काम की आड़ में आराम के मूड में दिख रहे मंत्री
यूरोप अमरिका की सरकारी यात्राओं के हो रहे मार्ग प्रशस्त
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। अप्रेल माह में जब सूर्य देव अपना कहर दिखाना आरंभ करते हैं तब देश की दिशा और दशा तय करने वाले मंत्रियों की बेचैनी बढ़ने लगी है। मई में जब भगवान भास्कर अपने पूरे शबाब पर होते हैं तब यूरोप और अमरिका की हसीन वादियों की ठंडी हवाओं का मजा ही कुछ और होता है। यही कारण है कि दिल्ली में मंत्रियों के स्टाफ द्वारा अपने हाकिमों की विदेश यात्रायों के मार्ग प्रशस्त किए जाने लगे हैं।
गौरतलब है कि सर्दियां आते ही भारत गणराज्य के मुक्त गगन में विदेशी विशेषकर साईबेरियन पक्षियों की तादाद अचानक ही बढ़ जाती है। उसी तरह मई जून माह में भारत की गर्मी से आजिज आकर ठंडे प्रदेशों की ओर पलायन करने वाले मंत्रियों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा महसूस किया जाता है।
विदेश यात्रा के दौरान तीन फायदे हुआ करते हैं। एक तो ठंडी हवाएं परेशान नहीं करतीं, दूसरे इसी बहाने सरकारी काम काज निपटाना और तीसरा और अंतिम तथा अटल उद्देश्य कि इसी बहाने विदेशों में फैले अपने कारोबारों की मानिटरिंग भी हो जाती है। विदेश यात्राओं के लिए चर्चित अनेक मंत्रियों का स्टाफ इन दिनों परेशानी में है, इसका कारण इस साल जनवरी में हुआ मंत्रीमण्डल फेरबदल है। नए विभागों में गए कुछ मंत्रियों का विभागीय प्रोफाईल ही एसा है कि उसमें विदेश यात्रा का क्या काम? फिर भी नए सिरे से सरकारी खच्र पर विदेश जाने का जुगाड़ खोजा ही जा रहा है।
उधर मई आते आते वित्त मंत्रालय का बटुआ बुरी तरह कंपकपाने लगता है। आखिर इन सरकारी कम निजी यात्राओं का भोगमान तो आखिर उसे ही भोगना है। मंत्री निश्चिंत दिख रहे हैं, क्योंकि मंदी का दौर गया, और सादगी के प्रहसन पर से भी पर्दा गिर चुका है। खर्च में कटौती और किफायत का फरमान प्रधानमंत्री वैसे भी वापस ले ही चुके हैं।
गौरतलब है कि सर्दियां आते ही भारत गणराज्य के मुक्त गगन में विदेशी विशेषकर साईबेरियन पक्षियों की तादाद अचानक ही बढ़ जाती है। उसी तरह मई जून माह में भारत की गर्मी से आजिज आकर ठंडे प्रदेशों की ओर पलायन करने वाले मंत्रियों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा महसूस किया जाता है।
विदेश यात्रा के दौरान तीन फायदे हुआ करते हैं। एक तो ठंडी हवाएं परेशान नहीं करतीं, दूसरे इसी बहाने सरकारी काम काज निपटाना और तीसरा और अंतिम तथा अटल उद्देश्य कि इसी बहाने विदेशों में फैले अपने कारोबारों की मानिटरिंग भी हो जाती है। विदेश यात्राओं के लिए चर्चित अनेक मंत्रियों का स्टाफ इन दिनों परेशानी में है, इसका कारण इस साल जनवरी में हुआ मंत्रीमण्डल फेरबदल है। नए विभागों में गए कुछ मंत्रियों का विभागीय प्रोफाईल ही एसा है कि उसमें विदेश यात्रा का क्या काम? फिर भी नए सिरे से सरकारी खच्र पर विदेश जाने का जुगाड़ खोजा ही जा रहा है।
उधर मई आते आते वित्त मंत्रालय का बटुआ बुरी तरह कंपकपाने लगता है। आखिर इन सरकारी कम निजी यात्राओं का भोगमान तो आखिर उसे ही भोगना है। मंत्री निश्चिंत दिख रहे हैं, क्योंकि मंदी का दौर गया, और सादगी के प्रहसन पर से भी पर्दा गिर चुका है। खर्च में कटौती और किफायत का फरमान प्रधानमंत्री वैसे भी वापस ले ही चुके हैं।

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