गुरुवार, 11 मार्च 2010

कहां की ``धनवषाZ`` से चमकते हैं मन्त्री आवास!

कहां की ``धनवषाZ`` से चमकते हैं मन्त्री आवास!
सीपीडब्लूडी का बजट है मन्त्रियों के लिए कम
जनता के पैसे का तबियत से दुरूपयोग करते हैं जनसेवक
(लिमटी खरे)
 
आजाद भारत में जनता को दो महत्वपूर्ण अधिकार दिया गया है, एक है वोट देने का, और दूसरा है कर देने का। वोट देकर वह अपना जनसेवक चुनता है और कर देकर उस जनसेवक के भोग विलास के मार्ग प्रशस्त करती है। आज आम आदमी को एक समय खाना खाने के पूरे पैसे न हों पर देश के नीति निर्धारक जनसेवकों के ठाठ देखते ही बनते हैं। लक झक चमचमाती मंहगी कारें, आलीशान अट्टालिकाएं, परिजनों के लिए विलासिता की चीजें और न जाने क्या क्या। इतना ही नहीं अपने सरकारी आवासों को भी ये आलीशान फाईव स्टार के कमरों जैसा बनाने से नहीं चूकते हैं। सवाल यह उठता है कि जब केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्लूडी) के पास इतना बजट है ही नहीं तो आखिर ये अपने अरमानों को परवान कैसे चढा पाते हैं।
देखा जाए तो केन्द्रीय मन्त्रियों के आवासों की देखरेख और संवारने की महती जवाबदारी अपने जर्जर कंधों पर उठाए सीपीडब्लूडी का बजट इतना है कि वह मन्त्रियों की फरमाईशों के सामने उंट के मुंह में जीरे की कहावत को चरितार्थ करता है। सीपीडब्लूडी के पास मन्त्रियों के आवास को चमकाने के लिए महज 75 हजार से ढाई लाख रूपए तक का बजट होता है। मकानों को निखारने, संवारने के लिए सीपीडब्लूडी के पास 75 हजार, टाईप 5 से टाईप 7 तक की कोठियों के लिए डेढ लाख तो टाईप आठ के लिए ढाई लाख रूपए का बजट प्रावधान है। अगर कोई सूचना के अधिकार में मन्त्रियों के आवासों पर हुए व्यय की जानकारी ले ले तो भारत के महालेखा परीक्षक भी दान्तों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाएंगे।
दरअसल जनसेवक जो मन्त्री बन जाते हैं उनके विभाग के अन्तर्गत आने वाले सार्वजनिक उपक्रम (पीयूसी) और विभाग में काम करने वाले ठेकेदारों द्वारा मन्त्रियों के सरकारी आवास को चमकाने का काम किया जाता है। विडम्बना तो देखिए कि मन्त्री के आवास पर हुए व्यय के बारे में कोई पूछ परख ही नहीं करता। अगर एक ईंट भी जोडी गई है, और वह सरकारी पैसे से नहीं जुडी है तो क्या उसके बारे में सम्बंधित मन्त्री ने अपनी आयकर विवरणी में इसका उल्लेख किया है। जाहिर है नहीं ही किया है। यह बात भी उतनी ही सच है जितनी कि दिन और रात कि मन्त्रियों के आवासों को चमकाने के लिए पीयूसी द्वारा लाखों व्यय किए जाते हैं, यही कारण है कि मन्त्रीपद से हटने के बाद भी जनसेवक अपने उस सरकारी आवास का मोह नहीं छोड पाते हैं, और महीनों वहां जमे ही रहते हैं।
जैसे ही आम चुनाव होते हैं और नए मन्त्री चुनकर आते हैं, तब उनकी पित्नयों के हिसाब से मन्त्री आवास का इंटीरियर डेकोरेशन किया जाता है। कमरों में वास्तु के हिसाब से दरवाजे, शयन कक्ष में फेरबदल कुल मिलाकर नए कमरे बनाना, पुराने को ठीक करना, रंग रोगन, प्लास्टर ऑफ पेरिस का काम, मंहगे रंग रोगन, फर्नीचर आदि को बाजारू कीमत पर देखा जाए तो एक आवास में 75 हजार से ढाई लाख रूपए का बजट बहुत ही कम है।
एकडों में फैले मन्त्रियों के आवासों में उनके बंग्ला कार्यालय में भी मनचाहा परिवर्तन करवाया जाता है। उनके बंग्ला कार्यालय में पर्सनल स्टाफ के बैठने के स्थान को देखकर आम सरकारी बाबू रश्क ही कर सकता है। साथ ही ``शौकीन जनसेवकों`` द्वारा तो अपने आवासों में मंहगी विदेशी लान ग्रास के साथ ही साथ लेण्ड स्केपिंग भी करवाई जाती है। इतना हीं नहीं मन्त्रालयों में मन्त्री कक्षों को सजाने संवारने में भी लाखों करोडों रूपए फूंक दिए जाते हैं। जनसेवकों का मानना होगा कि जब भी उनके निर्वाचन क्षेत्र से कोई मिलने आए तो वह वहां की साज सज्जा देख दान्तों तले उंगली ही दबा ले। यही कारण है कि मन्त्रियों के कार्यालयों में विजिटर्स रूम भी मन्त्रीकक्ष से कम नहीं होते हैं।
बहुत ही साधारण सी बात है कि जब मन्त्री द्वारा अपने आवास में लाखों खर्च कर उसे अपने अनुरूप बनाया जाता है तो फिर वे उसे मन्त्रीपद से हटने के बाद जल्दी कैसे छोड दें। यही वजह उनके आवास में प्रवेश के दौरान आती है। जब मन्त्री को आवास आवंटित होता है तब पुराना मन्त्री उसे छोडता नहीं। बाद में साल छ: माह बीतने पर जब आवास खाली होता है, तब नए मन्त्री के हिसाब से उसकी साज सज्जा में साल छ: महीना और लग जाता है, इस तरह इतने समय मन्त्री कहां रहता है। जाहिर है फाईव स्टार होटल में। उस होटल का भोगमान कौन भुगतता है। पैसा पेडों पर तो नहीं लगता है, पैसा वही मतदाता करों के माध्यम से ही चुकाता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि ``सादा जीवन उच्च विचार`` का नारा लगाकर देश के ``जनसेवक`` किस तरह ``विलासिता पूर्ण जीवन और निम्न विचारों`` को अंगीकार किए हुए हैं।
आज इस बात पर चिन्तन करने की महती जरूरत है कि देश के नीति निर्धारक जनसेवक आखिर अपनी रियाया के साथ किस तरह का न्याय कर उसे क्या दे रहे हैं। इतिहास में इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि मुगल शासकों में सबसे अधिक लोकप्रिय रहे सम्राट अकबर ने भी अनेकों बार भेष बदलकर अपनी रियाया के हाल चाल जाने और उनके दुखदर्द दूर किए। आजाद भारत में जनता किस कदर कराह रही है, और जनता की सेवा के लिए तत्पर जनसेवकों द्वारा अपने स्वार्थों को कितनी संजीदगी, तन्मयता और मुस्तैदी के साथ पूरा किया जा रहा है यह बात देखते ही बनती है। कहने को तो राजनैतिक दलों द्वारा ``रामराज`` और ``सुराज`` लाने का दावा किया जाता है, पर जमीनी हकीकत इससे उलट कुछ और बयां करती नज़र आती है।

बुधवार, 10 मार्च 2010

कहां गई गौरैया की चहचहाट

कहां गई गौरैया की चहचहाट

कांक्रीट जंगलों और वनों की अधांधुंध कटाई से पर्यावरण सन्तुलन को खतरा

गुम हो चुकी है, पक्षियों की चहचहाट

इतिहास की बात हो गई है, पक्षियों का कलरव

(लिमटी खरे)

याद है, जब छोटे थे, तब स्कूल जाने के लिए अलह सुब्बह उठाया जाता था, यह कहकर देखो चिडिया आई, देखो कौआ आया, वो देखो मोर आया। घर की मुण्डेर पर छोटी सी चिडिया चहकती रहती, और उठकर स्कूल के लिए तैयार होने लगते। गरमी में कोयल की कूक मन को अलग ही सुकून देती थी। आज आधुनिकता के इस दौर में जब बच्चों को उठाया जाता है तो उन्हें चिडिया, कौआ के स्थान पर टीवी पर ``डोरीमाल`` ``नोमिता`` जैसे काटूZन केरेक्टर्स को दिखाकर उठाया जाता है। यह सच है, परिवर्तन बहुत ही तेजी से हुआ है, हमारी पीढी इस दुत गति से होने वाले परिवर्तन की साक्षात गवाह है। यह परिवर्तन सतत प्रक्रिया है, पर अस्सी के दशक के उपरान्त परिवर्तन की गति को पंख लग चुके हैं। कल तक मुण्डेर पर बैठे कौए और अन्य पक्षियों के कलरव पर गाने भी बना करते थे, शकुन अपशकुन के मामले में भी अनेकानेक धारणाएं हुआ करती थीं।

विडम्बना यही है कि हमने भाग दौड में आधुनिक दुनिया की कल्पना तो कर ली पर प्रकृति के साथ जो हमने छेडछाड या सीधे शब्दों में कहें बलात्कार किया है, वह अक्ष्म्य ही है। इसका भोगमान कोई ओर नहीं वरन हमारी आने वाली पीढी को ही भोगना है। ईश्वर ने इस कायनात की रचना की है। इस सृष्टि में जितने भी जीव जन्तु प्रभु ने बनाए हैं, सबकी अपनी अलग अलग भूमिका और महत्व है। स्वच्छन्द विचरित होने वाले पक्षियों पर अघोषित तौर पर मानव का हस्ताक्षेप भारी पडा है। अपने सुख सुविधा और स्वाद के चक्कर में पक्षियों को प्रश्रय देने के स्थान पर मौत के घाट उतारा गया, जिससे इनकी संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की गई, रही सही कसर पर्यावरण प्रदूषण ने पूरी कर दी।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज पक्षियों की सैकडों प्रजातियां विलुप्तप्राय हैं। गिद्ध, सारस, कोयल, गोरैया, कौवा आदि अब बमुश्किल ही दिख पाते हैं। गुजरे जमाने में राजा महराजाओं से लेकर नवाबों की थाली की शान होने वाली शीली, बटेर, दिघोची, तीतर, लालशर जैसी चिडिया अब देखने को नहीं मिलती। अनेक निरामिष भोजनालयों में अब भुने हुए तीतर या बटेर के स्थान पर गोरैया को ही परोसा जा रहा है। गाय, भैंस का दूध बढाने की गरज से दी जाने वाली दवाओं का प्रतिकूल असर भी देखने को मिला है। इनके मृत शरीर का भक्षण कर पर्यावरण का एक सशक्त पहेरूआ ``गिद्ध`` अब देखे से नहीं दिखता है। पक्षियों की संख्या में कमी से पर्यावरण विशेषज्ञों की पेशानी पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई पडने लगी हैं।

पर्यावरण विदों की मानें तो पक्षियों का होना मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक है। ये मानव जीवों के लिए खतरनाक कीट पतंगों को अपना निवाला बनाकर मनुष्यों की रक्षा करते हैं। ये पक्षी ही हैं जो कीट पतंगों के अलावा मृत जानवरों के अवशिष्ट को भी धरती से समाप्त करते हैं। विलुप्त होते पक्षियों को लेकर सरकारी और गैर सरकारी संगठन चिन्ता जाहिर कर रस्म अदायगी से बाज नहीं आते हैं। ``मन राखन लाल`` की भूमिका निभाने वाले इन संगठनों ने कभी भी पक्षियों को बचाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है। यहां तक कि भारत सरकार के सूचना प्रसारण मन्त्रालय द्वारा भी ग्रामीणों को जागरूक बनाने की दिशा में डाक्यूमेंटरी या विज्ञापनों का निर्माण तक नहीं करवाया है। परिणाम यह है कि दीगर पक्षियों के अलावा हर घर में चहकने वाली गोरैया भी अब दुर्लभ पक्षी की श्रेणी में आ चुकी है।

कुछ माह पूर्व दिल्ली की निजाम श्रीमति शीला दीक्षित ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि अब गोरैया भी दुर्लभ हो गई है। यह सच है कि देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में कबूतरों के अलावा और दूसरे पक्षी दिखाई ही नहीं पडते हैं। कबूतर भी इसलिए कि यहां के लोगों को कबूतर पालने का शौक है। वैसे जंगली कबूतरों की भी दिल्ली में भरमार ही है। नासिक के एक व्यक्ति ने गोरैया के घोसले बनाकर बेचना भी आरम्भ किया है।

एक समय था जब घरों में महिलाओं द्वारा गेंहूं या चावल बीनते समय कुछ दाने इन चिडियों के लिए जानबूझकर गिरा दिए जाते थे। इन दानों के चक्कर में घरों के आसपास चिडिया चहकती रहती थीं। अब माल और डिब्बा बन्द प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थाें के बढे प्रचलन ने इन पक्षियों के मुंह से निवाला छीन लिया है। इसके अलावा शहरों में सीना ताने खडे मोबाईल टावर की चुम्बकीय तरंगों, वाहनों के द्वारा छोडे जाने वाले धुंए ने भी पक्षियों के लिए प्रतिकूल माहौल तैयार किया है।

एक अनुमान के अनुसार पक्षियों के कम होने के पीछे कामोत्तेजक दवाओं का तेजी से प्रचलन में आना है। असंयमित खानपान और रहन सहन के चलते कामोत्तेजक दवाओं का बाजार तेजी से गर्माया है। गोरैया के अण्डों का इस्तेमाल कामोत्तेजक दवाओं में किया जाता है। चीन के माफिया सरगनाओं ने गैण्डे के सींग से सेक्स बढाने की दवाएं इजाद की। कल तक गैण्डों से आच्छादित भारत के जंगलों में अब इनकी तादाद महज 200 ही रह गई है।

अब समय आ चुका है कि पक्षियों को बचाने की दिशा में हम जागरूक हो जाएं। हमें हर हाल में पक्षियों के जीने के लिए अनुकूल माहौल प्रशस्त करना ही होगा। पक्षियों की तादाद अगर दिनों दिन कम होती गई तो पर्यावरण का जो असन्तुलन पैदा होगा उसका भोगमान किसी और को नहीं हमारी आने वाली पीढी को ही भोगना होगा, जिसके उज्जवल भविष्य के लिए आज हम धन दौलत एकत्र कर छोडे जाने वाले हैं। हम अपने वंशजों को धन दौलत, संपन्नता, सुविधाएं तो देकर इस दुनिया से रूखसत हो जाएंगे, किन्तु जब पर्यावरण असन्तुलन होगा तब हमारी आने वाली पीढी जिस कठिनाई में जीवन व्यतीत करेगी उसका अन्दाजा आज लगाना असम्भव ही है। सरकार को चाहिए कि वह गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर पक्षियों को बचाने की दिशा में तत्काल ही कोई मुहिम की ठोस कार्ययोजना बनाए ताकि पक्षियों के कलरव को आने वाली पीढी सुन सके और महसूस कर सके।

सोमवार, 8 मार्च 2010

बहादुर ने दिखाई मन्त्री का रिपोर्ट कार्ड दिखाने की बहादुरी

ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)

बहादुर ने दिखाई मन्त्री का रिपोर्ट कार्ड दिखाने की बहादुरी

देश के नीति निर्धारक कितने योग्य हैं, इस बात पर अघोषित तौर पर तो चौक चौराहों पर बहस होती रही है, पर बनारस के रामचरण बहादुर ने केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मन्त्री कपिल सिब्बल की शैक्षणिक योग्यता जांचने का साहस दिखाकर अनुकरणीय पहल की है। दरअसल कपिल सिब्बल द्वारा आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा की पात्रता के लिए स्कूल सार्टिफिकेट की महत्ता पर बल दिया था। सिब्बल का मशिविरा था कि स्कूली प्रमाण पत्र में 80 फीसदी से अधिक नंबर लाने वालों अर्थात टापर 20 फीसदी छात्रों को ही प्रवेश का अवसर मिले तो बहुत अच्छा होगा। इसी से क्षुब्ध बहादुर ने सूचना के अधिकार में कपिल सिब्बल के स्कूल प्रमाण पत्रों की प्रति की मांग की है, ताकि वह जान सके कि आईआईटी के छात्रों का भविष्य निर्धारण करने वाले सिब्बल ने स्कूल के जमाने में क्या गुल खिलाए थे। सिब्बल ने सेंट स्टीफन्स कालेज और हार्वड लॉ स्कूल में पढाई की है। बहादुर ने आईआईटी संस्थानों के निदेशक और प्राध्यापकों के स्कूली प्रमाण पत्र भी मांगे हैं। कहा जा रहा है कि हो सकता है बहादुर की यह मंशा पूरी न हो सके क्योंकि सूचना के अधिकार में उन प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक नही होता है जिनका ठोस आधार, कारण या तर्क नहीं होता है।

नक्सली कार्यक्षेत्र विस्तार के रोड मेप में सतना रीवा!
लाल कारीडोर के विस्तार में लगे हुए हैं नक्सलवादी, जी हां यह सच है, नक्सलवादियों द्वारा सरकार की ढीली पोली नीतियों और राज्य तथा केन्द्र के बीच समन्वय का फायदा उठाकर अपना कार्यक्षेत्र विस्तार करने की योजना बनाई जा रही है। वैसे भी नक्सलियों के लिए सामाजिक और आर्थिक विषमता वाले क्षेत्र बहुत ही मुफीद होते हैं। कल तक ददुआ और ठोकिया जैसे दुर्दान्त डाकुओं के कब्जे वाले विन्ध्य क्षेत्र अब नक्सलियों की पहली पसन्द बनता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों द्वारा केन्द्र सरकार के गृह मन्त्रालय को सौंपी रिपोर्ट में कुछ इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं। गृह मन्त्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि पिछले साल अक्टूबर माह में सरगुजा जिले में हुए नक्सली हमले के उपरान्त खुफिया एजेंसियों द्वारा बनाई गई रिपोर्ट के मुताबिक अब लाल डोरे के विस्तार के लिए नक्सलियों द्वारा विन्ध्य के सतना, रीवा और त्रिवेणी संगम वाले इलहाबाद को चुना है। सतना, रीवा पुलिस भले ही इस बात से इंकार करे कि नक्सलवादी पदचाप उन्हें सुनाई दिए हैं, पर खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

भारतीय डाक्टर्स पचा नहीं पाते हैं बातें!
भारत के चिकित्सकों ने समूची दुनिया में अपने फन का लोहा मनवाया है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु यह खबर भारतीय मूल के चिकित्सकों को परेशान करने वाली हो सकती है कि सालों साल भारत पर राज करने वाले ब्रिटेन की महिलाएं भारतीय मूल के चिकित्सकों पर एतबार नहीं करती हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रितानी महिलाएं अपनी यौन समस्याओं, गर्भावस्था और गर्भ निरोध या उन्मुक्त यौन सम्बंधों के बारे में भारतीय मूल के चिकित्सकों पर भरोसा नहीं कर पाती हैं। सर्वे के अनुसार ब्रितानी महिलाओं को सदा यह भय सताता रहता है कि कहीं उनके नैतिक अनैतिक यौन सम्बंधों के बारे में राज की बातें उनके परिजनों तक न पहुंच जाए। सर्वेक्षण में कहा गया है कि ब्रितानी महिलाएं भारतीय मूल के चिकित्सकों की बातों को हजम करने की क्षमता पर सशंकित ही रहती हैं। इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर भारतीय मूल के चिकित्सकों से वे बात करने में कतराती ही हैं।

कांग्रेस, भाजपा की मिली जुली सरकार!
मध्य प्रदेश में इन दिनों कांग्रेस और भाजपा की मिली जुली सरकार चल रही है, जी हां यह सच है। मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान दिल्ली और भोपाल में उद्योगपतियों को आकषिZत करने के लिए बिजली की समस्या नही होने देने का आश्वासन दे रहे हैं, इतना ही नहीं मुख्यमन्त्री द्वारा सार्वजनिक तौर पर अन्य राज्यों को बिजली बेचने की बात भी कही जा रही है, पर कांग्रेस चुप है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जबकि विधानसभा चुनावों के दौरान ही कांग्रेस द्वारा शिवराज सिंह के इस तरह बिजली बेचने के मामले को आडे हाथों लिया गया था। प्रदेश के जमीनी हालात किसी से छिपे नहीं है। ग्रामीण अंचलों में आधे दिन से अधिक तो जिला मुख्यालयों में आठ घंटे तक की बिजली कटौती धडल्ले से जारी है। इस पर अगर मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा अन्य राज्यों को बिजली बेचने की बात कही जाए और कांग्रेस खामोशी अिख्तयार कर ले तो कहा ही जाएगा न कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस भाजपा की मिली जुली सरकार चल रही है।

वेस्ट यूपी में साक्षर जनसेवकों की बाढ
एक समय था जबकि ग्राम प्रधान, सरपंच आदि के द्वारा धनादेश (बैंक के चेक) पर हस्ताक्षर के नाम से अंगूठा आगे कर दिया जाता था, आज हालात बदल चुके हैं। अगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ही आधार बनाकर देखा जाए तो इस बार यहां 23 जनपदों के 322 में से 227 ग्राम प्रधान पूरी तरह साक्षर हो चुके हैं। अब ये सारे प्रधान लोग धनादेश पर अंगूठा आगे नहीं बढाते हैं, इतना ही नहीं इनके द्वारा अब अपने सचिवों से कार्यवाही पंजी को पढकर हिसाब किताब भी मांगा जाता है। सुखद आश्चर्य की बात तो यह है कि इनमें से 13 फीसदी प्रधानों ने कम्पयूटर, इंटरनेट के साथ ही साथ बीएड या एमए की परीक्षा भी उत्तीर्ण की हुई है। ये सारे आंकडे केन्द्रीय ग्रामीण विकास मन्त्रालय द्वारा राष्ट्रीय ग्राम स्वराज योजना लागू करने हेतु कराए गए सर्वे में सामने आईं हैं। लोगों की सेवा में छोटी से छोटी सार्वजनिक इकाई अगर साक्षर लोगों के हाथों में होगी तो आम आदमी को सरकारी योजनाओं का लाभ ज्यादा से ज्यादा मिल सकेगा इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
. . . तो भारतीय सेना आतंकी गिनने बैठी है
देश की सेना के प्रमुख जनरल दीपक कपूर का कहना है कि कश्मीर घाटी में अस्थिरता फैलाने की गरज से पाकिस्तान द्वारा लगातार आतंकी भेजे जा रहे हैं। जनरल कपूर ने पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा में यह भी कहा कि आतंकी भेजने के इस तरह के प्रयास पीर पंजाल के दक्षिणी क्षेत्र से हो रहे हैं, क्योंकि बर्फबारी के चलते अधिकांश दरेZ अभी भी बन्द हैं। जनरल कपूर की बातें भारतीय सेना के उत्साह में कमी लाने में काफी कही जा सकतीं हैं, क्योंकि देश की सेवा का जज्बा रखने वाले भारतीय सेना के जवानों जिन पर हर भारतीय को नाज है, उस क्षेत्र की रक्षा ही नहीं कर पा रहा है, जहां से आतंकी भारत में प्रवेश कर रहे हैं। अगर देश में अस्थिरता फैलाने वाले पीर पंजाल के दक्षिणी क्षेत्र से आ रहे हैं तो क्या भारतीय फौज उनकी आगवानी के लिए या उनकी संख्या गिनने के लिए बैठी है। होना यह चाहिए कि जिस रास्ते से भी आतंकी या नापाक इरादों वाले हिन्दुस्तान की सरजमीं पर आएं उन्हें वहीं ढेर कर दिया जाना चाहिए।

जीएम फुड : कंपनी के पैरोकार बने मन्त्री
जेनेटिकल माडीफाईड फुड (जीएम फुड) के बारे में तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्री अम्बूमणि रामदास ने चिन्ता जताते हुए प्रधानमन्त्री को एक पत्र लिखा था, इसका जवाब विज्ञान और तकनीकि मन्त्रालय के खाते में गया। जवाब पृथ्वीराज चौहाण को देना था। चौहाण ने जो जवाब दिया उसका अधिकांश मेटर उन्होंने वीटी बैगन की हिमायती रही ``मोनोसाटो`` और ``महिको`` जैसी कंपनियों द्वारा जारी लेखों से ही चुरा लिया। जुलाई 2009 में लिखे चार पेज के पत्र मेें चोहान ने आठ अन्य पेज में इससे जुडी जानकारियां भी दी थीं। इन आठ पन्नों में भी जो जवाब पहुंचा है, वह इंटरनेशलन सर्विस फॉर द एक्वीजिशन ऑफ एग्री बॉयोटेक एप्लीकेशन के लेख में अधिकांश पेराग्राफ को जस का तस इस्तेमाल कर लिखा गया है जो अमेरिकन एजेंसी है। इतना ही नहीं चौहाण के मन्त्रालय द्वारा प्रस्तावित बॉयोटेक्नोलाजी रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इण्डिया बिल में एक कण्डिका यह भी डाली है कि जीएम प्रोडक्टस की बुराई करने पर किसी भी भारतीय को 6 महीने की जेल हो सकती है। यह बिल अगर पास हो गया तो फिर चौहाण की बुराई करने के पहले किसी को भी दस बार सोचना ही पडेगा।

प्यूमा के विरोध में उतरे अल्पसंख्यक
चीन की जूता कंपनी ``प्यूमा`` द्वारा अपने उत्पाद में अल्पसंख्यकों की भावनाएं भडकाने वाली चीजों के समावेश के चलते मुसलमानों ने उक्त जूता कंपनी को जमकर कोसा। देश में जगह जगह इस बात का विरोध किया जा रहा है। मध्य प्रदेश के टीकमगढ जिले में मुसलमानों ने इसे समूचे समुदाय का अपमान बताते हुए यूएसए के महासचिव वानकी मून, महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, वजीरे आजम मन मोहन सिंह, महामहिम राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर आदि को संबांधित ज्ञापन कलेक्टर को सौंपा। ज्ञापन में इण्डियन मुस्लिम त्योहार कमेटी और अंजुमन इस्लामिया कमेटी ने कहा है कि प्यूमा के इस काम से देश के 38 करोड मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने मांग की है कि इस कंपनी के मालिक एवं अन्य जिम्मेदार कर्मचारियों पर धार्मिक भावनाएं भडकाने का प्रकरण दर्ज कर उन्हें प्रत्यापर्ण संधि के तहत भारत लाकर प्रकरण चलाया जाना चाहिए। इसके अलावा नार्वे में भी एक अखबार द्वारा प्रकाशित काटूZन पर मण्डला जिले के अल्पसंख्यकों ने अपना विरोध दर्ज कराया है। अंजूमन रहमानिया वक्फ कमेटी द्वारा नार्वे के उक्त अखबार और नार्वे सरकार के खिलाव भारत सरकार को विरोध दर्ज कराने को कहा है।

पूर्व पति के नाम के प्रयोग पर पाबन्दी
मुम्बई उच्च न्यायालय के एक फैसले के बाद ठाकरे परिवार की बहू िस्मता ठाकरे सहित अनेक महिलाओं को अपने नाम के साथ पूर्व पतियों के नाम का इस्तेमाल बन्द करना पड सकता है। मुम्बई के पुलिस महकमे से जुडे एक निरीक्षक के मामले में उच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था देते हुए तलाकशुदा महिलाओं को उनके पूर्व पतियों के नाम के उपयोग पर रोक लगा दी है। अभी अनेक तलाकशुदा महिलाओं द्वारा उनके रसूखवाले पूर्व पतियों के नामों का उपयोग अपने नाम के साथ किया जाता है, जिसे अनुचित ठहरा दिया है उच्च न्यायालय द्वारा। इस मामले में बान्द्रा परिवार न्यायालय के बाद उच्च न्यायलय ने भी इस तलाक को मंजूरी दे दी। बाद में निरीक्षक की पित्न ने इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में लंबित होने की बात कहकर उस आदेश पर रोक लगाने की बात कही थी, जिसमें कहा गया था कि परिवार न्यायालय द्वारा महिला के तलाक शुदा होने की बात कहकर उसे अपने पूर्व पति के नाम और उपनाम के उपयोग पर रोक लगाने को कहा था। उच्च न्यायलय ने परिवार न्यायालय के आदेश को सही ठहराते हुए सख्त रवैया अपनाते हुए पूर्व पति के नाम या उपनाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने को कहा है।

रेल ई टिकिट में गफलत
भले ही भारतीय रेल या रेल्वे बोर्ड द्वारा यात्रियों की सुविधाओं के मद्देनज़र नित नई सुविधाए लाई जा रहीं हों पर अमानत में खयानत करने वाले उसमें भी डाका डालने के रास्ते खोज ही लेते हैं। रेल ई टिकिट के माध्यम से लोग घर बैठे ही यात्रा टिकिट अवश्य निकाल रहे हों पर चतुर सुजान खिलाडी इसके माध्यम से भी रेल्वे को चूना लगाने से नहीं चूक रहे हैं। रेल्वे के सामने अनेक एसे मामले आए हैं जब सांसद के कार्ड नंबर पर फर्जी व्यक्ति सफर करते मिलें या फिर सीनियर सिटीजन के नाम पर जवान यात्रा करते नज़र आएं। रिफण्ड के मामलों में भी खिलाडियों के फन को माना जा सकता है। एक अनुमान के अनुसार यात्रियों के रिफण्ड की तादाद में खासा इजाफा हुआ है। होता यह है कि फाईनल चार्ट बनने के बाद यात्रियों द्वारा टिकिट निरस्त करवा दी जाती है, इससे एक ओर चार्ट में उनका नाम भी रह जाता है, और दूसरी ओर उनकी टिकिट के ओने पौने पैसे भी वापस मिल जाते हैं। कुछ रेल्वे जोन ने भारतीय रेल को पत्र लिखकर इस तरह की गफलत करने वाले रेल एजेंट के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुशंसा भी की है।

. . . तो कहां रूकें सुरक्षा बल!
अमूमन देखा गया है कि राज्य सरकारों द्वारा कानून और व्यवस्था की स्थिति को बरकरार रखने के लिए बुलाई या भेजी जाने वाली सुरक्षा बलों की टुकडियों को शैक्षणिक संस्थाओं में ही रूकवा दिया जाता है। आने वाले दिनों में सुरक्षा बलों को शिक्षण संस्थाओं के परिसर में नहीं रूकवाया जा सकेगा। सर्वोच्च न्यायलय द्वारा एक मामले में व्यवस्था देते हुए कहा है कि शिक्षण संस्थाओं में सुरक्षा बलों या पेरा मिलट्री फोर्स के जवानों को अगर रोका जाता है, तो उसका गलत सन्देश जाता है। आंध्र प्रदेश के उस्मानिया विश्वविद्यालय परिसर में ठहराए जवानों को लेकर राज्य सरकार को आडे हाथों लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायधीश के.जी.बालाकृष्णन, जस्टिस एस.एच.कापडिया और जस्टिस आफताब की बैंच ने यह व्यवस्था दी है। इस व्यवस्था के बाद अब राज्य सरकारों को सुरक्षा बलों के जवानों को लाईन आर्डर की स्थिति में भेजने या बुलवाने पर उनके रहने खाने आदि की व्यवस्था अब शैक्षणिक संस्थाओं से इतर ही करनी होगी।

विदेशी कर्जे वाली साढे छ: सौ योजनाएं अधर में
किसी भी सूबे में सिचाई योजना ही उसकी उन्नति के मार्ग प्रशस्त करती है। आजादी के उपरान्त बनाए गए विशाल बांधों और सिचाई परियोजनाओं से ही हरित क्रान्ति का आगाज हुआ था। समय के साथ इन योजनाओं में अफसरशाही हावी होती गई और किसानों की कमर टूटती ही चली गई। विडम्बना ही कही जाएगी कि देश के हृदय प्रदेश में करोडों रूपए के विदेशी कर्ज से पोषित सिचाई परियोजनाओं का काम 70 फीसदी से भी ज्यादा अटका हुआ है। एमपी गर्वमेंट द्वारा पाईकू नामक परियोजना तैयार की थी, जिसमें 1919 करोड रूपए का विदेशी कर्जा प्रस्तावित था। सरकार द्वारा अब तक 1830 करोड रूपए का विदेशी कर्ज लिया जा चुका है, बावजूद इसके अभी महज तीस फीसदी काम ही हो सका है। इसके तहत इन्दौर, नीमच, मन्दसौर, कटनी, रायसेन, सागर, देवास, धार, रतलाम, उज्जैन, राजगढ, भिण्ड, गुना, शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, श्योपुर, मुरैना, दमोह, पन्ना, रीवा, छतरपुर, टीकमगढ, अशोक नगर, विदिशा, भोपाल, सीहोर, साीधी सतना आदि जिलों में मिट्टी के बांधों की मरम्मत, छोटी नहरों का निर्माण, तकनीकी तौर पर बेकार बांधों, तलाबों, नहरों का रखरखाव आदि का काम किया जाना था।

पुच्छल तारा
भोपाल से श्वेता तिवारी के भेजे गए ईमेल के अनुसार कांग्रेस की नज़रों में भविष्य के प्रधानमन्त्री राहुल गांधी सदा ही युवा शक्ति की बात कहकर युवाओं को आगे लाने के हिमायती दिखते हैं। पिछले चुनावों में जब वे फिरोजाबाद में एक उमरदराज केण्डीडेट के लिए चुनाव प्रचार को गए उस वक्त अगर मीडिया उनसे युवाओं की पैरोकारी और वृद्ध के चुनाव प्रचार पर टिप्पणी मांग लेती तो कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी कुछ इस अन्दाज में जवाब देते -``बिल्कुल गलत बात है, उनकी उमर ही क्या है। महज बीस साल और यही कोई 400 महीने!!!!``

गुरुवार, 4 मार्च 2010

सर पर आज भी ढुल रहा है मैला!

सर पर आज भी ढुल रहा है मैला!
मध्य प्रदेश में जारी है सामन्ती प्रथा
लगता है देश का हृदय प्रदेश आज भी दासता में सांसे ले रहा है
दलित अत्याचार के मामले में यूपी कम नहीं
(लिमटी खरे)
 
भारत देश को आजाद हुए छ: दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, भारत में गणतन्त्र की स्थापना भी साठ पूरे कर चुकी है, बावजूद इसके आज भी देश के हृदय प्रदेश में मध्ययुगीन सामन्ती प्रथा की जंजरों की खनक सुनाई पड रही है। कहने को केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा देश भर में सर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने के लिए ढेर सारे जतन किए हों, पर कागजी बातों और वास्तविकता में जमीन आसमान का अन्तर दिखाई पड रहा है। पिछले साल मानवाधिकार आयोग के सर्वेक्षण में मध्य प्रदेश में सर पर मैला ढोने वाले लोगों की तादाद लगभग सात हजार दर्शाया जाना ही अपने आप में सबसे बडा प्रमाण माना जा सकता है। उधर देश को सबसे अधिक प्रधानमन्त्री देने वाले उत्तर प्रदेश सूबे में दलितों की हालत बद से बदतर ही है।
मध्य प्रदेश के अलावा देश के और भी सूबे एसे होंगे जहां सर पर मानव मल ढोने वालों की खासी तादाद होगी। मध्य प्रदेश में ही होशंगाबाद, सीहोर, हरदा, शाजापुर, नीमच, मन्दसौर, भिण्ड, टीकमगढ, राजगढ, उज्जैन, पन्ना, छतरपुर, नौगांव, निवाडी आदि शहरों और एक दर्जन से भी अधिक जिलों में इस तरह की अमानवीय प्रथा को प्रश्रय दिया जा रहा है। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस भले ही दलितों के उत्थान के लिए गगनभेदी नारे लगती रही हो पर सच्चाई यह है कि आज भी इसी कांग्रेस की नीतियों के चलते बडी संख्या में दलित समुदाय के लोग इस तरह की प्रथा के जरिए अपनी आजीविका कमाने पर मजबूर हैं। विडम्बना यह है कि आज भी हिन्दु धर्म में बािल्मकी समाज तो मुस्लिमों में हैला समाज के लोग देश में सर पर मैला ढोने का काम कर रहे हैं।
हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज भी परंपरागत तरीके से सिर पर मैला ढोने का काम, शौचालयों की साफ सफाई, मरे पालतू या शहरों में पाए जाने वाले जानवरों को आबादी से दूर करने, नाले नालियों की सफाई, शुष्क शौचालयों के टेंक की सफाई, चिकित्सालय में साफ सफाई, मलमूत्र साफ करने के काम आदि को करने वाले दलित सुमदाय के लोगों का जीवन स्तर और सामाजिक स्थितियां अन्य लोगों की तुलना में बहुत ही दयनीय है। सरकारों द्वारा इन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल अवश्य ही किया जाता हो, पर इन्हें मुख्य धारा में शामिल होने नहीं दिया जाता है। सरकारों द्वारा दलित उत्थान के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ इस वर्ग के दलित लोगों को ही मिल पाता है, इस बात में कोई सन्देह नहीं है।
गौरतलब है कि भारत सरकार ने अपनी दूसरी पंचवषीZय योजना मेें सर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने की गरज से राज्यों और नगरीय निकाय संस्थाओं को शुष्क शौचालय बनाने के लिए नागरिकों को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय प्रावधान भी किए थे। आश्चर्य तो तब होता है जब इतिहास पर नज़र डाली जाती है। 1971 में भारत सरकार ने दस साल की आलोच्य अवधि में सर पर मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने हेतु चरणबद्ध तरीके से अभियान चलाया था। दस साल तो क्या आज चालीस साल बीतने को हैं, पर यह कुप्रथा बदस्तूर जारी है।
इसके बाद 1993 में सरकार की तन्द्रा टूटी थी, तब सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय संनिर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम 1993 लागू किया गया था, जिसके तहत प्रावधान किया गया था कि जो भी व्यक्ति यह काम करवाएगा उसे एक वर्ष के कारावास और दो हजार रूपए अर्थदण्ड की सजा का भोगमान भुगतना पड सकता है। कानून के जानकार बताते हैं कि देश में कुछ इस तरह के कानून और भी अस्तित्व में हैं, जो सर पर मैला ढोने की प्रथा पर पाबन्दी लगाते हैं। रोना तो इसी बात का है कि सब कुछ करने के बाद भी चूंकि जनसेवकों की नीयत साफ नहीं थी इसलिए इसे रोका नहीं जा सका।
सरकार द्वारा इस काम में संलिप्त लोगों के बच्चों को अच्छा सामाजिक वातावरण देने, साक्षर और शिक्षित बनाने के प्रयास भी किए हैं। सरकार ने इसके लिए बच्चों को विशेष छात्रवृति तक देने की योजना चलाई है। इसके तहत बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी गई। मजे की बात यह है कि जिन परिवारों ने इस काम को छोडा और कागजों पर जहां जहां सर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त होना दर्शा दी गई वहां इन बच्चों की छात्रवृत्ति भी बन्द कर दी गई है।
देश के पिता की उपाधि से अंलकृत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम को भुनाने में कांग्रेस द्वारा अब तक कोई कोर कसर नही रख छोडी है। बापू इस अमानवीय प्रथा के घोर विरोधी थे। बापू द्वारा उस समय के अपने शौचालय को स्वयं ही साफ किया जाता था। सादगी की प्रतिमूर्ति महात्मा गांधी के नाम को तो खूब कैश कराया है कांग्रेस ने पर जब उनके आचार विचार को अंगीकार करने की बात आती है तब कांग्रेस की मोटी खाल वाले खद्दरधारी नेताओं द्वारा मौन साध लिया जाता है।
दलित परिवारों को प्रश्रय देने में उत्तर प्रदेश काफी हद तक पिछडा माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश में 2006 में एससी एसटी के 1759, 2007 में 2410, तो 2008 में 2390 मामले दर्ज किए गए। आईपीसी के मामलों ने तो सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए। 2206 में 2238, 2007 में 3064 तो 2008 में इनकी संख्या बढकर 3543 हो गई थी। दलित महिलाओं की आबरू बचाने के मामले में 2006 से 2008 तक 255, 339 एवं 333 मामले प्रकाश में आए। ये तो वे आंकडे हैं जिनकी सूचना पुलिस में दर्ज है। गांव के बलशाली लोगों के सामने घुटने टेकने वाले वे मामले जो थाने की चारदीवारी तक पहुंच ही नहीं पाते हैं, उनकी संख्या अगर इससे कई गुना अधिक हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
खबरें तो यहां तक आ रहीं हैं कि दलित बच्चों के साथ शालाओं में भी भेदभाव किया जाता है। अनेक स्थानों पर संचालित शालाओं में दलित बच्चों को मध्यान भोजन के वक्त उनके घरों से लाए बर्तनों में ही खाना परोसा जाता है। इतना ही नहीं शिक्षकों द्वारा इन बच्चों को दूसरे बच्चों से अलग दूर बिठाया जाता है। देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी दासता का सूरज डूबा नहीं है। आलम कुछ इस तरह का है कि दलित लोगों के साथ अन्याय जारी है। गांव के दबंग लोग इनसे बेगार करवाने में भी नहीं चूक रहे हैं। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आजादी के बासठ सालों बाद भी गांवों में बसने वाला भारत स्वतन्त्रता के बजाए मध्य युगीन दासता में ही उखडी उखडी सांसे लेने पर मजबूर है।

बुधवार, 3 मार्च 2010

कैसे लगे धनवन्तरी के वंशजों पर अंकुश

कैसे लगे धनवन्तरी के वंशजों पर अंकुश
अपने कौल को भूल चुके हैं चिकित्सक
दवा कंपनियों पर नकेल कसना जरूरी
(लिमटी खरे)
 
पीडित मानवता की सेवा का संकल्प लेने वाले हिन्दुस्तान के चिकित्सकों की मानवता कभी की मर चुकी है। आज के युग में चिकित्सा का पेशा नोट कमाने का साधन बन चुका है। आज के समय को देखकर कहा जा सकता है कि मरीज की कालर एक डाक्टर द्वारा बिस्तर पर ही पकडी जाती है। दवा कंपनियों की मिलीभगत के चलते मरीजों की जेब पर सीधे सीधे डाका डाला जा रहा है। चिकित्सकों और दवा कंपनियों ने मिलकर तन्दरूस्ती हजार नियामत की पुरानी कहावत पर पानी फेरते हुए अपना नया फण्डा इजाद किया है कि स्वास्थ्य के नाम पर जितना लूट सको लूट लो। इसी तारतम्य में स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने बिना मेडीकल रिपर्जेंटेटिव ही स्वास्थ्य की उपजाउ भूमि पर न केवल अपना साम्राज्य स्थापित किया है, वरन् अब तो वे देश पर राज करने का सपना भी देखने लगे हैं। संस्कृत की एक पुरानी कहावत है, ``न दिवा स्वप्नं कुर्यात`` अर्थात दिन में सपने नहीं देखना चाहिए, किन्तु बाबा रामदेव को लगता है कि योग के बल पर उन्होंने जो आकूत दौलत और शोहरत एकत्र की है, उसे वे भुना सकते हैं।
बहरहाल मेडीकल काउंसलि ऑफ इण्डिया द्वारा इसी माह एक कोड लाने की तैयारी की जा रही है, जिसके तहत दवा कंपनियों से तोहफा लेने वाले चिकित्सकों का लाईसेंस रद्द किए जाने का प्रावधान है। एमसीआई द्वारा स्वास्थ्य के देवता भगवान धनवन्तरी के वर्तमान वंशजों अर्थात चिकित्सकों पर लगाम कसने की कवायद की जा रही है। एमसीआई अपने इस कोड के निर्णय को अमली जामा कैसे पहनाती है, यह तो वक्त ही बताएगा किन्तु इस सबमें दवा कंपनियों की मश्कें कसने की बात कहीं भी सामने नहीं आई है। अर्थात कहीं न कहीं चोरी करने के लिए थोडी सी जमीन जरूर छोड दी गई है।
एमसीआई कोड के अनुसार चिकित्सक और उसके परिजन अब दवा कंपनियों के खर्चे पर सेमीनार, वर्कशाप, कांफ्रेंस आदि में नहीं जा सकेंगे। कल तक अगर चिकित्सक एसा करते थे, तब भी वे उजागर तौर पर तो किसी को यह बात नहीं ही बताते थे। इसके अलावा दवा कंपनियों के द्वारा चिकित्सकों को छुटि्टयां बिताने देश विदेश की सैर कराना प्रतिबंधित हो जाएगा। चिकित्सक किसी भी फार्मा कंपनी के सलाहकार नहीं बन पाएंगे तथा मान्य संस्थाओं की मंजूरी के उपरान्त ही शोध अथवा अध्ययन के लिए अनुदान या पैसे ले सकेंगे।
एमसीआई कोड भले ही ले आए पर चिकित्सकों के मुंह में दवा कंपनियों ने जो खून लगाया है, उसके चलते चिकित्सक इस सबके लिए रास्ते अवश्य ही खोज लेंगे। देखा जाए तो दुनिया का चौधरी अमेरिका इस मामले में बहुत ही ज्यादा सख्त है। अमेरिका में अनेक एसे उदहारण हैं, जिनको देखकर वहां के चिकित्सक और दवा कंपनी वालों की हिम्मत मरीजों की जेब तक हाथ पहुंचाने की नहीं हो पाती है। अमेरिका की एली लिली कंपनी ने तीन हजार चार सौ चिकित्सकों और पेशेवरों के लिए 2.20 करोड डालर (एक अरब रूपए से अधिक) दिए, बाद में गडबडियों के लिए उस कंपनी को 1.40 अरब डालर (64.40 अरब रूपए से अधिक) की पेनाल्टी भरनी पडी।
इसी तरह फायजर कंपनी ने चिकित्सकों और पेशेवरों के माध्यम से गफलत करने पर 2.30 अरब डॉलर (एक सौ पांच अरब रूपए से अधिक) का दण्ड भुगता। ग्लेक्सोिस्मथक्लाइन ने 30909 डालर (14 लाख रूपए से अधिक) के औसत से 3700 डॉक्टर्स को 1.46 करोड डालर (6.71 अरब रूपए से अधिक) दिए तो मर्क ने 1078 पेशेवरों को 37 लाख डालर (सत्रह करोड रूपए से अधिक) का भुगतान किया।
अमेरिका में फिजिशियन पेमेंट सानशाइन एक्ट लाया जा रहा है, जिसके तहत दवा कंपनियों को हर साल 100 डालर से अधिक के भुगतान की जानकारी देनी होगी। जानकारी देने में नाकाम या आनाकानी करने वाली कंपनी को हर भुगतान पर कम से कम 1000 डालर और जानबूझकर जानकारी छिपाने के आरोप में कम से कम दस हजार डालर का भोगमान भुगतना पडेगा।
दरअसल पेंच चिकित्सकों द्वारा लिखी जाने वाली दवाओं में है। निहित स्वार्थ और लाभ के लिए चिकित्सकों द्वारा कंपनी विशेष की दवाओं को प्रोत्साहन दिया जाता है। दवा कंपनी द्वारा अनेक लीडिंग पे्रक्टीशनर्स को पिन टू प्लेन सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। चिकित्सकों के बच्चों की पढाई लिखाई से लेकर घर तक खरीदकर देती हैं, दवा कंपनियां। इसी बात से अन्दाज लगाया जा सकता है कि दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों के साथ मिलकर किस कदर मोनोपली मचाई जाती है, और मरीजों की जेब किस तरह हल्की की जाती है।
चिकित्सकों द्वारा सस्ती दवाएं नहीं लिखी जातीं हैं, क्योंकि जितनी मंहगी दवा उतना अधिक कमीशन उसे मिलता है। वहीं दूसरी ओर देखा जाए तो चिकित्सकों पर होने वाले खर्चे के कारण ही दवाओं की कीमतें आसमान छू रहीं हैं। बीते साल में ही दवाओं की कीमतों में 20 से 30 फीसदी तक इजाफा हुआ है। हृदय रोग के काम आने वाली दवाएं तो 70 फीसदी तक उछाल मार चुकीं हैं। कहा जाता है कि लगभग पचास फीसदी दवाएं तो अनुपयुक्त ही हैं। मर्क कंपनी की अथर्राइटिस की दवा वायोक्स के साईड इफेक्ट के मामले में कंपनी ने मौन साध लिया था। इसके सेवन से हार्ट अटैक की संभावनाएं बहुत ज्यादा हो जाती थीं। अनेक मौतों के बाद इस दवा को वापस लिया गया था।
महानगरों सहित लगभग समूचे हिन्दुस्तान के बडे शहरों में चिकित्सा की दुकानें फल फूल रही है, आम जनता कराह रही है, सरकारी अस्पताल उजडे पडे हैं, पर सरकारें सो रहीं हैं। नर्सिंग होम में चिकित्सकों के परमानेंट पेथालाजी लेब, एक्सरे आदि में ही टेस्ट करवाने पर चिकित्सक उसे मान्य करते हैं, अन्यथा सब बेकार ही होता है। कितने आश्चर्य की बात है कि सरकारी अस्पतालों में होने वाले टेस्ट को इन्हीं चिकित्सकों द्वारा सिरे से खारिज कर दिया जाता है। अगर वाकई सरकारी अस्पताल के टेस्ट मानक आधार पर सही नहीं होते हैं तो बेहतर होगा कि सरकारी अस्पतालों से इन विभागों को बन्द ही कर देना चाहिए। यहां तक कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र और मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान की कर्मभूमि विदिशा में जिला चिकित्सालय में पदस्थ सिविल सर्जन श्रीमति जैन के पास इतना समय है कि वे अस्पताल के ठीक गेट के सामने अपनी निजी चिकित्सा की दुकान चलाती हैं, और जनसेवक चुपचाप देख सुन रहे हैं।
चिकित्सकों पर अंकुश लगाने के लिए एमसीआई द्वारा नियमावली बनाई जा रही है, कहा जा रहा है कि मार्च माह में उसे लागू भी कर दिया जाएगा। इसके लिए विशेषज्ञों से सुझाव भी आमन्त्रित करवाए जा रहे हैं। इस पाबन्दी से डायरी, पेन, पेपवेट, कलेण्डर जैसी चीजों को मुक्त रखा गया है। वैसे दवा कंपनियों से डी कंट्रोल श्रेणी की दवाओं के मूल्य निर्धारण का अधिकार छीनकर कुछ हद तक भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है।
जब तक सरकार द्वारा चिकित्सकों के साथ ही साथ दवा कंपनियों पर अंकुश नहीं लगाया जाता तब तक मरीजों की जेब में डाका डालने का सिलिसिला शायद ही थम पाए। सरकार को अमेरिका जैसा कानून ``सख्ती`` से लागू कराना होगा। दवा कंपनियों से यह कहना होगा कि वे किसी चिकित्सक विशेष के बजाए मेडीकल एसोसिएशन या चिकित्सकों की टीम के लिए स्पांसरशिप कर नई दवाओं की जानकारी दे। इसके अलावा एमसीआई को चिकित्सकों और जांच केन्द्रों के बीच की सांठगांठ के खिलाफ कठोर पहल करनी होगी। मार्च माह में लागू किए जाने वाले कोड और आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करने के लिए कठोर कदम ही उठाने आवश्यक होंगे।
भगवान धनवन्तरी के आधुनिक वंशजों द्वारा मानवता की सेवा के लिए लिए गए संकल्प को पूरी तरह से भुला दिया गया है। आज सरकारी और गैरसरकारी चिकित्सकों द्वारा मरीजों को जमकर लूटा जा रहा है। चिकित्सकों और दवा कंपनियों द्वारा अपनी इस लूट से ``जनसेवकों`` को मुक्त रखा गया है। कोई भी जनसेवक जब बीमार पडता है तो उसे देखने जाने वाले चिकित्सक द्वारा सैंपल में मिली दवाएं इंजेक्शन दिए जाते हैं, जिससे जनसेवक को पता ही नहीं चल पाता कि आम आदमी की कमर इन दोनों ही ने किस कदर तोडकर रखी है। इसके अलावा अगर चिकित्सकों को दिए जाने वाले नाट फार सेल वाले सैंपल और बाजार में मिलने वाली दवाओं के कंटेंट्स को ही मिला लिया जाए तो गुणवत्ता की कलई खुलने में समय नहीं लगे। एमसीआई द्वारा पहल जरूर की जा रही है, पर यह परवान चढ सकेगी इस बात में सन्देह ही नज़र आता है।

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

वाह री होली, जित देखो उत नओ नाम


वाह री होली, जित देखो उत नओ नाम
अनेकता में एकता भारत की विशेषता
होली तेरे नाम अनेक
(लिमटी खरे)

होली शब्द जेहन में आते ही सारा जहां रंगों से सराबोर दिखाई पडने लगता है। लगता है मानो कुदरत की सबसे अनुपम भेंट धरती और हम इंसानों सहित समूचे पशु पक्षी रंगों से नहा गए हों। होली का पर्व आते आते ही मन आल्हादित हो उठता है। युवाओं के मन मस्तिष्क में न जाने किसम किसम की भावनाएं हिलोरे मारने लगती हैं। प्रोढ और वृद्ध भी साल भर रंगो के इस त्योहार की प्रतिक्षा करते हैं। सबसे बडी और अच्छी बात तो यह है कि देश के हर धर्म, वर्ग, मजहब के लोग होली का पूरा सम्मान कर एक दूसरे से गले मिलने से नहीं चूकते हैं।
भारत को समूचे विश्व में अचंभे की नज़रों से देखा जाता है। इसका कारण यह है कि यहां हर 20 किलोमीटर की दूरी पर बोलचाल की भाषा में कुछ न कुछ परिवर्तन दिखने लगता है। हिन्दुस्तान ही इकलौता एसा देश है जहां हर धर्म, हर पन्थ, हर मजहब को मानने की आजादी है। दुनिया भर के लोग आश्चर्य इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि आखिर कौन सी ईश्वरीय ताकत है जो इतने अलग अलग धर्म, पन्थ, विचार, मजहब के लोगों को एक सूत्र में पिरोए रखती है।
अगर देखा जाए तो भारत कुदरत की इस कायनात का एक सबसे दर्शनीय, पठनीय, श्रृवणीय करिश्मा होने के साथ ही साथ महसूस करने की विषय वस्तु से कम नहीं है, यही कारण है कि हर साल लाखों की तादाद में विदेशी सैलानी यहां आकर इन्ही सारी बातों के बारे में अध्ययन, चिन्तन और मनन करते हैं। भारत के अन्दर फैली एताहिसक विरासतों में विदेशी सैलानी बहुत ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं।
भारत के अनेक प्रान्तों में होली को अलग अलग नामों से जाना जाता है। पर्व एक है, उल्लास भी कमोबेश एक ही जैसा होता है, बस नाम ही जुदा है। इसके साथ ही साथ इसे मनाने का अन्दाज भी बहुत ज्यादा हटकर नहीं है। अगर आप इब्नेबबूता (मुगलकालीन धुमक्कड) बनकर समूचे देश की सैर करें तो आप पाएंगे कि वाकई होली एक है, भावनाएं एक हैं, प्रेम का इजाहर कमोबेश एक सा है, बस अन्दाज कुछ थोडा मोडा जुदा है।
 
दुलैण्डी
होली शब्द के कान में गूंजते ही देवर भाभी के बीच की नोक झोंक, छेड छाड के फिल्मी दृश्य जेहन में जीवन्त हो उठते हैं। वैसे तो देश के अनेक भागों में देवर भाभी के बीच होने वाले पंच प्रपंच को होली से जोडकर देखा जाता है, पर हरियाणा में इसका बहुत ज्यादा प्रचलन है। मजे की बात यह है कि हरियाणा में इस दिन भाभी को देवर की पिटाई करने का सामाजिक हक मिल जाता है। इस दिन भाभी द्वारा पूरे साल भर की देवर की करतूतों हरकतों के हिसाब से उसकी पिटाई की जाती है। दिन ढलते ही शाम को लुटा पिटा देवर भाभी के लिए मिठाई लाता है।
फाग पूिर्णमा
बिहार में होली को फाग पूिर्णमा भी कहा जाता है। दरअसल फाग का मतलब होता है, पाउडर और पूिर्णमा अर्थात पूरे चान्द वाला। बिहार में शेष हिन्दुस्तान की तरह आम तरह की ही होली मनाई जाती है। ``नदिया के पार`` में दिखाई होली बिहार में खेले जाने वाले फगवा की ओर इशारा करती है। बिहार में होली को फगवा इसलिए भी कहते हैं क्योंकि यह फागुन मास के अन्तिम हिस्से और चैत्र मास के शुरूआती समय मनाई जाती है।
डोल पूिर्णमा
पश्चिम बंगाल में युवाओं द्वारा मनाई जाने वाली होली को डोल पूिर्णमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही केसरिया रंग का लिबास पहनकर युवा हाथों में महकते फूलों के गजरे और हार लटकाए हुए नाचते गाते मोहल्लों से होकर गुजरते हैं। कुछ स्थानों पर युवा पालकी में राधा कृष्ण की तस्वीर या प्रतिमा रखकर सज धजकर उल्लास से झूमते नाचते हैं।
बसन्त उत्सव
पश्चिम बंगाल मेें इस उत्सव की शुरूआत नोबेल पुरूस्कार प्राप्त साहित्यकार गुरू रविन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। गुरूदेव के द्वारा स्थापित शान्ति निकेतन में बसन्त उत्सव का पर्व बहुत ही सादगी और गरिमा पूर्ण तरीके से मनाया जाता है। शान्ति निकेतन के छात्र छात्राएं न केवल पारंपरिक रंगों से होली खेलते हैं, बल्कि गीत संगीत, नाटक, नृत्य आदि के साथ बसन्त ऋतु का स्वागत करते हैं।
कमन पण्डिगाई
तमिलनाडू में होली का पर्व कमन पण्डिगाई के रूप में भी मनाया जाता है। तमिलनाडू में होली पर भगवान कामदेव की अराधना और पूजा की जाती है। यहां मान्यता है कि भोले भण्डारी भगवान शिव ने जब कामदेव को अपने कोप से भस्म किया था, तो इसी दिन कामदेव की अर्धांग्नी रति के तप, प्रार्थना और तपस्या के उपरान्त भगवान शिव ने उन्हें पुर्नजीवित किया था।
शिमगो
मूलत: शिमगो गोवा के इर्द गिर्द ही मनाया जाता है। महाराष्ट्र की कोकणी भाषा में होली को शिमगो का नाम दिया गया है। शेष भारत की तरह गोवा के लोग भी रंगों को आपस में उडेलकर बसन्त का स्वागत करते हैं। इस पर्व पर ढेर सारे पकवान बनाए जाते हैं, आपस में बांटे जाते हैं। खासतौर पर पणजिम में यह त्योहार बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटकों का मंचन भी इसी दिन किया जाता है।
होला मुहल्ला
पंजाब में होला मुहल्ला का इन्तजार हर किसी को होता है। यह होली के दूसरे दिन आनन्दपुर साहिब में लगने वाले सालाना मेले का नाम है। मान्यता है कि होला मुहल्ला की शुरूआत सिख पन्थ के दसवें गुरू, ``गुरू गोविन्द सिंह जी`` द्वारा की गई थी। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के दौरान सिख समुदाय के लोग खतरनाक खेलों का प्रदर्शन कर उनके माध्यम से अपनी ताकत और क्षमताओं का प्रदर्शन करते हैं।
रंग पंचमी
समूचे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित मालवा अंचल में होली का जश्न और सुरूर एक दो नहीं पूरे पांच दिन होता है। होलिका दहन के दूसरे दिन धुरैडी से लेकर रंग पंचमी तक लोग होली पूरे शबाब पर होती है। धुरैडी के उपरान्त लोग पांचवा दिन अर्थात रंग पंचमी का बेसब्री से इन्तजार करते हैं। प्रदेश के कुछ भागों में तो होली से ज्यादा आनन्द रंग पंचमी का लिया जाता है। राज्य मेें खासतौर पर मछुआरा समुदाय इस पर्व को बडी ही धूमधाम के साथ मनाता है। वे जोरशोर से नाचते गाते बजाते हैं। इस दिन हुई शादी को वे बहुत ही शुभ मानते हैं।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

1411

आखिर कैसे बचें बाघ बहादुर 

जयराम उवाच देश में आदमियों की कमी नहीं, बाघों की है
 

हुजूर आते आते बहुत देर कर दी
 

अवैध शिकार रोकना टेडी खीर
 

वनाधिकारी और पुलिस की मिलीभगत से घट रही है बाघों की संख्या
 

(लिमटी खरे)

आधी सदी से ज्यादा समय तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस ने 1973 में बाघों को बचाने के लिए टाईगर प्रोजेक्ट का श्रीगणेश किया था। उस वक्त माना जा रहा था कि बाघों की संख्या तेजी से कम हो सकती है, अत: बाघों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। विडम्बना देखिए कि उसी कांग्रेस को 37 साल बाद एक बार फिर बाघों के संरक्षण की सुध आई है। जिस तरह सरकार के उपेक्षात्मक रवैए के चलते देश में गिद्ध की प्रजाति दुर्लभ हो गई है, ठीक उसी तरह आने वाले दिनों में बाघ अगर चिडियाघर में शोभा की सुपारी की तरह दिखाई देने लगें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
बाघ संरक्षण के लिए भारत सरकार की तन्द्रा तब जाकर टूटी है, जबकि कैंसर लगभग अन्तिम अवस्था में पहुंच चुका है। कितने आश्चर्य की बात है कि हर साल हजारों करोड रूपए खर्च करने के बाद भी बाघों का अस्तित्व दिनों दिन संकट में पहुंचता रहा। 2007 में बाघ संरक्षित क्षेत्रों में सबसे अधिक 245 बाघ सुन्दरवन में थे, इसके अलावा बान्दीपुर में 82, कॉबेZट मेे 137, कान्हा में 127, मानस 65, मेलघाट 73, पलामू 32, रणथंबौर 35, सिमलीपाल में 99 तो पेरियार में 36 बाघ मौजूद थे।
2007 में हुई गणना के आंकडों के अनुसार सरिक्सा 22, बक्सा 31, इन्द्रावती 29, नागार्जुन सागर में 67 नामधापा 61, दुधवा 76, कलाकड 27, वाल्मीकि 53, पेंच (महाराष्ट्र) 40, पेंच (मध्य प्रदेश) 14, ताडोबा 8, बांधवगढ 56, डम्पा 4, बदरा 35, पाकुल 26, एवं सतपुडा में महज 35 बाघ ही मौजूद थे, इसके अलावा 2007 में सर्वेक्षण वाले अतिरिक्त क्षेत्रों में कुनो श्योपुर में 4, अदबिलाबाद में 19, राजाजी नेशनल पार्क 14, सुहेलवा 6, करीमनगर खम्मन 12, अचानकमार 19, सोनाबेडा उदान्ती 26, ईस्टर्न गोदावरी 11, जबलपुर दमोह 17, डाण्डोली खानपुर में 33 बाघ चििन्हत किए गए थे।
दूसरे आंकडों पर गौर फरमाया जाए तो 1972 में भारत में 1827 तो मध्य प्रदेश में 457, 1979 में देश में 3017, व एमपी में 529, 1984 में ये आंकडे 3959 / 786 तो 1989 में 3854 / 985 हो गए थे। फिर हुआ बाघों का कम होने का सिलसिला जो अब तक जारी है। 1993 में 3750 / 912, 1997 में 3455 / 927, 2002 में 3642 / 710 तो 2007 में देश में 1411 तो मध्य प्रदेश में महज 300 बाघ ही बचे थे।
दुख का विषय यह है कि देश में 28 राष्ट्रीय उद्यान और 386 से अधिक अभ्यरण होने के बाद भी छत्तीसगढ के इन्द्रावती टाईगर रिजर्व नक्सलियों के कब्जे में बताया जाता है। इसके साथ ही साथ टाईगर स्टेट के नाम से मशहूर देश का हृदय प्रदेश माना जाने वाला मध्य प्रदेश अब धीरे धीरे बाघों को अपने दामन में कम ही स्थान दे पा रहा है, यहां बाघों की तादाद में अप्रत्याशित रूप से कमी दर्ज की गई है।
दरअसल, भुखमरी, रोजगार के साधनों के अभाव और कम समय में रिस्क लेकर ज्यादा धन कमाने की चाहत के चलते देश में वन्य प्राणियों के अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हैं। विश्व में चीन बाघ के अंगों की सबसे बडी मण्डी बनकर उभरा है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बाघ के अंगों की भारी मांग को देखते हुए भारत में शिकारी और तस्कर बहुत ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। सरकारी उपेक्षा, वन और पुलिस विभाग की मिलीभगत का ही परिणाम है कि आज भारत में बाघ की चन्द प्रजातियां ही अस्तित्व में हैं। मरा बाघ 15 से 20 लाख रूपए कीमत दे जाता है। बाघ की खाल चार से आठ लाख रूपए, हडि्डयां एक लाख से डेढ लाख रूपए, दान्त 15 से 20 हजार रूपए, नखून दो से पांच हजार रूपए के अलावा रिप्रोडेक्टिव प्रोडक्ट्स की कीमत लगभग एक लाख तक होती है। बाघ के अन्य अंगो को चीन के दवा निर्माता बाजार में बेचा जा रहा है।
बाघ संरक्षण की दिशा में केन्द्र और राज्य सरकार कितनी संजीदा है उसकी एक बानगी है मध्य प्रदेश के पन्ना जंगल। पन्ना में 2002 में 22 बाघ हुआ करते थे, इसी लिहाज से इस अभ्यरण को सबसे अच्छा माना गया था। 2006 मे वाईल्ड लाईफ इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया (डब्लूआईआई) ने कहा था कि पन्ना में महज आठ ही बाघ बचे हैं। इसके उपरान्त यहां पदस्थ वन संरक्षक एच.एस.पावला का बयान आया कि पन्ना में बाघों की संख्या उस समय 16 से 32 के बीच है। जनवरी 2009 में डब्लूआईआई ने एक बार फिर कहा कि पन्ना में महज एक ही बाघ बचा है। इस तरह अब किस बयान को सच माना जाए यह यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है। अपनी खाल बचाने के लिए वनाधिकारी मनमाने वक्तव्य देकर सरकार को गुमराह करने से नहीं चूकते और सरकार है कि अपने इन बिगडैल, आरामपसन्द, भ्रष्ट नौकरशाहों पर एतबार जताती रहतीं हैं।
एसा नहीं है कि वन्य जीवों के संरक्षण के प्रयास पहले नहीं हुए हैं। गुजरात के गीर के जंगलों में सिंह को बचाने के प्रयास जूनागढ के नवाब ने बीसवीं सदी में आरम्भ किए थे। एक प्रसिद्ध फिरंगी शिकारी जिम काबेZट को बाघों से बहुत लगाव था। आजादी के बाद जब बाघों का शिकार नहीं रूका तो उन्होंने भारत ही छोड दिया। भारत से जाते जाते उन्होंने एक ही बात कही थी कि बाघ के पास वोट नहीं है अत: बाघ आजाद भारत में उपेक्षित हैं।
इतना ही नहीं आजाद भारत में विजयनगरम के महाराजा ने उस जगह तीस महीनों में तीस बाघों को मौत के घाट उतारा जहां वर्तमान कान्हा नेशनल पार्क स्थित है। बावजूद इसके तत्कालीन जनसेवक मौन साधे रहे। खबरें यहां तक आ रही हैं कि मध्य प्रदेश में कुछ सालों पहले एक बाघ को इसलिए काल कलवित होना पडा क्योंकि उसने गांव वाले की गाय को खा लिया था। गुस्साए ग्रामीणों ने अधखाए गाय के शरीर में जहर मिला दिया था।
हर साल टाईगर प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार द्वारा आवंटन बढा दिया जाता है। इस आवंटन का उपयोग कहां किया जा रहा है, इस बारे में भारत सरकार को कोई लेना देना प्रतीत नहीं होता है। भारत सरकार ने कभी इस बारे में अपनी चिन्ता जाहिर नहीं की है कि इतनी भारी भरकम सरकारी मदद के बावजूद भी आखिर वे कौन सी वजहें हैं जिनके कारण बाघों को जिन्दा नहीं बचाया जा पा रहा है।
सरकार की पैसा फेंकने की योजनाओं के लागू होते ही उसे बटोरने के लिए गैर सरकारी संगठन अपनी अपनी कवायदों में जुट जाते हैं। वन्य प्राणी और बाघों के संरक्षण के मामले में भी अनेक एनजीओ ने अपनी लंगोट कस रखी है। जनसेवकों के ``पे रोल`` पर काम करने वाले इन एनजीओ द्वारा न केवल सरकारी धन को बटोरा जा रहा है, बल्कि जनसेवकों के इशारों पर ही सरकार की महात्वाकांक्षी परियोजनाओं में अडंगे भी लगाए जा रहे हैं। केन्द्रीय भूतल परिवहन मन्त्री कमल नाथ चाहते हैं कि स्विर्णम चतुभुZज सडक परियोजना के उत्तर दक्षिण गलियारे को उनके संसदीय क्षेत्र छिन्दवाडा से होकर गुजार जाए। वर्तमान में यह मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से होकर गुजर रही है। इसके निर्माण में बाघा तब आई जब सर्वोच्च न्यायालय में एक गैर सरकारी संगठन द्वारा याचिका प्रस्तुत की गई।
बताते हैं कि याचिका में कहा गया है कि चूंकि शेरशाह सूरी के जमाने का यह मार्ग पेंच और कान्हा नेशनल पार्क के बीच वन्य जीवों के कारीडोर से होकर गुजर रहा है अत: इसके फोर लेन बनाने की अनुमति न दी जाए। यह एनजीओ किसके इशारे पर काम कर रहा है, यह तो वह ही जाने पर यह एनजीओ इस बात को भूल जाता है कि अगर इस मार्ग को छिन्दवाडा से होकर गुजारा जाएगा तब यह सतपुडा और पेंच के कारीडोर के मध्य से गुजरेगा। इस बात को न तो सिवनी के ही किसी जनसेवक ने उठाया है और न ही क्षेत्रीय प्रबुद्ध मीडिया ने भी नज़रें इनायत की हैं।
आजाद भारत के इतिहास में सम्भवत: पहली बार किसी वन मन्त्री ने खुद जाकर वन अभ्यारणों की स्थिति का जायजा लिया होगा। यह बात तो सभी जानते हैं कि किसी मन्त्री के निरीक्षण की सूचना के बाद जमीनी हालात फौरी तौर पर किस कदर बदल दिए जाते हैं। इसके पहले देश के पहले प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू, प्रियदर्शनी इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी वन्य जीवों के प्रति संजीद दिखे, पर इनके अलावा और अन्य निजामों ने कभी वन्य जीवों के प्रति उदार रवैया नहीं अपनाया।
बाघों या वन्य जीवों पर संकट इसलिए छा रहा है क्योंकि हमारे देश का कानून बहुत ही लचर और लंबी प्रक्रिया वाला है। वनापराध हों या दूसरे इसमें संलिप्त लोगों को सजा बहुत ही विलम्ब से मिल पाती है। देश में जनजागरूकता की कमी भी इस सबसे लिए बहुत बडा उपजाउ माहौल तैयार करती है। सरकारों के उदासीन रवैए के चलते जंगलों में बाघ दहाडने के बजाए कराह ही रहे हैं।
जंगल की कटाई पर रोक और वन्य जीवों के शिकार के मामले में आज आवश्यक्ता सख्त और पारदशीZ कानून बनाने की है। सरकार को सोचना होगा कि आखिर उसके द्वारा इतनी भारी भरकम राशि और संसाधन खर्च करने के बाद भी पांच हजार से कम तादाद वाले बाघों को बचाया क्यों नही जा पा रहा है। मतलब साफ है कि सरकारी महकमों में जयचन्दों की भरमार है। भारत में बाघ एक के बाद एक असमय ही काल कलवित हो रहे हैं और सरकार गहरी निन्द्रा में है।
भारत में वृक्षों की पूजा अर्चना की संस्कृति बहुत पुरानी है। एक जमाना था जब लोग झाड काटने के पहले उसकी पूजा कर क्षमा याचना करते थे, फिर कुल्हाडी चलाते थे। कल तक भारत सरकार द्वारा भी वृक्ष बचाने के लिए बाकायदा जन जागृति अभियान चालाया जाता था। विज्ञापनों का प्रदर्शन और प्रसारण किया जाता था, जिससे वनों को बचाने जन जागृति फैल सके। विडम्बना है कि वर्तमान में वनों को बचाने की दिशा में सरकारें पूरी तरह निष्क्रीय ही नज़र आ रही है।
वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह ने व्यक्तिगत रूचि ली थी बाघों के संरक्षण की दिशा में। उन्होंने पर्यावरणविद सुनीता नारायण की अध्यक्षता में एक कार्यदल का गठन किया। कार्यदल के प्रतिवेदन पर बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया गया।। बावजूद इसके बाघों की संख्या में कमी चिन्ताजनक पहलू ही माना जाएग। आदिवासियों को मिले वनाधिकारों ने भी बाघों के परलोक जाने के मार्ग प्रशस्त किए हैं। बाघ के इलाकों के इर्द गिर्द मानव बसाहट भी इनके लिए खतरे से कम नहीं है।
तेजी से कटते जंगल, स्पेशल इकानामिक जोन जैसी विशाल परियोजनाएं, रेल विस्तार परियोजनाएं, बांघ निर्माण के साथ ही साथ बढते रिहायशी इलाकों के कारण बाघ सहित अन्य वन्य जीवों के घरोन्दे सिकुडते जा रहे हैं। बन्दर बिलाव तो शहरों में जाकर रह सकते हैं, पर बाघ या हाथी तो मुम्बई, दिल्ली में विचरण नहीं कर सकते न। इन्हें तो घने जंगल ही चाहिए, जहां मानवीय हस्ताक्षेप न हो।
बाघ बचाने लिए सरकार को चाहिए कि वह जंगल की कटाई पर रोक के लिए सख्त कानून बनाए, टाईगर रिजर्व के आस पास कडी सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराए, इसके लिए विशेष बजट प्रावधान हो, नए जंगल लगाने की योजना को मूर्तरूप दिया जाने के साथ ही साथ बाघ को मारने पर फांसी की सजा का प्रावधान किया जाना आवश्यक होगा। वरना आने वाले एक दशक में ही बाघ भी उसी तरह दुर्लभ हो जाएगा जिस तरह अब गिद्ध हो गया है।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

योग गुरू नहीं परिपक्व राजनेता हैं बाबा रामदेव

योग गुरू नहीं परिपक्व राजनेता हैं बाबा रामदेव

राजनीति के दांव पेंच भली भान्ति जानते हैं बाबा

योग तो एक बहाना था असल मकसद राजनीति में आना था

गांधी बनने की जुगत में हैं रामदेव

(लिमटी खरे)

देश में कथित अध्यात्म गुरू, ज्योतिषविद, प्रवचनकर्ताओं आदि की कमी किसी भी दृष्टिकोण से नहीं है। इन सबके बीच धु्रव तारा बनकर उभरे योग गुरू बाबा रामदेव बडे ही सधे कदमों से चल रहे हैं। एक परिपक्व राजनेता के मानिन्द पहले उन्होंने देश के बीमारों को स्वस्थ्य बनाने का बीडा उठाया। देश के प्राचीन अर्वाचीन योग को एक नई पेकिंग में बाजार में लांच किया, फिर समाचार और दूसरे चेनल्स के माध्यम से घरों घर में अपनी आमद दी। अब जबकि उनके अनुयायियों की खासी तादाद हो गई है, तब उन्होंने लोहा गरम देख राजनीति में आने का हथौडा जड दिया है।

पिछले चन्द दिनों से बाबा रामदेव के मुंह से योग के माध्यम से लोगों को स्वस्थ्य बनाने के बजाए राजनीति में आने की महात्वाकांक्षाएं ज्यादा कुलांचे मारती प्रतीत हो रहीं हैं। बाबा के मुंह से निकली यह बात किसी को भी आश्चर्यजनक इसलिए नहीं लग रही होगी क्योंकि बाबा रामदेव ने बहुत ही करीने से सबसे पहले अपने आप को महिमा मण्डित करवाया फिर अपनी इस महात्वाकांक्षा को जनता पर थोपा है।

बाबा रामदेव का कहना है कि अब राजनीति नहीं वरन योग नीति का वक्त आ गया है। स्वयंभू योगाचार्य बाबा रामदेव ने देश में केंसर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार को योगनीति के माध्यम से दुरूस्त करने का मानस बनाया है। बाबा ने बहुत सोच समझकर गरीब और अविकसित भारत देश में भ्रष्टाचार के साथ ही साथ विदेशों में फैले भारत के काले धन को भारत लाने का कौल उठाया है। बाबा का कहना है कि देश में अनेक प्रकार के अपराधों के लिए तरह तरह के कानून बने हैं, लेकिन भ्रष्टाचारियों पर अंकुश लगाने के लिए एक भी कठोर कानून नहीं है। बाबा यह भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार करते पकडे जाने पर न जाने कितने जनसेवक जेल की हवा भी खा चुके हैं।

बाबा का कहना सही है कि जनता की गाढी कमाई पर एश करने वालों के लिए सिर्फ और सिर्फ मृत्युदण्ड का प्रावधान होना चाहिए। बाबा के इस कथन से सत्तर के दशक में आई उस समय के सुपर डुपर स्टार राजेश खन्ना और मुमताज अभिनीत चलचित्र ``रोटी`` का ``यार हमारी बात सुनो, एसा एक इंसान चुनो जिसने पाप न किया हो जो पापी न हो. . . `` की याद ताजा हो जाती है। बाबा रामदेव देश के अनेक शहरों में अपने योग शिविर की दुकानें लगा चुके हैं इस हिसाब से वे भली भान्ति जानते होंगे कि देश में गरीब गुरबे किस तरह रहते हैं। यह बात भी उतनी ही सच है जितना कि दिन और रात कि बाबा के पास वर्तमान में अकूत दौलत का भण्डार है। बाबा अगर चाहें तो गरीब गुरबों के लिए एकदम निशुक्ल योग शिविर और चिकित्सा शिविर लगाकर दवाएं बांट सकते हैं। वस्तुत: बाबा रामदेव एसा नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह भी जानते हैं कि राजनेताओं का काम सिर्फ भाषण देना है, उसे अमली जामा पहनाना नहीं।

बाबा रामदेव के एजेण्डे में तीसरा तथ्य यह उभरकर सामने आया है कि उन्होंने ``हिन्दी की चिन्दी`` पर अफसोस जाहिर किया है। बाबा का कहना है कि आजादी के इतने समय बाद भी हम ब्रितानी मानसिकता के गुलाम हैं। आज भी न्यायालयों में हिन्दी के बजाए अंग्रेजी का ही बोल बाला है। बाबा रामदेव के इस कथन से हम पूरा इत्तेफाक रखते हैं, पर सवाल यह है कि समूची ब्यूरोक्रेसी में ही अंग्रेजी का बोलबाजा है, बाबा रामदेव बहुत चतुर खिलाडी हैं, वे अगर नौकरशाहों पर वार करते तो वे देश पर राज करने का जो रोडमेप तैयार कर रहे हैं उसके मार्ग में शूल ही शूल बिछा दिए जाते, यही कारण है कि बाबा रामदेव नौकरशाहों पर परोक्ष तौर पर निशाना साध रहे हैं।

बाबा रामदेव के कदम ताल को देखकर यह माना जा सकता है कि वे आजादी के उपरान्त महात्मा गांधी की छवि को अपने अन्दर सिमटाना चाह रहे हैं। चाहे देश आजाद हुआ हो तब या वर्तमान परिदृश्य हो, राजनीति की धुरी गांधी के इर्द गिर्द ही सिमटी रही है। तब मोहन दास करमचन्द गांधी बिना किसी पद पर रहते हुए राजनीति के केन्द्र थे तो आज कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के हाथों राजकाज की कमान है। लगता है बाबा रामदेव चाहते हैं कि वे सोनिया गांधी की तरह ही सबसे शक्तिशाली बने रहें और सक्रिय राजनीति में न रहें। बाबा रामदेव यह भूल जाते हैं कि आदि अनादी काल से राजकाज में सहयोग का काम राजगुरूओं का होता रहा है न कि कथित योग गुरू का। न तो बाबा रामदेव राजगुरू हैं और न ही वे धर्म गुरू। रही बात अपने आप को सबसे श्रेष्ठ समझने की तो शंकराचार्य के बारे में टिप्पणी करने के उपरान्त उन्हें माफी भी मांगनी पडी थी यह बात किसी से छिपी नहीं है।

हमारा अपना मानना है कि बाबा रामदेव पूरी तरह मुगालते में हैं। हमने अपने पिछले आलेखों ``राष्ट्रधर्म की राह पर बाबा रामदेव`` और ``बाबा रामदेव का राष्ट्रधर्म`` में बाबा रामदेव की भविष्य की राजनैतिक बिसात के बारे में इशारा किया था। उस दौरान बाबा रामदेव के अंधे भक्तों ने तरह तरह की प्रतिक्रियाएं व्यक्त की थीं। राजनेताओं को कोसना बहुत आसान है। जनसेवकों की मोटी खाल पर इसका कोई असर नहीं होता है। बाबा रामदेव ने भी जनसेवकों को पानी पी पी कर कोसा है। रामदेव यह भूल जाते हैं कि जैसे ही बाबा रामदेव उनकी कुर्सी हथियाने का साक्षात प्रयास करेंगे वैसे ही ये सारे राजनेता एक सुर में तान छेड देंगे और फिर आने वाले समय में बाबा रामदेव को अपनी योग की दुकान भी समेटना पड सकता है।

बाबा रामदेव के पास अकूत दौलत है। यह दौलत उन्होंने पिछले लगभग डेढ दशक में ही एकत्र की है। मीडिया की ताकत से बाबा रामदेव भली भान्ति परिचित हो चुके हैं। मीडिया चाहे तो किसी को फर्श से उठाकर अर्श पर तो किसी को आसमान से जमीन पर उतार सकता है। आने वाले समय में बाबा रामदेव अगर कोई समाचार चेनल खोल लें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, साथ ही प्रिंट की दुनिया में भी बाबा रामदेव उतर सकते हैं। हमें यह कहने मेें कोई संकोच नहीं कि मीडिया के ग्लेमर को देखकर इस क्षेत्र में उतरे लोग सरेआम अपनी कलम का सौदा कर रहे हैं। मीडिया को प्रजातन्त्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। प्रजातन्त्र के तीन स्तंभ तो गफलत, भ्रष्टाचार, अनैतिकता के दलदल में समा चुके हैं। लोगों की निगाहें अब मीडिया पर ही हैं, और मीडिया ही अगर अंधकार के रास्ते पर निकल गया तो भारत में प्रजातन्त्र के बजाए हिटलर राज आने में समय नहीं लगेगा।

बहरहाल बाबा के एक के बाद एक सधे हुए कदम से साफ जाहिर होने लगा है कि बाबा रामदेव के मन मस्तिष्क में देश पर राज करने की इच्छा बहुत पहले से ही थी। उन्होंने योग का माध्यम चुना और पहले लोगों को इसका चस्का लगाया। जब लोग योग के आदी हो गए तो योग गुरू ने अपना असली कार्ड खोल दिया। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की स्थापन के पीछे यही उद्देश्य प्रतीत हो रहा है। अब बाबा रामदेव ने इसके कार्यकर्ताओं से ज्यादा से ज्यादा सदस्य बनाने का आव्हान कर डाला है। बाबा के कदमों को देखकर यही कहा जा सकता है कि ``योग तो एक बहाना था, बाबा रामदेव का असल मकसद तो राजनीति में आना था।``

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

अटल, राजनाथ से किनारा करती भाजपा

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

अटल, राजनाथ से किनारा करती भाजपा

भाजपा के नए निजाम गडकरी के लिए इन्दौर की ओमेक्स सिटी में हुए तीन दिनी सम्मेलन में भाजपा अपने आदर्श और पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी बाजपेयी तथा निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह से किनारा करते ही नज़र आई। इस सम्मेलन के मुख्य द्वार पर नए अध्यक्ष गडकरी के साथ राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवानी के ही चित्र नज़र आए। इसमें निर्वतमान अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी गेट पर दिखाया नहीं गया। सम्मेलन में जिस तरह से आडवाणी का महिमा मण्डन और बाकी पूर्व अध्यक्षों की उपेक्षा की गई उसके बाद से राजनैतिक फिजां में तरह तरह की चर्चाओं के बाजार गर्मा गए हैं। लोग तो यह तक कहने से नहीं चूक रहे हैं कि आडवाणी के बाहुपाश में बंधे नितिन गडकरी आने वाले समय में नितिन आडवाणी प्राईवेट लिमिटेड बनाकर ही छोडेंगे। भले ही लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद आडवाणी ने तज दिया हो पर प्रधानमन्त्री बनने की उनकी ललक में कहीं कमी नहीं आई है। चर्चा है कि पिछली बार लोकसभा चुनावों में बुरी तरह पिटने के बाद अब आडवाणी की चाहत देश भर में एक अलग छवि बनाने की है, और इसी मिशन के तहत अब पार्टी ने अटल बिहारी बाजपेयी से किनारा कर लिया है, साथ ही अपने पूर्व अध्यक्षों को भी हाशिए पर लाकर सिर्फ और सिर्फ आडवाणी को ही प्रोजेक्ट किए जाने की कार्ययोजना बनाई जा रही है।

महामहिम के आदेश से हिमाचल सरकार सकते में
देश में सबसे बडे संवेधानिक पद महामहिम राष्ट्रपति का फरमान हो या उनके कार्यालय का, बात एक ही मानी जाती है। महामहिम कार्यालय के फरमान ने हिमाचल प्रदेश की सरकार को संशय में डाल दिया है। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के सारी गांव का 12वीं पास युवा निरंजन कुमार चाहता है कि उसे एक दिन का राष्ट्रपति या मुख्यमन्त्री बनना चाहता है। इस हेतु उसने महामहिम राष्ट्रपति को आवेदन कर एक दिन के लिए देश का राष्ट्रपति बनाने की गुहार लगाई है। निरंजन ने आगे कहा है कि अगर उसे एक दिन का राष्ट्रपति राष्ट्रपति नहीं बनाया जा सकता है, तो कम से कम उसे एक दिन का मुख्यमन्त्री ही बना दिया जाए ताकि वह कुछ करके दिखाए। निरंजन ने अपने आवेदन में एक दिन में देश के विकास और गरीबी दूर करने के सुझाव भी दिए हैं। उसने अपने आवेदन में कहा है कि देश में बहुत सारी एसी प्रतिभाएं हैं जो एक दिन में देश का विकास कर सकतीं हैं। इस आवेदन को राष्ट्रपति सचिवालय की बेलगाम नौकरशाही ने अिग्रम कार्यवाही के लिए हिमाचल सरकार को अग्रेषित कर दिया है। अब हिमाचल सरकार को समझ में नहीं आ रहा है कि अिग्रम कार्यवाही के मायने आखिर क्या हैं।

बंगाल के खाते में रहेगा इस बार का बजट
आम बजट आने को है, इस बार का समूचा बजट पश्चिम बंगाल के चुनावों के मद्देनज़र वहां समर्पित किया जा सकता है। इसका सबसे बडा कारण वित्त मन्त्री प्रणव मुखर्जी और रेल मन्त्री ममता बनर्जी का पश्चिम बंगाल से होना है। वैसे भी रेलमन्त्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने अपना सारा ध्यान बंगाल पर ही केन्द्रित कर लिया है। ममता तो बाकायदा अपना कार्यालय बंगाल से ही चला रहीं हैं। उन्होंने अपने पार्टी के मन्त्रियों को भी बंगाल पर ध्यान देने की बात कही है। बंगाल में रेल मन्त्रालय द्वारा जारी किए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों में कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमन्त्री डॉ मनमोहन सिंह की तस्वीरें हटा दी गईं हैं। वहीं दूसरी और कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केन्द्र 10 जनपथ के सूत्रों की मानें तो बंगाल के चुनावों को मद्देनज़र रख प्रणव दा ने सोनिया को इसके लिए राजी कर लिया है कि वे अपना खजाना बंगाल के लिए खोल दें, अगर एसा हुआ तो देश के अन्य सूबों का दुर्भाग्य ही होगा, क्योंकि जो मन्त्री जिस सूबे से है, वह अपने सूबे को ठेंगा ही दिखा रहा है।

खून की होली की तैयारी में नक्सलवादी
देश में नक्सलवाद आग की तरह फैलता जा रहा है। लाल दायरा धीरे धीरे समूचे भारत को अपने आगोश में लेते जा रहा है। छत्तीसगढ में नक्सलवाद तेजी से उभरता जा रहा है। गुप्तचर एजेंसी के सूत्रों की मानें तो छत्तीसगढ से साढे छ:: सौ नक्सलवादियों का जत्थ होली पर तबाही मचाने के उद्देश्य से बिहार और बंगाल के अनेक इलाकों में घुस गए हैं। बताया जाता है कि ये सभी भाकपा माओवादी के हमलावर दस्ता पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के सदस्य हैं। कहते हैं कि ये सभी हर मामले में दक्ष हैं। छत्तीसगढ में केन्द्रीय सुरक्षा बल के दबाव बढने के उपरान्त ये नक्सलवादी यहां से कूच कर गए हैं। बिहार के सिल्दा में माओवादी हमले में 24 जवानों और जमुई में 12 लोगों की मौत हुई है। सूत्रों का कहना है कि इस बार होली में ये बुरी तरह आतंक बरपा सकते हैं।

रीढ विहीन हैं फिकरमन्द
देश का दुर्भाग्य है कि सरकार के अधिकांश मन्त्री पिछले रास्ते अर्थात राज्यसभा से संसदीय सौंध तक पहुंचे हैं, अर्थात जिन्हें जनता द्वारा नकारा गया है, या जो जनता का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं, वे देश के नीति निर्धारक बने बैठे हैं। अब देश के पांच मन्त्रियों को यह चिन्ता सताए जा रही है कि वे अगली बार कैसे अपनी लाल बत्ती को बरकरार रख पाएंगे। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी के चहेते प्रतिरक्षा मन्त्री ए.के.अंटोनी,, उद्योग मन्त्री आनन्द शर्मा, खेल मन्त्री एम.एस.गिल, वन एवं पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश और सबसे खराब परफार्मेंस वालीं अंबिका सोनी इस साल रिटायर हो रहीं हैं। इसके अलावा इस साल 65 राज्य सभा सदस्यों की सदस्यता समाप्त हो रही है। सभी का दुबारा पुनर्वास सम्भव प्रतीत नहीं हो रहा है। खासकर खेल मन्त्री एम.एस.गिल, सूचना प्रसारण मन्त्री अंबिका सोनी और पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश की कारगुजारियों से पार्टी के आला नेता खुश नहीं दिख रहे हैं।

दिग्गी में दिखती अर्जुन की छवि
पूर्व केन्द्रीय मन्त्री अर्जुन सिंह को बीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में कांग्रेस का कूटनीतिक चाणक्य माना जाता था। ढलती उमर के चलते उन्हें राजनीतिक बियावान से शून्य की ओर धकेल दिया गया है। अर्जुन खामोश हैं, लोगों को बहुत आश्चर्य है। इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के दूसरे नंबर के ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह में लोग अर्जुन सिंह का अक्स ढूंढते मिल रहे हैं। माना जा रहा है कि अब अर्जुन सिंह की तर्ज पर ही दिग्विजय सिंह चाणक्य बनने की जुगत में हैं। उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को साधने की महती जवाबदारी दिग्गी के कांधो पर डाली गई। अर्जुन सिंह की राह पर ही चलते हुए उन्होंने बटाला एनकाउंटर और आजमगढ मामले में जमकर सियासत की। इतना ही नहीं भारी विरोध के बावजूद न केवल दिग्गी राजा वहां गए वरन अब तो वे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी आजमगढ ले जाने की तैयारियों में जुट गए हैं। कांग्रेस के वर्तमान गांधी (राहुल और सोनिया) को साधकर राजा दिग्विजय सिंह ने ``एक साधे सब सधें`` की कहावत को चरितार्थ कर दिया है।

बिग बी के निशाने पर मीडिया
मीडिया और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की दोस्ती और बैर कोई नया नहीं है। बिग बी की तारीफों और आलोचनाओं से सदा ही मीडिया पटा पडा रहता है। अब अपनी इकलौती बहू को लेकर मीडिया और बिग बी आमने सामने हैं। मुम्बई मिरर में यह खबर आई कि एश्वर्या राय बच्चन को पेट का कैंसर है, इसलिए वे फिलहाल मां नहीं बन सकतीं। जैसे ही यह खबर फिजां में तैरी वैसे ही मीडिया की सुर्खियां बनते देर नहीं लगी। इससे अमिताभ बच्चन का परिवार बहुत आहत हुआ है। एशवर्या ने एक खत जारी कर यह पूछा है कि बिना पुष्टि के इस तरह की खबर जारी कर किसी का माखौल उडाने का आखिर क्या मतलब है। लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि अमर सिंह और अमिताभ की मित्रता के चलते हो सकता है कि समाजवादी पार्टी के नए मैनेजरों ने इस तरह की प्लांट खबर फिजां में तैरा दी हो। अभिषेक बच्चन ने टि्वटर पर टिप्पणी की है कि मीडिया ने पहले भी उनके और उनके पिता अमिताभ बच्चन के बारे में अनर्गल बातें कहीं हैं, जो बर्दाश्त की जा चुकी हैं पर घर की महिलाओं को तो कम से कम इस तरह के दुष्प्रचार से दूर रखा जाना चहिए।

मान गए कोडा को
करोडों रूपयों के घोटाले के आरोप में जेल की सलाखों के पीछे बैठे मधु कोडा भले ही अपने भाग्य और करनी को कोस रहे हों पर केन्द्र में कांग्रेसनीत सरकार उन पर जबर्दस्त तरीके से मेहरबान नज़र आ रही है। सी.पी.जोशी के नेतृत्व वाला ग्रामीण विकास मन्त्रालय आज भी अपने संसदीय सलाकार बोर्ड में उनके ओहदे को बरकरार रखे हुए है। कोडा इस समिति में स्थाई आमन्त्रित की हैसियत से हैं। मजे की बात तो यह है कि इस समिति के सदस्य कांग्रेस की नज़र में भविष्य के प्रधानमन्त्री राहुल गांधी भी हैं। जेल में रहने के कारण वे इस समिति की बैठक में भाग नहीं ले पाए हैं पर वे चाहें तो विशेषाधिकार के तहत इसमें भाग लेने की मंशा जता सकते हैं, और अगर उन्होंने इस तरह की मंशा जताई तो केन्द्र सरकार मुश्किल मे पड सकती है। उधर बिना धार का विपक्ष सब कुछ जानते बूझते इतने अहम मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठा है।

रक्षक बने भक्षक
पुलिस का काम आम जनता की जान माल की रक्षा का होता है। पुलिस के द्वारा आम जनता के जान माल को लूटना कोई नई बात नहीं है। पिछले दिनों मध्य प्रदेश के कटनी जिले में जो हुआ है, वह खाकी वदीZ पर काले दाग से कम नहीं है। फिर भी सूबे के मुख्मन्त्री शिवराज सिंह चौहान नीरो की तरह चैन की बंसी बजा रहे हैं। कटनी जिले के बरतारा बरतरी गांव में पुलिस का कहर टूटा एक दलित महिला पर। पुलिस ने एक महिला को ज़िन्दा ही जलाने का प्रयास किया। यह मामला संगीन अपराध की श्रेणी में आता है। यह सच है कि इस काम को अंजाम दिया है पांच पुलिस कर्मियों ने पर भरोसा तो सूबे के समूचे पुलिस महकमे के उपर से उठा है। इन पांचों को सजा मिलेगी या नहीं यह समय ही बताएगा पर इनके खिलाफ क्या कार्यवाही की जा रही है, यह आम जनता के सामने आना जरूरी है। इनके खिलाफ कठोरतम कार्यवाही होना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की हरकत करने के पहले खाकी धारण करने वाला लाख मर्तबा सोचे।

आखिर क्या बला है बीटी बैगन
इन दिनों बीटी बैगन का मामला मीडिया में छाया हुआ है। हर कोई बीटी बैगन का जिकर कर रहा है। चौक चौराहों पर बीटी बैगन का चर्चा आम है। बीटी बैगन, जयराम रमेश के बारे में तो लोग बढ चढकर बात कर रहे हैं, पर बीटी बैगन है क्या बला यह कोई बताने को राजी नहीं है। दरअसल जमीन में पाए जाने वाले एक बैक्टीरिया बेसिलस थुरिंजिएिन्सस अर्थात बीटी के एक जीन को निकालकर बैगन में प्रत्यारोपित कर दिया गया है। यह जीन एक खास तरह के प्रोटीन का निर्माण करता है, जिसकी वजह से बैगन के मूल गुणों में परिवर्तन हो जाता है। यह जीन फसल को कीडों से भी बचाता है, इसीलिए इस जीन की मदद से तैयार बैगन को बीटी बैगन कहा गया है। इसी जीन का प्रयोग कर देश में बीटी काटन का निर्माण भी हो रहा है। बीटी बैगन मानव स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त है या नहीं यह अभी साफ नहीं हो सका है। पूरी दुनिया में अभी किसी भी देश में इसके उत्पादन को मंजूरी नहीं मिली है, पर भारत है कि इस मामले में श्रेय लेने की गरज से इसका उत्पादन सबसे पहले करना चाह रहा है।

यह है अजमेर का हाल सखे
के सीरियल के लिए विख्यात एकता कपूर के साथ ख्वाजा की दरगाह अजमेर में जो कुछ हुआ वे शायद ही भूल पाएं। उनके प्रशंसकों ने उनके साथ जबर्दस्त तरीके से बदसलूकी की। इतना ही नहीं भीडभाड में दरगाह परिसर में एकता का मोबाईल भी जेब तराशों ने पार कर दिया। ख्वाजा के दर पर देश विदेश से लोग अपनी मुराद मांगने या पूरी होने पर मत्था टेकने आते हैं। यहां मची लूट किसी से छिपी नहीं है। ख्वाजा के सेवक होने का दावा करने वाले काली टोपी वाले साहेबान सदा ही अपने आने वालों पर टूट पडते हैं, एवज में वे श्रृद्धालुओं को बेवकूफ बनाकर मोटी रकम भीं एंठ लेते हैं। ख्वाजा के दर पर पुलिस का सख्त पहरा है, बावजूद इसके यह सब बदस्तूर जारी रहता है। मतलब साफ है कि जो भी होता है वह पुलिस की मिली भगत से ही होता है। अरे पैसे के भूखे सरकारी नुमाईन्दो कम से कम धर्मस्थलों को तो इस सबसे महफूज रखा होता।

झूल भैया झूल तेरी टोपी मे फूल
बडा पुराना गाना है यह, यह गाना तब सुनाया जाता है जब कभी भी बच्चे को बहलाना होता है। मध्य प्रदेश का आलम भी कमोबेश इसी तरह का है। सूबे के निजाम चाहे दिग्विजय सिंह रहे हों, उमाश्री, बाबू लाल गौर या फिर शिवराज सिंह चौहान, सभी ने सूबे के बच्चों को यही गाना सुनाकर बहलाने का जतन ही किया है। सूबे में बिजली की किल्लत हद दर्जे पर है। परीक्षा सिर पर है, और गांव गांव में बिजली का टोटा है। उधर शिवराज सिंह द्वारा दिल्ली आकर दूसरे सूबों को बिजली बेचने की बात कही जाती है। समूचे मध्य प्रदेश में शहरी क्षेत्रों में बिजली की कटौती जारी है। इस कटौती से बिजली विभाग के मुख्यालय जबलपुर और भोपाल को मुक्त रखा गया है। एक समय था जब दिग्गी राजा के गढ राजगढ, कमल नाथ के छिन्दवाडा, जबलपुर और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बिजली कटौती नहीं की जाती थी। आज नक्सल समस्या सर चढकर बोल रही है, फिर भी बालाघाट, मण्डला, डिण्डोरी आदि जिलों में बिजली कटौती जारी है। बच्चे लालटेन युग की ओर लोट रहे हैं, चिमनी और भभके में पढने को मजबूर बच्चों को इक्कीसवीं सदी में भी शिवराज सिंह चौहान वही पुराना गाना झूल भैया झूल सुना रहे हैं।

पुच्छल तारा
रायपुर से स्वति खरे ने ई मेल भेजा है। जिसके अनुसार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में अध्यक्ष नितिन गडकरी द्वारा मन्दिर दो मिस्जद लो कहा गया है। दरअसल पेशे से राजनेता और उद्योगपति नितिन गडकरी के बारे में अब यह कहा जा रहा है कि वे अपने राजनेता के बजाए उद्योगपति के अनुभवों को साझा कर रहे हैं क्योंकि बाजार में किसी के साथ कुछ फ्री की स्कीम बडी ही कारगर साबित होती है।

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

दिग्भ्रमित लग रहे हैं भाजपा के आला नेता

दिग्भ्रमित लग रहे हैं भाजपा के आला नेता
कभी मन्दिर, कभी युवा तो कभी किसान पर जाकर टिक जाती है नेताओं की नज़रें
इस बार कमजोर विपक्ष साबित हुई भाजपा
सत्ता प्राप्ति हुई अहम, जनसेवा हुई गौड
(लिमटी खरे)

भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ जिस तेजी से उपर उठा था, पिछले एक दशक में उतनी ही तेजी से अब वह रसातल की ओर जाता प्रतीत हो रहा है। पार्टी का एजेण्डा इन दिनों क्या रहा कोई भी ठीक तरीके से नहीं बता सकता है। इसका कारण भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेताओं का सत्ता संघर्ष कहा जा सकता है। यह सच है कि किसी की छवि बनाने और बिगाडने में मीडिया की बडी भूमिका रहती है, और मीडिया को अपने निहित स्वार्थों के लिए साध साधकर भाजपाई नेताओं ने पार्टी के बजाए खुद को स्थापित करने के प्रयास किए हैं।
अब भाजपा की लगाम बहुत साधारण कार्यकर्ता रहे नितिन गडकरी के हाथों में सौंपी गई है। गडकरी की भविष्य की योजनाएं क्या हैं और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने क्या रोडमेप तैयार किया है, यह तो भविष्य में ही साफ हो सकेगा, किन्तु अब भाजपा का नया एजेण्डा राम मन्दिर, गंगा शुद्धिकरण और कश्मीर जैसे मुद्दे पर आकर टिक गया है। राम के नाम को भुनाकर एक बार भाजपा सत्ता की मलाई चख चुकी है, किन्तु सत्ता में आने के बाद वह अपने मुद्दे से भटक गई थी। अब दुबारा राम नाम के सहारे भाजपा की हिचकोले खाती नैया से वेतरणी पार करने का प्रयास जारी है।
इन्दौर में हुए तीन दिनी महाकुंभ में हुए मन्थन के उपरान्त जो तथ्य निकलकर आए हैं, उनसे यही समझा जा सकता है कि भाजपा किसी भी कीमत पर आम आदमी की परवाह के स्थान पर अब येन केन प्रकरणेन सत्ता हासिल करना चाह रही है। भाजपा के आला नेता भूल चुके हैं कि राम मन्दिर का मुद्दा अब शायद प्रासंगिक ही नहीं बचा है। 1992 में बावरी ढांचे के दौरान युवाओं ने जो जोश खरोश दिखाया था, वे अब 18 साल बाद अधेडावस्था को पा चुके हैं। उनके मानस पटल से बाबरी विध्वंस की यादें और उसके बाद भाजपा का यू टर्न विस्मृत नहीं हुआ होगा।
रही बात अब शिव की जटा से निकली गंगा मैया के शुद्धिकरण की तो भाजपा को देश की जनता को यह बताना ही होगा कि जब छ: साल वे सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर थे तब उन्होंने गंगा के लिए क्या किया। जनता यह सवाल अवश्य ही पूछेगी कि आखिर अब गंगा की याद कैसे आई और अब क्या यह राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवानी की जटा से निकलने वाली है। कश्मीर मुद्दा अवश्य ही प्रासंगिक माना जा सकता है। इस मामले में भी भाजपा का सत्ता में रहते हुए इतिहास मौन ही है। 2004 के बाद भाजपा विपक्ष में है, पर भाजपा के प्रदर्शन को देखकर कहा जा सकता है कि भाजपा एक कमजोर विपक्ष के तौर पर अपनी छवि बना सकी है।
तीन दिनी माथा फोडी के बाद एक तथ्य उभरकर साफ तौर पर सामने आया है कि इन तीन दिनों में भाजपा के आला नेताओं ने अपनी अलग अलग भाव भंगिमाएं दिखाकर मीडिया की सुर्खियों में रहने का प्रयास तो अवश्य किया है, किन्तु अन्तिम छोर के आम आदमी के लिए उसके जेहन में कितनी चिन्ता है, इस बारे में चर्चा की फुरसत भाजपा को नहीं मिल सकी, जो अपने आप में आश्चर्यजनक मानी जा सकती है।
भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता और वंशवाद के लिए कल तक कांग्रेस को ही पर्याय माना जाता रहा है, अब भाजपा भी उसी राह पर चली पडी है। भाजपा में भी इस तरह के गम्भीर रोग लग चुके हैं, जिनके इलाज के प्रति भाजपा संजीदा नहीं दिखाई पड रही है, यही कारण है कि भाजपा को कांग्रेस का भगवा संस्करण भी माना जाने लगा है। नाराजगी के चलते भाजपा के अनेक नेताओं ने इन्दौर सम्मेलन से किनारा करना ही उचित समझा।
उधर भाजपा के पितृ संगठन माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भाजपा के लिए जो कार्ययोजना तैयार की थी उसमें भी पलीता लगाने के प्रयास आरम्भ हो गए हैं। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत चाहते हैं कि टीम गडकरी में उन लोगों को शामिल किया जाए जो भाजपा में कायाकल्प करने का माद्दा रखते हों। संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो संगठन में अंगद की तरह पांव जमाए बैठे कुछ आला नेताओं की छुट्टी के हिमायती हैं संघ प्रमुख।
होना यह चाहिए कि टीम गडकरी में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोश, राजनाथ सिंह, अनन्त कुमार, वेंकैया नायडू अब मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाएं। इसके साथ ही साथ संगठन में उन चेहरों को तवज्जो दी जानी चाहिए जो कार्यकर्ताओं और जनता से बेहतर संवाद कायम कर सकें। गडकरी की ताजपोशी वैसे भी गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र कुमार मोदी को रास नहीं आई है। यही कारण है कि उन्होंने गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद उनसे जाकर सौजन्य भेंट करना तक उचित नहीं समझा। संघ जिन नेताओं को टीम गडकरी का हिस्सा बनाना चाह रहा है, उनकी राह में भाजपा के आत्म केन्द्रित नेताओं द्वारा शूल बोने के काम भी किए जा रहे हैं।
कुल मिलाकर इन्दौर के महाकुंभ के बाद यह साफ हो गया है कि भाजपा का एजेण्डा अब सत्ता प्राप्ति ही रह गया है। भाजपा के दिग्भ्रमित आला नेता अपने घालमेल वाले एजेण्डे को लेकर भविष्य की कार्ययोजनाएं बनाने में जुटे हुए हैं। यह सब देखकर भाजपा की आने दिनों वाली राह बहुत ही धुंधली ही नज़र आ रही है।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

आशा और आंगनवाडी कार्यकर्ताओं ने दिखाई जागरूकता और जीते इनाम

आशा और आंगनवाडी कार्यकर्ताओं ने दिखाई जागरूकता और जीते इनाम

मल्टीमीडिया अभियान में आंगनवाडी कार्यकर्ता सम्मेलन संपन्न

विदिशा 16 फरवरी। केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय के विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय डीएवीपी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और भारत निर्माण योजनाओं पर आधारित मल्टी मीडिया जनजागरण अभियान के आज दूसरे दिन आंगनवाडी और आशा कार्यकर्ताओं का सम्मेलन किया गया।
जिला महिला और बाल विकास विभाग और क्षेत्रीय प्रचार निदेशालय डीएफपी के संयुक्त संचालन में विशेषज्ञों द्वारा आशा और आंगनवाडी कार्यकर्ताओं को विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी गई। सम्मेलन में डीएफपी के श्री डी.एन.अग्निहोत्री ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और भारत निर्माण योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने आंगनवाडी और आशा कार्यकर्ताओं को ग्रामीण विकास और बेहतर स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करने के सुझाव दिए।
इस मौके पर महिला बाल विकास विभाग की सुपरवाईजर श्रीमति संध्या विठोलिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सम्मेलन में विदिशा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत आंगनवाडी और आशा कार्यकर्ता बडी संख्या में शामिल हुए। उन्होंने मंच पर पूछे गए शत प्रतिशत जवाब देकर अपनी जागरूकता का परिचय दिया।
इस अवसर पर डीएफपी की सागर और छिन्दवाडा इकाई द्वारा प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया, जिसमें विजेताओं को पुरूस्कार भी बांटे गए। सम्मेलन में आयी सभी आशा आंगनवाडी कार्यकर्ताओं ने डीएवीपी द्वारा लगाई गई स्वास्थ्य ग्राम स्वस्थ्य राष्ट्र एवं भारत प्रगति की ओर प्रदर्शनी का अवलोकन किया। मंगलवार को भी बडी संख्या में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों ने डीएवीपी द्वारा आयोजित प्रदर्शनी का अवलोकन किया
आज के कार्यक्रम
दोपहर एक बजे से पंच सरपंच सम्मेलन
दोपहर दो बजे से निशुल्क् होम्योपैथी चिकित्सा परामर्श शिविर जिसमें भोपाल के होम्योपैथी चिकित्सक मौजूद रहेंगे।

कांग्रेस का भगवा संस्करण बनकर रह गई है भाजपा

कांग्रेस का भगवा संस्करण बनकर रह गई है भाजपा 
नारे लगाने में उत्साद हैं भाजपाई
 
ये है भाजपा की चाल, यह चरित्र और यह रहा चेहरा
 
(लिमटी खरे)

भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम नितिन गडकरी के लिए मध्य प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी माने जाने वाले इन्दौर शहर का उपनगरीय इलाका सज धज कर तैयार है। भाजपा के पिछले एक दशक के कार्यकाल को देखकर लगने लगा है मानो यह कांग्रेस का भगवा संस्करण ही बनकर रह गई है। वर्तमान समय में सत्ता प्राप्ति के लिए हर स्तर पर जाने आमदा भाजपा द्वारा अपने सिद्धान्तों के साथ अनेक समझौते किए हैं और यह मुख्य धारा से भटकती दिख रही है।
पूर्व में भाजपा द्वारा सबसे अलग दिखने का दावा किया जाता रहा है। आज भाजपा सबसे अलग दिखने की बजाए अन्य राजनैतिक दलों की पिछलग्गू ही दिखाई पड रही है। भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों की झण्डाबरदार भाजपा के जितने निजाम बदले उन्होंने हर बार एक नया स्लोगन दिया पर उस बात पर कायम नहीं रह सकी। कभी सौगंध राम की खाते हैं, हम मन्दिर वहीं बनाएंगे का गगन भेदी नारा लगाने वाली भाजपा ने जब अयोध्या में राम मन्दिर बनाने की बात आई तो अपने हाथ खीच लिए। मजे की बात तो यह है कि जब केन्द्र में भाजपानीत एनडीए और उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार थी, तब भाजपा ने यह कहकर मामले को ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया था कि मन्दिर मुद्दा एनडीए के मेनीफेस्टो का हिस्सा नहीं है।
फिर अत्याचार न भ्रष्टाचार, हम देंगे अच्छी सरकार, का नारा बहुत चला। इस नारे को जब अमली जामा पहनाने की बारी आई तो भाजपा टांय टांय फिस्स ही हो गई। भाजपा का समूचा कार्यकाल चाहे केन्द्र में रहा हो या सूबों में सदा ही भ्रष्टाचार के लिए चर्चित रहा है। ताबूत, शक्कर, दूरसंचार, यूटीआई जैसे बडे घोटालों के दाग अभी भी भाजपा के धवल आंचल से धुल नहीं सके हैं। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके शिबू सोरेन से भी हाथ मिलाने में भाजपा ने कोताही नहीं की।
जिस एनरान को अरब सागर में डुबो देने की बात भाजपा द्वारा की जा रही थी, उसी एनरान के साथ भाजपा ने समझौता किया। भाजपा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार इस कदर सडांध मार रहा है कि कहा नहीं जा सकता, बावजूद इसके भाजपा के आला नेता खामोशी अिख्तयार किए हुए हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में नौकरशाहों ने अत्त मचा रखी है। सरकारी योजनओं में सरेआम डाका डाला जा रहा है। जनता हलाकान है पर भाजपा के आला नेता नीरो के मानिन्द चैन की बंसी बजा रहे हैं।
मध्य प्रदेश में अरविन्द जोशी और टीनू जोशी तो छत्तीसगढ में बाबू लाल अग्रवाल के लाकर करोडों रूपए उगल रहे हैं। भाजपा के जनसेवक माल अंटी करने में लगे हुए हैं, पर शीर्ष नेतृत्व इसी जुगाड में है कि किस तरह केन्द्र में सत्ता में आया जाए और 7 रेसकोर्स (प्रधानमन्त्री का सरकारी आवास) पर कब्जा जमाया जाए। अगर देखा जाए तो आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस की तरह ही अब भाजपा ने भी आम आदमी की चिन्ता छोड दी है।
चुनाव आते ही अल्पसंख्यकों को रिझाने की गरज से भाजपा अपनी पार्टी लाईन से भटकती ही दिखाई देती है। जब भी कोई राजनैतिक दल के आला नेता रमजान के दौरान रोजा अफ्तार पर जाते हैं, तो भाजपाई चीख चीख कर कहते हैं कि यह मुसलमानों के तुष्टीकरण की नीति है, पर जब अफ्तार की दावत अटल बिहारी बाजपेयी या एल.के.आडवाणी के घर पर होती है तब इसे क्या कहा जाएगा।
विडम्बना ही कही जाएगी कि भाजपा द्वारा हमेशा जिन मुद्दों को आधार बनाकर कांग्रेस या अन्य राजनैतिक दलों की आलोचना की जाती रही है, आज उन्हीं मार्गों पर भाजपा ने कदम बढा दिए है। कितने आश्चर्य की बात है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत अफसरान को उपकृत करने के लिए भाजपाई मुख्यमन्त्रियों द्वारा प्रोटोकाल तक को ताक पर रख दिया जाता है। मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी विकास मन्त्री अनूप मिश्रा राज्य मन्त्री थे, उस समय सेवानिवृत मुख्य सचिव आदित्य विजय सिंह को केबनेट का दर्जा दे दिया गया था। इतना ही नहीं वर्तमान में उर्जा मन्त्री राजेन्द्र शुक्ला हैं, ये स्वतन्त्र प्रभार वाले राज्य मन्त्री हैं, तो सेवानिवृत्त मुख्य सचिव राकेश साहनी को उनका सलाहकार बनाया गया है। यहां एक बार फिर विसंगति सामने आ रही है। मन्त्री राज्य मन्त्री स्तर के तो उनके सलाहकार राकेश साहनी को दिया गया है केबनेट मन्त्री का दर्जा। अर्थात राज्य मन्त्री के अधीन केबनेट मन्त्री काम करेंगे।
रही बात अत्याचार की तो गुजरात में नरेन्द्र मोदी के गोधरा काण्ड से भाजपा की रीति नीति उजागर होती है। वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश में पिछली बार जब भाजपा सरकार काबिज हुई थी, तब सिवनी जिले के भोमाटोला ग्राम में एक ही दलित परिवार की महिलाओं के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना लोगों के दिमाग से विस्तृत नहीं हुई होगी, कि किस कदर उच्च वर्ग के परिवारों द्वारा सरेआम गांव वालों के सामने इन महिलाओं के साथ बलात्कार किया था।
अब जबकि 17 फरवरी से मध्य प्रदेश के इन्दौर में भाजपा की तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यपरिषद की बैठक का आयोजन किया जा रहा है, तब मीडिया में तरह तरह के कायस लगाए जा रहे हैं कि भाजपा के नए निजाम अपनी किन किन रणनीति को अमली जामा पहनाने का प्रयास करेंगे। हो सकता है नितिन गडकरी के दिलो दिमाग में कुछ नया करने का अरमान हो, किन्तु अब तक के निजामों ने कुछ नया नहीं किया है। इस लिहाज से यही कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी और कुछ नहीं वरन् कांग्रेस का भगवा संस्करण ही बनकर रह गई है।