लूट मची है मनरेगा के कामों में . . . 2
भ्रष्टाचार का बढ़िया साधन बन चुका है मनरेगा
मानिटरिंग न होने से पौ बारह है अफसरान की
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी की महात्वाकांक्षी योजना राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (नरेगा) को बाद में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) बना दिया गया। नरेगा और मनरेगा दोनों ही में तबियत से भ्रष्टाचार होता रहा। वर्तमान में भी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से सिंचित राजस्व को जनता के नुमाईंदों द्वारा हवा में उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
ज्ञातव्य है कि रोजगार की तलाश में लोगों के पलायन को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर ही रोजगार मुहैया करवाने की गरज से कांग्रेसनीत संप्रग सरकार द्वारा नरेगा आरंभ की गई थी। बाद में इसे कानून में तब्दील कर साल में कम से कम सौ दिन का रोजगार उपलब्ध कराने का काम सुनिश्चित किया गया था। मनरेगा के साथ ही ग्रामीण स्तर पर लोगों के चेहरे खिल गए थे कि अब उन्हें रोजगार की तलाश में दूर नहीं जाना पड़ेगा। उन्हें उन्हीं के क्षेत्र में रोजगार मुहैया हो सकेगा। इस तरह वे अपने परिवार के साथ ही रहकर उनकी देखभाल और उनका लालन पालन कर सकेंगे।
जब इस योजना को अमली जामा पहनाया गया तब लोगों को असलियत पता चली। इसमें मानीटरिंग न होने से लोगों का पलायन रूक नहीं सका। इस योजना के लिए आई राशि को अधिकारियों ने बंदरबांट कर सरकारी राशि हजम कर डाली। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर तो उपलब्ध हुए किन्तु काम को श्रमिकों के बजाए मशीनों से करवाकर फर्जी मस्टर रोल से सरकारी राशि डकार ली गई।
जिला स्तर पर जिला कलेक्टर्स की अनदेखी के चलते यह योजना परवान नहीं चढ़ पाई। मनरेगा के कामों के अधिकांश ठेके भी स्थानीय स्तर पर कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के हाथों में ही रहे, यही कारण है कि राजनैतिक दलों ने अफसरों से गठजोड़ कर जनता के हक पर सीधा डाका डाला गया और पहरेदार ही इसमें शामिल रहकर मौन रहे। इस योजना की मानिटरिंग ना तो जिला कलेक्टर्स और न ही अनुविभागीय दण्डाधिकारी या राजस्व के अधिकारियों ने इसके बारे मे कोई जांच करना ही मुनासिब समझा।


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