मंगलवार, 3 जनवरी 2012

क्यों झूठ बोल रहा है संयंत्र प्रबंधन?


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . . 43

क्यों झूठ बोल रहा है संयंत्र प्रबंधन?

क्या कार्यकारी सारांश मायने नहीं रखता सरकार के लिए?



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। लगता है मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी और केंद्र की कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के लिए किसी भी कंपनी के द्वारा संयंत्र लगाने के लिए आवश्यक कागजी खानापूरी मायने नहीं रखती है। कागजों पर गंभीर गल्तियों के बाद भी भाजपा और कांग्रेस की सरकारों द्वारा विकास के नाम पर आदिवासियों को न केवल छला जा रहा है वरन् उद्योगपतियों को जमकर लाभ पहुंचाया जा रहा है।
मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा केंद्र सरकार की छटवीं अनुसूची में अधिसूचित मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील में स्थापित किए जाने वाले कोल आधारित पावर प्लांट ने अनियमितताओं की सारी वर्जनाएं पार कर ली हैं। वहीं इसकी पहरेदारी के लिए पाबंद मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इसकी मश्कें कसने के बजाए इसकी थाप पर ही मुजरा किया जा रहा है।
दो चरणों में डाले जाने वाले इस संयंत्र के अलग अलग कार्यकारी सारांश में जबर्दस्त तरीके से भिन्नताएं होने के बाद भी न तो मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मण्डल और ना ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी ही इसे पकड़ सके हैं। मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा लगाए जाने वाले इस पावर प्लांट के पहले चरण की जनसुनवाई 22 अगस्त 2009 को संपन्न हुई थी। इस दौरान संयंत्र प्रबंधन द्वारा जमा कराए गए कार्यकारी सारांश में दी गई जानकारी और इसके उपरांत 22 नवंबर 2011 को संपन्न दूसरे चरण की लोकसुनवाई में दी गई जानकारी में काफी अंतर है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार इसमें अक्षांश, देशांस में ही काफी अंतर है। इसके साथ ही साथ नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे की दूरी में काफी अंतर बताया जा रहा है। इसके पहले चरण के कार्यकारी सारांश में समीपस्थ रेल्वे स्टेशन की दूरी महज डेढ़ किलोमीटर तो दूसरे चरण में यह दूरी एक किलोमीटर हो गई है। ये सारी बातें अधिकारियों के संज्ञान में लाए जाने के बाद भी अधिकारी मौन साधे बैठे हैं। कहा जा रहा है कि औपचारिकता पूर्ण करने के लिए संयंत्र प्रबंधन द्वारा कार्यकारी सारांश इस तरह आनन फानन में जमा करवा दिया गया है।
संयंत्र के प्रथम चरण में समीपस्थ ग्राम बरेला एक किलोमीटर दूर तो दूसरे चरण में समीपस्थ ग्राम गोरखपुर हो गया है जो संयंत्र स्थल से छः सौ मीटर दूर स्थित होना दर्शाया जा रहा है। निकटतम शहर घंसौर की दूरी भी नौ किलोमीटर से घटकर दूसरे चरण में साढ़े आठ किलोमीटर ही बची है।
सबसे अधिक आश्चर्य तो मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर की संयंत्र से दूरी को देखकर होने लगता है। पहले चरण की लोकसुनवाई के दौरान संयंत्र प्रबंधन द्वारा जमा कराए गए कार्यकारी सारांश में निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर में अस्सी किलोमीटर दूर बताया गया है जो दूसरे चरण में घटकर पचास किलोमीटर हो गया है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर संयंत्र कहां लगाया जा रहा है। जिस जगह संयंत्र लगाया जा रहा है, उससे दूरियों में गफलत के पीछे कहीं कुछ न कुछ कुत्सिक मानसिकता या प्रयोजन अवश्य ही हो सकता है।

(क्रमशः जारी)

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