मंत्री की अदालत में सूली चढ़ा प्रजातंत्र!
(लिमटी खरे)
देश के हृदय प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी सरकार के एक मंत्री ने मुख्यमंत्री की नाक में दम कर रखा है। अपनी हरकतो ंसे विवादों को गले लगाने वाले मध्य प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री गौरी शंकर बिसेन एक के बाद एक विवादों में फंसते ही जा रहे हैं। भगवान शिव की नगरी सिवनी के केवलारी विधानसभा क्षेत्र में एक आदिवासी पटवारी को जातिसूचक शब्दों के जहर बुझे तीखे व्यंग्य बाण चला सार्वजनिक तौर पर उठक बैठक लगवाकर बिसेन एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। मौके पर मौजूद आदिवासी सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र बरघाट के विधायक कमल मस्कोले और केवलारी विधायक और मध्य प्रदेश विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ठाकुर का घटनास्थल पर उपस्थित रहने के बाद भी मौन आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। सिवनी से लगभग हजार किलोमीटर दूर एमपीसीसी अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की कर्मभूमि झाबुआ में बिसेन का पुतला जला पर सिवनी के कांग्रेसियों ने एक सरकारी कर्मचारी वह भी आदिवासी के अपमान की सुध तक नहीं ली।
(लिमटी खरे)
देश के हृदय प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी सरकार के एक मंत्री ने मुख्यमंत्री की नाक में दम कर रखा है। अपनी हरकतो ंसे विवादों को गले लगाने वाले मध्य प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री गौरी शंकर बिसेन एक के बाद एक विवादों में फंसते ही जा रहे हैं। भगवान शिव की नगरी सिवनी के केवलारी विधानसभा क्षेत्र में एक आदिवासी पटवारी को जातिसूचक शब्दों के जहर बुझे तीखे व्यंग्य बाण चला सार्वजनिक तौर पर उठक बैठक लगवाकर बिसेन एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। मौके पर मौजूद आदिवासी सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र बरघाट के विधायक कमल मस्कोले और केवलारी विधायक और मध्य प्रदेश विधानसभा उपाध्यक्ष हरवंश सिंह ठाकुर का घटनास्थल पर उपस्थित रहने के बाद भी मौन आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। सिवनी से लगभग हजार किलोमीटर दूर एमपीसीसी अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की कर्मभूमि झाबुआ में बिसेन का पुतला जला पर सिवनी के कांग्रेसियों ने एक सरकारी कर्मचारी वह भी आदिवासी के अपमान की सुध तक नहीं ली।
मध्य प्रदेश में 2003 में उमा भारती ने दस साल तक लगातार राज करने वाले राजा दिग्विजय सिंह का चक्र तोड़ा और भारतीय जनता पार्टी को मध्य प्रदेश में सत्ता पर काबिज किया। साध्वी उमा ज्यादा दिन तक सत्ता का स्वाद नहीं चख पाईं। उनके बाद बाबू लाल गौर तो अब शिवराज सिंह चैहान सत्ता पर काबिज हैं। शिवराज सिंह चैहान के एक मंत्री हैं गोरी शंकर बिसेन। जिन्हें गौरी भाऊ के नाम से लोग ज्यादा जानते हैं। गौरी शंकर बिसेन मंत्री बनने के बाद से ही चर्चाओं में रहे हैं।
दो साल पहले होली मिलन समारोह में पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ हाथ में नोट लहराकर चर्चाओं में आने वाले बिसेन ने लोकसभा चुनावों के पहले सिवनी के ही एक होटल में पत्रकारों को ‘घड़ी‘ (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह) बांटकर नए विवाद को जन्म दिया था। गौरतलब है कि परिसीमन में सिवनी के ही नीति निर्धारक कर्णधारों ने सिवनी लोकसभा के विलोपन के मार्ग प्रशस्त किए थे, जिससे जिले के पांच में से चार बचे विधानसभा क्षेत्र सिवनी और बरघाट को बालाघाट तो लखनादौन और केवलारी को मण्डला संसदीय क्षेत्र में शामिल कर दिया गया था। बालाघाट संसदीय क्षेत्र से के.डी.देशमुख चुनाव मैदान में थे। गौरी शंकर बिसेन ने घड़ी क्यों बांटी इस बारे में भाजपाई आज भी शोध ही कर रहे हैं।
पिछले कुछ दिनों में गौरी शंकर बिसेन अपने आवास पर ‘भोज की राजनीति‘ के कारण चर्चाओं में हैं। इसके बाद उन्होंने अपने गृह जिले के जिला मुख्यालय बालाघाट में भाजपा के रमेश रंगलानी के नेतृत्व वाली नगर पालिका में भ्रष्टाचार के आरोप मढ़ दिए। अपनी ही पार्टी के खिलाफ तलवार पजाने वाले बिसेन की मुखालफत आरंभ हो गई है। लोग उन्हें सालों साल से कांग्रेस के कब्जे वाली वारासिवनी विधानसभा से जोर अजमाईश करने का सुझाव भी दबी जुबान से देने लगे हैं। गौरतलब है कि वर्तमान में वारासिवनी विधानसभा पर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष प्रदीप जायस्वाल का कब्जा है।
गौरी शंकर बिसेन का जुबानी कहर अभी थमा नही है। सिवनी जिले के केवलारी विकासखण्ड के ग्राम छींदा में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में तो हद ही हो गई। इस प्रोग्राम में गौरी शंकर बिसेन के अलावा राज्य के शिक्षा राज्य मंत्री नाना भाऊ मोहोड़, विधानसभा उपाध्यक्ष एवं क्षेत्रीय कांग्रेस विधायक हरवंश सिंह ठाकुर, पूर्व मंत्री डाॅ.ढाल सिंह बिसेन, बरघाट विधायक कमल मस्कोले की उपस्थिति में ही मध्य प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी और सहकारिता मंत्री गौरी शंकर बिसेन ने वहां राजस्व विभाग के एक पटवारी धर्मेंद्र मस्कोले पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप मढ़ते हुए उसका पक्ष सुने बिना ही तालियों की गड़गड़ाहट बटोरने की गरज से उसे वहीं उठक बैठक लगाने की सजा सुना दी।
सत्ता के मद में चूर मध्य प्रदेश सरकार के एक मंत्री की अघोषित अदालत में पटवारी को न केवल जाति सूचक शब्दों के व्यंग्य बाणों से आहत किया गया वरन् किसी शाला के प्राईमरी स्तर के विद्यार्थी की तरह उसे उठक बैठक लगाने पर मजबूर कर अपमानित किया गया। देखा जाए तो यह मामला एट्रोसिटी एक्ट और सिविल सर्विसेज के नियम कायदों का खुला उल्लंघन है। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर हुआ जब ‘‘मंचासीन तमाशाई‘‘ राज्य मंत्री नाना मोहोड़, विधायक कमल मस्कोले, पूर्व मंत्री डाॅ.ढाल सिंह बिसेन सहित विधान सभा उपाध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठे कांग्रेस के विधायक हरवंश सिंह ठाकुर भी चुपचाप एक लोकसेवक को मंत्री के हाथों प्रताडि़त होते देखते रहे। उस वक्त वहां मौजूद अनुविभागीय दण्डाधिकारी आर.एस.पण्डा ने अपने मातहत कर्मचारी के पक्ष में आवाज उठाकर साबित करने का प्रयास किया है कि सरकारी नुमाईंदा किसी भी कीमत पर जनसेवकों के घर की चैखट पर नाचने वाली लौंडी नहीं है।
मामला अब काफी तूल पकड़ चुका है। राज्य स्तर पर इस मामले की आग सुलगती दिख रही है। धुंआ चारोें ओर दिखाई देने लगा है। मामला राजनैतिक ‘गुणा गणित और जोड़ तोड़‘ के माहिर खिलाड़ी बिसेन के खिलाफ है इसलिए कितना परवान चढ़ पाएगा कहा नहीं जा सकता है। वैसे इस मामले में मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने संज्ञान लिया है। उनकी कर्मस्थली झाबुआ में गौरी शंकर बिसेन का पुतला फुंका है। आश्चर्य तो इस बात पर है कि सिवनी जिले में जहां यह घटना घटी है वहां कांग्रेस का संगठन चुप्पी साधे ‘किसी विशेष‘ के इशारे का इंतजार कर रहा है।
मामला चाहे प्रदेश स्तर का रहा हो या जिला स्तर का। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में एक कमजोर विपक्ष की भूमिका का ही निर्वहन किया है। जनहित के न जाने कितने मामले प्रकाश में आए पर ‘आपसी सामंजस्य‘ ने इन सारे मामलों को परवान चढ़ने नहीं दिया। अंत में मरण गरीब गुरबों की ही हुई। मीडिया ने जब इस तरह के मामलों को उठाया तो मीडिया की कमर तोड़ने से भी गुरेज नहीं किया सत्ता की मलाई चखने और उनके लिए सीढ़ी बने विपक्ष ने। एक नहीं अनेकों मामले एसे हैं जिनमें मामला उजागर होने पर या तो संपादक / संवाददाता को संस्थान से चलता कर दिया गया या फिर उसे अधिकार विहीन ही करवा दिया गया।
बहरहाल पटवारी संघ ने जिला मुख्यालय के वोट क्लब ‘कचहरी चैक‘ पर धरना दिया गया। विडम्बना देखिए इस धरने में किसी भी राजनैतिक समाजिक संगठन ने अपना सहयोग देने की जहमत नहीं उठाई। जनता के हितों के लिए लड़कर अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले संगठन भी कांग्रेस भाजपा की इस नूरा कुश्ती में इस बात का इंतजार किया जा रहा है कि उंट किस करवट बैठता है? इसी बीच ‘हमें क्या करना है‘, ‘हमसे संबंधित थोड़े ही है‘, ‘हम क्यों खुजाएं‘, ‘क्या हमारा ही ठेका है?‘ ‘लेता भी तो था यार रिश्वत‘, ‘मंत्री से कौन ले पंगा?‘, ‘अरे अपनी पार्टी का मामला है‘, ‘जब विधायकों को नहीं फिकर तो हम क्यों आगे आएं?‘, ‘जाने तो दो?‘, ‘कौन पड़े पचड़े में‘ जैसे जुमले हवा में तैरने लगे हैं जिनको पतवार बनाकर जनता के स्वयंभू हितैषी अपनी अपनी नाव इस भंवर से दूर खे रहे हैं।
बड़बोले गौरी शंकर बिसेन की वाणी का कहर अनवरत जारी है। छिंदवाड़ा में भी उन्होंने आदिवासी समुदाय के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की है, पर वहां भी कांग्रेस का संगठन मौन साधे ही बैठा है। बताते हैं कि होशंगाबाद में नर्मदा सहकारिता के सहायक आयुक्त जिनका अठ्ठारह माह में तीन मर्तबा स्थानांतरण हो चुका है को भी गौरी शंकर बिसेन ने सार्वजनिक तौर पर खरी खोटी सुनाई है। कहते हैं कोर्ट से स्थानांतरण पर स्थगन लेने वाले उक्त सहायक आयुक्त को बिसेन ने कहा है कि सरकार तो सरकार है, सरकार से मत टकराईए। इन बातों में सच्चाई कितनी है यह तो शिवराज सिंह चैहान मंत्री मण्डल के वरिष्ठ सदस्य गौरी शंकर बिसेन जाने पर सिवनी की घटना अपने आप में सारी कहानी खुद कहने के लिए पर्याप्त है।
सिवनी में जो कुछ हुआ वह प्रजातंत्र को सरेआम मिली फांसी की सजा के समतुल्य माना जा सकता है। प्रजातंत्र के मायने इसकी स्थापना के वक्त ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन‘ माना गया था, पर अब इसके मायने पूरी तरह से बदल चुके हैं। प्रजातंत्र का स्थान हिटलरशाही ने ले लिया है। किसी सरकारी कर्मचारी को इस तरह सार्वजनित तौर पर उठक बैठक की सजा सुनाई जाए और उसे जाति सूचक शब्दों के सहारे प्रताडि़त किया जाए, यह बात सुनकर ही हृदय कंपित हो उठता है, फिर जिसके साथ यह बीता होगा उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि आदिवासी समुदाय के उस पटवारी के समर्थन में न तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस ही सामने आई है और न ही समाज सेवा, जनसेवा का दंभ भरने वाले समाजसेवी जनसेवी ठेकदार!

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