शनिवार, 3 मार्च 2012

संगठन को ताक पर रख शुक्ला ने रखी थापर की चिमनी की आधारशिला!


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . .  76]

संगठन को ताक पर रख शुक्ला ने रखी थापर की चिमनी की आधारशिला!

स्थानीय विधायक और जिला संगठन को दिखाया झाबुआ पावर ने ठेंगा!

भाजपा में दो फाड़ करवाने की जुगत में थापर



(महेंद्र सोलंकी)

घंसौर जिला सिवनी (साई)। मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से महज सौ किलोमीटर दूर सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर विकासखण्ड के ग्राम बरेला में लगभग 6800 करोड़ रूपए की लागत से बनने वाले कोल आधारित पावर प्लांट के प्रथम चरण में निर्माणाधीन 275 मीटर (लगभग एक हजार फिट उंची चिमनी) एवं अन्य कामों की आधारशिला मध्य प्रदेश सरकार के उर्जा और खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने शनिवार को अपरान्ह रखी। इस कार्यक्रम में भाजपा की स्थानीय विधायक श्रीमति शशि ठाकुर सहित जिला भाजपा की अनुपस्थिति खासी चर्चा का विषय बनी रही।
उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल शनिवार अपरान्ह हेलीकाप्टर से बरेला स्थित पावर प्लांट के संयंत्र स्थल पहुंचे। संयंत्र स्थल पर जाकर उन्होंने संयंत्र प्रबंधन द्वारा पूर्व निर्धारित लगभग 1000 फिट उंची चिमनी एवं प्रेशर पार्ट इक्यूपमेंट की अधारशिला रखी। इसके अलावा उर्जा मंत्री ने संयंत्र स्थल पर वृक्षारोपण भी किया। गौरतलब है कि संयंत्र प्रबंधन पर आदिवासियों की उपेक्षा और पर्यावरण मानकों का माखौल उड़ाने के संगीन आरोप लग रहे हैं।
यहां यह उल्लेखनीय है कि इस कार्यक्रम में स्थानीय विधायक श्रीमति शशि ठाकुर सहित मध्य प्रदेश में सत्ता पर काबिज भाजपा के जिला संगठन के पदाधिकारी नदारत थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा सरकार के इस कथित विकास के आयाम जुड़ने के दरम्यान स्थानीय विधायक श्रीमति शशि ठाकुर इस जबलपुर में किसी कार्यक्रम में व्यस्त रहीं। इतना ही नहीं जिला भाजपा संगठन के पदाधिकारी भी इस कार्यक्रम में उपस्थित नही रहे, जिसे लेकर तरह तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं।
मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा आदिवासी बाहुल्य घंसौर विकास खण्ड के ग्राम बरेला में स्थापित होने वाले इस संयंत्र में अनेक अनियमितताओं की शिकायत के बाद भी संयंत्र प्रबंधन द्वारा जिस तरह से सरकार को साधकर स्थानीय विधायक और जिला भाजपा की उपेक्षा की जा रही है उसे लेकर माना जा रहा है कि गौतम थापर द्वारा जिला भाजपा और स्थानीय विधायक को उपेक्षित कर भाजपा में दो फाड़ करने का प्रयास किया जा रहा है।
मौके पर जब मीडिया ने इस बात को उर्जा मंत्री राजेन्द्र शुक्ल के संज्ञान में यह बात लाई गई तो बात को लगभग संभालते हुए उन्होंने कहा कि यह उनकी बिजनिस विजिट थी और इस संबंध में संगठन के पदाधिकारियों से उनकी चर्चा हुई है और भविष्य में संयंत्र में होने वाले कार्यक्रमों में संगठन की महती भूमिका रखी जाएगी। भाजपा सरकार द्वारा संगठन की जबर्दस्त उपेक्षा के परिणाम भविष्य में अगर भाजपा को देखने को मिलें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
भाजपा की उपेक्षा सरकार द्वारा इस कदर की गई कि स्थानीय पदाधिकारियों द्वारा भी इस कार्यक्रम का लगभग बहिष्कार ही किया। कार्यकर्ताओं के रोष और असंतोष का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संयंत्र प्रबंधन द्वारा क्षेत्र के आदिवासी बहुल्य समुदाय के बच्चों के लिए प्राईमरी, मिडिल, हाई या हायर सेकेन्डरी स्कूल खोलने के स्थान पर औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) में चालीस सीटें आरंभ कराई गईं हैं, के उद्यघाटन का कार्यक्रम कार्यकर्ताओं के विरोध के चलते रद्द करना पड़ा।

(क्रमशः जारी)

द्विवेदी, माकोड़े की सेवाएं कांट्रेक्ट पर लेगा जनसंपर्क


द्विवेदी, माकोड़े की सेवाएं कांट्रेक्ट पर लेगा जनसंपर्क

सरकार के बजाए संगठन की सेवा से उपकृत हो रहे सेवानिवृत अधिकारी



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। शिवराज सिंह चौहान को सरकार की छवि बनाने के लिए पाबंद जनसंपर्क विभाग के मौजूदा अधिकारियों के बजाए सेवानिवृत अधिकारियों पर ज्यादा भरोसा नजर आ रहा है। यही कारण है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अधिकारियों का मोह सरकार नहीं छोड़ पा रही है। दिल्ली स्थित राज्य सूचना केंद्र से सेवानिवृत हुए संयुक्त संचालक सुरेंद्र कुमार द्विवेदी को अब जनसंपर्क विभाग में एक साल के लिए कांट्रेक्ट पर लेने की कवायद की जा रही है।
मध्य प्रदेश जनसंपर्क विभाग के आला दर्जे के सूत्रों का कहना है कि शिवराज सिंह चौहान सरकार की छवि चमकाने के बजाए भाजपा संगठन और विशेषकर मध्य प्रदेश भाजपा के निजाम प्रभात झा की चाकरी में ज्यादा समय बिताने वाले अधिकारियों को उपकृत करने की कवायद की जा रही है।
गौरतलब है कि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के मंहगे व्यवसायिक इलाके कनाट सर्कस के बाबा खड़क सिंह मार्ग पर  स्थित मध्य प्रदेश सरकार के सूचना केंद्र के प्रभारी रहे सुरेंद्र कुमार द्विवेदी के कार्यकाल में सूचना केंद्र पर अघोषित तौर पर भाजपा कार्यालय बनने के आरोप मीडिया में जब तब लगते रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली में मध्य प्रदेश बीट कव्हर करने वाले पत्रकारों को सूचना केंद्र द्वारा सुविधाएं सहूलियत देने के बजाए भाजपा के सांसद और विधायकों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा गया था।
आरोप तो यहां तक भी हैं कि मध्य प्रदेश सरकार से अपात्र लोगों को अधिमान्यता की अनुशंसा भी सूचना केंद्र के तत्कालीन प्रभारी सुरेंद्र कुमार द्विवेदी द्वारा की गई है। चर्चा है कि चहेतों को रेवड़ी बांटने के चक्कर में सूचना केंद्र प्रभारी द्विवेदी द्वारा अपात्र लोगों को मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग से अधिमान्यता करवा दी गई। वहीं दूसरी ओर असल और पात्र मीडिया कर्मियों की अधिमान्यता के बारे में श्री द्विवेदी ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
दिल्ली में मध्य प्रदेश बीट कव्हर करने वाले पत्रकार उस वक्त हैरान रह जाते जब किसी मंत्री या मुख्यमंत्री की पत्रकार वार्ता की सूचना उन्हें दूसरे दिन समाचार पत्रों के माध्यम से उनके जाने के उपरांत मिलती। कहा जाता है कि भाजपा मानसिकता वाले मीडिया कर्मियों को ही सूचना केंद्र द्वारा पूरी तवज्जो, सहूलियत और सुविधाएं प्रदान की जाती रही हैं।
चर्चाएं तो यहां तक हैं कि श्री द्विवेदी के कार्यकाल में मध्य प्रदेश सूचना केंद्र द्वारा मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की छवि निखारने, सरकार की योजनाओं की जानकारी देने के बजाए इसे अघोषित तौर पर भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठनों के क्रिया कलापों के प्रचार प्रसार का अड्डा बना दिया गया था।
भाजपा संगठन के सूत्रों का कहना है कि सरकार के बजाए संगठन की सेवा के सम्मान के पारितोषक के बतौर सुरेंद्र कुमार द्विवेदी को सेवानिवृत्ति के पहले ही उपकृत करने का ताना बाना बुना जाने लगा। सूत्रों के अनुसार पहले श्री द्विवेदी को माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्व विद्यालय में भेजने की कवायद की गई किन्तु उनके भारी विरोध के चलते यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी।
सूत्रों ने बताया कि इसके बाद संगठन के दबाव में सरकार ने सेवानिवृत्त संयुक्त संचालक सुरेंद्र कुमार द्विवेदी को दिल्ली स्थित संसदीय प्रकोष्ठ का प्रभारी नियुक्ति करने का मन बनाया। इस बार भी उनके मंसूबे इसलिए कामयाब नहीं हो पाए चूंकि यह सरकारी पद था और इसमें कांग्रेस के एक कद्दावर सांसद ने अपना पुरजोर विरोध दर्ज करवा दिया था।
सूत्रों ने बताया कि सरकार के बजाए संगठन पर ज्यादा ध्यान देने के उपहारस्वरूप अब भाजपा संगठन द्वारा शिवराज सिंह चौळान पर श्री द्विवेदी की सेवाएं जनसंपर्क विभाग द्वारा कांट्रेक्ट पर लेने की सैद्धांतिक सहमति बना दी गई है। सूत्रों ने कहा कि जल्द ही दिल्ली स्थित सूचना केंद्र के सेवानिवृत्त संयुक्त संचालक सुरेंद्र कुमार द्विवेदी एवं भोपाल के श्री माकोड़े की सेवाएं मध्य प्रदेश सरकार का जनसंपर्क विभाग एक साल के लिए कांट्रेक्ट पर लेने जा रहा है। सूत्रों की मानें तो श्री द्विवेदी की सेवाएं दिल्ली स्थित जनसंपर्क विभाग के सूचना केंद्र और श्री माकोड़े की सेवाएं भोपाल में ली जाएंगी।

(क्रमशः जारी)


बजट तक शायद चलें मनमोहन. . . 
98

मध्यावधि चुनावों की तैयारी में जुटे पुलक चटर्जी

अचानक ही तेवर तल्ख हो गए हैं बाबू मोशाय के

संजय गांधी की पसंद थे पुलक बाबू


(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। देश के सबसे ताकतवर कार्यालय के सिरमोर बन चुके उत्तर प्रदेश काडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1974 बैच के वरिष्ठ अधिकारी पुलक चटर्जी इन दिनों मध्यावधि चुनावों की तैयारियों में व्यस्त दिख रहे हैं। पीएमओ में उनके तेवर और भाव भंगिमाएं काफी सख्त ही नजर आ रही हैं। चटर्जी के मशविरे पर वज़ीरे आज़म डॉ.मनमोहन सिंह ने भी मध्यावधि चुनाव का मन बना लिया है।
प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि पुलक चटर्जी ने सभी मंत्रालयों पर मश्कें कसना आरंभ कर दिया है। पुलक चटर्जी इस समय आधारभूत अधोसंरचना वाले मंत्रालय विशेषकर उर्जाकोयलाभूतलशिपिंगखननसामाजिक न्यायपर्यावरणवाणिज्य आदि पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। चटर्जी ने साफ तौर पर कहा दिया है कि सभी मंत्रालय अपना अपना लक्ष्य निर्धारित समय सीमा में पूरा कर लें।
सूत्रों ने आगे कहा कि मूलतः उत्तर प्रदेश काडर के आईएएस पुलक चटर्जी ने साफ तौर पर अधिकारियों को हिदायत दे दी है कि अगर वे निर्धारित समय सीमा में काम पूरा नहीं कर सकते हैं तो बेहतर होगा वे त्यागपत्र दे दें। पिछले माह के दूसरे पखवाड़े में पुलक चटर्जी ने सचिव स्तर की बैठक में भी अधिकारियों को आड़े हाथों लिया था।
उधरकांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि पुलक चटर्जी के तेवरों में बदलाव इसलिए आया है क्योंकि पिछले दिनों सोनिया गांधी ने उन्हें कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के लिए रोड़मेप तैयार करने के निर्देश दिए थे। अब मध्यावधि चुनाव किन परिस्थितियों में होगा इस बारे में सूत्रों ने कोई खुलासा नही किया है।
मध्य प्रदेश काडर के आईएएस अलका सिरोहीके.एम.आचार्यसुषमा नाथराघवेंद्र सिंह सिरोहीराकेश बंसल और रंजना चौधरी के बैच के अधिकारी पुलक चटर्जी की खोज अस्सी के दशक में संजय गांधी द्वारा ही की गई थी। बताते हैं कि अस्सी के दशक में संजय गांधी को सुल्तानपुर के लिए एक अदद जिला दण्डाधिकारी (डीएम) की तलाश थी। उस वक्त सूबे के तत्कालीन निजाम विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पुलक चटर्जी को सुल्तानपुर का डीएम बनाने की सिफारिश की।
पुलक चटर्जी कभी संजय गांधी से नहीं मिल सके किन्तु पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के अमेठी आने के बाद भी चटर्जी का नेहरू गांधी परिवार से नाते का पौधा कब वटवृक्ष बन गया पता ही नहीं चला। राजीव गांधी के साथ पीएमओराजीव गांधी फाउंडेशन और सोनिया के आफिस में काम करने के बाद पुलक आज पीएमओ की नाक का बाल बने हुए हैं।

(क्रमशः जारी)

सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा पहुंचा कोर्ट


सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा पहुंचा कोर्ट

(शरद खरे)

नई दिल्ली (साई)। कांग्रेस और उसकी नेशनल प्रेजीडेंट श्रीमति सोनिया गांधी की मुसीबतें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं। सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा एक बार फिर सर उठाता दिख रहा है। इस बार सोनिया के विदेशी मूल के मामले को उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया है।
याचिका में सवाल किया गया है कि क्या विदेशी मूल का कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक पद पर आसीन हो सकता है। न्यायमूर्ति एच एल दत्तू और न्यायमूर्ति सी के प्रसाद ने इस मुद्दे की सुनवाई को तेजी से किये जाने का समर्थन किया जिसे एक सामाजिक राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने उठाया है।
मोर्चा ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी जिसने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया था। इसमें कहा गया था कि इटली मूल की होने के नाते वह किसी भी संवैधानिक पद को संभालने की हकदार नहीं हैं।
अपनी याचिका में आरएमएम ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि वर्ष 1999 में राजग सरकार द्वारा संसद में विश्वास मत खो देने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को केंद्र में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। शीर्ष न्यायालय ने इस मुद्दे पर अप्रैल 2007 में केंद्र और और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था। इस बीच केंद्र ने अभी तक कोई शपथ पत्र दाखिल नहीं किया है और शीर्ष अदालत से इसको अंतिम सुनवाई के लिए रखने को कहा है। चुनाव आयोग ने कहा था कि जो केंद्र का दृष्टिकोण होगा वहीं उनका भी दृष्टिकोण होगा।

टूजी मामले की समीक्षा की गुहार


टूजी मामले की समीक्षा की गुहार

(प्रियंका श्रीवास्वत)

नई दिल्ली (साई)। केंद्र सरकार ने टू-जी स्पेक्ट्रम के एक सौ २२ लाइसेंसों को रद्द करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले की समीक्षा के लिए याचिका दायर की है। सरकार ने टू-जी स्पेक्ट्रम के आबंटन में पहले आओ, पहले पाओ की नीति अपनाने को असंवैधानिक करार देने पर भी सवाल उठाया है। याचिका में कहा गया है कि न्यायालय ने ऐसे क्षेत्र में प्रवेश किया है, जो बिल्कुल कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और जो न्यायिक समीक्षा की सीमा से बाहर है।
समीक्षा याचिका में कहा गया है कि स्पेक्ट्रम सहित सभी प्राकृतिक संसाधनों का आबंटन केवल नीलामी के जरिये करने का न्यायालय का आदेश संविधान में वर्णित अधिकारों के बंटवारे के सिद्धांत के विपरीत है। कोई विवेकपूर्ण प्राधिकरण सभी मामलों में ऐसा नहीं कर सकता। प्राकृतिक संसाधन सबसे अधिक बोली लगाने वाले को दिये जाने चाहिए।
सरकार ने कहा कि टू-जी स्पेक्ट्रम लाइसेंसों को रद्द करने का २ फरवरी के आदेश की समीक्षा जरूरी है, क्योंकि इसमें कई गलतियां हैं। न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली की पीठ द्वारा दिये गए फैसले की समीक्षा के लिए और भी पर्याप्त कारण हैं। सरकार ने नीति सम्बन्धी फैसले में हस्तक्षेप करने के लिए भी उच्चतम न्यायालय पर सवाल उठाये हैं और कहा है कि नीति के बारे में फैसला स्थापित कानून के विपरीत है।
उधर, पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने टू-जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंसों को रद्द करने के बारे में उच्चतम न्यायालय के फैसले की समीक्षा करने की मांग की है। राजा ने आज न्यायालय से कहा कि लाइसेंसों को रद्द किया जाना सामान्य न्याय और न्यायिक तौर-तरीकों के सिद्धांत का उल्लंघन है, क्योंकि उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिये बिना, दोषी ठहराया गया है। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ फैसले के निष्कर्ष से, टू-जी स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाले मामले में उनका बचाव पक्ष प्रभावित हो सकता है। राजा इस मामले में एक साल से अधिक समय से जेल में हैं।

बेदी बने फर्जी मुठभेड़ जांच समिति के अध्यक्ष


बेदी बने फर्जी मुठभेड़ जांच समिति के अध्यक्ष

(यशवंत श्रीवास्तव)

नई दिल्ली (साई)। उच्चतम न्यायालय ने पूर्व न्यायाधीश एच.एस. बेदी को गुजरात में २००२ से २००६ के बीच कथित फर्जी मुठभेड़ों में २२ लोगों के मारे जाने के मामलों की जांच के लिए गठित निगरानी प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया है। उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि न्यायालय ने मानवाधिकार मामले पर किसी एक को चुना है और यही मानदंड अन्य राज्यों में इस तरह के मामलों के लिए नहीं अपनाया है।
न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने कहा कि अगर अन्य राज्यों से मानवाधिकार हनन के मामले उसके सामने लाये जाते हैं तो उतनी ही तत्परता से उन पर भी कार्रवाई की जायेगी। न्यायालय ने कहा कि वह चाहता है कि इन मामलों की जांच की निगरानी कोई ऐसा व्यक्ति करे, जिसकी निष्ठा पर किसी तरह का कोई संदेह न हो।
न्यायालय ने अध्यक्ष की नियुक्ति का मुद्दा तय करने की समय सीमा १२ मार्च तक बढ़ाने का सरकार का अनुरोध भी नामंजूर कर दिया। पीठ ने कहा कि निगरानी प्राधिकरण तीन महीने में अंतरिम रिपोर्ट दे देगा। माना जा रहा है कि बेदी के अध्यक्ष बनने के बाद जांच में तेजी आ सकती है।

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

उर्जा मंत्री आज करेंगे बरेला में चिमनी का उद्यघाटन!


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . .  75

उर्जा मंत्री आज करेंगे बरेला में चिमनी का उद्यघाटन!

जनप्रतिनिधियों को खबर नहीं थापर दिखा सकते हैं कमाल



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। मध्य प्रदेश सरकार के ऊर्जा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राजेन्द्र शुक्ल 3 मार्च को हेलीकाप्टर से सिवनी जिले के ग्राम बरेला, सागर जिले के ग्राम सिरचोपी पहुँचकर वहाँ स्थापित होने वाली ताप विद्युत परियोजनाओं का स्थल-भ्रमण करेंगे। श्री शुक्ल डेव्हलपर के साथ परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा भी करेंगे। श्री शुक्ल शाम को भोपाल लौट आयेंगे। उक्ताशय की जानकारी मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी की गई है। महज चार लाईन के भ्रमण कार्यक्रम से मंत्री का भ्रमण चर्चाओं में आ गया है।
उधर, उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ला के करीबी सूत्रों का कहना है कि उर्जा और खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य विकासखण्ड घंसौर के ग्राम बरेला में मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा निर्माणाधीन 1200 मेगावाट के कोल आधारित पावर प्लांट के संयंत्र का निरीक्षण करेंगे। सूत्रों ने यह भी कहा कि संयंत्र प्रबंधन ने मंत्री ने निर्माण कार्यों की आधारशिला रखने का आग्रह भी किया गया है। सूत्रों की मानें तो उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल द्वारा इस आग्रह को स्वीकार कर लिया गया है।
बरेला स्थित पावर प्लांट के संयंत्र के महाप्रबंधक श्री मिश्रा ने दूरभाष पर चर्चा के दौरान कहा कि उन्हें प्रशासन की ओर से यह जानकारी मिली है कि खनिज और उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल तीन मार्च प्रातः साढे ग्यारह बजे हेलीकाप्टर से बरेला पहुंचेगे, जहां वे संयंत्र के निर्माण कार्यों का रिव्यू करेंगे। श्री मिश्रा ने कहा कि उर्जा मंत्री के भ्रमण के दौरान जिन जिन कामों को जल्द ही आरंभ करवाना है उनकी आधारशिला भी लगे हाथ रखवा दी जाएगी। उन्होंने कहा कि संयंत्र की 275 मीटर (लगभग एक हजार फिट) उंची चिमनी की आधारशिला भी शनिवार को उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल के हस्ते रखवा दी जाएगी।
वहीं चर्चाओं के अनुसार उर्जा मंत्री के इस भ्रमण या आधारशिला के प्रोग्राम की खबर स्थानीय विधायक सांसद सहित सिवनी जिले के जनप्रतिनिधियों को नहीं दी गई है। गौरतलब है कि आदिवासियों के छले जाने और पर्यावरण मानकों को ताक पर रखने की खबरें धीरे धीरे सार्वजनिक हो रहीं हैं। यह मामला मध्य प्रदेश के एक सांसद सहित सिवनी बालाघाट के भाजपा सांसद केशव दयाल देशमुख द्वारा भी लोकसभा में उठाए जाने की बात कही गई है।
कहा जा रहा है कि इससे संयंत्र प्रबंधन सकते में है। संभवतः यही कारण है संयंत्र प्रबंधन ने अपने उंचे राजनैतिक रसूख का उपयोग कर आनन फानन संयंत्र में निर्माण कार्यों की आधार शिला रखवाने का काम प्रदेश सरकार के मंत्री के हाथों करवाना आरंभ कर दिया है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि बरेला में मंत्री के उड़न खटोले (हेलीकाप्टर) के लिए जो हेलीपेड बनाया गया है उसका भोगमान भी संयंत्र प्रबंधन द्वारा ही भोगा गया है। क्षेत्र में भाजपा सरकार के मंत्री से इस तरह के काम गुपचुप तरीके से करवाने की प्रतिक्रियाएं अच्छी नहीं कही जा सकती हैं।

(क्रमशः जारी)


बजट तक शायद चलें मनमोहन. . . 97

चमक रहा है त्रिवेदी का चेहरा

मणिशंकर परा डोरे डाल रहीं हैं ममता



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर पर त्रणमूल कांग्रेस की निगाहें गड़ रही हैं। बड़बोलेपन के कारण कांग्रेस के आला नेताओं की आंखों की किरकिरी बन चुके अय्यर इन दिनों इस खुर्दबीनी में लगे हैं कि त्रणमूल कोटे से रेल मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी कब तक अपनी आसनी (कुर्सी) बचा पाते हैं। उधर, त्रणमूल के नेता खुद ही त्रिवेदी और ममता बनर्जी के बीच के रिश्तों को सुधारने की खबरों को हवा दे रहे हैं।
कांग्रेस और त्रणमूल कांग्रेस के बीच चल रही रस्साकशी और बयानबाजी से लगने लगा था कि बजट के आसपास ममता बनर्जी अपने मंत्रियों को सरकार से बाहर कर लेंगी। उधर, कांग्रेस भी ममता के विकल्प की तलाश में लगी हुई थी। कांग्रेस के पास मुलायम सिंह यादव का तगड़ा विकल्प उभरकर सामने आया है। ममता के तेवरों से दिनेश त्रिवेदी भी सहमे सहमे नजर आ रहे थे।
रेल मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी बेहद उहापोह में थे कि न जाने कब उन्हें कुर्सी छोड़ने का फरमान जारी कर दिया जाए। घाटे की ओर अग्रसर भारतीय रेल के आला अधिकारियों ने दिनेश त्रिवेदी को मशविरा दिया है कि रेल में यात्री किराया बढ़ाया जाए वरना भारतीय रेल का लोगो बना हाथी भी हाथ में लालटेन के बजाए एयर इंडिया के महाराजा की तरह कटोरा लेकर भीख मांगता नजर आएगा।
त्रणमूल कांग्रेस अचानक ही बैकफुट पर नजर आ रही है। मीडिया में रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी और त्रणमूल कांग्रेस सुप्रीमो सुश्री ममता बनर्जी के बीच अनबन की खबरों के आने के चार पांच माह तक त्रणमूल कांग्रेस ने खामोशी ही अख्तियार कर रखी थी। अचानक ही त्रणमूल के आला नेता सक्रिय नजर आए और उन्होंने ममता और त्रिवेदी के बीच खटास की अफवाहों को सिरे से खारिज करना आरंभ कर दिया।
पिछले दिनों मणिशंकर अय्यर और त्रणमूल नेता सुदीप बंदोपाध्याय के बीच एक घंटे रायशुमारी ने सियासी हल्के में हलचल मचा दी है। कहने को तो यह अनोपचारिक बैठक पिछले तीन सालों से नहीं दिए गए बी.सी.राय अवार्ड के सिलसिले में थी किन्तु जानकार इसके निहितार्थ खोज रहे हैं। मणिशंकर की किचिन कैबनेट से छन छन कर बाहर आ रही खबरों के अनुसार बंदोपाध्याय से चर्चा के दौरान वे पूरे समय इस बात को जानने के इच्छुक रहे कि ममता और दिनेश त्रिवेदी के बीच संबंध कैसे हैं?
सूत्रों ने यह भी बताया कि जब पासा पलटते हुए सुदीप बंदोपाध्याय ने मणिशंकर को यह बताया कि जिस बैरकपोर संसदीय क्षेत्र से कभी मणिशंकर खुद उम्मीदवार हुआ करते थे, उसी सीट से त्रणमूल ने दिनेश त्रिवेदी को उतारा था। बंदोपाध्याय के खुलासे के साथ ही अय्यर को मानो बिच्छू का डंक लग गया हो। उन्होंने आश्चर्य के साथ कहा कि क्या हमारे संसदीय क्षेत्र से दिनेश त्रिवेदी को त्रणमूल ने उतारा!
सूत्रों के अनुसार इस पर सुदीप बंदोपाध्याय ने लोहा गरम देखकर वार करते हुए कहा कि अरे अब आपका संसदीय क्षेत्र कहां बचा है। अगर आप त्रणमूल में होते तो दिनेश त्रिवेदी के स्थान पर आप ही रेल मंत्री होते! सुदीप बंदोपाध्याय ने इशारों ही इशारों में मणीशंकर अय्यर के अंदर खदबदाती भावनाओं को परवान चढ़ा दिया है। अब देखना यह है कि आने वाले समय मणिशंकर कौन सा रास्ता अख्तियार करते हैं।

(क्रमशः जारी)

बृहस्पतिवार, 1 मार्च 2012

सांसद देशमुख उठाएंगे लोकसभा में मामला!


0 घंसौर को झुलसाने की तैयारी पूरी . . .  74

सांसद देशमुख उठाएंगे लोकसभा में मामला!

कलेक्टर से लेंगे मामले की पूरी जानकारी



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। लगभग बीस हजार करोड़ रूपयों की अकूत धनसंपदा के मालिक मशहूर दौलतमंद उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के द्वारा मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य विकास खण्ड घंसौर में स्थापित किए जाने वाले 1200 मेगावाट के कोल आधारित पावर प्लांट में हुई अनियमितताओं के बारे में बालाघाट सिवनी क्षेत्र के जागरूक संसद सदस्य केशव दयाल देशमुख सिवनी के आदिवासियों के हित में लोकसभा में आवाज बुलंद करेंगे।
सांसद के.डी.देशमुख ने दूरभाष पर चर्चा के दौरान उक्ताशय की बात कहते हुए कहा कि उनके संज्ञान में यह बात लाई गई है कि झाबुआ पावर लिमिटेड द्वारा सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर विकास खण्ड में लगाए जाने वाले कोल आधारित पावर प्लांट में अनेक अनियमितताएं की गई हैं, इतना ही नहीं क्षेत्र में आदिवासियों के साथ अन्याय किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि वे जल्द ही इस संबंध में जिला कलेक्टर सिवनी, एसडीएम लखनादौन, घंसौर एवं भाजपा के कार्यकर्ताओं से सारे तथ्यों पर चर्चा कर इसे लोकसभा के बजट सत्र में ही प्रश्न उठाकर आदिवासियों के हितों पर कुठाराघात करने वालों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की मांग करेंगे। सांसद देशमुख ने कहा कि वे अभी संसदीय क्षेत्र बालाघाट जिले के भ्रमण पर हैं और राजधानी भोपाल में भी कुछ प्रोग्राम्स में उन्हें शिरकत करना है अतः एक दो दिन में ही चर्चा पूरी कर इसे पुरजोर उठाने की कार्यवाही करेंगे।
यहां उल्लखनीय है कि सिवनी जिले का आदिवासी बाहुल्य विकास खण्ड घंसौर पूर्व में परिसीमन में विलुप्त हुई सिवनी लोकसभा सीट का अंग था जो अब अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित मण्डला लोकसभा क्षेत्र में शामिल कर दिया गया है। मण्डला संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कांग्रेस के बसोरी सिंह मसराम कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि बसोरी सिंह मसराम खुद अपने ही जात समाज के लोगों के साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने में अपने आप को अक्षम पा रहे हैं।
इस संबंध में चर्चा के लिए जब उनसे संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उनके डिंडोरी जिले के करंजिया विकास खण्ड स्थित ग्राम बोदर में बतौर सांसद उनके निवास पर लगा दूरभाष 07645 - 280161 आउट ऑफ आर्डर और दिल्ली का मोबाईल 9013180232 बंद मिला।
मध्य प्रदेश के बीएसएनएल मोबाईल 9406772333 पर उनके चालक रवि ने बताया कि सांसद के निवास का भारत संचार निगम लिमिटेड का लेण्ड लाईन काफी दिनों से खराब था अतः सांसद बसोरी सिंह ने उसे कटवाकर उसकी सेवाएं समाप्त कर दी हैं। रही बात दिल्ली के मोबाईल की तो, दिल्ली वाले नंबर की सिम गुम गई है, जो सांसद के दिल्ली जाने पर ही दुबारा इशु होगी। उन्होंने कहा कि सांसद अभी अपने गृह ग्राम बोदर में विश्राम कर रहे हैं।

(क्रमशः जारी)

दिग्विजय विरोधी हुए सक्रिय


बजट तक शायद चलें मनमोहन. . . 96

दिग्विजय विरोधी हुए सक्रिय

यूपी के परिणाम तय करेंगे राजा का भविष्य



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। कांग्रेस की नजर में भविष्य के वज़ीरे आज़म राहुल गांधी के अघोषित गुरू राजा दिग्विजय सिंह की मुखालफत करने वाले अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कांग्रेस के अंदर घमासान थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। दिग्विजय सिंह के पतन का इंतजार करने वाले नेताओं ने रणनीति तैयार कर ली है कि अगर यूपी में कांग्रेस के खाते में सौ से कम सीटें मिलीं तो दिग्विजय सिंह पर इसकी गाज गिर सकती है।
कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की जमीनी हालत को देखकर युवराज राहुल गांधी को यूपी में झोंकने आ ओचित्य नहीं था। अगर यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहता है तो निश्चित तौर पर इससे कांग्रेस को नुकसान के साथ ही साथ युवराज राहुल गांधी की साख को बट्टा लगना तय है। जब सारी बातें सोनिया गांधी के सामने रखीं गईं तब सोनिया की आंखें खुलीं, पर तब तक तीर कमान से निकल चुका था।
सूत्रों ने कहा कि अगर मिशन यूपी में युवराज के हाथ नाकामयाबी लगती है तो कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह को बली का बकरा बनाना तय ही है। दरअसल, दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस के आला नेताओं के विरोध के बावजूद भी राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश चुनावों में मैदान में ढकेलने का दबाव बनाया था। दिग्विजय के करीबी सूत्रों का कहना है कि राजा ने अपने बचाव के अस्त्र तैयार कर रखे हैं। राजा यूपी में नाकामयाबी का सेहरा बेनी प्रसाद वर्मा और श्रीप्रकाश जायस्वाल के कांधों पर रख सकते हैं।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा कि यूपी चुनाव के परिणाम राजा दिग्विजय सिंह के भाग्य का फैसला करेंगे। अगर पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा तो दिग्गी राजा के पर कतरे जा सकते हैं। उनसे उत्तर प्रदेश का प्रभार वापस लिया जा सकता है।
उधर, मध्य प्रदेश से सियासी पायदान चढ़ने वाले दिग्विजय सिंह के खिलाफ सूबाई क्षत्रपों कमल नाथ, सुरेश पचौरी, सुभाष यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी तलवार पजाना आरंभ कर दिया है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों के परिणाम आने के बाद कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने की महती जवाबदारी दी जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2003 में मध्य प्रदेश विधानसभा में पराजय का मुंह देखने के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी रसातल की ओर अग्रसर हुई जो वर्तमान में भी जारी है। मध्य प्रदेश कोटे से केंद्र में राजनीति करने वाले क्षत्रपों ने भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत करने की जहमत नहीं उठाई है। एमपी में दमदार प्रवक्ता के.के.मिश्रा को हटाने से सूबाई कांग्रेस के अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया भी संदेह के दायरे में आ चुके हैं।
कांति लाल भूरिया को दिग्विजय सिंह का पट्ठामाना जाता है। इन दिनों एमपीसीसी प्रेजीडेंट भूरिया मीडिया से कन्नी काटे नजर आ रहे हैं। फोन पर मीडिया से बातचीत के दौरान भूरिया ‘‘हैलो . . . हैलो‘‘ कहकर फोन काट रहे हैं। भूरिया के अध्यक्ष बनने के बाद कमल नाथ के प्रभाव वाले छिंदवाड़ा और सत्यव्रत चतुर्वेदी के प्रभाव वाले छतरपुर और टीकमगढ़ में जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्षों की घोषणा नहीं होने के जवाब शायद उनके पास नहीं हैं।

(क्रमशः जारी)

मौलिक चिंतन का महाजन



मौलिक चिंतन का महाजन

(संजय तिवारी)

समझ साफ हो तो जिंदगी सहज हो जाती है. नासमझी उलझने पैदा करती है. यह बात व्यक्तिगत जीवन में जितना लागू होती है उतना ही सामाजिक क्षेत्र या राजनीतिक चिंतन करते समय भी जरूरी होती है. हमारे आस पास बहुतेरे ऐसे लोग उपलब्ध हैं जो निजी जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक उलझे हुए नजर आते हैं. अपने अभी तक के जीवन में दो लोग ऐसे मिले हैं जो सुलझकर सहज हो गये लगते हैं. एक आचार्य नागराज जो कि जीवन विद्या के संस्थापक हैं और दूसरे बजरंगमुनि. आचार्य नागराज के बारे में हमारा समय ज्यादा जान नहीं पाया है लेकिन वे चेतना के जिस धरातल पर हैं वह जागृति की अवस्था है. अगर आप आचार्य नागराज के आस पास रहते हैं तो आपको महसूस होता है कि कम से कम उनके प्रभाव के दायरे में कोई उलझन नहीं है. प्रश्न तिरोहित हो जाते हैं, जिज्ञासाएं तो जैसे बचती ही नहीं है. बजरंगमुनि से मिलते हैं तो भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक सवालों को लेकर वही समाधान प्रस्तुत हो जाता है जो आचार्य नागराज के सामने आध्यात्मिक जगत के लिए होता है.
जैसे ही हमारी समझ साफ होती है हम सहज हो जाते हैं और जैसे ही हम सहज होते हैं हमारा चिंतन मौलिक हो जाता है. लौकिक हो जाता है. पारलौकिक विषयों की रहस्यवादी दुनिया और लौकिक विषयों की वास्तविक दुनिया में कोई भेद ही नहीं है. समझ की पैदाइश हो गई तो यह बात बिल्कुल अटपटी नहीं लगती है कि राजनीतिक सुधारों से व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है. अभी एक दिन पहले ही अमेरिकी विचारक एर्न्ड्यू कोहेन भी तो यही बोल रहे थे. किसी ने उनसे पूछा कि संसार में समस्याएं क्यों हैं तो उन्होंने कहा कि यह अविकसित रह जाने के कारण है. जैसे ही हमारा विकास पूरा होगा हमारी समस्याएं समाप्त हो जाएगी. एन्ड्रयू जब ऐसा कह रहे थे तो उनका आशय रोटी, कपड़ा और मकान भर से था. सम्यक रूप से भौतिक जरूरतें पूरी हो जाएं तो आध्यात्मिकता को प्रकट होने में वक्त कहां लगता है? भारत जैसे देश में जहां हमारे लिए हमारे राज्य प्रशासन ने अधिकांश जरूरतें पैदा कीं और उन्हें पूरा करने के नाम पर हमें भ्रमित करता है, कम से वहां यह बात अक्षरशरू लागू होती है.
बजरंग मुनि का लौकिक चिंतन इन्हीं मौलिक और मूलभूत जरूरतों को पूरा करने की दिशा में है. आचार्य नागराज की तरह वे किसी आध्यात्मिक उत्थान की शिक्षा नहीं देते. वे तो भारत की वर्तमान समस्या को वर्तमान के नजरिये से ही देख रहे हैं और उसका समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं. उनके चिंतन में अतीत का कोई आवरण नहीं है. निहायत ही मौलिक तरीके से वे जब कहते हैं कि सब सुधरेंगे, तीन सुधारे, नेता कर कानून हमारे. तो एक बारगी हंसी छूट जाती है. यह कौन सा मौलिक चिंतन है? इसमें ऐसा क्या है जो हम नहीं जानते? और उस पर से बजरंग मुनि का तुर्रा यह कि इस निष्कर्ष पर पहुंचने में उन्होंने तीस साल लगा दिये हैं? तीस साल की तपस्या में ये तीन मामूली सी बातें भला कोई समाधान हो सकती हैं क्या?
लेकिन उनकी ये तीन मौलिक बातें मन में उतरती हैं तो मजा आता है. अगर आप ध्यान से अपनी निजी जिंदगी को देखें तो पायेंगे कि राजनीति, अर्थनीति और कानून हमारे लिए हमारी समस्त परेशानियों का कारण हैं. राजनीति का केन्द्र नेता है. अर्थनीति का केन्द्र कर प्रणाली है और उल्टे सीधे कानूनों के कारण हमारी जिंदगी से मौलिकता कहां गायब हो गई है इसे झक मारकर भी नहीं खोज सकते. मानवीय इतिहास में नेतृत्व एक अनिवार्य सत्य है. किसी भी समाज में नेतृत्व के बिना व्यवस्था संचालित नहीं हो सकती. यह नेतृत्व आकाशीय हो सकता है, कबीलाई हो सकता है, राज व्यवस्था का हो सकता है या फिर लोकतंत्र का. नेतृत्व के बिना मानव समाज अपना उद्धार नहीं कर सकता. मानव जाति की कलेक्टिव इच्छाशक्ति जब घनीभूत होती है तो उन्हीं के बीच से नेतृत्व पैदा होता है. हाल फिलहाल को देखें तो गांधी कोई आसमान से नहीं आये थे. वे हमारी कलेक्टिव इच्छाशक्ति के प्रतीक पुरुष थे. राम हो, पैगम्बर मोहम्मद हो, ईसा हों या फिर कोई महात्मा गांधी या नेल्सन मंडेला. मानव समाज की जितनी मात्रा में कलेक्टिव इच्छाशक्ति होती है उसी अनुपात में हमारे बीच से कोई पुरुष पैदा होता है जो वांछित शक्तियों का वाहक बनकर हमारा नेतृत्व करता है. अगर इस समझ से हम अपने नेता की ओर देखें तो क्या उसे सुधारने की जरूरत नहीं है?
बजरंग मुनि तब बजरंगलाल अग्रवाल होते थे और राजनीतिक व्यक्ति थे. उन्होंने चुनावी राजनीति को तिलांजलि देकर आज से करीब 25 साल पहले अपने आपको राजनीतिक संन्यासी घोषित कर लिया था. वह 25 दिसंबर 1984 था जब उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान अपनी सारी राजनीतिक जिम्मेदारियों को पूरा करके खुद को राजनीतिक सन्यासी घोषित कर लिया था. उस वक्त उन्होंने तय किया वे घर परिवार से अलग होकर रहेंगे और राजनीतिक चिंतन करेंगे. अपने जन्मक्षेत्र और बाद में कर्मक्षेत्र बने अंबिकापुर को ही उन्होंने अपना संन्यास क्षेत्र बनाया और खुद को सक्रिय राजनीति से अलग कर लिया. उस वक्त उन्होंने घोषणा किया था कि 2009 तक संविधान संशोधन हो जाएगा और इस संविधान के कारण जो भारतीय मनुष्यों के सामने समस्याएं हैं वे समाप्त हो जाएगी. राजनीतिक सन्यास के दौरान ही उन्होंने संविधान पर जमकर शोध किया और आज वे जो तीन निष्कर्ष बता रहे हैं यह उसी शोध से निकला परिणाम है. उनके शोध के दौरान दिल्ली से भी विशेषज्ञ उनके पास जाते थे और विचार विमर्श तथा शोध करीब 15 साल चला. उनकी योजना थी कि उनका शोध दस साल में पूरा हो जाएगा और वे दस साल में व्यवस्था परिवर्तन का सूत्र समाज को सौंप देंगे. लेकिन जैसा कि होता है अच्छे काम बिना विघ्न के संपन्न नहीं होते. बजरंग मुनि बताते हैं कि जैसे ही मध्य प्रदेश सरकार को यह बात पता चली उन्होंने तरह तरह से परेशान करने की कोशिश की जिसके कारण उनके इस शोध में करीब चार साल और लग गये और नवंबर 1999 में उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन का सूत्र समाज को सौंप दिया.
उनका अध्ययन समग्र है. अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने समाज से जुड़े हर विषय पर मौलिक चिंतन किया है और उसका निष्कर्ष सामने रखा है. लेकिन इन निष्कर्षों के मूल का निष्कर्ष वही जो हम शुरू में समझ आये हैं. वे मानते हैं कि अगर इस देश में नेता, कर और कानून को ठीक कर दिया जाये हमारे देश की मानवीय समस्याओं का बहुत हद तक निदान हो जाएगा. उन्होंने जो शोध किया वह महज शोध ही नहीं रहा. वे रामानुजगंज के महापौर बने और अपने अध्ययन को अपनी नगरपालिका में लागू भी किया. प्रयोग का यह क्षेत्र भले ही तीन वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में सीमित रहा हो लेकिन उनके सफल प्रयोग से प्रेरित होकर छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार ने भी माना था कि रामानुजगंज में रामराज्य है. बजरंगमुनि का यह प्रयोग भले ही सीमित क्षेत्र में हुआ हो लेकिन उसकी संभावनाएं असीमित क्षेत्र के लिए भी हैं.
बजरंगमुनि का अपना निष्कर्ष है कि भारत में ग्यारह प्रकार की अनियंत्रित समस्याएं हैं जिनपर रोक लगाना बहुत जरूरी है लेकिन क्योंकि इन अनियंत्रित समस्याओं के कारण राजनीतिक हित सधते हैं इसलिए इन पर लगाम लगाने की बजाय हमारी राजनीति इनको बढ़ावा देती है. वे जिन 11 प्रकार की अनियंत्रित समस्याओं की ओर संकेत करते हैं वे हैं- चोरी डकैती, बलात्कार, मिलावट, जालसाजी, हिंसा आतंकवाद, भ्रष्टाचार, चरित्रपतन, सांप्रदायिकता, जातीय कटुता, आर्थिक असमानता और श्रम शोषण. अपने अध्ययन की समाप्ति के बाद वे अपने इन्हीं निष्कर्षों और इसकी व्याख्या को लेकर पूरे देश में जा रहे हैं. पिछले करीब एक दशक से यात्राओं और सभाओं के जरिए उन्होंने देशभर ये बातें समझाने की कोशिश की है कि जिसे हमारी समस्या बताया जा रहा है वह असल में कृतिम समस्या है जबकि हमारी मूल समस्या की ओर सरकारें जानबूझकर न ध्यान देती हैं और न ध्यान देने देती हैं.
हाल में अपनी एक और यात्रा पूरी करके दिल्ली पहुंचे बजरंग मुनि से जब हमने जानना चाहा कि करीब एक दर्जन राज्यों की यात्रा करने के बाद आपको कौन सी बात सबसे अधिक अखरती है तो उन्होंने कहा कि शरीर के व्यायाम पर जितना जोर बढ़ा है बुद्धि का व्यायाम उतना कम हो गया है. बकौल, बजरंगमुनि अब देश में बुद्धि की व्यायामशालाएं खोलने की जरूरत हैं ताकि लोग कम से कम अपने हित और अहित के बारे में निर्णय तो कर सकें. प्रक्षेपित ज्ञान ने हमें इतना आक्रांत कर दिया है कि हमारी अपनी मौलिक चिंतन की क्षमता ही खत्म होती जा रही है. शायद यही कारण है कि आज के विवेकशून्य होते दौर में हमें बजरंग मुनि मौलिक चिंतन के महाजन नजर आते हैं जिन्हें सुनने और समझने की जरूरत है. किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपने खुद के लिए.

(लेखक विस्फोट डॉट काम के संपादक )

दो संदिग्ध आतंकी धरे गए


दो संदिग्ध आतंकी धरे गए

(शरद खरे)

नई दिल्ली (साई)। दिल्ली पुलिस ने बुधवार को  राजधानी में लश्कर-ए-तैयबा के दो संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्घ्तार किया है। पुलिस ने इस बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया है। पुलिस ने केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से सूचना मिलने के बाद दोनों संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफतार करने के लिये कार्रवाई शुरू की थी।
दिल्ली पुलिस के विशेष आयुक्त पी.एन. अग्रवाल ने बताया कि दोनों आतंकवादियों को दस दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। उधर, पुलिस सूत्रों का कहना है कि इन दोनों संदिग्ध लोगों के पास से पुलिस को काफी बड़ा कंसाइमेंट मिला है जिसमें बाम बनाने से संबंधित जो समान चाहिए वो मेट्रिक्स पासपोर्ट, मोबाइल फोन मिले हैं। इनका इरादा बहुत जल्दी ही दिल्ली के एक कराउडे मार्केट में टेरेस्ट एक्शन का था जो इनके पकड़े जाने से प्रिवेंट हुआ है।
केंद्रीय गृहमंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम ने इस साजिश को नाकाम करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों और तीन राज्यों के पुलिस बलों के कार्यों की सराहना की है। चिदम्बरम ने कहा कि देश की एजेंसियां तीनों राज्यों के पुलिसबलों के साथ मिलकर काम कर रही थी जिन्होंने लश्करे तैयबा की आंतकी योजना को नाकाम किया है। ये एक खास माड्यूल था और इसमें दिल्ली में आतंकी हमलों को अंजाम देने की योजना बनाई थी।
नई दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों ने दिल्ली में भीड़-भाड़ वाले इलाकों में बम-विस्फोट करने की लश्करे तैयबा की साजिश को विफल कर दिया। उन्होंने लश्करे तैयबा द्वारा किसी प्रमुख हस्ती को निशाना बनाने की संभावना से इंकार किया।
इसके साथ ही साथ, तमिलनाडु में चार गैरसरकारी संगठनों के खिलाफ एफ आई आर के मुद्दे पर गृह मंत्री ने कहा कि इन संगठनों पर आरोप है कि उन्होंने जिन उद्देश्यों के लिए धन प्राप्त किया था, उसे अन्य गतिविधियों पर खर्च किया। श्री चिदम्बरम ने बताया कि सी बी आई को इनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिये गये है। एक प्रश्न के उत्तर में गृह मंत्री ने कहा कि जर्मनी के नागरिक को पर्यटन वीजा से बाहर की गतिविधियों में शामिल होने के कारण कल वापस भेजा गया।

सीएस डीजी की बैठक नौ को


सीएस डीजी की बैठक नौ को

(प्रियंका श्रीवास्तव)

नई दिल्ली (साई)। घुरैड़ी के दूसरे दिन नौ मार्च को गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केन्द्र के मुद्दे पर बातचीत के लिए अगले महीने की नौ तारीख को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों की बैठक बुलायी है। इससे पहले गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केन्द्र को पहली मार्च से लागू न करने का फैसला किया था।
उधर, दिल्ली उच्च न्यायालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान- एम्स से पूछा है कि उसने पिछले वर्ष सितम्बर में उच्च न्यायालय में हुए बम विस्फोटों के पीड़ितों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने के उसके पिछले आदेच्च का पालन क्यों नहीं किया। न्यायालय की एक पीठ ने पीडितों के वकील की अर्जी पर एम्स का जवाब मांगा है। अर्जी में कहा गया है कि न्यायालय के आदेच्च के बावजूद पीड़ितों के लिए कुछ भी नहीं किया और वे कृत्रिम अंगो के लिए दर-दर की ठोकर खा रहे हैं।

महिलाओं को दुर्घटना का खतरा कम!


महिलाओं को दुर्घटना का खतरा कम!

(यशवंत श्रीवास्तव)

नई दिल्ली (साई)। दिल्ली सरकार का मानना है कि दुपहिया वाहन में अगर पीछे पुरूष के स्थान पर महिला बैठी है तो दुर्घटना में उसके सर पर चोट नहीं लगेगी। जी हां, यह सच है, दिल्ली सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया है कि दुपहिया वाहन चलाने वाली या उस पर पीछे बैठने वाली महिलाओं के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य नहीं किया जा सकता।
सरकार ने न्यायालय से हेलमेट पहनना पुरूष और महिलाओं दोनों के लिए अनिवार्य करने संबंधी याचिका खारिज करने का आग्रह किया है। इस याचिका के उत्तर में दाखिल हलफनामे में सरकार ने कहा है कि उसने इसी तरह की याचिका पर महिलाओं को हेलमेट पहनने से छूट दे रखी है। न्यायालय की पीठ ने याचिकाकर्ता को हलफनामे का अध्ययन करने और २५ अप्रैल तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देच्च दिया है।

पर्यटन के विकास पर दें जोर: पाटिल


पर्यटन के विकास पर दें जोर: पाटिल

(मणिका सोनल)

नई दिल्ली (साई)। राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील ने पर्यटन क्षेत्र में टिकाऊ विकास के लिए बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया है। नई दिल्ली में राष्ट्रीय पयर्टन पुरस्कार समारोह में पर्यटन मंत्रालय की पहल की सराहना करते हुए कहा कि १२वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक विश्व में पर्यटकों के आगमन में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाकर एक प्रतिशत करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
इस समय यह शून्य दशमलव छह प्रतिशत है। श्रीमती पाटील में कहा कि पर्यटन क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम निवेश से रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा होते हैं। पर्यटन देश के आर्थिक विकास और प्रगति का वाहक बन सकता है। इस क्षेत्र का सबसे बड़ा फायदा इसकी रोजगार पैदा करने की क्षमता है।
उन्होंने कहा कि इसमें न केवल प्रबंधन और आतिथ्य में कुशल विशेषज्ञों को रोजगार मिलता है, बल्कि ये कुशल और अर्द्धकुशल कर्मियों को भी आजीविका का अवसर देता है। इस अवसर पर पर्यटन मंत्री सुबोध कांत सहाय ने कहा कि उनके मंत्रालय ने इस वर्ष से तीन नई श्रेणी के पुरस्कार शुरू किए हैं।

अनेक रोगों में लाभकारी है जीरा


हर्बल खजाना ----------------- 34

अनेक रोगों में लाभकारी है जीरा



(डॉ दीपक आचार्य)

अहमदाबाद (साई)। भारतीय किचन में प्रमुख खाद्य पदार्थाे मे प्रयुक्त किया जाने वाला जीरा एक प्रचलित मसाला है। यह दिखने में सौंफ की तरह होता है। संस्कृत में इसे जीरक कहा जाता है, जिसका अर्थ है, अन्न के जीर्ण होने में (पचने में) सहायता करने वाला। जीरा का वानस्पतिक नाम क्युमिनम सायमिनम है।
भोजन में अरुचि, पेट फूलना, अपच आदि को दूर करने में जीरा विश्वसनीय औषधि है। भुने हुए जीरे को लगातार सूँघने से जुकाम की छीकें आना बंद हो जाती है। पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार प्रसूति के पश्चात जीरे के सेवन से गर्भाशय की सफाई हो जाती है। जीरा गरम प्रकृति का होता है अतरू इसके अधिक सेवन से उल्टी भी हो सकती है।
जीरा कृमिनाशक है ज्वरनिवारक भी होता है। अत्यधिक एसिडिटी होने पर कच्चे और बगैर भुने जीरे की फ़ाँक दिन में ५-६ बार मारने से एसिडिटी सदैव के लिये दूर हो जाती है। डाँग- गुजरात के आदिवासी जीरे व नमक को पीसकर घी व शहद में मिलाकर थोड़ा गर्म करके बिच्छू के डंक पर लगाते है, इनका मानना है कि ऐसा करने से बिच्छु का विष उतर जाता है।
मट्ठे में हींग, जीरा और सेंधा नमक डालकर पीने से गैस और बवासीर में लाभ होता है। साथ ही जीरा पानी में पीसकर बवासीर के मस्सों पर लगाएं, तो और शीघ्र लाभ होगा। थायरॉइड में एक प्याला पालक के रस के साथ एक चम्मच शहद और चौथाई चम्मच जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। 

(साई फीचर्स)

बुधवार, 29 फरवरी 2012

दम तोड़ता विजन ट्वंटी ट्वंटी


दम तोड़ता विजन ट्वंटी ट्वंटी

(लिमटी खरे)

देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस वैसे तो देश को इक्कीसवीं सदी में ले जाने की बात कहती है, किन्तु जब अमली जामा पहनाने की बात आती है, तो वह इस ओर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझती है। आज इंटरनेट का जादू सर चढ़कर बोल रहा है फिर भी देश के 61 जिलों की अपनी वेवसाईट ही नहीं है। सेट फारमेट के अभाव में अलग अलग जिलों की वेब साईट भी विभिन्न तरह की ही हैं। करोड़ों अरबों रूपए पानी में बहाने के बाद भी अनेक जिलों की वेव साईट तो हैं पर अपडेट नहीं होती।


बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भविष्यदृष्टा की अघोषित उपाधि पाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सबसे पहले इक्कीसवीं सदी में जाने की परिकल्पना कर लोगों को अत्याधुनिक उपकरणों आदि के बारे में सपने दिखाए थे। आज वास्तव में उनकी कल्पनाएं साकार होती दिख रही हैं। विडम्बना यह है कि स्व.राजीव गांधी की अर्धांग्नी पिछले एक दशक से अधिक समय से कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं किन्तु कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ही आज इक्कीसवीं सदी में नहीं पहुंच सकी है।
आधुनिकता के इस युग में जब कम्पयूटर और तकनालाजी का जादू सर चढकर बोल रहा है, तब भारत गणराज्य भी इससे पीछे नहीं है। भारत में आज कंप्यूटर इंटरनेट का बोलबाला हर जगह दिखाई पड जाता है। जिला मुख्यालयों में भले ही बिजली कम ही घंटों के लिए आती हो पर हर एक जगह इंटरनेट पार्लर की धूम देखते ही बनती है। शनिवार, रविवार और अवकाश के दिनों में इंटरनेट पार्लर्स पर जो भीड उमडती है, वह जाहिर करती है कि देशवासी वास्तव में इंफरमेशन तकनालाजी से कितने रूबरू हो चुके हैं।
भारत गणराज्य की सरकार द्वारा जब भी ई गवर्नंसकी बात की जाती है तो हमेशा एक ही ख्वाब दिखाया जाता है कि ‘‘अब हर जानकारी महज एक क्लिक पर‘‘, किन्तु इसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। देश के कुल 626 जिलों में से 565 जिलों की अपनी वेव साईट है, आज भी 61 जिले एसे हैं जिनके पास उनकी आधिकारिक वेव साईट ही नहीं है। भारत में अगर किसी जिले के बारे में कोई जानकारी निकालना हो तो इंटरनेट पर खंगालते रहिए, जानकारी आपको मिलेगी, पर आधिकारिक तौर पर कतई नहीं, क्योंकि वेव साईट अपडेट ही नहीं होती है।
ई गवर्नंस के मामले में सबसे खराब स्थिति बिहार की है। बिहार के 38 जिलों में से महज 6 जिलों की ही आधिकारिक वेव साईट है, जबकि यहां के मुख्यमंत्री नितीश कुमार खुद ही अपने ब्लाग पर लोगो से रूबरू होते हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश के 23 में से 19, असम के 27 में से 24, छत्तीसगढ के 18 में से 16, झारखण्ड के 24 में से 20, कर्नाटक के 28 में से 27, मध्य प्रदेश के 50 में से 49, मिजोरम में 8 में पांच, पंजाब में 20 में 18 और तमिलनाडू के 31 में से 30 जिलों की अपनी वेव साईट है।
भारत गणराज्य के जिलों में आधिकारिक वेव साईट के मामले में सबसे दुखदायी पहलू यह है कि केंद्र सरकार के डंडे के कारण वेव साईट तो बना दी गई हैं, किन्तु इन्हें अद्यतन अर्थात अपडेट करने की फुर्सत किसी को नहीं है। जिलों में बैठे अप्रशिक्षित कर्मचारियों के हाथों में इन वेव साईट्स को अपडेट करने का काम सौंपा गया है, जिससे सब ओर अपनी ढपली अपना राग का मुहावरा ही चरितार्थ होता नजर आ रहा है।
वस्तुतः समूचा मामला ही केंद्रीय मंत्रालयों के बीच अहं की लडाई का है। अदूरदर्शिता के चलते सारा का सारा गडबडझाला सामने आने लगा है। जब नेशनल इंफरमैटिक संेटर (एनआईसी) का गठन ही कंप्यूटर इंटरनेट आधारित प्रशासन को चलाने के लिए किया गया है तब फिर इस तरह का घलमेल क्यों? एनआईसी का कहना है कि उसका काम मूलतः किसी मंत्रालय या जिले की अथारिटी के मशविरे के आधार पर ही वेव साईट डिजाईन करने का है। इसे अद्यतन करने की जवाबदारी एनआईसी की नहीं है।
देखा जाए तो एनआईसी के जिम्मे ही वेव साईट को अपडेट किया जाना चाहिए। जब देश के हर जिले में एनआईसी का एक कार्यालय स्थापित है तब जिले की वेव साईट पर ताजा तरीन जानकारियां एनआईसी ही करीने से अपडेट कर सकता है। चूंकि इंटरनेट  और कम्पयूटर के मामले में जिलों में बहुत ज्यादा प्रशिक्षित स्टाफ की तैनाती नहीं है इसलिए या तो ये अपनी अपनी वेव साईट अपडेट नहीं कर पाते हैं, या फिर तकनीक की जानकारी के अभाव के चलते करने से कतराते ही हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में गौतम बुद्ध नगर पूर्व में (नोएडा) में न्यू का एक साईन लिए टेंडर नोटिस लगा हुआ है, जिसमें 2008 का एक टेंडर जो 2009 में जारी कर दिया गया है आज भी विद्यमान है। इसी तरह अनेक जिलों की वेव साईट में भी सालों पुरानी जानकारियां आज भी लगी हुई हैं।
इसके अलावा एक और समस्या मुख्य तौर पर लोगों के सामने आ रही है। हर जिले की वेव साईट अलग अलग स्वरूप या फार्मेट में होने से भी लोगों को जानकारियां लेने में नाकों चने चबाने पड जाते हैं। फार्मेट अलग अलग होने से लोगों को जानकारियां जुटा पाना दुष्कर ही प्रतीत होता है। अगर शिक्षा पर ही जानकारियां जुटाना चाहा जाए तो अलग अलग जिलों में प्रदेश के शिक्षा बोर्ड और कंेद्रीय शिक्षा बोर्ड के अधीन कितने स्कूल संचालित हो रहे हैं, उनमें कितने शिक्षक हैं, कितने छात्र छात्राएं हैं, यह जानकारी ही पूरी तरीके से उपलब्ध नहीं हो पाती है।
दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू काश्मीर, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, उडीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल आदि सूबों में शत प्रति जिलों की अपनी वेव साईट हैं, पर यह कोई नहीं बात सकता है कि ये कब अद्यतन की गई हैं। लचर व्यवस्था के चलते सरकारी ढर्रे पर चलने वाली इन वेव साईट्स से मिलने वाली आधी अधूरी और पुरानी जानकारी के कारण लोगों में भ्रम की स्थिति निर्मित होना आम बात है।
देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसने देश पर आधी सदी से अधिक तक राज किया है को चाहिए कि देश भर के समस्त जिलों, संभागों की आधिकारिक वेव साईट को एक सेट फार्मेट में बनाए, और इसको अपडेट करने की जवाबदारी एनआईसी के कांधों पर डालें क्योंकि इंफरमेशन टेक्नालाजी के मामले में एनआईसी के बंदे ही महारथ हासिल रखते हैं। इसके साथ ही साथ केंद्र सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ये वेव साईट समय समय पर अपडेट अवश्य हों, इसके लिए जवाबदेही तय करना अत्यावश्यक ही है, वरना आने वाले समय में लोग कांग्रेस के भविष्य दृष्टा स्व.राजीव गांधी के बाद वाली नेहरू गांधी परिवार की पीढी को बहुत इज्जत, सम्मान और आदर की नजर से देखेंगे इस बात में संदेह ही है।

(साई फीचर्स)