शनिवार, 10 मार्च 2012

सीएसआर में कटौती


सीएसआर में कटौती

(शरद खरे)

नई दिल्ली (साई)। भारतीय रिजर्व बैंक ने ऋण नीति की समीक्षा और आम बजट से पहले नकद आरक्षी अनुपात यानी सी.आर.आर. में दशमलव सात-पांच प्रतिशत की कटौती की है। सी.आर.आर. की नई दर अब साढ़े पांच प्रतिशत से घटकर चार दशमलव सात-पांच प्रतिशत हो गई है जो आज से लागू होगी।
बैंक अपनी कुल जमा राशि का एक तय प्रतिशत रिजर्व बैंक के पास जमा कराते हैं जिसे सी.आर.आर. कहते हैं। सी.आर.आर. में इस कटौती से बैंकों के पास ४८ हजार करोड़ रूपये अतिरिक्त आयेंगे। इस साल रिजर्व बैंक ने सी.आर.आर. में दूसरी बार कटौती की है।
इसके अलावा वित्त मंत्रालय से सम्बद्ध स्थायी संसदीय समिति ने आयकर सीमा मौजूदा एक लाख अस्सी हजार से बढ़ाकर तीन लाख रूपये करने की सिफारिश की है। पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली समिति ने कल अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने महिलाओं के लिए आयकर में छूट की सीमा बढ़ाने की भी सिफारिश की है।

विधायक का होगा पॉलीग्राफ टेस्ट


विधायक का होगा पॉलीग्राफ टेस्ट

(नंद किशोर)

नई दिल्ली (साई)। मध्यप्रदेश में इंदौर में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने सीबीआई को राज्य के भाजपा उपाध्यक्ष धु्रव नारायण सिंह के पॉलीग्राफ टेस्ट की इजाजत दे दी है। सीबीआई ने भोपाल की आर टी आई कार्यकर्ता शहला मसूद की हत्या के सिलसिले में विधायक श्री सिंह के पॉलीग्राफ टेस्ट की इजाजत मांगी थी। धु्रव नारायण सिंह भोपाल मध्य क्षेत्र से विधायक है। इससे पहले सीबीआई ने अपने भोपाल कार्यालय में सिंह से लगभग ६ घंटे तक पूछताछ की थी। जांच एजेंसी ने उनके भोपाल स्थित आधिकारिक निवास पर भी छापा मारा था।

विदेशी पर्यटकों की तादाद बढ़ी


विदेशी पर्यटकों की तादाद बढ़ी

(प्रियंका श्रीवास्तव)

नई दिल्ली (साई)। सरकार ने वर्ष २०१६ तक पर्यटन क्षेत्र में बारह प्रतिशत वृद्धि हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इससे देश में रोजगार के ढाई करोड़ से अधिक अतिरिक्त अवसर पैदा हो सकेंगे। यह जानकारी पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय ने बर्लिन के पर्यटन मेले में भारतीय मंडप का उद्घाटन करते हुए दी।
श्री सहाय ने कहा कि पर्यटन क्षेत्र के विकास से जुड़े मुद्दों के समाधान में मदद के लिए एक अंतर मंत्रालय समन्वय समिति बनाई गई है। उन्होंने कहा कि पर्यटन आर्थिक विकास का बड़ा साधन है और भारत में इस क्षेत्र में भारी संभावनाएं हैं। पर्यटन मंत्री ने बताया कि वर्ष २०१० के दौरान देश में विदेशी पर्यटकों की संख्या में ग्यारह दशमलव आठ प्रतिशत की वृद्धि हुई।

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

शिव प्रभात का गुण्डा राज!


शिव प्रभात का गुण्डा राज!



(लिमटी खरे)

एक समय देश के हृदय प्रदेश को शांति का टापू कहा जाता रहा है। पिछले दो दशकों में आपराधिक गतिविधियों में मध्य प्रदेश ने सारे रिकार्ड ही ध्वस्त कर दिए हैं। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में जबसे मध्य प्रदेश में भाजपा का शासन विशेष तौर पर शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री और प्रभात झा प्रदेश भाजपाध्यक्ष बने हैं तबसे मध्य प्रदेश में गुण्डा राज चरम पर है। एमपी में वन और खनन माफिया बेहद ताकतवर हो गया है। मध्य प्रदेश में कानून और व्यवस्था नाम की चीज नहीं बची है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी इसके विरोध की महज रस्म अदायगी ही कर रही है। खनिज माफिया के होसले इतने बुलंद हैं कि धुरैड़ी के दिए सरेराह ही भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी नरेंद्र कुमार को टेक्टर से कुचलकर उनकी इहलीला ही समाप्त कर दी गई। मध्य प्रदेश में राजनेताओं और माफिया की दबंगई का इससे घिनौना स्वरूप और कुछ नहीं हो सकता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, गृहमंत्री उमा शंकर गुप्त, एमपीबीजेपी प्रेजीडेंट प्रभात झा ने घटना की निंदा कर रस्म अदायगी कर ली है। मामला अब ठंडे बस्ते के हवाले करने की कवायद आरंभ हो जाएगी। विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी घडियाली आंसू बहाकर चुप्पी साध लेगी। जल्द ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा और फिर खनिज माफिया का नंगा नाच एक बार फिर आंरभ हो जाएगा।



अपने कर्तव्यों को तीज त्योहार से बड़ा समझने वाले 2009 बेच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी नरेंद्र कुमार के लिए गुरूवार का दिन काल बनकर आया। होली के दिन खनिज माफिया ने उनकी हत्या कर दी। गृह मंत्री उमा शंकर गुप्त खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उनकी हत्या हुई है। बावजूद इसके अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा सकी है। मध्य प्रदेश में कानून और व्यवस्था राजनेताओं के घर की लौंडी बनी हुई है। पुलिस की खाकी वर्दी को नेता अपने हिसाब से चला रहे हैं। विधायकों पर हत्या या हत्या के प्रयासों के संगीन आरोप लग रहे हैं। चाल चरित्र और चेहरे का जुमला मुंह में लिए भाजपा चुपचाप सब कुछ देख सुन रही है। कांग्रेस भी मूकदर्शक बनकर इस काम में भाजपा का साथ दे रही है।
हालात देखकर अगर यह कहा जाए कि शांति का टापू मध्य प्रदेश भी अब बिहार और उत्तर प्रदेश की राह पर चल पड़ा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। सूबे के आधा दर्जन विधायकों पर हत्या के आरोप लग चुके हैं। आरटीआई एक्टिविस्ट शाहला मसूद मामले में विधायक ध्रुव नारायण सिंह पर षणयंत्र में शामिल होने का आरोप लगा है। इसके पहले भाजपा के कमल पटेल, आशारानी सिंह, अनूप मिश्रा और जितेंद्र डागा पर हत्या के आरोप लगे हैं। वहीं कांग्रेस के ब्रजेंद्र सिंह राठोर पर भी हत्या का आरोप लगा था।
ब्रजेंद्र राठोर पर पूर्व मंत्री सुनील नायक की हत्या का आरोप लगा है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से जमानत लेकर काम चलाया है। वहीं कमल पटेल पर दुर्गेश जाटव हत्याकांड का आरोप है। वे इसके लिए जेल की हवा भी काट चुके हैं। आशारानी सिंह पर अपनी नौकरानी तिज्जी बाई की हत्या का आरोप है। दो माह जेल में बिताने के बाद उन्हें जमानत मिल गई है।  जितेंद्र डागा पर भोपाल विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी आधिकारी मदन गोपाल रूसिया की हत्या का आरोप है।
हालात साफ साफ इशारा कर रहे हैं कि एक ओर जहां कांग्रेस के शासन काल में मध्य प्रदेश में वन माफिया ताकतवर होकर उभरा था वहीं अब शिव प्रभात के राज में एमपी में खनिज माफिया की पौ बारह हो रही है। खनिज माफिया के तार इतने मजबूत हैं कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का तख्ता पलट की कोशिशों के बाद शिवराज को मजबूरी में इनके खिलाफ मुंह खोलना पड़ा था। वहीं कांग्रेस ने शिवराज पर खनिज माफिया को संरक्षण देने के आरोप लगाकर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया है।
2009 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी नरेंद्र कुमार वर्तमान में परिवीक्षा अवधि में बतौर अनुविभागीय अधिकारी पुलिस मुरैना में पदस्थ थे। कहा जाता है कि नरेंद्र कुमार ने अवैध उत्खनन और खनिज माफिया के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। राजनैतिक सरपरस्ती में चलने वाले इस धंधे के आगे नरेंद्र और मध्य प्रदेश पुलिस बौनी साबित हुई। मुरैना जिले में अवैध उत्खनन का आलम यह है कि वर्ष 2007 में तत्कालीन जिलाधिकारी आकाश त्रिपाठी और तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक हरी सिंह यादव पर भी खनिज माफिया ने जमकर हमला बोल दिया था। उस वक्त हुई गोलीबारी में उक्त दोनों ही अधिकारी बाल बाल बच गए थे। जब जिले का मुखिया कहलाने वाला कलेक्टर और जिले में कानून और व्यवस्था का रखवाला एसपी ही खनिज माफिया द्वारा घेर लिया गया हो तब भला बाकी की क्या बिसात।
याद पड़ता है कि मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में जब नक्सलवादी सर उठा रहे थे तब वहां पुलिस ने सख्ती की। नक्सलियों ने प्रतिकार स्वरूप एक अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पर हमला बोल दिया। इसके बाद पुलिस ने उन्हें इस कदर खदेडा कि वे सालों तक बिल में घुसे रहे। इसके बाद दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे की गला रेतकर इन नक्सिलयों ने नृशंस हत्या कर दी थी। फिर पुलिस ने कमान संभाली और उसके बाद बालाघाट में कोई बड़ी वारदात को नक्सली अंजाम नहीं दे पाए।
कहने का तात्पर्य महज इतना है कि अगर शासन प्रशासन किसी बात को ठान ले तो माफिया की इतनी ताकत नहीं कि वह सर उठा सके। विडम्बना ही कही जाएगी कि माफिया के आगे मध्य प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा घुटने टेके खड़ी नजार आ रही है। सरकार तो माफिया से अपनी कीमत वसूल रही होगी किन्तु विपक्ष में बैठी कांग्रेस की आखिर क्या मजबूरी है? दरआल, माफिया के आगे विपक्ष में बैठी कांग्रेस शांत इसलिए है क्योंकि कांग्रेस के युवा विधायक संजय पाठक भी खनिज व्यवसाय से जुड़े हैं और उन पर खनिज माफिया होने का आरोप भी है।
उधर, मध्यप्रदेश के मुरैना में खनन माफिया का शिकार बने आईपीएस अफसर नरेंद्र कुमार के पिता केशव देव का साफ कहना है कि उनके बेटे की हत्या में राजनेताओं का हाथ है और पुलिस का रुख भी असहयोगात्मक है। उन्होंने भाजपा के एक विधायक पर भी अंगुली उठाई और कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सब पता है। उन्घ्होंने आशंका जताई कि उनके द्वारा खुले आम यह सच कहने के बाद उनकी बहू को भी खतरा हो सकता है। केशव का यह भी कहना है कि मौत से एक दिन पहले नरेंद्र ने उन्हें बताया था कि वह खनन माफिया के खिलाफ काम कर रहे हैं और उन पर ऐसा नहीं करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मघ्य प्रदेश के एक भाजपा विधायक ने उनकी पुत्रवधू पर गलत काम करने के लिए दबाव डाला था। इनकार करने पर उनका तबादला करवा दिया गया। 15 दिन तक तो भोपाल सचिवालय में संबद्ध रखा गया और कोई काम भी नहीं लिया गया। जब उनसे उस विधायक का नाम बताने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा कि यह सब मुख्घ्यमंत्री के संज्ञान में है और नाम बताया तो उनकी बहू को खतरा हो सकता है।
नरेंद्र के पिता ने सोची समझी साजिश बताया है लेकिन मध्य प्रदेश के गृह मंत्री उमा शंकर गुप्ता ने कहा कि यह गलत है। उन्होंने कहा कि नरेंद्र की मौत के पीछे खनन माफिया का हाथ नहीं है। उनकी मौत के मामले में ड्राइवर को गिरफ्तार किया गया है। जांच हुए बिना ही उमा शंकर गुप्त ने खनिज माफिया को क्लीन चिट देना अपने आप में अनेकों अनुत्तरित प्रश्न छोड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर खनिज माफिया को संरक्षण देने के संगीन आरोप हैं। मध्य प्रदेश राज्य के गृह मंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे गुप्ता अगर खनिज माफिया के बचाव में आ रहे हों तब सूबे में कानून और व्यवस्था की क्या स्थिति होगी इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
वैसे नरेंद्र के पिता की पीड़ा को समझा जा सकता है। नरेंद्र के पिता केशव देव का कहना है कि अवैध खनन को रोक रहे उनके बेटे को ईमानदारी की सजा मिली है। उनका कहना है कि स्थानीय पुलिस अगर मदद करती तो शायद ये घटना नहीं होती। उन्होंने कहा कि उन्हें घटना की जानकारी तक पुलिस विभाग की ओर से नहीं दी गई। जब वह ग्वालियर पहुंचे तब भी उन्घ्हें कुछ बताने के बजाय सीधे बेटे का शव सौंप दिया गया। केशव देव ने मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। नरेंद्र के पिता की जांच की मांग को न्यायोचित ठहराया जा सकता है।
नरेंद्र की मौत पर मध्य प्रदेश में राजनीति भी शुरु हो गई है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय सिंह ने कहा है कि मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार के संरक्षण में माफिया अपनी समानांतर सरकार चला रहे हैं। राज्य में जो भी उनके हितों के रास्ते में आ रहा है वो बेखौफ होकर उसे रास्ते से हटा रहे हैं। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि सरकार माफिया के सामने कितनी कमजोर हो गई है। जबकि गृह मंत्री उमा शंकर गुप्ता इसे आईपीएस की मौत का राजनीतिकरण करने की विपक्षी साजिश बता रहे हैं।
आईपीएस अफसर नरेंद्र की मौत पर सियासी रोटियां सेंकने की निंदा की जाना जरूरी है। कांग्रेस को अगर लगता है कि सरकार कमजोर हो गई है और माफिया बेखौफ। तो कांग्रेस इसके लिए क्या कर रही है? कांगेस का संगठनात्मक ढांचा गांव गांव तक है, कांग्रेस इसके खिलाफ गांव से ही जेहाद का आगाज क्यों नहीं करती है? उत्तर साफ है हमाम में सब नंगे हैं! कांग्रेस का विरोध महज दिखावे से ज्यादा नहीं है।

(साई फीचर्स)

विभिन्न नाम और स्वरूपों में खेली जाती है देश में होली


विभिन्न नाम और स्वरूपों में खेली जाती है देश में होली

अनेकता में एकता भारत की विशेषता

होली तेरे नाम अनेक



(लिमटी खरे)

होली शब्द जेहन में आते ही सारा जहां रंगों से सराबोर दिखाई पडने लगता है। लगता है मानो कुदरत की सबसे अनुपम भेंट धरती और हम इंसानों सहित समूचे पशु पक्षी रंगों से नहा गए हों। होली का पर्व आते आते ही मन आल्हादित हो उठता है। युवाओं के मन मस्तिष्क में न जाने किसम किसम की भावनाएं हिलोरे मारने लगती हैं। प्रोढ और वृद्ध भी साल भर रंगो के इस त्योहार की प्रतिक्षा करते हैं। सबसे बडी और अच्छी बात तो यह है कि देश के हर धर्म, वर्ग, मजहब के लोग होली का पूरा सम्मान कर एक दूसरे से गले मिलने से नहीं चूकते हैं।
भारत को समूचे विश्व में अचंभे की नजरों से देखा जाता है। इसका कारण यह है कि यहां हर 20 किलोमीटर की दूरी पर बोलचाल की भाषा में कुछ न कुछ परिवर्तन दिखने लगता है। हिन्दुस्तान ही इकलौता एसा देश है जहां हर धर्म, हर पंथ, हर मजहब को मानने की आजादी है। दुनिया भर के लोग आश्चर्य इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि आखिर कौन सी ईश्वरीय ताकत है जो इतने अलग अलग धर्म, पंथ, विचार, मजहब के लोगों को एक सूत्र में पिरोए रखती है।
अगर देखा जाए तो भारत कुदरत की इस कायनात का एक सबसे दर्शनीय, पठनीय, श्रृवणीय करिश्मा होने के साथ ही साथ महसूस करने की विषय वस्तु से कम नहीं है, यही कारण है कि हर साल लाखों की तादाद में विदेशी सैलानी यहां आकर इन्ही सारी बातों के बारे में अध्ययन, चिंतन और मनन करते हैं। भारत के अंदर फैली एताहिसक विरासतों में विदेशी सैलानी बहुत ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं।
भारत के अनेक प्रांतों में होली को अलग अलग नामों से जाना जाता है। पर्व एक है, उल्लास भी कमोबेश एक ही जैसा होता है, बस नाम ही जुदा है। इसके साथ ही साथ इसे मनाने का अंदाज भी बहुत ज्यादा हटकर नहीं है। अगर आप इब्नेबबूता (मुगलकालीन धुमक्कड) बनकर समूचे देश की सैर करें तो आप पाएंगे कि वाकई होली एक है, भावनाएं एक हैं, प्रेम का इजाहर कमोबेश एक सा है, बस अंदाज कुछ थोडा मोडा जुदा है।

दुलैंडी

होली शब्द के कान में गूंजते ही देवर भाभी के बीच की नोक झोंक, छेड छाड के फिल्मी दृश्य जेहन में जीवंत हो उठते हैं। वैसे तो देश के अनेक भागों में देवर भाभी के बीच होने वाले पंच प्रपंच को होली से जोडकर देखा जाता है, पर हरियाणा में इसका बहुत ज्यादा प्रचलन है। मजे की बात यह है कि हरियाणा में इस दिन भाभी को देवर की पिटाई करने का सामाजिक हक मिल जाता है। इस दिन भाभी द्वारा पूरे साल भर की देवर की करतूतों हरकतों के हिसाब से उसकी पिटाई की जाती है। दिन ढलते ही शाम को लुटा पिटा देवर भाभी के लिए मिठाई लाता है।

फाग पूर्णिमा

बिहार में होली को फाग पूर्णिमा भी कहा जाता है। दरअसल फाग का मतलब होता है, पाउडर और पूर्णिमा अर्थात पूरे चांद वाला। बिहार में शेष हिन्दुस्तान की तरह आम तरह की ही होली मनाई जाती है। ‘‘नदिया के पार‘‘ में दिखाई होली बिहार में खेले जाने वाले फगवा की ओर इशारा करती है। बिहार में होली को फगवा इसलिए भी कहते हैं क्योंकि यह फागुन मास के अंतिम हिस्से और चैत्र मास के शुरूआती समय मनाई जाती है।

डोल पूर्णिमा

पश्चिम बंगाल में युवाओं द्वारा मनाई जाने वाली होली को डोल पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही केसरिया रंग का लिबास पहनकर युवा हाथों में महकते फूलों के गजरे और हार लटकाए हुए नाचते गाते मोहल्लों से होकर गुजरते हैं। कुछ स्थानों पर युवा पालकी में राधा कृष्ण की तस्वीर या प्रतिमा रखकर सज धजकर उल्लास से झूमते नाचते हैं।

बसंत उत्सव

पश्चिम बंगाल मेें इस उत्सव की शुरूआत नोबेल पुरूस्कार प्राप्त साहित्यकार गुरू रविंद्रनाथ टैगोर ने की थी। गुरूदेव के द्वारा स्थापित शांति निकेतन में बसंत उत्सव का पर्व बहुत ही सादगी और गरिमा पूर्ण तरीके से मनाया जाता है। शांति निकेतन के छात्र छात्राएं न केवल पारंपरिक रंगों से होली खेलते हैं, बल्कि गीत संगीत, नाटक, नृत्य आदि के साथ बसंत ऋतु का स्वागत करते हैं।

कमन पंडिगाई

तमिलनाडू में होली का पर्व कमन पंडिगाई के रूप में भी मनाया जाता है। तमिलनाडू में होली पर भगवान कामदेव की अराधना और पूजा की जाती है। यहां मान्यता है कि भोले भंडारी भगवान शिव ने जब कामदेव को अपने कोप से भस्म किया था, तो इसी दिन कामदेव की अर्धांग्नी रति के तप, प्रार्थना और तपस्या के उपरांत भगवान शिव ने उन्हें पुर्नजीवित किया था।

शिमगो

मूलतः शिमगो गोवा के इर्द गिर्द ही मनाया जाता है। महाराष्ट्र की कोकणी भाषा में होली को शिमगो का नाम दिया गया है। शेष भारत की तरह गोवा के लोग भी रंगों को आपस में उडेलकर बसंत का स्वागत करते हैं। इस पर्व पर ढेर सारे पकवान बनाए जाते हैं, आपस में बांटे जाते हैं। खासतौर पर पणजिम में यह त्योहार बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर आधारित नाटकों का मंचन भी इसी दिन किया जाता है।

होला मुहल्ला

पंजाब में होला मुहल्ला का इंतजार हर किसी को होता है। यह होली के दूसरे दिन आनंदपुर साहिब में लगने वाले सालाना मेले का नाम है। मान्यता है कि होला मुहल्ला की शुरूआत सिख पंथ के दसवें गुरू, ‘‘गुरू गोविंद सिंह जी‘‘ द्वारा की गई थी। तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व के दौरान सिख समुदाय के लोग खतरनाक खेलों का प्रदर्शन कर उनके माध्यम से अपनी ताकत और क्षमताओं का प्रदर्शन करते हैं।

रंग पंचमी

समूचे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित मालवा अंचल में होली का जश्न और सुरूर एक दो नहीं पूरे पांच दिन होता है। होलिका दहन के दूसरे दिन धुरैडी से लेकर रंग पंचमी तक लोग होली पूरे शबाब पर होती है। धुरैडी के उपरांत लोग पांचवा दिन अर्थात रंग पंचमी का बेसब्री से इंतजार करते हैं। प्रदेश के कुछ भागों में तो होली से ज्यादा आनंद रंग पंचमी का लिया जाता है। राज्य मेें खासतौर पर मछुआरा समुदाय इस पर्व को बडी ही धूमधाम के साथ मनाता है। वे जोरशोर से नाचते गाते बजाते हैं। इस दिन हुई शादी को वे बहुत ही शुभ मानते हैं।

(साई फीचर्स)

कांग्रेस नहीं चाहती महिलाओं का कल्याण


08 मार्च महिला दिवस पर विशेष

कांग्रेस नहीं चाहती महिलाओं का कल्याण



(लिमटी खरे)

आजाद हिन्दुस्तान में देश की सबसे शक्तिशाली महिला होकर उभरने के बावजूद भी सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी चौदहवीं लोकसभा में महिला आरक्षण जैसे महात्वपूर्ण बिल को पास नहीं करवा सकीं। अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने अवश्य कहा है कि सरकार में आने पर महिलाओं की तीस फीसदी भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। पिछले अनेक मर्तबा संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही मौन साध रखा था। अगर कांग्रेस के 2004 में सत्ता में आने के उपरांत मनमोहनी घोषणापत्र को अमली जामा पहनाया होता तो निश्चित रूप से आने वाले आम चुनावों के बाद आजादी के छः दशकों के उपरांत देश में महिलाओं की दशा में सुधार परिलक्षित हो सकता था, वस्तुतः एसा नहीं हुआ नहीं, क्योंकि घोषणा पत्र को मतदाताओं को लुभाने के लिए ही किया जाता रहा है। विडम्बना है कि देश की महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष श्रीमति सुषमा स्वराज के साथ ही साथ लगभग दो दशकों से कांग्रेस के सत्ता और शक्ति का केंद्र बन चुकी श्रीमति सोनिया गांधी के महिला होने के बाद भी महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल सका है।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस 8 मार्चको मानया जाता है। अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन, यह दिवस सबसे पहले सबसे पहले यह 28 फरवरी 1909 में मनाया गया। इसके बाद यह फरवरी के आखरी इतवार के दिन मनाया जाने लगा। 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकर देशों में महिला को वोट देने का अधिकार नहीं था।
1917 में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी। ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये। उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक 1917 की फरवरी का आखरी इतवार 23 फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन 8 मार्च थी। इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये 8 मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
2004 में जैसे ही कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार केंद्र पर काबिज हुई, और सरकार के अघोषित सबसे शक्तिशाली पद पर कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी बैठीं तभी लगने लगा था कि आने वाले समय में सरकार द्वारा महिलाओं के हितों का विशेष ध्यान रखा जाएगा। पांच साल बीत गए पर महिलाओं की स्थिति में एक इंच भी सुधार नहीं हुआ है।
महिलाओं के फायदे वाले सारे विधेयक आज भी सरकार की अलमारियों में पड़े हुए धूल खा रहे हैं। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई (33 फीसदी) भागीदारी सुनिश्चित करने संबंधी विधेयक अंततः लोकसभा में पारित ही नहीं हो सका। राजनैतिक लाभ हानि के चक्कर में संप्रग सरकार ने इस विधेयक को हाथ लगाने से परहेज ही रखा।
महिलाओं की हालत क्या है यह बताता है उत्तर प्रदेश में किया गया एक सर्वेक्षण। सर्वे के अनुसार 1952 से 2002 के बीच हुए 14 विधानसभा चुनावों में प्रदेश में कुल 235 महिला विधायक ही चुनी गईं थीं। इनमें से सुचिता कृपलानी और मायावती ही एसी भाग्यशाली रहीं जिनके हाथों मंे सूबे की बागड़ोर रही।
चुनाव की रणभेरी बजते ही राजनैतिक दलों को महिलाओं की याद सतानी आरंभ हो जाती है। चुनावी लाभ के लिए वालीवुड के सितारों पर भी डोरे डालने से बाज नहीं आते हैं, देश के राजनेता। भीड़ जुटाने और भीड़ को वोट मंे तब्दील करवाने की जुगत में बड़े बड़े राजनेता भी रूपहले पर्दे की नायिकाओं की चिरोरी करते नज़र आते हैं।
देश के ग्रामीण इलाकों में महिलाओ की दुर्दशा देखते ही बनती है। कहने को तो सरकारों द्वारा बालिकाओं की पढ़ाई के लिए हर संभव प्रयास किए हैं। किन्तु ज़मीनी हकीकत इससे उलट है। गांव का आलम यह है कि स्कूलों में शौचालयों के अभाव के चलते देश की बेटियां पढ़ाई से वंचित हैं।
प्राचीन काल से माना जाता रहा है कि पुरातनपंथी और लिंगभेदी मानसिकता के चलते देश के अनेक हिस्सों मंे लड़कियों को स्कूल पढ़ने नहीं भेजा जाता। एक गैर सरकारी संगठन द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार उत्तर भारत के अनेक गांवों में बेटियों को शाला इसलिए नहीं भेजा जाता, क्योंकि वे अपनी बेटी को शिक्षित नहीं करना चाहते। इसकी प्रमुख वजह गांवों मंे शौचालय का न होना है।
शौचालयों के लिए केंद्र सरकार द्वारा समग्र स्वच्छता अभियान चलाया है। इसके लिए अरबों रूपयों की राशि राज्यों के माध्यम  से शुष्क शोचालय बनाने में खर्च की जा रही है। सरकारी महकमों के भ्रष्ट तंत्र के चलते इसमें से अस्सी फीसदी राशि गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से सरकारी मुलाजिमों ने डकार ली होगी।
सदियों से यही माना जाता रहा है कि नारी घर की शोभा है। घर का कामकाज, पति, सास ससुर की सेवा, बच्चों की देखभाल उसके प्रमुख दायित्वों में शुमार माना जाता रहा है। अस्सी के दशक तक देश में महिलाओं की स्थिति कमोबेश यही रही है। 1982 में एशियाड के उपरांत टीवी की दस्तक से मानो सब कुछ बदल गया।
नब्बे के दशक के आरंभ में महानगरों में महिलाओं के प्रति समाज की सोच में खासा बदलाव देखा गया। इसके बाद तो मानो महिलाओं को प्रगति के पंख लग गए हों। आज देश में जिला मुख्यालयों में भी महिलाओं की सोच में बदलाव साफ देखा जा सकता है। कल तक चूल्हा चौका संभालने वाली महिला के हाथ आज कंप्यूटर पर जिस तेजी से थिरकते हैं, उसे देखकर प्रोढ़ हो रही पीढी आश्चर्य व्यक्त करती है।
कहने को तो आज महिलाएं हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं, पर सिर्फ बड़े, मझौले शहरों की। गांवों की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है। देश की अर्थव्यवस्था गावों से ही संचालित होती है। देश को अन्न देने वाले अधिकांश किसानों की बेटियां आज भी अशिक्षित ही हैं।
आधुनिकीकरण की दौड़ में बड़े शहरों में महिलाओ ने पुरूषों के साथ बराबरी अवश्य कर ली हो पर परिवर्तन के इस युग का खामियाजा भी जवान होती पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है। मेट्रो में सरेआम शराब गटकती और धुंए के छल्ले उड़ाती युवतियों को देखकर लगने लगता है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति कितने घिनौने स्वरूप को ओढ़ने जा रही है।
पिछले सालों के रिकार्ड पर अगर नज़र डाली जाए तो शराब पीकर वाहन चलाने, पुलिस से दुर्व्यवहार करने के मामले में दिल्ली की महिलाओं ने बाजी मारी है। टीवी पर गंदे अश्लील गाने, सरेआम काकटेल पार्टियां किसी को अकर्षित करतीं हो न करती हों पर महानगरों की महिलाएं धीरे धीरे इनसे आकर्षित होकर इसमें रच बस गईं हैं। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि महानगरों और गांव की संस्कृति के बीच खाई बहुत लंबी हो चुकी है, जिसे पाटना जरूरी है। अन्यथा एक ही देश में संस्कृति के दो चेहरे दिखाई देंगे।
बहरहाल सरकारों को चाहिए कि महिलाओं के हितों में बनाए गई योजनाओं को कानून में तब्दील करें, और इनके पालन में कड़ाई बरतें। वरना सरकारों की अच्छी सोच के बावजूद भी छोटे शहरों और गांव, मजरों टोलों की महिलाएं पिछड़ेपन को अंगीकार करने पर विवश होंगी।

(साई फीचर्स)

बुधवार, 7 मार्च 2012

फ्यूज हो गई कनफ्यूज भाजपा


फ्यूज हो गई कनफ्यूज भाजपा



(समीर चौंगावकर)

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में अगर कांग्रेस कमतर हुई है तो भाजपा की स्थिति कमतर से भी ज्यादा बदतर हो गई है. कभी भाजपा का गढ़ रहे उत्तर प्रदेश में ही अपनी लाज बचाने में कामयाब नहीं हो पाई और जितनी सीटें थीं उसमें से भी पांच सीटें गंवा दी. पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने वैसे तो प्लान किया था कि जितनी सीटें हैं उससे दोगुनी पर जाएंगे लेकिन उत्तर प्रदेश की जनता ने न सिर्फ नितिन गडकरी को गर्त में डाल दिया बल्कि प्रदेश में पूरी भाजपा का ही लगभग सफाया हो गया है.
उत्तर प्रदेश में इस बार का विधानसभा चुनाव भाजपा के कई नेताओं और खुद पार्टी अध्यक्ष के लिए प्राथमिक परीक्षण बन गया था. नितिन गडकरी ने उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति बेहतर करने के लिए सारे साधन और संसाधन झोंक दिये थे. नागपुर से दिल्ली होते हुए लखनऊ तक नितिन गडकरी ने कहीं कोई कमी नहीं रहने दी थी. लेकिन जब चुनाव परिणाम सामने आये तो पता चला कि नितिन गडकरी की सारी कवायद को जनता ने कोई तवज्जो नहीं दिया.
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव परिणाम भाजपा के लिए बेहद चौंकानेवाला है. लेकिन केवल भाजपा ही नहीं चौंक रही है. भाजपा का वैचारिक आका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो भौचक्का रह गया है. पिछले पांच बार से जो अयोध्या भाजपा की परंपरागत सीट बन गई थी इस बार वह सीट भी हाथ से जाती रही. अयोध्या में हार को भाजपा गंभीरता से ले न लेलेकिन संघ ने बहुत गंभीरता से लिया है. अयोध्या में समाजवादी पार्टी के तेज नारायण पांडेय विजयी हुए हैं. इस सीट पर हार के बाद से ही नागपुर के महाल में सन्नाटा पसरा हुआ है. बताया जा रहा है कि संघ प्रमुख तक को सदमा लगा है. इसका कारण एक तो अयोध्या से भाजपा और संघ का भावनात्मक लगाव है तो दूसरा बड़ा कारण यह है कि अयोध्या की कुल आबादी में एक तिहाई स्वयंसेवक हैं. कॉडर की इतनी बड़ी संख्या के रहते अगर भाजपा अपनी अयोध्या को नहीं बचा पाई तो उसका लंकादहन होने से कौन रोक सकता है?
लेकिन अयोध्या के जाने का सदमा ही नहीं है. पथरदेवा से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही अपनी सीट नहीं बचा पाये तो इलाहाबाद से एक और वरिष्ठ नेता केशरीनाथ त्रिपाठी भी पटखनी खाकर औंधे गिरे पड़े हैं. गाजियाबाद से सांसद राजनाथ सिंह ने पूरे प्रदेश में जमकर दौरा किया था और जितनी सभाएं राजनाथ सिंह ने की थी उतनी शायद किसी और भाजपा नेता नहीं की. लेकिन तमाशा देखिए कि राजनाथ सिंह की गाजियाबाद सीट की वह सीट भी हाथ से जाती रही जिसकी बदौलत राजनाथ सिंह को लोकसभा चुनाव में जीत हासिल हुई थी. गाजियाबाद की साहिबाबाद सीट से सुनील शर्मा हार गये और लोनी में भी राजनाथ का लठैत लाठी नहीं भांज पाया. हांलालजी टंडन अपने बेटे गोपाल टंडन को चुनाव जितवाने में कामयाब नहीं हो पाये. इन हारते परिदृश्यों के बीच अगर कोई लाज बचाकर बाहर निकल आया है तो वे हैं कलराज मिश्र और उमा भारती जो कि लखऩऊ सिटी और चरखारी की सीटें जीतने में कामयाब रहे हैं. शायद उमा भारती के होने का ही असर है कि पड़ोस की हमीरपुर सीट भी भाजपा के खाते में चली गई है.
अगर हम उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के चुनावी रणनीति का आंकलन करें तो हमें दिखता है कि पूरे प्रचार के दौरान भाजपा कन्फ्यूज दिखी. नेताओं की भीड़ ने भागदौड़ तो बहुत की लेकिन इस भागदौड़ और मंथन से वे कुछ हासिल नहीं कर पाये. नकवी जैसे नकारा नेता को प्रबंधन सौंप दिया गया जो चुनाव जीतने की रणनीति बनाने से ज्यादा अपनों पर उपकार करने में ही जुटे रहे. खुद गडकरी कहीं उमा भारती को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बताते तो कहीं कलराज मिश्र का नाम लेते. इसी कन्फ्यूजन का परिणाम हुआ कि प्रदेश में भाजपा की बत्ती फ्यूज हो गई.
अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की इस करारी हार का खुद भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं पर क्या असर पड़ेगाभाजपा की इस हार की मार से न तो नितिन गडकरी बच पायेंगे और न ही संजय जोशी या उमा भारती को छुटकारा मिलेगा. भाजपा के अंदर जो योजनाएं पक रही थींउसके अनुसार अगर उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होता तो संजय जोशी कई राज्यों के प्रभार के साथ राज्यसभा में नजर आते तो उमा भारती केन्द्र में महासचिव बन बिराजतीं. लेकिन अब ऐसा होना मुश्किल लगता है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हार की मार इन्हीं तीनों नेताओं पर ही पड़ेगी. प्रदेश के कुछ बड़े नेता मसलनराजनाथ सिंहलालजी टंडन या कलराज मिश्र को भी इस हार का खामियाजा भुगतना होगा.
उत्तर प्रदेश में भाजपा की इस हार से अगर नितिन गडकरीउमा भारती या संजय जोशी पर मार पड़ने की आशंका दिख रही है तो कुछ नेता ऐसे भी हैं जिनका कद पार्टी में ऊंचा उठेगा. इसमें सबसे पहला नाम नरेन्द्र मोदी का है. नरेन्द्र मोदी पूरे चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश नहीं गये. जो जानकारी है वह यह कि नरेन्द्र मोदी न तो चुनाव प्रबंधन से संतुष्ट थे और न ही संजय जोशी या सुधीन्द्र कुलकर्णी जैसे नेताओं की मौजूदगी से. नरेन्द्र मोदी के अलावा सुषमा स्वराजअरुण जेटली और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता भी राहत की सांस लेंगे जो दम साधे केवल प्रचार देख रहे थे.
उत्तर प्रदेश में हुई भाजपा की हार के बाद संघ कुछ बड़े बदलाव भी कर सकता है. आगामी 16-17-18 मार्च को संघ के पदाधिकारियों की अखिल भारतीय बैठक होनेवाली है. इस बैठक में भाजपा को ष्मजबूतष् करनेवाले कुछ ऐसे निर्णय लिये जा सकते हैं जिससे भाजपा के कुछ नेताओं पर गाज गिर सकती है. क्योंकि संघ को जितनी चिंता उत्तर प्रदेश में भाजपा के हारने की है उससे ज्यादा चिंता मुलायम सिंह यादव के जीतने की है. मौलाना मुलायम की उत्तर प्रदेश की मौजूदगी को संघ जाया नहीं जाने देगाइसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उत्तर प्रदेश की करारी शिकस्त के बाद भाजपा के कुछ बड़े नेता पस्त कर दिये जाएं.
(साई फीचर्स)

होली पर सिवनी का दर्द!!!!!


होली पर सिवनी का दर्द!!!!!



(संजय तिवारी)

एन.एच. के गड्ढ़ों और सड़कों से उड़ती धूल।
            जिले में नेता और अधिकारी सब बनाते हमको फूल।।

बधिया कर राजनीति को बना दिया सैटिंग का खेल
            भ्रष्ट नेता भ्रष्ट अधिकारियों के बीच लूटने की रेलम पेल।।

जिले में दबंगता की नहीं खस्सीपन की घुट्टी पिलायी जाती है।
         जमीन में नहीं बैनर, पोस्टर, होर्डिंग्स से राजनीति की जाती है।।

जिले का नहीं मेरा विकास हमारे नेताओं का ये नारा है।
         गाड़ी, बंगला, पैसा बना लो अगली सात पीढ़ियों का गुजारा है।।

 भ्रष्ट और भ्रष्टाचार का स्वर्ग है हमारा सिवनी जिला।
          माल खाते नेता कार्यकर्ताओं से जपवाते नैतिकता की माला।।

हम बाहर से आये भैया और दीदी को सिर पर बैठाते हैं।
          अपनों की समीक्षा कर भैया दीदी को लोकप्रिय बताते हैं।।

जिले में है विकास पुरूष, लोकप्रिय, अपराजित कद्दावर और महाबलि।
            फिर क्यों बार-बार चढ़ती है लोकसभा, संभाग और फोरलेन की बलि।।

बदल रहे हैं मापदंड कौन होगा हमारा नायक, है यह सवाल।
            कागजों पर नायक बनाने वालों की चांदी, जनता को है मलाल।।

लालबत्ती वाली गाड़ी उजियारे वस्त्रों की बिखरी है छटा।
             सिवनी के उतर रहे हैं कपड़े जनता का मन है खट्टा।।

हम जनता भी कुछ कम नहीं, एक दूसरे को बताते मुर्दा।
           अपना आक्रोश सिर्फ बतियाते, मेरे घर में नहीं बाजू में हो भगतसिंह पैदा।।

कह दिया जो कहना था होली का है त्यौहार।
            बुरा लगे तो बुरा मानना चला दो आक्रोश की बौछार।।

(साई फीचर्स)

मंगलवार, 6 मार्च 2012

शिंदे को नहीं मिल पा रहा उर्जा मंत्रालय से करंट


शिंदे को नहीं मिल पा रहा उर्जा मंत्रालय से करंट

मुख्यमंत्री या राष्ट्रपति बनने की चहत है सुशील शिंदे की



(लिमटी खरे)

नई दिल्ली (साई)। लगता है महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे अब उर्जा मंत्रालय से उकता चुके हैं। उनके मन में एक बार फिर महाराष्ट्र जाने की इच्छाएं कुलबुलाने लगीं हैं। वैसे कांग्रेस की ओर से अगर उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो वे शायद ही इसका विरोध करें। उधर, देश भर में लगने वाले कोल आधारित पावर प्लांट्स में शिंदे की दिलचस्पी उनके विरोधियों का प्रमुख हथियार बन सकती है।
उर्जा मंत्री के करीबी सूत्रों का दावा है कि अब सुशील कुमार शिंदे को उर्जा मंत्रालय रास नहीं आ रहा है। उन्होंने राष्ट्रपति के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को हटाकर महाराष्ट्र के निजाम की कुर्सी पर बैठने का मानस बना लिया है। दरअसल, महाराष्ट्र में बीएमसी चुनावों में कांग्रेस के औंधे मुंह गिरने के बाद इसका ठीकरा चव्हाण के सिर पर ही फोड़ा जा रहा है।
कांग्रेस की सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस आलाकमान से की गई शिकायत में साफ कहा गया है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस की पराजय के लिए सीएम पृथ्वीराज चव्हाण की अकर्मयता ही प्रमुख कारक है। महाराष्ट्र में चव्हाण के खिलाफ जमकर माहौल बन चुका है। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस आलाकमान को मशविरा दिया गया है कि जल्द ही महाराष्ट्र में सत्ता और संगठन को एक बार मथ दिया जाए।
सूत्रों ने कहा कि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री हर कीमत पर बदला जाएगा। वैसे इस पद के लिए विलास राव देशमुख के नाम पर भी विचार किया जा रहा है। शिन्दे और देशमुख दोनों ही मराठा क्षत्रप होने के साथ ही साथ शरद पवार की गुड बुक्स में इनके नामों का शुमार है। सूबे में बिना शरद पंवार को साधे कांग्रेस एक कदम भी चलने में अपने आप को असहज ही महसूस कर रही है।
वहीं, दूसरी ओर महाराष्ट्र के सीएम पद की ताजपोशी किसकी होगी, इस बारे में फैसला मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष की आसनी पर किसी नेता के बैठने के बाद ही होगा। अगर मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर अगर किसी मराठा को बिठा दिया गया तो निश्चित तौर पर सीएम पद पर मराठा क्षत्रप को नहीं बिठाया जाएगा। वैसे मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष के लिए प्रिया दत्त, दलित सांसद एकनाथ गायकवाड, विधायक जगत मराठा, दलित विधायक चन्द्रकांत हंडोर आदि के नाम प्रमुख तौर पर चल रहे हैं।
सूत्रों की मानें तो अगर किसी मराठा को मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया जाता है तो शिंदे की दावेदारी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के लिए सबसे मजबूत हो जाती है, क्योंकि वे दलित हैं। उधर, शिंदे के करीबी सूत्रों ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि अगर कांग्रेस द्वारा सुशील कुमार शिंदे को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो वे इसके लिए भी सहर्ष तैयार हो जाएंगे।
देश भर में लगने वाले अनेक पावर प्रोजेक्ट्स में शिंदे की भूमिका पर सवालिया निशान लगाने की तैयारी भी जोर शोर से की जा रही है। शिंदे विरोधी, विशेषकर महाराष्ट्र के अनेक क्षत्रपों द्वारा बड़े बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा देश भर में लगने वाले कोल अधारित पावर प्लांट्स और शिंदे के बीच समीकरणों के तार खोजे जा रहे हैं। इस तरह के पावर प्रोजेक्ट्स में शिंदे की दिलचस्पी आने वाले दिनों में उर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे की परेशानी का सबब बनें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

सोमवार, 5 मार्च 2012

भाड में जाए संगठन




मध्‍य प्रदेश के उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्‍ल शनिवार को सिवनी जिले के घंसौर में मशहूर उदयोगपति गौतम थापर के स्‍वामित्‍व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्‍ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के पावर प्‍लांट में अनेक कामों की आधार शिला रखने घंसौर पहुंचे। दौरा इतना गुपचुप था कि जिला भाजपा और स्‍थानीय विधायक को भनक तक नहीं लग पाई। मंत्री महोदय ने जिला भाजपा संगठन और स्‍थानीय विधायक को ठेंगा दिखाया। गौतम थापर को प्रसन्‍न करने अनेक कामों की आधार शिला रखी और उड लिए सिवनी से। भाजपा संगठन और विधायक हैरत में हैं कि उनकी उपेक्षा आखिर सरकार कैसे कर सकती है

चर्चा में मशगूल मंत्री जी



मध्‍य प्रदेश के उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्‍ल शनिवार को सिवनी जिले के घंसौर में मशहूर उदयोगपति गौतम थापर के स्‍वामित्‍व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्‍ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के पावर प्‍लांट में अनेक कामों की आधार शिला रखने घंसौर पहुंचे। भ्रमण के दौरान उर्जा सचिव मोहम्‍मद सुलेमान से चर्चारत मंत्री महोदय। जिला भाजपा और स्‍थानीय विधायक यहां भी नहीं।

मंत्री जी ने कर दिया वृक्षारोपण




मध्‍य प्रदेश के उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्‍ल शनिवार को सिवनी जिले के घंसौर में मशहूर उदयोगपति गौतम थापर के स्‍वामित्‍व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्‍ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के पावर प्‍लांट में अनेक कामों की आधार शिला रखने घंसौर पहुंचे। संयंत्र प्रबंधन ने तो वृक्षारोपण पर ध्‍यान नहीं दिया पर मंत्री जी ने लगा दिया पौधा। गौरतलब बात यह है कि क्षेत्रीय लखनादौन की विधायक श्रीमति शशि ठाकुर और जिला भाजपा ने इस कार्यक्रम का अघोषित बहिष्‍कार किया

चल दिए मंत्री जी प्‍लांट की ओर




मध्‍य प्रदेश के उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्‍ल शनिवार को सिवनी जिले के घंसौर में मशहूर उदयोगपति गौतम थापर के स्‍वामित्‍व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्‍ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के पावर प्‍लांट में अनेक कामों की आधार शिला रखने घंसौर पहुंचे। उनके साथ सिवनी के पूर्व कलेक्‍टर और उर्जा सचिव मोहम्‍मद सुलेमान एवं वर्तमान कलेक्‍टर अजीत कुमार भी दिख रहे हैं

यह आया मंत्री जी का हेलीकाप्‍टर


मध्‍य प्रदेश के उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्‍ल शनिवार को सिवनी जिले के घंसौर में मशहूर उदयोगपति गौतम थापर के स्‍वामित्‍व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्‍ठान मेसर्स झाबुआ पावर लिमिटेड के पावर प्‍लांट में अनेक कामों की आधार शिला रखने घंसौर पहुंचे। दौरा इतना गुपचुप था कि जिला भाजपा और स्‍थानीय विधायक को भनक तक नहीं लग पाई।

युवराज या अपनी टीम बना रहे पुलक!


ये है दिल्ली मेरी जान



(लिमटी खरे)

युवराज या अपनी टीम बना रहे पुलक!
देश के सबसे ताकतवर नौकरशाह 1974 बैच के यूपी काडर के आईएएस पुलक चटर्जी इन दिनों काफी व्यस्त नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में पुलक चटर्जी का इकबाल जबर्दस्त तरीके से बुलंद है। उन्हें अभी राज्य मंत्री का दर्जा नहीं मिला है फिर भी उन्हें बेहद बड़ा बंग्ला आवंटित कर दिया गया है। पीएमओ के सूत्रों का कहना है कि कैबनेट मंत्री और राज्य मंत्री सर झुकाकर पुलक चटर्जी का अभिवादन करते हैं। सूत्रों ने बताया कि पुलक चटर्जी को कहा गया है कि वे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की ताजपोशी का इंतजाम पुख्ता करें। इसलिए पुलक इन दिनों राहुल गांधी के मिजाज के हिसाब से टीम बनाने में जुटे हुए हैं। मूलतः संजय गांधी की खोज पुलक ने गांधी परिवार को पूरी तरह सिद्ध कर रखा है। कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि अगस्त 2013 में सेवानिवृत होने के बाद बाबू मोशाय भी अपनी सियासी पारी आरंभ कर सकते हैं इसलिए वे वर्तमान में राहुल के बजाय अपनी टीम बनाने में जुटे हुए हैं।

हिन्दुस्तां की सरज़मीं पर फिर गोरों की फोज!
दुनिया के चौधरी अमरीका के सबसे ताकतवर कार्यालय पेंटागनके एक शीर्ष कमांडर का खुलासा चौंकाने वाला है। एडमिरल राबर्ट विलार्ड ने कहा है कि आतंकवाद विशेषकर लश्कर ए तैयबा से निपटने के लिए अमरीका का फौजी दस्ता भारत सहित नेपाल, श्रीलंका, बंग्लादेश, मालद्वीव में तैनात है। एडमिरल विलार्ड ने संसद की समिति में सांसद जॉय विलियम्स के सवाल के जवाब में यह जानकारी दी है। यह खबर अपने आप में चौंकाने वाली इसलिए है क्योंकि भारत सरकार का रक्षा मंत्रालय इस तरह की खबरों को सिरे से नकार रहा है। देश में उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावों के बाद सियासी समीकरणों के बीच अब राजनैतिक बियावान में अमरिका उवाच और भारत सरकार के खण्डन के निहितार्थ ढूंढे जा रहे हैं कि आखिर क्या वजह है कि अमरिका इस बात को हवा दे रहा है कि उसकी गोरी फोजें भारत की सरज़मीं पर हैं और भारत सरकार इसका खण्डन करने पर आमदा है! एक बार ब्रितानी गोरों की फौज ने देश पर शासन किया अब लगता है दुनिया का चौधरी भी हिन्दुस्तान फतह का ताना बाना बुन रहा है।

मेडम माया का शनि भारी!
उत्तर प्रदेश में एक्जिट पोल के आंकड़ों को देखकर लगने लगा है कि यूपी में त्रिशंकु सरकार बनने के आसार हैं। सरकार अगर बनी तो सभी को सायकल (समाजवादी पार्टी) की सवारी गांठने पर मजबूर होना पड़ेगा। कांग्रेस का पंजा सायकल के हेंडल पर रखा नजर आ रहा है। संभवतः यही कारण है कि वोटिंग पूरी होते ही एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई ने यूपी के हेल्थ मिनिस्टर बाबू सिंह कुशवाह को धर पकड़ा। सियासी जानकार कहते हैं कि यह सब मायावती पर दबाव बनाने के लिए कांग्रेस के रणनीतिकारों द्वारा चली गई चाल के अलावा और कुछ नहीं है। गौरतलब है कि पहले भी सीबीआई को कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के इशारों पर चलने के आरोप लगते रहे हैं। इसके पहले भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते मायावती ने कुशवाह को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। माना जा रहा है कि कुशवाह ने 19 फरवरी को नो घंटे चली पूछताछ में अहम बातें उगलीं थीं, यही कारण है कि सीबीआई ने पुनः उन्हें अपने कब्जे में ले लिया है।

क्या अस्त हो जाएगा धु्रव तारा!
मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक ध्रुव नारायण सिंह से शहला मसूद हत्याकांड के सिलसिले में सीबीआई ने पूछताछ आरंभ कर दी है। धु्रव नारायण सिंह पहले पर्याटन विकास निगम के अध्यक्ष रह चुके हैं, उस दौरान उनकी कारगुजारियों पर भी सीबीआई की नजर है। भाजपा के 11, अशोक रोड़ स्थित नेशनल ऑफिस के सूत्रों का कहना है कि दरअसल, धु्रव नारायण सिंह की पत्रकारों से खासी छनती है। उन पर एमपी के निजाम शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ माहौल बनाने के आरोप दबी जुबान से लगते रहे हैं।  चर्चा है कि धु्रव नारायण सिंह मण्डली द्वारा शिवराज के खिलाफ बातें ऑफ द रिकार्ड हवा में उछाल कर चौहान की नाक में दम कर रखी थी। वैसे यह बात भी सियासी गलियारों में है कि धु्रव नारायण की सीढ़ी पर चढ़कर सीबीआई पत्रकार से राजनेता बने संसद सदस्य तरूण विजय की गिरेबान तक अपने हाथ ले जा सकती है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भले ही सिंह को क्लीन चिट दे रही हों पर माना जा रहा है कि उनकी सियासी दखल अब समाप्त होने को ही है।

मुश्किल में माल्या
मंहगी शराब की बोतलें और वर्ष 2012 के अर्धनग्न कलेंडर बांटकर सांसदों को अपने पक्ष में करने का सपना देखने वाले शराब व्यवसायी कम राजनेता विजय माल्या की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। माल्या के स्वामित्व वाली किंगफिशर एयरलाईंस के चालीस खाते सेवाकर विभाग द्वारा सील कर दिए गए। माल्या की कंपनी पर सत्तर करोड़ रूपए बकाया थे, जिनमें से माल्या ने तीस करोड़ रूपए अदा कर दिए हैं। उधर, विजय पुत्र सिद्धार्थ की सिने तारिका दीपिका पदुकोण से दूरियां बढ़ चुकी हैं। आईपीएल के दौरान खुशी से चहककर सिद्धार्थ के सीने लगने वाली दीपिका ने एक एवार्ड सेरेमनी में सिद्धार्थ से पर्याप्त दूरी बनाकर रखी। पिता पुत्र की कारस्तानियां गजब ढा रही हैं। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि आईपीएल में करोड़ों अरबों रूपए की टीम खरीदकर कई गुना मुनाफा कमाने वाले विजय माल्या का प्रबंधन इतना खराब कैसे कहा जा सकता है कि उनके स्वामित्व वाली एयरलाईंस जमीन से उठ ही नहीं पा रही है।

. . . और निकाल दी उमा की हवा!
सियासत भी बड़ी ही अज़ीब चीज है। इसमें सब कुछ संभव है। उत्तर प्रदेश में अंतिम दौर के दरम्यान भाजपा नेतृत्व ने तेज तर्रार साध्वी उमा भारती को आगे बढ़ाते हुए उन्हें महिमा मण्डित किया। गड़करी के ग्रीन सिग्नल से उमा भारती पूरे जोश में आ गईं। अब सियासी जानकार गड़करी के इस तीर की तहेदिल से दाद दे रहे हैं। दरअसल, उमा भारती के तेवर काफी तल्ख माने जाते हैं। पूर्व में उन्होंने अपने पिता समान का दर्जा दिए गए आड़वाणी को नहीं बख्शा तो फिर बाकी की बिसात ही क्या? उमा भारती ने अपनी पार्टी बनाई फिर गड़करी उन्हें वापस भाजपा में ले आए। सियासी पण्डितों के अनुसार नितिन गड़करी उम्मीद से ज्यादा चतुर नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में अगर भाजपा औंधे मुंह गिरती है तो उमा भारती का राजनैतिक जीवन अस्ताचल की ओर जाना सुनिश्चित है। कहा जा रहा है कि गड़करी ने नेताओं की घर वापसी अवश्य ही की है किन्तु एक एक कर वे सभी की पैनी धार को बोथला करने में जुटे हुए हैं ताकि भविष्य में ये भाजपा को नश्तर की भांति न चुभ सकें।

सत्ता और संगठन में दरार!
देश के हृदय प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के सूूबाई अध्यक्ष प्रभात झा के बीच भले ही मुस्कुराहट तैर रही हो किन्तु अंदर ही अंदर दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ तलवार पजा रहे हैं। भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी ने नाम उजागर न होने की शर्त पर कहा कि सत्ता और संगठन के बीच रार का नज़ारा हाल ही में सिवनी जिले के आदिवासी बाहुल्य घंसौर तहसील में देखने को मिला। घंसौर में अवंथा समूह के मालिक गौतम थापर द्वारा एक पावर प्लांट लगाया जा रहा है। इस संयंत्र में आदिवासियों के शोषण और अनेक गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगते आए हैं। शिव के गण (उर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल) ने संयंत्र में जाकर अनेक कामों की आधारशिला रखी। गौतम थापर के गण (संयंत्र प्रबंधन) ने इस कार्यक्रम में स्थानीय विधायक श्रीमति शशि ठाकुर और प्रभात झा के गण (जिला भाजपा के पदाधिकारियों) को बुलाना उचित नहीं समझा। मेसर्स झाबुआ पावर की इस हरकत से जिला भाजपा का गुस्सा उफान पर है। उन्होंने कहा कि अब बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. . .।

राजमाता पर संकट के बादल
कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी अपनी रहस्यमय बीमारी के लिए अमेरिका गई हैं। अमेरिका में सिख समुदाय ने सोनिया के अमेरिका में होने का विरोध किया है। दरअसल, 1984 के दंगों की आग में आज भी कांग्रेस झुलस रही है। केंद्रीय मंत्री कमल नाथ के खिलाफ भी सिख्ख समुदाय में रोष और असंतोष उबाल पर है। कमल नाथ के संसदीय क्षेत्र जिला छिंदवाड़ा में सिख्ख मतदाताओं की बड़ी तादाद उनके लिए परेशानी का सबब बन सकती है। कांग्रेस अब मुश्किल में है, कि अपनी नेशनल प्रेजीडेंट के अमरीका में सिख्खों के जबर्दस्त विरोध का वह क्या करे। देश के वज़ीरेआजम डॉ.मनमोहन सिंह भी सिख्ख ही हैं। गौरतलब है कि 65 वर्षीय सोनिया गांधी पिछले साल अगस्त में अपनी बीमारी के इलाज के लिए विदेश गई थीं। बताया जाता है कि सर्जरी के बाद टीम सोनिया जिस अपार्टमेंट में रूकी थी उसका किराया अठ्ठारह लाख रूपए रोजना था। इस तरह की सादगी और देशप्रेम पर हर कोई मर मिटे।

दिग्विजय विरोधी हुए सक्रिय
कांग्रेस की नजर में भविष्य के वज़ीरे आज़म राहुल गांधी के अघोषित गुरू राजा दिग्विजय सिंह की मुखालफत करने वाले अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कांग्रेस के अंदर घमासान थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। दिग्विजय सिंह के पतन का इंतजार करने वाले नेताओं ने रणनीति तैयार कर ली है कि अगर यूपी में कांग्रेस के खाते में सौ से कम सीटें मिलीं तो दिग्विजय सिंह पर इसकी गाज गिर सकती है। कांग्रेस के सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10, जनपथ के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की जमीनी हालत को देखकर युवराज राहुल गांधी को यूपी में झोंकने आ ओचित्य नहीं था। अगर यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहता है तो निश्चित तौर पर इससे कांग्रेस को नुकसान के साथ ही साथ युवराज राहुल गांधी की साख को बट्टा लगना तय है। जब सारी बातें सोनिया गांधी के सामने रखीं गईं तब सोनिया की आंखें खुलीं, पर तब तक तीर कमान से निकल चुका था।

बची रहेगी त्रिवेदी की नौकरी
त्रणमूल कोटे से रेल मंत्री बने दिनेश त्रिवेदी के लिए राहत की बात है कि उनकी नौकरी कुछ दिन ओर बची रहेगी। पूर्व में कांग्रेस और त्रणमूल कांग्रेस के बीच चल रही रस्साकशी और बयानबाजी से लगने लगा था कि बजट के आसपास ममता बनर्जी अपने मंत्रियों को सरकार से बाहर कर लेंगी। रेल मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी बेहद उहापोह में थे कि न जाने कब उन्हें कुर्सी छोड़ने का फरमान जारी कर दिया जाए। त्रणमूल कांग्रेस अचानक ही बैकफुट पर नजर आ रही है। मीडिया में रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी और त्रणमूल कांग्रेस सुप्रीमो सुश्री ममता बनर्जी के बीच अनबन की खबरों के आने के चार पांच माह तक त्रणमूल कांग्रेस ने खामोशी ही अख्तियार कर रखी थी। अचानक ही त्रणमूल के आला नेता सक्रिय नजर आए और उन्होंने ममता और त्रिवेदी के बीच खटास की अफवाहों को सिरे से खारिज करना आरंभ कर दिया।

पण्डित गड़करी का नया रूप
भारतीय जनता पार्टी के निजाम नितिन गड़करी को उत्तर प्रदेश में ना जाने क्या क्या जतन करने पड़े। यूपी में उन्हें अपनी जात को भी उकेरना पड़ा। 65 साल के युवा गड़करी ने छात्र जीवन से लेकर अब तक कभी अपनी जात का उल्लेख नहीं किया। यूपी में पोस्टर्स और विज्ञापनों में नितिन गड़करी को पण्डित नितिन गड़करी के रूप में प्रचारित किया गया। दरअसल, यूपी के 23 जिलों में ब्राम्हणों का वर्चस्व है। साथ ही साथ अधिकांश जिलों में जाट जाटव के मुकाबले ब्राम्हण मत निर्णायक ही रहता है। कम ही लोगा जानते हैं कि मूलतः महाराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर से सियासी सफर तय करने वाले नितिन गड़करी देशस्थ ब्राम्हण हैं। पहली बार गड़करी के नाम के आगे पण्डित लगाने का कितना लाभ उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिल पाएगा यह बात तो एक दो दिन में ही साफ हो जाएगी, पर गड़करी का नया रूप चौंकाने वाला अवश्य ही माना जा रहा है।

पुच्छल तारा
कांग्रेस के आला नेता पूरा जोर लगा रहे हैं कि नेहरू गांधी परिवार की वर्तमान पीढ़ी यानी राहुल गांधी के हाथों देश की बागडोर सौंप दी जाए। इसी पर आधारित एक ईमेल अभय नायक ने रायपुर छत्तीसगढ़ से भेजा है। अभय लिखते हैं कि खबर है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को राहुल गांधी के लिए सजाया जा रहा है। क्यों न सजाया जाए भई! राहुल को सलाह दी है कि अभी बन जाओ प्रधानमंत्री पता नहीं 2014 में कांग्रेस सत्ता में आए या नहीं। कम से कम जीवन भर पूर्व प्रधानमंत्री की सुख सुविधाएं और प्रोटोकाल का लाभ तो मिलता ही रहेगा।