शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

इतिहास की क्लास ले गए आडवाणी!

इतिहास की क्लास ले गए आडवाणी!

(महेश रावलानी)

सिवनी (साई)। ‘1984 में लोकसभा नहीं, शोकसभा के चुनाव हुए थे। उस समय राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस आतुर थी। उस चुनाव में कांग्रेस को जितनी सीटें मिली थीं उतनी सीटें तो पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भी कभी नहीं मिलीं।
उक्ताशय की बात कल तक राजग के पीएम इन वेटिंग रहे एल.के.आडवाणी ने आज मिशन उच्चतर माध्यमिक शाला के दो तिहाई से ज्यादा रिक्त मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए कही। भाजपा नेता आडवाणी आज देर शाम हेलीकॉप्टर से सिवनी पहुंचे और सभा स्थल पर लगभग आधे घंटे रूकने के बाद वापस लौट गए। आडवाणी का भाषण पूरी तरह 2004 तक के लोकसभा चुनावों पर केंद्रित लगा जिसमें उन्होंने संसद के इतिहास को बताने में ही ज्यादा दिलचस्पी दिखाई।
लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि वे 1951 से सक्रिय राजनीति में हैं, जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की थी। उन्होंने कहा कि वे समूचे भारत वर्ष के अनेक जिलों में जा चुके हैं, कम ही जिले ऐसे बचे होंगे जहां वे नहीं गए होंगे। उन्होंने कहा कि 1984 में भाजपा को महज दो सीट मिली थीं, उस चुनाव के बाद कार्यकर्ता उनसे पूछा करते थे कि आखिर क्या हुआ कि लोकसभा में इतनी कम सीटें मिलीं। इस पर वे कार्यकर्ताओं को जवाब दिया करते थे कि चौरासी का लोकसभा चुनाव वाकई में शोकसभा का चुनाव था। उस समय सहानुभूति लहर का फायदा कांग्रेस को मिला। इस समय इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षा कर्मियों ने हत्या कर दी थी।
आडवाणी ने कहा कि देश में लाल बहादुर शास्त्री और गुलजारी लाल नंदा जैसे ईमानदार और योग्य प्रधानमंत्री देश में हुए हैं। उन्होंने कहा कि 1989 के चुनावों में भाजपा का परफार्मेंस देखने लायक था जिसमें भाजपा को 86 सीट मिली थीं। गठबंधन सरकारों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भाजपा ही दो ऐसी पार्टी हैं जिनके प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा समय तक रहे हैं, शेष दलों के पीएम कुछ ही समय के लिए गद्दी पर बैठे। उन्होंने कहा कि एक समय था जब दिल्ली का 7 रेसकोर्स रोड का बंग्ला (भारत के प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) सबसे महत्वपूर्ण माना जाता था, पर बाद में यह खिसककर 10, जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) हो गया है।

नरेश से नहीं मिल पाए आडवाणी
अपने भाषण में पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी ने कहा कि चुनाव आयोग के निर्देशों के चलते वे नरेश दिवाकर से नहीं मिल पाए हैं, क्योकि अगर प्रत्याशी मंच पर आएगा तो उनकी यात्रा का सारा खर्च प्रत्याशी के खाते में जुड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि वे चुनाव आयोग से इस बारे में बात करेंगे। भाजपा प्रत्याशी नरेश दिवाकर को जिताने की परोक्ष अपील करते हुए उन्होंने कहा कि अगर आप (सिवनी की जनता) उन्हें जिता देगी तो वे बतौर विधायक उनसे बाद में मिल लेंगे।

जुड़ सकता है यात्रा का खर्च
वहीं, यह चर्चा भी मीडिया के बीच रही कि एल.के.आडवाणी ने नरेश दिवाकर को जिताने की अपील की है, भले ही वह परोक्ष तौर पर की गई हो, तो आडवाणी की सिवनी यात्रा का खर्च नरेश दिवाकर के खाते में जोड़ा जा सकता है। वहीं, एक महिला वक्ता द्वारा आडवाणी के आने के पूर्व नरेश दिवाकर को विजयी बनाने की अपील की गई, जिसे भी व्यय की दृष्टि से प्रत्याशी के खाते में जोड़ने की चर्चा चलती रही।

पढ़ा गए इतिहास
वहीं, श्रोताओं के बीच यह चर्चा चलती रही कि एल.के.आडवाणी द्वारा विधानसभा सिवनी के चुनाव प्रचार के दौरान संसद के इतिहास को क्यों बताया जा रहा है। मिशन उच्चतर माध्यमिक शाला लगभग दो तिहाई खाली मैदान में श्रोता कुछ समय बाद ही इतिहास सुनने में दिलस्पी नहीं दिखाते हुए धीरे धीरे सभास्थल से कूच करते देखे गए।

रहा महिलाओं का स्थल रीता!

सिवनी में हुई इस सभा में पुरूषों के लिए निर्धारित स्थल भी आधे से ज्यादा खाली ही था, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के लिए आरक्षित स्थल में मीडिया कर्मी अलबत्ता इस आरक्षित स्थल पर अवश्य ही देखे गए। मीडिया कर्मियों के अनुसार उनके लिए आरक्षित स्थल में कुर्सियों पर एक दर्जन से ज्यादा महिलाओं ने कब्जा जमा लिया था, अतः मजबूरी में उन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित किन्तु खाली पड़े स्थान पर जाकर रिपोर्टिंग करना पड़ा।

कौन देगा बुनियादी सुविधाएं

कौन देगा बुनियादी सुविधाएं

(शरद खरे)

सिवनी शहर आज़ाद भारत का ही एक अंग है। आज़ाद भारत में हर नागरिक को पीने को साफ पानी, प्रकाश, साफ सफाई आदि जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना शासन प्रशासन का प्रथम दायित्व है। अगर किसी नागरिक को यह बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जाहिर है स्थानीय निकाय यानि नगर पालिका, नगर पंचायत या नगर निगम ही इसके लिए जवाबदेह हैं।
सिवनी शहर में साफ पानी जनता को पिलाने की जवाबदेही नगर पालिका की ही है। नगर पालिका को चाहिए कि वह पानी की गुणवत्ता का पूरा पूरा ध्यान रखे। साथ ही साथ साफ सफाई भी नगर पालिका की ही जवाबदेही है। दोनों ही मामलों में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली नगर पालिका परिषद् फेल्युअर ही साबित हुई है। सिवनी शहर के नागरिक आज भी बुनियादी सुविधाओं को तरसते ही नजर आ रहे हैं।
सिवनी में भीमगढ़ जलावर्धन योजना के आरंभ होते ही लोगों को लगने लगा था मानो उन्हें जन्नत मिलने वाली हो। वे जन्नत का मजा ले सकेंगे। जैसे ही यह योजना मूर्त रूप में आई, वैसे ही लोगों की आशाओं पर तुषारापात हो गया। लोगों को दो समय पूरा पानी तो छोड़िए, एक समय भी साफ पानी मयस्सर नहीं हो पाया। लोगों का भरोसा तब टूटा जब उनके नलों से, फिल्टर किए हुए पानी के बजाए गंदा बदबूदार और कीड़े युक्त पानी आने लगा। लोगों के नलों ने इस तरह का गंदा पानी उगला तो लोगों का दिल टूट गया। जब भीमगढ़ जलावर्धन योजना आरंभ हुई और सालों तक गंदा पानी मिला तब भी किसी विधायक ने इस बारे में विधानसभा में प्रश्न उठाकर इसकी गुणवत्ता या इसकी कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया। जिससे यह साबित हो गया कि चोर चोर मौसेर भाई की तर्ज पर सभी जनता को छलने में अपने अपने हुनर का प्रदर्शन करते आए हैं।
सिवनी शहर में कहने को तो विशाल जलसंग्रह क्षमता वाला बबरिया, दलसागर, बुधवारी, मठ तालाब है। इसके अलावा यहां रेल्वे स्टेशन के पास दो तालाब और न जाने कितने कुंए बावली और नलकूप हैं। बावजूद इसके भगवान शिव की नगरी में लोग गर्मी तो छोड़िए बारिश के मौसम में भी कण्ठ की प्यास बुझाने के लिए तरसते नजर आते हैं। क्या यही है भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के सिवनी जिले की किस्मत!
सिवनी में चहुंओर गंदगी पसरी हुई है। नालियां गंदगी से बजबजा रही हैं। जहां तहां निर्माण कार्य मनमाने तरीके से संचालित हो रहे हैं। नगर पालिका के चहेते ठेकेदारों ने सड़कों पर निर्माण सामग्री बेतरतीब बगरा रखी है। नाली और सड़कों का निर्माण, घटिया और स्तरहीन हो रहा है। कहीं किसी की जमीन पर ही नगर पालिका ने बिना किसी पूर्व सूचना के ही सड़क या नाली का निर्माण करवा दिया है, कहीं नाली उबड़ खाबड़ है तो कहीं नाली पूरी बनी ही नहीं है। महीनों से नाली आधी अधूरी ही पड़ी है।
अतिक्रमण का दानव सिवनी की सड़कों को निगल रहा है। सिवनी में सड़कें तंग गलियों में तब्दील हो गई हैं। सड़कों की स्थिति ऐसी है, उसे देखकर लग रहा है मानों इस पर सर्कस के बाजीगर ही चल सकें। हां कुछ जगहों की सड़कें दुरूस्त हैं। ये जगहें वे मानी जा सकती हैं, जहां प्रशासन के आला अधिकारियों के अलावा सांसद विधायक, पूर्व विधायक आदि निवास कर रहे हैं। इन लोगों के घरों के सामने की या घर पहुंच मार्ग बनाने में पूरी गुणवत्ता का ध्यान रखा जाता है। क्या इसी तरह की सड़कों का जाल पूरे शहर में नहीं बिछाया जा सकता? क्या कारण है कि नगर पालिका परिषद् द्वारा शेष शहर की सड़कों के निर्माण पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
एसपी बंग्ले से लेकर कलेक्टर बंग्ले, और बाहुबली चौक से लेकर पुराने आरटीओ तक के पहुंच मार्ग पर चलना दूभर था। यह सड़क बनने के बाद ही उखड़ गई। सिवनी में नगर पालिका जो न कराए, कम ही है। बाहुबली चौक से पुराने आरटीओ वाले मार्ग पर सीमेंटीकृत सड़क पर जब तब डामर लगाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि इस सड़क से होकर व्हीव्हीआईपीज यदा कदा आते जाते हैं। दरअसल, सिवनी में अतिविशिष्ट लोगों के उड़न खटोले स्थानीय पॉलीटेक्निक कॉलेज में ही उतरा करते हैं। ये लोग इसी मार्ग का प्रयोग कर गंतव्य तक जाकर वापस उड़न खटोले से सिवनी से रवानगी ले लेते हैं।
शहर की सफाई व्यवस्था भी इस तरह की हैं कि सारे शहर में जहां तहां कचरों के ढेर पर आवारा मवेशी, कुत्ते, सुअर आदि मुंह मारते नजर आ जाते हैं। लोग परेशान हैं कि आखिर इन आवारा मवेशियों का ईलाज किया जाए तो कैसे? लोगों के घरों में में आवारा मवेशी घुसकर नुकसान कर रहे हैं। दुकानदार भी परेशान हैं, उनके प्रतिष्ठानों के सामने आवारा मवेशी गोबर कर जाते हैं, और सुबह सवेरे जब वे अपने प्रतिष्ठान पहुंचते हैं तो उनके सामने गोबर हटाने की समस्या सबसे बड़ी होती है।
शहर में दलसागर तालाब को लोग आन बान और शान के रूप में देखा करते थे। आज आलम यह है कि दलसागर तालाब में ही गंदगी पसरी पड़ी है। लगभग सवा करोड़ रूपए पानी में बहाने के बाद भी दलसागर की स्थिति नहीं सुधर सकी है। इसके बाद अब पर्यटन विभाग द्वारा इसमें राशि खर्च की जाना प्रस्तावित है।

शहर की अव्यवस्था के संबंध में अनेक बार लोगों के द्वारा भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष नरेश दिवाकर से संपर्क भी किया गया, उनसे शिकायत भी की। एक बार तो व्यापारियों के लीज के मामले में नरेश दिवाकर द्वारा जिला कलेक्टर से चर्चा भी की थी। पर पता नहीं क्यों जनता से जुड़े मुद्दों के मामले में उन्होंने ध्यान देना उचित नहीं समझा। भाजपा शासित नगर पालिका परिषद् के द्वारा इस तरह की कार्यप्रणाली में विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी मौन रहकर सहभागी बनी हुई है। टूटी पुलिया के पास वाले इलाके में एक सड़क विशेष के इर्द गिर्द रहने वाले लोगों का हवा पानी, आवागमन भी पालिका द्वारा दो तीन माह से अवरूद्ध किया हुआ है किन्तु कांग्रेस के भी किसी छोटे बड़े नेता को जनता की समस्याओं से लेना देना नजर नहीं आ रहा है। हो सकता है कांग्रेस और भाजपा के छद्म युद्ध में सिवनी की जनता बुरी तरह पिस रही हो, और यही उसके भाग्य में भी लिखा हो!

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

नरेश दिवाकर के जनसंपर्क में खूनी संघर्ष!

नरेश दिवाकर के जनसंपर्क में खूनी संघर्ष!

बीजेपी नेताओं ने की मारपीट, चार लोग घायल

(अय्यूब कुरैशी)

सिवनी (साई)। सिवनी जिले में चुनावी बयार अब तेज होती दिख रही है। सिवनी की चार विधानसभाओं में से सिवनी विधानसभा में चुनाव में कुछ हिंसा होने की खबरें मिल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी के सिवनी विधानसभा क्षेत्र के भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी नरेश दिवाकर के जनसंपर्क के दौरान पुसेरा में खूनी संघर्ष होने की खबर है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम पुसेरा में भारतीय जनता पार्टी के सिवनी विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी नरेश दिवाकर के जनसंपर्क के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा मारपीट करने से चार ग्रामीणों के घायल होने की जानकारी मिली है।
 पुलिस के अनुसार बंडोल थाना क्षेत्र के ग्राम पुसेरा में 10 नवंबर की रात भाजपा कार्यकर्ताओं ने किसी विवाद पर ग्रामीणों से मारपीट कर दी। इस दौरान एक कार्यकर्ता ने तलवार से भी प्रहार कर दिया। इस घटना में घायल हुए चारों ग्रामीणों जागेश्वर बघेल, प्रदीप बघेल, रामकुमार बघेल और राकेश बघेल को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
 गंभीर रूप से घायल हुये जागेश्वर बघेल को बाद में उपचार के लिये नागपुर भेज दिया गया। पुलिस मामला दर्ज कर जांच कर रही है। जिला कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी भरत यादव ने बताया कि इस मामले के दोषियों पर सख्त कायवाही की जायेगी।

गौरतलब है कि इस विधानसभा चुनाव में मसल पॉवर और मनी पॉवर के दुरूपयोग की आशंका पूर्व में भी समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया और हिन्द गजट द्वारा व्यक्त की जा चुकी है।

आखिर, कौन समझेगा सिवनी जिले की प्रसव वेदना!

आखिर, कौन समझेगा सिवनी जिले की प्रसव वेदना!

(लिमटी खरे)

1 नवंबर 1956 को अंतिम बार अस्तित्व में आए सिवनी जिले को देखकर कोई भी कह सकता है कि सिवनी जिला आज़ादी के साढ़े छः दशकों बाद भी प्रसव वेदना से लगातार दो चार होता आया है। सिवनी के नीति निर्धारक और देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद और प्रदेश की नीति निर्धारक विधानसभा में सिवनी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने के बाद भी सिवनी का नवनिर्माण न हो पाना अपने आप में शर्मिंदगी भरा ही माना जा सकता है। आज उमर दराज या प्रौढ़ हो रही पीढ़ी के मानस पटल पर सिवनी के विकसित न हो पाने का दर्द साफ देखा जा सकता है।
अपने आंचल में अकूूत वन संपदा समेटने वाली इस सिवनी के राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात होने के अनेक कारक हैं। इनमें जगतगुरू स्वामी शंकराचार्य की जन्म स्थली, भेड़िया बालक मोगली की कर्मस्थली, एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांध (संजय सरोवर परियोजना), बेहतरीन क्वालिटी के चंदन के लिए प्रसिद्ध चंदन बगीचा, सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता का कार्यालय, लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण यंत्री का कार्यालय, राष्ट्रीय राजमार्ग के कार्यपालन यंत्री का कार्यालय, उम्दा किस्म के चावल का उत्पादक, काले हिरण (चिंकारा), सिवनी की पुरानी जिला जेल और सुधारालय जिसमें महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसे स्वतंत्रता संग्राम सैनानी के साथ ही साथ पीर पगारो जैसी हस्तियां भी बंद थीं, जिनसे गोरे ब्रितानी अंग्रेज भय खाते थे।
अस्सी के दशक तक तो सिवनी के वाशिंदे अपने आप को गौरवांवित महसूस किया करते थे कि वे ऐसी माटी में जन्मे या रह रहे हैं, जहां संपन्नता और समृद्धि है। सिवनी के नागरिक पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित गार्गीशंकर मिश्र और सुश्री विमला वर्मा के द्वारा सिवनी को दी गई सौगातों को पाकर अपने आप को प्रफुल्लित महसूस किया करते थे। ऐसा नहीं है कि विमला वर्मा और गार्गी शंकर मिश्र को विरोध न झेलना पड़ा हो।
याद पड़ता है कि सिवनी में खेल के स्टेडियम के मामले में उस समय स्कूल और कॉलेज के युवाओं के विरोध का लंबे समय तक सामना करना पड़ा था पंडित गार्गीशंकर मिश्र और सुश्री विमला वर्मा को। सुश्री विमला वर्मा और पंडित गार्गी शंकर मिश्र द्वारा सिवनी में स्टेडियम की मांग पर बारंबार बनवाने का आश्वासन दिया जाता रहा। उस वक्त जुझारू छात्र नेता संजय चौरसिया द्वारा उद्यत एक नारा याद पड़ता है जो सभी की जुबान पर छा गया था और वह था -‘‘आश्वासन नहीं, स्टेडियम चाहिए। अर्थात अब आश्वासन नहीं चाहिए अब तो स्टेडियम ही चाहिए। अंत में सिवनी के युवाओं के सामने पंडित गार्गी शंकर मिश्र और सुश्री विमला वर्मा को झुकना पड़ा तथा सिवनी में पुलिस लाईन्स के पीछे एक स्टेडियम की सौगत मिल पाई सिवनी को।
शनैःशनैः सिवनी में समृद्धि और संपन्नता को मानो ग्रहण लगना आरंभ हो गया हो। सिवनी में जो कुछ था वह भी एक के बाद एक करके मुट्ठी की रेत के मानिंद फिसलने लगा। सिवनी के लोग हैरान परेशान थे कि आखिर क्या कारण है कि कहां तो जनसेवकों द्वारा सिवनी में एक एक ईंट जोड़कर आशियाना बनाया गया और कहां जनसेवकों द्वारा पूर्व के जनसेवकों की सौगातों को ही सहेजकर नहीं रखा जा पा रहा है। इसी उहापोह में नागरिक रहे और सिवनी की सौगातों के पिटारे में से एक एक कर सौगातें या तो लोगों की आंखों में धूल झोंककर या बलात् निकालकर अन्य जिलों के सरमायादारों द्वारा ले जाई जाती रहीं।
नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही सिवनी जिले को मिलने वाली सौगातों का सिलसिला थमने सा लगा। लोगों को लगा कुछ समय बाद ही सही सिवनी की झोली में सौगातें मिलना आरंभ हो जाएंगी। समय बीतता गया सिवनी की झोली में आने वाली रसद बेहद कम होती गई। एक के बाद एक सौगातें मिलने की संभावनाएं के क्षीण होती देख सिवनी वासियों का मन आशंकाओं कुशंकाओं से घबराने लगा।

जनसेवक पता नहीं किसके दबाव में या फिर निहित स्वार्थ के चलते मौन साधे हुए थे, पर सिवनी की जनता लगातार लुट रहे अपनी अमूल्य धरोहरों के खजानों को लुटता देखकर बस इसी डर में आशंकित थी कि कहीं पहरेदार इसी तरह आंख बंद कर बैठे रहे और उसका सौगातों का खजाना रीत न जाए . . .।

निष्पक्ष चुनाव और सरकारी नुर्माइंदे

निष्पक्ष चुनाव और सरकारी नुर्माइंदे

(शरद खरे)

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा निष्पक्ष चुनाव के लिए अपनी कटिबद्धता सदा ही दुहराई जाती है। चुनाव आयोग की हां में हां मिलाकर सियासी दल के नुर्माइंंदे और सरकारी कर्मचारी भी निष्पक्ष चुनाव की बात कहा करते हैं। निष्पक्ष चुनाव का सीधा मतलब होता है न काहू से दोस्ती न काहू से बैर। अर्थात किसी के पक्ष में न तो प्रचार करना, न ही किसी के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर काम करना। आज़ाद भारत में शुरूआती दौर में तो सब कुछ ठीक ठाक चला पर कालांतर में मामला कुछ गड़बड़ा गया। सरकारी नुर्माइंंदों ने सियासी दलों के साथ कदमताल मिलाने आरंभ कर दिए।
सिवनी में हाल ही में बरघाट विधानसभा में खण्ड चिकित्सा अधिकारी पर कमलके प्रचार के आरोप लगे। जांच में ये आरोप सत्य पाए गए, यह एक बहुत बड़ा उदाहरण है जिसकी निंदा करने से काम नहीं चलेगा। आखिर क्या वजह है कि सरकारी नुर्माइंंदे अपने मूल काम को छोड़कर किसी नेता या दल विशेष के काम को ही अपनी नौकरी मान लेते हैं, जबकि उन्हें सरकारी काम करने के एवज में पगार मिलती है।
जाहिर है राजनैतिक दलों के नुर्माइंंदों द्वारा उन्हें प्रश्रय दिया जाता होगा। अब प्रश्न यह उठता है कि प्रश्रय की दरकार किसे होती है? शायद उसे जो गलत काम करता हो। वरना सीधी साधी नौकरी करने वाले को किसी नेता के प्रश्रय की क्या दरकार! किसी को क्या परवाह कि उसे जनसेवक सहयोग दे, उसका पक्ष ले या संरक्षण दे। निश्चित तौर पर गलत करने वाले को ही राजनैतिक संरक्षण की दरकार होती है।
चुनाव के दौरान कई बार यह भी देखा गया है कि अगर किसी के द्वारा, किसी सक्षम अधिकारी से किसी प्रत्याशी के द्वारा आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत की जाती है, तो उस समय अधिकारी द्वारा मौके पर जाने में हीला हवाला किया जाता है। आज का युग संचार क्रांति का युग है। इस युग में सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान तक बहुत ही जल्दी और आसानी से पहुंचाई जा सकती है। अनेक बार इस तरह के समाचार भी मिलते हैं कि फलां उम्मीदवार की शिकायत पर फलां अधिकारी के पास वाहन न होने से वह मौके पर विलंब से पहुंचा।
पिछले दिनों बरघाट विधानसभा क्षेत्र के मुख्यालय बरघाट में पदस्थ खण्ड चिकित्सा अधिकारी डॉ.उषा श्रीपाण्डे के खिलाफ कामरेड राजेंद्र चौहान द्वारा एक शिकायत मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी भोपाल को की गई। इस शिकायत की जांच जिला निर्वाचन अधिकारी सिवनी द्वारा करवाई गई। यह शिकायत जांच में सत्य पाई गई और खण्ड चिकित्सा अधिकारी डॉ.उषा श्रीपाण्डे का मुख्यालय सिवनी कर दिया गया।
देखा जाए तो यह एक राजनैतिक दल के प्रति निष्ठा जताने का मामला था एक सरकारी नुमाईंदे का। कोई भी सरकारी नुर्माइंंदा एक आदमी ही होता है और वह किसी दल विशेष या प्रत्याशी के लिए अपने मन में अनुराग या निष्ठा रख सकता है। उसकी निष्ठा व्यक्तिगत होनी चाहिए। उसके कामकाज में अगर वह निष्ठा दिखाई देती है तो इसे उचित किसी भी दृष्टिकोण से नहीं माना जा सकता है। इसके लिए उस सरकारी नुर्माइंंदे को दोषी करार दिया जाकर उससे जवाब तलब करना आवश्यक है। वैसे यह मामला प्रशासनिक स्तर का और प्रशासन के नुर्माइंंदों का है।
अगर जिला निर्वाचन अधिकारी ने यह पाया है कि खण्ड चिकित्सा अधिकारी बरघाट द्वारा भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार कर मतदाताओं को रिझाया जा रहा है तो यह निश्चित तौर पर बेहद ही संगीन मामला है। इस मामले में भारत निर्वाचन आयोग को तत्काल ही कठोर कार्यवाही करना चाहिए।
जिस तरह मीडिया में भी सियासी दलों ने अपने अपने लोगों की घुसपैठ बना ली है, और मीडिया पथभ्रष्ट होता जा रहा है, उसी तरह नौकरशाही को भी यह दीमक खा रहा है। मीडिया में काम करने वाला किसी दल या प्रत्याशी विशेष का अनुयायी हो सकता है, पर उसकी लेखनी में कभी भी यह अनुराग या प्रेम झलकना नहीं चाहिए। अगर ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर वह अपने काम के साथ न्याय नहीं कर रहा है।
कमोबेश यही स्थिति सरकारी कर्मचारियों के साथ होती है। एक बार के वाक्ये का जिकर यहां लाजिमी होगा। सालों पहले चुनावी कव्हरेज में खजुराहो प्रेस टूर के दौरान जब तत्कालीन कलेक्टर से यह सवाल पूछा गया कि वे व्यक्तिगत तौर पर किस पार्टी में दिलचस्पी रखते हैं, किस नेता से वे विशेष रूप से प्रभावित हैं, इस पर उन्होंने कुशलता के साथ छूटते ही जवाब दिया कि प्रशासन सदा ही शासन के साथ होता है, जिसका शासन उसका प्रशासन।अर्थात प्रशासन का कारिंदा किसी दल विशेष में अपनी निष्ठा नहीं रखता है।
खण्ड चिकित्सा अधिकारी बरघाट पर कमल के चुनाव प्रचार की बात साबित हो गई है। इसलिए अब जिला प्रशासन और चुनाव अयोग को अधिक संवेदनशील और सतर्क रहने की आवश्यकता है। अनेक सियासी लोगों और विधायक सांसदों के करीबी रिश्तेदार भी सालों से सिवनी में ही तैनात हैं। वैसे तो इनका तबादला पहले ही हो जाना चाहिए था, पर पता नहीं क्यों इन पर शासन ने अपनी नजरें इनायत नहीं की हैं। अब इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ये कारिंदे चुनावों को किसी भी दृष्टिकोण से प्रभावित नहीं करेंगे।

हो सकता है कि जिन सरकारी नुर्माइंंदों के रिश्तेदार सियासत में घोषित तौर पर हों उन्हें चुनाव के कार्य से प्रथक रखा गया हो, पर यह तो उनके लिए एक पारितोषक से कम नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि वे चुनाव के काम से मुक्त रहकर और बेहतर तरीके से अपने सगेवालों के पक्ष में माहौल बना सकते हैं। बहरहाल, संवेदनशील जिला कलेक्टर भरत यादव जो सिवनी के जिला निर्वाचन अधिकारी भी हैं, ने हर पहलू पर सारे दृष्टिकोण से विचार अवश्य ही किया होगा, किन्तु बरघाट खण्ड चिकित्सा अधिकारी द्वारा कमल के पक्ष में किए जाने वाले चुनाव प्रचार के साबित होने से चुनाव आयोग की परेशानियां बढ़ जाएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

जिले में भटक रही दो हजार आत्माएं मांग रहीं कमल नाथ से जवाब: नरेंद्र ठाकुर

जिले में भटक रही दो हजार आत्माएं मांग रहीं कमल नाथ से जवाब: नरेंद्र ठाकुर

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। सिवनी जिले की सीमा से होकर गुजरने वाले एनएचएआई के फोरलेन में अब तक हुई लगभग दो हजार मौतों के लिए जवाबदेह कौन है? इस बारे में सिवनी की जनता बेहतर तरीके से जानती है। कहा जाता है कि अकाल मौत मरने वाले की आत्मा शांति मिलने तक भटकती ही रहती है। सिवनी जिले में भटक रही दो हजार आत्माएं, कमल नाथ से जवाब मांग रही हैं कि आखिर उनकी गलती क्या है?
उक्ताशय की बात भाजपा के युवा नेता नरेंद्र ठाकुर ‘‘गुड्डू‘‘ द्वारा यहां जारी विज्ञप्ति में कही गई है। नरेंद्र ठाकुर ने आगे कहा है कि कांग्रेस के नेता कमल नाथ यह आरोप लगाते हैं कि सिवनी में फोरलेन का काम प्रदेश की भाजपा के कारण रूका है। पर कमल नाथ क्या 13 नवंबर को सिवनी आने पर इस बात का खुलासा कर पाएंगे कि आखिर पेंच से कान्हा के काल्पनिक वाईल्ड लाईफ कॉरीडोर में उनके कथित रिश्तेदार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से अड़ंगा लगाया गया है तो वही अशोक नाम के व्यक्ति सतपुड़ा, पेंच और मेलघाट वाईल्ड लाईफ कॉरीडोर के मामले में मंुह क्यों सिले बैठे हैं, जो छिंदवाड़ा जिले के टूलेन से होकर गुजर रहा है।
गुड्डू ठाकुर ने आगे कहा है कि कमल नाथ इस बात का जवाब दें कि आखिर छिंदवाड़ा जिले में सड़क निर्माण में केंद्र सरकार कोई बाधा उत्पन्न क्यों नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि क्या सिवनी की जनता 21 अगस्त 2009 के आंदोलन को भूल पाएगी, जिसमें कमल नाथ की प्रतीकात्मक शवयात्राएं निकाली र्गइं थीं। आज चुनाव आया है तो कमल नाथ सिवनी आकर यहां की जनता को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं।
नरेंद्र ठाकुर ने आगे कहा है कि कमल नाथ केंद्र में वन एवं पर्यावरण, वस्त्र, भूतल परिवहन, शहरी विकास आदि विभागों के मंत्री रहे हैं, और वे बार बार सिवनी को गोद लेकर अपनी गोद को अघोषित तौर पर अनाथालय ही बताने का प्रयास करते हैं। क्या कमल नाथ यह स्पष्ट करेंगे कि इसके पहले मंत्री रहते हुए उन्होंने सिवनी की झोली में क्या डाला? जाहिर है इसका जवाब कमल नाथ के पास नहीं है। कमल नाथ ने सिवनी की झोली में कुछ डालने के बजाए सिवनी के हितों को झपट्टा मारकर छीना ही है।
नरेंद्र ठाकुर ने कहा कि जब दिग्विजय सिंह प्रदेश में मुख्यमंत्री थे उस समय सिवनी के राज्य परिवहन की संभागीय कर्मशाला जिसके लिए मण्डला रोड पर आमा झिरिया में जमीन भी आरक्षित हो चुकी थी को बलात् झपट्टा मारकर छिंदवाड़ा ले जाया गया था। इतना ही नहीं स्व.हरवंश सिंह के गृह मंत्री रहते हुए कमल नाथ द्वारा उन पर दबाव डालकर सिवनी पुलिस के लिए हाईवे पेट्रोलिंग के नाम पर आई क्वालिस गाड़ी को भी सिवनी का हक मारकर छिंदवाड़ा ले जाया गया था। जबकि छिंदवाड़ा जिले में नेशनल हाईवे की लंबाई सिवनी से लगभग आधी ही है।
युवा भाजपा नेता नरेंद्र ठाकुर ने आगे कहा है कि कमल नाथ ने सिवनी के हक को मारा है, और इसका प्रमाण उन्होंने राज्य सभा में यह कहकर दे दिया था कि उनकी असली मंशा सिवनी से होकर गुजरने वाले हाईवे को छिंदवाड़ा ले जाने की थी। सब कुछ आईने की तरह साफ है, फिर भला कमल नाथ किस मुंह से सिवनी आकर वोट मांगने का साहस जुटा पा रहे हैं।
उन्होंने आगे कहा कि सिवनी को अपनी अनाथालय रूपी गोद में रखने वाले कमल नाथ इस बात का जवाब दे पाएंगे कि उनके संसदीय क्षेत्र में पेंच परियोजना जिसका सबसे ज्यादा लाभ सिवनी को मिलने वाला है, वह तीस साल से अधिक समय से क्यों झूला झूल रही है।
नरेंद्र ठाकुर ने आगे कहा कि सिवनी में आखिर ब्रॉडगेज क्यों नहीं आ पा रही है, इस बात का जवाब, है कमल नाथ के पास! क्या कारण है कि छिंदवाड़ा में ब्रॉडगेज की सीटी पूरे जिले में सुनाई दे रही है? उद्योग धंधों के मामले में छिंदवाड़ा संपन्न है। कई सालों से कमल नाथ सिवनी आते हैं और कहते हैं कांग्रेस का परचम लहराओ बाकी हम पर छोड़ दो। नरेंद्र ठाकुर ने कहा कि क्या अपनी बर्बादी के लिए बाकी सब कुछ कमल नाथ अपने उपर छोड़ने की बात कहते हैं।

इसके साथ ही साथ नरेंद्र ठाकुर ने यह भी कहा है कि सिवनी विधानसभा क्षेत्र की जनता कांग्रेस के प्रत्याशी राज कुमार खुराना के बारे में यह कह रही है कि अब तक जनता ने पप्पू खुराना को ‘‘पोस्टर्स‘‘ और ‘‘फ्लेक्स‘‘ में ही देखा है, जनता इस तरह के ‘‘फ्लेक्सी‘‘ नेता से यह पूछ रही है आखिर सशरीर वे कब उन्हें दर्शन देंगे।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

शलाका पुरूष हरवंश सिंह को ही भूले कांग्रेसी!

शलाका पुरूष हरवंश सिंह को ही भूले कांग्रेसी!

(लिमटी खरे)

अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जिला इकाई को लगभग ढाई दशकों तक राह दिखाने वाले महाकौशल के कांग्रेसी क्षत्रप ठाकुर हरवंश सिंह को जिले के कृतघ्न कांग्रेसी भूल ही गए हैं। आज हरवंश सिंह की का जन्म दिन है, यह उनका पहला जन्म दिन है जब वे लोगों के बीच नहीं है। जब तक हरवंश सिंह जिंदा थे, तब तक उनके जन्म दिवस पर मीडिया विज्ञापन से पटे रहते थे। आज पहली बार ऐसा हुआ है जब हरवंश सिंह के जन्म दिवस पर मीडिया पूरी तरह सूना ही नजर आया।
न तो जिला कांग्रेस कमेटी के किसी प्रवक्ता द्वारा 10 नवंबर को हरवंश सिंह की जयंति की पूर्वसंध्या पर ही इस तरह की कोई विज्ञप्ति जारी नहीं की गई कि 11 नवंबर को हरवंश सिंह के जन्म दिवस पर जिला कांग्रेस कमेटी कार्यालय में कोई कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा, न ही 11 नवंबर को भी हरवंश सिंह के जन्म दिवस पर जिला कांग्रेस कमेटी के कार्यालय में किसी तरह का कोई श्रृद्धांजली कार्यक्रम भी नहीं रखा गया।
11 नवंबर को जिला कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता द्वारा जारी तीन विज्ञप्तियों में सिवनी के कांग्रेस के प्रत्याशी राज कुमार खुराना के 12 नवंबर का भ्रमण कार्यक्रम जारी किया गया है। दूसरी विज्ञप्ति में भाजपा प्रत्याशी नरेश दिवाकर के जनसंपर्क में हुई मारपीट का उल्लेख है। तीसरी विज्ञप्ति में शिवराज सिंह के बारे में उल्लेख किया गया है।
हरवंश सिंह का निधन 14 मई को जिला चिकित्सालय सिवनी में हो गया था। आश्चर्य तो इस बात का है कि शलाका पुरूष हरवंश सिंह को कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता महज छः माह में ही भूल गए (उनके निधन के छः माह 14 नवंबर को पूरे होंगे)। आज जिला कांग्रेस कमेटी में भी किसी तरह के श्रृद्धांजली कार्यक्रम का आयोजन न होने से लगने लगा है मानो अब संगठन की कमान उन हाथों में आ गई है जो हरवंश सिंह की मुखालफत में विश्वास रखते थे।
ठाकुर हरवंश सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं। हरवंश सिंह के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालना सूरज को रोशनी दिखाने जैसा ही होगा। हरवंश सिंह ठाकुर ने गरीब परिवार में जन्म लेकर हर मायने में जिन ऊंचाईंयों को छुआ है वह हर किसी के बस की बात नहीं है। इस मार्ग में उन्हें न जाने कितने शूल निकालने पड़े, ना जाने कितने नश्तर चुभे होंगे, न जाने कितनी प्रतिकूल धाराओं का सामना करना पड़ा होगा यह तो वे ही जानें पर हरवंश सिंह कभी डिगे नहीं, रूके नहीं।
सिवनी में कांग्रेस का एक बड़ा तबका हर गलती को ठाकुर साहेब के मत्थे मढ़कर अपने दायित्वों और कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता आया है। सिवनी में विमला वर्मा के उपरांत हरवंश सिंह ही थे जो कांग्रेस को जिंदा रखते थे। दलगत सामंजस्य भी वे बेहतर तरीके से ही बनाने में सक्षम थे। 14 मई को उनके निधन के उपरांत उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ ने साबित कर दिया कि हरवंश सिंह वाकई शलाका पुरूष थे।
संगठन में उनकी पकड़ का कोई सानी नहीं था। एक वाक्या याद पड़ता है। एक बार एक काम के सिलसिले में प्रदेश के तत्कालीन वित्त मंत्री कर्नल अजय नारायण मुशरान के पास जाना हुआ। वहां प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संगठनात्मक ढांचे के बारे में उनसे एक अन्य मंत्री चर्चा कर रहे थे। हमारे अभिवादन को कर्नल साहेब ने मुस्कुराकर जवाब दिया और कुर्सी पर बैठने का संकेत किया। इसके उपरांत उन्होंने कहा कि राजा साहेब (तत्कालीन मुख्यमंत्री राजा दिग्विजय सिंह)।के पास इतना समय नहीं है कि वे संगठन को देख सकें। ऐसी परिस्थितियों में हरवंश सिंह ही दूसरे सक्षम व्यक्तित्व हैं जो संगठन में जान डाल सकते हैं। बकौल कर्नल साहेब, दिग्विजय सिंह और हरवंश सिंह ही दो ऐसे राजनेता हैं जो हर कार्यकर्ता को नाम से पहचानते हैं।
हरवंश सिंह की संगठन क्षमता और कार्यकर्ताओं पर पकड़ के साथ ही साथ सभी को साथ लेकर चलने की सभी मुक्त कंठ से तारीफ किया करते थे। एक समय था जब वे कुंवर अर्जुन सिंह के करीब थे। इसके बाद वे कमल नाथ के करीब आए फिर राजा दिग्विजय सिंह के नौरत्नों में शामिल हो गए। एक साथ तीन तीन क्षत्रपों को साधे रखना कोई हंसी खेल नहीं था। जब तिवारी कांग्रेस बनी तब कांग्रेस और तिवारी कांग्रेस के बीच तालमेल भी हरवंश सिंह जैसी शख्सियत के बलबूते की ही बात थी।
हरवंश सिंह ने चुनौतियों को सदा ही स्वीकारा है। उन्होंने कभी भी कठिन समय में धैर्य नहीं खोया। एक बार उन्हें जब मंत्री पद से महरूम रखा गया था तब भी उन्होंने इसे बहुत ही धैर्य के साथ स्वीकार करते हुए इसे समय का चक्र ही माना। इतने बड़े बड़े पदों पर रहने के बाद भी अहंकार मानो उन्हें छू भी नहीं सका था। ऐसा नहंी कि हरवंश सिंह के विरोधी नहीं थे। हरवंश सिंह के विरोधियों की तादाद बहुत अधिक थी।

बहरहाल, हरवंश सिंह के निधन के उपरांत उनकी पहली जयंति पर जिले भर में उन्हें याद न किया जाना वाकई आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा। यह चुनावी बेला है, हरवंश सिंह के न रहने पर उन्हें याद करने का काम कांग्रेस का है, इस मामले में पालीटिकल माईलेज लेना, लाभ हानि का गणित लगाना कांग्रेस या विरोधियों का काम है, पर सिवनी के एक प्रभावशाली नेता, केवलारी के चार बार के विधायक, प्रदेश शासन के पूर्व मंत्री, सिवनी जिले के प्रभारी मंत्री, मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष और मध्य प्रदेश विधानसभा के तत्कालीन उपाध्यक्ष होने के कारण सभी का दायित्व था कि हरवंश सिंह ठाकुर को श्रृद्धा सुमन अर्पित करते। इस मामले में कांग्रेस को आगे आना था, पर दुर्भाग्य से कृतघ्न कांग्रेसियों ने इस काम को अंजाम नहीं दिया। समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया और दैनिक हिन्द गजट की ओर से हरवंश सिंह ठाकुर को आदर सहित श्रृद्धा सुमन . . .

नवजात शिशु का शव और संवेदनाएं

नवजात शिशु का शव और संवेदनाएं

(शरद खरे)

जिले में नवजात शिशुओं के शव मिलने की घटनाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी होना चिंताजनक ही माना जा सकता है। किसी का जीवन समाप्त करने का हक भारत गणराज्य के कानून में किसी को भी नहीं दिया गया है। अपराधियों के लिए मौत की या फांसी की सजा इसमें अपवाद मानी जा सकती है। नवजात शिशुओं को जन्म कहीं न कहीं तो दिया ही गया होगा! जिले की सीमा में अगर नवजात के शव मिल रहे हैं तो संभावना यह भी बलवती होती है कि उसे इसी जिले में इस धरती पर लाया गया होगा। इसके लिए नर्सिंग होम्स या चिकित्सकों को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है।
कहने को तो नर्सिंग होम्स में गर्भपात को अवैध बताने वाले बोर्ड चस्पा होते हैं। बावजूद इसके इन नर्सिंग होम्स में धडल्ले से गर्भपात की खबरें आम हुआ करती हैं। जिला मुख्यालय में ही अनेक जगहों पर अवैध गर्भपात की खबरें मिल जाती हैं। दो तीन दशकों पहले गर्भपात के लिए एक संस्था का ही नाम जिले में सामने आता था। बाकी मामलों में पड़ोसी प्रदेश महाराष्ट्र के चुनिंदा शहरों में ही इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता था। यद्यपि इस बात के प्रमाण कहीं नहीं है फिर भी आज प्रौढ़ हो रही पीढ़ी इस बात को बेहतर समझ सकती है कि उस समय किन किन शहरों के नाम इसके लिए सामने आया करते थे।
आज विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर क्या वजह है कि नवजात शिशुओं के शव मिलने का सिलसिला थम ही नहीं पा रहा है। कुछ माह पहले जिला मुख्यालय की एकता कालोनी में चिकित्सा क्षेत्र में ही कार्यरत एक सरकारी नुमाईंदे के घर के प्रांगण में ही एक शिशु का शव मिला था। हाल ही में लखनादौन में एक शिशु का शव और उसके उपरांत एक बार फिर लखनादौन शहर में ही पालीथिन में एक बच्चे का शव मिला है।
यह निश्चित तौर पर अच्छी परंपरा का आगाज कतई नहीं माना जा सकता है। जिले में इस तरह की घटनाओं के बारे में विचार करने की जरूरत है। विशेषकर पालकों को इस मामले में विचार करना ही होगा। दरअसल, अधकचरी पाश्चात्य संस्कृति के चलते युवा नग्नता की अंधी सुरंग में घुसता ही चला जा रहा है। वह इसके दूसरे मुहाने के दलदल से अनजान ही है, किन्तु वर्तमान में उसके लिए यह एक खिलवाड़ की तरह ही है।
आज के इस परिवेश के लिए काफी हद तक टीवी और मोबाईल को ही जिम्मेदार माना जा सकता है। आधुनिक दिखने की जुगत में युवा तेजी से नग्नता को अंगीकार करते जा रहे हैं हो वाकई मेें चिंताजनक बात ही मानी जा सकती है। टीवी पर दिखाए जाने वाले सीरियल्स और अश्लील विज्ञापनों का बुरा प्रभाव आज की युवा पीढ़ी पर पड़े बिना नहीं है। अश्लील विज्ञापनों में कभी पिघली चाकलेट खाते नर नारी को एक दूसरे की ओर आकर्षित होते दिखाया जाता है तो कभी किसी बडी स्प्रे से बाला को आकर्षित होते दिखाया जाता है। क्या यह सब भारतीय समाज और संस्कृति के लिए उचित है? जाहिर है यह सब कुछ पूर्व के बजाए पाश्चयत्य संस्कृति के अनुरूप माना जा सकता है। फिर क्या वजह है कि भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा इस तरह के प्रसारण को अवैध करार देकर कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है?
सिवनी जिले में भी अश्लीलता का चलन जोरों पर है। युवाओं की जिद पर उनके पालकों द्वारा उन्हें मोबाईल तो दिला दिए जाते हैं पर क्या कभी किसी पालक ने अपने यौवन की दहलीज पर कदम रखने वाले बच्चे के मोबाईल के अंदर झांककर देखा है? इसका उत्तर नकारात्मक ही ज्यादा आएगा। युवाओं के मोबाईल में अश्लील सामग्रियों की भरमार हुआ करती है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
सिवनी जिले में अवैध रूप से मोबाईल में डाले जाने वाले गाने आदि का कारोबार जोर शोर से चल रहा है। स्टार कापीराईट प्रोटेक्शनद्वारा कुछ समय पूर्व एक दो बार पुलिस की मदद से छापे भी मारे गए थे मोबाईल डाउनलोडिंग करने वाले कारोबारियों के प्रतिष्ठानों में। स्टार कापीराईट प्रोटेक्शन की कार्यप्रणाली देखकर यही लग रहा है मानो वे वैध अवैध, या अश्लील क्लििपिंग के बदले इन प्रतिष्ठानों से आठ से दस हजार रूपए की सालाना राशि की मांग ही कर रहे हों। जिन प्रतिष्ठान संचालकों द्वारा यह राशि अदा कर दी गई उन प्रतिष्ठानों को मानो अश्लीलता परोसने की खुली छूट मिल गई है। पुलिस ने भी कभी अपने स्तर पर इन प्रतिष्ठानों या व्यवसाईयों के कंप्यूटर्स का निरीक्षण करने की जहमत नहीं उठाई है।
इसके साथ ही साथ अगर जिला मुख्यालय को ही लिया जाए तो जिला मुख्यालय में निर्जन स्थानों पर युवक युवतियों को अश्लील हरकतें करते देख उमर दराज लोग भी शरमा जाते हैं। इन युवाओं के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि अगर इन्हें कोई रोकता है तो ये उस पर टूट पड़ते हैं। पुलिस के बेकर (पुराने चीता मोबाईल) भी रस्म अदायगी के लिए इन युगलों को पकड़ने की जहमत नहीं उठाती है। बीते दिनों मसीही समाज के कब्रिस्तान में दो जोड़ी प्रेमी युगलों को पुलिस ने आपत्तिजनक हालत में पकड़ा था। इनके साथ क्या कार्यवाही की गई, यह बात किसी को नहीं पता।

युवा कच्ची मिट्टी के मानिंद होता है। उस जिस रूप में ढाल दिया जाए वह आसानी से ढल जाता है। पालकों की अनदेखी और समाज में फैली गंदगी की परिणिती के रूप में इस तरह के नवजात शिशु ही सामने आते हैं। सामाज से छिपकर अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को पाप समझकर उससे छुटकारा पाने के चक्कर में युवतियां इस तरह की घटनाओं को अंजाम देती हैं, और इस पाप में वे चिकित्सक या पैरामेडीकल स्टाफ बराबरी का भागीदार है जो यह करवाता है।

रविवार, 10 नवंबर 2013

सज गया चुनावी मैदान, तैयार हैं योद्धा, माहौल में पसरा है सन्नाटा

सज गया चुनावी मैदान, तैयार हैं योद्धा, माहौल में पसरा है सन्नाटा

कुहासा हटा नहीं चारों विधानसभा में, आखिर किस करवट बैठेगा मतदाताओं के रूझान का ‘ऊंट‘

(लिमटी खरे)

विधानसभा चुनावों के लिए रणभेरी बजे समय बीत चुका है। नाम दाखिल करने का समय भी निकल गया है। अब नाम वापसी की अंतिम तारीख 11 नवंबर का इंतजार है। सभी इसकी राह देख रहे हैं कि कौन कौन सैट होकर या दबाव में आकर अपने अपने नामांकन वापस लेते हैं। असल तस्वीर 11 नवंबर के बाद ही स्पष्ट होगी। 11 तारीख के बाद 24 तारीख तक महज 13 दिनों का ही माना जाएगा विधानसभा चुनाव, क्योंकि 25 को मतदान है। वैसे तो पांच सालों का लेखा जोखा आवश्यक है पर कहा जाता है कि लोगों की याददाश्त बेहद कम होती है, अतः लोग पुरानी बातों पर धूल ही डाल दिया करते हैं। नेता इस बात से भली भांति परिचित हैं, अतः वे भी कम ही समय में अपना सारा करतब दिखा दिया करते हैं।

सिवनी विधानसभा में है जोर आजमाईश
सिवनी विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की ओर से 2003 के चुनाव में 15 हजार से अधिक से पराजित हो चुके राज कुमार खुराना मैदान में हैं। पेशे से व्यवसाई राज कुमार खुराना राजनीति के अलावा खेल गतिविधियों में भी सक्रिय रहे हैं। राजकुमार खुराना से जनता यह जानना अवश्य ही चाहेगी कि उन्होंने पिछले सालों में आम जनता के दुख दर्द और सिवनी के अधिकारों के लिए क्या जतन किए? वहीं, भाजपा से दो बार के विधायक रहे नरेश दिवाकर मैदान में हैं। नरेश दिवाकर जिला भाजपा के अध्यक्ष और महाकौशल विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष (हो सकता है प्राधिकरण से वे त्यागपत्र दे चुके हों पर यह बात अभी तक उजागर नहीं हो पाई है) भी हैं। जनता के सामने उनके दस साल का बतौर विधायक तथा भाजपा के जिलाध्यक्ष के साथ ही साथ महाकौशल विकास प्राधिकरण का कार्यकाल भी है, इस नाते जनता उनके इस कार्यकाल का हिसाब भी रख रही होगी। नरेश दिवाकर ने 2003 में राजकुमार खुराना को नाकों चने चबवाए थे। इसके बाद 2008 में भाजपा ने उनकी टिकिट काटकर श्रीमति नीता पटेरिया को अपना उम्मीदवार बनाया था। वहीं तीसरी ताकत के रूप में पिछले विधानसभा चुुनावों में लगभग तीस हजार वोट लेने वाले दिनेश राय मैदान में हैं। वे निर्दलीय हैं। दिनेश राय मूलतः लखनादौन के रहने वाले माने जाते हैं, क्योंकि वे वर्तमान में लखनादौन बार एॅसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं। इसके अलावा आशा भलावी, सालिगराम, अकबर खान, अजहर उल अलीम, एम.आर.खान, महमूद खान, राम प्रसाद डेहरिया, मुकेश कुमार सनोडिया, तीरथ सिंह, मो.अशफाक, निहाल सिंह, रामेश्वर, राजेश उपाध्याय एवं घासीदास सनोाडिया आदि भी मैदान में हैं।
सिवनी विधानसभा में जोर आजमाईश सबसे ज्यादा दिखाई दे रही है। इसका कारण यह है कि इस विधानसभा क्षेत्र में जिला मुख्यालय शामिल है। जिला मुख्यालय में किसके पक्ष में वोट डलते हैं या किसकी बयार बहती है, यह बात तो समय आने पर ही पता चलेगा किन्तु अभी सिवनी में सर्दी के मौसम में गिरते पारे के साथ ही चुनावी गर्माहाट भी महसूस नहीं की जा रही है।

हाईटेक प्रचार में पिछड़े प्रत्याशी
एक ओर जहां सोशल नेटवर्किंग वेब साईट्स लोगों विशेषकर युवाओं के सर चढ़कर बोल रहीं हैं, वहीं सिवनी में प्रमुख राजनैतिक दलों के अलावा निर्दलीय या अन्य राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के द्वारा हाईटेक प्रचार में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई जा रही है, संभवतः हो सकता है सोशल मीडिया को पेड न्यूज के दायरे में लाने की कवायद के चलते प्रत्याशी फूंक फूंक कर कदम रख रहे हों।

मीडिया से गायब है सरगर्मी
वहीं दूसरी ओर समाचार पत्र और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी चुनावी सुगबुगाहट अपेक्षाकृत कम ही दिखाई दे रही है। हो सकता है इस बार चुनाव आयोग के पेड न्यूज के संबंध में कड़े निर्देशों के बाद प्रत्याशियों द्वारा किसी किस्म का रिस्क मोल नहीं लिया जा रहा हो। अखबारों में भी जनसंपर्क कार्यालय द्वारा जारी विज्ञप्तियों को, खबरों के रूप में भरपूर स्थान मिल रहा है। एक के बाद एक कर, एमसीएमसी द्वारा दिए जाने वाले नोटिस से मीडिया भी खबरों के मामले में बेहद सावधानी ही बरतता दिख रहा है।

ये हो सकते हैं मुख्य मुद्दे!
इस बार चुनाव में वैसे तो मुद्दों का टोटा ही दिखाई पड़ रहा है, फिर भी स्थानीय स्तर पर भीमगढ़ जलावर्धन योजना का पूरा लाभ सिवनी को न मिल पाना, जिला मुख्यालय में नगर पालिका की लापरवाही से गंदा बदबूदार पानी मिलना, फोरलेन की राह के फच्चर (जिसके लिए कांग्रेस ने भाजपा को तो भाजपा ने कांग्रेस को ही दोषी ठहराया है), ब्रॉडगेज, उद्योग धंधों का अभाव, जिला चिकित्सालय सहित विधानसभा में स्वास्थ्य सुविधाओं की उखड़ती सांसें, आर्युविज्ञान महाविद्यालय (मेडीकल कॉलेज), नर्सिंग ट्रेनिंग सेंटर, खेल सुविधाओं का अभाव (विशेषकर क्रिकेट के लिए स्टेडियम न होना, हाकी के एस्ट्रोटर्फ का लंबे समय बाद लोकार्पण, बेडमिंटन हॉल के बनने के बाद भी लोकार्पण न होना, टेबिल टेनिस के लिए स्थानाभाव, दौड़ के लिए ट्रेक का अभाव, जल क्रीड़ाओं का शून्य होना आदि), बाग बगीचों के शहर में एक भी बगीचा बच्चों के लिए सही हालत में न होना, गांव गांव अवैध शराब का विक्रय, जंगलों में लगातार लगने वाली जुएं की फड़, युवाओं के लिए रचनात्मक शिक्षा और साधनों का अभाव, ट्रांसपोर्ट नगर का अभाव, टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग के स्पष्ट नजरिए का अभाव, फोरलेन के बाद भी एक्सीडेंट की स्थिति में फौरी मदद के लिए ट्रामा यूनिट का न बनना, फोरलेन की हाईवे पेट्रोलिंग का किराना ढोने के लिए होने वाला उपयोग, फोरलेन की एंबूलेंस कभी न दिखना, अधूरी सड़क पर जबरिया टोल का बोझ, अवैध उत्खनन आदि शामिल हैं।

केवलारी में है रोचक मुकाबला!
सिवनी जिले की दूसरी सामान्य विधानसभा सीट केवलारी में मुकाबला रोचक होता दिख रहा है। केवलारी में पिछली बार पराजित हुए चार बार के (परिसीमन के पूर्व बरघाट सामान्य से) विधायक एवं राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष (हो सकता है आयोग से वे त्यागपत्र दे चुके हों पर यह बात अभी तक उजागर नहीं हो पाई है) डॉ.ढाल सिंह बिसेन पर भाजपा ने दुबारा दांव आजमाया है। वहीं, कांग्रेस द्वारा चार बार से केवलारी में कांग्रेस के परचम फहराने वाले स्व.हरवंश सिंह ठाकुर के ज्येष्ठ पुत्र ठाकुर रजनीश सिंह को मैदान में उतारा गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही में कशमकश का दौर चल रहा है। केवलारी विधानसभा के लोग यहां के विकास या अविकसित केवलारी विधानसभा को ही प्रमुख रूप से देख रहे हैं। कुछ लोग आज़ादी के उपरांत केवलारी के द्वारा विकास के सौपान तय किए जाने की कहानियां गढ़ रहे हैं, तो कुछ अविकसित केवलारी का ही राग अलाप रहे हैं। यद्यपि यह सब उजागर तौर पर नहीं हो रहा है, पर सुगबुगाहट कुछ इसी तरह की नजर आ रही है।
इसके अलावा जिला पंचायत के उपाध्यक्ष रहे और कांग्रेस के महामंत्री शक्ति सिंह ने भी केवलारी से बतौर निर्दलीय नामांकन भरा है। शक्ति सिंह के अलावा मूलचंद पटेल, केशव, हिहमायत, रामप्रसाद डेहरिया, अहमद सईद कुरैशी, आनंद, कुसुम ठाकुर, मो.हसीब, रामगुलाम बत्तेलाल, राकेश, श्रीमति मानवती, मंगल सिंह किरार, धर्मराज ठाकुर ओर हेमंतकुमार आदि मैदान में हैं।
देखा जाए तो केवलारी विधानसभा सीट आजादी के उपरांत लगभग कांग्रेस के कब्जे में ही रही है। इस सीट से कांग्रेस की सुश्री विमला वर्मा सबसे अधिक समय तक विधायक रही हैं। विमला वर्मा के उपरांत भाजपा की मुखर नेत्री श्रीमति नेहा सिंह (अब कांग्रेस में) ने भी इस सीट से प्रतिनिधित्व किया है। इसके उपरांत हरवंश सिंह यहां से विधायक रहे हैं। केवलारी विधानसभा क्षेत्र में विकास की गंगा बहाई गई है या फिर अभी भी विकास होना बाकी है, इस बारे में जनता जनार्दन ही बेहतर फैसला कर सकती है। एक तरफ अनुभवी डॉ.ढाल सिंह बिसेन हैं तो दूसरी ओर पहली बार चुनावी समर में उतरे ठाकुर रजनीश ंिसंह हैं।

ये हो सकते हैं चुनावी मुद्दे!
केवलारी विधानसभा क्षेत्र में चुनावी मुद्दों का टोटा नजर आ रहा है। वैसे केवलारी मेें भीमगढ़ बांध का भरपूर पानी होने के बाद भी किसानों को राहत नहीं है। इसके अलावा दो दर्जन से ज्यादा गांव में आज़ादी के बाद बिजली का न आ पाना भी एक मुद्दा है। साथ ही साथ क्षेत्र की अंदरूनी सड़कों और पुल पुलियों के अभाव में बच्चे और नागरिक कहीं पानी में नांव की सवारी गांठ रहे हैं तो कहीं रेल्वे ट्रेक पर चलकर रास्ता नाप रहे हैं, यहां भी ब्रॉडगेज एक मुद्दे से कम नहीं है, शिक्षा के क्षेत्र में भी इस क्षेत्र को पिछड़ा ही कहा जा सकता है। नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास भी एक मुद्दा हो सकता है। केवलारी क्षेत्र में बेरोजगारी सबसे बड़ा अभिशाप बनकर उभरी है, क्षेत्र में उद्योग धंधों के अभाव में मजदूर पलायन पर मजबूर हैं। यहां स्वास्थ्य सुविधाएं भी बदहाल ही हैं, आज़ादी के लगभग साढ़े छः दशकों बाद भी केवलारी की तस्वीर सही तरीके से नहीं उकेरी जा सकी है, क्षेत्र में जगह जगह बिकने वाली अवैध शराब भी लोगों के लिए सरदर्द से कम नहीं है। फोरलेन इस विधानसभा से होकर भी गुजर रही है, अतः फोरलेन के रिसते धाव यहां भी दिखाई दे जाएं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस तरह के अनेक मुद्दे आज भी जीवंत बने लग रहे हैं।

बरघाट की तस्वीर
सिवनी की पूर्व सामान्य और परिसीमन के बाद आरक्षित हुए विधानसभा क्षेत्र बरघाट में भाजपा का वर्चस्व लंबे समय से बना हुआ है। यहां से चार बार डॉ.ढाल सिंह बिसेन ने परचम लहराया तो उसके बाद कमल मर्सकोले ने भाजपा के गढ़ को बचाए रखा। इस बार भी कमल मर्सकोले को ही उम्मीदवार बनाया गया है। कमल मर्सकोले के पांच साल के कामों का हिसाब जनता के पास होगा और वह भी मायने ही रखेगा। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से अर्जुन काकोड़िया मैदान में हैं। इसके अलावा दिनेश सिंह, रामनरेश सिंह, सीता राजेंद्र सिंह, बिहारी लाल, अशोक सिरसाम, हंसराम आदि भी मैदान में हैं। बरघाट में कांग्रेस के उम्मीदवार कई बार पराजय का सामना कर चुके हैं तो भाजपा के उम्मीदवार को अपने पांच सालों का हिसाब जनता के समक्ष रखना होगा। दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दलों में भीतराघात के कयास तेज हो गए हैं।

ये हो सकते हैं चुनावी मुद्दे!
बरघाट विधानसभा वैसे तो पवार बाहुल्य मानी जाती है पर इसमें अरी से लेकर कुरई तक के बेल्ट के जुड़ने से इसमें आदिवासी समुदाय का वर्चस्व देखने को मिल रहा है। बरघाट विधानसभा में चावल उत्पादक किसान की भरमार है, अतः राईस मिल और चावल उत्पादकों की समस्याएं यहां प्रमुख रूप से सामने आ सकती हैं, इसके अलावा क्षेत्र की अंदरूनी सड़कें, जर्जर स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा के क्षेत्र में पसरी अराजकता, रोजगार आदि प्रमुख रूप से मुद्दे बन सकते हैं। इसके अलावा फोरलेन इस क्षेत्र के कुरई अंचल से होकर गुजरती है, जो सबसे खराब स्थिति में है। यह मामला सबसे तेजी से इस विधानसभा क्षेत्र में उभर सकता है।

लखनादौन की बिसात!
जिले की दूसरी आरक्षित विधानसभा सीट लखनादौन में भाजपा ने दो बार की विधायक श्रीमति शशि ठाकुर पर पुनः विश्वास जताया है। वहीं कांग्रेस ने पहले सूची में बेनी कुंदन परते का नाम तय किया बाद में नाटकीय तरीके से उसे बदलकर अब हिमाचल की राज्यपाल उर्मिला सिंह के सुपुत्र योगेंद्र बाबा के नाम पर मुहर लगाई है। कांग्रेस के लिए यह दूसरा मौका है जब लखनादौन में कांग्रेस ने टिकिट बदली है। इसके पहले बेनी परते की टिकिट काटकर शोभाराम भलावी को मैदान में उतारा गया था, तब कांग्रेस ने यहां मुंह की खाई थी। इन दोनों के अलावा बेनी कुंदन परते अभी निर्दलीय बतौर मैदान में हैं, साथ ही साथ आनंद इनवाती, सौरभ उईके, देवी प्रसाद कुसराम, रामनरेश सरेयाम, सुखलाल, राजेश्वरी उईके, कांतिलाल धुर्वे, नेपाल सिंह, दशोदी उईके, असाढू आदि भी मैदान में हैं। इस बार श्रीमति शशि ठाकुर को अपने दस साल के कार्यकाल का हिसाब लोगों को देना होगा। इसके अलावा उर्मिला सिंह के पुत्र योगेंद्र बाबा के लिए भी राह आसान नहीं है। उन्हें क्षेत्र में मेहनत करना जरूरी है। रही बात बेनी कुंदन परते की तो अगर वे निर्दलीय के बतौर मैदान में हैं और राजेश्वरी उईके भी मैदान में हैं। दोनों को भी वेतरणी पार करने के लिए मशक्कत करना पड़ सकता है।

चुनावी मुद्दों की है भरमार
लखनादौन विधानसभा क्षेत्र में चुनावी मुद्दे भरे पड़े हैं। क्षेत्र में सबसे बड़ा मुद्दा रोजगार, ब्रॉडगेज और फोरलेन का है। फोरलेन यहां आधी अधूरी पड़ी है। ब्रॉडगेज का भी कमोबेश यही हाल है। रोजगार के लिए साधन नहीं हैं। देश के मशहूर उद्योगपति गौतम थापर के स्वामित्व वाले अवंथा समूह के सहयोगी प्रतिष्ठान मेसर्स झाबुआ पॉवर लिमिटेड द्वारा यहां 1260 मेगावाट का पॉवर प्लांट डाला जा रहा है। इस पॉवर प्लांट की संस्थापना में अनेकानेक विसंगतियां हैं, मीडिया के माध्यम से चीख चीख कर इन विसंगतियों को उजागर किया गया था। इसके बावजूद विधायक श्रीमति शशि ठाकुर सहित विपक्ष में बैठी कांग्रेस के नुमाईंदों ने कोई पहल नहीं की। क्षेत्र के आदिवासियों को लूटा गया पर सियासी दल खामोश रहे। क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं आदि आदि के बुरे हाल हैं। लखनादौन शहर में अनेक काम नियम विरूद्ध हुए पर कांग्रेस भाजपा खामोश बैठी रहीं। भाजपा के मण्डल अध्यक्ष को थाने में अकारण निरूद्ध किया गया, पर भाजपा के संगठन ने इस बारे में कोई कार्यवाही नहीं की।
कुल मिलाकर चारों विधानसभा में स्थिति, नाम वापसी के उपरांत ही स्पष्ट हो पाएगी। नाम वापसी के बाद की तस्वीर को देखकर ही राजनैतिक पंडित अनुमान लगा सकते हैं। अभी तो यह स्पष्ट नहीं है कि कौन चुनाव लड़ेगा और कौन नामांकन वापिस लेगा।  इस सबके बाद भी कार्यकर्ता और मतदाता अपना मौन अभी तक बरकरार रखे हुए हैं जो प्रत्याशियों की हृदयगति को बढ़ाए हुए है। प्रदेश में दस सालों से भाजपा की सरकार है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस को भी अपना लेखा जोखा प्रस्तुत करना होगा। इस नाते अब अंतिम क्षणों में यही देखना बाकी है कि ऊंट आखिर किस करवट बैठने वाला है।