बुधवार, 8 जून 2011

फायर ब्रांड उमा की खामोश वापसी!

फायर ब्रांड उमा की खामोश वापसी!

(लिमटी खरे)

उमा भारती एक फायर ब्रांड साध्वी और नेत्री हैं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। उमा जनाधार वाली नेत्री हैं, यह भ्रम भाजपा को रहा है, भाजपा के आला नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि उमा भारती अपने बल बूते पर अपने ही गृह प्रदेश में भारतीय जनशक्ति पार्टी का न केवल खाता नहीं खोल पाईं वरन् खुद भी चुनाव में पराजय का मुंह देख चुकी हैं। उमा का गुस्सा उनके लिए सबसे बड़ी नाकारात्मक बात है। जब उन्हें गुस्सा आता है तब वे यह नहीं देखतीं कि वे किसके बारे में क्या प्रलाप कर रही हैं। उमा भारती को उत्तर प्रदेश चुनावी वैतरणी पार करने के लिए भाजपा में लाया गया प्रचारित किया जा रहा है, जबकि लगने लगा है कि भाजपा के निजाम नितिन गड़करी द्वारा अपने विरोधियों के शमन हेतु उमा का उपयोग किया जाएगा। दिल्ली में बैठे भाजपा मानसिकता वाले मध्य प्रदेश के आला अफसरान भी अब उमा की घर वापसी से दहशत में आ गए हैं। उमा भारती एक जानदार व्यक्तित्व की स्वामी हैं, किन्तु उनकी घर वापसी जिस तरह गुपचुप और नीरस तरह से हुई उससे हर किसी को आश्चर्य ही हुआ है।

2003 में देश के हृदय प्रदेश में भाजपा ने उमा भारती के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और आशातीत सफलता पाई। प्रदेश में जिस थंपिंग मेजारिटी से भाजपा ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई उसे देखकर लगने लगा था मानो उमा भारती बहुत ज्यादा जनाधार वाली नेता बनकर उभरी हैं। विवाद उमा का पीछा नहीं छोड़ते हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उमा के खिलाफ 1994 में हुबली दंगा के मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ और उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा। इसके उपरांत नवंबर 2004 में एक लाईव पत्रकार वार्ता में उमा भारती ने अपने आरध्य एल.के.आड़वाणी की उपस्थिति में उन्हें ही कोस दिया। इतना ही नहीं उमा ने राज्य सभा के रास्ते फुरसत में राजनीति करने वाले कुछ फितरती नेताओं का नाम लिए बिना उन पर जमकर प्रहार किया कि वे मीडिया को ‘आॅफ द रिकार्ड‘ ब्रीफ कर उनके और भाजपा के अन्य नेताओं के कपड़े उतारते हैं। उमा को अनुशासनहीनता का नोटिस मिला और फिर उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। उमा ने भारतीय जनशक्ति पार्टी के नाम से अलग संगठन का गठन किया। पिछले चुनावांे में यह संगठन औंधे मुंह गिर गया, यहां तक कि उमा भारती खुद अपने गृह जिले टीकमगढ़ से ही हार गईं। इसके बाद से वे भाजपा में घर वापसी के लिए प्रयासरत थीं। उमा भारती यह बात भली भांति जान चुकी हैं कि पार्टी उनसे नहीं वे पार्टी से हैं। हर हाल में संगठन का कद व्यक्ति विशेष से बड़ा ही रहता है। उमा को भ्रम हो गया था कि संगठन उनके कारण चल रहा है।

उमा भारती भाजपा में वापस आ गईं हैं, उनकी वापसी से पार्टी का क्या फायदा मिलेगा यह बात तो भविष्य के गर्भ में ही है, किन्तु यह बात बिल्कुल साफ है कि उमा के पास अपना अस्तित्व बचाने के लिए भाजपा में वापसी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। उमा भारती वर्तमान में गंगा को बचाने के अभियान पर लगी हुईं हैं। उमा भारती के बारे में राजनैतिक वीथिको में कहा जाता है कि उमा भारती कांच का सामन हैं, जिसकी पेकिंग पर एक तीर के साथ ‘दिस साईड अप‘ लिखा होता है, अर्थात उमा को अगर साथ रखना है तो बहुत ही सावधानी बरतने की आवश्यक्ता है। उमा भारती का सबसे बड़ा शत्रु उनका क्रोध पर काबू न होना है।

नितिन गड़कारी को उमा की घर वापसी का फैसला लेने में पसीना आ गया होगा। गड़करी को बताया गया होगा कि इसके पहले भी उमा घर से ‘रिसाकर‘ (रूठकर) चलीं गईं थी, इसके बाद उन्हें वापस लिया गया था, तब अनेक नेताओं ने इसका विरोध किया था। बाद में जब दुबारा उमा ने भाजपा को पानी पी पी कर कोसा और पार्टी से बिदाई ले ली तब जाकर लगा था कि पहली बार की रूखसती के बाद घर वापसी में नेताओं का विरोध गलत नहीं था।

यह सच है कि उत्तर प्रदेश एक एसा सूबा है जिसने देश को सबसे ज्यादा वजीरे आजम दिए हैं। उत्तर प्रदेश पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही की नजरें गड़ी हुई हैं। 2012 के विधानसभा चुनावों के पूर्व एक किताब दिल्ली की फिजां में तैरी जिसमें यूपी में कांग्रेस की दुर्गत के लिए इंदिरा गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्रों को अपने दामन में समेटने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में कांग्रेस अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत नजर आ रही है, वहीं दूसरी ओर यूपी पर राज करने वाली भाजपा भी तीसीे और चैथी पायदान के लिए प्रयासरत है।

इसके पहले मदन लाल खुराना और कल्याण सिंह के उदहारण हमारे सामने हैं। पार्टी ने जब इन्हें वापस लिया तब इनकी छवि या अनुभवांे का बहुत ज्यादा लाभ पार्टी को नहीं मिल सका है। उमा भारती की अपनी ही पार्टी के आला नेताओं से पटरी नहीं बैठती है। मध्य प्रदेश मूल की होने के बाद भी उमा भारती की अपने ही सूबे के नेताओं से अनबन ही रहा करती है। उमा से खौफजदा उनके अधिकांश समर्थकों ने उनका दामन छोड़ दिया था। अब उमा भाजपा में हैं इन परिस्थितियों में उमा के निशाने पर उनके निष्ठा बदलने वाले सिक्के हों तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उमा और आला नेताओं के बीच खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि उसे पाटने में ही ज्यादा समय बीत जाएगा।

एक समय था जब उमा भारती के नाम से हजारों की भीड़ जमा हो जाया करती थी। गांव गांव में उनके चोले को देखकर लोग बरबस ही उनके आगे साष्टांग हो जाया करते थे। साध्वी ऋतंभरा और उमा भारती को सुनने दूर दूर से श्रृद्धालु जुटते थे। ऋतंभरा ने तो आध्यात्म की राह नहीं छोड़ी पर उमा भारती ने भगवा चोला धारण करने के साथ ही साथ राजनैतिक राह पकड़ ली। उमा भारती शुरूआती दौर में इसमें सफल भी हुईं, किन्तु उनके उग्र स्वभाव के कारण उनके समर्थक कम शत्रु ज्यादा पैदा हो गए। राजनैतिक बिसात पर भी उमा भारती को नीचा दिखाने के लिए उनकी राह में शूल बोए जाते रहे हैं। जानबूझकर एसा वातावरण पैदा किया जाता रहा है कि वे तैश में आएं और अनाप शनाप अर्नगल प्रलाप आरंभ करें।

वैसे अगर दूसरे नजरिए से देखा जाए तो भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी के लिए अरूण जेतली, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चैहान आदि जैसे नेता चुनौति ही हैं। अगला चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाए, इस पर भाजपा के अंदरखाने में गुपचुप बहस आरंभ हो चुकी है। भाजपाई नितिन गड़करी का नेतृत्व पचा नहीं पा रहे हैं। उमा की घर वापसी का फैसला भी जिस गुपचुप तरीके से लिया जाकर एकाएक मीडिया को सुनाया गया, उससे भाजपा के आला नेताओं में रोष और असंतोष है। भाजपा में उमा की घर वापसी के वक्त वहां राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, राज्य सभा के अरूण जेतली, पूर्व अध्यक्ष और यूपी की राजनीति से उठे राजनाथ सिंह मौजूद नहीं थे, जो चर्चाओं का केंद्र बना है।

उमा की घर वापसी से शिवराज सिंह चैहान, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गज नेताओं की नींद उड़ना स्वाभाविक ही है। उमा भारती का कार्यक्षेत्र मध्य प्रदेश रहा है। शिवराज सिंह चैहान द्वारा सालों साल सींची गई विदिशा लोकसभा सीट की फसल एकाएक दिल्ली से अवतरित हुईं सुषमा स्वराज द्वारा काट ली गई। शिवराज के पास चूंकि मुख्यमंत्री पद था, इसलिए वे खून का घूंट पीकर रह गए होंगे। शिवराज चाहते हैं कि उनकी अर्धांग्नी साधना को विदिशा से सांसद बनवाया जाए। उधर सुषमा के लिए कम झंझटों के साथ विदिशा लोकसभा सीट मुफीद लग रही है। उमा के आने के बाद मध्य प्रदेश की भाजपाई राजनीति में हलचल होना स्वाभाविक ही है।

हो सकता है कि भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी द्वारा अपने लिए सरदर्द बनते पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेता जो अपने आप को गड़करी का समकक्ष समझ रहे हों, को निपटाने के लिए गड़करी ने संघ से मिलकर उमा की घर वापसी करवाई हो। भले ही उमा को उत्तर प्रदेश का मिशन दिया गया हो, किन्तु उनकी नजरें मध्य प्रदेश पर ही रहेंगी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। मध्य प्रदेश में उमा की अप्रत्यक्ष दखल से अब शिवराज सिंह चैहान और सुषमा स्वराज दोनों ही को अपना ज्यादा से ज्यादा समय एमपी बेस्ड राजनीति को देना होगा।

शिवराज सिंह चैहान के मुख्यमंत्री बनने के पहले जब मुख्यमंत्री पद के लिए कैलाश विजयवर्गीय का नाम चला था, उस वक्त नेशनल लेबल पर इमेज बिल्डिंग के लिए कैलाश ने मध्य प्रदेश सूचना केंद्र सहित अन्य पदों पर अपनी पसंद के अधिकारियों को बिठाकर फील्डिंग आरंभ कर दी थी। बाद में शिव का राज आने पर उन्हें बदल दिया गया। वर्तमान में दिल्ली में मध्य प्रदेश के अधिकांश अफसरान शिवराज के बजाए प्रभात झा की नौकरी करते नजर आ रहे हैं। उमा भारती की घर वापसी से उन अफसरों की पेशानी पर भी पसीने की बूंदे छलक आईं हैं जो उमा से भयाक्रांत होकर एमपी छोड़ प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली आ गए थे। उमा भारती जैसी कद्दावर नेता जिसके बल बूते पर भाजपा ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस का तिलिस्म 2003 में तोड़ा था, की इस तरह खामोश वापसी से अनेक प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं।

अन्ना का अनशन आरंभ

राजघाट को छावनी बनाने पर बिफरे अन्ना
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। सिविल सोसायटी ने रामलीला मैदान पर हुई रावणलीला के विरोध में महात्मा गांधी की समाधि ‘राजघाट‘ पर अनशन आरंभ कर दिया है। राजघाट पर लगभग गए हजार पुलिस के जवानों की तैनाती अन्ना हजारे को नागवार गुजरी और उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकार सत्याग्रह से डरने के बजाए लोगों को डरा रही है।
 
आज सुबह लाल रंग की गाड़ी में सवार जब अन्ना राजघाट पहुंचे तब वहां भारी तादाद में पुलिस बल मौजूद था। राजघाट को छावनी बना देख अन्ना हजारे के तेवर तीखे हो गए और उन्होंने सरकार पर प्रहार आरंभ कर दिया। अन्ना का कहना है कि वे मरने से नहीं डरते। अन्ना के साथ देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी और स्वामी अग्निवेश भी मौजूद थे। आज सुबह आरंभ हुआ अन्ना का अनशन शाम छः बजे तक चलेगा।
 
अनशन स्थल पर विवादों के साए में आने वाले पिता पुत्र अधिवक्ता शांति भूषण और प्रशांत भूषण भी मौजूद थे। अनशनस्थल पर बने मंच पर अन्ना हजारे अकेले ही बैठे थे। देश भक्ति के गानों पर लोग झूमते नजर आ रहे थे। नजारा देख, गोरे दमनकारी ब्रितानियों को भारत से खदेड़ने छिड़े स्वतंत्रता संग्राम की याद ताजा हो रही थीं। उमर दराज लोगों ने कहा कि जैसा देश भक्ति की फिल्मों में देखा वैसा ही नजारा राजघाट का नजर आ रहा है।

उधर मीडिया ने अब बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के साथ चार और पांच जून को रामलीला मैदान में हुए दमन की खबरों को प्रमुखता देना लगभग कम कर दिया है। बाबा के राईट हेण्ड आचार्य बाल कृष्ण कल एकाएक हरिद्वार में प्रकट हुए और उन्होंने मीडिया से चर्चा के बाद कहा कि वे छिपकर बैठे थे, क्योंकि उनको जान का खतरा बना हुआ था। जब आचार्य बाल कृष्ण से पूछा गया कि बाबा रामदेव ने उन्हें किस मिशन पर लगाया था? के जवाब में आचार्य बाल कृष्ण बगलें झांकते ही नजर आए। अपनी नागरिकता की सफाई भी उन्होंने गोलमोल तरीके से ही दी। उन्होंने कबूल किया कि उनके माता पिता और सगे भाई नेपाल के नागरिक हैं, पर वे भारत के नागरिक हैं।

एमपी ने की बच्चों को शिक्षा देने की पहल

एमपी ने की बच्चों को शिक्षा देने की पहल
नई दिल्ली (ब्यूरो)। मध्यप्रदेश की स्कूल शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस ने कहा है कि प्रदेश में शिक्षा के अधिकार के तहत सभी बच्चों को शिक्षा देने की जोरदार पहल की जा रही है। शिक्षा के अधिकार के तहत जो सकारात्मक पहल की जा रही है उसके अच्छे परिणाम आ रहे हैं। शिक्षा के अधिकार अधिनियम को लागू करने के लिए जो कमियां हैं उन्हें दूर किये जाने की भी आवश्यकता है। शिक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए कुछ मामूली सुधार भी किये जायं। श्रीमती चिटनिस आज यहां मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल की अध्यक्षता में आयोजित देश के शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित कर रहीं थीं। प्रदेश के उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने भी बैठक में भाग लिया।
श्रीमती चिटनिस ने मानव संसाधन विकास मंत्री श्री सिब्बल का ध्यान आकर्षित किया कि स्कूल स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए व्होकेशनल एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाय। स्कूली पाठ्यक्रम में व्होकेशनल एजुकेशन के साथ कृषि संबंधी विषय और स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संबंधित विषयों को शामिल किया जाय।
शिक्षा मंत्री श्रीमती चिटनिस ने मानव संसाधन विकास मंत्री से आग्रह किया कि निजी शिक्षण संस्थाओं की मानिटरिंग किये जाने की आवश्यकता है। निजी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षा की गुणवत्ता को देखते हुए स्कूलों की रेटिंग की जाय और रेटिंग के अनुसार उनकी फीस आदि तय की जाय। अशोका होटल में आयोजित 58वीं केन्द्रीय सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड आफ एजुकेशन की बैठक में देश के सभी राज्यों के स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा मंत्रियों ने भाग लिया।

मंगलवार, 7 जून 2011

दिग्भ्रमित लग रहे बाबा रामदेव

दिग्भ्रमित लग रहे बाबा रामदेव

(लिमटी खरे)

इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव अब कन्फयूज नजर आ रहे हैं। कभी वे दिल्ली जाने की बात से तौबा करते हैं तो कभी एक करोड़ समर्थकों के साथ दिल्ली कूच करने की बात करते हैं। कभी सरकार को कोसते हैं तो कभी माफ कर देते हैं। हालात देखकर लगने लगा है कि भोले भाले बाबा रामदेव को रिमोट की तरह चलाने वाला कथित दिमाग अब बाबा के पीछे से हट गया है, यही कारण है कि बाबा रामदेव अब एक कदम आगे चार कदम पीछे कदम ताल कर रहे हैं, बाबा को यह अवश्य ही लग रहा होगा कि वे आगे बढ़ रहे हैं, किन्तु सच्चाई यह है कि बाबा रामदेव अब पिछड़ते जा रहे हैं। भाजपा बाबा रामदेव का साथ सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के दमन के विरोध में दे रही है, किन्तु बाबा मान रहे हैं कि वे भाजपा के कांधों पर बैठ गए हैं।

समय चक्र किस तेजी से करवट लेता है। 01 जून को केंद्र सरकार के चार वरिष्ठ मंत्री बाबा रामदेव की अगवानी के लिए दिल्ली के एयरपोर्ट पर डेढ़ घंटे इंतजार करते रहे। फिर वहां से वार्ताओं का दौर जारी हुआ जो 04 जून की मध्य रात्रि कर अनवरत चलता रहा। आखिर चार दिन क्या बातें होती रहीं? बाबा रामदेव बस इतना ही चाह रहे थे न कि विदेशों में जमा काला धन वापस भारत ले आया जाए! सरकार हामी भर देती और कथित तौर पर बाद में भरी भी। आखिर सरकार को इस बात की इतनी चिंता क्यों है कि अगर काला धन वापस आता है तो क्या पहाड़ टूटेगा? जाहिर है पहाड़ उन पर टूटने वाला है जिनका काला धन विदेशों में जमा है। सरकार अगर इस पर हिचक रही है तो मतलब साफ है कि सरकारी नुमाईंदों का काला धन विदेशों में जमा है। विपक्ष ने इस मामले में संसद में आवाज नहीं उठाई। मामला अगर सांसदों की वेतन वृद्धि का होता तो मसखरे लालू यादव सहित सारे सांसद जमीन आसमान एक कर देते, किन्तु इस मामले में सभी खामोश हैं। खामोश इसलिए क्योंकि अगर काला धन वापस आया तो यह जीत उनकी नहीं बाबा रामदेव के खाते में जाएगी। बाबा पालीटिकल माईलेज ले जाएगा।
 
देखा जाए तो 6 दिसंबर 1992 और 5 जून 2011 में काफी कुछ समानता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव और विश्व हिन्दू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बीच 4 दिसंबर तक बातचीत का दौर चला। दोनों ही पक्षों द्वारा एक दूसरे को बेवकूफ बनाया जाता रहा। संघ और विहिप जानते थे कि अगर कार सेवकों को खाली हाथ वापस भेज दिया गया तो फिर दोबारा उनमें उत्साह और जोश का संचार करना कठिन होगा, साथ ही चतुर सुजान नरसिंहराव का सोचना था कि अगर कार सेवक वापस गए तो आंदोलन की रीढ़ टूट जाएगी। कमोबेश कुछ इसी तरह का माजरा रामदेव बाबा के प्रकरण में सामने आया है। सरकार इस आंदोलन को तोड़ने के जतन कर रही थी तो बाबा रामदेव के सामने अस्तित्व का संकट था। पिछले साल नवंबर से अब तक बाबा ने देश के कोने कोने की खाक छानी है, अलख जगाई है, अगर बाबा कदम वापस खींचते तो उनकी साख पर बट्टा लगना तय था।
 
बाबा के काले धन के मामले को सिविल सोसायटी ने अन्ना हजारे के नेतृत्व में हाईजेक कर लिया। बाबा का कद अन्ना के सामने बौना नजर आने लगा था। बाबा के अनशन पर बैठने की बात को भी लोग बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे थे। अचानक ही जब चार और पांच जून की दर्मयानी रात को रामलीला मैदान पर ‘रावणलीला‘ हुई तब जाकर लोगों का बाबा रामदेव पर पुनः भरोसा जमा। बाबा रामदेव का कद अब पूर्व की तरह अन्ना हजारे से कई गुना अधिक बढ़ गया है।
 
बाबा रामदेव पर यह हमला कैसे हुआ? इस मामले की तह में जाने पर अनेक आश्चर्यजनक तथ्य निकलकर सामने आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) में ही इस रावणलीला की स्क्रिप्ट लिखी गई थी। बाद में गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम को इसे अमली जामा पहनाने के निर्देश दिए गए। कहते हैं कि चिदम्बरम इससे घबरा गए, और उन्होंने इसकी सूचना वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह को दी। एम.एम.सिंह ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए चिदम्बरम से कार्यवाही न करते हुए बातचीत जारी रखने का मशविरा दिया। बात पुनः सोनिया के दरबार पहुंची। हुकुम उदूली से तमतमाई सोनिया ने चिदम्बरम को फटकारा और कहा कि मनमोहन की बात सुनने की आवश्यक्ता नहीं, तत्काल हुकुम की तामील हो। फिर क्या था देश के गृह मंत्री के आदेश पर देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने मामले की कमान संभाली और बाबा रामदेव और मध्य रात्रि में विश्राम करते उनके समर्थकों पर तबियत से लाठियां भांजी।
 
पूरे घटना क्रम को टीवी चेनल्स और समाचार पत्रों ने प्रमुखता के साथ कव्हर किया। बाबा रामदेव रातों रात फिर हीरो बन गए। बाबा के अंदर प्रचार पाने का कीड़ा एक बार फिर कुलबुलाया। जब टीवी चेनल्स नहीं आए थे तब इस तरह की लोकप्रियता हासिल करने की कवायद को ‘छपास‘ का रोग कहा जाता था। बाबा रामदेव सन्यासी होने का दावा अवश्य ही करते हैं किन्तु सन्यासी जैसे गुण उनमें कम ही देखने को मिल रहे हैं। अमूमन सन्यासियों द्वारा स्वाध्याय और आत्म चिंतन पर जोर दिया जाता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि महात्मा गांधी भी सत्याग्रह के आंदोलनों के मध्य गुजरात के साबरमती और महाराष्ट्र के सेवाग्राम आश्रम में जाकर आत्म चिंतन अवश्य ही किया करते थे। बाबा रामदेव ने एक दिन का भी आत्मचिंतन किया हो एसा प्रतीत नहीं होता है। खुद को महिमा मण्डित करने के लिए बाबा रामदेव ने देश भर में योग शिविर लगाए। योग शिविरों में प्रवेश की कम से कम फीस पांच सौ रूपए हुआ करती थी। इस तरह बाबा रामदेव अमीरों को ही योगा सिखाने का काम करने लगे। बाबा इस बात का जवाब देने में खुद को असफल ही पाते हैं कि कल तक जिस व्यक्ति के पास साईकल का पंचर जुड़वाने के पैसे नहीं थे, वह आज 1100 करोड़ की अकूत दौलत का मालिक कैसे बन बैठा है। बाबा के पतांजली योग पीठ में आम आदमी को प्रवेश नहीं मिल सकता, जबकि गांधी के अवसान के छः दशकों बाद भी उनके साबरमती आश्रम और संत बिनोवा भावे के सेवाग्राम में आम आदमी बेरोकटोग आवाजाही कर सकता है।
 
बाबा रामदेव का दिल्ली में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है। बाबा रामदेव ने उत्तर प्रदेश की निजाम मायावती से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया और बयान जारी किया कि वे नोएडा में अनशन करेंगे। नोएडा दिल्ली का उपनगरीय इलाका ही माना जाता है जो उत्तर प्रदेश में होने के साथ ही साथ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में आता है। नोएडा में कांग्रेस की हुकूमत फिलहाल नहीं है। चतुर सुजान बाबा रामदेव इस बात को भी बेहतर समझ चुके हैं कि नोएडा में ही अधिकांश चेनल्स के कार्यालय हैं, सो उन्हें बैठे बिठाए पब्लिसिटी मिल जाएगी। रही बात हरिद्वार की तो एक दो दिन में ही बाबा का यह मामला ठंडा पड़ जाएगा और फिर कोई भी चेनल का रिपोर्टर बाबा के पास नहीं फटकेगा।
 
बाबा रामदेव को चलाने वाला दिमाग या तो बाबा के कदमों से नाराज है या फिर किसी ने उसे हाईजेक कर लिया है, यही कारण है कि 1 जून के बाद बाबा रामदेव के हर कदम उल्टे ही पड़ रहे हैं। सत्याग्रह के नाम पर जान देने की हुंकार लगाने वाले बाबा रामदेव आखिर चार और पांच जून की दर्मयानी रात औरतों का लिबास पहनकर अनशन स्थल से जान बचाकर भागे क्यों? बाबा और सरकार के बीच जो वार्ता चल रही थी, उस वार्ता के बारे में बाबा ने मीडिया को समय समय पर खुलकर क्यों नहीं बताया? क्यों बाबा बार बार बातचीत के बाद वार्ता सकारात्मक रही का उल्लेख करते आए हैं?
 
बाबा काफी हद तक कन्फयूज्ड लग रहे हैं। बाबा को अब सूझ नहीं रहा है कि अगला कदम क्या उठाया जाना चाहिए। अनशन स्थल पर शाम से ही बाबा की बदहवासी देखते बन रही थी। मध्य रात्रि तक तो बाबा को किसी बात की सुध नहीं थी। अब जब बाबा से उनके विश्वस्त सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के बारे में पूछा गया तो वे कहते हैं कि उन्हें एक खास मिशन पर लगाया गया है। उनके पासपोर्ट और नागरिकता के सवालों को भी बाबा सिरे से खारिज कर रहे हैं। पर उत्तराखण्ड में तो सरकार द्वारा यह साबित कर दिया गया है कि बाल किशन की नागरिकता ही संदिग्ध है।
 
इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव के योग से निरोग अभियान से भले ही किसी को लाभ हुआ हो या नहीं, किन्तु यह तय है कि इसके माध्यम से बाबा की लोकप्रियता में विस्फोटक इजाफा हुआ है। बाबा से जुड़ने और योग में आस्था रखने वालों की तादाद करोड़ों अरबों में है। बाबा रामदेव के मिशन में वे लोग बाबा का साथ अवश्य देंगे। इसलिए बाबा रामदेव को चाहिए कि वे देश हित में विदेश में जमा काले धन को वापस भारत लाने के मिशन पर ही अड़े रहें, राजनीति से तौबा करें, अपने शिष्य या सहयोगी विधायकों सांसदों और अपने चाहने वालों के माध्यम से हस्ताक्षर अभियान, मानव श्रंखला आदि बनवाकर विरोध प्रदर्शन करें। इस तरह से सत्याग्रह करने और फिर रणछोड़दास बनकर भागने से काला धन वापस नहीं आने वाला। बाबा रामदेव को कोई हक नहीं बनता कि वे योग में आस्था रखने वाले देश के अरबों लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करें।

गायब हैं आचार्य बालकृष्ण

बाबा करेंगे शाम तक धमाका
 
बालकृष्ण का पासपोर्ट असली
 
(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। कालेधन को विदेश से वापस भारत लाने का अभियान छेड़ने वाले रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव और सरकार के बीच नफरत की खाई बढ़ती ही जा रही है। रामलीला मैदान पर हुई कार्यवाही के उपरांत एक तरफ जहां कांग्रेसनीत कंेद्र सरकार अब बैकफुट पर आती नजर आ रही है, वहीं दूसरी और सरकार के प्रति बाबा रामदेव की धार में पैनापन शनैः शनैः बढ़ता ही जा रहा है। बाबा रामदेव ने कहा है कि वे अपनी अगली रणनीति का खुलासा आज शाम की पत्रकार वार्ता में करेंगे। उधर बाबा के विश्वस्त सहयोगी और कथित तौर पर नेपाल मूल के नागरिक आचार्य बालकृष्ण 4 जून की रात्रि से ही लापता बताए जा रहे हैं।
 
बाबा रामदेव ने केंद्र सरकार पर भ्रष्ट होने का अरोप लगाते हुए कहा कि चार और पांच जून की मध्य रात्रि की वारदात के लिए उन्होंने केंद्र सरकार को माफ कर दिया है, पर उनका यह अभियान जारी रहेगा। हठ योग पर आमदा बाबा रामदेव अपनी अगली रणनीति का खुलासा आज देर शाम करेंगे। अपने विश्वस्त सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के बारे में उन्होनें साफ करते हुए कहा कि उन्हें किसी खास मिशन पर लगाया गया है, अतः वे अभी भूमिगत हैं। जैसे ही मिशन पूरा हो जाएगा वे जनता के सामने आ जाएंगे। बालकृष्ण के पासपोर्ट और पतांजली योगपीठ की जमीन के बारे उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि सब कुछ सही और नियमानुसार ही है।
 
रामदेव ने कहा है कि वे एक करोड़ लोगों के साथ अब दिल्ली पर हमला बोलेगे। उनके योग के शिष्यों में से एक करोड़ लोग उनकी एक हुंकार पर दिल्ली आ जाएंगे। प्रधानमंत्री के खिलाफ पहली बार बयानबाजी करते हुए रामदेव ने कहा कि वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह ने राष्ट्रधर्म नहीं निभाया है। उधर कांग्रेस द्वारा अनशन स्थल से बाबा रामदेव के सलावार कुर्ता पहनकर भागने पर उन्हें ‘रणछोड़दास‘ की उपाधि से भी नवाजा गया है।

रामलीला मैदान के प्रकरण पर अब कांग्रेसनीत केंद्र सरकार पूरी तरह घिरती नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के बाद मानवाधिकार आयोग ने भी केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। इसके साथ ही साथ महिला आयोग मंे भी इसकी शिकायत दर्ज करा दी गई है। माना जा रहा है कि महिला आयोग भी इस मामले की जांच करने के आदेश जारी कर सकता है।

बुधवार को अन्ना का अनशन

रामलीला मैदान में पुलिसिया बर्बरता के विरोध में सिविल सोसायटी की ओर से अन्ना हजारे एक दिन के अनशन पर बुधवार को बैठने वाले हैं। सरकार ने अन्ना के अनशन से उपजने वाली परिस्थितियांे का अनुमान लगाकर उससे निपटने की रणनीति बनाना आरंभ कर दिया है।

बाबा उलझ सकते हैं कोर्ट कचहरी के चक्करों में

जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के साथ दो दो हाथ करने वाले बाबा रामदेव के खिलाफ कांग्रेस ने सबूत जुटाने आरंभ कर दिए हैं। कांग्रेस के घाघ नेताओं के कदम ताल देखकर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही के द्वारा बाबा के 1100 करोड़ रूपए के साम्राज्य पर अधिकार जमाकर बाबा रामदेव का बाकी समय कोर्ट कचहरी में प्रकरणों को सुलटाने में व्यतीत करवाया जा सकता है। कहा जा रहा है कि इस मामले को भुनाने के बाद भाजपा द्वारा बाबा रामदेव से पल्ला झाड़ लिया जाएगा, जिसके बाद बाबा रामदेव राजनैतिक बियावान में खो जाएंगे।

डा० निशंक के सामने कांग्रेसी की तैयारियां व रणनीति शून्य

 डा० निशंक के सामने कांग्रेसी की तैयारियां व रणनीति शून्य

(चन्द्रशेखर जोशी)

देहरादून। भाजपा हाईकमान ने उत्तराखण्ड के मामले में स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में विधानसभा चुनाव सामूहिक नेतृत्व आधार पर लडे जाएंगे, इसके बाद ही नेता की भूमिका तय होगी। परन्तु कांग्रेस में चुनाव लडने के बारे में कोई रणनीति तैयार नहीं की गयी है। अब कांग्रेस का हर प्रादेशिक क्षत्रप स्वयं को मुख्यमंत्री मानकर चल रहा है। जिससे उत्तराखण्ड में हर आम कांग्रेसी यह मानने में कतई नहीं हिचक रहा है कि कांग्रेस द्वारा चुनावी रणनीति की कोई तैयारी नहीं की जा रही है, सब कुछ हवा में हैं तथा मात्र निशंक को कोसने तक सीमित है।
वहीं जनता का यह मानना है कि कांग्रेस के जिस नेता को देखो वह डा० निशंक को कोसने मात्र तक सीमित है। उनकी अपनी उपलब्धि शून्य है। हरीश रावत की मुख्य चिंता यह है कि अपने पुत्र को युवा कांग्रेस में अध्यक्ष पद दिलवाने के बाद अब पुत्री को कैसे विधायक बनाया जाए, इसके बाद फिर स्वयं कैसे मुख्यमंत्री बना जाए। इस तरह हर कांग्रेसी नेता व्यक्तिगत गुणा भाग में उलझा है, उसको सूबे की नहीं स्वयं की चिंता ज्यादा सता रही है कि वह कैसे मुख्यमंत्री बन सके।  देहरादून में २८ मई को एक कार्यक्रम में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस के विकास खोज मार्च में कांग्रेस नेता हरीश रावत की पुत्री ने राज्य सरकार को कोसा।

  कई कांग्रेसी नेताओं ने स्वीकार किया है किं उत्तराखण्ड में कांग्रेस अंदरखाने डरी हुई है। उत्तराखण्ड में जमीन से जुडे कई नेताओं का यह मानना है कि डा० निशंक की जिस तरह से तैयारी व रणनीति तैयार की जा रही है, कोई शक नहीं कि वह विधानसभा चुनाव में भाजपा को रिपीट करवा दें और शह आंकडा एकाध कांग्रेसी नेता या किसी शहर विशेष के कांग्रेसियों का नहीं है, अपितु हमारी टीम ने अनेक शहरों में जमीन से जुडे अनेक कांग्रेसी नेताओं से राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भूमिका के बारे में बात की, जिस पर यह तथ्य निकल कर आया कि डा० निशंक के सामने कांग्रेसी की तैयारियां व रणनीति शून्य है। यही हाल रहा तो डा० निशंक के नेतृत्व में भाजपा रिपीट कर सकती है।
जनता का यह मानना है कि उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री डा० निशंक का करिश्माई नेतृत्व उभर कर सामने आया है, सूबे में अनेक मोर्चो पर डा० निशंक को घेरने की रणनीति बनाने के बावजूद वह अपने कार्यो से डिगे नहीं है। देखा जाए तो एक सफल राजनीतिक के जो गुण मुख्यमंत्री में होने चाहिए वह इस समय सूबे के किसी भी दल के राजनीतिज्ञ में नहीं हैं। आज डा० निशंक हर आम व खास से जिस तरह मिल रहे हैं, उनको तवज्जो दे रहे हैं, क्या यह गुण अन्य किसी में हैं, अपनी कई तरह की दुर्बलता ही उनको उत्तराखण्ड की जनता से दूर कर देती है। वहीं डा० निशंक में क्या कमी है, आज तक ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है।
इसके अलावा गांधी की तरह सत्याग्रह यात्रा करना उत्तराखण्ड में कांग्रेस को भीड़ ना जुटा पाने के कारण फायदे का सौदा होता नही दिख रहा। गुटो में बटे कांग्रेसी प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्या की मुहिम को झटका लगाने की  साजिश में लगे हुए है और यही कारण है कि गढ़वाल के बड़े नेताओ का कुमाउ में चल रही सत्याग्रह यात्रा में दूर दूर तक अता पता नही था। अकेले प्रदेश अध्यक्ष ही यात्रा को सफल बनाने में लगे हुए थे जबकि गढ़वाल के ऐसे नेता जो लगातार प्रदेश अध्यक्ष के इर्द गिर्द डेरा लगाए रहते थे वह कुमाउ में सत्याग्रह यात्रा के दौरान कही भी नजर नही आए जिससे कांग्रेस की कलह खुलकर पूरी तरह जनता के बीच आ गई है।
यात्राओ में कुछ स्थानो पर इतनी कम भीड़ एकत्र हुई जिसने कांग्रेस को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सत्याग्रह यात्राएं जनता के बीच अपनी कोई खास पकड़ नही बनाती हुई नजर आ रही। कांग्रेस सत्याग्रह यात्रा के माध्यम से उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार के खिलाफ जनआन्दोलन इक्ठ्ठा करना चाहती थी लेकिन प्रदेश की जनता ने कांग्रेस का साथ नही दिया। तीन चरणो की सत्याग्रह यात्रा को निपटा चुके कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अपने ऐसे नेताओ से बेहद दुखी हैं जो कुमाउ में सत्याग्रह यात्रा के दौरान कही भी नजर नही आए। भले ही प्रदेश अध्यक्ष इस बात को सार्वजनिक मंच पर उजागर ना करना चाहते हो लेकिन वह इससे बेहद नाराज है कि जिन्होने सत्याग्रह यात्रा को शुरू करने का ढोल तो जोर शोर से पीटा और बाद में कदम पीछे खींच लिए। कुमाउ में सत्याग्रह यात्रा के दौरान विजय बहुगुणा व सतपाल महाराज भले ही नजर आए हो लेकिन सांसद हरीश रावत किसी भी सत्याग्रह यात्रा में अभी तक नजर नही आए हैं। जिससे माना जा रहा है कि अभी भी कांगेस में याशपाल आर्या व हरीश रावत के बीच छत्तीस का आंकड़ा जारी है।
इससे पूर्व नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत व प्रदेश अध्यक्ष के बीच भी छत्तीस का आंकड़ा रहा है और हरीश रावत यशपाल आर्या के किसी भी कार्यक्रम में खुलकर नजर नही आए हैं। इसके अलावा हरक सिंह रावत भी यशपाल आर्या से दूरी बनाकर चल रहे हैं और इससे पूर्व भी प्रदेश अध्यक्ष के अलावा वह अपने कई ऐसे कार्यक्रम कर चुके हैं जिससे दोनो में गुटबाजी होने को बल मिलता ळै। कांग्रेस में चल रही अन्र्तकलह पूरी तरह खुलकर नजर आ रही है और इसी का कारण है कि हरिद्वार में जिला पंचायत के चुनाव में बाजी बसपा के हाथो चली गई क्योकि हरिद्वार में हरीश रावत अपने किले को बचाना चाहते थे लेकिन प्रदेश अध्यक्ष ने इस सीट पर कोई तवज्जो ना देते हुए कोई ध्यान नही दिया जिसका नतीजा जिला पंचायत के चुनाव में कांग्रेस को हार के रूप में देखने को सामने आया।
लोकसभा की पांचो सीटे जीतने के बाद कांग्रेस के बड़े नेता अपनी अपनी गुटबाजी में उलझकर रह गए हैं और एनडी तिवारी के शासन काल में जहां कांग्रेस में हरीश रावत व एनडी तिवारी गुट हुआ करते थे वहीं वर्तमान में सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा, हरक सिंह रावत, हरीश रावत, यशपाल आर्या गुट हो गए हैं। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी चैधरी वीरेन्द्र सिंह भले ही गुटबाजी को कम करने के लिए अनुशासन का डंडा उठाए दौड़ रहे हो लेकिन उत्तराखण्ड में कांग्रेस में उपजी गुटबाजी को खत्म नही किया जा सकता। गुटबाजी का दंश कांग्रेस की सत्याग्रह यात्रा मे तो खुलकर सामने आ गया है और यशपाल आर्या की मुहिम को उनके विरोधी धक्का लगाने में जुट गए हैं जिससे कांग्रेस कमजोर ििस्थ्त में आ गई है । भले ही कांग्रेसी नेता सत्याग्रह यात्रा को सफल बता रहे हो लेकिन दबी जुबान से कांग्रेस के ऐसे नेता जो जमीनी पकड़ रखते हैं इसे फ्लाॅप साबित कर रहे हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस की सत्याग्रह यात्रा गुटबाजी की भेंट चढ़ गई है। अब देखना यह होगा कि चैथे चरण की शरू होने वाली 31 मई की यात्रा अब गढ़वाल में अपना क्या रंग दिखाती है।

सोमवार, 6 जून 2011

सुनाई देने लगी ‘आपातकाल‘ की पदचाप


सुनाई देने लगी ‘आपातकाल‘ की पदचाप

(लिमटी खरे)

देश की आजादी के वक्त आजादी के परवानों और महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं ने इक्कीसवीं सदी में भारत की जो कल्पना की होगी, भारत गणराज्य उससे एकदम ही उलट नजर आ रहा है। गरीब और अधिक गरीब तो अमीर की तिजोरी इतनी भर चुकी है कि उसका मुंह बंद नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस की नाक के नीचे जनता के गाढ़े पसीने की कमाई के लाखों करोड़ों रूपयों की होली खेली जा रही है, पर कांग्रेस नीत कंेद्र सरकार आखें बंद कर बैठी है। ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ‘ का नारा देने वाली कांग्रेस की पोल अब खुलने लगी है। हालात देखकर लगने लगा है कि कांग्रेस को अपना नारा बदलकर ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी की गर्दन के साथ‘ कर देना चाहिए। बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के साथ रामलीला मैदान पर जो भी हुआ उससे भान होने लगा है कि आने वाले समय में आपतकाल लागू होजाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


देश की जनता घपले, घोटाले और भ्रष्टाचार से पूरी तरह आजिज आ चुकी है। चूंकि कानून में बदलाव का हक संसद, विधानसभा, सांसदों और विधायकों को ही होता है इसलिए आम जनता अपने आप को निरीह, निर्बल, मजबूर ही महसूस कर रही है। जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के द्वारा देश में आपातकाल लागू कर दिया गया था, हालात कुछ उसी तरह के बनते नजर आ रहे हैं। उस वक्त श्रीमति इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष तो उनके पुत्र संजय गांधी कांग्रेस के महासचिव हुआ करते थे। कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, आज कांग्रेस अध्यक्ष की आसनी पर इंदिरा गांधी के बजाए उनकी इटली मूल की बहू श्रीमति सोनिया गांधी तो महासचिव के पद पर संजय गांधी के भतीजे राहुल गांधी विराजमान हैं।

सोनिया की चाटुकार मण्डली में भी इंदिरा गांधी की कोटरी का अक्स ही दिखाई दे रहा है। उस वक्त प्रकाश चंद सेठी और नारायण दत्त तिवारी के जो स्वर थे वही तल्खी और स्वामीभक्ति राजा दिग्विजय सिंह के सुरों में दिखाई दे रही है। आपात काल में जिस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई थी, वही हालात आज भी दिख रहे हैं। सरकार का विरोध करने पर अन्ना हजारे के बाद अब रामदेव बाबा को आम ‘चोर‘ की तरह पकड़ा जाना निंदनीय है।

रामलीला मैदान में 4 और 5 जून की दरमयानी रात को जो रावण लीला हुई उससे देश दुनिया का हर नागरिक हतप्रभ है। कांग्रेस के इशारे पर पुलिस की बर्बरता से साफ हो गया है कि लोकतंत्र की स्थापना करने वाली कांग्रेस की वर्तमान पीढ़ी को अब लोकतंत्र पर विश्वास नहीं रहा। आज के हालात देखकर लगने लगा है मानो भारत गणराज्य में ‘हिटलरशाही‘ हावी होती जा रही है। अगर कोई सरकार या तंत्र के खिलाफ बोलने का साहस जुटाता है तो उसे मिटाने के लिए राजनेता एड़ी चोटी एक कर देते हैं।

आजादी के उपरांत 1975 में जय प्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी के कदमों से त्रस्त जनता को उस जंगल राज से मुक्ति दिलाने के लिए आंदोलन छेड़ा और इंदिरा गांधी से त्यागपत्र मांग लिया। जेपी की यह कथित घ्रष्टता इंदिरा गांधी और संजय गांधी को इतनी नागवार गुजरी कि उसी वक्त देश में आपातकाल लगा दिया गया। सरकार का विरोध करने वालों को तरह तरह की यातनाएं देकर जेल मंे बंद कर दिया गया था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्यों को मीसा में बंद कर जिस तरह की अमानवीय यातनाएं दी थीं, उसे याद कर आज भी मीसाबंदियों सिहर उठते हैं।

रामलीला मैदान में भी कांग्रेस नीत कंेद्र सरकार द्वारा ने कमोबश यही कदम उठाया है। आधी रात को चोरों की तरह जाकर बाबा रामदेव को पकड़ने और शांति पूर्वक अनशन करने वालों के खिलाफ लाठियां भाजनें का ओचित्य किसी को समझ नही आ पाया है। महिलाओं और उनके साथ आए बच्चों को भी पुलिस ने अपना निशाना बनाया। सवाल यह है कि आखिर एसी कौन सी आफत आ गई थी सरकार को अंधेरी रात में इस तरह के कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा।

देश की सवा करोड़ जनता प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह से इस बात का उत्तर अवश्य चाह रही है कि अगर देश में वाकई लोकतंत्र बचा हुआ है, तो वे इस बात का जवाब अवश्य ही दें कि आखिर क्या वजह थी कि बाबा रामदेव को पकड़ने और अनशनकारियों पर अश्रु गैस और लाठियां भांजने के लिए दिन होने का इंतजार नहीं किया गया? क्या कारण था कि सोते निर्दोष लोगों को बेतहाशा पीटा गया? क्या यही लोकतंत्र की परिभाषा है? क्या यही नेहरू और महात्मा गांधी के सपने के भारत के शासक हैं? इसे तो सोनिया और राहुल के शासन के प्रजातंत्र का नमूना कहा जा सकता है।

यह तो वाकई उपर वाले का शुक्र मनाना चाहिए कि चार और पांच जून की दर्मयानी रात को रामलीला मैदान में पुलिसिया कहर के बावजूद भी कोई अनहोनी नहीं घटी, वरना हालात संभालना मुश्किल हो जाता। देश के चेहरे पर भ्रष्टाचार, घपले, घोटालों के साथ ही साथ कुछ इस तरह के दाग भी लग जाते जिन्हें धोने में सालों साल का समय भी कम पड़ जाता। बाबा रामदेव के साथ ‘डीलिंग‘ करने में सरकार द्वारा जो तरीका अपनाया गया, वह अपने आप में इस बात को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि बाबा रामदेव के अनशन से सरकार किस कदर खौफजदा है।

उधर बाबा रामदेव इस आंदोलन की सफलता से फूले नहीं समा रहे हैं। बाबा का कहना है कि अगर आंदोलन तीन दिन चल जाता तो सरकार गिर जाती? हो सकता है बाबा की बात में दम हो, किन्तु बाबा को इस तरह का अहम नहीं पालना चाहिए। पहले भी मीडिया ने बाबा रामदेव का अनेक बार साक्षात्कार में भी उनका अहम छलका है। बाबा ने संवाददाताओं को ही डामीनेट करने के हथकंडे भी अपनाए। कहा जाता है कि ‘अहम‘ में से ‘अ‘ को अलग कर दिया जाए तो बाकी बचता है ‘हम‘।

केंद्र सरकार के इस तरह के कदम के उपरांत देश की सबसे बड़ी अदालत ने खुद संज्ञान लिया है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार और जस्टिस बी.एस.चैहान की पीठ ने केंद्र सरकार के गृह सचिव, दिल्ली सरकार के गृह सचिव और पुलिस आयुक्त दिल्ली को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब तलब किया है। इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में की जाएगी। एक याचिका कर्ता अधिवक्ता अग्रवाल के अनुसार कोर्ट ने उनकी अपील दाखिल करने के साथ ही कहा कि न्यायालय इस मामले में खुद ही स्वमोटिव नोटिस ले रहा है। कोर्ट खुद भी समाचार पत्र की कतरनों और विजुअल्स देखकर सन्न रह गया है। कोर्ट ने इस मामले को बेहद संगीन माना है।

न्यायालय ने लिया स्वतः संज्ञान

0 काला धन अभियान
 
न्यायालय ने लिया स्वतः संज्ञान
 
(लिमटी खरे)
 
नई दिल्ली। काले धन के खिलाफ जेहाद छेड़ने वाले बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के आंदोलन को बर्बरता के साथ कुचलने का मामला अब तूल पकड़ने लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में स्वतः ही संज्ञान लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। उधर केंद्रीय गृह मंत्रालय भी इस मामले में हरकत में आ गया है। गृह मंत्रालय में इस मामले को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक चल रही है।
 
इस मामले को लेकर याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता अजय अग्रवाल ने बताया कि उनकी पिटीशन एनरोल नहीं हो पाने के बारे मंे जब उन्होंने कोर्ट को आवगत कराया तो कोर्ट ने इस मामले में स्वतः ही संज्ञान लिया और अखबार की कतरनों तथा वीजुअल्स देखने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और पुलिस आयुक्त दिल्ली को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई जुलाई के दूसरे सप्ताह में होने की उम्मीद है। कोर्ट की कार्यवाही पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और खुद बाबा रामदेव ने न्यायालय के प्रति आभार जतया है।
 
गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदंबरम के करीबी सूत्रों का कहना है कि न्यायालय की कार्यवाही के बाद अब गृह मंत्रालय पूरी तरह चोकन्ना हो गया है। सूत्रों ने कहा कि गृह मंत्रालय की एक उच्च स्तरीय बैठक इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है, जिसमें बाबा रामदेव को हर मोर्चे पर घेरने की तैयारियां और अब तक की पुलिस और प्रशासन की कार्यवाही को न्यायसंगत ठहराने के लिए कानून के जानकारों की मदद ली जा रही है।
 
उधर कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ से छन छन कर बाहर आ रही खबरों के अनुसार सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही इस मामले में कांग्रेस और सरकार की विफलता से बहुत ज्यादा नाराज दिख रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी इस समय सबसे ज्यादा किसी से खफा हैं तो उस फेहरिस्त में पी.चिदम्बरम, कपिल सिब्बल और पवन बंसल शामिल हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी नजरों में दिग्विजय सिंह की बयानबाजी बहुत ही कारगर साबित हो रही है।
 
बाबा रामदेव ने कहा कि मशहूर वक्ता जाकिर नायक के नाम से एक फर्जी ईमेल पुलिस ने ही बनाकर दिल्ली में मीडिया को भेजा था। बाबा का कहना था कि अनशन स्थल के पास ही एक मस्जिद है सरकार की इच्छा थी कि अनशन स्थल पर कुछ गड़बड़ कर दी जाए और इसे सांप्रदायिक स्वरूप दे दिया जाए पर सरकार विफल हो गई।
 
भाजपा ने इस मामले को अपने हाथों में लेने का प्रयास आरंभ कर दिया है। बाबा रामदेव के संघर्ष जारी रहने के फैसले के उपरांत भाजपा ने राजघाट पर एक दिवसीय धरना दे दिया है। भाजपा के धरने में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज ने ठुमके भी लगाए। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भाजपा ने महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल से मिलने का समय मांगा है। अपरान्ह बारह बजे भाजपा श्रीमति पाटिल से मिलकर उनसे विशेषाधिकार का प्रयोग कर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग करेगी। बाबा रामदेव ने अंत तक प्रधानमंत्री से त्यागपत्र की मांग नहीं की है।

रविवार, 5 जून 2011

जनरल डायर बनाम मनमोहन सिंह


जनरल डायर बनाम मनमोहन सिंह

(लिमटी खरे)

ब्रितानी हुकूमत के काल में 13 अप्रेल 1919 में जनरल डायर ने अमृतसर के जलियां वाले बाग में निर्दोष लोगों को गोलियांे से भून दिया था, यह था गोरी चमड़ी वालों की बर्बरता का नंगा नाच। महात्मा गांधी के आर्दशों पर चलकर देश को आजादी मिली और फिर कायम हुआ भारत गणराज्य जिसमें लोकतंत्र को सर्वोपरि माना गया। 4 और 5 जून की दर्मयानी रात दिल्ली में जो हुआ वह एक बार फिर ब्रितानी हुकूमत की सामंतवादी सोच का परिचायक कहा जाएगा। जिस तरह गोरों ने साम, दाम, दण्ड भेद की नीति पर चलकर देश पर राज किया, कमोबेश उसी तरह कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा हाल ही में किया जा रहा है। अन्ना हजारे के बाद बाबा रामदेव के अनशन से हिली कांग्रेस को अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। बाबा रामदेव की मुहिम को जनता का समर्थन हासिल है, इस आंदोलन के दमन से सरकार की नीयत पर अनेक प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। लोग इसकी तुलना जनरल डायर की अमानवीयता और आपातकाल (इमरजेंसी) से करने से नहीं चूक रहे हैं।

देश की सरकार एक और अन्ना हैं हजारों‘, यह जुमला आज हर किसी की जुबां पर चढ़ चुका है। चाहे अन्ना हजारे ने बाबा के काले धन के मुद्दे को हाईजेक कर लिया हो, किन्तु 4 जून को स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में जो भी किया उसे देखकर लगने लगा है मानो देश का आम आदमी भ्रष्टाचार घपले घोटालों से आजिज आ चुका है। इसके पहले अन्ना हजारे लोकपाल मामले में अपने तेवर दिखा चुके हैं। भले ही कांग्रेस इस मामले में बैकफुट पर हो, किन्तु बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ने कांग्रेस के थिंक टेंक्स को गंभीर मंत्रणा पर विवश कर ही दिया है।

भारत गणराज्य की स्थापना के साथ ही साफ कर दिया गया था कि भारत देश न तो कोई कम्युनिष्ट देश है, न ही दुनिया का चैधरी अमेरिका और न ही अरब देश की सामन्ती व्यवस्था का प्रतीक, जहां देश का सर्वोच्च नागरिक स्वविवेकसे कोई भी कानून में तब्दीली का हक रखता हो। भारत गणराज्य में सबसे ताकतवर संवैधानिक पद प्रधानमंत्रीका माना गया है, किन्तु उसे भी निचली अदालत से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत को सम्मन भेजकर हाजिर करने का हक है। इसी बिनहा पर यह कहा जा सकता है कि देश में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। इसे किसी भी कीमत पर छेड़ा नहीं जा सकता है।

बाबा रामदेव आखिर चाह क्या रहे हैं, यही न कि विदेशों में जमा देश का काला धन वापस स्वदेश लाया जाए। इसके लिए बाबा रामदेव लंबे समय से प्रयासरत हैं। यह अलहदा बात है कि उनकी इस मुहिम में बीच बीच में सडांध मारती राजनीति की बू भी आने लगती है, जब वे सियासत पर उतर आते हैं। लोगों को स्मरण दिलाना चाह रहा हूं कि जब लौह पुरूष का तमगा पाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल का निधन हुआ तब उनकी कुल संपत्ति 259 रूपए थी। एसे थे नीतियों पर चलने वाले राजनेता। आज के राजनेताओं के पास अकूत दौलत है। क्या आम आदमी से ज्यादा धन को राष्ट्रीय संपत्ति नहीं माना जाए!

बाबा रामदेव को मनाने के लिए कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के हालिया सबसे विश्वस्त दूत कपिल सिब्बल गए। सिब्बल और बाबा के बीच वार्ता चली, जो असफल ही रही। सिब्बल ने गोरे ब्रितानियों की चाल चलकर बाबा के राईट हेण्ड और कथित तौर पर नेपाली मूल के आचार्य बाल कृष्ण से अनशन समाप्ति का पत्र लिखवा लिया। यह बात समझ से परे है कि आखिर उन्होंने अनशन समाप्ति का पत्र अनशन प्रारंभ होने के पूर्व लिखकर क्यों दिया? कहीं एसा तो नहीं कि यह सब कुछ मिली जुली प्रायोजित कुश्ती हो? अमूमन इस तरह के पत्र अग्रिम में तो सरकार में शामिल करने के पूर्व मंत्रियों से लिखवाए जाते हैं ताकि समय बे समय काम आ सकें।

कांग्रेस का आरोप है कि बाबा के अनशन स्थल को फाईव स्टार सुविधाओं से लैस किया गया है। इसमें पैसा कौन लगा रहा है यह शोध का विषय है। सियासी दल के नुमाईंदे इस तरह के आरोप लगाने के पहले यह बात भूल जाते हैं कि जब कांग्रेस या भाजपा के अधिवेशन होते हैं तब फाईव तो क्या सेवन स्टार की सुविधाएं मुहैया होती हैं नेताओं को, तब वे इस तरह का प्रश्न दागने का नैतिक साहस क्यों नहीं कर पाते हैं? इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि बाबा के पीछे संघ है या भाजपा, सवाल तो यह है कि बाबा का मुद्दा सही है अथवा नहीं!

एक तरह से देखा जाए तो सरकार और कांग्रेस के ट्रबल शूटर बनकर एक कपिल सिब्बल पूरी तरह से असफल ही हुए हैं। बाबा रामदेव को कल शाम अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का प्रयास किया है, बाद में 4 और 5 जून की दर्मयानी रात में उन्हें बलात उठाही लिया गया, जो निंदनीय है। यह तो अच्छा हुआ कुटिल राजनेताओं ने बाबा के अनशन स्थल पर असमाजिक तत्वों का उपयोग कर रंग में भंग नहीं डाला, वरना मामला कुछ और रंग ले चुका होता।

बाबा रामदेव के इस तरह के अनशन से उनके पक्ष में बयार बह निकली है। दिल्ली इस बात की गवाह है कि सरकार के दमन चक्र के बावजूद भी बाबा रामदेव देश ने की जनता के मजबूत कांधों पर बैठकर भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद किया। बाबा रामदेव की हुंकार के आगे अन्ना हजारे का कद अब बौना नजर आने लगा है।

पहले सियासत तब गर्माई थी जब पिछले साल बाबा रामदेव ने राहुल गांधी से मुलाकात की थी। पिछले माह बाबा रामदेव ने अपने कमोबेश हर साक्षात्कार में यही कहा कि सरकार के साथ बातचीत सकारात्मक चल रही है, पर इस बात से वे कन्नी ही काटते रहे कि क्या बातचीत चल रही है? एसा कौन सा हिडन एजेंडा था जिसे बताने में बाबा रामदेव आखिरी तक हिचकते रहे। बार बार सरकार के साथ बातचीत फिर अनशन और पत्र का खुलासा, फिर बाबा की धरपकड़! आम आदमी इस बात को समझ ही नहीं पा रहा है कि आखिर एकाएक बाबा रामदेव के साथ सकारात्मकबातचीत इस तरह की विपरीत परिस्थितियों में कैसे पहुंच गई?

जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी का यह कथन भी विचारणीय ही है कि बाबा रामदेव अनशन से पहले अपने 11 हजार करोड़ रूपए के साम्राज्य की सफाई अवश्य कर लें। कल तक जिनके पास साईकल के पंचर जुड़वाने के पैसे नहीं होते थे, वे बाबा रामदेव आज अकूत दौलत पर राज कर रहे हैं। बाबा रामदेव को शंकराचार्य के इस आरोप की सफाई देना ही होगा कि बाबा रामदेव अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए यह अनशन कर रहे हैं। उधर सिने स्टार सलमान खान ने भी बाबा रामदेव को योग सिखाने पर अपना ध्यान केंद्रित रखना चाहिए। पर जो भी हो बाबा रामदेव के अनशन को कुचलकर कांग्रेस ने यह साबित कर ही दिया है कि देश में कानून और व्यवस्था नाम की चीज नहीं बची है। जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर सरकार ने सभी को एक ही लाठी से हांकने का कुत्सित प्रयास किया है।

बाबा रामदेव के काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे को कांग्रेस ने बहुत ही हल्के रूप में लिया। कांग्रेस को लगा योग सिखाने वाला एक बाबा आखिर कैसे सियासी ताकत के सामने टिक पाएगा। उधर बाबा रामदेव कछुए और खरगोश की कहानी में कछुए के मानिंद चलते रहे, अंत में अब बाबा रामदेव देश में सरकार के खिलाफ अलख जगाने में कामयाब हो ही गए। बाबा रामदेव ने योग से जुड़े लोगों को एक सूत्र में पिरोया और फिर सरकार को कटघरे में खड़ा कर ही दिया।

कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह ने जहर बुझे तीरों के मार्फत बाबा रामदेव को आहत करना चाहा किन्तुू वे सफल नहीं हो सके। इसके बाद गंदी राजनीति के तहत बाबा रामदेव को सियासी ताने बाने में उलझाने का प्रयास किया गया, किन्तु बाबा रामदेव की साफगोई के चलते सरकार की चालें अंततः सामने आ ही गईं।

5 जून की मध्य रात्रि में बाबा रामदेव को अनशन स्थल से जिस तरह से उठाया गया वह लोकतांत्रिक तरीका किसी भी दृष्टिकोण से नहीं कहा जा सकता है। बाबा रामदेव की गिरफ्तारी को उनकी किडनेपिंग की संज्ञा दी जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। कांगे्रस का कहना है कि बाबा रामदेव द्वारा जनता को भड़काया जा रहा था, किन्तु कांग्रेस इस बात को स्पष्ट नहीं कर पाई कि आखिर कौन सी पंक्तियां थीं, जिनके माध्यम से बाबा रामदेव द्वारा लोगों को भरमाया जा रहा था।

पूरे घटनाक्रम का तातपर्य यह ही हुआ कि अगर आप सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे तो आपका बलात शमन कर दिया जाएगा। ये परिस्थितियां इसलिए भी निर्मित हो रही हैं क्योंकि निहित स्वार्थ को प्राथमिक मानकर लंबे समय से सत्ता, विपक्ष, नौकरशाही और मीडिया का गठजोड़ हो गया है। यही कारण है कि आज शासकों द्वारा लोकतंत्र को अपने जूते के तले रोंदने में जरा भी हिचक नहीं की जाती है। समय रहते अगर हम नहीं चेते तो देश में हिटलरशाही राज कायम होने में समय नहीें लगने वाला। इस पूरे मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री और युवराज राहुल गांधी एवं ईमानदार छवि के धनी वजीरे आजम डाॅ.मनमोहन सिंह की चुप्पी भी आश्चर्यजनक ही कही जाएगी।

कड़ी सुरक्षा में बाबा पहुंचे मांद में


कड़ी सुरक्षा में बाबा पहुंचे मांद में

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे बाबा रामदेव का धरना पुलिस ने बलात समाप्त करवा 4 और 5 जून की दर्मयानी रात में एक बजे उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आज अपरान्ह उन्हें विशेष विमान से देहरादून के जाॅलीग्रान्ट एयर पोर्ट ले जाया गया जहां सफेद इंडिका से बाबा को कनखल स्थित उनके आश्रम ले जाया गया। बाबा ने संकेत दिए हैं कि वे मीडिया से जल्द ही चर्चा करेंगे।

प्रत्यक्ष दर्शियों के मुताबिक बीती रात लगभग एक बजे बाबा रामदेव को अनशन स्थल पर अचानक ही अहसास हुआ कि उन्हें पुलिस अपनी कस्टडी में ले सकती है, इस बात को भांपकर बाबा रामदेव ने मंच से छलांग लगा दी और अनशन स्थल से भागने की कोशिश की।

आठ घंटे तक अनशन स्थल से लापता बाबा रामदेव के बारे में दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने बताया कि वे सुरक्षित स्थान पर हैं एवं उन्हें विशेष विमान से देहरादून ले जाया जाएगा। इसके पहले सफदरजंग एयरपोर्ट से बाबा रामदेव को हेलीकाप्टर से हरिद्वार ले जाने के कयास लगाए जा रहे थे।

पुलिस की दमनात्कम कार्यवाही से व्यथित बाबा रामदेव ने कहा कि पुलिस ने शांतिपूर्वक धरना दे रहे अनशनकारियों पर बर्बरता के साथ लाठियां भांजी हैं। बहनों को अमानवीय तरीके से घसीटा है। आजाद भारत में यह बेहद संगीन जुर्म है। ब्रितानियों ने भी इस तरह की बर्बरता नहीं की थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने और उनके समर्थकों ने कोई अपराध नहीं किया है। बाबा रामदेव ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि वे दिन के उजाले में वारंट निकालकर उन्हें गिरफ्तार करें, न कि चोरों की तरह से।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बाबा रामदेव भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पतांजली पीठ पहुंच चुके थे। बाबा रामदेव आज भगवा वस्त्रों के बजाए सफेद रंग के कुर्ता पायजामा में दिखाई पड़े। साथ ही बाबा के कहर से डरी केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बाबा रामदेव के प्रवेश पर 15 दिन के लिए पाबंदी लगा दी गई है। रामलीला मैदान पर अनशन स्थल पर धारा 144 लगा दी गई है। बाबा के अनशन में साथ देने आए लोगों को अलह सुब्बह से ही घर वापसी में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा है।
कांग्रेस द्वारा एक तरफ बाबा रामदेव पर संघ और भाजपा की कठपुतली बनने का आरोप लगाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार द्वारा भी बाबा रामदेव को इस मामले में किसी भी तरह की राहत नहीं दिया जाना आश्चर्यजनक ही माना जा रहा है।

उधर हरिद्वार में बाबा रामदेव के समर्थकों का जमावड़ा देखते ही बन रहा है। बाबा समर्थकों ने कहा है कि वे आंदोलन को पूरी तरह जारी रखेंगे। अन्ना हजारे की टीम ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। कांग्रेस की इस कार्यवाही की देश भर में निंदा की जा रही है। बाबा रामदेव कनखल पहुंचने पर काफी थके दिखाई दिए। बाबा के समर्थकों ने आश्रम को पूरी तरह घेर लिया है और किसी को भी अंदर नहीं जाने दे रहे हैं।

मंगलवार, 31 मई 2011

कांग्रेस के चेहरे दो, भाजपा का मुखौटा एक


कांग्रेस के चेहरे दो, भाजपा का मुखौटा एक

(लिमटी खरे)

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को भाजपा का मुखौटा कहा गया था। इसके बाद भाजपा में किसी तरह का चेहरा सामने नहीं आया। भाजपा का चाल चरित्र और चेहरा भले ही बदल गया हो पर आज भी भाजपा का नाम आते ही जेहन में अटल बिहारी बाजपेयी का चेहरा आ जाता है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में वर्तमान वजीरे आजम डाॅक्टर मन मोहन सिंह के न जाने कितने चेहरे सामने आते जा रहे हैं। कभी वे खुद को मजबूर बताकर अपनी खाल बचाने की कोशिश करते हैं तो कभी भ्रष्टाचार के मामले मंे शतुरमुर्ग के मानिंद अपनी गर्दन रेत में गड़ाने का उपक्रम करते नजर आते हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ईमानदार छवि के धनी मन मोहन सिंह को ध्यान में रखकर जनता ने कांग्रेस को जिताया किन्तु बाद में जनता को समझ में आने लगा कि जिसे उन्होंने चुना है वह लोकतंत्र का सबसे बड़ा लाचार लुटेरा है। मनमोहन के सहयोगी अगर लूटपाट मचा रहे हैं और वे चुप हैं इसका तात्पर्य है कि अली बाबाने अपने चालीस चोरोंको लूट खसोट की छूट मौन सहमति के रूप में दी है।

वाकई डाॅ.मनमोहन सिंह ने इतिहास रच दिया है। आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली कांग्रेस आजादी के उपरांत नेहरू गांधी परिवार की प्राईवेट लिमिटेड कंपनी बनकर रह गई है। आजादी के बाद नेहरू गांधी परिवार के पंडित जवाहर लाल नेहरू, प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने देश के सबसे ताकतवर पद वजीरे आजम को संभाला। गैर कांग्रेसी सरकार में अटल बिहारी बाजपेयी ने ही पांच साल से ज्यादा समय तक लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित किया है। कांग्रेस में गैर नेहरू गांधी परिवार में डाॅक्टर साहेब सातवीं मर्तबा स्वाधीनता दिवस पर लाल किले से देश को संबोधित करने का सौभाग्य पाएंगे।

दूसरी बार जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तब से पहली मर्तबा से अधिक कमजोर दिखाई पड़ने लगे। इसका कारण कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के सलाहकारों में कुछ मंझे और घाघ किस्म के राजनेताओं का जुड़ना ही था। अपने मन में 7, रेसकोर्स (प्रधानमंत्री का ईयरमार्क आवास) को आशियाना बनाने की चाहत पाले कांग्रेस के राजनैतिक चाणक्यों ने सोनिया गांधी को मनमोहन के खिलाफ तबियत से भरमाया और भ्रष्टों को लूट खसोट के लिए उकसाया।

कांग्रेस के बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के चाणक्य स्व.अर्जुन सिंह ने इन हालातों को बेहतर भांपा और फिर उनके मौन ने कांग्रेस नेतृत्व की नींद उड़ा दी। इसी बीच एक के बाद एक लाखों करोड़ रूपयों के घपले और घोटालों की गूंज होने लगी। क्या टू जी स्पेक्ट्रम घोटाल, क्या कामन वेल्थ घोटाला, क्या एस.बेण्ड, क्या आदर्श सोसायटी, क्या सीवीसी पद पर थामस की नियुक्ति, हर मामले में कांगे्रसनीत केंद्र सरकार को मुंह की ही खानी पड़ी है। यहां तक कि देश की शीर्ष अदालत ने दो दो मर्तबा टू जी स्पेक्ट्रम मामले में वजीरे आजम की भूमिका पर ही गंभीर सवाल खड़े किए थे। अदालत का यह कहना कि इतने बड़े घोटाले के बाद आदिमत्थू राजा आखिर मंत्री पद पर क्यों बने हुए हैं? काग्रेस को गिरेबान में झाकने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। काले धन के मामले में भी सरकार को बार बार अदालत द्वारा आड़े हाथों लेते हुए फटकार लगाई है।

जब पानी सर से उपर होता दिखा तो वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह ने देश के चुनिंदा टीवी समाचार चेनल्स के संपादकों को बुलाकर अपना स्पष्टीकरण दिया और खुद को निरीह, मजबूर और निर्दोष बताने का प्रयास किया। समूचे देश ने उस वक्त मनमोहन सिंह को पानी पी पी कर कोसा कि अगर आप मजबूर हैं तो फिर कुर्सी से चिपके रहने की क्या मजबूरी है। अगर आप इस सब भ्रष्टाचार घपले घोटाले में शामिल नहीं हैं तो आप अपने पद से त्यागपत्र क्यों नहीं दे देते? मतलब साफ है कि आप भी ‘‘कथड़ी (एक तरह का फटे वस्त्रों से बना दुशाला) ओढ़कर घी पीने‘‘ में विश्वास रखते हैं। अगर आप यह कहने का साहस जुटा पा रहे हैं कि आप मजबूर हैं तो सवा करोड़ भारतवासियों को यह जानने का पूरा हक है कि आखिर यह मजबूरी क्या है और यह आप भारत के हर नागरिक की किस कीमत पर चुका रहे हैं।

हाल ही में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दो साल पूरे हुए। प्रधानमंत्री ने सरकार में प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर शामिल घटक दलांे के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर जश्न मनाया। पता नहीं प्रधानमंत्री ने इस तरह खुशी मनाने का नैतिक साहस कैसे जुटाया? क्योंकि सरकार को भ्रष्टाचार के मामले में जिस करवट मिला उस करवट उसके अपने सहयोगियों ने कपड़ों के मानिंद धुना। पूर्व संचार मंत्री ए.राजा, कामन वेल्थ गेम्स आयोजन समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी, सरकार की सहयोगी द्रमुक अध्यक्ष करूणानिधि की पुत्री कनिमोरी जैसी शख्सियतें सरकार की छवि पर कालिख लगाकर जेल में हैं। अनेक और एसे ही नगीनों का जेल इंतजार कर रहा है। इन परिस्थितियों में क्या संप्रग सरकार ने घपले घोटालों का जश्न मनाया है!

आदि अनादि काल से रियाया के हर दुख दर्द, सुख सुविधा का ध्यान रखना शासकों का प्रथम नैतिक दायित्व रहा है। आजाद भारत में पहली मर्तबा यह देखने को मिल रहा है कि शासकांे को अपना निजी खजाना वह भी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से भरने की फिक्र है। शासकों को इतना भी इल्म नहीं है कि वह मंहगाई के बोझ तले दबी जनता के रूदन को सुन पाए। नौ माह में नौ मर्तबा पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए। डीजल और रसोई गैस इसी कतार में खड़े हैं। दूध के दामों में बार बार बढ़ोत्तरी की जा रही है। दाल तेल और अन्य खाद्य सामग्रियों की कीमतें आसमान को छू रही हैं। नहीं बढ़ रही हैं तो शराब की कीमतें।

लगता है वजीरे आजम डाॅक्टर मनमोहन सिंह वाकई में महात्मा गांधी के सच्चे अनुयाई हैं। बापू के तीन बंदर यह शिक्षा देते हैं कि बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो। वजीरे आजम बुरा सुनने से गुरेज ही करते हैं, रही बात देखने की तो जहां भी अनर्थ या भ्रष्टाचार, घपले घोटाले होते दिखते हैं वे अपनी आंखे बन्द कर लेते हैं और बचा बुरा बोलना तो व्यक्तिगत तौर पर वे भले आदमी हैं, सो बुरा बोलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है। एक तरफ मनमोहन की छवि ईमानदार की बनी हुई है वहीं दूसरी ओर उनका दूसरा चेहरा भ्रष्टों को प्रश्रय देने वाला सामने आया है।

प्रधानमंत्री के इस नरम रवैए से कांग्रेस, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और खुद डाॅक्टर मनमोहन सिंह की छवि जमीन पर आ चुकी है। इसका सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष उदहारण अन्ना हजारे का आंदोलन था। अन्ना के आंदोलन से सरकार हिल गई। अन्ना ने लोकपाल विधेयक की तान छेड़ी है। सच है कि जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि जिसे वह जनादेश देती है अगर वह उसकी उम्मीदों पर खरा न उतरे तो उसे वापस बुलाने का अधिकार उसे होना चाहिए। अगर एसा हुआ तो पारदर्शिता आ सकती है। अन्ना हजारे द्वारा उठाए गए मुद्दों पर पहले भी काफी शोर शराबा हो चुका है। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने इस बात का समर्थन किया था कि जनता को अपने प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार होना ही चाहिए।

स्वतंत्र भारत में सत्तर के दशक के बाद भ्रष्टाचार का केंसर तेजी से बढ़ा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी ने खुद ही इस बात को स्वीकारा था कि केंद्र द्वारा दी गई इमदाद के एक रूपए में से महज पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं। उस दर्मयान एक लतीफा बहुत ही चला था। केंद्र की मदद को बर्फ की संज्ञा दी गई थी, जो एक हाथ से दूसरे हाथ जाने तक पिछलती रहती है। और जब अंतिम हाथ में पहुंचती है और उसे खर्च करने के लिए जब वह सोचता है तब तक वह पूरी ही घुल जाती है।
इस संदर्भ में मध्य प्रदेश मंे उप सचिव रहे स्व.आर.के.तिवारी दद्दा द्वारा उद्यत एक प्रसंग का जिकर लाजिमी होगा। दद्दा ने बतायाकि उन्होंने त्रि स्तरीय पंचायती राज की व्याख्या स्व.राजीव गांधी के समक्ष कुछ इस तरह की थी। सूबाई व्यवस्था में तीन स्तर पर काम होता है। पहला सचिवालय जिसे अंग्रेजी में सेक्रेटरिएट कहते हैं, यहां सब कुछ सीक्रेट है, अर्थात हो सकता है आपका काम पांच लाख में हो जाए या फिर एक बोतल शराब में, इसे दद्दा सेक्रेटरिएट के बजाए सीक्रेटरेटकहा करते थे। दूसरा है संचालनालय अर्थात डायरेक्ट रेट, यहां सब फिक्स है दो परसेंट लगेगा मतलब दो परसंेट न कम न ज्यादा। पंचायती राज का तीसरा स्तर है जिलों में जिलाध्यक्ष कार्यालय जिसे कलेक्ट रेटकहते हैं अर्थात जो कुछ आया उसे कलेक्ट करना।
आज देश के हर राज्य में कमोबेश यही आलम है। वहीं देश के प्रधानमंत्री डाॅक्टर मनमोहन सिंह ध्रतराष्ट्र की भूमिका में शांति के साथ जनता को लुटने दे रहे हैं। प्रधानमंत्री का दोहरा चरित्र देखकर आश्चर्य ही होता है। वजीरे आजम राज्य सभा से हैं, एवं आम धारणा बन चुकी है कि बिना जनाधार वाले लोग ही राज्य सभा की बैसाखी से संसदीय सौंध तक जाने का मार्ग चुनते हैं, ये रीढ़ विहीन होते हैं। अब समय आ चुका है प्रधानमंत्री को सारे मिथक तोड़ने ही होंगे, उन्हंे कठोर और अप्रिय कदम उठाने ही होंगे, इस देश की नंगी भूखी जनता की चीत्कार सुनना ही होगा, वरना आने वाले समय में जो परिदृश्य बनेगा वह अद्भुत और अकल्पनीय तौर पर भयावह ही होने की उम्मीद है।

नक्सल काडर का प्रशिक्षण स्थल बना बालाघाट!


नक्सलियों की चहलकदमी ने उड़ाई केंद्र की नींद

छत्तीसगढ़ में बनाई अपनी 11वीं कंपनी

मध्य प्रदेश में सात दर्जन से अधिक नक्सलियों के घुसने की आशंका

नक्सल काडर का प्रशिक्षण स्थल बना बालाघाट!

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ में नक्सली पदचाप ने एक बार फिर केंद्र सरकार की नींद में खलल डाल दिया है। खुफिया तंत्र को मिली सूचना के मुताबिक नक्सलियों ने छग मंे अपनी ग्यारहवीं कंपनी तैयार कर ली है। पुलिस महानिरीक्षक की तैनाती के बावजूद भी नक्सली अपने कैडर के प्रशिक्षण के लिए मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिले बालाघाट को मुफीद समझ रहे हैं।

खुफिया तंत्र के सूत्रों का कहना है कि नक्सलवादी अपनी सोची समझी रणनीति के तहत अब बियावान जंगलों से निकलकर शहरों में अपना नेटवर्क मजबूत करने की कवायद में जुट गए हैं। छत्तीसगढ़ में हाल ही में चार वारदातों को अंजाम देकर नक्सलियों ने अपने इरादे जग जाहिर कर दिए हैं।

सूत्रों के मुताबिक छत्त्ीसगढ़ के राजनांदगांव और महाराष्ट्र सीमा के गढ़ चिरोली जिलों में एक के बाद एक धमाकों में दोनों ही राज्यों में सक्रिय नक्सलवादियों का आपस में सामंजस्य स्थापित होने की खबरें हैं। वहीं दूसरी ओर नक्सल प्रभावित जिलों में स्थानीय पुलिस बल और अर्ध सैनिक बलों के बीच तालमेल का अभाव भौगोलिक परिस्थितियों का न समझ पाना भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। इसी बीच नक्सलियों की 11वीं कंपनी की स्थापना की खबर ने खुफिया तंत्र की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलका दी हैं। सूत्रों का कहना है कि यद्यपि इसमें नक्सलियों की तादाद काफी कम है फिर भी नक्सलियों की सक्रियता के चलते इसमें भारी मात्रा में स्थानीय युवा सदस्यों के जुड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से 80 से अधिक नक्सलियों की लांजी और बैहर में आमद के संकेत मिले हैं। गौरतलब है कि बालाघाट में टांडा और मलाजखण्ड दलम पहले से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो नक्सलवादियों ने बालाघाट में अपना ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया है, जिसमें प्रशिक्षण लेने बड़ी तादाद में नए जुड़े नक्सली आ रहे हैं।

गौरतलब होगा कि संयुक्त मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ के प्रथक होने से पूर्व) में बालाघाट और मण्डला में नक्सली गतिविधियों के मद्देनजर पुलिस महानिरीक्षक का पद सृजित किया गया था, जिसका मुख्यालय बालाघाट से लगभग ढाई सौ तो मण्डला से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर जबलपुर में रखा गया था, बाद में इसे बालाघाट स्थानांतरित कर दिया गया है। आईजी नक्सल जोन की तैनाती के बावजूद भी बालाघाट में नक्सली प्रशिक्षण केम्प के संचालन की खबरें आश्चर्यजनक ही कही जाएंगी। इसके पहले मध्य प्रदेश के तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की नक्सलियों ने उनके निवास पर ही नृशंस तरीके से गला रेतकर हत्या कर दी थी।

उमा का पीछा करते शिवराज


उमा का पीछा करते शिवराज

जहां जहां उमा भारती जा रहीं हैं वहां वहां शिवराज दे रहे दस्तक

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के वर्तमान और पूर्व निजाम के बीच चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती जहां जहां जा रही हैं, वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान वहीं वहीं अपनी आमद दे रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व उमा भारती दिल्ली स्थित मध्य प्रदेश भवन में रूकीं थीं, दूसरे ही दिन शिवराज सिंह चैहान भी वहां आ धमके थे।

उस वक्त उमा भारती ने राजनैतिक बिसात छोड़कर गंगा का दामन थाम गंगा की सफाई के लिए अनशन करने की बात कही थी। उमा भारती ने अपने कौल को निभाते हुए उत्तराखण्ड के हरिद्वार जाकर अपना अनशन प्रारंभ किया। रविवार को उमा भारती ने गंगा हर की पौड़ी में गंगा में डुबकी लगाकर गंगा की रक्षा के लिए बलिदान देने का अपना संकल्प दुहराया। वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान अपने परिवार के साथ चार धाम की यात्रा पर निकल पड़े और रविवार को ही शिवराज ने हरिद्वार में व्हीआईपी घाट पर जाकर गंगा में डुबकी लगाई।

सियासी हल्कों में उमा भारती और शिवराज सिंह चैहान का बार बार अलग अलग स्थानों पर एक साथ पहुंचना महज संयोग की दृष्टि से नहीं देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि उमा भारती की भाजपा में वापसी के प्रबल विरोधी शिवराज सिंह चैहान द्वारा उनके हर पदचाप को बाद में पहुंचकर मिटाया जा रहा है।

फिर लग सकती है पेट्रोल में आग!


फिर लग सकती है पेट्रोल में आग!

कच्चे तेल के सस्ते होने पर भी कंपनियां हैं घाटे में

जीओएम 9 जून को तय करेगा बढ़ोत्तरी

(लिमटी खरे)

नई दिल्ली। तैयार रहिएगा, सरकार जल्द ही पेट्रोल के दाम और बढ़ा सकती है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ़ने पर घाटे का हवाला देकर पेट्रोल के दाम बढ़ाने वाली तेल कंपनियां अब कच्चे तेल के दाम कम होने पर भी पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने की दुहाई ही दे रही हैं।
गौरतलब होगा कि जब कच्चे तेल की कीमत 75 डालर प्रति बैरल थी तब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 110 डालर प्रति बैरल है, जो अप्रेल माह में 120 डालर तक पहुंच गई थी। इसी कारण पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए थे और डीजल, केरोसीन तथा रसोई गैस के दाम बढ़ाने की तैयारियां थीं। हालिया जानकारी के अनुसार प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली उच्च अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह की बैठक नौ जून को प्रस्तावित है जिसमें इसकी कीमत पर कोई निर्णय लिए जाने की उम्मीद है।
उधर इंडियन आयल कार्पोरेशन के सूत्रों का कहना है कि मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय दरांे के कारण उसे हर रोज 261 करोड़ रूपयों का नुकसान झेलना पड़ रहा है। सूत्रों का कहना है कि वर्तमान में कंपनी को पेट्रोल पर 4 रूपए 58 पैसे, डीजल पर 14 रूपए 66 पैसे, मिट्टी के तेल पर 28 रूपए 27 पैसे प्रति लिटर तो रसाई गैस पर 330 रूपए प्रति सिलेंडर का घाटा उठाना पड़ रहा है। कंपनी की उधारी अब तक 67 हजार 880 करोड़ रूपए हो गई है जिस पर कंपनी को 1500 करोड़ का ब्याज भी चुकाना पड़ रहा है।