रविवार, 13 फ़रवरी 2011

धरने की राजनीति

धरने की राजनीति


    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान 13 फरवरी से भोपाल में धरने पर बैठ रहे हैं। कारण प्रदेश में पाला पड़ने और ओला वृष्टि से फसल को हुए नुकसान की भरपाई  के लिए केन्द्र सरकार से 2442 करोड़ रु0 के विशेष पैकेज की मांग पर समय पर कोई कार्यवाही होना। श्री चौहान ने इस विषय पर प्रधानमंत्री और केन्द्रीय कृषि मंत्री से मिल कर एक ज्ञापन भी सौंपा था और उसी समय ऐलान भी कर दिया था कि केन्द्र सरकार द्वारा इस विषय पर समय रहते कोई कार्यवाही होने की स्थिति में वह उपवास पर बैठेंगे। अब यह तो समय ही बताएगा कि शिवराज जी के धरने का क्या हर्ष होगा। हमारी सद्भावनाएं उनके साथ हैं।
    अगर हम एक आम नागरिक की भांति इस पूरे प्रकरण को देखे मामला शीशे की तरह साफ दिखता है कि पाला पड़ने और ओला वृष्टि से हुए प्रदेश के 50 जिलों में से 46 जिलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार केन्द्र सरकार से विशेष पैकेज की मांग कर रही है। पर मामला इतना सीधा और साफ नहीं है। धरने की राजनीति देश में अपनाया जाने वाला पुराना हथकंडा है जो विभिन्न पार्टी के नेता समय-समय पर अपनी जरूरत के हिसाब से अपनाते हैं। इस हथकंडे को विभिन्न श्रमिक संगठन और सरकारी संगठन कर्मचारियों के नियमितिकरण का मामला हो या फिर डी.. की किश्त जारी करने का मामला हो, सब संगठन पूरी राजनीति करते हैं और इसका भरपूर लाभ उठाते हैं।
    यह बात अलग है कि मध्य प्रदेश में पिछले कुछ महीनों से किसान द्वारा आत्महत्या करने के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है, यह एक चिन्ता का विषय है और इसको गंभीरता से लेना चाहिए। इन आत्महत्या के मूल कारणों में जाने की जरूरत है। इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक परिवेश में समझने की जरूरत है ताकि किसानों से जुड़ी समस्याओं का निराकरण समय रहते किया जा सके।

    इस पूरे विषय पर किसानों के हमदर्द बनने के लिए मानो कोई होड़ सी लगी है, जिसमें सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष भी इससे अछूता नहीं है। विपक्षीय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी पीछे नहीं हटते, वे भी उपवास पर बैठ जाते हैं, किसानों को न्याय दिलाने के लिए। वहीं केन्द्र सरकार भी इस ओछी राजनीति से अछूती नहीं है, वह भी जो राशि सामान्यतः स्वीकृत हो कर राज्य को दी जानी चाहिए, को प्रदेश अध्यक्ष जी के अनशन को समाप्त कराकर, दो केन्द्रीय नेताओं की मौजूदगी में सहायता राशि का ऐलान किया जाता है जिससे इसका श्रेय अनशन पर बैठे प्रदेश अध्यक्ष को देती है। ऐसा लगता है कि यह नाटक का पूर्व नियोजित था।
    वहीं दूसरी तरफ एक सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अनशन को एक मेगा शो बनाने की तैयारी कर रही है। अनशन को कांग्रेस के विरूद्ध हथियार बनाने के मकसद से पार्टी हर दिन अलग-अलग इलाकों से एक से दो हजार कार्यकर्ता मुख्यमंत्री का साथ देंगे, उम्मीद है कि दिल्ली से पार्टी के बड़े नेता भी आएंगे। यह बात अलग है कि मध्यप्रदेश सरकार केन्द्र द्वारा आपदा राहत कोष से दी गई राशि को अभी तक पूरी तरह खर्च ही नहीं कर पाई और प्रदेश के कृषि मंत्री किसानों की आत्महत्याओं को उनके पूर्व जन्म के कर्मों से जोड़ रहे हैं। इससे सरकार की मंशा पूरी तरह से साफ हो जाती है कि सरकार किसानों की कितनी बड़ी हितेषी है।
    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का 13 फरवरी को अनशन पर बैठने पर भी राजनीति है। प्रदेश में 14 फरवरी को दो उप-चुनाव में मतदान की तारीख है और सत्तारूढ़ पार्टी इसका पूरा फायदा उठाना चाहती है। पिछली बार दोनों सीटों पर कांग्रेस काबिज थी। भाजपा के नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष किसी भी प्रकार से इन सीटों पर विजयी होना चाहते हैं, जिससे जीत का सेहरा प्रदेश अध्यक्ष को जाए। प्रदेश अध्यक्ष पद पर काबिज होने के बाद प्रदेश में यह पहला उपचुनाव है।

    कुल मिलाकर देखा जाए तो किसानों की समस्या एक तरफ और सिर्फ राजनीति ही राजनीति है, पार्टी कोई भी हो। किसानों द्वारा की गई आत्महत्याएं हों या किसानों से जुड़ी अन्य समस्याएं हों, इससे किसी को भी कोई मतलब नहीं, सिर्फ विषय उठाकर राजनैतिक रोटियां सेंकना ही मकसद रह गया है। कोई नहीं सोंचता है कि धरने पर बैठने से क्या उनकी मूल समस्याओं का निवारण हो सकेगा। उनकी समस्याएं तो वही कि वही रहेंगी। क्यों नहीं कोई इस विषय पर पार्टी लाइन से हटकर ठोस निर्णय नहीं लेता और अपनी संकीर्ण सोच से परे हटकर किसानों के हित के लिए दीर्घकालीन योजना बनाते जिससे कि किसानों का उद्धार हो, इन्हीं के उद्धार होने से हमारा देश प्रगति के अग्रसर होकर सफलता की नई उचाईयां छुएगा। किसान कोई राजनीति का मोहरा नहीं है, वह हमारे देश के विकास की आधारशिला है।

sanjayadrishti9@gmail.com



मेरे देष का न्याय

मेरे देष का न्याय


अभी कुछ दिन पूर्व एक प्रतिप्ठित अखबार में प्रकाषित खबर ‘जांजगीर छत्तीसगढ में एक व्यक्ति ने जज के सामने पैसा रख कर जल्दी फैसला सुनाने की गुहार लगाई, जिसे जज साहब की षिकायत पर पुलिस व्दारा गिरफ्तार कर लिया गया ’
 
इस घटना में माननीय जज साहब ने ईमानदारी का आदर्ष पेष कर उस गरीब दुखुराम को पुलिस के हवाले कर दिया ।
पहली नजर में यह लगता है कि यह क्या हुआ ? और इसका पटाक्षेप ऐसा ही होना था, पर दुबारा सोचने पर उस पीडित की मनःस्थिति पर ध्यान जरुर जाता है जो जमीन के एक टुकडे के लिए पिछले 6 साल से कोर्ट के चक्कर काट रहा था ।
क्या वजह थी कि उसके केस का निर्णय नहीं हो पा रहा था ?
 
कारण - सरकारी तंत्र की परिभापा में हजारों होंगे । कोई भी व्यक्ति खासकर ग्रामीण और गरीब जब सब जगह से थक हार जाता है तभी कोर्ट कचहरी की तरफ रुख करता है, जहॉं पर उसे अभिनेता सनी देवल के प्रसिध्द डॉयलाग ‘‘ तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख’’ ही मिलती है बनिस्बत न्याय के । यह प्रक्रिया इतनी लंबी और दुखदायी होती है कि न्याय तत्काल मिल भी जाता तो आज वर्पों बाद मिले न्याय से सस्ता ही होता ।
दुखुराम का कृत्य न्यायालीन प्रक्रिया पर करारा तमाचा इस संदर्भ में है कि पहला तो वह इस उम्मीद भरी लंबी होती न्याय से बेजार हो चुका है एवं दूसरा इसलिए कि कहीं न कहीं वर्तमान में न्याययलीन कार्यवाहियों के बारे में आमजन और विषिप्टजनों में भी यह बात घर कर गई कि न्याय बिकाउ होता जा रहा है। मुमकिन है कि किसी षुभचिंतक  ने या न्यायतंत्र के ही किसी सहायक व्दारा दुखुराम को यह बताया गया हो कि भई, बार बार क्यूॅं परेषान हो रहे हो, कुछ दे-दुआ कर जल्दी निपट लो । दोनों ही स्थिति में यह न्याय की ही हार है । न्यायालीन व्यवस्था में जिन दो बातों पर सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है  पहला- सौ गुनाहगार छूट जायें पर एक बेगुनाह को सजा न मिल जावे, दूसरा- देर से मिला न्याय, न्याय ही नहीं है । दोनों ही बातों में श् हर बार सौ गुनाहगार छूट जा रहे हैं और बेगुनाह घनचक्कर बन रहा है और जब तक सत्य को न्याय मिलता है तब तक वह न्याय से इतना बेजार हो चुका होता है कि सत्य को न्याय की जरुरत ही नहीं रह जाती । लाखों निरीह लोग जिनका उस जुर्म से कोई लेना देना ही नहीं है, जिसकी उन्हें सजा मिली है और तत्काल बेगुनाह या गुनाहगार होने पर जो सजा मिलती उससे ज्यादा सजा काट रहे हैं क्योंकि उनका कोई वकील नहीं, जमानतदार नहीं और उनके माथे पर अदृष्य काली स्याही से गुनाहगार लिख दिया गया है क्योंकि न्यायालय ने उन्हें बेगुनाह घोपित नहीं किया है । अभी हाल ही में एक सेवानिवृत्त श्री श्रीवास्तव जी ने अपने पेंषन की दो लाख की राषि जमानत के तौर पर जमा कर कुछ बेगुनाहों को जमानत दिलाकर उस नर्क से बाहर निकाला । क्या यह वाक्या कार्यपालिका और न्यायपालिका को कुछ यथार्थवादी प्रक्रिया अपनाने की बात नहीं बतलाता । वहीं सक्षम एवं कुछ विष्प्टि लोग  सार्वजनिक स्थलों पर भी क्रूरतम एवं भ्रप्टतम कृत्य कर, सैकडों सबूतों और गवाहों के बावजूद कुछ ही घंटों में किसी भी स्तर के न्यायालीन व्यवस्था में जमानत पा लेते हैं । आखिर  ऐसा क्यूॅं ? क्या दुखुराम पागल था ? क्या अब उसका न्याय का पथ दोराहे पर नहीं खडा हो गया है जहॉं उसे प्राथमिक स्तर पर तो न्याय मिला ही नहीं उल्टा वह दुसरे जुर्म में फॅंस गया ? क्या श्री श्रीवास्मव जी बुध्दिहीन हैं कि अपने वर्पों की नौकरी के पष्चात प्राप्त पैसे को दूसरों की जमानत पर खर्च कर रहे हैं ?
 इन दोनों ही घटनाओं को न्याय पथ के बेहद महत्वपूर्ण मोंड मानते हुए न्यायपालिका एवं कार्यपालिका में बदलाव लाना चाहिए अन्यथा चारों तरफ दुष्मन देषों से घिरे हम अपने ही घर में दुष्मन पैदा करते रहेंगे और नक्सलवाद व उग्रवाद को ही पोपित करेंगे  जिसकी जिम्मेवारी हम सभी की होगी और हम ही उसको भोगेंगे ।  ‘ सत्यमेव जयत ’े बहुत ही सुन्दर और सुखद एहसास दिलाता है पर प्रष्न है ‘‘ कब ’’ । इसका जवाब कौन देगा ?
यह ‘‘कब ’’ क्या ‘‘ कब्र ’’ ही नहीं बनता जा रहा है । एक छोटा सा
‘‘ र ’’ का फर्क है पर इस देष में जहॉं एक व्यक्ति अरबों रुपयों के आवास में रहता है और करोडों व्यक्तियों के सिर पर छत ही नहीं है,जो कुछ भी उनके  सिर पर घास-पूस, पेड- पत्ते है उसे भी उन्हीं करोडों -अरबों के आषियाने वालों को ही न्योता देकर उससे भी बेदखल किया जा रहा है ।  हमारे अन्नदाताओं-किसानों  की उपजाउ जमीनों को उद्योगों के लिए छिना जा रहा है । सीमेंट प्लॉंट , पॅावर प्लॉंट ,लौह प्लॉंट इत्यादि लगाये जा रहे हैं कि इनसे रोजगार बढेंगे । किसे चाहिए सीमेंट , पॉवर , लोहा ? जिसके पास झोंपडी तक नहीं है उसको ? अपनी ही जमीन पर लगे कारखानों में आज हमारे लाखों किसान , आदिवासी दिहाडी के मजदूर हैं । न तो उनके पास आज जमीन है, न ही इज्जत , जितनी रोटी आज खा रहा है उससे ज्यादा पहले उसे मिलती थी । सरकारें  कभी बॉंध के नाम पर तो कभी कारखानों के नाम पर , कभी विलुप्त जंगली जानवरों को बसाने के नाम पर सैकडों सालों से बसे सैकडों गावों को खाली करवाया जा रहा है । जोर जबरदस्ती और नियम- कायदे, देष के लिए सोचना , देष के लिए कुर्बानियॉं , क्या ये मात्र गरीबों पर ही लागू होती हैं क्या कभी किसी उद्योगपति या उसके परिवार के सदस्य ने इन चीजों के लिए सोचा भी है या दायित्व निभया है ? क्या सरकार कभी ऐसी नीति बनाऐगी कि बडे उद्योगपति या घराना किसी राप्टीय जरुरतों जैसे स्वास्थ्य, षिक्षा, कृपि,खाद्य,परिवहन की जिम्मेवारी बिना किसी फायदे नुकसान के उठाये ? जिस देष में 12 महिने में से 12 महिनें ही सूर्य निकलता हो वहॉं सौर्य उर्जा पर ध्यान न देकर उन स्रोतों जैसे कोयला, जल, जंगल पर जो सीमित है, महंगे हैं , जिसके कारण पर्यावरण बर्बाद होगा, लाखों गॉंव, करोडों नागरिक व्यस्थापित होंगे पर ही ध्यान क्यों केंद्रित करती रहती है ? क्या सिर्फ इसलिए कि उन उद्योगपतियों से ज्यादा लाभ दिखता है, उन्हें ‘ सस्ते लेबर ’ उपलब्ध हों ।  क्या कभी किसी भी स्थिति में किसी भी तरह मुंबई गेट वे ऑफ इंडिया के सामने स्थित तॉज होटल से टाटा को व्यस्थापित कर देष हित में नौसेना का मुख्यालय बना सकती है ?  नहीं, कभी नहीं , फिर हमारा गरीब, किसान और आदिवासी ही क्यूॅं ?
 हममें से कोई नहीं चाहता कि उसका आषियाना उजडे, न ही कोई यह चाहता है कि उद्योगपति सरकार सम्हालें, उसकी व्यवस्था सम्हालें और उन पर उनके
कार्याें को छोडकर कोई और जिम्मेवारी लादी जावे पर यह तो सरासर अन्याय है कि किसान की उपजाउ जमीन चाहिए तो चाहिए क्योंकि सरकार की रजामंदी से वहॉं पर कारखाना लगना है । दिल्ली मुंबई में एक बडा व्यक्ति मर जाये तो सरकारे हिलनें लगतीं हैं ,राप्टीय समाचार बन जाता है पर लाखों किसान आत्महत्या करते हैं, हजारों आदिवासी नक्सली हमलों में मारे जाते हैं, गॉंव का गॉंव किसी अनजानी बीमारी से तबाह हो जाता है , सरकार के कान में जॅंू नहीं रेंगती, खबर बनना तो दूर जिक्र करना भी प्राईम टाईम बौर अखबार के पन्नों की बर्बादी लगती है । इस पूरी व्यवस्था से दो वर्ग तैयार हो रहा है और उनके बीच की दूरी लगातार बढती ही जा रही हैे - हैव्स संचित  और हैव नॉट्स वंचित जो आने वाले समय में गृह युध्द की पदचाप भी सुना रही है । इसलिए लोकतंत्र के सभी स्तंभों को अभी से अपनी चतुर्य को, पक्षपातपूर्ण रवैये और मात्र मुठ्ठी भर लोगों की भलाई को छोडकर ज्यादा से ज्यादा लोगों की भलाई ,तरक्की और खुषहाली के लिए सोचना चाहिए वर्ना कितने भी ज्यादा सितारा सुविधाऐं ,हवाओं में सफर , विष्व के अमीरों में गिनती , स्वीस बैंक में जमा पॅंूजी किसी भी तरह से सुरक्षा की गारंटी नहीं है न होगी ।




व्दारा:
     डॉ. पी.डी. महंत
      पीपुल्स मेडिकल कॉलेज, भोपाल
      9300956877

धरने में शिव देख रहे हैं अपना प्रभात

धरने में शिव देख रहे हैं अपना प्रभात
किसान तो बहाना है असल मकसद उपचुनाव जिताना है
केंद्र द्वारा मिली इमदाद को पूरा खर्च भी नहीं कर पाए हैं शिवराज
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। रविवार 13 फरवरी को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठने वाले शिवराज सिंह चौहान द्वारा पाला पड़ने से खराब हुई किसानों की फसलों के एवज में राज्य सरकार द्वारा मांगे गए विशेष पैकेज की मांग पर समय पर कोई कार्यवाही न होने से धरने पर बैठा जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश को दिए गए दो सौ करोड़ रूपए के पैकेज को अभी राज्य सरकार ने पूरा खर्च भी नहीं किया है, इसके साथ ही साथ मध्य प्रदेश के उपचुनावों से भी इस धरने को जोड़कर देखा जा रहा है।
ज्ञातव्य है कि मध्य प्रदेश के 50 में से 46 जिलों में फसलों को हुए नुकसान के चलते राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार से 2442 करोड़ रूपयों का विशेष पैकेज मांगा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आंतरिक सुरक्षा के मसले पर हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा था कि राज्य सरकार ने छः सौ करोड़ रूपए तत्काल इस मद में जारी कर दिए हैं। उधर मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सुरेश पचौरी के उपवास के उपरांत कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश को दो सौ करोड़ रूपए की मदद जारी की थी।
गौरतलब होगा कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ किसानों को हर सियासी दल ने छला ही है। किसानों पर राजनीति करने से न तो कांग्रेस चूकती है और न ही भारतीय जनता पार्टी। किसान पुत्र शिवराज के कार्यकाल में किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं ने रिकार्ड बना दिया है। भारतीय जनता पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि शिवराज सिंह के इस धरने को ‘मेगा शो‘ में तब्दील करने के लिए भाजपा के बड़े नेताओं की भी इसमें शिरकत करने की तैयारी है।
उधर कांग्रेस के रणनीतिकार इस धरने को 14 फरवरी को कुक्षी और सोनकच्छ उपचुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। प्रभात झा के मध्य प्रदेश भाजपाध्यक्ष बनने के उपरांत यह पहला उपचुनाव है, जिस पर भाजपा के आला नेताओं की नजरें गड़ी हुईं हैं। दोनों ही सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती हैं। कांग्रेस का मानना है कि राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए छः सौ करोड़ एवं केंद्र सरकार द्वारा दिए गए दो सौ करोड़ से अधिक की राशि अभी शिवराज सिंह द्वारा खर्च नहीं की गई है, फिर वे दो हजार करोड़ से अधिक की मांग कर रहे हैं, पहले यह राशि व्यय कर दी जाए फिर केंद्र से आगे राशि की मांग की जानी चाहिए।

भू-माफिया को बचाने मुख्यमंत्री के विरूद्ध षडय़ंत्र?

भू-माफिया को बचाने मुख्यमंत्री के विरूद्ध षडय़ंत्र?


सिवनी सिवनी जिले के नेता भले ही जिले के विकास में अपनी ईमानदारी से भूमिका का निर्वाहन न कर सके परन्तु षडय़ंत्र करने के मामले में पीछे नहीं है। षडय़ंत्रों  के माध्यम से राजनैतिक ऊचांईयां प्राप्त करने की मृग तृष्णा के कारण सिवनी जिले के एक राजनैतिक संपन्नता प्राप्त व्यक्ति द्वारा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को कटघरे में खड़े करने का बड़ा जबरदस्त प्लान तैयार किया जा रहा है। इस प्रकार के प्लान में सत्ता धारी दल के ही व्यक्तियों के शामिल होने की बात कही जा रही है। अपनी राजनैतिक स्वार्थ पूर्ति के लिए सत्ताधारी भाजपा के एक कद्दावर नेता द्वारा इस प्रकार के षडय़ंत्र को एक अन्य राजनैतिक दल के माध्यम से सिरे चढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सिवनी जिले के कुछ भू-माफियाओं को बचाने के लिए प्रारंभिक प्रयास सफल न होने के बाद मुख्यमंत्री के परिजनों को भू-माफिया के तौर पर प्रचारित कर इस प्रकार का दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि अपनी राजनैतिक प्रभुता के चलते एक भू-माफिया जिसे पिछले दिनों गिरफ्तार किया गया है उसे जेल में न रखकर चिकित्सकीय उपचार हेतु जबलपुर मेडिकल में भर्ती कराकर जेल की चारदिवारी से बाहर रखकर सारी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। उस पूरे चार सौ बीसी के प्रकरण को कमजोर करने और आरोपी को बचाने के लिए मुख्यमंत्री पर जबरदस्त दबाव बनाने की रणनीति तैयार कर ली गई है । एक क्षेत्रीय राजनैतिक दल के माध्यम से मुख्यमंत्री के भतीजे द्वारा भोपाल में कथित तौर पर खरीदी गई करोड़ो रूपये की जमीन के मामले को प्रचारित कर सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है। मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के भतीजे द्वारा एक किसान के ऊपर अत्याचार करने और उसकी जमीन की फर्जी रजिस्ट्री कराने का कोई मामला शपथ पत्र सहित तैयार किया गया है। जिले के कुछ क्षेत्रों में भाजपा के विरूद्ध उक्त राजनैतिक दल द्वारा आंदोलन किये जायेंगे और तत्पश्चात राजधानी मुख्यालय भोपाल में आंदोलन और एफ.. आई. आर. करने की योजना तैयार की गई है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के विरूद्ध छिडऩे वाले इस आंदोलन के पीछे कोई बड़ी राजनैतिक हस्ती होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कथित तौर पर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के भतीजे द्वारा क्रय की गई या जबरन छुड़ाई गई जमीन के फोटोग्राफ और फार्महाऊस में जे.सी.बी. चलते हुए फोटोग्राफ भी बड़े-बड़े बैनरों में तैयार किये गये हैं। हालांकि जिस जमीन के सम्बन्ध में बात की जा रही है उसका वास्तविक रकबा लगभग २ एकड़ है परंतु भोपाल के पास होने के कारण इसकी कीमत करोड़ों में बताई गई है। इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी सेे सम्बद्ध जिले के कुछ नेताओं को भी भू-माफिया के तौर पर प्रचारित करने का विस्तृत कार्यक्रम तैयार किया गया है। सम्भावना तो यह भी है कि जिले के भाजपा नेताओं जिन्हें भू-माफिया के तौर पर प्रचारित किया जाना है, उनके विरूद्ध एफ.आई.आर. भी दर्ज करायी जायेंगी। षडय़ंत्र कारियों के खेमे से मिली जानकारी के अनुसार जिले के एक भू-माफिया को बचाने के लिए बड़ी योजना तैयार की गई है। एक छोटे राजनैतिक दल के ही कुछ कार्यकर्ता इस प्रकार के षडय़ंत्र को समझ गये हैं और उन्हीं के मध्य विवाद पूर्ण स्थिति भी निर्मित हुई है, जिसे निपटाने की कोशिश की जा रही है।

मैकाले से छुटकारा आवश्यक

मैकाले से छुटकारा आवश्यक

* सभी धर्मों के मूल तत्वों को शिक्षा में शामिल करना आवश्यक
सिवनी सैकड़ों वर्ष तक भारत गुलाम रहा और इस गुलामी के दौरान हजारो, लाखों स्वतंत्रता पे्रमिया ेंने अपना गर्म लहू, बहा दिया प्राणों की आहूति दे दी, इनके मनों में स्वतंत्रत भारत की क्या तस्वीर रही होगी इसकी न तो कभी किसी ने चिन्ता की है और न कभी चिन्ता करने की कोशिश की जाती है। जयंती और पुण्यतिथियों पर मात्र कुछ महापुरूषों का स्मरण राजनैतिक या शासकीय तौर पर मात्र करने की परम्परा बन गई है। स्वतंत्र और अखण्ड भारत की कल्पना संजोकर भारत को स्वाधीन कराने वाले अमर शहीद चाहे वे क्रान्तिकारी रहे हो  या अहिंसा मार्गी कम से कम उनके मन में यही कल्पना रही होगी कि भारत सुशिक्षित, सुसंस्कृत, सुविधा सम्पन्न बनकर विश्व शिखर पर अपनी योग्यता और क्षमता का प्रदर्शन करते हुए एक गौरवशाली राष्ट्र के रूप में विकसित हो कम से कम आज जो पाश्चात्य संस्कृति और मैकाले शिक्षा के आवरण से हम जैसा ढके हुए हैं उसी से मुक्ति के लिए उनका सारा संघर्ष रहा है। परंतु हम ६० वर्ष पूर्व भले ही स्वाधीन हो गये हों मैकाले की शिक्षा पद्धति और पाश्चात्य संस्कार हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे हैं जिसके चलते आज भौतिक सुखों की मृग तृष्णा निरंतर भारतीय समाज को खोखला कर रही हैं। जिस भारतीय संस्कृति के वेद पुरणों के आध्यात्म को हजारों पूर्व  वश्वि ने ग्रहण कर अपने देशों में प्रचारित किया और उनके बल पर शान्ति और मोक्ष की कामना की है। उन्हे उस आध्यात्म से अपार शान्ति का अनुभव हुआ उसी संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का दुषप्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि भौतिक सुख सुविधाएं जुटाने के लिए भारत के ही लोग मानवीय धर्म भूलने लगें हैं। स्त्री जिन्हें भारतीय समाज में अत्यधिक पूज्यनीय माना जाता है, वे भी मृग तृष्णा की रोगी हो गई हैं। भ्रष्टाचार के जो बड़े-बड़े मामले सामने आ रहे हैं, योग गुरू रामदेव बाबा दावा कर रहे हैं कि भारत वर्ष के कई वर्षो के बजट के बराबर की राशि विदेशी बैंकों में जमा है।  निश्चित तौर पर विदेशी बैंकों में जमा करने वाले लोगों की  संख्या कम होगी परंतु उनकी राशि चाहे बैंकों में जितनी भी जमा हो उसके कारण देश बड़ी -बड़ी उपलब्धियां पीछे छोड़ते जा रहा है। निश्चित तौर पर  जमा राशि अनेक जनकल्याण की योजनाओं पर डाका डालकर जमा की गई होगी। जिन वर्गो के कल्याण के लिए बजटों में स्वीकृति प्राप्त होती है। उनमें बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हो रहा होगा। नेता और अफसर मिलकर इस प्रकार की राशियों को लील रहे हैं। जिससे सरकार की कल्पनाएं पूर्ण नहीं हो पाती, निरंतर इस प्रकार के बढ़़ते क्रम में मामले सामने आ रहे हैं। संसद मैं बैठे हुए व्यक्ति भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध कड़े कानून बनाने में संभव है संकोच करते हों। उन्हे भी इस बात का भय रहता होगाकि वे भी ईमानदार नहीं है परंतु यह स्थिति कब तक रहेगी। इस पर कोई न कोई ठोस निर्णय लेना ही होगा पूरे देश में जब तक इस प्रकार कावातावरण नहीं बनेगा, कानून के लचीले पन के कारण आजाद देश के ६० वर्ष में जो भ्रष्टाचार बढ़ा है उसकी रफ्तार बढ़ते ही जायेगी। आम जनता जहां  मूल भूत सुविधाओं को तरसते रहेगी और चंद नेताओ कि तिजोरियां भरते रहेंगी। चिन्ता जनक बात हैं ६० वर्ष में जो देश अपनी रियाया को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं करा सका  जिस देश की जनता पीने का पानी सहंी न मिलने के कारण हजारों की संख्या में मर रही है। ९० प्रतिशत बीमारियां पानी की अशुद्धियों के  कारण होती  है यह देश के लिए शर्म की बात है यह और बात है कि सस्ती लोकप्रियता की राजनीति करने वाले और स्वार्थी राजनैतिक शराब से एक मौत हो जाने पर संसद चलना मुश्किल कर दे और सारे देश में हंगामा खड़ा कर दे परंतु देश में आम आदमी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए कभी कोई सार्थक पहल नहीं की गई है। शिक्षा स्वास्थ्य, रोटी, कपड़ा मकान, जो गरीब आदमी की आवश्यकता हैं। उनके  नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाकर डकार रहे हैं। ऐसे भ्रष्ट व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कानून बनाये बिना समस्या का कोई समाधान नहीं होगा साथ ही भौतिक सुखों की मृग तृष्णा से उबारने के लिए अध्यात्मिक शिक्षा को  और हर संभव सभी धर्माे के मूल तत्वों का प्राथमिक स्तर की शिक्षा में ही शामिल करना होगा। तभी संस्कारित भारत का निर्माण संभव है। सांप्रादायिकता का जामा पहनाकर शिक्षा के मूल आधार को नकार कर  जो वर्तमान परिदृश्य है, उससे छुटकारा नहीं मिल सकता.........
* सभी धर्मों के मूल तत्वों को शिक्षा में शामिल करना आवश्यक
सिवनी यशो-: सैकड़ों वर्ष तक भारत गुलाम रहा और इस गुलामी के दौरान हजारो, लाखों स्वतंत्रता पे्रमिया ेंने अपना गर्म लहू, बहा दिया प्राणों की आहूति दे दी, इनके मनों में स्वतंत्रत भारत की क्या तस्वीर रही होगी इसकी न तो कभी किसी ने चिन्ता की है और न कभी चिन्ता करने की कोशिश की जाती है। जयंती और पुण्यतिथियों पर मात्र कुछ महापुरूषों का स्मरण राजनैतिक या शासकीय तौर पर मात्र करने की परम्परा बन गई है। स्वतंत्र और अखण्ड भारत की कल्पना संजोकर भारत को स्वाधीन कराने वाले अमर शहीद चाहे वे क्रान्तिकारी रहे हो  या अहिंसा मार्गी कम से कम उनके मन में यही कल्पना रही होगी कि भारत सुशिक्षित, सुसंस्कृत, सुविधा सम्पन्न बनकर विश्व शिखर पर अपनी योग्यता और क्षमता का प्रदर्शन करते हुए एक गौरवशाली राष्ट्र के रूप में विकसित हो कम से कम आज जो पाश्चात्य संस्कृति और मैकाले शिक्षा के आवरण से हम जैसा ढके हुए हैं उसी से मुक्ति के लिए उनका सारा संघर्ष रहा है। परंतु हम ६० वर्ष पूर्व भले ही स्वाधीन हो गये हों मैकाले की शिक्षा पद्धति और पाश्चात्य संस्कार हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे हैं जिसके चलते आज भौतिक सुखों की मृग तृष्णा निरंतर भारतीय समाज को खोखला कर रही हैं। जिस भारतीय संस्कृति के वेद पुरणों के आध्यात्म को हजारों पूर्व  वश्वि ने ग्रहण कर अपने देशों में प्रचारित किया और उनके बल पर शान्ति और मोक्ष की कामना की है। उन्हे उस आध्यात्म से अपार शान्ति का अनुभव हुआ उसी संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का दुषप्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि भौतिक सुख सुविधाएं जुटाने के लिए भारत के ही लोग मानवीय धर्म भूलने लगें हैं। स्त्री जिन्हें भारतीय समाज में अत्यधिक पूज्यनीय माना जाता है, वे भी मृग तृष्णा की रोगी हो गई हैं। भ्रष्टाचार के जो बड़े-बड़े मामले सामने आ रहे हैं, योग गुरू रामदेव बाबा दावा कर रहे हैं कि भारत वर्ष के कई वर्षो के बजट के बराबर की राशि विदेशी बैंकों में जमा है।  निश्चित तौर पर विदेशी बैंकों में जमा करने वाले लोगों की  संख्या कम होगी परंतु उनकी राशि चाहे बैंकों में जितनी भी जमा हो उसके कारण देश बड़ी -बड़ी उपलब्धियां पीछे छोड़ते जा रहा है। निश्चित तौर पर  जमा राशि अनेक जनकल्याण की योजनाओं पर डाका डालकर जमा की गई होगी। जिन वर्गो के कल्याण के लिए बजटों में स्वीकृति प्राप्त होती है। उनमें बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हो रहा होगा। नेता और अफसर मिलकर इस प्रकार की राशियों को लील रहे हैं। जिससे सरकार की कल्पनाएं पूर्ण नहीं हो पाती, निरंतर इस प्रकार के बढ़़ते क्रम में मामले सामने आ रहे हैं। संसद मैं बैठे हुए व्यक्ति भी भ्रष्टाचार के विरूद्ध कड़े कानून बनाने में संभव है संकोच करते हों। उन्हे भी इस बात का भय रहता होगाकि वे भी ईमानदार नहीं है परंतु यह स्थिति कब तक रहेगी। इस पर कोई न कोई ठोस निर्णय लेना ही होगा पूरे देश में जब तक इस प्रकार कावातावरण नहीं बनेगा, कानून के लचीले पन के कारण आजाद देश के ६० वर्ष में जो भ्रष्टाचार बढ़ा है उसकी रफ्तार बढ़ते ही जायेगी। आम जनता जहां  मूल भूत सुविधाओं को तरसते रहेगी और चंद नेताओ कि तिजोरियां भरते रहेंगी। चिन्ता जनक बात हैं ६० वर्ष में जो देश अपनी रियाया को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं करा सका  जिस देश की जनता पीने का पानी सहंी न मिलने के कारण हजारों की संख्या में मर रही है। ९० प्रतिशत बीमारियां पानी की अशुद्धियों के  कारण होती  है यह देश के लिए शर्म की बात है यह और बात है कि सस्ती लोकप्रियता की राजनीति करने वाले और स्वार्थी राजनैतिक शराब से एक मौत हो जाने पर संसद चलना मुश्किल कर दे और सारे देश में हंगामा खड़ा कर दे परंतु देश में आम आदमी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए कभी कोई सार्थक पहल नहीं की गई है। शिक्षा स्वास्थ्य, रोटी, कपड़ा मकान, जो गरीब आदमी की आवश्यकता हैं। उनके  नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाकर डकार रहे हैं। ऐसे भ्रष्ट व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कानून बनाये बिना समस्या का कोई समाधान नहीं होगा साथ ही भौतिक सुखों की मृग तृष्णा से उबारने के लिए अध्यात्मिक शिक्षा को  और हर संभव सभी धर्माे के मूल तत्वों का प्राथमिक स्तर की शिक्षा में ही शामिल करना होगा। तभी संस्कारित भारत का निर्माण संभव है। सांप्रादायिकता का जामा पहनाकर शिक्षा के मूल आधार को नकार कर  जो वर्तमान परिदृश्य है, उससे छुटकारा नहीं मिल सकता.........