सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

यम का वाहक बनी बीसीजी वेक्सीन

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

यम का वाहक बनी बीसीजी वेक्सीन

देश के हृदय प्रदेश में आदिवासी बाहुल्य जिले डिंडोरी मंे बच्चों को लगने वाले टीके ही काल के गाल में समाने का कारण बनते जा रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश में डिंडोरी जिले के बजाग तहसील में बीसीजी और खसरा के टीका लगाने के बाद क्षेत्र के विक्रमपुर गांव के डेढ दर्जन से ज्यादा बच्चे बीमार पड़ गए जिन्हें सरकारी अस्पताल में दाखिल करा दिया गया। इनमें से दो बच्चे काल कलवित कर दिया। इसके अलावा बाद में दो बच्चों को और काल ने अपना ग्रास बना लिया। प्रशासन ने भी वेक्सीन का सेंपल लेकर उसे सील नहीं किया गया। गौरतलब है कि पूर्व में 24 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की टीम ने डिंडोरी जिले के अस्पतालों का अचानक ही निरीक्षण किया था जिसमें उन्होंने वेक्सीन को खराब पाया था। अपने प्रतिवेदन में अधिकारियों ने साफ कहा था कि वेक्सीन को उसके लिए प्रदाय किए गए डीप फ्रीजर में रखने के बजाए गरम वातावरण में रखा गया था, और डीप फ्रीजर में कोल्ड ड्रिंक की बोतलें शोभा बढ़ा रही थीं।


कांग्रेस ने हाईजेक किया भाजपा को!

देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को अपने कब्जे में ले लिया है। जी हां, यह सच है!, इंटरनेट के हेकर्स ने भाजपा की वेव साईट बीजेपी डॉट काम को हेक कर लिया है। वेव ब्राउजर के एड्रेस बार पर बीजेपी डॉट काम टाईप करते ही आप कांग्रेस की वेव साईट पर पहुंच जाते हैं। भाजपा ने इस मामले में कांग्रेस को कानूनी नोटिस भेज दिया है। यद्यपि कांग्रेस भाजपा के इस आरोप को सिरे से खारिज कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि तकनीकि गडबडी के कारण एसा संभव हो सकता है, किन्तु भाजपा इसे अपनी पहचान को चोरी करने का मामला बता रही है। वैसे भी कांग्रेस और भाजपा में मुद्दों को लेकर अब तक हुए द्वंद में कांग्रेस ही भारी पडती दिखी है। इस बार भी अगर कांग्रेस के आईटी सेल ने कोई कारनामा कर दिखाया हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

10 जनपथ से सुरेश पचौरी की बिदाई तय

स्व.राजीव गांधी के जमाने से दस जनपथ (स्व.राजीव, सोनिया का सरकारी आवास, और कांग्रेस का सत्ता और शक्ति का शीर्ष केंद्र) की शान रहे मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष सुरेश पचौरी का शनि पिछले दो सालों से बहुत ज्यादा भारी चल रहा है। सबसे पहले तो दो साल पहले राज्य सभा की सदस्यता का नवीनीकरण न हो पाने से मंत्री पद तजना पड़ा, फिर वे मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनाकर भेज दिए गए। पचौरी के नेतृत्व में लोकसभा और विधानसभा में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। आंकड़ों के बाजीगर पचौरी ने कांग्रेस का जनाधार बढ़ा हुआ बताकर सोनिया गांधी को प्रसन्न करने का प्रयास किया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के हाल ही के मध्य प्रदेश दौरे में पचौरी की 10 जनपथ से दूरी साफ दिखाई पड़ी जब राहुल ने सुरेश पचौरी से मंच पर ही प्रश्न कर दिया कि आपको चेहरे से कितने लोग जानते हैं, जब अध्यक्ष का यह आलम है तो फिर पार्टी का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कहते हैं अब सुरेश पचौरी एक बार फिर संजीवनी की तलाश में हैं, और वे राजमाता के गण अहमद पटेल की गणेश परिक्रमा में जुट गए हैं।

टिफिन वाले गडकरी!

भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम नितिन गडकरी की ताजपोशी को लगभग एक साल होने को आया है, किन्तु अब तक भारतीय जनता पार्टी कोई चमत्कार करती नहीं दिख रही है। भाजपाध्यक्ष गडकरी भले ही कार्यकर्ताओं नेताओं से घुलने मिलने के दावे करते हांे, पर एक मामले में वे बहुत ही पाबंद नजर आ रहे हैं, और यह मामला है गडकरी का अपना भोजन साथ लेकर चलना। देखा गया है कि गडकरी जब भी कहीं प्रवास पर जाते हैं, वे अपने साथ दो से चार टिफिन अवश्य ही ले जाते हैं। गडकरी के निकटवर्ती सूत्रांे का दावा है कि गडकरी भुमका गिरी अर्थात जादूटोने से बहुत ज्यादा भयभीत रहते हैं, उन्हें डर है कि कहीं कोई उन्हें कुछ खिला पिला न दे। दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि गडकरी की जीभ है कि मानती ही नहीं, सो वे अपने चटोरेपन की आदत के चलते अपने मनपसंद व्यंजन साथ ही लेकर चलते हैं, ताकि जो भी चीज उन्हें खाने का मन हो, वे तत्काल टिफिन खोलकर उसका स्वाद ले सकें। बेचारे मेजबान खान पान के मामले में तो अपने अध्यक्ष को प्रसन्न करने की स्थिति में ही नहीं रह पाते हैं।

मेहरबान है भाजपा कमल नाथ पर!

मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की थाप पर नृत्य की मुद्रा में ही दिख रही है। कोई भी मंत्री दिल्ली यात्रा पर हो, और कमल नाथ से भेंट मुलाकात न करे यह संभव ही नहीं है। मध्य प्रदेश भाजपा के मुख्यमंत्री सहित सारे के सारे मंत्री कमल नाथ के आशियाने 01 तुगलक रोड़ की चौखट चूमते ही नजर आते हैं। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर जब विदेश से लौटे तब उन्होंने कमल नाथ को सलामी देना नहीं भूला। इधर प्रदेश भाजपा द्वारा कमल नाथ को घेरने 05 से 07 अक्टूॅबर तक एन एच पर पड़ने वाले कस्बों में हस्ताक्षर अभियान का आगाज किया था, किन्तु सत्ता और संगठन के बीच समन्वय के अभाव के चलते यह आंदोलन भी चारों खाने चित्त ही गिर पड़ा है। रविवार तक मीडिया को इस बात से वंचित ही रखा गया है कि केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ मध्य प्रदेश के एनएच पर पड़ने वाले कितने गांवों में कितने हस्ताक्षर करवाए गए? लगता है लोग सच ही कहते है सियासी जादूगर कमल नाथ के पास कोई जड़ी है, जिसे वे विपक्षी को भी सुंघा दें तो वह भी कमल नाथ की भाषा ही बोलने लगता है।

कैंसर ने बनाया भ्रष्टाचारी

देश में भ्रष्टाचार कैंसर से भी बड़ी लाईलाज बीमारी बन गया है, किन्तु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक सरकारी कर्मचारी वह भी महिला ने भ्रष्टाचार इसलिए किया क्योंकि उसे खुद को हुए कैंसर का इलाज करवाना था। सेंट्रल एक्साईज के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि हाल ही में मुंबई में रिश्वत के मामले में पकड़ी गई विभाग की अधीक्षक रंजना बोब्बाल एक निहायत ही ईमानदार कर्मचारी है। बोब्बाल को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने रिश्वत के आरोप में पकड़ा है। सूत्र बताते हैं कि बोब्बाल के घर से सीबीआई को कुछ भी नहीं मिला। महिला अधिकारी अगर रिश्वत लेने की आदी होती तो निश्चित तौर पर उसके घर से नगद या अन्य कागजात एफडी, जमीन जायदाद के कागज अवश्य ही मिलते, वस्तुतः एसा हुआ नही। सूत्रों की माने तो रंजना एक निहायत ही शरीफ और ईमानदार कर्मचारी थी। बाद में उसे जब कैंसर हुआ तब उसका काफी धन इलाज में व्यय हो गया। आगे इलाज के लिए पैसे जुटाने की गरज से रंजना ने भ्रष्टाचार का सहारा लिया। धन्य है भारत सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था, कि एक कर्मचारी को इसके लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेना पड़ा।

भाजपा के युवा गांधी की पूछ परख बढ़ी

भारतीय जनता पार्टी के युवा गांधी इन दिनों डिमांड में हैं। वरूण गांधी को रूबरू और फोन, मोबाईल पर शुभकामनाएं देने वालों की फेहरिस्त जबर्दस्त लंबी होती जा रही है। इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र स्व.संजय गांधी के इकलौते पुत्र वरूण गांधी अगले साल के आरंभ में ही पश्चिम बंगाल की बाला यामिनी राय के साथ परिणय सूत्र में आबद्ध होने जा रहे हैं। संजय गांधी के बाल सखा रहे कमल नाथ, गुलाम नवी आजाद, प्रणव मुखर्जी, मुलायम सिंह यादव, नितिन गड़करी, सुषमा स्वराज, मोहन भागवत जैसे दिग्गज भी पीलीभीत के युवा सांसद वरूण को बधाईयां प्रेषित कर चुके हैं। वरूण का देशी बाला के साथ शादी करना कांग्रेस के लिए बहुत ही मुश्किल का सबब बनता जा रहा है। गौरतलब है कि इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र स्व. संजय गांधी ने देशी बाला मेनका आनंद से विवाह किया था। दूसरी ओर कांग्रेस के प्रधानमंत्री रहे स्व.राजीव गांधी ने इटली की सोनिया मानियो को अपना जीवन साथी बनाया था, अब उनके पुत्र राहुल गांधी भी कोलंबिया की बाला को अपनी अर्धांग्नी बनाना चाह रहे हैं।

फीका रहेगा गेम्स का समापन

अरबों रूपए पानी में बहाने के बाद हो रहे राष्ट्रमण्डल खेलों के प्रति देश में लोगों के बीच वह उत्साह नहीं दिख रहा है, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। अब तक भारत ने पदकों के ढेर लगा दिए हैं, किन्तु लोगों के बीच गेम्स को लेकर उत्साह और उल्लास की कमी साफ दिखाई पड़ रही है। कामन वेल्थ गेम्स की आयोजन समिति के सूत्रों का कहना है कि गेम्स के बाद होने वाली जांच की खबरों से अब आयोजन समिति की घिघ्घी बंधने लगी है, यही कारण है कि कामन वेल्थ गेम्स आर्गनाईजिंक कमेटी खेलों के समापन को सादे तौर पर संपन्न कराना चाह रही है। सूत्रों ने कहा कि पहले समापन कार्यक्रम में वालीवुड के शाहरूक खान, करीना कपूर, विद्या बालान आदि को परफारमेंस के लिए बुलाया जाना तय था, किन्तु गत दिवस निर्माण भवन में गु्रप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक के बाद लगने लगा है कि इनको नहीं बुलाया जाएगा।

बीमारी ने उमा को लाया सुर्खियों में

भारतीय जनता पार्टी की फायर ब्रांड नेता रहीं उमा भारती इन दिन फिर चर्चाओं में हैं। राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी के साथ एक बार फिर उमा भारती को देखने के बाद भाजपा की अंदरूनी सियासत में उबाल आने लगा है। एक बार फिर उमा भारती की भाजपा में वापसी के कयास तेज हो गए हैं। भाजपा और संघ में उनके शुभचिंतक और विरोधियों की सरगर्मियां एक बार फिर से बढ गईं हैं। भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय 11 अशोक रोड़ के उच्च पदस्थ सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि मध्य प्रदेश की राजधानी के एक विलासितापूर्ण पांच सितारा अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ लेने के दौरान एल.के.आड़वाणी ने अनेक भाजपा के आला नेताओं को निर्देश दिया था कि वे जाकर उमा भारती का हाल चाल जानें। इन्हीं निर्देशों का असर था कि इसके अनुपालन में उमा के घुर विरोधी मुख्यमंत्री शिवराज ंिसंह चौहान, संघ के सह सरकार्यवाहक मदन दास देवी, स्वास्थ्य राज्य मंत्री महेंद्र हार्डिया, डॉ.गौरी शंकर शेजवार, रूस्तम सिह आदि अनेक नेताओं की भीड लगातार बनी रही।

बडबोले युवराज से परेशान है कांग्रेस

कांग्रेस में राहुल गांधी को महिमा मण्डित करने बाकायदा मीडिया को मैनेज किया जाता है। राहुल के इर्द गिर्द सिर्फ उन्ही मीडिया पर्सन को जाने की इजाजत दी जाती है, जो कांग्रेस की मानसिकता के हैं। राहुल की पत्रकार वार्ताओं में भी मीडिया को पहले से ही प्रश्न देकर प्रश्न पुछवाए जाते हैं। इसके बदले में कांग्रेस के वित्तीय प्रबंधकों द्वारा इन गिने चुने पत्रकारों को तबियत से उपकृत किया जाता है। हाल ही में राहुल गांधी की जबान फिसल गई और राहुल ने संघ और सिमी को एक समान ही बता दिया। संघ पर सीधे वार से तिलमिलाई भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठनों ने राहुल गांधी को घेरना आरंभ कर दिया है। कांग्रेस के आला नेता अपने युवराज की इस तरह की बयानबाजी से खासे नाराज दिख रहे हैं। एक वरिष्ठ नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि राहुल के पढाने वालांे ने पता नहीं राहुल को क्या पट्टी पढ़ाई है, वरना कांग्रेस को इस बचाव की मुद्रा में नहीं आना पड़ता। गौरतलब है कि इससे पहले सिमी के संबंध में दिग्विजय सिंह द्वारा लगातार इसी तरह की बयानबाजी की जाती रही है।

अनमने मन से तैयार हो रहा खाद्य सुरक्षा विधेयक

देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा केंद्रीय कृषि मंत्री को दी गई नसीहत के बाद केंद्र में कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार बेक फुट पर आ गई है। कांग्रेस के सत्ता के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार के महात्वाकांक्षी खाद्य सुरक्षा विधेयक के मामले में कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी बहुत ज्यादा संजीदा हो चुकी हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को अपनी इस मंशा से आवगत करा दिया है कि किसी भी कीमत पर खाद्य सुरक्षा विधेयक को तैयार करवा दिया जाए। खाद्य मंत्रालय मंे अफसरान के बीच चल रही चर्चाओं के अनुसार सरकार को क्या सूझी है कि इस ‘‘ड्राई‘‘ सब्जेक्ट पर सब को झोंका जा रहा है। पहले कितने बेहतरीन दिन थे, सब कुछ गीला गीला था, जितना चाहे निचोड लो। प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव के चलते अब अधिकारियों को अपना अधिक से अधिक समय मंत्रालय में खाद्य सुरक्षा विधेयक के लिए देना पड रहा है, जिससे उनकी सेहत पर प्रतिकूल असर ही पड़ रहा है।

पुच्छल तारा

हर साल कुछ न कुछ अजीब संयोग बनते हैं, केलेन्डर, घड़ी आदि का संयोग भी अजीबोगरीब होता है। अहमदाबाद से प्रदीप बैस द्वारा ईमेल भेजा है जिसमें इस संयोग के बारे में बताया गया है। प्रदीप बैस लिखते हैं कि दस अक्टूबर 2010 को दस बजकर दस मिनिट और दस सेकण्ड पर एक साथ जो सामने आएगा वह होगा 10: 10: 10: 10: 10: 10 (10/10/2010: 10 बजकर 10 मिनिट 10 सेकण्ड) है न अजीब संयोग।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

वीडियोकोन की पेशकश: पकड़ो लाईफ़ का हर सिग्नल
अब यूएस और कनेडा सब एक जैसा एक पैसा
सिवनी 09 अक्टूबर। घरेलू और इलेक्ट्रानिक उपकरणांे के निर्माण में अग्रणी ‘वीडियोकोन‘ ने अब मोबाईल के क्षेत्र में आमद दे दी है। वीडियोकोन का दावा है कि वे इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि उपभोक्ता हर सिग्नल को पकड़े। वीडियोकोन का बेहतरीन नेटवर्क प्रस्तुत करता है सुपर स्ट्रांग सिग्नल और बेहतरीन साफ सुथरी निर्बाध आवाज। वीडियोकोन के नेटवर्क में काल ड्राप और नेटवर्क जाम होने वाली बातें गुजरे जमाने की बातों में समाहित हो चुकी हैं।
वीडियोकोन के सिवनी डिस्ट्रीब्यूटर विपिन सिंह राजपूत ने बताया कि 02 अगस्त को वीडियोकोन द्वारा लांच की गई आकर्षक और मनमोहक स्कीम्स की ओर मोबाईल उपभोक्ता आकर्षित हुए बिना नहीं है। इंटरनेट के उपभोक्ताओं के लिए वीडियोकोन ने अनलिमिटेड इंटरनेट प्लान महज 96 रूपए प्रतिमाह में ही उपलब्ध कराया जा रहा है। वीडियोकोन के माध्यम से अब हर महीने अनलिमिटेड डाउनलोडिंग, ब्राउजिंग, चैटिंग, ईमेल और बहुत कुछ का आनंद महज 96 रूपए में ही लिया जा सकता है।
बारापत्थर स्थित केयर कंप्यूटर के संचालय विपिन राजपूत का कहना है कि वीडियोकोन की एक अन्य आकर्षक योजना के तहत लोकल वीडियोकोन नेटवर्क पर अनलिमिटेड नम्बरों पर उपभोक्ता पा सकते हैं, अनलिमिटेड कॉल और एसएमएस हर महीने महज 59 रूपए में।
श्री राजपूत ने आगे कहा कि वीडियोकोन में महज 149 रूपए में ही 1800 मिनिट अर्थात महीने में 30 घंटा याने एक घंटा रोज उपभोक्ता बात कर सकता है। इसमंे मात्र 149 रूपए में रोजाना आधा घंटा वीडियोकोन के लोकल नेटवर्क और आधा घंटा ही अन्य नेटवर्क पर रोजाना पूरे माह बात की जा सकती है।
उन्होंने बताया कि इसके साथ ही वीडियोकोन की सबसे अधिक आकर्षक योजना के तौर पर 399 रूपए का फिक्सड मंथली चार्ज उभरकर सामने आ रहा है। इस योजना में 3000 मिनिट किसी भी लोकल नेटवर्क पर उपभोक्ता को निशुल्क प्राप्त होता है। इन दोनों ही योजनाओं में रोजाना एक सौ एसएमएस भी बिना किसी शुल्क के उपलब्ध हैं। वीडियोकोन 55 रूपए में 125 मिनिट के लोकल और एसटीडी काल हेतु टाक टाईम प्रदान कर रहा है। इसके अलावा 14 रूपए में 30 मिनिट का टॉक टाईम भी प्रदान कर रहा है।
वीडियोकोन ने एक नया धमाका किया है। वीडियोकोन का कहना है कि ‘‘न सेकण्ड का डर, न पैसों की फिकर! अब अपनों से बात कीजिए जी भरकर!!‘‘ अब वीडियोकोन एक नई आकर्षक स्कीम लाए हैं, जिसके तहत अमेरिका और कनाडा में आईएसडी काल करने पर महज एक पैसा प्रति सेकण्ड की दर से चार्ज किया जा रहा है। यह योजना 57 रूपए के रिचार्ज पर उपलब्ध है। वीडियोकोन की सभी योजनाओं में कंपनी की नियम और शर्तें लागू होंगी।

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

आदिवासी बाहुल्य सिवनी को तिरस्कार की नजरों से देख रही कांग्रेस

फोरलेन, संभाग के बाद अब मेडीकल कालेज की बारी
 
आखिर सिवनी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों कर रहे हैं महाकौशल के क्षत्रप कमल नाथ
 
(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश में भगवान शिव का जिला सिवनी पिछले लगभग दो दशकों से अपने भाग्य पर आंसू बहा रहा है। सदा से कांग्रेस का परचम लहराने वाले इस जिले ने नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कांग्रेस का साथ छोड़ना आरंभ कर दिया। जैसे ही पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा के हाथों से कांग्रेस की कमान गई वैसे ही सिवनी में कांग्रेस का सूरज अस्ताचल की ओर अग्रसर हो गया। महाकौशल के इकलौते क्षत्रप कमल नाथ द्वारा सिवनी के खाते में आने वाले सारी सौगातों को एक एक कर अपने संसदीय क्षेत्र में ले जाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। सिवनी की कोख उजाड़ कमल नाथ छिंदवाड़ा की झोली में एक के बाद एक सौगातों को ले जाने का प्रयास कर रहे हैं और सिवनी में राजनैतिक बिसात बिछाने वाली भाजपा और कांग्रेस मूकदर्शक ही बनी बैठी है। यहां तक कि मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा 05 से 07 अक्टूबर तक एनएच पर पड़ने वाले सारे कस्बों में कमल नाथ के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान के मामले में भी विज्ञप्तिवीर भाजपा ने अब तक मौन साध रखा है।

गौरतलब है कि छिंदवाड़ा, सिवनी और बालाघाट को मिलाकर संभाग बनाने की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने काफी पहले कर दी थी। इस संभाग का संभागीय मुख्यालय क्या होगा इस बारे में अनिश्चितता का कुहासा छट नहीं सका है। कमल नाथ कांग्रेस के कद्दावर नेता और महाकौशल के क्षत्रपों में उनका शुमार है। शिवराज की संभाग बनाने की घोषणा परवान नहीं चढ़ सकी। सिवनी वासी चाहते हैं चूंकि बालाघाट, छिंदवाड़ा का केंद्र सिवनी है, अतः संभाग सिवनी में बने, किन्तु कमल नाथ की चाहत छिंदवाड़ा में बनाने की है, जिससे यह मामला एक साल से भी अधिक समय से अधर में लटका है।
 
संभाग के मसले के उपरांत दूसरा मुख्य मसला अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल की महात्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का है। इस परियोजना के अभिन्न अंग उत्तर दक्षिण गलियारे के नक्शे से सिवनी जिले को गायब करने के षणयंत्र का तान बाना बुना जा रहा है। सिवनी की फिजां में तैर रही चर्चाओं में इस ताने बाने के लिए समीपस्थ जिला छिंदवाडा के संसद सदस्य और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ (जिनके मंत्रालय द्वारा इस सड़क के निर्माण का काम करवाया जा रहा है) को ही दोषी माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस सड़क को सिवनी के बजाए छिंदवाड़ा से ले जाने के लिए वे लालायित हैं।
 
फोरलेन के विवाद में कमल नाथ का नाम इसलिए प्रमुखता से लिया जा रहा है, क्योकि उन्होंने राज्य सभा में एक बयान देकर सभी को चौंका दिया था कि वे इस उत्तर दक्षिण गलियारे को सिवनी के बजाए अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा से होकर गुजारने के ख्वाईशमंद थे। कमल नाथ की दो टूक बात पर भी भाजपा के मध्य प्रदेश के रखवाले संसद सदस्य, विधायक और संगठन भी धृतराष्ट्र की भूमिका में रहा। कहा जा रहा है कि सियासी जादूगर कमल नाथ ने अपने कारिंदों के जरिए भाजपा की एक एक सीढ़ी को सेट कर लिया, तभी मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की किसी भी इकाई, किसी भी विधायक, किसी भी संसद सदस्य, पूर्व विधायक सांसद ने कमल नाथ के खिलाफ मुंह खोलने का साहस नहीं जुटाया।
 
बाद में खबर आई कि भाजपा अब कमल नाथ को घेरने का प्रयास करेगी। भाजपा का कहना है कि वह 5 से 7 अक्टूबर तक नेशनल हाईवे पर पड़ने वाले कस्बों और ग्रामों में हस्ताक्षर अभियान चलाएगी फिर 22 से 24 अक्टूबर तक इन्ही ग्रामों में मानव श्रंखला बनाई जाने के उपरांत 10 नवंबर को भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष 10 नवंबर को प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपेंगे। भाजपा के इस निर्णय से कमल नाथ और भाजपा के बीच नूरा कुश्ती और तेज हो गई है, इसका कारण यह है कि भाजपाध्यक्ष प्रभात झा इन दिनों प्रदेश के दौरे पर हैं, वे राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे अवस्थित जिला, तहसील, विकासखण्ड मुख्यालयों के अलावा गांवों और कस्बों से भी विचर रहे हैं और उन्होंने कहीं भी अपने कार्यकर्ताओं को प्रदेश पदाधिकारियों के इस महत्वपूर्ण निर्णय की जानकारी देकर इसे सफल बनाने का आव्हान नहीं किया है। आश्चर्य तो इस बात पर हो रहा है कि प्रभात झा खुद भी सड़क मार्ग से गुजर रहे हैं, और सड़कों पर हिचकोले खाती चलती उनकी आलीशान विलासिता पूर्ण गाड़ी के बाद भी उनकी तंद्रा नहीं टूट पा रही है।
 
मध्य प्रदेश भाजपा के इस निर्णय और आदेश के बाद भी प्रदेश में भाजपा ने 06 अक्टूबर तक इस अभियान के बारे में मौन साध रखा है। कल इस मामले में अभियान का अंतिम दिन है। सत्ता के मद में मदमस्त भाजपा का आलम यह है कि भाजपा द्वारा प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ने वाले कस्बों की स्थानीय भाजपा इकाईयों को इस मामले में ताकीद तक नहीं किया है। प्रदेश मंे अनेक कस्बाई भाजपाईयों को प्रदेश सरकार के इस पोल खोल अभियान के बारे में पता तक नही है, जबकि भाजपा के मुख्य निजाम नितिन गड़करी खुद कस्बाई राजनीति से चलकर देश के शिखर पर पहुंचे हैं। कहा जा रहा है कि चूंकि यह मामला केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और उनके मंत्रालय के खिलाफ है, और माना जाता है कि भाजपा के नेता कमल नाथ से पूरी तरह ‘सेट‘ हैं, अतः वे कमल नाथ का खुलकर विरोध करने में अपने आप को असहज ही महसूस कर रहे हैं।
 
वरना और क्या कारण हो सकता है कि कांग्रेस के महासचिव सिवनी प्रवास पर आएं और फोरलेन मामले में स्थानीय भाजपा खामोशी अख्तियार करे। फोरलेन का प्रकरण भले ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हो, किन्तु भाजपा के साथ ही साथ सभी इस बात से भली भांति परिचित हैं कि इस मामले में मुख्य दोषी भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का अपना राग ही माना जा रहा है। राहुल गांधी के आगमन के दिन ही इस मामले में हमने जिला भाजपाध्यक्ष सुजीत जैन एवं पूर्व विधायक नरेश दिवाकर से इस मसले पर चर्चा कर भाजपा का स्टेंड जानना चाहा था, किन्तु बाद में भाजपा का मौन सबसे अधिक आश्चर्यजनक ही लगा। हो सकता है सियासी जादूगर कमल नाथ का दांव स्थानीय स्तर पर भी कारगर हो रहा हो। गौरतलब है कि हमने अपने पूर्व आलेख में इस बात का उल्लेख किया था कि सिवनी में राजनीति करने वालों ने अगर सिवनी के हितों को कमल नाथ के पास गिरवी रख दिया हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
 
इसके अलावा पेंच परियोजना से सिवनी जिले के किसानों को लाभ होने वाला है, किन्तु पेंच सिंचाई परियोजना में भी कमल नाथ द्वारा फच्चर फसाया बताया जाता है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा केंद्र को भेजे गए सिंचाई विभाग के 1560 करोड़ रूपयों के प्रस्तावों पर कुंडली मारकर बैठा जा रहा है। केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ और सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपने अपने क्षेत्रों के सबसे अधिक प्रस्ताव केंद्र के पास लंबित पड़े हुए हैं।
 
इंडो जर्मन बायलेटरल डेव्हलपमेंट को ऑपरेशन के तहत पेंच वृहद परियोजना, तीन मध्यम परियोजना और 28 लघु सिंचाई योजनाओं के 853 करोड़ 20 लाख रूप्ए के प्रस्ताव राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार को भेजे गए हैं। छिदवाड़ा संसदीय क्षेत्र की पेंच व्यपवर्तन परियोजना की निवेश निकासी की स्वीकृति भी केंद्रीय जल संसाधन विभाग के मंत्रालय की सीढीयां चढ और उतर रही है। इन प्रस्तावों को स्वीकृत करने में स्थानीय जनसेवकों की मंशाएं आड़े आ रही हैं, जिससे समूचा खेल ही बिगड गया है। छिंदवाड़ा जिले की महात्वाकांक्षी पेंच परियोजना पर तो छिंदवाड़ा जिले और संसदीय क्षेत्र पर 1980 से (1997 के जबरिया उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के हाथों पटखनी खाने वाले तत्कालीन किंगमेकर कमल नाथ की पराजय को छोड़कर) कब्जा जमाने वाले कमल नाथ द्वारा ही अड़ंगा लगाने के आरोप छिंदवाड़ा के भाजपाईयों द्वारा खुले तौर पर लगाए जाते रहे हैं।
 
आश्चर्य का विषय तो यह है कि किसान हितैषी होने का दावा करने वाली कांग्रेस द्वारा मध्य प्रदेश के सिवनी और छिंदवाड़ा सहित महाराष्ट्र के लाखों किसान परिवारों के फायदे वाली पेंच परियोजना को हरी झंडी न दिखाई जा रही हो। पेंच परियोजना में कांग्रेस के क्षत्रपों द्वारा फच्चर पिछले पंद्रह सालों से फंसाए जाते रहे हैं। कहा जा रहा है कि मनमानी फर्म को इसका ठेका न दिए जाना भी एक प्रमुख कारण है।
 
बहरहाल कांग्रेस की वयोवृद्ध नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा ही अंतिम कांग्रेसी रहीं हैं, जिन्होंने सिवनी जिले को कुछ न कुछ प्रदान किया है, अंतिम कांग्रेसी इसलिए क्योंकि उनके द्वारा प्रदत्त सारी सौगातों में ईमानदारी की सौंधी गंध आज भी बरकरार है। मामला चाहे संजय सरोवर परियोजना (भीमगढ़ बांध) का हो, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी कार्यालय का, सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता कार्यालय का, नेशनल हाईवे के कार्यपालन यंत्री, लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण यंत्री, राज्य सड़क परिवहन निगम के संभागीय कार्यायल और वर्कशाप आदि का, हर मामले में सुश्री विमला वर्मा ने सबसे पहले सिवनी वासियों का हित ही साधा।
 
सुश्री वर्मा के सक्रिय राजनीति से किनारा करते ही मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन का संभागीय वर्कशाप सिवनी से उठकर छिंदवाड़ा स्थानांतरित कर दिया गया। कहते है। यह कमल नाथ की मंशा पर हुआ, चलिए मान लिया जाए कि कमल नाथ कद्दावर और ताकतवर हैं, वे चाहें तो अपने संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में सोने की सड़कें, लोगों के लिए चांदी के महल बनवा लें, किन्तु उन्हें क्या हक बनता है कि वे सिवनी वासियों के हलक में हाथ डालकर निवाला निकालें और छिंदवाड़ा वासियों का उदर पोषण करें? दुख का विषय तो यह है कि कमल नाथ सिवनी वासियों की सौगातें ब्रितानियों की तर्ज पर लूटते रहे और सिवनी के उस समय के जिले के क्षत्रप माने जाने वाले कांग्रेसी नेता बरसाती मेंढक के मानिंद सुसुप्तावस्था में ही पड़े रहे।
 
सुश्री विमला वर्मा ने भगवान शिव की नगरी को सबसे बड़ी सौगात के तौर पर प्रियदर्शनी के नाम से सुशोभित इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय दिया है। इतना विशाल जिला चिकित्सालय आसपास के जिलों में भी देखने को नहीं मिलता है। इतना साफ सुथरा सर्वसुविधायुक्त चिकित्सालय देखकर आसपास के जिलों के लोग सिवनी वासियों की किस्मत पर रश्क करते थे। फिर दुर्भाग्य कहा जाएगा कि सुश्री वर्मा के बाद जिन भी सियासतदारों ने सियासत की कमान संभाली है, उन्होंने इस अस्पातल की गरिमा को बढ़ाने के बाजाए उसे ध्वस्त ही किया है।
 
एक के बाद एक करके जिला चिकित्सालय से चिकित्सकों का मोहभंग होता रहा। यहां पदस्थ रहने वाले चिकित्सकों द्वारा अस्पताल से ज्यादा अपनी निजी चिकित्सा पर ही ध्यान रमाया गया। गरीब गुरबे बीमारी में लुटते पिटते रहे। अस्पताल में संसाधनों का अभाव साफ दिखाई देने लगा। समीपस्थ महाराष्ट्र प्रदेश की संसकारधानी नागपुर के फाईव स्टार नर्सिंग होम्स के संचालक चिकित्सकों के दलाल बन गए सिवनी के नीम हकीम। जरा सी बात पर हर मरीज को नागपुर ही रिफर कर दिया जाता है। अगर यही सच्चाई है तो इतने विशाल अस्पताल के बजाए यहां एक सिटी डिस्पेंसरी खोलना ही मुनासिब होगा।
 
सुश्री विमला वर्मा ने उस दर्मयान प्रयास किए थे कि इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय के पास ही आर्युविज्ञान महाविद्यालय (मेडीकल कालेज) की स्थापना कर दी जाए, ताकि इस अस्पताल को मेडीकल कालेज अस्पताल का दर्जा दिलाया जा सके। दुर्भाग्य से सुश्री वर्मा का सपना आकार नहीं ले सका। हाल ही में जिला मुख्यालय की विधायिका श्रीमति नीता पटेरिया ने सुश्री वर्मा के सपने को आगे बढ़ाने का उपक्रम किया है, वे साधुवाद की पात्र हैं।
 
श्रीमति पटेरिया ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अनेक मर्तबा सिवनी में मेडीकल कालेज खोलने की मांग की है। सीएम ने निजी क्षेत्र के कालेज को खोलने की मंशा भी व्यक्त कर दी है। जैसे ही सिवनी की किस्मत का तारा कुछ चमचमाया, एक बार फिर केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ ने इस मामले को अपने बाहुपाश में लेने का प्रयास आरंभ कर दिया है। केंद्रीय राजमार्ग मंत्री कमल नाथ अब अपनी कर्मभूमि छिंदवाड़ा में आर्युविज्ञान महाविद्यालय की स्थापना के लिए प्रयासरत हो गए हैं।
 
जाहिर सी बात है कि जब महाकौशल अंचल में जबलपुर के अलावा सिवनी से मेडीकल कालेज की मांग उठी फिर कांग्रेस के एक कद्दावर नेता ने छिंदवाड़ा में इसकी मांग कर दी तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तवज्जो सिवनी के बजाए छिंदवाड़ा की ओर होना स्वाभाविक ही है। वैसे भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कांग्रेस पर खासे मेहरबान हैं, उन्होंने भाजपा के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी की परवाह न करते हुए कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी को राज्य अतिथि का दर्जा देकर सभी को चौंका दिया है।
 
कमल नाथ का प्रयास है कि राज्य सरकार गांधी मेडीकल कालेज भोपाल, एमवाय इंदौर, नेताजी सुभाष चंद बोस जबलपुर, श्याम शाह मेडीकल कालेज रीवा, ग्वालियर और सागर की तर्ज पर छिंदवाड़ा में भी सरकारी तौर पर मेडीकल कालेज की स्थापना कर दे। मूलतः उद्योगपति राजनेता कमल नाथ चाहें तो निजी तौर पर मेडीकल कालेज की स्थापना छिंदवाड़ा में चुटकियों में करवा सकते हैं, किन्तु वे चाहते हैं कि एक बार फिर भाजपा के शीर्ष नेता उनके सामने नतमस्तक नजर आएं कि उन्होंने भाजपा की प्रदेश सरकार को अपनी मंशा के अनुरूप ढाल लिया है। वैसे भी अनेक मामलों में राज्य सरकार और सूबे की भाजपा कमल नाथ की तान पर ही मनमोहक आकर्षक नृत्य करती नजर आई है।
 
बताते हैं कि कमल नाथ के कार्यालय ने इस आशय का एक प्रस्ताव शिवराज सिंह चौहान को प्रेषित भी किया है। इस मामले में कमल नाथ ने राज्य सरकार के सामने एक जलेबी फिर लटकाई है, कि अगर राज्य सरकार छिंदवाड़ा मे मेडीकल कालेज खोलना प्रस्तावित करती है तो केंद्र सरकार हर तरह से इस मामले में मदद को आगे आ सकती है। दूध का जला छांछ और कचौड़ी का जला समोसा भी फूंक फूंक कर खाता है की तर्ज पर अगर राज्य सरकार कमल नाथ को यह जवाब दे दे कि पहले राज्य से गुजरने वाले नेशनल हाईवे के संधारण और निर्माण के मसले को सार्वजनिक तौर पर हल किया जाए तब ही इस संबंध में कोई चर्चा संभव है! तब भाजपा की साख भी बच सकती है और कमल नाथ के इस जहर बुझे तीर से भाजपा के साथ ही साथ भगवान शिव की नगरी के वासियों को भी निजात मिल सकती है।
 
महाकौशल के आदिवासी बाहुल्य सिवनी जिले के साथ दुर्भाग्य जुडा नहीं है, वरन हमारे जनसेवकों ने ही इसे हमारे उपर लादा है। लोकसभा सीट के अवसान को भी छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र को बचाने के बदले बली चढ़ाने से देखा जा रहा है। घंसौर विधानसभा सीट का नियमविरूद्ध विलोपन भी कुछ कहता रहा। इस मामले में भाजपा पूरी तरह खामोश रही, भाजपा की खामोशी काफी कुछ बयां करने के लिए पर्याप्त कही जा सकती है। आदिवासी बाहुल्य सिवनी जिले के हितों के साथ खिलवाड़ आरंभ हुआ है नब्बे के दशक के उपरांत जब राजनीति में स्वार्थपरक राजनीति हावी हुई है। अब तो नेताओं को खुद को स्थापित करने और अपनी जेब भरने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं बचा है। यक्ष प्रश्न फिर वही है कि इन नेताओं के भुलावे, बहकावे में आकर कब तक छले जाते रहेंगे हम सिवनीवासी?

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

युवराज के औचक रात्रि विश्राम!

कितने औचक होते हैं युवराज के अचानक रात्रि विश्राम!
 
(लिमटी खरे)
 
दलित आदिवासियों के बीच रात बिताकर मीडिया की सुर्खियां बटोरने वाले कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के अचानक दलित बस्तियों में जाने की बात कितनी औचक होती है, इस बात से आम आदमी अब तक अनजान ही है। राहुल बाबा का सुरक्षा घेरा स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) का होता है, जिसमें परिंदा भी पर नहीं मार सकता है, फिर अचानक किसी अनजान जगह पर कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी का रात बिताना आसानी से गले नहीं उतरता है। वास्तविकता तो यह है कि राहुल गांधी के प्रस्तावित दौरों के स्थानों की खाक खुफिया एजंेसियों द्वारा लंबे समय पहले ही छान ली जाती है, जजमान को भी पता नहीं होता है कि उसके घर भगवान (युवराज) पधारने वाले हैं। मीडिया को भी अंतिम समय में ही ज्ञात होता है कि राहुल बाबा फलां के घर रात्रि विश्राम करने वाले हैं। कांग्रेस की राजमाता और राहुल गांधी की माता श्रीमति सोनिया गांधी को राहुल की सुरक्षा की चिंता सदा ही खाए जाती है, किन्तु एसपीजी के निदेशक की देखरेख में राहुल की सुरक्षा से वे खासी संतुष्ट नजर आती हैं। कहा जाता है कि राहुल को इस तरह के दौरों की अनुमति श्रीमति सोनिया गांधी द्वारा प्रदत्त है, ताकि कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की छवि आम आदमी से जुड़ने, उनकी समस्याओं से रूबरू होने और उसके निदान की योजनाएं बनाने की बन सके। सवाल अब भी यही खड़ा है कि राहुल गांधी की इन यात्राओं से देश का क्या भला हो रहा है? एक साधारण से संसद सदस्य और कांग्रेस के महासचिव के दौरों पर भारत और सूबों की सरकार सरकारी खजाने से पानी की तरह पैसा क्यों बहाती है?

नेहरू गांधी परिवार में मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, श्रीमति इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के उपरांत आगे बढ़ी पीढ़ी में तीन ही सितारे आकाश में खिले नजर आते हैं। इनमें से राजीव और सोनिया की पुत्री प्रियंका अब गांधी से वढ़ेरा हो चुकी हैं, तथा देश की सियासत से प्रत्यक्ष तौर पर एक दूरी बना चुकी हैं। इसके अलावा स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी की आखों के तारे रहे राहुल और वरूण गांधी ने अपने अपने रास्ते अलग अलग चुन रखे हैं। एक ही परिवार के दो वारिसों को अलग अलग सुरक्षा श्रेणियां सिर्फ और सिर्फ हिन्दुस्तान में ही संभव है। लोग प्रियंका में उनकी नानी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी तो राहुल में ‘‘दुश्मनों को नानी याद दिलाने वाले‘‘ स्व.राजीव गांधी की छवि देखते हैं। भारत का पूर्वाग्रही मीडिया भी अजीब है, किसी को उसी खानदान के संजय मेनका के पुत्र वरूण गांधी में किसी की छवि नहीं दिखाई देती है। स्व.संजय गांधी के बाल सखा और उनके अभिन्न मित्रों जिन्होंने राजनीतिक पायदान भी संजय गांधी के सहारे से ही चढ़ी हैं, भी वरूण गांधी से इस तरह का बरताव करते हैं जैसा कि अठ्ठारहवीं शताब्दी में सवर्णों द्वारा अछूतों से किया जाता था।
 
देश के ‘कांग्रेस और लक्ष्मीभक्त‘ दोनों ही तरह के मीडिया ने नेहरू गांधी परिवार की एक शाख जिसमें श्रीमति सोनिया और राहुल बंधे हैं, को अर्श पर इतना उपर चढ़ा दिया है कि कांग्रेस के लोग उन्हें भगवान से कम नहीं मानते हैं। राहुल गांधी जब भी जहां भी जाते हैं वहां भीड़ जुट जाती है, कांग्रेस का जनाधार बढ़ता है, युवाओं के मानस पटल पर कांग्रेस की अमिट छाप लग जाती है, कांग्रेस की गिरती साख को बचाया जा सकता है। सारी बातें मंजूर हैं, पर यह सब किस कीमत पर हो रहा है? क्या राहुल की एक यात्रा का भोगमान कांग्रेस ने भोगा है? क्या गांधी के नाम का गर्व के साथ उपयोग करने वाले राहुल ने अपनी यात्राएं महात्मा गांधी की सादगी से की हैं? जाहिर है नहीं। बापू रेल गाडी के साधारण डिब्बे में यात्रा करते थे, उन्होंने अपना पूरा जीवन सादगी के साथ बिता दिया, आधी लंगोटी में ही बापू ने अपना जीवन काटकर उन ब्रितानियों को जिनके बारे में कहा जाता था कि उनका सूरज कभी डूबता नहीं है, को डेढ़ सौ बरस के राज पाट को छोड़कर जाने पर मजबूर कर दिया। राहुल गांधी एक यात्रा में उपयोग में आने वाले विमान और हेलीकाप्टर का किराया ही अगर जोड़ लिया जाए तो एक शहर के गरीबों को एक महीना भोजन कराया जा सकता है। इसके अलावा राहुल की सुरक्षा में लगी एजेंसियों, प्रदेश सरकार का सुरक्षा बल आदि का खर्च जोड़ लिया जाए तो मंहगाई के बोझ से दबे आम आदमी की मानो चीख ही निकल जाएगी। इस कीमत पर आम आदमी के गाढ़े पसीने की कमाई से कांग्रेस द्वारा अपने आप को मजबूत करने के लिए झोंका जा रहा है राहुल गांधी को। कांग्रेस को चाहिए कि वह अपने व्ही.व्ही.आई.पी. पर होने वाले व्यय को आना पाई से केद्र और राज्य सरकार को चुकाए, क्योंकि सोनिया या राहुल की यात्राओं से देश का नहीं कांग्रेस का भला हो रहा है।
 
आज कांग्रेस की नजरों में गरीबों के मसीहा राहुल गांधी के सिर्फ जूतों पर ही गौर फरमाया जाए तो उनकी कीमत पांच अंको में होगी। राहुल गांधी की संपत्ति के बारे में देश के लोग कम ही जानते हैं। सैकड़ों करोड़ रूपयों की संपत्ति के मालिक हैं राहुल गांधी जिनकी संपत्ति में हर साल दस बीस फीसदी नहीं डेढ़ से दो सौ फीसदी का इजाफा होता है। आखिर एक संसद सदस्य के पास कौन सी एसी मशीन है कि वह अपनी संपत्ति में इस तरह हर साल बेतहाशा बढ़ोत्तरी करते जा रहे हैं। अगर उनके पास आकूत दौलत है तो उन्हें बतौर सांसद मिलने वाली तनख्वाह और वेतन को अस्वीकार कर एक नजीर पेश करना चाहिए।
 
बहरहाल कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की अचानक ही दलित बस्तियों की यात्राएं, दलित आदिवासियों के घरों पर रात बिताना उनके साथ भोजन करना, जैसी खबरों से देश के आम लोग, प्रशासन और मीडिया चकित ही रह जाता है। लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं कि राहुल गांधी जैसा ‘‘सुकुमार युवराज‘‘ आम आदमी के घर कैसे? आम आदमी यह सौच कर हैरान होता है कि कांग्रेस आखिर राहुल गांधी इस तरह की यात्राओं के माध्यम से भला क्या संदेश देना चाहती है।
 
राहुल गांधी की औचक यात्राआंे से सबसे ज्यादा खौफजदा अगर कोई है तो वह हैं यूपी की निजाम मायावती। मायावती को लगने लगा है कि राहुल की इस तरह की यात्राएं उनके दलित आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाने का काम कर रही है। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के मनमाने दौरों से आजिज आकर यूपी के चीफ सेक्रेटरी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर अपनी अपत्ति दर्ज कराई है। यूपी सरकार का कहना है कि राहुल गांधी द्वारा यूपी प्रशासन और स्थानीय प्रशासन को सूचना दिए बिना की जाने वाली यात्राएं राहुल गांधी को प्रदत्त सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। केंद्रीय गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम राज्य की आपत्ति को सिरे से खारिज करते हैं। चिदम्बरम का कहना है कि राहुल द्वारा अपनी यात्राओं में सुरक्षा व्यवस्था के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया जा रहा है। राहुल की यात्राओं में सुरक्षा मनदण्डों का पूरा पूरा पालन किया जा रहा है। चिदम्बरम ने साफ किया है कि राहुल की यात्राओं के पहले एसपीजी द्वारा सुरक्षा के पर्याप्त इंतजामात कर दिए जाते हैं।
 
राहुल गांधी की इन औचक यात्राओं के बारे में हकीकत कुछ और बयां करती है। दरअसल, राहुल गांधी के इस तरह के औचक कार्यक्रम स्थानीय लोगों, प्रशासन, कांग्रेस पार्टी और मीडिया के लिए कोतुहल एवं आश्चर्य का विषय होते हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इससे कतई अनजान नहीं होती हैं। सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों का कहना है कि इस तरह के औचक कार्यक्रमों में सुरक्षा एजेंसियों की लंबी कवायद के बाद ही इन्हें हरी झंडी दी जाती है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब भी जहां भी जाते हैं वहां जाने की योजना महीनों पहले ही बना दी जाती है।
 
राहुल गांधी के करीबी सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी के इस तरह के दौरों की तैयारी एक से दो माह पहले ही आरंभ हो जाती है। सर्वप्रथम राहुल गांधी की कोर टीम यह तय करती है कि राहुल गांधी कहां जाएंगे। उस क्षेत्र की भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक स्थिति के बारे में विस्तार से जानकारी जुटाई जाती है। इसके बाद राहुल गांधी के बतौर सांसद सरकारी आवास 12, तुगलक लेन में उनकी निजी टीम इसे अंतिम तौर पर अंजाम देने का काम करती है। यहां बैठे राहुल के सहयोगी कनिष्क सिंह, पंकज शंकर, सचिन राव आदि इन सारी जानकारियों को एक सूत्र में पिरोकर एसपीजी के अधिकारियों से इस बारे में विचार विमर्श करते हैं। इन सारी तैयारियों और सूचनाओं को केंद्रीय जांच एजेंसी ‘इंटेलीजेंस ब्योरो‘ द्वारा खुद अपने स्तर पर अपने सूत्रों के माध्यम से जांचा जाता है। आई बी की हरी झंडी के उपरांत ही राहुल गांधी के दौरे की तारीख तय की जाती है। राहुल गांधी के कार्यालय, एसपीजी और आईबी के अधिकारियों के बीच की कवायद को इतना गुप्त रखा जाता है कि मीडिया तक उसे पता नही कर पाती।
 
इस तरह गोपनीय तौर पर कांग्रेस की नजर में देश के भावी प्रधानमंत्री का दौरा कार्यक्रम तय होता है और राहुल गांधी अचानक ही किसी दलित आदिवासी के घर पर जाकर रात बिताकर सभी को हतप्रभ कर देते है। देखा जाए तो राहुल गांधी जिस भी गांव में रात बिताने का उपक्रम करते हैं, उस गांव में एसपीजी और आईबी के कर्मचारी सादे कपड़ों में हर गतिविधि पर नजर रखते हैं। इस सारे घटनाक्रम की भनक स्थानीय प्रशासन तक को नहीं हो पाती है। राहुल के रात बिताने वाले क्षेत्र में व्हीव्हीआईपी सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक एएसएल (एडवांस सिक्यूरिटी लेयर) अर्थात अग्रिम सुरक्षा कवच को पूरी तरह चाक चौबंद कर लिया जाता है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि जिस भी गांव में देश के युवराज रात बिताते हैं उस गांव में उस दिन आरजी (राहुल गांधी) की पसंद की सब्जी भी बिकती है, ताकि वे रात के खाने में उसका स्वाद ले सकें।

यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है कि राहुल गांधी की इस तरह की यात्राओं से देश का क्या भला हो रहा है? क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में आज तक कोई बड़ा आंदोलन अंजाम ले सका है जिसने देश की दिशा और दशा को बदला हो? राहुल की यात्राओं से सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस का ही भला हो रहा है। यही सच्चाई है, और इसके लिए राहुल गांधी की सुरक्षा में लगी एसपीजी, आईबी, प्रदेश सरकार का सुरक्षा अमला और सुरक्षा एजेंसियों पर होने वाले खर्च को कांग्रेस से ही वसूला जाना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस ही वह है जो राहुल गांधी के दौरों से अपना जनाधार बढ़ाकर राहुल गांधी को महिमा मण्डित कर रहे हैं। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब होता है जब विपक्ष में बैठी भाजपा और राहुल फेक्टर से सबसे अधिक घबराने वाली उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती तक इस मामले में मौन धारण कर लेती हैं।

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

गांधी परिवार में पिघल सकेगी नफरत की बर्फ!

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

क्या गांधी परिवार में पिघल सकेगी नफरत की बर्फ!
नेहरू गांधी परिवार में मोती लाल, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी के बाद वाली पीढ़ी में जब तक स्व.संजय गांधी जिन्दा थे, तब तक एका दिखाई पड़ती रही, उसके उपरांत नेहरू गांघी परिवार की एकता को मानो किसी की नजर लग गई। इंदिरा गांधी के बर्ताव से नाराज मेनका गांधी को परिवार से प्रथक कर दिया गया था। इसके बाद वाली पीढ़ी अर्थात प्रियंका वढ़ेरा, राहुल गांधी और इनके चचेरे भाई वरूण गांधी के बीच भी रिश्ते सामान्य नहीं रहे। उत्सव के मौके पर भी देवरानी मेनका और जेठानी सोनिया के बीच दूरी साफ दिखाई दी। प्रियंका के विवाह के अवसर पर भी मेनका परिदृश्य से गायब ही रहीं। अब जब स्व.संजय गांधी के सुपुत्र वरूण गांधी विवाह के बंधन में बंधने जा रहे हैं तो मेनका को उम्मीद है कि उनकी जेठानी और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया दलगत राजनैतिक प्रतिद्वंदिता को तजकर शामिल होंगी। विश्लेषकों की नजरें इस पर टिक गई हैं कि संजय मेनका के इकलौते पुत्र वरूण की शादी में ताई बाराती बनकर जाती हैं या नहीं!
पहले अहलूवालिया को बदलो फिर बदलेगा मंत्रीपद
योजना आयोग के उपाध्यक्ष सरदार मोटेंक सिंह अहलूवालिया की सख्ती से भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ, रेल मंत्री ममता बनर्जी, वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायस्वाल सहित अनेक राजनेताओं की कुर्सी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इन नेताओं ने आपसी मतभेद भुलाकर अब अहलूवालिया के खिलाफ लामबंद होना आरंभ कर दिया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि जिन मंत्रियों के विभाग बदलने की सुगबुगाहट चल रही है उन्होंने प्रधानमंत्री और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को दो टूक शब्दों में कह दिया है कि उनका विभाग इसी शर्त पर बदला जाए जब योजना आयोग से अहलूवालिया की रवानगी डाली जाए। खबर है कि मंत्रियों को प्रसन्न करने मांटेक सिंह अहलूवालिया को अमेरिका में भारत के राजदूत मीरा शंकर के स्थान पर पदस्थ किया जा सकता है।
कलमाड़ी की राह नहीं है आसान
आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे राष्ट्रमण्डल खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी की राह अब आसान नहीं दिख रही है। कलमाड़ी मण्डली के भ्रष्टाचार के किस्से अब आम होने से लोगों के मन में कलमाड़ी के प्रति अनादर का भाव आने लगा है। इसकी एक बानगी पिछले दिनों देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में देखने को मिली। हुआ यूं कि कलमाड़ी अपने कुछ मित्रों के साथ मौज मस्ती के इरादे से दिल्ली के एक माल में जा धमके। कलमाड़ी जैसे ही अपने निजी सुरक्षा अधिकारी को माल के बाहर छोड़कर अंदर प्रविष्ठ हुए, वैसे ही वहां लोगो ने कलमाड़ी को बिजूका (खेतों में खड़ा पुतला) की तरह आश्चर्य से देखना आरंभ कर दिया। कलमाड़ी मनमसोसकर माल के अंदर एक रेस्टोरेंट में पहुंचे, उन्होंने खाने का आर्डर दिया। जब तक खाना आता तब तक तो आसपास बैठे लोगों ने कलमाड़ी को इतना भला बुरा कहा कि कलमाड़ी और उनके दोस्तों का खाना खराब हुए बिना नहीं रह पाया।
संघ ने ओढ़ी गिरगिट की खाल: हैरान है कांग्रेस
अयोध्या मामले में लखनउ उच्च न्यायालय के फैसले के आने के बाद जिस तरह से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सुर बदले हैं, उससे कांग्रेस बुरी तरह हैरान दिखाई पड़ रही है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद संतोष जताया है। गौरतलब है कि संघ के अनुवांशिक घड़े विहिप द्वारा सदा से ही यह राग अलापा जाता रहा है कि पंचकोषीय यात्रा के अंदर कोई मस्जिद को स्वीकार नहीं किया जाएगा। अब संघ के नए आलाप से कांग्रेस खौफजदा है, कांग्रेस को लगने लगा है कि यह मामला कहीं उसके हाथों से फिसलकर भाजपा की झोली में न चला जाए। कल तक अपनी बातों पर अडिग संघ की इस नई लचीली सम्भाव की नीति ने कांग्रेस की नींद ही उड़ा दी है। माना जा रहा है कि अल्पसंख्यकांे को लुभाने, अपने पास बुलवाने और उदारवादी मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति विश्वास पैदा कराने की रणनीति का हिस्सा है संघ का यह पैंतरा।
रेत की तरह खिसल रहा है भाजपा का जनाधार
भाजपा के आला नेताओं की नींद इस बात से उड़ी हुई है कि दो सीटों से लेकर देश पर शासन करने वाली भारतीय जनता पार्टी का जनाधार बहुत ही तेजी से खिसकता जा रहा है। पार्टी प्रमुख नितिन गड़करी के करीबी सूत्रों का दावा है कि पार्टी द्वारा कराए गए अंदरूनी एवं गुप्त सर्वे में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि भाजपा का अगड़ा वोट बैंक बुरी तरह ध्वस्त हो चुका है। भाजपा द्वारा पांच चरणों में कराए गए सर्वे में साफ कहा गया है कि मतदाताओं में राहुल फेक्टर जबर्दस्त तरीके से हावी हो चुका है। साथ ही साथ राजग के पीएम इन वेटिंग के नेता प्रतिपक्ष पद से हटते ही उनकी सक्रियता में आई कमी भी इसका एक प्रमुख कारण है। वैसे भी भाजपा का चेहरा रहे अटल बिहारी बाजपेयी अब सक्रिय राजनीति को अलविदा कह चुके हैं। भाजपा के कद्दावर नेताओं को भी भाजपा के ही कुछ शातिर नेताओं ने बाहर का रास्ता दिखाकर पार्टी की जड़ों में मट्ठा डाला गया है। आक्रमक हिन्दुत्व के हिमायतियों के आईकान बन चुके नरेंद्र मोदी के पर भी काट देने से भाजपा को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
दूसरी पीढ़ी को विरासत सौंपने की तैयारी में नेता
भारत गणराज्य में अब तक राजनैतिक विरासत को एक के बाद एक पीढ़ी को हस्तांतरित करने का उदहारण सिर्फ अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ही देखने को मिला है, जहां नेहरू गांधी परिवार को ही कांग्रेस की ताकतवर की पोस्ट सौंपी गई है। जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी इस बात के साक्षात उदहारण हैं कि राजनीति में विरासत का हस्तांतरण और अनुकम्पा नियुक्ति कितनी जल्दी मिलती है, और उसका सफल संचालन कैसे किया जा सकता है। नेहरू गांधी परिवार की तर्ज पर अब अनेक राजनेताओं ने इसको अंगीकार करना आरंभ कर दिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपने पुत्र जयवर्धन, कमल नाथ ने नकुल नाथ, स्व.माधव राव सिंधिया के उपरांत ज्योतिरादित्य सिंधिया, कुंवर अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह, राम विलास पासवान के पुत्र चिराग, लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी, शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले, मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश आदि ने राजनीति में अपने पिताओं की वसीयत को संभालना आरंभ कर दिया है।
काडर घराने की नई पेशकश
सरकारी कर्मचारियों में काडर का बहुत ही महत्व होता है। कोई अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा से है तो कोई पुलिस, विदेश, सूचना, वन आदि की सेवाओं से। केंद्र सरकार ने सिविल सर्विसिस की तर्ज पर अब पंचायत सर्विसेस नाम से नया काडर तैयार करने की कार्ययोजना पर काम किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने पंचायत काडर के मामले मंे गाईड लाईन तय कर दी गई हैं। वैसे तो देश के हृदय प्रदेश की सरकार को इस मामले में सैद्धांतिक एककतेन होना पड़ा है पर मध्य प्रदेश को इस गाईड लाईन में कुछ आपत्तियां नजर आ रही हैं। केंद्र सरकार अपनी महात्वाकांक्षी महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, सर्वशिक्षा अभियान, स्वर्ण जयंती रोजगार योजना आदि के सफल क्रियान्वयन के लिए कर्मचारियों की पर्याप्त फौज की कमी के कारण बेहद चिंतित है, यही कारण है कि केंद्र का पंचायत सर्विसेज नाम का नया काडर बनाने की सूझी है। इस नए काडर के लिए केंद्र सरकार का अंशदान अस्सी फीसदी होगा, जो हर साल दस प्रतिशत की दर से घटेगा, अर्थात आठ सालांे बाद इन कर्मचारियों के वेतन भत्तों आदि की व्यवस्था राज्यों के जिम्मे होगी। राज्यों की सरकारों को भय सता रहा है कि आने वाले समय में वे इन कर्मचारियों के वेतन भत्तों की व्यवस्था कहां से कर पाएंगे?
लो आ गया आधार!
भारत गणराज्य में यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर (यूआईडी) देने का सिलसिला आरंभ हो गया है। केंद्र सरकार की इस महात्वाकांक्षी परियोजना का पहला आधार कार्ड कांग्रेसनीत महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले मे टेंभली में आयोजित एक कार्यक्रम में वजीरेआजम डॉ. मनमोहन सिंह और यूपीए चेयरपर्सन श्रीमति सोनिया गांधी ने आदिवासी महिला रंजना सोनवने को सौंपा। 12 अंकों वाले इस आधार कार्ड की अनेक विशेषताएं हैं। इससे प्रमुख तौर पर फर्जी राशन कार्ड पर लगाम लग सकेगी। वैसे उम्मीद की जा रही थी कि इस महात्वपूर्ण योजना का आगाज कांग्रेस नीत कंेद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी की जन्मस्थली पोरबंदर, अथवा गुजरात के साबरमती या फिर भारत को आजाद कराने वाले रणबांकुरों की जन्म या कर्मस्थली से करना चाहिए था। विडम्बना है कि गुजरात में भाजपा की नरेंद्र मोदी की सरकार सत्तारूढ है, और नरेंद्र मोदी तथा कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है, विवाद भाजपा कांग्रेस का और भोगमान भोगे राष्ट्रपिता के प्रदेश की जनता।
भाजपा में वापसी को बैचेन हैं साध्वी
एक समय मंे भारतीय जनता पार्टी की फायर ब्रांड नेत्री रहीं उमा भारती द्वारा गठित भारतीय जनशक्ति पार्टी का अस्तित्व लगभग समाप्त ही होने के बाद अब उमा भारती खुद भी भाजपा में वापसी को बेचैन दिखाई पड रही हैं। पिछले दो सालों से उमा भारती के कदम ताल से साफ जाहिर हो रहा है कि उमा भारती भाजपा के समंुदर से बाहर रहकर स्वांस लेने में असहज ही महसूस कर रही हैं। वैसे भी उमा भारती को शरीर तो उनके हनुमान रहे प्रहलाद सिंह पटेल को उस शरीर का दिमाग माना जाता था। अब जबकि दिमाग और शरीर दोनों ही अलग अलग हो गए हैं तब उमा भारती काफी हद तक कमजोर ही प्रतीत हो रही हैं। 25 सितम्बर 1990 को राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी की सोमनाथ से अयोध्या यात्रा के 20 बरस पूरे होने पर उमा भारती को लोगों ने जब आड़वाणी के साथ देखा तो बहुत ही आश्चर्यचकित रह गए। तब से अनुमान लगाया जाने लगा है कि उमा भारती आने वाले नवरात्र में भाजपा में आमद दे सकती हैं। भोपाल में उमाश्री के बीमार पड़ने पर उनके पुस्ताहाल जानने सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान का जाना भी कम आश्चर्यजनक नहीं माना जा रहा है।
कांग्रेस का बसपा को झटका
दो महारानियों के बीच छिड़ी रार के चलते केंद्र और उत्तर प्रदेश की सियासत गर्माने लगी है। कांग्रेस का कहना है कि राज्यों में कानून व्यवस्था और अमन चैन की कायमी का जिम्मा सूबे की सरकार का होता है। केंद्र सरकार तो महज राज्यों के अनुरोध पर पीछे से अपना हाथ रखती है। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद में उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति के मद्देनजर मायावती की बयानबाजी के उपरांत एआईसीसी के सचिव और यूपी के इंचार्ज परवेश हाशमी ने कहा कि अगर यूपी की निजाम मायावती उत्तर प्रदेश में अमन चैन कायम नहीं रख सकतीं हैं तो उन्हंे अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए, फिर केंद्र सरकार द्वारा सूबे में अमन चैन कायम करने का प्रयास किया जाएगा। वैसे हाशमी का कहना सच है कि राज्य में अमन चैन की जवाबदारी उस राज्य की सरकार के कांधों पर ही होती है। कांग्रेस के सचिव इस बात को भी रेखांकित कर देते तो बेहतर होता कि इस तरह की सियासत में ईंधन कौन डालता आया है?
नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली चली . . .
आज से आरंभ होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड ध्वस्त हो चुके हैं। पैसों को पानी की तरह बहाने का शानदार प्रदर्शन किया गया है। वस्तुतः पैसे आयोजन समिति, उनके उपकृत लोगों की जेबों की शान बन गए हैं। अब गफलतों को ढाकने की कवायद जोर शोर से की जा रही है। खबर है कि खेलों मंे खिलाड़ियों को आने जाने के लिए हेलीकाप्टर का प्रयोग किया जाएगा। अरबों रूपए व्यय कर बनाए गए विशेष मार्ग, एक्सप्रेस वे, अलग लेन का अब क्या होगा? क्या भ्रष्टाचार के शिरोमणी की अघोषित उपाधि पाने वाले आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी का बचाव करने वाली कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी इस बारे में दो शब्द कह पाएंगी? क्या इस तरह का भ्रष्टाचार उनके पीहर ‘‘इटली‘‘ में होता तो वे इसी तरह मूकदर्शक बनी बैठी रहतीं? और तो और अब सोनिया गांधी की शह पर कलमाड़ी यह कहने में भी गुरेज नहीं कर रहे हैं कि भारत ऑलंपिक की मेजबानी को भी तैयार है। लगता है अभी कलमाड़ी सहित कांग्रेस के आला नेताओं का पेट हजारों करोड़ रूपए गपाने के बाद भी भरा नहीं है।
राहुल भैया आएंगे, नई रोशनी लाएंगे
कांग्रेस के युवराज और उसकी ही नजरों में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी 04 अक्टूबर को सिवनी आ रहे हैं। वे आदिवासी बाहुल्य लखनादौन में कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसके पहले उनके पिता स्व.राजीव गांधी भी एक मर्तबा सिवनी आ चुके हैं। राहुल गांधी लखनादौन आएंगे तो सिवनी के युवाओं में बहुत जोश दिखाई पड़ रहा है। बच्चा बच्चा कह रहा है कि राहुल भईया आएंगे, नई रोशनी लाएंगे। जिले के कांग्रेसी बहुत खुश हैं कि राहुल गांधी के आने पर युवा झूम रहा है, किन्तु कांग्रेसियों का मुगालता तब टूटेगा जब उन्हे पता चलेगा कि युवा यह सोच सोचकर खुश हो रहा है कि राहुल गांधी द्वारा सिवनी के फोरलेन के लिए भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को कुछ नसीहत या संदेश दिया जाएगा। अगर राहुल गांधी ने इस मामले में खामोशी अख्तियार की तो फिर उनका सिवनी आना या न आना एक बराबर ही होगा। वैसे इस दिन लखनादौन के पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष दिनेश राय के लिए कांग्रेस के दरवाजे भी खुल सकते हैं।
पुच्छल तारा
छः दशकों के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि विवाद के बारे में अपना फैसला सुनाया है। केंद्र, राज्य सरकार और जिलों के प्रशासन को भय था कि कहीं इस फैसले की रोशनी में उन्माद न फैल जाए और कानून तथा व्यवस्था की स्थिति नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए। देश के हर धर्म, महजब, संप्रदाय, पंथ के लोगों ने गजब की सहनशीलता, धैर्य और संयम का परिचय दिया है। भटिंडा से पेंट व्यवसाई रजत गुप्ता ने एक शानदार जानदार ईमेल भेजा है। रजत गुप्ता लिखते हैं -
‘चर्चे नहीं इसान पढ़े जाते हैं!,
मजहब नही ईमान पढ़े जाते हैं!!,
भारत ही एसा देश है जहां!!!,
एक साथ ‘गीता‘ और ‘कुरान‘ पढ़े जाते हैं!!!!।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

सियासी जादूगर के जाल में भाजपा

सियासी जादूगर कमल नाथ के जाल में उलझे भाजपा के कर्णधार
 
(लिमटी खरे)

मध्य प्रदेश भाजपा के तीखे तेवरों के बाद प्रदेश सरकार और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के बीच रार बढ़ती ही जा रही है। भाजपा के मुख्यमंत्री और मंत्रियों के केंद्रीय मंत्रियांे विशेषकर कमल नाथ के गुणगान के बाद संगठन ने इस मामले को गंभीरता से लिया और नेशनल हाईवे के मामलों में केंद्र को घेरना आरंभ कर दिया है। भाजपा के चरणबद्ध आंदोलन के आगाज ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, इसका कारण केंद्रीय मंत्रियांे और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के बीच आपसी समन्वय को ही माना जा रहा है। भले ही संगठन इस बात को लेकर खासा चिंतित हो कि 2003 में दस साल के दिग्विजयी शासन को उसने सड़क, बिजली और पानी के मामले को भुनाकर मध्य प्रदेश का ताज पाया हो, किन्तु पिछले सात सालों में प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा ने जनता के मन में भाजपा के प्रति एक असंतोष को पनपने की भूमि तैयार कर ही दी है। लोगों का कहना है कि जब वे वाहन खरीदते हैं, तभी उनके द्वारा रोड़ टेक्स की अदायगी कर दी जाती है वह भी लाईफ टाईम, तब जगह जगह टोल टेक्स की वसूली का क्या ओचित्य है। सड़क पर चलने का कर तो एक बार एक मुश्त जमा हो ही चुका है, फिर उसी मद में दुबारा वसूली क्यों और कैसे? फिर जब 2003 से अब तक स्वर्णिम चतुर्भुज और नार्थ साउथ, ईस्ट वेस्ट कारीडोर के लिए पेट्रोल डीजल पर वाहन चालकों से एक रूपए सेस वसूला जा रहा है, तब उन्ही वाहन चालकों से दुबारा टोल टेक्स वसूली को कहां तक न्याय संगत ठहराया जा सकता है?

‘‘सियासी जादूगर‘‘ एवं भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के पक्ष मंे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सूबे के लोक कर्म मंत्री नागेंद्र सिंह ने पिछले माहों में खासा तराना बजाया। मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार सियासी जादूगर की शान में बज रहे इस मनमोहक तरन्नुम में सब कुछ भूल बैठी और केंद्र के द्वारा राज्य की उपेक्षा की राष्ट्रीय भाजपा की चीख पुकार ने भी उसकी नींद में खलल नहीं डाला। भाजपा मंहगाई और मध्य प्रदेश के साथ होने वाले अन्याय को लेकर केंद्र सरकार को कोस रही थी, उधर भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों द्वारा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री के पक्ष में बयानबाजी की जा रही थी। भाजपा की नेशनल बाडी के विरोध और सरकार के पक्ष के बयानांे पर नेशनल मीडिया के सामने मुख्यमंत्री स्वयं निरूत्तर थे।

हो सकता है जब यह बात भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के कानों में डाली गई हो तब भाजपा के नेताओं के कान खड़े हुए हों, कि मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र के कुछ मंत्रियों के बीच अघोषित परोक्ष समझौते केंद्रीय मंत्रियों द्वारा ही मीडिया के समक्ष लाए जा रहे हों और उन्होंने सरकार पर लगाम कसने अपनी मध्य प्रदेश इकाई को इस बात को गंभीरता से लेने की बात कही हो। संभवतः यही कारण है कि भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों के सामने इस बात को रेखांकित किया गया। जब यह बात प्रदेश पदाधिकारियों के सामने आई तब प्रदेश भाजपा ने नेशनल हाईवे के मामले में केंद्र को आड़े हाथों लेने का फैसला लिया।
 
मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव हेतु केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा हाथ खींच लिए जाने के आरोप के साथ ही मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ सड़कों पर उतरने की बात कही जा रही है। भूतल परिवहन मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नेशनल हाईवे के संधारण के प्रस्तावों को महालेखाकार लेखा एवं हकदारी ग्वालियर के माध्यम से केंद्र को भेजना था, वह अभी तक नही भेजे गए हैं, कुछ प्रस्ताव केंद्र को प्राप्त भी हुए थे किन्तु त्रुटिपूर्ण होने के चलते केंद्र ने इन्हें नामंजूर कर दिया था। सूत्रों का आरोप है कि मध्य प्रदेश के नेशनल हाईवे के रखरखाव के लिए केंद्र सरकार से आने वाली भारी भरकम रकम में पिछले नौ सालों के रिकार्ड में जबर्दस्त गड़बड़झाला है। केंद्र सरकार को प्रस्ताव न भेजकर मध्य प्रदेश ने अपने ही खजाने में तकरीबन तीस करोड़ रूपए की चपत लगा ली है।
 
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव वैसे तो 2013 के अंत तक निर्धारित हैं, किन्तु कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के कदमताल देखकर भाजपा को भय सताने लगा है कि अगर किसी कीमत पर मध्यावधि चुनाव की नौबत आई तो प्रदेश की सत्ता भाजपा के हाथों से सियासत की मलाई रेत के ढेर की तरह फिसलने में ढेर नहीं लगने वाली। केंद्रीय भाजपा द्वारा पांच चरणों में कराए एक सर्वे की चर्चाएं भी इन दिनों सियासी हल्कों में गुलजार हो रही हैं, जिसमें आज की स्थिति में चुनाव होने की दशा में भाजपा को महज 80 सीटों पर ही संतोष करना पड़ सकता है। कांग्रेस बिना कुछ करे ही सैकड़ा पार करने की स्थिति में है। बिजली के मामले में तो आज की स्थिति पूर्व के कांग्रेस के शासनकाल से बहुत बेहतर कही जा सकती है, किन्तु सड़कों की दुर्दशा के कारण भाजपा माईनस में जाती जा रही है। विशेषकर नेशनल हाईवे की दुर्दशा को देखकर राहगीर और वाहन चालक दोनों ही मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार को पानी पी पी कर कोस रहे हैं।
 
मध्य प्रदेश में सड़कों का मामला बहुत ही संवेदनशील हो रहा है। सड़कों विशेषकर नेशनल हाईवे की स्थिति बहुत ही दयनीय होती जा रही है। संधारण के अभाव में राष्ट्रीय राजमार्ग गढ़ढों और पोखरों की सड़क में तब्दील हो गए हैं। एक तरफ नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) और लोक कर्म विभाग के नेशनल हाईवे डिवीजन्स के माध्यम से राष्ट्रीय राजमार्गों का संधारण करने की बात केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, किन्तु इसमें भी अनेक पेंच सामने आ रहे हैं।
 
अव्वल तो यह कि पीडब्लूडी के एनएच डिवीजन में पदस्थ अधिकारी और कर्मचारी मूलतः मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग के ही मुलाजिम हैं, जिनके वेतन भत्ते और अन्य स्थापना व्यय का जिम्मा प्रदेश सरकार के कांधों पर ही आहूत होता है। अगर केंद्र सरकार से राष्ट्रीय राजमार्गों के संधारण की मद में राशि प्रदान नहीं की जाती है तो यह अतिरिक्त भार प्रदेश की भाजपा सरकार के कंधों पर ही आता है। जनसेवकों, मंत्रियों और नौकरशाहों की विलासिता पूर्ण जीवनशैली और फिजूलखर्ची के चलते प्रदेश सरकार की माली हालत बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही है, जिसके चलते प्रदेश सरकार इस स्थिति में नहीं प्रतीत हो रही है कि वह इस जवाबदारी का निर्वहन कर सके।
 
इसके अलावा केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय के नए विंग के तौर पर अस्तित्व में आया एनएचएआई बिना बाराती के दूल्हा की भूमिका में है, अर्थात एनएचएआई के पास अपना कोई अमला नहीं है। केंद्र सरकार के भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा इसका गठन अवश्य ही कर दिया गया है, पर इसके लिए जरूरी महकमे की तैनाती के मामले में वह पूरी तरह मौन साधे बैठा है। मूलतः एनएचएआई की स्थापना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के दौरान अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्वकाल की महात्वाकांक्षी परियोजना ‘स्वर्णिम चतुर्भुज‘ और इसके अंग ‘उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम गलियारे‘ के निर्माण के लिए की गई थी। दोनों ही काम लगभग लगभग पूरे होने को हैं, इसलिए अब एनएचएआई के लिए नए काम की तलाश आरंभ कर दी गई है।
 
कहा जा रहा है कि भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ चाह रहे हैं कि राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और संधारण का जिम्मा एनएचएआई को सौंप दिया जाए। इस मामले का सबसे आश्चर्य जनक पहलू यह है कि एनएचएआई के पास भारत गणराज्य में किसी भी सूबे में एसा अमला नहीं है जो नए राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण या रखरखाव की महती जवाबदारी उठा सके। बिना किसी ठोस कार्ययोजना के एनएचएआई को इसकी जवाबदारी देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित कतई नहीं कहा जा सकता है।
 
बहरहाल कल तक केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ की तारीफों में कशीदे गढ़ने वाले मध्य प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह को अब अचानक (संगठन के कड़े रूख के उपरांत) दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई है। अब उन्हें भान हुआ है कि सबसे बड़े ‘‘सियासी जादूगर‘‘ कमल नाथ ने उन्हें अब तक जो सपने दिखाए थे, वे महज छलावा ही थे। सियासत के अखाड़े के स्वयंभू अपराजित अजेय (1997 में उपचुनाव में सुंदर लाल पटवा के हाथों जबर्दस्त पटकनी खाने को छोड़कर) योद्धा कमल नाथ ने एक ही धोबी पाट में प्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्रियों को धूल चटवा दी है। अपने पत्र में नागेंद्र सिंह लिखते हैं कि प्रदेश से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गो का रखरखाव पूरी तरह एनएचएआई के हवाले कर दिया जाए या फिर इसके संधारण का काम पूरी तरह से मध्य प्रदेश सरकार को सौंप दिया जाए।
 
वैसे नागेंद्र सिंह की पीड़ा जायज है। कमल नाथ को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा न तो मई 2010 में केंद्र को भेजे गए राष्ट्रीय राजमार्गों के प्रस्तावों को मंजूरी दी जा रही है, और न ही केंद्र द्वारा खुद ही उसका संधारण किया जा रहा है, नतीजतन ये राजमार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। नागें्रद सिंह को चाहिए कि वे इस बात को भी जनता के सामने लाएं कि उन्होंने लोक कर्म मंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश की किन किन सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील करने के प्रस्ताव कंेद्र को भेजे थे।
 
क्या कारण था कि बहुत ही कम यातायात दबाव वाले एवं कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा से गुजरने वाले नरसिंहपुर, हर्रई, सिंगोड़ी, छिंदवाड़ा, उमरानाला, सौंसर, सावनेर, नागपुर मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग मंे तब्दील करने का प्रस्ताव उनके द्वारा केंद्र सरकार को भेजा गया था? जिस प्रस्ताव पर योजना आयोग ने अपना अडंगा लगा दिया है। सियासी जादूगर कमल नाथ ने एक एसा तीर चलाया था, जिसमें भाजपा के कुशाग्र बुद्धि के धनी समझे जाने वाले जनसेवक उलझकर रह गए हैं। राज्य की अनेक सड़कों को राष्ट्रीय राजमाग में तब्दील कराने का प्रस्ताव भेजकर प्रदेश सरकार ने इन सड़कों का संधारण बंद कर दिया था।
 
राज्य सरकार को लगने लगा था कि ये सड़कें जल्द ही राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील हो जाएंगी और फिर इनके रखरखाव या निर्माण का सरदर्द केंद्र के भरोसे ही होगा, जिससे इसमें व्यय होने वाले धन से राज्य सरकार पूरी तरह मुक्त होगी। वस्तुतः एसा हुआ नहीं, ये सड़कें राष्ट्रीय राजमार्ग में तब्दील नहीं हुई और आज भी ये प्रदेश सरकार की संपत्ति ही हैं। इतना ही नहीं दीगर राष्ट्रीय राजमार्गों का संधारण भी केंद्र द्वारा नही किए जाने से, संधारण के अभाव में इन सड़कों के धुर्रे पूरी तरह से उड़ चुके हैं। आम जनता को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि ये सड़कंे किसके स्वामित्व में हैं, वह तो राज्य से गुजरने वाली हर सड़क की दुर्दशा के लिए राज्य सरकार को ही पूरी तरह दोषी मानती है, भले ही केंद्र सरकार द्वारा इसका पैसा नहीं दिया जा रहा हो।
 
सड़कों बदहाली पर जनता के गुस्से को देखकर भाजपा की शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली सरकार बुरी तरह खौफजदा साफ दिखाई दे रही है। यही कारण है कि केंद्र सरकार को घेरने के लिए वह अब राष्ट्रीय राजमार्गों पर जगह जगह नोटिस बोर्ड लगाने का मन बना रही है, जिसमें इस बात का उल्लेख होगा कि इन सड़कों की बदहाली के लिए राज्य की भारतीय जनता पार्टी की सरकार कतई जवाबदार नही है। सूबे की सरकार मान रही होगी कि एसा करके कम से कम इन मार्गों पर चलने वालों को सच्चाई से रूबरू तो करवा ही दिया जाएगा।
 
जनता को इस बात से कतई लेना देना नहीं है कि सड़कें किसकी संपत्ति हैं, या इसके रख रखाव का जिम्मा किसका है। राज्य सरकार अगर बोर्ड लगा रही है तो फिर राज्य सरकार को उस नोटिस बोर्ड पर इस बात का उल्लेख भी करना चाहिए कि इसका संधारण करने वाला लोक कर्म विभाग का राष्ट्रीय राजमार्ग महकमा मूलतः किस राज्य की सेवा का अंग है। वस्तुतः इसके मातहत मध्य प्रदेश सरकार के कर्मचारी ही होते हैं। कर्मचारी मध्य प्रदेश के जिम्मेदारी केंद्र सरकार की अगर दोनों ही जगह एक दल की सरकार है, तब तो सामंजस्य बना रह सकता है, किन्तु अगर सरकारें अलग अलग दलों की हैं तो फिर सामंजस्य का अभाव निश्चित तौर पर परिलक्षित ही होगा।
 
मध्य प्रदेश की संसकारधानी जबलपुर से बरास्ता सिवनी, महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात (जिसका लखनादौन से नागपुर तक का हिस्सा उत्तर दक्षिण गलियारे का अंग बन गया है) की हालत देखकर राहगीरों और वाहन चालकांे को रोना ही आता है। आलम यह है कि वाहन चालकों को गड्ढों के बीच सड़कों को खोजना पड़ता है। अनेक स्थानों पर तो डेढ़ से दो फीट गहरे गड्ढे हो चुके हैं, सड़कों पर।
 
एसा नहीं कि इस मार्ग पर से उच्च न्यायालय एवं अन्य न्यायालयों के माननीय न्यायधीशगण, प्रदेश और केंद्र सरकार के मंत्रीगण, सांसदगण, विधायकगण, कमिश्नर, कलेक्टर, महानिरीक्षक, उपमहानिरीक्ष पुलिस, एसपी या एनएचएआई के प्रोजेक्ट डायरेक्टर विवेक जायस्वाल सहित अन्य अधिकारी न गुजरते हों, पर किसी ने भी अब तक इस बारे में संज्ञान लेने की फुर्सत नहीं उठाई है। हो सकता है इनमें से अधिकांश साहेबान सरकारी वाहनों में सफर करते हों, तो इन्हें वाहन की टूट फूट और टायर घिसाई से ज्यादा लेना देना न हो पर एक आम आदमी गाढ़े पसीने की कमाई से खरीदे गए वाहन के कलपुर्जे हिलते कैसे देख सकता है? नेशनल हाईवे पर पेंच तो इससे कुछ ही दूरी पर कान्हा नेशनल पार्क अवस्थित है। देश विदेश से आने वाले पर्यटकों द्वारा जब राष्ट्रीय राजमार्ग की दुर्दशा देखी जाती है तो निश्चित तौर उनके मानस पटल पर प्रदेश की छवि बहुत अच्छी तो कतई नहीं बन पाती होगी। वे निश्चित तौर पर मध्य प्रदेश की सड़कों को कोढ़, खाज ग्रस्त मानते होंगे, और वापस जाकर यही कहते होंगे, ‘‘इस जन्म या अगले जन्म मोहे एम पी न भेजियो‘‘।
 
कहा जा रहा है कि लखनादौन के पास बने टोल ब्रिज को इस साल के अंत तक टोल टेक्स वसूली के लिए चालू भी कर दिया जाएगा। वाहन चालकों में इस उधड़ी सड़क को देखकर वैसे ही रोष और असंतोष पनप रहा है, फिर उपर से टोल टेक्स की वसूली उनके रिसते घावों पर जख्म का ही काम करेगी। वैसे देखा जाए तो वाहन खरीदी के समय ही लिया जाने वाला रोड़ टेक्स आखिर क्यों वसूला जाता है? जाहिर है सड़क पर चलने का कर होता है रोड़ टेक्स, जब वाहन चालक एक मुश्त वाहन के पंजीयन के दौरान परिवहन विभाग के पास इसे आरंभ मंे ही जमा करा देता है, फिर टोल टेक्स किस बात का।
 
क्या सड़कों पर चलने के लिए वाहन चालकों को बार बार कर देना पड़ेगा? एक बात और यहां उल्लेखनीय है कि जब स्वर्णिम चतुर्भुज और उसके अंग उत्तर दक्षिण गलियारे के निर्माण और संधारण हेतु 2003 से अब तक पेट्रोल डीजल पर एक रूपए सेस (एक तरह का कर) लगाकर वसूल ही लिया गया है, तो फिर टोल टेक्स वसूलने की बात तो बेमानी ही है। आश्चर्य इस बात पर ज्यादा होता है कि इस मामले में केंद्र में विपक्ष में बैठी भाजपा बयानबाजी के अलावा और कुछ करती नहीं दिखती है।

सोमवार, 27 सितंबर 2010

चूल्हे में हगें, शनीचर को दोष दें. . .

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)
 
चूल्हे में हगें, शनीचर को दोष दें. . .
बुंदेलखण्ड की बहुत पुरानी कहावत है -‘‘चूल्हे में हगें, शनीचर को दोष दें. . .। अर्थात पुराने जमाने के शौचालयों के बजाए अलह सुब्बह जाकर चूल्हे में जाकर पॉटी कर दी और सुबह जब देखा तो कहने लगे शनी भारी हो गया है हमारे घर की रसोई में चूल्हे में पॉटी पड़ी है। इसी कहावत को मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार चरितार्थ कर रही है। मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव हेतु केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा हाथ खींच लिए जाने के आरोप के साथ ही मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ सड़कों पर उतरने की बात कही जा रही है। भूतल परिवहन मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नेशनल हाईवे के संधारण के प्रस्तावों को महालेखाकार लेखा एवं हकदारी ग्वालियर के माध्यम से केंद्र को भेजना था, वह अभी तक नही भेजे गए हैं, कुछ प्रस्ताव केंद्र को प्राप्त भी हुए थे किन्तु त्रुटिपूर्ण होने के चलते केंद्र ने इन्हें नामंजूर कर दिया था। सूत्रों का आरोप है कि मध्य प्रदेश के नेशनल हाईवे के रखरखाव के लिए केंद्र सरकार से आने वाली भारी भरकम रकम में पिछले नौ सालों के रिकार्ड में जबर्दस्त गड़बड़झाला है। केंद्र सरकार को प्रस्ताव न भेजकर मध्य प्रदेश ने अपने ही खजाने में तकरीबन तीस करोड़ रूपए की चपत लगा ली है।

सात दिन पहले जागे कलमाड़ी!
राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी 2003 में मिल गई थी, और आयोजन होना था 2010 में अर्थात सात सालों का समय था भारत के पास। आयोजन समिति पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगते रहे। न केवल भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री वरन् कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी सहित विपक्ष भी अर्थमोह में ‘ध्रतराष्ट्र‘ की भूमिका में रहा। आयोजन के महज सात दिन पहले सुरेश कलमाड़ी को ‘दिव्य ज्ञान‘ की प्राप्ति हुई, और उन्होंने अपनी गल्ती स्वीकार की है, कि अभी बहुत काम होना बाकी है। कलमाड़ी सोच रहे होंगे के अंतिम समय में सच को स्वीकार करने से वे अपनी जवाबदारी से बच जाएंगे। कलमाड़ी की अंतिम समय में स्वीकारोक्ति किसी ओर के नहीं वरन् प्रधानमंत्री डॉ..मनमोहन सिंह और कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के गाल पर करारे तमाचे से कम नहीं है। जिसे वे भले ही महसूस न कर पा रहे हों पर इसकी गूंज, अनुगूंज, प्रतिध्वनि न केवल भारत में वरन् समूचे विश्व में जोर से सुनाई दे रही है।

तीसरी महाशक्ति बना भारत गणराज्य
भ्रष्टाचार, अनाचार, नक्सलवाद, अलगाववाद, माओवाद, आतंकवाद, प्रांतवाद, भाषावाद आदि की जद में कराहने वाले भारत गणराज्य के नागरिकों के लिए यह खबर खुशी देने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है कि भारत गणराज्य को विश्व की तीसरी महाशक्ति के तौर पर पहचाना गया है। जी हां, अमेरिका की सरकारी रिपोर्ट में 2010 के ताकतवर देशों की फेहरिस्त में अमेरिका, चीन के बाद भारत को स्थान दिया जाना निश्चित तौर पर भारत के लिए गर्व की बात है। इस सूची के अनुसार दुनिया की 22 फीसदी ताकत अमेरिका के पास, 12 फीसदी चीन के पास, भारत के पास आठ प्रतिशत तो जापान, ब्राजील और रूस के पास 5 - 5 प्रतिशत ताकत है। इतना ही नहीं अनुमान 2025 को लेकर लगाया गया है, जिसमें अमेरिका की ताकत 4 प्रतिशत घटकर जताई गई है, 2025 में अमेरिका की ताकत 18 फीसदी, यूरोपीय संघ की 14 फीसदी और भारत की ताकत में दो अंको का इजाफा होकर यह 10 फीसदी होने का अनुमान लगाया गया है।

बाढ़ से निपटने तैयार नहीं हैं सूबे
कितने आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य द्वारा 35 साल पहले बनाए गए एक विधेयक को सूबाई सरकारों ने कानून के तौर पर मान्यता नहीं दी है। केंद्रीय जल आयोग द्वारा 1975 में बनाए गए मॉडल फ्लड बिल को देश में राजस्थान और मणिपुर द्वारा ही कानूनी तौर पर मान्यता दी है। इस विधेयक के तहत बाढ संभावित निचले इलाकों में रिहाईशी या व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के बजाए बाग बगीचे अथवा खेल के मैदान बनाने की बात कही गई थी, जिसका कारण यह था कि अतिवर्षा या बाढ़ की स्थिति में जान माल की सुरक्षा करना प्रमुख था। आश्चर्य तो तब हुआ जब 35 सालों के बाद भी राजस्थान और मणिपुर को छोडकर किसी भी सूबे की सरकार ने विधानसभा में इसे पेश करके इसे कानूनी तौर पर मान्य नहीं किया है। घोर आश्चर्य तो तब होता है जब कांग्रेस की केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए बिल को सालों साल सूबों पर राज करने वाली कांग्रेस की ही राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षा की नजर से देखा गया हो।

दिग्गी की राह पर लालू
राजनीति में वंशवाद, परिवारावद जमकर हावी होता दिख रहा है। कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने अपने पुत्र जयवर्धन को 2013 में राजनीति में लांच करने की योजना बना रखी है, तो भला स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव उससे पीछे कैसे रहते। लालू यादव ने भी अपने क्रिकेटर पुत्र तेजस्वी यादव को राजनीति में उतारकर उसे अपनी राजनैतिक विरासत सौंपने का मानस बना लिया है। पटना में लालू यादव ने अपने पुत्र तेजस्वी को मंच से बाकायदा चुनाव प्रचार की जवाबदारी सौंपकर जता दिया है कि आने वाले समय में राजद के सुप्रीमो के चेयरपर्सन उनके पुत्र तेजस्वी ही होंगे। अरे भई जब नेहरू गांधी परिवार का मूल ‘‘व्यवसाय‘‘ ही ‘‘इक्कीसवीं सदी की जनसेवा‘‘ बन गया हो तो भला फिर नेहरू गांधी परिवार को आदर्श मानने वाले राजनेता इससे भला पीछे कैसे रहेंगे।

जमुना देवी: एक युग का अवसान
मध्य प्रदेश की लौह महिला का अघोषित खिताब पाने वाली आदिवासी नेता जमुना देवी की आवाज शांत हो गई। 1952 से मध्य प्रदेश विधानसभा में लगातार गूंजने वाली आवाज को अब नही सुना जा सकेगा। वे 1952 से 1957 तक मध्य भारत विधानसभा की सदस्य रहीं। 1962 से 1967 तक लोकसभा सदस्य, 1985 में राज्य मंत्री मध्य प्रदेश सरकार, 1998 में उपमुख्यमंत्री बनीं और 16 दिसंबर 2003 को नेता प्रतिपक्ष बनीं। इसके बाद 07 जनवरी 2009 को पुनः नेता प्रतिपक्ष चुनी र्गइं। जमुना बुआ इकलौती ऐसी महिला जनसेवक रहीं जिन्हांेने कभी भी नीतियों के साथ समझौता नहीं किया। पूर्व मुख्यमंत्री एवं महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने अपने दस साल के कार्यकाल में भले ही कुंवर अर्जुन सिंह, स्व.माधवराव सिंधिया, शुक्ल बंधुओं, अजीत जोगी, कमल नाथ जैसे क्षत्रपांे को पानी पिलाया हो, पर जमुना बुआ की एक हुंकार पर राजा दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी सहम ही जाते थे। अंतिम समय तक वे सक्रिय राजनीति में रहीं। जमुना बुआ का निधन कांग्रेस के लिए क्षति अवश्य है, पर उनके जाने से राजनैतिक क्षेत्र में हुई रिक्तता की भरपाई शायद ही हो पाए। मध्य प्रदेश विधानसभा में गूंजने वाली एक दबंग आवाज अब शांत हो गई है।

बंगाल की रेलमंत्री
कांग्रेस को न जाने क्या हो गया है कि वह केंद्र मंे सत्ता की मलाई चखनेे के लिए अपने सहयोगियों के हर सितम को हंस हंस कर सह रही है। कांग्रेस चाहे जो करे पर इससे सीधे सीधे नुकसान तो रियाया का ही हो रहा है। संप्रग - 2 में रेल मंत्री बनी ममता बनर्जी का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ पश्चिम बंगाल की कुर्सी पर काबिज होना दिख रहा है। भारतीय रेल किस दिशा में जा रही है, इस बात से रेल मंत्री ममता बनर्जी को लेना देना नहीं है। पूर्व रेल मंत्री लालू यादव भी शांत भाव से सब कुछ देख सुन रहे हैं। विपक्ष के सारे दल भी मूकदर्शक हैं। रेल दुर्घटनाओं में इजाफा और रेल सुविधाओं में कमी साफ साफ दिखाई पड़ रही है। रेल मंत्री को इन सारी बातों से कोई सरोकार नहीं है, उनका प्रथम उद्देश्य पश्चिम बंगाल की कुर्सी पर काबिज होना ही है। इसलिए वे कई माहों से पश्चिम बंगाल में ही डेरा डाले हुए हैं। अब तो लोग ममता बनर्जी को भारत गणराज्य की रेल मंत्री के बजाए पश्चिम बंगाल की रेलमंत्री के नाम से भी जानने लगे हैं।

घर के लड़का गोंही चूसें, मामा खाएं अमावट
देश के सांसद विधायकों के वेतन भत्तों और अन्य सुविधाओं को देखकर दो वक्त की रोजी रोटी की जद्दोजहद में लगा आम आदमी दांतो तले उंगली दबा लेता है। देश की रक्षा करने वाले वीर सपूतांे के परिवार किस हालत में हैं, इस बात से किसी जनसेवक को लेना देना नहीं है। जनसेवकों की अपनी अंटी में पैसा और सुविधाएं बरकरार रहंे, बस इसके अलावा उन्हें और अधिक कुछ नहीं चाहिए। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि देश के खुले बाजार में जब दालें 80 रूपए प्रति किलो से अधिक की दर से बिक रही हैं, तब सेना के एक अधिकारी की बेवा को महज अस्सी रूपए प्रतिमाह पेंशन मिल रही है। सेना के दिवंगत मेजर धरमचंद ने भारत पाक के बीच हुए 1947 - 48 एवं 1965 के तथा चीन के साथ हुए 1962 के युद्ध में भाग लिया था। दिवंगत मेजर को उत्कृष्ठ सेवाओं के लिए 14 मेडल भी मिले थे। देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस मामले में संज्ञान लेते हुए सरकार को फटकार लगाई है। देश की सेवा के लिए प्राणों को न्योछावर करने वाले वीर योद्धाओं के परिवारों की बदहाली से भला जनसेवकों को क्या लेना देना।
 
औंधे मुंह गिरा आरटीई
शिक्षा का अधिकार (राईट टू एजूकेशन, आरटीई) को कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने जोर शोर से लागू तो कर दिया, किन्तु होमवर्क के बिना लागू आरटीई लागू होते ही औंधे मुंह गिर गया है। देश की महज 14 फीसदी आबादी को ही इस बारे में पता है कि आरटीई किस चिडिया का नाम है। एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है कि पंजाब में सबसे अधिक 79 फीसदी, महाराष्ट्र में 55, हरियाणा में 23, बिहार में 21, यूपी में 13, राजस्थान में 12, झारखण्ड मे छ‘, एमपी में महज चार, और देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में तो यह आंकड़ा शून्य से भी नीचे जाकर दशमलव आठ फीसदी पर आकर टिक गया है। जब राजनेताओं की नाक के नीचे दिल्ली में ही लोगों को शिक्षा के अधिकार के कानून का भान नही है तो फिर सुदूर ग्रामीण अंचलों में तो इस कानून के बारे में भगवान ही मालिक है। वैसे भी शिक्षा को लेकर आजादी के बाद नित नए प्रयोग होते रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी आजादी के मायने ही भूलती जा रही है। शिक्षा को लेकर दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में भी आम विद्यार्थी या पालक को कोई खास जानकारी नहीं है।
 
खुद या परिजन को टिकिट दिलाने जुटे कांग्रेसी
बिहार में चुनावों की गहमा गहमी काफी हद तक बढ़ चुकी है। कांग्रेस का राष्ट्रीय मुख्यालय 24 अकबर रोड़ इन दिनों बिहार सदन में तब्दील हो गया है। बिहार से आए नेताओं द्वारा कांग्रेस के नेशनल हेडक्वार्टर की देहरी को चूमा जा रहा है। कांग्रेस के आला नेताओं की समस्या यह है कि बिहार से आए पूर्व विधायक, वर्तमान विधायक, पूर्व सांसद आदि या तो खुद को ही टिकिट देने की पेरवी कर रहे हैं, या फिर उनकी प्राथमिकता है कि उनके बेटे, बेटी, बहू या दामाद को टिकिट देकर उपकृत किया जाए। बताते हैं कि प्रदेशाध्यक्ष रामजतन सिन्हा जहानाबाद से अपने पुत्र के लिए, कृष्णा शाही बेगूसराय से अपनी बहू के लिए, अशोक राम अपने बेटे के लिए सुरक्षित सीट से टिकिट चाह रहे हैं। एसी सूची बहुत ही लंबी है, जिसमें खुद के लिए या अपने परिजनों के लिए टिकिट मांगी जा रही है। सूत्रांे का कहना है कि बिहार की सूची को लेकर कांग्रेस के आला नेता भी असमंजस में हैं, यही कारण है कि दस जनपथ जाकर सूची बार बार वापस आ रही है।

शिशु मृत्यु दर रोकने में भारत असफल
दुनिया भर में हर साल 81 लाख बच्चे अपना पांचवा जन्म दिन मनाने के पहले ही काल के गाल में समा जाते हैं। शिशुओं की मौत के मामले में पिछले दो दशकों में एक तिहाई कमी आई है। इस मामले में चिंताजनक तथ्य यह है कि इन दो दशकों में भारत शिशुदर मृत्यु रोकने में लगभग नाकामयाब ही रहा है। यूनिसेफ के आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो दुनिया भर में होने वाली बच्चों की मौत में से आधी अर्थात पचास फीसदी मौतें भारत, नाईजीरिया, पाकिस्तान, चीन और कांगों में होती है। वैसे शिशुओं की मृत्यु अफ्रीका में बहुत ज्यादा होती है। इस क्षेत्र में आठ में से एक बच्चे की मौत पांच साल में हो जाती है। यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा दर 2015 तक सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य हासिल करने के लिहाज से अभी पूरी तरह से अपर्याप्त ही मानी जा रही है। 1990 के दशक में विश्व की शिशु मृत्युदर हर साल एक एक करोड़ 24 लाख थी, जो घटकर 81 लाख पर पहुंच गई है।

एमपी में हैं 51 हजार धर्मस्थल अवैध
हिमाचल प्रदेश को भले ही देवभूमि कहा जाता हो, किन्तु देश के हृदय प्रदेश में अवैध धर्मस्थलों की भरमार है। देश की सबसे बड़ी अदालत में सूबे के मुख्य सचिव द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार मध्य प्रदेश में 51 हजार से ज्यादा धर्मस्थल अवैध तौर पर बने हुए हैं। एक ओर जहां विकास के नए आयामों में मध्य प्रदेश पिछड़ रहा हो, किन्तु धर्म स्थलों वह भी अवैध रूप से निर्मित होने वाले धर्मस्थलों के मामले में देश का यह सूबा अपने परचम लहरा रहा है। गौरतलब है कि पिछले साल सितम्बर में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्य सरकारें सार्वजनिक स्थलों, सड़कों, नुक्कड़ों, उद्यानों आदि में मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, गिरजाघर या अन्य धार्मिक स्थलों के निर्माण की अनुमति कतई न दें। मध्य प्रदेश में जहां चाहे वहां धर्मस्थलों के निर्माण से एक ओर जहां आवागमन बाधित होता है, वहीं दूसरी ओर जब तब कानून और व्यवस्था की स्थिति निर्मित होती रहती है।

पुच्छल तारा
हिन्दुस्तान के वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा वन्य जीवों विशेषकर बाघांे को बचाने के लिए आम आदमियों के लिए बनने वाले बांध, सड़क, रेलमार्ग आदि को रोककर अपनी पीठ थपथपाई जा रही है। दिल्ली में नेशनल मीडिया भी चंद दिनों से जयराम रमेश की तारीफों में कसीदे गढ़ रहा है, कारण चाहे जो भी हो, पर जयराम रमेश की छवि मानव विरोधी और वन्य जीव प्रेमी की बन गई है। कोटा राजस्थान में अध्ययनरत पिं्रस सिंह राजपूत ने एक बड़ा ही दिलचस्प ईमेल भेजा है। वे लिखते हैं कि टाईगर 1411 बचे हैं किन्तु भारत में पुरूष और महिला का अनुपात 1000: 824 है। अरे भईया, टाईगर बाद में बचाना पहले बच्चियों को बचा लो, क्योंकि टाईगर को बचाकर क्या उखाड़ लोगे? शेरनी पटने से तो रही और पट भी गई तो क्या बाघिन से शादी का जोखम उठा सकते हो. . .।

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

कामन वेल्थ गेम्स में भारी भ्रष्टाचार

किसकी सेहत के लिए है कामन वेल्थ गेम्स

(लिमटी खरे)

जनता की गाढ़ी कमाई के हाजारांे करोड़ फूंककर तमाशा देखने वाले अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सहित सारे सियासी दलों को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि कामन वेल्थ गेम्स में भारी भ्रष्टाचार के चलते किसका सबसे अधिक भला हुआ है। आज जनता की किस कदर आफत आई है। सियासी दलों के बीच जारी नूरा कुश्ती के चलते कामन वेल्थ गेम्स के आयोजन में भारत गणराज्य का सर उंचा तो किसी भी दृष्टिकोण से नहीं हो सकता है। अब जबकि इसके आयोजन की उल्टी गिनती आरंभ हो गई है तब इसके आयोजन की तैयारियों में हुए व्यापक भ्रष्टाचार की परतें एक के बाद एक उघड़ना आरंभ हो गई हैं। कहीं फुट ओवर ब्रिज गिर रहा है, तो कहीं सीलिंग धराशायी हो रही है। खिलाड़ियों के लिए बने आवासों में पानी घुसा है तो दीवारें सीपेज की सड़ांध से बजबजा रही है। डेंगू और मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के डेरे को देखकर लगने लगा है कि आने वाले खिलाड़ी अगर यहां से इस तरह की बीमारियां अपने साथ ले जाएंगे ऐसी परिस्थितियां निर्मित होने लगी है।

2003 में जब भारतीय जनता पार्टी की अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी हासिल की थी, तब उस सरकार को यह भान कतई नहीं होगा कि अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा कामन वेल्थ गेम्स के नाम पर भ्रष्टाचार का खुला, गंदा, नंगा, अश्लील, भोंडा नाच नाचा जाएगा और भाजपा सहित समस्त दलों के सियासतदार कांग्रेस के तराने पर ठुमके लगाते फिरेंगे।

भारत का मीडिया अगस्त माह तक कामन वेल्थ गेम्स में हुए अब तक के भयानकतम भ्रष्टाचार पर गला फाड़ता रहा और कांग्रेस के शासक नीरो के मानिंद चैन की बसी बजाते रहे। भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश के नाम दिए उद्बोधन में कामन वेल्थ गेम्स में मेच भ्रष्टाचार को ढांकने की गरज से कहा था कि इस आयोजन को राष्ट्रीय पर्व के तौर पर मनाया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री डॉ. एम.एम.सिह, कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी सहित सभी ने इस आयोजन को होने देने की बात कहकर कहा था कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच खेल के आयोजन के उपरांत की जाएगी। कांग्रेस के आला नेताओं की यह बात संकेत थी कि जब तक आयोजन नहीं हो जाता तब तक आयोजन समिति से जुड़े लोगों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट है। बाद में एक जांच आयोग बिठाया जाएगा, जो सालों साल तक जांच करने के उपरांत अगले दो या तीन राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन के बाद ही अपना प्रतिवेदन सौंपने की स्थिति में आ सकेगा।

कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि सरकार द्वारा नेशनल मीडिया को इसके लिए मनाया गया कि वह कामन वेल्थ गेम्स मंे होने वाली गफलतों को ज्यादा तवज्जो न दे। मीडिया ने सरकार की इस मंशा को फलीभूत भी किया। 15 अगस्त के उपरांत कामन वेल्थ गेम्स से जुड़ी खबरों को मीडिया में बहुत अधिक स्थान नहीं मिल सका। राष्ट्रमण्डल खेलों के भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की खबरों को दबाने के लिए मीडिया ने सरकार से क्या कीमत वसूली या निशुल्क ही यह काम किया यह तो वह ही जाने पर नेशनल मीडिया ने निश्चित तौर पर देशवासियों के गाढ़े पसीने की कमाई का इस तरह की खबरंे न दिखाकर अपमान ही किया है।

भारत के जनसेवक भारत के तंत्र की व्यवस्थाओं को बेहतर जानते हैं। उन्हें पता है कि आकंठ भ्रष्टाचार करने के बाद भी वे किस तरह से अपने आप को सालों साल तक बचाकर रख सकते हैं। यह सच है कि कामन वेल्थ गेम्स से भारत की साख जुड़ी हुई है। इसका सफल आयोजन करने सभी को कंधे से कंधा मिलाना चाहिए, किन्तु जनता के गाढ़े पसीने की कमाई का जिस कदर से खुल दुरूपयोग किया जा रहा है, उस पर बहस एवं उसकी खुली जांच की जाना भी अनिवार्य है।

कामन वेल्थ गेम्स की तैयारियों में रोज ही कोई न कोई अनियमितता होने की बात प्रकाश में आती रही है। अब जबकि इसके आयोजन में दस दिन से भी कम समय बचा है तब जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के ठीक सामने बन रहे फुट ओवर ब्रिज का भरभरा कर गिर जाना अपने आप में भ्रष्टाचार की एक बानगी ही कहा जाएगा। क्या यह नमूना प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी सहित विपक्ष के गाल पर करारा तमाचा नहीं है।

भ्रष्टाचार के जिस दलदल की बात मीडिया चीख चीख कर कर रहा था, वह अंतिम दिनों में सड़ांध मारने लगा है। दसियों हजार लोगों को एक साथ कदम ताल कर ढोने के लिए तैयार किया गया फुट ओवर ब्रिज महज तीस लोगों के भार को नहीं सह सका। जब यह आलम आयोजन स्थल जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के पास का है, तो फिर बाकी दूर दराज की तैयारियों के बारे में कहना बेमानी ही होगा।

कहते हैं कि कामन वेल्थ गेम्स के दौरान परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा। उधर अतिसंवेदनशील जामा मस्जिद इलाके में जो लाल किले से महज कुछ मीटरों की दूरी पर ही है, वहां दो हथियार बंद मोटर सायकल सवार लोगों ने दिल्ली पुलिस की नाक में दम कर दिया। आतंकियों ने सरेआम सरकार को धमकी दी है, कि भले ही सरकार कामन वेल्थ गेम्स कराने तैयार हो या नहीं वे हमले के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

गृहमंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम कहते हैं कि तैयारियों को जल्द ही पूरा किया जाए ताकि आयोजन स्थल को सुरक्षा बलों के हवाले किया जा सके। सच है जब तक तैयारियां जारी रहेंगी भला कौन किस भेष मंे अंदर घुसकर क्या कर जाए कहा नहीं जा सकता है। अनेक देश के खिलाडियों ने सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं। खबर है कि इंग्लेण्ड ने कहा है कि आना अभी पक्का नहीं है। साथ ही कनाड़ा के दो तीरंदाज केविन टाटारिन और दिएत्मार ट्राईल्स ने भी इस आयोजन में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया है। इसके पहले इंग्लेण्ड के तीन एथलीट और आस्ट्रेलिया के डेनी सेम्युअल ने भी भाग लेने से इंकार किया हुआ है। खेलगांव की सुरक्षा को दिल्ली पुलिस ने अपने हाथों में ले लिया है। यह वही दिल्ली पुलिस है, जिसकी पुलिस कंट्रोल रूम वेन के इलाके में होते हुए भी दो हथियार बंद मोटर सायकल सवार जामा मस्जिद के पास गोलीबारी कर फरार हो चुके हैं।

भारोत्तोलन स्टेडियम का निर्माण भी पूरा होना बताया जा रहा था। मजे की बात तो यह है कि इसकी फाल्स सीलिंग भी भरभरा कर गिर चुकी है। यह तो शुक्र मनाया जाना चाहिए कि वह सीलिंग आयोजन के दौरान खिलाडियों पर नहीं गिरी, वरना भारत की जो भद्द अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पिटती उसका अंदाजा लगाया जाना कठिन ही है। कामन वेल्थ की तैयारियों में जिस तरह पैसा बचाने के लिए ‘‘थूक में सतुआ साना गया है‘‘ उसके चलते खेलों के दौरान ही अगर इस तरह का कोई हादसा हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रमण्डल खेलों के शुभारंभ और समापन के लिए 5 करोड़ का गीत रहमान ने तैयार किया। फीके और अनाकर्षक इस गाने के चलते उदघाटन समारोह के फीके होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसकी क्षतिपूर्ति के तौर पर 38 करोड़ रूपए की लागत से बनवाए गए गुब्बारे की हवा भी निकलने लगी है। इस गुब्बारे एयरोस्टेट में भी तकनीकी गडबडियां होने लगी हैं। 80 मीटर लंबे, 40 मीर चौड़े और 12 मीटर उंचे इस गुब्बारे के दो ब्लेडर फट गए बताए जा रहे हैं। इसके अलावा इस एयरोस्टेट को हवा में उठाने की प्रणाली में कुछ तकनीकि पेंच फंस गया है, जिससे यह गुब्बारा हवा में उठ नहीं पा रहा है। इसे समारोह के अवसर पर 30 मीटर उपर उठाया जाना प्रस्तावित है।

कुल मिलाकर कांग्रेस और भाजपा की मण्डलियों ने अरबों रूपए के इस आयोजन में तबियत से भ्रष्टाचार किया है। कांग्रेस के इस भ्रष्टाचार को भाजपा इसलिए जोर शोर से नहीं उठा रही है, क्योंकि कहीं न कहीं उसकी झोली में भी कुछ न कुछ तो आया है। पिछले लंबे अरसे से भाजपा ने कांग्रेस की जनविरोधी, दमनकारी, हिटलरशाही से परिपूर्ण नीतियों के बारे में राष्ट्रव्यापी आंदोलन नहीं छेड़ा है, जो यह साबित करता है कि उपरी स्तर पर कांग्रेस और भाजपा द्वारा एक दूसरे को कांधा दिया जा रहा है, पर जनता को दिखाने के लिए एक दूसरे की टांग खीचने का स्वांग अवश्य ही रचा जा रहा है।