मंगलवार, 13 सितंबर 2011
सोमवार, 12 सितंबर 2011
मतलब 1100 करोड़ रूपए होंगे सरकार के नाम!
ये है दिल्ली मेरी जान
(लिमटी खरे)
मतलब 1100 करोड़ रूपए होंगे सरकार के नाम!
सरकार के राजस्व में जल्द ही ग्यारह सौ करोड़ रूपयों का इजाफा होने वाला है। जी हां, यह सच है। इक्कीसवीं सदी के स्वयंभू योग गुरू रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव की संपत्ति 1100 करोड़ रू.आंकी गई है। लोकसभा के पटल पर रखी जानकारी में बाबा रामदेव किसी भी कंपनी के निदेशक मण्डल में शामिल नहीं हैं। उनके सहयोगी आचार्य बाल किसन 34 कंपनियों के डायरेक्टर हैं। कार्पोरेट मामलों के राज्यमंत्री आर.एम.पी.सिंह ने कहा कि कंपनियों के कारोबार में पंख कैसे लग गए इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। एक तरफ बाल किसन की नागरिकता ही संदेह के घेरे में हैं। उन पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने का भी आरोप है। यक्ष प्रश्न यह है कि अगर बाल किसन भारत के नागरिक ही नहीं हैं तो उनके द्वारा भारत गणराज्य की सरजमीं पर अर्जित संपत्ति पर किसका मालिकाना हक होगा? जाहिर है भारत गणराज्य की सरकार का! फिर सरकार इसको अपने कब्जे में लेने के लिए इंतजार किस बात का कर रही है?
रहस्यमय बीमारी से ग्रसित राजमाता!
देश की रियाया इस बात की पतासाजी में लगी है कि कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को कौन सा राजरोग हो गया है? आखिर कांग्रेस पार्टी अपनी अध्यक्ष की बीमारी या उनकी शल्य क्रिया के मामले में मौन क्यों साधे हुए है? शल्य चिकित्सा के उपरांत एक माह आराम कर कांग्रेस की राजमाता सोनिया गांधी वापस आ गईं हैं। इस मामले में मीडिया ही खबरें दे रहा है। कांग्रेसी चिमाए बैठे हैं। सोनिया दो अगस्त को अमेरिका अपनी चिकित्सा के लिए गईं थीं। सोनिया का आना इसलिए भी महत्सपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनकी अनुपस्थिति में अण्णा हजारे प्रकरण से सरकार और कांग्रेस की भद्द पिटी फिर दिल्ली में ताजा बम विस्फोट हो गया। कांग्रेस के रणीनीतिकार तो सोनिया की चुप्पी पर उनकी बीमारी का बहाना बनाकर अपनी खाल बचा सकते हैं। अब देखना यह है कि खुद सोनिया अण्णा और बम विस्फोट प्रकरण को किस नजरिए से देखती हैं। साथ ही साथ क्या वे अपनी बीमारी को जनता में उजागर करेंगी या फिर लोगों को इसके लिए भी ‘विकीलीक्स‘ केबल का इंतजार होगा!
चिदम्बरम का गैर जिम्मेदाराना बयान!
आतंक की काली स्याह छाया देश पर पसरी हुई है। उंचे दर्जे की सुरक्षा में देश के जनसेवक खुद को महफूज ही पा रहे हैं। गरीबी रियाया अपना खून बहाने पर मजबूर है। दस साल पहले दुनिया के चौधरी अमेरिका पर हमला हुआ इसके बाद अमेरिका ने अपनी सुरक्षा इतनी चाक चौबंद कर ली कि वहां के नागरिक दस साल से अपने आप को सुरक्षित पा रहे हैं। दूसरी ओर भारत गणराज्य की सरकार बापू के उस सिद्धांत पर अमल करती नजर आ रही है कि अगर कोई आपके एक गाल पर मारे तो दूसरा आगे कर दो। दिल्ली में हाल ही में हुए बम विस्फोट के बाद देश के गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम का बयान आया कि इस मामले में वे कुछ नहीं कर सकते हैं, यह राज्य सरकार का मामला है। चिदम्बरम जी आप देश के गृह मंत्री हैं, आपके मुंह से इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान शोभा नहीं देते। अगर यह राज्य सरकार का मसला है तो फिर मुंबई हमलों के बाद शिवराज पाटिल को क्यों चलता कर दिया गया था?
मोदी हो सकते हैं राजग के पीएम इन वेटिंग
गुजरात में विकास की नई इबारत लिखने वाले नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ दिनों दिन उपर आता जा रहा है। नरेंद्र मोदी की पायदान चढ़ते रहने का सबसे ज्यादा खतरा राजग के वर्तमान पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी और पीएम की कुर्सी पर नजर गड़ाने वाली सुषमा स्वराज को ही दिख रहा है। सियासी गलियारों में चल रही चर्चा के अनुसार सुषमा स्वराज जानतीं हैं कि ढलती उमर के चलते 2014 में आड़वाणी को शायद ही पार्टी द्वारा आगे किया जाए। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस द्वारा अगर मीरा कुमार को आगे किया जाता है तो सुषमा को उनकी काट के रूप में आगे करना भाजपा की मजबूरी होगा। नरेंद्र मोदी के आगे आते ही नए सियासी समीकरण तैयार होने लगे हैं। मोदी की छवि का लाभ लेने संघ भी आतुर ही दिख रहा है। कहा जा रहा है कि जल्द ही मोदी को राजग का पीएम इन वेटिंग घोषित कर दिया जाएगा।
सवा तीन अरब के पंच!
देश की सबसे बड़ी पंचायत के पंच यानी संसद सदस्य हमेशा ही सांसद निधि को बढ़ाने की मांग करते हैं। जब यह बढ़ जाती है तो इन्हें यह सुहूर नहीं होता है कि इसको खर्च कैसे किया जाए। संसद में जब तब इस बात पर शोर शराबा होता है कि सांसदों का वेतन उनके भत्ते और सांसद निधि को बढ़ाया जाए। एक दूसरे के खिलाफ तलवार पजाने वाले राजनैतिक दल एक मामले में एक राय ही नजर आते हैं। अपनी तनख्वाह खुद ही तय कर मेजें थपथपाकर इसका स्वागत करते हैं। निस्वार्थ सेवा का मुआवजा हर सांसद को कितना मिलता है इस बात का अंदाजा लगाने मात्र से ही रूह कांप जाती है। आज जानते हैं कि वर्ष 2010 में खुद ही अपने वेतन भत्ते बढ़ाने वाले संसद सदस्यों में लोकसभा के प्रत्येक सदस्य पर जनता के गाढ़े पसीने की कमाई का साठ लाख पंचानवे हजार रूपए का सालाना खर्च है। इस लिहाज से 543 लोकसभा सदस्यों पर तीन अरब 25 करोड़, 47 लाख और तीस हजार रूपए खर्च होते हैं। इतना ही खर्च राज्य सभा के सांसदों पर होता है। अब अंदाजा लगाईए गरीब गुरबों के भारत देश के जनसेवकों के मनोविचार का!
यह है एयरपोर्ट सुरक्षा का हाल सखे
देश पर आतंकी हमलों का साया मण्डरा रहा है। बाहर से आने और जाने के हर रास्ते पर सुरक्षा तगड़ी कर दी गई है। हिन्दुस्तान की सुरक्षा एजेंसियों को देश की आन बान और शान की ज्यादा चिंता है, इसलिए देश मे आने वालों की सुरक्षा जांच तो बखूबी की जाती है किन्तु अगर कोई देश से बाहर जा रहा हो तो उसमें ढिलाई बरती जाती है। हो सकता है एजेंसियां यह सोचती हों कि चलो एक बला तो टली। हाल ही में गुलाबी शहर जयपुर के सांगानेर हवाई अड्डे से एक बंग्लादेशी नागरिक फर्जी पासपोर्ट के सहारे समुद्र पार गया और फिर वह साउदी अरब में दम्माम में पकड़ा गया। मूलतः बंग्लादेश का रहने वाला 21 वर्षीय हबीबुल्लाह जिसने डोलक राज के नाम से पासपोर्ट बनवाया था ने एयर अरेबिया के माध्यम से शरजाह तक की यात्रा की। शरजाह से जब हबीबुल्लाह दम्माम में पकड़ा गया। हद तो तब हो गई जब इसे वापस जयपुर उतारा गया तो सुरक्षा एजेंसियों ने इसे आम यात्रियों के साथ चुपचाप ही बाहर निकाल दिया। बाद में मामला पुलिस को सौंपा गया।
जेल जाने को आतुर आड़वाणी
इमरजेंसी के उपरांत प्रदर्शन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी को तिहाड़ जेल में बंद किया गया था इसके बाद से तिहाड़ जेल लोगों की नजरों में आई। वर्ष 2011 में तिहाड़ की पूछ परख एकदम बढ़ गई। अनेक व्हीव्हीआईपीज को शरण दे रखी है तिहाड़ जेल ने। अब तो लगता है कि तिहाड़ के अंदर एक अलग जेल ही बना दी जाए जिसे ‘पॉलीटिशियन्स प्रिजन‘ का नाम दे दिया जाए। अब तो लगता है कि भ्रष्टाचार करना और पकड़े जाने पर जेल जाना राजनेताओं का प्रिय शगल बनकर रह गया है। एक के बाद एक नेताओं का विकेट गिरता जा रहा है और वे पवेलियन (तिहाड़ जेल) जाकर विश्राम कर रहे हैं। इसी बीच अमर सिंह सहित फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा को भी जेल भेज दिया गया है। अभी तक राजग के पीएम इन वेटिंग रहे एल.के.आड़वाणी ने इन दोनों के जेल जाने का विरोध करते हुए कह डाला कि उन्हें भी जेल भेज दिया जाए। कहा जा रहा है कि आड़वाणी को भी डर सताने लगा है कि कहीं उनकी भी कोई फाईल भी न खुल जाए और उन्हें भी . . .।
आखिर क्या बला है हाई अलर्ट!
दिल्ली सहित चारों महानगर हाई अलर्ट पर हैं। यह संदेश जब तब मीडिया के माध्यम से जनता के बीच पहुंच जाता है। सवाल यह उठता है कि हाई अलर्ट आखिर बला क्या है? दरअसल देश में जब भी असमान्य परिस्थितियां निर्मित होती हैं तब तब पुलिस को हाई अलर्ट किया जाता है। पुलिस जब अत्याधिक तौर पर सक्रिय हो जाती है तब माना जाता है हाई अलर्ट। षणयंत्र और साजिश रचने वालों के मन में भय पैदा करने के लिए पुलिस बल अधिक तादाद में जनता के बीच नजर आने लगता है हाई अलर्ट में। पुलिस का हाई अलर्ट आदेश कभी वापस नहीं होता, समय के साथ ही हाई अलर्ट अपने आप ही डाल्यूट हो जाता है। मजे की बात तो यह है कि केद्र के गृह विभाग से लेकर अनेक सूबाई पुलिस में भी हाई अलर्ट नाम का कोई शब्द है ही नहीं। पुलिस मैनुअल में इस शब्द का समावेश न होने के बाद भी हाई अलर्ट तो हाई अलर्ट ही है।
आखिर सूचना केंद्र से क्यों दूरी बना रहे पत्रकार!
दिल्ली में मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग का सूचना केंद्र कनाट सर्कस में मंहगे व्यवसायिक इलाके की एम्पोरिया बिल्डिंग में काम कर रहा है। एक समय था जब दिल्ली में मध्य प्रदेश बीट कव्हर करने वाले पत्रकारों का जमावड़ा सदा ही लगा रहता था इस कार्यालय में। सारे दिन पत्रकारों के मिलन का अड्डा बनकर उभर चुका मध्य प्रदेश सूचना केंद्र इन दिनों वीरान ही पड़ा हुआ है। मध्य प्रदेश सरकार के इस कार्यालय में मनहूसियत ही पसरी दिखाई पड़ती है। जब भी कोई पत्रकार सूचना या खबर लेने के उद्देश्य से यहां आता है तो तीसरी मंजिल का यह कार्यालय सूना ही दिखता है। अधिकांश समय इस कार्यालय में कोई भी जवाबदार अधिकारी कर्मचारी ही उपस्थित नहीं रहता है। पत्रकारों को मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से मिलने वाली डायरी कलेंडर की रेवड़ी भी चीन्ह चीन्ह कर ही बांटी जाती है। कुछ पत्रकारों का आरोप है कि चुनिंदा पत्रकारों को रबड़ी बाकी सब को गर्मी के दिनों में भी गर्म पानी ही पिलाया जाता है। पत्रकार जब ठण्डे पानी की मांग किया करते थे तब अधिकारी बजट का रोना रोकर फ्रिज खराब होने का बहाना जड़ दिया करते थे।
असरदार से दूरी बनाते सरदार
कांग्रेस ने भले ही सिख्ख समुदाय के 1984 के रिसते घावों पर मरहम लगाने के लिए पूर्व में ज्ञानी जेल सिंह को देश का पहला नागरिक बनाया हो फिर डॉ.मनमोहन सिंह को वजीरे आजम बना दिया हो, पर कांग्रेस के इस कदम से सिख्ख कौम कांग्रेस के पास आती कतई नहीं दिख रही है। डॉ.मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुए घपले घोटालों से सिख्ख बाहुल्य पंजाब की कांग्रेस बुरी तरह खौफजदा है। कांग्रेस के आला नेताओं ने मन बना लिया है कि इस बार के विधानसभा चुनावों में सूबाई कांग्रेस प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह से पर्याप्त दूरी बनाकर रखेगी। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्रियों और मुद्दों के बिना पंजाब में कांग्रेस स्थानीय मुद्दों पर ही चुनाव की वैतरणी पार करने का प्रयास करेगी।
युवराज अनफिट, कौन होगा अगला बादशाह!
सनसनीखेज खुलासों के लिए मशहूर विकीलीक्स के अहम खुलासे कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी आज की भारतीय राजनीति के हिसाब से पूरी तरह से अनफिट हैं, के बाद कांग्रेस बैकफुट पर आ गई है। विकीलीक्स के अनुसार राहुल न केवल अनफिट हैं वरन अनुपयोगी भी हैं। कांग्रेस के आला नेता अब सर जोड़कर बैठे हैं कि अगर दुनिया भर पर नजर रखने वाले दुनिया के चौधरी अमेरिका के तत्कालीन राजदूत डेविड मलफोर्ड द्वारा भेजे गए इस केबल में सच्चाई है तो फिर भ्रष्टों के ईमानदार संरक्षक डॉ.मनमोहन ंिसह के बाद देश का बादशाह किसे बनाया जाएगा। इसके लिए जो नाम सामने आ रहे हैं उनमें ए.के.अंटोनी का नाम सबसे उपर है। इसके बाद मीरा कुमार पर कांग्रेस दांव लगा सकती है। उधर राजनीति के चतुर सुजान राजा दिग्विजय सिंह के सधे और खामोश कदमों ने सभी की नींद उड़ा रखी है।
बताओ कहां खर्ची हमारी इमदाद
केंद्र सरकार ने अब शिवराज सिंह चौहान की मश्कें कसना आरंभ कर दिया है। यह किसके इशारे पर हो रहा है यह बात अभी भविष्य के गर्भ में है किन्तु आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद हत्याकांड़़ में भाजपा सांसद तरूण विजय का नाम आने फिर इसकी सीबीआई जांच के बाद अब केंद्र सरकार ने शिवराज से गैस पीड़ितों को दिए पौने तीन सौ करोड़ रूपयों का लेखा जोखा मांगना साधारण बात नहीं मानी जा रही है। केंद्रीय रसायन मंत्रालय ने मध्य प्रदेश सरकार से कहा है कि वह 1984 के गैस पीड़ितों के पुर्नवास की मद में जारी 272 करोड़ रूपयों का लेखा जोखा केंद्र को भेजे। यह राशि किस मद में खर्च हो गई है इस बारे में मध्य प्रदेश सरकार का वित्त विभाग भी जानकारी जुटा ही रहा है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार अब हर केंद्रीय मदद और केंद्र पोषित योजनाओं के बारे में बारीकी से जांच पड़ताल करने वाला है।
पुच्छल तारा
देश में सत्तर फीसदी लोगों की रोजाना की आय बीस रूपए से कम है। देश में आज होटल में एक आदमी का खाना कम से कम पच्चीस रूपए में मिल पाता है। मध्य प्रदेश से अभिषेक दुबे ‘रिंकू‘ ने ई मेल भेजकर कहा है कि क्या आपको पता है देश में एक स्थान एसा भी है जहां सब कुछ सस्ता है? जानना चाहेंगे वह जगह कौन सी है। वह है देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद की कैंटीन। इस कैंटीन में मिलने वाली खाद्य सामग्री का दाम जानकर आपके होश उड़ जाएंगे। आम आदमी के हितों का संरक्षण करने वाली संसद में आम आदमी को आसानी से प्रवेश नहीं मिल पता है। यह उस जगह के रेट हैं जहां के पंचों को अस्सी हजार रूपए मासिक पगार मिलती है। बहरहाल रिंकू ने यहां की प्राईज लिस्ट के बारे में विस्तार से भेजा है।
चाय एक रूपए
सूप साढ़े पांच रूपए
दाल डेढ़ रूपए
खाना दो रूपए
रोटी एक रूपए
दोशा चार रूपए
वेज बिरयानी आठ रूपए
चिकन साढ़े चौबीस रूपए
मछली तेरह रूपए
रविवार, 11 सितंबर 2011
कब तक होगी सिवनीवासियों की अग्निपरीक्षा!
कब तक होगी सिवनीवासियों की अग्निपरीक्षा!
(लिमटी खरे)
भगवान शिव की नगरी है सिवनी। सिवनी में भगवान शिव का वास माना जाता है। सिवनी की जनता भगवान शिव की ही भांति भोली भाली है। नेताओं ने सिवनी वासियों को छलने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है। जब जिसका जो मन आया उस तरीके से सिवनी की भोली भाली जनता को उस तरीके से ढाल दिया। ब्राडगेज का झुनझुना हमें सालों साल से पकड़ाया जाता रहा है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही के नेता इसकी असलियत जानते हैं, किन्तु विज्ञप्तिवीर नेता न जाने क्यों जनता से सच्चाई बयान करने से कतराते हैं। शेरशाह सूरी के जामने के एनएच 07 पर 2008 से जमकर सियासत हो रही है। कोई इस मामले में तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ पर दोषारोपण करता है तो कोई अपने ही नेताओं को घेरने की रणनीति बनाता है। किसी का ध्यान भी जनता जनार्दन की ओर नहीं है। जनता के लिए लड़ाई करने का स्वांग सभी रच रहे हैं पर इसका कोई हल निकलकर सामने आता नहीं दिख रहा है। नेतृत्वविहीन सिवनी वासियों की अग्निपरीक्षा सालों साल से होती आ रही है। कोई कहता है सिवनी को भी एक अण्णा हजारे की आवश्यक्ता है। अण्णा तो सैकड़ों हैं सिवनी पर निहित स्वार्थों को ज्यादा तवज्जो देना उनका प्रिय शगल है।
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सीमा पर देश के सबसे लंबे और व्यस्ततम राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात पर अवस्थित है मध्य प्रदेश का एक छोटा सा जिला सिवनी। सिवनी जिले की स्थापना मध्य प्रदेश की स्थापना के साथ ही 01 नवंबर 1956 को की गई थी। अपनी स्थापना के उपरांत सिवनी ने अनेक पड़ाव और उतार चढ़ाव देखे हैं। अस्सी के दशक के उपरांत सिवनी मे स्वार्थ की राजनीति ने पैर जमाना आरंभ कर दिया। इसके उपरांत यहां के नेतृत्व कर्ताओं ने सिवनी का इतिहास, वर्तमान और भविष्य अपने स्वार्थ के हिसाब से गढ़ना आरंभ कर दिया। आज युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित ही नजर आ रही है। युवाओं में संघर्ष का जज़्बा तो दिख रहा है, किन्तु संघर्ष किस दिशा में किया जाए इस बारे में वे अनजान ही नजर आ रहे हैं। बुनियादी समस्याओं से जूझते सिवनी जिले में अब तो आक्रांताओं ने भी हमले आरंभ कर दिए हैं।
सिवनी की झोली में एक के बाद एक सौगातें डालने वाली पूर्व केंद्रीय मंत्री सुश्री विमला वर्मा भी अपने लंबे राजनैतिक जीवन में सिवनी जिले को ब्राडगेज से नहीं जोड़ पाईं। हो सकता है कि वे इसकी इच्छा मन में रखतीं हों पर उनके लग्गु भग्गुओं ने उनका ध्यान इस ओर से हटा दिया हो। सिवनी जिले में सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता का कार्यालय, विशालकाय जिला चिकित्सालय, नेशनल हाईवे का कार्यपालन यंत्री कार्यालय, लोक निर्माण विभाग का अधीक्षण यंत्री कार्यालय, क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय, एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांध ‘संजय सरोवर परियोजना‘ आदि का श्रेय सुश्री विमला वर्मा को ही जाता है। वहीं दूसरी ओर नब्बे के दशक में उभरे और फिर सिवनी के राजनैतिक परिदृश्य में धूमकेतू बनकर चमकने वाले हरवंश सिंह ठाकुर के खाते में दूरभाष पर एसटीडी की सुविधा लाने का श्रेय जाता है। उस समय गिनती के शहरों में एसटीडी की सुविधा हुआ करती थी।
सिवनी का औद्योगिक पिछड़ापन किसी से छिपा नहीं है। सिवनी के उद्योगों में राजाधिराज इंडस्ट्रीज़ और क्रिसेंट एलांयस का नाम शिखर पर हुआ करता था। इसके अलावा देशी शराब आसवानी का भी खासा बोलबाला था। राजनैतिक संरक्षण के अभाव में एक के बाद एक यहां के उद्योग धंधे दम तोड़ते चले गए। आज सिवनी में उद्योग के नाम पर कुछ नहीं बचा है। वहीं अगर पड़ोसी जिले छिंदवाड़ा या बालाघाट पर नजर डाली जाए तो दोनों ही जिले औद्योगिक रूप से काफी हद तक सग्रद्ध माने जा सकते हैं। दोनों ही जिलों के जनप्रतिनिधियों चाहे वे सांसद हों या विधायक और चाहे किसी भी राजनैतिक दल के हों ने अपने अपने जिलों को समृद्ध करने का भरसक प्रयास किया है दलगत भावना से उपर उठकर। दोनों ही जिलों की जनता अपने सशक्त नेताओं की सरपरस्ती में चैन से दिखती है।
सिवनी के विकास में सबसे बड़ी बाधा निश्चित तौर पर रेल से न जुड़ा होना ही है। सिवनी के सीमावर्ती जिलों में जबलपुर, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, बालाघाट, नागपुर की जनता ब्राडगेज के मजे ले रही है। मण्डला की जनता जल्द ही जब जबलपुर से बालाघाट की ब्राडगेज अमान परिवर्तन योजना पूरी हो जाएगी तब इसका आनंद ले पाएगी। रह जाएंगे तो इसके मध्य में रहने वाले सिवनी वासी। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सिवनी जिले के सांसदों और विधायकों ने कभी भी ईमानदारी से सिवनी में ब्राडगेज लाने का प्रयास नहीं किया। जब भी बिल्ली के भाग से छीका टूटा और सिवनी के किसी रेल परियोजना का नाम बजट में जुड़ा वैसे ही श्रेय लेने के लिए नेताओं ने भर भर पेज विज्ञापन जारी करवा दिए। इसके बाद पता नहीं किस मुंह से वे जनता के बीच जाकर उसका सामना करने का साहस जुटा पाते हैं।
सिवनी में रेल तो नहीं है पर सिवनी की जीवनरेखा मानी जाती है नेशनल हाईवे नंबर सात। उत्तर में जबलपुर तो दक्षिण में नागपुर से जुड़े इस मार्ग पर से रोजाना हजारों की तादाद में वाहन गुजरते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में चारों महानगरों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की नींव रखी गई। इसके उपरांत जब उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम जाने वालों की परेशानियों पर विचार किया गया तब उत्तर दक्षिण एवं पूर्व पश्चिम फोरलेन गलियारे की आधार शिला रखी गई। भगवान शिव एक बार फिर सिवनीवासियों पर प्रसन्न हुए। नेताओं के लाख बुरा चाहने के बावजूद भी उत्तर दक्षिण गलियारा सिवनी से होकर गुजारा गया।
इसके बाद इस गलियारे पर एक बार फिर नेताओं की कुदृष्टि हो गई। समचे भारतवर्ष में संभवतः सिवनी जिला ही होगा जहां इस मार्ग के निर्माण में बाधाएं उतपन्न की गईं। कृत्रिम तौर पर उतपन्न इन बाधाओं को जब तक लोग समझ पाते तब तक तो पानी सर के उपर आ चुका था। मामला सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर था। हमने अपने पूर्व के आलेख 09 जुलाई 2009, ‘उत्तर दक्षिण गलियारे में पर्यावरण का पेंच‘ इसके उपरांत 27 जुलाई 2009 को ‘सांप ही मारें, लकीर न पीटें‘, 16 जुलाई 2010, ‘सड़क किनारे खिले कमल में उगने लगे हैं कांटे!‘, 03 अगस्त 2010 को ‘तारीफे काबिल है स्वप्रेरणा से किया अहिंसक विरोध‘ फिर 08 अगस्त 2010 को ‘किस षणयंत्र के तहत किसने रूकवाया था काम‘, 10 अगस्त 2010 के आलेख ‘आखिर क्या बला है सीईसी‘ आदि में इस फोरलेन के बारे में काफी कुछ सविस्तार लिखा था। अंततः 27 जुलाई के आलेख सांप ही मारें लकीर न पीटें की तर्ज पर आज हम लकीर को ही पीट रहे हैं सांप तो कब का गुजर चुका।
यक्ष प्रश्न आज भी यही खड़ा हुआ है कि जब एक जिलाधिकारी के आदेश को उनके स्थान पर आए जिलाधिकारी ने 18 दिसंबर 2008 को निरस्त कर दिया तब क्या नया जिलाधिकारी इसे निरस्त नहीं कर सकता? सर्वोच्च न्यायालय ने आखिर क्या व्यवस्था दी? क्या यह सब करने से मार्ग के गड्ढ़े भर गए। जुलाई 2009 से अब तक फोरलेन से संबंधित हमारी खबरों या आलेखों में हमने सदा ही इस बात पर जोर दिया था कि कम से कम सड़क के गड्ढ़े तो भरवा ही दिए जाएं। विडम्बना ही कही जाएगी कि किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।
आश्चर्य तो तब हुआ जब पिछले दिनों सिवनी के उत्तर की ओर एक ट्रक गड्ढ़ा बचाने के चक्कर में पलट गया और चालक की मौत हो गई, पर सिवनी के नेतागण खामोश बैठे रहे। उत्साही युवा नरेंद्र ठाकुर साधुवाद के पात्र हैं कि वे सदा इस मार्ग को लेकर जन जागृति पैदा करते रहते हैं। कुरई में ट्रक पलटा और एक महिला की मौत हो गई। इस बारे में भी गुड्डू ठाकुर ने ही बैठक आयोजित कर बंद का आव्हान किया है। सड़क के जर्जर होने का असर जनसेवकों पर नहीं पड़ेगा क्योंकि वे तो मंहगी और विलासिता वाली गाड़ियों अथवा सरकारी या फिर किराए के वाहन में ही भ्रमण करते हैं। इसके लिए उन्हें सरकार से बाकायदा प्रति किलोमीटर भाड़ा भी मिलता है।
असली मरण तो आम जनता की होती है। अब तो लदे फदे ट्रक भी गड्ढ़े बचाने के चक्कर में सड़कों पर लोट रहे हैं। इसके साथ ही साथ रख रखाव के अभाव में यह मार्ग भी अब बली लेने लगा है। गड्ढ़ों में हाल ही में यह दूसरी मौत है। इसके बाद भी न तो एनएचएआई ही जागा है और ना ही सांसद विधायक साहेबान भी। सांसद के.डी.देशमुख ने तो इस बात को भी स्वीकारा है कि उन्होने इस मामले को संसद में अब तक नहीं उठाया है। सवाल यह उठता है कि संसद में इस मामले को उठाने की जवाबदेही आखिर किसकी है? देखा जाए तो यह मार्ग सिवनी मण्डला के कांग्रेसी सांसद बसोरी मसराम, सिवनी बालाघाट के सांसद के.डी.देशमुख के साथ ही साथ भाजपा विधायक शशि ठाकुर, नीता पटेरिया, कमल मस्कोले के साथ ही साथ कांग्रेस के क्षत्रप और केवलारी विधायक हरवंश सिंह ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र से होकर भी गुजरता है। जनता ने जनादेश देकर इन्हें चुना है, फिर ये जनादेश का अपमान करने का साहस आखिर कैसे जुटा पा रहे हैं?
अण्णा हजारे के आंदोलन में सिवनी वासियों का गुस्सा फट पड़ा उसे देखकर लगा कि नेताओं के मन में जनता का भय फिर जागा होगा। हालात देखकर अब लगने लगा है कि सांसद विधायकों को शायद जनता की परवाह कतई नहीं है। जनता की चिंता उन्हें बस चुनाव के एक माह पहले ही होती है। इतना ही नहीं लोकसभा या विधानसभा में पराजित नेताओं को भी जनता की सुध नहीं है। चुनाव आते ही वे एक बार फिर जनता के खालिस हिमायती बने नजर आएंगे। कभी जनता का स्वप्रेरित जनता कर्फ्यू देखने को मिलता है तो कभी अण्णा के समर्थन में बच्चों युवाओं बुजुर्गों की टोली का उत्साह देखते बनता है, फिर दिमाग में एक नेता हरीश क्षेत्रपाल की बात हथोड़े सी बज उठती है -‘‘यह मुर्दों का शहर है प्यारे।‘‘
हालात देखकर लगता है मानो कांग्रेस भाजपा सहित सारे दलों के नेता भगवान शिव की नगरी सिवनी के निवासियों की अग्निपरीक्षा ले रहे हैं। यह अग्निपरीक्षा का दौर आखिर कब समाप्त होगा? सभी को इंतजार है कि यह जल्दी ही समाप्त हो जाए। वरना अगर भगवान शिव के इस सिवनी जिले में जनता ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया तो . . .।
शनिवार, 10 सितंबर 2011
शुक्रवार, 9 सितंबर 2011
सहिष्णुता की आड़ में कायरता हो रही हावी
सहिष्णुता की आड़ में कायरता हो रही हावी
(लिमटी खरे)
भारत गणराज्य में रहने वाला हर नागरिक सहिष्णु रहा है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। जीयो और जीने दो के सिद्धांत को प्रतिपादित कर इस पर अमल करने में हिन्दुस्तान का कोई सानी नहीं है। भारत की न्याय प्रणाली कहती है कि भले ही सो मुजरिम छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए। जिस पर आरोप सिद्ध हो चुके हों उसे दया माफी या अन्य रास्तों से बचने के मार्ग प्रशस्त कहीं होते हैं तो यह भारत गणराज्य ही है। अजमल कसाब, अफजल गुरू, अजहर मसूद जैसे अनेक उदहारण हमारे सामने हैं जिनमें भारत गणराज्य की सरकारें बेबस ही नजर आती हैं। जम्मू काश्मीर लिब्ररेशन फ्रंट के पांच आतंकियों को इसलिए छोड़ दिया गया था क्योंकि उस वक्त एक मंत्री की बेटी अगुआ कर ली गई थी। एक गरीब को जब किसी डकैत द्वारा पकड़ा जाता है तो उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता है, पर दूसरी ओर जब किसी नेता के वंशज को पकड़ा जाता है तब सरकार सारे नियम कायदों को ताक पर रखने से नहीं चूकती। जब धमाके होते हैं तो मरने वालों और घायलों को सरकार मुआवजा देती है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या नेहरू गांधी परिवार के वंशजों ने स्व.इंदिरा गांधी और स्व.राजीव गांधी की नृशंस हत्या के बाद मुआवजा कबूल किया था?
कहते हैं कि शत्रु वहीं सबसे अधिक आक्रमण करते हैं जहां एकता नहीं होती। जहां लोगों के बीच एकता का अभाव होगा वहां शत्रुओं को सर छिपाने और छिपकर वार करने मे सहूलियत होती है। ‘अनेकता में एकता, भारत की विशेषता‘ यह नारा आजादी के बाद तेजी से बुलंद हुआ था। अस्सी के दशक के उपरांत एकाएक भ्रष्टाचार ने सर उठाना आरंभ किया। इसके उपरांत देश पर शासक करने वालों ने ही देश को लूटना आरंभ किया। अपने संचित धन को कथित तौर पर इन नेताओं ने स्विस सहित विदेशी बैंकों में जमा करना आरंभ कर दिया। कहा जाता है कि इसके साथ ही साथ हिन्दुस्तान में भी स्विस बैंक की तर्ज पर एक कंपनी का उदय हुआ। इस कंपनी ने रातों रात तरक्की की। इस कंपनी में भी नेताओं, अफसरों और व्यवसाईयों का बेनामी पैसा लगा हुआ है। यही कारण है कि केंद्र और सूबाई सरकारें भी चाहकर इसका कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं।
बहरहाल, देश की नपुंसक सरकार को एक के बाद एक धमाकों ने जमकर दहलाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय बम विस्फोट की पहली जवाबदारी हूजी ने ली। हूजी का कहना है कि अफजल गुरू की फांसी की सजा अगर माफ नहीं हुई तो इस तरह के धमाके और भी होते रहेंगे। इसके बाद इंडियन मुजाहिद्दीन ने इसकी जवाबदारी ले ली है। इसने यह धमाका क्यों किया है इसे साफ नहीं किया है। इंडियन मुजाहिद्दीन क्या कहता है यह और हूजी की धमकी का क्या असर होगा इस बारे में अभी से कुछ कहना जल्दबाजी ही होगी।
पिछले दो दशकों में एक बात तो उभरकर सामने आई है कि भारत गणराज्य की सरकार को फैसला न लेने या टालने की आदत हो गई है। नब्बे के दशक में इसकी शुरूआत कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंम्हाराव के शासनकाल से हुई। उनके प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने फैसले जमकर टाले। फिर क्या था नरसिम्हाराव के उपरांत सरकारों का प्यारा शगल बनकर रह गया है फैसलों को टालना। मसला चाहे आम आदमी की रोजी रोटी से जुड़ा हो या फिर आम आदमी की सुरक्षा से, हर मामले में सरकार मूक दर्शक ही बनी बैठी दिखती है।
आज बम धमाकों के पीछे यह कारण उभरकर सामने आया है कि अफजल गुरू की फांसी की सजा को माफ किया जाए। कल अगर यही बात किसी और कारण से अजहर मसूद और अजमल कसाब के लिए सामने आए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वोट बैंक की घ्रणित राजनीति के चलते राजनेता कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। स्व.राजीव गांधी की पुत्री प्रियंका वढ़ेरा खुद चलकर अपने पिता की हत्यारिन नलिनी से मिलने जेल गईं और मीडिया की सुर्खियां बटोरी। सालों बीतने पर भी प्रियंका ने यह नहीं बताया कि आखिर क्या वजह थी, कि वे अपने पिता के कातिल से मिलने जेल गईं थीं। आखिर कौन से प्रश्न प्रियंका के मानस पटल पर घुमड़ रहे थे जिनका जवाब लेने वे नलिनी से मिलने गई थीं।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को लेकर तमिलनाडू विधानसभा द्वारा जो किया है उसकी गूंज अनुगूंज समूचे भारत वर्ष को पार करती हुई जम्मू और काश्मीर तक सुनाई पड़ी है। जम्मू काश्मीर के निजाम उमर अब्दुल्ला ने गरम तवे पर रोटी सेंकते हुए एक प्रश्न जड़ ही दिया कि अगर यही मामला जम्मू काश्मीर विधानसभा द्वारा अफजल गुरू के संबंध में किया होता तो क्या देश में इसी तरह की शांति रहती? उमर के प्रश्न में दम है? क्या मानव मानव में भेद उचित है। यह जात पात, धर्म, मजहब, क्षेत्रवाद का मानवता में कोई स्थान है? जाहिर है नहीं, फिर एसा क्यों? उत्तर साफ है राजनेता ही हमें आपस में भेद करना सिखाते हैं। ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी हैं हमवतन हैं हिन्दोस्तां हमारा।
अल्प संख्यक समुदाय को प्रमुख राजनैतिक दलों ने अपना वोट बैंक माना है। यही कारण है कि आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोगों द्वारा अल्प संख्यकों की भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया जाता है। राजीव के हत्यारों के मामले में खुद उनकी अर्धांग्नी और कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी एवं राजीव पुत्र तथा कांग्रेस की नजर में भविष्य के वजीरे आजम राहुल गांधी ने भी खामोशी ही अख्तियार कर रखी है। जब उनके परिजन ही मौन हैं तब कांग्रेसियों की फौज के साथ ही साथ बाकी देश का मौन रहना स्वाभाविक ही है।
वहीं दूसरी ओर चूंकि जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अफजल गुरू के बारे में एक साधारण सा प्रश्न किया तो देश भर के सियासी लोगों की भवें तन गईं। देखा जाए तो अफजल गुरू का अपराध कमोबेश राजीव के हत्यारों के समकक्ष ही माना जा सकता है। फिर अपराधियों के मामले में दोहरे मापदण्ड आखिर क्यों? आज समूचे देश में अफजल गुरू का मामला फिर जीवंत हो गया है। चौक चौराहों पर एक बार फिर लोग अफजल के मामले की जुगाली करते दिखने लगे हैं।
दिल्ली में हुए हालिया विस्फोट से इसे जोड़ा जा रहा है। बताया जाता है कि दिल्ली विस्फोट मामले में संकेत जुलाई में ही मिल चुके थे। संभावना यह भी है कि इस मामले में अफजल गुरू का नाम लाने से मामला हॉट बनाया जा सकता है। अगर अफजल को पहले ही फांसी दे दी गई होती तो आज यह मामला उठता ही नहीं कि उसकी फांसी की सजा को माफ नहीं किया तो और धमाके होंगे। आने वाले समय में अगर कोई अनहोनी हो और उनमें अजहर मसूद और अजमल कसाब को जोड़ा जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
दिल्ली के इस विस्फोट में मारे गए और घायलों को सरकार ने मुआवजे के तौर पर चंद लाख रूपए देने की पेशकश की है। हर बार एसा ही होता है। एक प्रश्न आज भी दिमाग में जस का तस ही बना हुआ है कि जब इस तरह के हादसे, उदहारण के तौर पर राजीव गांधी की बम धमाके में हुई हत्या के उपरांत सरकार द्वारा दिए गए मुआवजे को क्या उनकी पत्नि श्रीमति सोनिया गांधी, उनकी पुत्री प्रियंका और पुत्र राहुल ने स्वीकार किया था? क्या इंदिरा जी की हत्या के बाद सरकार ने उनके परिजनों को मुआवजा दिया था? क्या मध्य प्रदेश में नक्सलियों द्वारा नृशंस तरीके से गला रेतकर जब तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की हत्या की थी तब उनके परिजनों को सरकार ने मुआवजा दिया था? क्या ये सभी गरीब जनसेवक नहीं थे? अगर थे तो क्या इनके परिजनों को मुआवजे की दरकार नहीं?
दरअसल भारत गणराज्य की नपुंसक सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति के चलते ही यह सब हो पा रहा है। जिस देश का प्रधानमंत्री ही जनता द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर न चुना गया हो, जिसे जनता ने दो बार नकार दिया हो, जो पिछले दरवाजे यानी राज्य सभा के रास्ते संसद पहुंचा हो, जिसे खुद लोकसभा में मत देने का अधिकार ही न हो, जिस पर सरेआम आरोप लगें कि वह सोनिया गांधी के चाबी वाले खिलौने की तरह चल रहा हो, जो देश के सामने अपने आप को मजबूर बताए, जिसके लिए ‘राष्ट्र धर्म‘ से बड़ा ‘गठबंधन धर्म‘ हो उसके नेतृत्व वाली बिना रीढ़ की सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है।
शिवराज की लिस्ट को आलाकमान की हरी झंडी का इंतजार
शिवराज की लिस्ट को आलाकमान की हरी झंडी का इंतजार
अक्टूबर में होगा शिवराज सरकार का अंतिम फेरबदल
चार मंत्रियों की रवानगी तय
लाल बत्ती पाने उठापटक तेज
लखनादौन से शशि ठाकुर की लग सकती है लाटरी
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। 2013 में होने वाले मध्य प्र्रदेश के विधानसभा चुनावों के पूर्व अंतिम बार मंत्रीमण्डल फेरदबल अक्टूबर माह में होने के संकेत मिले हैं। हृदय प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रीमण्डल में फेरबदल की सूची भाजपा हाईकमान को अनुमोदन के लिए भेज दी है। अब इंतजार नितिन गड़करी की हरी झंडी का है। इस फेरबदल में चार मंत्रियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है। उधर लाल बत्ती के जुगाड़ के लिए विधायकों ने अपने अपने आकाओं को सिद्ध करना आरंभ कर दिया है।
भारतीय जनता पार्टी के नेशनल हेडक्वार्टर के सूत्रों ने बताया कि शिवराज सिंह चौहान ने अपनी पिछली दिल्ली की यात्रा के दौरान ही झंडेवालान स्थित संघ मुख्यालय ‘केशव कुंज‘ और नितिन गड़करी से मंत्रीमण्डल फेरदबल के संबंध में चर्चा की है। उन्होंने अपनी प्रस्तावित सूची भी आला नेताओं को सौंप दी है। अगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मद्देनजर संघ और भाजपा के आला नेताओं से शिवराज सिंह चौहान का काफी मंथन हो चुका है।
पिछले दिनों शिवराज सिंह चौहान द्वारा वन टू वन अपने मंत्रियों से की गई चर्चा इसी मंथन का परिणाम मानी जा रही है। इस फेरबदल में जिन मंत्रियों की कुर्सी जाने की उम्मीद है उनमें बयानों के जरिए विवादों में रहने वाले गौरी शंकर बिसेन, नारायण सिंह कुशवाह, पारस जैन एवं वित्त मंत्री राघवजी भाई के नाम प्रमुख तौर पर सामने आए हैं। वहीं दूसरी ओर लाल बत्ती की कतार में खड़े नेताओं में जिन्हें उपकृत किया जा सकता है उनमें आदिवासी बाहुल्य सिवनी जिले की लखनादौन सीट से भाजपा का परचम लहराने वाली शशि ठाकुर, पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा, प्रेम नारायण ठाकुर, शरद जैन, गिरीश गौतम, ओम प्रकाश सकलेचा, मीना सिंह के नाम प्रमुख तौर पर सामने आ रहे हैं।
नरेंद्र मोदी हो सकते हैं राजग के पीएम इन वेटिंग
नरेंद्र मोदी हो सकते हैं राजग के पीएम इन वेटिंग
आड़वाणी की किस्मत में नहीं लाल किले की प्राचीर से संबोधन
रथ यात्राओं ने अब नहीं बदलने वाली आड़वाणी की किस्मत
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक बार फिर हिन्दुत्व के एजेंडे को वापस लाने के मूड में दिखाई दे रहा है। समूचे भारत में भारतीय जनता पार्टी की मट्टी पलीत से संघ के आला नेता नाखुश ही दिख रहे हैं। संघ के नेताओं का मानना है कि राजग के पीएम इन वेटिंग की गलत नीतियों का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। संघ के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर 2014 में भी भाजपा सत्ता से दूर रही तो आने वाले दिनों में भाजपा के साथ संघ का भी सांस लेना मुश्किल हो जाएगा। मिशन 2014 के लिए भाजपा की ओर से अपेक्षाकृत युवा चेहरे नरेंद्र मोदी पर दांव लगाया जा सकता है।
गुजरात में सत्ता का परचम लहराने वाले नरेंद्र मोदी की छवि खाटी हिन्दुवादी नेता के तौर पर स्थापित हो चुकी है। भाजपा के समस्त मुख्यमंत्रियों में नरेंद्र मोदी को एक कुशल राजनेता और प्रशासक के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि नरेंद्र मोदी का प्रबंधन कमाल का है। गुजरात सरकार को छः लोग मिलकर ही चला रहे हैं। पर्दे के पीछे रहने वाले इन लोगों की नीतियों से नरेंद्र मोदी खुद को स्थापित कर पाए हैं। गुजरात में पिछले दिनों हुए निवेश ने सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए हैं।
गौरतलब है कि पिछले दिनों विकीलीक्स केबल में भी इस बात के संकेत मिले थे कि गुजरात के निजाम नरेंद्र मोदी केंद्र में बड़ी भूमिका की तलाश में हैं। यद्यपि यह केबल 2005 के आधार पर था किन्तु 2009 के आम चुनावों में पुनः इस बात के संकेत मिले थे कि मोदी ही भाजपा के सबसे पसंदीदा चेहरा बनकर उभरे हैं। भाजपा के शिवराज सिंह चौहान की इमेज साधारण ग्रामीण की है किन्तु उनके दामन पर लगे भ्रष्टाचार के दागों के चलते वे पीएम मटेरियल नहीं बन पा रहे हैं। यह अलहदा बात है कि शिवराज की पीआर देख रहे लोग दिल्ली में उन्हें पीएम मटेरियल बनाने से नहीं चूक रहे हैं। इसके पीछे एमपी में तख्ता पलट की बात भी कही जा रही है। रही बात रमन सिंह की तो रमन सिंह ने अपने आप को छत्तीसगढ़ के औरे में ही कैद कर रखा है।
भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों का यह भी कहना है कि भाजपाध्यक्ष नितिन गड़करी ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अगर वे 2014 तक भाजपाध्यक्ष की कुर्सी पर रहे तो निश्चित तौर पर वे भी नरेंद्र मोदी को ही आगे करेंगे। वैसे भाजपा और संघ में चल रही बयार के अनुसार राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आड़वाणी को अब विश्राम देने के मूड में हैं अधिकांश नेता। इस लिहाज से देखा जाए तो बतौर प्रधानमंत्री आड़वाणी की किस्मत में लाल किले पर ध्वाजारोहण करना शायद नहीं लिखा है।
भाजपा में अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो आने वाले दिनों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का पीएम इन वेटिंग घोषित कर दिया जाएगा। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनते ही अधिकांश पार्टियां जो धर्म निरपेक्ष होने का स्वांग रचती हैं वे एक झंडे तले आ सकती हैं। वैसे आज की स्थिति में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ कुंलांचे मारते हुए उपर बढ़ते ही जा रहा है।
बच्चों के प्रति संजीदा नहीं सरकारें
बच्चों के प्रति संजीदा नहीं सरकारें
बुनियादी सुविधाओं का अभाव है आंगनवाड़ियों में
पैसा कमाने का जरिया बनीं आंगनवाड़ियां
राज्यों को भी नहीं परवाह बच्चों की
(लिमटी खरे)
नई दिल्ली। ‘‘सुविधाओं को तरसते देश के अधिकांश बच्चे आज भी कुपोषण से ग्रसित हैं। जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से संचित कर सरकारों द्वारा खर्च किए गए अरबों रूपए पानी में ही बह गए हैं।‘‘ उक्ताशय के निश्कर्ष संसदीय समिति ने अपने प्रतिवेदन में निकाले हैं। सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इस समिति ने माहिला एवं बाल विकास मंत्री को जमकर घेरा है। समिति ने पाया कि आधे से अधिक आंगनवाड़ियों में बुनियादी सुविधाएं ही नहीं हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की महिलाओं को सुदृण और आत्मनिर्भर बनाने संबंधी संसदीय समिति ने अपना आठवां प्रतिवेदन संसद में पेश किया है। इस प्रतिवेदन में बच्चों के विकास के प्रति कोताही बरतने पर सरकार की कड़ी आलोचना की गई है। समिति ने देश में 1975 में आरंभ की गई योजना में कुछ अमूल चूल परिवर्तन करते हुए आंगनवाड़ी और शिशु गृह में पैदा होने के बाद से तीन साल तक के बच्चों को भी शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। समिति का मानना है कि इससे एक ओर बच्चों में कुपोषण की समस्या से निजात मिल सकेगी वहीं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को भी शिशु गृह की सुविधा मिल सकेगी।
इस प्रतिवेदन में समिति ने पाया कि देश में संचालित आंगनवाड़ियों में आधी से अधिक जगहों पर पेयजल की सुविधा ही नहीं है। बच्चे प्यासे कंठ ही यहां रोते पाए गए। इतना ही नहीं इतनी ही संख्या में आंगनवाड़ियों में शौचालय ही नहीं थे। समिति ने महज पच्चीस फीसदी आंगनवाड़ियों में ही रसोईघर पाए। समिति ने यह भी पाया कि आंगनवाड़ी चलाने वालों के घरों पर ही एक कमरे में ही आंगनवाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं।
समिति को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर हुआ कि आंगनवाड़ी कार्यकताओं के लगभग नब्बे हजार और समेकित बाल विकास सेवा में निरीक्षकों के लगभग पंद्रह हजार पद रिक्त होने के बाद भी राज्यों द्वारा इस बारे में केंद्र को अंधेरे में ही रखा जा रहा है। समिति ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया है कि चार दशकों के बाद भी इसके लिए पात्र लगभग सोलह करोड़ में से महज साढ़े सात करोड़ बच्चों को ही शामिल किया गया है।
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