
बताया जाता है कि पार्टी के महासचिवों ने मुख्यालय की ओर रूख करना ही तज दिया है। पार्टी महासचिव वीरप्पा माईली, मुकुल वासनिक, केशव राव, गुलाम नवी आजाद ने लंबे समय से पार्टी मुख्यालय में अपनी आमद नहीं दी है। इसके साथ ही साथ सत्यव्रत चतुर्वेदी भी लंबे समय से पार्टी मुख्यालय से नदारत ही हैं।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि सोनिया गांधी के अध्यक्षयीय कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी सदा ही मीडिया मैनेजरांे की कमी से दो चार होती आई है। वर्तमान में भी मीडिया से रूबरू होने वालों की कमी साफ परिलक्षित हो रही है। पत्रकारों की यह शिकायत आम है कि जब भी कांग्रेस मुख्यालय जाया जाता है तो शकील अहमद और मनीष तिवारी को छोड़कर और कोई वहां मिलता ही नहीं है।
जयंती नटराजन का अधिकांश समय दिल्ली के बजाए चेन्नई में ही बीतता है। इसी तरह अभिषेक मनु सिंघवी को हरयाणा और आस्कर फर्नाडिस को जम्मू काश्मीर के साथ ही साथ संगठन का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने से ये भी पार्टी मुख्यालय फटकना पसंद नहीं करते हैं। रही बात आधा दर्जन मंत्रियों की तो सत्ता और संगठन में हिस्सेदार होने के कारण इनके पास पार्टी मुख्यालय जाकर कार्यकर्ताओं से मिलने का वक्त निकाल पाना मुश्किल ही होता है।
सोनिया के करीबी सूत्रों का कहना है कि इस साल पांच के अलावा 2012 में उत्तराखण्ड और पंजाब में होने वाले चुनावों के चलते कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और उनके पुत्र युवराज राहुल गांधी ने ताना बाना बुनना आरंभ कर दिया है। सूत्रोंने कहा कि चुनावी राज्यों से ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व देने का प्रयास करने वालीं हैं सोनिया गांधी।

0 इन पर गिरेगी गाज
गुलाम नवी आजाद, वी.नारायणसामी, एमवीरप्पा मोईली, मुकुल वासनिक, ए.के.अंटोनी, जयराम रमेश जैसे मंत्रियों जिनके पास संगठन की जवाबदारी भी है, उन्हें एक जवाबदारी से मुक्त कर दिया जाएगा। साथ ही साथ मणिशंकर अय्यर को महती जवाबदारी से नवाजा जा सकता है।