गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

शिव के राज में खुलते प्रगति के नए दरवाजे

हृदय प्रदेश  शिव के राज में खुलते प्रगति के नए दरवाजे
(लिमटी खरे)

अपने अंदर अकूत प्राकृतिक संपदा को समेटने वाले भारत गणराज्य के हृदय प्रदेश में प्रगति के दरवाजे खोलने में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। 22 और 23 अक्टूबर को चंदेलकालीन बेहतरीन नायाब कलाकारी के नमूनों को अपने दामन में समेटने वाले मध्य प्रदेश के खजुराहो में आयोजित होने वाले ग्लोबल इन्वेटर्स समिट टू से प्रदेश प्रगति के नए आयामों को छू सकेगा इस बात में संदेह नहीं किया जा सकता है। मध्य प्रदेश की आबादी तेजी से बढ़ती जा रही है। मध्य प्रदेश में अनेक हाथ रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। आदिवासी बाहुल्य मध्य प्रदेश में लोग पारंपरिक व्यवसाय से हटने लगे हैं, इन परिस्थितियों में औद्योगिक क्रांति का आगाज सूबे में खुशहाली की दस्तक दे सकता है, बशर्ते इसके निष्पादन, क्रियान्वयन में पूरी पूरी ईमानदारी बरती जाए। मध्य प्रदेश में औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए चलाए गए विशेष अभियान के चलते प्रदेश में औद्योगिक परिदृश्य के बदलने की संभावनाओं से इकार नहीं किया जा सकता है। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि सब तरह से परिपूर्ण मध्य प्रदेश में इंवेस्टर्स को सारे संसाधन मुहैया करवाए जाएं एवं इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि उद्योगपतियो, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और निवेशकों द्वारा प्रदेश का दोहन अवश्य किया जाए पर प्रदेश के लोगों को इसका वांछित लाभ अवश्य ही मिल सके। ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट टू की विशेषता यह उभरी है कि इसमें पहली बार केंद्रीय मंत्रियों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जा रही है। शिवराज सरकार द्वारा दी जा रही छूट और अनुकूल वातावरण के चलते निवेशक मध्य प्रदेश की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं हैं। राज्य में निवेश करवाने से राज्य की माली हालत दुरूस्त होने के साथ ही साथ लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर मुहैया होंगे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु शिवराज सिंह चौहान को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राज्य में निवेश करने के पूर्व सुरक्षा इंतजामात को सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।

समाज शास्त्र में औद्योगीकरण और नगरीकरण को एक दूसरे का पूरक ही माना जाता है। जहां उद्योग स्थापित होंगे वहां आबादी या बसाहट तेजी से होगी इस बात को माना और सिद्ध किया गया है। भारत गणराज्य की राजनैतिक राजधानी दिल्ली और आर्थिक राजधानी मुंबई में आबादी के तेजी से बढ़ने का कारण इन दोनों ही स्थानों के उपनगरीय क्षेत्रों में उद्योगी का तेजी से बढ़ना ही प्रमुख तौर पर माना जा सकता है। जहां उद्योग स्थापित होंगे वहां इनमें काम करने वाले कामगारो की बस्ती बन ही जाती है। देश का औद्योगिक विकास बेतरतीब होने के कारण हर महानगर में झोपड़ पट्टियां मखमल पर टाट का पेबंद ही नजर आती हैं। जिसका जहां मन आया वहां उद्योग स्थापित कर दिया, सरकारों द्वारा भी उपलब्ध प्राकृतिक एवं अन्य संसाधनों को तो औद्योगिक घरानों को मुहैया करवा दिया जाता है, किन्तु जब बसाहट की बात आती है तो इस मामले मंे सरकारें मौन ही साधे रखती हैं।
 
मध्य प्रदेश में निजी पूंजी निवेश के लिए शिवराज सरकार द्वारा की गई पहल निश्चित तौर पर तारीफे काबिल कही जा सकती है। निवेशकों, औद्योगिक घरानों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को मध्य प्रदेश में उद्योग लगाने के लिए उपजाऊ माहौल तैयार करना सूबे के शासक का प्रथम दायित्व होता है। शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले सालों में इस असंभव काम को संभव कर दिखाया है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्रित्व काल में संपन्न हुए इंवेस्टर्स समिट में अरबों खरबों रूपए के एमओयू हस्ताक्षरित किए गए हैं।
 
अब तक खजुराहो में 15 और 16 जनवरी 2007 को हुए इन्वेस्टर्स समिट मं 39 हजार करोड़ रूपए, मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में 26 और 27 अक्टूबर 2007 को संपन्न हुए ग्लोबल मीट मे 1 लाख 20 हजार पांच सौ इकतालीस करोड़ रूपए, 15 और 16 फरवरी 2008 को मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में संपन्न इन्वेस्टर्स मीट में 59 हजार 129 करोड़ रूपए, 11 अप्रेल 2008 को सागर की इंवेस्टर्स मीट में 30 हजार 698 करोड़ रूपए, ग्वालियर में 29 और 30 जुलाई 2008 को संपन्न मीट में 88 हजार 18 करोड़ रूपए, उर्जा के क्षेत्र में संपन्न एमओयू में एक लाख तीन हजार पांच सौ तिरानवे करोड़ रूपए के अलावा अन्य एमओयू को अगर मिलाया जाए तो अब तक मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा चार करोड़ 71 हजार पांच सौ चौसठ करोड़ रूपयों का निवेश किया गया है।
 
विभागीय सूत्रों का कहना है कि इनमें से 1596 करोड़ रूपए की 13 परियोजनाओं में उत्पादन भी प्रारंभ कर दिया गया है, जो शिवराज सरकार की एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। इसके अलावा 54 हजार 717 करोड़ रूपयों की लागत वाली 23 महात्वाकांक्षी परियोजनाओं का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।
 
दूसरी ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट में शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा प्रदेश में औद्योगिक निवेश की दृष्टि से देश और विदेश के लगभग पांच सौ निवेशकों को न्योता भेजा है। 15 और 16 जनवरी 2007 के उपरांत खजुराहो में दूसरी बार इसका आयोजन किया जाना दर्शाता है कि पिछली मर्तबा यह सफल रहा है, तभी इसमें इतनी अधिक तादाद में निवेशकों ने अपनी दिलचस्पी दिखाई है। पिछली समस्त इंवेस्टर्स मीट और ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट की सफलता से यह साबित होने लगा है कि देश और विदेश के निवेशकों के लिए निवेश हेतु देश का हृदय प्रदेश पहली पसंद बनकर उभर रहा है।
 
सरकारी सूत्रों का दावा है कि खजुराहो में इस आयोजन में सूबे की सरकार द्वारा इसमें भाग लेने वाले निवेशकों को निवेश की स्थिति में राज्य सरकार की भागीदारी के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। इस समिट में राज्य सरकार द्वारा निवेश पर सहूलियतें, करों में राहत, सुविधाएं, आवागमन के साधन, कच्चे माल की उपलब्धता आदि के साथ ही साथ विभिन्न महकमों की उद्योग नीतियों को बारीकी से समझाकर निवेशकों को रिझाने का प्रयास किया जाएगा।
 
इसके साथ ही साथ मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश सरकार की उद्योग नीति और प्रदेश में उद्योगों की स्थापना पर शासन स्तर पर दी जाने वाली छूट, सहूलियतों आदि के बारे में सविस्तार समझाया जाएगा। अमूमन कोई भी उद्योगपति कहीं भी उद्योग स्थापित करने मंे शासन स्तर पर बहुत ही अधिक कठिनाई का अनुभव करता है। यह कठिनाई उसके समक्ष इसलिए आती है, क्योंकि निवेशक को संबंधित राज्य की नीतियों के बारे में जानकारी विस्तार से नहीं मिल पाती है।
 
मध्य प्रदेश के विकास के लिए कृत संकल्पित मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश की माली हालत सुधारने और राज्य में रोजगार के बेहतर अवसर मुहैया करवाने की गरज से औद्योगिक नीति को काफी हद तक लचीला बना दिया है। हलांकि मध्य प्रदेश की नई उद्योग नीति को अभी मंत्रीमण्डल की स्वीकृति मिलना बाकी है, फिर भी माना जा रहा है कि जनहितैषी इंडस्ट्री फ्रेंडली इस नई नीति को मंत्री परिषद की स्वीकृति बिना किसी रोक टोक के मिल जाएगी।
 
विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए प्रदेश सरकार का प्रतिनिधिमण्डल अनेक देशों की यात्रा पर भी गया। उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पिछले साल तीन से ग्यारह नवंबर तक जापान, अस्टेªलिया और सिंगापुर की यात्रा कर निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास किया। इसके आलवा सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान द्वारा 13 से 23 जून तक दस दिवसीय यात्रा पर टोकियो, ब्रिस्बेन, सिडनी और सिंगापुर की यात्रा कर औद्योगिक घरानों को मध्य प्रदेश में निवेश हेतु आमंत्रित किया। सूबे के प्रतिनिधिमण्डल ने यूरोपीय देशों पर अपना खासा ध्यान केंद्रित किया है।
 
कहा जा रहा है कि एमपी गर्वंमेंट की नीति के अनुसार इन देशों की यात्रा करने पर प्रतिनिधिमण्डल द्वारा तकनीकि सहयोग और व्यापारिक भागीदारी के मामले में मध्य प्रदेश सरकार का रूख स्पष्ट किया। इसके अलावा संरक्षित खेती, तकनीकि विज्ञान, इंजीनियरिंग, आज के युग की सबसे अधिक डिमांड वाली फैशन डिजाईनिंग, रिन्यूएबल एनर्जी, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, जैविक खेती, उर्जा, पावर प्लांट, टेक्सटाईल्स टूरिज्म, इंफरमेशन तकनालाजी, मिनरल्स, रियल इस्टेट, हाउसिंग, शिक्षा, हेल्थ केयान, आधारभूत अधोसंरचना, आदि के क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश की संभावनाओं के बारे में तैयार खांका प्रदर्शित किया है।
 
खजुराहो मंे आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट सेकंड की सबसे बड़ी विशेषता है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दलगत भावना से उपर उठकर मध्य प्रदेश के विकास के मार्ग प्रशस्त किए हैं। यह पहला मौका होगा जबकि किसी सूबे में आयोजित इस तरह के कार्यक्रम में किसी दूसरे दल की केंद्र सरकार के मंत्री शिरकत करेंगे इस समारोह में मध्य प्रदेश कोटे से केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ, सर्वजनिक उपक्रम और भारी उद्योग राज्य मंत्री अरूण यादव, के अलावा वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनन्द शर्मा और खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री सुबोध कांत सहाय को आमंत्रित किया गया है, ताकि निवेशकों के समक्ष केंद्र और राज्य के बेहतर समन्यव के साथ ही साथ निवेशकों की अनेक जिज्ञासाओं को शांत किया जा सके।
 
बताते हैं कि खजुराहो में 22 और 23 अक्टूबर को आयोजित होने वाले इस विशाल आयोजन के लिए मलेशिया, नीदरलेण्ड, ताईवान, ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी, फिनलेण्ड, आस्ट्रिया सहित लगभग आधा सैकड़ा से अधिक देशों के निवेशकों के भाग लेने की सहमति राज्य सरकार को मिल चुकी है। इसके अलावा देश के बड़े, मझौले और छोटे औद्योगिक घरानों के दो दर्जन से भी ज्यादा प्रतिनिधियों ने भी अपनी सहमति इस आयोजन में उपस्थित होने प्रदान की जा चुकी है।
 
इस आयोजन में उद्योगपतियों, औद्योगिक घरानों के सदस्यों और निवेशकों को मध्य प्रदेश से भली भांति परिचित कराने वीडियो प्रजेंटेशन भी रखा गया है। वीडियो प्रेजेंटेशन के माध्यम से राज्य सरकार द्वारा मध्य प्रदेश की भौगोलिक, राजनैतिक और अन्य परिस्थितियों के साथ ही साथ सामरिक महत्व के स्थानों के बारे में भी सविस्तार बताया जाएगा। वीडियो प्रजेंटेशन के माध्यम से निवेशक खजुराहो में बैठे बैठे ही निवेश करने के लिए अनुकूल एवं उपयुक्त स्थान के बारे में सब कुछ जान सकेंगे।

सच्चे और साफ मन से किए जाने वाले इस आयोजन की सफलता पर कहीं से कहीं तक किसी भी प्रकार के प्रश्न चिन्ह की संभावना नहीं है, किन्तु शिवराज सरकार को निवेश के साथ ही साथ अनेकानेक सावधानियों को भी अपने जेहन में रखना बहुत ही आवश्यक है। सावधानिया बरतना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि मध्य प्रदेश के भाल पर छब्बीस साल पूर्व भोपाल गैस कांड के रूप में विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी का बदनुमा दाग आज भी बरकारार है, जिसमें कुंवर अर्जुन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन राज्य सरकार आज तक कटघरे से बरी नही हो सकी है। राज्य की आर्थिक सेहत को चुस्त दुरूस्त और समृद्ध करना एवं अपनी रियाया को रोजगार मुहैया कराना निश्चित तौर पर राज्य के मुख्यमंत्री का पहला दायित्व है, किन्तु इस सबमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण पहलू सुरक्षा का है, सुरक्षा चाहे संयंत्र की हो या फिर राज्य की आंतरिक, हर पहलू पर शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार को विचार करना अत्यावश्यक ही है।

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

भारत की यह मजबूरी है भ्रष्टाचार जरूरी है

भारत की यह मजबूरी है भ्रष्टाचार जरूरी है
 
(लिमटी खरे)

एक समय में सामाजिक बुराई समझे जाने वाले भ्रष्टाचार ने आजाद हिन्दुस्तान में अब शिष्टाचार का रूप धारण कर लिया है। बिना रिश्वत दिए लिए कोई भी काम संभव नहीं है, यह हमारा नहीं देश की सबसे बड़ी अदालत का मानना है। अस्सी के दशक के मध्य तक भ्रष्टाचार को सामाजिक बुराई समझा जाता था, उस समय भ्रष्टाचार करने वालांे को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था। कालान्तर में भ्रष्टाचार की जड़े इस कदर गहरी होती गईं कि हर सरकारी कार्यालय में भ्रष्टाचार अब रग रग में बस चुका है। सरकारी कार्यालयों के बाबू, अफसर और चपरासी बेशर्म होकर ‘कुछ चढ़ावा तो चढ़ाओ‘, ‘बिना वजन के फाईल उड़ जाएगी‘, ‘बिना पहिए के फाईल कैसे चलेगी‘, ‘अरे सुविधा शुल्क तो दे दो‘ आदि जुमले पूरी ईमानदारी के साथ बोलते नजर आते हैं। याद नहीं पड़ता कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी के उपरांत किसी जनसेवक ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी चिंता जाहिर की हो। आज कम ही जनसेवक एसे बचे हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप न हों। यह अलहदा बात है कि भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने में बरसों बरस लग जाते हैं, तब तक मूल मामला लोगों की स्मृति से विस्मृत ही हो जाता है। लालू प्रसाद यादव और सुरेश कलमाड़ी इस बात के जीते जागते उदहारण कहे जा सकते हैं जिन पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के बावजूद भी कांग्रेसनीत कंेद्र सरकार ने उन्हंे गले लगाकर ही रखा है। विडम्बना यह है कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अक्सर ही खुद को सत्यवादी हरिशचंद के वंशज बताकर भ्रष्टाचार पर लंबे चौंड़े भाषण पेलते रहते हैं, पर जब उसे अमली जामा पहनाने की बारी आती है तब भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार बनकर उभर जाता है।

भारत गणराज्य की आने वाली पीढ़ी नब्बे के दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक को किसी रूप में जाने या न जाने किन्तु भ्रष्टाचार के गर्त में भारत को ढकेलने के लिए अवश्य ही याद करेगी। नई दिल्ली के एक समाचार पत्र समूह द्वारा इसी साल अगस्त माह के पहले पखवाड़े में कराए गए सर्वे में यह तथ्य उभरकर आया है कि उमर दराज हो चुके दिल्ली के 65 फीसदी लोगों का मानना है कि आजाद भारत में भ्रष्टाचारियों को अधिक ‘आजादी‘ नसीब हुई है। रिश्वत खोरों के लिए सजा का प्रावधान नगण्य ही है। बिना रिश्वत की पायदान चढ़े देश में कोई भी काम परवान नहीं चढ सकता है। लोगों का मानना था कि इस मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाले लोग खुद भी भ्रष्टाचार की जद में हैं। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के पेंशनर्स का मानना हृदय विदारक माना जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवन में सरकारी सेवा के दौरान जनता की सेवा पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ की किन्तु अब उन्हंे भी रिश्वत की सीढ़ी पर चढ़ने पर मजबूर होना पड़ता है। यह है गांधी नेहरू के देखे गए आजाद भारत की इक्कीसवीं सदी की भयावह तस्वीर।
 
अस्सी के दशक के मध्य तक कमोबेश हर कार्यालय की दीवार पर ‘‘घूस (रिश्वत) लेना और देना अपराध है, दोनों ही पाप के भागी हैं‘‘ भावार्थ के जुमले लिखे होते थे। उसके पहले तक रिश्वत लेने वाले को समाज में बेहद बुरी नजर से देखा जाता था। आज चालीस की उमर को पार करने वाले प्रौढ़ भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि भ्रष्टाचार का तांडव अगर इसी तरह जारी रहा तो आने वाले भारत की तस्वीर कितनी बदरंग और बदसूरत हो जाएगी।
 
जनसेवक, सरकार, न्यायालय हर जगह भ्रष्टाचार को लेकर तरह तरह की बहस होती है। बावजूद इसके जब भी जमीनी हकीकत को देखा जाता है तो भ्रष्टाचार का बट वृक्ष और विशालकाय होकर उभरता दिखाई पड़ता है। इसकी परछाईं इतनी डरावनी होती है कि आम आदमी ईमानदारी से जीने की कल्पना कर ही सिहर जाता है। आज ईमानदार सरकारी कर्मचारी फील्ड पोस्टिंग के बिना मन मसोसकर रह जाते हैं। अनेक विभागों में न जाने एसे कितने कर्मचारी अधिकारी होंगे जो भ्रष्ट व्यवस्था से समझौता न कर पाने के चलते जिस पद पर भर्ती हुए उसी से सेवानिवृत होने पर मजबूर होंगे।
 
हद तो तब हो गई जब देश की सबसे बड़ी अदालत की एक पीठ ने भ्रष्टाचार पर अपनी तल्ख टिप्पणी कर डाली। सुप्रीम कोर्ट की पीठ का कहना था कि अगर सरकार भ्रष्टाचार को रोक नहीं सकती तो उसे कानूनन वैध क्यों नहीं बना देती है। सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नही लग रही है। अगर यही सही है तो सरकार भ्रष्टाचार को कानूनी स्वरूप दे दे।
 
सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी अपने आप में अत्यंत महात्वपूर्ण और आत्मावलोकन करने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है, किन्तु धरातल की हकीकत को अगर देखा जाए तो यह टिप्पणी आम आदमी की लाचारी को ज्यादा परिलक्षित करती है। सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कोर्ट की टिप्पणी भले ही आबकारी, आयकर और बिक्रकर विभाग के बारे में हो पर यह सच है कि संपूर्ण सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार का लकवा मार चुका है। भ्रष्ट सरकारी तंत्र पूरी तरह पंगु हो चुका है। हमें यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि सरकार चलाने वाले जनसेवक नपुंसक हो चुके हैं, उनकी मोटी चमड़ी पर नैतिकता के पाठ की सीख का कोई असर नहीं होने वाला है।
 
देश में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि ‘‘सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का‘‘ की तर्ज पर जब भ्रष्टाचार पर अकोड़ा और अंकुश कसने वाले ही भ्रष्टाचार के समुंदर में डुबकी लगा रहे हों, तब आम आदमी की बुरी गत होना स्वाभाविक ही है। विजलेंस विभाग आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, पर सरकार में बैठे शीर्ष अधिकारी अपने निहित स्वार्थों के लिए अपने खुद के लिए बस धृतराष्ट की भूमिका को ही उपयुक्त मान रहे हैं।
 
भारत गणराज्य की स्थापना के साथ ही यहां का प्रजातंत्र तीन स्तंभों पर टिका बताया गया था। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका। इसके अलावा इन तीनों पर नजर रखने के लिए ‘‘मीडिया‘‘ को प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर अघोषित मान्यता दी गई थी। विडम्बना यह है कि मीडिया भी इन्हीं भ्रष्टाचारियों की थाप पर मुजरा करते आ रहा है। अपने निहित स्वार्थों के लिए मीडिया ने भी अपनी विश्वसनीयता को खो दिया है। देश भर मंे हर जगह नेता विशेष के चंद टुकड़ों के आगे मीडिया ने अपनी पहचान मिटा दी है। नेताओं द्वारा मीडिया को अपनी इस सांठगांठ में मिलाने के लिए उन्हें राजनैतिक दलों का सदस्य बना लिया जाता है फिर वह मेनेज्ड मीडिया सरकार की वह उजली छवि पेश करता है कि लोगों को लगने लगता है कि फलां नेता भ्रष्टाचारी हो ही नहीं सकता यह उसके खिलाफ विरोधियों का षणयंत्र ही है।
 
इस समय सरकार में शामिल न होकर भी सरकार का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के पति मरहूम राजीव गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री कहा था कि केंद्र सरकार से भेजा जाने वाले एक रूपए में से पंद्रह पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। यह बात उन्होंने अस्सी के दशक के पूर्वाध में कही थी। अगर उस वक्त यह आलम था तो आज तो सारी योजनाएं ही कागजों पर सिमटकर रह जाती हैं।
 
विचित्र किन्तु सत्य की बात भी सरकारें ही चरितार्थ करती हैं। राज्य या केद्र सरकार ही योजनाएं बनाती है, उन योजनाओं के लिए धन जुटाकर आवंटित करती हैं, योजनाओं को अमली जामा भी सरकारों द्वारा पहनाया जाता है। योजनाएं पूरी होने पर उनकी समीक्षा भी सरकारों द्वारा ही की जाती है। इस समीक्षा में अंत में निश्कर्ष यही आता है कि उस योजना में वह खामी थी या फिर उस योजना का पूरा लाभ जनता को नहीं मिल पाया। यक्ष प्रश्न तो यह है कि योजना किसने बनाई और किसने क्रियान्वित की? जाहिर है सरकारी सिस्टम ने, तब इसके लिए जवाबदेही तय होना चाहिए या नहीं और अगर पूरा लाभ नहीं मिल पाया तो इस तरह पानी मंे बहाई गई राशि को सरकारी तन्खवाह पाने वालों के वेतन से उसे वसूल क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
 
भ्रष्टाचार की अनुगूंज के मध्य भ्रष्टाचार रोकने के लिए तैनात लोकायुक्त ने भी एक सुर से संवैधानिक अधिकारों की मांग आरंभ कर दी है। लोकायुक्त चाहते हैं कि केंद्र सरकार संसद में एक विधेयक लाकर लोकायुक्त संगठन को समेचे देश में एकरूपता प्रदान करे। अब तक अमूमन लोकायुक्त के पद पर किसी बड़ी अदालत के ही सेवानिवृत न्यायधीश को लोकायुक्त बनाया गया है। पिछले चार दशकों का इतिहास इस बात का गवाह माना जा सकता है कि लोकायुक्त द्वारा अब तक छोटे मोटे शिकार के अलावा कौन सी बड़ी मछली को पकड़कर सजा दिलाई हो।
 
महज रस्म अदायगी के लिए तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी पर प्रकरण बनाकर लोकायुक्त संगठन द्वारा भी रस्म अदायगी ही की जाती रही है। भारत गणराज्य के हर सूबे में लोकायुक्त संगठन ने मंत्री, बड़े अधिकारियों नौकरशाहों या दिग्गजों को दागी करार दिया है, बावजूद इसके किसी के खिलाफ भी कार्यवाही न किया जाना भारत के ‘‘सिस्टम की गुणवत्ता‘‘ की ओर इशारा करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।
 
भारत सरकार के कानून मंत्री भले ही भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए वचनबद्ध होने का स्वांग रच रहे हों, लोकायुक्त संगठनों को अधिक ताकतवर बनाने का प्रयास करने का दिखावा कर रहे हों, पर क्या उनमें इतना माद्दा है कि वे स्वयं इस बात की ताकीद लोकायुक्त संगठनों से करें कि उनके पास कितने प्रकरण लंबित हैं, और कितनी शिकायतों पर लोकायुक्त संगठनों ने क्या कार्यवाही की, किन प्रकरणांे को किस आधार पर नस्तीबद्ध किया गया। दरअसल लोकायुक्त के पास जाने का साहस आम आदमी जुटा नहीं पाता है, इसलिए कम ही लोगों को इस बात की जानकारी हो पाती है कि किसके खिलाफ शिकायत हुई और क्या कार्यवाही हुई।
 
रही बात देश के चौथे स्तंभ मीडिया की तो मीडिया के पास जब लोकायुक्त में दर्ज प्रकरणों की जानकारी आती है, तो मीडिया भी उसका इस्तेमाल ‘‘अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह चीन्ह कर देय‘‘ की तर्ज पर ही करता है। हर सूबे में भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री, नौकरशाहों, दिग्गजों की लंबी फेहरिस्त होगी पर कार्यवाही अंजाम तक किसी भी मामले में नहीं पहुंच पाना निश्चित तौर पर मंशा में कमी को ही परिलक्षित करता है।
 
जो पकड़ा गया वो चोर, बाकी सब साहूकार का सिस्टम आज सरकारी तंत्र में पसरा है। जो भी रिश्वत लेते पकड़ा जाए उसे ही चोर माना जाता है बाकी सारे तंत्र में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की तरह अंगीकार कर लिया गया है। इस मामले में एक वाक्ये का जिकर लाजिमी होगा। मध्य प्रदेश में पंचायती राज की स्थापना के उपरांत प्रदेश मंत्रालय के एक उपसचिव स्तर के अधिकारी स्व.आर.के.तिवारी द्वारा पूूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी से भेंट के दौरान त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यख्या की गई थी। उन्होंने स्व. राजीव गांधी से कहा था कि मध्य प्रदेश में तीन स्तर पर पंचायती (भ्रष्टाचार) राज कायम है।
 
पहला है सचिवालय जहां नीति निर्धारक बैठते हैं इसे अंग्रेजी में ‘‘सेकरेटरिएट‘‘ कहते हैं इसका नाम बदलकर ‘सीक्रेट रेट‘ कर देना चाहिए, क्योंकि यहां हर काम का रेट सीक्रेट है। हो सकता है आपका काम एक दारू की बॉटल में हो जाए न काहो कि दस लाख में हो। यहां हर काम का रेट सीक्रेट यानी गुप्त ही है।
 
दूसरा है संचालनालय जिसे आंग्ल भाषा में ‘‘डायरेक्ट रेट‘‘ कहते हैं। संचालनालय में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए हर विभाग के आला अधिकारी की तैनाती होती है। अपने आंग्ल नाम को मूर्त रूप देता है यह सरकारी कार्यालय। अर्थात यहां हर बात का डारेक्ट यानी सीधा रेट है। फलां काम में डेढ़ परसेंट लगेगा, फलां काम में आवंटन के लिए तीन परसेंट देना होगा वरना आप अपनी व्यवस्था देख लीजिए।
 
अब दो स्तर के बाद तीसरा स्तर आता है जिलों का। हर जिले में इन सरकारी योजनाओं को मैदानी अफसरान द्वारा अमली जामा पहनाया जाता है। हर जिले में जिलाध्यक्ष का कार्यालय होता है। जिलाध्यक्ष का नियंत्रण समूचे जिले पर होता है। जिलाध्यक्ष का काम ही हर बात पर नजर रखना होता है। अंग्रेजी में जिलाध्यक्ष के कार्यालय को ‘‘कलेक्ट रेट‘‘ कहा जाता है। अर्थात जिलांे में प्रदेश या केंद्र सरकार से आने वाली राशि को कलेक्ट किया जाता है, इधर रेट का सवाल ही पैदा नहीं होता है, यहां तो बस कलेक्ट करने का काम ही होता है।
 
हर सूबे में राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो अर्थात ईओडब्लू अपनी अपनी तर्ज और नाम से काम कर रहे हैं। यह पुलिस का ही एक विंग है, जिसका काम आर्थिक तौर पर हो रहे अपराधों पर नजर रखने का है। सरकारी सिस्टम में आर्थिक तौर पर होने वाले अपराधों की जानकारी ईओडब्लू को देने पर उनका फर्ज तत्काल कार्यवाही करने का है। अमूमन देखा गया है कि ईओडब्लू के मातहत सूचना मिलने पर आरोपी से ही भावताव करने जुट जाते हैं। शायद ही कोई सूबा एसा बचा हो जिसमें आर्थिक अपराध रोकने वाली शाखा में दागी अफसर कर्मचारियों की तैनाती न हो। इन परिस्थितियों मंे अगर इन्हें और अधिक साधन संपन्न बना दिया गया तो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार का ग्राफ और अधिक बढ़ जाएगा, क्योंकि भ्रष्टाचारी को बचने के लिए इन संगठनों को अधिक राशि रिजर्व स्टाक में रखना पड़ेगा जो उसे अलग से कमानी होगी।
 
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और रसायन मंत्री राम विलास पासवान के बीच भ्रष्टाचार को लेकर हुए कथित संवाद को सियासी गलियारों में चटखारे लेकर सुनाया जाता था। यह वार्तालाप उनके बीच हुआ अथवा नहीं यह तो वे दोनों ही जाने पर चटखारे लेकर किस्से अवश्य सुनाए जाते रहे। कहा जाता है कि जब राम विलास पासवान के मंत्रालय में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंचा तो डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें बुला भेजा, और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बात कही। इस पर पासवान भड़क गए और बोले आप हमें मंत्री मण्डल से बाहर कर दें तो बेहतर होगा, हम इसे रोक नहीं सकते, क्योंकि हमें पार्टी चलाना है। पार्टी का खर्च हम आखिर कहां से निकालेंगे?
 
अस्सी के दशक तक शैक्षणिक संस्थानों में नैतिकता का पाठ सबसे पहले पढ़ाया जाता था। अस्सी के दशक के उपरांत जब से शिक्षा का व्यवसाईकरण हुआ है, तब से आने वाली पौध को नैतिकता का पाठ ही नहीं पढ़ाया जा रहा है। इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक स्तर घटिया हो, देश का भविष्य तैयार करवाने वाले शिक्षक शालाओं के बजाए निजी तौर पर ट्यूशन पर जोर दे रहे हों, निजी स्कूलों ने शिक्षा को व्यवसाय बना लिया हो, तब बच्चों को आदर्श और नेतिकता कौन सिखाएगा।
 
वैसे भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों और मीडिया के भ्रष्ट लोगों के गठजोड़ ने देश को भ्रष्टाचार की अंधी सुरंग में ढकेल दिया है। नैतिकता की दुहाई देकर उसे अपने से कोसों दूर रखने वाले लोगांे ने भारत को अंधेरे में बहुत दूर ले जाया गया है। आज आप किसी भी सरकारी दफ्तर में चले जाएं बिना रिश्वत के आपका कोई काम नहीं हो सकता है। और तो और अब तो मंत्रीपद पाने के लिए भी रिश्वत का सहारा लिया जाने लगा है। देश के अनेक जिलों के कलेक्टर्स के पद भी बिकने लगे हैं। देश में परिवहन, आयकर, विक्रयकर, वाणिज्य आदि जैसे मलाईदार विभागों में तो बिना रिश्वत के एक भी तैनाती नहीं हो सकती है।
 
बहरहाल माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार के बारे में अपनी चिंता जताकर सरकार को जगाने का प्रयास किया है। न्यायालय का कहना सही है अगर भ्रष्टाचार का खत्मा नहीं किया जा सकता है तो कम से कम इसे कानूनी जामा पहना दिया जाए, ताकि काम कराने वाले को किसी भी काम के लिए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क की तर्ज पर यह बात तो पता हो कि किस काम के लिए कितनी राशि बतौर ‘चढ़ावा‘, ‘सुविधा शुल्क‘, ‘चढोत्री‘, ‘वजन‘ अथवा ‘शिष्टाचार‘ आदि के लिए अदा करनी है।
 
जरूरत इस बात की है कि सरकार एक नई व्यवस्था को बनाए, जिसमें हर एक व्यक्तिक की जवाबदेही तय हो, जो इस व्यवस्था का पालन ईमानदारी से न करे, उससे राशि वसूली जाए और उसे आर्थिक और सामाजिक तौर पर दण्डित भी किया जाए। इसके लिए महती जरूरत सरकारी तंत्र में शीर्ष में बैठे लोगों को ईमानदार होने की है। अगर वे ईमानदारी से प्रयास करेंगे तो देश को भ्रष्टाचार के केंसर की लाईलाज बीमारी से मुक्त कराने में समय नहीं लगने वाला, किन्तु पुरानी कहावत है कि ‘‘जगाया उसे जाता है, जो सो राहा हो, किन्तु जो सोने का स्वांग रचे उसे आप चाहकर भी नहीं जगा सकते हैं।‘‘

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

यम का वाहक बनी बीसीजी वेक्सीन

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

यम का वाहक बनी बीसीजी वेक्सीन

देश के हृदय प्रदेश में आदिवासी बाहुल्य जिले डिंडोरी मंे बच्चों को लगने वाले टीके ही काल के गाल में समाने का कारण बनते जा रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश में डिंडोरी जिले के बजाग तहसील में बीसीजी और खसरा के टीका लगाने के बाद क्षेत्र के विक्रमपुर गांव के डेढ दर्जन से ज्यादा बच्चे बीमार पड़ गए जिन्हें सरकारी अस्पताल में दाखिल करा दिया गया। इनमें से दो बच्चे काल कलवित कर दिया। इसके अलावा बाद में दो बच्चों को और काल ने अपना ग्रास बना लिया। प्रशासन ने भी वेक्सीन का सेंपल लेकर उसे सील नहीं किया गया। गौरतलब है कि पूर्व में 24 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की टीम ने डिंडोरी जिले के अस्पतालों का अचानक ही निरीक्षण किया था जिसमें उन्होंने वेक्सीन को खराब पाया था। अपने प्रतिवेदन में अधिकारियों ने साफ कहा था कि वेक्सीन को उसके लिए प्रदाय किए गए डीप फ्रीजर में रखने के बजाए गरम वातावरण में रखा गया था, और डीप फ्रीजर में कोल्ड ड्रिंक की बोतलें शोभा बढ़ा रही थीं।


कांग्रेस ने हाईजेक किया भाजपा को!

देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को अपने कब्जे में ले लिया है। जी हां, यह सच है!, इंटरनेट के हेकर्स ने भाजपा की वेव साईट बीजेपी डॉट काम को हेक कर लिया है। वेव ब्राउजर के एड्रेस बार पर बीजेपी डॉट काम टाईप करते ही आप कांग्रेस की वेव साईट पर पहुंच जाते हैं। भाजपा ने इस मामले में कांग्रेस को कानूनी नोटिस भेज दिया है। यद्यपि कांग्रेस भाजपा के इस आरोप को सिरे से खारिज कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि तकनीकि गडबडी के कारण एसा संभव हो सकता है, किन्तु भाजपा इसे अपनी पहचान को चोरी करने का मामला बता रही है। वैसे भी कांग्रेस और भाजपा में मुद्दों को लेकर अब तक हुए द्वंद में कांग्रेस ही भारी पडती दिखी है। इस बार भी अगर कांग्रेस के आईटी सेल ने कोई कारनामा कर दिखाया हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

10 जनपथ से सुरेश पचौरी की बिदाई तय

स्व.राजीव गांधी के जमाने से दस जनपथ (स्व.राजीव, सोनिया का सरकारी आवास, और कांग्रेस का सत्ता और शक्ति का शीर्ष केंद्र) की शान रहे मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष सुरेश पचौरी का शनि पिछले दो सालों से बहुत ज्यादा भारी चल रहा है। सबसे पहले तो दो साल पहले राज्य सभा की सदस्यता का नवीनीकरण न हो पाने से मंत्री पद तजना पड़ा, फिर वे मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनाकर भेज दिए गए। पचौरी के नेतृत्व में लोकसभा और विधानसभा में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। आंकड़ों के बाजीगर पचौरी ने कांग्रेस का जनाधार बढ़ा हुआ बताकर सोनिया गांधी को प्रसन्न करने का प्रयास किया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के हाल ही के मध्य प्रदेश दौरे में पचौरी की 10 जनपथ से दूरी साफ दिखाई पड़ी जब राहुल ने सुरेश पचौरी से मंच पर ही प्रश्न कर दिया कि आपको चेहरे से कितने लोग जानते हैं, जब अध्यक्ष का यह आलम है तो फिर पार्टी का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कहते हैं अब सुरेश पचौरी एक बार फिर संजीवनी की तलाश में हैं, और वे राजमाता के गण अहमद पटेल की गणेश परिक्रमा में जुट गए हैं।

टिफिन वाले गडकरी!

भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम नितिन गडकरी की ताजपोशी को लगभग एक साल होने को आया है, किन्तु अब तक भारतीय जनता पार्टी कोई चमत्कार करती नहीं दिख रही है। भाजपाध्यक्ष गडकरी भले ही कार्यकर्ताओं नेताओं से घुलने मिलने के दावे करते हांे, पर एक मामले में वे बहुत ही पाबंद नजर आ रहे हैं, और यह मामला है गडकरी का अपना भोजन साथ लेकर चलना। देखा गया है कि गडकरी जब भी कहीं प्रवास पर जाते हैं, वे अपने साथ दो से चार टिफिन अवश्य ही ले जाते हैं। गडकरी के निकटवर्ती सूत्रांे का दावा है कि गडकरी भुमका गिरी अर्थात जादूटोने से बहुत ज्यादा भयभीत रहते हैं, उन्हें डर है कि कहीं कोई उन्हें कुछ खिला पिला न दे। दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि गडकरी की जीभ है कि मानती ही नहीं, सो वे अपने चटोरेपन की आदत के चलते अपने मनपसंद व्यंजन साथ ही लेकर चलते हैं, ताकि जो भी चीज उन्हें खाने का मन हो, वे तत्काल टिफिन खोलकर उसका स्वाद ले सकें। बेचारे मेजबान खान पान के मामले में तो अपने अध्यक्ष को प्रसन्न करने की स्थिति में ही नहीं रह पाते हैं।

मेहरबान है भाजपा कमल नाथ पर!

मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की थाप पर नृत्य की मुद्रा में ही दिख रही है। कोई भी मंत्री दिल्ली यात्रा पर हो, और कमल नाथ से भेंट मुलाकात न करे यह संभव ही नहीं है। मध्य प्रदेश भाजपा के मुख्यमंत्री सहित सारे के सारे मंत्री कमल नाथ के आशियाने 01 तुगलक रोड़ की चौखट चूमते ही नजर आते हैं। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर जब विदेश से लौटे तब उन्होंने कमल नाथ को सलामी देना नहीं भूला। इधर प्रदेश भाजपा द्वारा कमल नाथ को घेरने 05 से 07 अक्टूॅबर तक एन एच पर पड़ने वाले कस्बों में हस्ताक्षर अभियान का आगाज किया था, किन्तु सत्ता और संगठन के बीच समन्वय के अभाव के चलते यह आंदोलन भी चारों खाने चित्त ही गिर पड़ा है। रविवार तक मीडिया को इस बात से वंचित ही रखा गया है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ मध्य प्रदेश के एनएच पर पड़ने वाले कितने गांवों में कितने हस्ताक्षर करवाए गए? लगता है लोग सच ही कहते है सियासी जादूगर कमल नाथ के पास कोई जड़ी है, जिसे वे विपक्षी को भी सुंघा दें तो वह भी कमल नाथ की भाषा ही बोलने लगता है।

कैंसर ने बनाया भ्रष्टाचारी

देश में भ्रष्टाचार कैंसर से भी बड़ी लाईलाज बीमारी बन गया है, किन्तु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक सरकारी कर्मचारी वह भी महिला ने भ्रष्टाचार इसलिए किया क्योंकि उसे खुद को हुए कैंसर का इलाज करवाना था। सेंट्रल एक्साईज के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि हाल ही में मुंबई में रिश्वत के मामले में पकड़ी गई विभाग की अधीक्षक रंजना बोब्बाल एक निहायत ही ईमानदार कर्मचारी है। बोब्बाल को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने रिश्वत के आरोप में पकड़ा है। सूत्र बताते हैं कि बोब्बाल के घर से सीबीआई को कुछ भी नहीं मिला। महिला अधिकारी अगर रिश्वत लेने की आदी होती तो निश्चित तौर पर उसके घर से नगद या अन्य कागजात एफडी, जमीन जायदाद के कागज अवश्य ही मिलते, वस्तुतः एसा हुआ नही। सूत्रों की माने तो रंजना एक निहायत ही शरीफ और ईमानदार कर्मचारी थी। बाद में उसे जब कैंसर हुआ तब उसका काफी धन इलाज में व्यय हो गया। आगे इलाज के लिए पैसे जुटाने की गरज से रंजना ने भ्रष्टाचार का सहारा लिया। धन्य है भारत सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था, कि एक कर्मचारी को इसके लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़ा।

भाजपा के युवा गांधी की पूछ परख बढ़ी

भारतीय जनता पार्टी के युवा गांधी इन दिनों डिमांड में हैं। वरूण गांधी को रूबरू और फोन, मोबाईल पर शुभकामनाएं देने वालों की फेहरिस्त जबर्दस्त लंबी होती जा रही है। इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र स्व.संजय गांधी के इकलौते पुत्र वरूण गांधी अगले साल के आरंभ में ही पश्चिम बंगाल की बाला यामिनी राय के साथ परिणय सूत्र में आबद्ध होने जा रहे हैं। संजय गांधी के बाल सखा रहे कमल नाथ, गुलाम नवी आजाद, प्रणव मुखर्जी, मुलायम सिंह यादव, नितिन गड़करी, सुषमा स्वराज, मोहन भागवत जैसे दिग्गज भी पीलीभीत के युवा सांसद वरूण को बधाईयां प्रेषित कर चुके हैं। वरूण का देशी बाला के साथ शादी करना कांग्रेस के लिए बहुत ही मुश्किल का सबब बनता जा रहा है। गौरतलब है कि इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र स्व. संजय गांधी ने देशी बाला मेनका आनंद से विवाह किया था। दूसरी ओर कांग्रेस के प्रधानमंत्री रहे स्व.राजीव गांधी ने इटली की सोनिया मानियो को अपना जीवन साथी बनाया था, अब उनके पुत्र राहुल गांधी भी कोलंबिया की बाला को अपनी अर्धांग्नी बनाना चाह रहे हैं।

फीका रहेगा गेम्स का समापन

अरबों रूपए पानी में बहाने के बाद हो रहे राष्ट्रमण्डल खेलों के प्रति देश में लोगों के बीच वह उत्साह नहीं दिख रहा है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। अब तक भारत ने पदकों के ढेर लगा दिए हैं, किन्तु लोगों के बीच गेम्स को लेकर उत्साह और उल्लास की कमी साफ दिखाई पड़ रही है। कामन वेल्थ गेम्स की आयोजन समिति के सूत्रों का कहना है कि गेम्स के बाद होने वाली जांच की खबरों से अब आयोजन समिति की घिघ्घी बंधने लगी है, यही कारण है कि कामन वेल्थ गेम्स आर्गनाईजिंक कमेटी खेलों के समापन को सादे तौर पर संपन्न कराना चाह रही है। सूत्रों ने कहा कि पहले समापन कार्यक्रम में वालीवुड के शाहरूक खान, करीना कपूर, विद्या बालान आदि को परफारमेंस के लिए बुलाया जाना तय था, किन्तु गत दिवस निर्माण भवन में गु्रप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक के बाद लगने लगा है कि इनको नहीं बुलाया जाएगा।

बीमारी ने उमा को लाया सुर्खियों में

भारतीय जनता पार्टी की फायर ब्रांड नेता रहीं उमा भारती इन दिन फिर चर्चाओं में हैं। राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी के साथ एक बार फिर उमा भारती को देखने के बाद भाजपा की अंदरूनी सियासत में उबाल आने लगा है। एक बार फिर उमा भारती की भाजपा में वापसी के कयास तेज हो गए हैं। भाजपा और संघ में उनके शुभचिंतक और विरोधियों की सरगर्मियां एक बार फिर से बढ गईं हैं। भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय 11 अशोक रोड़ के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि मध्य प्रदेश की राजधानी के एक विलासितापूर्ण पांच सितारा अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ लेने के दौरान एल.के.आड़वाणी ने अनेक भाजपा के आला नेताओं को निर्देश दिया था कि वे जाकर उमा भारती का हाल चाल जानें। इन्हीं निर्देशों का असर था कि इसके अनुपालन में उमा के घुर विरोधी मुख्यमंत्री शिवराज ंिसंह चौहान, संघ के सह सरकार्यवाहक मदन दास देवी, स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया, डॉ.गौरी शंकर शेजवार, रूस्तम सिह आदि अनेक नेताओं की भीड लगातार बनी रही।

बडबोले युवराज से परेशान है कांग्रेस

कांग्रेस में राहुल गांधी को महिमा मण्डित करने बाकायदा मीडिया को मैनेज किया जाता है। राहुल के इर्द गिर्द सिर्फ उन्ही मीडिया पर्सन को जाने की इजाजत दी जाती है, जो कांग्रेस की मानसिकता के हैं। राहुल की पत्रकार वार्ताओं में भी मीडिया को पहले से ही प्रश्न देकर प्रश्न पुछवाए जाते हैं। इसके बदले में कांग्रेस के वित्तीय प्रबंधकों द्वारा इन गिने चुने पत्रकारों को तबियत से उपकृत किया जाता है। हाल ही में राहुल गांधी की जबान फिसल गई और राहुल ने संघ और सिमी को एक समान ही बता दिया। संघ पर सीधे वार से तिलमिलाई भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठनों ने राहुल गांधी को घेरना आरंभ कर दिया है। कांग्रेस के आला नेता अपने युवराज की इस तरह की बयानबाजी से खासे नाराज दिख रहे हैं। एक वरिष्ठ नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि राहुल के पढाने वालांे ने पता नहीं राहुल को क्या पट्टी पढ़ाई है, वरना कांग्रेस को इस बचाव की मुद्रा में नहीं आना पड़ता। गौरतलब है कि इससे पहले सिमी के संबंध में दिग्विजय सिंह द्वारा लगातार इसी तरह की बयानबाजी की जाती रही है।

अनमने मन से तैयार हो रहा खाद्य सुरक्षा विधेयक

देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा केंद्रीय कृषि मंत्री को दी गई नसीहत के बाद केंद्र में कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार बेक फुट पर आ गई है। कांग्रेस के सत्ता के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार के महात्वाकांक्षी खाद्य सुरक्षा विधेयक के मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी बहुत ज्यादा संजीदा हो चुकी हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को अपनी इस मंशा से आवगत करा दिया है कि किसी भी कीमत पर खाद्य सुरक्षा विधेयक को तैयार करवा दिया जाए। खाद्य मंत्रालय मंे अफसरान के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार सरकार को क्या सूझी है कि इस ‘‘ड्राई‘‘ सब्जेक्ट पर सब को झोंका जा रहा है। पहले कितने बेहतरीन दिन थे, सब कुछ गीला गीला था, जितना चाहे निचोड लो। प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव के चलते अब अधिकारियों को अपना अधिक से अधिक समय मंत्रालय में खाद्य सुरक्षा विधेयक के लिए देना पड रहा है, जिससे उनकी सेहत पर प्रतिकूल असर ही पड़ रहा है।

पुच्छल तारा

हर साल कुछ न कुछ अजीब संयोग बनते हैं, केलेन्डर, घड़ी आदि का संयोग भी अजीबोगरीब होता है। अहमदाबाद से प्रदीप बैस द्वारा ईमेल भेजा है जिसमें इस संयोग के बारे में बताया गया है। प्रदीप बैस लिखते हैं कि दस अक्टूबर 2010 को दस बजकर दस मिनिट और दस सेकण्ड पर एक साथ जो सामने आएगा वह होगा 10: 10: 10: 10: 10: 10 (10/10/2010: 10 बजकर 10 मिनिट 10 सेकण्ड) है न अजीब संयोग।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

वीडियोकोन की पेशकश: पकड़ो लाईफ़ का हर सिग्नल
अब यूएस और कनेडा सब एक जैसा एक पैसा
सिवनी 09 अक्टूबर। घरेलू और इलेक्ट्रानिक उपकरणांे के निर्माण में अग्रणी ‘वीडियोकोन‘ ने अब मोबाईल के क्षेत्र में आमद दे दी है। वीडियोकोन का दावा है कि वे इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि उपभोक्ता हर सिग्नल को पकड़े। वीडियोकोन का बेहतरीन नेटवर्क प्रस्तुत करता है सुपर स्ट्रांग सिग्नल और बेहतरीन साफ सुथरी निर्बाध आवाज। वीडियोकोन के नेटवर्क में काल ड्राप और नेटवर्क जाम होने वाली बातें गुजरे जमाने की बातों में समाहित हो चुकी हैं।
वीडियोकोन के सिवनी डिस्ट्रीब्यूटर विपिन सिंह राजपूत ने बताया कि 02 अगस्त को वीडियोकोन द्वारा लांच की गई आकर्षक और मनमोहक स्कीम्स की ओर मोबाईल उपभोक्ता आकर्षित हुए बिना नहीं है। इंटरनेट के उपभोक्ताओं के लिए वीडियोकोन ने अनलिमिटेड इंटरनेट प्लान महज 96 रूपए प्रतिमाह में ही उपलब्ध कराया जा रहा है। वीडियोकोन के माध्यम से अब हर महीने अनलिमिटेड डाउनलोडिंग, ब्राउजिंग, चैटिंग, ईमेल और बहुत कुछ का आनंद महज 96 रूपए में ही लिया जा सकता है।
बारापत्थर स्थित केयर कंप्यूटर के संचालय विपिन राजपूत का कहना है कि वीडियोकोन की एक अन्य आकर्षक योजना के तहत लोकल वीडियोकोन नेटवर्क पर अनलिमिटेड नम्बरों पर उपभोक्ता पा सकते हैं, अनलिमिटेड कॉल और एसएमएस हर महीने महज 59 रूपए में।
श्री राजपूत ने आगे कहा कि वीडियोकोन में महज 149 रूपए में ही 1800 मिनिट अर्थात महीने में 30 घंटा याने एक घंटा रोज उपभोक्ता बात कर सकता है। इसमंे मात्र 149 रूपए में रोजाना आधा घंटा वीडियोकोन के लोकल नेटवर्क और आधा घंटा ही अन्य नेटवर्क पर रोजाना पूरे माह बात की जा सकती है।
उन्होंने बताया कि इसके साथ ही वीडियोकोन की सबसे अधिक आकर्षक योजना के तौर पर 399 रूपए का फिक्सड मंथली चार्ज उभरकर सामने आ रहा है। इस योजना में 3000 मिनिट किसी भी लोकल नेटवर्क पर उपभोक्ता को निशुल्क प्राप्त होता है। इन दोनों ही योजनाओं में रोजाना एक सौ एसएमएस भी बिना किसी शुल्क के उपलब्ध हैं। वीडियोकोन 55 रूपए में 125 मिनिट के लोकल और एसटीडी काल हेतु टाक टाईम प्रदान कर रहा है। इसके अलावा 14 रूपए में 30 मिनिट का टॉक टाईम भी प्रदान कर रहा है।
वीडियोकोन ने एक नया धमाका किया है। वीडियोकोन का कहना है कि ‘‘न सेकण्ड का डर, न पैसों की फिकर! अब अपनों से बात कीजिए जी भरकर!!‘‘ अब वीडियोकोन एक नई आकर्षक स्कीम लाए हैं, जिसके तहत अमेरिका और कनाडा में आईएसडी काल करने पर महज एक पैसा प्रति सेकण्ड की दर से चार्ज किया जा रहा है। यह योजना 57 रूपए के रिचार्ज पर उपलब्ध है। वीडियोकोन की सभी योजनाओं में कंपनी की नियम और शर्तें लागू होंगी।

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

आदिवासी बाहुल्य सिवनी को तिरस्कार की नजरों से देख रही कांग्रेस

फोरलेन, संभाग के बाद अब मेडीकल कालेज की बारी
 
आखिर सिवनी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों कर रहे हैं महाकौशल के क्षत्रप कमल नाथ
 
(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश में भगवान शिव का जिला सिवनी पिछले लगभग दो दशकों से अपने भाग्य पर आंसू बहा रहा है। सदा से कांग्रेस का परचम लहराने वाले इस जिले ने नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कांग्रेस का साथ छोड़ना आरंभ कर दिया। जैसे ही पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा के हाथों से कांग्रेस की कमान गई वैसे ही सिवनी में कांग्रेस का सूरज अस्ताचल की ओर अग्रसर हो गया। महाकौशल के इकलौते क्षत्रप कमल नाथ द्वारा सिवनी के खाते में आने वाले सारी सौगातों को एक एक कर अपने संसदीय क्षेत्र में ले जाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। सिवनी की कोख उजाड़ कमल नाथ छिंदवाड़ा की झोली में एक के बाद एक सौगातों को ले जाने का प्रयास कर रहे हैं और सिवनी में राजनैतिक बिसात बिछाने वाली भाजपा और कांग्रेस मूकदर्शक ही बनी बैठी है। यहां तक कि मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा 05 से 07 अक्टूबर तक एनएच पर पड़ने वाले सारे कस्बों में कमल नाथ के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान के मामले में भी विज्ञप्तिवीर भाजपा ने अब तक मौन साध रखा है।

गौरतलब है कि छिंदवाड़ा, सिवनी और बालाघाट को मिलाकर संभाग बनाने की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने काफी पहले कर दी थी। इस संभाग का संभागीय मुख्यालय क्या होगा इस बारे में अनिश्चितता का कुहासा छट नहीं सका है। कमल नाथ कांग्रेस के कद्दावर नेता और महाकौशल के क्षत्रपों में उनका शुमार है। शिवराज की संभाग बनाने की घोषणा परवान नहीं चढ़ सकी। सिवनी वासी चाहते हैं चूंकि बालाघाट, छिंदवाड़ा का केंद्र सिवनी है, अतः संभाग सिवनी में बने, किन्तु कमल नाथ की चाहत छिंदवाड़ा में बनाने की है, जिससे यह मामला एक साल से भी अधिक समय से अधर में लटका है।
 
संभाग के मसले के उपरांत दूसरा मुख्य मसला अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का है। इस परियोजना के अभिन्न अंग उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे से सिवनी जिले को गायब करने के षणयंत्र का तान बाना बुना जा रहा है। सिवनी की फिजां में तैर रही चर्चाओं में इस ताने बाने के लिए समीपस्थ जिला छिंदवाडा के संसद सदस्य और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ (जिनके मंत्रालय द्वारा इस सड़क के निर्माण का काम करवाया जा रहा है) को ही दोषी माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस सड़क को सिवनी के बजाए छिंदवाड़ा से ले जाने के लिए वे लालायित हैं।
 
फोरलेन के विवाद में कमल नाथ का नाम इसलिए प्रमुखता से लिया जा रहा है, क्योकि उन्होंने राज्य सभा में एक बयान देकर सभी को चौंका दिया था कि वे इस उत्तर दक्षिण गलियारे को सिवनी के बजाए अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा से होकर गुजारने के ख्वाईशमंद थे। कमल नाथ की दो टूक बात पर भी भाजपा के मध्य प्रदेश के रखवाले संसद सदस्य, विधायक और संगठन भी धृतराष्ट्र की भूमिका में रहा। कहा जा रहा है कि सियासी जादूगर कमल नाथ ने अपने कारिंदों के जरिए भाजपा की एक एक सीढ़ी को सेट कर लिया, तभी मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की किसी भी इकाई, किसी भी विधायक, किसी भी संसद सदस्य, पूर्व विधायक सांसद ने कमल नाथ के खिलाफ मुंह खोलने का साहस नहीं जुटाया।
 
बाद में खबर आई कि भाजपा अब कमल नाथ को घेरने का प्रयास करेगी। भाजपा का कहना है कि वह 5 से 7 अक्टूबर तक नेशनल हाईवे पर पड़ने वाले कस्बों और ग्रामों में हस्ताक्षर अभियान चलाएगी फिर 22 से 24 अक्टूबर तक इन्ही ग्रामों में मानव श्रंखला बनाई जाने के उपरांत 10 नवंबर को भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष 10 नवंबर को प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे। भाजपा के इस निर्णय से कमल नाथ और भाजपा के बीच नूरा कुश्ती और तेज हो गई है, इसका कारण यह है कि भाजपाध्यक्ष प्रभात झा इन दिनों प्रदेश के दौरे पर हैं, वे राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे अवस्थित जिला, तहसील, विकासखण्ड मुख्यालयों के अलावा गांवों और कस्बों से भी विचर रहे हैं और उन्होंने कहीं भी अपने कार्यकर्ताओं को प्रदेश पदाधिकारियों के इस महत्वपूर्ण निर्णय की जानकारी देकर इसे सफल बनाने का आव्हान नहीं किया है। आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि प्रभात झा खुद भी सड़क मार्ग से गुजर रहे हैं, और सड़कों पर हिचकोले खाती चलती उनकी आलीशान विलासिता पूर्ण गाड़ी के बाद भी उनकी तंद्रा नहीं टूट पा रही है।
 
मध्य प्रदेश भाजपा के इस निर्णय और आदेश के बाद भी प्रदेश में भाजपा ने 06 अक्टूबर तक इस अभियान के बारे में मौन साध रखा है। कल इस मामले में अभियान का अंतिम दिन है। सत्ता के मद में मदमस्त भाजपा का आलम यह है कि भाजपा द्वारा प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ने वाले कस्बों की स्थानीय भाजपा इकाईयों को इस मामले में ताकीद तक नहीं किया है। प्रदेश मंे अनेक कस्बाई भाजपाईयों को प्रदेश सरकार के इस पोल खोल अभियान के बारे में पता तक नही है, जबकि भाजपा के मुख्य निजाम नितिन गड़करी खुद कस्बाई राजनीति से चलकर देश के शिखर पर पहुंचे हैं। कहा जा रहा है कि चूंकि यह मामला केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और उनके मंत्रालय के खिलाफ है, और माना जाता है कि भाजपा के नेता कमल नाथ से पूरी तरह ‘सेट‘ हैं, अतः वे कमल नाथ का खुलकर विरोध करने में अपने आप को असहज ही महसूस कर रहे हैं।
 
वरना और क्या कारण हो सकता है कि कांग्रेस के महासचिव सिवनी प्रवास पर आएं और फोरलेन मामले में स्थानीय भाजपा खामोशी अख्तियार करे। फोरलेन का प्रकरण भले ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हो, किन्तु भाजपा के साथ ही साथ सभी इस बात से भली भांति परिचित हैं कि इस मामले में मुख्य दोषी भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का अपना राग ही माना जा रहा है। राहुल गांधी के आगमन के दिन ही इस मामले में हमने जिला भाजपाध्यक्ष सुजीत जैन एवं पूर्व विधायक नरेश दिवाकर से इस मसले पर चर्चा कर भाजपा का स्टेंड जानना चाहा था, किन्तु बाद में भाजपा का मौन सबसे अधिक आश्चर्यजनक ही लगा। हो सकता है सियासी जादूगर कमल नाथ का दांव स्थानीय स्तर पर भी कारगर हो रहा हो। गौरतलब है कि हमने अपने पूर्व आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि सिवनी में राजनीति करने वालों ने अगर सिवनी के हितों को कमल नाथ के पास गिरवी रख दिया हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
 
इसके अलावा पेंच परियोजना से सिवनी जिले के किसानों को लाभ होने वाला है, किन्तु पेंच सिंचाई परियोजना में भी कमल नाथ द्वारा फच्चर फसाया बताया जाता है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा केंद्र को भेजे गए सिंचाई विभाग के 1560 करोड़ रूपयों के प्रस्तावों पर कुंडली मारकर बैठा जा रहा है। केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपने अपने क्षेत्रों के सबसे अधिक प्रस्ताव केंद्र के पास लंबित पड़े हुए हैं।
 
इंडो जर्मन बायलेटरल डेव्हलपमेंट को ऑपरेशन के तहत पेंच वृहद परियोजना, तीन मध्यम परियोजना और 28 लघु सिंचाई योजनाओं के 853 करोड़ 20 लाख रूप्ए के प्रस्ताव राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार को भेजे गए हैं। छिदवाड़ा संसदीय क्षेत्र की पेंच व्यपवर्तन परियोजना की निवेश निकासी की स्वीकृति भी केंद्रीय जल संसाधन विभाग के मंत्रालय की सीढीयां चढ और उतर रही है। इन प्रस्तावों को स्वीकृत करने में स्थानीय जनसेवकों की मंशाएं आड़े आ रही हैं, जिससे समूचा खेल ही बिगड गया है। छिंदवाड़ा जिले की महात्वाकांक्षी पेंच परियोजना पर तो छिंदवाड़ा जिले और संसदीय क्षेत्र पर 1980 से (1997 के जबरिया उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के हाथों पटखनी खाने वाले तत्कालीन किंगमेकर कमल नाथ की पराजय को छोड़कर) कब्जा जमाने वाले कमल नाथ द्वारा ही अड़ंगा लगाने के आरोप छिंदवाड़ा के भाजपाईयों द्वारा खुले तौर पर लगाए जाते रहे हैं।
 
आश्चर्य का विषय तो यह है कि किसान हितैषी होने का दावा करने वाली कांग्रेस द्वारा मध्य प्रदेश के सिवनी और छिंदवाड़ा सहित महाराष्ट्र के लाखों किसान परिवारों के फायदे वाली पेंच परियोजना को हरी झंडी न दिखाई जा रही हो। पेंच परियोजना में कांग्रेस के क्षत्रपों द्वारा फच्चर पिछले पंद्रह सालों से फंसाए जाते रहे हैं। कहा जा रहा है कि मनमानी फर्म को इसका ठेका न दिए जाना भी एक प्रमुख कारण है।
 
बहरहाल कांग्रेस की वयोवृद्ध नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा ही अंतिम कांग्रेसी रहीं हैं, जिन्होंने सिवनी जिले को कुछ न कुछ प्रदान किया है, अंतिम कांग्रेसी इसलिए क्योंकि उनके द्वारा प्रदत्त सारी सौगातों में ईमानदारी की सौंधी गंध आज भी बरकरार है। मामला चाहे संजय सरोवर परियोजना (भीमगढ़ बांध) का हो, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी कार्यालय का, सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता कार्यालय का, नेशनल हाईवे के कार्यपालन यंत्री, लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण यंत्री, राज्य सड़क परिवहन निगम के संभागीय कार्यायल और वर्कशाप आदि का, हर मामले में सुश्री विमला वर्मा ने सबसे पहले सिवनी वासियों का हित ही साधा।
 
सुश्री वर्मा के सक्रिय राजनीति से किनारा करते ही मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन का संभागीय वर्कशाप सिवनी से उठकर छिंदवाड़ा स्थानांतरित कर दिया गया। कहते है। यह कमल नाथ की मंशा पर हुआ, चलिए मान लिया जाए कि कमल नाथ कद्दावर और ताकतवर हैं, वे चाहें तो अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में सोने की सड़कें, लोगों के लिए चांदी के महल बनवा लें, किन्तु उन्हें क्या हक बनता है कि वे सिवनी वासियों के हलक में हाथ डालकर निवाला निकालें और छिंदवाड़ा वासियों का उदर पोषण करें? दुख का विषय तो यह है कि कमल नाथ सिवनी वासियों की सौगातें ब्रितानियों की तर्ज पर लूटते रहे और सिवनी के उस समय के जिले के क्षत्रप माने जाने वाले कांग्रेसी नेता बरसाती मेंढक के मानिंद सुसुप्तावस्था में ही पड़े रहे।
 
सुश्री विमला वर्मा ने भगवान शिव की नगरी को सबसे बड़ी सौगात के तौर पर प्रियदर्शनी के नाम से सुशोभित इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय दिया है। इतना विशाल जिला चिकित्सालय आसपास के जिलों में भी देखने को नहीं मिलता है। इतना साफ सुथरा सर्वसुविधायुक्त चिकित्सालय देखकर आसपास के जिलों के लोग सिवनी वासियों की किस्मत पर रश्क करते थे। फिर दुर्भाग्य कहा जाएगा कि सुश्री वर्मा के बाद जिन भी सियासतदारों ने सियासत की कमान संभाली है, उन्होंने इस अस्पातल की गरिमा को बढ़ाने के बाजाए उसे ध्वस्त ही किया है।
 
एक के बाद एक करके जिला चिकित्सालय से चिकित्सकों का मोहभंग होता रहा। यहां पदस्थ रहने वाले चिकित्सकों द्वारा अस्पताल से ज्यादा अपनी निजी चिकित्सा पर ही ध्यान रमाया गया। गरीब गुरबे बीमारी में लुटते पिटते रहे। अस्पताल में संसाधनों का अभाव साफ दिखाई देने लगा। समीपस्थ महाराष्ट्र प्रदेश की संसकारधानी नागपुर के फाईव स्टार नर्सिंग होम्स के संचालक चिकित्सकों के दलाल बन गए सिवनी के नीम हकीम। जरा सी बात पर हर मरीज को नागपुर ही रिफर कर दिया जाता है। अगर यही सच्चाई है तो इतने विशाल अस्पताल के बजाए यहां एक सिटी डिस्पेंसरी खोलना ही मुनासिब होगा।
 
सुश्री विमला वर्मा ने उस दर्मयान प्रयास किए थे कि इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय के पास ही आर्युविज्ञान महाविद्यालय (मेडीकल कालेज) की स्थापना कर दी जाए, ताकि इस अस्पताल को मेडीकल कालेज अस्पताल का दर्जा दिलाया जा सके। दुर्भाग्य से सुश्री वर्मा का सपना आकार नहीं ले सका। हाल ही में जिला मुख्यालय की विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया ने सुश्री वर्मा के सपने को आगे बढ़ाने का उपक्रम किया है, वे साधुवाद की पात्र हैं।
 
श्रीमति पटेरिया ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अनेक मर्तबा सिवनी में मेडीकल कालेज खोलने की मांग की है। सीएम ने निजी क्षेत्र के कालेज को खोलने की मंशा भी व्यक्त कर दी है। जैसे ही सिवनी की किस्मत का तारा कुछ चमचमाया, एक बार फिर केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने इस मामले को अपने बाहुपाश में लेने का प्रयास आरंभ कर दिया है। केंद्रीय राजमार्ग मंत्री कमल नाथ अब अपनी कर्मभूमि छिंदवाड़ा में आर्युविज्ञान महाविद्यालय की स्थापना के लिए प्रयासरत हो गए हैं।
 
जाहिर सी बात है कि जब महाकौशल अंचल में जबलपुर के अलावा सिवनी से मेडीकल कालेज की मांग उठी फिर कांग्रेस के एक कद्दावर नेता ने छिंदवाड़ा में इसकी मांग कर दी तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तवज्जो सिवनी के बजाए छिंदवाड़ा की ओर होना स्वाभाविक ही है। वैसे भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कांग्रेस पर खासे मेहरबान हैं, उन्होंने भाजपा के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी की परवाह न करते हुए कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को राज्य अतिथि का दर्जा देकर सभी को चौंका दिया है।
 
कमल नाथ का प्रयास है कि राज्य सरकार गांधी मेडीकल कालेज भोपाल, एमवाय इंदौर, नेताजी सुभाष चंद बोस जबलपुर, श्याम शाह मेडीकल कालेज रीवा, ग्वालियर और सागर की तर्ज पर छिंदवाड़ा में भी सरकारी तौर पर मेडीकल कालेज की स्थापना कर दे। मूलतः उद्योगपति राजनेता कमल नाथ चाहें तो निजी तौर पर मेडीकल कालेज की स्थापना छिंदवाड़ा में चुटकियों में करवा सकते हैं, किन्तु वे चाहते हैं कि एक बार फिर भाजपा के शीर्ष नेता उनके सामने नतमस्तक नजर आएं कि उन्होंने भाजपा की प्रदेश सरकार को अपनी मंशा के अनुरूप ढाल लिया है। वैसे भी अनेक मामलों में राज्य सरकार और सूबे की भाजपा कमल नाथ की तान पर ही मनमोहक आकर्षक नृत्य करती नजर आई है।
 
बताते हैं कि कमल नाथ के कार्यालय ने इस आशय का एक प्रस्ताव शिवराज सिंह चौहान को प्रेषित भी किया है। इस मामले में कमल नाथ ने राज्य सरकार के सामने एक जलेबी फिर लटकाई है, कि अगर राज्य सरकार छिंदवाड़ा मे मेडीकल कालेज खोलना प्रस्तावित करती है तो केंद्र सरकार हर तरह से इस मामले में मदद को आगे आ सकती है। दूध का जला छांछ और कचौड़ी का जला समोसा भी फूंक फूंक कर खाता है की तर्ज पर अगर राज्य सरकार कमल नाथ को यह जवाब दे दे कि पहले राज्य से गुजरने वाले नेशनल हाईवे के संधारण और निर्माण के मसले को सार्वजनिक तौर पर हल किया जाए तब ही इस संबंध में कोई चर्चा संभव है! तब भाजपा की साख भी बच सकती है और कमल नाथ के इस जहर बुझे तीर से भाजपा के साथ ही साथ भगवान शिव की नगरी के वासियों को भी निजात मिल सकती है।
 
महाकौशल के आदिवासी बाहुल्य सिवनी जिले के साथ दुर्भाग्य जुडा नहीं है, वरन हमारे जनसेवकों ने ही इसे हमारे उपर लादा है। लोकसभा सीट के अवसान को भी छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र को बचाने के बदले बली चढ़ाने से देखा जा रहा है। घंसौर विधानसभा सीट का नियमविरूद्ध विलोपन भी कुछ कहता रहा। इस मामले में भाजपा पूरी तरह खामोश रही, भाजपा की खामोशी काफी कुछ बयां करने के लिए पर्याप्त कही जा सकती है। आदिवासी बाहुल्य सिवनी जिले के हितों के साथ खिलवाड़ आरंभ हुआ है नब्बे के दशक के उपरांत जब राजनीति में स्वार्थपरक राजनीति हावी हुई है। अब तो नेताओं को खुद को स्थापित करने और अपनी जेब भरने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं बचा है। यक्ष प्रश्न फिर वही है कि इन नेताओं के भुलावे, बहकावे में आकर कब तक छले जाते रहेंगे हम सिवनीवासी?

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

युवराज के औचक रात्रि विश्राम!

कितने औचक होते हैं युवराज के अचानक रात्रि विश्राम!
 
(लिमटी खरे)
 
दलित आदिवासियों के बीच रात बिताकर मीडिया की सुर्खियां बटोरने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के अचानक दलित बस्तियों में जाने की बात कितनी औचक होती है, इस बात से आम आदमी अब तक अनजान ही है। राहुल बाबा का सुरक्षा घेरा स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) का होता है, जिसमें परिंदा भी पर नहीं मार सकता है, फिर अचानक किसी अनजान जगह पर कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी का रात बिताना आसानी से गले नहीं उतरता है। वास्तविकता तो यह है कि राहुल गांधी के प्रस्तावित दौरों के स्थानों की खाक खुफिया एजंेसियों द्वारा लंबे समय पहले ही छान ली जाती है, जजमान को भी पता नहीं होता है कि उसके घर भगवान (युवराज) पधारने वाले हैं। मीडिया को भी अंतिम समय में ही ज्ञात होता है कि राहुल बाबा फलां के घर रात्रि विश्राम करने वाले हैं। कांग्रेस की राजमाता और राहुल गांधी की माता श्रीमति सोनिया गांधी को राहुल की सुरक्षा की चिंता सदा ही खाए जाती है, किन्तु एसपीजी के निदेशक की देखरेख में राहुल की सुरक्षा से वे खासी संतुष्ट नजर आती हैं। कहा जाता है कि राहुल को इस तरह के दौरों की अनुमति श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा प्रदत्त है, ताकि कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की छवि आम आदमी से जुड़ने, उनकी समस्याओं से रूबरू होने और उसके निदान की योजनाएं बनाने की बन सके। सवाल अब भी यही खड़ा है कि राहुल गांधी की इन यात्राओं से देश का क्या भला हो रहा है? एक साधारण से संसद सदस्य और कांग्रेस के महासचिव के दौरों पर भारत और सूबों की सरकार सरकारी खजाने से पानी की तरह पैसा क्यों बहाती है?

नेहरू गांधी परिवार में मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के उपरांत आगे बढ़ी पीढ़ी में तीन ही सितारे आकाश में खिले नजर आते हैं। इनमें से राजीव और सोनिया की पुत्री प्रियंका अब गांधी से वढ़ेरा हो चुकी हैं, तथा देश की सियासत से प्रत्यक्ष तौर पर एक दूरी बना चुकी हैं। इसके अलावा स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी की आखों के तारे रहे राहुल और वरूण गांधी ने अपने अपने रास्ते अलग अलग चुन रखे हैं। एक ही परिवार के दो वारिसों को अलग अलग सुरक्षा श्रेणियां सिर्फ और सिर्फ हिन्दुस्तान में ही संभव है। लोग प्रियंका में उनकी नानी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी तो राहुल में ‘‘दुश्मनों को नानी याद दिलाने वाले‘‘ स्व.राजीव गांधी की छवि देखते हैं। भारत का पूर्वाग्रही मीडिया भी अजीब है, किसी को उसी खानदान के संजय मेनका के पुत्र वरूण गांधी में किसी की छवि नहीं दिखाई देती है। स्व.संजय गांधी के बाल सखा और उनके अभिन्न मित्रों जिन्होंने राजनीतिक पायदान भी संजय गांधी के सहारे से ही चढ़ी हैं, भी वरूण गांधी से इस तरह का बरताव करते हैं जैसा कि अठ्ठारहवीं शताब्दी में सवर्णों द्वारा अछूतों से किया जाता था।
 
देश के ‘कांग्रेस और लक्ष्मीभक्त‘ दोनों ही तरह के मीडिया ने नेहरू गांधी परिवार की एक शाख जिसमें श्रीमति सोनिया और राहुल बंधे हैं, को अर्श पर इतना उपर चढ़ा दिया है कि कांग्रेस के लोग उन्हें भगवान से कम नहीं मानते हैं। राहुल गांधी जब भी जहां भी जाते हैं वहां भीड़ जुट जाती है, कांग्रेस का जनाधार बढ़ता है, युवाओं के मानस पटल पर कांग्रेस की अमिट छाप लग जाती है, कांग्रेस की गिरती साख को बचाया जा सकता है। सारी बातें मंजूर हैं, पर यह सब किस कीमत पर हो रहा है? क्या राहुल की एक यात्रा का भोगमान कांग्रेस ने भोगा है? क्या गांधी के नाम का गर्व के साथ उपयोग करने वाले राहुल ने अपनी यात्राएं महात्मा गांधी की सादगी से की हैं? जाहिर है नहीं। बापू रेल गाडी के साधारण डिब्बे में यात्रा करते थे, उन्होंने अपना पूरा जीवन सादगी के साथ बिता दिया, आधी लंगोटी में ही बापू ने अपना जीवन काटकर उन ब्रितानियों को जिनके बारे में कहा जाता था कि उनका सूरज कभी डूबता नहीं है, को डेढ़ सौ बरस के राज पाट को छोड़कर जाने पर मजबूर कर दिया। राहुल गांधी एक यात्रा में उपयोग में आने वाले विमान और हेलीकाप्टर का किराया ही अगर जोड़ लिया जाए तो एक शहर के गरीबों को एक महीना भोजन कराया जा सकता है। इसके अलावा राहुल की सुरक्षा में लगी एजेंसियों, प्रदेश सरकार का सुरक्षा बल आदि का खर्च जोड़ लिया जाए तो मंहगाई के बोझ से दबे आम आदमी की मानो चीख ही निकल जाएगी। इस कीमत पर आम आदमी के गाढ़े पसीने की कमाई से कांग्रेस द्वारा अपने आप को मजबूत करने के लिए झोंका जा रहा है राहुल गांधी को। कांग्रेस को चाहिए कि वह अपने व्ही.व्ही.आई.पी. पर होने वाले व्यय को आना पाई से केद्र और राज्य सरकार को चुकाए, क्योंकि सोनिया या राहुल की यात्राओं से देश का नहीं कांग्रेस का भला हो रहा है।
 
आज कांग्रेस की नजरों में गरीबों के मसीहा राहुल गांधी के सिर्फ जूतों पर ही गौर फरमाया जाए तो उनकी कीमत पांच अंको में होगी। राहुल गांधी की संपत्ति के बारे में देश के लोग कम ही जानते हैं। सैकड़ों करोड़ रूपयों की संपत्ति के मालिक हैं राहुल गांधी जिनकी संपत्ति में हर साल दस बीस फीसदी नहीं डेढ़ से दो सौ फीसदी का इजाफा होता है। आखिर एक संसद सदस्य के पास कौन सी एसी मशीन है कि वह अपनी संपत्ति में इस तरह हर साल बेतहाशा बढ़ोत्तरी करते जा रहे हैं। अगर उनके पास आकूत दौलत है तो उन्हें बतौर सांसद मिलने वाली तनख्वाह और वेतन को अस्वीकार कर एक नजीर पेश करना चाहिए।
 
बहरहाल कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की अचानक ही दलित बस्तियों की यात्राएं, दलित आदिवासियों के घरों पर रात बिताना उनके साथ भोजन करना, जैसी खबरों से देश के आम लोग, प्रशासन और मीडिया चकित ही रह जाता है। लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं कि राहुल गांधी जैसा ‘‘सुकुमार युवराज‘‘ आम आदमी के घर कैसे? आम आदमी यह सौच कर हैरान होता है कि कांग्रेस आखिर राहुल गांधी इस तरह की यात्राओं के माध्यम से भला क्या संदेश देना चाहती है।
 
राहुल गांधी की औचक यात्राआंे से सबसे ज्यादा खौफजदा अगर कोई है तो वह हैं यूपी की निजाम मायावती। मायावती को लगने लगा है कि राहुल की इस तरह की यात्राएं उनके दलित आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाने का काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के मनमाने दौरों से आजिज आकर यूपी के चीफ सेक्रेटरी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर अपनी अपत्ति दर्ज कराई है। यूपी सरकार का कहना है कि राहुल गांधी द्वारा यूपी प्रशासन और स्थानीय प्रशासन को सूचना दिए बिना की जाने वाली यात्राएं राहुल गांधी को प्रदत्त सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। केंद्रीय गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम राज्य की आपत्ति को सिरे से खारिज करते हैं। चिदम्बरम का कहना है कि राहुल द्वारा अपनी यात्राओं में सुरक्षा व्यवस्था के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया जा रहा है। राहुल की यात्राओं में सुरक्षा मनदण्डों का पूरा पूरा पालन किया जा रहा है। चिदम्बरम ने साफ किया है कि राहुल की यात्राओं के पहले एसपीजी द्वारा सुरक्षा के पर्याप्त इंतजामात कर दिए जाते हैं।
 
राहुल गांधी की इन औचक यात्राओं के बारे में हकीकत कुछ और बयां करती है। दरअसल, राहुल गांधी के इस तरह के औचक कार्यक्रम स्थानीय लोगों, प्रशासन, कांग्रेस पार्टी और मीडिया के लिए कोतुहल एवं आश्चर्य का विषय होते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इससे कतई अनजान नहीं होती हैं। सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों का कहना है कि इस तरह के औचक कार्यक्रमों में सुरक्षा एजेंसियों की लंबी कवायद के बाद ही इन्हें हरी झंडी दी जाती है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब भी जहां भी जाते हैं वहां जाने की योजना महीनों पहले ही बना दी जाती है।
 
राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी के इस तरह के दौरों की तैयारी एक से दो माह पहले ही आरंभ हो जाती है। सर्वप्रथम राहुल गांधी की कोर टीम यह तय करती है कि राहुल गांधी कहां जाएंगे। उस क्षेत्र की भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी जुटाई जाती है। इसके बाद राहुल गांधी के बतौर सांसद सरकारी आवास 12, तुगलक लेन में उनकी निजी टीम इसे अंतिम तौर पर अंजाम देने का काम करती है। यहां बैठे राहुल के सहयोगी कनिष्क सिंह, पंकज शंकर, सचिन राव आदि इन सारी जानकारियों को एक सूत्र में पिरोकर एसपीजी के अधिकारियों से इस बारे में विचार विमर्श करते हैं। इन सारी तैयारियों और सूचनाओं को केंद्रीय जांच एजेंसी ‘इंटेलीजेंस ब्योरो‘ द्वारा खुद अपने स्तर पर अपने सूत्रों के माध्यम से जांचा जाता है। आई बी की हरी झंडी के उपरांत ही राहुल गांधी के दौरे की तारीख तय की जाती है। राहुल गांधी के कार्यालय, एसपीजी और आईबी के अधिकारियों के बीच की कवायद को इतना गुप्त रखा जाता है कि मीडिया तक उसे पता नही कर पाती।
 
इस तरह गोपनीय तौर पर कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री का दौरा कार्यक्रम तय होता है और राहुल गांधी अचानक ही किसी दलित आदिवासी के घर पर जाकर रात बिताकर सभी को हतप्रभ कर देते है। देखा जाए तो राहुल गांधी जिस भी गांव में रात बिताने का उपक्रम करते हैं, उस गांव में एसपीजी और आईबी के कर्मचारी सादे कपड़ों में हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। इस सारे घटनाक्रम की भनक स्थानीय प्रशासन तक को नहीं हो पाती है। राहुल के रात बिताने वाले क्षेत्र में व्हीव्हीआईपी सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक एएसएल (एडवांस सिक्यूरिटी लेयर) अर्थात अग्रिम सुरक्षा कवच को पूरी तरह चाक चौबंद कर लिया जाता है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि जिस भी गांव में देश के युवराज रात बिताते हैं उस गांव में उस दिन आरजी (राहुल गांधी) की पसंद की सब्जी भी बिकती है, ताकि वे रात के खाने में उसका स्वाद ले सकें।

यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है कि राहुल गांधी की इस तरह की यात्राओं से देश का क्या भला हो रहा है? क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में आज तक कोई बड़ा आंदोलन अंजाम ले सका है जिसने देश की दिशा और दशा को बदला हो? राहुल की यात्राओं से सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस का ही भला हो रहा है। यही सच्चाई है, और इसके लिए राहुल गांधी की सुरक्षा में लगी एसपीजी, आईबी, प्रदेश सरकार का सुरक्षा अमला और सुरक्षा एजेंसियों पर होने वाले खर्च को कांग्रेस से ही वसूला जाना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस ही वह है जो राहुल गांधी के दौरों से अपना जनाधार बढ़ाकर राहुल गांधी को महिमा मण्डित कर रहे हैं। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब होता है जब विपक्ष में बैठी भाजपा और राहुल फेक्टर से सबसे अधिक घबराने वाली उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती तक इस मामले में मौन धारण कर लेती हैं।

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

गांधी परिवार में पिघल सकेगी नफरत की बर्फ!

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

क्या गांधी परिवार में पिघल सकेगी नफरत की बर्फ!
नेहरू गांधी परिवार में मोती लाल, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी के बाद वाली पीढ़ी में जब तक स्व.संजय गांधी जिन्दा थे, तब तक एका दिखाई पड़ती रही, उसके उपरांत नेहरू गांघी परिवार की एकता को मानो किसी की नजर लग गई। इंदिरा गांधी के बर्ताव से नाराज मेनका गांधी को परिवार से प्रथक कर दिया गया था। इसके बाद वाली पीढ़ी अर्थात प्रियंका वढ़ेरा, राहुल गांधी और इनके चचेरे भाई वरूण गांधी के बीच भी रिश्ते सामान्य नहीं रहे। उत्सव के मौके पर भी देवरानी मेनका और जेठानी सोनिया के बीच दूरी साफ दिखाई दी। प्रियंका के विवाह के अवसर पर भी मेनका परिदृश्य से गायब ही रहीं। अब जब स्व.संजय गांधी के सुपुत्र वरूण गांधी विवाह के बंधन में बंधने जा रहे हैं तो मेनका को उम्मीद है कि उनकी जेठानी और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया दलगत राजनैतिक प्रतिद्वंदिता को तजकर शामिल होंगी। विश्लेषकों की नजरें इस पर टिक गई हैं कि संजय मेनका के इकलौते पुत्र वरूण की शादी में ताई बाराती बनकर जाती हैं या नहीं!
पहले अहलूवालिया को बदलो फिर बदलेगा मंत्रीपद
योजना आयोग के उपाध्यक्ष सरदार मोटेंक सिंह अहलूवालिया की सख्ती से भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ, रेल मंत्री ममता बनर्जी, वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायस्वाल सहित अनेक राजनेताओं की कुर्सी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इन नेताओं ने आपसी मतभेद भुलाकर अब अहलूवालिया के खिलाफ लामबंद होना आरंभ कर दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि जिन मंत्रियों के विभाग बदलने की सुगबुगाहट चल रही है उन्होंने प्रधानमंत्री और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को दो टूक शब्दों में कह दिया है कि उनका विभाग इसी शर्त पर बदला जाए जब योजना आयोग से अहलूवालिया की रवानगी डाली जाए। खबर है कि मंत्रियों को प्रसन्न करने मांटेक सिंह अहलूवालिया को अमेरिका में भारत के राजदूत मीरा शंकर के स्थान पर पदस्थ किया जा सकता है।
कलमाड़ी की राह नहीं है आसान
आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे राष्ट्रमण्डल खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी की राह अब आसान नहीं दिख रही है। कलमाड़ी मण्डली के भ्रष्टाचार के किस्से अब आम होने से लोगों के मन में कलमाड़ी के प्रति अनादर का भाव आने लगा है। इसकी एक बानगी पिछले दिनों देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में देखने को मिली। हुआ यूं कि कलमाड़ी अपने कुछ मित्रों के साथ मौज मस्ती के इरादे से दिल्ली के एक माल में जा धमके। कलमाड़ी जैसे ही अपने निजी सुरक्षा अधिकारी को माल के बाहर छोड़कर अंदर प्रविष्ठ हुए, वैसे ही वहां लोगो ने कलमाड़ी को बिजूका (खेतों में खड़ा पुतला) की तरह आश्चर्य से देखना आरंभ कर दिया। कलमाड़ी मनमसोसकर माल के अंदर एक रेस्टोरेंट में पहुंचे, उन्होंने खाने का आर्डर दिया। जब तक खाना आता तब तक तो आसपास बैठे लोगों ने कलमाड़ी को इतना भला बुरा कहा कि कलमाड़ी और उनके दोस्तों का खाना खराब हुए बिना नहीं रह पाया।
संघ ने ओढ़ी गिरगिट की खाल: हैरान है कांग्रेस
अयोध्या मामले में लखनउ उच्च न्यायालय के फैसले के आने के बाद जिस तरह से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सुर बदले हैं, उससे कांग्रेस बुरी तरह हैरान दिखाई पड़ रही है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद संतोष जताया है। गौरतलब है कि संघ के अनुवांशिक घड़े विहिप द्वारा सदा से ही यह राग अलापा जाता रहा है कि पंचकोषीय यात्रा के अंदर कोई मस्जिद को स्वीकार नहीं किया जाएगा। अब संघ के नए आलाप से कांग्रेस खौफजदा है, कांग्रेस को लगने लगा है कि यह मामला कहीं उसके हाथों से फिसलकर भाजपा की झोली में न चला जाए। कल तक अपनी बातों पर अडिग संघ की इस नई लचीली सम्भाव की नीति ने कांग्रेस की नींद ही उड़ा दी है। माना जा रहा है कि अल्पसंख्यकांे को लुभाने, अपने पास बुलवाने और उदारवादी मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति विश्वास पैदा कराने की रणनीति का हिस्सा है संघ का यह पैंतरा।
रेत की तरह खिसल रहा है भाजपा का जनाधार
भाजपा के आला नेताओं की नींद इस बात से उड़ी हुई है कि दो सीटों से लेकर देश पर शासन करने वाली भारतीय जनता पार्टी का जनाधार बहुत ही तेजी से खिसकता जा रहा है। पार्टी प्रमुख नितिन गड़करी के करीबी सूत्रों का दावा है कि पार्टी द्वारा कराए गए अंदरूनी एवं गुप्त सर्वे में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि भाजपा का अगड़ा वोट बैंक बुरी तरह ध्वस्त हो चुका है। भाजपा द्वारा पांच चरणों में कराए गए सर्वे में साफ कहा गया है कि मतदाताओं में राहुल फेक्टर जबर्दस्त तरीके से हावी हो चुका है। साथ ही साथ राजग के पीएम इन वेटिंग के नेता प्रतिपक्ष पद से हटते ही उनकी सक्रियता में आई कमी भी इसका एक प्रमुख कारण है। वैसे भी भाजपा का चेहरा रहे अटल बिहारी बाजपेयी अब सक्रिय राजनीति को अलविदा कह चुके हैं। भाजपा के कद्दावर नेताओं को भी भाजपा के ही कुछ शातिर नेताओं ने बाहर का रास्ता दिखाकर पार्टी की जड़ों में मट्ठा डाला गया है। आक्रमक हिन्दुत्व के हिमायतियों के आईकान बन चुके नरेंद्र मोदी के पर भी काट देने से भाजपा को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
दूसरी पीढ़ी को विरासत सौंपने की तैयारी में नेता
भारत गणराज्य में अब तक राजनैतिक विरासत को एक के बाद एक पीढ़ी को हस्तांतरित करने का उदहारण सिर्फ अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही देखने को मिला है, जहां नेहरू गांधी परिवार को ही कांग्रेस की ताकतवर की पोस्ट सौंपी गई है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी इस बात के साक्षात उदहारण हैं कि राजनीति में विरासत का हस्तांतरण और अनुकम्पा नियुक्ति कितनी जल्दी मिलती है, और उसका सफल संचालन कैसे किया जा सकता है। नेहरू गांधी परिवार की तर्ज पर अब अनेक राजनेताओं ने इसको अंगीकार करना आरंभ कर दिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपने पुत्र जयवर्धन, कमल नाथ ने नकुल नाथ, स्व.माधव राव सिंधिया के उपरांत ज्योतिरादित्य सिंधिया, कुंवर अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह, राम विलास पासवान के पुत्र चिराग, लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी, शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले, मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश आदि ने राजनीति में अपने पिताओं की वसीयत को संभालना आरंभ कर दिया है।
काडर घराने की नई पेशकश
सरकारी कर्मचारियों में काडर का बहुत ही महत्व होता है। कोई अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा से है तो कोई पुलिस, विदेश, सूचना, वन आदि की सेवाओं से। केंद्र सरकार ने सिविल सर्विसिस की तर्ज पर अब पंचायत सर्विसेस नाम से नया काडर तैयार करने की कार्ययोजना पर काम किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने पंचायत काडर के मामले मंे गाईड लाईन तय कर दी गई हैं। वैसे तो देश के हृदय प्रदेश की सरकार को इस मामले में सैद्धांतिक एककतेन होना पड़ा है पर मध्य प्रदेश को इस गाईड लाईन में कुछ आपत्तियां नजर आ रही हैं। केंद्र सरकार अपनी महात्वाकांक्षी महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, सर्वशिक्षा अभियान, स्वर्ण जयंती रोजगार योजना आदि के सफल क्रियान्वयन के लिए कर्मचारियों की पर्याप्त फौज की कमी के कारण बेहद चिंतित है, यही कारण है कि केंद्र का पंचायत सर्विसेज नाम का नया काडर बनाने की सूझी है। इस नए काडर के लिए केंद्र सरकार का अंशदान अस्सी फीसदी होगा, जो हर साल दस प्रतिशत की दर से घटेगा, अर्थात आठ सालांे बाद इन कर्मचारियों के वेतन भत्तों आदि की व्यवस्था राज्यों के जिम्मे होगी। राज्यों की सरकारों को भय सता रहा है कि आने वाले समय में वे इन कर्मचारियों के वेतन भत्तों की व्यवस्था कहां से कर पाएंगे?
लो आ गया आधार!
भारत गणराज्य में यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर (यूआईडी) देने का सिलसिला आरंभ हो गया है। केंद्र सरकार की इस महात्वाकांक्षी परियोजना का पहला आधार कार्ड कांग्रेसनीत महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले मे टेंभली में आयोजित एक कार्यक्रम में वजीरेआजम डॉ. मनमोहन सिंह और यूपीए चेयरपर्सन श्रीमति सोनिया गांधी ने आदिवासी महिला रंजना सोनवने को सौंपा। 12 अंकों वाले इस आधार कार्ड की अनेक विशेषताएं हैं। इससे प्रमुख तौर पर फर्जी राशन कार्ड पर लगाम लग सकेगी। वैसे उम्मीद की जा रही थी कि इस महात्वपूर्ण योजना का आगाज कांग्रेस नीत कंेद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी की जन्मस्थली पोरबंदर, अथवा गुजरात के साबरमती या फिर भारत को आजाद कराने वाले रणबांकुरों की जन्म या कर्मस्थली से करना चाहिए था। विडम्बना है कि गुजरात में भाजपा की नरेंद्र मोदी की सरकार सत्तारूढ है, और नरेंद्र मोदी तथा कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है, विवाद भाजपा कांग्रेस का और भोगमान भोगे राष्ट्रपिता के प्रदेश की जनता।
भाजपा में वापसी को बैचेन हैं साध्वी
एक समय मंे भारतीय जनता पार्टी की फायर ब्रांड नेत्री रहीं उमा भारती द्वारा गठित भारतीय जनशक्ति पार्टी का अस्तित्व लगभग समाप्त ही होने के बाद अब उमा भारती खुद भी भाजपा में वापसी को बेचैन दिखाई पड रही हैं। पिछले दो सालों से उमा भारती के कदम ताल से साफ जाहिर हो रहा है कि उमा भारती भाजपा के समंुदर से बाहर रहकर स्वांस लेने में असहज ही महसूस कर रही हैं। वैसे भी उमा भारती को शरीर तो उनके हनुमान रहे प्रहलाद सिंह पटेल को उस शरीर का दिमाग माना जाता था। अब जबकि दिमाग और शरीर दोनों ही अलग अलग हो गए हैं तब उमा भारती काफी हद तक कमजोर ही प्रतीत हो रही हैं। 25 सितम्बर 1990 को राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी की सोमनाथ से अयोध्या यात्रा के 20 बरस पूरे होने पर उमा भारती को लोगों ने जब आड़वाणी के साथ देखा तो बहुत ही आश्चर्यचकित रह गए। तब से अनुमान लगाया जाने लगा है कि उमा भारती आने वाले नवरात्र में भाजपा में आमद दे सकती हैं। भोपाल में उमाश्री के बीमार पड़ने पर उनके पुस्ताहाल जानने सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान का जाना भी कम आश्चर्यजनक नहीं माना जा रहा है।
कांग्रेस का बसपा को झटका
दो महारानियों के बीच छिड़ी रार के चलते केंद्र और उत्तर प्रदेश की सियासत गर्माने लगी है। कांग्रेस का कहना है कि राज्यों में कानून व्यवस्था और अमन चैन की कायमी का जिम्मा सूबे की सरकार का होता है। केंद्र सरकार तो महज राज्यों के अनुरोध पर पीछे से अपना हाथ रखती है। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद में उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति के मद्देनजर मायावती की बयानबाजी के उपरांत एआईसीसी के सचिव और यूपी के इंचार्ज परवेश हाशमी ने कहा कि अगर यूपी की निजाम मायावती उत्तर प्रदेश में अमन चैन कायम नहीं रख सकतीं हैं तो उन्हंे अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए, फिर केंद्र सरकार द्वारा सूबे में अमन चैन कायम करने का प्रयास किया जाएगा। वैसे हाशमी का कहना सच है कि राज्य में अमन चैन की जवाबदारी उस राज्य की सरकार के कांधों पर ही होती है। कांग्रेस के सचिव इस बात को भी रेखांकित कर देते तो बेहतर होता कि इस तरह की सियासत में ईंधन कौन डालता आया है?
नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली . . .
आज से आरंभ होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड ध्वस्त हो चुके हैं। पैसों को पानी की तरह बहाने का शानदार प्रदर्शन किया गया है। वस्तुतः पैसे आयोजन समिति, उनके उपकृत लोगों की जेबों की शान बन गए हैं। अब गफलतों को ढाकने की कवायद जोर शोर से की जा रही है। खबर है कि खेलों मंे खिलाड़ियों को आने जाने के लिए हेलीकाप्टर का प्रयोग किया जाएगा। अरबों रूपए व्यय कर बनाए गए विशेष मार्ग, एक्सप्रेस वे, अलग लेन का अब क्या होगा? क्या भ्रष्टाचार के शिरोमणी की अघोषित उपाधि पाने वाले आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का बचाव करने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी इस बारे में दो शब्द कह पाएंगी? क्या इस तरह का भ्रष्टाचार उनके पीहर ‘‘इटली‘‘ में होता तो वे इसी तरह मूकदर्शक बनी बैठी रहतीं? और तो और अब सोनिया गांधी की शह पर कलमाड़ी यह कहने में भी गुरेज नहीं कर रहे हैं कि भारत ऑलंपिक की मेजबानी को भी तैयार है। लगता है अभी कलमाड़ी सहित कांग्रेस के आला नेताओं का पेट हजारों करोड़ रूपए गपाने के बाद भी भरा नहीं है।
राहुल भैया आएंगे, नई रोशनी लाएंगे
कांग्रेस के युवराज और उसकी ही नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी 04 अक्टूबर को सिवनी आ रहे हैं। वे आदिवासी बाहुल्य लखनादौन में कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसके पहले उनके पिता स्व.राजीव गांधी भी एक मर्तबा सिवनी आ चुके हैं। राहुल गांधी लखनादौन आएंगे तो सिवनी के युवाओं में बहुत जोश दिखाई पड़ रहा है। बच्चा बच्चा कह रहा है कि राहुल भईया आएंगे, नई रोशनी लाएंगे। जिले के कांग्रेसी बहुत खुश हैं कि राहुल गांधी के आने पर युवा झूम रहा है, किन्तु कांग्रेसियों का मुगालता तब टूटेगा जब उन्हे पता चलेगा कि युवा यह सोच सोचकर खुश हो रहा है कि राहुल गांधी द्वारा सिवनी के फोरलेन के लिए भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को कुछ नसीहत या संदेश दिया जाएगा। अगर राहुल गांधी ने इस मामले में खामोशी अख्तियार की तो फिर उनका सिवनी आना या न आना एक बराबर ही होगा। वैसे इस दिन लखनादौन के पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष दिनेश राय के लिए कांग्रेस के दरवाजे भी खुल सकते हैं।
पुच्छल तारा
छः दशकों के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि विवाद के बारे में अपना फैसला सुनाया है। केंद्र, राज्य सरकार और जिलों के प्रशासन को भय था कि कहीं इस फैसले की रोशनी में उन्माद न फैल जाए और कानून तथा व्यवस्था की स्थिति नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए। देश के हर धर्म, महजब, संप्रदाय, पंथ के लोगों ने गजब की सहनशीलता, धैर्य और संयम का परिचय दिया है। भटिंडा से पेंट व्यवसाई रजत गुप्ता ने एक शानदार जानदार ईमेल भेजा है। रजत गुप्ता लिखते हैं -
‘‘चर्चे नहीं इसान पढ़े जाते हैं!,
मजहब नही ईमान पढ़े जाते हैं!!,
भारत ही एसा देश है जहां!!!,
एक साथ ‘गीता‘ और ‘कुरान‘ पढ़े जाते हैं!!!!।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

सियासी जादूगर के जाल में भाजपा

सियासी जादूगर कमल नाथ के जाल में उलझे भाजपा के कर्णधार
 
(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश भाजपा के तीखे तेवरों के बाद प्रदेश सरकार और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के बीच रार बढ़ती ही जा रही है। भाजपा के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के केंद्रीय मंत्रियांे विशेषकर कमल नाथ के गुणगान के बाद संगठन ने इस मामले को गंभीरता से लिया और नेशनल हाईवे के मामलों में केंद्र को घेरना आरंभ कर दिया है। भाजपा के चरणबद्ध आंदोलन के आगाज ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, इसका कारण केंद्रीय मंत्रियांे और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के बीच आपसी समन्वय को ही माना जा रहा है। भले ही संगठन इस बात को लेकर खासा चिंतित हो कि 2003 में दस साल के दिग्विजयी शासन को उसने सड़क, बिजली और पानी के मामले को भुनाकर मध्य प्रदेश का ताज पाया हो, किन्तु पिछले सात सालों में प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा ने जनता के मन में भाजपा के प्रति एक असंतोष को पनपने की भूमि तैयार कर ही दी है। लोगों का कहना है कि जब वे वाहन खरीदते हैं, तभी उनके द्वारा रोड़ टेक्स की अदायगी कर दी जाती है वह भी लाईफ टाईम, तब जगह जगह टोल टेक्स की वसूली का क्या ओचित्य है। सड़क पर चलने का कर तो एक बार एक मुश्त जमा हो ही चुका है, फिर उसी मद में दुबारा वसूली क्यों और कैसे? फिर जब 2003 से अब तक स्वर्णिम चतुर्भुज और नार्थ साउथ, ईस्ट वेस्ट कारीडोर के लिए पेट्रोल डीजल पर वाहन चालकों से एक रूपए सेस वसूला जा रहा है, तब उन्ही वाहन चालकों से दुबारा टोल टेक्स वसूली को कहां तक न्याय संगत ठहराया जा सकता है?

‘‘सियासी जादूगर‘‘ एवं भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के पक्ष मंे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सूबे के लोक कर्म मंत्री नागेंद्र सिंह ने पिछले माहों में खासा तराना बजाया। मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार सियासी जादूगर की शान में बज रहे इस मनमोहक तरन्नुम में सब कुछ भूल बैठी और केंद्र के द्वारा राज्य की उपेक्षा की राष्ट्रीय भाजपा की चीख पुकार ने भी उसकी नींद में खलल नहीं डाला। भाजपा मंहगाई और मध्य प्रदेश के साथ होने वाले अन्याय को लेकर केंद्र सरकार को कोस रही थी, उधर भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों द्वारा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री के पक्ष में बयानबाजी की जा रही थी। भाजपा की नेशनल बाडी के विरोध और सरकार के पक्ष के बयानांे पर नेशनल मीडिया के सामने मुख्यमंत्री स्वयं निरूत्तर थे।

हो सकता है जब यह बात भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के कानों में डाली गई हो तब भाजपा के नेताओं के कान खड़े हुए हों, कि मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र के कुछ मंत्रियों के बीच अघोषित परोक्ष समझौते केंद्रीय मंत्रियों द्वारा ही मीडिया के समक्ष लाए जा रहे हों और उन्होंने सरकार पर लगाम कसने अपनी मध्य प्रदेश इकाई को इस बात को गंभीरता से लेने की बात कही हो। संभवतः यही कारण है कि भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों के सामने इस बात को रेखांकित किया गया। जब यह बात प्रदेश पदाधिकारियों के सामने आई तब प्रदेश भाजपा ने नेशनल हाईवे के मामले में केंद्र को आड़े हाथों लेने का फैसला लिया।
 
मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव हेतु केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा हाथ खींच लिए जाने के आरोप के साथ ही मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ सड़कों पर उतरने की बात कही जा रही है। भूतल परिवहन मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नेशनल हाईवे के संधारण के प्रस्तावों को महालेखाकार लेखा एवं हकदारी ग्वालियर के माध्यम से केंद्र को भेजना था, वह अभी तक नही भेजे गए हैं, कुछ प्रस्ताव केंद्र को प्राप्त भी हुए थे किन्तु त्रुटिपूर्ण होने के चलते केंद्र ने इन्हें नामंजूर कर दिया था। सूत्रों का आरोप है कि मध्य प्रदेश के नेशनल हाईवे के रखरखाव के लिए केंद्र सरकार से आने वाली भारी भरकम रकम में पिछले नौ सालों के रिकार्ड में जबर्दस्त गड़बड़झाला है। केंद्र सरकार को प्रस्ताव न भेजकर मध्य प्रदेश ने अपने ही खजाने में तकरीबन तीस करोड़ रूपए की चपत लगा ली है।
 
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव वैसे तो 2013 के अंत तक निर्धारित हैं, किन्तु कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के कदमताल देखकर भाजपा को भय सताने लगा है कि अगर किसी कीमत पर मध्यावधि चुनाव की नौबत आई तो प्रदेश की सत्ता भाजपा के हाथों से सियासत की मलाई रेत के ढेर की तरह फिसलने में ढेर नहीं लगने वाली। केंद्रीय भाजपा द्वारा पांच चरणों में कराए एक सर्वे की चर्चाएं भी इन दिनों सियासी हल्कों में गुलजार हो रही हैं, जिसमें आज की स्थिति में चुनाव होने की दशा में भाजपा को महज 80 सीटों पर ही संतोष करना पड़ सकता है। कांग्रेस बिना कुछ करे ही सैकड़ा पार करने की स्थिति में है। बिजली के मामले में तो आज की स्थिति पूर्व के कांग्रेस के शासनकाल से बहुत बेहतर कही जा सकती है, किन्तु सड़कों की दुर्दशा के कारण भाजपा माईनस में जाती जा रही है। विशेषकर नेशनल हाईवे की दुर्दशा को देखकर राहगीर और वाहन चालक दोनों ही मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार को पानी पी पी कर कोस रहे हैं।
 
मध्य प्रदेश में सड़कों का मामला बहुत ही संवेदनशील हो रहा है। सड़कों विशेषकर नेशनल हाईवे की स्थिति बहुत ही दयनीय होती जा रही है। संधारण के अभाव में राष्ट्रीय राजमार्ग गढ़ढों और पोखरों की सड़क में तब्दील हो गए हैं। एक तरफ नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) और लोक कर्म विभाग के नेशनल हाईवे डिवीजन्स के माध्यम से राष्ट्रीय राजमार्गों का संधारण करने की बात केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, किन्तु इसमें भी अनेक पेंच सामने आ रहे हैं।
 
अव्वल तो यह कि पीडब्लूडी के एनएच डिवीजन में पदस्थ अधिकारी और कर्मचारी मूलतः मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के ही मुलाजिम हैं, जिनके वेतन भत्ते और अन्य स्थापना व्यय का जिम्मा प्रदेश सरकार के कांधों पर ही आहूत होता है। अगर केंद्र सरकार से राष्ट्रीय राजमार्गों के संधारण की मद में राशि प्रदान नहीं की जाती है तो यह अतिरिक्त भार प्रदेश की भाजपा सरकार के कंधों पर ही आता है। जनसेवकों, मंत्रियों और नौकरशाहों की विलासिता पूर्ण जीवनशैली और फिजूलखर्ची के चलते प्रदेश सरकार की माली हालत बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही है, जिसके चलते प्रदेश सरकार इस स्थिति में नहीं प्रतीत हो रही है कि वह इस जवाबदारी का निर्वहन कर सके।
 
इसके अलावा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय के नए विंग के तौर पर अस्तित्व में आया एनएचएआई बिना बाराती के दूल्हा की भूमिका में है, अर्थात एनएचएआई के पास अपना कोई अमला नहीं है। केंद्र सरकार के भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा इसका गठन अवश्य ही कर दिया गया है, पर इसके लिए जरूरी महकमे की तैनाती के मामले में वह पूरी तरह मौन साधे बैठा है। मूलतः एनएचएआई की स्थापना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के दौरान अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्वकाल की महात्वाकांक्षी परियोजना ‘स्वर्णिम चतुर्भुज‘ और इसके अंग ‘उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम गलियारे‘ के निर्माण के लिए की गई थी। दोनों ही काम लगभग लगभग पूरे होने को हैं, इसलिए अब एनएचएआई के लिए नए काम की तलाश आरंभ कर दी गई है।
 
कहा जा रहा है कि भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ चाह रहे हैं कि राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और संधारण का जिम्मा एनएचएआई को सौंप दिया जाए। इस मामले का सबसे आश्चर्य जनक पहलू यह है कि एनएचएआई के पास भारत गणराज्य में किसी भी सूबे में एसा अमला नहीं है जो नए राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण या रखरखाव की महती जवाबदारी उठा सके। बिना किसी ठोस कार्ययोजना के एनएचएआई को इसकी जवाबदारी देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित कतई नहीं कहा जा सकता है।
 
बहरहाल कल तक केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में कशीदे गढ़ने वाले मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को अब अचानक (संगठन के कड़े रूख के उपरांत) दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई है। अब उन्हें भान हुआ है कि सबसे बड़े ‘‘सियासी जादूगर‘‘ कमल नाथ ने उन्हें अब तक जो सपने दिखाए थे, वे महज छलावा ही थे। सियासत के अखाड़े के स्वयंभू अपराजित अजेय (1997 में उपचुनाव में सुंदर लाल पटवा के हाथों जबर्दस्त पटकनी खाने को छोड़कर) योद्धा कमल नाथ ने एक ही धोबी पाट में प्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्रियों को धूल चटवा दी है। अपने पत्र में नागेंद्र सिंह लिखते हैं कि प्रदेश से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गो का रखरखाव पूरी तरह एनएचएआई के हवाले कर दिया जाए या फिर इसके संधारण का काम पूरी तरह से मध्य प्रदेश सरकार को सौंप दिया जाए।
 
वैसे नागेंद्र सिंह की पीड़ा जायज है। कमल नाथ को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा न तो मई 2010 में केंद्र को भेजे गए राष्ट्रीय राजमार्गों के प्रस्तावों को मंजूरी दी जा रही है, और न ही केंद्र द्वारा खुद ही उसका संधारण किया जा रहा है, नतीजतन ये राजमार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। नागें्रद सिंह को चाहिए कि वे इस बात को भी जनता के सामने लाएं कि उन्होंने लोक कर्म मंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश की किन किन सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील करने के प्रस्ताव कंेद्र को भेजे थे।
 
क्या कारण था कि बहुत ही कम यातायात दबाव वाले एवं कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा से गुजरने वाले नरसिंहपुर, हर्रई, सिंगोड़ी, छिंदवाड़ा, उमरानाला, सौंसर, सावनेर, नागपुर मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग मंे तब्दील करने का प्रस्ताव उनके द्वारा केंद्र सरकार को भेजा गया था? जिस प्रस्ताव पर योजना आयोग ने अपना अडंगा लगा दिया है। सियासी जादूगर कमल नाथ ने एक एसा तीर चलाया था, जिसमें भाजपा के कुशाग्र बुद्धि के धनी समझे जाने वाले जनसेवक उलझकर रह गए हैं। राज्य की अनेक सड़कों को राष्ट्रीय राजमाग में तब्दील कराने का प्रस्ताव भेजकर प्रदेश सरकार ने इन सड़कों का संधारण बंद कर दिया था।
 
राज्य सरकार को लगने लगा था कि ये सड़कें जल्द ही राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील हो जाएंगी और फिर इनके रखरखाव या निर्माण का सरदर्द केंद्र के भरोसे ही होगा, जिससे इसमें व्यय होने वाले धन से राज्य सरकार पूरी तरह मुक्त होगी। वस्तुतः एसा हुआ नहीं, ये सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील नहीं हुई और आज भी ये प्रदेश सरकार की संपत्ति ही हैं। इतना ही नहीं दीगर राष्ट्रीय राजमार्गों का संधारण भी केंद्र द्वारा नही किए जाने से, संधारण के अभाव में इन सड़कों के धुर्रे पूरी तरह से उड़ चुके हैं। आम जनता को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि ये सड़कंे किसके स्वामित्व में हैं, वह तो राज्य से गुजरने वाली हर सड़क की दुर्दशा के लिए राज्य सरकार को ही पूरी तरह दोषी मानती है, भले ही केंद्र सरकार द्वारा इसका पैसा नहीं दिया जा रहा हो।
 
सड़कों बदहाली पर जनता के गुस्से को देखकर भाजपा की शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली सरकार बुरी तरह खौफजदा साफ दिखाई दे रही है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को घेरने के लिए वह अब राष्ट्रीय राजमार्गों पर जगह जगह नोटिस बोर्ड लगाने का मन बना रही है, जिसमें इस बात का उल्लेख होगा कि इन सड़कों की बदहाली के लिए राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार कतई जवाबदार नही है। सूबे की सरकार मान रही होगी कि एसा करके कम से कम इन मार्गों पर चलने वालों को सच्चाई से रूबरू तो करवा ही दिया जाएगा।
 
जनता को इस बात से कतई लेना देना नहीं है कि सड़कें किसकी संपत्ति हैं, या इसके रख रखाव का जिम्मा किसका है। राज्य सरकार अगर बोर्ड लगा रही है तो फिर राज्य सरकार को उस नोटिस बोर्ड पर इस बात का उल्लेख भी करना चाहिए कि इसका संधारण करने वाला लोक कर्म विभाग का राष्ट्रीय राजमार्ग महकमा मूलतः किस राज्य की सेवा का अंग है। वस्तुतः इसके मातहत मध्य प्रदेश सरकार के कर्मचारी ही होते हैं। कर्मचारी मध्य प्रदेश के जिम्मेदारी केंद्र सरकार की अगर दोनों ही जगह एक दल की सरकार है, तब तो सामंजस्य बना रह सकता है, किन्तु अगर सरकारें अलग अलग दलों की हैं तो फिर सामंजस्य का अभाव निश्चित तौर पर परिलक्षित ही होगा।
 
मध्य प्रदेश की संसकारधानी जबलपुर से बरास्ता सिवनी, महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात (जिसका लखनादौन से नागपुर तक का हिस्सा उत्तर दक्षिण गलियारे का अंग बन गया है) की हालत देखकर राहगीरों और वाहन चालकांे को रोना ही आता है। आलम यह है कि वाहन चालकों को गड्ढों के बीच सड़कों को खोजना पड़ता है। अनेक स्थानों पर तो डेढ़ से दो फीट गहरे गड्ढे हो चुके हैं, सड़कों पर।
 
एसा नहीं कि इस मार्ग पर से उच्च न्यायालय एवं अन्य न्यायालयों के माननीय न्यायधीशगण, प्रदेश और केंद्र सरकार के मंत्रीगण, सांसदगण, विधायकगण, कमिश्नर, कलेक्टर, महानिरीक्षक, उपमहानिरीक्ष पुलिस, एसपी या एनएचएआई के प्रोजेक्ट डायरेक्टर विवेक जायस्वाल सहित अन्य अधिकारी न गुजरते हों, पर किसी ने भी अब तक इस बारे में संज्ञान लेने की फुर्सत नहीं उठाई है। हो सकता है इनमें से अधिकांश साहेबान सरकारी वाहनों में सफर करते हों, तो इन्हें वाहन की टूट फूट और टायर घिसाई से ज्यादा लेना देना न हो पर एक आम आदमी गाढ़े पसीने की कमाई से खरीदे गए वाहन के कलपुर्जे हिलते कैसे देख सकता है? नेशनल हाईवे पर पेंच तो इससे कुछ ही दूरी पर कान्हा नेशनल पार्क अवस्थित है। देश विदेश से आने वाले पर्यटकों द्वारा जब राष्ट्रीय राजमार्ग की दुर्दशा देखी जाती है तो निश्चित तौर उनके मानस पटल पर प्रदेश की छवि बहुत अच्छी तो कतई नहीं बन पाती होगी। वे निश्चित तौर पर मध्य प्रदेश की सड़कों को कोढ़, खाज ग्रस्त मानते होंगे, और वापस जाकर यही कहते होंगे, ‘‘इस जन्म या अगले जन्म मोहे एम पी न भेजियो‘‘।
 
कहा जा रहा है कि लखनादौन के पास बने टोल ब्रिज को इस साल के अंत तक टोल टेक्स वसूली के लिए चालू भी कर दिया जाएगा। वाहन चालकों में इस उधड़ी सड़क को देखकर वैसे ही रोष और असंतोष पनप रहा है, फिर उपर से टोल टेक्स की वसूली उनके रिसते घावों पर जख्म का ही काम करेगी। वैसे देखा जाए तो वाहन खरीदी के समय ही लिया जाने वाला रोड़ टेक्स आखिर क्यों वसूला जाता है? जाहिर है सड़क पर चलने का कर होता है रोड़ टेक्स, जब वाहन चालक एक मुश्त वाहन के पंजीयन के दौरान परिवहन विभाग के पास इसे आरंभ मंे ही जमा करा देता है, फिर टोल टेक्स किस बात का।
 
क्या सड़कों पर चलने के लिए वाहन चालकों को बार बार कर देना पड़ेगा? एक बात और यहां उल्लेखनीय है कि जब स्वर्णिम चतुर्भुज और उसके अंग उत्तर दक्षिण गलियारे के निर्माण और संधारण हेतु 2003 से अब तक पेट्रोल डीजल पर एक रूपए सेस (एक तरह का कर) लगाकर वसूल ही लिया गया है, तो फिर टोल टेक्स वसूलने की बात तो बेमानी ही है। आश्चर्य इस बात पर ज्यादा होता है कि इस मामले में केंद्र में विपक्ष में बैठी भाजपा बयानबाजी के अलावा और कुछ करती नहीं दिखती है।