शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

अनुसुईया की उपेक्षा करते शिव


अनुसुईया की उपेक्षा करते शिव

जीएडी नहीं दे रहा अनसुईया की मांग पर ध्यान

अनसुईया के रिटायरमेंट की प्रतीक्षा में शिवराज

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राजनैतिक दृष्टिकोण से मध्य प्रदेश के अतिसंवेदनशील और महत्वपूर्ण छिंदवाड़ा जिले की निवासी और भाजपा की राज्यसभा सदस्य सुश्री अनुसुईया उईके की मांग पर शिवराज सिंह चौहान कान नहीं दे रहे हैं। सूबे का सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) भी सुश्री उईके की सेवानिवृति की प्रतीक्षा कर रहा है, ताकि उसके बाद इस मांग को नस्तीबद्ध कर दिया जाए।

ज्ञातव्य है कि मध्य प्रदेश से राज्य सभा सदस्य सुश्री अनुसुईया उईके लंबे समय से मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार से यह मांग कर रहीं हैं कि सांसदों के द्वारा सूबाई सरकार को लिखे गए पत्रों पर की गई कार्यवाही को ऑन लाईन कर दिया जाए ताकि सभी इसे देख सकें और संसद सदस्यों एवं राज्य सरकार की पारदर्शिता बढ़ जाए।

यहां उल्लेखनीय होगा कि मध्य प्रदेश ही एसा सूबा है जहां ई शासन और गुड गर्वनेंस पर आधारित काम लंबे समय से किया जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लिखा पत्र अब सूबे के सामान्य प्रशासन विभाग में पड़ा धूल ही खा रहा है। कहा जा रहा है कि अगर इसे ऑन लाईन कर दिया गया तो यह राजनैतिक दृष्टि से उचित नहीं होगा क्योंकि आपस में लड़ाई करने वाले अनेक सियासी दलों के नेता अंदर ही अंदर एक ही थैली में रहते हैं।

2006 में राज्य सभा के लिए चुनी गईं सुश्री अनुसुईया उईका का कार्यकाल अगले साल 2 अप्रेल को समाप्त हो रहा है। अनुसुईया उईके के करीबियों का कहना है कि वे इस व्यवस्था के माध्यम से छिंदवाड़ा के सांसद कमल नाथ को घेरना चाह रहीं हैं, पर शिवराज सिंह चौहान इस काम में उनकी मदद नहीं कर रहे हैं। उधर निराशाजनक प्रदर्शन के चलते अनुसुईया उईको को अगले साल फिर से राज्य सभा का टिकिट मिलना मुश्किल ही प्रतीत हो रहा है।

यूपी में उमा को हकालते भाजपाई


यूपी में उमा को हकालते भाजपाई

राजनाथ भी नहीं हैं उमा से खुश

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भाजपा की तेज तर्रार नेत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के दिन वाकई खराब चल रहे हैं। पहले तो तिरंगा प्रकरण में उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी गई, फिर उनकी भारतीय जनशक्ति पार्टी भी कोई करिश्मा नहीं कर पाई। जैसे तैसे वे भाजपा में वापस आईं तो ढेर सारी शर्तें उन पर लाद दी गईं। अब उत्तर प्रदेश में ही उनका विरोध पार्टी के अंदर आरंभ हो गया है।

गौरतलब है कि भाजश की असफलता के बाद उमा भारती भाजपा में वापस आने बेताब रहीं। कई बार उनकी वापसी टाली गई। जैसे तैसे वे भाजपा में वापस आईं तो उन पर शर्त लाद दी गई कि वे अपने गृह सूबे मध्य प्रदेश की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देंगीं। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार तक ही वे अपने आप को सीमित रखेंगे। यूपी की निजाम बनने का सपना भी वे नहीं देखेंगी।

फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती ने चंद दिनों में ही उत्तर प्रदेश में धमाल मचा दिया है। उनकी सक्रियता पार्टी के सूबाई नेताओं को खलने लगी है। उमा के तेवरों और उनके आगे पीछे उमड़ने वाली भीड़ ने सूबे के आला भाजपा नेताओं की नींद ही उड़ा दी है। उमा के कदम ताल से लगने लगा है कि वे उत्तर प्रदेश में भाजपा की डूबती नैया को सहारा दे सकती हैं।
इसी बीच उत्तर प्रदेश भाजपाध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने एक बयान देकर ठहरे हुए पानी में लहरें पैदा कर दीं कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो उत्तर प्रदेश का ही व्यक्ति मुख्यमंत्री बनेगा। इसके समर्थन में भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी बयान दे मारा कि उत्तर प्रदेश का ही व्यक्ति सीएम बनेगा। कुल मिलाकर सारी बयानबाजी उमा भारती के लिए हो रही है। वहीं उमा समर्थक इसी बात को मध्य प्रदेश में भी हवा देने के मूड में दिख रहे हैं कि एमपी मूल का व्यक्ति ही एमपी में सीएम होगा।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

सावधान! मानसून के बाद बढ़ सकते हैं सीमेंट के दाम


सावधान! मानसून के बाद बढ़ सकते हैं सीमेंट के दाम

(लिमटी खरे)

सीमेंट एक बड़ा उद्योग बन चुका है भारत गणराज्य में। सीमेंट का उपयोग अब हर घर में होने ही लगा है। एक समय था जब सत्तर के दशक में सीमेंट की राशनिंग की गई थी। उस समय सीमेंट की खपत बहुत ज्यादा थी और उत्पादन बेहद कम। सीमेंट का उद्योग तेजी से उपर आया है। आज प्रति व्यक्ति सीमेंट की खपत लगभग डेढ़ सौ किलोग्राम आंकी जा रही है। मानसून में वैसे भी सीमेंट का उपयोग बेहद कम होता है। अब जबकि बारिश रूक गई है तब मानसून की बिदाई के साथ ही सीमेंट की कीमतों में उछाल दर्ज किया जाएगा। इसका बड़ा कारक डीजल पेट्रोल के दामों में बढ़ोत्तरी भी है। त्योहारी मांग को देखकर सीमेंट की कीमतों में इजाफे से इंकार नहीं किया जा सकता है।

देश के महानगरों के अलावा छोटे मंझोले शहरों में भी अब कांक्रीट जंगल खड़े होना आरंभ हो गए हैं। मकान पक्के हों या कच्चे हर जगह सीमेंट का उपयोग अवश्यंभावी ही है। बिना सीमेंट कोई भी दीवार खड़ी नहीं हो सकती है। यही कारण है कि सीमेंट उद्योग में दिन दोगनी रात चौगनी बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से लेकर अस्सी के दशक के आरंभ तक सीमेंट की मांग और उत्पादन में कमी के चलते सीमेंट तक की राशनिंग कर दी गई थी। लोग मकान बनाते वक्त सीमेंट खरीदने के लिए पर्ची बनवाने के लिए रतजगा तक किया करते थे। इस दौर में सीमेंट की कालाबाजारी करने वालों की पौ बारह हो गई थी।

मानसून की बिदाई की बेला आते आते रियल्टी सेक्टर के कदम तालों में तेजी आना आरंभ हो गया है। अक्टूबर नवंबर माह में सीमेंट, इंफ्रा और रियल्टी सेक्टर में उफान आने की भविष्यवाणियां होना आरंभ कर दी गई हैं। सीमेंट उत्पादन से जुड़े लोगों का भी मानना है कि अगले माह से सीमेंट के दामों में जबर्दस्त उछाल दर्ज होने की संभावनाएं हैं। त्योहारी मांग को देखकर भी सीमेंट की कीमतों में इजाफे से इंकार नहीं किया जा सकता है।

अमूमन सीमेंट के तीन ही उपभोक्ता होते हैं, इनमें बिल्डर, इंफ्रास्टक्चर संस्थाएं और व्यक्तिगत प्रमुख हैं। एक आंकलन के मुताबिक कुल उत्पादन का चालीस फीसदी हिस्सा व्यक्तिगत तौर पर ही उपयोग में लाया जाता है। वैसे सरकार की इंफ्रास्टक्चर क्षेत्र के प्रति नजदीक और लचीला रवैए के साथ ही साथ त्योहारी आकर्षण में बिल्डर्स द्वारा छूट के साथ मकानों के बेचने की घोषणा के चलते सीमेंट की मांग में तेजी से इजाफा होने का अनुमान है।

वैसे भी मानसून में निर्माण कार्य बाधित ही हुआ करते हैं, यही कारण है कि बारिश के चार माहों में सीमेंट की खपत न्यूनतम ही हुआ करती है। सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में इजाफा किया जा चुका है। पेट्रोल, डीजल, कोयला, लाजिस्टिकल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के चलते सीमेंट की कीमतों में वैसे ही उछाल दर्ज किया जा सकता है। अनुमान तो यह लगाया जा रहा है कि सीमेंट की कीमतों में दस से तीस रूपए प्रति बैग की वृद्धि दर्ज हो सकती है।

आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2008 - 2009 में 18.61 करोड़ टन सीमेंट का उत्पादन किया गया था। इसी वित्तीय वर्ष में 1850 करोड़ डालर का कुल टर्न ओवर था सीमेंट उद्योग का। सीमेंट इंडस्ट्री के माध्यम से इस वक्त दुनिया में चौदह खरब लोग अपने परिवार की क्षुदा शांत कर रहे हैं। रही बात भारत की तो भारत में इस वक्त 365 छोटे और सफेद सीमेंट के प्लांट अस्तित्व में हैं। जिनमें से 148 बड़े सीमेंट प्लांटस हैं।

आपको यह जानकर बेहद आश्चर्य होगा कि भारत गणराज्य विश्व में सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक देश है। भारत की सीमेंट इंडस्ट्री की उत्पादन क्षमता वित्तीय वर्ष 2009 - 2010 में बढ़कर 21.9 करोड़ टन हो गई है। देश में इस वक्त कुल 46 कंपनियां सीमेंट उत्पादन के कार्य में लगी हुई हैं। चालू माली साल के बाद वर्ष 2011 - 2012 में सीमेंट इंडस्ट्री का उत्पादन लक्ष्य बढ़ाकर 29.8 करोड़ टन होने की उम्मीद है।

सीमेंट के बढ़ते उपयोग और मांग को देखकर अगले तीन सालों में सीमेंट इंडस्ट्री के दस फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। विश्व के मान से अगर देखा जाए तो प्रति व्यक्ति सीमेंट का औसत उत्पादन विश्व में 250 किलोग्राम होता है, जबकि दुनिया के चौधरी बनने की होड़ में शामिल चीन द्वारा 450 किलोग्राम सीमेंट का उत्पादन प्रति व्यक्ति किया जाता है। भारत में यह औसत 115 किलोग्राम प्रति व्यक्ति है। जबकि खर्च की दर 136 किलोग्राम प्रति व्यक्ति है।

एक समय था जब लोग घरों को मिट्टी से बनाया करते थे। उसके पहले दीवारों को खड़ा करने और जोड़ने के लिए मिट्टी के साथ ही साथ अनेक प्राकृतिक चीजों का उपयोग भी किया जाता था। आज के सीमेंट के जोड़ से वे प्राकृतिक चीजों का जोड़ कहीं ज्यादा टिकाउ और मजबूत होता था। कालांतर में मिट्टी का प्रयोग दीवारें खड़ी करने के लिए किया जाने लगा। मिट्टी के बने मकान पूरी तरह पर्यावरण और मौसम के अनुकूल ही हुआ करते थे।
जब से सीमेंट इंडस्ट्री ने अपने पैर पसारे हैं तब से समूचा विश्व इसकी जद में आ गया है। सीमेंट के अत्याधिक प्रयोग के चलते पर्यावरण का असंतुलन भी साफ तौर पर दृष्टिगोचर होने लगा है। सीमंेट के बने मकानों में स्वच्छ हवा और रोशनी की कमी के कारण तरह तरह की समस्याओं ने पैर पसारने आरंभ कर दिए हैं।

एमपी में सीनियर सिटीजन्स को हेलीकाप्टर सुविधा!


एमपी में सीनियर सिटीजन्स को हेलीकाप्टर सुविधा!

सूबे की सड़कें नहीं बची चलने के काबिल

केंद्र और राज्य की रस्साकशी में पिस रहे हृदय प्रदेश के यात्री

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। जर्जर सड़कों वाले देश के हृदय प्रदेश में आने वाले दिनों में अस्सी साल की उमर पार करने वाले यात्रियों को मध्य प्रदेश की भाजपा शायद उड़न खटोले की सुविधा निशुल्क देने जा रही है। इस सुविधा का भोगमान कौन भोगेगा इस बारे में भी कुहासा जल्द ही साफ होने की उम्मीद है। इस तरह की चर्चाएं इन दिनों देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की सियासी फिजां में तैर रही हैं।

दरअसल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग पद से अपने आप को प्रथक करने वाले लाल कृष्ण आड़वाणी की जन चेतना यात्रा मध्य प्रदेश से होकर गुजर रही है। निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक आड़वाणी पहले होशंगाबाद जाएंगे फिर रात्रि विश्राम के लिए भोपाल आकर अगले दिन होशंगाबाद होते हुए ही छिंदवाड़ा जाना था। एमपी की राजधानी भोपाल से छिंदवाड़ा का मार्ग इतना जर्जर हो चुका है कि इस पर अगर आड़वाणी सफर करते तो वे शिवराज सिंह चौहान को एक मिनिट बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं रहते।

गौरतलब है कि आड़वाणी की जनचेतना यात्रा का मूल मंतव्य जनता से फीडबेक लेना है। मध्य प्रदेश में हालात इतने खराब हैं कि यहां के सियासी प्रबंधकों ने उन्हें हवा हवाई बनाकर यहां से बिदा दिलाना उचित समझा है। आड़वाणी की प्रस्तावित यात्रा को देखकर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आनन फानन करोड़ों रूपए खर्च कर सड़कें दुरूस्त करवाई जा रही है, जिसकी प्रतिक्रिया बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। लोगों का कहना है कि आड़वाणी की महज एक दिन की यात्रा के लिए सड़कों को सुधारने में करोड़ों रूपए खर्च किए जा रहे हैं वहीं जिस जनता से ये वसूले जा रहे हैं उसकी सुविधा की जब बात आती है तो शिवराज सिंह चौहान द्वारा गेंद केंद्र के पाले में फेंक दी जाती है। यह कहां का न्याय है? इस मामले में विपक्ष में बैठी कांग्रेस के मौन से भाजपा और कांग्रेस की नूरा कुश्ती की संभावनाओं को ही बल मिलता है।

आड़वाणी के लिए भोपाल से छिंदवाड़ा तक हेलीकाप्टर का भोगमान किसी मंत्री या मुख्यमंत्री को इसमें बिठाकर सरकार भोगेगी या फिर संगठन इसका किराया भरेगा यह बात तो भविष्य के गर्भ में ही है, किन्तु दिल्ली के सियासी गलियारों में अब इस मामले में चुटकियां लेना आरंभ हो गया है। लोगों का कहना है कि आड़वाणी उमर दरज हैं, वे 84 के पेटे में हैं। इस लिहाज से अब राज्य में अस्सी पार कर चुके लोगों की सुविधाओं का ख्याल रखते हुए भाजपा या मध्य प्रदेश सरकार उनकी यात्रा के लिए हेलीकाप्टर मुहैया करवाने की नीति लाने वाली है। लोगों का तर्क भी सही है जब आड़वाणी को इसका लाभ मिल सकता है तो बाकी बुजुर्गवार इससे क्यों वंचित रहें।

चिदम्बरम के लिए ट्रबल शूटर बनकर उभरे मनमोहन


चिदम्बरम के लिए ट्रबल शूटर बनकर उभरे मनमोहन

टूजी की आग का डर बचाए हुए है चिदम्बरम को

हिन्दु आतंकवाद के कारण भाजपा के निशाने पर हैं चिदम्बरम

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। टूजी मामले में गले तक फंस चुके गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम ने पांसे कुछ इस तरह से फेंके हैं कि उनकी खाल बचाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ही न चाहते हुए भी पहल करनी पड़ी। वजीरे आजम को आभास हो चुका है कि अगर चिदम्बरम का त्यागपत्र हुआ तो अगला निशाना वे खुद बन जाएंगे। उधर चिदम्बरम ने भगवा आतंकवाद के नारे को बुलंद कर भाजपा और संघ से बैर मोल लिया हुआ है।

गृहमंत्री चिदम्बरम के नोट प्रकरण के सामने आते ही सियासी भूचाल में तेजी आ गई। न्यूयार्क गए प्रधानमंत्री ने तत्काल ही फोन पर चिदम्बरम से फोन पर बात की। चिदम्बरम के करीबी सूत्रों का कहना है कि चिदम्बरम ने पीएम से त्यागपत्र देने की पेशकश कर दी थी। प्रधानमंत्री भी इसके लिए तैयार हो गए थे। अचानक ही चिदम्बरम ने कहा कि अगर वे गए तो विपक्षियों के निशाने पर उनके यानी मनमोहन के आने से कोई रोक नहीं सकता। इस पर चिंतित मनमोहन ने उन्हें एसा करने से रोक दिया। वैसे भी पार्टी के आला नेता भाजपा के दबाव में चिदम्बरम को हटाने को तैयार नहीं हैं।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के आला सूत्रों का कहना है कि चिदम्बरम ने पार्टी के नेताओं के बीच में यह बात प्लांट कर दी है कि भाजपा को टूजी से कोई ज्यादा सरोकार नहीं है। वह तो चिदम्बरम के पीछे इसलिए पड़ी है क्योंकि उन्होंने भगवा आतंकवाद का खुलासा कर उसे हवा दी थी। उपर से अमेरिका भी चिदम्बरम का हितचिंतक बनकर सामने आया है। कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग इस बात से सहमत नहीं है। उसका मानना है कि अब परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं अतः मनमोहन की ज्यादा जरूरत नहीं बची है। इस लिहाज से चिदम्बरम और मनमोहन दोनों ही को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए।

कांग्रेस के लिए टर्निंग प्वाईंट होगा अगला आम चुनाव


बजट तक शायद चलें मनमोहन . . . 3

कांग्रेस के लिए टर्निंग प्वाईंट होगा अगला आम चुनाव

अर्थशास्त्री नहीं राजनैतिक व्यक्ति चाहिए पीएम पद के लिए

योजना आयोग को कोसने वाले मंत्रियों ने खोला अपना मोर्चा

टीम अण्णा के वन टू वन हमले से कांग्रेसी बैचेन

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस के लिए वर्ष 2014 में होने वाले आम चुनाव टर्निंग प्वाईंट से कम नहीं होंगे। इन चुनावों के परिणाम से साफ हो जाएगा कि कांगेस का भविष्य क्या होने वाला है। कांग्रेस में अब यह बात उभरकर सामने आने लगी है कि देश को अर्थशास्त्री नहीं राजनैतिक समझ बूझ वाला प्रधानमंत्री चाहिए है। उधर योजना आयोग से खफा मंत्रियों ने भी अपनी तलवार पजानी आरंभ कर दी है।

कांग्रेस के अंदरखाने में चल रही चर्चाओं में कांग्रेसी भविष्य को लेकर भयाक्रांत नजर आ रहे हैं। टीम अण्णा के सीधे कांग्रेस के उपर वन टू वन हमले से आला नेताओं की बैचेनी बढ़ती ही जा रही है। हिसार में टीम अण्णा के कांग्रेस विरोधी रवैए से कांग्रेस अब मनमोहन को हटाने के लिए आतुर नजर आने लगी है। हिसार के चुनाव परिणाम अगर कांग्रेस के खिलाफ आते हैं तो इसके उपरांत मनमोहन की बिदाई के लिए दबाव चरम पर आ जाएगा।

दस जनपथ के सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी को एक सूची सौंपी गई है जिसमें योजना आयोग और पीएमओ से नाराज मंत्रियों का जिकर किया गया है। विपक्ष के सरकार को कमजोर करने के मनमोहन सिंह के आरोप पर नेताओं ने साफ तौर पर कह दिया कि मनमोहन यह साफ करें कि उनका आशय कांग्रेस के अंदर के विरोधियों से है या बाहर के।

सूत्रों ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय और योजना आयोग का कांग्रेस संगठन से सामंजस्य नहीं बन पा रहा है। कांग्रेस के अंदर उबाल मचा हुआ है कि सरकार पर जो संकट के बादल मण्डरा रहे हैं उनमें से अधिकांश अर्थशास्त्र से संबंधित नहीं वरन् राजनैतिक हैं। वहीं अख्खड़ मंत्रियों द्वारा कांग्रेस के सांसदों को तवज्जो न दिया जाने का मामला भी गर्मा रहा है। इसके साथ ही साथ सूबों के वे क्षत्रप जो सरकार में सत्ता की मलाई चख रहे हैं वे भी अपने अपने सूबे के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को बुरी तरह उपेक्षित ही रखे हुए हैं।

जग रहा है शिवराज का दिल्ली मोह!


जग रहा है शिवराज का दिल्ली मोह!

शिवराज का दिल्ली दौरा या तो राजनैतिक या पारिवारिक!

हर यात्रा में घिसी पिटी मांग ही दोहरा रहे हैं शिवराज

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इन दिनों देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। आए दिन उनकी दिल्ली यात्राओं से भाजपा के अंदरखाने में हलचल मचने लगी है। एल.के.आड़वाणी के पीएम इन वेटिंग पद से हटने के बाद अब पार्टी आम चुनावों में किस चेहरे को आगे करती है इस बात के लिए लाबिंग तेज हा गई है। राजग का पीएम इन वेटिंग भाजपा की पसंद से ही चुना जाएगा यह तय है। भाजपा की ओर से इसके लिए नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह के नाम आगे लाने पर विचार किया जा रहा है।

पिछले कुछ माहों में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दिल्ली यात्राएं बहुतायत में हुई हैं। उनकी हर यात्रा पर अगर गौर किया जाए तो हर बार वे किसी न किसी केंद्रीय मंत्री से मिलकर अपनी घिसी पिटी मांग को ही दोहरा रहे हैं। सियासी गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार शिवराज सिंह चौहान अपनी सरकारी दिल्ली यात्रा की आड़ में अनेक मोर्चों पर अपने हित साध रहे हैं। उनकी तुलना में भाजपा शासित राज्यों के अन्य मुख्यमंत्री न के बराबर ही दिल्ली के दर्शन कर रहे हैं।

देखा जाए तो शिवराज सिंह चौहान की मांगों पर कांग्रेसनीत केंद्र सरकार द्वारा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। शिवराज सिंह की यात्राओं पर मध्य प्रदेश का सूचना केंद्र भी मौन ही साधे रहता है। वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और स्थानीय शासन मंत्री बाबू लाल गौर एक ही झटके में केंद्र से एक हजार करोड़ से ज्यादा की रकम झटक कर ले जाने में सफल हो जाते हैं। एमपी इंफरमेशन सेंटर से छन छन कर बाहर आ रही खबरों के अनुसार शिवराज के दौरों में कोई उपलब्धि ही हासिल नहीं है तो प्रचार प्रसार आखिर किस बात का किया जाए, रही बात मांगों की तो अनेकों बार एक ही जैसी मांगों पर तो खबर जारी नहीं ही की जा सकती है।

गौरतलब है कि सालों साल विदिशा से सांसद रहे शिवराज सिंह चौहान ने अपने सरल स्वभाव के चलते नेशनल लेबल पर अपनी एक अलग साफ्ट छवि का निर्माण किया है। उनके दिल्ली दौरों से यह मतलब भी निकाला जा रहा है कि मध्य प्रदेश के अगले चुनाव शायद ही उनकी अगुआई में लड़े जाएं। शिवराज विरोधी भी इसके लिए सक्रिय नजर आ रहे हैं। भाजपा के सूत्रों का कहना है कि शिवराज सिंह चौहान के बजाए संगठन को ही सूबे की कमान दी जाकर एमपी में भी गुजरात जैसा प्रयोग दुहराया जा सकता है।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

जगजीत सिंह: एक युग का अवसान


जगजीत सिंह: एक युग का अवसान

(लिमटी खरे)

गीत गज़ल की दुनिया के सम्राट जगजीत सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं। जगजीत सिंह ने निश्चित तौर पर गज़ल को नए आयाम दिए हैं। उनका रूझान कभी भी व्यवसियक नहीं रहा। निर्धनता में बचपन बिताने वाले जगजीत सिंह को आकूत दौलत और शोहरत तो मिली पर अहंकार उन्हें छू भी नहीं सका। यूं तो वे पगड़ी पहनते और दाढ़ी रखते थे, किन्तु एक एलबम के कव्हर फोटो के लिए उन्होंने दोनों ही चीजों की तिलांजली दे दी थी। उनका विवाह चित्रा दत्ता से महज तीस रूपए खर्च में संपन्न हुआ तब लोगों को उनकी सादगी का भान हुआ। संगीत जगजीत सिंह की आत्मा थी। उनके इकलौते पुत्र के निधन से वे व्यथित हो गए और आध्यात्म की ओर अग्रसर हो गए। पदमभूषण से सम्मानित जगजीत सिंह को सच्ची श्रृद्धांजली यही होगी कि आज के तड़क भड़क और आडम्बर से परिपूर्ण संगीत युग में सादगी को बरकरार रखा जाए


क्या याद उसे कहते हैं जो अकेले में आए! जी नहीं याद उसे कहते हैं जो महफिल में आए और तन्हा कर जाए!! अनेक फनकार होंगे जो अकेलापन दूर करने में सहायक होते होंगे। अकेले में जिनके गीत सुनने में सुकून मिलता होगा। जगजीत सिंह एक एसी शख्सियत थी जिसके गीत महफिल में भीड़ से खींचकर आपको अकेला कर देते हैं। जगजीत की गजलें हमें वास्तविकता से रूबरू किया करतीं हैं।

जगजीत सिंह के गीतों को सुनकर हर कोई डूब ही जाता था। अगर आप बस में सफर कर रहे हैं और उनकी गजलें बज रहीं हों तो निश्चित तौर पर आप साठ सत्तर यात्रियों से अपने आप को एकाएक अलग कर यादों में खो जाते हैं। उनकी गजलों में एक अजीब सा खिंचाव और जादू था, जो लोगों को बरबस ही अतीत के अच्छे बुरे अनछुए पहलुओं को कुरेदने पर मजबूर कर दिया करती थी।

सत्तर के दशक में जगजीत सिंह की एक गजल बेहद मशहूर हुई जिसका मुखड़ा था, बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। जगजीत की इस गजल वाकई आज के समय में भी प्रासंगिक मानी जा सकती है। सत्तर के दशक के उपरांत तकनीक बदली, आवाजें बदलीं, लोग बदले, तौर तरीका बदला, पश्चिमी सभ्यता और संगीत हावी हुआ पर जगजीत जहां थे वहीं रहे, और उनकी आवाज दूर तलक सालों साल उसी शिद्दत से गूंजती रही।

जगजीत सिंह के पिता मूलतः पंजाब के दल्ला गांव के निवासी थे। वे लोक निर्माण विभाग में काम करते थे। उनकी मां का नाम बचन कौर था। जगजीत का जन्म 8 फरवरी को राजस्थान के श्रीगंगा नगर में हुआ। इसके बाद उनका परिवार बीकानेर चला गया। बाद में वे फिर गंगानगर ही वापस आ गए। शालेय शिक्षा के उपरांत स्नातक करने वे जलांधर पहुंच गए। जगजीत सिंह के पिता अमर सिंह ने उनका नाम जगमोहन रखा।

जगजीत सिंह के गुरू के निर्देश पर उन्होंने अपना नाम जगमोहन से जगजीत कर लिया। वे अपने नाम के अनुसरण करते रहे और अपनी आवाज के दम पर उन्होंने जग को जीत ही लिया। उनका बचपन बहुत ही आभाव में बीता। यहां तक कि उन्हें सायकल तक के लिए संघर्ष करना पड़ा। उस जमाने में पतंग भी उनके लिए विलासिता की चीज ही हुआ करती थी।

जालंधर में उन्होंने आकाशवाणी में काम करने का प्रयास किया। आकाशवाणी जालंधर ने जगजीत सिंह को बी वर्ग के कलाकार के तौर पर मान्यता दे दी। इसके बाद रूपहले पर्दे की दुनिया के गढ़ मुंबई ने उन्हें आकर्षित किया। वे 1961 में मुंबई कूच कर गए। वहां सघर्ष किया किन्तु सफलता उनसे कोसों दूर ही रही। जब पैसे खत्म हो गए तो वहां से एक रेलगाड़ी के शौचालय में बिना टिकिट छिपकर वे वापस जालंधर लौटे।

जालंधर में 1962 में तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के जालंधर आगमन पर उन्हें एक स्वागत गीत तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसका उन्होंने बखूबी निर्वहन किया। तीन साल तक जालंधर में ही काम करने के उपरांत वे एक बार फिर दृढ निश्चय के साथ मुंबई लौटे। वहां इस बार उन्होंने किफायत से रहना आरंभ किया। सस्ती बदबूदार सीलन भरी जगह पर रहने के कारण वे अक्सर बीमार रहने लगे। उनकी रिहाईश में अनगिनत खटमल और मच्छर थे। एक रात तो उनके पैर को चूहा ही कुतर गया।

दुबारा मुंबई आए जगजीत सिंह को संघर्ष का लंबा अंतराल झेलना पड़ा। वे इस दरम्यान पार्टियों, घरेलू सामाजिक धार्मिक आयोजनों, महफिलों में गाया करते थे। अचानक ही एक दिन मशहूर एचएमवी कंपनी ने अपने एक रिकार्ड के लिए उनसे दो गजलें गवावाईं। इसके लिए उनका फोटो सेशन किया गया। फोटो सेशन हेतु उन्हें अपनी पगड़ी और दाढ़ी की तिलांजली देना पड़ा।

एक मर्तबा रिकार्डिंग के दौरान ही वे चित्रा दत्ता से मिले और नयन मटक्का हो गया। फिर क्या था, 1970 में बिना किसी रिसेप्शन, आयोजन, बारात, धूम धड़ाके, फटाके के दोनों परिणय सूत्र में आबद्ध हो गए। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जगजीत सिंह की शादी का कुल खर्च आया था महज तीस रूपए। विवाह के दौरान भी जगजीत सिंह की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी।

विवाह के उपरांत जगजीत सिंह एक कमरे के घर में रहने लगे। विवाह के एक साल के बाद उनके घर में खुशियां आईं। वे विवेक के पिता बने। गरीबी का आलम यह था कि तीन हफ्ते के दुधमुंहे विवेक को छोड़कर चित्रा को माईक थामना पड़ा। गरीबी उनका मजाक उड़ाती रही और अपने दोस्तों के बीच जगजीत अपने आप को दुनिया का सबसे अमीर ही निरूपित करते रहे।

विवेक के जन्म के चार साल बाद 1975 में उनकी किस्मत ने यू टर्न लिया और जगजीत सिंह ने कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ना आरंभ किया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 75 का साल दो बातों के लिए याद रखा जाता है। पहली तो सुपर डुबर हिट फिल्म शोले के लिए और दूसरा एचएमवी के द अनफॉरगाटेबल्स के लिए। यह जगजीत सिंह का कलेक्शन था। इसकी कामयाबी ने सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए। इसके बाद जगजीत सिंह ने मुंबई में एक मकान खरीदा। इसके बाद जगजीत की यात्रा चल पड़ी।

जगजीत सिंह ने कमर्शियल फिल्म की ओर कभी रूख नहीं किया। उन्होंने अनेक फिल्मों में स्वर और संगीत दिया। 22 जुलाई 1990 में विवेक की सड़क दुर्घटना में हुई मौत ने जगजीत को झझकोर कर रख दिया। इसके बाद वे आध्यात्म और दर्शन की ओर बढ़ गए। उन्हें 2003 में पदमभूषण सम्मान से नवाजा गया। संगीत के इस चितेरे को शत शत नमन।

चिदम्बरम और गहलोत पर युवराज की नजरें हुईं तिरछी


चिदम्बरम और गहलोत पर युवराज की नजरें हुईं तिरछी

गोपालगढ़ नहीं पहुंचे चिदम्बरम

बिना सूचना गोपालगढ़ पहुंचे राहुल

गहलोत पर संकट के बादल मंडराए

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। राजस्थान में सांप्रदायिक दंगा प्रभावित गोपालगढ़ इन दिनों सुर्खियों में है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी राज्य सरकार और राजस्थान कांग्रेस संगठन को सूचना दिए बिना ही गोपालगढ़ पहुंचे और प्रभावितों से चर्चा की। वहीं दूसरी ओर केंद्रीय गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम ने गोपालगढ़ जाने की जहमत भी नहीं उठाई जो चर्चा का विषय बना हुआ है।

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने पिथेली, परसोली, मालिगा और गोपालगढ़ गांव का भ्रमण किया। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के साथ वे मोटर सायकल पर ही गांव गांव घूमे। उन्होंने पुलिस फायरिंग में मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों से मुलाकात भी की। राहुल के दौरे से राजस्थान की सियासत गर्मा गई है। राहुल गांधी ने प्रदेश सरकार को बताए बिना ही पार्टी के राज्य के नेताओं को भी प्रथक रखकर किए इस दौरे के निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। अनेक विधायकों ने भी इस मामले में सरकार के रूख की शिकायत राहुल गांधी से की थी।

एआईसीसी में चल रही चर्चाओं के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्री को पता नहीं गहलोत से क्या एजर्ली है कि वे न तो जयपुर जाना चाह रहे हैं और न ही गोपालगढ़ जाने की जहमत ही उठा रहे हैं। चिदम्बरम विरोधियों का कहना है कि अगर यही मामला गुजरात में हुआ होता तो चिदम्बरम तो क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद चलकर वहां जाते और घायलों से मिलते। कांग्रेस के रणनीतिकार इस मामले में नरेंद्र मोदी की बली लेने में कोई कसर नहीं रख छोड़ते।

कांग्रेस के अंदर सिद्धांतवादी गुट का मानना है कि एक बात के दो मानक नहीं हो सकते हैं। कांग्रेस के नेता सांप्रदायिकता से लड़ने के दो मानकों को अपना रहे हैं जो ठीक नहीं है। एक तो तथा कथित धर्मनिरपेक्षता के लिए और वहीं दूसरा और कहीं अधिक कड़े और अनुचित कथित सांप्रदायिक पार्टियों के लिए।

माना जा रहा है कि राहुल गांधी का गोपालगढ़ दौरा जल्द ही कांग्रेस की दशा और दिशा में सुधार करने का काम करेगा। राहुल गांधी इस मामले में अपनी मां कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी को दृश्य बताते हैं सब कुछ उसी पर निर्भर करता है। अगर राहुल ने कड़े तेवर अपनाए तो चिदम्बरम या गहलोत में से एक को जाना ही होगा।

मनमोहन निरूत्साहित तो राहुल अभी नहीं हैं तैयार


मनमोहन निरूत्साहित तो राहुल अभी नहीं हैं तैयार

प्रणव को पीएम नहीं बनाना चाहतीं सोनिया

सोनिया की पसंद हैं अंटोनी

दिग्विजय सिंह की खुल सकती है लाटरी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की दूसरी पारी में जिस कदर घपले घोटाले और भ्रष्टाचार सामने आया है उससे कांग्रेस की बुरी तरह भद्द पिटी है। कांग्रेस के रणनीतिकार इस समय इस जुगत में लगे हैं कि किसी तरह 2014 के आम चुनावों के पहले कांग्रेस की काली छवि को धवल साफ कर दिया जाए। इसके लिए वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह की बिदाई ही इकलौता विकल्प उभरकर सामने आ रहा है।

कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि बीमारी से उठीं कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी इन हालातों को लेकर काफी उहापोह में हैं। उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह सामने आ रही है कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह निरूत्साहित हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी अभी राजकाज संभालने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। अपने पुत्र को सियासी खुरपेंच सिखाने के लिए उन्हें महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ही मुफीद लगे। राजा दिग्विजय सिंह भले ही द्रोणाचार्य की भूमिका में हों पर अर्जुन की भूमिका में राहुल अभी पूरी तरह पारंगत नहीं हो पाए हैं।

अगर मनमोहन सिंह को पीएम पद से हटाया जाता है तो उनके बाद नंबर आता है प्रणव मुखर्जी का। किन्तु प्रणव के नाम के लिए सोनिया गांधी किसी भी दृष्टिकोण से अपनी सहमति नहीं देना चाहतीं। सूत्रों ने बताया कि सोनिया को यह बता दिया गया है कि प्रणव मुखर्जी ही वह शक्सियत थी जिसने राजीव गांधी के खिलाफ परोक्ष तौर पर उनके प्रधानमंत्री रहते मोर्चा खोला था।

सूत्रों की मानें तो वजीरे आजम पद के लिए सोनिया की पहली पसंद के तौर पर ए.के.अंटोनी का नाम ही उभरकर सामने आता है। सोनिया की नजरों में भ्रष्टाचार मुक्त अगर कोई राजनेता है तो वह अंटोनी ही है। अंटोनी की राह में अनेक नेता फच्चर फंसाने को तैयार बैठे हैं। अगर अंटोनी का नाम सामने आया तो इसके लिए भी उनके विरोधियों ने झूटी सच्ची कहानियां गढ़ी हुई हैं।

कांग्रेस को अगर आम चुनाव में वेतरणी पार करने के लिए मनमोहन सिंह को हटाना पड़ता है तो निश्चित तौर पर इस पद के लिए सबसे योग्य और प्रबल दावेदार मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह ही होंगे। दिग्गी राजा के मीडिया से संबंध जग जाहिर हैं। मीडिया मैनेजमेंट में उनका कोई सानी नहीं है। सबसे अहम बात तो यह है कि दिग्गी राजा खुद बहुत ही सधे कदमों से 7 रेसकोर्स रोड़ अर्थात प्रधानमंत्री आवास को अपना आशियाना बनाने का सपना मन में संजोए बैठे हैं।

झा के हाथ होगा भाजपा का प्रभात


झा के हाथ होगा भाजपा का प्रभात

विधानसभा चुनावों में अपने को साबित करना होगा प्रभात झा को

दिल्ली का मीडिया मैनेजमेंट सरकारी हाथों में

सूबे में दम तोड़ रहा संगठन

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में कांग्रेस कमेटी के गठन के उपरांत अब भाजपा और कांग्रेस में संगठनात्मक दृष्टि से एक दूसरे को तौलना आरंभ हो गया है। एक तरफ भाजपा की कमान प्रभात झा के तो कांग्रेस की परोक्ष तौर पर दिग्विजय सिंह के हाथ में है। 2008 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने आप को साबित कर चुके हैं अब परीक्षा की घड़ी संगठन के मुखिया प्रभात झा की है। अध्यक्ष बनने के उपरांत प्रभात झा समूचे मध्य प्रदेश को भी नहीं नाप पाए हैं।

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के बहुप्रतिक्षित पुर्नगठन के उपरांत टीम भूरिया में दिग्विजय सिंह की परछाईं साफ दिखाई पड़ रही है। दिग्विजय सिंह अब सूबाई राजनीति से उपर उठ चुके हैं। राष्ट्रीय परिदृश्य में वे अपने आप को स्थापित कर चुके हैं। नेशनल मीडिया पर उनकी पकड़ का कोई सानी नहीं है। चर्चाओं में रहने के कारण वे समूचे देश में पहचाने जाने लगे हैं।

2008 में विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान के चेहरे को ही आगे कर लड़ा गया था। उस वक्त उमा भारती का फेक्टर भी जमकर सामने आया था। उमा भारती खेमे द्वारा उछाले गए डम्पर कांड की काली छाया भी उनके उपर पड़ रही थी। बावजूद इसके शिव के तीर ने कांग्रेस को बांधे ही रखा। कहा जा रहा है कि उस वक्त संगठन भी शिवराज सिंह की छाया ही था।

वर्तमान में संगठन की कमान बिहार मूल के प्रभात झा के हाथों में है। प्रभात झा को अभी संगठनात्मक क्षमता का परिचय देना बाकी है। सियासी हल्कों में यह चर्चा भी चल पड़ी है कि मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग के दिल्ली स्थित सूचना केंद्र का उपयोग सरकार की जनकल्याणकारी नीतियों के प्रचार प्रसार के बजाए संगठन के कार्यक्रमों के प्रचार प्रसार के लिए ज्यादा किया जा रहा है। इसके साथ ही साथ यह भी कहा जा रहा है कि पीएम इन वेटिंग से खुद को हटा चुके लाल कृष्ण आड़वाणी की हवाई रथ यात्रा को संगठन की मांग पर अब भाजपा की कमजोर सीटों की ओर मोड़ा जा रहा है ताकि इसका लाभ भाजपा को आने वाले चुनावों में मिल सके।

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

delhi diary


सोनिया की 18 लाख रूपए रोज की सदगी!


सोनिया की 18 लाख रूपए रोज की सदगी!

सोनिया की बीमारी रहस्यमय, खर्च भी अनाप शनाप!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी अमेरिका से सर्जरी कराकर वापस आ चुकी हैं। उनकी बीमारी के मामले में कांग्रेस और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार मौन है। जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रम्हाण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी पर अमेरिका में हुई सर्जरी में हुए खर्च पर सवाल उठाया है। बताया जाता है कि सर्जरी के बाद टीम सोनिया जिस अपार्टमेंट में रूकी थी उसका किराया अठ्ठारह लाख रूपए रोजना था।

वैसे तो सोनिया गांधी की बीमारी उनका निजी मामला है, किन्तु व्हीव्हीआईपी पर्सन्स के हर कदम को जानने के लिए रियाया उत्सुक रहती है। सोनिया की बीमारी पर कांग्रेस की चुप्पी ने लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है। कांग्रेस मुख्यालय के अंदरखाने से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो इस साल जून में वे अपनी बीमार मां का हाल जानने नहीं अपना ही इलाज करवाने विदेश गईं थीं।

कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (सोनिया का सरकारी आवास) के सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी का आपरेशन न्यूयार्क स्थित मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर में हुआ है। उनका आपरेशन साधारण नहीं था और उनकी सर्जरी लगभग सात घंटे से अधिक समय तक चली। अपुष्ट समाचारों के अनुसार सोनिया को पेंक्रियाज में कैंसर था। इस तरह का कैंसर असामान्य ही माना जाता है क्योंकि यह लाखों लोगों में एक को होता है।

बहरहाल, सूत्रों के अनुसार आपरेशन के बाद सोनिया गांधी अपने लाव लश्कर के साथ वे न्यूयार्क के प्लस मैनहट्टन अपार्टमेंट में दो मंजिला आवास में रूकी थीं। सूत्रों ने यह भी बताया कि सोनिया गांधी के द्वारा किराए पर लिए इस आवास का किराया 40 हजार अमरीकि डालर अर्थात लगभग 18 लाख रूपए प्रतिदिन था।

गौरतलब है कि अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जबकि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी द्वारा कांग्रेसियों को सादगी बरतने की नसीहत दी गई थी। सोनिया गांधी ने इसे अपनाते हुए दिल्ली से मुंबई तक की हवाई यात्रा इकानामी क्लास में बीस सीट खाली कराकर (सुरक्षा का हवाला देकर) और राहुल गांधी ने दिल्ली से चंडीगढ़ तक शताब्दी रेल में एक पूरी की पूरी बोगी बुक कराकर (सुरक्षा कारणों के चलते) सादगी का अद्भुत परिचय दिया था।

कहा जा रहा है कि सोनिया के इस लंबे चौड़े खर्च का भोगमान सोनिया के पीहर की ही एक फर्म ने भोगा है। अब देखना महज इतना है कि इस मसले पर विपक्ष क्या रूख अपनाता है? विपक्ष को यह एक बेहतरीन मुद्दा मिला है जिस पर वह कांग्रेस और सरकार को बुरी तरह घेर सकती है।

बजट सत्र तक शायद ही चल पाएं मनमोहन


बजट सत्र तक शायद ही चल पाएं मनमोहन

राहुल को पीएम बनाने का दबाव बढ़ा

राहुल पीएम बनाने के मुद्दे पर बटी कांग्रेस

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों लाख टके का सवाल पूछा जा रहा है कि क्या डॉ.मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री बजट सत्र में संसद जा पाएंगे? कांग्रेस के अंदर ही अंदर मनमोहन की बिदाई के लिए मार्ग प्रशस्त किए जा रहे हैं। कांग्रेसियों का मानना है कि अगर मनमोहन के नेतृत्व में आम चुनावों में जनता के बीच जाया जाएगा तो घपले, घोटाले, भ्रष्टाचार के जिन्न कांग्रेस को ले डूबेंगे।

कांग्रेस के एक धड़े का मानना है कि राहुल गांधी को तत्काल ही प्रधानमंत्री पद संभालकर भ्रष्ट मंत्रियों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए, वरना अगर देर हो गई तो फिर देश में कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचेगा। राहुल गांधी की पैरवी करने वाले कांग्रेसी नेता अब उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे सूबों में कांग्रेस की स्थिति का हवाला दे रहे हैं जहां कांग्रेस बुरी तरह उखड़ चुकी है।

वहीं दूसरी ओर कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि अगर राहुल गांधी अभी वजीरे आजम बनते हैं और आने वाले समय में भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग पाता है तो फिर वे फेल्युअर पीएम साबित होंगे। इतना ही नहीं अगर 2014 में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलता है तो नेहरू गांधी परिवार (महात्मा गांधी परिवार नहीं) की विश्वसनीयता को रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता है। गांधी परिवार के नेतृत्व संभालने के उपरांत अगर पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो पार्टी के विघटन के मार्ग प्रशस्त हो सकते हैं।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की छवि एक ईमानदार व्यक्ति की है। उनके प्रधानमंत्री रहते हुए जिस तरह से मंत्रियों ने देश को लूटा है उसे देखकर अब उन्हें ईमानदार व्यक्ति के बजाए भ्रष्टाचार का ईमानदार संरक्षकसमझा जाने लगा है। वैसे भी मनमोहन सिंह मीडिया के सामने अपने आप को मजबूर और कमजोर साबित कर चुके हैं। इतना ही नहीं उनके मंत्री भी आपस में जिस तरह लड़ भिड़ रहे हैं उससे उनकी और कांग्रेस की छवि प्रभावित हुए बिना नहीं है।

मीडिया के चहेते बने रमेश


मीडिया के चहेते बने रमेश

अपने विभाग के साथ पत्रकारों की टोली को भी किया स्थानांतरित

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में सधे कदमों से तरक्की की इबारत लिखने वाले ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश मीडिया के एक वर्ग विशेष में काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। मीडिया उन्हें हाथों हाथ लिए हुए है। वन एवं पर्यावरण मंत्री रहते हुए उनके डंडे का बोलबाला रहा है मीडिया में। पर्यावरण की दुहाई देकर वे मीडिया में छाए रहे।

जैसे ही उनको वन एवं पर्यावरण से हटाकर ग्रामीण विकास मंत्रालय में भेजा गया उन्होंने अपने चहेते पत्रकारों की बीट ही बदलवा दी। जो मीडिया पर्सन्स उन्हें वन मंत्री के तौर पर घेरे रहते थे उनके ठहाके आज ग्रामीण विकास मंत्रालय में गुंजायमान हो रहे हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन की परेशानी यह है कि उन्हें कव्हरेज के लिए पत्रकारों का टोटा पड़ रहा है। जयंती इस जुगत में हैं कि किसी तरह वे भी पत्रकारों की कृपा पा सकें।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में इन दिनों एक बात गूंज रही है कि जब कोई संपादक अपने संस्थान में परिवर्तन कर नई जगह जाता है तो वह अपने प्रति निष्ठा रखने वाले पत्रकारों को साथ ले जाता है। यहां न तो जयराम रमेश संपादक हैं और न ही उन्होंने मीडिया का संस्थान ही बदला है। फिर आखिर कौन सी वजह है कि उनके इर्द गिर्द घूमने वाले पत्रकार अब वन मंत्रालय के बजाए ग्रामीण विकास मंत्रालय की सीढ़ियां चढ़ उतर रहे हैं?

यूपीए के ब्रांड एम्बेसेडर होंगे सलमान


यूपीए के ब्रांड एम्बेसेडर होंगे सलमान

आमिर के नखरों से परेशान हैं अंबिका

राहुल ने बिताई थी सलमान संग रात

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। रूपहले पर्दे पर आदाकारी के लिए चर्चित और आपसी संबंधों आदि में विवादित तीन खानों में सलमान खान की टीआरपी (टेलीवीजन रेटिंग प्वाईंट) एक बार फिर टॉप पर है। वे जल्द ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के ब्रांड एम्बेसेडर बनाए जा सकते हैं। पर्यटन मंत्रालय भी उन्हें एंगेज करने जा रहा है। आमिर खान की पैसों की चाहत ने उन्हें सरकार से दूर कर दिया है।

गौरतलब है कि पर्यटन मंत्रालय वर्तमान में अतुल्य भारत के लिए आमिर खान से अनुबंध पर चल रहा है। सूचना प्रसारण मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि विभागीय मंत्री अंबिका सोनी अब आमिर खान से बुरी तरह खफा हो चुकी हैं। सूत्रों ने बताया कि पिछले साल आमिर खान को गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का मुख्य अतिथि बनाया जाना प्रस्तावित था। आमिर ने इसकी सशर्त सहमति दे दी थी। आमिर की शर्त थी कि इसके एवज में सरकार उन्हें पचास लाख रूपए नकद और एक मर्सरीज़ बैंज कार दे।

भारत गणराज्य की गरीब सरकार ने आमिर के इन नखरों को पूरा करने में असमर्थता जाहिर कर दी। बाद में इस प्रोग्राम के लिए बिग बी यानी अमिताभ बच्चन की बहू एश्वर्या राय बच्चन को बमुश्किल तैयार करना पड़ा। आमिर की इस हरकत से कांग्रेस नीत केंद्र सरकार का आमिर खान से मोहभंग हो गया। किंग खान यानी शाहरूख खान पहले से ही कांग्रेस से दूर हैं।

उधर मुंबई में हुए क्रिकेट के फायनल मैच के उपरांत रात में सलमान के घर हुए जश्न में राहुल गांधी अपने मित्रों के साथ पहुंचे और पार्टी का लुत्फ उठाया। यहीं से सलमान की कांग्रेस से पींगे बढ़ना आरंभ हुई। पर्यटन मंत्रालय अब आमिर के बजाए सलमान को अतुल्य भारत के लिए अनुबंधित करना चाह रहा है।

इतना ही नहीं कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से करीबी के चलते अब सलमान के दोनों हाथों में लड्डू साफ दिखाई पड़ रहे हैं। कांग्रेस नीत केंद्र सरकार भी उन पर मेहरबान होने वाली है। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि जल्द ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के विज्ञापनों में सलमान खान का सलोना चेहरा नजर आएगा। इससे सरकार की नीतियों के प्रचार प्रसार के साथ ही साथ अल्प संख्यक वर्ग को भी कांग्रेस के साथ जोड़ने का काम हो सकेगा।