गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

प्रदर्शनी में दिखी लोकतन्त्र की झलक

प्रदर्शनी में दिखी लोकतन्त्र की झलक

लोस अध्यक्ष मीरा कुमार ने किया उद्घाटन

(लिमटी खरे)

लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने बुधवार को भोपाल में देश के संसदीय इतिहास पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस मौके पर राज्यसभा के उपाध्यक्ष के. रहमान, विधानसभा के अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी, उपाघ्यक्ष हरवंश सिंह सहित विभिन्न राज्यों से आए पीठासीन अधिकारी उपस्थित थे।

भारत की विधानसभाओं के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के अवसर पर विधानसभा परिसर में लगी ``भारत में लोकतन्त्र अतीत से वर्तमान तक´´ प्रदर्शनी में भारत में वैदिक काल से चली आ रही लोकतान्त्रिक परंपरा में भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम, भारत के संवधिान व भारतीय संसद के कामकाज पर चित्रों, लेखों पर भी प्रकाश डाला गया है।

संसदीय संग्रहालय एवं डीएवीपी द्वारा लगाई गई इस प्रदर्शनी में भारत की संघीय व्यवस्था व देश के विभिन्न राज्यों में संसदीय ढांचे, विशेषकर भोपाल में संसदीय गतिविधियों पर रोशनी डाली गई है। लोकसभा अध्यक्ष व अन्य अतिथियों ने इस प्रदर्शनी का गहराई से अवलोकन किया। श्रीमती मीरा कुमार ने आगन्तुक पुस्तका पर लिखे सन्देश में इस प्रदर्शनी की भव्यता की प्रशंसा की। इस दौरान मध्यप्रदेश के विकास को दर्शाती एक अन्य प्रदर्शनी का उन्होंने अवलोकन किया।

13 भागों में विभक्त यह प्रदर्शनी प्राचीनकाल से आज तक की संसदीय संस्थाओं तक देश में लोकतान्त्रिक परंपराओं पर विशेष बल देती है। जिनमें ऋग्वेद व महात्मा बुद्ध के काल सम्मिलित हैं।

यह प्रदर्शनी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम, भारत के संविधान व भारतीय संसद के कामकाज पर चित्रों, लेखों, चार्ट, समाचार पत्रों की कतरनों इत्यादि द्वारा प्रकाश डालती है। यह प्रदर्शनी भारत की संघीय व्यवस्था व देश के विभिन्न राज्यों में संसदीय ढांचे, विशेषकर भोपाल में संसदीय गतिविधियों पर भी प्रकाश डालती है।

कम्प्यूटर, मल्टीमीडया व एलसीडी पर दृश्य-श्रव्य के माध्यम से इस प्रदर्शनी को और भी आकर्षक बना दिया है। आगन्तुक यहां ऋग्वेद के श्लोकों और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा पाली भाषा में गाए गए श्लोकों को सुन सकते हैं।

महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरु, डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर व नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की आवाजें भी सुनी जा सकती हैं। कम्प्यूटर मल्टीमीडिया पर आगन्तुक भारतीय संविधान की स्केन की गई प्रति भी देख सकते हैं। प्रदर्शनी में भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महत्वपूर्ण क्षण व भारत में चुनाव प्रक्रिया को भी प्रदर्शनी में दर्शाया गया है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

अचानक उत्तर भारतीयों की याद कैसे आ गई युवराज को!

अचानक उत्तर भारतीयों की याद कैसे आ गई युवराज को!

(लिमटी खरे)

मुम्बई सहित समूचे महाराष्ट्र सूबे में शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे और उनके आतातायी भतीजे एवं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सर्वेसर्वा राज ठाकरे सालों से भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर लोगों को बांटने का कुित्सत प्रयास कर रहे हैं, किन्तु देश की सियासी पार्टियों ने मुंह नहीं खोला। अचानक ही कांग्रेस के युवराज और भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी सहित मुरली मनोहर जोशी जैसे साफ छवि के नेताओं ने इस मामले को पकडना आरम्भ कर दिया है। यह काफी हद तक सोचनीय ही है, कि आखिर और अचानक एसा क्या हो गया है कि इन नेताओं को उत्तर भारतीयों की परवाह होने लगी है।

सालों पहले शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे ने मुम्बई और महाराष्ट्र सूबे में मराठी और गैर मराठी लोगों के बीच भेद कर सियासत गर्माई थी, उसके बाद अब उनके भतीजे राज ठाकरे भी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के माध्यम से वही काम कर रहे हैं। पिछले कुछ सालों में महाराष्ट्र भाषावाद और क्षेत्रवाद के नाम पर जिस आग में झुलसा है, वह निश्चित तौर पर सियासी दलों के लिए शर्मनाक कहा जा सकता है। देश के गृह मन्त्री चुपचाप इस ताण्डव को कैसे देख पा रहे हैं, यह सोचकर आश्चर्य ही होता है, कि किस तरह आधी सदी से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस के सियासतदार आखों पर पट्टी बांधे बैठे हैं। साल दर साल शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना द्वारा भाषाई और क्षेत्रीयता की बिसात पर लोगों की भावनाओं का सरेआम शोषण किया जा रहा है और आजाद भारत के सियासतदार आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे हुए हैं।

हाल ही में मराठी और गैर मराठी मानुष के बीच के भेद पर सियासत तेज होती दिख रही है। इस मामले में पहले कांग्रेस के सबसे ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने बाला साहेब ठाकरे को मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के मूल का होना बताकर सनसनी फैला दी थी। इसके बाद कुछ नरम रूख अपनाकर मुरली मनोहर जोशी ने कह दिया कि मुम्बई सिर्फ मराठियों की है, और जिन्हें वहां रहना हो वे मराठियों की तरह ही रहें। जोशी के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि जोशी से उमरदराज सीनियर सियासतदार जो देश की सबसे बडी पंचायत लोकसभा के अध्यक्ष के आसन पर विराजमान रहे हों वे इस तरह के बयान दें। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि मुम्बई सभी की है, और यहां सभी को रहने का अधिकार है। इस पर शिवसेना के उद्व ठाकरे का हत्थे से उखडना आश्चर्यजनक नहीं माना जा सकता है।

भाजपा के सुर में सुर मिलाते हुए चर्चित स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने भी हुंकार भरी और धोती समेटकर इस मामले में अखाडे में छलांग लगा दी। बाबा ने कहा कि मुम्बई सभी की है, यहां किसी की दादा गिरी नहीं चलने दी जाएगी। संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव ने संघ की लाईन स्पष्ट करते हुए कहा कि भाषा पर भेद करना ठीक है पर विरोध उचित नहीं है। बकौल माधव, ``संघ का मौलिक विचार यही है कि जम्मू काश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा भारत एक है, इसमें रहने वाले नागरिकों में भेदभाव जैसी कोई चीज नहीं है। यदि कोई विभेद पैदा करने का प्रयास करे तो उसका विरोध होना चाहिए।`` माधव को भी लगभग दो दशक के सेना के आतंक को देख रहे हैं, पर अब अचानक उनकी तन्द्रा टूटना स्वाभाविक कतई नहीं माना जा सकता है।

गृह मन्त्री पी.चिदंबरम के अलावा भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी ने भी शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के इस तरह के मराठी और उत्तर भारतीय के भेद को खारिज किया है। बुन्देलखण्ड की एक कहावत ``सूपा तो सूपा, अब चलनी बोले, जिसमें 172 छेद`` को चरितार्थ करते हुए कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने भी इस मामले में पटना से तीर दागा है। बकौल राहुल गांधी,``महाराष्ट्र सभी भारतीयों का है, यह किसी विशेष लोगों की जागीर नहीं है, अगर वहां उत्तर भारतीयों को रोका गया तो वे चुप नहीं बैठेंगे``। कांग्रेस के युवराज को अगर उत्तर भारतीयों की याद आई है तो निश्चित तौर पर इसके गहरे निहितार्थ ही होंगे। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस का यही प्रयास है कि वह किसी भी सूरत में अपने युवराज को प्रधानमन्त्री के तौर पर ताजपोशी करवाएं, अन्यथा आने वाले समय में कांग्रेस की लोकप्रियता के ग्राफ में तेजी से गिरावट दर्ज हो सकती है। राहुल गांधी का इस मामले में दिलचस्पी लेने का साफ मतलब है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों के मन में अब उत्तर भारतियों को लेकर कोई ताना बाना बुना जा रहा है।

शोध का विषय तो यह है कि अचानक और एकसाथ सभी सियासतदारों का उत्तर भारतीयों के प्रति मोह कैसे जागृत हो गया है। इसके पीछे कहीं न कहीं गहरी सोची समझी सियासत छिपी हुई है। लगता है कि बिहार के वासिन्दों की देश भर में पूछ परख कर राजनैतिक दल काई भी मौका हाथ से गंवाना नहीं चाहती है। मौका गंवाया भी क्यों जाए, जब आने वाले समय में बिहार में चुनाव प्रस्तावित हैं। वोटबैंक पक्का करने की जुगत में कौन सा सियासी दल को नहीं होगा। उसूल, सिद्धान्त, उजली राजनैतिक बिसात यह सब बातें सिर्फ भाषणबाजी में ही अच्छी लगतीं हैं, वास्तविकता में तो सभी राजनैतिक दल अवसरवादिता और भटकाव का ही मार्ग अपनाकर सत्ता हासिल करते आए हैं।

दुख का विषय तो यह है कि आजाद भारत में धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर राजनीतिक बिसात बिछाई जाने लगी है। इसकी महज निन्दा करने से काम नहीं चलेगा, हमें जागना होगा, बेनकाब करना होगा इस तरह के षणयन्त्रकारियों को, जो आदमी से आदमी को बांट रहा है, किसी ने सच ही कहा है -

``मन्दिर, मिस्जद, गुरूद्वारे में, बांट दिया भगवानों को!

धरती बांटी, सागर बांटे, मत बांटों इंसानों का!!``

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

बन्द होना चाहिए पचौरी का महिमा मण्डन

बन्द होना चाहिए पचौरी का महिमा मण्डन

ग्लोबल वार्मिंग पर अनर्गल बयानबाजी से लोगों को भ्रमित कर रहे हैं पचौरी

(लिमटी खरे)

``ग्लोबल वार्मिंग`` इस शब्द से हिन्दुस्तान के लोग कुछ साल पहले तक भली भान्ति परिचित नहीं थे, पर मीडिया ने इसे जैसे ही हौआ बनाया लोगों की नीन्दें उडने लगीं। दुनिया आग के गोले में तब्दील हो जाएगी। सब कुछ जलकर खाक हो जाएगा। समाचार चेनल्स ने भी अपनी टीआरपी (टेलीवीजन रेटिंग प्वाईंट) को दुरूस्त रखने की गरज से खूब प्रोग्राम चलाए इस संबन्द्ध में। इससे उलट इस साल समूची दुनिया में हुई भीषण बर्फबारी ने सभी अनुमानों को उलटकर रख दिया। यह बात समझ से परे है कि अगर दुनिया गर्म हो रही है तो इस कदर कहर बरपाने वाली और हाड गलाने वाली सदीZ कैसे और कहां से आई।

जाहिर है, पर्यावरण के नाम पर दुकाने चलाने वाले लोग अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए अनर्गल बयानबाजी का सहारा ले अपनी अपनी टीआरपी में जबर्दस्त इजाफा कर रहे हैं। भारत में जलवायू विशेषज्ञ आर.के.पचौरी को मीडिया ने सर पर बिठा रखा है। पचौरी ने जो कहा वह पत्थर की लकीर हो गया। एक वाक्ये का जिकर यहां लाजिमी होगा। एक अखबार में नौकरी के दौरान आंग्ल भाषा के इंटरनेशनल शब्द के हिन्दी में अनुवाद के दौरान अतरराष्ट्रीय लिखा जाए या अतर्राष्ट्रीय, इस पर बसह चली। हमारे पत्रकार मित्र का कथन था कि संपादक महोदय ने कहा है कि अतरराष्ट्रीय लिखा जाए जबकि हमारा मत था कि अतर्राष्ट्रीय लिखा जाए। अन्त में पत्रकार मित्र नहीं माने हमने उन्हें डिक्शनरी में देखने को कहा, डिक्शनरी में अतर्राष्ट्रीय ही मिला। कहने का तातपर्य यह है कि संपादक भी आदमी ही है कोई मानक नहीं। इसी तरह पचौरी का महिमामण्डन किया जाना हमारी नज़र में अनुचित है।

पचौरी का कहना था कि वातावरण में ब्लैक कार्बन की मौजूदगी चिन्ता का विषय है, पर इससे ग्लेशियर के पिघलने की बात जोडना उचित नहीं है। जलवायू परिवर्तन पर अन्तरसरकारी पेनल (आईपीसीसी) के अध्यक्ष आर.के.पचौरी के अनुसार ब्लैक कार्बन के जलवायू परिवर्तन और ग्लेशियरों पर प्रभाव के सम्बंध में पांचवा आंकलन प्रतिवेदन 2013 में पेश किया जाएगा। कोपनहेगन में भी पचौरी ने सरकार को कटघरे में खडा कर खासी वाहवाही बटोरी थी।

गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन का आकलन करने वाली आईपीसीसी दुनिया की प्रमुख संस्था है। 2007 में अपने चौथे प्रतिवेदन में आईपीसीसी ने कहा चेतावनी दी थी कि देशों को कार्बन के उत्सर्जन को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने ही होंगे, इस प्रतिवेदन में हिमालय के ग्लेशियरों के घटने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार ठहराया गया था।

अब आईए देखें कि आईपीसीसी के चेयरमेन एवं जाने माने पर्यावरण और जलवायू विद श्रीमान आर.के.पचौरी असल जिन्दगी में क्या करते हैं। एक ब्रितानी समाचार पत्र के अनुसार वे देश की राजधानी दिल्ली में अपने घर से महज सोलह सौ मीटर दूर अपने कार्यालय जाने के लिए टोयोटा करोला कार का इस्तेमाल करते हैं। मजे की बात तो यह है कि ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के लिए पचौरी द्वारा लोगों को बसों में चलने और इको फ्रेण्डली कार के इस्तेमाल की सीख देते हैं, पर जब उस पर अमल की बारी आती है तो वे इसे ठेंगा दिखाने से नहीं चूकते हैं।

इतना ही नहीं पचौरी द्वारा लोगों को निरामिष भोजन (नानवेज) खाने से मना किया जाता है, पर वे रोजाना अपने कार्यालय से शोफर िड्रवन कार में दिल्ली के एक उम्दा मांसाहारी रेस्टोरेंट में जाकर अपनी क्षुदा शान्त करते हैं। पचौरी पर केन्द्रित आलेख में उक्त अखबार ने अनेक बातों का खुलासा किया हैै। इसके अनुसार पचौरी के एक एक सूट की कीमत 73 हजार रूपए से ज्यादा है।

वैसे भी हिमालय के ग्लेशियर के 2035 तक पिघलने का दावा कर पचौरी ने अपनी टीआरपी जबर्दस्त तरीके से बढा ली है, पर पिछले कुछ दिनों से विवादों में उलझे पचौरी की पेशानी पर पसीने की बून्दे साफ छलकती दिख रहीं हैं। इसका कारण य है कि कार्बन ट्रेडिंग से जुडी संस्थाओं का प्रकाश में आना। बताते हैं कि इन संस्थाओं के साथ आर.के.पचौरी के व्यवसायिक हित जुडे हुए हैं। क्लीन एनर्जी के उद्देश्य से इन संस्थाओं में अनेक कंपनियां अरबों डालर का निवेश करने जा रहीं हैं। बताते हैं कि पचौरी के स्वामित्व वाली एनजीओ द एनर्जी एण्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट को लगभग उन्नीस करोड रूपए की रकम हाल ही में उस वक्त मिली जब उन्होंने हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने की भविष्यवाणी की थी।

एक अन्य अखबार के अनुसार पचौरी की ग्लेशियर पिघलने की भविष्यवाणी में दम नहीं है। अखबार खुलासा करता है कि ग्लोबल वार्मिंग पर एक विद्यार्थी के शोध को ही आधार बनाकर जाने माने जलवायू और पर्यावरण विद आर.के.पचौरी ने आईपीसीसी के हवाले से भविष्यवाणी कर सभी को चौंका दिया। बताते हैं कि उक्त छात्र द्वारा भारत को छोडकर कुछ देशों के पर्वतारोहियों के संस्मरण और उनके द्वारा प्रदत्त जानकारी को ही आधार बनाकर यह थीसिस बनाई थी। इतना ही नहीं आईपीसीसी पर बर्न विश्वविद्यालय के एक छात्र के डिजर्टेशन को चुराने का भी आरोप है।

पचौरी द्वारा ग्लेशियर के पिघलने का जैसे ही दावा किया गया मीडिया को मानों नए पंख मिल गए। दिन रात चीख चीख कर मीडिया द्वारा बिना परीक्षण के ही पचौरी की बात को हवा दी जाने लगी। टीवी चालू करते ही, डूब जाएगी धरती, डूब जाएगी मुम्बई, डूब जाएगा कोलकता, जैसे सिंहनाद सुनाई पडने लगे। लोग घबराए सरकार घबराई, भेडिया आया भेडिया आया की तर्ज पर सभी की सांसे थमने लगीं।

हमारे मतानुसार देश की सरकार के पास संसाधनों की कमी कतई नहीं है। होना यह चाहिए था कि सरकार को पचौरी के वक्तव्यों की बारीकी से जांच करवाई जानी चाहिए थी और कार्बन ट्रेडिंग से जुडी संस्थाअों से उनके व्यवसायिक हितों को भी जांचना परखना चाहिए था। कहीं एसा न हो कि मीडिया पचौरी का महिमा मण्डन करता रहे एवं सरकार भी उसकी तरफ ध्यान न दे, और जब मामला खुले तो इन दावों के कारण समूची दुनिया भारत पर उपहास करती नज़र आए।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

सोनिया, मनमोहन के खिलाफ तलवार पजाई ममता ने

ये है दिल्ली मेरी जान

(लिमटी खरे)

सोनिया, मनमोहन के खिलाफ तलवार पजाई ममता ने
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तेजी से छाने वाली ममता बनर्जी को अब कांग्रेस से दोस्ती रास नहीं आ रही है। बंगाल में अपनी पसन्द के राज्यपाल न बिठा पाने से दुखी ममता के तेवर अब कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी और वजीरे आजम डॉ.एम.एम.सिंह के प्रति तीखे होते जा रहे हैं। रेल्वे के सरकारी विज्ञापनों में अब प्रधानमन्त्री और सोनिया गांधी की तस्वीरें न दिखें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ममता बनर्जी ने मन बना लिया है कि वे अब सोनिया और मनमोहन के फोटो वाले विज्ञापनों के माध्यम से उन्हें पब्लिसिटी नहीं दिलाएंगी। कोलकता के पास दमदम में मेट्रो रेल के रेक मरम्मत कारखाने के शिलान्यास के दौरान जारी आधे पेज के विज्ञापन में दोनों ही नेताओं के फोटो न दिखने पर कांग्रेसी हैरान परेशान रहे। सूत्रों के अनुसार मामला दस जनपथ पहुंचा फिर एक दूत को लगाया गया ममता से बातचीत करने। दूत के आग्रह पर ममता ने उसे सविनय अस्वीकार करते हुए यह कह दिया गया कि रेल्वे के विज्ञापनों में पीएम और सोनिया का क्या काम! कहते हैं कि मामला अन्त में इस बात पर सुलट गया कि बंगाल को छोडकर अन्य सूबों में जारी होने वाले विज्ञापनों में प्रधानमन्त्री और सोनिया के फोटो लगाए जाएंगे। चूंकि बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक ही हैं और मुख्यमन्त्री की कुर्सी पाने का सपना पाले ममता बनर्जी द्वारा प्रधानमन्त्री और सोनिया के फोटो लगाकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहतीं।

शिवराज की फटकार के बाद उतरे मसाज के होर्डिंग्स
देश भर में मसाज पार्लर की आड में देह व्यापार का धंधा जमकर फल फूल रहा है। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में तो यह चरम पर है। सरेआम अखबारों में मसाज के विज्ञापन अटे पडे होते हैं। रशियन, चायनीज, गोरी बाला क्या चाहिए आपको, सब कुछ बस एक फोन नंबर पर उपलब्ध हैं। बताते हैं कि हाल ही में दिल्ली यात्रा पर आए मध्य प्रदेश के निजाम शिवराज सिंह चौहान को किसी ने इस बारे में जानकारी दी। सीएम जब अपने सूबे की राजधानी भोपाल लौटे तो उन्होंने कई जगहों पर निक्की बावा के चाकलेट मसाज के होर्डिंग देखे। जब सीएम भाजपा के प्रदेश मुख्यालय दीनदयाल परिसर में चिकित्सा प्रकोष्ठ के एक प्रोग्राम में शिरकत करने जा रहे थे, तो उन्होंने नूतन कन्या महाविद्यालय के सामने होर्डिंग लगा देखा। फिर क्या था, शिवराज सिंह चौहान का धैर्य जवाब दे गया, और तत्काल उन्होंने निगम आयुक्त मनीष सिंह को फोन कर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि गल्र्स कालेज के सामने भी इस तरह के होर्डिंग! आयुक्त को मिली फटकार के बाद नगर निगम अमला सक्रिय हुआ और आनन फानन होर्डिंग एजेंसी और निक्की बावा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई।

मोदी से अमिताभ की नजदीकियां खल रहीं हैं मुलायम को
 समाजवादी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के कुनबे से एक के बाद एक कर नगीने पलायन करते जा रहे हैं। मुलायम के अमर प्रेम में दरार आने के बाद सपा का कुनबा छोटा होता जा रहा है। इसी बीच गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के बीच बढती नजदीकियों ने मुलायम की नीन्द उडा रखी है। बताते हैं कि अपनी फिल्म ``पा`` के प्रमोशन के लिए गुजरात गए अमिताभ ने मोदी से जबर्दस्त नजदीकी कायम कर ली है। अब दोनों के बीच फोन पर संवादों का आदान प्रदान अनवरत जारी है। मुलायम हैरान हैं कि एक ओर दुबई से अमर सिंह अपना त्यागपत्र भेजते हैं तो दूसरी ओर अमिताभ द्वारा नरेन्द्र मोदी के पक्ष में कशीदे गढे जाते हैं। अमिताभ के लगातार मोदी के संपर्क में रहने की खबरें मुलायम को अन्दर तक झझकोरने के लिए पर्याप्त कही जा सकतीं हैं। मुलायम जानते हैं कि अमर सिंह भले ही कुशल राजनेता न हों पर मेनीपुलेटर और मेनेजर में उनका कोई सानी नहीं है।

राजस्थान में थाने ही थाने
देश में राजस्थान ही इकलौता एसा सूबा होगा जिसमें थाने ही थाने हैं। जी हां, चौंकिए मत राज्य में पुलिस के थानों के अलावा, यातायात के थाने सडक दुघZटनाओं को रोकने, आबकारी के थाने अवैध शराब को रोकने, बिजली की चोरी रोकने विद्युत महकमे के थाने, आर्थिक अपराध रोकने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी), जसूसी मामलों की जांच हेतु इंटेलीजेंस ब्यूरो, भ्रष्टाचार रोकने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के थाने हैं। इसके अलावा परिवहन विभाग द्वारा अवैध वाहन चालन के लिए, पर्याटकों की सुरक्षा के लिए पर्यटन विभाग, अवैध निर्माण आदि को रोकने नगर निगम, कर चोरी रोकने वाणििज्यक कर विभाग, वन से सम्बंधित मामलों के लिए वन विभाग बिना ही थानों के थानेदारी कर रहे हैं। राजस्थान में अब मिलावटी मामलों के लिए अलग से थाना बनाया जा रहा है। प्रायोगिक और प्राथमिक तौर पर महानिरीक्षक रेंज स्तर पर विशेष थाने खोलने का प्रावधान किया गया है।

पूर्व मन्त्री का खाता सीज
देश के जनसेवकों का आलम देखिए कि डिफाल्टर होने पर उनके खाते सीज किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में दस हजार रूपए जमा न करने पर प्रदेश की पूर्व मन्त्री का खाता आयकर विभाग द्वारा सीज कर दिया गया। केन्द्रीय आयकर विभाग के सूत्रों का कहना है कि आयकर विभाग द्वारा दो साल पूर्व सूबे के आधा दर्जन मन्त्रियों को आयकर विवरणी जमा करने का नोटिस दिया था, जिसमें कुसुम मेहदेले भी शामिल थीं। इसके उपरान्त उपलब्ध सूचना के अनुसार उन्हें या उनके सलाहकार को धारा 148 के तहत उपस्थित होने का नोटिस दिया गया था। जानकारों की मानें तो धारा 148 के अनुसार विभाग के पास कर चोरी की पुख्ता सूचना है। विभाग ने दस हजार रूपए की पेनाल्टी न जामा करने पर सूबे के राज्य सचिवालय वल्लभ भवन स्थित भारतीय स्टेट बैंक में जाकर मेहदेले का खाता सीज कर दिया। ये है हमारे जनसेवकों का हाल।

बुनियादी सुविधाओं को तरसते दिल्ली के गांव
देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली के बारे में तरह तरह की अवधारणाएं और भ्रान्तिया विकसित हैं। दिल्ली को देश में सबसे ज्यादा रकम अधोसंरचना विकास के लिए दी जाती है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि दिल्ली के गांवों में न तो बिजली है, न पानी और न ही स्कूल जैसी कोई चीज ही उपलब्ध है। यह हमारा कहना नहीं है, दिल्ली के हाईकोर्ट द्वारा बदरपुर खादर की बदहाली पर चिन्ता व्यक्त की गई है। चीफ जस्टिस अजीत प्रकाश शाह और जस्टिस एस.मुरलीधर ने यह कहते हुए कि इस गांव में बिजली, पानी और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं अचंभित करने वालीं हैं, दिल्ली सरकार से पूछा है कि इस गांव में पढाई न कर पाने वाले 200 बच्चों के लिए सरकार ने क्या किया है। दिल्ली हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में कहा गया है कि दिल्ली के बदरपुर खादर गांव में छ: सौ परिवार रहते हैं और वहां बुनियादी सुविधाएं हैं ही नहीं।

शिव के गण की मितव्ययता
केन्द्र सरकार और राज्यों की सरकारें मितव्ययता के ठोस सन्देश देने की बात तो कहती है, किन्तु जब अमली जामा पहनाने की बात आती है तो जनसेवक इससे कन्नी ही काटते हैं। केन्द्र में विदेश मन्त्री एम.एस.कृष्णा, शशि थुरूर, त्रणमूल कांग्रेस के सुल्तान अहमद के बाद अब मध्य प्रदेश के वन मन्त्री सरताज सिंह मितव्ययता की मिसाल पेश कर रहे हैं। मन्त्री बनने के बाद उन्हें बंग्ला नहीं मिला सो उन्होंने राजधानी के एक मंहगे होटल को अपना आशियाना बना लिया। तारीफेकाबिल बात यह है कि सरताज सिंह खुद भोपाल में ही एक बेहतरीन होटल के मालिक हैं, पर उन्होंने आशियाना बनाया है किसी और के होटल को। सरताज को आवंटित बंग्ले में पूर्व मन्त्री कुसुम मेहदेले के रिश्तेदारों ने कब्जा जमा रखा है, सो वह रिक्त नहीं है। अब देखना यह है कि विदेश मन्त्रीद्वय और अहमद की तर्ज पर सरताज सिंह भी इसका भुगतान अपनी जेब से करने की घोषणा कर भोगमान किसके कांधों पर डालते हैं।

स्वाईन फ्लू से होटल उद्योग पर काली छाया
भारतीय हॉिस्पटालिटी उद्योग के लिए स्वाईन फ्लू शनि की काली छाया बनकर सामने आया है। एच1एन1 विषाणु के कारण फैलने वाला स्वाईन फ्लू विदेशी पर्यटकों की संख्या में काफी कमी कर रहा है। इसके साथ ही साथ समूचे देश में दिल्ली में तेजी से फैलने वाले डेंगू, चिकन गुनिया और स्वाईन फ्लू का प्रचार प्रसार वास्तविकता से कई गुना अधिक हो चुका है, इसीके चलते लोग दिल्ली जाने से कतराने लगे हैं। लोगों का मानना है कि ठण्ड के मौसम में स्वाईन फ्लू की मारक क्षमता बहुत अधिक होती है, इसलिए दिल्ली की ओर रूख करना ठीक नहीं है। वैसे बडे होटल्स ने इन हाउस डाक्टर्स के निर्देशों का पालन पूरी मुस्तैदी के साथ किया जा रहा है, फिर भी होटल उद्योग को लगे झटके से इंकार नहीं किया जा सकता है।

पत्रकारों की वेदना कैसे सुनें ममता
पिछले बजट में रेल मन्त्री ममता बनर्जी द्वारा पत्रकारों को लुभाने योजनाएं लागू कीं। इनमें यात्रा करने पर आरटीसी के बजाए अब रेल विभाग द्वारा एक कार्ड जारी किया गया है। यह कार्ड इतना बडा और बदरंग है कि मीडिया पर्सन्स इसे किसी को दिखाने में भी अपमान महसूस करते हैं। रेल विभाग चाहता तो स्मार्ट कार्ड की तर्ज पर लेमिनेटेड कार्ड जारी कर सकता था, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। इतना ही नहीं इस कार्ड से टिकिट बनवाने में पत्रकारों को भारी परेशानी का सामना करना पडता है। अनेक रेल्वे स्टेशन्स पर तो बुकिंग क्लर्क को पता ही नहीं होता है कि टिकिट कैसे बनेगी और कोड क्या डलेगा। क्लर्कस सीधे सीधे एक ही सवाल करते हैं कि क्या आपके पास पुरानी बुक कराई टिकिट है। अगर नहीं तो फिर कंसेशन की टिकिट बनना मुश्किल ही समझिए। निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन हो या नई दिल्ली, अगर इस कार्ड के जरिए ओपन टिकिट लेना चाहें तो हजार प्रश्नों के उत्तरों के लिए पत्रकार मित्रों को तैयार रहना चाहिए। होना यह चाहिए था कि देश के हर कंप्यूटराईज्ड बुकिंग विण्डो पर इस कार्ड के बारे में विस्तार से सूचना चस्पा करना चाहिए।

दस लाख में लोकतन्त्र नीलाम!
लूट, डकैती, हत्या, राहजनी आदि के लिए प्रसिद्ध मध्य प्रदेश के दतिया जिले में पंचायत चुनाव में धार्मिक आस्था के नाम पर लोकतन्त्र को ही नीलाम कर दिया गया। भाण्डेर तहसील के ग्राम खिरिया फैजुल्ला गांव में एक मन्दिर के जीणोZद्धार के लिए सरपंच के पद की बोली लगा दी गई। गावं के एक युवा शिवकुमार ने दस लाख रूपए दान दिए और सर्वसम्मति से उसे सरपंच चुन लिया गया। दरअसल इस गांव में पुराने हनुमान मन्दिर के जीणोZद्धार के लिए एक बैठक बुलाई गई और निर्णय लिया गया कि जो भी सबसे ज्यादा दान देगा उसे निर्विरोध सरपंच बना दिया जाएगा। इतना ही नहीं यहां 17 पंच भी निर्विरोध चुने गए हैं। मध्य प्रदेश पर राम के नाम पर राज करने वाली भाजपा का शासन है, और भाजपा शासित सूबे में अगर धर्म के नाम पर लोकतन्त्र को ही नीलाम कर दिया जाए तो फिर क्या कहने। यद्यपि दिल्ली के केन्द्रीय कार्यालय में भाजपाई सफाई दे रहे हैं कि क्षेत्र के 1200 मतदाताओं ने एकता की मिसाल पेश की है और अपसी वेमनस्य तथा फिजूलखर्ची रोककर एक नई मिसाल पेश की है। यह गांव लूट, डकैती, हत्या, राहजनी आदि के लिए कुख्यात है।

कांग्रेस के लिए दुर्जन हुए सज्जन
कांग्रेस के पूर्व संसद सदस्य सज्जन कुमार से अब अपने ही लोगों ने किनारा करना आरम्भ कर दिया है। पिछले 25 सालों से 1984 के दंगों में संलिप्तता का आरोप झेल रहे सज्जन कुमार उमर के इस पडाव में लंबी लडाई लडकर फिर से खुद को स्थापित कर पाएंगे इस बात में संशय ही है। इस बार वे सबसे अधिक आहत इसलिए भी हैं कि अबकी बार वार उनकी अपनी पार्टी से ही हुआ है। संसद में किए अपने वादे को निभाने के लिए केन्द्रीय गृह मन्त्री ने सीबीआई को सज्जन कुमार के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे ही दी है। दंगे में संलिप्त होने के आरोप ललित माकन, अर्जुन दास, धर्मवीर शास्त्री पर भी लगे थे, किन्तु वे अब जिन्दा नहीं है। सज्जन और टाईटलर का नाम बार बार उछलता रहा है। अब सज्जन को सभी मुकदमे नए सिरे से झेलने होंगे साथ ही उनका सरकारी आवास भी जल्द ही उनके हाथों से जा सकता है।

नक्सली चला रहे छग में अपने स्कूल
नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ के बारे में खबरें चाहे जो आ रहीं हों पर अन्दरूनी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। केन्द्रीय गृह मन्त्रालय के सूत्रों के अनुसार छत्तीसगढ के बस्तर संभाग में नक्सल प्रभावित क्षेत्र के स्कूलों से लगातार आदिवासी विद्यार्थी लापता होते जा रहे हैं। नक्सली गांवों में जाकर हर घर से एक बच्चे की मांग भी करते हैं, और उन्हें जनयुद्ध का स्कूल चलाकर माओवादी विचारधाराओं से आवगत कराते हैं। इस भयावह स्थिति को छिपाने के लिए भले ही राज्य सरकार सब कुछ नियन्त्रण में बता रही हो पर जमीनी हकीकत से वह अनजान नहीं मानी जा सकती है। छत्तीसगढ में नक्सलियों ने अपनी समानान्तर सत्ता कुछ क्षेत्रों में स्थापित कर ली है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। कुछ इलाकों में सिर्फ और सिर्फ इन्हीं की मर्जी से पत्ते हिलते हैं।

फरार आतंकियों को हवाला से मिले थे दो लाख!
दिल्ली से फरार हुए तीन आतंकी अब्दुल रजाक, मौहम्मद सादिक और रिफाकत अली को हवाला के जरिए दो लाख रूपए की रकम मुहैया करवाई गई थी। हवाला किस आपरेटर के माध्यम से हुआ था इसकी जानकारी जुटाने में स्पेशल सेल को नाकों चने चबाने पड रहे हैं। भरोसेमन्द सूत्रों का दावा है कि पुलिस को सेवा सदन में ही आतंकियों को रकम पहुंचाने की जानकारी दे दी गई थी। इसके बाद ही उन्होंने वहां से भागने की कार्ययोजना को अमली जामा पहनाया। पुलिस की उडी नीन्द अब कुछ हद तक ठीक इसलिए मानी जा सकती है कि गणतन्त्र दिवस बिना किसी सरगर्मी के शान्तिपूर्ण तरीके से निपट गया। सूत्रों के अनुसार आतंकवादियों के लिए दिल्ली साफ्ट टारगेट बन गया है, इस साल होने वाले कामन वेल्थ गेम्स के दौरान सुरक्षा सबसे बडी चुनौति के तौर पर सामने आएगी।

पुच्छल तारा
हरिद्वार से रचना सिंह द्वारा भेजे गए ई मेल के अनुसार एक साधू दूसरे साधू से बोला -``उफ! यह जीवन . . . समय का टोटा, काम का पहाड, कोई करे तो क्या करे. . . .! दूसरे ने तपाक से जवाब दिया -``सम्मेलन, अधिवेशन, पार्टी, ट्रस्ट, साक्षात्कार, और तो और अब चेनल्स में भी विशेष कार्यक्रम. . .! अरे समय ही कहां है, भगवान को याद करने का हम सन्यासियों के पास. . .।

रविवार, 31 जनवरी 2010

भारतवंशियों का कभी नहीं डूबता है सूरज


भारतवंशियों का कभी नहीं डूबता है सूरज

दुनिया भर में पूजा जाता है इण्डियन स्किल

रहें कहीं, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी

(लिमटी खरे)

भारत पर सालों साल राज करने वाले ब्रितानियों के बारे में कहा जाता था कि अंग्रेजों का सूरज कभी नहीं डूबता, अर्थात उनकी सल्तनत इतने सारे देशों मे थी कि कहीं न कहीं सूरज दिखाई ही देता था। आज हम हिन्दुस्तानी गर्व से कह सकते हैं कि भारतवंशियों का सूरज कभी भी नहीं डूबता है। विश्व के कमोबेश हर देश में भारतीय मिल जायेंगे तो अपनी सफलता के परचम लहरा रहे हैं।

अपने ज्ञान और कौशल से दुनिया भर को आलोकित करने वाले भारतवंशियों के दिमाग का लोहा दुनिया का चौधरी माने जाने वाला अमेरिका भी मानता है। हर क्षेत्र हर विधा, हर फन में माहिर होते हैं भारतवंशी। भले ही वे गैर रिहायशी भारतीय (एनआरआई) हों पर कहलाएंगे वे भारतवंशी ही।

अपनी प्रतिभा के बलबूते पर ही दुनिया भर में भारत के नाम का डंका बजाने वाले भारतीयों को भी अपने वतन पर नाज है। भारत सरकार द्वारा प्रवासी भारतीयों के योगदान को रेखांकित करने के लिए 2003 से हर साल नौ जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन किया जाता है।

दरअसल इस दिन 1915 में भारत के सबसे बडे प्रवासी भारतीय मोहन दास करमचन्द गांधी ने दक्षिण आफ्रीका से भारत लौटकर स्वाधीनता का बिगुल बजाया था। कोट पेंट से आधी धोती पहनने वाले इस महात्मा ने अहिंसा के पथ पर चलकर भारत को आजादी दिलाई और हम भारतीयों का जीवन ही बदल दिया।

देखा जाए तो हिन्दुस्तानियों की तादाद लगभग हर देश में है। कनाडा में दस लाख, अमेरिका में साढे बाईस लाख, त्रिनिदाद में साढे पांच लाख, गुयाना में तीन लाख बीस हजार, सूरीनाम में एक लाख चालीस हजार, ब्रिटेन में 15 लाख, फ्रांस में दो लाख अस्सी हजार, साउदी अरब में 18 लाख, बेहरीन में साढे तीन लाख, कुबेत में पांच लाख अस्सी हजार, कतर में पांच लाख, यूनाईटेड अरब अमीरात में 17 लाख, दक्षिण अफ्रीका में 12 लाख, मरीशस में नौ लाख, यमन में एक लाख 20 हजार, ओमान में पांच लाख साठ हजार, श्रीलंका में 16 लाख, नेपाल में 6 लाख, मलेशिया में 21 लाख, म्यांमार में साढे तीन लाख, सिंगापुर में 6 लाख, फिजी में 3 लाख 22 हजार और आस्ट्रेलिया में साढे चार लाख भारतवंशी निवास कर रहे हैं।

दुनिया के चौधरी अमेरिका जैसे देश में 38 फीसदी चिकित्सक भारतीय हैं। यहां वैज्ञानिकों में 12 फीसदी स्थान भारतवंशियों के कब्जे में है। नासा में 36 फीसदी कर्मचारी भारतवंशी हैं। इतना ही नहीं कम्पयूटर के क्षेत्र में धमाल मचाने वाली माईक्रोसाफ्ट कंपनी में भारत के 34 फीसदी तो आईबीएम में 28 और इंटेल में 17 फीसदी कर्मचारियों ने अपना डंका बजाकर रखा हुआ है। फोटोकापी के क्षेत्र में 13 फीसदी हिन्दुस्तानी अमेरिका में छाए हुए हैं। भारतवंशियों की पहली पसन्द बनकर उभरा है अमेरिका, यहां भारतीय मूल के स्वामित्व वाली 100 शीर्ष कंपनियों का सालाना राजस्व 2.2 अरब डालर है, जो दुनिया भर के 21 हजार लोगों को रोजगार मुहैया करवा रही हैं।

भारतवंशियों के अन्दर कोई तो खूबी होगी जो कि विदेशों की धरा में ये अपने आप को संजोकर रखे हुए हैं। परदेस में परचम फहराने वाले भारतियों में अमेरिका में लुइसियाना के गर्वनर बाबी जिन्दल, न्यूजीलेण्ड के गर्वनर जनरल आनन्द सत्यानन्द, जाने माने ब्रिटिश सांसद कीथ वाज, लिबरल डोमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष लार्ड ढोलकिया, सुरीनाम के उपराष्ट्रपति राम सर्दजोई, सिंगापुर के महामहिम राष्ट्रपति एस.आर.नाथन, तीसरी बार गुयाना के महामहिम राष्ट्रपति बने भरत जगदेव के अलावा मरीशस के महामहिम राष्ट्रपति अनिरूद्ध जगन्नाथ, मरीशस के प्रधानमन्त्री नवीन रामगुलाम, 1999 में फिजी के प्रधानमन्त्री महेन्द्र चौधरी, केन्या के प्रथम उपराष्ट्रपति जोसेफ मुरूम्बी, त्रिनिदाद एवं टौबेगो की पहली महिला अटार्नी जनरल कमला प्रसाद बिसेसर के नाम प्रमुख हैं।

विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल विजेता डॉ हरगोविन्द खुराना, एस.चन्द्रशेखर, अन्तरिक्ष विज्ञानी कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स के अलावा 2009 में नोबेल विजेता वेंकटरमन रामाकृष्णन तो साहित्य के क्षेत्र में बुकर ऑफ बकर्स पुरूस्कार से नवाजे गए सलमान रशदी, बुकर विजेता किरण देसाई अर्थशास्त्र के नोबेल विजेता आमत्र्य सेन, पुलित्जर विजेता झुम्पा लाहिडी, नोबेल विजेता सर वी.एस.नागपाल प्रमुख हैं।

कारोबार के क्षेत्र में भारतवंशियों की सफलता इतनी है कि उनकी उंचाईयों को सर उठाकर देखने पर सर की टोपी पीछे गिरना स्वाभाविक ही है। पेिप्सको में मुख्य कार्यकारी अधिकारी इन्दिरा नूरी, ब्रिटेन के धनी परिवारों में से एक हिन्दुजा बंधु, बोस कार्पोरेशन के संस्थापक अमर बोस, इस्पात करोबारी लक्ष्मी नारायण मित्तल, 1978 मेें नून प्रोडक्टस की स्थापना करने वाले सर गुलाम नून, मूलत: चार्टर्ड एकाउंटेंट करन बिलीमोरिया ने 1989 में कोब्रा बीयर का कारोबार आरम्भ किया जो आज सर चढकर बोल रहा है। इसके अलावा साठ के दशक में अपनी बिटिया के इलाज के लिए ब्रिटेन पहुंचे लार्ड स्वराज पाल ने 1978 में कापरो समूह की स्थापना की जो आज बुलन्दियों पर है।

कंप्यूटर की दुनिया में तहलका मचाने वाले एचपी के जनरल मेनेजर राजीव गुप्ता, पेंटियम चिप बनाने वाले विनोद धाम, दुनिया के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति अजीम प्रेमजी, वेब बेस्ड ईमेल प्रोवाईडर हॉटमेल के फाउण्डर और क्रिएटर समीर भाटिया, सी, सी प्लस प्लस, यूनिक्स जैसे कंप्यूटर प्रोग्राम देने वाली कंपनी एटी एण्डटी बेल के प्रजीडेंट अरूण नेत्रावाली, विण्डोस 2000 के माईक्रोसाफ्ट टेस्टिंग डायरेक्टर संजय तेजवरिका, सिटी बैंक के चीफ एग्जीक्यूटिव विक्टर मेंनेंजेस, रजत गुप्ता और राना तलवार, का नाम आते ही भारतवासियों का सर गर्व से उंचा हो जाता है।

दुनिया भर के देशों में सरकार में सर्वोच्च या प्रमुख पद पाने वालों में भारतवंशी आगे ही हैं। फिजी में एक, गुयाना में 14, मलावी में 1 मलेशिया में चार, मारीशस में 17, मोजािम्बक में 1, सिंगापुर में 8, श्रीलंका में 9, सूरीनाम में 5, त्रिनिदाद और टुबैगो में 8, दक्षिण आफ्रीका में चार लोगों ने सरकार में सर्वोच्च या प्रमुख पद पाया है।

इसी तरह कनाडा में 9, जिम्वाब्बे में 1, जांबिया में 1, ब्रिटेन में 24, त्रिनिदाद और टुबैगो में 23, युगाण्डा में 1, तंजानिया में 4, इण्डोनेशिया में 1, आयरलेण्ड में 1, मलेशिया में दस, सूरीनाम में 18, श्रीलंका में 2, दक्षिण अफ्रीका में 16, सिंगापुर में 4, पनामा में एक, मोजािम्बक में 11 और मारीशस में 36 भारतीय मूल के संसद सदस्य या सीनेटर रहे हैं।

इस लिहाज से माना जा सकता है कि भारतवंशी समूचे विश्व में फैले हुए हैं, और हर क्षेत्र, हर विधा हर फन में भारत का तिरंगा उंचा करने के मार्ग प्रशस्त करते जा रहे हैं। भारतीय दिमाग को विश्व के हर देश में पर्याप्त सम्मान दिया जाता है। माना जाता है कि भारतवंशी के दिमाग के बिना कोई भी देश प्रगति के सौपान तय नहीं कर सकता है। तभी तो हम भारतीय गर्व से कहते हैं -``वी लव अवर इण्डिया``।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

यमराज के शिकंजे में पेंच नेशनल पार्क के बाघ

यमराज के शिकंजे में पेंच नेशनल पार्क के बाघ

13 महीने में 19 बाघ हुए काल कलवित

(लिमटी खरे)

सिवनी। एक तरफ केन्द्र सरकार द्वारा एक के बाद एक कार्यक्रम लागू कर करोडों अरबों रूपए खर्च कर वन्य जीवों के संरक्षण के लिए नित नई योजनाओं को बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के सिवनी जिले मेें एक के बाद एक बाघों ने दम तोडा है, जिससे यह साबित हो रहा है कि कागजों में तो योजनाएं फलफूल रहीं हैं, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही है।

प्रदेश के पेंच राष्ट्रीय उद्यान में पिछले चार महीने में चार बाघ मारे गए हैं। इन बाघों की मौत कैसे हुई है, यह बात अभी उजागर नहीं हो सकी है। गत 27 जनवरी को पेंच में बेयोरथडी बीट के तालाब में एक लगभग सात वषीZय जवान शेर मृत अवस्था में तैरता पाया गया। वन विभाग द्वारा इसकी सूचना मिलने पर आनन फानन में गोपनीय तरीके से इस शेर का अन्तिम संस्कार कर दिया गया था। जब यह मामला मीडिया में उछला तब जाकर वन विभाग ने इसकी आधिकारिक तौर पर जानकारी देना आरम्भ किया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार उक्त बाघ के शव परीक्षण के दौरान उसकी किडनी, लीवर एवं हृदय क्षतिग्रस्त पाया गया। आशंका व्यक्त की जा रही है कि उक्त बाघ को जहर देकर मारा गया था। उक्त बाघ बीमार भी नहीं था और वह जहां तैरता पाया गया वहां पानी महज डेढ से दो फिट ही गहरा था। यक्ष प्रश्न आज भी यह है कि अगर बाघ की मौत जहर से हुई है तो जहर बाघ के शरीर में पहुंचा कैसे।

यहां उल्लेखनीय है कि 2003 में जब बाघों की गणना की गई थी, तब पेंच में 45 बाघ थे, जो 2005 में कम होकर 42 हो गए थे। वर्तमान में यहां महज 33 बाघ ही बताए जा रहे हैं। पिछले तीन माहों में दो बाघ के शावकों सहित तीन बाघ काल कलवित हो चुके हैं।

सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रदेश के बाघ बाघिन को सूबे के वन विभाग द्वारा सेटेलाईट कॉलर से जोड दिया गया है, जिससे इनकी उपस्थिति एवं गतिविधियों पर बराबर नज़र रखी जा सकती है। पेंच मेें भी बाघों को इससे जोडने के लिए डब्लू आई आई देहरादून के विशेषज्ञों के दल में शामिल डॉ.शंकर और डॉ.पराग निगम ने बाघों को सेटेलॉईट कॉलर से जोडा था।

मध्य प्रदेश का वन महकमा वन्य जीवों के प्रति कितना संवेदनशील है, इस बात का अन्दाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि पिछले 13 माहों में प्रदेश में 19 बाघों की मौत हुई है, जिसमें से सिवनी जिले के पेंच राष्ट्रीय उद्यान और कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में चार चार और बांघवगढ के नेशनल पार्क में तीन की मौत हुई थी।

पेंच नेशनल पार्क में जब से पार्क संचालक के.नायक, उपसंचालक ओम प्रकाश तिवारी की पदस्थापना हुई है, तबसे पेंच नेशनल पार्क में वन्य जीवों पर शामत ही आ गई है। बताया जाता है कि वन्य जीवों की तस्करी के लिए अब सिवनी जिले के जंगल ``साफ्ट टारगेट`` बनकर उभर रहा है। उधर दूसरी ओर क्षेत्रीय सांसद के.डी.देशमुख और विधायक कमल मस्कोले द्वारा भी वन्य जीवों के बारे में कोई संवेदनाएं नहीं बरती जा रहीं हैं। अब तक सिवनी में मारे गए वन्य जीवों के मामले में किसी की भी जवाबदारी निर्धारित न किया जाना आश्चर्यजनक ही है।

यहां एक और तथ्य गौरतलब है कि सिवनी से होकर गुजरने वाला शेरशाह सूरी के जमाने के मार्ग पर बनने वाले उत्तर दक्षिण गलियारे में लगभग आठ किलोमीटर के मार्ग पर अडंगा लगाया गया है। इस अडंगे का कारण यह है कि इस आठ किलोमीटर के हिस्से में वन्य जीवों के संरक्षण की बात कही गई है। यह मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

महिलाओं का सच्चा हितेषी बना मध्य प्रदेश

महिलाओं का सच्चा हितेषी बना मध्य प्रदेश

महिलाओं के लिए वरदान से कम नहीं हैं शिवराज की योजनाएं

पहली बार किसी सूबे में महिलाओं को शक्तिशाली बनाने का हुआ है प्रयास

(लिमटी खरे)

देश को आजाद हुए छ: दशक (बासठ साल) से अधिक का समय हो चुका है। सरकार भी बासठ साल में अपने कर्मचारी को सेवानिवृत कर देती है। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि देश ने सरकार के हिसाब से अपनी औसत आयु की नौकरी पूरी कर ली है, पर क्या देश सेवानिवृति के लिए तैयार है। कतई नहीं, इन बासठ सालों में देश ने तरक्की के आयाम अवश्य तय किए होंगे पर यह अनेक मामलों में रसातल की ओर भी अग्रसर हुआ है।

मातृशक्ति को सभी बारंबार प्रणाम करते हैं, पर कोई भी महिलाओं को आगे लाने या सशक्त बनाने की पहल नहीं करता है। देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस ने प्रधानमन्त्री के तौर पर स्व.श्रीमति इिन्दरा गांधी, अपने अध्यक्ष के तौर पर श्रीमति सोनिया गांधी के बाद देश की पहली महामहिम राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, पहली लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार दिए हैं, वहीं भाजपा ने मातृशक्ति का सम्मान करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के तौर पर श्रीमति सुषमा स्वराज को आसन्दी पर बिठाया है।

इतना सब होने के बाद भी महिलाओं के लिए 33 फीसदी के आरक्षण का विधेयक लाने में कांग्रेस को नाकों चने चबाने पड रहे हैं, जाहिर है पुरूष प्रधान मानसिकता वाले देश में महिलाओं को बराबरी पर लाने की बातें तो जोर शोर से की जातीं हैं, पर जब अमली जामा पहनाने की बात आती है, तब सभी बगलें झाकने पर मजबूर हो जाते हैं।

मध्य प्रदेश में पिछले कुछ सालों से ``मां तुझे सलाम . . .`` का गीत जमकर बज रहा है। सूबे के निजाम शिवराज सिंह चौहान द्वारा मध्य प्रदेश में स्त्री वर्ग के लिए जो महात्वाकांक्षी योजनाएं लागू की गई हैं, वे आने वाले समय में देश के लिए नजीर से कम नहीं होंगी। निश्चित तौर पर इन योजनाओं को या तो `जस का तस` या फिर कुछ हेरफेर कर सभी राज्य लागू करने पर मजबूर हो जाएंगे।

सुप्रसिद्ध कवि मैथली शरण गुप्त की कविता की ये पंक्तियां -
``अबला जीवन हाय तुम्हारी यह ही कहानी!,
आंचल में है दूध, और आंखों में है पानी!!``

को शिवराज सिंह चौहान ने कुछ संशोधित कर आंखों के पानी को खुशी के आंसुओं में तब्दील कर दिया है।

कुल पुत्र से ही आगे बढता है, की मान्यता को झुठलाते हुए शिवराज सिंह चौहान ने लाडली लक्ष्मी योजना का आगाज किया। इस योजना में आयकर न देने वाले आंगनवाडी में पंजीकृत वे पालक जिन्होंने परिवार नियोजन को अपनाया हो, अपनी कन्या का नाम दर्ज करा सकते हैं। इसमें उन्हें तीस हजार रूपए का राष्ट्रीय बचत पत्र प्राप्त होता है। इस जमा राशि से मिलने वाले ब्याज से लाडली लक्ष्मी को दो हजार रूपए एक मुश्त दिए जाते हैं, जिससे वह पांचवी तक की शिक्षा प्राप्त कर सके।

इसके उपरान्त आठवीं पास करने पर चार हजार रूपए, दसवीं में पहुंचने पर साढे सात हजार रूप्ए और ग्यारहवीं तथा बारहवीं कक्षा के लिए उसे हर माह दो सौ रूपयों की मदद मिलेगी। इतना ही नहीं जब वह सयानी हो जाएगी तो उसे एक लाख रूपए से अधिक की राशि मिलेगी जो उसकी शादी में काम आएगी। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की यह योजना सुपरहिट साबित हुई है, अब तक साठ हजार से अधिक कन्याएं लाडली लक्ष्मी बन चुकी हैं।

इससे इतर बालिकाओं की शिक्षा के लिए शिवराज सिंह चौहान ने खासा ध्यान दिया है। सच ही है, अगर घर में मां शिक्षित और संस्कारी होगी तो आने वाली पीढी का भविष्य उज्जवल होना तय है। इसी तर्ज पर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा संसाधन, साधन और धन के अभाव को शिक्षा में अडंगा न बनने की योजना बनाई है।

सरकार के अनेक महकमे अपनी अपनी महात्वाकांक्षी योजनाओं के माध्यम से बालिकाओं को कोर्स की किताबें, यूनीफार्म, छात्रवृत्ति तो मुहैया करा ही रहे हैं, साथ ही बालिकाओं के मन में पढाई के प्रति रूझान पैदा करने की गरज से सरकार ने जून 2008 से छटवीं कक्षा में प्रवेश लेने वाली हर कन्या को साईकिल देने का लोकलुभावना निर्णय भी लिया है।

सहज सुलभ व्यक्तित्व और सुलझे विचारों वाले सादगी पसन्द मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा महिलाओं के पिछडे होने के दर्द को समझा है। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने कमर कस ली है। महिलाओं में आत्मविश्वास जगाने का जिम्मा अपने कांधे पर उठाए शिवराज सिंह चौहान द्वारा एतिहासिक फैसले लेते हुए पंचायत संस्थाओं और नगरीय निकायों में पचास फीसदी, तो वन समितियों में एक तिहाई आरक्षण लागू करवा दिया है।

इतना ही नहीं 38 जिलों में महिला डेस्क, कार्यपालिक बल में सब इंसपेक्टर की भर्ती में तीस फीसदी, आरक्षक की भर्ती में दस फीसदी महिलाओं में रचनात्मकता को विकसित करने दो लाख रूपए के रानी दुगाZवती पुरूकार, समाज सेवा और वीरता के लिए राजमाता विजयाराजे सिंधिया और रानी अवन्ति बाई के नाम पर एक एक लाख रूपए के पुरूस्कार भी आरंीा किए गए है।

इतना ही नहीं वीरांगना रानी दुगाZवती के नाम पर बहुत समय से एक बटालियन की बहुप्रतिक्षित मांग को पूरा करते हुए 329 पदों का सृजन भी कर दिया है मध्य प्रदेश सरकार ने। इसके अलावा खेलों में महिलाओं को प्रोत्साहन देने हेतु ग्वालियर में राज्य महिला अकादमी की स्थापना भी कर दी गई है। हाकी के खिलाडियों को जब केन्द्र सरकार की ओर से तिरस्कार मिला तब शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें सहारा दिया है।

इस मंहगाई के दौर में गरीब के घर सबसे बडी समस्या उसकी बेटी के कन्यादान की होती है। शिवराज सिंह चौहान ने इस दर्द को बखूबी समझा है। जब वे संसद सदस्य हुआ करते थे, तब से उनके संसदीय क्षेत्र विदिशा में सामूहिक विवाहों का आयोजन होता रहा है। अब मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कन्यादान योजना का ही आगाज कर दिया है।

इस योजना में गरीब, जरूरत मन्द, नि:शक्त, निर्धन, कमजोर परिवारों की न केवल विवाह योग्य, वरन् परित्याक्ता, विधवा महिलाओं के लिए पांच हजार रूपए और सामूहिक विवाह के आयोजनों हेतु संस्थाओं को एक हजार रूपए प्रति कन्या के हिसाब से राशि सरकार द्वारा मुहैया करवाई जाती है।

विवाह के उपरान्त गर्भधारण करने पर भू्रण का लिंग परीक्षण वैसे तो केन्द्र सरकार द्वारा ही प्रतिबंधित किया गया है, इस मामले में एक कदम आगे बढते हुए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा परीक्षण करने वाले चिकित्सक अथवा संस्था को दण्ड दिए जाने का प्रावधान करने के साथ सूचना देने वाले को दस हजार का ईनाम भी देने की घोषणा की है।

बिटिया जब गर्भ धारण करती है तो उसकी गोद भराई की जवाबदारी भी मध्य प्रदेश सरकार अपने कांधों पर उठाती है। इस योजना के तहत गोद भराई आयोजन में गर्भवती स्त्री को मातृ एवं शिशु रक्षा कार्ड, आयरन फोलिक एसिड की गोलियां आदि देकर उसकी गोद भराई में नारियल, सिन्दूर, चूडियां और अन्य तोहफे भी दिए जाते हैं।

फिर आती है जननी सुरक्षा योजना की बारी। इसमें गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरित कर आर्थिक सहायता मुहैया करवाई जाती है। इसमें प्रेरक को प्रोत्साहन राशि के अलावा स्त्री को समीपस्थ सरकारी अस्पताल पहुंचाने में होने वाले व्यय को भी दिया जाता है।

रीब की बच्ची के अन्नप्राशन हेतु आंगनवाडी केन्द्र में अन्नप्राशन संस्कार में बच्ची को कटोरी चम्मच और खाद्य पदार्थ तोहफे में दिए जाते हैं। इसके बाद पढाई के लिए लाडली लक्ष्मी योजना, आत्मनिर्भरता के लिए अनेक योजनाओं के बाद जब बेटी के हाथ पीले करने की बारी आती है तब भी मध्य प्रदेश सरकार इसे अपनी चिन्ता मानती है। जिस सूबे में मातृशक्ति को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से लवरेज करने के प्रयास खुले दिल और दिमाग से हो रहे हों उस प्रदेश में राम राज्य आने में समय नहीं लगेगा।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

तीन दिन में सिमटी राष्ट्रभक्ति

तीन दिन में सिमटी राष्ट्रभक्ति


गणतन्त्र, स्वाधीनता और गांधी जयन्ती पर ही सुनाई देते हैं देशप्रेम के गाने

आजादी के मतवालों को भूल गई इक्कीसवीं सदी की युवा पीढी

देश प्रेम की अलख जगाने, महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी कवि प्रदीप ने

(लिमटी खरे)


कितने जतन के बाद भारत देश में 15 अगस्त 1947 को आजादी का सूर्योदय हुआ था। देश को आजाद कराने, न जाने कितने मतवालों ने घरों घर जाकर देश प्रेम का जज्बा जगाया था। सब कुछ अब बीते जमाने की बातें होती जा रहीं हैं। आजादी के लिए जिम्मेदार देश देश के हर शहीद और स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी की कुबाZनियां अब जिन किताबों में दर्ज हैं, वे कहीं पडी धूल खा रही हैं। विडम्बना तो देखिए आज देशप्रेम के ओतप्रोत गाने भी बलात अप्रसंगिक बना दिए गए हैं। महान विभूतियों के छायाचित्रों का स्थान सचिन तेन्दुलकर, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार जैसे आईकान्स ने ले लिया है। देश प्रेम के गाने महज 15 अगस्त, 26 जनवरी और गांधी जयन्ती पर ही दिन भर और शहीद दिवस पर आधे दिन सुनने को मिला करते हैं।


गौरतलब होगा कि आजादी के पहले देशप्रेम के जज्बे को गानों में लिपिबद्ध कर उन्हें स्वरों में पिरोया गया था। इसके लिए आज की पीढी को हिन्दी सिनेमा का आभारी होना चाहिए, पर वस्तुत: एसा है नहीं। आज की युवा पीढी इस सत्य को नहीं जानती है कि देश प्रेम की भावना को व्यक्त करने वाले फिल्मी गीतों के रचियता एसे दौर से भी गुजरे हैं जब उन्हें ब्रितानी सरकार के कोप का भाजन होना पडा था।

देखा जाए तो देशप्रेम से ओतप्रोत गानों का लेखन 1940 के आसपास ही माना जाता है। उस दौर में बंधन, सिकन्दर, किस्मत जैसे दर्जनों चलचित्र बने थे, जिनमें देशभक्ति का जज्बा जगाने वाले गानों को खासा स्थान दिया गया था। मशहूर निदेशक ज्ञान मुखर्जी द्वारा निर्देशित बंधन फिल्म सम्भवत: पहली फिल्म थी जिसमें देशप्रेम की भावना को रूपहले पर्दे पर व्यक्त किया गया हो। इस फिल्म में जाने माने गीतकार प्रदीप (रामचन्द्र द्विवेदी) के द्वारा लिखे गए सारे गाने लोकप्रिय हुए थे। कवि प्रदीप का देशप्रेम के गानों में जो योगदान था, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।


इसके एक गीत ``चल चल रे नौजवान`` ने तो धूम मचा दी थी। इसके उपरान्त रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जगाने का सिलसिला आरम्भ हो गया था। 1943 में बनी किस्मत फिल्म के प्रदीप के गीत ``आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ए दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है`` ने देशवासियों के मानस पटल पर देशप्रेम जबर्दस्त तरीके से जगाया था। लोगों के पागलपन का यह आलम था कि लोग इस फिल्म में यह गीत बारंबार सुनने की फरमाईश किया करते थे।


आलम यह था कि यह गीत फिल्म में दो बार सुनाया जाता था। उधर प्रदीप के क्रान्तिकारी विचारों से भयाक्रान्त ब्रितानी सरकार ने प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया, जिससे प्रदीप को कुछ दिनों तक भूमिगत तक होना पडा था। पचास से साठ के दशक में आजादी के उपरान्त रूपहले पर्दे पर देशप्रेम जमकर बिका। उस वक्त इस तरह के चलचित्र बनाने में किसी को पकडे जाने का डर नहीं था, सो निर्माता निर्देशकों ने इस भावनाओं का जमकर दोहन किया।

दस दौर में फणी मजूमदार, चेतन आनन्द, सोहराब मोदी, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे नामी गिरमी निर्माता निर्देशकों ने आनन्द मठ, लीजर, सिकन्दरे आजम, जागृति जैसी फिल्मों का निर्माण किया जिसमें देशप्रेम से भरे गीतों को जबर्दस्त तरीके से उडेला गया था।


1962 में जब भारत और चीन युद्ध अपने चरम पर था, उस समय कवि प्रदीप द्वारा मेजर शैतान सिंह के अदम्य साहस, बहादुरी और बलिदान से प्रभावित हो एक गीत की रचना में व्यस्त थे, उस समय उनका लिखा गीत ``ए मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी . . .`` जब संगीतकार ए.रामचन्द्रन के निर्देशन में एक प्रोग्राम में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने सुनाया तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू भी अपने आंसू नहीं रोक सके थे।

इसी दौर में बनी हकीकत में कैफी आजमी के गानों ने कमाल कर दिया था। इसके गीत कर चले हम फिदा जाने तन साथियो को आज भी प्रोढ हो चुकी पीढी जब तब गुनगुनाती दिखती है। सत्तर से अस्सी के दशक में प्रेम पुजारी, ललकार, पुकार, देशप्रेमी, कर्मा, हिन्दुस्तान की कसम, वतन के रखवाले, फरिश्ते, प्रेम पुजारी, मेरी आवाज सुनो, क्रान्ति जैसी फिल्में बनीं जो देशप्रेम पर ही केन्दित थीं।

वालीवुड में प्रेम धवन का नाम भी देशप्रेम को जगाने वाले गीतकारों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। उनके लिखे गीत काबुली वाला के ए मेरे प्यारे वतन, शहीद का ए वतन, ए वतन तुझको मेरी कसम, मेरा रंग दे बसन्ती चोला, हम हिन्दुस्तानी का मशहूर गाना छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी,


महान गायक मोहम्मद रफी ने देशप्रेम के अनेक गीतों में अपना स्वर दिया है। नया दौर के ये देश है वीर जवानों का, लीडर के वतन पर जो फिदा होगा, अमर वो नौजवां होगा, अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं . . ., आखें का उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता. . ., ललकार का आज गा लो मुस्करा लो, महफिलें सजा लो, देश प्रेमी का आपस में प्रेम करो मेरे देशप्रेमियों, आदि में रफी साहब ने लोगों के मन में आजादी के सही मायने भरने का प्रयास किया था।

गुजरे जमाने के मशहूर अभिनेता मनोज कुमार का नाम आते ही देशप्रेम अपने आप जेहन में आ जाता है। मनोज कुमार को भारत कुमार के नाम से ही पहचाना जाने लगा था। मनोज कुमार की कमोबेश हर फिल्म में देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत गाने हुआ करते थे। शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम, क्रान्ति जैसी फिल्में मनोज कुमार ने ही दी हैं।

अस्सी के दशक के उपरान्त रूपहले पर्दे पर शिक्षा प्रद और देशप्रेम की भावनाओं से बनी फिल्मों का बाजार ठण्डा होता गया। आज फूहडता और नग्नता प्रधान फिल्में ही वालीवुड की झोली से निकलकर आ रही हैं। आज की युवा पीढी और देशप्रेम या आजादी के मतवालों की प्रासंगिकता पर गहरा कटाक्ष कर बनी थी, लगे रहो मुन्ना भाई, इस फिल्म में 2 अक्टूबर को गांधी जयन्ती के बजाए शुष्क दिवस (इस दिन शराब बन्दी होती है) के रूप में अधिक पहचाना जाता है। विडम्बना यह है कि इसके बावजूद भी न देश की सरकार चेती और न ही प्रदेशों की।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार और राज्यों की सरकारें भी आजादी के सही मायनों को आम जनता के मानस पटल से विस्मृत करने के मार्ग प्रशस्त कर रहीं हैं। देशप्रेम के गाने 26 जनवरी, 15 अगस्त के साथ ही 2 अक्टूबर को आधे दिन तक ही बजा करते हैं। कुल मिलाकर आज की युवा पीढी तो यह समझने का प्रयास ही नहीं कर रही है कि आजादी के मायने क्या हैं, दुख का विषय तो यह है कि देश के नीति निर्धारक भी उन्हें याद दिलाने का प्रयास नहीं कर रहे हैं।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

आजाद भारत में ये हैं गण और यह रहा तन्त्र

आजाद भारत में ये हैं गण और यह रहा तन्त्र


महिला बाल विकास के साथ, सूचना प्रसारण मन्त्रालय ले नैतिक जवाबदारी

तीरथ के बजाए अंबिका से मांगना चाहिए इस्तीफा

गणतन्त्र की स्थापना के साठ साल पूरे होने पर कांग्रेस का देशवासियों को नायाब तोहफा

सवाल गिल्त किसकी का नहीं, कैसे हो गई गिल्त यह महत्वपूर्ण

(लिमटी खरे)


15 अगस्त 1947 को भारत देश को पराधीनता से मुक्ति मिली। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को भारण गणराज्य के गणतन्त्र की स्थापना हुई। भारत का गणतन्त्र आज किस मुकाम पर है किसी से छिपा नहीं है। देश के जिन गण के लिए तन्त्र की स्थापना की गई थी, आज वे गण तो हाशिए में सिमट गए हैं। अब तन्त्र चलाने वाले गण ही सब कुछ बनकर उभर चुके हैं। किसी को भारत देश के आखिरी छोर पर बैठे आम आदमी की चिन्ता नहीं है, हर कोई अपनी मस्ती और मद में चूर है। शिख से लेकर नख तक समूचे गण और उसका तन्त्र आकंठ विलासिता, राजशाही, में डूबकर भ्रष्टाचार और अमानवीयता का नंगा नाच दिखा रहा है।

भारत के गणतन्त्र के साठ साल पूरे होने की पूर्व संध्या से पहले ही भारत सरकार ने एक एसा करिश्मा कर दिखाया है, जिसे क्षम्य श्रेणी में कतई नहीं रख जा सकता है। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय बालिका दिवस पर रविवार को जो विज्ञापन प्रकाशित करवाया है, वह घोर आपत्तिजनक है। इस विज्ञापन के बारे में अब सरकार अपनी खाल बचाने की गरज से तरह तरह के जतन अवश्य कर रही हो पर तरकश से निकले तीर को वापस रखा जा सकता है, किन्तु धनुष से छूटे तीर को वापस नहीं लाया जा सकता है।

केन्द्र सरकार के मानव संसाधन विभाग द्वारा कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ प्रकाशित विज्ञापन में देश के वजीरे आलम डॉ.एम.एम.सिंह, कांग्रेस की शक्ति और सत्ता की शीर्ष केन्द्र श्रीमति सोनिया गांधी के साथ पडोसी मुल्क पाकिस्तान के पूर्व एयर चीफ मार्शल तनवीर महमूद अहमद का फोटो भी प्रकाशित किया है। तनवीर महमूद का फोटो इसमें प्रकाशित किया जाना किसी भी दृष्टिकोण से प्रासांगिक नहीं कहा जा सकता है।

केन्द्र सरकार के विज्ञापन सरकारी तौर पर जारी करने का दायित्व सूचना और प्रसारण मन्त्रालय के दिल्ली में सीजीओ काम्लेक्स में सूचना भवन के दृश्य एवं श्रृव्य निदेशालय (डीएव्हीपी) का होता है। सम्बंधित विभाग द्वारा विज्ञापन का प्रारूप या अपनी मंशा से इस महकमे को आवगत कराया जाता है। इसके उपरान्त यह विभाग उस विज्ञापन को डिजाईन करवाकर वापस सम्बंधित विभाग के अनुमोदन के उपरान्त प्रकाशन के लिए जारी करता है।

यहां यह उल्लेखनीय होगा कि जो भी विभाग अपने विज्ञापन का प्रकाशन करवाना चाहता है, वह विज्ञापन के साथ अनुमानित राशि का धनादेश और किन अखबारों में इसे प्रकाशित किया जाना है, उसकी सूची भी संलग्न कर भेजता है। यह समूची प्रक्रिया सूचना भवन के भूलत से लेकर नवें तल तक विभिन्न प्रभागों और अनुभागों से होकर गुजरती है। इस मामले में गिल्त किसकी है, यह मूल प्रश्न नहीं है, मूल प्रश्न तो यह है कि इतने हाथों से होकर गुजरने के बाद भी गिल्त कैसे हो गई।

दरअसल सूचना भवन में वषोZं से पदस्थ सरकारी नुमाईन्दों को अब अपने मूल काम के बजाए मीडिया की दलाली में ज्यादा मजा आने लगा है। कहते हैं कि पन्द्रह से पचास फीसदी तक के कमीशन पर यहां करोडों अरबों रूपयों के वारे न्यारे हो रहे हैं। सूचना प्रसारण मन्त्री अंबिका सोनी द्वारा अगर एक माह में ही विभागों द्वारा प्रस्तावित विज्ञापन, अखबारों की सूची, उनके देयक के भुगतान की जानकारी ही बुलवा ली जाए तो उनकी आंखें फटी की फटी रह जाएंगी कि उनकी नाक के नीचे किस कदर भ्रष्टाचार की गंगा अनवरत सालों साल से बह रही है। डीएव्हीपी में भ्रत्य से लेेकर उप संचालक स्तर तक के अधिकारियों का पूरा कार्यकाल डीएव्हीपी के दिल्ली कार्यालय में ही बीत गया है।

इस मामले में अपनी खाल बचाने के लिए महिला बाल विकास मन्त्री कृष्णा तीरथ द्वारा तर्क के बजाए कुतर्क देना उनके मानसिक दिवालियापन के अलावा और कुछ नहीं माना जा सकता है। यह कोई छोटी मोटी गिल्त नहीं जिसकी निन्दा कर इसे भुलाया जा सके। अगर चाईल्ड वेलफेयर मिनिस्ट्री ने तनवीर महमूद की फोटो जारी की भी हो तो क्या डीएव्हीपी की सारी सीिढयों पर धृतराष्ट्र के बंशज ही विराजमान हैं।

वायूसेना का कहना सच है कि इस तरह से सरकारी विज्ञापनों में अगर भारत के खिलाफ आतंकवाद का ताना बाना बुनने वाले पकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख का फोटो प्रकाशित किया जाएगा तो सैनिकों का मनोबल गिरना स्वाभाविक ही है। उपर से तीरथ के उस बयान ने आग में घी का ही काम किया है जिसमें तीरथ ने कहा है कि फोटो के बजाए विज्ञापन की भावनाओं पर ध्यान दें। तीरथ का यह बयान राष्ट्रभक्तों की भावनाएं आहत करने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है।

अगर विज्ञापनों में फोटो महत्वहीन होती हैं तो फिर उसमें सोनिया और मनमोहन की फोटो लगाई ही क्यों गई। और अगर तीरथ के बजाए इस विज्ञापन में पाकिस्तान की किसी महिला नेत्री की फोटो लग जाती तब भी क्या तीरथ के तेवर यही रहते, जाहिर है नहीं, क्योंकि उस वक्त तो विभाग के न जाने कितने अफसरान निलंबन की राह से गुजर चुके होते।

इस तरह के विज्ञापन के लिए प्रधानमन्त्री कार्यालय और तीरथ ने तो कुतर्कों के साथ माफी मांग ली है, किन्तु भारत सरकार के सूचना प्रसारण मन्त्रालय (आई एण्ड बी मिनिस्ट्र) दायित्व सम्भालने वाली अंबिका सोनी क्यों खामोश हैं। दरअसल यह गिल्त सूचना प्रसारण मन्त्रालय के डीएव्हीपी प्रभाग की है, सो उन्हें भी सामने आना चाहिए। गिल्त से अगर महिला बाल विकास विभाग ने तनवीर महमूद की फोटो जारी भी कर दी तो आई एण्ड बी मिनिस्ट्र के डीएव्हीपी प्रभाग की जवाबदारी यह नहीं बनती है कि वह सम्बंधित विभाग को यह बताए कि यह फोटो प्रासंगिक नहीं है।

बहरहाल देश में गण की रक्षा, समृद्धि, विकास के लिए स्थापित किए गए तन्त्र ने साठ साल पूरे कर लिए हैं। आज आजाद भारत में गणतन्त्र पहले से मजबूत हुआ है या कमजोर इस पर टिप्पणी करना बेमानी ही होगा, क्योंकि भारत के गणतन्त्र की गाथा सबके सामने ही है। जब गणतन्त्र की स्थापना के पचास साल पूरे होने के महज दो दिन पहले ही भारत सरकार का तन्त्र इतनी भयानक और अक्षम्य लापरवाही करे तब गणतन्त्र के हाल किसी से छिपे नहीं होना चाहिए।

युवराज से घबराई भाजपा


ये है दिल्ली मेरी जान


(लिमटी खरे)

युवराज से घबराई भाजपा

कांग्रेस की नज़र में भविष्य के प्रधानमन्त्री राहुल गांधी की लोकप्रियता शायद इस कदर बढ गई है कि अब भाजपा द्वारा उन पर तीखे प्रहार आरम्भ कर दिए हैं। भाजपा द्वारा राहुल गांधी के युवा जोडो अभियान में पलीता लगाने के हर सम्भव प्रयास किए जा रहे हैं। हाल ही में राहुल गांधी की मध्य प्रदेश यात्रा के उपरान्त भाजपा शासित राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश की अघोषित व्यवसायिक राजधानी इन्दौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलपति और रजिस्टार को नोटिस भेजकर जवाब तलब किया है। गौरतलब होगा कि राहुल इस विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में शिरकत करने गए थे, इस दौरान वे विद्यार्थियों से रूबरू हुए और उन्होंने राजनीति में सक्रिय होने का न्योता दिया था। यह अलहदा बात है कि राजनीति को दूर से सलाम करने वाले विद्यार्थियों की यहां ज्यादा तादाद थी, किन्तु भाजपा सरकार को यह रास नहीं आया और राज्य के उच्च शिक्षा विभाग ने यूनिवर्सिटी को नोटिस देकर पूछा है कि इस तरह के राजनैतिक कार्यक्रम की इजाजत किसने दी थी। उधर कांग्रेस के तथाकथित थिंक टैंक समझे जाने वाले सांसद अनिल माधव दुबे ने भी नहले पर दहला मारकर ग्वालियर, इन्दौर, भोपाल और सागर के शैक्षणिक संस्थाओं को पत्र लिखकर कहा है कि वे उनके भी इस तरह के कार्यक्रम आयोजित कराएं ताकि वे बच्चों को पर्यावरण के बारे में विस्तार से समझा सकें।

इन्दिरा गांधी को कोसा मोंटेक ने

कांग्रेस का दुश्मन और कोई नहीं कांग्रेस ही है, यह बात कांग्रेस से जुडे न जाने कितने बडे नेता और जनसेवक कह चुके हैं। शशि थुरूर हों या फिर खुद राहुल गांधी अपने बडबोलेपन से कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने से नहीं चूकते। अबकी बार योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने ही इन्दिरा गांधी की नीतियों की आलोचना कर डाली। अहलूवालिया का कहना है कि इन्दिरा गांधी की गरीबी उन्नमूलन की नीतियों के जरिए गरीबी को मिटाया जाना सम्भव नहीं है। गरीबी उन्नमूलन पर पटना में आयोजित एक सम्मेलन में अहलूवालिया ने इस तरह का बयान देकर सनसनी पैदा कर दी। हलांकि अहलूवालिया के इस कथन को मीडिया ने ज्यादा हवा नहीं दी फिर भी कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के अंग ही कांग्रेस के लिए नित नई मुसीबत पैदा करने से नहीं चूक रहे हैं। कांग्रेस का भाग्य अच्छा कहा जा सकता है, क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के खेमे में पिछले तीन चार माहों से खामोशी पसरी हुई है। यही कारण है कि अनेक अच्छे, ज्वलन्त और प्रभावी मुद्दे भाजपा के हाथ से निकलते जा रहे हैं।

अरूण वसेZस अरूण!
भाजपा में इन दिनों दो अरूण के बीच घमासान मचा हुआ है। पिछले अनेक चुनावों में मुंह की खाने के बाद भाजपा के नए निजाम नितिन गडकरी की ताजपोशी के बाद अरूण जेतली और अरूण शोरी की तोपें शान्त हो गईं थीं, यह शान्ति क्षणिक ही थी। गौरतलब होगा कि आंग्ल भाषा में कुछ दिनों पूर्व मूलत: पत्रकार किन्तु अब राजनेता अरूण शोरी ने अपने एक लेख के माध्यम से तहलका मचा दिया था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन नेतृत्व पर जमकर प्रहार किया था। सभी को घोर आश्चर्य हुआ था कि शोरी ने अचानक अपना मोर्चा पार्टी के उमर दराज नेता एल.के.आडवाणी और अरूण जेतली के खिलाफ एकाएक कैसे खोल दिया। शोरी के नजदीकी सूत्रों की मानें तो अरूण वसेZस अरूण की लडाई में अल्पविराम लगा है किन्तु दोनों अन्दर ही अन्दर तलवारें पजा रहे हैं, जो कभी भी खुलकर सामने आ सकतीं हैं। अनुशासन का दंभ भरने वाली भाजपा में अनुशासनहीनता की मिसालें जब तब देखने को मिलतीं हैं। गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी को ही लें, जिन्होंने अब तक भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी से सोजन्य भेंट तक करने का समय नहीं निकाला है।

भूख हडताल की उम्र दो सौ साल
अपनी बातें मनवाने के लिए घर हो या बाहर सभी भूख हडताल का ही साहारा लेते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भूख हडताल की आयु अब दो सौ साल और एक महीना होने वाली है। भारत में भूख हडताल का सिलसिला 26 दिसम्बर 1809 को बनारस में भूमि एवं भवन कर के मुद्दे को लेकर आरम्भ हुआ था। तब पहली बार भारतवंशियों ने भूखहडताल को विरोध प्रदेर्शन के लिए अपना अस्त्र बनाया था। उस समय महज पांच लोगों ने इसका आगाज किया और जल्द ही समूचे शहर ने इसे अंगीकार कर लिया था। 1809 में जब देश की धर्मनगरी बनारस दंगे की आग में जल रही थी, तभी तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर बर्ड ने एक तुगलकी फरमान सुनाते हुए शहरवासियों पर भूमि और भवन का कर लगा दिया। इसके विरोध में गौरीकेदारेश्वर मन्दिर के महन्त परिवार से जुडे पांच सदस्यों ने भूख हडताल आरम्भ की और लगभग एक माह चली इस हडताल के बाद कलेक्टर बर्ड को घुटने टेकने पडे। फिर क्या था, गलत बात के विरोध में भूख हडताल करना अब सभी का प्रिय शगल बन चुका है।

राजमाता का आंचल ममता को नहीं दे रहा छांव
कांग्रेस की सुप्रीमो श्रीमति सोनिया गांधी और त्रणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के बीच सब कुछ सामान्य नहीं दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के मामले में दोनों ही के बीच खाई बढती ही जा रही है। ममता चाहतीं हैं कि केन्द्र का पूरा दोहन कर वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमन्त्री की कुर्सी हथिया लें उधर प्रणव मुखर्जी की नज़रें भी इसी कुर्सी पर लगी हुइंZ हैं। पिछले दिनों ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि उनके टेलीफोन और बिना तार के फोन की भी टेपिंग कर उन पर नज़र रखी जा रही है। ममता का इशारा राज्य सरकार की ओर था या कांग्रेस की ओर यह उन्होंने साफ नहीं किया है, पर ममता की बयानबाजी से साफ होने लगा है कि जैसे जैसे बंगाल के चुनावों का समय नजदीक आता जा रहा है वैसे वैसे कांग्रेस और ममता के बीच दूरियां बढने लगीं हैं। ममता ने इस समस्या से निपटने की महती जवाबदारी पूर्व रेल्वे के मुख्य सुरक्षा आयुक्त बी.मोहन को सौंप दी है कि उनके फोन की टेपिंग और उन पर निगरानी को रोका जा सके।


कब हटेगी किलर ब्लू लाईन!
देश की राजनैतिक राजधानी इस साल होने वाले कामनवेल्थ गेम्स की तैयारियों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। समय कम होने के बावजूद युद्ध स्तर पर तैयारियां जारी हैं। विदेशों से आने वाले मेहमानों को दिखाने के लिए दिल्ली की परिवहन व्यवस्था को भी चाक चौबन्द किया जा रहा है। दिल्ली की सडकों पर यमराज बनकर दौडती किलर लाईन बन चुकी ब्लू लाईन बस को हटाने के लिए बस घोषणाओं पर घोषणाएं ही की जा रहीं हैं। शीला सरकार द्वारा अनेक मर्तबा तारीख मुकर्रर की जा चुकीं हैं कि फलां तारीख तक ब्लू लाईन बस हट जाएंगी, किन्तु ``दामिनी`` फिल्म की तरह यह तारीख पर तारीख ही साबित हो रहा है। ब्लू लाईन के एवज में डीटीसी ने लो फ्लोर बस उतारने की कवायद की है। लक झक बस कुछ मार्ग पर संचालित होना आरम्भ भी हो गईं हैं, पर ब्लू लाईन जस की तस ही हैं। कहा जा रहा है कि जनसेवकों या उनके नाते रिश्तेदारों और चाहने वालों की बसें ही हैं ब्लू लाईन, सो उनके दबाव के चलते इन्हें सडक से हटाने में देर हो रही है।

संस्कृत में अखबार हो कहा शीला ने
दिल्ली की कुर्सी पर तीसरी मर्तबा विराजीं शीला दीक्षित का मानना है कि संस्कृत भाषा में भी समाचार पत्र का प्रकाशन किया जाना चाहिए। चौंकिए मत, दरअसल शीला दीक्षित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित कौमुदी संस्कृत नाटक महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर बोल रहीं थीं, वरना संस्कृत की फिकर किसे है। वैसे भी अगर देखा जाए तो हमारी प्राचीन भाषा संस्कृत को काशी के अलावा संरक्षण कहां मिल पा रहा है। सरकारों द्वारा भी जब राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ ही दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा हो तब संस्कृत के साथ अन्याय होना स्वाभाविक ही है। आज स्कूल कालेज में संस्कृत पर जोर कतई नहीं दिया जाता है। शीला दीक्षित खुद एक सूबे की निजाम हैं, वे बेहतर जानतीं हैं कि किस तरह संस्कृत को संरक्षण दिया जा सकता है, पर वे एसा करने में न जाने क्यों हिचकतीं हैं। शीला जी, जब संस्कृत की पढाई ही नहीं होगी तो भला कोई इस भाषा में छपा अखबार पढेगा कैसे। वैसे भी आप इसी से सम्बंधित एक समारोह में शिरकत कर रहीं थीं, अत: आपका भाषण इस पर केन्द्रित होना स्वाभाविक ही है। सच ही है राजनेताओं की कथनी और करनी में बडा भेद होता है।

. . . . अभी भाजपा खामोश है
अक्टूबर माह के बाद से अब तक भाजपा में खामोशी ही पसरी हुई है। केन्द्र सरकार की अनेक विसंगतियों, विफलताओं के बाद भी भाजपा ने अपना मुंह सिला हुआ है। एसा नहीं है कि भाजपा मरण शैया पर है। दरअसल भाजपा के अन्दरूनी सत्ता हस्तान्तरण के दौरान अन्त:पुर में व्याप्त खामोशी उभरकर सामने आ गई है। पहले चला चली की बेला में राजनाथ सिंह ने विवादित होने से बचने के लिए चुप्पी साध रखी थी, फिर दिसम्बर में नितिन गडकरी को कमान सौंप अवश्य दी, किन्तु उनकी नियुक्ति अडहाक ही थी। उस पर कंफरमेशन की मुहर फरवरी में राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लगेगी। फिर गडकरी अपनी सेना का गठन करेंगे, उसमें कोैन स्थान पाएगा कौन नहीं यह बात अभी साफ नहीं है। लिहाजा भाजपा के प्रवक्ता भी जबर्दस्त मुद्दों पर खामोशी अिख्तयार किए हुए हैं। दूसरी ओर नए पदाधिकारी और प्रवक्ताओं को सेट होने में कम से कम दो माह का समय लगेगा। इस तरह देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी का प्रचार तन्त्र छ: महीने के लिए सुस्सुप्तावस्था में चला गया है। किसी भी नेता को इस वेक्यूम को भरने की फुर्सत नहीं है। इन सपनों और कार्यप्रणाली के साथ भाजपा केन्द्र और देश के अनेक राज्यों में सत्तारूढ होने का दंभ भर रही है, जय हो. . .!

कब होगा घोषणाओं पर अमल
सदन चाहे विधानसभा का हो राज्य सभा या लोकसभा का, मन्त्रियों का काम घोषणा करना है, उनका पालन किस स्तर पर हो रहा है, इस बारे में जानने की सुध किसी को भी नहीं है। गरीब रथ, दुरन्तो एक्सप्रेस जैसी रेल गाडियों में सभी श्रेणियों के यात्रियों को बिस्तर (बेड रोल) उलब्ध कराने की ममता बनर्जी की घोषणा नई अवश्य लगती है, किन्तु यह कोई अलग से उपलब्ध कराई गई सुविधा नहीं है। यह तो रेल्वे के संसाधनों पर ही निर्भर करता है कि उसे किस किस रेल में किस श्रेणी में क्या उपलब्ध करवाना है। देखा जाए तो रेल्वे की वाणिज्य नियमावली में बहुत पहले ही यह प्रावधान कर दिया गया था कि रेल में सफर करने वाले यात्रियों को उनकी मांग के अनुरूप शुल्क लेकर बिस्तर उपलब्ध कराया जा सकेगा। दुरन्तो और गरीब रथ में बेड रोल की सुविधा सशुल्क प्रस्तावित है। दरअसल रेल के सीमित संसाधनों के चलते यात्रियों को यह सुविधा सशुल्क भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। हो भी क्यों, रेल मन्त्री को वाहवाही लूटना था, सो इस तरह की घोषणा कर दी, फिर उसका पालन हो रहा है या नहीं, इस पर कान देना उनका फर्ज नहीं होता है शायद।

दिल्ली में भीख मांगना अपराध नहीं!
एक तरफ देश की साख इस साल के अन्त में होने वाले कामन वेल्थ गेम्स पर लगी है। विदेशी आकर देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली की बदहाली न देख सकें इसके लिए करोडों अरबों रूपए व्यय कर दिल्ली को संवारा जा रहा है। दिल्ली में चौक चौराहों पर भीख मांगते अधनंगे लोगों को देखकर विदेशी भारत के असली चेहरे को आसानी से पहचान सकते हैं। दिल्ली के हृदय स्थल कनाट प्लेस पर सूखा नशा (पुडिया के नशे) के आदी हो चुके भिखारियों को पकडने पुलिस ने अनेक बार मुहिम भी छेडी है। लगता है आने वाले समय में दिल्ली में भीख मांगना अपराध नहीं होगा। दिल्ली सरकार भिक्षावृति को अपराध मुक्त बनाने के लिए कानून में परिवर्तन करना चाह रही है। गरीबी एक अपराध नहीं है, और गरीबी के चलते ही लोग भीख मांगते हैं, इस आधार पर दायर एक याचिका के जवाब में दिल्ली सरकार ने कहा है कि वह मुम्बई प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट में बदलाव पर विचार कर रही है। तीसरी बार कुर्सी पर बैठ कर शीला दीक्षित ने निश्चित ही एक रिकार्ड बनाया है, और वे अब जो भी करें सो कम ही होगा।

प्रवासी एससी एसटी आरक्षण के हकदार नहीं
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछडा वर्ग के आरक्षण का लाभ प्रवासियों को नहीं दिया जा सकता है। न्यायालय ने कहा है कि एक राज्य में रहने वाले एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षित वर्ग के अभ्यार्थी दूसरे सूबे में जाकर इसका लाभ नहीं ले सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश एस.बी.सिन्हा और सिरियाक जोसफ की युगल बैंच ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह व्यवस्था दी है। बैंच ने कहा है कि ग्यारह सदस्यीय बैंच ने अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में फैसला दिया था, एससी एसटी वर्ग के अभ्यार्थियों द्वारा सर्वोच्च न्यायायल में याचिका दायर की थी, जिसमें दिल्ली प्रशासन में आरक्षित नौकरियों में आरक्षण से लाभांवित होने की बात कही गई थी। इस याचिका को युगल बैंच ने खारिज कर दिया।

यह है आजाद भारत की तस्वीर
ब्रितानियों की परातन्त्रता से आजाद हुए छ: दशक से ज्यादा बीत चुके हैं, भारत के गणतन्त्र की स्थापना को भी साठ साल पूरे हो चुके हैं, पर भारत की वास्तविक तस्वीर से आज भी देश के नीति निर्धारक रूबरू नहीं हैं। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली से कुछ ही दूर हरियाणा के फरीदाबाद गांव में पीर बाबा की मजार के पास एक आठ वषीZय बच्चा पान गुटखा बेच रहा है, जबकि सरकार ने अठ्ठारह साल से कम उमर के लोगों को पान गुटखा बेचने पर ही पाबन्दी लगाई हुई है। दिल्ली में ही अनेक स्थानों पर एक रूपए में ठण्डा पानी पिलाने वाली मशीन हो या फिर अघोषित मयखानों में गिलास पानी की सुविधा देने वाले हाथ, हर जगह नाबालिकों की खासी तादाद है। इन बच्चों से अगर पूछ ही लिया कि बेटा स्कूल जाते हो तो इनका एक ही उत्तर होता है, स्कूल कैसा होता है, अंकल। यह है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, चाचा जवाहर लाल नेहरू और प्रियदर्शनी इन्दिरा गांधी के सपनों के भारत की तस्वीर।

भाजपा को मिला था पचास लाख का चन्दा
चुनाव में किस दल को कितना चन्दा मिला, यह बात सार्वजनिक करना न करना उस पार्टी का अपना अन्दरूनी मामला हो सकता है, किन्तु अगर जनसेवा के लिए राजनीति करने उतरे जनसेवक ही इस बात को जनता से छिपाएं तो बात कुछ हजम नहीं होती है। आयकर छापों के दौरान उडीसा के एक कारोबारी ने यह स्वीकार किया है कि उसने लोकसभा चुनाव में भाजपा को पचास लाख रूपए का चन्दा दिया था। राजनैतिक दलों को चन्दा देने पर आयकर में छूट का प्रावधान है, इसलिए मोटी रकम काटने वाले व्यवसायी दोहरा लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं। उडीसा के एक खनन व्यवसायी के बारे में सूचना के अधिकार के उपरान्त यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि उसने भाजपा को पचास लाख रूपए का चन्दा दिल्ली के एक ट्रस्ट के माध्यम से दिया था। मजे की बात यह है कि भाजपा की पंजी में यह रकम उक्त व्यवसायी के नाम पर दर्ज है, किन्तु चन्दा ट्रस्ट के माध्यम से दिया गया था।

पुच्छल तारा
भोपाल से श्वेता तिवारी द्वारा भेजे गए ईमेल के अनुसार बाघ को पाने के दो ही तरीके हैं, पहला तो जंगल जाओ और बाघ को खोजो, जो बहुत ही कठिन और जोखिम का काम है। दूसरा यह कि बिल्ली को पकडो, और भारतीय पुलिस की तरह तब तक पीटो जब तक वह यह स्वीकार न कर ले कि वह बाघ ही है।